संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
[ ३० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत् ।
विभेत्यल्पश्रुताद्वेदो मामयं प्रहरिष्यति ॥१७१
अभ्यसन्निममध्यायं साक्षात्प्रोक्तं स्वयंभुवा ।
नापदं प्राप्य मुह्येत यथेष्टां प्राप्नुयाद्गतिम् ॥१७२
यस्मात्पुरा ह्यभूच्चैतत्पुराणं तेन तत्स्मृतम् ।
निरुक्तमस्य यो वेद सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥१७३
अतश्च संक्षेपमिमं शृणुध्वं नारायणः सर्वमिदं पुराणम् ।
संसर्गकालेऽपि करोति सर्गं संहारकाले च न
वास्ति भूयः ॥१७४
इस कारण से समास का उद्देश्य करके आपको विस्तार से कहूँगा । जो अपनी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर लेने वाला पुरुष इस आद्य पाद का भली-भाँति से अध्ययन किया करता है ।१६६। उसने इस सम्पूर्ण पुराण का ही मानों अध्ययन कर लिया है—इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है । द्विज-गणों ! अङ्गों और उपनिषदों के सहित जिसने चारों वेदों का ज्ञान प्राप्त कर लिया है ।१७०। इतिहास पुराणों से वेद को समुपबृंहित करना चाहिए । जो बहुत ही कम पढ़ा लिखा पुरुष है उससे वेद भी भय खाता है कि यह मेरे ऊपर प्रहार करेगा ।१७१। साक्षात् स्वयम्भू ने स्वयं कहा है कि इस अध्याय के अभ्यास करने वाला पुरुष आपदा को प्राप्त करके भी कभी मोह को प्राप्त नहीं हुआ करता है और अपनी अभीष्ट गति को प्राप्त कर लिया करता है ।१७२। कारण यह है कि यह पुराण प्राचीन काल में हुआ था और उनने यह कहा था कि जो इसके निरुक्त जानता है वह सब प्रकार के पापों से प्रमुक्त हो जाया करता है ।१७३। इसलिए इसके संक्षेप का श्रवण करो । यह सम्पूर्ण पुराण साक्षात् भगवान् नारायण का ही स्वरूप है । संसर्ग काल में भी सर्ग करता है और संहार के काल में फिर नहीं होता है ।१७४।
नैमिषाख्यान वर्णनम्
प्रत्यवोचन्पुनः सूतमृषयस्ते तपोधनाः ।
कुत्र सत्रं समभवत्तेषामद्भुतकर्मणाम् ॥१
नैमिषाख्यान वर्णनम् ] [ ३१
कियन्तं चैव तत्कालं कथं च समवर्त्तत ।
आचचक्षे पुराणं च कथं तत्सप्रभंजनः ॥२
आचख्यो विस्तरेणैव परं कौतूहलं हि नः ।
इति संचोदितः सूतः प्रत्युवाच शुभं वचः ॥३
शृणुध्वं यत्र ते धीरा मेनिरे सत्रमुत्तमम् ।
यावन्तं चाभवत्कालं यथा च समवर्तत ॥४
सिसृक्षमाणो विश्वं हि यजते विसृजत्पुरा ।
सत्रं हि तेऽतिपुण्यं च सहस्रपरिवत्सरान् ॥५
तपोगृहपतेर्यत्र ब्रह्मा चैवाभवत्स्वयम् ।
इडाया यत्र पत्नीत्वं शामित्रं यत्र बुद्धिमान् ॥६
मृत्युश्चके महातेजास्तस्मिन्सत्रे महात्मनाम् ।
विबुधाश्चोषिरे तत्र सहस्रपरिवत्सरान् ॥७
तपश्चर्या के धन वाले उन ऋषियों ने श्रीसूतजी से फिर कहा था कि उन अद्भुत कर्मों के करने वालों का वह यज्ञ कहाँ पर हुआ था ।१। वह समय जिसमें यज्ञ का यजन हुआ था कितना था और वह किस प्रकार से सम्पन्न हुआ था ? । वायुदेव ने पुराण की किस रीति से कहा था ? ।२। उन्होंने बहुत विस्तार के साथ इस पुराण का कथन किया था—इसमें हम सबके हृदय में बड़ा भारी कौतूहल हो रहा है । इस प्रकार से जब प्रेरित किया गया था तो श्री सूतजी ने परम शुभ वचन से उत्तर दिया था ।३। हे मुनियो ! आप लोग श्रवण कीजिए । जहाँ पर उन धीरों ने उस उत्तम सत्र को किया था । और जितने समय पर्यन्त वह वहाँ पर हुआ था और जिस रीति से हुआ था ।४। इस विशाल विश्व का सृजन करने की इच्छा वाला यजन करता है तब पहिले विसृजन करता है । यह सत्र अत्यधिक पुण्य मय है जो कि एक सहस्र परिवत्स्रों तक हुआ था ।५। जहाँ पर गृहपति का ब्रह्मा तप स्वयं ही हुआ था और जिसमें पत्नीत्व इडा का था और जहाँ बुद्धिमान् शामित्र था ।६। उन महान् आत्माओं वालों के यज्ञ में महातेज वाले मृत्यु ने सब किया था । सहस्र परिवत्स्रों तक वहाँ पर देवगणों ने निवास किया था ।७।
भ्रमतो धर्मचक्रस्य यत्र नेमिरशीर्यत ।
३२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
कर्मणा तेन विख्यातं नैमिषं मुनिपूजितम् ॥८ यत्र सा गोमती पुण्या सिद्धचारणसेविता । रोहिणी ससुता तत्र गोमती साभवत् क्षणात् ॥६ शक्तिर्ज्येष्ठा समभवद्वसिष्ठस्य महात्मनः । अरुन्धत्याः सुतायात्रादानमुत्तमतेजसः ॥१० कल्माषपादो नृपतिर्यत्र शक्रश्च शक्तिना । यत्र वैरं समभवद्विश्वामित्रवसिष्ठयोः ॥११ अदृश्यंत्यां समभवन्मुनिर्यत्र पराशरः । पराभवो वसिष्ठस्य यस्य ज्ञाने ह्यवर्त्तयत् ॥१२ तत्र ते मेनिरे शैलं नैमिषे ब्रह्मवादिनः । नैमिषं जज्ञिरे यस्मान्नैमिषीयास्ततः स्मृताः ॥१३ तत्सत्रमभवत्तेषां समा द्वादश धीमताम् । पुरूरवसि विक्रांते प्रशासति वसुन्धराम् ॥१४
भ्रमण करते हुए धर्म चक्र की नेमि जहां पर शीर्ण हो गयी थी । उस कर्म से मुनियों के द्वारा समर्चित नैमिष विख्यात हुआ था ।८। जहाँ परम पुण्यमयी गोमती नदी है जो कि सिद्धों और चारणों के द्वारा सदा सेवित रहा करती है । वहाँ पर ससुता रोहिणी एक ही क्षणमात्र में वह गोमती हो गयी थी ।६। महात्मा वसिष्ठ की शक्ति ज्येष्ठा हुई थी जो उत्तम तेज वाली अरुन्धती की सुता का यात्रा दान था ।१०। कल्माषपाद नृप और शक्ति के सहित इन्द्रदेव थे जहां पर विश्वामित्र और वसिष्ठ मुनि का वैर हुआ था ।११। जिस स्थल पर अदृश्यन्ती में पराशर मुनि ने जन्म ग्रहण किया था । जिसके ज्ञान में वसिष्ठ मुनि का पराभव हुआ था ।१२। वहां पर उन ब्रह्म वादियों ने उस शैल को नैमिष माना था । क्योंकि वहां पर नैमिष यजन किया था अतएव तभी से वे सब नैमिष कहे गये थे ।१३। वह सत्र उन बुद्धिमानों का द्वादश वर्षों तक हुआ था जबकि विक्रमी पुरूरवा नृप इस वसुन्धरा पर शासन कर रहा था ।१४।
अष्टादश समुद्रस्य द्वीपानश्नन् पुरूरवाः । तुतोष नैव रत्नानां लोभादिति हि नः श्रुतम् ॥१५
नैमिषाख्यान वर्णनम् ] [ ३३
उर्वशी चकमे तं च देवदूतप्रचोदिता । आजहार च तत्सत्रमुर्वश्या सह संगतः ॥१६ तस्मिन्नरपतौ सत्रे नैमिषीयाः प्रचक्रिरे । यं गर्भं सुषुवे गङ्गा पावकाद्दीप्ततेजसम् ॥१७ तत्तुल्यं पर्वते न्यस्तं हिरण्यं समपद्यत । हिरण्मयं ततश्चक्रे यज्ञवाटं महात्मनाम् ॥१८ विश्वकर्मा स्वयं देवो भावनो लोकभावनः । स प्रविश्य ततः सत्रं तेषाममिततेजसाम् ॥१९ ऐडः पुरूरवा भेजे तं देशं मृगयां चरन् । तं दृष्ट्वा महदाश्चर्यं यज्ञवाटं हिरण्मयम् ॥२० लोभेन हतविज्ञानस्तदादातुमुपाक्रमत् । नैमिषेयास्ततस्तस्य चुक्रुधुर्नृपतिं भृशम् ॥२१
अट्ठारह समुद्र के द्वीपों का अशन करते हुए भी पुरूरवा लोभ से रत्नों से सन्तुष्ट न हुआ था—ऐसा हमने सुना है ।१५। देवदूतों के द्वारा प्रेरित हुई उर्वशी ने उसको अपना पति बनाने की कामना की थी । उर्वशी के साथ संगत होकर उसने उस सत्र का आहरण किया था ।१६। उस नर पति के होने पर नैमिषीयों ने सत्र किया था । गंगा ने पावक से दीप्त तेज वाले जिस गर्भ का प्रसव किया था ।१७। उसके तुल्य पर्वत में न्यस्त किया हुआ हिरण्य (सुवर्ण) हो गया था । इसके अनन्तर उन महात्माओं को हिरण्मय कर दिया था ।१८। लोकों को प्रसन्न करने वाले परम भावुक विश्वकर्मा स्वयं देव था । उन अपरिमित तेज वालों के सत्र में फिर उस विश्वकर्मा ने प्रवेश किया था । ऐड पुरूरवा ने शिकार करते हुए उस देश का सेवन किया था । उसने जब देखा था कि वह यज्ञ का स्थल एकदम सुवर्णमय है तो उसको महान् आश्चर्य हुआ था ।१९-२०। लोभ के कारण उस राजा का सब ज्ञान नष्ट हो गया था और उसने उसको स्वयं ग्रहण करने का उपक्रम किया था । तब तो जो नैमिषीय मुनिगण वहाँ पर थे वे उस राजा पर बहुत क्रुद्ध हुए थे ।२१।
निजघ्नुश्चापि तं क्रुद्धाः कुशवज्रैर्मनीषिणः । तपोनिष्ठाश्च राजानं मुनयो देवचोदिताः ॥२२
३४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
कुशवज्रैर्बिनिष्पिष्टः स राजा व्यजहात्तनुम्। और्वशेयैस्ततस्तस्य युद्धं चक्रे नृपो भुवि ॥२३ नहुषस्य महात्मानं पितरं यं प्रचक्षते। स तेष्ववभृथेष्वेव धर्म्मशीलो महीपतिः ॥२४ आयुरार्यभवायाग्र्यमस्मिन् सत्रे नरोत्तमः। शान्तयित्वा तु राजानं तदा ब्रह्मविदस्तथा ॥२५ सत्रमारेभिरे कत्तुं पृथ्वीवत्सात्ममूर्तयः। बभूव सत्रे तेषां तु ब्रह्मचर्यं महात्मनाम् ॥२६ विश्वं सिसृक्षमाणानां पुरा विश्वसृजामिव। वैखानसैः प्रियसखैर्वालखिल्यैर्मरीचिभिः ॥२७ अजैश्च मुनिभिर्जातं सूर्यवैश्वानरप्रभः। पितृदेवाप्सरः सिद्धैर्गंधर्वोरगचारणैः ॥२८
उन मनीषियों ने बहुत क्रोधित होते हुए कुश के वज्रों से उसका हनन किया था क्योंकि वे मुनिगण तपश्चर्या में निष्ठा रखने वाले और दैव के द्वारा प्रेरित थे ।२२। कुशाओं के वज्रों से पिसकर उस राजा ने अपना शरीर त्याग दिया था। उसके अनन्तर भूमि में उसके उर्वशी के पुत्रों के साथ नृप ने युद्ध किया था ।२३। नहुष के जिसको महात्मा पिता कहते हैं। उन अवभृथों में ही वह महीपति बहुत ही धर्मशील था ।२४। इस सत्र में वह नरश्रेष्ठ आयुराय और जन्म से बहुत श्रेष्ठ था। उस समय में ब्रह्म वेत्ताओं ने राजा को शान्त किया था ।२५। आत्म मूर्ति वाले उन्होंने पृथ्वी के समान सत्र करने का आरम्भ कर दिया था उनके सत्र में उन महात्माओं का ब्रह्मचर्य हुआ था ।२६। विश्व के सृजन करने की इच्छा वाले का प्राचीनकाल में विश्व के स्रष्टाओं की भांति वैखानस-प्रियसखा-बालखिल्य-मरीचियों-अज और मुनिगण-पितृगण-देव-अप्सरा-सिद्ध-गन्धर्व-उरग और चारण के साथ वह सूर्य तथा वैश्वानर के समान प्रभा वाला हुआ था ।२७-२८।
भारतैः शुशुभे राजा देवैरिन्द्रसमो यथा। स्तोत्रशस्त्रैर्गृहैर्देवान्पितॄन्पिश्यद्य कर्मभिः ॥२९ आनर्चुःस्म यथाजाति गंधर्वादीन् यथाविधि।
नैमिषाख्यान वर्णनम् ] [ ३५
आराधने स सस्मार ततः कर्मान्तरेषु च ॥३० जगुः सामानि गन्धर्वा ननृतुश्चाप्सरोगणाः । व्याजहुर्मुंनयो वाचं चित्राक्षरपदां शुभाम् ॥३१ मन्त्रादि तत्र विद्वांसो जजपुश्च परस्परम् । वितंडावचनैश्चैव निजघ्नुः प्रतिवादिनः ॥३२ ऋषयश्चैव विद्वांसः शब्दार्थन्यायकोविदाः । न तत्र हारितं किंचिद्विविशुर्न ह्मराक्षसाः ॥३३ नैव यज्ञहरा दैत्या नैव वाजमुखास्त्रिणः । प्रायश्चित्तं दरिद्रं च न तत्र समजायत । ३४ शक्तिप्रज्ञाक्रियायोगैर्विधिराशीष्वनुष्ठितः । एवं च ववृधे सत्रं द्वादशाब्दं मनीषिणाम् ॥३५
भारतीयों के द्वारा राजा देवगणों से इन्द्र के समान शोभायुक्त हुआ था। शस्त्रों-स्तोत्रों और गृहों से देवगणों का तथा पित्र्य कर्मों से पितृगणों का और गन्धर्व आदि का जाति के अनुसार विधिपूर्वक किया करते थे। उसने आराधना में और फिर अन्य कर्मों में स्मरण किया था ।२९-३०। गन्धर्वगण सामवेद के मन्त्रों का गान कर रहे थे परम शुभ और विचित्र अक्षरों और पदों से युक्त वाणी का उच्चारण कर रहे थे जो परम शुभ थी ।३१। वहाँ पर विद्वान् लोग परस्पर में मन्त्रों का जप करते थे। प्रतिवादी गण वितण्डावाद के वचनों के द्वारा निहनन कर रहे थे ।३२। ऋषिगण और शब्दार्थ तथा न्याय के ज्ञाता वहाँ पर थे। वहां पर कुछ भी हारित नहीं था और ब्रह्मराक्षसों ने प्रवेश किया था ।३३। दैत्यगण यज्ञ के हरण करने वाले नहीं थे और वाजमुख अस्त्र आदि थे। प्रायश्चित्त और दरिद्रता वहाँ पर नहीं थे ।३४। शक्ति-प्रजा और क्रिया के योगों से आशिषों में विधि अनुष्ठित की गयी थी। इस रीति से वह यज्ञ मनीषियों का बारह वर्ष पर्यन्त वृद्धि युक्त हुआ था ।३५।
ऋषीणां नैमिषीयाणां तदभूदिव वज्रिणः । वृद्धाश्च ऋत्विजो वीरा ज्योतिष्टोमान् पृथक्पृथक् ॥३६ चक्रिरे पृष्ठगमनाः सर्वानियुतदक्षिणान् ।
३६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
समाप्तयज्ञो यत्रास्ते वासुदेवं महाधिपम् ॥३७ पप्रच्छुरमितात्मानं भवद्बिभ्यर्थदहं द्विजः । प्रचोदितः स्ववंशार्थं स च तानब्रवीत्प्रभुः ॥३८ शिष्यः स्वयंभुवो देवः सर्वं प्रत्यक्षदृग्वशी । अणिमादिभिरष्टाभिः सूक्ष्मैरंगैः समन्वितः ॥३६ तिर्यग्वातादिभिर्वर्षैः सर्वांल्लोकान्बिभर्ति यः । सप्तस्कन्धा भूताः शाखाः सर्वतोयाजराजरात् ॥४० विषयैर्मरुतो यस्य संस्थिताः सप्तसप्तकाः । व्यूहत्रयाणां सूतानां कुर्वन् सत्रं महाबलः ॥४१ तेजसश्चाप्युयानां दधातीह शरीरिणः । प्राणाद्या वृत्तयः पञ्च धारणानां स्ववृत्तिभिः ॥४२ ऋषियों का जो कि नैमिषीय थे वह सत्र इन्द्र के समान हुआ था । वृद्धाश्च-ऋत्विज और वीर पीछे की ओर गमन करने वाले होते हुए ज्योति- ष्टोमों को पृथक् २ सबको अयुत दक्षिणा वाले कर रहे थे । जहाँ पर यज्ञ समाप्त हुआ था वहाँ पर महान् अधिप भगवान् वासुदेव से जो कि अमित आत्मा वाले थे पूछा था कि आपने मुझ ब्राह्मण को प्रेरित किया था कि अपने वंश के लिए यह करो । और उन प्रभु ने उनसे कहा था ।३६-३८। शिष्य वशी देव स्वयंभुव है जो प्रत्यक्ष रूप से देखने वाला है और अणिमा आदि आठों सूक्ष्म अङ्गों से समन्वित रहते हैं ।३६। जोकि तिर्यग्वात आदि वर्षों से समस्त लोकों का भरण किया करते हैं । सात स्कन्धशाखाओं से भृत थे और विषयों से सर्व तो या जराजर युक्त थे जिसके मरुत् सप्त सप्तक संस्थित महाबल सूत तीनों व्यूहों का सत्र कर रहा था ।४०-४१। उपायों के शरीर धारी तेज का यहां पर धारण करता है । धारणाओं की प्राणाद्य पांच वृत्तियां अपनी वृत्तियों से युक्त थी ।४२। पूर्णमाणः शरीराणां धारणं यस्य कुर्वते । आकाशयोनिर्द्विगुणः शब्दस्पर्शसमन्वितः ॥४३ वाचोरणिः समाख्याता शब्दशास्त्रविचक्षणैः । भारत्याः श्लक्ष्णया सर्वान्मुनीन्प्रह्लादयन्निव ॥४४
सर्ग-वर्णनम् ] [ ३७
पुराणज्ञाः सुमनसः पुराणाश्रययुक्तया ।
पुराणनियता विप्राः कथामकथयद्विभुः ॥४५
एतत्सर्वं यथावृत्तमाख्यानं द्विजसत्तमाः ।
ऋषीणां च परं चैतल्लोकतत्त्वमनुत्तमम् ॥४६
ब्रह्मणा यत्पुरा प्रोक्तं पुराणं ज्ञानमुत्तमम् ।
देवतानामृषीणां च सर्वपापप्रमोचनम् ॥४७
विस्तरेणानुपूर्व्या च तस्य वक्ष्याम्यनुक्रमम् ॥४८
जिसका शरीरों का धारण को पूर्यमाण होता हुआ करता है । आकाश जिसकी योनि है वह द्विगुण है और शब्द तथा स्पर्श समन्वित ।४३। शब्द शास्त्र अर्थात् व्याकरण के विद्वानों के द्वारा वाग्घोरणि कही गयी है । परम नम्र और मधुर वाणी से सभी मुनिगणों को आनन्दित करते हुए ही ऐसा किया था ।४४। सुन्दर मन वाले जो पुराणों के ज्ञाता थे उन्होंने पुराणों के समाश्रय के युक्त होकर जो पुराणों के प्रवचन करने में नियत थे उनसे विभु ने कहा कही थी ।४५। हे द्विजश्रेष्ठो ! यह सब आख्यान जैसा भी हुआ था । ऋषियों का यह परम सर्वोत्तम लोक तत्त्व है ।४६। प्राचीन काल में ब्रह्माजी ने उत्तम ज्ञान पुराण कहा था वह देवताओं से और ऋषियों के सभी प्रकार के पापों का मोचन करने वाला है अब पूर्ण विस्तार से और आनुपूर्वी अर्थात् आरम्भ से अन्त तक क्रम से मैं अनुक्रम से बतलाऊंगा ।४७-४८।
सर्ग-वर्णनम्
शृणु तेषां कथां दिव्यां सर्वपापप्रमोचिनीम् ।
कथ्यमानां मया चित्रां बह्वर्थां श्रुतिसंमताम् ॥१
य इमां धारयेन्नित्यं शृणुयाद्वाप्यभीक्ष्णशः ।
स्ववंशं धारणं कृत्वा स्वर्गलोके महीयते ॥२
विश्वतारा या च पञ्च यथावत्तं यथाश्रुतम् ।
कीर्त्यमानं निबोधार्थं पूर्वेषां कीर्तिवर्धनम् ॥३
३८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
धन्यं यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्यं शत्रुघ्नमेव च । कीर्त्तनं स्थिरकीर्तीनां सर्वेषां पुण्यकर्मणाम् ॥४ यस्मात्कल्पायते कल्पः समग्रं शुचये शुचिः । तस्मै हिरण्यगर्भाय पुरुषायेश्वराय च ॥५ अजाय प्रथमायैव वरिष्ठाय प्रजासृजे । ब्रह्मणे लोकतन्त्राय नमस्कृत्य स्वयंभुवे ॥६ महदाद्यं विशेषांतं सवैरूप्यं सलक्षणम् । पञ्चप्रमाणं षट्श्रांतः पुरुषाधिष्ठितं च यत् ॥७
श्री सूतजी ने कहा—समस्त पापों का प्रमोचन कर देने वाली उनकी परम दिव्य कथा का आप अब श्रवण कीजिए जो कि मेरे द्वारा कही जा रही है। यह कथा बहुत ही विचित्र है और श्रुति के संमत है। इसका प्रचुर अर्थ भी है ।१। जो पुरुष इस कथा को नित्य धारण किया करता है और बारम्बार इसका श्रवण किया करता है वह अपने वंश को धारण करके अन्त में स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित हुआ करता है ।२। जिस प्रकार से हुआ है और जैसा सुना गया है जो यह पंच विश्व तारा है। ज्ञान प्राप्त करने के लिए कीर्त्तित किया हुआ यह पूर्व में होने बालों की कीर्त्ति का बढ़ाने वाला है ।३। यह परम धन्यपण देने वाला —आयु के बढ़ाने वाला—स्वर्गलोक प्राप्त कराने वाला और शत्रुओं का नाशक है । स्थिर कीर्ति से युक्त-पुण्य कर्मों वाले सबका कीर्त्तन करना इन उपर्युक्त सभी के देने वाला होता है ।४। जिसके कल्प भी कल्प का रूप धारण किया करता है और सम्पूर्ण शुचि के लिए भी शुचि है उन पुरुषों के स्वामी हिरण्यगर्भ के लिए जो अजन्मा है—सबसे प्रथम है—सबमें परमश्रेष्ठ है और प्रजाओं का सृजन करने वाले हैं उन लोक तन्त्र स्वयम्भू ब्रह्माजी के लिए नमस्कार है ।५-६। जो महत् का आदि में होने वाला है, जो विशेष के अन्त वाला है जो वैरुप्य से युक्त है-जो लक्षण वाला है—जो पांच प्रणामों वाला है-जो षट् श्रान्त है और पुरुषाधिष्ठित है ।७।
आसंयमात्प्रवक्ष्यामि भूतसर्गमनुत्तमम् । अव्यक्तं कारणं यत्तन्नित्यं सदसदात्मकम् ॥८ प्रधानं प्रकृतिं चैव यमाहुस्तत्त्वचिंतकाः ।
सर्ग वर्णन ] [ ३६
गन्धरूपरसैर्हीनं शब्दस्पर्शविवर्जितम् ॥६ जगद्योनिम्महाभूतं परं ब्रह्म सनातनम् । विग्रहं सर्वभूतानामव्यक्तमभवत्किल ॥१० अनाद्यंतमजं सूक्ष्मं त्रिगुणं प्रभवोप्ययम् । असांप्रतिकमज्ञेयं ब्रह्म यत्सदसत्परम् ॥११ तस्यात्मना सर्वमिदं व्याप्तमासीत्तमोमयम् । गुणसाम्ये तदा तस्मिन्नविभातं तमोमयम् ॥१२ सर्गकाले प्रधानस्य क्षेत्राज्ञाधिष्ठितस्य वै । गुणभावादूभासमाने महातत्वं वभूव ह ॥१३ सूक्ष्म स तु महानग्रे अव्यक्तेन समावृतः । सत्वोद्रेको महानग्रे सत्वमात्रप्रकाशकः ॥१४
इस परमोत्तम भूतों के सर्ग को संयम से आरम्भ करने मैं बतला- ऊँगा । जो अव्यक्त कारण है वह नित्य है और उसको स्वरूप सत् एवं जगत् दोनों ही प्रकार का है ।८। तत्त्वों का चिन्तन करने वाले विचारक लोग उस त्र्यम्बक को प्रधान तथा प्रकृति कहा करते हैं जो कि गन्ध-स्पर्श और रस से रहित है तथा शब्द से भी विवर्जित हैं ।६। इस सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति स्थान, महाभूत सनातन परब्रह्म तथा समस्त भूतों का विग्रह निश्चित रूप से अव्यक्त हो गया था ।१०। आदि और अन्त से रहित अजन्मा, सूक्ष्म रूप वाला सत्त्व-रज और तम-इन तीन गुणों से युक्त अर्थात् त्रिगुणात्मक, सबका प्रभाव भी यह है जो असाम्प्रतिक, न जानने के योग्य, सत् और असत् स्वरूप वाला, पर ब्रह्म है । जो सभी भूतों का निग्रह है वही अव्यक्त हो गया है । ।११। उसी को आत्मा से यह सम्पूर्ण विश्व व्याप्त है तम से परिपूर्ण है । उस समय में उस गुणों (तीनों गुणों) के साम्य होने पर यह तमोमय विभात नहीं होता है ।१२। जब सृजन का समय होता है उस काल में क्षेत्र के ज्ञाता के द्वारा अधिष्ठित प्रधान के गुणों के भय से भासमान होने पर यह महा- तत्व होगया था ।१३। आगे वह सूक्ष्म रूप वाला महान् अव्यक्त से समावृत था । सत्त्व गुण की अधिकता से युक्त महान् केवल सत्त्व का ही प्रकाश करने वाला था ।१४।
सत्वान्महान्स विज्ञेय एकस्तत्कारणः स्मृतः ।
४० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
लिंगमात्रं समुत्पन्नं क्षेत्रज्ञाधिष्ठितं महत् ॥१५ संकल्पोऽध्यवसायश्च तस्य वृत्तिद्वयं स्मृतम् । महासृष्टिं च कुरुते वीतमानः सिसृक्षया ॥१६ धर्मादीनि च भूतानि लोवतत्वार्थहेतवः । मनो महात्मनि ब्रह्म दुर्बुद्धिख्यातिरीश्वरात् ॥१७ प्रज्ञासंधिश्च सर्वस्थं संख्यायतनरश्मिभिः । मनुते सर्वभूतानां तस्माच्चेष्टफलो विभुः ॥१८ भोक्ता त्राता विभक्तात्मा वर्त्तंनं मन उच्यते । तत्वानां संग्रहे यस्मान्महांश्च परिमाणतः ॥१९ शेषेभ्यो गुणतत्वेभ्यो महानिव तनुः स्मृतः । विभक्तिमानं मनुते विभागं मन्यतेऽपि वा ॥२० पुरुषो भोगसंबंधात्तेन चासौ संति स्मृतः । वृहत्त्वाद्वृंहणत्वाच्च भावानांमखिलाश्रयात् ॥२१
सत्र से वह महान् एक जानने के योग्य है। और एक ही कारण कहा गया है क्षेत्रज्ञ से अधिष्ठित महत् केवल लिङ्ग ही समुत्पन्न हुआ था ।१५। उसकी छै: प्रकार की वृत्ति बतायी गयी है—एक तो सङ्कल्प और दूसरी वृत्ति अध्यवसाय है । सृजन करने की इच्छा से वीतमान वह इस महती सृष्टि को किया करता है ।१६। और धर्म आदि भूत लोकतत्वार्थ के हेतु हैं । महान् आत्मा में मन ही ब्रह्म है और ईश्वर से इसकी दुर्बुद्धि यह ख्याति है ।१७। संख्यायत रश्मियों से सब भूतों की प्रज्ञा सन्धि सर्वस्व मानता है । इस कारण से विभु चेष्टा के वाला होता है ।१८। भोक्ता (भोगने वाला) परित्राण करने वाला-विभक्त आत्मा वाला बरतने वाला जो है वही मन कहा जाता है । जिसमें तत्वों के संग्रह में है और परिणाम से महान् है ।१९। शेष जो गुणों के तत्व हैं उनके महान की ही भाँति तनु कहा गया है । विभक्ति स युक्त को मानता है अथवा विभाग को मानता है ।२०। यह पुरुष उसके द्वारा अर्थात् शरीर के द्वारा भोगों का सम्बन्ध होने से सत् में कहा गया है । वृहत् होने से और वृंहणत्व होने से और भावों का पूर्ण आश्रय होने से पैदा होता है ।२१।
सर्ग वर्णन ] [ ४१
यस्माद्बृ ंहयत भावान् ब्रह्मा तेन निरुच्यते । आपूरयति यस्माच्च सर्वान् देहाननुग्रहैः ॥२२ बुध्यते पुरुषश्चात्र सर्वान् भावान्पृथक् पृथक् । तस्मिंस्तु कार्यकारणं संसिद्धं ब्रह्मणः पुरा ॥२३ प्राकृतं देवि वर्तं मां क्षेत्रज्ञो ब्रह्मसंमितः । स वै शरीरी प्रथमः पुरा पुरुष उच्यते ॥२४ आदिकर्त्ता स भूतानां ब्रह्माऽग्रे समवर्त्तिनाम् ॥२५ हिरण्यगर्भः सोऽण्डेऽस्मिन्प्रादुर्भूतश्चतुर्मुखः । सर्गे च प्रतिसर्गे च क्षेत्रज्ञो ब्रह्म संमितः ॥२६ करणैः सह पृच्छते प्रत्याहारैस्त्यजंति च । भजंते च पुनर्देहांस्ते समाहारसंधिषु ॥२७ हिरण्मयस्तु यो मेरुस्तस्योद्धर्तुं र्महात्मनः । गर्त्तोदकं संबुदास्तु हरेयुश्चापि पञ्चताः ॥२८
जिससे भावों का बृंहण करना है उसी से ब्रह्मा—इस नाम से कहा जाया करता है । और जिस कारण से समस्त देहों को अनुग्रहों के द्वारा आपूरित करता है ।२२। यहाँ पर पुरुष सब भावों को पृथक् पृथक् जानता है । उसमें तो पहले ब्रह्म का कार्य और करण से सिद्ध हुआ है ।२३। हे देवि ! मुझको प्राकृत समझकर बतलाया करो । जो क्षेत्रज्ञ है वह ब्रह्म से संमित है । वह शरीर धारी निश्चय ही पहिले पुरुष कहा जाया करता है ।२४। ब्रह्मा के आगे समवर्ती भूतों का वह आदि कर्त्ता है ।२५। वह हिरण्यगर्भ इस अण्ड में चार मुखों वाला प्रादुर्भूत हुआ था । सर्ग और प्रतिसर्ग में क्षेत्रज्ञ ब्रह्म संमित है ।२६। करणों के साथ पूछते हैं और प्रत्याहारों से त्याग करते और वे पुनः समाहार सन्धियों में देहों का सेवन करते हैं ।२७। हिरण्मय जो मेरु गिरि है उस महान् आत्मा वाले के गर्त्तोदक का उद्धार करने के लिये संबुद पञ्जला का भी हरण करते हैं ।२८।
यस्मिन्नंड इमे लोकाः सप्त वै संप्रतिष्ठिताः । पृथिवी सप्तभिर्द्दीपैः समुद्रैः सह सप्तभिः ॥२९ पर्वतैः सुमहद्भिश्च नदीभिश्च सहस्रशः । अन्तः स्थस्य त्विमे लोका अंतर्विश्वमिदं जगत् ॥३०
४२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
चन्द्रादित्यौ सनक्षत्रौ संग्रहः सह वायुना । लोकालोक च यत् किंचिदण्डे तस्मिन्प्रतिष्ठितम् ॥३१ आपो दशगुणे नैव तेजसा वाह्यतो वृताः । तेजो दशगुणेनैव वाह्यतो वायुना वृतम् ॥३२ वायुर्दशगुणेनैव बाह्यतो नभसा वृतः । आकाशमावृतं सर्वं बहिर्भूतादिना तथा ॥३३ भूतादिर्महता चैव प्रधानेनावृतो महान् । एभिरावरणेरंडं सप्तभिः प्राकृतैर्वृतम् ॥३४ इच्छया वृत्य चान्योन्यमरणे प्रकृतयः स्थिताः । प्रसर्गकाले स्थित्वा च ग्रसंतश्च परस्परम् ॥३५
जिस अण्ड में ये सात लोक संप्रतिष्ठित हैं। इनमें पृथिवी है जो सात द्वीपों से और सात समुद्रों से युक्त हैं इस पृथ्वी में महान् पर्वत है और सहस्रों नदियाँ भी विद्यमान है। अन्दर स्थित इसके ये सब लोक हैं और अन्दर में रहने विश्व में यह जगत रहता है ।२६-३०। समस्त नक्षत्रों के साथ चन्द्रमा और सूर्य है तथा वायु के साथ संग्रह है। और लोकालोक है। जो कुछ भी है। वह सब उस अण्ड में प्रतिष्ठित हैं अर्थात् विद्यमान रहा करता है ।३१। दश गुने तेज के साथ बाहिर की ओर जल आवृत रहते हैं। दश गुणित वायु के द्वारा वह तेज भी आवृत रहता है ।३२। दश गुने नभ (आकाश) से वह वायु वृत रहता है जोकि बाहिर की ओर है। फिर वह आकाश सम्पूर्ण बाहिर भूतादि से आवृत है ।३३। भूतादिक महान से समावृत है और महान प्रधान के द्वारा आवृत है। इन सात प्राकृत आवरणों के द्वारा यह अण्ड आवृत रहा करता है ।३४। एक दूसरे के मरण में परस्पर में इच्छा से आवृत प्रकृतियां स्थित हैं और प्रसर्ग के अर्थात् प्रसृजन के समय में स्थित होकर परस्पर में ग्रसन किया करती हैं ।३५।
एवं परस्परैश्चैव धारयंति परस्परम् । आधाराधेयभावेन विकारास्ते विकारिषु ॥३६ अव्यक्तं क्षेत्रमित्युक्तं ब्रह्म क्षेत्रज्ञमुच्यते । इत्येवं प्राकृतः सर्गः क्षेत्रज्ञाधिष्ठितस्तु सः ॥३७
लोक-वर्णनम् (२) ] | ४३
अबुद्धिपूर्व्वः प्रथमः प्रादुर्भू तस्तडिद्यथा ।
एतद्धिरण्यगर्भस्य जन्म यो वेत्ति तत्त्वतः ।
आयुष्मान्कीर्त्तिमान्धन्यः प्रज्ञावांश्च न संशयः ॥३८॥
इस प्रकार से परस्पर में एक दूसरे को धारण किया करते हैं। ये विकार वालों में आधार और आधेय के भाव से वे सब विकार होते हैं। ।३६। इस अव्यक्त को ही क्षेत्र कहा जाता है और ब्रह्म क्षेत्रज्ञ कहा जाया करता है। इस रीति से यह प्राकृत सर्ग है और वह क्षेत्रज्ञ से अधिष्ठित होता है। ३७। प्रथम अबुद्धि पूर्वक होता है जिस तरह से तड़ित होती है। हिरण्यगर्भ का जन्म तो तात्विक रूप से जानता है वह आयु वाला-कीर्ति से समन्वित-धन्य और प्रज्ञा वाला होता है—इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं हैं ।३८।
॥ लोक-वर्णन (१) ॥
सूत उवाच—आत्मन्यवस्थिते व्यक्ते विकारे प्रतिसंहृते ।
साधर्म्येणावतिष्ठेते प्रधानपुरुषौ तदा ॥१
तमः सत्त्वगुणावेतौ समत्वेन व्यवस्थितौ ।
अनुद्रिक्तावनुचरौ तेन प्रोक्तौ परस्परम् ॥२
गुणसाम्ये लयो ज्ञेय आधिक्ये सृष्टिरुच्यते ।
सत्त्ववृद्धौ स्थितिरभूद् ध्रुवं रत्नशिखास्थितम् ॥३
यदा तमसि सत्त्वे च रजोप्यनुगतं स्थितम् ।
रजः प्रवर्त्तक तच्च बीजेष्विव यथा जलम् ॥४
गुणा वैषम्यमासाद्य प्रसंगेन प्रतिष्ठिताः ।
गुणेभ्यः क्षोभ्यमाणेष्यस्त्रयो ज्ञेया हि सादरे ॥५
शाश्वताः परमा गुह्याः सर्वात्मानः शरीरिणः ।
सत्त्वं विष्णु रजो ब्रह्मा तमो रुद्रः प्रजापतिः ॥६
रजः प्रकाशको विष्णु र्ब्रह्मात्रस्रष्टुत्वमाप्नुयात् ।
जायते च यतश्चित्रा लोकसृष्टिर्नहौजसः ॥७
४४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
श्रीसूतजी ने कहा—व्यक्त के आत्मा में अवस्थित होने पर और विकार के प्रति संहृत हो जाने पर उस समय में प्रधान और पुरुष सहकर्मता के साथ अवस्थित हुआ करते हैं ।१। तमोगुण और सत्वगुण ये दोनों समता से व्यवस्थित हुआ करते हैं । उसके साथ ये उद्रिक्त नहीं होते हैं और परस्पर से उसके अनुगामी रहा करते हैं ।२। जब इन गुणों की समता होती है तो उस समय में लय जान लेना चाहिए और जब इनमें किसी भी अधिकता अर्थात् परस्पर में विषमता होती है तो उस अवस्था में सृष्टि कही जाया करती है सत्व की वृद्धि में स्थिति हुई थी और ध्रुव पद्म शिखा में होता है और वह बीजों में जल के ही समान प्रवर्त्तक होता है ।४। ये गुण विषमता की दशा को प्राप्त करके प्रसङ्ग से प्रतिष्ठित होते हैं । गुणों के क्षोभ्यमाण होने से ये तीनों गुण बड़े आदर में जानने के योग्य होते हैं ।५। ये शाश्वत अर्थात् नित्य रहने वाले हैं—परमगुह्य हैं—सबकी आत्मा है और शरीरधारी है । सत्वगुण विष्णु हैं—रजोगुण प्रजापति ब्रह्मा है और तमोगुण साक्षात् रुद्र देव हैं ।६। रजोगुण के प्रकाशक विष्णु ब्रह्मा के स्रष्टा होने की अवस्था को प्राप्त किया करते हैं । जिस महान् ओज वाले से यह विचित्र प्रकार की सृष्टि समुत्पन्न हुआ करती है ।७।
तमः प्रकाशको विष्णुः कालत्वेन व्यवस्थितः ।
सत्त्वप्रकाशको विष्णुः स्थितित्वेन व्यवस्थितः ॥८
एत एव त्रयो लोका एत एव त्रयो गुणाः ।
एत एव त्रयो वेदा एत एव त्रयोऽग्नयः ॥९
परस्परान्वया ह्येते परस्परमनुव्रताः ।
परस्परेण वर्तंते प्रेरयति परस्परम् ॥१०
अन्योन्यं मिथुनं ह्येते अन्योन्यमुपजीविनः ।
क्षणं वियोगो न ह्येषां न त्यजंति परस्परम् ॥११
प्रधानगुणवैषम्यात्सर्गकाले प्रवर्त्तते ।
अदृष्टाऽधिष्ठितात्पूर्वे तस्मात्सदसदात्मकात् ॥१२
ब्रह्मा बुद्धित्वमिथुनं युगपत्संबभूव ह ।
तस्मात्तमौव्यक्तमयं क्षेत्रज्ञो ब्रह्मसंज्ञकः ॥१३
कपिल आश्रम में अश्वानयन ] [ ४५
अर्थों के तत्त्वों का ज्ञाता होगा ।४८। वह अपने पितरों के गौरव से सुसमन्वित होगा और महान यत्न से परम घोर तप करके निश्चय ही स्वर्ग से यहाँ पर गङ्गा को लावेगा ।४९।
तदंभसा पावितेषु तेषां गात्रास्थिभस्मसु ।
प्राप्नुवंति गतिं स्वर्गे भवतः पितरोऽखिला ॥५०
तथेति तस्या माहात्म्यं गंगाया नृपनन्दन ।
भागीरथीति लोकेऽस्मिन्सा विख्यातिमुपेष्यति ॥५१
यत्तोयप्लावित्तेष्वस्थिभस्मलोमनखेष्वपि ।
निरयादपि संयाति देही स्वर्लोकमक्षयम् ॥५२
तस्मात्त्वं गच्छ भद्रं ते न शोकं कर्तुं महंसि ।
पितामहाय चैवैनमश्वं संप्रतिपादय ॥५३
जैमिनिरुवाच-
ततः प्रणम्य तं भक्त्या तथेत्युक्त्वा महामतिः ।
ययौ तेनाभ्यनुज्ञातः साकेतनगरं प्रति ॥५४
सगरं स समासाद्य तं प्रणम्य यथाक्रमम् ।
न्यवेदयच्च वृत्तांतं मुनेस्तेषां तथात्मनः ॥५५
प्रददौ तुरगं चापि समानीतं प्रयत्नतः ।
अतः परमनुष्ठेयमब्रवीत्किं मयेति च ॥५६
उस पतित पावनी गङ्गा के पुनीत जल से उन सबके गात्र-अस्थि और भस्म के पवित्र हो जाने पर वे समस्त आपके पितृगण स्वर्ग में गति को प्राप्त करेंगे ।५०। हे नृपनन्दन उस गङ्गा का माहात्म्य ही ऐसा अद्भुत है । राजा भगीरथ के द्वारा यहाँ लाने से इस लोक में उसका नाम भागीरथी प्रसिद्ध होगा ।५१। गङ्गा का बड़ा अद्भुत माहात्म्य होता है कि उसके जल में किसी भी प्राणी की अस्थि-भस्म-नख आदि कोई भी भाग जब प्लावित हो जाता है तो वह प्राणी नरक की यातनाओं से भी मुक्त होकर अक्षय स्वर्गलोक में चला जाया करता है ।५२। इस कारण से अब आप यहाँ से चले जाइए—आपका कल्याण होगा—आपको कुछ भी शोक नहीं करना चाहिए । अपने पितामह को यह अश्व ले जाकर दे दो ।५३। जैमिनि मुनि
४६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
एकधा स द्विधा चैव त्रिधा च बहुधा पुनः । योगीश्वरः शरीराणि करोति विकरोति च ॥२१
वह प्रथम ही शरीर था जो कि धारणत्व से व्यवस्थित था। यहाँ पर अनुपम ज्ञान से और वैराग्य से सप्तति था। इसके अव्यक्तता के लिए उस मन से वह जो-जो भी इच्छा करता था वही करता था क्योंकि इसके तीनों गुण वश में किये हुए थे और भाव से वे एक दूसरे की अपेक्षा करने वाले थे ।१५-१६। चतुर्मुख ब्रह्मत्व को प्राप्त किया था और अन्त करनेवाले पुरुष हुए। इस प्रकार से स्वयम्भू की ही ये तीन अवस्थाएँ थीं। १७। ब्रह्मत्व की दशा में सब रजोगुण है और काल की अवस्था में रजोगुण और तमोगुण होता है। जब पुरुष की दशा में यह होते हैं तो तत्वगुण के युक्त होते हैं। इस प्रकार से स्वयम्भू में गुणों की वृत्ति होती है ।१८। जब ब्रह्मा की दशा में यह रहते हैं तो यह लोकों का सृजन किया करते हैं। जब काल का स्वरूप धारण किया करते हैं तो उन सभी लोकों का संक्षय करते हैं। जब केवल पुरुष की दशा में होते हैं तो यह उदासीन रहते हैं। ऐसे स्वयम्भू की ही ये तीन भिन्न-भिन्न अवस्थाएँ हुआ करती हैं ।१९। ब्रह्मा कमल के दलों के समान नेत्रों वाले होते हैं और काल का जब उनका स्वरूप होता है तो अञ्जन के समान कृष्ण वर्ण होता है। जब उदासीन पुरुष के रूप में होते हैं तो यह परमात्मा के स्वरूप से पुण्डरीकाक्ष होते हैं ।२०। एक प्रकार से—दो प्रकार से—तीन प्रकार से फिर बहुत प्रकार से योगीश्वर प्रभु अनेक शरीरों को बनाया करते हैं और बदलते रहा करते हैं ।२१।
नानाकृतिक्रियारूपमाश्रयंति स्वलीलया । त्रिधा यद्वर्त्तते लोके तस्मात्त्रिगुण उच्यते ॥२२ चतुर्द्धा प्रविभक्तत्वाच्चतुर्व्यूहः प्रकीर्तितः । यदा शेते तदार्धाते यद्भक्ते विषयान्प्रभुः ॥२३ यत्स्वस्थाः सततं भावस्तस्मादात्मा निरुच्यते । ऋषिः सर्वगतश्चात्र शरीरे सोऽभ्ययात्प्रभुः ॥२४ स्वामी सर्वस्य यत्सर्वं विष्णुः सर्वप्रवेशनात् । भगवानग्रसद्भावान्नागो नागस्वसंश्रयात् ॥२५ परमः संप्रहृष्टत्वाद्वैवतादोमिति स्मृतिः ।
लोक वर्णनम् (१) ] [ ४७
सर्वज्ञः सर्वविज्ञानात्सर्वः सर्वं यतस्ततः ॥२६ नराणां स्वापनं ब्रह्मा तस्मान्नारायणः स्मृतः । त्रिधा विभज्य चात्मानं सकलः संप्रवर्त्तते ॥२७ सृजते ग्रसते चैव पाल्यते च त्रिभिः स्वयम् । सोऽग्रे हिरण्यगर्भः सन् प्रादुर्भूतः स्वयं प्रभुः ॥२८
अनेक क्रिया-आकार और स्वरूप का आश्रय ग्रहण किया करते हैं और यह सब अपनी ही लीला से करते रहा करते हैं । लोक में यह तीन प्रकार वाले होकर रहते हैं इसी कारण से इनको त्रिगुण कहा जाता है ।२२। चार प्रकार से प्रविभक्त होने से यह चतुर्व्यूह कहा गया है । जिस समय में यह शयन किया करते हैं उस समय में बह अर्धन्त होते हैं प्रभु विषयों का भोग किया करते हैं ।२३। जो स्वस्थ होते हैं तब निरन्तर भाव होता है । इसी से आत्मा कहा जाता है और ऋषि इसमें सर्वगत हैं । वह शरीर में आते हैं ।२४। भगवान् विष्णु सबके स्वामी हैं क्योंकि विष्णु का सभी में प्रवेश होता है । भगवान् अप्रसद्भावसे नाग हैं और नाग का संश्रय नहीं होता है ।२५। संप्रहृष्ट होने से परम है और देवता होने से ओम् यह स्मृति है । सबके विज्ञान होने से यह सर्वज्ञ हैं क्योंकि यह सबमें हैं अतएव यह सर्व कहा जाता है ।२६। नरों में अर्थात् जलों में यह स्वपन किया करते हैं इस कारण से ब्रह्माजी नारायण कहे गये हैं और अपने आपके स्वरूप को तीन प्रकार से विभक्त करके यह सकल से संप्रवृत्त हुआ करते हैं ।२७। इन तीनों स्वरूपों से यह लोकों का सृजन पालन और क्रम से ग्रसन किया करते हैं । वही सबसे आगे हिरण्यगर्भ होते हुए स्वयं प्रादुर्भूत हुए हैं ।२८।
आद्यो हि स्ववशश्चैव अजातत्वादजः स्मृतः । तस्माद्धिरण्यगर्भश्च पुराणेषु निरुच्यते ॥२९ स्वयंभुवो निवृत्तस्य कालो वर्णग्रितस्तु यः । न शक्यः परिसंख्यातुं मनुवर्षशतैरपि ॥३० कल्पसंख्यानिवृत्तस्तु परार्धो ब्रह्मणः स्मृतः । तावत्त्वे सोऽस्य कालोऽन्यस्तस्यांते प्रतिबुद्ध्यते ॥३१ कोटिवर्षसहस्राणि गृहभूतानि यानि च । समतीतानि कल्पानां तावच्छेषात्परे तु ये ॥३२
४८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
यत्स्वयं वर्त्तते कल्पो वाराहस्तन्निबोधत ।
प्रथमं सांप्रतस्तेषां कल्पो वै वर्त्तते च यः ॥३३
पूर्णे युगसहस्रे तु परिपाल्यं नरेश्वरैः ॥३४
क्योंकि यह सबसे आदि काल में होने वाले हैं । अतएव यह स्ववशी हैं अर्थात् अपने ही वश में रहने वाले हैं ऐसा ही कहा गया है । उसी कारण से पुराणों में इनको हिरण्यगर्भ कहा जाया करता है ।२९। जो स्वयम्भुव है वह निवृत्त का वर्षों में अग्रकाल है । इसकी परिसंख्या मनु के सैकड़ों वर्षों में भी नहीं की जा सकती है ।३०। कल्पों की संख्या से निवृत्त ब्रह्मा का परार्ध कहा गया है । उतने ही में इसका वह काल है उसके अन्त में अन्य काल प्रतिबुद्ध होता है ।३१। करोड़ों सहस्र वर्ष जो कि इसके गृहभूत हैं । उतने कल्पों के समतीत हैं और जो शेष हैं वे दूसरे हैं ।३२। जो स्वयं कल्प है वह वाराह कल्प है—ऐसा ही समझ लो । प्रथम उनमें साम्प्रत है और जो कल्प होता है ।३३। एक सहस्र युगों के पूर्ण हो जाने पर नरेश्वरों के द्वारा परिपालन के योग्य है ।३४।
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॥ लोककल्पनम् (२) ॥
सूत उवाच—आपोऽग्रे सर्वगा आसन्नेतस्मिन्पृथिवीतले ।
शांतवातेः प्रलीनेऽस्मिन्न प्राज्ञायत किंचन ॥१
एकार्णवे तदा तस्मिन्नष्टे स्थावरजङ्गमे ।
विभुर्भवति स ब्रह्मा सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥२
सहस्रशीर्षा पुरुषो रुक्मवर्णो ह्यतीन्द्रियः ।
ब्रह्म नारायणाख्यस्तु सुष्वाप सलिले तदा ॥३
सत्त्वोद्रेकान्निषिद्धस्तु शून्यं लोकमवेक्षत ।
इमं चोदाहरंत्यत्र श्लोकं नारायणं प्रति ॥४
आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः ।
अयनं तस्य ताः प्रोक्तास्तेन नारायणः स्मृतः ॥५
तुल्यं युगसहस्रस्य वसन्कालमुपास्यतः ।
लोककल्पनम् (२) ] [ ४६
स्वर्णपत्रे प्रकुरुते ब्रह्मत्वाददर्शकारणात् ॥ ६ ब्रह्मा तु सलिले तस्मिन्नवाग् भूत्वा तदा चरत् । निशायामिव खद्योतः प्रावृट्काले ततस्ततः ॥ ७
श्रीसूतजी ने कहा—इस पृथिवी तत्व में सबसे पूर्व जल ही जल सर्वत्र था और यह शील तथा प्रलीन था । इसमें उस समय कुछ भी नहीं जाना जाता था । १। केवल एक समुद्र ही था और उस सागर में सभी स्थावर (अचर) और जङ्गम (चर) नष्ट हो गये थे । विभु (व्यापक) वह ब्रह्मा जी उस समय में सहस्रों पादों और नेत्रों वाले हो जाया करते हैं । २। सहस्रों शीर्षों वाले, सुवर्ण के समान जिनका वर्ण था और जो इन्द्रियों की पहुँच से परे थे अर्थात् अप्रत्यक्ष थे ऐसे पुरुष नारायण नाम वाले ब्रह्मा उस समय में समुद्र में शयन कर रहे थे । ३। सत्व के उद्रेक से निषिद्ध होते हुए उन्होंने उस समय में इस लोक को शून्य देखा था । यहाँ पर भगवान् नारायण के विषय में इन निम्न लिखित श्लोक को उदाहृत किया करते हैं । ४। जलों को नारा कहा गया है और ये जल ही नर के आत्मज हैं । वे जल ही उन नारायण प्रभु के निवास स्थान है अतएव प्रभु का नाम नारायण कहा गया है । ५। सहस्रों युगों के तुल्य काल तक वे प्रभु वहाँ पर निवास करते हुए स्थित रहे थे । ब्रह्मत्व के अदर्शन के कारण से वे स्वर्ण पत्र किया करते हैं । ६। उस जल में ब्रह्माजी अवाक् होकर उस समय में विचरण कर रहे थे जिस तरह से वर्षा ऋतु में रात्रि में खद्योत चमकता हुआ यहाँ से वहाँ घूमा करता है । ७।
ततस्तु सलिले तस्मिन् विज्ञायांतर्गते महत् । अनुमानादसंमूढो भूमेरुद्धरणं प्रति ॥ ८ ॐकाराष्टतनुं त्वन्यां कल्पादिषु यथा पुरा । ततो महात्मा मनसा दिव्यरूपमचिंतयत् ॥ ९ सलिलेऽवप्लुतां भूमिं दृष्ट्वा स समचिंतयत् । किं तु रूपमहं कृत्वा सलिलादुद्धरे महीम् ॥ १० जलक्रीडासमुचितं वाराहं रूपमस्मरत् । अदृश्यं सर्वभूतानां वाङ्मयं ब्रह्मसंज्ञितम् ॥ ११