ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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श्रीमत् स्वामी शिवानन्द महाराज, आश्रम-वरुड, ( जि० अमरावती । ) P.O.-WARUD, ( Dist. Amraoti. )
भूमिका
प्रथम संस्करण से
“मूकं करोति वाचालं पंगुं” लंघयते गिरिम् ।
यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्द माधवम् ॥ १ ॥
इस छोटे से ग्रन्थ में सर्वत्र स्वानुभव-प्रकाश और साथ ही साथ शास्त्र व परानुभव-प्रकाश भी किया है। इसमें अनुभव की बातें कूट कूट कर भरी होने के कारण यह ग्रन्थ और भी महत्व का हुआ है। इसका मुख्य विषय “Chastity is Life and Sensuality is Death” यानी “ब्रह्मचर्य ही जीवन है और वीर्यनाश ही मृत्यु है” यह है। जब शरीर में से चैतन्य निकल जाता है तब उसके साथ ही साथ रक्त और वीर्य, ये दो जीवन-प्रद तत्व भी मृत्यु के बाद शीघ्र ही गायब हो जाते हैं; और उनका पानी बन जाता है। जिस मनुष्य को हैजा होता है उसके रक्त का पानी बनने लग जाता है और वही पानी फिर कैं और दस्त के द्वारा बाहर निकलने लगता है। कोई अंग काटने पर भी उसके शरीर से खून नहीं निकलता; पश्चात् वह बहुत जल्द मृत्यु को प्राप्त होता है। अतः यह सिद्ध है कि “जब तक मनुष्य के शरीर में रक्त व वीर्य ये दो चीजें मौजूद हैं, तभी तक वह जीवित रह सकता है और इनका नाश होने से उसका भी तत्काल नाश हो जाता है। जितना मनुष्य वीर्य का नाश करता है उतना ही वह रक्त-विहीन बन कर मृत्यु की ओर घराघरा भुक्तता जाता है। जितना अधिक मनुष्य वीर्य को धारण करता है उतना ही अधिक वह सजीव बनता जाता
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है; उसमें शक्ति, तेज, निश्चय, सामर्थ्य, पुरुषार्थ, बुद्धि, सिद्धि और ईश्वरत्व प्रगट होने लगते हैं और वह दीर्घकाल पर्यन्त जीवनलाभ कर सकता है। वीर्य हीन पुरुष को कोई भी तार नहीं सकता और वीर्यवान पुरुष को कोई भी ( रोग ) अकाल में मार नहीं सकता ! दुर्बल को ही सब कोई सताते हैं । “दैवो दुर्वलघातकः” यही प्रकृति का नियम है । सच पृच्छिए तो “वीर्य ही अमृत* है ।” इसी के रक्षा करने से अर्थात् धारण करने से मनुष्य अजर अमर होता है । भीष्म पितामह इसी संजीवनी शक्ति के कारण अमर ( यानी अकाल में मृत्यु न पाने वाले ) और इतने सामर्थ्य-संपन्न हुए थे । यदि हम भी इस की रक्षा करें अर्थात् वीर्य रोक कर ब्रह्मचर्य धारण करेंगे, तो हम भी वैसे ही प्रभावशाली और उन्नतिशाली बन सकते हैं । क्योंकि वीर्य रक्षा ही आत्मोद्धार का रहस्य है और इसी में जीवमात्र का जीवन है ।
इस ग्रन्थ में वीर्यरक्षा सम्बन्धी जो अन्तः और स्वातुभूत नियम बतलाये गये हैं वे बहुत ही अनमोल हैं ! स्वतः अनुभव किये होने के कारण वे अत्यन्त ही सिद्ध हैं—रामवाण हैं—कभी भी निष्फल होने वाले नहीं हैं । केवल नियम ही भर पढ़ लेने से मनुष्य वीर्यरक्षा करने में निःसन्देह समर्थ हो सकता है, परन्तु यदि वह इस ग्रन्थ को “आद्योपान्त” पढ़ लेगा तो वह उन नियमों का मर्म भली भाँति समझ जायगा और उसमें वीर्यरक्षा के लिये एक अद्भुत जोश पैदा होगा, जिससे वह उन्नति अवश्य करेगा । आप स्वयं अनुभव करके देख लीजिये ।
क्या तुम जीवित रहना चाहते हो ? तब फिर तुम्हें अवश्य ही वीर्य के नाश से बचना होगा और इस ग्रन्थ में दिये हुये नियमों
*शास्त्र में अमृत का रूप ‘यूध्द’ वर्णन किया है ।
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के अनुसार मन, क्रम, वचन से चलना होगा। जो मनुष्य इन नियमों के अनुसार केवल दो ही साल तक चलेगा उसका जीवन-प्रवाह बिल्कुल ही बदल जायगा, शरीर और मन में अद्भुत परिवर्तन होगा, पापात्मा भी निःसंशय पुरयात्मा बन जायगा ! व्यभिचारी भी ब्रह्मचारी बन जायगा !! और दुर्बल भी सिंह तथा दुरात्मा भी साधु महात्मा बन सकेगा !!!
पर हाँ, नियमों को किसी कारण तोड़ना न होगा ! उन्हें दृढ़ता के साथ निवाहना होगा। यदि कोई जीवन-पर्यन्त इन नियमों के अनुसार चले तो फिर कहना ही क्या है ? वह इस मृत्युलोक में ही देवता के तुल्य पूजनीय बन जायगा, इसमें कोई सन्देह नहीं है।
इस ग्रन्थ में दिये हुये ब्रह्मचर्य-पालन के नियम अत्यन्त ही सरल व सुलभ हैं। उनमें एक कौड़ी का भी खर्च नहीं है। जैसे हम पालन कर रहे हैं वैसे आप भी पालन कर सकते हैं। यदि दिल से निश्चय करलो तो क्या नहीं हो सकता ? “Resolution is victory” अर्थात् निश्चय ही वल है और निश्चय ही फल है !
प्रत्येक मनुष्य में ईश्वरीय शक्ति वास कर रही है। दया, क्षमा, शान्ति, परोपकार, भक्ति, प्रेम, वीरता, स्वतंत्रता, सत्य और कृकर्म से अरुचि इन सब के अंकुर हृदय में रक्खे हुए हैं चाहे उन्हें सींच कर बढ़ावो चाहे सुखा दो ?
परमात्मा सब को सुवृद्धि प्रदान करे और उनका उद्धार करे !
सब का नम्र वन्द्य—
शिवानन्द
ॐ ! ॐ !! ॐ !!!
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११
ॐ तत्सत्
ब्रह्मचर्य ही जीवन है
१—ब्रह्मचर्य की महिमा
न तपस्तप इत्याहुर्ब्रह्मचर्यं तपोऽमम् । ऊर्ध्वरेता भवेद् यस्तु स देवो न तु मानुषः ॥ १ ॥
भगवान् कैलाशपति शङ्कर कहते हैं:—“ब्रह्मचर्य अर्थात् वीर्य धारण यही उत्कृष्ट तप है। इससे बढ़ कर तपश्चर्या तीनों लोकों में दूसरी कोई भी नहीं हो सकती। ऊर्ध्वरेता पुरुष अर्थात् अखण्डवीर्य का धारण करनेवाला पुरुष इस लोक में मनुष्य रूप में प्रत्यक्ष देवता ही है।”
अहा हा ! क्या ही महान् इस ब्रह्मचर्य की महिमा है ! परन्तु आज हम इस महानता को मूलकर नीचता की धूल में दास्यभाव से विचरण कर रहे हैं। कहाँ हमारे वीर्यवान्, सामर्थ्य-संपन्न पूर्वज और कहाँ हम उनकी निर्वीर्य और पद-दलित दुर्बल सन्तान ! ओफ़ ! कितना यह आकाश पाताल का अन्तर हो गया है ? हमारा कितना भयंकर पतन हुआ है ? इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है कि हमारा यह जो भीषण पतन हुआ है इसका मुख्य कारण एक मात्र
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
हमारे “ब्रह्मचर्य का हास” ही है। ब्रह्मचर्य के नाश से ही हमारा संपूर्ण सत्यानाश हो गया है। हमारा सुख, आरोग्य, तेज, विद्या, बल, सामर्थ्य, स्वातन्त्र्य और धर्म संपूर्ण हमारे ब्रह्मचर्य के ऊपर ही सर्वथा निर्भर है। ब्रह्मचर्य ही हमारे आरोग्य-मन्दिर का एक मात्र आधारस्तंभ है। आधारस्तंभ के टूटने से जैसे सम्पूर्ण भवन ढह जाता है, वैसे ही वीर्यनाश होने से संपूर्ण शरीर का भी नाश अति शीघ्र हो जाता है। जैसे जैसे हमारे ब्रह्मचर्य का नाश होता है, वैसे वैसे हमारा स्वास्थ्य का भी नाश होता जाता है। “मरणं विन्दुपातेन जीवनं विन्दुधारणात्।” यह भगवान् शंकर का अमिट सिद्धान्त है। वीर्य को नष्ट करने वाला पुरुष कभी बच नहीं सकता और वीर्य को धारण करनेवाला कभी अकाल में मर नहीं सकता। तत्वतः व वस्तुतः ब्रह्मचर्य ही जीवन है और वीर्यनाश ही मृत्यु है। ब्रह्मचर्य के अभाव से हम किसी अवस्था में सुखी और उन्नत नहीं हो सकते। ब्रह्मचर्य ही हमारे इह लोक व परलोक के सुख का एक मात्र आधार है। यही नहीं किन्तु ब्रह्मचर्य ही हमारे चारों पुरुषार्थों का मुख्य मूल है—मुक्ति का प्रदाता है। वीर्य अत्यन्त अनमोल वस्तु है। इसी वीर्य के बल पर मनुष्य देवता बनता है और उसके नाश से वह पूर्ण पतित बन जाता है। विना ब्रह्मचर्य धारण किये हुए कोई भी पुरुष कदापि श्रेष्ठ पद को प्राप्त नहीं कर सकता। वीर्य-अष्ट पुरुष कदापि, पाषाणमा, धर्मात्मा व महात्मा नहीं हो सकता। विना ब्रह्मचर्य के प्रत्यक्ष इन्द्र भी तुच्छ और पददलित हो सकता है तब फिर सामान्य मनुष्यों की वातही क्या है ? अतः ब्रह्मचर्य ही हमारी संपूर्ण विद्या, वैभव और सौभाग्य का आदि कारण है ! ब्रह्मचर्य ही हमारी श्रेष्ठता, स्वतंत्रता
❁ अष्ट मैथुन ❁
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और सम्पूर्ण उन्नति का बीज मन्त्र है !! ब्रह्मचर्य ही हमारी सम्पूर्ण सिद्धियों का एकमात्र रहस्य है !!!
२-अष्ट मैथुन
“स्मरणं कीर्तनं केलिः प्रेक्षणं गुह्यभाषणं ।
संकल्पोऽध्यवसायश्च क्रिया निष्पत्तिरेव च ॥
“एतन्मैथुनमष्टांगं प्रवदन्ति मनोपिणः ।
विपरीतं ब्रह्मचर्यं एतत् पवाप्नु लक्षणम् ॥ १ ॥
शास्त्र में ब्रह्मचर्य-नाश के आठ मैथुन बतलाये हैं:—( १ ) किसी जगह पढ़े हुए, सुने हुये या चित्र में वा अत्यन्त दृश्ये हुए स्त्री का ध्यान, चिन्तन वा स्मरण करना । ( २ ) स्त्रियों के रूप, गुण और अंग अत्यन्त का वर्णन करना—शृङ्गारिक गायन वा कजली गाना अथवा भड़ी बातें बकना । ( ३ ) स्त्रियों के साथ गेंद, ताश, शतरंज होली इत्यादि खेल खेलना । ( ४ ) किसी स्त्री की ओर गीध या ऊंट की तरह गर्दन उठा कर या घुमाकर पाप-दृष्टि से अथवा चोर-दृष्टि से देखना । ( ५ ) स्त्रियों में बार बार आना, जाना और उनके साथ एकान्त में बातचीत करना । ६ शृङ्गार-रस-पूर्ण वाहियात उपन्यास पढ़कर किंवा स्त्रियों के भड़े फोटो देखकर, अथवा नाटक वा सिनेमा के रद्दी कामचेश्ठापूर्ण दृश्य देखकर उन्हीं की कल्पनाओं में निमग्न रहना । ( ७ ) किसी अ-प्राप्य स्त्री की प्राप्ति के लिये व्यर्थ पापपूर्ण प्रयत्न करना । और ( ८ ) अत्यन्त संभोग । ये ही अष्ट मैथुन हैं । इन लक्षणों के विलकुल विरुद्ध लक्षण अखण्ड ब्रह्मचर्य के होते हैं । आदर्श ब्रह्मचर्य में इनमें का एक लक्षण वा मैथुन नहीं आना चाहिये । क्योंकि इनमें का कोई भी मैथुन किंवा लक्षण मनुष्य को नष्ट अष्ट करने में पूर्ण समर्थ है ।
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
३-हस्तमैथुन और उसके दुष्परिणाम
आजकल समाज में उपर्युक्त अष्ट मैथुनों के अलावा और भी एक मैथुन नवयुवकों में बड़े भीषणरूप से फैल गया है। इस मैथुन से तो बालकों का बड़ा ही भारी संहार हो रहा है; प्लेग और इनफ्लुएन्जा से कहीं बढ़कर यह नया रोग नवयुवकों को जान से मार रहा है। यही नहीं, बल्कि बड़े-बड़े लिखे-पढ़े हुए लोग भी इस काल के कराल पंजे में 'मोहवश' जा रहे हैं। हा ! यह बड़े ही दुर्भाग्य की बात है। इस महारोग से पिण्ड छुड़ाना पूरे इन्फ्लुएन्जा से भी महा कठिन हो गया है। इस महारोग को "हस्तमैथुन"❁ का रोग कहते हैं। यह रोग बड़ा ही भयानक है ! यह राक्षस मनुष्य को बड़ी क्रूरता से विलकुल निचोड़ डालता है। यह भी एक प्रकार की स्त्री की नवविधा भक्ति ही है। फर्क इतना ही है कि परमात्मा की नवविधा भक्ति से मनुष्य की मुक्ति होती है और स्त्री की किंवा विषय की इस नवविधा भक्ति से मनुष्य को नरक की प्राप्ति होती है।
हस्तमैथुन के कारण जितनी हानियां, उठानी पड़ती हैं यदि केवल उनके नाम ही लिखे जायें तो एक छोटी सी पुस्तिका तैयार हो सकती है। हम यहां पर इस नष्टकारी कुटेव का संक्षेप में ही वर्णन करते हैं। किसी लकड़ी को घुन लगने से जैसे वह विलकुल खोखली पड़ जाती है वैसे ही इस अधम कुटेव से मनुष्य की अवस्था जर्जरभूत होती है।
*पापी मनुष्यों ने धीर्यनाश के धीरों तरीकों निकाले हैं। वे सब अप्राकृतिक व महानिष हैं। अतः वे सब हमने "हस्तमैथुन" में ही समाविष्ट किये हैं।
❁ हस्तमैथुन और उसके दुष्परिणाम ❁
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हस्तमैथुन को अङ्गरेजी में ( Masturbation ) मास्टरबेशन कहते हैं। कोई इसे मुष्टिमैथुन, हस्त-क्रिया अथवा आत्म-मैथुन भी कहते हैं। हस्तमैथुन से इन्द्री की सब नसें ढीली पड़ जाती हैं। फल यह होता है कि स्नायुओं के दुर्बल होने से जननेन्द्रिय टेढ़ा, लघु व ढीला पड़ जाता है। मुख की ओर मोटा और जड़ की ओर पतला पड़ जाता है। इन्द्री पर एक नस होती है वह उभर आती है और मुँह के पास वाईं ओर कंटिया की तरह टेढ़ी बन जाती है। यह नितान्त नपुंसकता का चिन्ह है। ऐसे एक बालक को हमने स्वयं देखा है। नस-द्वैर्बल्य से बार बार स्वप्न-दोष होने लगता है। सामान्य कामसंकल्पों से ही अथवा शृङ्गारिक वर्णन, गायन वा दृश्य मात्र से ही ऐसे पतित पुरुष का वीर्य नष्ट होने लगता है। उसका वीर्य पानी की तरह इतना पतला पड़ जाता है कि स्वप्न-दोष के बाद वस्त्र पर उसका चिन्ह तक नहीं दिखाई देता। इन्द्री में वीर्यधारण करने की शक्ति नहीं रह जाती। ऐसा पुरुष स्त्री-समागम के सर्वथा अयोग्य बन जाता है।
शरीर के भीतर “मनोवहा” नामक एक नाड़ी है। इस नाड़ी के साथ शरीर की संपूर्ण नाड़ियों का सम्बन्ध है ! काम-भाव जागृत होते ही ये सब नाड़ियाँ काँप उठती हैं। और शरीर के पैर से सिर तक के सब यंत्र हिल जाते हैं; फिर रक्त का व संपूर्ण शरीर का मथन होकर वीर्य उनसे भिन्न होकर नष्ट होने लगता है जिससे धातु-द्वैर्बल्य, ग्रमेह, स्वप्न-मेह, मधुमेहादि कठिन रोग शरीर में घर कर लेते हैं।
शरीर के खून में एक सफ़ेद ( White corpuscle ) और दूसरे लाल ( Red corpuscle ) कीट होते हैं। सफ़ेद कीटों
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
में रोगों के कीटों से लड़ने की शक्ति होती है। वीर्य जितना ही पुष्ट व अधिक होता है उतने ही ये शुभ्र कोट महान् वलवान होते हैं और विष को भी पचा डालने की शक्ति रखते हैं। परन्तु ज्योंही वीर्य क्षीण होता है त्योंही ये कीट भी दुर्बल बनकर हैजा प्लेग, मलेरिया के कीटाणुओं से दब जाते हैं और फिर मनुष्य भी काल के गाल में प्रवेश करता है। ये वीर्यनाश के ही दारुण फल हैं।
हस्तमैथुन से जो वीर्यनाश किया जाता है उससे शरीर और दिमाग के समस्त स्नायुओं पर बड़ा भारी धक्का पहुँचता है। जिससे पश्चाघात, ग्रन्थिवात, सन्धिवात, अपस्मार-मृगी और पागलपन आदि भीपणरोगों की उत्पत्ति होती है। व्यभिचार तो सर्वथा निन्द्य है ही परन्तु उससे भी महानिन्द्य यह हस्तमैथुन का कर्म है। हस्तमैथुन द्वारा वीर्य के निकलने से कलेजे में विशेष धक्का लगता है। जिससे क्षय, खाँसी, श्वास; यक्ष्मा और “हार्ट डिजीज़” नामक महाभयानक हृदय-रोग हो जाते हैं। हृद्रोग से ऐसे अभागे मनुष्य की कौन से समय में मृत्यु होगी इसका कुछ भी निश्चय नहीं होता। अकाल ही में वह मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। मस्तिष्क पर तो विजली का सा धक्का लगता है। हस्तमैथुन से सिर फौरन हल्का और खाली पड़ जाता है। स्मृति (याददास्त) सु-बुद्धि, प्रतिभा सभी चौपट हो जाते हैं और अन्त में ऐसा नष्ट-वीर्य पुरुष पागल सा बन जाता है। पागल-खानों में सौ में ९५ आदमी व्यभिचार और हस्तमैथुन के ही कारण पागल बने होते हैं। यही हालत अपनी स्त्री से अति रति करने वालों की भी हुस्सा करती है।
- टारेन्टों के डाक्टर वर्कमन कहते हैं “सैकड़ों पागलखानों की जाँच करने पर हमें यही ज्ञात हुस्सा कि जिनको हम आप नीतिभ्रष्ट
❁ हस्तमैथुन और उसके दुष्परिणाम ❁
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अशिचित व मूर्ख समझते हैं उनमें नहीं; किन्तु धर्म से व स्वच्छता से रहने वाले शिचित लोगों में ही यह हस्तमैथुन का रोग विशेष-रूप से फैला हुआ है।” खेतों में शारीरिक परिश्रम करने वालों मूर्खों में नहीं किन्तु शहरों के पुस्तक-कीट बने हुए नवयुवकों और आदमियों में ही यह घृणित रोग विशेष फैला हुआ है। माता-पिता इस भीतरी कारण को नहीं जानते। वे समझते हैं कि परिश्रम की अधिकता से ही बालकों की ऐसी दुर्दशा हुई है ! मस्तिष्क कमजोर होते ही आँखों की ज्योति और कान व दाँत की शक्ति भी कमजोर हो जाती है। बाल झड़ने और पकने लगते हैं। राजा के घायल होते ही जैसे संपूर्ण सेना एक वारगी घबड़ा जाती है उसी प्रकार वीर्यरूपी राजा को आघात पहुँचते ही शरीर की इन्द्रियरूपी सेना एक वारगी अस्वस्थ व कमजोर हो जाती है। आँख, कान, नाक, जिह्वा, वाणी, हाथ, पैर, त्वचा, आँतें और मलमूत्रेन्द्रिय अपना काम करने में असमर्थ हो जाती हैं फिर ऐसे पुरुष का बहुत जल्द नाश होता है।
हस्तमैथुन से संपूर्ण शरीर पीला, ढीला, फीका, दुर्बल व रोगी बन जाता है। मुख-कान्ति हीन व पीली पड़ जाती है। ऐसा पुरुष जीवित रहते हुये भी मुर्दा होता है ! हाय ! जिस विषयानन्द को कामी लोग ब्रह्मानन्द से भी बढ़कर समझते हैं, वह विषयानन्द भी ऐसे पतित पुरुष ज्यादा दिन तक नहीं भोग सकते। इन्द्रिय दुर्बलता के और अन्यान्य रोगों के कारण वे गाहैस्थ्य सुख भी नहीं भोग सकते। उनकी सन्तानोत्पादन शक्ति नष्ट हो जाती है। जिससे इनकी स्त्रियाँ-बन्ध्या बनी रहती हैं। अथवा सन्तान हुई तो कन्या ही कन्या होती हैं। ऐसे लोग काम के मारे वैकाम बन जाते हैं।
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❖ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❖
सन्ततिमुख से वे हाथ धो बैठते हैं। उनकी स्त्रियों को कभी सन्तोष नहीं होता है ! फिर वे व्यभिचार करने लगती हैं। स्त्रियों के विगड़ने से सन्तान भी दुःसाध्य होती है व अधर्म की वृद्धि होती है। अधर्म के फैलते ही घर में व देश में दारिद्र्य, अकाल व अशान्ति आदि फैलते हैं। फिर सुख की आशा कहाँ ? अन्त में सब कुल नरकगाभी होता है। ( गीता अ० १ ला श्लोक ४१ से ४४ देखो ) इस महा पाप के मूल कारण व भागी दुराचारी पुरुष ही होते हैं।
हाय ! यह बड़ा ही अधर्म और दुष्ट कर्म है। जिस अभागे को इसके करने का एक चार भी दुर्भाग्य प्राप्त हुआ तो धीरे धीरे यह “शैतान” हाथ धोकर उसके पीछे पड़ जाता है, वहाँ तक कि प्राण बचना भी मुश्किल हो जाता है। ऐसे पुरुष इस महानिन्द कुट्टेव के पूर्ण गुलाम बन जाते हैं। दुर्बल चित्त के कारण इच्छा करने पर भी वे संयम नहीं कर सकते। हजारों प्रतिज्ञायें करने पर भी एक भी प्रतिज्ञा पूरी नहीं होने पाती। विषयों के सामने आते ही सभी प्रतिज्ञायें ताक पर धरी रह जाती हैं। इस प्रकार वीर्य को नष्ट करने से मनुष्य का मनुष्यत्व लोप हो जाता है। और उसका जीवन उसी को भारस्वरूप मालूम होने लगता है। आबोधवा का परिवर्तन थोड़ा भी सहन नहीं होता। हर समय सदी गर्मी मालूम होने लगती है, जुकाम, सिर-दर्द और छाती में पीड़ा होने लगता है। ऋतुओं के बदलते ही उसके स्वास्थ्य में भी फर्क होता है और अन्यान्य रोग उत्पन्न हो जाते हैं। देश में जब कभी बीमारी फैलती है तब सबसे पहले ऐसा ही पुरुष बीमार पड़ता है और अक्सर वही काल का शिकार बनता है।
❁ हस्तमैथुन और उसके दुष्परिणाम ❁
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हा ! ऋषि-सन्तानों के दिव्यनेत्र व ज्ञाननेत्र सब नष्ट हो गये हैं और उनको अब उपनेत्र के बिना देखना भी मुश्किल हो गया है। अज्ञान की घनघोर घटा भारत-आकाश को चारों ओर से आन्धल कर रही है। आर्य-सन्तान आज पूर्णतया तेजोहीन व गुलाम बन कर भारत माता का सुख कलंकित कर रहे हैं ! हा ! शोक !! शोक !!! शोक !!!
वस, अब हम इससे अधिक वर्णन करना नहीं चाहते। केवल वीर्यभ्रष्टता के प्रमुख चिन्ह ही कह कर इस विषय को समाप्त करते हैं, जिससे कि हम लोग पतित बालक, बालिका, व स्त्री-पुरुष को फौरन पहचान सकें।
वीर्यनाश के मुख्य लक्षण।
(१) काम पीड़ित वीर्यधन ( वीर्य को नष्ट करने वाला ) बालक बड़े आदमियों की तरफ आँख से आँख मिला कर नहीं देख सकता। किसी अपराधी की तरह शर्मिन्दा होकर नीचे देखता है अथवा इधर उधर मुंह छिपाना चाहता है।
(२) बहुत से चालाक या धूर्त लड़के भूठे ही छाती निकाल कर समाजमें इतस्ततः ऐंठते हुए अकड़ कर घूमा करते हैं। वे ज़रूरत से अधिक ठीठ बन जाते हैं; हेतु यह कि ऐसा करने से उनके दुर्गुण छिप जायेंगे और लोगों की दृष्टि में वे निर्दोष जचेंगे।
(३) उसका आनन्दमय व हँसमुख चेहरा दुःखी व उदास बन जाता है। सूरत रौनी बन जाती है। प्रसन्न-स्वभाव नष्ट होकर चिड़चिड़ा, क्रोधी व रुच (रुखा) बन जाता है। चेहरा फीका, पीला व मुर्दे की तरह निस्तेज बन जाता है।
(४) गालों पर की पहले की वह गुलाबी छटा नष्ट होकर गालों
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
पर भाई पड़ने (काले दाग पड़ना) लगती है। यह अत्यन्त वीर्यनाश का निश्चित लक्षण है।
(५) आँखें व गाल अन्दर धँस जाते हैं और गाल की हड्डियाँ खुल जाती हैं।
(६) बाल पकने व भड़ने लगते हैं। मूछें पीली व सुर्ख यानी लाल बन जाती हैं। चारह वर्ष के उपरान्त बाल का सफेद होना वीर्यनाश का स्पष्ट लक्षण है।
(७) कोई भी रोग न रहते हुए अकाल ही में वृद्ध पुरुष की तरह जर्जर, दुर्बल व ढीले बनना; किसी अच्छे काम में दिल न लगना व नाताक्रुत बनना तथा थोड़े ही परिश्रम से व दौड़ने से हँफने लगना और मृतपिण्ड की तरह उत्साहहीन बनना; दैनिक काम करना भी अच्छा न लगना; सामान्य से सामान्य काम भी कठिन जान पड़ना।
(८) चित्त में कुचिन्ताओं का बढ़ना। थोड़े ही डर से छाती में वेहद थडकन आना तथा भयभीत हो जाना। थोड़ा सा भी दुःख पहाड़ सा मालूम होना।
(९) बार बार भूठी ही अस्वाभाविक भूख लगना अथवा भूख का मन्द पड़ जाना, यह भी वीर्यनाश का प्रमुख चिन्ह है। अपच और मलबद्धता (कञ्जियत) इसका निश्चित परिणाम है। चरपर मसालेदार पदार्थ खाने में अधिक रुचि रखना।
(१०) नींद का न आना; यदि आई तो ऐसी आना जैसी कुम्भकर्ण की निद्रा जैसी। उठते समय महा आलस्य व निरुत्साह मालूम करना और आँखों का भारी पड़ना।
❁ हस्तमैथुन और उसके दुष्परिणाम ❁
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(११) रात्रि में स्वप्रदोष होना, यह पापी वा कामी मन का पूर्ण लक्षण है ।
(१२) वीर्य का पानी जैसा पतला पड़ना और पेशाब के बक्त वीर्य का बूँद बूँद बाहर निकलना, यह भी हस्तमैथुन का एक मुख्य चिन्ह है । इसका अन्तिम भयानक परिणाम पुरुषत्व का नाश अर्थात् नपुंसकता है ।
(१३) बार बार पेशाब होना तथा गरमी, परमा, प्रमेहादि उग्र रोग होना ।
(१४) हाथ पैर और शरीर के पोर पोर में ( सन्धि में ) दर्द मालूम होना । हाथ पैरों में शिथिलता, जड़ता व सनसनी उत्पन्न होना तथा उनका मुर्दे की तरह ठंड पड़ जाना ।
(१५) तलुवे तथा हथेलियों का पसीजना, यह वीर्य-अष्टता का मुख्य लक्षण है ।
(१६) हाथ पैरों में कंप मालूम होना, ( हाथ में पकड़ा हुआ काराज व कोई वस्तु हिलने लगना, हाथ काँपना )
(१७) नाटक उपन्यास आदि शृङ्गारिक किताबें तथा चित्र पढ़ने व देखने की अत्यन्त रुचि रखना ।
(१८) स्त्रियों में बार बार आना जाना; निर्लज्जता से गीध व ऊँट की तरह सर उठाकर या घुमाकर किंवा चोर-टुष्टि से झिपकर स्त्रियों की तरफ देखना ।
(१९) चेहरे पर पिटिका ( मुहरसा ) उभड़ना यह पापी व कामी मन का पूर्ण लक्षण है ।
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
(२०) किसी समय ऊपर उठते समय एकाएक दृष्टि के सामने अन्धेरा छा जाना तथा मुर्छा आने से नीचे गिर पड़ना ।
(२१) मस्तिष्क का विलकुल हलका व खाली पड़ना । स्मरण शक्ति का हास होना । देखे हुए स्वप्न का याद न आना । रक्खी हुई वस्तु का स्मरण न होना और कण्ठ की हुई कविता या पाठ भी भूल जाना और मानसिक दुर्बलता का बढ़ जाना ।
(२२) आबो हवा का परिवर्तन न सहा जाना ।
(२३) चित्त का अत्यन्त चंचल, दुर्बल, कामी व पापी बनना और कोई भी प्रतिज्ञा पूरी न कर सकना तथा सब काम अधूरे ही कर के छोड़ देना । एक भी अच्छा काम पूर्ण न करना, परं कुकर्म प्रयत्न पूर्वक पूरा करना । गिरगिट की तरह सदा विचार व निश्चय बदलते रहना और सदा मन मलीन व नाशक बने रहना ।
(२४) दिमाग में गर्मी छा जाना । नेत्रों में जलन उत्पन्न होना व नेत्रों से पानी बहने लगना ।
(२५) क्षण ही में रुष्ट व क्षण ही में तुष्ट होना ।
(२६) माथे में, कमर में, मेरुदण्ड में और छाती में बार बार दर्द उत्पन्न होना ।
(२७) दाँत के मसूड़े फूलना । मुख से महान् दुर्गन्धि का आना तथा शरीर से भी ❁ बदबू निकलना । वीर्यवान् के शरीर से सुगन्धि निकलती है । (अतः दाँत को विलकुल साफ रखना चाहिये ।)
*दुर्गन्धो भोगिनो देहे जायते धिन्दुसंक्षयात् ।
श्री शिवदास वामन
❁ माता-पिताओं का कर्तव्य ❁
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(२८) मेहदण्ड का मुक जाना; फिर हर वृक्ष मुक कर बैठना ।
(२९) वृषण की बृद्धि होना तथा उनका विशेष लटक जाना ।
(३०) आवाज की कोमलता नष्ट होकर आवाज मोटा, रुखा व अप्रिय बन जाना ।
(३१) छाती का दुर्भंग हो जाना अर्थात् छाती पर का अंतर गहरा और विस्तृत बन जाना । और छाती की हड्डियाँ दीखना ।
(३२) नेत्ररूपी चन्द्र-सूर्य को ग्रहण लगना । नाक के कोने में प्रथम कालिमा छा जाती है, फिर बढ़ते बढ़ते आँखों के चतुर्दिक ग्रहण लग जाता है अर्थात् चारों ओर से नेत्र काले पड़ जाते हैं । यह अत्यन्त वीर्यनाश का बड़ा भयानक और भीषण चिन्ह है ।
(३३) किसी बात में कामयाबी न होना तथा सर्वत्र निन्दित व अपमानित बनना यह वीर्यनाश की पूरी निशानी है । सन्तति-सम्पत्ति का धीरे धीरे नाश होना, अधर्म, व्यभिचार व पाप का बढ़ता; आयु का घट जाना; वेदशास्त्राज्ञाओं को कुछ भी न मानना और अपनी ही मनमानी करना अर्थात् “विनाश काले विपरीत बुद्धिः” इस न्याय से सब उलटी ही बातें करना यह गुलामी के खास चिन्ह हैं । सम्पूर्ण अपयश, दुःख व गुलामी का कारण एक मात्र वीर्य का नाश ही है ।
(३४) अन्त में कभी कभी दुःख और पश्चाताप के मारे आत्महत्या करने का भी विचार करना । इति प्रमुख विह्वानि ।
४-माता-पिताओं का कर्तव्य
प्रत्येक माता, पिता, गुरु, वन्धु तथा मित्र का सब से प्रथम कर्तव्य अब यही होना चाहिये कि यदि उपर्युक्त लक्षणों में कोई
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
भी एक-दो लक्षण पुत्र-पुत्री और शिष्य-मित्रोंमें दिखाई दें तो फौरन उन के सामने पाप के परिणाम का भीषण चित्र तथा ब्रह्मचर्य की श्रेष्ठमहिमा स्पष्ट शब्दों में रखनी चाहिए । इसमें लज्जा संकोच करना तथा अपमान समझना मानो अपनी सन्तान का पूर्ण नाश ही करना है । “शरीरं व्याधि मन्दिरम् ” तब ही बनता है जब कि मनुष्य ब्रह्मचर्य के प्राकृतिक नियमों का उल्लंघन करता है । अतः उन्हें उन नियमों का अवश्य ज्ञान करा देना चाहिये । माता, पिता व गुरु ब्रह्मचर्य का पूर्ण स्पष्ट वर्णन करने में लजाते हैं ! परन्तु यह उनकी भारी भूल एवं मूर्खता है । अपने पर वीती हुई दुर्घटनाओं को, जिनके दुष्परिणाम माता-पिता तथा गुरुजनों को आज भी उनकी मर्जी के विरुद्ध भोगने पड़ रहे हैं, लड़कों से साफ साफ कहें और उनसे बचे रहने के लिये अपने अनुभूत इलाज को स्पष्ट बतलायें अथवा यह जीवन पथप्रदीप ग्रन्थ अपने प्रिय बालकों, शिष्यों अथवा मित्रों के हाथ में रख दें, जिससे उनका कर्तव्यमार्ग उन्हें साफ दिखाई दे ।
कई लोग यह समझते हैं कि यदि बालकों के सामने ब्रह्मचर्य की रक्षा के हेतु हस्तमैथुन शिशुमैथुनादि महानिन्द्य वुराइयों का वर्णन करे, तो वे यदि न भी जानते होंगे तो इन दुर्गुणों को जान लेंगे परन्तु यह धारणा विलकुल बृथा व नाशकारी है । यदि आप न कहेंगे तो बालक कुसंगों में पड़ कर दूसरों से अवश्य ही उपर्युक्त दुर्गुण सीख लेंगे । परन्तु वुराइयों का तीव्र निषेध व ब्रह्मचर्य की उज्ज्वल महिमा आप वर्णन करेंगे तो आपके बालक अवश्य ही सदाचारी व ब्रह्मचारी बनेंगे ऐसा पूर्ण विश्वास रखेंगे । गन्दगी या गडदे को ढाकने के वनिस्वत उससे बचे रहने का ज्ञान करा