भारतकोश
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ब्रह्मचर्यामृत अर्थात् जीवन सन्देश

Brahmacharyamrit Arthat Jeevan Sandesh

स्वामी ओमानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: गुरुकुल झज्जर संस्करण · गुरुकुल झज्जर (हरियाणा) (उद्गम)

DevanagariHindipublished26 पृष्ठ

॥ ओ३म् ॥

विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव।

यद्भद्रं तन्न आ सुद। (यजुर्वेद अ० ३० मन्त्र ३)

इस पवित्र वेदवाणी द्वारा ईश्वर का सच्चा भक्त प्रेम से गदगद होकर प्रेममय प्रभु से प्रार्थना करता है— हे दयालु देव ! आप ही इस संसार के कर्ता—धर्ता और हर्ता हैं। मेरे सब दुर्गुण, दोष कुटेव (बुरी आदतें) तथा सब दुःखों को दूर करो। यही नहीं, किन्तु जितने सद्गुण (अच्छी आदतें) तुझ में हैं— मैं उन सबका भण्डार बन जाऊँ। जिससे सच्चे सुख और परमानन्द की प्राप्ति कर सकूँ।

किसी कवि ने कहा है —

हे जगदीश्वर दोष हमारे सगरे दूर भगादो।

जितने सद्गुण जगत् बीच हैं हमरे संग लगादो॥

हम औरों के दोष न देखें अपने दोष विचारें।

निन्दा करें न कभी किसी की यही एक गुण धारें॥

यदि संसार इस प्रार्थना के अनुसार चले तो शीघ्र ही स्वर्गधाम बन जाये। किन्तु बने कैसे ? जब बीज में ही दोष हो तो मीठे फल कहीं आकाश में से पककर आजाये ? भला चाहते हो तो ऋषियों की शरण में आओ और 'मातृमान् पितृमान् आचार्यवान् पुरुषो वेद' के अनुसार चलो। फिर देखो, आनन्द ही आनन्द है। धन्य हैं व सन्तान जिनके माता-पिता सदाचारी, विद्वान् और धार्मिक हैं जो गर्भाधान से लेकर पूरी विद्या होने तक धर्म और सदाचार का ही उपदेश और शिक्षा देते हैं। इतना ही नहीं, किन्तु पवित्र देवभूमि गुरुकुल में पूर्ण विद्वान्-धार्मिक और सदाचारी अध्यापक और गुरुओं द्वारा अपनी सन्तान को शिक्षा दिलाते हैं। तब जाकर बालक दुर्गुणों (बुरी आदतों) से बचकर धर्मात्मा और सुखी हो सकते हैं। नहीं तो कितने ही पापड़ बेलों, कुछ नहीं बनेगा। ये कच्चे बीज के फल पकने से पूर्व धड़ाम से नीचे गिर और सड़कर केवल दुःख का ही कारण होंगे, इनसे मिठास और स्वाद आये तथा शक्ति और बल प्राप्त हो, ऐसी आशा करना मूर्खता ही है।

हम लोगों के बच्चे भारत-माता की स्वाधीनता की रक्षा कर राम

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ब्रह्मचर्यामृत

राज्य बनायेंगे, फिर से भारत-भूमि को प्राचीन गौरव प्राप्त करायेंगे ऐसी आशा करना उपहास (मजाक) मात्र ही है। हम तो इतने निर्बल हैं कि उठते-बैठते, अँधेरी आती है, जवानी दूर भागती है और बुढ़ापे को बुलाती है। बल शक्ति और सुन्दरता हमारे पास रहती हुई शर्माती है। तेज, साहस, वीरता हमें नगरते कहकर भाग गये हैं हम भारत-माता के सपूत सोये हुए हैं, किन्तु दुनियाँ के सब लोग जाग गये हैं। हमारे देश में पापों की भरमार है और हमारा जीवन दुःखमय और भार है।

किन्तु इसमें हमारा अपराध ही क्या है ? न तो हमें माता-पिता ही धार्मिक मिले और न ही सच्चे गुरुओं की शिक्षा मिली। अरे-भाई कहाँ सच्चे गुरु और जीवन की शिक्षा ? यहाँ तो जैसे मूर्ख किसान प्रातःकाल अपने पशुओं के रस्से खोल देते हैं, वे सायं काल तक भूखे रहें वा प्यासे रहें, किसी की हानि करें वा लाभ करें, कोई देखभाल नहीं, वही बर्ताव, नहीं नहीं, किन्तु उससे भी बुरा, अपने जिगर के टुकड़ों-प्राणों से प्यारे बच्चों के साथ, हमारे माता-पिता करते हैं। न कुछ सीखते हैं, न पढ़ते हैं। कहाँ धर्म और सदाचार की शिक्षा। हम तो गलियों में फिरते-फिरते एवं नीच और दुराचारी साथियों के साथ खेलते कूदते न जाने कितने दुर्गुण (बुराईयों) पल्ले बाँध लेते हैं। बालकों का हृदय कोमल और स्वभाव सरल होता है, कुसंग की दलदल में फँस जाता है। दुर्गुणों को सदगुण समझकर झोली भर लेता है। पहिले-पहिले बुराई भी भलाई लगती है। भला बनने में दुःख और कष्ट भी प्रतीत होता है। यही नहीं, बालक बेचारे को बुराई भलाई का ठीक ज्ञान ही कहाँ होता है ? वह विष को अमृत समझ खा बैठता है।

प्रथम तो माता-पिता ने शिक्षा नहीं दी। दूसरे गली-कूचों के कुसंग की मार पड़ी। तीसरे आजकल के भारतीय स्कूलों में दुर्भाग्यवश अनेक दुराचारी अध्यापक भी आजाते हैं जिनके संग से बच्चे बिगड़ जाते हैं। इसका कारण कुछ तो देश की नैतिक दृष्टि से ही हीन अवस्था है और कुछ यह भी है कि अध्यापकों को बहुत कम वेतन मिलता है जिससे कि अच्छे और बुद्धिमान् व्यक्ति अन्य पदों पर चले जाते हैं। यह सब जानते हैं कि यह अर्थ-युग है। प्राचीन युग के समान केवल निर्वाह-मात्र लेकर सन्तुष्ट हो

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जीवन-सन्देश

जानेवाले ब्राह्मणवृत्ति के अध्यापक आजकल विरले ही होते हैं। जिन्हें कहीं अन्यत्र स्थान नहीं मिलता वे विवश हो स्कूलों में आजाते हैं। अब देश स्वतन्त्र है। राज्य को चाहिए कि अध्यापकों को समुचित वेतन एवं मान दे। इनका कार्य बड़े उत्तरदायित्व का है। अच्छे अध्यापक अवश्य आदरणीय हैं, वे भावी राष्ट्र के नेताओं के निर्माता हैं।

गुण्डे नीच छात्रों के चंगुल से बचना टेढ़ी खीर है। शायद ही कोई सौभाग्यशाली बालक बचता होगा। इनके पवित्र जीवन पर वे भयंकर धब्बे (दाग) लग जाते हैं जो यत्न करने पर अनेक जन्मों तक नहीं धुलते। परमात्मा वह शुभ दिन लाये जब हमारे स्कूल आदि शिक्षणालयों में चरित्र-हीनता और गन्दगी मिटे। यह सच्चे गुरुकुल और शिक्षणालय बनें।

यह एक दुःखी की पुकार और करुण-क्रन्दन (रोना) है। मैं सताए हुए होनहार बालकों और युवकों को एक अमृत पिलाना चाहता हूँ। आपका दुःख है, यही समझ भेंट देना चाहता हूँ। आप श्रद्धा से स्वीकार कर इसका सेवन वा पान करें, यही इसका मूल्य है। यह अचूक और अमोघ औषधि है, इसे खाओ, संजीवनी बूटी है। अन्दर जाते ही सब रोग दूर होंगे, आरोग्यता बढ़ेगी, निर्बलता और पाप चकनाचूर होंगे, सुन्दरता सरसायेगी, बुद्धि भी पराक्रम दिखलायेगी, बल और नवजीवन आयेगा। शरीर पर लाली और मुख पर तेज चम-चमायेगा। इसके सेवन से बूढ़े जवान होंगे, बालक पहलवान होंगे, मूर्ख विद्वान् होंगे। यदि मृत्यु भी आयेगी तो चार ठोकर खाकर दूर जायेगी। नवयुवको! आपको तो वह आनन्द आयेगा जिसको यह वाणी कह नहीं सकती और लेखनी लिख नहीं सकती। यह तो गूँगे के लिए मिश्री का स्वाद है, जो चखेगा सो जानेगा।

आप औषध (नुस्खा) पूछना चाहेंगे।

भाई ! यह किसी टटपूँजिये वैद्य और ऐरे-गरे-नत्थू-खेरे की पिप्सी पिप्साई औषध नहीं, यह एक महान् संदेश है। यह प्राचीन भारत का जीवन-सन्देश हमें गंगा-यमुना की मन-लुभावनी लहरों की अनवरत कलकल ध्वनि से मिलता है। अरण्य की नीरव शून्यता, हिमालय की हिमाच्छादित गुफायें, तपस्वियों के तपस्यामय आश्रम जोर-जोर से

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ब्रह्मचर्यामृत

चिल्ला-चिल्लाकर सन्देश सुना रहे हैं। कमी है सुननेवालों की। सुनो ! यह आदिसृष्टि का संदेश है। क्या आप भी नहीं समझे ? लो, स्पष्ट सुनलो, कान खोलकर सुनलो। फिर न कहना कि हमें पता नहीं चला, यह वह संदेश है, जो इस युग के विधाता सच्चे आजीवन ब्रह्मचारी महर्षि दयानन्द जी महाराज ने पुनः संसार को दिया। यह संदेश अमर संदेश है। इस पर अमरता की छाप (मोहर) महर्षि ने ही लगाई है। यह अमृतरूपी संदेश है—ब्रह्मचर्य ! ब्रह्मचर्य !! ब्रह्मचर्य !!! इसे सुनो और संसार के कोने-कोने में सुनादो, ब्रह्मचर्यामृत को सारी आयुभर खूब स्वाद ले-लेकर और घूँट-घूँटकर पीओ और इसे पीकर परशुराम, हनुमान, भीष्म, शंकर और दयानन्द के समान अमर होजाओ।

ब्रह्मचर्य क्या है ?

ब्रह्मचर्य क्या है ? जब तक इसे ठीक-ठीक न समझ लिया जाये तब तक इससे पूर्ण लाभ उठाना और ब्रह्मचर्य की रक्षा करना असम्भव है। 'ब्रह्मचर्य' यह दो शब्दों से बना है।

१. ब्रह्म- इसका अर्थ है—ईश्वर, वेद, ज्ञान और वीर्यादि।

२. चर्य-इसका अर्थ है—चिन्तन, अध्ययन, उपार्जन और रक्षण।

इस प्रकार ब्रह्मचर्य के—

१. ईश्वर-चिन्तन, २. ज्ञान (विद्या) उपार्जन,

४. वीर्य-रक्षण आदि अर्थ हुए।

इन सब का परस्पर घनिष्ठ (गहरा) सम्बन्ध है। वैसे ब्रह्मचर्य का नाम लेते ही लोगों के हृदय में वीर्यरक्षा का भाव उठता है। इसी को ही लोग ब्रह्मचर्य समझते हैं, किन्तु एक ही साथ ईश्वरचिन्तन करना, वेद पढ़ना, ज्ञान और विद्या की प्राप्ति करना तथा वीर्यरक्षा करने का नाम ब्रह्मचर्य है। जो मनुष्य वीर्य की रक्षा नहीं करता और विषय-भोगों में फँसा रहता है, वह वेद का अध्ययन, विद्योपार्जन और ईश्वर-चिन्तन कभी नहीं कर सकता। शरीर, मन और आत्मा को पूर्ण शक्तिशाली और बलवान् बनाना और किसी प्रकार इनकी शक्तियों का हास और नाश न होने देना ही ब्रह्मचर्य है। इन तीनों में से किसी एक की भी शक्ति का नाश हुआ तो

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जीवन-सन्देश

वह ब्रह्मचर्य सम्पूर्ण नहीं अधूरा है। अतः शारीरिक, मानसिक और आत्मिक शक्तियों को पूर्ण उन्नत और विकसित करो, यह कैसे होगा ? ब्रह्मचर्य पालन से। ब्रह्मचर्य का स्थूल (मोटा) रूप वीर्यरक्षा है।

वीर्य क्या है ?

पहले इसे समझ लें, फिर इसकी रक्षा का प्रश्न होगा। जो भोजन हम प्रतिदिन करते हैं उसका पेट में जाकर पहले रस बनता है जैसे पशुओं के शरीर में दूध बनता है वैसे ही भोजन का असली सार शरीर में रहता है। उसी से रसादि धातुएं बनती हैं। भोजन का जो स्थूल (खराब) भाग होता है, वह मल मूत्रादि गन्दगी के रूप में शरीर से निकलता रहता है। रस फिर से जठराग्नि में पकने के लिए जाता है। इससे पक्कर रक्त बनता है। इसी प्रकार क्रमशः एक के बाद एक, रक्त से माँस (गोरत), माँस से मेद (चर्बी), मेद से हड्डी, हड्डी से मज्जा और मज्जा से वीर्य सातवीं धातु बनती है। प्रत्येक धातु के बनने में पाँच दिन से अधिक समय लगता है। वीर्य के तैयार करने में शरीर के यन्त्रों (मशीन) को विशेष परिश्रम करना पड़ता है। इसमें तीस दिन से अधिक समय लगता है। तब कहीं यह मनुष्य का बीज (वीर्य) तैयार होता है। १०० बूँद रक्त (खून) से एक बूँद वीर्य बनता है। लगभग जो भोजन एक मन की मात्रा में किया जाता है उससे एक सेर रक्त बनता है। एक सेर रक्त से एक तोला से कम वीर्य तैयार होता है। यदि एक तोला वीर्य शरीर से निकल जाये तो एक सेर खून अर्थात् एक मन भोजन का सार नष्ट हो गया। एक बार की कुचेष्टा वा व्यभिचार से जो वीर्य-पात (नष्ट) होता है, वह एक तोले से अधिक ही होता है। एक बार के वीर्य से दस दिन की आयु घटती है, अतः हमारे पूर्वज वीर्यरक्षा में जी-जान से लगे रहते थे। यही तो बात है कि पुराने समय में हमारे देश में १०० वर्ष से पूर्व कोई मरता न था। अकाल वा बालमृत्यु कोई जानता भी न था। यह तो शरीर का बल है। वीर्य की अग्नि मृत्यु के पंखों को भी जला डालती है। जिसका शरीर वीर्य से भरा है, उसे मृत्यु का भय कैसा ? अतः वीर्य की रक्षा करो और भीष्म और दयानन्द के समान मृत्युंजय (मृत्यु को

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ब्रह्मचर्यामृत

जीतने वाला) बनो।

वीर्यरक्षा का प्रताप

१७६ वर्ष का ब्रह्मचारी भीष्म कुरुक्षेत्र के मैदान में वह घमासान युद्ध मचाता है कि प्रतिदिन दस-दस हजार सैनिकों को वीरगति प्राप्त कराता है। ऐसी अवस्था देख सारा पाण्डव-दल घबराता है। पाण्डव योगश्वर कृष्ण को नेता बना भीष्म की शरण में आते हैं। उसी से अपनी विजय का उपाय गिड़गिड़ाकर पूछते हैं। भीष्म की उदारता और धर्मप्रिय से पाण्डवों को उनके मरने का ढँग और रीति मिल जाती है। शिखण्डी को आगे खड़ा करके अर्जुन निहत्थे भीष्म पर तीर बरसाता है और अपनी वीरता के जौहर दिखाता है। भीष्म का शरीर छलनी हो जाता है। वे शरशय्या पर ही लेट जाते हैं। तीरों से बिधे प्रतिदिन रणभूमि में ही पुत्र-पौत्रों को उपदेशामृत का पान कराते थे। मृत्यु बार-बार आती है, किन्तु ब्रह्मचारी से डरकर उल्टे पैरों भाग जाती है, ब्रह्मचारी आज्ञा देता है, अभी शीतकाल है, सूर्य दक्षिणायन में है, लगभग तीन मास पीछे ग्रीष्मकाल में सूर्य उत्तरायण में आयेगा तभी यह ब्रह्मचारी शरीर को छोड़कर स्वर्गधाम को जायेगा। हुआ भी यही, जब तीन मास पीछे ग्रीष्म-ऋतु आई, तभी उन्होंने स्वेच्छा से शरीर छोड़ा और मोक्षपद पाया। आज भी सारे संसार के लोग श्रद्धा से गुण गाते हैं। उनके सन्तान न थी, फिर भी ब्रह्मचर्य के ही तप के कारण सारे जगत् के पितामह (दादा) कहलाते हैं।

सच्चे ब्रह्मचारी महर्षि दयानन्द का आदर्श जीवन भी हमारे सन्मुख है। वह आजीवन ब्रह्मचारी रहे। भयंकर से भयंकर कष्ट हँसते-हँसते सहे। नीच धूर्तों ने भोजन आदि में उन्हें सोलह बार विष खिलाया। धन्य-धन्य ब्रह्मचारी, तेरा तो विष भी कुछ न बिगाड़ सका। तूने हलाहल को भी निष्प्राण कर दिखाया। जब अन्तिम बार जोधपुर में नीच जगन्नाथ व धोलमिश्र ने काँच वा विष मिलाकर ऋषि को दूध पिलाया तो वह फूट-फूट कर शरीर से निकलने लगा। उस अवस्था को देखकर डाक्टर सूरजमल भी घबरा गये और चिल्ला उठे कि ऐसा भयंकर विष दिया गया है कि किसी

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जीवन-सन्देश

अन्य पुरुष को दिया जाता तो पाँच मिनट में मर जाता। ऋषिवर ! आप तो शरीर की चिन्ता से ऊपर उठ चुके थे, न आपको जीने की इच्छा थी, न मरने का भय। आपने विष देने वाले घातक को बुलाया। उसका पाप उसको समझाया। हे दया के भण्डार ! तूने उसे अपने पास से थैली देकर सपरिवार नेपाल पहुँचाया। धन्य हो ब्रह्मचारी ! तूने मौत भी उधारी नहीं ली। आपने विष देनेवाले का नाम और भेद भी किसी को नहीं बतलाया। इतना ही नहीं, जोधपुर महाराज के नीचे धूर्त डाक्टर अलीमर्दानख़ाँ ने आपको दवाई के रूप में प्रतिदिन जहर पिलाया। प्रतिदिन सौ-सौ दस्त आये। आँत कट-कट कर गिरने लगी, फिर भी आपका मन नहीं घबराया। मृत्यु ने बार-बार आना चाहा तो आपने उसे दुकराकर एक मास तक दूर ही बैठाया। अजमेर की विशाल नगरी में भक्तजनों ने आपको पहुँचाया। दीपामाला आ पहुँची। सबने अपने दीपक जलाये। आपने अपना शरीर रूपी दीपक बुझा दिया, सब भक्तजन रोये और चिल्लाये। आपने अन्तिम समय में योगाभ्यास और प्राणायाम किया। ईश्वर स्तुति की और मन्द-स्वर से वेदमन्त्रों का गान किया, लोग रोये, किन्तु तू हँसा ! 'ईश्वर ! तूने अच्छी लीला की'। तेरी इच्छा पूर्ण हो, तेरी इच्छा पूर्ण हो, तेरी इच्छा पूर्ण हो' यह कहकर नश्वर संसार से प्रयाण किया। तूने इस मरी हुई आर्यजाति को जीवन दिया और इसकी डूबती हुई नया को पार लगाया। तेरे इस मृत्यु के दृश्य ने गुरुदत्त को आस्तिक और ईश्वर का सच्चा भक्त बनाया। ब्रह्मचर्य के तप से ही परमपद की प्राप्ति की और मृत्युंजय कहलाया। प्रिययुवको ! तुम भी वीर्य की रक्षा करो, ऋषि के समान अमरपद पाओगे और मृत्युंजय कहलाओगे।

सावधान !

यह वीर्य शरीर में नौ दस साल की आयु में उत्पन्न होना आरम्भ होता है। सोलह वर्ष की आयु में जब वृद्धि अवस्था आरम्भ होती है तब खूब बढ़ता है। जब मनुष्य २५ वर्ष का होता है, तब युवावस्था आरम्भ होती है। तब तक वीर्य तथा सब धातुएँ बढ़ती हैं। यह समय मनुष्य के जीवन में बड़ा

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ब्रह्मचर्यामृत

भयानक है। कुसंग के कारण काम-देवता भी इसी समय मुँह दिखाता है। जो बालक मन के पीछे चलकर कामवासना वा विषय भोग में फँस जाते हैं व अपना सर्वनाश करके सारी आयु रोते और पछताते हैं। उनका स्वास्थ्य बिगड़ जाता है। दुनिया के सभी रोग उन्हे आ घेरते हैं, उनकी आयु घट जाती है। इस आयु में वीर्य कच्चा होता है। यह इसलिये उत्पन्न नहीं होता कि इससे विषय भोग की इच्छा पूरी की जाये। यह इसलिये उत्पन्न होता है कि इसे फिर से खूब व्यायाम करके शरीर में पचाया जाये और बल और शक्ति का रूप धारण करे, और शरीर का अंग बन जाये। इस वृद्धि की अवस्था में "१६ वर्ष की आयु से पूर्व कन्या और २५ वर्ष से पूर्व की आयु का जो लड़का वीर्यादि धातुओं का नाश करेगा, वह कुल्हाड़े से काटे वृक्ष और डण्डे से फूटे घड़े के समान अपने सर्वस्व का नाश करके पश्चाताप करेगा। पुनः उसके हाथ में सुधार कुछ भी नहीं रहेगा।" उसे स्वर्ग समान युवावस्था के दर्शन भी नहीं होंगे। जवान होने से पहले ही बूढ़ा हो जायेगा। जीवन में वसन्त आने से पूर्व पतझड़ आजायेगा। हाय ! कितने दुःख की बात है कि सारे जीवन में सच्चा ब्रह्मचारी बनने के लिए केवल एक बार, एक बार, निश्चय से एक बार ही अवसर मिलता है, यह भाग्यहीन बालक उसे भी खो देता है।

हमारे युवकों की दशा

एक यात्री दूर देश में व्यापार करने के लिए जाता है। मार्ग में निर्जन और वीहड़ जंगल आता है। पथिक चलते-चलते थक जाता है। विश्राम करने के लिये वृक्ष की छाया में सो जाता है। कुछ समय पीछे भूख और प्यास से व्याकुल होकर उठता है। अपनी गठरी देखता है तो भोजन और वस्त्र नहीं मिलते। लंगूर और बन्दरों ने भोजन उठाकर खा लिया। वस्त्र खाली पड़ा है। जलपात्र की ओर जाता है तो उसे भी खाली पाता है। जल भी बन्दरों ने पी लिया। कुछ भूमि पर गिरा दिया। अब कमर से बँधी रुपयों की थैली को देखता है तो वह भी नहीं मिलती। उसी खोज में इधर-उधर दौड़ भाग करता है, कोलाहल करता है और रुदन मचाता है। जिन चोर डाकूओं ने

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जीवन-सन्देश

उसके रुपये लिये थे; वे उसके शोर से पकड़े जाने के भय से आते हैं और उसका मुँह बन्द करने के लिए खूब डण्डे लगाते हैं और वह भूखा-प्यासा लुटा और मुँह पिटा सा रह जाता है। रात्रि हो जाती है। चारों ओर जंगली पशुओं के घुर्घुराने के भयंकर शब्द सुनाई देते हैं। उसे अपनी रक्षा और जीवन का कोई उपाय और मार्ग नहीं दिखाई देता। चारों ओर भय और आतंक का साम्राज्य है, जाये तो कहाँ जाये ? ठीक उस यात्री जैसी अवस्था आज हमारे देश के युवकों की है। कुसंग में फंसकर नष्ट और भ्रष्ट हो रहे हैं। वीर्य का कुछ भी मूल्य नहीं समझते। आँख खुलती है, तब रोते और पछताते हैं।

एक मनुष्य के हाथ में एक शीशी है जिसमें ५०० रुपये का बहुमूल्य इतर है। उससे पूछते हैं कि आप इसका क्या करोगे ? वह उत्तर देता है कि गन्दी नाली में डालूँगा। इसी प्रकार एक और मनुष्य जिसके पास एक बहुमूल्य रत्न हीरा है उससे भी पूछते हैं कि इसका क्या करोगे ? वह उत्तर देता है कि इसको बारीक पीसकर मिट्टी में मिलाऊँगा। इन दोनों से भी बढ़कर मूर्ख और पागल हमारे देश के वे नवयुवक और बालक हैं जो वीर्य जैसे अमूल्य-रत्न को जिसकी एक बूँद लाखों रुपयों से भी बढ़कर मूल्यवाली है, रात-दिन अपने हाथों से हस्त-मैथुन, पशुमैथुन, गुदा-मैथुन आदि पापों के द्वारा गन्दी नालियों में डालते हैं। यदि इसकी रक्षा करके ठीक समय पर खर्च किया जाये तो हनुमान्, भीष्म, दयानन्द, गांधी, सुभाष जैसे देवताओं को जन्म लेना पड़े।

दुःखभरी घटना

किन्तु कुसंग में फंसकर हमारे बच्चे किस प्रकार नष्ट होते हैं, यह दिखाने के लिए एक सच्ची घटना आपको सुनाता हूँ। नाम लेना अच्छा नहीं। स्कूल के विद्यार्थी ने अपनी करुणाजनक, दुःखभरी सच्ची कहानी सुनाई।

“मैं जिस समय आठ वर्ष का था, कुसंग में फँस गया। कई साथी स्वयं भी कुटेबों (कुचेष्टाओं) में फँसे हुए थे। मुझे भी वह गुप्त पाप

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ब्रह्मचर्यामृत

(बदकारी) गन्दे नीचों ने सिखलादी। मैं कई वर्ष तक हस्तमैथुन अर्थात् अपने हाथों से नाश करता रहा। मैं बहुत ही सुन्दर लड़का था। खाने-पीने में भी चटोरा था। कई विद्यार्थी जो मेरी कक्षा में थे, मेरे से आयु में बड़े और शरीर से तगड़े थे, वे बड़े नीच व गुण्डे थे। वे ऊपर से मेरे से बड़ा प्रेम करते थे। मुझे अनेक बार पैसे देते, बाजार से अच्छी-२ चीजें खरीदकर खिलाते और जब मैं उनकी बात नहीं मानता तो वे मुझे डराते और धमकाते। शनैः-शनैः उन्होंने ऐसे डोरे डाले कि मुझे अपने जाल में फँसा ही लिया। कई वर्ष तक मुझे खूब खराब किया। उन्ही दिनों मेरे स्कूल के एक अध्यापक ने मेरे से प्रेम करना आरम्भ किया, इस प्रेम का कारण मेरी सुन्दरता थी। उस नीच ने भी मेरे साथ कितनी बार मुँह काला किया। जब मैं इन बुराइयों में नहीं फँसा था, अपनी कक्षा में पढ़ने में प्रथम था, शरीर सुन्दर और स्वस्थ था। अब इन बुराइयों का फल मिलने लगा। रात को स्वप्न में सप्ताह में दो बार वीर्यनाश हो जाता। पेशाब में भी गड़बड़ होने लगी। मस्तिष्क निर्बल हो गया। पढ़ने में मन नहीं लगता था, उठते बैठते अन्धेरी आती। कई वर्ष अपना नाश करते रहने के कारण शरीर भी थोथे वृक्ष की तरह निर्बल हो गया। देखने को मुख पर अभी सुन्दरता शेष थी, किन्तु युवा होने से पहले बुढ़ापा आ गया। घरवाले विवाह की चिन्ता में थे, मन बड़ा दुःखी और उदास रहता था, मैं जीवन से निराश था। कई बार मन में आता था कि विष खाकर सदा के लिए सो जाऊँ, रेल के आगे कटकर मर जाऊँ। इस जीने से तो मरना भी अच्छा है। गुण्डे विद्यार्थियों और नीच अध्यापक के चंगुल से निकलने का भी यत्न किया, किन्तु वे बड़े धूर्त थे-उनके जाल से निकलना कोई सहज बात थोड़ी ही थी। बार-बार यत्न करने पर भी उसी प्रकार दल-दल में फँसा रहा। ऐसे विकट समय में डूबते को तिनके का सहारा आर्यसमाज के एक सदाचारी उपदेशक का सत्संग मिला। उस सच्चे देवता ने मुझे बार-बार ब्रह्मचर्य और सदाचार की शिक्षा दी। ब्रह्मचर्य सम्बन्धी अनेक पुस्तकें उन्होंने दी और पढ़ाई। कई वर्ष लगातार घोर परिश्रम करके मुझे उन गुण्डों के चंगुल से निकाला। उनके सत्संग से मेरी सब कुटेब (बुराइयों) छूट गई। प्रतिदिन नियमित व्यायाम

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जीवन-सन्देश

करने और अन्य ब्रह्मचर्य के नियमों का पालन करने से फिर से शक्ति और बल आने लगा। निराशा समाप्त हुई। सच्चा आनन्द क्या होता है, उसका स्वाद चखने को कुछ—२ मिला। क्या ही अच्छा होता यह सत्संग मुझे बाल्यकाल में ही मिलता और मैं नष्ट होने से बच जाता।”

इसी प्रकार देश के प्रायः सभी होनहार बच्चे बुरी आदतों में फँसकर नष्ट हो रहे हैं। प्यारे विद्यार्थियो ! यदि कोई नीच साथी तुम्हें यह गुप्त (गन्दी) शिक्षा दे कि मूत्रेन्द्रिय के हिलाने या मलने से आनन्द आयेगा, ऐसे नीच के मुँह को पीट देना। यदि तुमने किसी के बहकावे से मूत्रेन्द्रिय के साथ कोई खेल किया तो तुम्हारे जीवन का ही खेल बिगड़ जायेगा। परमात्मा ने मूत्रेन्द्रिय और गुदेन्द्रिय को मूत्र-मल (पेशाब, पाखाना) निकालने के द्वार बनाया है। इससे भूलकर भी कोई काम न लें। पेशाब पाखाना निकालना ही इनका काम है। मूत्रेन्द्रिय के द्वारा ही शरीर का राजा वीर्य भी कुचेष्टा(बुराई) करने से निकलता है। इसलिए इसे कभी हाथ न लगाओ, हाथ लगाने से कुट्टेयों में फँसने का डर है। स्नान आदि के समय मैल अवश्य साफ कर लिया करो। मूत्रेन्द्रिय का एक और भी काम है सन्तान पैदा करना। वह २५ वर्ष के पीछे गृहस्थाश्रम का काम है। किन्तु सच्चा विद्यार्थी तो महात्मा शुक्राचार्य के उपदेशानुसार (विद्यार्थी ब्रह्मचारी स्यात्) सच्चा ब्रह्मचारी ही होता है। जैसे दीपक में तेल बत्ती के सहारे उपर चढ़कर प्रकाश के रूप में बदल जाता है, ठीक उसी प्रकार मनुष्य का वीर्य मस्तिष्क में पहुँचकर विचार-अग्नि का ईंधन बनता है, ज्ञानरूपी प्रकाश का संचार करता है। मनुष्य के अविद्यारूपी अन्धकार को मिटाकर मन और आत्मा को देदीप्यमान् (प्रकाशित) करता है। प्यारे युवको ! सारी शक्ति लगाकर शरीर के सार, शक्ति के भण्डार, वीर्य की रक्षा करो। जैसे दूध में से मक्खन (घी) निकाल दिया जाये तो शेष छाछ का कोई मूल्य नहीं, गन्ने और सन्तरे का रस निकाल दिया जाये तो बचे हुए छिलके पैरों नीचे रौंदे जाते हैं, जिस साईकिल में से हवा निकल जाये तो वह सवारी के काम की नहीं, जिस वृक्ष को कीड़े (घुन) ने खाकर खोखला कर रखा है उसकी कड़ी-शहतीर आदि नहीं बन सकते, ऐसे ही जो मनुष्य के तत्त्व (कीमती

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ब्रह्मचर्यामृत

जौहर) वीर्य को नष्ट कर देता है ऐसा वीर्य-हीन (थौथा) मनुष्य अपने सौभाग्य को नष्ट करके दुःखसागर में डूब मरता है।

ब्रह्मचारी का शरीर वज्र के समान होता है। उसकी नस नाड़ियाँ फौलाद (इस्पात) से भी कठोर होती हैं। शरीर दृढ़, सुन्दर और सुडौल होता है। सारे शरीर और मुख-मण्डल पर ऐसी लाली, सुन्दरता (चमक) और तेज आता है कि जिसके दर्शन करके मनुष्य का पेट नहीं भरता। पाठकगण! इस ब्रह्मचर्य के आनन्द को खूब लूटिये और इस पवित्र सन्देश को देश के सब विद्यार्थियों और युवकों तक पहुँचाइये।

ब्रह्मचर्य का शत्रु बाल-विवाह

बाल-विवाह भी तुम्हारे मार्ग में एक भयंकर बाधा है। इस अन्याय के विरुद्ध वीरता से युद्ध करो। इसके कुचक्र में न फँसो। संसार में कोई मूर्ख किसान ऐसा नहीं जो चना-गेहूँ का कच्चा बीज अगले साल की फसल के बोने के लिए रखता हो, किन्तु भारतवर्ष ही एक ऐसा भाग्यहीन देश है जिसमें १६ वर्ष से पूर्व कन्या और २५ वर्ष से पूर्व बच्चों को बाल-विवाह की फाँसी देकर जब कि इनका शरीर और वीर्यादि धातुएँ भी कच्ची होती हैं, इनसे सन्तान पैदा कराई जाती है। फिर सन्तान कौनसी भीम-अर्जन पैदा होती है ? कीड़े-मकौड़े पैदा हो जाते हैं जो संसार में भार बनकर पाप ही बढ़ाते हैं। बाल-विवाह से प्रथम तो सन्तान होती नहीं, होती है तो मरी हुई। यदि जीवित भी हुई तो शीघ्र मर जाती है, जब तक जीती है सदा रोगी रहती है। बाल-विवाह से बढ़कर कोई पाप और अत्याचार संसार में नहीं है किसी को शीघ्र ही विवाह करना हो तो कम से कम लड़के की आयु २५ वर्ष और लड़की की आयु १६ वर्ष से कम न हो। यह अधम और निकृष्ट विवाह हैं। इससे पूर्व विवाह करना अपनी संतान को विषय-भोग की भट्टी में झोंकना है। १७ वर्ष से १६ वर्ष तक की स्त्री और ३० वर्ष से ४० वर्ष तक का-पुरुष विवाह करे मो मध्यम विवाह जानो और २० वर्ष से लेकर २४ वर्ष तक की स्त्री और ४० से ४८ वर्ष तक का पुरुष का विवाह करे तो सर्वोत्तम

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जीवन-सन्देश

है। जो कोई ब्रह्मचारी ऋतुगामी अर्थात् सन्तान पैदा करने के लिए वीर्यदान देने वाला, परस्त्री-त्यागी और एक स्त्रीवाला न हो तो वह भी बना बनाया धूल में मिल जावेगा। यदि आपके मूर्ख माता-पिता ने आपका बाल-विवाह कर दिया तो अपने आप को अविवाहित समझो। जब तक तुम २५ वर्ष के न हो जाओ गृहस्थ को विष समझो। नहीं तो तुम्हारा सर्वनाश हो जायेगा। तुम विद्या न पढ़ सकोगे, तुम्हारा शरीर भी बिगड़ जायेगा, पीछे पछताओगे और रोओगे। कोई आँसू भी पोछनेवाला नहीं मिलेगा। घर जाना भी पड़े तो बचकर रहो। बात तो तब है कि वे सैंकड़ों नवयुवक जिनके बाल-विवाह हो गये हों घरवालों के विरुद्ध सत्याग्रह करें, विवाह के बन्धन को तोड़ डालें और विवाह को विवाह न मानकर गृहस्थी न रहें। तब कहीं यह बाल-विवाह का पाप मिट सकेगा, नहीं तो रात-दिन इस देश के होनहार बालक इसी प्रकार मिट्टी में मिलते रहेंगे।

सगाई भी आधा विवाह है इसे भी २५ वर्ष की आयु से पूर्व स्वीकार नहीं करना चाहिए। सगाई के बहाने बालक को एक रुपया देकर ये धूर्त लोग अपने जाल में फँसा लेते हैं। सगाई करने वाले बड़ी मीठी-मीठी बातें करते हैं, इनके जाल में न फँसो।

विशेष जानकारी के लिए मेरी बनाई पुस्तक “बाल-विवाह से हानियाँ” पढ़ो।

निराश न हों।

बहुत से नवयुवक जिनका विवाह भी नही हुआ होता, किन्तु अज्ञानवश बाल्यकाल में कुसंगति में फँस अपना जीवन भ्रष्ट कर लेते हैं, उन्हें सत्संग से जब होश आता है बड़े हताश और दुःखी देखे जाते हैं। उन्हे घबराना नहीं चाहिए। जब आँख खुले, तभी प्रभात समझो। पिछली बातों को याद करके रोने-धोने में समय न खोओ। व्यर्थ चिन्ता करके अपनी चिता तैयार न करो। बीती को बिसार दो, रही को सँभालो। जब वाल्मीकि-सा डाकू महिर्ष बन सकता है, नास्तिक, शराबी तथा चरित्रहीन मुन्शीराम सच्चा साधु स्वामी श्रद्धानन्द सन्यासी अमर शहीद का पद पाता है, प्राचीन गुरुकुल शिक्षाप्रणाली का उद्धार कर हलचल मचाता है, थोड़ी-सी हड़्डियों

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ब्रह्मचर्यामृत

का पिंजर एम० के० गांधी महात्मा पद को पाता है, तो आप क्या नहीं बन सकते ? सब कुछ बन सकते हैं। इनके जीवन पहले क्या कम गिरे थे ? इतना गिरा हुआ तो कोई ही नवयुवक होता है। इन्हे संसार का सिरमौर किसने बना दिया? सदाचार ने। अन्धकार कितना ही पुराना हो, प्रकाश होते ही भाग जाता है। जो कुचेष्टाओं को छोड़ेगा, ब्रह्मचर्य के नियमों और साधनों का दृढ़तापूर्वक पालन करेगा, उसके सब संकट और दुःख दूर हो जायेंगे और सफल होगा।

ब्रह्मचर्य के साधन

१. प्रातःजागरण

सदैव प्रातः काल चार बजे उठो। उठते ही ईश्वर का चिन्तन करो। फिर अन्य कार्य करो। प्रातः काल उठने से बुद्धि तीव्र होती है। मनुष्य रोगरहित और स्वस्थ रहता है। जो आलसी मनुष्य अमृतवेला में सोता है, स्वप्नदोष आदि रोग उसे ही सताते हैं, क्योंकि गन्दे स्वप्न प्रायः चार बजे के पीछे ही आते हैं। इसलिये चार बजे के पीछे ब्रह्मचर्य-प्रेमियों को नहीं सोना चाहिए।

२. उषःपान तथा चक्षुरस्नान

शुद्ध जल को लेकर मुख में पूरा भरलो—और साथ ही दूसरे जल से आँखों में खूब छींटे दो, फिर कुल्ली करके आठ—दस घूँट जल पी लो। इस जलपान से वीर्य सम्बन्धी रोग नष्ट होता है। बवासीर नहीं होती। अर्जीण (कब्ज) दूर होता है और शौच खुलकर आता है। कामविकार और शरीर की ऊष्णता दूर होती है।

३. शौच

जल पीकर लघुशंका जा कुछ समय के पीछे खुले जंगल में जाकर मलत्याग (शौच) करें। शौच के लिए जितना ग्राम से दूर जायें उतना ही अच्छा है। जिधर से वायु आता हो उधर मुख करके बैठें। मुख तथा दाँतों

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जीवन-सन्देश

को बन्द रखें। बारें पैर पर दबाव रखें। शौच के समय जोर न लगायें और न ही किणछें, बल लगाने से वीर्यनाश हो जाता है। जो मल (टट्टी) स्वयं आजाये, ठीक है। यदि शौच खुलकर नहीं आता और कब्ज रहता है, तो शौच जाने से पूर्व पेट के आसनादि हल्के व्यायाम करें। पेट को खूब हिलायें। पीछे शौच जायें तो मलबद्ध नहीं होगा। सायंकाल ताँबे के पात्र में जल रख दें। उसका प्राःकाल पान करने से शौच ठीक होता है।

शौच दोनों समय प्रातः और सायं अवश्य जायें। मल तथा मूत्र के वेग को कभी नहीं रोकें। इनके रोकन से अनेक रोग हो जाते हैं। मल मूत्र की उष्णता से वीर्यनाश भी हो जाता है। शौच जाते समय जलपात्र अवश्य ही साथ ले जायें। दोनो समय मूत्र-इन्द्रिय तथा गुदा-इन्द्रिय को शुद्ध ठण्डे जल से कई बार मिट्टी लगाकर धोयें। जो सफेद मैल मूत्रेन्द्रिय के अगले भाग पर खाल के नीचे जम जाता है उसे जल से साफ कर दें और इन्द्रिय के छिद्र पर, जिससे मूत्र निकलता है ठण्डे पानी की बारीक धार एक-दो मिनट डालें। ऐसा करते समय ईश्वर का चिन्तन करें। विचार शुद्ध रखें। ठण्डे पानी की धार से शरीर में ठण्डक होकर मन की चंचलता दूर होती है और निरन्तर सेवन से स्वप्नदोष भी नहीं होता। जब-जब मूत्र त्याग करें, तब-तब ठण्डे जल से इन्द्रिय को धो डालें। शौच के पीछे हाथ तथा जलपात्र को कई बार मिट्टी लगा-लगाकर धोयें।

प्रातः जागरण, उषःपान, चक्षुःस्नान, शौचादि के विषय में मेरी पुस्तक "ब्रह्मचर्य के साधन" १-२ भाग पढ़ें।

४. दन्त-धावन

कीकर, नीम, मौलसरी किसी एक वृक्ष की दातुन प्रतिदिन किया करें। इससे दाँत-रोग दूर होंगे, पाचन-शक्ति और आँखों की ज्योति बढ़ेगी। दाँतों के सम्बन्ध में पूरे विवरण के लिए मेरी "दन्त-रक्षा" पुस्तक पढ़ें।

५. स्नान

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ब्रह्मचर्यामृत

प्रतिदिन कूँए के ठण्डे और ताजा जल से रगड़-रगड़कर धर्षन स्नान करें। पहले सिर पर और फिर शरीर के सब अंगों पर पानी डालें, गर्म जल से कभी भूलकर भी नहीं नहाना। नाभि के नीचे खूब ठण्डे जल की धार डालें। इससे स्वप्नदोष दूर होकर वीर्यरक्षा में लाभ होगा। खदर के अँगोछे से पोछकर शरीर को सुखा लें, फिर शुद्ध खदर के सादे वस्त्र धारण करें। ब्रह्मचारी सदैव दोनों समय स्नान करें तो और भी अच्छा है, नहीं तो गरमी के काल में तो अवश्य की दोनों समय नहायें।

६. सन्ध्या तथा प्राणायाम

एकान्त शुद्ध स्थान में ईश्वर का भजन तथा सन्ध्या करें। सन्ध्या से पूर्व तथा जब भी प्राणायाम मन्त्र आये, तो कम से कम तीन-तीन प्राणायाम करें। सदा लम्बे तथा गहरे श्वास लेने का स्वभाव डाले। इससे आयु बढ़ती है। प्राणायाम करने के समय सिद्धासन से बैठें। मूलाधार और नाभि को ऊपर खींचें, इससे स्वप्नदोष आदि विकार दूर होते हैं, वीर्यरक्षा में बड़ी सहायता मिलती है। प्राणायाम ब्रह्मचर्य का सबसे उत्तम साधन है। अथवा यूँ समझिए कि प्राणायाम ब्रह्मचारी का प्राण है। प्राणायाम और सन्ध्या से सब पाप दूर होते हैं तथा मन और इन्द्रियाँ वश में आती हैं। प्राणायाम की पूर्णविधि 'सत्यार्थप्रकाश' के तीसरे समुल्लास और मेरी प्राणायाम पुस्तक में पढ़ें और स्नान, सन्ध्या-यज्ञ आदि के सम्बन्ध में मेरी 'ब्रह्मचारी के साधन' (पाँचवाँ भाग) पुस्तक पढ़ें।

७. व्यायाम

सन्ध्या के पीछे खुली हवा में व्यायाम करें। आसन तथा दौड़ का व्यायाम विद्यार्थियों के लिए विशेष लाभकारी है। पहले सौ गज की दौड़ आरम्भ करें और शनैः-शनैः एक मील की, फिर इससे भी अधिक का अभ्यास करें। ध्यान रहे कि श्वास सदैव नाक से ही लें। शीर्षासन ब्रह्मचर्य का प्राण है और वीर्यरक्षा का उत्कृष्ट साधन है, किन्तु यह ध्यान रहे कि सिर के नीचे कपड़े की मोटी गद्दी रखें और दौड़ आदि सभी व्यायामों से

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जीवन-सन्देश

पूर्व इसे करें। पीछे करने से बहुत हानि होती है। इसे एक मिनट से आरम्भ करके शैनः-शैनः दस- पन्द्रह मिनट तक करने का अभ्यास बढ़ावें। जिन्हें स्वप्नदोष होता हो उन्हें सांयकाल भी शीर्षासन और प्राणायाम का दीर्घकाल तक अभ्यास करना चाहिए। इससे वीर्य ऊर्ध्वगति हो जाती है। वीर्यसम्बन्धी सब रोग नष्ट हो जाते हैं। इसी प्रकार मयूरासन, हलासन, चक्रासन तथा मयूराचालादि प्रातः काल करने चाहिए। सांय काल शीर्षासन, मोगरी, मुग्दर, बैठक और मल्लयुद्ध (कुशती थोड़ी -सी) का व्यायाम अच्छा रहता है। यदि घी, दूध बादाम आदि पुष्टिकारक पदार्थ अधिक मिलें तो अधिक; और कम मिलें तो कम व्यायाम करें। व्यायाम शक्ति और भोजन के अनुसार ही करें। जैसे जल, वायु और अन्न, जीवन का आधार है, ऐसे ही व्यायाम स्वास्थ्य का मूल कारण है। संसार का कोई भी मनुष्य बिना व्यायाम के पूर्ण स्वस्थ नहीं रह सकता। व्यायाम करने में खूब आनन्द लें। व्यायाम करने से शरीर के सब अंग दृढ़ होते हैं। शरीर सुन्दर और सुडौल बनता है। वीर्य शरीर में पचकर रक्त में मिल जाता है और शक्ति का रूप धारण करता है।

व्यायाम से रंग-रोगन निखरता है। मुख पर तेज और लाली आती है। मनुष्य सदा जवान रहता है। घर के कार्य को कभी व्यायाम न समझें। कार्य-कार्य ही है और व्यायाम-व्यायाम ही। व्यायाम के लिए प्रातः काल का समय सबसे अच्छा है। यदि ब्रह्मचारी दोनों समय नियमित व्यायाम करे तो सोने पर सुहागा है। व्यायाम इतना करें कि पसीना आजाये। पैरों के व्यायाम की अपेक्षा हाथों का व्यायाम अधिक करें, जिससे भुजायें, छाती और मस्तिष्क अधिक बलशाली हों। उष्णकाल में स्नान से पूर्व और शीतकाल में स्नान-सन्ध्या के पीछे व्यायाम कर सकते हैं। शरीर ठण्डा होने पर अर्थात् आधा घण्टा पीछे स्नान करें। खाना खाकर कभी व्यायाम न करें। ग्रीष्मकाल में व्यायाम के पीछे प्यास लगती है, जल कभी न पियें, बहुत हानि करता है, गोदुग्ध का पान सर्वश्रेष्ठ है। यदि दूध न मिले तो बादाम आदि रगड़कर पीयें। व्यायाम के पीछे भूख लगा करती है, थोड़ा पुष्टिकारक भोजन अवश्य करलें, भूखा रहना अच्छा नहीं।

पूरे विवरण के लिए मेरे द्वारा लिखित "व्यायाम का महत्त्व और

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१९ | जीवन सन्देश

प्रकार का सन्देह नहीं।

मनुष्य अपने जीवन को सुन्दर, सुखी और शान्त बनाने के लिये अनेक प्रकार के यत्न करता है, परन्तु जब तक वह ब्रह्मचर्य का पालन नहीं करता, तब तक उसे सच्ची शान्ति और सुख प्राप्त नहीं हो सकता। ब्रह्मचर्य ही जीवन का मूल आधार है। जो मनुष्य वीर्य की रक्षा करता है, उसका शरीर पुष्ट, मन प्रसन्न और बुद्धि तीव्र होती है। इसके विपरीत जो मनुष्य वीर्य का नाश करता है, वह दुर्बल, रोगी, अल्पायु और निस्तेज हो जाता है।

अतः प्रत्येक युवक और युवती का यह परम कर्तव्य है कि वह ब्रह्मचर्य के महत्व को समझे और अपने जीवन में उसका दृढ़तापूर्वक पालन करे। विषय-वासनाओं के जाल में फँसकर अपने अमूल्य जीवन को नष्ट न करे। सदा उत्तम विचारों का चिन्तन करे, सत्पुरुषों की संगति करे और ईश्वर की उपासना में मन लगावे। इसी से उसका लोक और परलोक दोनों सुधर सकते हैं।

ब्रह्मचर्य के नियमों का पालन करने से मनुष्य दीर्घायु, बलवान् और यशस्वी बनता है। हमारे प्राचीन ऋषियों-महर्षियों ने ब्रह्मचर्य के बल पर ही महान् कार्य किये और संसार का मार्गदर्शन किया।

जीवन-सन्देश

हो। स्वाद के लिए जिह्वा के दास न बनें। लाल, काली सफेद, हरी किसी भी प्रकार की मिर्च न खायें। ये सभी ब्रह्मचर्य के लिए विष हैं, सोडावाटर, बर्फ, चाय, कहवा, कॉफी ये सभी वीर्यनाशक हैं, इन्हें कभी न छुयें। माँस, मछली, अण्डे मनुष्य का भोजन नहीं, इन्हे खाकर सात जन्म में भी ब्रह्मचारी नहीं रह सकता। यदि खाते हैं तो अभी छोड़ दें।

नशों से बचें

हुक्का, बीड़ी, सिगरेट, शराब, गॉंजा, अफीम, चण्डू, भंग आदि खाने-पीने की वस्तु नहीं। इनके खाने-पीनेवाला जीवन से प्रेम छोड़ दे, कफन मंगवाकर घर में रखे। कहो वीर्यरक्षा और कहां ये नशे ओर व्यसन, इनका क्या मेल ? सिगरेट शराब आदि पीने वाला इन्हें बिना छोड़े ही वीर्यरक्षा करना चाहता है। यदि अपना कल्याण चाहते हैं तो आज ही कान पकड़ लें और व्रत लें कि “कभी सिगरेट, शराब आदि विष का पान नहीं करेंगे, चाहे मर भी जायें इन्हे छुयेंगे नहीं।” इनके पीने खानेवाला सर्वथा नष्ट होकर मिट्टी में मिल जाता है। विशेष विवरण के लिये ‘भोजन’ पुस्तक पढ़ें।

६. शयन

सदा अकेले सोयें। कभी किसी अवस्था में भी किसी के साथ यहाँ तक कि सगे भाई के साथ भी न सोयें। सोने से पूर्व लघुशंका (पेशाब) अवश्य करें। हाथ, पैर, मुख शीतल जल से धोयें। मूत्रेन्द्रिय का स्नान भी हितकर है। अँगोछे से हाथ पैर पोंछलें। कुर्ता धोती आदि सब वस्त्र उतार दें। केवल शुद्ध और बारीक खदर का लंगोट बाँधे रहें। मर्द का लंगोट और घोड़े का तंग २४ घण्टे बँधा ही रहना चाहिए। सदा भूमि पर सोये। एक दरी का बिछौना रखें। यदि जाड़े में न रह सकें तो एक कम्बल और डाललें, रूई के गढ़े वा कोमल बिस्तर पर कभी न सार्यें। सीधे, पेट के बल कभी न सोयें, ब्रह्मचारी को दार्या करवट सोना चाहिए। सोते समय पैर के ऊपर पैर न रखें, आगे पीछे रखें। सिर पूर्व वा दक्षिण की ओर ही रखें।

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२१ | जीवन सन्देश

सकता। जो मनुष्य अपने मन को वश में कर लेता है, वह संसार के समस्त सुखों का उपभोग करने में समर्थ होता है।

मन की चंचलता को रोकने के लिये प्राणायाम, ईश्वर-प्रार्थना और स्वाध्याय परम आवश्यक साधन हैं। जब मन पवित्र और एकाग्र हो जाता है, तब विषय-वासनाएँ स्वतः ही शान्त हो जाती हैं।

युवकों को चाहिये कि वे गन्दे उपन्यासों, अश्लील चित्रों और सिनेमा के कुप्रभाव से दूर रहें। कुसंगति से सदा बचें, क्योंकि जैसी संगति होगी, वैसा ही रंग चढ़ेगा। शुद्ध, सात्विक और पौष्टिक भोजन करें। अधिक मिर्च-मसाले और उत्तेजक पदार्थों का त्याग करें। रात्रि को शीघ्र सोयें और प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर भ्रमण व व्यायाम करें।

इस प्रकार के नियमबद्ध जीवन से स्वास्थ्य उत्तम रहता है और ब्रह्मचर्य की रक्षा सहज ही हो जाती है।