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बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

सप्तमोऽध्यायः नारद उवाच कोऽसौ राक्षसभावाद्धि मोचितः सगरान्वये । सगरः को मुनिश्रेष्ठ तन्ममाख्यातुमर्हसि ॥१॥ सनक उवाच शृणुष्व मुनिशार्दूल गङ्गामाहात्म्यमुत्तमम् । यज्जलस्पर्शमात्रेण पावितं सागरं कुलम् ॥ गतं विष्णुपदं विप्र सर्वलोकोत्तमोत्तमम् ॥२॥ आसीद्रविकुले जातो बाहुर्नाम वृकात्मजः । बुभुजे पृथिवीं सर्वां धर्मतो धर्मतत्परः ॥३॥ ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चान्ये च जन्तवः । स्थापिताः स्वस्वधर्मेषु तेन बाहुर्विशांपतिः ॥४॥ अश्वमेधैरियाजासौ सप्तद्वीपेषु सप्तभिः । अतर्पयद्भूमिदेवान् गोभूस्वर्णांशुकादिभिः ॥५॥ अशासन्नीतिशास्त्रेण यथेष्टं परिपन्थिनः । मेने कृतार्थमात्मानमत्यातपनिवारणम् ॥६॥ चन्दनानि मनोज्ञानि बलिं यत्सर्वदा जनाः । भूषिता भूषणैर्दिव्यैस्तद्राष्ट्रे सुखिनो मुने ॥७॥ अकृष्टपच्यां पृथिवी फलपुष्पसमन्विता ॥८॥ ववर्ष भूमौ देवेन्द्रः काले काले मुनीश्वर । अधर्मनिरताराये प्रजा धर्मेण रक्षिताः ॥६॥ अध्याय ७ गंगा माहात्म्य-वर्णन नारद बोले- मुनिश्रेष्ठ ! सगर के वंश में कौन था जो राक्षस भाव से मुक्त हुआ, सगर कौन थे ? इस आख्यान को कृपा कर मुझसे कहिए ॥१॥ सनक बोले- मुनिशार्दूल ! जिस गंगा के पुनीत जल के स्पर्श मात्र से सगर कुल पवित्र हो गया और विष्णु पद को प्राप्त कर लिया उस गंगा के परमोत्तम माहात्म्य को सुनिए । सूर्य वंश में वृक का पुत्र बाहु नामक राजा उत्पन्न हुआ । इस धार्मिक राजा ने न्याय पूर्वक सम्पूर्ण पृथ्वी पर शासन किया और अपने बाहु-बल से ब्राह्मण-क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और अन्य समस्त प्रजाओं को अपने धर्मों एवं कर्त्तव्यों में लगाया, सातों द्वीपों में सात अश्वमेध यज्ञ किये, ब्राह्मणों को गौ, स्वर्ण, भूमि और वस्त्रदान से संतुष्ट किया एवं अपने शत्रुओं को इच्छानुसार नीति पूर्वक पराजित किया । उसने मनोहर चन्दन वृक्ष के समान दूसरों के कष्ट दूर करने के कारण अपने को कृत-कृत्य समझा । प्रजा सर्वदा उसके मनोन्दुकूल आचरण करती थी । मुने ! उसके राज्य में मनुष्य सर्वदा दिव्य आभूषणों से भूषित और सुखी रहते थे ॥२-७॥ पृथ्वी अनायास अन्न देती और फल पुष्पों से सुशोभित रहती थी । मुनीश्वर ! इन्द्र समय-समय पर पृथ्वी पर वर्षा कर देते थे । प्रत्येक बाधाओं और अन्याय से राजा धर्मपूर्वक प्रजा की रक्षा करता था । एक दिन उसके हृदय में सम्पत्ति का नाश करने वाला, राज्य

सप्तमोऽध्यायः ३६ एकदा तस्य भूपस्य सर्वसंपद्विनाशकृत् । अहंकारो महाञ्जज्ञे सासूयो लोपहेतुकः ॥१०॥ अहं राजा समस्तानां लोकानां पालको बली । कर्त्ता महाक्रतूनां च मत्तः पूज्योऽस्ति कोऽपरः ॥११॥ अहं विचक्षणः श्रीमान्जिताः सर्वे मयारयः । वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञो नीतिशास्त्रविशारदः ॥१२॥ अजेयोऽव्याहतैश्वर्यो मत्तः कोऽन्योऽधिको भुवि । अहंकारवशस्यैवं जातासूया परेष्वपि ॥१३॥ असूयातोऽभवत्कामस्तस्य राज्ञो मुनीश्वर । एषु स्थितेषु तु नरो विनाशं यात्यसंशयम् ॥१४॥ यौवनं धनसंपत्तिः प्रभुत्वमविवेकिता । एकैकमप्यनर्थाय किमु यत्र चतुष्टयम् ॥१५॥ तस्यासूया तु महती जाता लोकविरोधिनी । स्वदेहनाशिनी विप्र सर्वसंपद्विनाशिनी ॥१६॥ असूयाविष्टमनसि यदि संपत्प्रवर्त्तते । तुषाग्नि वायुसंयोगमिव जानीहि सुव्रत ॥१७॥ असूयोपेतमनसां दम्भाचारवतां तथा । परुषोक्तिरतानां च सुखं नेह परत्र च ॥१८॥ असूयाविष्टचित्तानां सदा निष्ठुरभाषिणाम् । प्रिया वा तनया वापि बान्धवा अप्यरातयः ॥१९॥ मनोभिलाषं कुरुते यः समीक्ष्य परस्त्रियम् । स स्वसंपद्विनाशाय कुठारो नात्र संशयः ॥२०॥ यः स्वश्रेयोविनाशाय कुर्याच्चेतं नरो मुने । सर्वेषां श्रेयसं दृष्ट्वा स कुर्यान्मत्सरं कुधीः ॥२१॥ मित्रापत्यगृहक्षेत्रधनधान्यपशुष्वपि । हानिमिच्छन्नरः कुर्यादसूयां सततं द्विज ॥२२॥ अथ तस्याविनीतस्य ह्यसूयाविष्टचेतसः । हैहयास्तालजंघाश्च बलिनोऽरातयोऽभवन् ॥२३॥ यस्यानुकूलो लक्ष्मीशः सौभाग्यं तस्य वर्द्धते । स एव विमुखो यस्य सौभाग्यं तस्य हीयते ॥२४॥

सत्ता मिटा देने वाला और ईर्ष्या युक्त अहंकार उत्पन्न हो गया । वह सोचने लगा कि मैं समस्त लोगों का स्वामी हूँ, पालक हूँ और सर्व शक्तिसम्पन्न हूँ, बड़े-बड़े यज्ञों का कर्त्ता हूँ । मुझसे बढ़कर दूसरा कौन पूज्य है ? ॥८-११॥ मैं विद्वान् हूँ श्रीमान् हूँ, सब शत्रुओं को मैंने जीत लिया है, वेद-वेदाङ्गों के तत्त्व को जानने वाला और नीति कुशल मैं ही हूँ । मैं अजेय हूँ समस्त ऐश्वर्य मेरे यहाँ केन्द्रीभूत है । मुझसे बढ़कर इस पृथ्वी पर दूसरा कौन है ? इस प्रकार अहंकार हो जाने पर दूसरों के प्रति भी उसको असूया होने लगी । मुनीश्वर ! इस प्रकार असूया बुद्धि (गुणों में दोषों का देखना) हो जाने पर उस राजा के हृदय में काम (इच्छा) जागरित हो गया । इसमें कुछ भी सन्देह नहीं कि इस प्रकार असूया होने पर मनुष्य का नाश अवश्यम्भावी है । युवावस्था, सम्पत्ति, अधिकार मद, अज्ञान इनमें से प्रत्येक अनर्थ की सृष्टि करते हैं । फिर जहाँ ये चारों जुट जाँय वहाँ तो कुछ कहना ही नहीं । उसके हृदय में इस प्रकार की लोकविरोधिनी, स्वदेहनाशिनी और सब सम्पत्तियों को धूल में मिला देने वाली असूया उत्पन्न हो गई ॥१२-१६॥ सुव्रत ! ऐसी असूया रखने वाले व्यक्ति के पास धन हो जाता है तब तो समझो कि तुषाग्नि सुलगती हुई को वायु के झोंक मिल गये । ईर्ष्यालु, दम्भी, और कटुभाषी व्यक्ति को कभी भी लोक और परलोक में सुख नहीं मिलता है । असूया से भरे हृदय वाले और सर्वदा अप्रिय वचन बोलने वाले व्यक्तियों के भाई बन्धु यहाँ तक कि भार्या भी शत्रु हो जाती है । जो दूसरे की स्त्री को देख कर मन में बुरी भावना रखता है वह अपनी संपत्ति नाश का एक मात्र कारण (कुठार) बन जाता है । मुने ! यदि कोई अपने कल्याण का नाश करना चाहे तो वह मूर्ख दूसरों की सम्पत्ति देखकर ईर्ष्या करना सीखे । द्विज ! यदि कोई मित्र, सन्तान, भवन, क्षेत्र, धन, अन्न और पशुओं का नाश चाहता हो तो वह सर्वदा ईर्ष्या करे ॥१७-२२॥ उस राजा की उद्दण्डता और मात्सर्य भाव को देखकर हृदय, ताल जङ्घ आदि बली पड़ोसी राजा शत्रु हो गए । लक्ष्मीपति विष्णु जिसके अनुकूल होते हैं उसकी विभूति बढ़ती है परन्तु वही जिसके प्रतिकूल हो जाते हैं तो उसका सारा वैभव शीघ्र नाशोन्मुख हो जाता है । नारद !

४० नारदीयपुराणम् तावत्पुत्राश्च पौत्राश्च धनधान्यगृहादयः । यावदीक्षेत लक्ष्मीशः कृपापाङ्गेन नारद ॥२५॥ अपि मूर्खान्धबधिरजडाः शूरा विवेकिनः । श्लाघ्या भवन्ति विप्रेन्द्र प्रेक्षिता माधवेन ये ॥२६॥ सौभाग्यं तस्य हीयेत यस्यासूयादिलाञ्छनम् । जायते नात्र संदेहो जन्तुद्वेषो विशेषतः ॥२७॥ सततं यस्य कस्यापि यो द्वेषं कुरुते नरः । तस्य सर्वाणि नश्यन्ति श्रेयांसि मुनिसत्तम ॥२८॥ असूया वर्द्धते यस्य तस्य विष्णुः पराङ्मुखः । धनं धान्यं मही संपद्विनश्यति ततो ध्रुवम् ॥२९॥ विवेकं हन्त्यहंकारस्तद्विवेकात्तु जीविनाम् । आपदः संभवन्त्येवेत्यहंकारं त्यजेत्ततः ॥३०॥ अहंकारो भवेद्यस्य तस्य नाशोऽतिवेगतः । असूयाविष्टमनसस्तस्य राज्ञः परैः सह ॥३१॥ आयोधनमभूद्घोरं मासमेकं निरन्तरम् । हैहयैस्तालजङ्घैश्च रिपुभिः स पराजितः ॥३२॥ स तु बाहुस्ततो दुःखी अन्तर्वत्न्या स्वभार्यया । अवाप परमां तुष्टिं तत्र दृष्ट्वा महत्सरः ॥३३॥ असूयोपेतमलसस्तस्य भावं निरीक्ष्य च । सरोगतविहङ्गास्ते लीनाश्चित्रमिदं महत् ॥३४॥ अहो कष्टमहो रूपं घोरमत्र समागतम् । विशन्तस्त्वरया वासमित्यूचुस्ते विहङ्गमाः ॥३५॥ सोऽवगाह्य सरो भूपः पत्नीभ्यां सहितो मुदा । पीत्वा जलं च सुखदं वृक्षमूलमुपाश्रितः ॥३६॥ तस्मिन्बाहौ वनं याते तेनैव परिरक्षिताः । दुर्गुणान्विगणय्यास्य धिग्धिगित्यब्रुवन्प्रजाः ॥३७॥ यो वा को वा गुणी मर्त्यः सर्वश्लाघ्यतरो द्विजः । सर्वसंपत्समायुक्तोऽप्यगुणी निंदितो जनैः ॥३८॥ मनुष्य की धन-सम्पत्ति-पुत्र, पौत्र, धान्य और गृह आदि तभी तक बढ़ते हैं जब तक उसके ऊपर भगवान् की कृपा । दृष्टि बनी रहती है ॥२३-२५॥ विप्रेन्द्र ! जब तक माधव की कृपा दृष्टि मनुष्य पर बनी रहती है तब तक चाहे वह मूर्ख, अन्धा, बहिरा, भी क्यों न हो परन्तु वह विवेकी, शूर और लोक में आदरणीय रहता है। उस मनुष्य का सौभाग्य शीघ्र नष्ट हो जाता है जो असूया रूपी कलंक से अथवा विशेष रूप से प्राणी-ईर्ष्या से कलंकित हो जाता है। जो मनुष्य जिस किसी व्यक्ति से सर्वदा द्वेष करता रहता है उसके सारे श्रेय नष्ट हो जाते हैं। मुनिश्रेष्ठ ! जिसके हृदय में असूया रहती है उससे भगवान् असन्तुष्ट हो जाते हैं और उसके बाद धन-धान्य, भूमि, संपत्ति आदि शीघ्र नष्ट हो जाते हैं, यह ध्रुव सत्य है ॥२६-२९॥ अहंकार विवेक को नष्ट कर देता है। अविवेक से आपत्तियाँ आ जाती हैं। इसलिए अहंकार को कभी भी पास नहीं फटकने देना चाहिए। जिसको अहंकार हो जाता है, उसका शीघ्र नाश हो जाता है। उस असूया के कारण उस ईर्ष्यालु राजा से शत्रुओं ने घोर युद्ध किया । हैहय-तालजङ्घ आदि रिपुओं से एक मास तक सतत युद्ध होता रहा, जिसमें वह राजा पराजित हुआ । ॥३०-३२॥ निदान, दुःखी होकर वह राजा अपनी गर्भिणी पत्नी को साथ लेकर भटकता हुआ एक बहुत बड़े सरोवर के पास पहुँचा। सरोवर को देखकर वह बहुत प्रसन्न हुआ परन्तु उसकी असूया-भावना को देखकर उस तालाब के पक्षी आदि जीव छिप गए, यह आश्चर्य जनक घटना हुई। उस राजा को देख कर पक्षी आपस में कहने लगे कि 'अहा ! बड़ा अनर्थ हुआ यहाँ महाभयङ्कर प्राणी आ गया तुम लोग शीघ्र सरोवर में घुस जाओ। वह राजा प्रसन्नता पूर्वक पत्नी सहित सरोवर में स्नान कर और जल पान कर एक वृक्ष की सुखद छाया में बैठ गया । ॥३३-३६॥ उस बाहु राजा के इस प्रकार वन में चले जाने पर उनके ही शासन और रक्षा में रहने वाली प्रजा उनके अवगुणों का स्मरण कर धिक्कारने लगी। द्विज ! चाहे मनुष्य गुणवान् हो या न हो परन्तु सम्पत्तिशाली होने पर वह आदरणीय समझा जाता है। वही जब विभवहीन हो जाता है तब मनुष्यों द्वारा निन्दित होता है। इस संसार में अपयश के समान मृत्यु भी कष्टकर नहीं है। जब राजा बाहु वन को चला गया तब उससे राग करने

सप्तमोऽध्यायः ४१ अपकीर्तिसमो मृत्युर्लोकेष्वन्यो न विद्यते । यदा बाहुर्वनं यातस्तदा तद्भागगा जनाः ॥३६॥ निन्दितो बहुशो बाहुर्मृतवत्कानने स्थितः । निहत्य कर्म च यशो लोके द्विजवरोत्तम ॥४०॥ नास्त्यकीर्तिसमो मृत्युर्नास्ति क्रोधसमो रिपुः । नास्ति निन्दासमं पापं नास्ति मोहसमासवः ॥४१॥ नास्त्यसूयासमा कीर्तिर्नास्ति कामसमोऽनलः । नास्ति रागसमः पाशो नास्ति सङ्गसमं विषम् ॥४२॥ एवं विलप्यबहुधा बाहुरत्यन्तदुःखितः । जीर्णाङ्गो मनसस्तापाद् वृद्धभावादभूदसौ ॥४३॥ गते बहुतिथे काले और्वाश्रमसमीपतः । स बाहुर्व्याधिना ग्रस्तो ममार मुनिसत्तम ॥४४॥ तस्य भार्या च दुःखार्ता कनिष्ठा गर्भिणी तदा । चिरं विलप्य बहुधा सह गन्तुं मनोदधे ॥४५॥ समानीय च सैधांसि चितां कृत्वातिदुःखिता । समारोप्य तमारूढं स्वयं समुपचक्रमे ॥४६॥ एतस्मिन्नन्तरे धीमानौर्वस्तेजोनिधिर्मुनिः । एतद्विज्ञातवान्सर्वं परमेण समाधिना ॥४७॥ भूतं भव्यं वर्तमानं त्रिकालज्ञा मुनीश्वराः । गतासूया महात्मानः पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषा ॥४८॥ तपोभिस्तेजसां राशिरौर्वपुण्यसमो मुनिः । संप्राप्तस्तत्र साध्वी च यत्र बाहुप्रिया स्थिता ॥४६॥ चितामारोढुमुद्युक्तां तां दृष्ट्वा मुनिसत्तमः । प्रोवाच धर्ममूलानि वाक्यानि मुनिसत्तमः ॥५०॥ और्व उवाच राजवर्यप्रिये साध्वि मा कुरुष्वातिसाहसम् । तवोदरे चक्रवर्ती शत्रुहन्ता हि तिष्ठति ॥५१॥ बालापत्याश्च गर्भिण्यो ह्यदृष्टऋतवस्तथा । रजस्वला राजसुते ! नारोहति चितां शुभे ॥५२॥ वाले लोगों ने उसी प्रकार शक्ति का अनुभव किया जैसे जलन मिट जाने पर लोग करते हैं ॥३७-३६॥ लोक से अनेक प्रकार का अयश पाकर वह राजा वन में मृतक के समान रहने लगा । उसका यश और पूर्व सत् कर्म सभी लुप्त- से हो गए । द्विज ! इस संसार में अपयश के समान मृत्यु नहीं, न तो क्रोध के समान कोई दूसरा शत्रु ही है । निन्दा के समान कोई पाप नहीं और मोह के समान कोई दूसरा नशा भी नहीं है । असूया के समान कोई अयश और काम के समान भस्म करने वाला अग्नि भी नहीं है । अनुराग के समान इस लोक में दूसरा बंधन नहीं और संग (लोकासक्ति) के समान कोई विष नहीं है । इस प्रकार अपनी हीन दशा पर रोकर वह राजा अत्यन्त दुःखी हो गया । मानसिक संताप के कारण वह दिन प्रति दिन शिथिल होने लगा और असमय में ही बूढ़ा हो गया ॥४०-४३॥ मुनिश्रेष्ठ ! बहुत समय बीत जाने पर वह राजा बाहु और्व ऋषि के आश्रम के समीप व्याधि- ग्रस्त होकर मर गया । उसकी छोटी भार्या, जो उस समय गर्भिणी थी, दुःख से कातर हो गई । बहुत विलाप करने के बाद उसने सती होने का निश्चय किया । उस दुःखी रानी ने इधर-उधर से लकड़ियां लाकर चिता बनाई । उस पर अपने पति का शव रखकर स्वयं चिता में भस्म होने को उद्यत हुई । इसी बीच परम तेजोनिधि और ज्ञानी मुनि और्व ने अपनी परम समाधि के द्वारा सारी बातें जान लीं । क्योंकि त्रिकालज्ञ, उदार और महात्मा मुनीश्वर अपने ज्ञान चक्षु से भूत, भविष्यत् और वर्तमान सब कुछ जान लेते हैं ॥४४-४८॥ तपस्या और तेज-पुंज के विधान पर पुण्यवान् मुनि और्व उस स्थान पर आये जहाँ वह साध्वी बाहु की प्रिय पत्नी सती होने को प्रस्तुत थी । चिता पर आरूढ़ होने के लिए प्रस्तुत उस साध्वी को देखकर मुनिवर्य और्व धर्म-सम्मत उपदेश देने लगे । ॥४६-५०॥ और्व बोले—'बाहु की प्रिय भार्या ! सती ! ऐसा घोर साहस मत करो । तुम्हारे उदर में शत्रुओं का नाश करने वाला चक्रवर्ती सम्राट् है । शुभे ! राजसुते ! जिसका बच्चा छोटा हो, जो गर्भिणी हो, जिसको अभी फा० ६—मा०

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४२ नारदीयपुराणम् ब्रह्महत्यादिपापानां प्रोक्ता निष्कृतिरुत्तमैः । दम्भिनो निन्दकस्यापि भ्रूणघ्नस्य न निष्कृतिः ॥५३॥ नास्तिकस्य कृतघ्नस्य धर्मोपेक्षाकरस्य च। विश्वासघातकस्यापि निष्कृतिर्नास्ति सुव्रते ॥५४॥ तस्मादेतन्महत्पापं कर्तुं नार्हसि शोभने । यदेतद् दुःखमुत्पन्नं तत्सर्वं शान्तिमेष्यति ॥५५॥ इत्युक्ता मुनिना साध्वी विश्वस्य तदनुग्रहम् । विललापातिदुःखार्ता निगृह्यचरणौ मुनेः ॥५६॥ और्वोऽपि तां पुनः प्राह सर्वशास्त्रार्थकोविदः । मारोदीराजतनये श्रियमग्रे गमिष्यसि ॥५७॥ मा मुंचाश्रु महाभागे प्रेतो दाह्योऽद्य सज्जनैः । तस्माच्छोकं परित्यज्य कुरु कालोचितां क्रियाम् ॥५८॥ पंडिते वापि मूर्खे वा दरिद्रे वा श्रियान्विते । दुर्वृत्ते वा सुवृत्ते वा मृत्योः सर्वत्र तुल्यता ॥५९॥ नगरे वा तथा मन्ये दैन्यमत्रातिरिच्यते ॥६०॥ यद्यत्पुरातनं कर्म तत्तदेव ह युज्यते । कारणं दैवमेवात्र मन्ये सोपाधिका जनाः ॥६१॥ गर्भे वा बाल्यभावे वा यौवने वापि वार्धके । मृत्योर्वशे प्रयातव्यं जन्तुभिः कमलानने ॥६२॥ हन्ति पाति च गोविन्दो जन्तूनकर्मवशे स्थितान् । प्रवादं रोपयन्त्यज्ञा हेतुमात्रेषु जन्तुषु ॥६३॥ तस्माद्दुःखं परित्यज्य सुखिनी भव सुव्रते । कुरु पत्युश्च कर्माणि विवेकेन स्थिरा भव ॥६४॥ एतच्छरीरं दुःखानां व्याधीनामुयुतैर्वृतम् । सुखाभासं बहुक्लेशं कर्मपाशेन यन्त्रितम् ॥६५॥ इत्याश्वास्य महाबुद्धिस्तया कार्याण्यकारयत् । त्यक्तशोका च सा तन्वी नता प्राह मुनीश्वरम् ॥६६॥ किमात्र चित्रं यत्सन्तः परार्थफलकांक्षिणः । नहि द्रुमाश्च भोगार्थं फलन्ति जगतीतले ॥६७॥

रजोदर्शन न होता हो और जो ऋतुमती हो उसको सती होने के लिए शास्त्र आज्ञा नहीं देता है । महान् व्यक्तियों ने ब्रह्महत्या आदि पापों के लिए प्रायश्चित्त कहा है; परन्तु पाखण्डी, परनिन्दक, और भ्रूणहत्या करने वालों का प्रायश्चित्त नहीं है । सुव्रते ! नास्तिक, कृतघ्न, धर्म की उपेक्षा करने वाले और विश्वासघात करने वाले के पापों का भी प्रायश्चित्त नहीं है । इसलिए शोभने ! तुम इस महापाप को करने का साहस मत करो । जो यह विपत्तियां आई हुई हैं सब दूर हो जायेंगी ॥५१-५५॥ मुनि की इन बातों को सुनकर उनके अनुग्रह पर उस साध्वी को विश्वास हुआ । परन्तु दुःख से व्याकुल वह मुनि के चरण पकड़ कर विलाप करने लगी । तब सब शास्त्रों के मर्मज्ञ मुनि और्व पुनः उसको सान्त्वना देते हुए बोले-राजकुमारी ! मत रोओ । तुम भविष्य में कल्याण प्राप्त करोगी । महाभाग्यशालिनी ! आंसू मत बहाओ । देखो, इस समय सज्जनों के आदेशानुसार इस प्रेत की दाह क्रिया करो । तुम लौकिक मोह छोड़कर कालोचित क्रिया करो । मृत्यु पण्डित, मूर्ख, दरिद्र, धनी, आचार-हीन या सदाचारी, नगर में हो या वन में सबको समान दृष्टि से देखती है । यहाँ दैन्य अधिक है, ऐसा मानता हूँ, परन्तु इसमें किसी का दोष नहीं । मनुष्य के जो पूर्वजन्म के कर्म हैं वे ही यहाँ प्राप्त होते हैं । संसार में प्रत्येक कार्य का कारण दैव ही है । मनुष्य केवल निमित्त मात्र या बहाने हैं ॥५६-६१॥ कमल के समान सुन्दर मुख वाली ! चाहे प्राणी गर्भ में रहे या बालक या युवा या बुड्ढा कोई भी हो परन्तु काल वश वह मृत्यु का ग्रास बनता ही है । गोविन्द ही अपने कर्म के बन्धन में बँधे प्राणियों की रक्षा या नाश करते हैं । वे मूर्ख हैं जो निमित्त मात्र बने दूसरों को दोष लगाते हैं । सुव्रते ! इसलिए दुःख को छोड़कर शान्त हो जाओ । अपने विवेक से शान्त होकर पति की अन्त्येष्टि क्रिया करो । अपने कर्म के बन्धनों से बँधा यह शरीर असंख्य व्याधियों से घिरा है। इसको बहुत क्लेश के बाद सुख नहीं प्रत्युत केवल सुख का आभास मिलता है ॥६२-६५॥ इस प्रकार ज्ञानी मुनि ने उसको ढाढस बँधा कर उसके द्वारा सारी प्रेत-क्रिया कराई । स्वयं आश्वासन पाकर इस कोमलाङ्गी रानी ने नम्र होकर मुनीश्वर से कहा- यदि सज्जन परोपकार को ही अपने जीवन का उद्देश्य समझते हैं तो इसमें आश्चर्य ही क्या है ? इस भूतल पर वृक्ष स्वयं अपने भोग के लिए नहीं फलते हैं ! जो दूसरों को दुःखी जानकर

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सप्तमोऽध्यायः ४३ योऽन्यदुःखानि विज्ञाय साधुवाक्यैः प्रबोधयेत् । स एव विष्णुस्सत्त्वस्थो यतः परहिते स्थितः ॥६८॥ अन्य दुःखेन यो दुःखी योऽन्यहर्षेण हर्षितः । स एव जगतामीशो नररूपधरो हरिः ॥६६॥ सद्भिः श्रुतानि शास्त्राणि परदुःखविमुक्तये । सर्वेषां दुःखनाशाय इति सन्तो वदन्ति हि ॥७०॥ यत्र सन्तः प्रवर्त्तन्ते तत्र दुःखं न बाधते । वर्तते यत्र मार्तण्डः कथं तत्र तमो भवेत् ॥७१॥ इत्येवं वादिनी सा तु स्वपत्युश्चापराः क्रियाः । चकार तत्सरस्तीरे मुनिप्रोक्तविधानतः ॥७२॥ स्थिते तत्र मुनौ राजा देवराडिव संज्वलन् । चितामध्याद्विनिष्क्रम्य विमानवरमास्थितः ॥ प्रपेदे परसं धाम नत्वा चौर्वं मुनीश्वरम् ॥७३॥ महापातकयुक्ता वा युक्ता वा चोपपातकैः । परं पदं प्रयान्त्येव महद्भिरवलोकिताः ॥७४॥ कलेवरं वा तद्भस्म तद्धूमं वापि सत्तम । यदि पश्यति पुण्यात्मा स प्रयाति परां गतिम् ॥७५॥ पत्युः कृतक्रिया सा तु गत्वाश्रमपदं मुनेः । चकार तस्य शुश्रूषां सपत्नया सह नारद ॥७६॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे गङ्गामाहात्म्ये नाम सप्तमोऽध्यायः ॥७॥ अपने उचित और प्रिय वचनों से ढाढस बँधाता है वही मानवरूप में विष्णु हैं, क्योंकि वह परोपकार में लीन है ॥६६-६६॥ जो दूसरे के दुःख को देखकर दुःखी होता है और सुखी देखकर स्वयं सुखी होता है वह मनुष्य नहीं प्रत्युत मनुष्यरूपधारी संसार का पालक हरि हैं। सज्जनों के मुख से सुने गए शास्त्र दूसरों के दुःख दूर करने में कारण बनते हैं परन्तु सज्जन सबके दुःखों के नाश के कारण होते हैं, ऐसा कहा जाता है। जहाँ सज्जन रहते हैं वहाँ दुःखों से बाधा नहीं पहुँचती; क्योंकि जहाँ स्वयं सूर्य विद्यमान है वहाँ अन्धकार कैसे टिक सकता है ? इस प्रकार मुनि की स्तुति करने के बाद उस रानी ने मुनि की बतायी हुई विधि के अनुसार उस सरोवर के तट पर अपने पति की श्राद्ध-क्रिया सम्पन्न की ॥७०-७२॥ उस मुनि की उपस्थिति में ही वह राजा इन्द्र के समान जाज्वल्यमान शरीर धारण कर उस चिता-भस्म से निकला और मुनीश्वर को प्रणाम कर उत्तम विमान पर आरूढ़ होकर परम धाम को चला गया । चाहे महापापी हो या उपपापों का करने वाला हो परन्तु वह सज्जनों की पावन दृष्टि के पड़ते ही परम पद को पा जाता है । सज्जन-श्रेष्ठ ! केवल शव-शरीर, भस्म अथवा चिता धूम को भी यदि सज्जन देख लें तो भी वह मृत प्राणी परम पद को पा जाता है। नारद ! इस प्रकार अपने पति की श्राद्ध क्रिया समाप्त कर वह रानी अपनी सौत के साथ मुनि के आश्रम में गई और मुनि की सेवा में रत रह कर दिन बिताने लगी ॥७३-७७॥ श्रीनारदीयमहापुराण में गंगामाहात्म्यप्रकरण में बाहु का मृत्यु वर्णन नामक सातवाँ अध्याय समाप्त ॥७॥

अष्टमोऽध्यायः सनक उवाच एवमौर्वाश्रमे ते द्वे बाहुभार्ये मुनीश्वर । चक्राते भक्तिभावेन शुश्रूषां प्रतिवासरम् ॥१॥ गते वर्षाद्धिके काले ज्येष्ठा राज्ञी तु या द्विज । तस्याः पापमतिर्जाता सपत्न्याः संपदं प्रति ॥२॥ ततस्तया गरो दत्तः कनिष्ठायै तु पापया । न स्वप्रभावं चक्रे वै गरो मुनिनिषेवया ॥३॥ भूलेपनादिभिः सम्यग्रतः सानुदिनं मुनेः । चकार सेवां तेनासौ जीर्णपुण्येन कर्मणा ॥४॥ ततो मासत्रयेऽतीते गरेण सहितं सुतम् । सुषाव सुशुभे काले शुश्रूषानष्टकिल्बिषा ॥५॥ अहो सत्संगतिर्लोके किं पापं न विनाशयेत् । न ददातिसुखं किं वा नराणां पुण्यकर्मणाम् ॥६॥ ज्ञानाज्ञानकृतं पापं यच्चान्यत्कारितं परैः । तत्सर्वं नाशयत्याशु परिचर्या महात्मनाम् ॥७॥ जडोऽपि याति पूज्‍यत्वं सत्संगाज्जगतीतले । कलामात्रोऽपि शीतांशुः शंभुना स्वीकृतो यथा ॥८॥ सत्संगतिः परामृद्धिं ददाति हि नृणां सदा । इहामुत्र च विप्रेन्द्र सन्तः पूज्यतमास्ततः ॥९॥ अहो महद्गुणान्वक्तुं कः समर्थो मुनीश्वर । गर्भं प्राप्तो गरो जीर्णो मासत्रयमहोऽद्भुतम् ॥१०॥

अध्याय ८ गंगा माहात्म्य-वर्णन

सनक बोले--मुनीश्वर ! इस प्रकार राजा बाहु की दोनों स्त्रियां आश्रम में प्रति दिन मुनि की सेवा करने लगीं । द्विज ! जब वर्षा ऋतु का आधा भाग बीत गया तब ज्येष्ठ रानी के मन में अपने सौत के प्रति ईर्ष्या जाग उठी । उस पापिनी ने अपनी छोटी गर्भिणी सौत को विष दे दिया । परन्तु मुनि की सेवा के प्रभाव से उस विष का कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ा क्योंकि वह प्रति दिन (आश्रम में) भली-भांति भूमिलेपन आदि कार्यों से मुनि की सेवा करती थी । उसी पुण्य के प्रभाव से उसका बाल भी बाँका नहीं हुआ । तत्पश्चात् तीन मास बीत जाने पर उस रानी ने शुभ मुहूर्त्त में गर के (विष के) साथ ही पुत्र को उत्पन्न किया । मुनि की सेवा के कारण उस विष का प्रभाव नष्ट हो चुका था, अतः बालक को किसी प्रकार की हानि नहीं हुई ॥१-५॥ अहो सत्संगति मनुष्य के किस पाप को नष्ट नहीं कर देती है या मनुष्यों को पुण्य कर्मों के फलस्वरूप कौन-सा सुख नहीं देता है ? महात्माओं की सेवा से जाने अनजाने अथवा दूसरों के द्वारा कराये गये पाप शीघ्र नष्ट हो जाते हैं । इस भूतल पर मूर्ख भी सत्संगति के प्रभाव से पूज्य हो जाता है, जैसे शंभु कला मात्र अवशिष्ट चन्द्रमा को भी स्वीकार करते हैं । सत्संगति मनुष्यों को सर्वदा उत्तम वैभव प्रदान करती हैं । विप्रेन्द्र ! इसीलिए सन्त इस लोक या परलोक में सर्वत्र पूजित होते हैं । मुनीश्वर ! सत्संगति के महान् गुणों का वर्णन कोई कैसे कर सकता है ? क्योंकि तीन महीने तक गर्भ में रहकर भी वह विष प्रभावकर नहीं हुआ प्रत्युत जीर्ण-शीर्ण हो गया, यह आश्चर्य की बात है ।

अष्टमोऽध्यायः ४५ गरेण सहितं पुत्रं दृष्ट्वा तेजोनिधिर्मुनिः । जातकर्म चकारासौ तन्नाम सगरेति च ॥११॥ पुपोष सगरं बालं तन्माता प्रीतिपूर्वकम् । चौलोपवीतकर्माणि तथा चक्रे मुनीश्वरः ॥१२॥ शास्त्राण्यध्यापयामास राजयोग्यानि मंत्रवित् । समर्थं सगरं दृष्ट्वा किंचिदुद्भिन्नशैशवम् ॥१३॥ मन्त्रवत्सर्वशस्त्रास्त्रं दत्तवान्स मुनीश्वरः । सगरः शिक्षितस्तेन सम्यगौर्वेषिणा मुने ॥१४॥ बभूव बलवान्धर्मी कृतज्ञो गुणवान्सुधीः । धर्मज्ञः सोऽपि सगरो मुनेरमिततेजसः ॥ ॥१५॥ समिस्कुशांबुपुष्पादि प्रत्यहं समुपानयत् स कदाचिद्गुणनिधिः प्रणिपत्य स्वमातरम् । उवाच प्रांजलिर्भूत्वा सगरो विनयान्वितः ॥१६॥ सगर उवाच मातर्गतः पिता कुत्र किंनामा कस्य वंशजः । तत्सर्वं मे समाचक्ष्व श्रोतुं कौतूहलं मम ॥१७॥ ॥१८॥ पित्रा विहीना ये लोके जीवंतोऽपि मृतोपमाः दरिद्रोऽपि पिता यस्य ह्यास्ते स धनदोपमः । यस्य माता पिता नास्ति सुखं तस्य न विद्यते ॥१९॥ धर्महीनो यथा मूर्खः परत्रेह च निन्दितः । मातापितृविहीनस्य अज्ञस्याप्यविवेकितः ॥ ॥२०॥ अपुत्रस्य वृथा जन्म ऋणग्रस्तस्य चैव हि चन्द्रहीना यथा रात्रिः पद्महीनं यथा सरः । पतिहीना यथा नारी पितृहीनस्तथा शिशुः ॥२१॥ धर्महीनो यथा जन्तुः कर्महीनो यथा गृही । पशुहीनो यथा वैश्यस्तथा पित्रा विनार्भकः ॥२२॥ सत्यहीनं यथा वाक्यं साधुहीना यथा सभा । तपो यथा दयाहीनं तथा पित्रा विनार्भकः ॥२३॥ ॥१६-१०॥ तेजःपुंज मुनि ने जब यह देखा कि उस बालक के साथ गर ( विष ) भी उत्पन्न हुआ है तब उसका जात कर्म संस्कार करने के बाद 'सगर' नाम रख दिया । उस बालक की माता बालक का पालन करने लगी और उस मुनीश्वर ने चूड़ाकर्म और यज्ञोपवीत संस्कार कराये । उस मन्त्रज्ञ मुनि ने राजाओं के योग्य समस्त शास्त्रों का उपदेश भी कर दिया । जब उस मुनीश्वर ने देखा कि अब यह सगर समर्थ (समझदार) हो गया है कुछ शिशुता भी दूर हो चली है तब उन्होंने मन्त्रपूर्वक सारे अस्त्र-शस्त्र भी सिखा दिये । मुने ! ऋषि और्व ने वह सगर को भली- भाँति शिक्षा दी । वह बालक सगर भी, मुनि के अमित तेज के प्रभाव से बलवान्, धार्मिक, कृतज्ञ, विद्वान्, गुणी और धर्म का ज्ञाता हुआ । वह प्रति-दिन परम तेजोनिधि मुनि के लिए समिधा, कुश, जल और पुष्प आदि ला दिया करता था । एक दिन वह गुणी बालक माता को प्रणाम करके हाथ जोड़कर नियम पूर्वक अपनी माता से बोल. ॥११-१६॥ सगर ने कहा—मां ! मेरे पिता कहाँ चले गए ? उनका नाम क्या था ? और वे किसके वंशज थे ? मुझसे सारी बातें कहो, मुझे इन बातों को सुनने के लिए कौतूहल हो रहा है । जो इस संसार में पिता से हीन हैं उनका जीना भी मरने के समान हैं । जिसके पिता जीवित हैं वह दरिद्र होता हुआ भी कुवेर के समान है । जिसके माता और पिता नहीं हैं उसको जीवन में कभी भी सुख नहीं मिलता । जिस प्रकार धर्म रहित अज्ञानी व्यक्ति की इस लोक में और पर लोक में सर्वत्र निन्दा होती है उसी प्रकार उस अविवेकी मूर्ख की भी निन्दा होती है जो माता-पिता से हीन है । ऋण के भार से दबे और पुत्र से रहित व्यक्ति का जन्म व्यर्थ है ॥१७-२०॥ जिस प्रकार चन्द्र से शून्य रात्रि की, कमल से हीन सरोवर की और पति हीन नारी की शोभा नहीं होती उसी प्रकार पिता से हीन बालक की भी शोभा नहीं होती । जिस प्रकार धर्म से विमुख प्राणी, कर्मच्युत गृहस्थ और पशु से हीन कृषक का जीवन निरर्थक है उसी प्रकार बालक पिता के बिना निरर्थक है । जिस प्रकार सत्य से हीन वाक्य,

४६ नारदीयपुराणम् वृक्षहीनं यथारण्यं जलहीना यथा नदी । वेगहीनो यथा वाजी तथा पित्रा विनाऽर्भकः ॥२४॥ यथा लघुत्तरो लोके मातर्याच्ञापरो नरः । तथा पित्रा विहीनस्तु बहुदुःखान्वितः सुतः ॥२५॥ इतीरितं सुतेनैषा श्रुत्वा निःश्वस्य दुःखिता । संपृष्टं तद्यथावृत्तं सर्वं तस्मै न्यवेदयत् ॥२६॥ तच्छ्रुत्वा सगरः क्रुद्धः कोपसंरक्तलोचनः । हनिष्यामीत्यरातींन्स प्रतिज्ञामकरोत्तदा ॥२७॥ प्रदक्षिणीकृत्य मुनिं जननीं च प्रणम्य सः । प्रस्थापितः प्रतस्थे च तेनैव मुनिना तदा ॥२८॥ और्वाश्रमाद्विनिष्क्रान्तः सगरः सत्यवाक् शुचिः । वशिष्ठं स्वकुलाचार्यं प्राप्तः प्रीतिसमन्वितः ॥२९॥ प्रणम्य गुरवे तस्मै वशिष्ठाय महात्मने । सर्वं विज्ञापयामास ज्ञानदृष्ट्या विजानते ॥३०॥ ऐन्द्रास्त्रं वारुणं ब्राह्ममाग्नेयं सगशे नृपः । तेनैव मुनिनाऽवाप खङ्गं वज्रोपमं धनुः ॥३१॥ ततस्तेनाभ्यनुज्ञातः सगरः सौमनस्यवान् । आशीर्भिरर्चितः सद्यः प्रतस्थे प्रणिपत्य तम् ॥३२॥ एकेनैव तु चापेन स शूरः परिपन्थिनः । सपुत्रपौत्रांत्सगणानकरोत्स्वर्गवासिनः ॥३३॥ तच्चापमुक्तबाणाग्निसंतप्तास्तदरातयः । केचिद्विनष्टा संत्रस्तास्तथा चान्ये प्रदुद्रुवुः ॥३४॥ केचिद्विशीर्णकेशाश्च वल्मीकोपरि संस्थिताः । तृणान्यभक्षयंकेचिन्नग्नाश्च विविशुर्जलम् ॥३५॥ शकाश्च यवनाश्चैव तथा चान्ये महीभृतः । सत्वरं शरणं जग्मुर्वशिष्ठं प्राणलोलुपाः ॥३६॥ जितक्षितिर्बाहुपुत्रो रिपुन्गुरुसमीपगान् । चारैर्विज्ञातवान्सद्यः प्राप्तश्चाचार्यसन्निधिम् ॥३७॥ सज्जनों से हीन सभा, करुणा से हीन तपस्या की कुछ भी सार्थकता नहीं उसी प्रकार पिता से रहित बालक का जीवन निरर्थक है। जिस प्रकार वृक्ष विहीन वन, जल हीन नदी, वेग हीन (बिना चाल के) अश्व का कुछ भी मूल्य नहीं उसी प्रकार उस बालक का कुछ भी महत्त्व नहीं जिसके पिता का कुछ पता न हो। माता ! जिस प्रकार याचक का जीवन संसार में तुच्छ है उसी प्रकार पितृ विहीन बालक का जीवन दुःखों से ही घिरा रहता है। ॥२४-२५॥ बालक सगर की उपर्युक्त बातों को सुनकर माता अत्यन्त दुःखी हुई। उसने लम्बी साँस लेकर जैसा पुत्र ने प्रश्न किया था तदनुरूप सारी घटना कह सुनाई। सारी घटनायें सुन कर सगर क्रुद्ध हो उठा। उसके नेत्र क्रोध से लाल हो गए। उसने तत्काल शत्रुओं के मारने की प्रतिज्ञा की। तदनन्तर वह मुनि और माता की प्रदक्षिणा कर उसी मुनि की आज्ञा और योजना के अनुसार वहाँ से चल पड़ा। सत्यवादी और पवित्र वह सगर मुनि और्व के आश्रम को छोड़कर कुल गुरु वशिष्ठ के आश्रम में आया। स्वकुलाचार्य गुरु के आश्रम को देखकर उसको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥२६-२९॥ गुरु को प्रणाम कर उसने ज्ञान दृष्टि से सब कुछ जान लेने वाले गुरु वशिष्ठ से सारी कथा कह दी। गुरु के अनुग्रह से राजा सगर ने उसी गुरु मुनि से ऐन्द्र, वारुण, ब्राह्म और आग्नेयास्त्र भी प्राप्त कर लिया और उसी मुनि से उसने एक खड्ग और वज्र के समान एक धनुष भी प्राप्त किया। तदनन्तर गुरु का आशीर्वाद पाकर मनस्वी सौम्य सगर लक्ष्मण गुरु को प्रणाम कर उनकी कृपा का वरदान प्राप्त कर शत्रु संहार के लिए चल पड़ा। उसी एक धनुष से उस शूर ने अपने सभी शत्रुओं को कुटुम्ब सहित यमलोक पहुँचा दिया ॥३०-३३॥ उसके धनुष से छूटे हुए बाणों की ज्वाला से कितने शत्रु नष्ट हो गए, कुछ भयत्रस्त हो गए और कितने तो देश छोड़कर भाग निकले। कितने शिर केश मुँड़वा कर डर के मारे वल्मीक पर जा बैठे, कितने शत्रुओं ने दाँतों तले तृण रखकर अधीनता स्वीकार की और कुछ नंगे होकर जल में छिप गए। प्राण रक्षा के लाभ से कितने शक, यवन एवं अन्य दूसरे राजा शीघ्र गुरु वसिष्ठ की शरण में गए। बाहु-पुत्र सगर ने जब सारी पृथ्वी जीत ली तब वह गुप्तचरों के द्वारा यह जान कर कि आचार्य वसिष्ठ के समीप शत्रु छिपे हुए हैं शीघ्र गुरु के समीप पहुँचा। मुनि वसिष्ठ ते

अष्टमोऽध्यायः ४७ समागतं बाहुसुतं निशम्य मुनिर्वशिष्ठः शरणागतांस्तान् । त्रातुं च शिष्याभिहितं च कर्तुं विचारयामास तदा क्षणेन ॥३८॥ चकार मुण्डाञ्शबरांयवनांलम्बमूर्द्धजान् । अन्धांश्च श्मश्रुलांत्सर्वान्मुण्डान्वेदबहिष्कृतान् ॥३६॥ वसिष्ठमुनिना तेन हतप्रायान्निरीक्ष्य सः । प्रहसन्नाह सगरः स्वगुरुं तपसो निधिम् ॥४०॥ सगर उवाच भो भो गुरो दुराचारानेतान्रक्षसि तान्वृथा । सर्वथाहं हनिष्यामि मत्पितुर्देशहारकान् ॥४१॥ उपेक्षेत समर्थः सन्धर्मस्य परिपन्थिनः । स एव सर्वनाशाय हेतुभूतो न संशयः ॥४२॥ बाधन्ते प्रथमं मत्ता दुर्जनाः सकलं जगत् । त एव बलहीनाश्चेद्भजन्तेऽत्यन्तसाधुताम् ॥४३॥ अहो मायाकृतं कर्म खलाः कश्मलचेतसः । तावत्कुर्वन्ति कार्याणि यावत्स्यात्प्रबलं बलम् ॥४४॥ दासभावं च शत्रूणां वारस्त्रीणां च सौहृदम् । साधुभावं च सर्पाणां श्रेयस्कामो न विश्वसेत् ॥४५॥ प्रहासं कुर्वते नित्यं यान्दन्तान्दर्शयन्खलाः । तानेव दर्शयन्त्याशु स्वसामर्थ्यविपर्यये ॥४६॥ पिशुना जिह्वया पूर्वं परुषं प्रवदन्ति च । अतीव करुणं वाक्यं वदन्त्येव तथाबलाः ॥४७॥ श्रेयस्कामो भवेद्यस्तु नीतिशास्त्रार्थकोविदः । साधुत्वं समभावं च खलानां नैव विश्वसेत् ॥४८॥ दुर्जनं प्रणतिं यान्तं मित्रं कैतवशीलिनम् । दुष्टां भार्या च विश्वस्तो मृत एव न संशयः ॥४६॥ मा रक्ष तस्मादेतान्वै गोरूपव्याघ्रकर्मिणः । हत्वैतानखिलान् दुष्टांस्त्वत्प्रसादान्महीं भजे ॥५०॥ वशिष्ठस्तद्वचः श्रुत्वा सुप्रीतो मुनिसत्तमः । कराभ्यां सगरस्याङ्गं स्पृशन्निदमुवाच ह ॥५१॥ बाहु पुत्र सगर का आश्रम में आना सुना तो शीघ्र ही शरणागत शत्रुओं की रक्षा का उपाय और शिष्य की प्रार्थना का उत्तर सोच निकाला। लम्बे-लम्बे केश रखने वाले शबर और यवनों के बाल मुंड़वा दिये और वेद विमुख उन दाढ़ी रखने वाले अन्धों की दाढ़ी मुंड़वा कर मुण्डी बना दिया । मुनि वशिष्ठ द्वारा शत्रुओं की यह दशा देखकर राजा ने उनको मरा सा समझ लिया और हँसकर तपोनिधि गुरु वसिष्ठ से कहा ॥३४-४०॥ सगर बोला- हे गुरुदेव ! आप इन दुराचारी शत्रुओं की क्यों व्यर्थ में रक्षा कर रहे हैं ? मेरे पिता का सर्वस्व अपहरण करने वाले इन शत्रुओं को अवश्य मारूँगा । जो समर्थ होते हुए भी धर्मद्रोही शत्रुओं की उपेक्षा करता है अन्त में वे ही शत्रु उसके सर्वनाश का कारण बनते हैं। (बल से) उन्मत्त दुर्जन व्यक्ति पहले तो सारे संसार को कष्ट पहुँचाते हैं, पर बलहीनदशा में वे ही अत्यन्त साधु बन जाते हैं। अहो ! दुष्ट हृदय पामर जनों की विचित्र माया है । वे तब तक ही अच्छे कार्य करते हैं जब तक उनकी शक्ति नहीं बढ़ जाती है। कल्याणેચ્છु व्यक्ति को शत्रुओं के दास-भाव, वेश्याओं की सहृदयता और साँपों की सरलता पर कभी भी विश्वास नहीं करना चाहिए ॥४१-४५॥ दुष्ट जन विभव-काल में जिन दाँतों को दिखाकर (अट्टहास कर) दूसरों की हंसी उड़ाते हैं, हीन दशा आ जाने पर उन्हीं दाँतों को दिखाकर अपनी दीनता को दिखाते हैं । धूर्त शत्रु जिस जिह्वा से पहले बढ़-चढ़ कर बातें करते हैं, निर्बल हो जाने पर उसी जीभ से करुण वाक्य बोलते हैं। जो श्रेय चाहने वाले व्यक्ति नीति कुशल होते हैं वे दुष्टों के साधुभाव और उनके सौम्य व्यवहार पर कभी भी विश्वास नहीं करते हैं । नम्र होने वाले शत्रु, कपट परायण मित्र एवं दुष्ट भार्या पर जो विश्वास करता है, वह मरा हुआ ही है, इसमें कुछ सन्देह नहीं ॥४६-४६॥ इसलिए गुरुदेव ! आप इन बाघ के समान हिंसक परन्तु इस समय गाय के समान दीन शत्रुओं की रक्षा मत कीजिए । आज मैं आपकी कृपा से इन दुष्टों का वधकर सम्पूर्ण पृथ्वी का उपभोग करूँगा । मुनिश्रेष्ठ वशिष्ठ शिष्य की नीतियुक्त बातों को सुनकर प्रसन्न हो गए और हाथ से सगर के अंगों को स्नेहपूर्वक सहलाते हुए यह बोले ॥५०-५१॥

४८ नारदीयपुराणम् वसिष्ठ उवाच साधु साधु महाभाग सत्यं वदसि सुव्रत । तथापि मद्वचः श्रुत्वा परां शान्तिं लभिष्यसि ॥५२॥ मयैते निहताः पूर्वं त्वत्प्रतिज्ञाविरोधिनः । हतानां हनने कीर्तिः का समुत्पद्यते वद ॥५३॥ भूमीश जन्तवः सर्वे कर्मपाशेन यन्त्रिताः । तथापि पापैर्निहताः किमर्थं हंसि तान्पुनः ॥५४॥ देहस्तु पापजनितः पूर्वमेवैनसा हतः । आत्मा ह्यभेद्यः पूर्णत्वाच्छास्त्राणामेष निश्चयः ॥५५॥ स्वकर्मफलभोगानां हेतुमात्रा हि जन्तवः । कर्माणि दैवमूलानि दैवाधीनमिदं जगत् ॥५६॥ यस्माद्दैवं हि साधूनां रक्षिता दुष्टशिक्षिता । ततो नरैरस्वतन्त्रैः किं कार्यं साध्यते वद ॥५७॥ शरीरं पापसम्भूतं पापेनैव प्रवर्तते । पापमूलमिदं ज्ञात्वा कथं हन्तुं समुद्यतः ॥५८॥ आत्मा शुद्धोऽपि देहस्थो देहीति प्रोच्यते बुधैः । तस्मादिदं वपुर्भूप पापमूलं न संशयः ॥५६॥ पापमूलवपुर्हन्तुः का कीर्तिस्तव बाहुज । भविष्यतीति निश्चित्य नैतांहिसीस्ततः सुत ॥६०॥ इति श्रुत्वा गुरोर्वाक्यं विरराम स कोपतः । स्पृशन्करेण सगरं नन्दनं मुनयस्तदा ॥६१॥ अथाथर्ववनिधिस्तस्य सगरस्य महात्मनः । राज्याभिषेकं कृतवान्मुनिभिः सह सुव्रतैः ॥६२॥ भार्याद्वयं च तस्यासीत्केशिनी सुमतिस्तथा । काश्यपस्य विदर्भस्य तनये मुनिसत्तम ॥६३॥ राज्ये प्रतिष्ठिते दृष्ट्वा मुनिरौर्वस्तपोनिधिः । वनादागत्य राजानं संभाव्य स्वाश्रमं ययौ ॥६४॥ कदाचित्तस्य भूपस्य भार्याभ्यां प्रार्थितो मुनिः । वरं ददावपत्यार्थमौर्वो भार्गवमन्त्रवित् ॥६५॥ वशिष्ठ बोले—महाभाग ! धन्य हो धन्य हो ! सुव्रत ! ठीक हो कह रहे हो । फिर भी मेरी बातों को सुनो, तुमको परम शान्ति मिलेगी। तुम्हारी प्रतिज्ञा के विरुद्ध आचरण करने वाले इन शत्रुओं को तो मैंने पहले ही मार डाला है। सोचो तो सही इन जीवन हीनों को पुनः मारने से कौन सा यश प्राप्त करोगे। भूपति ! सब प्राणी अपने कर्मों के बन्धन से बँधे हुए हैं। इसके अतिरिक्त ये अपने पापों से स्वयं मार डाले गए हैं। अब पुनः इनको क्यों मारना चाहते हो ? पाप से प्राप्त शरीर तो पापों के कारण पहले ही नष्ट हो गया, केवल आत्मा अभिन्न अविनाशी है, ऐसा शास्त्रों का एकमात्र निर्णय है। ये प्राणी तो अपने पूर्व कृत कर्मों को भोगने के लिए एक निमित्त मात्र हैं, कर्म दैव के अधीन हैं। इस प्रकार यह सारा जगत् दैवाधीन है ॥५२-५६॥ यतः दैव ही साधुओं का रक्षक और दुष्टों को शिक्षा देने वाला है अतः दैवाधीन, परतन्त्र मनुष्य क्या कर सकते हैं, यह बताओ । यह शरीर पाप से ही उत्पन्न हुआ है और पाप की प्रेरणा से ही प्रत्येक कार्यों को करता है तो इन सम्पूर्ण कार्य कलापों को पाप पर ही आश्रित समझ कर क्यों इनका वध करने पर तुले हुए हो ? शुद्ध-बुद्ध होता हुआ भी यह आत्मा देहस्थ होने के कारण विद्वानों द्वारा देही (शरीर वाला) कहा जाता है। इसलिए भूपाल ! यह शरीर ही पापों का मूल है इसमें कुछ सन्देह नहीं । बाहुतनय ! इस पाप मूल शरीर को मारकर तुम कौन सी कीर्ति प्राप्त करोगे ? यह सोच समझ कर तुम निश्चय कर लो, तब इनको मारो ॥५७-६०॥ गुरु की इन बातों को सुनकर वह सगर क्रोध से विरत हो गया । शिष्य की शान्ति मुद्रा को देखकर मुनि अपने प्रिय शिष्य के अंगों का स्नेह से स्पर्श करने लगे । इसके पश्चात् अथर्ववेद के ज्ञाता गुरु ने तपस्वी मुनियों के सहयोग से उस महात्मा सगर का राज्याभिषेक किया। मुनिश्रेष्ठ ! उस राजा की दो स्त्रियाँ थीं। एक का नाम केशिनी और दूसरी का नाम सुमति था। दोनों विदर्भ नरेश काश्यप की कन्या थीं। तपोनिधि मुनि और्व राजा सगर को राज्यासन पर प्रतिष्ठित जानकर वन से आये और उसको उपदेश देकर अपने आश्रम को लौट गए ॥६१-६४॥ किसी समय उन दोनों राजपत्नियों ने पुत्र कामना से और्व मुनि को प्रार्थनापूर्वक बुलाया।

अष्टमोऽध्यायः ४६ क्षणं ध्यानस्थितो भूत्वा त्रिकालज्ञो मुनीश्वरः । केशिनीं सुमतिं चैव इदमाह प्रहर्षयन् ॥६६॥ और्व उवाच एका वंशधरं चैकमन्या षड्युतानि च । अपत्यार्थं महाभागे वृणुतां च यथेप्सितम् ॥६७॥ अथ श्रुत्वा वचस्तस्य मुनेरौर्वस्य नारद । केटिन्येकं सुतं वव्रे वंशसन्तानकारणम् ॥६८॥ तथा षष्टिसहस्राणि सुमत्य। ह्यभवन्सुताः । नाम्नासमंजाः केशीन्यास्तनयो मुनिसत्तम ॥६६॥ असमंजास्तु कर्माणि चकारोन्मत्तचेष्टितः । तं दृष्ट्वा सागराः सर्वे ह्यासन्दुर्वृत्तचेतसः ॥७०॥ तद्बालभावं संदुष्टं ज्ञात्वा बाहुसुतो नृपः । चिन्तयामास विधिवत्पुत्रकर्म विगर्हितम् ॥७१॥ अहो कष्टतरा लोके दुर्जनानां हि संगतिः । कारुकैस्ताड्यते वह्निरयःसंयोगभावतः ॥७२॥ अंशुमान्नाम तनयो बभूव ह्यसमंजसः । शास्त्रज्ञो गुणवान्धर्मी पितामहहिते रतः ॥७३॥ दुर्वृत्ताः सागराः सर्वे लोकोपद्रवकारिणः । अनुष्ठानवतां नित्यमन्तराया भवन्ति ते ॥७४॥ हुतानि यानि यज्ञेषु हवींषि विधिवद्विजैः । बुभुजे तानि सर्वाणि निराकृत्य दिवौकसः ॥७५॥ स्वर्गादाहृत्य सततं रम्भाद्या देवयोषितः । भजन्ति सागरास्ता वै कचग्रहबलात्कृताः ॥७६॥ पारिजातादिवृक्षाणां पुष्पाण्याहृत्य ते खलाः । भूषयंति स्वदेहानि मद्यपानपरायणाः ॥७७॥ साधुवृत्तीः समाजह्रुः सदाचाराननाशयन् । मित्रैश्च योद्धुमारब्धा बलिनोऽत्यन्तपापिनः ॥७८॥ एतद्दृष्ट्वातिदुःखार्ता देवा इंद्रपुरोगमाः । विचारं परमं चक्रू रेतेषां नाशहेतवे ॥७६॥ निश्चित्य विबुधाः सर्वे पातालान्तरगोचरम् । कपिलं देवदेवेशं ययुः प्रच्छन्नरूपिणः ॥८०॥ भार्गव मंत्र के ज्ञाता मुनि ने उन दोनों को पुत्र प्राप्ति का वर दिया। क्षण भर ध्यान मग्न होकर त्रिकालज्ञ मुनि ने केशिनी और सुमति को प्रसन्न करते हुए कहा ॥६५-६६॥ और्व बोले- महाभागे ! एक को वंश बढ़ाने वाला एक पुत्र और दूसरे को साठ हजार बलशाली पुत्र होंगे, इनमें से इच्छानुसार वरदान स्वयं स्वीकार कर लो। नारद ! जितेन्द्रिय और्व मुनि की आज्ञा को सुनकर केशिनी ने वंश विस्तार करने वाले एक पुत्र होने का वर माँगा। और सुमति के साठ हजार पुत्र हुए। मुनिश्रेष्ठ ! केशिनी के पुत्र का नाम असमंजस् रखा गया। असमंजस् अपने राजमद के कारण अनर्थाचरण करने लगा। उसके अनुचित कार्यों को देखकर सगर के और पुत्र भी उपद्रवी हो गए। बाहुसुत राजा सगर पुत्रों की यह स्थिति देखकर उनके बुरे कर्मों पर विचार करने लगा। 'अहो! दुर्जनों की संगति संसार में अत्यन्त कष्टप्रद है; क्योंकि लोहे की छेनी के पा जाने से ही शिल्पी पत्थर पर चोट मारता और अग्नि उत्पन्न करता है ॥६७-७२॥ असमंजस् के अंशुमान् नामक पुत्र हुआ जो अत्यन्त गुणी, शास्त्रज्ञ, धार्मिक और पितामह की सेवा में लगा रहता था। इधर वे दुष्ट सगर-पुत्र लोक में उपद्रव मचाने लगे, नित्यप्रति यज्ञ करने वाले याज्ञिकों के यज्ञानुष्ठान में बाधा डालने लगे। द्विजगण यज्ञों में विधिपूर्वक जो कुछ हवन करते थे, उसको देवताओं का अनादर करके वे दुष्ट स्वयं खा जाते थे। स्वर्ग से रम्भा आदि अप्सराओं को केश पकड़ कर हठात् खींच लाते थे और उनका यथेच्छ भोग करते थे। वे दुष्ट मद्यपान कर मतवाले रहते थे पारिजात आदि देव वृक्षों के फूल तोड़ लाते थे और उससे अपने को सजाते थे ॥७३-७७॥ साधु आचरण सर्वथा लुप्त हो गए, सदाचार का उन दुष्टों ने नाश कर दिया। अत्यन्त पापी और बली वे मित्रों से ही युद्धकरने लगे। यह अनर्थ देखकर इन्द्र आदि प्रमुख देवता दुःख से कातर हो उठे और उन दुष्टों के नाश के उपाय सोचने लगे। आपस में विचार विनिमय कर वे देवता गुप्त रूप से पाताल में निवास करने वाले कपिल मुनि के पास गए, जो परम आनन्द के ७-ना० पु०

५० नारदीयपुराणम् ध्यायन्तमात्मनात्मानं परानन्दैकविग्रहम् । प्रणम्य दण्डवद् भूमौ तुष्टुवुस्त्रिदशास्ततः ॥८१॥ देवा ऊचुः नमस्ते योगिने तुभ्यं साङ्ख्ययोगरताय च । नररूपप्रतिच्छन्नविष्णवे जिष्णवे नमः ॥८२॥ नमः परेशभक्ताय लोकानुग्रहहेतवे । संसारारण्यदावाग्ने धर्मपालनसेतवे ॥८३॥ महते वीतरागाय तुभ्यं भूयो नमो नमः । सागरैः पीडितानस्मांस्त्रायस्व शरणागतान् ॥८४॥ कपिल उवाच ये तु नाशमिहेच्छन्ति यशोबलधनायुषाम् । त एव लोकान्बाधन्ते नात्राश्चर्यं सुरोत्तमाः ॥८५॥ यस्तु बाधितुमिच्छेद्य जनान्निरपराधिनः । तं विद्यात्सर्वलोकेषु पापभोगरतं सुराः ॥८६॥ कर्मणा मनसा वाचा यस्त्वन्यान्बाधते सदा । तं हन्ति दैवमेवाशु नात्र कार्या विचारणा ॥८७॥ अल्पैरहोभिरेवैते नाशमेष्यन्ति सागराः । इत्युक्ते मुनिना तेन कपिलेन महात्मना । प्रणम्य तं यथान्यायं गता नाकं दिवौकसः ॥८८॥ अत्रान्तरे तु सगरो वसिष्ठाद्यैर्महर्षिभिः । आरेभे हयमेधाख्यं यज्ञं कर्तुमनुत्तमम् ॥८९॥ तद्यज्ञे योजितं सप्तितमपहृत्य सुरेश्वरः । पाताले स्थापयामास कपिलो यत्र तिष्ठति ॥९०॥ गूढविग्रहशक्त्रेण हतमश्वं तु सागराः । अन्वेष्टुं बभ्रमुर्लोकान् भूरादींश्च सुविस्मिताः ॥९१॥ अदृष्टसप्तयस्ते च पातालं गन्तुमुद्यताः । चक्रुर्महीतलं सर्वमेकैको योजनं पृथक् ॥९२॥ मृत्तिकां खनितां ते चोदधितीरे समाकिरन् । तद्द्वारेण गताः सर्वे पातालं सगरात्मजाः ॥९३॥

एकमात्र आधार परमात्मा के ध्यान में निमग्न थे । यह देखकर देवताओं ने साष्टांग दण्डवत् किया और स्तुति करने लगे ॥७८-८१॥ देवगण बोले—सांख्य योग में सर्वदा लीन रहने वाले तुम योगेश्वर को नमस्कार है । नर रूप में गुप्त रूप से रहने वाले जयशील विष्णु को नमस्कार है । परम प्रभु के भक्त, लोक पर अनुग्रह करने वाले, संसाररूपी अरण्य में, जो माया मोह रूपी अधर्म की दावाग्नि से जल रहा है, केवल स्वयं धर्म की प्रतिष्ठा करने वाले मुनि को नमस्कार है । तुम वीतराग महान् मुनि को वार-वार नमस्कार है । महामुनि ! सगर के पुत्रों से त्रस्त पीड़ित अपने इन शरणागत भक्तों की रक्षा कीजिए ॥८२-८४॥ कपिल बोले—सुरोत्तमवृन्द ! जो अपने यश, बल, धन और आयु का नाश चाहते हैं वे ही लोक को पीड़ा पहुँचाते हैं, अतः आश्चर्य करने की आवश्यकता नहीं है । देवगण ! जो निरपराध प्राणियों को बाधा पहुँचाना चाहता है, उसे सब लोकों में पाप-भोग करने में निरत समझना चाहिए । जो सर्वदा पूज्यों को मन, वचन और कर्म से पीड़ा पहुँचाते हैं उनको शीघ्र दैव विनष्ट कर देता है, इसमें शंका नहीं करनी चाहिए । ये सगर-पुत्र थोड़े दिनों में ही नष्ट हो जायेंगे, उस महात्मा कपिल मुनि की बातों को सुनकर वे देववृन्द यथोचित रीति से मुनि को प्रणाम कर स्वर्ग चले गये ॥८५-८८॥ इसी बीच राजा सगर वशिष्ठ आदि महर्षियों की अनुज्ञा से परमोत्तम अश्वमेध यज्ञ करने लगे । उस यज्ञ में अभिषिक्त अश्व को देवेन्द्र गुप्त रूप से चुराकर पाताल में जहाँ कपिल मुनि रहते थे, बाँध आये । यह देखकर सगर-पुत्र परम विस्मित हुए और पृथ्वी आदि लोकों को घोड़े का पता पाने के लिए छान डाले । घोड़े का पता न पाकर वे पाताल लोक जाने की तैयारी करने लगे । पृथक्-पृथक् एक-एक योजन भूतल को खोद कर खोदी हुई मिट्टी को समुद्र तट पर फैला दिया । उसी विवर द्वार से वे उद्धत सगर पुत्र पाताल में पहुँच गए ॥८६-९३॥ वहाँ मदोन्मत्त की भाँति विवेक को तिलाञ्जलि

५१ अष्टमोऽध्यायः विचिन्वन्ति हयं तत्र मदोन्मत्ता विचेतसः । तत्रापश्यन्महात्मानं कोटिसूर्यसमप्रभ ॥६४॥ कपिलं ध्याननिरतं वाजिनं च तदन्तिके ॥६५॥ ततः सर्वे तु संरब्धा मुनिं दृष्ट्वाऽतिवेगतः । हन्तुमुद्युक्तमनसो विद्रवन्तः समासदन् ॥६६॥ हन्यतां हन्यतामेष बध्यतां बध्यतामयम् । गृह्यतां गृह्यतामाशु इत्युचुस्ते परस्परम् ॥६७॥ हृताश्वं साधुभावेन बकवद्ध्यानतत्परम् । सन्ति चाहो खला लोके कुर्वन्त्याडम्बरं महत् ॥६८॥ इत्युच्चरन्तो जहसुः कपिलं ते मुनीश्वरम् । समस्तेंद्रियसंदोहं नियम्यात्मानमात्मनि ॥६९॥ आस्थितः कपिलस्तेषां तत्कर्म ज्ञातवान्नहि ॥१००॥ आसन्नमृत्यवस्ते तु विनष्टमतयो मुनिम् । पद्भिः संताडयामासुर्बाहू च जगृहुः परे ॥१०१॥ ततस्त्यक्तसमाधिस्तु स मुनिर्विस्मितस्तदा । उवाच भावगम्भीरं लोकोपद्रवकारिणः ॥१०२॥ ऐश्वर्यमदमत्तानां क्षुधितानां च कामिनाम् । अहंकारविमूढानां विवेको नैव जायते ॥१०३॥ निधेराधारमात्रेण मही ज्वलति सर्वदा । तदेव मानवा भुक्त्वा ज्वलन्तीति किमद्भुतम् ॥१०४॥ किमत्र चित्रं सुजनं बाधन्ते यदि दुर्जनाः । महीरुहांश्चानुतटे पातयन्ति नदीरयाः ॥१०५॥ यत्र श्रीर्यौवनं वापि शारदा वापि तिष्ठति । तत्राश्रीर्वृद्धता नित्यं मूर्खत्वं चापि जायते ॥१०६॥ अहो कनकमाहात्म्यमाख्यातुं केन शक्यते । नामसाम्यादहो चित्रं धत्तूरोऽपि मदप्रदः ॥१०७॥ भवेद्यदि खलस्थ श्रीः सैव लोकविनाशिनी । यथा सखाग्नेः पवनः पन्नगस्य यथा विषम् ॥१०८॥ अहो धनमदान्धस्तु पश्यन्नपि न पश्यति । यदि पश्यत्यात्महितं स पश्यति न संशयः ॥१०६॥


देकर यज्ञाश्व को ढूंढ़ने लगे । वहां उन मूढों ने करोड़ों सूर्य के समान तेजस्वी ध्यान-मग्न कपिल मुनि को देखा जिनके पास ही वह अश्व बँधा था । तदनन्तर उस मुनि को देखकर वे क्रोध से पागल हो गए और बड़े वेग से उनको मारने की इच्छा से मुनि की ओर दौड़ पड़े और परस्पर इसको मारो मारो, पकड़ो पकड़ो, आदि अनुचित बातें कह कर चिल्लाने लगे । आश्चर्य है कि संसार में खल लोग व्यर्थ के महान् आडम्बर फैलाये रखते हैं ॥६४-६८॥ यह खल भी स्वयं घोड़े को चुराकर बक ध्यान लगाए हुए है, ऐसी कटु बातें कहकर उस कपिल मुनि की, जो समस्त इन्द्रियों को आत्मा के वश में कर ध्यान मग्न थे, खिल्ली उड़ाने लगे । मुनि तो ध्यानमग्न थे । उन्होंने इन दुष्टों के अपकर्मों को सर्वथा न जाना; परन्तु वे दुर्बुद्धि, जिनके शिर पर मौत नाच रही थी, उस मुनि को पैरों से मारने लगे ओर कुछ लोगों ने उनके हाथ पकड़ लिए । तदनन्तर मुनि की समाधि भङ्ग हुई और उनको आश्चर्य हुआ । तब उन्होंने गम्भीर मुद्रा धारण कर, संसार में उपद्रव मचाने वाले उन राजपुत्रों से कहा—ऐश्वर्य के मद में चूर, भूख से व्याकुल, कामात्तं और अहंकार के कारण ज्ञान-शून्य व्यक्तियों को विवेक बुद्धि नहीं रह जाती है । निधि के धारण मात्र से पृथिवी सर्वदा जलती रहती है । उसी निधि का उपभोग कर यदि मनुष्य भी जलता है तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं ॥६६-१०४॥ यदि दुर्जन व्यक्ति सज्जनों को पीड़ा पहुँचाते हैं तो इसमें आश्चर्य ही क्या है ? नदी के वेग तटवर्ती वृक्षों को तो सर्वदा गिराते ही रहते हैं । जहाँ सम्पत्ति, यौवन अथवा सरस्वती रहती है वहीं दरिद्रता वृद्धता और मूर्खता भी होती है । अहो ! इस कनक (सुवर्ण) की महिमा का वर्णन कौन कर सकता है ? क्योंकि केवल नाममात्र की समता से धतूरा (कनक) भी मद उत्पन्न कर देता है । यदि मूर्खो को धन मिल जाता है तो वह लोक-नाश का कारण बनता है, जिस प्रकार अग्नि अपने सहायक वायु और सर्प विष को पाकर लोक को कष्ट पहुँचाने वाले हो जाते हैं । अहो ! धन के मद से अन्धा व्यक्ति नेत्र रहते हुए भी नहीं देख पाता है । यदि वह आत्महित की ओर ध्यान देता है तो अवश्य

५२ नारदीयपुराणम् इत्युक्त्वा कपिलः क्रुद्धो नेत्राभ्यां ससृजेऽनलम् । स वह्निः सागरान्सर्वान्भस्मसादकरोत्क्षणात् ॥११०॥ यन्नेत्रजानलं दृष्ट्वा पातालतलवासिनः । अकालप्रलयं मत्वा चुक्रुशुः शोकलालसाः ॥१११॥ तदग्नितापिता सर्वे दन्दशूकाश्च राक्षसाः । सागरं विविशुः शीघ्रं सतां कोपो हि दुःसहः ॥११२॥ अथ तस्य महीपस्य समागम्याध्वरं तदा । देवदूत उवाचेदं सर्वं वृत्तं हि यत्क्षते ॥११३॥ एतत्समाकर्ण्य वचः सगरः सर्ववित्प्रभुः । दैवेन शिक्षिता दुष्टा इत्युवाचाति हर्षितः ॥११४॥ माता वा जनको वापि भ्राता वा तनयोऽपि वा । अधर्मं कुरुते यस्तु स एव रिपुरिष्यते ॥११५॥ यस्त्वधर्मेषु निरतः सर्वलोकविरोधकृत् । तं रिपुं परमं विद्याच्छास्त्राणामेष निर्णयः ॥११६॥ सगरः पुत्रनाशेऽपि न शुशोच मुनीश्वर ! । दुर्दान्तनिधनं यस्मात्सतामुत्साहकारणम् ॥११७॥ यज्ञेष्वनधिकारत्वादपुत्राणामिति स्मृतेः । पौत्रं तमंशुमन्तं हि पुत्रत्वे कृतवान्प्रभुः ॥११८॥ असमञ्जस्सुतं तं तु सुधियं वाग्विदांवरम् । युयोज सारविद्भूयो ह्यश्वानयनकर्मणि ॥११९॥ स गतस्तद्विलद्वारे दृष्ट्वा तं मुनिपुङ्गवम् । कपिलं तेजसां राशिं साष्टाङ्गं प्रणनाम ह ॥१२०॥ कृताञ्जलिपुटो भूत्वा विनयेनाग्रतः स्थितः । उवाच शान्तमनसं देवदेवं सनातनम् ॥१२१॥ अंशुमानुवाच दौःशील्यं यत्कृतं ब्रह्मन्मत्पितृव्यैः क्षमस्व तत् । परोपकारनिरताः क्षमासारा हि साधवः ॥१२२॥ दुर्जनेष्वपि सत्त्वेषु दयां कुर्वन्ति साधवः । नहि संहरते ज्योत्स्नां चन्द्रश्चाण्डालवेश्मनः ॥१२३॥ बाध्यमानोऽपि सुजनः सर्वेषां सुखकृद्भवेत् । ददाति परमां तुष्टिं भक्ष्यमाणोऽमरैः शशी ॥१२४॥ वह देखता है ॥६६-१०६॥ यह कहकर कपिल मुनि ने क्रुद्ध होकर अपने नेत्रों से महानल उत्पन्न किया जिसने तत्काल उन सगर पुत्रों को जला कर भस्म कर दिया । उस ऋषि के नेत्रों से उत्पन्न उस अग्नि को देखकर सभी पातालवासी प्राणी अकाल प्रलय समझ कर शोकमग्न होकर हाहाकार करने लगे । उस अग्नि की ज्वाला से दग्ध होकर सभी नाग और राक्षस शीघ्र ही समुद्र में घुस गए क्योंकि सज्जनों का कोप सबके लिए दुःसह होता है ॥११०-११२॥ तदनन्तर देवदूत ने उस राजा सगर के यज्ञ में आकर उन सारी घटनाओं को कह सुनाया । इन बातों को सुनकर सर्वज्ञ भूमिपति सगर यह कहकर कि स्वयं दैव ने ही उन दुष्टों को अच्छी शिक्षा दी; अति प्रसन्न हुए । माता-पिता-भाई या पुत्र चाहे कोई हो यदि वह अधर्म करता है तो वह शत्रु ही समझा जाता है । सब लोकों का विरोधी जो व्यक्ति सर्वदा पापकर्म में निरत रहता है उसको बहुत बड़ा शत्रु समझना चाहिए, ऐसा शास्त्रों का निर्णय है ॥११३-११६॥ मुनीश्वर ! सगर पुत्रनाश को देखकर भी शोकातुर नहीं हुए, क्योंकि दुराचारियों की मृत्यु सज्जनों के उत्साह का ही कारण है । 'यज्ञों में पुत्ररहित का अधिकार नहीं है' इस स्मृति- वचन का स्मरण कर राजा ने अंशुमान् को ही अपना पुत्र बनाया । उस तत्त्वविद् सगर ने असमंजस् के उस परम विनीत और विद्वान् पुत्र को पुनः अश्व लाने के कार्य में नियुक्त किया । वह उस बिल द्वार से पाताल पहुँचा और तेजोनिधान उस मुनि श्रेष्ठ को देखकर साष्टाङ्ग प्रणाम किया । वह हाथ जोड़कर विनीत भाव से उस मुनि के सम्मुख उपस्थित हुआ और शान्त सनातन देव-देव की स्तुति करने लगा ॥११७-१२१॥ अंशुमान् बोला- ब्रह्मन् ! मेरे पितृव्यों ने जो कुछ अविनय दिखाया है उसको आप क्षमा कर दें, क्योंकि सर्वदा परोपकार में रत रहने वाले साधुजन क्षमा की मूर्ति होते हैं । साधुजन दुष्टप्राणियों पर भी दया दिखाते हैं। चन्द्र चाण्डालों के घर पर से अपनी किरणें नहीं हटाते हैं। सज्जन दूसरों से कष्ट पाने पर भी सबको सुखी ही बनाते हैं; क्योंकि देवताओं का भक्ष्य बनकर भी चन्द्रमा उनको सुखी ही बनाता है। चन्दन स्वयं भग्न होकर और कटकर भी अपनी सुगन्ध से दूसरों को सुगन्धित ही करता है।

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अष्टमोऽध्यायः ५३ दारितश्छिन्न एवापि ह्यामोदेनैव चन्दनः । सौरभं कुरुते सर्वं तथैव सृजनो जनः ॥१२५॥ क्षान्त्या च तपसाचारैस्तद्गुणज्ञा मुनीश्वराः । संजातं शासितुं लोकांस्त्वां विदुः पुरुषोत्तम ॥१२६॥ नमो ब्रह्मन्मुने तुभ्यं नमस्ते ब्रह्ममूर्त्तये । नमो ब्रह्मण्यशीलाय ब्रह्मध्यानपराय च ॥१२७॥ इति स्तुतो मुनिस्तेन प्रसन्नवदनस्तदा । वरं वरय चेत्याह प्रसन्नोऽस्मि तवानघ ॥१२८॥ एवमुक्ते तु मुनिना ह्यंशुमान्प्रणिपत्य तम् । प्रापयासम्पितॄन्ब्राह्मं लोकमित्यभ्यभाषत ॥१२९॥ ततस्तस्यातिसंतुष्टो मुनिः प्रोवाच सादरम् । गङ्गामानीय पौत्रस्ते नयिष्यति पितॄन्दिवम् ॥१३०॥ त्वत्पौत्रेण समानीता गङ्गा पुण्यजला नदी । कृत्वैतान्धूतपापांन्वैनयिष्यति परं पदम् ॥१३१॥ प्रापयेनं हयं वत्स यतः स्यात्पूर्णमध्वरम् । पितामहान्तिकं प्राप्य साश्वं वृत्तं न्यवेदयत् ॥१३२॥ सगरस्तेन पशुना तं यज्ञं ब्राह्मणैः सह । विधाय तपसा विष्णुमाराध्याय पदं हरेः ॥१३३॥ जज्ञे ह्यंशुमतः पुत्रो दिलोप इति विश्रुतः । तस्माद्भागीरथो जातो यो गङ्गामानयद्दिवः ॥१३४॥ भगीरथस्य तपसा तुष्टो ब्रह्मा ददौ मुने । गङ्गां भागीरथ्यायाः चिंतयामास धारणे ॥१३५॥ ततश्च शिवमाराध्य तद्द्वारा स्वर्णदीं भुवम् । आनीय तज्जलंः स्पृष्ट्वा पुतान्निन्ये दिवं पितॄन् ॥१३६॥ भगीरथान्वये जातः सुदासो नाम भूपतिः । तस्य पुत्रो मित्रसहः सर्वलोकेषु विश्रुतः ॥१३७॥ वसिष्ठशापात्प्राप्तः स सौदासो राक्षसों तनुम् । गङ्गाबिन्दुनिषेवेण पुनर्मुक्तो नृपोऽभवत् ॥१३८॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे गङ्गामाहात्म्यं नाम अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ ऐसा ही सज्जनों का भी स्वभाव होता है ॥१२२-१२५॥ आपके गुणों के जानने वाले मुनिवर आपको पुरुषोत्तम समझते हैं—जो कि अपनी शान्ति, तपस्या और सदाचार से लोक को शिक्षा देने के लिए यहां आए हुए हैं। ब्रह्मन् ! मुने ! ब्रह्ममूर्ति आपको नमस्कार है। ब्राह्मणों के रक्षक ब्रह्मध्यानपरायण आपको नमस्कार करता हूँ। अंशुमान् की इस प्रकार की स्तुति सुनकर मुनि प्रसन्न हो गए और कहा कि अनघ ! वर मांगो। मैं तुमसे प्रसन्न हूँ! मुनि की ऐसी बातें सुनकर अंशुमान् उनके चरणों पर गिर पड़ा और कहा कि किसी प्रकार मेरे पितरों को ब्रह्मलोक पहुंचाइये । अंशुमान् की प्रार्थना सुनकर मुनि प्रसन्न हो गए और आदर पूर्वक बोले—तुम्हारा पौत्र गंगा को पृथ्वो पर लाकर तुम्हारे पितरों को स्वर्ग पहुँचा देगा ॥१२६-१३०॥ तुम्हारे पौत्र से लाई हुई पुण्यसलिला गंगा इन मृत पितरों को निष्पाप बनाकर परम पद पर पहुँचा देगी। वत्स ! इस अश्व को तुम अपने यहाँ ले जाओ जिससे कि यज्ञ पूर्ण हो जाय । अंशुमान् ने अपने पितामह के निकट जाकर अश्व और पितरोद्धार की सारी कथा कह दी। सगर ने ब्राह्मणों की सहायता से उस पशु के द्वारा यज्ञ समाप्त किया और विष्णु की आराधना कर विष्णुलोक को प्राप्त किया अंशुमान् से दिलोप नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, दिलोप से भगीरथ हुआ, जिसने गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर उतारा। मुने ! भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने गंगा को तो दे दिया परन्तु 'गंगा को कौन धारण करेगा ?' इसको चिन्ता करने लगे । तब भगीरथ ने शिव की आराधना की उनकी सहायता से देवनदी गंगा को पृथ्वी पर लाकर उसके जल से अपने पितरों को पवित्र किया और उनको स्वर्ग पहुँचाया । उस भगीरथ के कुल में सुदास नामक भूपति उत्पन्न हुआ। उसका पुत्र मित्रसह विश्व में विख्यात हुआ । वसिष्ठ के शाप से मित्रसह को राक्षस-शरीर प्राप्त हो गया था, परन्तु गंगाजल के स्पर्श से वह भूपति-श्रेष्ठ पुनः शुद्ध हो गया ॥१३१-१३७॥ श्रीनारदीयपुराण में गंगामाहात्म्य-वर्णन नामक आठवाँ अध्याय समाप्त ॥८॥

नवमोऽध्यायः नारद उवाच शप्तः कथं वसिष्ठेन सौदासो नृपसत्तमः । गङ्गाबिन्दुभिषेकेण पुनः शुद्धोऽभवत्कथम् ॥१॥ सर्वमेतदशेषेण भ्रातर्मे वक्तुमर्हसि । शृण्वतां वदतां चैव गङ्गाख्यानं शुभावहम् ॥२॥ सनक उवाच सौदासः सर्वधर्मज्ञः सर्वज्ञो गुणवाञ्छुचिः । बुभुजे पृथिवीं सर्वां पितृवद्रञ्जयन्प्रजाः ॥३॥ सगरेण यथा पूर्वं महीयं सप्तसागरा । रक्षिता तद्वदमुना सर्वधर्माविरोधिना ॥४॥ त्रिंशदब्दसहस्राणि बुभुजे पृथिवीं युवा ॥५॥ सौदासस्त्वेकदा राजा मृगयाभिरतिर्वनम् । विवेश सबलः सम्यक् शोधितं ह्याप्तमन्त्रिभिः ॥६॥ निषादैः सहितस्तत्र विनिघ्नन्मृगसंचयम् । आसाद नदीं रेवां धर्मज्ञः स पिपासितः ॥७॥ सुदासतनयस्तत्र स्नात्वा कृत्वान्हिकं मुने । भुक्त्वा च मन्त्रिभिः सार्द्धं तां निशां तत्र चावसत् ॥८॥ ततः प्रातः समुत्थाय कृत्वा पौर्वाह्निकीं क्रियाम् । बभ्राम मन्त्रिसहितो नर्मदातीरजे वने ॥६॥ अध्याय ६ गंगाजल के सम्पर्क से राजा सौदास का शापोद्धार नारद बोले—वसिष्ठ ने सौदास को क्यों शाप दिया और पुनः गंगाजल के अभिषेक से वह कैसे शुद्ध हो गया ? भाई ! इस आख्यान को पूर्णरूप से आप कहिए, गंगा की कथा सुनने वाले और कहने वाले दोनों के लिए मङ्गलदायक होता है ॥१-२॥ सनक बोले—सौदास सब धर्मों का ज्ञाता, सर्वज्ञ, गुणी और सदाचारी था । उसने अपने पिता के समान प्रजा का पालन कर सम्पूर्ण पृथ्वी का उपभोग किया । जिस प्रकार प्राचीनकाल में इस सप्त-समुद्रा पृथ्वी की रक्षा सगर ने की थी उसी प्रकार इसने न्याय और धर्म पूर्वक पृथ्वी की रक्षा की । उस युवक ने अपने पुत्र- पौत्रों के साथ सब प्रकार के वैभवों का उपभोग करते हुए तीस हजार वर्षों तक पृथ्वो का शासन किया ॥३-५॥ एक दिन मृगया-प्रेमी राजा सौदास अपने सैनिकों के साथ वन में गया जिस वन की पहले से ही विश्वस्त मन्त्रियों ने भली भाँति परीक्षा कर ली थी । वह धर्मज्ञ राजा निषादों को साथ लेकर अनेकों जंगली पशुओं का शिकार करता हुआ प्यास से व्याकुल होकर गोदावरी नदी के तट पर गया ॥६-७॥ मुने ! सुदास- पुत्र ने नर्मदा में स्नान कर सन्ध्या-वन्दनादि नित्य क्रिया की और मंत्रियों के सहित भोजन कर उस रात को वहीं रह गया । तदनन्तर प्रातः काल उठकर प्रातःकालीन क्रियाओं को समाप्त कर मन्त्रियों के साथ नर्मदा

नवमोऽध्यायः ५५ वनाद्वनान्तरं गच्छन्नेक एव महीपतिः । आकर्णाकृष्टबाणः सन् कृष्णसारं समन्वगात् ॥१०॥ दूरसैन्योऽश्वमारूढः स राजानुव्रजन्म्गम् । व्याघ्रद्वयं गुहासंस्थमपश्यत्सुरते रतम् ॥११॥ मृगपृष्ठं परित्यज्य व्याघ्रयोः संमुखं ययौ । धनुःसंहितबाणेन तेनासौ शरशास्त्रवित् ॥१२॥ तां व्याघ्रीं पातयामास तीक्ष्णाग्रनतपर्वणा । पतमाना तु सा व्याघ्री षट्त्रिंशद्योजनायता ॥१३॥ तडित्वद्घोरनिर्घोषा राक्षसी विकृताभवत् । पतितां स्वप्रियां वीक्ष्य द्विषन्स व्याघ्रराक्षसः ॥१४॥ प्रतिक्रियाम् करिष्यामीत्युक्त्वा चांतर्दधे तदा । राजा तु भयसंविग्नो वने सैन्यं समेत्य च ॥१५॥ तद्वृत्तं कथयन्सर्वान्स्वां पुरीं स न्यवर्तत् । शङ्कमानस्तु तद्रक्षःकृत्याद्राजा सुदासजः ॥१६॥ परित्यत्याज मृगयां ततः प्रभृति नारद । गते बहुतिथे काले हयमेधमखं नृपः ॥१७॥ समारभे प्रसन्नात्मा वशिष्ठाद्यैर्मुनीश्वरैः । तत्र ब्रह्मादिदेवेभ्यो हविर्दत्त्वा यथाविधि ॥१८॥ समाप्य यज्ञनिष्क्रांतो वशिष्ठः स्नातकोऽपि च । अत्रान्तरे राक्षसोऽसौ नृपहिंसितभार्यकः ॥ कर्तुं प्रतिक्रिया राज्ञे समायातो रुषान्वितः ॥१९॥ स राक्षसस्तस्य गुरौ प्रयाते वशिष्ठवेषं तु तदैव धृत्वा । ॥२०॥ राजामभ्येत्य जगाद भोक्ष्ये मांसं समिच्छाम्यहमित्युवाच भूयः समास्थाय स सूपवेषं पक्वमामिषं मानुषमस्य चादात् । ॥२१॥ स्थितश्च राजापि हिरण्यपात्रे धृत्वागुरोरागमनं प्रतीक्षन् तन्मांसं हेमपात्रस्थं सौदासो विनयान्वितः । समागताय गुरवे ददौ तस्मै स सादरम् ॥२२॥ तं दृष्ट्वा चिन्तयामास गुरुः किमिति विस्मितः ॥२३॥ तटवर्ती वनमें घूमने लगा । धनुष की डोरी कान तक खींचे हुए तथा अकेले ही एक वन से दूसरे वन में जाते हुए राजा को मृग मिला । घोड़े पर सवार होकर उस मृग के पीछे दौड़ता हुआ अपने सैनिकों से बहुत दूर निकल गया । उसी समय उसने किसी गुफा में रति क्रीड़ा करते हुए व्याघ्र-युग्म को देखा । वह शीघ्र मृग का पीछा छोड़कर उन बाघों के सामने गया । धनुर्विद्या में प्रवीण उस राजा ने धनुष पर चढ़े हुए उस बाण से जो अत्यन्त तीक्ष्ण और जिसका फल आगे की ओर कुछ झुका हुआ था—मादा बाघ को मार गिराया । गिरते समय वह व्याघ्री छत्तीस योजन विस्तृत शरीर वाली एक भयङ्कर राक्षसी हो गई जिसने बादल के समान भयङ्कर चीत्कार किया ।।८-१३।। अपनी प्रिय स्त्री को इस प्रकार मरते देखकर वह व्याघ्र आकार वाला राक्षस क्रुद्ध हो गया और द्वेषपूर्वक यह कहता हुआ कि इसका बदला लूँगा, उस समय अन्तर्हित हो गया । यह घटना देखकर राजा भय से व्याकुल हो गया अपनी सेना के पास आकर सारी घटना कह दी और अपनी राजधानी को लौट आया । नारद ! उस राक्षस की प्रतिक्रिया के भय से उस दिन से राजा ने आखेट करना बन्द कर दिया । बहुत दिन बीत जाने पर प्रसन्न होकर राजा ने वसिष्ठ आदि मुनियों के साथ अश्वमेध यज्ञ प्रारम्भ किया । उस यज्ञ में विधिपूर्वक देवों को हवि प्रदान किया गया ।।१४-१८।। यज्ञ समाप्त होने पर वसिष्ठ जी स्नातकों के साथ चले गये । इसी बीच अवसर पाकर वह राक्षस—जिसकी भार्या को राजा ने मार डाला था—अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए क्रुद्ध होकर आया । वह राक्षस राजगुरु वसिष्ठ के चले जाने पर गुरु का ही वेष धारण कर राजा के पास आया और बोला—'मैं मांस भोजन करना चाहता हूँ' । पुनः शीघ्र ही वह पाचक (रसोइयाँ) का वेष धारण कर मनुष्य का मांस पकाकर राजा को दे दिया । राजा भी उस पक्व मांस को सोने के बर्तन में परस कर गुरु के आने की प्रतीक्षा करने लगा । राजा सुदास ने आगत गुरु को बड़े आदर के साथ उस सोने के पात्र में परसे हुए मांस को दे दिया ।।१६-२२।। उस को देखकर गुरु वसिष्ठ विस्मित हो गए सोचने लगे कि यह क्या है । अपनी ज्ञानदृष्टि द्वारा उन्होंने उस मांस को देख लिया । 'अहो ! राजा

५६ नारदीयपुराणम् अपश्यन्मानुषं मांसं परमेण समाधिना । अहोऽस्य राज्ञो दौःशील्यमभक्ष्यं दत्तवान्मम ॥२४॥ इति विस्मयमापन्नः प्रमन्युर्भवन्मुनिः । अभोज्यं मद्विघाताय दत्तं हि पृथिवीपते ॥२५॥ तस्मात्तवापि भवतु ह्ये तदेव हि भोजनम् । नृमांसं रक्षसामेव भोज्यं दत्तं मम त्वया ॥२६॥ तद्याहि राक्षसत्वं त्वं तदाहारोचितं नृप । इति शापं ददत्यस्मिन्सौदासो भयविह्वलः ॥२७॥ आज्ञप्तो भवतेवेति सकंपोऽस्य व्यजिज्ञपत् । भूयश्च चिन्तयामास वशिष्ठस्तेन नोदितः ॥२८॥ रक्षसा वंचितं भूपं ज्ञातवान् दिव्यचक्षुषा । राजापि जलमादाय वशिष्ठं शप्तुमुद्यतः ॥२६॥ समुद्यतं गुरुं शप्तं दृष्ट्वा भूयो रुषान्वितम् । मदयंती प्रिया तस्य प्रत्युवाचाथ सुव्रता ॥३०॥ मदयंत्युवाच भो क्षत्रियदायाद कोपं संहर्तुमर्हसि । त्वया यत्कर्म भोक्तव्यं तत्प्राप्तं नात्र संशयः ॥३१॥ गुरुं तुंकृत्य हुंकृत्य यो वदेन्मूढधीर्नरः । अरण्ये निर्जले देशे स भवेद्ब्रह्मराक्षसः ॥३२॥ जितेन्द्रिया जितक्रोधा गुरुशुश्रूषण रताः । प्रयान्ति ब्रह्मसदनमिति शास्त्रेषु निश्चयः ॥३३॥ तयोक्तो भूपतिः कोपं त्यक्त्वा भार्यां ननन्द च । जलं कुत्र क्षिपामीति चिन्तयामास चात्मना ॥३४॥ तज्जलं यत्र संसिक्तं तद्भवेद्भस्म निश्चितम् । इति मत्वा जलं तत्तु पादयोर्न्यक्षिपत्स्वयम् ॥३५॥ तज्जलस्पर्शमात्रेण पादौ कल्माषतां गतौ । कल्माषपाद इत्येवं ततः प्रभृति विस्तृतः ॥३६॥ कल्माषपादो मतिमान् प्रिययाश्वासितस्तदा । मनसा सोऽतिभीतस्तु ववन्दे चरणं गुरोः ॥३७॥ उवाच च प्रपन्नस्तं प्राञ्जलिनंयकोविदः । क्षमस्व भगवन्सर्वं नापराधः कृतो मया ॥३८॥ की यह नीचता कि इसने अभक्ष्य मांस मुझे भोजन के लिए दे दिया ! यह सोचकर आश्चर्य-चकित मुनि को अत्यन्त क्रोध हुआ । 'पृथ्वोपति ! तुमने मेरे सर्वनाश के लिए अभक्ष्य मांस दिया है, अतः तुम्हारा भी यही भोजन होगा मनुष्य का मांस राक्षसों का ही भोजन है, वही आज तुमने मुझे दिया इसलिये राजन् ! तुम उसी आहार के योग्य 'राक्षस' बनो, गुरु को इस प्रकार शाप देते देखकर राजा सौदास भय से विह्वल हो गया ॥२३-२७॥ कांपते हुए उसने कहा 'आपने ही तो ऐसी आज्ञा दी है । उसके ऐसा कहने पर वसिष्ठ जी पुनः सोचने लगे । अपनी दिव्य दृष्टि से उन्होंने जान लिया कि राक्षस ने राजा को ठग लिया । राजा भी हाथ में जल लेकर गुरु को शाप देने के लिए तैयार हो गया । क्रोधान्ध पति को गुरु को शाप देने के लिए उद्यत देखकर उसकी प्रिय व्रतशील भार्या मदयन्ती ने कहा ॥२८-३०॥ मदयंती बोली-क्षत्रिय-दायाद ! तुम्हें क्रोध नहीं करना चाहिए, जो कुछ भोगना है वही इस समय प्राप्त हुआ है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं । जो मूर्ख मनुष्य गुरु से 'तुम कह कर, या हुँ कह कर' कुछ कहता है वह वनमें जलशून्य स्थान में ब्रह्मराक्षस होता है। इन्द्रियनिग्रही, परमशान्त और गुरु की शुश्रूषा में लीन रहने वाले मनुष्य ब्रह्मलोक में स्थान पाते हैं, ऐसा शास्त्रों का निर्णय है। पत्नी के इस प्रकार समझाने पर भूपति ने क्रोध छोड़ दिया और भार्या पर प्रसन्न हो गया। अपने मनमें सोचने लगा कि इस शाप जल को कहाँ फेंकूं, जहाँ यह जल फेंका जायगा वह तो अवश्य जल कर भस्म हो जायगा यह निश्चित है। यह सोचकर उस जल को अपने पैरों पर छोड़ दिया ॥३१-३५॥ उस जल के गिरते ही दोनों पैर काले हो गए। तभी से उसका नाम कल्माषपाद ही प्रसिद्ध हो गया । मतिमान् कल्माषपाद ने प्रिया के इस प्रकार समझाने पर कुछ आश्वस्त हुआ और मन में अत्यन्त भय से त्रस्त होकर गुरु के चरणों पर गिर पड़ा । नीति-विशारद राजा ने हाथ जोड़ कर विनीत भाव से कहा। भगवन् ! क्षमा कीजिए मैंने जान बूझकर अपराध नहीं किया है। मुनि ने राजा की

५७ नवमोऽध्यायः

तच्छ्रुत्वोवाच भूपालं मुनिर्निश्वस्य दुःखितः । आत्मानं गर्हयामास ह्यविवेकपरायणम् ॥३६॥ अविवेको हि सर्वेषामापदां परमं पदम् । विवेकरहितो लोके पशुरेव न संशयः ॥४०॥ राज्ञा त्वजानता नूनमेतत्कर्मोचितं कृतम् । विवेकरहितोऽज्ञोऽहं यतः पापं समाचरेत् ॥४१॥ विवेकनियतो याति यो वा को वापि निवृतिम् । विवेकहीनमाप्नोति को वा यो वाप्यनियतिम् ॥४२॥ इत्युक्त्वा चात्मनात्मानं प्रत्युवाच मुनिर्नृपम् । नात्यन्तिकं भवेदेतद्द्वादशाब्दं भविष्यति ॥४३॥ गङ्गाबिन्दुभिरिक्तस्तु त्यक्त्वा वै राक्षसीं तनुम् । पूर्वरूपं त्वमापन्नो भोक्ष्यसे मेदिनीमिमाम् ॥४४॥ तद्विन्दुसेकसंभूतज्ञानेन गतकल्मषः । हरिसेवापरो भूत्वा परां शान्तिं गमिष्यसि ॥४५॥ इत्युक्तवाथर्वविद्व्रूपं वशिष्ठः स्वाश्रमं ययौ । राजापि दुःखसंपन्नो राक्षसीं तनुमाश्रितः ॥४६॥ क्षुत्पिपासाविशेषात्तो नित्यं क्रोधपरायणः । कृष्णपक्षायुतिर्भीमो बभ्राम विजने वने ॥४७॥ मृगांश्च विविधांस्तत्र मानुषांश्च सरीसृपान् । विहङ्गमान्प्लवङ्गांश्च प्रशस्तांस्तानभक्षयत् ॥४८॥ अस्थिभिर्बहुभिर्भूयः पीतरक्तकलेवरैः । रक्तान्तप्रेतकेशैश्च चितासीद्भूर्भयंकरी ॥४६॥ ऋतुत्रये स पृथिवीं शतयोजनविस्तृताम् । कृत्वातिदुःखितां पश्चाद्वनान्तरमुपागमत् ॥५०॥ तत्रापि कृतवान्नित्यं नरमांसाशनं सदा । जगाम नर्मदातीरं मुनिसिद्धनिषेवितम् ॥५१॥ विचरन्नर्मदातीरे सर्वलोकभयंकरः । अपश्यत्कंचन मुनिं रमन्तं प्रियया सह ॥५२॥ क्षुधानलेन संतप्तस्तं मुनिं समुपाद्रवत् । जग्राह चातिवेगेन व्याधो मृगशिशुं यथा ॥५३॥


बातें सुनकर लंबी सांस ली और दुःखी होकर अपनी विवेकहीनता को कोसते हुए राजा से बोले-- 'अविवेक सब आपत्तियों का एकमात्र स्थान है, इस लोक में विवेकशून्य प्राणी पशु के तुल्य है; इसमें कुछ भी सन्देह नहीं ॥३६-४०॥ राजा ने तो अज्ञान वश ऐसा कर्म किया है जो कि सबसे हो सकता है, किन्तु मैं तो विवेक शून्य, अज्ञ हूँ कि सब कुछ जानता हुआ भी ऐसा पाप कर्म कर डाला । विवेक से युक्त कोई भी मनुष्य मोक्ष को प्राप्त करता है और विवेकहीन को सांसारिक बंधन प्राप्त होता है ॥४१-४२॥ इस प्रकार स्वयं अपने प्रति पश्चात्ताप सूचक बातें कहकर मुनि ने राजा से कहा 'यह शाप अधिक दिनों तक नहीं केवल बारह वर्ष तक ही रहेगा'। पुनः गंगाजल के अभिषेक से अपने राक्षस शरीर को छोड़कर पूर्व शरीर प्राप्त कर लोगे और तब इस साम्राज्य का उपभोग करोगे । उस गंगाजल के अभिषेक से ज्ञान प्राप्त होगा और तब निष्पाप होकर हरिसेवा में रुचि होगी जिसके फलस्वरूप परम शान्ति पा जाओगे ॥४३-४५॥ राजा से यह कहकर अथर्व-ज्ञाता वसिष्ठ जी अपने आश्रम को चले गए । राजा भी राक्षस शरीर पाकर दुःखी हो गया । भूख-प्यास से व्याकुल होकर नित्य प्रति क्रोध में ही जलता रहता था, उसका शरीर अमावस्या की रात्रि के समान कृष्ण वर्ण और भयंकर हो गया । इस प्रकार वह राक्षस बन कर विजन वन में इधर-उधर भटकने लगा । वन में विविध पशुओं मनुष्यों और रेंगकर चलने वाले जीवों, पक्षियों, वन्दरों एवं अन्य जीवों को खाता फिरता था। वन की सारी भूमि मरे हुए जीवों की अनगिनत हड्डियों, पीले और लाल रंग के कटे हुए अंगों, मृतकों के रक्त से सने बालों से अद्भुत और भयंकर बन गई ॥४६-४६॥ तीनों ऋतुओं में वह सौ योजन विस्तृत भू भाग को अपने अत्याचार से प्राणि-हीन बना दूसरे वनमें चला गया । वहाँ भी वह नित्य मनुष्यों की हत्या कर सर्वदा नर मांस खाता फिरता था। एक दिन सारे संसार को भयभीत करने वाला वह राक्षस नर्मदा तट पर घूमता हुआ सिद्धों और मुनियों के प्रदेश में पहुँचा । वहाँ उसने किसी मुनि को प्रिया के साथ विहार करते हुए देखा । क्षुधा-ज्वाला से जला वह उस मुनि की ओर बड़े वेग से झपटा और जिस ८--नार०