भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

२६ ]

❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

क्या हमारे शत्रु हम ही हैं और हमारे मित्र भी हम ही हैं ? क्या हमारे ही कृत कर्मों से हमें ऐसी नीच दशा प्राप्त हुई है ? हाँ, भगवद्वाणी तथा संतवाणी हमें यही बतला रही है ! “तुम ही अपने मित्र हो तथा तुम ही अपने शत्रु भी हो, अपने पतन के कारण केवल तुम्हें ही हो ।”

सत्य है ! नीति न्याय मर्यादा का उल्लंघन करने ही से अर्थात् अधर्म और अन्याय बढ़ने ही से आज हमारी ऐसी पतित हालत हुई है; जैसे हम अपने को कुकर्मों द्वारा पतित बना सकते हैं वैसे ही सुकर्मों द्वारा अपना उद्धार भी कर सकते हैं । उन्नति के लिये अब हमें धर्मका आचरण अवश्य ही अति शीघ्र शुरु करना होगा ! श्री गीतादेवी के सच्चे अध्ययन की आज हमें नितान्त आवश्यकता है । आज हमें सच्चे कर्मवीरों की बड़ी ही जरूरत है । वीर्यभ्रष्ट कच्चे कर्मवीर बड़े ही घातक होते हैं; वीच ही में किसी डर के कारण अपनै कर्तव्य को छोड़ भागने वाले पुरुष बड़े कायर और नामर्द होते हैं । “काम मर्दों का नहीं जो कि अधूरा करना, जो बात ज्यों से निकाले उसे पूरा करना ।” वस ऐसे ही मर्द पुरुष की आज भारत को जरूरत है । नामर्द और व्यभिचारी पुरुष का अब यहाँ कुछ भी काम नहीं है । क्योंकि ऐसे लोग देश के घोर शत्रु होते हैं । वीर्यनाश के कारण आज तक बहुत कुछ नाश हो चुका है । अब हमें अपने पूर्वजों का अनुकरण अति शीघ्र करना होगा और दुराचार को छोड़ पूर्ण सदाचारी और ब्रह्मचारी बनना होगा । ‘हमारे बाबा ऐसे थे और वैसे थे, ऐसा कोरा अभिमान और कोरी बातें हमें अब साफ छोड़ देनी होगी । उनकी जैसी प्रत्यक्ष करनी ही करके हमें अब दिखलाना

❁ ब्रह्मचर्य व आश्रम चतुष्टय ❁

[ २७ ]

होगा । हमें अपने पूर्वजों की तरह प्रत्यक्ष वीर्यवान और सामर्थ्यवान बनना होगा । आज भी हम भीमाजुन जैसे बली और धनुर्धारी अर्जुन बन सकते हैं प्रोफेसर माणिक राव, गामा, प्रो० एकनाथ मूांत और प्रो० शहा इस बात के आज जीते जागते दृष्टान्त हैं । हमारा भोजन हमी को खाना और पचाना पड़ता है । केवल भोजन की तरफ देखने से अथवा उसकी खुशबू से अथवा उसकी कोरी तारीफ से ही सिर्फ हमारा पेट कभी नहीं भर सकता; वैसे ही अपना, बल, तेज, सामर्थ्य, स्वातंत्र्य और वैभव भी हम ही को कमाना पड़ता है । पूर्वजों की कोरी तारीफ से कुछ भी नहीं हो सकता । यद्यपि आज हमारा बहुत कुछ पतन हुआ है, तो भी सदाचार द्वारा हम पुनः ब्रह्मचारी यानी वीर्यवान और बली हो सकते हैं । सैकड़ों प्रो० माणिकराव और सहस्रां प्रो० शहा इस भारत भूमि में पुनः निर्माण हो सकते हैं । याद रखो, केवल सदाचारी पुरुष ही ब्रह्मचारी और उन्नत हो सकते हैं न कि दुराचारी । व्यभिचारी पुरुष ! मुर्खाने हुये पेड़ जैसे पानी मिलने से पुनः सजीव और चैतन्यमय हो सकते हैं वैसे ही सदाचरण से हमारी सम्पूर्ण गुप्त शक्तियां खुल पड़ती हैं, और शक्तियां खुलते ही फिर हम अपने पूर्वजों की तरह अपना बल तेज व पराक्रम निश्चयपूर्वक सर्वत्र दिखाया सकते हैं ।

८—ब्रह्मचर्य व आश्रम चतुष्टय

हमारे शास्त्रकारों ने शास्त्रों में “प्रकृति के नियमानुसार” चार आश्रम निर्धारित किये हैं । उनमें से प्रथम और सब से

२८ ]

❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

प्रथम ब्रह्मचर्याश्रम है। मानों वह आश्रम सम्पूर्ण आश्रमों की नींव है और वास्तव में है भी ऐसा ही। ब्रह्मचर्याश्रम की मर्यादा उन्होंने पुरुष की २५ वर्ष की और स्त्री की १६ वर्ष की “पूर्ण दृष्टि” से निश्चित की है। इसमें तिल भर फर्क नहीं हो सकता। यदि कोई व्यक्ति इस नियम को तोड़े तो प्रकृति भी उस व्यक्ति को तोड़ डालती है। प्रकृति के नियम परम कठोर हैं; जो उन नियमों के अनुसार चलता है उसे वे अमृत के समान फल देने वाले होते हैं और जो उनका अतिक्रमण करता है उसे वे विपतुल्य संहारक बन जाते हैं। सद्गुणयोग करने से अग्नि जैसे परम उपकारी हो सकती है और दुर्गुणयोग करने से वही अग्नि जैसे महान विनाशक बन जाती है, ठीक यही न्याय प्रकृति के सम्पूर्ण नियमों का भी समन्वित है।

ब्रह्मचर्य दो प्रकार के हैं। एक “नैष्ठिक” और दूसरा “उपकुर्वाण” आजन्म ब्रह्मचारी को “नैष्ठिक” कहते हैं और गुरुगृह में यथायोग्य ब्रह्मचर्य पालन कर, विद्या प्राप्ति के अनन्तर गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने वाले ब्रह्मचारी को ‘उपकुर्वाण’ कहते हैं।

यदि कोई आजन्म-भरण ब्रह्मचर्यव्रत धारण करे तो फिर पूछना ही क्या? वह इस लोक में सचमुच देवता ही के तुल्य पूज्यनीय बन जाता है; ऐसे पुरुष बहुत कम हैं। उदाहरणार्थ:— श्री समर्थ रामदास स्वामी, स्वामी दयानन्द, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी रामकृष्ण परमहंस, वगैरह इसी उच्चश्रेणी के आदर्श ब्रह्मचारी महत्तमा हुये हैं जिनको आज संसार से पूजे जाते हुये हम आप प्रत्यक्ष देख रहे हैं।

❁ ब्रह्मचर्य और विद्यार्थी ❁

[ २९ ]

दूसरा आश्रम 'गृहस्थाश्रम' है। इसकी मर्यादा २५ से लेकर ५० वर्ष तक की निश्चित की गई है। इसमें धर्माचरण से चलकर केवल सु-प्रजा निर्माण करने की आज्ञा है, न कि कु-प्रजा।

तीसरा ५० से लेकर ७५ वर्ष तक 'वानप्रस्थाश्रम' है। इस अवस्था में अपनी स्त्री को माता तुल्य मान कर, उसके साथ विषय-रहित शुद्ध व्यवहार रखने की आवश्यकता है।

चौथा और अन्तिम 'सन्यासाश्रम' है, जिसमें कि सर्वसंग परित्याग कर आत्म-कल्याणार्थ एकान्त का आश्रय लेना पड़ता है और अहर्निश ब्रह्मचिन्तन करना पड़ता है, न कि विषय चिन्तन।

एक मात्र ज्ञानी और विरक्त पुरुष ही सन्यास का अधिकारी हो सकता है। मूर्ख व रोगी पुरुषों को सन्यासी होना पूर्ण लाञ्छना-स्पद और अवनतिप्रद है। मूर्ख पुरुष खास कर पेट के लिये ही बीच में सन्यासी बाबा बन जाते हैं। लेखक में ऐसे कई मूर्ख और दुराचारी सन्यासी और कई अधम वानप्रस्थाश्रमी अपनी आँखों देखे हैं और गृहस्थाश्रमियों को तो आप हम सब ही देख रहे हैं।

६ ब्रह्मचर्य और विद्यार्थी

ब्रह्मचर्याश्रम को विषयरूपी सुरङ्ग से उड़ाने वाले आज लाखों करोड़ों स्त्री-पुरुष समाज में जिधर देखो उधर चारों ओर दिखाई दे रहे हैं। जड़ काटने से जैसे पेड़ की स्थिति होती है, वैसे ही खराब और गिरी दशा ब्रह्मचर्यरूपी जड़ को काटने वाले गृहस्थाश्रमियों की हो गई है। “नष्टे मूले नैव शाखा न पत्रम्” इस न्याय

२० ]

❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

से बेचारे दिन व दिन सूखे जा रहे हैं और निःसन्तान बन रहे हैं। बाल पके हुये, अन्धे बने हुये, चश्मे लगे हुये, कमर दूटी हुई, बाहर भीतर रोगों से घुले हुये, आँख गाल अन्दर धँसे हुये, दुःखी दुर्बल और निरुत्साही बने हुये, निःसत्त्व निस्तेज बन कर अत्यन्त डरपोक बने हुये, सब तरह से आत्म-पतित, पापी, और गुलाम बने हुये, असंख्य दुखों में सने हुये और जिन्दी ठठरी बने हुये, तिस पर भी ध्यान-शूकर की तरह कामाग्नि में जलते हुये, ऐसे २०—२५ वर्ष के निर्वीर्य बूढ़े विद्यार्थी और गृहस्थाश्रमी ही आज सर्वत्र ढ़िखलाई दे रहे हैं ! हा ! यह दृश्य वड़ा ही भयानक मालूम हो रहा है। इस हृदयद्रावक दृश्य से भारत-प्रेमियों का हृदय आज भीतर ही भीतर जल रहा है। जिनके ऊपर भारत का सच्चा उद्धार निर्भर है, जो कि भारत के मुख्य आशास्थल और आधारस्तम्भ हैं ऐसे नवजवानों को ऐसी पतित और शोकपूर्ण दशा में देख कर किस भारतपुत्र का हृदय दुख से हिल नहीं जाता ! हमें तो रुलाई आने लगती है।

प्रभो ! यह हमारा वड़ा ही भारी पतन हुआ है। जो भारत एक समय परमोच्च उन्नति का केन्द्र था, जिस भारतवर्ष में हजारों बलशाली और वीर्यशाली नरसिंह वास करते थे, जिसकी ओर कोई भी राष्ट्र आँख उठाकर नहीं देख सकता था, जो सम्पूर्ण विद्याओं में सब का गुरु था, जिसका प्रभाव सम्पूर्ण दुनिया पर पड़ा हुआ था, जिसके अंगुलिनिर्देश से सम्पूर्ण दिङ्-मण्डल काँप उठता था, वही भारत आज गुलामों का कैदखाना सा बन रहा है और सब तरह से पीसा, निचोड़ा और जलाया जा रहा है। हाय ! इससे बढ़कर पतन और कौनसा हो सकता है ? नहीं, हमको अब

❁ काम का दमन ❁

[ ३१ ]

तुरन्त उठ खड़े होना चाहिये । इसी में हमारी भलाई है । यदि न चेतेंगे तो भारत का चिन्ह तक मिट जाने की संभावना है । इसलिये ऐ मेरे भारतवासी भ्रातृ-भगिनी-मित्रगण ! अब सावधान होइये ! आँखें खोलकर अपने तथा अन्य देशों की ओर ज़रा निहारिये और निहार कर अपना पूर्व वैभव प्राप्त करने के लिये निश्चित से कटिबद्ध हो ब्रह्मचर्य द्वारा अपना पुनः उद्धार कर लीजिये । एक ब्रह्मचर्य ही के द्वारा हमारा उद्धार होना 'सहज-संभव' है, अन्य सब उपाय बूथा हैं । विन्दु को साधने वाला सप्तसिन्धुओं को भी अपनी मुट्ठी में—कून्हे में ला सकता है । संपूर्ण संसार में ऐसी कोई भी वस्तु व स्थिति नहीं है, जिसे ब्रह्मचारी पुरुष प्राप्त न कर सकता हो । हाथी का रहस्य जैसे अंकुश है वैसे ही हमारे सम्पूर्ण विद्या, वैभव और सामर्थ्य का रहस्य एक मात्र हमारा ब्रह्मचर्य ही है । अभी भी ब्रह्मचारी बन सकते हैं और वीर्यधारण कर के अपना तथा भारत का सच्चा उद्धार कर सकते हैं । अतः ऐ मेरे परम प्रिय भारतपुत्रों ! अब नौंद को छोड़ दो* अवतक बहुत-कुछ सो चुके हो और खो चुके हो । अब जागृत होकर खड़े हो जाओ और खड़े होकर निश्चय के साथ अपने पैर सिंह के समान उन्नति की ओर निर्भयता से बढ़िये । अवश्य विजय होगी, निश्चय जानो ।

१०—काम का दमन

“काम का उद्भव ही न होने दो”

एक मनुष्य ने शेर का बच्चा पाला था । बच्चा बहुत गरीब

*‘He who sleeps, his Fortune sleeps’.

३२ ]

❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

था । एक दिन नींद में वह बच्चा मालिक का बांया हाथ चाटने लगा चाटते चाटते दांत लग जाने से हाथ का थोड़ा सा खून निकला । अब बच्चा कान टेढ़ा किये खून चाटने लगा । तकलीफ के मारे मालिक जग पड़ा और अपना हाथ हटाना चाहा । किंचित् हाथ हटाते ही शेर एकदम खड़ा हो गया और जाति स्वभावानुरूप “गुर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्र” गर्जन कर उसने हाथ को पंजे के नीचे मजबूती से दबा लिया और फिर रक्त चाटने लगा । मालिक ने सोचा, “अरे वाप रे ! अब तो मामला बड़ा वेदव है । यदि मैं इसको और भी प्यार करूँ तो यह मुझे फाड़ खाये बिना नहीं रहेगा” उसने निश्चय किया और तुरन्त सन्दूक में से पिस्तौल मँगवाया । पिस्तौल मिलते ही “रे नमक हराम” ऐसा कह कर तत्काल धड़ाके से गोली छोड़कर उसे मार डाला ।

ऐ मेरे प्यारे भ्रातृ-भगिनी-मित्र गए ! यदि कामरूपी शेर तुम्हारा शोषण करना चाहता हो तो तुम भी उसे फौरेन मार डालो । २५ वर्ष तक विषय से विलकुल दूर रहो । उसका स्मरण तक मत करो क्योंकि पूर्वांक नव-मैथुनों में से प्रत्येक मैथुन ब्रह्मचर्य का नाशक है । अन्ये को जैसे शीशा दिखलाना व्यर्थ है । वैसे ही कामान्ध पुरुष को भी उपदेश करना व्यर्थ है । उल्लू तो दिन में ही नहीं देख सकता परन्तु कामान्ध पुरुष दिन और रात दोनों में नहीं देख सकता । कामान्ध पुरुष डबल उल्लू होता है । जो विषय अत्यन्त दुःखप्रद, त्याज्य व नरकप्रद है वह मूर्खों को अत्यन्त प्रिय व मधुर मालूम होता है और जो परमार्थ मनुष्य को इसी जीवन में अमृत तुल्य फल शान्ति देने वाला और अन्त में मुक्तिप्रद है तथा जिसका आधार ब्रह्मचर्य के ऊपर ही मुख्यतः निर्भर है, वह परमार्थ उन्हें विष के समान कड़वी

काम का दमन

[ ३३ ]

मालूम होता है। जो वास्तव में विप है उसे अमृत समझना और जो प्रत्यक्ष अमृत है उसे विप समझना ये घोर पाप के लक्षण हैं। यह बात निःसन्देह सत्य है कि जिसे सांप काटता है उसको मिर्च भी तीत नहीं लगती और न नीम कड़वी लगती है परन्तु चीनी उसे बहुत ही कड़वी लगती है। ठीक यही हालत विषय रूपों सप से वंशित पुरुषों की भी समझिये। उन्हें सब उलटी ही बातें सूझती हैं और उनकी दृष्टि में सब पाप ही पाप भरा रहता है। वे सभी स्त्रियों की ओर पाप-दृष्टि से देखते हैं और इस प्रकार व्यर्थ पाप के भागी बन अन्त में नरक को जाते हैं। आज बड़े बड़े देवस्थानों में भी नाच रंग व व्यभिचार घुस गया है। कई मन्दिरों पर तो भद्दे भद्दे चित्र भी खुदे हुये हैं। हा ! पापी पुरुष क्या नहीं करेंगे ? गङ्गा जी में । तक डूबे रहने पर भी उनकी पाप दृष्टि नहीं जाती। देव-दर्शन के हाने मन्दिरों में और वायु सेवन के मिस से घाट पर तथा ज जगह कई गीध बैठे हुए नित्य दिखाई देते हैं। धिक्कार है, नारकी जीवों को !

अहो न हिरदय धस्यो, भयो पुण्य का नाश । मानों चिनगी आग की, परी पुरानी धास ॥ १ ॥ विविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः । कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत् त्रयं त्यजेत् ॥ २ ॥

भगवान् कहते हैं:—नरक के तीन प्रचण्ड महाद्वार रात दिन खुले हुए हैं। सब से पहला द्वार काम का है जिसमें कि विषय के गुलाम बलात् खींचे और दूसे जाते हैं। दूसरा द्वार क्रोधी पुरुषों के लिये है और तीसरा द्वार लोभियों के लिये है।

३४ ]

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

कामी पुरुष जीते जी ही नरक का अनुभव करने लगता है; वह जीते जी ही मुर्दा बन जाता है । जगद्गुरु श्री दत्तात्रेय मुनि कहते हैं:—“जो लोग गन्दगी से सदा भरे हुए मल मूत्र के स्थानों में रसमाण रहते हैं, ऐसे नारकी जीव नरक से क्यों कर तर सकते हैं ? ऐ पुरुषो ! तुम चर्ममयी नरक-कुंड की ओर क्यों ताकते हो ? क्या नरक के कीट बनने के लिए ? छीं छीं ! इससे तुम्हारा कैसे उद्धार होगा ? क्या यहीं स्वर्ग-सुख है । जरा तुमही सोचो कि यह स्वर्ग-भोग है या नरक-भोग ? इस प्रकार तो शूकर, कूकर और गोबर के कीड़े भी आनन्द मनाते हैं ! इनसे फिर तुम्हारा दर्जा ऊँचा कैसा ? ऊँचे दर्जे के लिये हमें अवश्य अपने आचार-विचार भी ऊँचे ही रखने चाहियें ! केवल मनुष्य की देह धारण कर लेने से कोई “मनुष्य” नहीं हो सकता । विद्या और विनय, तप व शान्ति, कान्ति व दान्ति ( लावण्य तथा दमन शक्ति ) गुण व अ-गर्व, धर्म व अदमम इत्यादि सद्गुणों से ही मनुष्य ‘मनुष्य’ बन सकता है और ईश्वरत्व को प्राप्त हो सकता है । परन्तु इन सब की जड़ एक मात्र ब्रह्मचर्य है, यह सत्य बात कभी न भूलो ।

कामान्ध मनुष्य तारुण्य के मद से विषय में प्रीति भले ही रखता हो और अपनी मनमानी भले ही करता हो; परन्तु वे ही विषय उसे आगे इस रीति से पटक देते हैं, जैसे पेड़ों को बाढ़ और आंधी ! बेचारा मोहवश विषय में फँस कर “सुख की बुद्धि” से स्त्री-संग करता है और अपने ही वीर्य का नाश कर अपने को धन्य व कृतार्थ समझता है; जैसे कुत्ता सूखी हड्डी को चबाते समय मुँह से निकले हुए खून को सूखी हड्डी से निकला हुआ समझ कर अपना ही खून चूस कर वह मूर्ख बड़ा खुश होता है; जैसे विच्छू

❁ काम का दमन ❁

[ ३५ ]

या खटमल की शय्या कदापि सुखकर नहीं हो सकती, वैसे ही विषयी पुरुष भी कदापि सुखी नहीं हो सकते, वे सदा बेचैन बने रहते हैं। “दुःखी सदा को ? विपयानुरागी !” ऐसा श्रीमत् शङ्कराचार्य भी कहते हैं। सच है, सांप के फन के नीचे बैठे हुआ चूहा कब तक छाया का सुख मनावेगा ? मेढक, सांप द्वारा आधा निगले जाने पर भी जैसा वह मूर्ख मक्खियों के लिये मुँह खोलता है, वैसे ही कामी पुरुष भी अनेक रोगों से अधमरे होने पर भी विषय सेवन के लिये हाथ-पैर फैलाते ही हैं। गढ़ही के लातों से नाक-मुँह फूट जाने पर भी जैसे वह गढ़हा गढ़ही की आशा नहीं छोड़ता, उसके पीछे पीछे ही दौड़ता है; वैसी ही दुर्दशा काम के कीटों की भी होती है; वे सब तरह से नष्ट-भ्रष्ट व दुखी होने पर भी अपनी कुदुष्टि को नहीं त्यागते और विषय के पीछे मारे मारे फिरते हैं। दाढ़ को खुजलाने से जैसे वह कदापि शमन नहीं हो सकती, उसे वैसे ही छोड़ देने तथा स्नान व उपवास द्वारा शरीर की सफाई रखने ही से वह शान्त हो सकती है, वैसे ही काम के सेवन से काम की शान्ति कदापि नहीं हो सकती। ऐसा आज तक किसी ने न देखा और न सुना ही है। सांप को छेड़ने से नहीं किन्तु सांप से दूर रहने ही से जैसे हम बच सकते हैं; वैसे ही काम के सेवन से नहीं किन्तु काम से दूर रहने ही से काम की सच्ची शान्ति हो सकती है और हम भी पूरा शान्त व सुखी बन सकते हैं। यदि कोई नासारोगी सफेद मिट्टी के तेल को, पानी समझ कर, जलते हुए भोंपड़े पर डाले, तो कैसा उल्टा परिणाम होगा ? क्या कभी ईधन से अग्नि शान्त हो सकती है। कोई कहेगा, “हाँ, हो सकती है, ढेर

३६ ]

❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

सी लकड़ी डाल देने से आगी बुझ सकती है।” हम कहते हैं, “अधिक विषय सेवन करने से फिर तुम भी अकाल में बुझ जाओगे ! एक शराबी ने ऐसा ही किया । एक दिन उसने खूब शराब पी ली । नतीजा यह हुआ कि एक ही घंटे में उसकी दुर्बल बनी हुई खोपड़ी नशे के मारे फट गई और वह मर गया । यथाति राजा ने अपने पुत्र की भी आयु ली और तमाम उम्र भर उसने विषय-सेवन किया परन्तु उसकी शान्ति नहीं हुई । अन्त में वह चर्या बन गया, उसको क्षय हो गया । इसी कारण संत उपदेश करते हैं:—

( भजन ध्रुव-गजल की )

“विषयों से मन को तृप्त कराना नहीं अच्छा । जलती अगिनि को घी से बुझाना नहीं अच्छा ॥ १ ॥ सुख भोगते ये जगत् के सभी हैं नाशमान । तृष्णा बढ़ा के जी को फँसाना नहीं अच्छा ॥ २ ॥ है गच्छतीति* जगत् धाम दुःख का भारी । रंग रंग के खेल देख लुभाना नहीं अच्छा ॥ ३ ॥ “धन धाम इष्ट मित्र रूप नारि और पुत्र । हरगिज धमण्ड इनका न करना कभी अच्छा ॥ ४ ॥ ‘वामन’ है आयु वीततो अब से भी जरा चेत । दुर्लभ शरीर पाके गँवाना नहीं अच्छा ॥ ५ ॥ अतएव, प्यारे भाइयो ! जहाँ तक हो सके वहाँ तक, मनुष्य को

  • जानेवाला किंवा बदलने वाला जगत् ।

काम का दमन

३७ ]

चेकाम बनाने वाले इस दुर्भर यानी कभी भी त्रम न होने वाले महापैट्ट व पापी काम से सदा दूर रहा ! इसी में कल्याण है ।

‘यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम् । तृष्णात्तय सुखस्यैते नाहृतः षोडशीं कलाम् ॥ १ ॥

अर्थात्, निष्कामता में यानी विषय वैराग्य में जो सुख भरा हुआ है उसका सोलहवाँ हिस्सा भी सुख संसार के व स्वर्ग के समस्त विषयों में तथा दिव्य ऐश्वर्यादि में नहीं है । अतः इस महाशनो महापाप्मा काम रिपु को “भगवान् के आज्ञानुसार” तुरंत मार डालो, नहीं तो वह दुष्ट तुम्हें ही मार डालेगा ! याद रखो ।

( भजन )

अनारी मन काम नरक को मूल ॥ १ ॥ रङ्ग रूप में रहो लुभाना, भूल गयो हरिनाम दिवाना । या यौवन का कौन ठिकाना, दो दिन में हो धूल ॥२॥ अमृत-भरे कलश बतलाये, धरि धरिके आनन्द मनावे । चमड़े की थैली है मूरख, जापै रहयो बड़ी फूल ॥३॥ ‘जा मुख को चन्दाकर मानो, थूक लार वामें लिपटानो । छी छी छी छी ! तुमारी मतिपर, विष्टा में गयो भूल ॥४॥ कैसा भारी धोका खाया, हाड़चाम पर मन ललचाया । ‘वामन’ इस पर गौर किया कुछ ? यही कालका मूल ॥५॥

३८ ]

❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

११—प्रकृति का स्वभाव

प्रकृति का स्वभाव अत्यन्त कठोर और दयालु है । वह अत्यन्त न्यायप्रिय है । न्याय में वह चूमा नहीं करना जानती । सदाचारियों के लिए प्रकृति परम प्यारी माता है और दुराचारियों के लिये वह पूरी राक्षसी है । वह स्वयं राक्षसी कदापि नहीं है । वह परम दयालु जगन्माता है । केवल दुराचारियों ही को वह राक्षसी जैसी प्रतीत होती है । परन्तु दण्ड में भी हमें सुधारने का ही उसका पवित्र हेतु होता है । ठोकर खाने ही से मनुष्य सावधान होता है ।

आज अत्यन्त वीर्यनाश के कारण तरुण समाज अत्यन्त नाशोन्मुख हो रहा है और दिन पर दिन रसातल को जा रहा है । चाहे तुम कितने ही अंधेरे में और कितने ही चालाकी से वीर्य-नाश करो और अपने को कितना ही सुरक्षित व बुद्धिमान समझो और कुकर्मों को छिपाने की कैसी ही कोशिश करो, परन्तु वीर्य-नाश होते ही मृत्यु तत्काल तुम्हारे द्वार पर आ डटती है और तुम्हारा इन्तजार करती है । प्रकृति माता अपने हाथ में डंडा लिये तुम्हारी वह नीच कृति देखती है तथा प्रत्येक वृद्ध के लिये तुम्हारे मर्म स्थानों पर कठोर डंडा प्रहार करती है । ज्यों ज्यों तुम वीर्यनाश करोगे त्यों त्यों वह तुम्हें मारते मारते वेदम व अधमरा कर डालेगी । तब भी यदि नहीं चेतोगे व सुधरोगे तब अन्त में तुम्हारा इन्तजार करती हुई मृत्यु की ओर तुम्हें, सड़े फल की तरह, फेंक देगी, तुम्हें उठा के नरककुण्ड में बिछा देगी !

आज कितने ही तरुणों के बदन पर हम उन डंडों की चोटों

❁ प्रकृति का स्वभाव ❁

[ ३९ ]

के गहरे निशान प्रतिदिन देख रहे हैं। कितने ही हतभागी लोग महारोगियों की तरह खटिया पर पड़े पड़े तड़फड़ा रहे हैं कोई गर्मी से पीड़ित है। कोई फिर भी, उन निशानों को लिये हुए समाज में इधर-उधर भूठे ही छाती निकाल कर ऐंठते हुए अकड़ कर घूम रहे हैं। कोई माला फेर रहे हैं और इधर नाड़ी भी टटोल रहे हैं और मन में राम का नहीं, किन्तु काम का जप कर रहे हैं। अब कहिये ऐसे लोगों की क्या गति होगी ? बेचारों की “इतो भ्रष्टस्तोभ्रष्टः” ऐसी ही त्रिशंकु की तरह दुर्गति होगी, और क्या ? दम्भाचार में न दीन है न दुनिया ही है।

“धंचक भक्त कहाय राम के ।

किंकर कंचन होय काम के ॥”

वहुत से बालक तो ऐसी दुर्गति को पहुंच गये हैं कि उन्हें भात तो क्या पर दूध तक नहीं पच सकता, पाखाना भी साफ नहीं होता। खाना तथा पाखाना में बड़ी ही दुर्दशा हो गई है। भोजन कर भी लिया तो पचता नहीं। इधर खाया और उधर निकल गया। यदि पचा भी तो उसका सार वीर्य शरीर में रहने नहीं पाता। रोज स्वप्रदोष अर्थात् धातुक्षय हुआ करता है। फिर छिपे छिपे वैद्यों की दूकान दृढ़ते हैं ! परन्तु उनको याद रहे कि वीर्यनाश करनेवाला यदि साक्षात् धन्वन्तरि ही क्यों न हो तथापि वह भी अपने को कदापि बचा नहीं सकता। फिर दूसरे वीर्यहीनों को वह कैसे बचा सकता है ? आजकल के डाक्टर वैद्य क्या धन्वन्तरि से भी ज्यादा बढ़ गये हैं ? हाँ ! लूटने मारने में वे अवश्य बड़े-चढ़े हुये हैं। किसी ने वैद्यों को “यमराज का भाई” कहा है, सो वहुत ही यथार्थ है। यम तो केवल प्राण ही हर लेता है पर वैद्य प्राण

४० ]

ॐ ब्रह्मचय ही जीवन है ॐ

और धन दोनों लूट लेते हैं। दवाओं से रोग “जड़” से अच्छे नहीं हो सकते। दवा से रोग थोड़ी देर के लिये दब सकते हैं सही, परन्तु कुछ अरसे के बाद वे दूसरी शक्ति में पैदा होते हैं। “मरण बढ़ता गया, ज्यों ज्यों दवा की” इसका यही प्रत्यक्ष प्रमाण है कि “ज्यों ज्यों डाक्टरों व वैद्यों की संख्या बढ़ती जाती है त्यों त्यों रोग और रोगियों की भी संख्या बढ़ती ही जाती है और इस बात को कोई जानना चाहता हो, तो वह अखबारों में दवाओं के विज्ञापनों को देख सकता है। प्यारे मित्रों, विदेशी लोग इन विज्ञापनों को देख कर दिलमें क्या सोचते होंगे ?

हम ही अपने डाक्टर हैं।

भाइयों ! लौटो ! प्रकृति माता की शरण में आओ। वह परम दयालु है। तुम्हारा जरूर सुधार करेगी। विश्वास रखो। प्रकृति माता की दया बिना कोई एक घण्टा भी नहीं जी सकता। नाक, कान, मुंह, मल, मूत्र, त्वचा इत्यादि द्वारा, बल्कि रोम रोम से, वह हमारे भीतर का संपूर्ण जहर हरदम बाहर निकाल कर फेंकती रहती है और हमें चंगा किया करती है। अतः हमें चाहिये कि प्रकृति के “पञ्चामृत” का अर्थात् शुद्ध हवा, प्रकाश, पानी, भूमि व आकाश ( Space ) इनका रोज यथेष्ट पान करें और कुकर्मों को त्याग कर सुकर्मों द्वारा अपना पुनरुद्धार कर लें। हमारा उद्धार हमारे ही हाथ में हैं। वस्तुतः हम ही अपने डाक्टर हैं, गुरु हैं।

पद—( राग—असावरी )

“कर्मों का फल पाना होगा । धृ० ॥

“क्यों न अरे तू चेत में आवे,

सभी ठाट तज जाना होगा।

❁ प्रकृति का स्वभाव ❁

[ ४१ ]

विषय भोग से सभी तरह बच, बचा न तो सङ्ग जाना होगा ॥ १ ॥ “सुर-दुर्लभ-तनु भोगी श्वानवत्, क्या श्व अब कहलाना होगा । धर्माधर्म कङ्कू नहीं मान्यो, कर्म-दण्ड यही पाना होगा ॥२॥ अन्त समय परे मन मूरख ! जड़ल तेरा ठिकाना होगा । कुछ इस जग में कीर्ति कमा ले, धर्महि ले साथ जाना होगा ॥३॥ “भूलि गयो कर्तव्य आपनो, देख बहुत पछताना होगा । आँखे रहते अन्धो मत बन, शुभ विवेक से तरना होगा ॥ ४ ॥ “जैसा जैसा कर्म करेगा, वैसा ही फल खाना होगा । अब भी ‘वामन’ चेत में आजा, नहीं तो दुर्गति पाना होगा ॥ ५ ॥ “गतं न शोच्यं ।”

“बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुधि लेई ।”

सचमुच हमको अब जरूर सम्हलना होगा । जलते हुए मकान से बाहर निकल आने में ही बुद्धिमान्नी है; उसी में जिन्दगी है । यदि हम अपना कल्याण चाहते हैं तो महापुरुषों के सद्गुपदेशानुसार हमको तन-मन-धन से शीघ्रतया जरूर चलना होगा । माता

४२ ]

❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन ❁

पिता अथवा गुरु यदि अधर्ममयी आशा करते हैं तो उनकी वह आशा भ्रुव प्रह्लाद, शुक्र, आदि की तरह कदापि न मानो। भीष्मपितामह ने अपने ब्रह्मचर्य के भंग करने की गुरु की अनुचित आशा बिल्कुल नहीं मानी; तब गुरु शिष्य में युद्ध छिड़ा। अन्त में परशुराम जी को उस महान् प्रतापी अखण्ड ब्रह्मचारी धर्मप्रतिज्ञ भीष्म के सामने हार माननी ही पड़ी। अहा ! क्या ही यह ब्रह्मचर्य का प्रताप है ? हमको भी अपने ब्रह्मचर्य के पालन में अब ऐसा ही दृढ़प्रतिज्ञ होना चाहिये।

“धैर्यं न टूटै पड़े चोट सौ घन की । यही दशा होना चाहिये निज मन की ॥”

सबमुच ‘हृदय से’ चाहने वालों को जैसी बुराई सहल है, वैसी भलाई भी सहल है। अतएव मनुष्य को चाहिये कि वह अपने दुष्ट मन को हठपूर्वक या विवेकपूर्वक विषय से हटावे। बुराई एकाएक दूर नहीं हो सकती यह बात सच है परन्तु “पुरुषस्य प्रयत्न शीलस्य असाध्यं नास्ति।” पुरुषार्थी पुरुष के लिये संसार में कुछ भी असाध्य व अशक्य नहीं है। हृदय से उचित प्रयत्न करने पर सब कुछ सरल है। अभ्यास से असाध्य भी साध्य हो जाता है। बड़े बड़े अफीमची और शराबी भी अपनी मात्रा को थोड़ी थोड़ी घटाते घटाते अन्त में व्यसन-मुक्त हो गये हैं, इस बात को कभी न भूलो। वैसे ही हम भी सुधर सकते हैं।

❁ मन व इन्द्रियाँ ❁

[ ४३ ]

१२—मन व इन्द्रियाँ

रहे शान्त जो युवा मैं , शान्त धीर वह वीर । नष्ट हुए पर वीर्य के, का न बने गम्भीर ? ॥ १ ॥

सच्चा कुशल सारथी वही है जो उन्मत्त घोड़ों को अपनी क़ाबू में रखता है; उन्हें उच्छृङ्खल नहीं होने देता । वैसे ही सच्चा वीर पुरुष वही है जो कि युवावस्था में भी प्रबल इन्द्रियों को अपने अधीन रखता है; उन्हें स्वतंत्र व स्वेच्छाचारी नहीं होने देता । शत्रुओं पर और संपूर्ण राजाओं पर विजय प्राप्त करने वाला सच्चा शूर नहीं कहा जा सकता । सच्चा शूर वही है जो मन और इन्द्रियों का स्वामी है और मन तथा इन्द्रियों पर केवल महापुरुष ही अधिकार चला सकते हैं और कोई भी मनुष्य यदि सदुपदेशों के अनुसार मन-क्रम-वचन से चले तो महापुरुष हो सकता है । इसमें कुछ भी कठिनता नहीं है । मैला कपड़ा जैसे पुनः साफ़ हो सकता है । वैसे ही विषय व दुर्धर्षन से गन्दा बना हुआ मन भी पुनः साफ़ हो सकता है । परन्तु अटल निश्चय व पूरी दृढ़ता होनीचाहिये । पवित्र मन माता, पिता, गुरु व मित्रों से भी अधिक उपकारी है; मन ही मनुष्य को नरक में फेंकता है और मन ही मनुष्य को नरकमें से निकाल कर ऊँचे पद पर पहुँचाता है; मन ही सुख दुःख का असली कारण है; मन ही स्वर्ग व नरक, वंध्य व मोक्ष का प्रदाता है,—ऐसा भगवान् श्री कृष्णचन्द्र का वचन है । अतः मन को इक्ष्वाकु में रखो । मन बड़ा दगा-बाज़ है । मन के वायदे को कभी न मानो । “मन के हारे हार है, मन के जीते जीत ।” यह अटल सिद्धान्त जानो । मन को न

४४ ]

❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

बाँधोगे तो मन तुमको जहाँ चाहे वहाँ पटक देगा, यह निश्चय सम्भो । क्या आपको इसका अनुभव नहीं है ? “आत्मोद्धार कैसे हो ?” इस पर सन्त कहते हैं “मन की कथनी से उलटी रीति पर चलो—उलटी चाल चलो । मन का गुलाम सब का गुलाम है । वह पंडित होने पर भी महामूर्ख है, बलवान होने पर भी महान दुर्बल है और राजा होने पर भी पूरा दुखी, अभागा और मिखारी है ।” मन का स्वामी ही सम्पूर्ण जगत् का स्वामी है, चाहे वह शरीर से भले ही दुर्बल हो । श्रीगोस्वामो जी कहते हैं:—

काम कोष मद लोभ की, जब लग मन में खान ।

तुलसी परिडित मूरखो, दोनों एक समानं ॥ १ ॥

अतः हमें चाहिये कि इस अन्ध में दिये हुये सरल, श्रेष्ठ व अमूल्य नियमों द्वारा अपने मन को स्वाधीन कर ब्रह्मचर्य का सच्चा पालन करें तथा अपना सच्चा उद्धार कर लें ।

१३—वीर्य की उत्पत्ति

“रसाद्रकं ततो मांसम् मासान्मेदः प्रजायते ।

मेदस्याऽस्थि ततो मज्जा मज्जायाः शुक्लसंभवः ॥

—श्रीशुश्रुताचार्य

मनुष्य जो कुछ भोजन करता है, वह प्रथम पेट में आकर पचने लगता है और उसका रस बनता है; उस रस का पांच दिन तक पाचन होकर उससे रक्त पैदा होता है; रक्त का भी पांच दिन तक पाचन होता है और उससे मांस बनता है । पाचन की यह क्रिया एक सेकण्ड भी बन्द नहीं रहती । एक को पचा कर

❁ वीर्य की उत्पत्ति ❁

[ ४५ ]

दूसरा, दूसरे से तीसरा, तीसरे से चौथा ऐसा एक से एक सार पदार्थ तैयार हुआ करता है और प्रत्येक क्रिया में फजूल चीजें मल; मूल, पसीना, आँख, कान व नाक का मैल, नाखून, केशादिक के रूप में बाहर निकल जाती हैं । इसी प्रकार पाँच दिन के बाद मेदा से अस्थि, अस्थि से मज्जा और मज्जा से सप्तम सार पदार्थ “वीर्य” बनता है । फिर उसका पाचन नहीं हो सकता । यही “वीर्य फिर ओजस्” रूप में संपूर्ण शरीर में चमकता रहता है । स्त्री के इस सप्तम शुद्धाति शुद्ध सार पदार्थ को “रज” कहते हैं । दोनों में भिन्नता होती है । वीर्य काँच की तरह चिकना और सफेद होता है और रज लाख की तरह लाल होता है । अस्तु । इस प्रकार रस से लेकर वीर्य वा रज तक छः धातुओं के पाचन करने में पाँच दिन के हिसाब से पूरे ३० दिन व क़रीब ४ घण्टे लगते हैं, ऐसा आर्य शास्त्रों का सिद्धान्त है । ❁

यह वीर्य वा रज कोई खास जगह में नहीं रहता । संपूर्ण शरीर ही इसका निवास स्थान है । वादाम या तिल में जैसे तेल, दूध में जैसे मक्खन, किसमिस व ईख में जैसी मिठास, काठ में जैसी अग्नि किंवा फूल में अथवा चन्दन में जैसे सुगन्ध सर्वत्र कण कण में भरी रहती है; उसी तरह वीर्य भी शरीर के प्रत्येक अणु परमाणु में भरा हुआ है । वीर्य का एक बूँद भी निकलना मानो अपने शरीर को नींबू की तरह निचोड़ ही डालना है ।

  • धातौ रसादौ मज्जान्ते प्रत्येकं क्रमतो रसः ।

अहो रात्रात्स्वयं पंच सादृं दण्डं च तिष्ठति ॥ इति भोजः ।

अर्थ—रस से मज्जान्त पर्यन्त प्रत्येक धातु पाँच दिन रात व ढेढ़ घड़ी तक रहती है । ( ढाई घड़ी का एक घन्टा होता है )