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बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

सप्तत्रिंशोऽध्यायः २३७ तेन पापान्यनेकानि कृतानि सुमहांति च । न तेषां शक्यते वक्तु संख्या वत्सरकोटिभिः ॥२२॥ स कदाचिन्महापापो जन्तूनामन्तकोपमः । सौवीरराज्ञो नगरं सर्वैश्वर्यसमन्वितम् ॥२३॥ योषिद्भिर्भूषिताभिश्च सरोभिर्निर्मलोदकैः । अलंकृतं विपणिभिर्यौ देवपुरोपमम् ॥२४॥ तस्योपवनमध्यस्थं रम्यं केशवमंदिरम् । छादितं हेमकलशैर्दृष्ट्वा व्याधो मुदं ययौ ॥२५॥ हरास्यत्र सुवर्णानि बहूनीति विनिश्चितम् । जगामाभ्यंतरं तस्य कीनाशश्चौर्यलोलुपः ॥२६॥ तत्रापश्यद्विजवरं शांतं तत्त्वार्थकोविदम् । परिचर्यापरं विष्णोरुत्तंकं तपसां निधिम् ॥२७॥ एकाकिनं दयालुं च निस्पृहं ध्यानलोलुपम् । चौर्यान्तरायकर्तारं तं दृष्ट्वा लुब्धको मुने ॥२८॥ द्रव्यजातं तु देवस्य हर्तुकामोऽतिसाहसी । उत्तं कं हंतुमारेभे विधुतासिर्मदोद्धतः ॥२६॥ पादेनाक्रम्य तद्वक्षो जटाः संगृह्य पाणिना । हंतुं कृतमतिं व्याधमुत्तंकः प्रेक्ष्य चाब्रवीत् ॥३०॥

उत्तंक उवाच भो भो साधो वृथा मां त्वं हनिष्यसि निरागसम् । मया किमपराद्धं ते तद्वदस्व महामते ॥३१॥ कृतापराधिनां लोके शक्ताः शिक्षां प्रकुर्वते । न हि सौम्य वृथा घ्नंति सज्जना अपि पापिनः ॥३२॥ विरोधिष्वपि मूर्खेषु निरीक्ष्यावस्थितान् गुणान् । विरोधं नहि कुर्वति सज्जनाः शांतचेतसः ॥३३॥ बहुधा बोध्यमानोऽपि यो नरः क्षमयान्वितः । तमुत्तमं नरं प्राहुर्विष्णोः प्रियतरं सदा ॥३४॥ सुजनो न याति वैरं परहितबुद्धिर्विनाशकालेऽपि । छेदेऽपि चंदनतरुः सुरभयति मुखं कुठारस्य ॥३५॥

उस पापी ने इतने अधिक महान् पापों को किया था कि उसकी गणना करोड़ों वर्षों में भी नहीं हो सकती है ॥२२॥ किसी समय प्राणियों के लिए यमराज के समान वह महापापी व्याध सब ऐश्वर्यों से परिपूर्ण देवनगरी के समान सौवीर राजा के नगर में गया । वहाँ की स्त्रियाँ आभूषणों से सुशोभित थीं। विमल जल वाली वावलियां और सजी हुई दूकानों से उस नगर की शोभा दुगुनी हो जाती थी । उस नगर के किसी उपवन के बीच एक रम्य केशव मन्दिर को, जो सुवर्णकलश से सुशोभित था, देखकर वह अत्यन्त प्रसन्न हो गया । वह यमरा : "आज इस सुवर्ण-राशि को चुराऊँगा" ऐसा दृढ़ निश्चय कर चोरी के लोभ से उस मन्दिर के भीतर गया ॥२३-२६॥ वहां उसने एक परम तत्त्व के जानने वाले तपोनिधि, परम शान्त उत्तं क नामक ब्राह्मण को देखा जो विष्णु की आराधना में तल्लीन था । मुने ! उस निःस्पृह ध्यानलोलुप, दयालु और असहाय विप्र को चोरी में बाधक समझ कर उसे देव- संपत्ति को चुराने की इच्छा करने वाले साहसी मदांधत व्याध ने हाथों में खड्ग लेकर मारने को उद्यत हुआ ॥२७-२६॥ जब वह उसकी छाती पर पैर रखकर जटा को हाथ में पकड़कर मारने को तैयार हुआ तो उसको देखकर उत्तंक ने कहा ॥३०॥ उत्तंक बोले--हे साधो! क्यों व्यर्थ में मुझ निरपराध को मार रहे हो? मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है ? हे महामति उसको बताओ ॥३१॥ इस लोक में बलवान् व्यक्ति अपराधी को दण्ड देते हैं, और सज्जन पापियों को भी व्यर्थ दण्ड नहीं देते हैं ॥३२॥ जो सज्जन शान्त स्वभाव के होते हैं अपने विरोधी में भी चाहे वह मूर्ख ही क्यों न हो-गुणों को देखकर उसका विरोध नहीं करते ॥३३॥ जो बहुधा उत्तेजित करने पर क्षमा का त्याग नहीं करता उसी को उत्तम व्यक्ति कहा जाता है और सदा विष्णु का प्रिय पात्र बना रहता है ॥३४॥ विनाश काल में भी परोपकार की भावना रखने वाले सुजन वैर नहीं करते । चन्दन वृक्ष काटा जाने पर भी कुठार के मुख को सुगन्धित ही बनाता है ॥३५॥ अहो, दैव बड़ा प्रबल है

२३८ नारदीयपुराणम् अहो विधिः सुबलवान्बाधते बहुधा जनान् । सर्वसंगविहीनोऽपि बाध्यते हि दुरात्मना ॥३६॥ अहो निष्कारणं लोके बाधंते बहुधा जनान् । सर्वसंगविहीनोऽपि बाध्यते पिशुनैर्जनैः तत्रापि साधून्बाधंते न समानान्कदाचन ॥३७॥ मृगमीनसज्जनानां तृणजलसंतोषविहितवृत्तीनाम् । लुब्धकधीवरपिशुना निष्कारणवैरिणो जगति ॥३८॥ अहो बलवती माया मोहयत्यखिलं जगत् । पुत्रमित्रकलत्रार्थं सर्वं दुःखेन योजयेत् ॥३९॥ परद्रव्यापहारेण कलत्रं पोषितं त्वया । अंते तत्सर्वमुत्सृज्य एक एव प्रयाति वै ॥४०॥ मम माता मम पिता मम भार्या ममात्मजाः । ममेदमिति जंतूनां ममता बाधते वृथा ॥४१॥ यावदर्जयति द्रव्यं बांधवास्तावदेव हि । धर्माधर्मौ सहैवास्तामिहामुत्र न चापरः ॥४२॥ धर्माधर्माजितैर्द्रव्यैः पोषिता येन ये नराः । मृतमग्निमुखे हुत्वा घृतान्नं भुंजते हि ते ॥४३॥ गच्छंतं परलोकं च नरं तु ह्यनुतिष्ठतः । धर्माधर्मा न च धनं न पुत्रा न च बांधवाः ॥४४॥ कामः समृद्धिमायाति नराणां पापकर्मणाम् । कामः संक्षयमायाति नराणां पुण्यकर्मणाम् ॥४५॥ वृथैव व्याकुला लोका धनादीनां सदार्जने ॥४६॥ यद्भावि तद्भवत्येव यदभाव्यं न तद्भवेत् । इति निश्चितबुद्धीनां न चिंता बाधते क्वचित् ॥४७॥ दैवाधीनमिदं सर्वं जगत्स्थावरजंगमम् । तस्माज्जन्म च मृत्युं च दैवं जानाति नापरः ॥४८॥ यत्र कुत्र स्थितस्यापि यद्भाव्यं तद्भवेद् ध्रुवम् । लोकस्तु तत्र विज्ञाय वृथायासं करोति हि ॥४९॥ अहो दुःखं मनुष्याणां ममताकुलचेतसाम् । महापापानि कृत्वापि परिपुष्यंति यत्नतः ॥५०॥ जो कि प्रायः सब सज्जनों को कष्ट देता रहता है, क्यों कि किसी से कुछ भी संबन्ध न रखने वाले को भी दुष्ट पीड़ा पहुँचाते रहते हैं ॥३६॥ आश्चर्य है कि प्रायः संसार में अकारण लोगों को कष्ट दिया जाता है । किसी का कुछ भी न बिगाड़ने वालों को दुष्ट जन व्यर्थ में पीड़ा पहुँचाते रहते हैं । दुष्ट केवल साधुजन को पीड़ित करते हैं, अपने समान दुष्ट का वे कुछ बिगाड़ नहीं पाते ॥३७॥ तृण, जल और केवल सन्तोष पर ही जीवन बिताने वाले मृग, मछली और सज्जनों का ब्याध, मल्लाह और चुगलखोर अकारण बैरी होते होते हैं ॥३८॥ माया भी कितनी प्रबल होती है जो सारे संसार को वश में कर लेती है, जिससे सभी पुत्र मित्र और स्त्री के लिए दुःख उठाते हैं ॥३९॥ तुमने दूसरों का धन चुरा कर स्त्री का पालन किया, परन्तु अन्त में सबको छोड़कर तुमको अकेला ही जाना पड़ेगा ॥४०॥ यह मेरी माता, यह मेरे पिता, यह मेरी स्त्री और ये मेरे पुत्र हैं, ऐसी ममता व्यर्थ में होती है क्योंकि जब तक लोग धन कमाते रहते हैं तभी तक सब भाई-बन्धु हैं । इस लोक और परलोक दोनों में केवल धर्म और अधर्म ही साथ रहते हैं ॥४१-४२॥ धर्म अथवा अधर्म से कमाई हुई संपत्ति से मनुष्य जिनका पोषण करता है वे ही उसके मर जाने पर उसे अग्नि के मुख में डालकर घृतान्न खाते हैं ॥४३॥ परलोक जाते हुए मनुष्य का धर्म और अधर्म ही अनुगमन करते हैं, धन, पुत्र और बान्धव नहीं । पापी मनुष्यों की इच्छायें सदा बढ़ती रहती हैं और पुण्य कर्म करने वाले की इच्छायें स्वयं शान्त हो जाती हैं ॥४४-४५॥ मनुष्य व्यर्थ ही सर्वदा धन कमाने के लिए व्याकुल रहते हैं । जो होने को होगा वह होगा ही और जो नहीं होने को है वह प्रयत्न करने पर भी नहीं होगा । इस प्रकार का विश्वास रखने वालों को चिन्ता कभी नहीं सताती है ॥४६-४७॥ जगत् के सब स्थावर जंगम दैव के ही अधीन हैं । इसलिए जन्म और मृत्यु की केवल दैव ही जानता है दूसरा कोई नहीं ॥४८॥ जहाँ कहीं रहने पर भी मनुष्य को उसके भाग्य की वस्तुयें निश्चय ही मिल जाती हैं । संसार इन बातों को जानकर भी व्यर्थ परिश्रम करता है ॥४९॥ माया से आतुर मनुष्यों की दशा देखकर, दुःख होता है कि मनुष्य महापाप

सप्तत्रिंशोऽध्यायः २३६ अर्जितं च धनं सर्वं भुंजते बांधवाः सदा। स्वयमेकतमो मूढस्तत्पापफलमश्नुते ॥५१॥ इति ब्रुवाणं तमृषिं विमुच्य भयविह्वलः। गुलिकः प्रांजलिः प्राह क्षमस्वेति पुनः पुनः ॥५२॥ सत्संगस्य प्रभावेण हरिसन्निधिमात्रतः। गतपापो लुब्धकश्च ह्यनुतापेदमब्रवीत् ॥५३॥ मया कृतानि पापानि महांति सुबहूनि च। तानि सर्वाणि नष्टानि विप्रेद्र तव दर्शनात् ॥५४॥ अहोऽहं पापधीर्नित्यं महापापमुपाचरम्। कथं मे निष्कृतिर्भूयो यामि कं शरणं विभोः ॥५५॥ पूर्वजन्मार्जितैः पापैर्लुब्धकत्वमवाप्तवान्। अत्रापि पापजालानि कृत्वा कां गतिमाप्नुयाम् ॥५६॥ अहो ममायुः क्षयमेति शीघ्रं पापान्यनेकानि समर्जितानि। प्रतिक्रिया नैव कृता मयैषां गतिश्च का स्यान्मम जन्म किं वा ॥५७॥ अहो विधिः पापशताकुलं मां किं सृष्टवान्पापतरं च शश्वत्। कथं च यत्पापफलं हि भोक्ष्ये कियत्सु जन्मस्वहमुग्रकर्मा ॥५८॥ एवं विनिन्दन्नात्मानमात्मना लुब्धकस्तदा। अंतस्तापाग्निसंतप्तः सद्यः पंचत्वमागतः ॥५६॥ उत्तंकः पतितं प्रेक्ष्य लुब्धकं तं दयापरः। विष्णुपादोदकेनैवमभ्यषिंचन्महामतिः ॥६०॥ हरिपादोदकस्पर्शात्त्लुब्धको गतकल्मषः। दिव्यं विमानमारुह्य मुनिमेतदथाब्रवीत् ॥६१॥ गुलिक उवाच उत्तंक मुनिशार्दूल गुरुस्त्वं मम सुव्रत। विमुक्तस्त्वत्प्रसादेन महापातककंचुकात् ॥६२॥ गतस्त्वदुपदेशान्मे संतापो मुनिपुंगव। तथैव सर्वपापानि विनष्टान्यतिवेगतः ॥६३॥ के द्वारा अपने आश्रित जनों का बड़े यत्न से पालन करता है। सदा उसकी कमाई हुई संपत्ति का उसके बन्धु जन उपभोग करते हैं, परन्तु पाप का फल उस मूर्ख को अकेले भोगना पड़ता ॥५०-५१॥ ऋषि के उपर्युक्त उपदेश को सुनकर उस गुलिक व्याधने उस ऋषि को छोड़ दिया और भय-विह्वल हो हाथ जोड़कर बार-बार क्षमा मांगने लगा ॥५२॥ सत्संग और विष्णु सान्निध्य के प्रभाव से वह लुब्धक निष्पाप हो गया, अपने किये पापों का स्मरण कर पछताने लगा। उसने उत्तंक ऋषि से कहा ॥५३॥— विप्रेन्द्र ! मैंने बहुत अधिक महापाप किये हैं परन्तु आपके दर्शन से मेरे वे सब पाप नष्ट हो गये ॥५४॥ आह ! मैं पापात्मा आजतक नित्य महापाप करता रहा, अब मेरा उद्धार कैसे होगा? विभो ! अब किसको शरण में जाऊँ ॥५५॥ पूर्व जन्म के पापों के कारण मुझे व्याध योनि मिली, और इस जन्म में भी मैंने केवल पाप राशि ही कमाई तो अब किस योनि में जाऊँगा ? ॥५६॥ आह ! शीघ्र ही मेरा जीवन भी समाप्त होने वाला है। अब तक अनेक पाप ही कमाये और पापों के लिए कोई प्रायश्चित्त भी नहीं किया। तब मेरी क्या गति होगी और कौन सा जन्म पाऊँगा ॥५७॥ विधि ने सैकड़ों पाप करने वाले मेरे लिए किस शाश्वत पाप योनि को चुना है, जो कुछ मेरे पाप फल हैं उनको भोगने के लिए क्रूर कर्म करने वाले मुझको कितने जन्म ग्रहण करने पड़ेंगे ? ॥५८॥ इस प्रकार स्वयं अपने पापों पर पश्चात्ताप कर ही रहा था कि तत्काल अन्तःकरण के पश्चात्ताप रूपी अग्नि में जलकर वह मर गया ॥५६॥ महामति ऋषि उत्तंक उस व्याध को इस प्रकार भूमि पर गिरते देखकर दयार्द्र हो गये और भगवान् के चरणोदक को उसके ऊपर छिड़क दिया ॥६०॥ भगवान् के चरणोदक के स्पर्श से वह लुब्धक निष्पाप हो गया और दिव्य विमान पर चढ़कर मुनि से बोला ॥६१॥ उत्तंक ! मुनिशार्दूल ! सुव्रत ! तुम मेरे गुरु हो, मुनिपुंगव ! तुम्हारे उपदेश से महापाप के बन्धन से छुटकारा मिला ॥६२॥ मुनिशार्दूल ! तुम्हारे उपदेशों से मेरा संताप दूर हो गया। इसी प्रकार मेरे सब पाप

२४० नारदीयपुराणम् हरिपादोदकं यस्मान्मयि त्वं सिक्तवान्मुने । प्लावितोऽस्मि त्वया तस्मात्तद्विष्णोः परमं पदम् ॥६४॥ त्वयाहं तारितो विप्र पापाद्स्माच्छरीरतः । तस्मान्नतोऽस्मि ते विद्वन्मत्कृतं तत्क्षमस्व च ॥६५॥ इत्युक्त्वा देवकुसुमैर्मुनिश्श्रेष्ठं समाकिरन् । प्रदक्षिणात्रयं कृत्वा नमस्कारं चकार सः ॥६६॥ ततो विमानमारुह्य सर्वकामसमन्वितम् । अप्सरोगणसंकीर्णः प्रपेदे हरिमंदिरम् ॥६७॥ एतद्दृष्ट्वा विस्मितोऽसौ ह्युत्तंकस्तपसांनिधिः । शिरस्यंजलिमाधाय तुष्टाव कमलापतिम् ॥६८॥ तेन स्तुतो महाविष्णुर्दत्त्वान्वरमनुत्तमम् । वरेण तेनोत्तंकोऽपि प्रपेदे परमं पदम् ॥६९॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे विष्णुमाहात्म्ये सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥३७॥

अष्टविंशोऽध्यायः

नारद उवाच किं तत्स्तोत्रं महाभाग कथं तुष्टो जनार्दनः । उत्तंकः पुण्यपुरुषः कीदृशं लब्धवान्वरम् ॥१॥ सनक उवाच उत्तंकस्तु तदा विप्रो हरिध्यानपरायणः । पादोदकस्य माहात्म्यं दृष्ट्वा तुष्टाव भक्तितः ॥२॥

शीघ्र नष्ट हो गये। मुने ! तुमने विष्णु के चरणोदक से मेरा अभिषेक किया है इसलिए तुमने मुझे विष्णु के परम पद में पहुँचा दिया ॥६३-६४॥ विप्र ! तुमने इस पापमय शरीर से मुझको मुक्त कर दिया इसलिए मैं आपको प्रणाम करता हूँ। विद्वन् ! आप मेरे अपराधों को क्षमा कर दें,। यह कह कर उस गुलिक ने उस मुनिपुंगव को- जिसके ऊपर देव गण पुष्प वृष्टि कर रहे थे, तीन प्रदक्षिणा की और हाथ जोड़कर नमस्कार किया ॥६५-६६॥ इसके अनन्तर सब इष्ट पदार्थों से भरे हुए और अप्सराओं से सुशोभित विमान पर चढ़कर हरिलोक को चला गया ॥६७॥ यह देखकर तपोनिधि उत्तंक को परम विस्मय हुआ। उन्होंने शिर पर अंजलि बाँध कर कमलापति की स्तुति की। उस स्तुति से प्रसन्न होकर उन्होंने उत्तम वर प्रदान किया। उस वर के प्रभाव से वह ऋषि भी अनुपम लोक को चला गया ॥६८-६९॥ श्रीनारदीयमहापुराण में विष्णुमाहात्म्य-वर्णन नामक सैंतीसवां अध्याय समाप्त ॥३७॥

अध्याय ३८ विष्णु-माहात्म्य-वर्णन नारद बोले- महाभाग ! वह कौन-सा स्तोत्र है जिससे हरि प्रसन्न हो जाते हैं ? पुण्य पुरुष उत्तंक ने कैसा वर प्राप्त किया ? ॥१॥ सनक बोले- विप्र ! उस समय हरिध्यान-परायण उत्तंक ने पादोदक का माहात्म्य देखकर भक्तिपूर्वक भगवान् की स्तुति की ॥२॥

अष्टात्रिंशोऽध्यायः २४१ उत्तंक उवाच नतोऽस्मि नारायणमादिदेवं जगन्निवासं जगदेकबंधुम् । चक्राब्जशाङ्गीसिधरं महांर्त स्मृतार्तिनिघ्नं शरणं प्रपद्ये ॥३॥ यन्नाभिजान्जप्रभवो विधाता सृजत्यमुं लोकसमुच्चयं च । यत्क्रोधजो हंति जगच्च रुद्रस्तमादिदेवं प्रणतोऽस्मि विष्णुम् ॥४॥ पद्मापतिं पद्मदलायताक्षं विचित्रवीर्यं निखिलैकहेतुम् वेदांतवेद्यं पुरुषं पुराणं तेजोनिधिं विष्णुमहं प्रपन्नः ॥५॥ आत्माक्षरः सर्वगतोऽच्युताख्यो ज्ञानात्मको ज्ञानविदां शरण्यः । ज्ञानैकवेद्यो भगवाननादिः प्रसीदतां व्यष्टिसमष्टिरूपः ॥६॥ अनंतवीर्यो गुणजातिहीनो गुणात्मको ज्ञानविदां वरिष्ठः । नित्यः प्रपन्नार्तिहरः परात्मा दयांबुधिर्मे वरदस्तु भूयात् ॥७॥ यः स्थूलसूक्ष्मादिविशेषभेदैर्जगद्यथावत्स्वकृतं प्रविष्टः । त्वमेव तत्सर्वमनंतसारं त्वत्तः परं नास्ति यतः परात्मन ॥८॥ अगोचरं यत्तव शुद्धरूपं मायाविहीनं गुणजातिहीनम् । निरञ्जनं निर्मलमप्रमेयं पश्यंति सन्तः परमार्थसंज्ञम् ॥६॥ एकेन हेम्नैव विभूषणानि यातानि भेदत्वमुपाधिभेदात् । तथैव सर्वेश्वर एक एव प्रदृश्यते भिन्न इवाखिलात्मा ॥१०॥

उत्तंक बोले — नारायण, आदिदेव, जगन्निवास और जगद्वन्धु को नमस्कार है । चक्र, कमल, धनुष्, और खड्ग को धारण करने वाले और स्मरण मात्र से सब बाधाओं को दूर करने वाले भगवान् की शरण में हूँ ॥३॥ जिसके नाभिकमल से उत्पन्न होकर ब्रह्मा इस त्रिलोकी की सृष्टि करता है, जिसके क्रोध से उत्पन्न होकर रुद्र सारे संसार को जला देते हैं उस आदिदेव विष्णु को प्रणाम करता हूँ ॥४॥ पद्मापति, पद्मदल के समान बड़ी-बड़ी आँखों वाले, विचित्र प्रभाव और पराक्रम वाले, वेदान्त वेद्य, अखिल लोक के एक मात्र कारण तेजो निधि विष्णु की शरण में आया हूँ॥५॥ समष्टि और व्यष्टि उभय रूपवाले, आत्मा, अक्षर, सर्वव्यापक, अच्युत, ज्ञानरूप, ज्ञानियों के आश्रय तथा केवल ज्ञान से प्राप्त होने योग्य अनादि भगवान् प्रसन्न हो जाइए ॥६॥ अनन्त पराक्रम-शील, गुण जाति हीन, गुण रूप, ज्ञानियों में श्रेष्ठ, नित्य, भक्तों की पीड़ा दूर करने वाले, परात्मा, दया- सागर आप मुझे वर प्रदान करें ॥७॥ तुम स्थूल, सूक्ष्म आदि अनेक रूपों में जगत् का निर्माण कर पुनः अपनी सृष्टि में प्रवेश कर जाते हो, और तुम्हीं अनन्त तत्त्वों से परिपूर्ण सम्पूर्ण पदार्थ हो । परात्मन् ! तुमसे बढ़कर इस संसार में और कोई पदार्थ नहीं ॥८॥ जो तुम्हारा अगोचर माया, गुण, जाति से हीन शुद्ध रूप है उसी निरंजन, निर्मल, अप्रमेय परमार्थ नामक तुमको सन्त सर्वदा देखते हैं ॥९॥ जिस प्रकार एक ही सुवर्ण से अनेक आभूषण बनते हैं और उपाधि (विशेषण) भेद से उसके अनेक नाम हो जाते हैं उसी प्रकार अखिल पदार्थों में रहने वाला एक ही सर्वेश्वर एक होता हुआ भी अनेक दिखाई पड़ता है ॥१०॥ जिसकी माया से मोहित होकर मनुष्य उस प्रसिद्ध ३१--ना० पु०

२४२ नारदीयपुराणम् यन्मायया मोहितचेतसस्तं पश्यंति नात्मानमपि प्रसिद्धम् । त एव मायारहितास्तदेव पश्यन्ति सर्वात्मकमात्मरूपम् ॥११॥ विभुं ज्योतिरनौपम्यं विष्णुसंज्ञं नमाम्यहम् । समस्तमेतदुद्भूतं यतो यत्र प्रतिष्ठितम् ॥१२॥ यतश्चैतन्यमायातं यद्रूपं तस्य वै नमः । अप्रमेयमनाधारमाधाराधेयरूपकम् ॥१३॥ परमानन्दचिन्मात्रं वासुदेवं नतोऽस्म्यहम् । हृद्गुहानिलयं देवं योगिभिः परिसेवितम् ॥१४॥ योगानामादिभूतं तं नमामि प्रणवस्थितम् । नादात्मकं नादबीजं प्रणवात्मकमव्ययम् ॥१५॥ सद्भावं सच्चिदानन्दं तं वन्दे तिग्मचक्रिणम् । अजरं साक्षिणं त्वस्य ह्यवाङ्मनसगोचरम् ॥१६॥ निरञ्जनमनंताख्यं विष्णुरूपं नतोऽस्म्यहम् । इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः सत्त्वं तेजो बलं धृतिः ॥१७॥ वासुदेवात्मकान्याहुः क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च । विद्याविद्यात्मकं प्राहुः परात्परतरं तथा ॥१८॥ अनादिनिधनं शांतं सर्वधातारमच्युतम् । ये प्रपन्ना महात्मानस्तेषां मुक्तिर्हि शाश्वती ॥१९॥ वरं वरेण्यं वरदं पुराणं सनातनं सर्वगतं समस्तम् । नतोऽस्मि भूयोऽपि नतोऽस्मि भूयो नतोऽस्मि भूयोऽपि नतोऽस्मि भूयः ॥२०॥ यत्पादतोयं भवरोगवैद्यो यत्पादपांशुर्विमलत्वसिद्ध्यै । यन्नाम दुष्कर्मनिवारणाय तमप्रमेयं पुरुषं भजामि ॥२१॥ सद्रूपं तमसद्रूपं सदसद्रूपमव्ययम् । तत्तद्विलक्षणं श्रेष्ठं श्रेष्ठाच्छ्रेष्ठतरं भजे ॥२२॥ निरञ्जनं निराकारं पूर्णमाकाशमध्यगम् । परं च विद्याविद्याभ्यां हृदंबुजनिवासिनम् ॥२३॥ स्वप्रकाशमनिर्देश्यं महतां च महत्तरम् । अणोरणीयांसमजं सर्वोपाधिविवर्जितम् ॥२४॥ आत्मा को भी नहीं देख पाते और वे ही मनुष्य जब भगवत्कृपा से मायामुक्त हो जाते हैं तब तत्काल सब प्राणियों में व्याप्त आत्मा के रूप को देखने लगते हैं ॥११॥ व्यापक, ज्योति, अनुपम विष्णु नामक परमात्मा को नमस्कार करता हूँ, जिससे यह सारा संसार उत्पन्न हुआ है और जिसमें यह प्रतिष्ठित है। ॥१२॥ विष्णु के उस रूप को नमस्कार करता हूँ जिससे चैतन्य की प्राप्ति होती है। अप्रमेय, अनाधार, आधाराधेय रूप परानंद चिन्मात्र वासुदेव को नमस्कार है। हृदयरूपी गुहा में रहने वाले, योगियों से पूजित और योगों के एक मात्र आदि आधार, प्रणव में रहने वाले, नादात्मक, नादबीज, प्रणवरूप, अव्यय, सद्भाव, तीक्ष्ण चक्र धारण करने वाले सच्चिदानन्द की वन्दना करता हूँ ॥१३-१५½॥ भगवान् के अजर साक्षी, वाणी और मन की पहुँच से परे रहने वाले, निरंजन, अनन्त नामक विष्णु रूप को नमस्कार करता हूँ। इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि सत्त्व, तेज, बल, धृति क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) सब वासुदेव के ही रूप हैं और वही विद्याविद्यात्मक परात्परतर है ॥१६-१८॥ जो महात्मा उस अनादि, अनन्त, शान्त, सबके पालक की शरण में जाते हैं उनको अवश्य शाश्वत मुक्ति मिल जाती है ॥१९॥ वर, वरेण्य, वरद, पुराण, सनातन, सर्व व्यापक भगवान् को नमस्कार करता हूँ, नमस्कार करता हूँ और बार-बार नमस्कार करता हूँ ॥२०॥ जिसका चरणोदक संसार की आधियों को नष्ट करने के लिए एक वैद्य है, जिसकी चरणरेणु मानव को निर्मल बुद्धि प्रदान करती है और जिसका नाम दुष्कर्मों के निवारण के लिए समर्थ है उस अप्रमेय पुरुष की वन्दना करता हूँ ॥२१॥ सद्रूप असद्रूप, सदसद्रूप, अव्यय, सदसद्विलक्षण, श्रेष्ठ और श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठ को नमस्कार है ॥२२॥ निरंजन, निराकार, पूर्ण आकाश के मध्य विचरण करने वाले, स्वप्रकाश, अनिर्देश्य, महान् से भी महान्,

अष्टत्रिंशोऽध्यायः २४३ यन्नित्यं परमानन्दं परं ब्रह्म सनातनम् । विष्णुसंज्ञं जगद्धामतमस्मि शरणं गतः ॥२५॥ यं भजन्ति क्रियानिष्ठा यं पश्यन्ति च योगिनः । पूज्यात्पूज्यतरं शांतं गतोऽस्मि शरणं प्रभुम् ॥२६॥ यं न पश्यन्ति विद्वांसो य एतद्व्याप्य तिष्ठति । सर्वस्मादधिकं नित्यं नतोऽस्मि विभुमव्ययम् ॥२७॥ अन्तःकरणसंयोगाज्जीव इत्युच्यते च यः । अविद्याकार्यरहितः परमात्मेति गीयते ॥२८॥ सर्वात्मकं सर्वहेतुं सर्वकर्मफलप्रदम् । वरं वरेण्यमजनं प्रणतोऽस्मि परात्परम् ॥२९॥ सर्वज्ञं सर्वगं शांतं सर्वान्तर्यामिणं हरिम् । ज्ञानात्मकं ज्ञाननिधिं ज्ञानसंस्थं विभुं भजे ॥३०॥ नमाम्यहं वेदनिधिं मुरारिं वेदांतविज्ञानसुनिश्चितार्थम् । सूर्येन्दुवह्नेरोज्ज्वलनेत्रमिन्द्रं खगस्वरूपं श्वपतिस्वरूपम् ॥३१॥ सर्वेश्वरं सर्वगतं महांर्त वेदात्मकं वेदविदां वरिष्ठम् । तं वाङ्मनोऽचिंत्यमनंतशक्तिं ज्ञानैकवेद्यं पुरुषं भजामि ॥३२॥ इन्द्राग्निकालासुरपाशिवायुसोमेशमार्तण्डपुरंदराद्यैः । यः पाति लोकान्परिपूर्णभावस्तमप्रमेयं शरणं प्रपद्ये ॥३३॥ सहस्रशीर्षं च सहस्रपादं सहस्रबाहुं च सहस्रनेत्रम् । समस्तयज्ञैः परिजुष्टमाद्यं नतोऽस्मि तुष्टिप्रदमुग्रवीर्यम् ॥३४॥ कालात्मकं कालविभागहेतुं गुणत्रयातीतमहं गुणज्ञम् । गुणप्रियं कामदमस्तसंगमतीन्द्रियं विश्वभुजं वितृष्णम् ॥३५॥ निरीहमग्र्यं मनसाप्यगम्यं मनोमयं चान्नमय निरूढम् । विज्ञानभेदं प्रतिपन्नकल्पं न वाङ्मयं प्राणमयं भजामि ॥३६॥ अणु से भी अणु, अज, सब उपाधियों से रहित, नित्य परमानन्द, परब्रह्म सनातन विष्णु हैं उनकी शरण में हूँ ॥२५॥ जिसको केवल क्रियानिष्ठ व्यक्ति ही भजते हैं, जिसको योगी जन ही देख पाते हैं, उस परमपूज्य शान्त भगवान् की शरण में हूँ ॥२६॥ जिसको विद्वान् जन भी नहीं देख सकते, जो सर्वव्यापक है, जो सबसे अधिक नित्य, विभु और अव्यय हैं उसको नमस्कार है ॥२७॥ जो अन्तःकरण के संयोग से जीव और अविद्या कार्य से रहित परमात्मा कहा जाता है, जो सर्वात्मक, सबका कारण, सब कर्मफलों को देने वाला, वर, वरेण्य, अजन और पर से पर है उसको नमस्कार है ॥२८-२९॥ सर्वज्ञ, सर्वग, शान्त, सब के अन्तर्यामी, ज्ञानरूप, ज्ञाननिधि और ज्ञानस्थ व्यापक हरि को भजता हूँ ॥३०॥ मैं वेदनिधि, मुरारि, वेदान्त के ज्ञान से निश्चित अर्थ के रूप में प्रतीत होने वाले, सूर्य- चन्द्र रूप नेत्रवाले, इन्द्र, खग स्वरूप, श्वपति स्वरूप, सर्वेश्वर, सर्वगत, महान्, वेद स्वरूप, वेद ज्ञाताओं में श्रेष्ठ, वाणी और मन के चिन्तन से परे रहने वाले, अनन्तशक्ति और एकमात्र ज्ञान से ही जानने योग्य को नमस्कार करता हूँ ॥३१-३२॥ जो परिपूर्ण भाव वाले, परमात्मा, इन्द्र, अग्नि, काल, असुर, वरुण, वायु, सोम, सूर्य, पुरन्दर आदि रूपों से विश्व की रक्षा करते हैं, उन अप्रमेय पुरुष की शरण में आया हूँ ॥३३॥ सहस्र शिर, चरण, बाहु और नेत्र वाले, सब यज्ञों के एक मात्र पूजनीय, आदि, तुष्टि देने वाले उग्र पराक्रमी, कालात्मक, काल विभाग के कारण, त्रिगुणातीत, गुणज्ञ, गुणप्रिय, मनोरथदाता, निर्लेप, अतीन्द्रिय, विश्वभोक्ता, तृष्णा रहित, निरीह, श्रेष्ठ, मन से परे, मनोमय, अन्नमय, अत्यन्त रूढ, विज्ञानभेद, जादृत, वाङ्मय से परे और प्राणमय को नमस्कार करता हूँ ॥३४-३६॥ जिसके रूप नहीं, जिसके बल, प्रभाव,

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२४४ नारदीयपुराणम् न यस्य रूपं न बलप्रभावो न यस्य कर्माणि न यत्प्रमाणम् जानंति देवा कमलोद्भवादखास्तोष्यास्यहं तं कथमात्मरूपम् ॥३७॥ संसारसिंधौ पतितं कदर्यं मोहाकुलं कामशतेन बद्धम् । अकीर्तिभाजं पिशुनं कृतघ्नं सदाशुचिं पापरतं प्रमन्युम् । ॥३८॥ दयांबुधे पाहि भयाकुलं मां पुनः पुनस्त्वां शरणं प्रपद्ये इति प्रसादितस्तेन दयालुः कमलापतिः । प्रत्यक्षतामगात्तस्य भगवांस्तेजसां निधिः ॥३६॥ अतसीपुष्पसंकाशं फुल्लपङ्कजलोचनम् । किरीटिनं कुण्डलिनं हारकेयूरभूषितम् ॥४०॥ श्रीवत्सकौस्तुभधरं हेमयज्ञोपवीतिनम् । नासाविन्यस्तमुक्ता भवधर्मानतनुच्छविम् ॥४१॥ पीतांबरधरं देवं वनमालाविभूषितम् । तुलसीकोमलदलैरर्चितांघ्रि महाद्युतिम् ॥४२॥ किंकिणीनू पुराद्यैश्च शोभितं गरुडध्वजम् । दृष्ट्वाऽननाम विप्रेन्द्रो दण्डवत्क्षितिमण्डले ॥४३॥ अभ्यषिञ्चद्धरैः पादावुत्तंको हर्षवारिभिः । मुरारे रक्ष रक्षेति व्याहरन्नान्यधीस्तदा ॥४४॥ तमुत्थाप्य महाविष्णुरालिलिंग दयापरः । वरं वृणुष्व वत्सेति प्रोवाच मुनिपुङ्गवम् ॥४५॥ असाध्यं नास्ति किंचित्ते प्रसन्ने मयि सत्तम । इतीरितं समाकर्ण्य ह्युत्तंकश्चक्रपाणिना । ॥४६॥ पुनः प्रणम्य तं प्राह देवदेवं जनार्दनम् किं मां मोहयसीश त्वं किमन्यैर्देव मे वरैः । त्वयि भक्तिर्दृढा मेऽस्तु जन्मजन्मांतरेष्वपि ॥४७॥ कीटेपु पक्षिषु मृगेषु सरीसृपेषु रक्षःपिशाचमनुषेष्वपि यत्र तत्र जातस्य मे भवतु केशव ते प्रसादात्त्वय्येव भक्तिरचलाव्यभिचारिणी च ॥४८॥ कर्म और प्रमाण का ज्ञान नहीं, जिसको ब्रह्मा आदि देवता भी नहीं जानते उस आत्मरूप की स्तुति कैसे कर सकता हूँ ॥३७॥ हे दयासागर ! इस संसार-सागर में डूबे हुए, मेरे समान कायर, मोहाकुल, अनेकों कामनाओं में फँसे, निन्दित, चुगलखोर, कृतघ्न, अपवित्र, पाप में रत, क्रोधी और भयत्रस्त की आप रक्षा करें और मुझे अपनी शरण में रखें ॥३८॥ महामुनि उत्तंक की इतनी प्रार्थना सुनकर दयालु, तेज निधि भगवान् कमलापति प्रसन्न होकर उसके सामने प्रकट हुए । उसने अतसी-कुसुम के समान नील वर्ण, खिले कमल के समान नेत्र वाले, किरीट, कुण्डल, केयूर और हार से सुशोभित, श्रीवत्स और कौस्तुभ को धारण किये हुए, सोने का यज्ञोपवीत पहने हुए, नाक में पहने हुए मोती की आभा से बढ़ती हुई शोभा वाले, पीताम्बरधारी भगवान् गरुड़ध्वज को देखा; जो वन- माला, किंकिणी और नूपुर से सुशोभित थे, जिनके युगल चरण तुलसी की कोमल पत्तियों से पूजित थे, जिनकी देह- कान्ति चारों ओर फैल रही थी । विप्रवर्य ने भगवान् को देखकर पृथिवी पर गिरकर साष्टांग दण्डवत् किया और अपने आनन्द के आंसुओं से उनके चरणों को धो दिया ॥३६-४३१॥ उस समय अनन्य भाव से हे मुरारे ! रक्षा करो, रक्षा करो, यही शब्द उसके मुंह से निकले । दयालु महाविष्णु ने उठाकर उस मुनि को गले लगाया और कहा कि 'वत्स ! वर मांगो ।।४४-४५।। सज्जनवर्य ! मेरे प्रसन्न हो जाने पर तुम्हारे लिए कुछ भी असाध्य नहीं । भगवान् चक्रपाणि की इन बातों को सुनकर उत्तंक ने फिर प्रणाम किया और देव-देव जनार्दन से कहा ॥४६॥ ईश, देव ! तुम मुझको अन्य वरदान का लोभ दिखाकर क्यों मोह में डाल रहे हो ? जन्मजन्मान्तर में भी तुम्हारे प्रति मेरे हृदय में अचला भक्ति बनी रहे ॥४७॥ केशव ! कीट, पक्षी, राक्षस, पिशाच, मृग, सरीसृप, मनुष्य आदि किसी भी योनि में जन्म ग्रहण करूँ, परन्तु तुम्हारी कृपा से तुम में ही मेरी अटल दृढ़ भक्ति बनी

अष्टत्रिंशोऽध्यायः २४५ एवमस्त्विति लोकेशः शङ्खप्रान्तेन संस्पृशन् । दिव्यज्ञानं ददौ तस्मै योगिनामपि दुर्लभम् ॥४६॥ पुनः स्तुवन्तं विप्रेन्द्रं देवदेवो जनार्दनः । इदमाह स्मितमुखो हस्तं तच्छिरसि न्यसन् ॥५०॥ श्रीभगवानुवाच आराध्य क्रियायोगैर्यां सदाद्विजसत्तम । नरनारायणस्थानं व्रज मोक्षं गमिष्यसि ॥५१॥ त्वया कृतमिदं स्तोत्रं यः पठेत्सततं नरः । सर्वान्कामानवाप्यांते मोक्षभागी भवेत्ततः ॥५२॥ इत्युक्त्वा माधवो विप्रं तत्रैवांतर्दधे मुने । नरनारायणस्थानमुत्तंकोऽपि ततो ययौ ॥५३॥ तस्माद्भक्तिः सदा कार्या देवदेवस्य चक्रिणः । हरिभक्तिः परा प्रोक्ता सर्वकामफलप्रदा ॥५४॥ उत्तंको भक्तिभावेन क्रियायोगपरो मुने । पूजयन्माधवं नित्यं नरनारायणाश्रमे ॥५५॥ ज्ञानविज्ञानसंपन्नः संच्छिन्नद्वैतसंशयः । अवाप दुरवापं वै तद्विष्णोः परमं पदम् ॥५६॥ पूजितो नमितो वापि संस्मृतो वापि मोक्षदः । नारायणो जगन्नाथो भक्तानां मानवर्द्धनः ॥५७॥ तस्मान्नारायणं देवमनंतमपराजितम् । इहामुत्र सुखप्रेप्सुः पूजयेद्भक्तिसंयुतः ॥५८॥ यः पठेदिदमाख्यानं शृणुयाद्वा समाहितः । सोऽपि सर्वाघनिर्मुक्तः प्रयाति भवनं हरेः ॥५६॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे विष्णुमाहात्म्यं नामाष्टत्रिंशोऽध्यायः ॥३८॥

रहे ॥४८॥ लोक पति ने शंख से उसको छूते हुए कहा 'ऐसा ही होगा, और योगियों के लिए भी दुर्लभ दिव्य ज्ञान को दिया ॥४६॥ फिर स्तुतिपरायण उस विप्र के शिर पर हाथ फेरते हुए देवदेव जनार्दन ने हँसकर कहा ॥५०॥ द्विजश्रेष्ठ ! कर्मयोग के द्वारा मेरी आराधना करो, नर-नारायण के आश्रम में जाओ, मोक्ष अवश्य पा जाओगे ॥५१॥ जो मनुष्य तुम्हारे इस स्तोत्र का पाठ करेगा; वह सब मनोरथों को प्राप्त कर अन्तकाल में मोक्ष प्राप्त करेगा ॥५२॥ मुने ! यह कह कर माधव वहीं अन्तर्हित हो गये । इसके अनन्तर उत्तंक भी नर-नारायण- आश्रम को गया ॥५३॥ इसलिए देवदेव चक्रधर की भक्ति सदा करनी चाहिए । हरि-भक्ति अत्यन्त उत्कृष्ट और सब फलों को देने वाली है ॥५४॥ मुने ! उत्तंक ने नारायण-आश्रम में जाकर क्रियायोगपरायण होकर भक्ति- पूर्वक माधव की पूजा की, ज्ञान विज्ञान से युक्त हो द्वैत भाव पर विजय प्राप्त की और दुर्लभ विष्णु के दुर्लभ परमपद को प्राप्त किया ॥५५-५६॥ भक्तों के मान बढ़ाने वाले नारायण जगन्नाथ की पूजा, स्तुति, नमस्कार, अथवा स्मरण करने पर अवश्य मोक्ष प्राप्त होता है । इसलिए उभय लोक में सुख की कामना करने वाला व्यक्ति अवश्य अनन्त, अपराजित नारायण की पूजा करे ॥५७-५८॥ जो व्यक्ति इस आख्यान को ध्यानपूर्वक पढ़ता है या सुनता है वह भी सब पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक को जाता है ॥५६॥ श्रीनारदीयमहापुराण में विष्णुमाहात्म्यवर्णन नामक अड़तीसवाँ अध्याय समाप्त ॥३८॥

अथैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः सनक उवाच भूयः शृणुष्व विप्रेन्द्र माहात्म्यं परमेष्ठिनः । सर्वपापहरं पुण्यं भुवितमुक्तिप्रदं नृणाम् ॥१॥ अहो हरिकथालोके पापघ्नी पुण्यदायिनी । शृण्वतां वदतां चैव तद्भक्तानां विशेषतः ॥२॥ हरिभक्तिरसास्वादमुदिता ये नरोत्तमाः । नमस्करोम्यहं तेभ्यो यत्संगान्मुक्तिभाङ्नरः ॥३॥ हरिभक्तिपरा ये तु हरिनामपरायणाः । दुर्वृत्ता वा सुवृत्ता वा तेभ्यो नित्यं नमो नमः ॥४॥ संसारसागरं तर्तुं य इच्छेन्मुनिपुङ्गव । स भजेद्धरिभक्तानां भक्तांश्चै पापहरिणः ॥५॥ दृष्टः स्मृतः पूजितो वा ध्यातः प्रणमितोऽपि वा । समुद्धरति गोविन्दो दुस्तराद्भवसागरात् ॥६॥ स्वपन्भुञ्जन् व्रजंस्तिष्ठन्नुत्तिष्ठंश्च वदंस्तथा । चिंतयेद्यो हरेर्नाम तस्मै नित्यं नमो नमः ॥७॥ अहो भाग्यमहो भाग्यं विष्णुभक्तिरतात्मनाम् । येषां मुक्तिः करस्थैव योगिनामपि दुर्लभा ॥८॥ अत्राप्युदाहरंतीममितिहासं पुरातनम् । वदतां शृण्वतां चैव सर्वपापप्रनाशनम् ॥६॥ आसीत्पुरा महीपालः सोमवंशसमुद्भवः । जयध्वज इति ख्यातो नारायणपरायणः ॥१०॥ विष्णोर्देवालये नित्यं संमार्जनपरायणः । दीपदानरतश्चैव सर्वभूतदयापरः ॥११॥

अध्याय ३६ विष्णु-माहात्म्य-वर्णन सनक बोले— विप्रेन्द्र ! अब पुनः परमेष्ठी के माहात्म्य को सुनो, जो मनुष्यों के सब पापों को हरने वाला, पवित्र और भुक्ति मुक्ति दोनों को देने वाला है ॥१॥ इस लोक में हरि-कथा पापों को हरने वाली और पुण्य प्रदान करने वाली है । इस कथा को श्रवण करने वाले, पाठ करने वाले और इसके भक्तों को विशेष फल मिलता है ॥२॥ जो नरपुंगव हरि-भक्ति का रसास्वादन कर सर्वदा मुदित रहते हैं, उनकी मैं वन्दना करता हूँ, उनकी संगति मात्र से मनुष्य मुक्ति पा जाता है ॥३॥ जो हरिभक्ति में रत रहने वाले या हरि नाम का स्मरण करने वाले हैं उनकी भी मैं वन्दना करता हूँ चाहे वे दुराचारी हों या सदाचारी ॥४॥ मुनिपुंगव ! जो इस संसार- सागर को पार करना चाहते हैं, वे हरि-भक्तों का सम्मान अवश्य करें । क्योंकि भक्त मनुष्यों के सब पापों के हरने वाले हैं ॥५॥ गोविन्द की पूजा, दर्शन, ध्यान और प्रणाम करने से वे इस दुस्तर भवसागर से अवश्य पार लगा देते हैं ॥६॥ जो सोते, खाते, चलते, बैठते और बोलते समय हरि-नाम का चिन्तन करते हैं उनको नित्य नमस्कार है ॥७॥ विष्णु-भक्ति में निष्ठा रखने वाले महापुरुषों के भाग्य की जितनी प्रशंसा की जाय थोड़ी है, जिनके लिए योगिदुर्लभ मुक्ति भी हस्तामलकवत् है ॥८॥ इस विषय में एक पुरातन इतिहास को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करता हूँ जिसके श्रवण और पाठ से सब पाप नष्ट हो जाते हैं ॥६॥ प्राचीन काल में जयध्वज नामक सोमवंशीय राजा था, जो विष्णु में अटल भक्ति रखता था ॥१०॥ वह प्रति दिन विष्णु मन्दिर में अपने हाथ से झाडू लगाता, दीप जलाता और सब प्राणियों पर दया भाव

एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः २४७ स कदाचिन्महीपालो रेवातीरे मनोरमे । विचित्रकुसुमोपेतं कृतवान्विष्णुमंदिरम् ॥१२॥ स तत्र नृपशार्दूलः सदा संमार्जने रतः । दीपदानपरश्चैव विशेषेण हरिप्रियः ॥१३॥ हरिनामपरो नित्यं हरिसंसक्तमानसः । हरिप्रणामनिरतो हरिभक्तजनप्रियः ॥१४॥ वीतिहोत्र इति ख्यातो ह्यासीत्तस्य पुरोहितः । जयध्वजस्य चरितं दृष्ट्वा विस्मयमागतः ॥१५॥ कदाचिदुपविष्टं तं राजानं विष्णुतत्परम् । अपृच्छद्वीतिहोत्रस्तु वेदवेदांगपारगः ॥१६॥ वीतिहोत्र उवाच राजनपरमधर्मज्ञ हरिभक्तिपरायण । विष्णुभक्तिमतां पुंसां श्रेष्ठोऽसि भरतर्षभ ॥१७॥ संमार्जनपरो नित्यं दीपदानरतस्तथा । तन्मे वद महाभाग किंत्वया विदितं फलम् ॥१८॥ संपादनेन वर्त्तीनां तैलसंपादनेन च । संयुक्तोऽसि सदा भद्र यद्विष्णोर्गृहमार्जने ॥१९॥ कर्माण्यन्यानि सन्त्येव विष्णोः प्रीतिकराणि च । तथापि किं महाभाग एतयोः सततोद्यतः ॥२०॥ सर्वात्मना महापुण्य नरेश विदितं च यत् । तद् ब्रूहि मे गुह्यतमं प्रीतिर्मयि तवास्ति चेत् ॥२१॥ पुरोधसैवमुक्तस्तु प्रहसन्स जयध्वजः । विनयावनतो भूत्वा प्रोवाचेदं कृतांजलिः ॥२२॥ जयध्वज उवाच शृणुष्व विप्रशार्दूल मयैवाचरितं पुरा । जातिस्मरत्वान्जानामि श्रोतृणां विस्मयप्रदम् ॥२३॥ आसीत्पुरा कृतयुगे ब्रह्मन्स्वारोचिषेंऽतरे । रैवतो नाम विप्रेन्द्रो वेदवेदांगपारगः ॥२४॥ अयाज्ययाजकश्चैव सदैव ग्रामयाजकः । पिशुनो निष्ठुरश्चैव ह्यपण्यानां च विक्रयी ॥२५॥ रखता था ॥११॥ किसी समय उसने विचित्र फूलों से सुशोभित नर्मदा के मनोहर तट पर एक विष्णु- मन्दिर बनवाया ॥१२॥ वह हरिभक्त नृपशार्दूल सदा उस देव मन्दिर की सफाई किया करता और भगवान् को दीपक दिखाया करता था ॥१३॥ इस प्रकार वह अपनी साधना से भगवान् का परम प्रिय भक्त हो गया । वह नित्य हरि-नाम का जप करता, हरि का ही ध्यान करता और भगवान् की स्तुति किया करता था ॥१४॥ उस हरिभक्त-प्रेमो राजा का वीतिहोत्र नामक एक पुरोहित था । वह जयध्वज का चरित्र देखकर आश्चर्यचकित था । एक दिन वेद-वेदांग के पारगामी उस पुरोहित ने विष्णु- सेवा में लगे हुए उस राजा से पूछा ॥१५-१६॥ वीतिहोत्र बोले-परमधर्म के ज्ञाता, हरि-भक्ति में निष्ठा रखने वाले हे राजन् ! तुम विष्णु- भक्तों में श्रेष्ठ हो, प्रतिदिन मन्दिर की सफाई में लगे रहते हो और दीपक भी दिखाते हो ॥१७॥ इसलिए इस दीर्घ साधना से क्या फल मिला, यह मुझे बताओ ॥१७-१८॥ भद्र ! तुम सदा बत्तियां बनाने, तेल जुटाने और मन्दिर में झाडू लगाने में लगे रहते हो ॥१९॥ महाभाग ! हरि-सेवा तो और प्रकार से भी की जा सकती है तथापि तुम क्यों इन्हीं कार्यों में सदा लगे रहते हो ॥२०॥ यदि तुम्हारा मेरे प्रति कुछ प्रेम है तो नरेश ! अपने अब तक के अनुभव से जो कुछ अत्यन्त श्रेष्ठ पुण्य जान पाये हो उसको कहो ॥२१॥ पुरोहित की उपर्युक्त बातों को सुनकर जयध्वज हँस पड़ा और हाथ जोड़कर विनम्र भाव से बोला ॥२२॥ जयध्वज बोले- प्राचीन काल में मैंने जो कुछ किया है उसको सुनो । जातिस्मर के कारण मैं पूर्व जन्म की उन बातों को जानता हूँ जिनको सुनकर पाठकों को आश्चर्य होगा॥२३॥ ब्रह्मन् ! स्वारोचिष मन्वन्तर में कृतयुग में वेद-वेदांगों का ज्ञाता रैवत नामक एक विप्र था । वह सदा अपात्रों से यज्ञ कराता

२४८ नारदीयपुराणम् निषिद्धकर्माचरणात्परित्यक्तः स बन्धुभिः । दरिद्रो दुःखितश्चैव शीर्णाङ्गो व्याधितोऽभवत् ॥२६॥ स कदाचिद्धनार्थं तु पृथिव्यां पर्यटन् द्विजः । ममार नर्मदातीरे श्वासकासप्रपीडितः ॥२७॥ तस्मिन्मृते तस्य भार्या नाम्ना बन्धुमती मुने । कामचारपरा सा तु परित्यक्ता च बन्धुभिः ॥२८॥ तस्यां जातोऽस्मि चण्डालो दण्डकेतुरिति श्रुतः । महापापरतो नित्यं ब्रह्मद्वेषपरायणः ॥२९॥ परदारपरद्रव्यलोलुपो जन्तुहिंसकः । गावश्च विप्रा बहवो निहता मृगपक्षिणः ॥३०॥ मेरुतुल्यसुवर्णानि बहून्यपहृतानि च । मद्यपानरतो नित्यं बहुशो मार्गरोधकृत् ॥३१॥ पशुपक्षिमृगादीनां जन्तूनामन्तकोपमः । कदाचित्कामसंतप्तो गंतुकामो रतिस्त्रियः ॥३२॥ शून्यं विष्णुगृहं दृष्ट्वा प्रविष्टश्च स्त्रिया सह । निशि रामोपभोगार्थं शयितं तत्र कामिना ॥३३॥ ब्रह्मन्स्ववस्त्रप्रांतेन कियद्देशः प्रमाजितः । यावंत्यः पांशुकणिकास्तत्र संमार्जिता द्विज ॥३४॥ तावज्जन्मकृतं पापं तदैव क्षयमागतम् । प्रदीपः स्थापितस्तत्र सुरतार्थं द्विजोत्तम ॥३५॥ तेनापि मम दुष्कर्म निःशेषं क्षयमागतम् । एवं स्थिते विष्णुगृहे ह्यागताः पुरपालकाः ॥३६॥ जारोऽयमिति मां तां च हतवंतः प्रसह्म वै । आवां निहत्य ते सर्वे निवृत्ताः पुररक्षकाः ॥३७॥ यदा तदैव संप्राप्ता विष्णुदूताश्चतुर्भुजाः । किरीटकुंडलधरा वनमालाविभूषिताः ॥३८॥ तैस्तु संप्रेरितावावां विष्णुदूतैरकल्मषैः । दिव्यं विमानमारुह्य सर्वभोगसमन्वितम् ॥३९॥ दिव्यदेहधरौ भूत्वा विष्णूलोकमूपागतौ । तत्र स्थित्वा ब्रह्मकल्पशतं साग्रं द्विजोत्तम ॥४०॥ दिव्यभोगसमायुक्तौ तावत्कालं दिवि स्थितौ । ततश्च भूमिभागेषु देवयोगेषु वै क्रमात् ॥४१॥ निषिद्ध वस्तुओं को बेचता तथा ग्राम याजक का कार्य करता था, वह बहुत बड़ा चुगलखोर और क्रूर था ॥२४-२५॥ निषिद्ध आचरण से उसके भाइयों ने उसको निकाल दिया जिससे थोड़ी ही दिनों में वह दरिद्र, दुःखी और रोगग्रस्त हो गया । उसकी इन्द्रियाँ शिथिल हो गईं ॥२६॥ किसी समय वह धन की खोज में इधर-उधर भटकता हुआ नर्मदा तट पर पहुँचा । वहाँ दमे से पीड़ित होकर मर गया ॥२७॥ मुने ! उसकी मृत्यु के बाद उसकी स्त्री बन्धुमती भी स्वेच्छा- चारिणी हो गई जिससे तंग आकर परिवार वालों ने उसको भी घर से निकाल दिया ॥२८॥ उसी के गर्भ से चाण्डाल- कुल में दण्डकेतु नाम से मैं उत्पन्न हुआ । चाण्डाल होकर मैं सदा महापाप करता और ब्राह्मणों से द्वेष करता था ॥२९॥ परायी स्त्रियों और पराये धन का लोलुप रहता और जीवहिंसा करता था । मैंने बहुत से ब्राह्मणों, गायों, मृगों, और पक्षियों का वध किया । सुमेरु के समान बहुत से स्वर्ण का अपहरण किया । नित्य प्रति मदिरा पीना, लोगों के मार्ग में अनेक प्रकार से बाधा उपस्थित करना मेरा काम था ॥३०-३१॥ पशु-पक्षी और जीवों के लिए तो यमराज के समान था । एक दिन काम से सन्तप्त होकर भोग की इच्छा से पुंश्चली स्त्री के निकट गया ॥३२॥ एक शून्य विष्णु मन्दिर को देखकर स्त्री के साथ उस मन्दिर में घुस गया । रात में कामान्ध मैं स्त्री से भोग करने के लिए उसी मन्दिर में सोया ॥३३॥ ब्रह्मन् ! अपने वस्त्र के छोर से थोड़ी सी भूमि झाड़ दी । द्विज ! जितने धूलिकण (मैंने झाडू या सफाई करते समय जितने धूलिकण) हटाये उसी समय तत्काल उतने जन्म के पाप नष्ट हो गए । द्विजवर्य ! रतिकाल में जो सुरत-दीप जलाया उस से भी मेरे शेष पाप भी नष्ट हो गए ॥३४-३५॥ ऐसा करने के बाद वहाँ नगर-रक्षक घूमते हुए आए । मुझको जार समझ कर उन लोगों ने मुझको और मेरी जार पत्नी को हठात् मार डाला । हम दोनों को मार कर जब वे पुररक्षक चले गए, तब तत्काल चार भुजा-वाले, किरीट, कुण्डल और वनमाला से सुशोभित विष्णु के दूत आए ॥३६-३८॥ उन निष्पाप विष्णुदूतों की प्रेरणा से सब भोग-सामग्रियों से सुसज्जित दिव्य विमान पर चढ़कर हम दोनों देवरूप होकर विष्णु लोक को गए ॥३९॥ वहाँ पर सौ कल्प तक रह कर दिव्य भोगों को भोगते हुए उतने ही समय तक देवलोक में रहे । इसके बाद क्रमशः देवोपयुक्त लोकों में सुख भोगकर उसी पुण्य के प्रभाव से पुनः यदुवंश में जन्म हुआ । उसी पुण्य

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एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः २४६ तेन पुण्यप्रभावेण यदूनां वंशसंभवः । तेनैवैतन्मेऽच्युता संपत्तथा राज्यमकंटकम् ॥४२॥ ब्रह्मन्कृत्त्वोपभोगार्थमेव श्रेयो ह्यवाप्तवान् । भक्त्या कुर्वंति ये संतस्तेषां पुण्यं न वेद्म्यहम् ॥४३॥ तस्मात्संमार्जने नित्यं दीपदाने च सत्तम । यतिष्ये परया भक्त्या ह्यहं जातिस्मरो यतः ॥४४॥ यः पूजयेज्जगन्नाथमेकाकी विगतस्पृहः । सर्वपापविनिर्मुक्तः प्रयाति परमं पदम् ॥४५॥ अवशेनापि यत्कर्म कृतवेमां श्रियमागतः । भक्तिमद्भिः प्रशांतैश्च किं पुनः सम्यगर्च॑नात् ॥४६॥ इति भूपवचः श्रुत्वा वीतिहोत्रो द्विजोत्तमः । अनंततुष्टिमापन्नो हरिपूजापरोऽभवत् ॥४७॥ तस्माच्छृणुष्व विप्रेन्द्र देवो नारायणोऽव्ययः । ज्ञानतोऽज्ञानतो वापि पुजकानां विमुक्तिदः ॥४८॥ अनित्या बांधवाः सर्वे विभवो नैव शाश्वतः । नित्यं सन्निहितो मृत्युः कर्तव्यो धर्मसंग्रहः ॥४९॥ अज्ञो लोको वृथा गर्वं करिष्यति महोद्धतः । कायः संनिहितापायो धनादीनां किमुच्यते ॥५०॥ जन्मकोटिसहस्रेषु पुण्यं यैः समुपार्जितम् । तेषां भक्तिर्भवेच्छुद्धा देवदेवे जनार्दने ॥५१॥ सुलभं जाह्नवीस्नानं तथैवातिथिपूजनम् । सुलभाः सर्वयज्ञाश्च विष्णुभक्तिः सुदुर्लभा ॥५२॥ दुर्लभा तुलसीसेवा दुर्लभः संगमः सताम् । सर्वभूतदया वापि सुलभा यस्य कस्यचित् ॥५३॥ सत्संगस्तुलसीसेवा हरिभक्तिश्च दुर्लभा । दुर्लभं प्राप्य मानुष्यं न तथा गमयेद् बुधः ॥५४॥ अर्चयेद्धि जगन्नाथं सारमेतद्विजोत्तम ॥५५॥ तत्तुं यदीच्छति जनो दुस्तरं भवसागरम् । हरिभक्तिपरो भूयादेतदेव रसायनम् ॥५६॥

के प्रभाव से मुझे यह सम्पत्ति और निष्कंटक राज्य प्राप्त हुआ ॥४०-४२॥ ब्रह्मन् ! इतनी सुख-सामग्री के साथ श्रेयःप्राप्ति उसी पुण्य के प्रभाव से हुई है। जो भक्त भक्तिपूर्वक भगवान् की उपासना करते हैं उनके पुण्य को मैं नहीं जानता ॥४३॥ इसलिए मैं नित्यप्रति मंदिर के संमार्जन और दीप-दर्शन में परम निष्ठा के साथ लगा रहता हूँ क्योंकि मुझे पूर्वजन्म की बातों का ज्ञान है ॥४४॥ जो एकान्त भाव से निःस्पृह होकर जगन्नाथ की पूजा करता है वह सब पापों से मुक्त होकर परमपद को प्राप्त करता है ॥४५॥ जब इच्छा के बिना भी भगवदर्चन करने से इस प्रकार की श्री प्राप्त होती है तो भक्ति पूर्वक शान्त भाव से भगवान् की अर्चना करने से कितना पुण्य होगा, उसके विषय में क्या कहा जाय ॥४६॥ राजा की इतनी बातें सुनकर द्विजोत्तम वीतिहोत्र अत्यन्त प्रसन्न हो गया और भगवदाराधना में लग गया ॥४७॥ विप्रेन्द्र ! सुनो, कहने का सार यह है कि भगवान् नारायण जान-बूझकर या अनजाने किसी प्रकार से भी पूजा करने पर अपने भक्तों को अवश्य मुक्ति प्रदान करते हैं ॥४८॥ सारे बंधुबांधव अनित्य हैं, ऐश्वर्य भी नित्य नहीं, तिस पर मृत्यु सदा शिर पर सवार रहती है, ऐसी अवस्था में धर्मसंग्रह अवश्य करना चाहिए ॥४९॥ व्यर्थ ही मूर्ख लोग मदमत्त होकर गर्व करते हैं। जब शरीर ही क्षण-भंगुर और बाधाओं से पूर्ण है, तब धन-ऐश्वर्य के विषय में निश्चित रूप से क्या कहा जा सकता है ॥५०॥ जो हजार करोड़ जन्मों तक पुण्य संचय करते हैं उनकी देव-देव जनार्दन में शुद्ध भक्ति होती है ॥५१॥ गंगास्नान सुलभ है, अतिथि पूजन भी सुलभ है, सब यज्ञ भी सुलभ हैं, परन्तु हरिभक्ति अत्यन्त दुर्लभ है ॥५२॥ तुलसी की सेवा दुर्लभ है, सत्संगति भी दुर्लभ ही है और सब प्राणियों पर दया करना भी जिस किसी के लिए सुलभ नहीं है ॥५३॥ जब तुलसी-सेवा, हरि-भक्ति और सत्संग दुर्लभ है तब विद्वान् का यह कर्त्तव्य है कि दुर्लभ मानव-जीवन को पाकर उसको व्यर्थ न गँवायें । द्विजोत्तम ! सब का सार यह है कि यदि मनुष्य इस दुस्तर भवसागर को पार करना चाहता है तो वह अवश्य भगवान् की पूजा करे । मनुष्य हरिभक्तिपरायण हो, यही एक रसायन है ॥५४-५६॥ भाई ! गोविन्द

३२ ना० पु०

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण देवनागरी पाठ पंक्ति-दर-पंक्ति दिया गया है:

२५० नारदीयपुराणम्

भ्रातराश्रय गोविन्दं मां विलं वं कुरु प्रिय । आसन्नमेव नगरं कृतांतस्य हि दृश्यते ॥५७॥ नारायणं जगद्योनिं सर्वकारणकारणम् । समर्च्चयस्व विप्रेन्द्र यदि मुक्तिमभीप्ससि ॥५८॥ सर्वाधारं सर्वयोनिं सर्वान्तर्यामिणं विभुम् । ये प्रपन्ना महात्मानस्ते कृतार्था न संशयः ॥५६॥ ते वंद्यास्ते प्रपूज्याश्च नमस्कार्या विशेषतः । येऽर्चयंति महाविष्णुं प्रणतार्तिप्रणाशनम् ॥६०॥ ये विष्णुभक्ता निष्कामा यजन्ति परमेश्वरम् । त्रिःसप्तकुलसंयुक्तास्ते यांति हरिमंदिरम् ॥६१॥ विष्णुभक्ताय यो दद्यान्निष्कामाय महात्मने । पानीयं वा फलं वापि स एव भगवत्प्रियः ॥६२॥ विष्णुभक्तिपराणां तु शुश्रूषां कुर्वते तु ये । ते यांति विष्णुभुवनं यावदाभूतसंप्लवम् ॥६३॥ ये यजंति स्पृहाशून्या हरिभक्तान् हरिं तथा । त एव भुवनं सर्वं पुनंति स्वांघ्रिपांशुना ॥६४॥ देवपूजापरो यस्य गृहे वसति सर्वदा । तत्रैव सर्वदेवाश्च तिष्ठन्ति श्रीहरिस्तथा ॥६५॥ पूज्यमाना च तुलसी यस्य तिष्ठति वेश्मनि । तत्र सर्वाणि श्रेयांसि वर्द्धन्त्यहरहर्द्विज ॥६६॥ शालग्रामशिलारूपी यत्र तिष्ठति केशवः । न बाधंते ग्रहास्तत्र भूतवेतालकादयः ॥६७॥ शालग्रामशिला यत्र तत्तीर्थं तत्तपोवनम् । यतः संनिहितस्तत्र भगवान्मधुसूदनः ॥६८॥ यद्गृहे नास्ति देवर्षे शालग्रामशिलार्चनम् । श्मशानसदृशं विद्यात्तद् गृहं शुभवजितम् ॥६६॥ पुराणन्यायमीमांसा धर्मशास्त्राणि च द्विज । सांगा वेदास्तथा सर्वे विष्णोरूपं प्रकीर्तितम् ॥७०॥ भक्त्या कुर्वन्ति ये विष्णोः प्रदक्षिणचतुष्टयम् । तेऽपि यांति परं स्थानं सर्वकर्मनिवर्हणम् ॥७१॥ इति बृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे विष्णुमाहात्म्यं नाम एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥३६॥


की शरण में जाओ, विलम्ब मत करो। प्रिय ! देखो, यमराज का नगर सामने समीप ही दिखाई दे रहा है (मृत्यु समीप है) ॥५७॥ इसलिए यदि मुक्ति चाहते हो तो जगत् के आदि कारण, सब कारणों के कारण नारायण की अर्चना करो ॥५८॥ सर्वाधार, सर्वयोनि, सब के अन्तर की बात जानने वाले, विभु की शरण में जो जाते हैं उनका जन्म सफल है, वे महात्मा हैं इसमें संशय नहीं है ॥५६॥ वे वन्दनीय हैं, पूजनीय हैं और विशेष रूप से नमस्कार के योग्य हैं। जो भक्त जनों के कष्ट को दूर करने वाले महाविष्णु की पूजा करते हैं, जो विष्णुभक्त निष्काम भाव से परमेश्वर की सेवा करते हैं वे अपनी इक्कीस कुल परम्परा के साथ विष्णु लोक को जाते हैं ॥६०-६१॥ जो निष्काम महात्मा विष्णु भक्त को जल और फल देते हैं वे ही भगवान् के प्रिय पात्र हैं ॥६२॥ जो विष्णुभक्ति में लीन रहने वाले भक्तों की शुश्रूषा करते हैं वे कल्पान्त तक विष्णुलोक में निवास करते हैं ॥६३॥ जो निःस्पृह होकर हरि भक्तों और हरि की सेवा करते हैं वे ही अपनी चरणरेणु से समस्त भुवन को पवित्र करते हैं ॥६४॥ जिसके घर में एक भी सदा देव-पूजा-परायण व्यक्ति रहता है, उस घर में ही स्वयं भगवान्, लक्ष्मी और सब देवता सदा निवास करते हैं ॥६५॥ जिसके घर तुलसी की नित्यप्रति पूजा होती है, द्विज, उसके घर नित्य प्रति सब श्रेय बढ़ते रहते हैं ॥६६॥ जहाँ विष्णु शालग्राम शिला के रूप में रहते हैं, वहाँ ग्रहों से कोई कष्ट नहीं होता और न तो भूत-वेताल ही कोई बाधा पहुँचा सकते हैं ॥६७॥ जहाँ शालग्रामशिला रहती है वह स्थान तीर्थ है, तपोवन है, क्योंकि वहाँ भगवान् मधुसूदन सदा सन्निहित रहते हैं ॥६८॥ देवर्षि- नारद ! जिस घर में शालग्राम का पूजन नहीं होता उस घर को अमंगलमय श्मशान समझना चाहिए ॥६९॥ द्विज ! पुराण, न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र और सब सांगोपांग वेद ये विष्णु के ही रूप हैं ॥७०॥ जो भक्ति पूर्वक विष्णु की चार बार प्रदक्षिणा करते हैं, वे भी सब कामों से मुक्त करने वाले उत्तम स्थान को जाते हैं ॥७१॥ श्री नारदीयमहापुराण में विष्णुमाहात्म्यवर्णन नामक उनतालीसवाँ अध्याय समाप्त ॥३६॥

अथ चत्वारिंशोऽध्यायः सनक उवाच अतः परं प्रवक्ष्यामि विभूतिं वैष्णवीं मुने । यां शृण्वतां कीर्तयतां सद्यः पापक्षयो भवेत् ॥१॥ वैवस्ततेऽन्तरे पूर्वं शक्रस्य च बृहस्पतेः । संवादः सुमहानासीत्तं वक्ष्यामि निशामय ॥२॥ एकदा सर्वभोगाढ्यो विबुधैः परिवारितः । अप्सरोगणसंकीर्णो बृहस्पतिमभाषत ॥३॥ इन्द्र उवाच बृहस्पते महाभाग सर्वतत्त्वार्थकोविद । अतीतब्रह्मणः कल्पे सृष्टिः कीदृग्विधा प्रभो ॥४॥ इन्द्रस्तु कीदृशः प्रोक्तो विबुधाः कीदृशाः स्मृताः । तेषां च कीदृशं कर्म यथावद्वक्तुमर्हसि ॥५॥ बृहस्पतिरुवाच न ज्ञायते मया शक्र पूर्वद्युश्चरितं विधेः । वर्तमानदिनस्यापि दुर्ज्ञेयं प्रतिभाति मे ॥६॥ मनवः समतीताश्च तान्वक्तुमपि न क्षमः । यो विजानाति तं तेऽद्य कथयामि निशामय ॥७॥ सुधर्म इति विख्यातः कश्चिदास्ते पुरे तव । भुञ्जानो दिव्यभोगांश्च ब्रह्मलोकादिहागतः ॥८॥ स वा एतद्विजानाति कथयामि निशामय । एवमुक्तस्तु गुरुणा शक्रस्तेन समन्वितः ॥६॥ देवतागणसंकीर्णः सुधर्मनिलयं ययौ ॥१०॥ अध्याय ४० विष्णुमाहात्म्य-वर्णन सनक बोले—मुनिवर ! अब इसके बाद वैष्णवी विभूति का वर्णन कर रहा हूँ, जिसके सुनने और कीर्तन करने से सद्यः पापक्षय हो जाता है ॥१॥ प्राचीन काल में वैवस्वत मन्वन्तर में इन्द्र और बृहस्पति के बीच जो महत्त्वपूर्ण वार्तालाप हुआ उसी को दोहरा रहा हूँ, सुनो ॥२॥ एक दिन इन्द्र सब भोग-सामग्री से परिपूर्ण इन्द्रपुरी में देवताओं के मध्य बैठे हुए थे । अप्सराओं से देवसभा भरी हुई थी । उन्होंने बृहस्पति से पूछा ॥३॥ इन्द्र बोले—बृहस्पते ! महाभाग ! सब तत्त्वों के जानने वाले ! अतीत ब्रह्म कल्प में सृष्टि किस प्रकार की थी ? इन्द्र कौन और कैसे थे ? देवगण कैसे थे ? और उनके कर्त्तव्य कैसे थे ? इसको भली-भाँति कहिए ॥४-५॥ बृहस्पति बोले—शक्र ! विधि के पूर्वकालीन चरित्र का ज्ञान मुझे नहीं है । यही नहीं, वर्त्तमान कल्प की बातें भी कठिनता से जानी जा सकती हैं । जो मनु बीत गए उनकी चर्चा करने में मैं समर्थ नहीं हूँ । जो इस विषय को जानता है, उसे मैं बता रहा हूँ, ध्यानपूर्वक सुनो ॥६-७॥ तुम्हारे इसी देवपुर में सुधर्म नामक देवता है । वह ब्रह्मलोक से दिव्य सुखों को भोगने के बाद यहाँ आया है । वही इन बातों को भली-भाँति जानता है । गुरुदेव की बातों को सुनकर इन्द्र गुरुदेव और देवताओं को साथ

२५२ नारदीयपुराणम् समागतं देवपतिं बृहस्पतिसमन्वितम् । दृष्ट्वा यथाहं देवर्षे पूजायामास सादरम् ॥११॥ सुधर्मणार्चितः शक्रो दृष्ट्वा तच्छ्रियमूत्तमाम् । मनसा विस्मयाविष्टः प्रोवाच विनयान्वितः ॥१२॥ इन्द्र उवाच अतीतब्रह्मकल्पस्य वृत्तांतं वेत्सि चेद्बुध । तदाख्याहि सकायात एतत्प्रष्टुं समाजिकः ॥१३॥ गतनिद्रांश्च देवांश्च येन जानासि सुव्रत । तद्वदस्वाधिकः कस्मादस्मद्भभोऽपि दिवि स्थितः ॥१४॥ तेजसा यशसा कीर्त्या ज्ञानेन च परंतप । दानेन वा तपोभिर्वा कथमेतादृशः प्रभो ॥१५॥ इत्युक्तो देवराजेन सुधर्मा प्रहसंस्तदा । प्रोवाच विनयाविष्टः पूर्ववृत्तं यथाविधि ॥१६॥ सुधर्म उवाच चतुर्युगसहस्राणि ब्रह्मणो दिनमुच्यते । एकस्मिन् दिवसे शक्र मनवश्च चतुर्दश ॥१७॥ इंद्राश्चतुर्दश प्रोक्ता देवाश्च विविधाः पृथक् । इंद्राणां चैव सर्वेषां मन्वादीनां च वासव ॥१८॥ तुल्यता तेजसा लक्ष्म्या प्रभावेण बलेन च । तेषां नामानि वक्ष्यामि शृणुष्व सुसमाहितः ॥१९॥ स्वायंभुवो मनुः पूर्वं ततः स्वारोचिषस्तथा । उत्तमस्तामसश्चैव रैवतश्चाक्षुषस्तथा ॥२०॥ वैवस्वतो मनुश्चैव सूर्यसावर्णिराष्टमः । नवमो दक्षसावर्णिः सर्वदेवहिते रतः ॥२१॥ दशमो ब्रह्मसावर्णिर्धर्मसावर्णिकस्ततः । ततस्तु रुद्रसावर्णी रोचमानस्ततः स्मृतः ॥२२॥ भौत्यश्चतुर्दशः प्रोक्त एते हि मनवः स्मृताः । देवानिंद्रांश्च वक्ष्यामि शृणुष्व विबुधर्षभ ॥२३॥ लेकर सुधर्म के घर पर गया ॥८-१०॥ देवर्षि नारद ! इन्द्र को बृहस्पति के साथ अपने घर पर आया हुआ देखकर उसने आदरपूर्वक यथायोग्य सब की पूजा की ॥११॥ सुधर्म का सम्मान और आतिथ्य ग्रहण करने के बाद, उसके उत्तम वैभव को देखकर इन्द्र को मन ही मन बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने विनयभाव से पूछा ॥१२॥ इन्द्र बोले- हे बुद्धिमन् ! यदि तुम अतीत कल्प की बातें जानते हो तो कहो। यही बात पूछने के लिए मैं गुरु के साथ आया हूँ। सुव्रत ! जिस कारण तुम निद्रा को जीतने वाले देवों को जानते हो उसको कहो। यह भी बताओ कि कौन ऐसा महान तप है जिसके कारण इस स्वर्ग में रहकर भी तुम हम सबों से श्रेष्ठ समझे जाते हो ॥१३-१४॥ शत्रुंजय ! तेज, यश, कीर्ति, ज्ञान, दान या तप इनमें से किसके प्रभाव से तुम इस प्रकार श्रेष्ठ हो गए ॥१५॥ देवराज इन्द्र की कही हुई इन बातों को सुनकर सुधर्मा हँसने लगा। उसने बड़ी विनयता से पूर्व की बीती हुई घटनाओं को यथाविधि कहना प्रारम्भ किया। १६॥ सुधर्मा ने कहा-सहस्र चतुर्युग ब्रह्मा का एक दिन है। इन्द्र ! ब्रह्मा के एक दिन में चौदह मनु होते हैं ॥१७॥ इन्द्र भी चौदह ही हैं। देवता तो पृथक्-पृथक् अनेकों हैं। वासव ! इन्द्र और सब मनु लक्ष्मी, तेज, प्रभाव और बल में समान ही होते हैं। अब मन्वन्तरों का नाम क्रमशः सुना रहा हूँ, तुम शान्त और एकाग्रभाव से इसको सुनो ॥१८-१९॥ पहले स्वायम्भुव मनु उसके बाद और स्वारोचिष मनु हुए। उसके अनन्तर उत्तम, तामस, रैवत, चाक्षुष तथा वैवस्वत मनु हुए। सूर्यसावर्णि आठवें और नवें दक्षसावर्णि हैं जो सदा सब देवों के हित में लगे रहते हैं। दसवाँ ब्रह्म सावर्णि, ग्यारहवाँ धर्मसावर्णि, बारहवाँ रुद्रसावर्णि, तेरहवां मनु रोचमान और चौदहवाँ भौत्य मनु हैं। ये ही चौदह मनु कहे गए हैं। विबुधर्षभ ! अब देवों और इन्द्रों को बतला रहा हूँ, सुनो ॥२०-२३॥ स्वायम्भुव

चत्वारिंशोऽध्यायः २५३ यामा इति समाख्याता देवाः स्वायंभुवेऽन्तरे । शचीपतिः समाख्यातस्तेषामिंद्रो महामतिः ॥२४॥ पारावताश्च तुषिता देवाः स्वारोचिषेऽन्तरे । विपश्चिन्नाम देवेन्द्रः सर्वसंपत्समन्वितः ॥२५॥ सुधामानस्तथा सत्याः शिवाश्चाथ प्रतर्दनाः । तेषामिंद्रः सुशांतिश्च तृतीये परिकीर्तितः ॥२६॥ सुताः पाराहराश्चैव सुत्याश्चासुधियस्तथा । तेषामिंद्रः शिवः प्रोक्तः शक्रस्तामसरुँऽतरे विभुनामा देवपतिः पञ्चमः परिकीर्तितः ॥२७॥ अमिताभदयो देवाः षष्ठेऽपि च तथा शृणु । आर्याद्या विबुधाः प्रोक्तास्तेषामिंद्रो मनोजवः ॥२८॥ आदित्यवसुरुद्राद्या देवा वैवस्वतेऽन्तरे । इन्द्रः पुरंदरः प्रोक्तः सर्वकामसमन्वितः ॥२९॥ अप्रमेयाश्च विबुधाः सूतपाद्याः प्रकीर्तिताः । विष्णुपूजाप्रभावेण तेषामिंद्रो बलिः स्मृतः ॥३०॥ पाराद्या नवमे देवा इन्द्रश्चाद्भुत उच्यते । सुवासनाद्या विबुधा दशमे परिकीर्तिताः ॥३१॥ शांतिर्नाम च तत्रेद्रः सर्वभोगसमन्वितः । विहंगमाद्या देवाश्च तेषामिंद्रो वृषः स्मृतः ॥३२॥ एकादशे द्वादशे तु निबोध कथयामि ते । ऋभुनामा च देवेंद्रो हरिनाभास्तथा सुराः ॥३३॥ सुत्रामाद्यास्तथा देवास्त्रयोदशतमेऽन्तरे । दिवस्पतिर्महावीर्यस्तेषामिंद्रः प्रकीर्तितः ॥३४॥ चतुर्दशे चाक्षुषाद्या देवा इन्द्रः शुचिः स्मृतः । एवं ते मनवः प्रोक्ता इंद्रा देवाश्च तत्त्वतः ॥३५॥ एकस्मिन्ब्रह्मदिवसे स्वाधिकारं प्रभूंजते ॥३६॥ लोकेषु सर्वसर्गेषु सृष्टिरेकविधा स्मृता । कर्त्तारो बहवः संति तत्संख्यां वेत्ति कोविदः ॥३७॥ मयि स्थिते ब्रह्मलोके ब्रह्माणो बहवो गताः । तेषां संख्यां न संख्यातुं शक्तोऽस्म्यद्य द्विजोत्तम ॥३८॥ स्वर्गलोकमपि प्राप्य यावत्कालं शृणुष्व मे । चत्वारो मनवोऽतीता मम श्रीश्चातिविस्तरा ॥३९॥ स्थातव्यं च मयात्रैव युगकोटिशतं प्रभो । ततः परं गमिष्यामि कर्मभूमिं शृणुष्व मे ॥४०॥ मन्वन्तर में देवता याम नाम से प्रसिद्ध थे । उनके इन्द्र महामति शचीपति थे ॥२४॥ स्वारोचिष में पारावत तुषिता देवता थे । उनके इन्द्र सब ऐश्वर्यों के उपभोक्ता विपश्चित् नाम के थे ॥२५॥ तीसरे मन्वन्तर में सुधाम, सत्य, शिव और प्रतर्दन देवता थे । उनका इन्द्र सुशान्ति था ॥२६॥ तामस मन्वन्तर में सुत, पाराहर, सुत्य और सुधी नाम के देवता थे । उनके इन्द्र शक्र, शिव हुए । पांचवें विभुनामक देवेन्द्र हुए । देवताओं की संज्ञा अमिताभ थी । छठे मन्वन्तर का वर्णन कर रहा हूँ, सुनो-आर्या देवताओं का नाम और उनके इन्द्र का नाम मनोजव था ॥२७-२८॥ वैवस्वत में आदित्य, वसु और रुद्र आदि देवता हैं, सब इष्ट साधनों से सम्पन्न पुरन्दर इन्द्र हैं ॥२९॥ आठवें मन्वन्तर में अप्रमेय, विबुध, सुतपाद्य देवता और विष्णु पूजा के प्रभाव से बलि इन्द्र हैं ॥३०॥ नवें में पराद्य देवता तथा 'अद्भुत' इन्द्र कहे गए हैं । दसवें मन्वन्तर के सुवामन आदि देवता और सब भोगों के भोक्ता इन्द्र शान्ति हैं । ग्यारहवें के विहंगम देवता और वृष उनके इन्द्र हैं ॥३१-३२॥ बारहवें के जो देवता हैं उनको सुनो--ऋभु नामक देवेन्द्र और हरिनाभ नामक देवता हैं ॥३३॥ तेरहवें में सुत्राम आदि देवता तथा महा पराक्रमी दिवस्पति इन्द्र कहे जाते हैं ॥३४॥ चौदहवें में चाक्षुष आदि देवता और शुचि इन्द्र हैं । इस प्रकार तुमसे मनु, इन्द्र, देवता आदि के विषय में यथार्थतः कह दिया ॥३५॥ ब्रह्मा के एक दिन में ये सब अपने अपने अधिकार का उपभोग करते हैं । लोको में तथा सभी सर्गों में सृष्टि एक ही ढंग से होती है । इनके कर्त्ता बहुत से हैं जिनका ज्ञान केवल विज्ञों को ही है ॥३६-३७॥ जब मैं ब्रह्मलोक में था तो बहुत से ब्रह्माओं का कार्य समाप्त हुआ । द्विजोत्तम ! उनकी संख्या की ठीक ठीक गणना करने में मैं तो समर्थ नहीं हूँ ॥३८॥ इस स्वर्गलोक में मैंने जितना समय बिताया है उसको सुनो-चार मनु तो बीत गये, अभी मेरी श्री उसी प्रकार विस्तृत रूप से फैली है ॥३९॥ प्रभो ! अभी यहाँ सौ करोड़ युगों तक रहना है । इसके अनन्तर कर्म भूमि को जाऊँगा, इसका भी वर्णन मुझ से सुनो ॥४०॥

२५४ नारदीयपुराणम् मया कृतं पुरा कर्म वक्ष्यामि तव सुव्रत । वदतां शृण्वतां चैव सर्वपापप्रणाशनम् ॥४१॥ अहमासं पुरा शक्र गृध्रः पापो विशेषतः । स्थितश्च भूमिभागे वै अमेध्यामिषभोजनः ॥४२॥ एकदाहं विष्णोगृहे प्राकारे संस्थितः प्रभो । पतितो व्याधशस्त्रेण सायं विष्णोगृहांगणे ॥४३॥ मयि कंठगतप्राणे श्वगणो मांसलोलुपः । जग्राह मां स्ववक्त्रेण श्वभिरन्यैश्चरन्द्रुतः ॥४४॥ वहन्मां स्वमुखेनैव भीतोऽन्यैर्भषणैस्तथा । गतः प्रदक्षिणाकारं विष्णोस्तन्मंदिरं प्रभो ॥४५॥ तेनैव तुष्टिमापन्नो ह्यापरात्मा जगन्मयः । मम चापि शुनश्चापि दत्तावन्परमं पदम् ॥४६॥ प्रदक्षिणाकारतया गतस्यापीदृशं फलम् । संप्राप्तं विबुधश्रेष्ठ किं पुनः सम्यगर्चनातू ॥४७॥ इत्युक्तो देवराजस्तु सुधर्मेण महात्मना । मनसा प्रीतिमापन्नो हरिपूजारतोऽभवत् ॥४८॥ तथापि निर्जराः सर्वे भारते जन्मलिप्सवः । समर्पयंति देवेशं नारायणमनामयम् । तानर्चयन्ति सततं ब्रह्माद्या देवतागणाः ॥४९॥ नारायणानुस्मरणोद्यतानां महात्मनां त्यक्तपरिग्रहाणाम् । कथं भवत्युग्रभवस्य बंधस्तत्सङ्गलुब्धा यदि मुक्तिभाजः ॥५०॥ ये मानवाः प्रतिदिनं परिमुक्तसङ्गा नारायणं गरुडवाहनमर्चयन्ति । ते सर्वपापनिकरैः परितो विमुक्ता विष्णोः पदं शुभतरं प्रतियान्ति हृष्टाः ॥५१॥ ये मानवा विगतरागपरावरज्ञा नारायणं सुरगुरुं सततं स्मरंति । ध्यानेन तेन हतकिल्विषचेतनास्ते मातुः पयोधररसं न पुनः पिबन्ति ॥५२॥ सुव्रत ! मैंने पहले जो कुछ कर्म किये हैं उनको कह रहा हूँ, जिसके श्रवण और पठन से सब पाप नष्ट हो जाते हैं ॥४१॥ शक्र ! पहले मैं एक विशेष रूप से पाप करने वाला गिद्ध था। सर्वदा पृथ्वी पर रहता और गन्दा मांस खाता था ॥४२॥ प्रभो ! एक दिन विष्णु मन्दिर की चहारदीवारी पर बैठा था। सायं काल किसी बहेलिये के वाण से घायल होकर उस मन्दिर के आँगन में गिर पड़ा ॥४३॥ अभी मेरे प्राण कण्ठ में ही थे कि एक मांस लो- लुप कुत्ता आया और अपने मुंह में मुझको दबा लिया। यह देखकर और भी कुत्ते आगये और उसका पीछा करने लगे ॥४४॥ प्रभो ! उन कुत्तों के भय से वह मुझको मुंह में दबाये ही मन्दिर के चारों ओर घूमने लगा जिससे कि मन्दिर की प्रदक्षिणा हो गयी ॥४५॥ केवल इतने से ही जगन्मय परात्मा सन्तुष्ट हो गये और मुझको तथा उस कुत्ते को भी परमगति दे दी ॥४६॥ जब केवल प्रदक्षिणा करने से इतना फल मिला तब भगवान् की भली-भाँति पूजा करने से कितना फल मिलेगा ॥४७॥ महात्मा सुधर्म की इतनी बातें सुनकर इन्द्र प्रसन्न हो गये और हरिपूजा करने लगे ॥४८॥ उस स्वर्ग लोक में रहकर भी सब देवता भारतवर्ष में जन्म पाने की इच्छा से निर्विकार देवेश नारायण की पूजा करते हैं। ब्रह्मा आदि देवगण उन भक्त देवों की पूजा करते हैं ॥४९॥ नारायण के ध्यान में लोन रहने वाले, किसी का परिग्रह (दान) न लेने वाले भक्तों को इस संसार का कठोर बन्धन कैसे प्राप्त हो सकता है, जबकि उनकी संगति में रहने वाले मनुष्य भी मुक्ति के अधिकारी हो जाते हैं ॥५०॥ जो मनुष्य प्रति दिन विषयों में अनासक्त रहकर गरुड़ध्वज नारायण की पूजा करते हैं, वे सब पाप-समूहों से सर्वथा मुक्त होकर बड़ी प्रसन्नता से विष्णु के शुभलोक को जाते हैं ॥५१॥ जो ब्रह्मज्ञानी वीतराग होकर सुर-गुरुनारायण का सर्वदा स्मरण करते हैं, वे अपने ध्यान के प्रभाव से निष्पाप और विमल बुद्धि हो जाते हैं एवं पुनः माता का दूध नहीं पीते अर्थात् जन्म

चत्वारिंशोऽध्यायः २५५ ये मानवा हरिकथाश्रवणास्तदोषाः कृष्णांघ्रिपद्मभजने रतचेतनाश्च । ते वै पुनंति च जगंति शरीरसंगात् संभाषणार्द्वापि ततो हरिरेव पूज्यः ॥५३॥ हरिपूजापरा यत्र महांन्तः शुद्धबुद्धयः । तत्रैव सकलं भद्रं यथा निम्ने जलं द्विज ॥५४॥ हरिरेव परो बन्धुर्हरिरेव परा गतिः । हरिरेव ततः पूज्यो यतश्चैतन्यकारणम् ॥५५॥ स्वर्गापवर्गफलदं सदानंदं निरामयम् । पूजयस्व मुनिश्रेष्ठ परं श्रेयो भविष्यति ॥५६॥ पूजयन्ति हरिं ये तु निष्कामाः शुद्धमानसाः । तेषां विष्णुः प्रसन्नात्मा सर्वान्कामान् प्रयच्छति ॥५७॥ यस्त्वेतच्छृणुयाद्वापि पठेद्वा सुसमाहितः । स प्राप्नोत्यश्वमेधस्य फलं मुनिवरोत्तम ॥५८॥ इत्येतत्ते समाख्यातं हरिपूजाफलं द्विज । संकोचविस्तराभ्यां तु किमन्यत्कथयामि ते ॥५९॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे विष्णुमाहात्म्ये चत्वारिंशोध्यायः ॥४०॥


ग्रहण नहीं करते ॥५२॥ जिन मनुष्यों के सारे पाप हरिकथा के सुनने से दूर हो गए हैं, जो सदा कृष्ण के चरण- कमल के ध्यान में लगे रहते हैं; वे अपने शरीर के स्पर्श और वाणी से समस्त संसार को पवित्र कर देते हैं, इसलिए हरि की ही पूजा करनी चाहिए ॥५३॥ द्विज! जहाँ हरि-पूजापरायण, शुद्धबुद्धि महात्मा रहते हैं वहाँ सारे कल्याण उसी प्रकार इकट्ठे हो जाते हैं जिस प्रकार नीची भूमि में जल ॥५४॥ हरि ही सत्य-बन्धु और हरि ही एकमात्र परम गति हैं। वही सब के पूज्य हैं। क्योंकि चैतन्य कारण वही हैं ॥५५॥ मुनिवर्य ! स्वर्ग और मोक्ष को देने वाले, सदानन्द, निरामय भगवान् की पूजा करो, तुम्हारा परम कल्याण होगा ॥५६॥ जो शुद्ध हृदय व्यक्ति निष्काम भाव से हरि की पूजा करते हैं, उन पर भगवान् विष्णु प्रसन्न होकर सारी कामनाओं को पूर्ण कर देते हैं ॥५७॥ मुनिवरोत्तम ! जो ध्यान पूर्वक इस अध्याय को पढ़ता या सुनता है उसको अश्वमेघ यज्ञ का फल प्राप्त होता है ॥५८॥ द्विज ! इस प्रकार तुमको हरिपूजा का फल संक्षेप और विस्तार से कह सुनाया । अब तुमको और क्या सुनाऊँ? ॥५९॥ श्रीनारदीयमहापुराण में विष्णुमाहात्म्यवर्णन नामक चालीसवां अध्याय समाप्त ॥४०॥

अथैकचत्वारिंशोऽध्यायः नारद उवाच आख्यातं भवता सर्वं मुने तत्त्वार्थकोविद । इदानीं श्रोतुमिच्छामि युगानां स्थितिलक्षणम् ॥१॥ सनक उवाच साधु साधु महाप्राज्ञ मुने लोकोपकारक । युगधर्मान्प्रवक्ष्यामि सर्वलोकोपकारकान् ॥२॥ धर्मो विवृद्धिमायाति काले कस्मिंश्चिदुत्तम । तथा विनाशमायाति धर्म्म एव महीतले ॥३॥ कृतं त्रेता द्वापरं च कलिश्चेति चतुर्युगम् । दिव्यैर्द्वादशभिर्ज्ञेयं वत्सरेस्तव सत्तम् ॥४॥ संध्यासंध्यांशयुक्तानि युगानि सदृशानि वै । कालतो वेदितव्यानि इत्युक्तं तत्त्वदर्शिभिः ॥५॥ आद्ये कृतयुगं प्राहुस्ततस्त्रेताविधानकम् । ततश्च द्वापरं प्राहुः कलिमंत्यं विदुः क्रमात् ॥६॥ देवदानवगंधर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः । नासन्कृतयुगे विप्र सर्वे देवसमाः स्मृताः ॥७॥ सर्वे हृष्टाश्च धर्मिष्ठा न तत्र क्रयविक्रयौ । वेदानां च विभागश्च न युगे कृतसंज्ञके ॥८॥ ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राः स्वाचारतत्पराः । सदा नारायणपरास्तपोध्यानपरायणाः ॥९॥ कामादिदोषनिर्मुक्ताः शमादिगुणतत्पराः । धर्मसाधनचित्ताश्च गतासूया अदंभिकाः ॥१०॥ सत्यवाक्यरताः सर्वे चतुराश्रमधर्मिणः । वेदाध्ययनसंपन्नाः सर्वशास्त्रविचक्षणाः ॥११॥ अध्याय ४१ नारद बोले-मुने ! तत्त्वार्थविज्ञ ! आपने सब कुछ कह दिया, अब युगों की स्थिति और धर्म के विषय में सुनना चाहता हूँ ॥१॥ सनक ने कहा- मुने ! लोकोपकारक ! महाबुद्धिमान् ! धन्य हो, धन्य हो। मैं सब लोक का उपकार करने वाले युग धर्म को कह रहा हूँ ॥२॥ उत्तम ! किसी समय धर्म की वृद्धि होती तो कभी इस पृथ्वी तल पर उसका ह्रास हो जाता है ॥३॥ कृत, त्रेता, द्वापर और कलि ये चार युग हैं । सज्जनश्रेष्ठ ! दिव्य बारह वर्षों तक ये चार युग स्थित रहते हैं ॥४॥ तत्त्वदर्शियों ने कहा है कि चारों युगों में सन्ध्या और सन्ध्यांश काल नियमपूर्वक होते हैं और समय के अनुसार ये जाने जाते हैं। सब से पहले कृतयुग तब त्रेता और इसके बाद द्वापर युग आता है । क्रम में कलि अन्तिम युग है ॥५-६॥ विप्र ! कृतयुग में देव, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और नाग आदि नहीं थे । सब देव कोटि के ही माने जाते थे । सब प्रसन्न और बलवान् थे । क्रय-विक्रय का व्यवहार न था । उस कृत नामक युग में वेदों का विभाग नहीं हुआ था ॥७-८॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य-शूद्र सब अपने आचार-पालन में तत्पर रहते थे । वे सदा नारायण की पूजा करते और तप, ध्यान में लगे रहते थे ॥६॥ वे काम आदि दोषों से मुक्त, शम आदि गुणों में तत्पर, धर्म-साधन के प्रेमी, असूया और दम्भ से सदा दूर रहने वाले होते थे ॥१०॥ सब सत्य बोलने वाले, आश्रम-धर्म का पालन करने वाले, वेदाध्ययनपरायण और सब शास्त्रों के ज्ञाता होते थे ॥११॥