बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
अथ चतुस्त्रिंशोऽध्यायः नारद उवाच समाख्यातानि सर्वाणि योगाङ्गानि महामुने । इदानीमपि सर्वज्ञ यत्पृच्छामि तदुच्यताम् ॥१॥ योगो भक्तिमतामेष सिध्यतीति त्वयोदितम् । यस्य तुष्यति सर्वेशस्तस्य भक्तिश्च शाश्वतम् ॥२॥ यथा तुष्यति सर्वेशो देवदेवो जनार्दनः । तन्ममाख्याहि सर्वज्ञ मुने कारुण्यवारिधे ॥३॥ सनक उवाच नारायणं परं देवं सच्चिदानन्दविग्रहम् । भज सर्वात्मना विप्र यदि मुक्तिमभीप्ससि ॥४॥ रिपवस्तं न हिंसन्ति न बाधंते ग्रहाश्च तम् । राक्षसाश्च न चेक्षन्ते नरं विष्णुपरायणम् ॥५॥ भक्तिर्दृढा भवेद्यस्य देवदेवे जनार्दने । श्रेयांसितस्य सिध्यन्ति भक्तिमन्तोऽधिकास्ततः ॥६॥ पादौ तौ सफलौ पुंसां यौ विष्णोगृहगामिनौ । तौ करौ सफलौ ज्ञेयौ विष्णुपूजापरौ तु यौ ॥७॥ ते नेत्रे सुफले पुंसां पश्यतो ये जनार्दनम् । सा जिह्वा प्रोच्यते सद्भिर्हरिनामपरा तु या ॥८॥ सत्यं सत्यं पुनः सत्यमुद्धृत्य भुजमुच्यते । तत्त्वं गुरुसमं नास्ति न देवः केशवात्परः ॥९॥ सत्यं वच्मि हितं वच्मि सारं वच्मि पुनः पुनः । असारेऽस्मिंस्तु संसारे सत्यं हरिसमर्चनम् ॥१०॥ अध्याय ३४ हरिभक्त के लक्षणों का निरूपण नारद बोले—महामुनि ! आपने समस्त योगांगों का वर्णन कर दिया, सर्वज्ञ ! अब जो कुछ मैं पूछ रहा हूँ उसको कहिए ॥१॥ आपने अभी कहा है कि, योग भक्तों को ही सिद्ध होता है और शाश्वत भक्ति उसी को प्राप्त होती है जिस पर सर्वेश प्रसन्न रहते हैं । सर्वज्ञ ! करुणा-सागर ! मुने ! अब देवाधिदेव जनार्दन कैसे प्रसन्न होते हैं, इसको आप कहिए ॥२-३॥ सनक बोले—विप्र ! यदि तुम मुक्ति चाहते हो तो सच्चिदानन्द स्वरूप, पर देव ब्रह्म का सब प्रकार से भजन करो ॥४॥ जो नर विष्णु में सर्वदा अपनी निष्ठा रखता है उसको शत्रु नहीं मार सकते, ग्रह-पीड़ा भी पास नहीं फटकती और राक्षस उसकी ओर आँख नहीं उठा सकते हैं ॥५॥ जिसकी देवाधिदेव जनार्दन में दृढ़ भक्ति हो जाती है उसको सब कल्याण प्राप्त होते हैं और वह अधिकाधिक भक्तिमान् हो जाता है ॥६॥ उस व्यक्ति के ही पैर सफल हैं जिनसे विष्णु मन्दिर में जाया जाता है, जो हाथ विष्णु की पूजा में लगे रहते हैं वे ही धन्य हैं । नेत्र वे ही कृतकृत्य हैं जो जनार्दन का दर्शन करते हैं । उसी जिह्वा की मनीषी लोग प्रशंसा करते हैं जो सर्वदा हरिनामोच्चारण में लगी रहती है ॥७-८॥ मैं दोनों हाथ उठाकर कह रहा हूँ कि यह सत्य है, सत्य है, सत्य है कि, गुरु के समान दूसरा कोई तत्त्व नहीं और न तो केशव से बढ़कर कोई देवता ही है ॥९॥ मैं सत्य कह रहा हूँ, श्रेय कह रहा हूँ और बार बार सार कह रहा हूँ कि, इस असार संसार
चतुस्त्रिंशोऽध्यायः २२१ संसारपाशे सुदृढं महामोहप्रदाय कम् । हरिभक्तिकुठारेण च्छित्वात्यन्तसुखी भव ॥११॥ तन्मनः संयुक्तं विष्णौ सा वाणी मत्परायणा । ते श्रोत्रे तत्कथासारपूरिते लोकवंदिते ॥१२॥ आनन्दमक्षरं शून्यमवस्थां त्रितयेऽपि । आकाशमध्यगं देवं भज नारद संततम् ॥१३॥ स्थानं न शक्यते यस्य स्वरूपं वा कदाचन । निर्देष्टुं मुनिशार्दूल द्रष्टुं वाथ कृतात्मभिः ॥१४॥ समस्तैः करणैर्युक्तो वर्त्ततेऽसौ यदा तदा । जाग्रदित्यप्युच्यते सद्भीरन्तर्यामी सनातनः ॥१५॥ यदान्तःकरणैर्युक्तः स्वेच्छया विलत्यसौ । स्वप्नन्नित्युच्यते ह्यात्मा यदा स्वापविवर्जितः ॥१६॥ न बाह्यकरणैर्युक्तो न चान्तःकरणैस्तथा । अस्वरूपो यदात्मासौ पुण्यापुण्यविवर्जितः ॥१७॥ सर्वोपाधिविनिर्मुक्तो ह्यानंदो निर्गुणो विभुः । परब्रह्ममयो देवः सुषुप्त इति गीयते ॥१८॥ भावनामयमेतद्वै जगत्स्थावरजङ्गमम् । विद्युल्लोलं विप्रेन्द्र भज तस्माज्जनार्दनम् ॥१९॥ अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्य्यापरिग्रहौ । वर्त्तते यस्य तस्यैव तुष्यते जगतां पतिः ॥२०॥ सर्व्वभूतदयायुक्तो विप्रपूजापरायणः । तस्य तुष्टो जगन्नाथो मधुकैटभमर्द्दनः ॥२१॥ सत्कथायां च रमते सत्कथां च करोति यः । सत्सङ्गे निरहंकारस्तस्य प्रीतो रमापतिः ॥२२॥ नामसंकीर्त्तनं विष्णो क्षुत्तृट्प्रस्खलितादिषु । करोति सततं यस्तु तस्य प्रीतो ह्यधोक्षजः ॥२३॥ या तु नारी पतिप्राणा पतिपूजापरायणा । तस्यास्तुष्टो जगन्नाथो ददाति स्वपदं मुने ॥२४॥ असूयारहिता ये तु ह्यहंकारविवर्जिताः । देवपूजापरायश्चैव तेषां तुष्यति केशवः ॥२५॥ में हरि पूजा ही सत्य है ॥१०॥ यह संसार का पाश अत्यन्त सुदृढ़ है और महामोह में डालने वाला है । इसलिए हरिभक्ति रूपी कुल्हाड़ी से इसको काटकर अत्यन्त सुखी हो जाओ ॥११॥ वही मन प्रशंसनीय है जो विष्णु में लगा रहता है, वही वाणी वाणी है जो प्रभु का गुणगान करती रहती है। वे ही कान धन्य है जो विष्णु के कथासार से भरे रहते हैं ॥१२॥ नारद ! तीनों अवस्थाओं (जाग्रत स्वप्न, सुषुप्ति) में आनन्द, अक्षर, शून्य और आकाश मध्यगामी देव (विष्णु) का सर्वदा भजन करो । मुनिशार्दूल ! उस ब्रह्म के स्थान, स्वरूप का निर्देश अवश्यात्म। जन कभी भी नहीं कर सकते हैं, (उनके लिए) दर्शन पाना तो दूर की वस्तु है ॥१३-१४.। जिस समय सनातन अन्तर्यामी आत्मा समस्त इन्द्रियों से युक्त रहता है उस अवस्था को सज्जन जाग्रत कहते हैं ॥१५॥ जिस समय आत्मा अन्तःकरण के साथ इच्छा पूर्वक इधर उधर विचरता रहता है सोता नहीं उसको स्वप्नावस्था कहते हैं ॥१६॥ बाह्य और अन्तःकरण से सर्वथा विमुक्त रहकर यह आत्मा जब अस्वरूप, पुण्यापुण्य से रहित हो जाता है तो उस अवस्था को सुषुप्ति कहते हैं। सब उपाधियों से मुक्त, आनन्द, निर्गुण, विभु, पर ब्रह्ममय देव ही सुषुप्त कहा जाता है ॥१७-१८॥ इसलिए हे विप्रेन्द्र ! यह स्थावर जंगमात्मक जगत् चंचला के समान चंचल है, इसलिए तुम अपनी भावना में सर्वदा ईश्वर का भजन करो ॥१९॥ जिसके पास अहिंसा, सत्य, अस्तेय और अपरिग्रह की निधि है उसी पर लोक-प्रभु प्रसन्न रहते हैं ॥२०॥ सब प्राणियों पर दया करने वाले, विप्र- पूजा परायण व्यक्ति पर मधु कैटभसंहारी विष्णु सर्वदा प्रसन्न रहते हैं ॥२१॥ जो सत्कथा में सर्वदा रमता रहता, सर्वदा सत्कथा को ही सुनता रहता और अहंकार रहित होकर सत्संगति से प्रेम करता है उसके ऊपर रमापति भगवान् प्रसन्न होते हैं ॥२२॥ जो भूख, प्यास और वाक् स्खलन के समय भी विष्णु का नाम स्मरण करता है, उसके ऊपर भगवान् अधोक्षज प्रसन्न रहते हैं ॥२३॥ मुने ! जो नारी पतिव्रता और पतिपूजा परायण होती है, उस पर भगवान् प्रसन्न होकर परमपद दे देते हैं ॥२४॥ जो ईर्ष्या और अहंकार से दूर रह कर देव-पूजा में सर्वदा लगे रहते
२२२ नारदीयपुराणम्
तस्माच्छृणुष्व देवर्षे भजस्व सततं हरिम् । मा कुरुष्व ह्यहंकारं विद्युल्लोलश्रिया वृथा ॥२६॥ शरीरं मृत्युसंयुक्तं जीवितं चातिचञ्चलम् । राजादिभिर्धनं बाध्यं सम्पदः क्षणभंगुराः ॥२७॥ किं न पश्यसि देवर्षे ह्यायुषार्द्धं तु निद्रया । हृतं च भोजनाद्यैश्च कियदायुः समाहृतम् ॥२८॥ कियदायुर्बालभावाद् वृद्धावाक्यिद्वृथा । कियदिन्द्रियभोगैश्च कदा धर्मान्करिष्यति ॥२९॥ बालभावे च वार्द्धक्ये न घटेताच्युतार्चनम् । वयस्येव ततो धर्मान्कुरु त्वमनहंकृतः ॥३०॥ मा विनाशं व्रज मुने मग्नः संसारगह्वरे । वपुर्विनाशनिलयमपदां परमं पदम् ॥३१॥ शरीरं भोगनिलयं मलाद्यैः परिदूषितम् । किमर्थं शाश्वतधिया कुर्यात्पापं नरो वृथा ॥३२॥ आसारभूते संसारे नानादुःखसमन्विते । विश्वासो नात्र कर्तव्यो निश्चितं मृत्युसंकुले ॥३३॥ तस्माच्छृणुष्व विप्रेन्द्र सत्यमेतद्ब्रवीम्यहम् । देहयोगनिवृत्त्यर्थं सद्य एव जनार्दनम् ॥३४॥ मानं त्यक्त्वा तथा लोभं कामक्रोधविवर्जितः । भजस्व सततं विष्णुं मानुष्यमतिदुर्लभम् ॥३५॥ कोटिजन्मसहस्रेषु स्थावरादिषु सत्तम । संभ्रांतस्य तु मानुष्यं कथंचित्परिलभ्यते ॥३६॥ तत्रापि देवताबुद्धिर्दानबुद्धिश्च सत्तम । भोगबुद्धिस्तथा नृणां जन्मान्तरतपःफलम् ॥३७॥ मानुष्यं दुर्लभं प्राप्य यो हरिं नार्चयेत्सकृत् । मूर्खः कोऽस्ति परस्तस्माज्जडबुद्धिरचेतनः ॥३८॥ दुर्लभं प्राप्य मानुष्यं नार्चयन्ति च ये हरिम् । तेषामतीव मूर्खाणां विवेकः कुत्र तिष्ठति ॥३९॥ आराधितो जगन्नाथो ददात्यभिमतं फलम् । कस्तं न पूजयेद्विप्रसंसाराग्निप्रदीपितः ॥४०॥
हैं उन पर केशव सदा प्रसन्न रहते हैं ॥२५॥ इसलिए, देवर्षिनारद ! सुनो, तुम सर्वदा हरि को भजो, विद्युत के समान क्षणभंगुर सम्पत्ति को पाकर कभी भी अहंकार न करो ॥२६॥ यह शरीर सर्वदा मृत्यु से घिरा रहता है, जीवन अत्यन्त चंचल है, राजा आदि से प्राप्त धन और संपत्ति सब कुछ क्षणभंगुर है ॥२७॥ देवर्षि ! क्या यह नहीं देखते कि आयु का आधा भाग निद्रा में ही चला जाता है, भोजन आदि में आयु का कितना अंश बीत जाता है यह भी प्रत्यक्ष ही है ॥२८॥ शैशव और बुढ़ापे में कितना व्यर्थ समय बीत जाता है ? कितना अंश तो विषय भोग में ही नष्ट हो जाता है तो बताओ कब तुम धर्माचरण करोगे ? ॥२९॥ बचपन और बुढ़ापे में भगवान् की पूजा तो हो नहीं सकती, इसलिए तुम युवावस्था में ही धर्माचरण करो ॥३०॥ मुनिवर ! इस संसार- कुण्ड में मग्न होकर आत्मविनाश मत करो। यह शरीर विनाश का घर है और आपत्तियों का परम स्थान है ॥३१॥ यह शरीर विषय भोग का अड्डा है और मलमूत्र आदि से दूषित है। इसलिए मनुष्य व्यर्थ में इसको शाश्वत समझकर क्यों पाप करे ? ॥३२॥ इस असार, नाना दुःखों से भरे और मृत्यु पाश में बँधे हुए संसार का विश्वास नहीं करना चाहिए ॥३३॥ विप्रेन्द्र ! इसलिए सुनो, तुमसे यथार्थ बात बता रहा हूँ। इस जन्म मृत्यु से मुक्ति पाने के लिए तत्काल अहंकार और लोभ को छोड़कर कामक्रोध को दूर हटाकर जनार्दन विष्णु को सर्वदा भजो । मानव-जीवन सचमुच ही अत्यन्त दुर्लभ है ॥३४-३५॥ मुनिश्रेष्ठ ! स्थावरादि योनियों में करोड़ों जन्म तक भ्रमण करने के बाद कहीं किसी प्रकार मानव-जीवन प्राप्त होता है। इस जीवन में भी देवों में श्रद्धा, दान की प्रवृत्ति और भोगबुद्धि मनुष्यों को जन्मान्तर की तपस्या से प्राप्त होती है ॥३६-३७॥ जो दुर्लभ मनुष्य देह प्राप्त करके हरि की एक बार भी पूजा नहीं करता उससे बढ़कर जड़बुद्धि, चेतनाहीन और मूर्ख कौन होगा ? ॥३८॥ जो दुर्लभ मानव जीवन को पाकर हरि की पूजा नहीं करते उन प्रचण्ड मूर्खों का विवेक कहाँ रहता है ? ॥३९॥ पूजा द्वारा भगवान् जगन्नाथ संतुष्ट होकर मनुष्य को इष्ट फल प्रदान करते हैं, विप्र ! तो कौन ऐसा होगा जो संसार ज्वाला से दग्ध होकर भी भगवदाराधना करना नहीं चाहेगा ? ॥४०॥ मुनिश्रेष्ठ ! चाण्डाल
चतुस्त्रिंशोऽध्यायः २२३ चंडालोऽपि मुनिश्रेष्ठ विष्णुभक्तो द्विजाधिकः । विष्णुभक्तिविहीनश्च द्विजोऽपि श्वपचाधमः ॥४१॥ तस्मात्कामादिकं त्यक्त्वा भजेत हरिमव्ययम् । यस्मिंस्तुष्टेऽखिलं तुष्येद्यतः सर्वगतो हरिः ॥४२॥ यथा हस्तिपदे सर्वं पदमात्रं प्रलीयते । तथा चराचरं विश्वं विष्णावेव प्रलीयते ॥४३॥ आकाशेन यथा व्याप्तं जगत्स्थावरजंगमम् । तथैव हरिणा व्याप्तं विश्वमेतच्चराचरम् ॥४४॥ जन्मनो मरणं नृणां जन्म वै मृत्युसाधनम् । उभे ते निकटे विद्धि तन्नाशं हरिसेवया ॥४५॥ ध्यातः स्मृतः पूजितो वा प्रणतो वा जनार्दनः । संसारपाशविच्छेदी कस्तं न प्रतिपूजयेत् ॥४६॥ यन्नामोच्चारणादेव महापातकनाशनम् । यं समभ्यर्च्य विप्रर्षे मोक्षभागी भवेन्नरः ॥४७॥ अहो चित्रमहो चित्रमहो चित्रमिदं द्विज । हरिनाम्नि स्थिते लोकः संसारे परिवर्तते ॥४८॥ भूयोभूयोऽपि वक्ष्यामि सत्यमेतत्तपोधन । नीयमानो यमभटैरशक्तो धर्मसाधनैः ॥४६॥ यावन्नेन्द्रियवैकल्यं यावद्व्याधिर्न बाधते । तावदेवार्चयेद्विष्णुं यदि मुक्तिमभीप्सति ॥५०॥ मातुर्गर्भाद्विनिष्क्रान्तो यदा जन्तुस्तदैव हि । मृत्युः संनिहितो भूयात्तस्माद्धर्मपरो भवेत् ॥५१॥ अहो कष्टमहो कष्टमहोकष्टमिदं वपुः । विनश्वरं समाज्ञाय धर्मं नैवाचरत्ययम् ॥५२॥ सत्यं सत्यं पुनः सत्यमुद्धृत्य भुजमुच्यते । दम्भाचारं परित्यज्य वासुदेवं समर्चयेत् ॥५३॥ भूयो भूयो हितं वच्मि भुजमुद्धृत्य नारद । विष्णुः सर्वात्मना पूज्यस्त्याज्यासूया तथानृतम् ॥५४॥ क्रोधमूलो मनस्तापः क्रोधः संसारबन्धनम् । धर्मक्षयकरः क्रोधस्तस्मात्तं परिवर्जयेत् ॥५५॥ भी यदि विष्णु भक्त है तो वह ब्राह्मणों से श्रेष्ठ है, विष्णु भक्ति के बिना ब्राह्मण श्वपच (चाण्डाल) से भी गया बीता है ॥४१॥ इन कामादि दोषों को छोड़कर अव्यय हरि का भजन करना चाहिए, जिसके प्रसन्न हो जाने पर सब देवता प्रसन्न हो जाते हैं क्योंकि विष्णु तो सर्वदेवमय और व्यापक हैं ॥४२॥ जिस प्रकार हाथी के पैर में सब जन्तुओं के पैर विलीन हो जाते हैं अर्थात् बड़े होने के कारण उसके पदचिह्न में सब जन्तुओं के पद चिह्न समा- विष्ट हो जाते हैं ॥४३॥ जिस प्रकार आकाश से सारा स्थावर जंगमात्मक जगत् व्याप्त है उसी प्रकार भगवान् से यह सचराचर जगत् व्याप्त है ॥४४॥ मनुष्यों का जन्म मृत्यु का और मृत्यु जन्म का साधन है । इन दोनों का निकटतम संबन्ध है । इस जन्म मृत्यु का नाश केवल हरि की सेवा से ही हो सकता है ॥४५॥ जनार्दन के ध्यान, स्मरण, पूजा और वन्दना से संसार बन्धन से छुटकारा अवश्य मिल जाता है । इसलिए कौन ऐसा अभागा होगा जो उसकी पूजा नहीं करेगा ? जिसके नामोच्चारण मात्र से महापातक नष्ट हो जाते हैं, विप्रर्षि ! जिसकी अर्चना करने से मनुष्य मोक्षभागी होता है उसकी पूजा मनुष्य क्यों न करे ॥४६-४७॥ द्विज ! यह आश्चर्य की बात है, अत्यन्त आश्चर्य है कि हरिनाम के रहते हुए भी मनुष्य संसार सागर में डूबता रहता है । तपोधन ! यह मैं बार-बार जोर देकर कहा रहा हूँ यह सत्य है कि धर्म साधन से हीन प्राणी यम दूतों द्वारा तो जाया जाता है ॥४८-४६॥ जब तक इन्द्रियां शिथिल नहीं है, जब तक शरीर रोग ग्रस्त नहीं है तब तक ही मोक्षाभिलाषी मनुष्य विष्णु की पूजा कर ले ॥५०॥ ज्यों ही जीव माता के गर्भ से बाहर आता है त्योंही मृत्यु उसके पीछे लग जाती है इसलिए सर्वदा धर्म तत्पर रहना चाहिए ॥५१॥ यह अत्यन्त खेद का विषय है कि इस शरीर को नश्वर समझकर भी मनुष्य धर्माचरण नहीं करता है ॥५२॥ मैं भुजा उठाकर यह घोषणा करता हूँ कि मनुष्य दंभाचार को छोड़ कर वासुदेव की पूजा करे यह एक चिर सत्य सिद्धान्त है ॥५३॥ नारद ! मैं भुजा उठाकर बार बार इस हितकर वचन को कह रहा हूँ कि विष्णु की सर्वतोभावेन पूजा करनी चाहिए, असूया और असत्य को पास नहीं फटकने देना चाहिए ॥५४॥ क्रोध से मनः सन्ताप होता है और क्रोध ही संसार-बन्धन का कारण है । क्रोध से ही धर्म क्षय भी होता है, काम इस जन्म का कारण है और काम ही पाप का कारण है । यश को नष्ट करने वाला भी काम
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२२४ नारदीयपुराणम् काममूलमिदं जन्म कामः पापस्य कारणम् । यशः क्षयकरः कामस्तस्मात्तं परिवर्जयेत् ॥५६॥ समस्तदुःखजालानां मात्सर्यं कारणं स्मृतम् । नरकाणां साधनं च तस्मात्तदपि संत्यजेत् ॥५७॥ मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः । तस्मात्तदमिसंयोज्य परात्मनि सुखी भवेत् ॥५८॥ अहो धैर्पमहो धैर्यमहो धैर्यमहो नृणाम् । विष्णौ स्थिते जगन्नाथे न भजंति मदोद्धता ॥५६॥ अनाराध्य जगन्नाथं सर्वधातारमच्युतम् । संसारसागरे मग्नाः कथं पारं प्रयांति हि ॥६०॥ अच्युतानंदगोविंदनामोच्चारणभेषजात् । नश्यंति सकला रोगाः सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥६१॥ नारायण जगन्नाथ वासुदेव जनार्दन । इतीरयन्ति ये नित्यं ते वै सर्वत्र वन्दिताः ॥६२॥ अद्यापि च मुनिश्रेष्ठ ब्रह्माद्या अपि देवताः । यत्प्रभावं न जानन्ति तं याहि शरणं मुने ॥६३॥ अहो मौर्यमहो मौर्यमहो मौर्य दुरात्मनाम् । हृत्पद्मसंस्थितं विष्णुं न विजानन्ति नारद ॥६४॥ शृणुष्व मुनिशार्दूल भूयोभूयो वदाम्यहम् । हरिः श्रद्धावतां तुष्येन्न धनेर्न च बान्धवैः ॥६५॥ बन्धुमत्त्वं धनाढ्यत्वं पुत्रवत्त्वं च सत्तम । विष्णुभक्तिमतां नॄणां भवेज्जन्मनि जन्मनि ॥६६॥ पापमूलमयं देहः पापकर्मरतस्तथा । एतद्विदित्वा सततं पूजनीयो जनार्दनः ॥६७॥ पुत्रमित्रकलत्राद्या बहवः स्युश्च संपदः । हरिपूजारतानां तु भवत्येव न संशयः ॥६८॥ इहामुत्र सुखप्रेप्सुः पूजयेत्सततं हरिम् । इहामुत्रासुखप्रेप्सुः परनिन्दापरो भवेत् ॥६६॥ धिग्जन्म भक्तिहीनानां देवदेवे जनार्दने । सत्पात्रदानशून्यं यत्तद्धनं धिक्पुनः पुनः ॥७०॥ न नमेद्विष्णवे यस्य शरीरं कर्मभेदिने । पापानामाकरं तद्वै विज्ञेयं मुनिसत्तम ॥७१॥ ही है, इसलिए काम को कभी भी पास न आने दो ॥५५-५६॥ मात्सर्य समस्त दुःख-समूह का एक मात्र कारण है। यही नरकों की ओर भी ले जाने वाला है। इसलिए इसको भी छोड़ दो ॥५७॥ मन ही मनुष्यों के बन्धन और मोक्ष का कारण है इसलिए इसको परमात्मा में लगा कर सुखी होना चाहिए ॥५८॥ अहो ! यह मनुष्यों की आश्च- चर्य जनक जड़ता या धीरता है कि जगत्पति विष्णु के रहते हुए भी मनुष्य मदोद्धत होकर उनका भजन नहीं करते ॥५६॥ सबके पालक जगन्नाथ की आराधना के बिना संसार-सागर में डूबे हुए मनुष्य कैसे भवसागर के पार जा सकते हैं ? ॥६०॥ यह सत्य कह रहा हूँ, सत्य कह रहा हूँ कि अच्युतानन्द, गोविन्दनामोच्चारण रूपी ओषधि से ही संसार के सब रोग नष्ट होते हैं ॥६१॥ नारायण, जगन्नाथ, वासुदेव, जनार्दन आदि नामों का जो उच्चारण करते हैं वे सर्वत्र सम्मानित होते हैं ॥६२॥ मुनिश्रेष्ठ ! आजतक ब्रह्मा आदि देवता जिसके प्रभाव को नहीं जानते हैं, मुने ! उसी की शरण में जाओ ॥६३॥ नारद ! दुष्टों की यह कितनी बड़ी मूर्खता है कि हृदय रूपी कमल में स्थित विष्णु को वे नहीं जानते ॥६४॥ मुनिशार्दूल ! सुनो, मैं यह बार बार कह रहा हूँ कि भगवान् श्रद्धालु भक्तों पर ही प्रसन्न होते हैं धन और बड़े परिवार वाले मनुष्य पर नहीं ॥६५॥ सज्जनाग्रणी ! विष्णु-भक्तों को जन्म जन्मान्तर में कुटुम्ब, धन, पुत्र आदि प्राप्त होते हैं ॥६६॥ यह मानव शरीर पापों का मूल है और इसके द्वारा सर्वदा पाप कर्मों में अभिरुचि बनी रहती है, यह जानकर जनार्दन की सर्वदा पूजा करनी चाहिए ॥६७॥ पुत्र, मित्र, कलत्र आदि और बहुत प्रकार की संपत्तियां हरिपूजापरायण व्यक्तियों को अवश्य प्राप्त होती हैं ॥६८॥ लोक, परलोक सर्वत्र सुख चाहने वाला व्यक्ति हरि की सर्वदा पूजा करे और कष्ट चाहने वाला दूसरों की निन्दा किया करे ॥६९॥ देवाधिदेव जनार्दन की भक्ति न करने वाले व्यक्ति के जीवन को धिक्कार है और सत्पात्र को दान न देने वाले के धन को बार बार धिक्कार है ॥७०॥ मुनिश्रेष्ठ ! कर्म बन्धन से छुटकारा दिलाने वाले विष्णु के सामने जिसका शरीर नहीं झुका उसको पापों की खान समझना चाहिए ॥७१॥ सत्पात्र को
पञ्चविंशोऽध्यायः २२५ सत्पात्रदानरहितं यद्द्रव्यं येन रक्षितम् । चौर्येण रक्षितमिव विद्धि लोकेषु निश्चितम् ॥७२॥ तडिल्लोलश्रिया मत्ताः क्षणभंगुरशालिनः । नाराधयंति विश्वेशं पशुपालविमोचकम् ॥७३॥ सृष्टिस्तु द्विविधा प्रोक्ता दैवासुरविभेदतः । हरिभक्तियुता दैवी तद्धीनाह्यासुरो मता ॥७४॥ तस्माच्छृणुष्व विप्रेन्द्र हरिभक्तपरायणाः । श्रेष्ठाः सर्वत्र विख्याता यतो भक्तिः सुदुर्लभा ॥७५॥ असूयारहिता ये च विप्रत्राणपरायणाः । कामादिरहिता ये च तेषां तुष्यति केशवः ॥७६॥ संमार्जनादिना ये तु विष्णुशुश्रूषणे रताः । सत्पात्रदाननिरताः प्रयांति परमं पदम् ॥७७॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे हरिभक्तिलक्षणं नाम चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥३४॥ अथ पञ्चत्रिंशोऽध्यायः सनक उवाच पुनर्वक्ष्यामि माहात्म्यं देवदेवस्य चक्रिणः । पठतां शृण्वतां सद्यः पापराशिः प्रणश्यति ॥१॥ शांता जितारिषड्वर्गा योगेनाप्यनहंकृताः । यजंति ज्ञानयोगेन ज्ञानरूपिणमव्ययम् ॥२॥ तीर्थस्नानर्विशुद्धा ये व्रतदानतपोमखैः । यजंति कर्मयोगेन सर्वधातारमच्युतम् ॥३॥ दान न देकर जिस द्रव्य को सुरक्षित रखा गया उसको संसार में चोर की कमाई हुई और उसके द्वारा रक्षित संपत्ति समझना चाहिए ॥७२॥ बिजली के समान चंचल शोभा वालो लक्ष्मी को पाकर मदमत्त हो जाने वाले मरणशील प्राणी पशु आदि योनियों से मुक्त करने वाले विश्वेश की आराधना नहीं करते हैं, यह एक दुर्भाग्य की बात है ॥७३॥ दैव और आसुर भेद से सृष्टि दो प्रकार की होतो है। हरि भक्ति से युक्त सृष्टि दैवी और इससे शून्य सृष्टि आसुरी मानी जाती है ॥७४॥ विप्रेन्द्र ! इसलिए सुनो, हरिभक्तिपरायण मनुष्य सर्वत्र आदर पाते हैं ; क्योंकि भक्ति संसार में अत्यन्त दुर्लभ पदार्थ है ॥७५॥ जो ईर्ष्या द्वेष से दूर रहते, और सदा ब्राह्मणों की रक्षा करने के लिए प्रस्तुत रहते हैं और काम आदि दोषों से अलग रहते हैं उनसे केशव सदा प्रसन्न रहते हैं ॥७६॥ जो मन्दिर की झाड़ू आदि से सफाई कर भगवान् को सेवा किया करते हैं और सत्पात्रों को दान दिया करते हैं, वे परम पद को प्राप्त करते हैं ॥७७॥ श्रीनारदीयमहापुराण में हरिभक्तिलक्षणवर्णन नामक चौतीसवां अध्याय समाप्त ॥३४॥ अध्याय ३५ ज्ञान का निरूपण सनक बोले--अब इसके बाद फिर मैं देवों के देव भगवान् विष्णु का माहात्म्य कह रहा हूँ जिसको सुनने और पढ़ने से शीघ्र ही पाप-समूह नष्ट हो जाता है ॥१॥ शान्त, काम, क्रोध आदि छह शत्रुओं को जीतने वाले और योग के द्वारा अहंकार पर विजय पाने वाले महापुरुष ज्ञान योग के द्वारा ज्ञान रूप अव्यय परमात्मा की आराधना करते हैं ॥२॥ जिनका तीर्थ, स्नान, व्रत, दान, तपस्या और यज्ञों से अन्तःकरण विशुद्ध है वे कर्मयोग से निखिल भुवन पालक भगवान् की आराधना करते हैं ॥३॥ २९-मार०
२२६ नारदीयपुराणम् लुब्धा व्यसनिनोऽज्ञाश्च न यजन्ति जगत्पतिम् । अजरामरवन्मूढास्तिष्ठंति नरकीटकाः ॥४॥ तडिल्लेखाश्रिया मत्ता वृथाहंकारदूषिताः । न यजन्ति जगन्नाथं सर्वश्रेयोविधायकम् ॥५॥ हरिधर्मरताः शांता हरिपादाम्बुजसेवकाः । दैवात्केऽपीह जायंते लोकानुग्रहतत्पराः ॥६॥ कर्मणा मनसा वाचा यो यजेद्भक्तितो हरिम् । स याति परमं स्थानं सर्वलोकोत्तमोत्तमम् ॥७॥ अत्रैवोदाहरंतीममितिहासं पुरातनम् । पठतां शृण्वतां चैव सर्वपापप्रणाशनम् ॥८॥ तत्प्रवक्ष्यामि चरितं यज्ञमालिसुमालिनोः । यस्य श्रवणमात्रेण वाजिमेधफलं लभेत् ॥९॥ कश्चिदासीत्पुरा विप्र ब्राह्मणो रैवतेंऽतरे । वेदमालिरिति ख्यातो वेदवेदांगपारगः ॥१०॥ सर्वभूतदयायुक्तो हरिपूजापरायणः । पुत्रमित्रकलत्रार्थं धनार्जनपरोऽभवत् ॥११॥ अपण्यविक्रयं चक्रे तथा च रसविक्रयम् । चंडालाद्यैरपि तथा संभावी तत्प्रतिग्रही ॥१२॥ तपसां विक्रयं चक्रे व्रतानां विक्रयं तथा । परार्थे तीर्थगमनं कलत्रार्थमकारयत् ॥१३॥ कालेन गच्छता विप्र जातौ तस्य सुतावुभौ । यज्ञमाली सुमाली च यमलावतिशोभनौ ॥१४॥ ततः पिता कुमारौ तावतिस्नेहसमन्वितः । पोषयामास वात्सल्याद्बहुभिः साधनैस्तदा ॥१५॥ वेदमालिर्बहुपायैर्धनं संपाद्य यत्नतः । स्वधनं गणयामास कियत्स्यादिति वेदितुम् ॥१६॥ निधिकोटिसहस्राणां कोटिकोटिगुणान्वितम् । विगणय्य स्वयं हृष्टो विस्मितश्चार्थचिंतया ॥१७॥ लोभी, व्यसनप्रिय और अज्ञानी जगत्पति की पूजा नहीं करते। ऐसे नरपशु उलटे अपने को अजर-अमर समझकर जड़ की भाँति पड़े रहते हैं। विद्युल्लेखा के समान चंचल लक्ष्मी से मतवाले और व्यर्थ अहंकार से दूषित लोग सर्वकल्याणकारी संसार के स्वामी भगवान् की पूजा नहीं करते हैं ॥४॥ भगवान् की कृपा से ही वैष्णव, शान्त, भगवान्, के चरण कमल की सेवा करने वाले, तथा लोककल्याणकारी कुछ महापुरुष इस लोक में जन्म लेते हैं ॥५-६॥ जो मन, वचन और कर्म से भगवान् हरि की उपासना करते हैं वे सब लोकों से श्रेष्ठ स्थान को प्राप्त करते हैं ॥७॥ इस विषय में एक पुरातन इतिहास को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करते हैं जिसके पठन और श्रवण से सब पाप नष्ट हो जाते हैं। मैं उस यज्ञमाली और सुमाली के चरित्र को सुना रहा हूँ जिसके सुनने से ही अश्वमेध का फल प्राप्त हो जाता है ॥८-६॥ विप्र ! बहुत दिनों की बात है, रैवत प्रदेश में एक ब्राह्मण रहता था। उसका नाम वेदमालि था जो वेद-वेदांगों का पारगामी विद्वान् था। वह हरि-पूजा का प्रेमी और सब प्राणियों पर दया करने वाला व्यक्ति था। कुछ समय के बाद वह पुत्र, मित्र और स्त्री के पालन के लिए धन कमाने के फेर में पड़ा ॥१०-११॥ अपने कुल-धर्म की ओर ध्यान न देकर उसने निषिद्ध वस्तुओं और रस (मद्य) को बेचा। लोभ में पड़कर चाण्डाल आदि से बात-चीत करता और उनसे दान भी लेता था। पैसे के लिए दूसरे के निमित्त तीर्थ यात्रा भी करता था ॥१२-१३॥ विप्र ! कुछ समय बीतने पर उसको यज्ञमाली और सुमाली नामक दो अत्यन्त सुन्दर जुड़वां पुत्र उत्पन्न हुए। तदनन्तर वेद माली ने उन दोनों पुत्रों को बड़े प्यार से प्रत्येक सम्भवसाधनों से पालन पोषण किया ॥१४-१५॥ उसने बड़े परिश्रम से अनेकों उपायों से धन कमाया। एक दिन वह अपनी उपार्जित सम्पति का ठीक ठीक परिमाण जानने के लिए अपने धन को गिनने लगा। हजारों करोड़ों की संख्या में अपनी संपत्ति को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ और फिर भी अर्थलोभ की ओर अपने मन को खिचाव देखकर विस्मित होकर सोचने लगा ॥१६-१७॥
पञ्चत्रिंशोऽध्यायः २२७ असत्प्रतिग्रहैश्चैव अपण्यानां च विक्रयैः । मया तपो विक्रयाद्यैरेतद्धनमुपार्जितम् ॥१८॥ नाद्यापि शांतिमापन्ना मम तृष्णातिदुःसहा । मेरुतुल्यसुवर्णानि ह्यसंख्यातानि वांछति ॥१९॥ अहो मन्ये महाकष्टं समस्तक्लेशसाधनम् । सर्वान्कामानवाप्नोति पुनरन्यच्च कांक्षति ॥२०॥ जीर्यति जीर्यतः केशा दंता जीर्यंति जीर्यतः । चक्षुःश्रोत्रे च जीर्येते तृष्णैका तरुणायते ॥२१॥ ममेंद्रियाणि सर्वाणि मंदभावं व्रजंति च । बलं हतं च जरसा तृष्णा तरुणतां गता ॥२२॥ कष्टआशा वर्त्तते यस्य स विद्वानथ पंडितः । सुशांतोऽपि प्रमन्युः स्याद्धीमानप्यतिमूढधीः ॥२३॥ आशा भंगकरी पुंसामजेयारातिसन्निभा । तस्मादाशां त्यजेत्प्राज्ञो यदिच्छेच्छाश्वतं सुखम् ॥२४॥ बलं तेजो यशश्चैव विद्यां मानं च वृद्धताम् । तथैव सत्कुले जन्म आशा हंत्यतिवेगतः ॥२५॥ नृणामाशाभिभूतानामाश्चर्यमिदमुच्यते । किंचिद्दातापि चांडालस्तस्मादधिकतां गतः ॥२६॥ आशाभिभूता ये मर्त्या महामोहा महोद्धताः । अवमानादिकं दुःखं न जानंति कदाप्यहो ॥२७॥ मयाप्येवं बहुक्लेशैरेतद्धनमुपार्जितम् । शरीरमपि जीर्णं च जरसापहृतं बलम् ॥२८॥ इतः परं यतिष्यामि परलोकार्थमादरात् । एवं निश्चित्य विप्रेंद्र धर्ममार्गरतोऽभवत् ॥२९॥ तदैव तद्धनं सर्वं चतुर्द्धा व्यभजत्तथा । स्वयं तु भागद्वितयं स्वार्जितादर्थादपाहरत् ॥३०॥ शेषं च भागद्वितयं पुत्रयोरुभयोर्ददौ । स्वेनार्जितानां पापानां नाशं कर्तुमनास्तदा ॥३१॥ प्रपातडागारामंश्च तथा देवगृहान्बहून् । अन्नादीनां च दानानि गंगातीरे चकार सः ॥३२॥ "आश्चर्य है कि मैंने असत् पात्रों से दान लिया, निषिद्ध वस्तुओं को बेंचा और अपनी तपस्या को बेंचा । इसप्रकार मैंने इतनी संपत्ति प्राप्त की । परन्तु अब तक मुझको शान्ति नहीं मिली प्रत्युत दिनानुदिन दुःसह तृष्णा होती जाती है । सुमेरु के बराबर असंख्य सुवर्ण राशि की इच्छा होती है ॥१८-१९॥ अहो ! यह बड़े कष्ट की बात है और समस्त दुःखों का यही एक मात्र कारण है कि मनुष्य ज्यों-ज्यों अपने मनोरथों को पाता जाता है त्यों-त्यों नई-नई आकांक्षायें बढ़ती जाती हैं । बुढ़ापे में बाल सफेद हो जाते, दांत टूट जाते, आँखें और कान भी जवाब दे देते हैं परन्तु केवल एक तृष्णा ही तरुण होती जाती है, अर्थात् बुढ़ापे में सब अंग तो शिथिल हो जाते पर तृष्णा बढ़ती ही जाती है ॥२०-२१॥ मेरी सब इन्द्रियाँ तो धीरे-धीरे शिथिल हो रही हैं, बुढ़ापे के कारण शक्ति भी नहीं रह गई परन्तु केवल तृष्णा नवीन होती जा रही है जिसको यह कष्ट दायिनी आशा (तृष्णा) हो जाती है चाहे वह विद्वान् हो, पंडित हो, परमधीर हो परन्तु वह भी क्रोधी हो जाता है, बुद्धिमान् भी इसके आगे मूढ़ हो जाता है ॥२२-२३॥ आशा पुरुषों को विनष्ट करने वाली है, अजेय है और शत्रु के समानघातक है; इसलिए शाश्वत सुख की इच्छा करने वाले मनस्वी जन यदि अपना कल्याण चाहते हों तो तृष्णा को अवश्य छोड़ दें ॥२४॥ बल, तेज, यश, विद्या, गर्व, वृद्धता और उसी प्रकार कुलीनता आदि को आशा शीघ्र नष्ट कर देती है ॥२५॥ आशा के बन्धन में बंधे मनुष्यों की स्थिति देखकर आश्चर्य के साथ कहना पड़ता है कि थोड़ा धन दान करने वाले चाण्डाल से दान लेकर उन्होंने अपने को चाण्डाल से भी हीन बना दिया ॥२६॥ जो मनुष्य आशा से अभिभूत, महामोह में पड़े मदोद्धत हैं वे अपमान आदि के दुःखों को कभी भी नहीं जानते हैं ॥२७॥ मैंने इसी प्रकार अत्यन्त कष्ट सहकर इतनी प्रचुर संपत्ति कमाई है, इसी कार्य में शरीर भी जीर्ण हो गया, बुढ़ापे से सारी शक्ति भी नष्ट हो गई ॥२८॥ अब इसके बाद मैं अवश्य श्रद्धापूर्वक परलोक-कल्याण के लिए प्रयत्न करूँगा । विप्रेन्द्र ! ऐसा निश्चय कर वह धर्म-कार्यों में लग गया ॥२९॥ उसी समय उसने अपने धन को चार भागों में बाँटा । अपनी अर्जित संपत्ति में से दो भाग स्वयं लिये और शेष दो भाग अपने दोनों पुत्रों को दे दिये । अपने किये हुए पापों को नष्ट करने के उद्देश्य से उसने बहुत स्थानों पर प्याऊ बैठाए, धर्मशालायें, उपवन और देवमन्दिर बनवाये,
२२८ नारदीयपुराणम् एवं धनमशेषं च विश्राण्य हरिभक्तिमान् । नरनारायणस्थानं जगाम तपसे वनम् ॥३३॥ तत्रापश्यन्महार्म्यमाश्रमं मुनिसेवितम् । फलितैः पुष्पितैश्चैव शोभितं वृक्षसंचयैः ॥३४॥ गृणद्भिः परमं ब्रह्म शास्त्रचिंतापरैस्तथा । परिचर्यापरैर्वृद्धैर्मतिभिः परिशोभितम् ॥३५॥ शिष्यैः परिवृतं तत्र मुनिं जानंति संज्ञकम् । गृणंतं परमं ब्रह्म तेजोराशिं ददर्श ह ॥३६॥ शमादिगुणसंयुक्तं रागादिरहितं मुनिम् । शीर्णपर्णाशनं दृष्ट्वा वेदमालिर्ननाम तम् ॥३७॥ तस्य जानन्तिरागतोः कल्पयामास चार्हणम् । कंदमूलफलाद्यैस्तु नारायणधिया मुने ॥३८॥ कृतातिथ्यक्रियस्तेन वेदमाली कृतांजलिः । विनयावनतो भूत्वा प्रोवाच वदतां वरम् ॥३९॥ भगवन्कृतकृत्योऽस्मि विगते कल्मषं मम । मामुद्धर महाभाग ज्ञानदानेन पंडित ॥४०॥ एवमुक्तस्ततस्तेन जानन्तिर्मु निसत्तमः । प्रोवाच प्रहसन्वाग्मी वेदमालिं गुणान्वितम् ॥४१॥ शृणुष्व विप्रशार्दूल संसारच्छेदकारणम् । प्रवक्ष्यामि समासेन दुर्लभं त्वकृतात्मनाम् ॥४२॥ भज विष्णुं परं नित्यं स्मर नारायणं प्रभुम् । परापवादं पैशुन्यं कदाचिदपि मा कृथाः ॥४३॥ परोपकारनिरतः सदा भव महामते । हरिपूजाकरश्चैव त्यज मूर्खसमागमम् ॥४४॥ कामं क्रोधं च लोभं च मोहं च मदमत्सरौ । परित्यज्यात्मवल्लोकं दृष्ट्वा शांतिं गमिष्यसि ॥४५॥ असूयां परनिन्दां च कदाचिदपि मा कुरु । दंभाचारमहंकारं नैष्ठुर्यं च परित्यज ॥४६॥ दयां कुरुष्व भूतेषु शुश्रूषां च तथा सताम् । त्वया कृतांश्च धर्मान्त्वं मा प्रकाशय पृच्छताम् ॥४७॥ गंगा के तट पर अन्नदान की व्यवस्था की ॥३०-३२॥ इस प्रकार अपना सारा धन हरिभक्तों को बाँट दिया और स्वयं नरनारायण के स्थान की ओर (बदरिकाश्रम) में तपस्या करने के लिए चला गया ॥३३॥ वहाँ वन में जाकर उसने मुनियों से सुशोभित अत्यन्त रमणीय आश्रम को देखा, जो फलफूलों से लदे हुए मनोहर वृक्षों से और अधिक रम्य जान पड़ता था ॥३४॥ उस आश्रम में परम ब्रह्म के गुणगान में निरत, शास्त्र चिन्तन में तल्लीन, भगवदाराधना में बेसुध वृद्ध तपस्वी मुनियों और शिष्यों से घिरे हुए जानंति नामक मुनि को देखा जिनकी सभी सेवा कर रहे थे । और जो स्वयं परम ब्रह्म का नाम जप करते हुए तेज पुंज के समान थे ॥३५-३६॥ हे मुनि ! शम आदि गुणों से युक्त, रागरहित और केवल सूखी पत्तियों को खाकर ही जीवन बिताने वाले उस मुनि को देखकर वेदमालि ने उन्हें प्रणाम किया और जानन्ति ने भी उस अतिथि वेदमाली का नारायण-भाव से कन्द मूल फल आदि के द्वारा सत्कार किया । वेदमाली मुनि का आतिथ्य स्वीकार करने के पश्चात् हाथ जोड़कर विनम्र भाव से उस वाग्मी शिरोमणि मुनि से बोला ॥३७-३६॥ भगवन् ! मैं कृतकृत्य हो गया, आपके दर्शन से मेरे सारे पाप दूर हो गए । पंडित ! महाभाग ! अब आप ज्ञान की दीक्षा देकर मेरा उद्धार कीजिए ॥४०॥ वेदमाली की इतनी बातें सुनकर वाग्मी मुनिवर हँस पड़े और उन्होंने उस गुणी अतिथि से कहा-॥४१॥ विप्रशार्दूल ! सुनो मैं भव बन्धन से मुक्त करने वाले उस ज्ञान को संक्षेप में सुना रहा हूँ, जो अविवेकियों के लिए सर्वथा दुर्लभ है । विष्णु का नित्य प्रति भजन करो, प्रभु नारायण का स्मरण करो और परनिन्दा तथा पिशुनता कभी भी न करो ॥४२-४३॥ महामति ! सदा परोपकार में लगे रहो, हरि पूजा को ही ध्येय समझो और मूर्खो की संगति न करो ॥४४॥ काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य को छोड़कर संसार को आत्मवत् समझो, ऐसे करने से तुम अवश्य शान्ति प्राप्त करोगे ॥४५॥ असूया और परनिन्दा कभी न करो । दंभ, अहंकार एवं निष्ठुरता को छोड़ दो, प्राणियों पर दया करो, सज्जनों की सेवा करो और अपने किये हुए धर्मों को पूछने पर अपने मुंह से न कहो ॥४६-४७॥ अपने सामने अनाचार होते देखकर शक्ति
पंचविंशोऽध्यायः २२६ अनाचारपरान्दृष्ट्वा नोपेक्षां कुरु शक्तितः । पूजयस्वातिथिं नित्यं स्वकुटुंबाविरोधतः ॥४८॥ पत्रैः पुष्पैः फलैर्वापि दूर्वाभिः पल्लवैरथ । पूजयस्व जगन्नाथं नारायणमकामतः ॥४९॥ देवान्ऋषीन्पितॄंश्चापि तर्पयस्व यथाविधि । अग्नेश्च विधिवद्विप्रं परिचर्यापरो भव ॥५०॥ देवतायतने नित्यं संमार्जनपरो भव । तथोपलेपनं चैव कुरुष्व सुसमाहितः ॥५१॥ शीर्णस्फुटितसंधानं कुरु देवगृहे सदा । मार्गशोभां च दीपं च विष्णोरायतने कुरु ॥५२॥ कंदमूलफलैर्वापि सदा पूजय माधवम् । प्रदक्षिणनमस्कारैः स्तोत्राणां पठनैस्तथा ॥५३॥ पुराणश्रवणं चैव पुराणपठनं तथा । वेदांतपठनं चैव प्रत्यहं कुरु शक्तितः ॥५४॥ एवं स्थिते तव ज्ञानं भविष्यत्युत्तमोत्तमम् । ज्ञानात्समस्तपापानां मोक्षो भवति निश्चितम् ॥५५॥ एवं प्रबोधितस्तेन वेदमालिर्महामतिः । तथा ज्ञानरतो नित्यं ज्ञानलेशमवाप्तवान् ॥५६॥ वेदमालिः कदाचित्तु ज्ञानलेशप्रचोदितः । कोऽहं मम क्रिया केति स्वयमेव व्यचिंतयत् ॥५७॥ मम जन्म कथं जातं रूपं कीदृग्विधं मम । एवं निवारणपरो दिवानिशमतंद्रितः ॥५८॥ अनिश्चितमतिर्भूत्वा वेदमालिद्विजोत्तमः । पुनर्जानंतिमागम्य प्रणम्येदमुवाच ह ॥५९॥ वेदमालिरुवाच ममचित्तमतिभ्रांतं गुरो ब्रह्मविदां वर । कोऽहं मम क्रिया का च मम जन्म कथं वद ॥६०॥ जानंतिरुवाच सत्यं सत्यं महाभाग चित्तं भ्रांतं सुनिश्चितम् । अविद्यानिलयं चित्तं कथं सद्भावमेष्यति ॥६१॥ रहते उपेक्षा न करो। अपने कुटुम्ब को कुछ हानि किये बिना अतिथि को नित्य सेवा करो । निष्काम भाव से पत्र, पुष्प, फल, दूर्वा और पल्लव से विधिपूर्वक भगवान् को पूजा करो। विधिपूर्वक देव, ऋषि और पितरों का तर्पण करो। विप्र ! विधिवत् अग्नि की पूजा करो ॥४८-५०॥ देवमन्दिर में जाकर नित्य प्रति झाडू लगाओ और एकाग्र होकर उसको लीपो-पोतो। सदा देवमन्दिर की दरार या जीर्ण भाग की मरम्मत करो, विष्णु-मन्दिर में दीपक जलाओ और वन्दनबार लगाकर द्वारों को सजाओ ॥५१-५२॥ कन्दमूल, फल, प्रदक्षिणा नमस्कार, स्तुतिपाठ आदि से माधव की पूजा करो। प्रतिदिन शक्ति के अनुसार पुराण श्रवण, पुराण पाठ और वेदान्त का अध्ययन करना चाहिए। ऐसा करने पर तुमको परमोत्तम ज्ञान प्राप्त होगा और ज्ञान द्वारा समस्त पापों से मुक्ति मिल जाती है यह निश्चित है ॥५३-५५॥ मुनि से इस प्रकार का उपदेश पाकर महामति वेदमालि जो पहले अज्ञानान्धकार में ही डूबा रहता था, ज्ञान का एक हल्का सा प्रकाश पा गया। किसी समय वह अपने उसी स्वल्पज्ञान की प्रेरणा से, मैं कौन हूँ, मेरा कर्त्तव्य क्या है, आदि बातों पर विचार करने लगा ॥५६-५७॥ (अनन्तर वह) प्रतिदिन आलस्य त्यागकर यही सोचा करता था कि 'मेरा जन्म कैसे हुआ, मेरा स्वरूप क्या है ? द्विजवर वेदमालि इन प्रश्नों का कोई निश्चित उत्तर न पाकर पुनः जानंति के पास आया और प्रणाम करके पूछा--॥५८-५९॥ वेदमालि ने पूछा-ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ ! गुरुदेव ! मेरा कर्त्तव्य क्या है, मुझे सन्देह हो गया है कि मैं कौन हूँ, मेरा जन्म कैसे हुआ और आप कृपा करके इस सन्देह का निराकरण कीजिए ॥६०॥ जानन्ति बोले-महाभाग ! यह सत्य है, तुम्हारा चित्त भ्रम में पड़ गया यह निश्चित हो है। अज्ञान का स्थान चित्त भला कैसे सद्भाव प्राप्त करेगा ॥६१॥ जो 'यह मेरा है' ऐसा कहा जाता है यह भी भ्रम है।
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२३० | नारदीयपुराणम् ममेति गदितुं यत् तदपि भ्रान्तिरिष्यते । अहंकारो मनोधर्म आत्मनो नहि पंडित ॥६२॥ पुनश्च कोऽहमित्युक्तं वेदमाले त्वया तु यत् । मम जात्यादि शून्यस्य कथं नाम करोम्यहम् ॥६३॥ अनौपम्यस्वभावस्य निर्गुणस्य परमात्मनः । नीरूपस्याप्रमेयस्य कथं नाम करोम्यहम् ॥६४॥ परज्योतिःस्वरूपस्य परिपूर्णव्ययात्मनः । अविच्छिन्नस्वभावस्य कथ्यते च कथं क्रिया ॥६५॥ स्वप्रकाशात्मनो चित्र नित्यस्य परमात्मनः । अनंतस्य क्रिया चैव कथं जन्म च कथ्यते ॥६६॥ ज्ञानैकवेद्यमजरं परं ब्रह्म सनातनम् । परिपूर्णं परानंदं तस्मान्नान्यदिह द्विज ॥६७॥ तत्त्वमस्यादिवाक्येभ्यो ज्ञानं मोक्षस्य साधनम् । ज्ञाने त्वनाहते सिद्धे सर्वं ब्रह्ममयं भवेत् ॥६८॥ एवं प्रबोधितस्तेन वेदमालिर्मुनीश्वर । सुमोद पश्यन्नात्मानमात्मन्येवाच्युतं प्रभुम् ॥६९॥ उपाधिरहितं ब्रह्म स्वप्रकाशं निरंजनम् । अहमेवेति निश्चित्य परां शांतिमवाप्तवान् ॥७०॥ ततश्च व्यवहारार्थं वेदमालिर्मुनीश्वरम् । गुरुं प्रणम्य जानंति सदा ध्यानपरोऽभवत् ॥७१॥ गते बहुतिथे काले वेदमालिर्मुनीश्वर । वाराणसीपुरं प्राप्य परं मोक्षमवाप्तवान् ॥७२॥ य इमं पठतेऽध्यायं शृणुयाद्वा समाहितः । स कर्मपाशविच्छेदं प्राप्य सौख्यमवाप्नुयात् ॥७३॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे ज्ञाननिरूपणं नाम पंचत्रिंशोऽध्यायः ॥३५॥
पंडित ! अहंकार मन का धर्म है आत्मा का नहीं ॥६२॥ वेदमाले ! फिर तुमने जो यह पूछा है कि 'मैं कौन हूँ' तो जाति आदि से शून्य आत्मा का नामकरण मैं कैसे कर सकता हूँ ॥६३॥ अनुपम स्वभाव वाले, निर्गुण, नीरूप, अप्रमेय परात्मा का नाम मैं कैसे बताऊँ ॥६४॥ परज्योतिस्वरूप, परिपूर्ण, अव्ययात्मा, और अविच्छिन्न प्रकृति वाले आत्मा की क्रिया को कैसे बताया जाय ? ॥६५॥ विप्र ! स्वप्रकाशात्मा, नित्य और अनन्त परमात्मा के जन्म कर्म के विषय में कैसे कहा जा सकता है ॥६६॥ द्विज ! ज्ञान के द्वारा ही एक मात्र जानने योग्य, अजर, अमर, परिपूर्ण, परानन्द सनातन ब्रह्म के अतिरिक्त कोई भी पदार्थ इस संसार में नहीं है ॥६७॥ 'तत्त्वमसि' [तुम (आत्मा) वही ब्रह्म हो ] इत्यादि वाक्यों से प्राप्त ज्ञान ही मोक्ष सिद्धि का प्रधान कारण है और इस नित्य ज्ञान के सिद्ध हो जाने पर सारा विश्व ब्रह्ममय दिखाई पड़ता है । मुनीश्वर ! इस प्रकार मुनि के ज्ञानोपदेश से उद्बुद्ध वेदमालि अत्यन्त प्रसन्न हुआ । उसने अपने में ही उपाधिरहित, निर्गुण, निरंजन, स्वप्रकाश ब्रह्म को देखा और 'वह ब्रह्म मैं ही हूँ' ऐसा निश्चयात्मक ज्ञान प्राप्त कर उसको अत्यधिक शान्ति मिली ॥६८-७०॥ इसके अनन्तर व्यवहार निर्वाह के लिए गुरु मुनीश्वर को प्रणाम कर वह सदा ध्यानमग्न रहने लगा । मुनीश्वर ! बहुत समय बीत जाने पर वह वेदमाली वाराणसीपुरी में गया जहाँ से उसको पर मोक्ष प्राप्त हो गया । जो व्यक्ति ध्यानपूर्वक इस अध्याय को पढ़ता है या सुनता है, वह भी अपने कर्म बन्धन को तोड़कर परम सौख्य (मुक्ति) पाता है ॥७१-७३॥ श्रीनारदीय महापुराण में ज्ञान-निरूपण नामक पैंतीसवां अध्याय समाप्त ॥३५॥
अथ षट्त्रिंशोऽध्यायः सनक उवाच वेदमालेः सुतौ प्रोक्तौ यावुभौ मुनिसत्तम । यज्ञमाली सुमाली च तयोः कर्माधुनोच्यते ॥१॥ तयोराद्यो यज्ञमाली विभेद पितृसंचितम् । धनं द्विधा कनिष्ठस्य भागमेकं ददौ तदा ॥२॥ सुमाली च धनं सर्वं व्यसनाभिरतः सदा । अपात्रानादिभिश्चैव नाशयामास भो द्विज ॥३॥ गीतवाद्यरतो नित्यं मद्यपानरतोऽभवत् । वेश्याविभ्रमलुब्धोऽसौ परदाररतोऽभवत् ॥४॥ सर्वस्मिन्नाशमायाते हिरण्ये पितृसंचिते । अपहृत्य परं द्रव्यं वारस्त्रीनिरतोऽभवत् ॥५॥ दृष्ट्वा सुमालिनः शीलं यज्ञमाली महामतिः । बभूव दुःखितोऽत्यर्थं भ्रातरं चेदमब्रवीत् ॥६॥ अलमत्यंतकष्टेन वृत्तेनास्मात्कुलेऽनुज । त्वमेक एव दुष्टात्मा महापापरतोऽभवः ॥७॥ एवं निवारयंतं तं बहुशो ज्येष्ठसोदरम् । हनिष्यामीति निश्चित्य खड्गहस्तः कचेऽग्रहीत् ॥८॥ ततो महारवो जज्ञे नगरे भृशदारुणः । बबंधुर्नागराश्चैनं कुपितास्ते सुमालिनम् ॥६॥ यज्ञमाली ह्युपेत्यात्मा पौरात्संप्रार्थ्य दुःखितः । बंधनान्मोचयामास भ्रातृस्नेहविमोहितः ॥१०॥ यज्ञमाली पुनश्चापि विभिदे स्वधनं द्विधा । आददे स्वयमर्द्धं च ददावर्द्धं यवीयसे ॥११॥ सुमाली त्वतिमूढात्मा तद्धनं चापि नारद । मूर्खैः पाखंडचंडालैर्बुभुजे च सहोद्धतः ॥१२॥ असतामुपभोगाय दुर्जनानां विभूतयः । पिचुमंदः फलाढ्योऽपि काकैरैवोपभुज्यते ॥१३॥ अध्याय ३६ यज्ञमाली और सुमाली को उत्तम लोक की प्राप्ति सनक बोले--मुनिश्रेष्ठ ! वेदमालि के जिन यज्ञमाली और सुमाली नामक दो पुत्रों की चर्चा हुई है, अब इन दोनों के कर्मों के विषय में कह रहा हूँ ॥१॥ उन दोनों में से ज्येष्ठ पुत्र यज्ञमाली ने पितृसंचित संपत्ति को दो भागों में बाँट दिया। उनमें से एक भाग कनिष्ठ भ्राता सुमाली को दे दिया ॥२॥ द्विज, सर्वदा व्यसन में ही लगे रहने वाले सुमाली ने अपनी सारी संपत्ति व्यर्थ में लुटा दी । नित्य प्रति वह गाने बजाने में लगा रहता था । मदिरापान में निरत रहता था। वेश्याओं के विलास में फँसने के कारण परस्त्री गमन भी करता था ॥३-४॥ पिता के द्वारा संचित सब धन नष्ट हो जाने पर दूसरों का धन हरण कर वह वेश्यागमन में निरत रहने लगा ॥५॥ सुमाली के इस स्वभाव को देखकर महामति यज्ञमाली अत्यन्त दुःखी हो गया । उसने अपने भाई से कहा- 'हे भाई, इस कुल-विरुद्ध पापाचरण से अपने को रोको। देखो, तुम्हीं एक ऐसे अपने कुल में दुष्ट निकले जो इस प्रकार पापपरायण हो गए ॥६-७॥ ज्येष्ठ सहोदर के इस प्रकार बार बार मना करने पर उसने बड़े भाई को मार डालने का निश्चय कर हाथ में खड्ग लेकर केश पकड़ लिया ॥८॥ यह देखकर नगर में दारुण कोलाहल मच गया। नागरिकों ने कुपित होकर उस दुष्ट को बाँध दिया ॥९॥ भाई के प्रेम से वशीभूत होकर विशुद्ध मति ने नागरिकों को समझा बुझाकर भाई को छुड़ा दिया ॥१०॥ फिर उसने अपनी संपत्ति को दो भागों में बाँटा एक भाग तो स्वयं अपने ले लिया और शेष आधा भाग छोटे भाई को दे दिया ॥११॥ नारद ! मूढात्मा सुमाली ने उस धन को पाकर मूर्ख, पाखंडी और चाण्डालों में उसे उड़ा दिया। क्योंकि दुष्टों की संपत्ति का भोग प्रायः दुर्जन ही करते हैं, जैसे फल से लदे हुए नीम की निबौरी कौओं के ही काम आती है ॥१२-१३॥
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२३२ नारदीयपुराणम् भ्रात्रा दत्तं धनं तच्च सुमाली नाशयन्मुने । मद्यपानप्रमत्तश्च गोमांसादीन्यभक्षयत् ॥१४॥ त्यक्तो बंधुजनैः सर्वैश्चांडालस्त्रीसमन्वितः । राज्ञापि बाधितो विप्र प्रपेदे निर्जनं वनम् ॥१५॥ यज्ञमाली सुधीविप्र सदा धर्मरतोऽभवत् । अवारितं ददावन्नं सत्सङ्गतकल्मषः ॥१६॥ पित्रा कृतानि सर्वाणि तडागादीनि सत्तम । अपालयत्प्रयत्नेन सदा धर्मपरायणः ॥१७॥ विश्राणितं धनं सर्वं यज्ञमालेर्महात्मनः । सत्पात्रदाननिष्ठस्य धर्ममार्गप्रवर्तिनः ॥१८॥ अहो सदुपभोगाय सज्जनानां विभूतयः । कल्पवृक्षफलं सर्वममरैरेव भुज्यते ॥१९॥ धनं विश्राण्य धर्मार्थं यज्ञमाली महामतिः । नित्यं विष्णुगृहे सम्यक्परिचर्यापरोऽभवत् ॥२०॥ कालेन गच्छता तौ तु वृद्धभावमुपागतौ । यज्ञमाली सुमाली च ह्येककाले मृतावुभौ ॥२१॥ हरिपूजारतस्यास्य यज्ञमालिमहात्मनः । हरिः संप्रेषयामास विमानं पार्षदैरावृतम् ॥२२॥ दिव्यं विमानमारुह्य यज्ञमाली महामतिः । पूज्यमानः सुरगणैः स्तूयमानो मुनीश्वरैः ॥२३॥ गंधर्वैर्गीयमानश्च सेवितश्चाप्सरोगणैः । कामधेन्वा पुष्यमाणश्चित्राभरणभूषितः ॥२४॥ कोमलैस्तुलसीमाल्यैर्भूषितस्तेजसां निधिः । गच्छन्विष्णुपदं दिव्यं मनुजं पथि दृष्टवान् ॥२५॥ ताड्यमानं यमभटैः क्षत्तृड्भ्यां परिपीडितम् । प्रेतभूतं विवस्त्रं च दुःखितं पाशवेष्टितम् । इतस्ततः प्रधावन्तं विलपंतमनाथवत् ॥२६॥ क्रोशन्तं च रुदंतं च दृष्ट्वा मनसि विव्यथे ॥२७॥ यज्ञमालादयायुक्तो विष्णुदूतान्समीपगान् । कोऽयं भटैर्बाध्यमानं इत्यपृच्छत्कृतांजलिः ॥२८॥
मुनिवर ! भाई की दी हुई संपत्ति को भी उस माली ने उड़ाना प्रारम्भ किया । मदिरापान से मतवाला होकर वह गोमांस-भक्षण और चाण्डाल-स्त्री-गमन भी करने लगा । यह देखकर कुटुम्ब के लोगों ने उसका बहिष्कार कर दिया । राज-बाधा या दण्ड के भय से विवश होकर अन्त में उसको वन की शरण लेनी पड़ी ॥१४-१५॥ उसका ज्येष्ठ भाई महामति यज्ञमाली सर्वदा धर्मानुष्ठान में ही लगा रहता था । सदा अन्न दान देने और सत्संगति के प्रभाव से उसके सारे पाप नष्ट हो गए ॥१६॥ वह धर्मप्रेमी सदा, पिता के बनवाए हुए सारे तड़ाग आदि की भलीभाँति यत्नपूर्वक रक्षा किया करता था ॥१७॥ उसने अपनी सारी संपत्ति महात्माओं, धर्म प्रेमियों और सत्पात्रों को दान कर दी । सच है, सज्जनों की संपत्ति सज्जनों के उपभोग में ही आती है, कल्पवृक्ष का फल सर्वदा देववृन्दों के ही काम आता है ॥१८-१९॥ इस प्रकार महामति यज्ञमाली ने अपना सारा धन धर्मकार्य में ही खर्च कर दिया और नित्य विष्णु मंदिर में परिचर्या करने लगा । कुछ समय बाद दोनों भाई वृद्धावस्था को प्राप्त हुए और दोनों एक ही साथ मृत्यु को प्राप्त हुए ॥२०-२१॥ हरिपूजा में रत महात्मा यज्ञमाली के लिए भगवान् विष्णु ने सेवकों के सहित एक दिव्यविमान उसके निकट भेजा । महामति यज्ञमाली जिसकी देवगण आरा- धना कर रहे थे, मुनिवर स्तुति कर रहे थे, गन्धर्व गुणगान कर रहे थे और अप्सरायें जिसकी सेवा कर रही थीं, कामधेनु जिसको भोग-सामग्री दे रही थी, जो स्वयं विविध आभूषणों से विभूषित, तेजस्वी तथा सुन्दर तुलसी की मालाओं से शोभित था उस विमान पर चढ़कर दिव्य विष्णु लोक को चला गया ॥२२-२५॥ उसने मार्ग में एक मनुष्य को देखा, जो भूख-प्यास से व्याकुल था । यमदूत उसे मार रहे थे । वस्त्र उसके फटे हुए थे । वह प्रेत के समान भयंकर था और पाश में बंधा हुआ था । वह दुःख से कातार होकर अनाथ की भाँति रो रहा था और इधर-उधर दौड़ रहा था ॥२६॥ उसको इस प्रकार रोते-चिल्लाते देखकर यज्ञमाली को अपार मानसिक व्यथा हुई । उसने दयार्द्र हो हाथ जोड़कर साथ चलने वाले विष्णुदूतों से पूछा—'यह कौन है जिसकी दुर्दशा यमदूत कर रहे हैं ? ॥२७-२८॥
षट्त्रिंशोऽध्यायः २३३ अथ ते हरिदूतास्तं यज्ञमालिमहौजसम् । असौ सुमाली भ्राता ते पापात्मेति समब्रुवन् ॥२६॥ यज्ञमाली समाकर्ण्य व्याख्यातं विष्णुकिंकरैः । मनसा दुःखमापन्नः पुनः पप्रच्छ नारद ॥३०॥ कथमस्य भवेन्मोक्षः संचितैःपापसंचयैः । तदुपायं वदध्वं मे यूयं हि मम बांधवाः ॥३१॥ सख्यं साप्तपदीनं स्यादित्याहुर्धर्मकोविदाः । सतां साप्तपदी मैत्री सत्सतां त्रिपदी तथा ॥३२॥ सत्सतामपि ये संतस्तेषां मैत्री पदे पदे ॥३३॥ तस्मान्मे बांधवा यूयं मां नेतुं समुपागताः । यतोऽयं मम भ्रातापि मुच्यते तदिहोच्यताम् ॥३४॥ यज्ञमालिवचः श्रुत्वा विष्णुदूता दयालवः । पुनः स्मितमुखाः प्रोचुर्यज्ञमालिहरिप्रियम् ॥३५॥ विष्णुदूता ऊचुः । यज्ञमालिन्महाभाग नारायणपरायण । उपायं तव वक्ष्यामः सुमालिप्रेममुक्तिदम् ॥३६॥ कृतं यत्सुमहत्कर्म त्वया प्राक्तनजन्मनि । प्रवक्ष्यामः समासेन तच्छृणुष्व समाहितः ॥३७॥ पुरा त्वं वैश्यजातीयो नाम्ना विश्वंभरः स्मृतः । त्वया कृतानि पापानि महांति्यगणितानि वै ॥३८॥ सुकर्मवासनाहीनो मातापित्रोर्विरोधकृत् । एकदा बंधुभिस्त्यक्तः शोकसंतप्तपीडितः ॥३६॥ क्षुधाग्निनापि संतप्तः प्राप्तवान्हरिमंदिरम् । तदा वृष्टिरभूत्तत्र तत्स्थानं पंकिलं ह्यभूत् ॥४०॥ दूरीकृतस्त्वया पंकस्तत्स्थाने स्थातुमिच्छया । उपलेपनतां प्राप्तं तत्स्थानंविष्णुमंदिरे ॥४१॥ त्वयोषितं तु तद्रात्रौ तस्मिन्देवालये द्विज । दंशितश्चैव सर्पेण प्राप्तं पञ्चत्वमेव च ॥४२॥ तेन पुण्यप्रभावेण उपलेपकृतेन च । विप्रजन्म त्वया प्राप्तं हरिभक्तिस्तथाचला ॥४३॥ महातेजस्वी यज्ञमाली के प्रश्न को सुनकर विष्णुदूतों ने कहा कि, 'यह तुम्हारा पापी भाई दुरात्मा सुमाली है; नारद ! विष्णु दूतों के मुख से 'यज्ञमाली' ऐसा नाम सुनकर उसके मन में अत्यन्त पीड़ा हुई । उसने फिर पूछा ॥२९-३०॥ इसके संचित पापों से इसकी मुक्ति कैसे होगी, इसका उपाय तुम लोग बताओ, तुम लोग अब मेरे बन्धु हो गए । धर्ममर्मज्ञों ने कहा कि सात पग साथ चलने पर सज्जनों की मैत्री हो जाती है, यह साधारण नियम है । जो सज्जन होते हैं उनकी मैत्री साप्तपदी होती है, उनसे भी जो अधिक सज्जन होते हैं उनकी मैत्री तीन डग के साथ ही हो जाती है परन्तु जो सर्वश्रेष्ठ सज्जन हैं उनसे मित्रता एक डग साथ चलने से ही हो जाती है ॥३१।३२॥ इसलिए तुम लोग मेरे बन्धु हो और मुझे ले जाने के लिए आये हो, अतएव जिस प्रकार मेरे भाई का उद्धार हो वही उपाय बतलाओ । यज्ञमाली की बातें सुनकर इन दूतों को भी दया आ गई, फिर मुसकराकर उन्होंने विष्णु-प्रिय यज्ञमाली से कहा॥३३-३५॥ विष्णुदूत बोले--महाभाग ! नारायणपरायण ! यज्ञमालिन् ! हम ऐसा उपाय बता रहे हैं जिसके द्वारा तुम्हारे भाई को पापों से मुक्ति मिल जायगी । इसके पूर्व तुमने पूर्व जन्म में जो महान् शुभ कर्म किया है, उसको संक्षेप में सुना रहा हूँ, सावधान होकर सुनो--॥३६-३७॥ पहले तुम वैश्य कुल में उत्पन्न हुए थे, विश्वम्भर तुम्हारा नाम था, तुमने अगणित महापाप किए थे, शुभ कर्म के संस्कार सर्वथा तुममें नहीं थे तुम माता-पिता के विरोधी थे । एक दिन जब तुमको तुम्हारे परिवार के लोगों ने घर से निकाल दिया, तब तुम शोक सन्तप्त और भूख-प्यास से व्याकुल हो घूमते-फिरते एक हरिमन्दिर में आए। उसी समय जोरों की वर्षा हुई जिससे यह स्थान कीचड़ से भर गया ॥३८-४०॥ तुमने वहाँ रहने की इच्छा से वहाँ से कीचड़ हटा दिया, जिससे अनायास उस मन्दिर का उपलेपन हो गया । द्विज ! तुम रात भर उस देवा- लय में रहे, अकस्मात् साँप के काटने से तुम्हारी मृत्यु हो गई ॥४१-४२॥ उसी मन्दिर के लीपने के पुण्य-प्रभाव से तुमको इस जन्म में ब्राह्मण कुल में उत्पन्न होने का सौभाग्य और हरि-चरणों में एकान्त प्रेम मिला है ॥४३॥ ३०-ना० पु०
२३४ नारदीयपुराणम् कल्पकोटिशतं साग्रं संप्राप्य हरिसन्निधिम् । वसाय ज्ञानमासाद्य परं मोक्षं गमिष्यसि ॥४४॥ अनुजं पातकिश्रेष्ठं त्वं समुद्धर्तुमिच्छसि । उपायं तव वक्ष्यामस्तं निबोध महामते ॥४५॥ गोचर्ममात्रभूमेस्तु उपलेपनजं फलम् । दत्वोद्धर महाभाग भ्रातरं कृपयान्वितः ॥४६॥ एवमुक्तो विष्णुदूतैर्यज्ञमाली महामतिः । तत्फलं प्रददौ तस्मै भ्रात्रे पापविमुक्तये ॥४७॥ सुमाली भ्रातृदत्तेन पुण्येन गतकल्मषः । बभूव यमदूतास्तु तं त्यक्त्वा प्रपलायिताः ॥४८॥ विमानं चागतं सद्यः सर्वभोगसमन्वितम् । तदा सुमाली स्वर्यानमारुह्य मुमुदे मुने ॥४९॥ तावुभौ भ्रातरौ विप्र सुरवृन्दनमस्कृतौ । अवापतुर्भृशं प्रीतिं समालिंग्य परस्परम् ॥५०॥ यज्ञमाली सुमाली च स्तूयमानौ महर्षिभिः । गीयमानौ च गंधर्वैर्विष्णुलोकं प्रजग्मतुः ॥५१॥ अवाप्य हरिसालोक्यं सुमाली मुनिसत्तम । यज्ञमाली चोभुतस्तौ कल्पमेकं मुदान्वितौ ॥५२॥ भुक्त्वा भोगान्बहूंस्तत्र यज्ञमाली महामतिः । तत्रैव ज्ञानसंपन्तः परं मोक्षमुपागतः ॥५३॥ सुमाली तु महाभागो विष्णुलोके मुदान्वितः । स्थित्वा भूमिं पुनः प्राप्य विप्रत्वं समुपागतः ॥५४॥ अतिशुद्धे कुले जातो गुणवान्वेदपारगः । सर्वसंपत्समोपेतो हरिभक्तिपरायणः ॥५५॥ व्याहरन्हरिनामानि प्रपेदे जाह्नवीतटम् । तत्र स्नातश्च गंगायां दृष्ट्वा विश्वेश्वरं प्रभुम् ॥५६॥ अवाप परमं स्थानं योगिनामपि दुर्लभम् । उपलेपनमाहात्म्यं कथितं ते मुनीश्वर ॥५७॥ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन संपूज्यो जगतांपतिः । अकामादपि ये विष्णोः सकृत्पूजां प्रकुर्वते ॥५८॥ न तेषां भवबंधस्तु कदाचिदपि जायते । हरिभक्तिरतान्यस्तु हरिबुद्ध्या समर्चयेत् ॥५६॥ इस समय तो तुम करोड़ों कल्प तक हरि के समीप रहो; पुनः ज्ञान प्राप्त कर मोक्ष का अधिकार प्राप्त करना । तुम अपने पाप शिरोमणि भाई का उद्धार करना चाहते हो तो महामते ! सुनो, हम उपाय बता रहे हैं ॥४४-४५॥ महाभाग ! तुम अपने पुण्य-पुंज में से गोचर्म के बराबर भूमि के लेपन से जो फल मिलता है उतना ही पुण्य फल देकर कृपा पूर्वक अपने भाई का उद्धार करो ॥४६॥ महामति यज्ञमाली ने विष्णुदूतों की इतनी बातें सुनकर उतना अपना पुण्यफल भ्राता के पापों से उद्धार के लिए उसको दे दिया ॥४७॥ भाई के दिये हुए पुण्य फल को पाकर सुमाली निष्पाप हो गया । यमदूत यह देखकर उसको छोड़कर दूर भाग गये ॥४८॥ तत्काल वहाँ सब उपभोग और प्रसाधन सामग्री से सज्जित देवविमान आया । मुनि ! उस समय उस दिव्य विमान पर चढ़कर सुमाली अत्यन्त प्रसन्न हुआ ॥४९॥ विप्र ! देवों द्वारा आदृत वे दोनों भाई परस्पर गले मिलकर अत्यधिक प्रसन्न हुए ॥५०॥ इस प्रकार वे दोनों भाई विष्णुलोक को चले गये, मार्ग में महर्षियों ने उनकी प्रशंसा की और गन्धर्वों ने अपने मधुर गीत सुनाए ॥५१॥ मुनिवर्य ! हरि-सालोक्य पाकर एक कल्प तक वे यज्ञमाली और सुमाली दोनों भाई बड़े सुख से वहाँ रहे ॥५२॥ वहाँ महामति यज्ञमाली ने विविध भोगों का उपभोग किया और ज्ञान प्राप्त कर पर मोक्ष प्राप्त कर लिया ॥५३॥ परन्तु महाभाग सुमाली उस लोक में आनन्द पूर्वक रहकर पुनः इस मृत्युलोक में आया और ब्राह्मणकुल में जन्म ग्रहण किया ॥५४॥ उस शुद्ध कुल में जन्म पाकर वह वेदों का पारगामी विद्वान्, गुणी, धनी और हरिभक्त हुआ ॥५५॥ हरिनाम का स्मरण करता हुआ वह जीवन के अन्तिम भाग में गंगा तट पर पहुँचा । वहाँ गंगा में स्नान किया और प्रभु विश्वेश्वर का दर्शन कर उस परम लोक को प्राप्त किया जो योगियों के लिए भी दुर्लभ है ॥५६॥ मुनीश्वर ! देवा- लय के लेपने से जो पुण्य मिलता है उसका माहात्म्य तो कह दिया । इसलिए सब प्रकार से लोकनाथ की पूजा करनी चाहिए । जो अनिच्छा से भी भगवान् की पूजा करता है उसको कभी जन्म-मृत्यु के बन्धन का भय नहीं
सप्तत्रिंशोऽध्यायः २३५ तस्य तुष्यंति विप्रेन्द्र ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः । हरिभक्तिपराणां तु संगिनां संगमात्रतः ॥६०॥ मुच्यते सर्वपापेभ्यो महापातुकवानपि । हरिपूजापराणां च हरिनामवतात्मनाम् ॥६१॥ शुश्रूषानिरता यांति पापिनोऽपि परां गतिम् ॥६२॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे विष्णुसेवाप्रभावो नाम षट्त्रिंशोऽध्यायः ॥३६॥ सप्तत्रिंशोऽध्यायः सनक उवाच भूयः शृणुष्व विप्रेन्द्र माहात्म्यं कमलापतेः । कस्य नो जायते प्रीतिः श्रोतुं हरिकथामृतम् ॥१॥ नराणां विषयान्धानां ममताकुलचेतसाम् । एकमेव हरेर्नाम सर्वपापप्रणाशनम् ॥२॥ सकृद्वा न नमेद्यस्तु विष्णुं पापहरं नृणाम् । श्वपचं तं विजानीयात्कदाचिन्नालपेच्च तम् ॥३॥ हरिपूजाविहीनं तु यस्य वेश्म द्विजोत्तम । श्मशानसदृशं तद्धि कदाचिदपि नो विशेत् ॥४॥ हरिपूजाविहीनाश्च वेदविद्वेषिणस्तथा । गोद्विजद्वेषनिरता राक्षसाः परिकीर्त्तिताः ॥५॥ यो वा को वापि विप्रेन्द्र विप्रद्वेषपरायणः । समर्चयति गोविन्दं तत्पूजा विफला भवेत् ॥६॥ रहता। जो व्यक्ति भगवद् भावना से हरि-भक्तों का सम्मान करता है, विप्रेन्द्र, उसके ऊपर ब्रह्मा, विष्णु और महेश सब प्रसन्न हो जाते हैं। हरि-भक्तों के संयोजनों के संसर्ग, मात्र से बड़े पापी भी सब पापों से मुक्त हो जाते हैं। हरि पूजा के प्रेमी और संकीर्तन प्रेमी भक्तों की सेवा में निरत रहने वाले घोर पापी भी परम गति को पा जाते हैं ॥५७-६२॥ श्रीनारदीयमहापुराण में विष्णु-सेवा-प्रभाव वर्णन नामक छत्तीसवाँ अध्याय समाप्त ॥३६॥ अध्याय ३७ विष्णु का माहात्म्य वर्णन सनक बोले— विप्रेन्द्र, फिर और भी भगवान् कमलापति का माहात्म्य सुनो। कौन ऐसा व्यक्ति होगा जो हरि कथा रूपी अमृत का पान करना न चाहेगा ॥१॥ विषयासक्त, मोह से व्याकुल रहने वाले मनुष्यों के सब पापों को दूर करने वाला एकमात्र हरि नाम ही है ॥२॥ जिसने मनुष्यों के सब पापों को दूर करने वाले विष्णु को एक बार भी प्रणाम नहीं किया उसको चाण्डाल समझना चाहिए। और ऐसे व्यक्ति से कभी बातचीत नहीं करनी चाहिए ॥३॥ द्विजोत्तम ! जिसके घर में कभी हरि की पूजा नहीं होती उसको श्मशान समझकर कभी उस घर में प्रवेश नहीं करना चाहिए ॥४॥ हरि पूजा से विमुख, वेद निन्दक और गौ, ब्राह्मण से द्वेष करने वाले व्यक्ति राक्षस कहे जाते हैं ॥५॥ विप्रेन्द्र ! जो कोई भी व्यक्ति ब्राह्मण द्वेष करते हुए गोविन्द की पूजा करता है उसकी
२३६ नारदीयपुराणम् अन्यश्रेयोविनाशार्थं येऽर्चयंति जनार्दनम् । सा पूजैव महाभाग पूजकामाशु हंति वै ॥७॥ हरिपूजाकरो यस्तु यदि पापं समाचरेत् । तमेव विष्णुद्वेष्टारं प्राहुस्तत्त्वार्थकोविदाः ॥८॥ ये विष्णुनिरताः संति लोकानुग्रहतत्पराः । धर्मकार्यरताः शश्वद्विष्णुरूपास्तु ते मताः ॥६॥ कोटिजन्मार्जितैः पुण्यैर्विष्णुभक्तिः प्रजायते । दृढभक्तिमतां विष्णौ पापबुद्धिः कथं भवेत् ॥१०॥ जन्मकोटयर्जितं पापं विष्णुपूजारतात्मनाम् । क्षयं याति क्षणादेव तेषां स्यात्पापधीः कथम् ॥११॥ विष्णुभक्तिविहीना ये चंडालाः परिकीर्तिताः । चंडाला अपि वै श्रेष्ठाः हरिभक्तिपरायणाः ॥१२॥ नराणां विषयांधानां सर्वदुःखविनाशिनी । हरिसेवेति विख्याता भुक्तिमुक्तिप्रदायिनी ॥१३॥ संगात्स्नेहाद्भयाल्लोभादज्ञानाद्वापि यो नरः । विष्णोरुपासनं कुर्यात्सोऽक्षयं सुखमश्नुते ॥१४॥ हरिपादोदकं यस्तु कणमात्रं पिबेदपि । स स्नातः सर्वतीर्थेषु विष्णोः प्रियतरो भवेत् ॥१५॥ अकालमृत्युशमनं सर्वव्याधिविनाशनम् । सर्वदुःखोपशमनं हरिपादोदकं स्मृतम् ॥१६॥ नारायणं परं धाम ज्योतिषां ज्योतिरुत्तमम् । ये प्रपन्ना महात्मानस्तेषां मुक्तिर्हि शाश्वती ॥१७॥ अत्राप्युदाहरंतीममितिहासं पुरातनम् । पठतां शृण्वतां चैव सर्वपापप्रणाशनम् ॥१८॥ आसीत्पुरा कृतयुगे गुलिको नाम लुब्धकः । परदारपरद्रव्यहरणे सततोग्यतः ॥१६॥ परनिंदापरो नित्यं जन्तूपद्रवकृत्तथा । हतवान्ब्राह्मणान् गाश्च शतशोऽथ सहस्रशः ॥२०॥ देवस्य हरणे नित्यं परस्वहरणे तथा । उद्यक्तः सर्वदा विप्र कीनाशानामधीश्वरः ॥२१॥ पूजा विफल होती है ॥६॥ अन्य लोगों के कल्याण के विनाश के लिए जो भगवान् की पूजा करता है वह पूजा ही उस पूजक को नष्ट कर देती है ॥७॥ हरि पूजा करने वाला व्यक्ति यदि पापाचरण करता है, उसी को तत्त्वज्ञ जन विष्णु-द्वेष्टा कहते हैं ॥८॥ जो विष्णु की सेवा में तथा लोक कल्याण में तत्पर रहकर धर्म संपादन करते हैं, उनको विष्णु रूप ही जानना चाहिए ॥६॥ करोड़ों जन्मों के संचित पुण्य के प्रभाव से ही विष्णु भक्ति प्राप्त होती है, और जिनकी विष्णु में दृढ़ भक्ति होगी उनको पापों की ओर प्रवृत्ति कैसे होगी ? ॥१०॥ विष्णु पूजा में सर्वदा लीन रहने वाले व्यक्ति के कोटि जन्म के पाप स्वतः तत्काल नष्ट हो जाते हैं । तब उनके मन में पाप वासना कैसे रह सकती है ? ॥११॥ जो विष्णु भक्ति से विमुख हैं वे चाण्डाल कहे जाते हैं, और चाण्डाल भी यदि विष्णु भक्ति में लगा रहता है तो वह श्रेष्ठ है ॥१२॥ विषयान्य मनुष्यों के सब दुःखों को दूर करने वाली और उनको भुक्ति और मुक्ति देने वाली हरि-सेवा ही है यह लोक-प्रसिद्ध है ॥१३॥ साहचर्य, स्नेह, भय, लोभ अथवा अज्ञान से भी जो मनुष्य विष्णु की उपासना करता है वह अक्षय सुख का उपभोग करता है ॥१४॥ जो व्यक्ति विष्णु-पादोदक का एक बिन्दु भी पी लेता है वह सब तीर्थों में स्नान करने का फल पाता है और वह विष्णु का प्रिय बन जाता है ॥१५॥ विष्णु का चरण-जल सब दुःखों को दूर करने वाला, अकाल मृत्यु से बचाने वाला और सब व्याधियों से मुक्त करने वाला है ॥१६॥ जो पर धाम, उत्तम प्रकाश, भगवान् नारायण की शरण में जाते हैं वे महात्मा अवश्य शाश्वत पद पा जाते हैं ॥१७॥ इस विषय में एक पुरातन इतिहास सुना रहा हूँ, जिसके पाठ और श्रवण से सब पाप अनायास नष्ट हो जाते हैं ॥१८॥ आज से बहुत पहले कृत युग में गुलिक नामक एक व्याध रहता था । वह सदा दूसरे का धन और स्त्रियाँ छीन लिया करता था ॥१६॥ नित्य प्रति दूसरे की निन्दा करने वाले और जन्तुओं को आतंकित करने वाले उस व्याध ने सैकड़ों, हजारों गायों और ब्राह्मणों की हत्या की थी ॥२०॥ वह यमराज देव-संपत्ति और दूसरे मनुष्यों के धन को लूटने के लिए सदा तैयार रहता था ॥२१॥
सप्तत्रिंशोऽध्यायः २३७ तेन पापान्यनेकानि कृतानि सुमहांति च । न तेषां शक्यते वक्तु संख्या वत्सरकोटिभिः ॥२२॥ स कदाचिन्महापापो जन्तूनामन्तकोपमः । सौवीरराज्ञो नगरं सर्वैश्वर्यसमन्वितम् ॥२३॥ योषिद्भिर्भूषिताभिश्च सरोभिर्निर्मलोदकैः । अलंकृतं विपणिभिर्यौ देवपुरोपमम् ॥२४॥ तस्योपवनमध्यस्थं रम्यं केशवमंदिरम् । छादितं हेमकलशैर्दृष्ट्वा व्याधो मुदं ययौ ॥२५॥ हरास्यत्र सुवर्णानि बहूनीति विनिश्चितम् । जगामाभ्यंतरं तस्य कीनाशश्चौर्यलोलुपः ॥२६॥ तत्रापश्यद्विजवरं शांतं तत्त्वार्थकोविदम् । परिचर्यापरं विष्णोरुत्तंकं तपसां निधिम् ॥२७॥ एकाकिनं दयालुं च निस्पृहं ध्यानलोलुपम् । चौर्यान्तरायकर्तारं तं दृष्ट्वा लुब्धको मुने ॥२८॥ द्रव्यजातं तु देवस्य हर्तुकामोऽतिसाहसी । उत्तं कं हंतुमारेभे विधुतासिर्मदोद्धतः ॥२६॥ पादेनाक्रम्य तद्वक्षो जटाः संगृह्य पाणिना । हंतुं कृतमतिं व्याधमुत्तंकः प्रेक्ष्य चाब्रवीत् ॥३०॥
उत्तंक उवाच भो भो साधो वृथा मां त्वं हनिष्यसि निरागसम् । मया किमपराद्धं ते तद्वदस्व महामते ॥३१॥ कृतापराधिनां लोके शक्ताः शिक्षां प्रकुर्वते । न हि सौम्य वृथा घ्नंति सज्जना अपि पापिनः ॥३२॥ विरोधिष्वपि मूर्खेषु निरीक्ष्यावस्थितान् गुणान् । विरोधं नहि कुर्वति सज्जनाः शांतचेतसः ॥३३॥ बहुधा बोध्यमानोऽपि यो नरः क्षमयान्वितः । तमुत्तमं नरं प्राहुर्विष्णोः प्रियतरं सदा ॥३४॥ सुजनो न याति वैरं परहितबुद्धिर्विनाशकालेऽपि । छेदेऽपि चंदनतरुः सुरभयति मुखं कुठारस्य ॥३५॥
उस पापी ने इतने अधिक महान् पापों को किया था कि उसकी गणना करोड़ों वर्षों में भी नहीं हो सकती है ॥२२॥ किसी समय प्राणियों के लिए यमराज के समान वह महापापी व्याध सब ऐश्वर्यों से परिपूर्ण देवनगरी के समान सौवीर राजा के नगर में गया । वहाँ की स्त्रियाँ आभूषणों से सुशोभित थीं। विमल जल वाली वावलियां और सजी हुई दूकानों से उस नगर की शोभा दुगुनी हो जाती थी । उस नगर के किसी उपवन के बीच एक रम्य केशव मन्दिर को, जो सुवर्णकलश से सुशोभित था, देखकर वह अत्यन्त प्रसन्न हो गया । वह यमरा : "आज इस सुवर्ण-राशि को चुराऊँगा" ऐसा दृढ़ निश्चय कर चोरी के लोभ से उस मन्दिर के भीतर गया ॥२३-२६॥ वहां उसने एक परम तत्त्व के जानने वाले तपोनिधि, परम शान्त उत्तं क नामक ब्राह्मण को देखा जो विष्णु की आराधना में तल्लीन था । मुने ! उस निःस्पृह ध्यानलोलुप, दयालु और असहाय विप्र को चोरी में बाधक समझ कर उसे देव- संपत्ति को चुराने की इच्छा करने वाले साहसी मदांधत व्याध ने हाथों में खड्ग लेकर मारने को उद्यत हुआ ॥२७-२६॥ जब वह उसकी छाती पर पैर रखकर जटा को हाथ में पकड़कर मारने को तैयार हुआ तो उसको देखकर उत्तंक ने कहा ॥३०॥ उत्तंक बोले--हे साधो! क्यों व्यर्थ में मुझ निरपराध को मार रहे हो? मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है ? हे महामति उसको बताओ ॥३१॥ इस लोक में बलवान् व्यक्ति अपराधी को दण्ड देते हैं, और सज्जन पापियों को भी व्यर्थ दण्ड नहीं देते हैं ॥३२॥ जो सज्जन शान्त स्वभाव के होते हैं अपने विरोधी में भी चाहे वह मूर्ख ही क्यों न हो-गुणों को देखकर उसका विरोध नहीं करते ॥३३॥ जो बहुधा उत्तेजित करने पर क्षमा का त्याग नहीं करता उसी को उत्तम व्यक्ति कहा जाता है और सदा विष्णु का प्रिय पात्र बना रहता है ॥३४॥ विनाश काल में भी परोपकार की भावना रखने वाले सुजन वैर नहीं करते । चन्दन वृक्ष काटा जाने पर भी कुठार के मुख को सुगन्धित ही बनाता है ॥३५॥ अहो, दैव बड़ा प्रबल है
२३८ नारदीयपुराणम् अहो विधिः सुबलवान्बाधते बहुधा जनान् । सर्वसंगविहीनोऽपि बाध्यते हि दुरात्मना ॥३६॥ अहो निष्कारणं लोके बाधंते बहुधा जनान् । सर्वसंगविहीनोऽपि बाध्यते पिशुनैर्जनैः तत्रापि साधून्बाधंते न समानान्कदाचन ॥३७॥ मृगमीनसज्जनानां तृणजलसंतोषविहितवृत्तीनाम् । लुब्धकधीवरपिशुना निष्कारणवैरिणो जगति ॥३८॥ अहो बलवती माया मोहयत्यखिलं जगत् । पुत्रमित्रकलत्रार्थं सर्वं दुःखेन योजयेत् ॥३९॥ परद्रव्यापहारेण कलत्रं पोषितं त्वया । अंते तत्सर्वमुत्सृज्य एक एव प्रयाति वै ॥४०॥ मम माता मम पिता मम भार्या ममात्मजाः । ममेदमिति जंतूनां ममता बाधते वृथा ॥४१॥ यावदर्जयति द्रव्यं बांधवास्तावदेव हि । धर्माधर्मौ सहैवास्तामिहामुत्र न चापरः ॥४२॥ धर्माधर्माजितैर्द्रव्यैः पोषिता येन ये नराः । मृतमग्निमुखे हुत्वा घृतान्नं भुंजते हि ते ॥४३॥ गच्छंतं परलोकं च नरं तु ह्यनुतिष्ठतः । धर्माधर्मा न च धनं न पुत्रा न च बांधवाः ॥४४॥ कामः समृद्धिमायाति नराणां पापकर्मणाम् । कामः संक्षयमायाति नराणां पुण्यकर्मणाम् ॥४५॥ वृथैव व्याकुला लोका धनादीनां सदार्जने ॥४६॥ यद्भावि तद्भवत्येव यदभाव्यं न तद्भवेत् । इति निश्चितबुद्धीनां न चिंता बाधते क्वचित् ॥४७॥ दैवाधीनमिदं सर्वं जगत्स्थावरजंगमम् । तस्माज्जन्म च मृत्युं च दैवं जानाति नापरः ॥४८॥ यत्र कुत्र स्थितस्यापि यद्भाव्यं तद्भवेद् ध्रुवम् । लोकस्तु तत्र विज्ञाय वृथायासं करोति हि ॥४९॥ अहो दुःखं मनुष्याणां ममताकुलचेतसाम् । महापापानि कृत्वापि परिपुष्यंति यत्नतः ॥५०॥ जो कि प्रायः सब सज्जनों को कष्ट देता रहता है, क्यों कि किसी से कुछ भी संबन्ध न रखने वाले को भी दुष्ट पीड़ा पहुँचाते रहते हैं ॥३६॥ आश्चर्य है कि प्रायः संसार में अकारण लोगों को कष्ट दिया जाता है । किसी का कुछ भी न बिगाड़ने वालों को दुष्ट जन व्यर्थ में पीड़ा पहुँचाते रहते हैं । दुष्ट केवल साधुजन को पीड़ित करते हैं, अपने समान दुष्ट का वे कुछ बिगाड़ नहीं पाते ॥३७॥ तृण, जल और केवल सन्तोष पर ही जीवन बिताने वाले मृग, मछली और सज्जनों का ब्याध, मल्लाह और चुगलखोर अकारण बैरी होते होते हैं ॥३८॥ माया भी कितनी प्रबल होती है जो सारे संसार को वश में कर लेती है, जिससे सभी पुत्र मित्र और स्त्री के लिए दुःख उठाते हैं ॥३९॥ तुमने दूसरों का धन चुरा कर स्त्री का पालन किया, परन्तु अन्त में सबको छोड़कर तुमको अकेला ही जाना पड़ेगा ॥४०॥ यह मेरी माता, यह मेरे पिता, यह मेरी स्त्री और ये मेरे पुत्र हैं, ऐसी ममता व्यर्थ में होती है क्योंकि जब तक लोग धन कमाते रहते हैं तभी तक सब भाई-बन्धु हैं । इस लोक और परलोक दोनों में केवल धर्म और अधर्म ही साथ रहते हैं ॥४१-४२॥ धर्म अथवा अधर्म से कमाई हुई संपत्ति से मनुष्य जिनका पोषण करता है वे ही उसके मर जाने पर उसे अग्नि के मुख में डालकर घृतान्न खाते हैं ॥४३॥ परलोक जाते हुए मनुष्य का धर्म और अधर्म ही अनुगमन करते हैं, धन, पुत्र और बान्धव नहीं । पापी मनुष्यों की इच्छायें सदा बढ़ती रहती हैं और पुण्य कर्म करने वाले की इच्छायें स्वयं शान्त हो जाती हैं ॥४४-४५॥ मनुष्य व्यर्थ ही सर्वदा धन कमाने के लिए व्याकुल रहते हैं । जो होने को होगा वह होगा ही और जो नहीं होने को है वह प्रयत्न करने पर भी नहीं होगा । इस प्रकार का विश्वास रखने वालों को चिन्ता कभी नहीं सताती है ॥४६-४७॥ जगत् के सब स्थावर जंगम दैव के ही अधीन हैं । इसलिए जन्म और मृत्यु की केवल दैव ही जानता है दूसरा कोई नहीं ॥४८॥ जहाँ कहीं रहने पर भी मनुष्य को उसके भाग्य की वस्तुयें निश्चय ही मिल जाती हैं । संसार इन बातों को जानकर भी व्यर्थ परिश्रम करता है ॥४९॥ माया से आतुर मनुष्यों की दशा देखकर, दुःख होता है कि मनुष्य महापाप
सप्तत्रिंशोऽध्यायः २३६ अर्जितं च धनं सर्वं भुंजते बांधवाः सदा। स्वयमेकतमो मूढस्तत्पापफलमश्नुते ॥५१॥ इति ब्रुवाणं तमृषिं विमुच्य भयविह्वलः। गुलिकः प्रांजलिः प्राह क्षमस्वेति पुनः पुनः ॥५२॥ सत्संगस्य प्रभावेण हरिसन्निधिमात्रतः। गतपापो लुब्धकश्च ह्यनुतापेदमब्रवीत् ॥५३॥ मया कृतानि पापानि महांति सुबहूनि च। तानि सर्वाणि नष्टानि विप्रेद्र तव दर्शनात् ॥५४॥ अहोऽहं पापधीर्नित्यं महापापमुपाचरम्। कथं मे निष्कृतिर्भूयो यामि कं शरणं विभोः ॥५५॥ पूर्वजन्मार्जितैः पापैर्लुब्धकत्वमवाप्तवान्। अत्रापि पापजालानि कृत्वा कां गतिमाप्नुयाम् ॥५६॥ अहो ममायुः क्षयमेति शीघ्रं पापान्यनेकानि समर्जितानि। प्रतिक्रिया नैव कृता मयैषां गतिश्च का स्यान्मम जन्म किं वा ॥५७॥ अहो विधिः पापशताकुलं मां किं सृष्टवान्पापतरं च शश्वत्। कथं च यत्पापफलं हि भोक्ष्ये कियत्सु जन्मस्वहमुग्रकर्मा ॥५८॥ एवं विनिन्दन्नात्मानमात्मना लुब्धकस्तदा। अंतस्तापाग्निसंतप्तः सद्यः पंचत्वमागतः ॥५६॥ उत्तंकः पतितं प्रेक्ष्य लुब्धकं तं दयापरः। विष्णुपादोदकेनैवमभ्यषिंचन्महामतिः ॥६०॥ हरिपादोदकस्पर्शात्त्लुब्धको गतकल्मषः। दिव्यं विमानमारुह्य मुनिमेतदथाब्रवीत् ॥६१॥ गुलिक उवाच उत्तंक मुनिशार्दूल गुरुस्त्वं मम सुव्रत। विमुक्तस्त्वत्प्रसादेन महापातककंचुकात् ॥६२॥ गतस्त्वदुपदेशान्मे संतापो मुनिपुंगव। तथैव सर्वपापानि विनष्टान्यतिवेगतः ॥६३॥ के द्वारा अपने आश्रित जनों का बड़े यत्न से पालन करता है। सदा उसकी कमाई हुई संपत्ति का उसके बन्धु जन उपभोग करते हैं, परन्तु पाप का फल उस मूर्ख को अकेले भोगना पड़ता ॥५०-५१॥ ऋषि के उपर्युक्त उपदेश को सुनकर उस गुलिक व्याधने उस ऋषि को छोड़ दिया और भय-विह्वल हो हाथ जोड़कर बार-बार क्षमा मांगने लगा ॥५२॥ सत्संग और विष्णु सान्निध्य के प्रभाव से वह लुब्धक निष्पाप हो गया, अपने किये पापों का स्मरण कर पछताने लगा। उसने उत्तंक ऋषि से कहा ॥५३॥— विप्रेन्द्र ! मैंने बहुत अधिक महापाप किये हैं परन्तु आपके दर्शन से मेरे वे सब पाप नष्ट हो गये ॥५४॥ आह ! मैं पापात्मा आजतक नित्य महापाप करता रहा, अब मेरा उद्धार कैसे होगा? विभो ! अब किसको शरण में जाऊँ ॥५५॥ पूर्व जन्म के पापों के कारण मुझे व्याध योनि मिली, और इस जन्म में भी मैंने केवल पाप राशि ही कमाई तो अब किस योनि में जाऊँगा ? ॥५६॥ आह ! शीघ्र ही मेरा जीवन भी समाप्त होने वाला है। अब तक अनेक पाप ही कमाये और पापों के लिए कोई प्रायश्चित्त भी नहीं किया। तब मेरी क्या गति होगी और कौन सा जन्म पाऊँगा ॥५७॥ विधि ने सैकड़ों पाप करने वाले मेरे लिए किस शाश्वत पाप योनि को चुना है, जो कुछ मेरे पाप फल हैं उनको भोगने के लिए क्रूर कर्म करने वाले मुझको कितने जन्म ग्रहण करने पड़ेंगे ? ॥५८॥ इस प्रकार स्वयं अपने पापों पर पश्चात्ताप कर ही रहा था कि तत्काल अन्तःकरण के पश्चात्ताप रूपी अग्नि में जलकर वह मर गया ॥५६॥ महामति ऋषि उत्तंक उस व्याध को इस प्रकार भूमि पर गिरते देखकर दयार्द्र हो गये और भगवान् के चरणोदक को उसके ऊपर छिड़क दिया ॥६०॥ भगवान् के चरणोदक के स्पर्श से वह लुब्धक निष्पाप हो गया और दिव्य विमान पर चढ़कर मुनि से बोला ॥६१॥ उत्तंक ! मुनिशार्दूल ! सुव्रत ! तुम मेरे गुरु हो, मुनिपुंगव ! तुम्हारे उपदेश से महापाप के बन्धन से छुटकारा मिला ॥६२॥ मुनिशार्दूल ! तुम्हारे उपदेशों से मेरा संताप दूर हो गया। इसी प्रकार मेरे सब पाप