भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य साधना

करता है। इस आसन के अभ्यास से नेत्रों की ज्योति बढ़ती है तथा चेहरे पर सुन्दरता व श्रोज झलकने लगता है।

अभ्यास कीजिये और उसका प्रभाव प्रत्यक्ष अनुभव कीजिये। शीर्षासन, सर्वांगासन, पश्चिमोत्तान आसन, और मयूरासन मुझे अत्यन्त प्रिय है। मैं अपने सभी विद्यार्थियों को इनका अभ्यास करने की शिक्षा देता हूँ।

भूमि पर कंबल बिछा लीजिये। कमर के बल सीधे चिन्ह लम्ब जाइये। धीरे धीरे टांगों को ऊपर उठाइये। धड़ और जंशाओं को भी ऊपर उठाइये। दोनों ओर से हाथों के सहारे कमर को थामे रहिये। अब सारा शरीर का भार आपके कंधों व केंदुनियों पर रहेगा। टांगों को स्थिर रखिये। टुट्टी को छाती की ओर हटता पूर्वक दबाये रखिये। केवल नासिका द्वारा धीरे धीरे स्वांस लीजिये। पांच मिनट से आरम्भ कीजिये और फिर धीरे धीरे जितना हो सके समय बढ़ाइये।

(४) मस्त्यासन

मत्स्यासन

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सर्वांगासन के पश्चात् तुरत मत्स्यासन करना चाहिए। सर्वांगासन से गर्दन व तत्संबंधी भागों में जो ऐंठन या रूखापन आ जाता है उसे यह आसन दूर कर देता है। इसके गर्दन तथा कंधों के संकुचित भागों को एक प्रकार से अन्च्छी हल्की सी मालिश हो जाती है। इसके अतिरिक्त इस आसन से प्रायः वे सभी लाभ प्राप्त हो जाते हैं जो सर्वांगासन से होते हैं।

दाये पैर को बाईं जंघा पर तथा बांये पैर को दाहिनी जंघा पर रखकर बैठ जाइये। अब कमर के बल चित्त लेट जाइये। मस्तक को इस प्रकार फैलाइये कि उसका ऊपरी भाग पृथ्वी पर दृढ़ता पूर्वक सटा रहे और उधर नीचे की ओर आपके दोनों चूतड़ (नितंब) भी जमीन से सटे रहें; कमर जमीन से ऊपर उठी हुई रहनी चाहिये ताकि एक प्रकार का पुल बन जाय। अब दोनों हाथों को जंघाओं पर रख दीजिये या पैरों के अंगुटों को हाथों से पकड़ लीजिये। यह मत्स्यासन अनेक रोगों का नाश करने वाला है। यह आसन साधारण स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक है।

(५) पादगुप्तासन

पंजों के बल बांये पैर को ऊपर उठाकर उसकी ऐँड़ी को गुदा के ठीक बीचों बीच रखिए। शरीर का सारा भार पंजों पर रहना चाहिये। दाहिने पैर को बाईं जंघा के ऊपर घुटने के पास रखिये। हाथों को चूतरों पर रख संतुलित होकर सावधानी से बैठिये। धीरे धीरे स्वांस लीजिये। इस आसन को अपने आप करने में यदि आपको कठिनाई मालूम हो तो आप इसको किसी बेंच या दीवाल के सहारे बैठकर कर सकते हैं।

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ब्रह्मचर्य साधना

गुदा स्थान की चौड़ाई केवल चार इंच है। इसी स्थान के नीचे वीर्य नाड़ी रहती है जिसके द्वारा वीर्य अंडकों में पहुँचता है। इस नाड़ी पर एड़ी का दबाव पड़ने से वीर्य का बाहरी प्रवाह रुक जाता है। इस आसन का दृढ़ अभ्यास करने से स्वप्नदोष मिटता है तथा साधक ऊर्ध्व रेता योगी बन जाता है। शीर्षासन, सर्वांगासन और सिद्धासन का संयुक्त प्रयोग ब्रह्मचर्य के लिये अत्यन्त लाभदायक है। प्रत्येक का अपना विशेष कार्य है। सिद्धासन अंडकोष और तत्संबंधी भागों पर प्रभाव डालता है तथा वीर्य की उत्पत्ति को रोकता है। शीर्षासन और सर्वांगासन वीर्य को ऊपर मस्तिष्क की ओर ले जाने में सहायता प्रदान करते हैं। पादांगुष्ठ्यासन शुक्र संबंधी नाड़ी पर पूर्ण प्रभाव डालता है।

आसन संबंधी सूचनायें

शारीरिक व्यायामों से प्राण बाहर की जाते हैं और आसनों के अभ्यास से प्राण अन्दर जाते हैं। आसन शारीरिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार के बलों को बढ़ाने वाले हैं।

आसनों के द्वारा इन्द्रियां मन और शरीर सभी नियन्त्रित किये जा सकते हैं। इनसे शरीर, नाड़ियां और पुष्टि शुद्ध होते हैं। यदि आप डंड बैठकों का अभ्यास पांच सौ प्रति दिन की दर से पांच वर्षों तक भी करें तो भी आपको आध्यात्मिक अनुभव कुछ भी नहीं प्राप्त हो सकते। साधारण शारीरिक व्यायाम केवल शरीर के वायु पुष्टों (अंगों) को ही पुष्ट करते हैं। शारीरिक व्यायामों के द्वारा मनुष्य एक सुन्दर डील डोल वाला सेंडो (पहलवान) बन सकता है। परन्तु आसनों से शारीरिक तथा आध्या-

आसन संबंधी सूचनायें

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स्मिक दोनों प्रकार के बल की वृद्धि होती है।

फर्श पर कंबल बिछाकर उस पर आसनों का अभ्यास करना चाहिये। शीर्षासन करते समय शिर के नीचे तकिया रखना चाहिये। आसन करते समय कौपीन (लंगोट) पहिने रहिये। चश्मा (पैन्क) उतार दीजिये और अधिक वस्त्र भी शरीर पर न रखिये।

जो लोग शीर्षासन का अभ्यास अधिक समय तक करते हैं, उनको आसन समाप्ति के पश्चात् कुछ जल-पान (कलेवा) कर लेना चाहिये अथवा कुछ दूध पी लेना चाहिए। आसनों का अभ्यास यथा-क्रम नियम-नियमानुसार करना चाहिये। जो कभी कभी अभ्यास करते हैं, उन्हें कुछ भी लाभ नहीं होता। यदि कोई आसनों का यथेच्छ लाभ उठाना चाहे, तो उसके लिये नियमित अभ्यास की परमावश्यकता है। साधारणतया लोग आरंभ में मास दो मास तक तो बड़े कौतूहल व उत्साह के साथ अभ्यास करते हैं और फिर अभ्यास छोड़ देते हैं। यह उनकी भारी भूल है।

आसनों का अभ्यास खाली पेट से करना चाहिये या खाना खाने के कम से कम तीन घंटे पश्चात्। आसनों का अभ्यास करते समय आप जप और प्राणायाम को भी सुविधा सहित भिला सकते हैं। उस स्थिति में वह वास्तविक योग बन जाता है। आसनों का अभ्यास खुली हवा में, समुद्र तट पर या नदी के किनारे बालू रेत पर करना उपयुक्त है। यदि आप आसन और प्राणायाम का अभ्यास किसी कमरे में करते हैं तो आपको देखना चाहिये कि कमरा संकुचित तो नहीं है। कमरा स्वच्छ और एवादार होना चाहिये।

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ब्रह्मचर्य साधना

आरम्भ में आसन का अभ्यास केवल एक या दो मिनट के लिये ही कीजिये और पुनः शनैः शनैः जितना हो सके, समय बढ़ाते जाइये। जब आप सभी योगिक क्रियाओं का अभ्यास करते हैं तो आप को सजग रहना चाहिये कहीं अत्यधिक परिश्रम न हो। हर समय प्रसन्नता और आनन्द रहना चाहिये।

संसार में जितने जीवधारी प्राणियों की जातियाँ हैं, उतने ही आसन हैं। यहाँ मैंने आपको कुछ सुने हुये आसनों के संबंध में शिक्षाएँ दी हैं, जो ब्रह्मचर्य के लिये परम उपयोगी है।

दन्व त्रय

बन्ध त्रय

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(६) मूल बन्ध

बाये पैर की एडी से योनि के दबाइये। गुदा को सिकोड़िये। दाहिने पैर की ऐंडी को सिगोन्द्रिय के मूल में रखिये। यह मूल बन्ध है। साधारणतया यह प्राणायाम करते समय किया जाता है।

(७) जालन्धर बन्ध

कंठ को सिकोड़िये। उदृढ़ी को हृदतापूर्वक छाती से सटा दीजिये। इसका अभ्यास पूरक के अन्त में और कुम्भक के आरम्भ में करना चाहिये। इसके पश्चात् उड़ियान बन्ध करना चाहिये। ये बन्ध एक प्रकार से एक ही प्रयोग के तीन रूप हैं।

(८) उड़ियान बंध

मस्तक को ऊपर उठाइये। रेचक कीजिये और उदर को इस प्रकार अन्दर खींचिये कि वह वक्षस्थल की गुहा से जा लगे। इस बंध का अभ्यास खड़े खड़े किया जा सकता है। इस स्थिति में टाँगों को कुछ चौड़ी कर हाथों को नंधाओं पर रख कर कुछ आगे की ओर नीचे झुक जाइये। इन तीनों (मूल, जालन्धर, उड़ियान) बन्धों का एक अन्ध्या समन्वय है।

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ब्रह्मचर्य साधना

(६) नौली किया

उड़ियान बंध बैठे बैठे किया जा सकता है, परन्तु नौली साधारणतया खड़ा होकर की जाती है। दोनों पैरों के बीच में एक फुट का फासला रख कर खड़े रहिये। हाथों को जंघाओं पर रखते हुए कमर को कुछ सामने की ओर नीचे झुका दीजिये। फिर उड़ियान बन्द कीजिये। अब पेट के गोल को पेट की दाई ओर बाई ओर इधर उधर घुमाइये। आपके सब पुछे लंब रूप में रहेंगे। सुख पूर्वक जितनी देर हो सके उतनी देर तक ऐसा कीजिये। कुछ दिनों तक इस प्रकार अभ्यास कीजिये।

इस प्रकार कुछ अभ्यास कर लेने के पश्चात् आप

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महामुद्रा

पेट की दाहिनी बगल (ओर) को सिकोड़े रखिये और बांई बगल को मुक्त कीजिये पुनः बांई बगल को सिकोड़िये और दांई को मुक्त कीजिये। इस प्रकार शनैः शनैः अभ्यास करते हुये आप स्वयं जानने लगेंगे कि पेट के बीच के तथा दांई बांई ओर के पुट्ठे किस प्रकार सिकोड़े जाने चाहिये॥

अब नौली क्रिया की अन्तिम स्थिति आती है। पुट्ठों को बीच में रखिये। धीरे धीरे दांई ओर लाइये और फिर गोलाकार रूप में बाईं ओर ले जाइये। इस प्रकार दांई से बाईं और बाईं से दाईं ओर कई बार कीजिये। आपको चाहिये कि आप इन पुट्ठों को गोलाकार चाल से सदा धीरे धीरे चलावें। यदि आप क्रिया को शनैः शनैः सावधानी के साथ करेंगे तो आपको पूर्ण लाभ होगा। नये साधकों को आरंभ के दो या तीन अभ्यासों में पेट में कुछ दर्द प्रतीत हो सकता है। परन्तु उन्हें भयभीत नहीं होना चाहिये। दो या तीन दिनों के नियमित अभ्यास के बाद दर्द नहीं प्रतीत होगा।

(१०) महामुद्रा

भूमि पर बैठ जाइये। बांई एड़ी से गुदा को दबाइये दाहिने पांव को फैला दीजिये। दोनों हाथों से अंगुष्ठ को पकड़ लीजिये। पूरक करके कुम्भक कीजिए। ठुड्डी

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ब्रह्मचर्य साधना

को दृढ़ता पूर्वक छाती से लगा लीजिए। भुंकुटी पर दृष्टि जमाइए। जितना हो सके उतनी देर तक इस स्थिति में रहिए। इसी प्रकार अन्य पांख पर भी अभ्यास कीजिए।

(११) योगमुद्रा

पद्मासन लगाकर बैठ जाइए। हथेलियों को ऐंड़ियों पर रख दीजिए। धीरे धीरे स्वांस बाहर निकालिए और सामने मुड़ते जाइए और मस्तक को भूमि से छूने दीजिए। यदि आर इस स्थिति में अधिक समय तक रहें तो साधारण रीति से स्वांस ले सकते हैं। यदि अधिक समय तक उस स्थिति में न रहें तो स्वांस को रोके रहिए जब तक आप धीरे धीरे मस्तक उठाते हुए अपनी साधारण स्थिति में न आ जायें; तब तक स्वांस पहली हालत में आकर स्वांस लीजिए। हाथों को ऐंड़ियों पर न रख कर आप उन्हें अपनी पीठ के पीछे लेजा कर, दाहिने हाथ से बाये हाथ की कलाई भी पकड़ सकते हैं। यह मुद्रा ब्रह्मचर्य के लिए लाभदायक है। इस मुद्रा से पेट का और अस्थायिक मोटापन कम होता है। तथा पेट और आंतों के सब प्रकार के रोग नष्ट होते हैं। जठराग्नि प्रबल होती है। भूल और पाचन शक्ति बढ़ती।

(१२) सरल सुखपूर्वक प्राणायाम

अपने ध्यान के कमरे में, खाली पेट पद्मासन लगा कर बैठ जाइये। आर्यों बन्द कर लीजिए। दाहिने हाथ के अंगुष्ठ के द्वारा दाहिनी नासिका को बंद कर लीजिये और बाईं नासिका के द्वारा धीरे धीरे वायु को भीतर खींचिए। अब दाहिने हाथ की अनामिका और कतिष्का अंगुलियों द्वारा बाये नासा-द्वार को बंद कर दीजिए। स्वांस को जितनी देर रोक सकें भीतर रोके रहिए। फिर

भक्तिका प्राणायाम

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दाहिने ग्रंणुष्ठ को हटा लीजिए और बहुत धीरे धीरे स्वांस बाहर निकालिए। इसी प्रकार पुनः दाहिने नासा-द्वार के द्वारा वायु को अन्दर खींचिए; जितनी देर रोक सकें अन्दर रोके रखिए फिर बांये द्वार से धीरे धीरे बाहर निकाल दें। यह सारा क्रम एक प्राणायाम कहलाना है। इस प्रकार २० प्राणायाम प्रातः और २० सार्धकाल में कीजिए। धीरे धीरे स्वांस रोकने के समय को मावधानी सहित बढ़ाइए; साथ ही प्राणायामों की संख्या को भी बढ़ाने का प्रयत्न कीजिए। जब आपको श्रद्धा अभ्यास हो जाय तो आप दिन में तीन या चार बार प्राणायाम कर सकते तथा प्राणायामों की संख्या भी एक बैठक में ८० तक बढ़ा सकते हैं।

नोटः—हाथ के ग्रंणुष्ठ के पास वाली ग्रंणुली को तर्जनी, उसके पास वाली यानी चिन्हली ग्रंणुली को मध्यमा उसके पास वाली को अनामिका तथा उसके पास वाली ग्रंणुली को कनिष्ठका कहते हैं।

(१३) भक्तिका प्राणायाम

प्रासन से बैठ जाइये। शरीर को सीधा खड़ा रखिये। मुँह बंद कर लीजिए। धीँकनी की नाई बीस बार तक खूब जोर जोर से पूरक और रेचक कीजिए। बीस पूरे होने पर फिर गहरी स्वांस लीजिए और धीरे धीरे बाहर निकालिये। यह एक चक्र है। योद्धा अवकाश लीजिए और फिर दूसरा चक्र कीजिए। तीन चक्र प्रातः और तीन चक्र सार्धकाल में कीजिये। यह बहुत शक्तिशाली अभ्यास है। ब्रह्मचर्य के लिए परम उपयोगी है। इस प्राणायाम को खड़े खड़े भी कर सकते हैं।

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ब्रह्मचर्य साधना

(१४) प्राणायाम के संबंध में साधारण संकेत प्राणायाम के अभ्यास के पश्चात् तुरंत स्नान नहीं करना चाहिये। आद्य घंटे तक ठहर कर फिर नहाना चाहिये। शीघ्र ऋतु में केवल एक ही बार मातृकाल में प्राणायाम करें। यदि मस्तिष्क में कुछ ताप मालूम हो तो नहाने के पहिले शिर पर ठंडा तेल मसिये।

पूरक और रेचक सदा धीरे धीरे करने चाहिये। पूरक करते समय कुछ भी शब्द नहीं होना चाहिये। भक्षिका में भी जो शब्द हो, वह तीव्र होना चाहिये। केशल नासिका द्वारा ही स्वांस लेना चाहिये। नये साधक को कुछ दिनों के लिये बिना कुम्भक का केवल पूरक और रेचक ही करना चाहिये।

प्राणायाम करते समय पूरक, कुम्भक और रेचक इस त्वरी से करना चाहिये कि आपको किसी भी स्थिति में कुछ भी पीड़ा या स्वासावरोधन न हो। रेचक का समय आपको आवश्यकता से अधिक नहीं बढ़ाना चाहिये। यदि आप ऐसा करते हैं तो आपका श्रमला पूरक शीघ्रता पूर्वक होगा और आपका लय या ताल भंग हो जायगा।

कुम्भक का समय शनैः शनैः बढ़ाहये। प्रथम सप्ताह में चार सेकेंड, दूसरे सप्ताह में द सेकेंड और तीसरे सप्ताह में १२ सेकेंड के लिये कुम्भक कीजिये; इसी प्रकार जितना हो सके, समय बढ़ाते जाहये।

प्राणायाम करते समय ८% मंत्र का, गायत्री मंत्र का अथवा किसी भी अन्य मंत्र का मानसिक जप कीजिये। ऐसा भाव रखिये कि पूरक करते समय करुणा, क्षमा, प्रेम आदि सद्गुण आप में प्रवेश कर रहे हैं तथा रेचक करते समय आपके काम, कोष, द्वेष, लोभ आदि दुष्ट गुणों

अन्य प्रकार

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का क्षय हो रहा है। पूरक करते समय आप ऐसी भावना कीजिये कि आप लौकिक प्राण से शक्ति प्राप्त कर रहे हैं तथा आपका सारा शरीर अगाध, स्वच्छ प्राण शक्ति से परिपूर्ण हो रहा है। विशेष अस्वस्थ अवस्था में अभ्यास बन्द कर दीजिये।

(१५) अन्य प्रकार

सत्संग, आहार संबन्धी नियम, मिताहार, सात्विक भोजन, व्रत, दृष्टि परिवर्तन आदि उपरोक्त सभी बातें, हठ-योग, भक्तियोग, राजयोग और ज्ञानयोग के सभी विद्यार्थियों के लिये सामान्य रूप से लागू हैं। ब्रह्मचर्य संबन्धी आवश्यक हठयोगिक अभ्यास पहिले बताये जा चुके हैं।

नवधा भक्ति (श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य और आत्म निवेदन) के अभ्यास के द्वारा भक्त अपनी अशुद्ध भावनाओं का दमन कर अपने मन को सगुण ब्रह्म पर एकाग्र कर सकता है। भगवान की लीला या कथा का सुनना या शान्तों का अध्ययन करना श्रवण भक्ति है। भगवान के नाम का निरन्तर जप करना तथा उसका निरन्तर स्मरण करना, स्मरण भक्ति कहलाती है। भगवान के यश का गान करना, कीर्तन है। पत्र-पुष्पादि भेंट चढ़ाना, अर्चन है। भगवान के चरण कमलों की पूजा करना, पादसेवन है। भगवान से मित्रता करना, सख्य है। भगवान की निस्वार्थ भाव से सेवा करना, दास्य है। आत्म समर्पण ही आत्म निवेदन है। व्रत, अनुष्ठान, प्रार्थनायें, मानसिक पूजा, मर्मग्राह्य आदि के द्वारा भक्त काम, क्रोध व अन्य अशुद्ध वामनाओं से मुक्त होकर नित्य शान्ति, आनन्द और ज्ञान के पथ पर चल सकता है।

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ब्रह्मचर्ये साधना

यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार के अभ्यास के द्वारा, राजयोगी कामवासना पर विजय प्राप्त कर अपनी यौगिक साधना में अग्रसर होता है।

आचारिक या धार्मिक पवित्रता के लिये यम और नियम आवश्यक हैं। अहिंसा, सत्य, अस्तेय ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह—ये यम कहलाते हैं। शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान—ये नियम हैं। मन, वचन और कर्म से किसी भी प्राणी को कष्ट नहीं देना, अहिंसा है। सच्चे बोलना सत्य है। संग्रह या लोभ नहीं करना, अपरिग्रह है। अन्तर और वाक् शुद्धि को शौच कहते हैं। प्राप्त वस्तु में तृप्ति मानना ही सन्तोष है। तपश्चर्या कर शरीर को कष्ट देना, तप है। अपने कर्म फलों को भगवान् के अर्पण कर देना, ईश्वर प्रणिधान कहलाता है। इन्द्रियों को भोग-पदार्थों से हटाना, प्रत्याहार कहलाता है। इन्द्रियों मन से पृथक् हैं। यदि मन को सदा विषयों से हटाकर लक्ष्य पर लगाया जाय तो प्रत्याहार आप ही होने लगेगा। ब्रह्मचर्य रक्षण के लिये प्रत्याहार बहुत सहायता प्रदान करता है। 'चित्तवृत्ति निरोध' इस उक्ति के द्वारा साधक वृत्ति हीन अवस्था को प्राप्त करता है। मन से किसी भी धिन्वार को उत्पन्न नहीं होने देते।

ज्ञान योगी, वैराग्य, विवेक, शम, दम, तितिक्षा समाधान, उपरति, श्रद्धा, मुमुक्षुत्व, अवण्ण, मनन और निदिध्यामन के अभ्यास द्वारा पवित्र होता है। विषय-सुख-भोगों से उदासीन रहना, वैराग्य है। सत्य और असत्य, नित्य और अनित्य का विचार करते रहना ही विवेक है। मन की शान्ति को शम कहते हैं। त्याग उपरति है। सहनशीलता ही तितिक्षा है (शीत, उष्ण आदि सहन करना)

निश्चय कीजिये और ध्यान कीजिये

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गुरु तथा शास्त्रों के वचनों में विश्वास रखना, अद्वा है। मन की सन्तुलित अवस्था, समाधान है। जीवन मरण के चक्र से मुक्त होने की तीव्र इच्छा को समुद्बल कहते हैं। ॐ का जप तथा शुद्ध अलिंग आत्मा का ध्यान करने से मन में कुत्सित विचार उत्पन्न नहीं होंगे। सब वासनायें नष्ट हो जायेंगी। साधक अपने मन को सदा विचार में पूर्णतया निमग्न रखता है।

वासनाओं का क्षय करके, राग-द्वेष को मन से निकाल करके, अपनी आवश्यकताओं को कम करके तथा तितिक्षा का अभ्यास करके यदि आप अपनी इच्छा या संकल्प-शक्ति को शुद्ध दृढ़ और अद्विग बना लेंगे तो आपका काम स्वयं भस्म हो जायगा। संकल्प-शक्ति काम का प्रबल शत्रु है।

अपने ध्यान के कमरे में अकेले बैठ जाइये। नेत्रों को थन्द कर लीजिये। उपर्युक्त नियमों को बार बार दुहराइये। अर्थात् भी ध्यान जमाइये। इन्हीं विचारों में अपने मन और बुद्धि को डुबो दीजिये। आपके सारे नस-नस इन विचारों से संदित होने चाहिये।

(१६) निश्चय कीजिये और ध्यान कीजिये

  • (१) मैं शुद्ध हूँ ॐ
  • (२) मैं अलिंग आत्मा हूँ ॐ
  • (३) आत्मा काम तथा लिंग-रहित है ॐ ॐ ॐ
  • (४) काम मानसिक विकार है; मैं इसका सान्नि ॐ ॐ ॐ ॐ
  • (५) मैं अंतर्ग हूँ ॐ ॐ ॐ
  • (६) मेरा संकल्प शुद्ध दृढ़ और अद्विग है ॐ ॐ ॐ
  • (७) मैं पूर्णरूप से शारीरिक और मानसिक ब्रह्मचर्य में संविधत हूँ ॐ ॐ ॐ

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ब्रह्मचर्य साधना

(८) मैं अब पवित्रता का अनुभव कर रहा हूँ

ॐ ॐ ॐ

किसी कागज पर छुः बार लिखिये “ॐ पवित्रता !” इसको आपनी जेब में रखिये। दिन में कई बार पढ़िये। इसे आप अपने घर में किसी दीवाल पर चिपका सकते हैं अथवा इसे किसी प्रमुख स्थान पर रख सकते हैं जहाँ वह हर समय आपके देखने में आता रहे। “ॐ पवित्रता” इन शब्दों का मानसिक चित्र आपके सामने सदा घूमत रहे। ब्रह्मचारी संत महात्माओं तथा उनके शक्तिशाली कार्यों का सदा स्मरण करते रहिये। ब्रह्मचर्य रूपी पवित्र जीवन के लाभ तथा अपवित्र जीवन से उत्पन्न होने वाली हानियों तथा पापों पर विचार करते रहिये।

नित्य अनुभव करते रहिये “भगवान की कृपा से मैं हर तरह से दिन दिन श्रेष्ठतर होता जा रहा हूँ” इसे आत्म-संकेत कहते हैं। यह भी एक प्रभावशाली विधि है।

(१७) टंडा हिप वाथ (कटि स्नान)

टंडा हिप वाथ बल और तेज बढ़ाने वाला है। हिप-वाथ और बैठक-स्नान में विशेष अन्तर नहीं है। इस संवन्ध में विशेष जानकारी के लिये (Louis Kuhne) लुई कुन्हे की “जल चिकित्सा” शीर्षक पुस्तक देखें। टंडा हिप वाथ अन्नेन्द्रिय और मूल संकन्धी नाड़ियों को मृदु आश्राम प्रदान करता है तथा रात्रि में होने वाले स्वप्न दोष को रोकने में यह एक रामवाण औषधि (प्रयोग) है। यह नाड़ी-मंडल को पुष्ट करने वाली एक मही विधि है।

किसी नदी मील या तालाब में आध घंटे तक इस प्रकार खड़े रहिये कि पानी आपके नामी तक ही रहे उपर न जाय। खड़े खड़े गायत्री या अन्य किसी भी मंत्र का

ठंडा हिप बाथ

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जप करते रहिये। पेट के नीचे वाले भाग को अंगोछे या किसी खहर के मोटे कपड़े से रगड़ते जाइये। धीम्ब मृतु में यह स्नान प्रातः और सायंकाल में दो बार लेना चाहिये। यह स्नान घर पर भी किसी बड़े टब में मुखपूर्वक लिया जा सकता है। बूढ़े तथा रोग युक्त व्यक्ति गुनगुने पानी का प्रयोग कर सकते हैं। स्नान कर चुकने पर शरीर के गीले भाग को सूखे अंगोछे से पोंछ कर गर्म कपड़ा पहन लेना चाहिए। किसी नल या फोहारे के नीचे थंड कर ठंडे पानी से स्नान ब्रह्मचर्य के अभ्यास के लिए अत्यन्त लाभदायक है।

वह इच्छा जो मन में सूक्ष्मरूप से छिपी हुई रहती है, उसे वासना कहते हैं। स्थूल रूप में वह इच्छा है। विषय पदार्थों को प्राप्त करने के लिए वनीभूत उत्कंठा (लालसा) को तुष्णा कहते हैं।

दशवां अध्याय

कहानियां और चरित्र

(१) जैमिनी ऋषि

एक बार ध्यास मुनि अपने शिष्यों को वेदान्त की शिक्षा दे रहे थे। प्रसंग वश उन्होंने अपने प्रवचन में कहा कि नवयुवक ब्रह्मचारियों को पूर्णतया सावधान रहना चाहिए कि वे युवती स्त्रियों का संग कदापि न करें क्योंकि काम ऐसा प्रयत्न है कि सर्वतः सावधान रहने पर भी वे काम के शिकार बन सकते हैं। जैमिनी नाम का एक शिष्य—जो पूर्व मीमांसा का रचयिता था—कुछ पूछा था। उसने कहा “गुरु जी महाराज ! आपका कथन असत्य है। कोई भी स्त्री मुझे आकर्षित नहीं कर सकती। मैं ब्रह्मचर्य में प्रतिष्ठित हूँ।” कुछ दिनों के पश्चात् व्यास

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जैमिनी ऋषि की कहानी

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मुनि ने कहा “मैं वाराणसी जा रहा हूँ और तीन महीने के पश्चात् आर्जुंगा । सावधान रहना, घर्मंड (अहंकार) न करना ।” व्यास मुनि ने अपने योग बल से एक ऐसी सुन्दर युवती का रूप धारण कर लिया जो अपनी महान् शैमी साड़ी, भोली माली मुखाम्बुति तथा बाँकी चितवन के द्वारा दर्शक गणों के मनों को आकर्षित करने वाली थी । सायंकाल का समय था, यह वाला एक चूल्ह के नीचे खड़ी थी । गगन में मेघ छाये हुये थे । धीरे धीरे वर्षा होने लगी । अकस्मात् जैमिनी उधर होकर जा रहे थे । उन्होंने उस रूपवती को देखा उनके हृदय में करुणा उत्पन्न हुई और उन्होंने उससे कहा “बहन जी ! आप आइये और मेरे आश्रम में ठहरिये, मैं आपको रहने के लिये स्थान दूंगा ।” वाला ने पूछा “क्या आप अकेले रहते हैं ? वहाँ कोई अन्य स्त्री है ?” जैमिनी ने उत्तर दिया “मैं अकेला हूँ । परन्तु मैं पूर्ण ब्रह्मचारी हूँ । मैं काम से प्रभावित नहीं हो सकता । मैं सब प्रकार के प्रलोभनों से मुक्त हूँ ! आप वहाँ रह सकती हैं ।” वाला ने कहा “एक तरफ़ कुमारी कन्या को ब्रह्मचारी के साथ रात्रि में अकेली रहना उचित नहीं है ।” जैमिनी ने कहा “हे भगिनी ! आप भयभीत न होइये । मैं प्रतिज्ञा कर कहता हूँ कि मैं पूर्ण ब्रह्मचारी हूँ ।” इस पर उस वाला ने स्वीकार कर लिया और वह रात्रि में उसके आश्रम में ठहर गई । जैमिनी बाहर सो गया और वह स्त्री कमरे के भीतर सो रही थी । अद्भुत रात्रि के समय जैमिनी काम के प्रभाव से पीड़ित होने लगा और उसके मन में काम-वासना उत्पन्न हो गई । प्रथमतः वह सर्वथा शुद्ध था । उसने कमरे का द्वार खटखटाया और कहा “अजी ! बहिन जी, बाहिर हवा चल रही है,

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ब्रह्मचर्य साधना

मैं ठंडी हवा के भोंके सहन नहीं कर सकता मैं भीतर सोना चाहता हूँ।” उसने द्वार खोल दिया। जैमिनी भीतर आकर स्त्री से कुछ दूरी पर सो गया। स्त्री के अत्यन्त निकट होने तथा उसके कंकन व नूपुरों की मधुर मधुर भनकार कानों में पड़ने से अब उसकी काम-वासना कुछ और अधिक प्रबल हो गई। तब वह उठा और उसे आलिंगन करने लगा। तत्काल लंबी दाढ़ी युक्त श्री व्यास मुनि अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हो गये और कहने लगे “ओ वत्स ! जैमिनी ! अब तुम्हारे उस पूर्ण ब्रह्मचर्य का बल कहाँ गया ? जब मैं उस समय ब्रह्मचर्य के विषय पर प्रवचन कर रहा था, तब तुमने क्या कहा था ?” जैमिनी ने अतिशय लज्जा के कारण शिर नवा कर कहा “हे गुरुदेव ! मैं अधर्मी हूँ। कृपया क्षमा कीजिये।” इस कहानी से यही शिक्षा मिलती है कि बलवती इन्द्रियों के प्रभाव तथा माया की शक्ति के द्वारा बदे बदे महा पुरुष भी धोखा खा जाते हैं। ब्रह्मचारियों को चाहिये कि वे प्रत्येक अवस्था में पूरे पूरे सावधान रहें।

(२) गुरुदेव मुनि

चित्त की एकाग्रता की जांच

श्री गुरुदेव जी ब्रह्मवान प्राप्त करने के हेतु राजा जनक के पास गये। राजा जनक ने उनकी धारणा (चित्त की एकाग्रता) शक्ति की परीक्षा लेनी चाही। उसने गुरुदेव जी को बुलाकर कहा 'हे ऋषि राज ! लीजिये यह एक पानी से भरा दुग्ध कटोरा है। इसे अपने मस्तक पर रख लीजिये और सारी मिथिला नगरी का चक्कर काट कर पुनः मेरे पास यहाँ आ जाइये, परन्तु ध्यान रहे कि पानी

राजा ययाति

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की एक बूंद भी पृथ्वी पर नहीं गिरनी चाहिये।’ राजा जनक ने उनके मार्ग में सुन्दर युवतियों के नाच, गान, वाद्य तथा नाना प्रकार के खेल, तमाशों की रचना करने का पहिले ही से प्रबन्ध कर दिया था ताकि उनका ध्यान किसी न किसी प्रकार से अवश्य विचलित हो जाय। सुख देव मुनि उस पानी के कटोरे को अपने शिर पर रक्खे हुए सारी नगरी में घूमकर पुनः ज्यों के त्यों राजा के पास लौट आये, पानी की एक बूंद भी गिरने न पाई।

राजा जनक ने पूछा “हे सुकदेव जी ! क्या आपने रास्ते में नाच गान आदि देखे ?” सुकदेव जी ने उत्तर दिया “हे मान्यवर ! मैंने रास्ते में कुछ भी नहीं देखा क्योंकि मेरा सम्पूर्ण ध्यान पानी के कटोरे पर था।”

दक्षिण भारत के सुप्रसिद्ध गृहस्थ ज्ञानी तिरुवल्लुवर ने भी अपनी पत्नी की परीक्षा इसी प्रकार से ली थी। यदि आप सुकदेव जी की भांति चित्त की एकाग्रता प्राप्त कर लेंगे तो ब्रह्मचर्य सदा करवद्ध होकर आपके गृह-द्वार पर खड़ा रहेगा।

(३) राजा ययाति

इसकी कथा आपको महाभारत—शान्ति पर्व में मिलेगी। यद्यपि राजा ययाति वृद्ध हो गया था, तथापि उसकी काम वासना अति प्रबल थी। उसने अपने पुत्र को बुला कर कहा “हे वत्स ! मैं उत्कट अनुरागी हूँ। मैं छः नवयुवती कन्याओं से विवाह करना चाहता हूँ। मुझे तुम्हारा यौवन दो।” पुत्र ने पिता की आज्ञा स्वीकार कर ली और उसने अपना यौवन पिता को दे दिया। राजा ने कई वर्षों तक घाटियों, नालियों, कगीचों, समुद्र