बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
६४४ नारदीयपुराणम् ध्यात्वैवं प्रजपेद्भानुसहस्रं विजितेन्द्रियः । दशांशं जुहुयाद्ब्रीहीन्पयोदध्याज्यमिश्रितान् ॥११॥ पूर्वोक्ते वैष्णवे पीठे मूर्तिं संकल्प्य मूलतः । आवाह्य तत्र संपूज्य पाद्यादिभिरुपायनैः ॥१२॥ केशरेष्वंगपूजा स्यात्पत्रेषु च ततोऽर्चयेत् । रामभक्तो महातेजाः कपिराजो महाबलः ॥१३॥ द्रोणाद्रिहारको मेरुपीठकार्चनकारकः । दक्षिणाशाभास्करश्च सर्वविघ्नविनाशकः ॥१४॥ इत्थं सम्पूज्य नामानि दलाग्रेषु ततोऽर्चयेत् । सुग्रीवमंगदं नीलं जांबवंतं नलं तथा ॥१५॥ सुषेणं द्विविदं मैंदं लोकपालस्ततोऽर्चयेत् । वज्राद्यानपि संपूज्य सिद्धश्चैवं मनुर्भवेत् ॥१६॥ मंत्रं नवशतं रात्रौ जपेद्दशदिनावधि । यो नरस्तस्य नश्यंति राजशत्रूत्थभीतयः ॥१७॥ मातुलिंगाम्रकदलीफलैर्हुत्वा सहस्रकम् । द्वाविंशतिब्रह्मचारि विप्रान्संभोजयेच्छुचीन् ॥१८॥ एवंकृते भूतविषग्रहरोगोपद्रवाः । नश्यंति तत्क्षणादेव विद्द्वेषिग्रहदानवाः ॥१९॥ अष्टोत्तरशतेनांबु मंत्रितंविषनाशनम् । भूतापस्मारकृत्योत्थं ज्वरे तन्मंत्रमंत्रितैः ॥२०॥ भस्मभिः सलिलैर्वापि ताडयेज्ज्वरिणं क्रुधा । त्रिदिनाज्ज्वरमुक्तोऽसौ सुखं च लभते नरः ॥२१॥ औषधं वा जलं वापि भुक्त्वा तन्मंत्रमंत्रितम् । सर्वरोगान्पराभूय सुखी भवति तत्क्षणात् ॥२२॥ तज्जप्तभस्मलिप्तांगो भुक्त्वा तन्मंत्रितं पयः । योद्धुं गच्छेदथ यो मंत्री शस्त्रसंघैर्न बाध्यते ॥२३॥ शस्त्रक्षतं व्रणस्फोटो लूतास्फोटोऽपि भस्मना । त्रिजप्तेन च संस्पृष्टाःशुष्यंत्येव न संशयः ॥२४॥ जपेदर्कास्तमारभ्य यावदर्कोदयो भवेत् । मन्त्रं सप्तदिनं यावच्चादाय भस्मकीलको ॥२५॥ निखनेदभिमन्त्र्याशु शत्रूणां द्वार्थलक्षितः । विद्वेषं मिथ आपन्नाः पलायंतेऽरयोऽचिरात् ॥२६॥
इस प्रकार वायुपुत्र का ध्यान कर बारह हजार मन्त्र का जप करे और उसका दशांश दूध, दही एवम् घी मिश्रित व्रीहि (धान्य) से होम करे। पश्चात् पूर्वोक्त वैष्णव पीठ पर मूल मन्त्र से मूर्ति की प्रतिष्ठा कर पाद्य आदि उपहारों से आवाहन पूर्वक आराधना करे। केसरो पर अंगदेवताओं को पूजा कर पत्रों पर रामभक्त, महातेजस्वी, कपिराज, महाबली, द्रोणपर्वतहारी, मेरुपीठपूजक, दक्षिणदिशाभास्कर और सर्वविघ्नविनाशक-इन नामों का पूजन करे। तदुपराम्त पत्रों के छोरों पर सुग्रीव, अंगद, जांबवंत, नल, सुषेण, द्विविद, मैंद तथा लोकपालों को पूजा कर वज्र आदि आयुधों को भी अर्चना करे। ऐसा करने से मन्त्र सिद्ध हो जाता है। जो व्यक्ति दश दिनों तक रात में नौ सौ बार इस मन्त्र का जप किया करता है, उसे राजशत्रुजन्य भय नहीं होता। बिजौरा नींबू, आम, तथा केले से हजार बार हवन कर वाईस ब्रह्मचारो विप्रों को भोजन कराने से भूत, विष, ग्रह, रोग, शत्रु तथा दानव-कृत उपद्रव तत्काल नष्ट हो जाते हैं। इस मन्त्र को एक सौ आठ वार पढ़ कर जल को अभिमंत्रित करने से जल विषनाशक होता है। जिसको भूतमिरगी आती हो या ज्वर लगता हो, उसे इस मन्त्र से अभिमंत्रित जल या भस्म से तीन दिन ताडन करे। ऐसा करने से रोगी रोगमुक्त होकर आनन्दित हो जाता है। औषध या जल को इस मन्त्र से अभिमंत्रित करके पान करने से मनुष्य तुरन्त सकल व्याधियों पर विजय प्राप्त कर सुखी होता है। जो व्यक्ति इस मन्त्र से अभिमंत्रित भस्म को अंगों में लगाकर तथा मंत्रित जल पीकर युद्ध करने जाता है, उसके ऊपर शस्त्रों का प्रहार निष्फल हो जाता है। भस्म को इस मन्त्र से तीन बार अभिमंत्रित कर शस्त्र-कृत घाव या व्रणस्फोट या लूतास्फोट पर लगा देने से घाव निःसंदेह सूख जाता है ॥११-२४॥ सात दिनों तक सूर्यास्त से लेकर सूर्योदय पर्यन्त इस मन्त्र का जप करे। फिर भस्म और कील को अभिमंत्रित करके छिप कर शत्रु के दरवाजे पर गाड़ आये। ऐसा कर देने से शत्रु अपने स्वजनों से ही द्वेष करते हुए शीघ्र उस स्थान
चतुःसप्ततितमोऽध्यायः ६४५ भस्माम्बु चन्दनं मंत्री मंत्रेणानेन मन्वितम् । भक्ष्यादियोजितं यस्मै ददाति स तु दासवतृ ॥२७॥ क्रूराश्च जंतवोऽप्येवं भवंति वशवर्तिनः । गृहीत्वेशानदिक्संस्थं करंजतरुमूलकम् ॥२८॥ कृत्वा तेनांगुष्ठमात्रां प्रतिमां च हनूमतः । कृत्वा प्राणप्रतिष्ठां च सिंदूराद्यैः प्रपूज्य च ॥२९॥ गृहस्याभिमुखों द्वारे निखनेन्मन्त्रमुच्चरन् । ग्रहाभिचाररोगानिंविषचोरनृपोद्भवाः ॥३०॥ न जायंत गृहे तस्मिन् कदाचिदप्युपद्रवाः । तद्गृहं धनपुत्राद्यैरेधते प्रत्यहं चिरम् ॥३१॥ निशि यत्र वने भस्म मृत्स्नया वापि यत्नतः । शत्रोः प्रतिकृतिं कृत्वा हृदि नाम समालिखेत् ॥३२॥ कृत्वा प्राणप्रतिष्ठांतं भित्त्वाच्छस्त्रैर्मनुं जपन् । मन्त्रान्ते प्रोच्चरेच्छत्रोर्नाम छिंधि च भिंधि च ॥३३॥ मारयेति च तस्यान्ते दंतैरोष्ठं निपीड्य च । पाण्योस्तले प्रपीड्याथ त्यक्त्वा तं स्वगृहं । व्रजेत् ॥३४॥ कुर्वन्सप्तदिनं चेवं हन्याच्छत्रुं न संशयः । राजिकालवणैर्मु क्तविकुरः पितृकानने ॥३५॥ धत्तूरफलपुष्पैश्च नखरोमविषैरपि । द्विक (काक) कौशिकगृध्राणां पक्षैः श्लेष्मांतकाक्षजैः ॥३६॥ समिद्भिस्त्रिस्रतं याम्यदिशूमुखो जुहुयान्निशि । एवं सप्तदिनं कुर्वन्मारयेदुद्धतं रिपुम् ॥३७॥ दिवास्त्रिस्रदिनं रात्रौ श्मशाने षट्शतं जपेत् । ततो वेताल उत्थाय वदेद्भावि शुभाशुभम् ॥३८॥ किंकरोऽस्य वर्तेत कुरुते साधकोदितम् । भस्मांबुमंत्रितं रात्रौ सहस्रावृत्तिकं पुनः ॥३६॥ दिनत्रयं च तत्पश्चात्प्रक्षिपेत्प्रतिमासु च । यासु कासु च स्थूलासु लघुष्वपि विशेषतः ॥४०॥ मंत्रप्रभावाच्चलनं सद्यत्येव न संशयः । अष्टम्य्यां वा चतुर्दश्यां कुजे वा रविवासरे ॥४१॥ से भाग जाता है । साधक इस मन्त्र से अभिमंत्रित भस्म, जल तथा चन्दन भोजन आदि में मिला कर जिसे देता है, वह उसका दासत्तुल्य हो जाता है । ऐसा करने से हिंसक जन्तु भो वशीभूत हो जाते हैं । ईशान कोण में स्थित करंज वृक्ष के मूल को लाकर इसकी अंगुष्ठप्रमाण हनुमान् की प्रतिमा बनाये । उस मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा तथा सिंदूर आदि से पूजन कर घर के सम्मुख द्वार पर मन्त्रोच्चारण करते हुए गाड़ दे । ऐसा करने से उस घर में ग्रह, अभिचार (टोना), रोग, अग्नि, विष, चोर, राजा आदि के उपद्रव कभी भी नहीं होते । रात्रि में वन जाकर भस्म या अच्छी मिट्टो को शत्रु को प्रतिमा बना कर उसके हृदय पर शत्रु का नाम लिख दे । फिर उसकी प्राण- प्रतिष्ठा कर (हनुमान् के) मन्त्र को जपते हुए शस्त्रों से काटे । मन्त्र के अन्त में 'अमुकनामानं शत्रुं छिन्धि, भिन्धि, मारय' यह पढ़े । तदनन्तर (प्रतिमा के) होंठ में दांत काट कर हथेली पर मारे पश्चात् अपने घर को लौट जाये ॥२५-३४॥ सात दिनों तक ऐसा करने से निःसन्देह शत्रु मर जाता है । रात्रि में श्मशान जाकर बालों को बिखेर कर पीले सरसों, नमक, धतूरे के फल-फूलों, नख, रोम, विष, कौए, कौशिक (उल्लू) तथा गोध के पंखों और लसोड़े एवम् बहेड़े को लकड़ी से दक्षिण मुंह होकर होम करे । इस तरह सात दिनों तक करने से उद्धत शत्रु की मृत्यु होती है । तीन दिनों तक ऐसा करने से शत्रु को महाभय होता है । रात्रि के समय श्मशान में जो साधक छह सौ बार मन्त्र का जप करता है, उसके वेताल दास होकर शुभाशुभ फल को बतलाने लगता है ॥३५-३८॥ तीन दिनों तक रात्रि में भस्म और जल को इस मन्त्र से सहस्र बार अभिमंत्रित कर जिस-किसी प्रतिमा पर—चाहे भारी हो या हलकी -छिड़कने से वह प्रतिमा मन्त्र के प्रभाव से चलने लगती है, इसमें संशय नहीं। अष्टमी या चतुर्दशी तिथि और मङ्गल या रवि दिन शुद्धचित्त साधक किसो तख्ते पर अतिस्निग्ध माष (उड़द) से हनुमान् की कमनीय एवम् सर्व लक्षण सम्पन्न प्रतिमा बनाये । उस प्रतिमा के वाम भाग में तेलदीप और दक्षिण भाग में
६४६ नारदीयपुराणम्
हनुमत्प्रतिमां पट्टे माषैः स्नेहपरिप्लुतः। कुर्याद्रम्यां विशुद्धात्मा सर्वलक्षणलक्षिताम् ॥४२॥ तैलदीपं वामभागे घृतदीपं तु दक्षिणे। संस्थाप्यावाहयेत्पश्चान्मूलमन्त्रेण मन्त्रवित् ॥४३॥ प्राणप्रतिष्ठां कृत्वा च पाद्यादीनि समर्पयेत्। रक्तचन्दनपुष्पैश्च सिन्दूराद्यैः समर्चयेत् ॥४४॥ धूपं दीपं प्रदायाथ नैवेद्यं च समर्पयेत्। अपूपमोदनं शाकमोदकान्वटकादिकम् ॥४५॥ साज्यं च तत्समर्थाथ मूलमन्त्रेण मन्त्रवित्। अखण्डितान्यहिलतादलानि सप्तविंशतिम् ॥४६॥ त्रिधा कृत्वा सपूगानि मूलेनैव समर्पयेत्। एवं सम्पूज्य मन्त्रज्ञो जपेद्दशशतं मनुम् ॥४७॥ कर्पूराक्तिकं कृत्वा स्तुत्वा च बहुधा सुधीः। निजेप्सितं निवेद्याथ विधिवद्विसृजेत्ततः ॥४८॥ नैवेद्यान्नेन संभोज्य ब्राह्मणान्सप्तसंख्यया। निवेदितानि पर्णानि तेभ्यो दद्याद्विभज्य च ॥४९॥ दक्षिणां च यथा शक्तिं दत्त्वा तान् विसृजेत्सुधीः। तत इष्टगणैः सार्द्धं स्वयं भुंजीत वाग्यतः ॥५०॥ तद्दिने भूमिशय्यां च ब्रह्मचर्यं समाचरेत्। एवं यः कुरुते मर्त्यः सोऽचिरादेव निश्चितम् ॥५१॥ प्राप्नुयात्सकलान्कामान्कपीशस्य प्रसादतः। हनुमत्प्रतिमां भूमौ विलिखेत्तत्तुरो मनुम् ॥५२॥ साध्यनाम द्वितीयांतं विमोचय विमोचय। तत्पूर्वं मार्जयद्वामपाणिनाथ पुनर्लिखेत् ॥५३॥ एवमष्टोत्तरशतं लिखित्वा मार्जयेत्पुनः एवं कृते महाकारागृहाच्छीघ्रं विमुच्यते। एवमन्यानि कर्माणि कुर्यात्पल्लवमल्लिखन् ॥५४॥ सर्षपैर्वश्यकृद्धोमो विद्वेषे ह्यमराजैः। कुंकुमैरिध्मकाष्ठैर्वा मरीचैर्जीरकैरपि ॥५५॥ ज्वरे दूर्वागुडूचीभिर्दध्ना क्षीरेण वा घृतैः। शूले करंजवातारिसमिद्भिस्तैललोलितैः ॥५६॥ तैलाक्ताभिश्च निर्गुण्डीसमिद्भिर्वा प्रयत्नतः। सौभाग्ये चंदनेश्चंद्रलोचनैर्वा लवंगकैः ॥५७॥ सुगंधपुष्पैर्वस्त्राप्त्यै तत्तद्धान्यैस्तदाप्तये। रिपुपादरजोभिश्च राजीलवणमिश्रितैः ॥५८॥
घृतदीप जलाये। पश्चात् मन्त्रवेत्ता साधक मूलमन्त्र से प्रतिमा को स्थापित कर (हनुमान् का) आवाहन कर ॥३९-४३॥ पुनः प्राणप्रतिष्ठा कर पाद्य, रक्तचन्दन, पुष्प, सिंदूर, धूप, दीप तथा नैवेद्य समर्पित करे। पूरी, चावल, शाक, वड़ा, घी तथा मिठाई समर्पण कर सत्ताईस बीड़े पान एवम् सुपारी भी मूलमन्त्र को पढ़ते हुए अर्पित करे। इस तरह पूजा कर विद्वान् साधक एक हजार मन्त्रजप, कर्पूर को आरती, अनेक प्रकार से स्तुति तथा अपनी प्रिय वस्तु समर्पित कर विधिपूर्वक प्रतिमा विसर्जन करे, तदुपराप्त सात ब्राह्मणों को नैवेद्यान्न खिला कर निवेदित पान-सुपारी एवम् यथाशक्ति दक्षिणा देकर उन्हें विदा करे। पश्चात् इष्ट-मित्रों के साथ मौन हो कर स्वयं भोजन करे। उस दिन उसे भूमि पर शयन तथा ब्रह्मचर्य पालन करना आवश्यक है। जो मनुष्य ऐसा करता है, उसे शीघ्र ही हनुमान् की कृपा से सकल अभीप्सित वस्तुएं प्राप्त होती हैं। भूमि पर हनुमान् की प्रतिमा लिखकर उसके आगे मन्त्र लिखे। फिर साध्य (जिसके उद्देश्य से क्रिया की जाती हो) का नाम लिखकर 'विमोचय, विमोचय' यह पद भी लिखे। पश्चात् सबको बाँयें हाथ से मिटा दे। इस प्रकार एक सौ आठ बार लिखने एवम् मिटाने से साध्य कारागार (जेल) से शीघ्र मुक्त हो जाता है ॥४४-५३ १/२॥ इसी तरह पल्लव को लिखते हुए अन्य कर्मों को भी करे। सरसों से होम करने से वशीकरण सिद्ध होता है। करबीर, कुंकुम, मरीच तथा जीरे की लकड़ी से होम करने से शत्रु को आपस में ही विद्वेष हो जाता है। दुर्वा, गुडूच, दही, दूध तथा घृत से हवन करने से ज्वर नष्ट होता है। तेल से भीगे करंज, रेंढ तथा निर्गुण्डी (स्याह फूल वाली नेवारी) की लकड़ी से होम करने से शूल रोग नष्ट होता है। सौभाग्यवृद्धि के लिये चन्दन, इन्द्रलोचन तथा लवंग से हवन करना चाहिये ॥५४-५७॥ सुगंधित पुष्पों से होम करने से वस्त्र की प्राप्ति होती है। तत्तत् अन्न की प्राप्ति के लिये तत्तत् अन्न से हवन करना चाहिये। शत्रु की चरणधूलि में पीला सरसों तथा नमक मिला कर उससे होम
६४७ चतुःसप्ततितमोऽध्यायः होमयेत्सप्तरात्रं च रिपुर्याति यमालयम् । धान्यैः संप्राप्यते धान्यमन्नैरन्नसमुच्चयः ॥५८॥ तिलाज्यक्षीरमधुभिर्महिषीगोसमृद्धये । किं बहुतैर्विषे व्याधौ शांतौ मोहे च मारणे ॥६०॥ विवादे स्तंभने द्यूते भूतभीतो च संकटे । वश्ये युद्धे क्षते दिव्ये बंधमोक्षे महावने ॥६१॥ साधितोऽयं नृणां दद्यान्मन्त्रः श्रेयः सुनिश्चितम् । वक्ष्येऽथ हनुमद्यंत्रं सर्वसिद्धिप्रदायकम् ॥६२॥ लांगलाकारसंयुक्तं वलयत्रितयं लिखेत् । साध्यनाम लिखेन्मध्ये पाशीबीजप्रवेष्टितम् ॥६३॥ उपर्यष्टच्छदं कृत्वा पत्रेषु कवचं लिखेत् । तद्बहिर्दंतमालिख्य तद्बहिश्चतुरस्रकम् ॥६४॥ चतुरस्रस्य रेखाग्रे त्रिशूलानि समालिखेत् । सौं बीजं भूपुरस्याष्टवज्रेषु विलिखेत्ततः ॥६५॥ कोणेष्वंकुशमालिख्य मालामन्त्रेण वेष्टयेत् । तत्सर्वं वेष्टयेद्यंत्रे वलयत्रितयेन च ॥६६॥ शिलायां फलके वस्त्रे ताम्रपत्रेऽथ कुडचके । ताडपत्रेऽथ भूर्जे वा रोचनानाभिकुंकुमैः ॥६७॥ यंत्रमेतत्समालिख्य निराहारो जितेंद्रियः । कपेः प्राणान्प्रतिष्ठाप्य पूजयेत्तद्यथाविधि ॥६८॥ अशेषदुःखशांत्यर्थं यंत्रं संधारयेद् बुधः । मारीज्वराभिचारादिसर्वोपद्रवनाशनम् ॥६९॥ योषितामपि बालानां धृतं जनमनोहरम् । भूतकृत्यापिशाचानां दर्शनादेव नाशनम् ॥७०॥ मालामन्त्रमथो वक्ष्ये तारो वाग्विष्णुगेहिनी । दीर्घत्रयान्विता माया प्रागुक्तं कूटपञ्चकम् ॥७१॥ ध्रुवो हृद्धनुमान्देंताऽथ प्रकटपराक्रमः । आक्रांतदिङ्मंडलांते यशोवितानसंवदेत् ॥७२॥ धवलीकृतवर्णांते जगत्त्रितयवञ्च च । देहज्वलदग्निसूर्य कोटद्युते च समप्रभ ॥७३॥ तनूरुहपदांते तु रुद्रावतार संवदेत् । लंकापुरी ततः पश्चाद्दहनोदधिलंघन ॥७४॥ करने से शत्रु यमलोक को चला जाता है। धान्य से होम करने से धान्य तथा अन्न से होम करने से अन्न की वृद्धि होती है। तिल, घृत, दूध तथा मधु से हवन करने से भैंस एवम् गाय की समृद्धि होती है। बहुत क्या कहें; विष, व्याधि, शांति, मोहन, मारण, विवाद, स्तंभन, द्यूत, भूतोपद्रव, संकट, वशीकरण, युद्ध, घाव, दैवी बाधा, बंधनमुक्ति तथा महावन में इस मन्त्र के जप करने से मनुष्य का निश्चित कल्याण होता है ॥५८-६१॥ अब मैं सर्वसिद्धिदायक हनुमान् के मन्त्र को बतलाता हूँ। पुच्छाकृति रेखा से युक्त तीन वलयाकार रेखा खींचे। उसके मध्य में साध्य का नाम लिखकर पाशबीज से वेष्टित कर दे। उसके ऊपर अष्टदल कमल लिख कर पत्रों पर कवच लिखे। उसके बाहर दांत और उससे भी परे चौकोर रेखा खींचे। चौकोर रेखा के आगे अनेक त्रिशूल बनाकर भूपुर के आठ वज्रों पर 'सौं' यह बीज लिख दे। कोणों में अंकुश लिखकर मालामन्त्र से उसे वेष्टित करे। फिर संपूर्ण यंत्र को वलयाकार त्रिरेखा से आवृत करे। शिला, फलक (तख्ता), वस्त्र, ताम्रपत्र, कुड्य (दीवार), तालपत्र या भोजपत्र पर गोरोचन तथा कस्तूरी मिश्रित कुंकुम से उस यंत्र को लिखकर निराहार एवम् जितेंद्रिय साधक उसमें हनुमान् की प्राणप्रतिष्ठा करके विधिपूर्वक पूजा करे। जो विद्वान् व्यक्ति उस यंत्र को धारण करते हैं, उनके समस्त दुःख निवृत्त हो जाते हैं। वह यंत्र महामारी (हैजा), ज्वर, प्रेतादि बाधा तथा सकल उपद्रवों का नाशक है। उसके धारण से कन्या, कामिनी तथा जनता भी वशीभूत हो जाती है। उसके दर्शन मात्र से भूत, कृत्या एवम् पिशाचों का नाश होता है ॥६२-७०॥ अब इसके उपरान्त मालामन्त्र के संबंध में कहता हूँ। "तारोवाक् स्वाहा" यह मालासंज्ञक मन्त्र सकल कामनाओं को सफल करने वाला है। इसमें इक्कीस अक्षर हैं। महाभय तथा महान् उत्पात के समय इसके स्मरण करने से दुःखनाश होता है। द्वादशाक्षर मन्त्र में जो अन्तिम छह अक्षर (हनुमते नमः) हैं
६४८ नारदीयपुराणम् दशग्रीवशिरः पश्चात्कृतांतकपदं वदेत् । सीतांते श्वसनपदं वाट्यंते सुतमीरयेत् ॥७५॥ अंजनागर्भसंभूतः श्रीरामलक्ष्मणान्वितः । नदंति करवर्णांते सैन्यप्राकार ईरयेत् ॥७६॥ सुग्रीवसख्याहृद्वाणैर्द्रणवालिनिबर्हण । कारणद्रोणशब्दांते पर्वतोत्पादनेति च ॥७७॥ अशोकवनवीथ्यंते दारुणाक्षकुमारक । छेदनांते वनरक्षाकरांते तु समूह च ॥७८॥ विभञ्जनांते ब्रह्मास्त्रब्रह्माशक्ति ग्रसेति च । लक्ष्मणांते शक्तिभेदनिवारणपदं वदेत् ॥७९॥ विशल्यो षधिशब्दांते समानयन संपठेत् । बालोदित ततो भानुमंडलप्रसनेति च ॥८०॥ मेघनादहोमघादिछ्वसनपदं वदेत् । इंद्रजिद्वधकारांते णसीतारक्षकेति च ॥८१॥ राक्षसीसंघशब्दांते विदारणपदं वदेत् । कुंभकर्णादिसंकीर्त्यवधांते च परायण ॥८२॥ श्रीरामभक्तिवर्णांते तत्परेति समुद्र च । व्योमद्रुमलंघनेति महासामर्थ्य संवदेत् ॥८३॥ महातेजः पुंजशब्दाद्विराजमानवोच्चरेत् । स्वानिवचनसंपादिचार्जनांते च संयुग ॥८४॥ सहायांते कुमारति ब्रह्मचारिन्पदंवदेत् । गंभीरशब्दोदयांते दक्षिणापथ संवदेत् ॥ मार्त्तण्डमेशशब्दांते वदेत्पर्वतपीठिका ॥८५॥ अर्चानांते तु सकलमंत्रांते मपदं वदेत् । आचार्यमम शब्दांते सर्वग्रहविनाशन ॥८६॥ सर्वज्वरोच्चाटनांते सर्वविषविनाशन । सर्वापत्तिनिवारण सर्वदुष्टनिबर्हण ॥८७॥ सर्वव्याध्याधि सम्प्रोच्य भयांते च निवारण ॥८८॥ सर्वशत्रुच्छेदनेति ततो मम परस्य च ॥८९॥ ततस्त्रिभुवनांते तु पुंस्त्रीनपुंसकात्मकम् । सर्वजीवपदांते तु जातं वशययुग्मकम् ॥९०॥ ममाज्ञाकारकं पश्चात्संपादयुगं पुनः । ततो नानानामधेयान्सर्वान् राजः स संपठेत् ॥९१॥ परिवारान्ममेल्यंते सेधकान् कुरु युग्मकम् । सर्वशस्त्रास्त्रवीर्यंते बाणि विध्वंसवद्वयम् ॥९२॥ लज्जादीर्घततोपेता होत्रयं चेहि युग्मकम् । विलोमं पंचकूटानि सर्वशत्रून्हनद्वयम् ॥९३॥
इनकों और थादि बीज (ह्रीँ) को छोड़कर शेष बचे हुए पांच बीजों का जो पञ्चाक्षर मन्त्र बनता है, वह सकलकामनादायक है । इसके श्रीरामचन्द्र ऋषि, गायत्री छन्द और हनुमान् देवता कहे गये हैं । निखिल वस्तुओं की प्राप्ति के लिए इसका विनियोग किया जाता है । इसके पांच बीजों तथा सम्पूर्ण मन्त्र से षडंगन्यास करे । रामदूत, लक्ष्मणप्राणदाता, अंजनीसुत, सीताशोकविनाशन तथा लंकाप्रासादभंजन-ये पांच नाम हैं । इनसे पहले 'हनुमत' यह नाम और है। हनुमत् आदि पांच नामों के आदि में पांच बीज और अंत में ङे विभक्ति लगाई जाती है । अन्तिम नाम के साथ उक्त पांचों बीज जुड़ते हैं । ये ही षडंगन्यास के ६ मन्त्र हैं' । इसके ध्यान-पूजन आदि कार्य पूर्वोक्त द्वादशाक्षर मन्त्र के समान हो हैं। प्रणव (ओँ), वाग्भव (ऐँ), पद्मा (श्रीँ) तीन दीर्घ स्वरों से युक्त मायाबीज (ह्रां ह्रीं ह्रूं) तथा पांच कूट (हूस्फें, ह्फ्रें, ह्स्रौं, ह्स्ख्फें, ह्सौं) यह ११ अक्षरों का मन्त्र समस्तसिद्धिदायक है। इसके भी ध्यान-पूजन आदि सब कार्य पूर्ववत् होते हैं। इस मन्त्र की आराधना की जाय तो
१. यथा 'हूस्फें हनुमते नमः,' हृदयाय नमः । ह्फ्रें रामभक्ताय नमः शिरसे स्वाहा । ह्स्रौं लक्ष्मणप्राणदात्रे नमः शिखायै वषट् । ह्स्ख्फें अञ्जनीसुताय नमः कवचाय हुम् । ह्सौं सीताशोकविनाशाय नमः नेत्रत्रयाय वौषट् । हूस्फें ह्फ्रें ह्स्रौं ह्स्ख्फें ह्सौं लङ्काप्रासादभंजनाय नमः अस्त्राय फट् ।
६४६ चतुःसप्ततितमोऽध्यायः परबलानि परांते सैन्यानि क्षोभयद्वयम् ॥८४॥ मम सर्वं कार्यजातं साधयेति द्वयं ततः ॥८५॥ सर्वदुष्टदुर्जनांते मुखानि कीलयद्वयम् । घेद्वयं वर्मत्रितयं फट्त्रयं हांत्रयं ततः ॥८६॥ वह्निप्रियांते मंत्रोऽयं मालासंज्ञोऽखिलेष्टदः ॥८७॥ वस्वष्टबाणवर्णोऽयं मंत्रः सर्वैष्टसाधकः ॥८८॥ महाभये महोत्पाते स्मृतोऽयं दुःखनाशनः । द्वादशार्णस्य षट्कूटं त्यक्त्वा बीजं तथादिमम् ॥८९॥ पंचकूटात्मको मंत्रः सर्वकामप्रदायकः । रामचंद्रो मुनिश्चास्य गायत्री छंद ईरितम् ॥१००॥ हनुमान्देवता प्रोक्तो विनियोगोऽखिलाप्तये । पंचबीजैः समस्तेन षडंगानि समाचरेत् ॥१०१॥ रामदूतो लक्ष्मणांते प्राणदाताञ्जनोसुतः । सीताशोकविनाशोऽयं लंकाप्रासादभंजनः ॥१०२॥ हनुमदाद्याः पंचैते बीजाद्या ङेयुताः पुनः । षडंगमन्त्रवो ह्येते ध्यानपूजावि पूर्ववत् ॥१०३॥ प्रणवो वाग्भवं पद्मा माया दीर्घत्रयान्विता । पंचकूटानि मंत्रोऽयं रुद्राणैः सर्वसिद्धिदः ॥१०४॥ ध्यानपूजादिकं सर्वमस्यापि पूर्ववन्मतम् । अयमाराधितो मंत्रः सर्वाभीष्टप्रदायकः ॥१०५॥ नमो भगवते पश्चादनंतश्चन्द्रशेखरां । जनेयाय महांते तु बलायांते ऽग्निवल्लभा ॥१०६॥ अष्टादशार्णो मंत्रोऽयं मनिरीश्वरसंज्ञकः । छंदोऽनुष्टुब्देवता तु हनुमान्पवनात्मजः ॥१०७॥ ह्रीं बीजं वह्निवनिता शक्तिः प्रोक्ता मनीषिभिः । आंजनेयाय हृदयं शिरश्च रुद्रमूर्तये ॥१०८॥ शिखायां वायुपुत्रायाग्निगर्भाय वर्मणि । रामदूताय नेत्रं स्याद्ब्रह्मास्त्रायास्त्रमीरितम् ॥१०९॥ तप्तचामीकरनिभं भीघ्नसंविहिताञ्जलिम् । चलत्कुंडसदीप्तास्यं पद्माक्षं मारुतिं स्मरेत् ॥११०॥ ध्यात्वैवममृतं जप्त्वा दशांशं जुहुयात्तिलैः । वैष्णवे पूजयेत्पीठे प्रागुद्दिष्टेन वर्त्मना ॥१११॥ अष्टोत्तरशतं नित्यं नक्तभोजी जितेंद्रियः । जपित्वा क्षुद्ररोगेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः ॥११२॥ महारोगनिवृत्त्यै तु सहस्रं प्रत्यहं जपेत् । राक्षसौघं विनिघ्नंतं कपिं ध्यात्वाघनाशनम् ॥११३॥ अयुतं प्रजपेन्नित्यमचिराज्जयति द्विषम् । सुग्रीवेण समं रामं संदधानं कपि स्मरन् ॥११४॥ सकल कामनायें पूर्ण होती हैं । 'नमो भगवते आंजनेयाय महाबलाय स्वाहा' यह १८ अक्षरों का मन्त्र है । इसके ईश्वर ऋषि, अनुष्टुप् छन्द, पवनकुमार हनुमान् देवता, ह्रं बीज और स्वाहा शक्ति है, ऐसा मनीषी पुरुषों का कथन है । 'आञ्जनेयाय नमः' का हृदय में, 'रुद्रमूर्तये नमः' का सिर में, 'वायुपुत्राय नमः' का शिखा में 'अग्नि- गर्भाय नमः' का कवच में, रामदूताय नमः' का नेत्रों में तथा 'ब्रह्मास्त्राय नमः' का अस्त्रस्थान में न्यास करे । इस प्रकार न्यासविधि कही गई है । (इसके बाद हनुमान् का ध्यान करना चाहिये) जिनकी कान्ति तप्त सुवर्ण के समान है, जो भय का नाश करने वाले हैं, जिन्होंने (श्रीराम के लिए) अंजलि बांध रखी है, जिनका मुख चमकते हुए चंचल कुंडलों से शोभायमान है और जिनके नेत्र कमल के समान हैं, उनका ध्यान करें ॥१०१-११०॥ इस प्रकार ध्यान कर दश हजार मन्त्र का जप करे और उसका दशांश तिल से होमे । अनन्तर वैष्णव पीठ पर पूर्वोक्त रीति से पूजन करना चाहिये । जो नित्य एकभुक्त करते हुए इन्द्रियसयंमपूर्वक एक सौ आठ बार इस मन्त्र का जप करता है, वह क्षुद्र रोगों से मुक्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं ॥१११-११२॥ महारोग से छुटकारा पाने के लिये प्रतिदिन एक हजार जप करना चाहिये । जो राक्षस समूह को मारने वाले पापनाशक हनुमान् का ध्यान कर दश हजार इस मन्त्र का जप करता है, वह शीघ्र ही शत्रु को जीत लेता है । जो सुग्रीव से राम को संधि कराते हुए वायुपुत्र का ध्यान कर दश हजार मन्त्र का जप करता है, उसे शत्रु से मेल हो जाता ८२ ना० पु०
६५० नारदीयपुराणम् प्रजपेदयुतं यस्तु संधिं कुर्याद्विद्वद्वयोः । ध्यात्वा लंकां दहंतं तमयुतं प्रजपेन्मनुम् ।।११५।। अचिरादेव शत्रूणां ग्रामात्संप्रदहेत्सधीः । ध्यात्वा प्रयाणसमये हनुमन्तं जपेन्मनुम् ।।११६।। यो याति सोऽचिरात्स्वेष्टं साधयित्वा गृहे व्रजेत् । हनुमंतं सदा गेहे योऽर्चयेज्जपतत्परः ।।११७।। आरोग्यं च श्रियं कांतिं लभते निरुपद्रवम् । कानने व्याघ्रचौरेभ्यो रक्षेन्मनुरयं स्मृतः ।।११८।। प्रस्वापकाले शय्यायां स्मरेन्मंत्रमनन्यधीः । तस्य दुःस्वप्नचौरादिभयं नैव भवेत्क्वचित् ।।११९।। वियत्संदुहंनुमते ततो रुद्रात्मकाय च । वर्मास्त्रांतो महामंत्रो द्वादशार्णोऽष्टसिद्धिकृत् ।।१२०।। रामचन्द्रो मुनिश्चास्य जगती छन्द ईरितम् । हनुमान्देवता बीजमाद्यं शक्तिर्हृमीरिता ।।१२१।। षड्दीर्घभाजा बीजेन षडंगानि समाचरेत् । महाशैलं समुत्पाट्य धावंतं रावणं प्रति ।।१२२।। लाक्षारक्तारुणं रौद्रं कालांतकयमोपमम् । ज्वलदग्निसमं जैत्रं सूर्यकोटिसमप्रभम् ।।१२३।। अंगदाद्यैमहावीरैर्वेष्टितं रुद्ररूपिणम् । तिष्ठ तिष्ठ रणे दुष्ट सृजंतं घोरनिःस्वनम् ।।१२४।। शैवरूपिणमभ्यर्च्य ध्यात्वा लक्षं जपेन्मनुम् । दशांशं जुहुयाद्वीह्योपयोदध्याज्यमिश्रितान् ।।१२५।। पूर्वोक्ते वैष्णवे पीठे विमलादिसमन्विते । मूर्तिं संकल्प्य मूलेन पूजा कार्या हनूमतः ।।१२६।। ध्यानैकमात्रोऽपि नृणां सिद्धिरेव न संशयः । अथास्य साधनं वक्ष्येलोकानां हितकाम्यया ।।१२७।। हनुमत्साधनं पुण्यं महापातकनाशनम् । एतद्गुह्यतमं लोके शीघ्रसिद्धिकरं परम् ।।१२८।। मंत्रो यस्य प्रसादेन त्रैलोक्यविजयी भवेत् । प्रातः स्नात्वा नदीतीरे उपविश्य कुशासने ।।१२६।। है । जो साधक लंकादाह करते हुए हनुमान् का स्मरण कर दश हजार मन्त्र का जप करता है, वह शीघ्र ही शत्रुओं के गाँवों को जला डालता है। यात्राकाल में जो हनुमान् का ध्यान कर मन्त्र का जप करता है, वह शीघ्र अपना कार्य साधन कर घर लौट आता है ।।११३-११६।। जो अपने घर में सदा हनुमान् का ध्यान कर मन्त्र का जप करता है, वह आरोग्य, एवम् कांति लाभ करता है, विघ्न-बाधायें उसे कभी नहीं सताती । वन में बाघों एवम् चोरों से यह मन्त्र बचाता है। जो व्यक्ति सोने के समय शय्या पर तन्मयतापूर्वक इस मन्त्र का जप करता है, उसे दुःस्वप्न तथा चोर आदि का भय कभी भी नहीं होता ।।११७-११९।। वियत् (ह) इंदु (अनुस्वार) से युक्त हो, उसके बाद 'हनुमते रुद्रात्मकाय' ये दो पद हों, फिर वर्म (हूं) और अस्त्र (फट्) हो तो (हं हनुमते रुद्रात्मकाय हुं फट्) यह बारह अक्षरों का महामन्त्र (अणिमा आदि) आठ सिद्धियों को देने वाला है ।।१२०।। इसके मुनि रामचन्द्र, छंद जगती, देवता हनुमान्, बीज हुं और शक्ति 'हृम्' है। छः दीर्घमात्राओं से युक्त बीजमन्त्र से षडंगन्यास कर शैवरूपी हनुमान् का ध्यान करे कि वे महापर्वत को उखाड़ कर रावण के ऊपर टूट पड़े हैं। लाक्षा (अलता) के समान उनका वर्ण लाल है। रूप कालांतक यम के समान उनका भयंकर है। कान्ति जाज्वल्यमान अग्नि एवम् कोटि सूर्यों के समान है ।।१२१-१२३।। अङ्गद आदि महावीर उन रुद्र रूपी हनुमान् को घेरे रहते हैं। रण में 'दुष्ट ! खड़ा रह !' इस तरह वे गर्जना करते हैं। ध्यानोपरान्त एक लाख मन्त्र का जप कर उसका दशांश दूध, दही तथा घी मिलाये धान्य से हवन करे । इसके बाद पूर्वोक्त वैष्णव पीठ पर मूल मन्त्र से मूर्ति को स्थापित कर हनुमान् की पूजा करे । इस मन्त्र के ध्यान मात्र से भी मनुष्यों को सिद्धि मिलती है, इसमें संशय करने की आवश्यकता नहीं ।।१२४-१२६३।। अब मैं लोगों के कल्याण की दृष्टि से हनुमान् की साधना बतलाता हूँ। उनकी साधना पवित्र, महापाप- नाशक, गोपनीय तथा लोक में शीघ्र सिद्धिदायक है। उस साधन के प्रभाव से मनुष्य त्रैलोक्यविजयी होता है । प्रातःकाल स्नान कर नदी के तट पर कुशासन पर बैठ कर प्राणायाम करते हुए मूलमन्त्र से सविधि षडंगन्यास
६५१ चतुःसप्ततितमोऽध्यायः प्राणायामषडंगे च मूलेन सकलं चरेत् । पुष्पांजल्यष्टकं दत्त्वा ध्यात्वा रामं ससीतकम् ॥१२७॥ ताम्रपात्रे ततः पद्ममष्टपत्रं सकेशरम् । कुचन्दनेन घृष्टेन संलिखेत्तच्छलाकया ॥१२८॥ कणिकायां लिखेन्मंत्रं तत्रावाह्य कपीश्वरम् । मूर्ति मूलेन संकल्प्य ध्यात्वा पाद्यादिकं चरेत् ॥१२९॥ गंधपुष्पादिकं सर्वं निवेद्य मूलमन्त्रतः । केसरेषु षडंगानि दलेषु च ततोऽर्चयेत् ॥१३०॥ सुग्रीवं लक्ष्मणं चैव ह्यंगदं नलनीलकौ । जांबवंतं च कुमुदं केसरीशं दलेऽर्चयेत् ॥१३१॥ दिक्पालांश्चापि वज्रादीन्पूजयेत्तदनंतरम् । एवं सिद्धे मनो मन्त्री साधयेत्स्वेष्टमात्मनि ॥१३२॥ नदीतीरे कानने वा पर्वते विजनेऽथवा । साधयेत्साधकश्रेष्ठो भूमिग्रहणपूर्वकम् ॥१३३॥ जिताहारो जितश्वासो जितवाक्च जितेंद्रियः । दिग्बन्धनादिकं कृत्वा न्यासध्यानादिपूर्वकम् ॥१३४॥ लक्षं जपेन्मंत्रराजं पूजयित्वा तु पूर्ववत् । लक्षांते दिवसं प्राप्य कुर्याच्च पूजनं महत् ॥१३५॥ एकाग्रमनसा सम्प्रध्यायत्वा पवननन्दनम् । दिवारात्रौ जपं कुर्याद्यावत्संदर्शनं भवेत् ॥१३६॥ सुदृढं साधकं मत्वा निशीथे पवनात्मजः । सुप्रसन्नस्ततो भूत्वा प्रयाति साधकाग्रतः ॥१४०॥ यथेप्सितं वरं दत्त्वा साधकाय कपीश्वरः । वरं लब्ध्वा साधकेंद्वो विहरेदात्मनः सुखैः ॥१४१॥ एतद्धि साधनं पुण्यं लोकानां हितकाम्यया । प्रकाशितं रहस्यं वै देवानामपि दुर्लभम् ॥१४२॥ अन्यानविप्रयोगांश्च साधयेदात्मनो हितान् । वियद्विन्दुयुतं पश्चाङेन्तं पवननंदनम् ॥१४३॥ वह्निप्रियान्तो मन्त्रोऽयं दशार्णः सर्वकामदः । मुन्यादिकं च पूर्वोक्तं षडंगान्यपि पूर्ववत् ॥१४४॥ ध्यायद्रेणे हनूमंतं सूर्यकोटिसमप्रभम् । धावंतं रावणं जेतुं दृष्ट्वा सत्वरमुत्थितम् ॥१४५॥ करे । तदनन्तर सीता सहित राम का ध्यान कर केसर के साथ घिसे हुए लाल चन्दन से उसी की शलाका द्वारा ताम्रपात्र में अष्टदल कमल लिखे । कर्णिका मन्त्र लिखकर उस पर कपीश्वर का आवाहन करे ॥१२७- १३१३॥ ध्यानपुरस्सर मूलमन्त्र से मूर्ति की प्रतिष्ठा कर पाद्य, गंध, पुष्प आदि सब कुछ मूलमन्त्र से ही समर्पित करे । केसरों पर छः अङ्ग देवों और पत्रों पर सुग्रीव, लक्ष्मण, अङ्गद, नल, नील, जांबवंत, कुमुद, केसरोश दिक्पाल तथा वज्र आदि की पूजा करे । इस प्रकार मन्त्र को सिद्ध कर मन्त्री इष्टसिद्धि करे । नदी तीर या वन या पर्वत या विजनस्थान में साधक साधन प्रारंभ करे ॥१३२-१३६॥ जिताहार, जितश्वास, जितवाक् तथा जितेन्द्रिय होकर न्यास, ध्यान तथा दिग्बंधन आदि करने के उपरान्त एक लाख मन्त्र जपकर पूर्ववत् पूजा करे । जिस दिन मन्त्रजप पूर्ण हो जाय, उस दिन विशिष्ट पूजा करनी चाहिये । एकाग्रमन से अच्छी तरह पवननंदन का ध्यान कर दिन-रात तब तक जप करते रहना चाहिये, जब तक दर्शन न हो । जब हनुमान् जो साधक को सुदृढ समझते हैं, तब वे प्रसन्न होकर रात्रि में उसके आगे आते हैं और यथेच्छ वर प्रदान करते हैं । उत्तम साधक वर प्राप्त कर सुख से विहरण करता है ॥१३७-१४१॥ यह साधना अत्युत्तम है । लोगों के कल्याण की कामना से मैंने इस रहस्य को प्रकाशित किया है, जो देवताओं के लिये भी दुर्लभ है । आत्मकल्याण के लिये अन्य प्रयोगों को भी करना चाहिये । इन्दु (अनुस्वार) युक्त वियत् (ह) अर्थात् (हं) के पश्चात् ङे विभक्त्यन्त पवननंदन शब्द हो और अन्त में वह्निप्रिया (स्वाहा) हो तो (हं पवननंदनाय स्वाहा) यह दशाक्षर मन्त्र सकल कामनाओं को पूर्ण करता है। इसके मुनि आदि पूर्ववत् ही हैं । षडंगन्यास आदि भी पहिले ही की तरह करे । तदनन्तर हनुमान् का ध्यान करे कि-उनकी कान्ति कोटि सूर्यों के समान है । रण में भागते हुए रावण को देखकर शीघ्र ही उसका पीछा करने के लिये उठ खड़े हुए हैं ।
६५२ नारदीयपुराणम् लक्ष्मणं च महावीरं पतितं रणभूतले । गुरुं च क्रोधमुत्पाद्य ग्रहीतुं गुरुपर्वतम् ॥१४६॥ हाहाकारैः सदर्पैश्च कंपयंतं जगत्त्रयम् । आब्रह्मांडं समाव्याप्य कृत्वा भीमं कलेवरम् ॥१४७॥ लक्षं जपेद्दशांशेन जुहुयात्पूर्ववत्सुधीः । पूर्ववत्पूजनम् प्रोक्तं मन्त्रस्यास्य विधानतः ॥१४८॥ एवं सिद्धे मनौ मन्त्री साधयेदात्मनो हितम् । अस्यापि मन्त्रवर्यस्य रहस्यं साधनं तु वै ॥१४९॥ सुगोप्यं सर्वतन्त्रेषु न देयं यस्य कस्यचित् । ब्राह्मे मुहूर्ते चोत्थाय कृतनित्यक्रियः शुचिः ॥१५०॥ गत्वा नदीं ततः स्नात्वा तीर्थमावाह्य चाष्टधा । मूलमन्त्रं ततो जप्त्वा सिंचेदादित्यसंख्यया ॥१५१॥ एवं स्नानादिकं कृत्वा गंगातीरेऽथवा पुनः । पर्वते वा वने वापि भूमिग्रहणपूर्वकम् ॥१५२॥ आद्यवर्णैः पूरकं स्यात्पञ्चवर्गैश्च कुम्भकम् । रेचकं च पुनर्ग्राह्यैरेवं प्राणान्नियम्य च ॥१५३॥ विधाय भूतशुद्ध्यादि पीठन्यासावधि पुनः । ध्यात्वा पूर्वोक्तविधिना संपूज्य च कपीश्वरम् ॥१५४॥ तदग्रे प्रजपेन्नित्यं साधकोऽयुतमादरात् । सप्तमे दिवसे प्राप्ते कुर्याच्च पूजनम् महत् ॥१५५॥ एकाग्रमनसा मन्त्री दिवारात्रं जपेन्मनुम् । महाभयं प्रदत्त्वा त्रिभागशेषामु निश्चितम् ॥१५६॥ यामिनीषु समायाति नियतं पवनात्मजः । यथेप्सितं वरं दद्यात्साधकाय कपीश्वरः ॥१५७॥ विद्यां वापि धनं वापि राज्यं वा शत्रुनिग्रहम् । तत्क्षणादेव चाप्नोति सत्यं सत्यं न संशयः ॥१५८॥ इह लोकेऽखिलान्कामान्भुक्त्वा॑ते मुक्तिमाप्नुयात् । सद्योचितं वायुयुग्मं हनूमंतेति चोद्धरेत् ॥१५९॥ फलांते फक्रियानेत्रयुक्ता च कामिका ततः । धग्गंते धगितेत्युक्त्वा आयुरास्व पदं ततः ॥१६०॥ रणभूमि में गिरे हुए महावीर लक्ष्मण को देखकर वे अत्यन्त क्रोध करते हैं तथा महाशैल को उखाड़ कर लाने के लिये चल पड़ते हैं। उस समय तीनों लोक में हाहाकार मच जाता है । उनके भयानक शरीर को देख कर ब्रह्मांड कांप उठता है । विद्वान् साधक एक लाख इस मन्त्र का जप कर पहिले की तरह उसका दशांश हवन करे। इस मन्त्र की पूजा भी पूर्ववत् ही विधिपूर्वक करनी चाहिये ॥१४२-१४८॥ इस प्रकार मन्त्र सिद्ध कर लेने पर मन्त्री अपना इष्टसाधन करे। इस मन्त्र-राज का भी रहस्य एवम् साधन समस्त तंत्रों में गुप्त करके रखा गया है। यह सबको नहीं बतलाना चाहिये। ब्राह्ममुहूर्त में उठकर नित्य कर्म से निवृत्त हो, नदी में जाकर स्नान करे। आठ तीर्थों का आवाहन कर मूलमन्त्र को जपते हुए बारह बार जल से अपने को सिक्त करे। पुनःस्नानोपरान्त गङ्गातीर या पर्वत या वन में आसन पर बैठ कर आद्य अक्षरों से पूरक, पंचवर्गों से कुंभक और य आदि अक्षरों से रेचक प्राणायाम करे। पश्चात् पीठन्यास, भूतशुद्धि आदि कर के पूर्वोक्त विधि से हनुमान् का ध्यानपूर्वक पूजन करे और उनके आगे नित्य आदरपूर्वक दश हजार मन्त्र जपे। सातवें दिन महापूजा करनी चाहिये ॥१४९-१५५॥ साधक एकाग्रमन से दिन-रात मन्त्र को जपता रहे। ऐसा करने से वह निर्भय हो जाता है। रात्रि में आकर हनुमान् जो उसे अभिलषित वर देते हैं। विद्या या धन या राज्य या शत्रु निग्रह जो कुछ वह चाहता है, तत्काल उसे मिल जाता है। यह ध्रुव सत्य है, इसमें संशय करने की आवश्यकता नहीं। वह साधक इस लोक में अखिल भोगों को भोग कर अन्त में मोक्ष पाता है ॥१५६-१५८॥ सद्योजात (ओ) सहित दो वायु (य् यू-यो यो) 'हनुमन्त' का उच्चारण करे। फिर 'फल' के अन्त में 'फ' तथा नेत्र (इ) युक्त क्रिया (ल) एवं कामिका (त) का उच्चारण करे। तत्पश्चात् 'धग्धगित' बोलकर 'आयुराष्' पद का उच्चारण करे । तदनन्तर लोहित (प) तथा 'रुद्राह' का उच्चारण करना चाहिए। मन्त्र--नों यो यो हनुमन्त फल-फलितं धग्धगित आयुराष पड्डाह) यह २५ अक्षरों का मन्त्र है। इसके मुनि आदि तो पूर्वोक्त
६५३ चतुःसप्ततितमोऽध्यायः लोहितो गरुडो हेतिर्वाणनेत्राक्षरो मनुः । मुन्यादिकं तु पूर्वोक्तं प्लीहरोगहरो हरिः ॥१६१॥ देवता च समुद्दिष्टा प्लीहयुक्तोदरे पुनः । नागवल्लीदलं स्थाप्यमुपर्याच्छादयेत्ततः ॥१६२॥ वस्त्रं चैवाष्टगुणितं ततः साधकसत्तमः । शकलं वंशजं तस्योपरि मुंचेत्कपिं स्मरेत् ॥१६३॥ आरण्यसानलोत्पन्ने वह्नौ यष्टिं प्रतापयेत् । बदरीभूरुहोत्थां तां मन्त्रेणानेन सप्तधा ॥१६४॥ तया संताडयेद्वंशशकलं जठरस्थितम् । सप्तकृत्वः प्लीहरोगो नाशमायाति निश्चितम् ॥१६५॥ तारो नमो भगवते आंजनेयाय चोच्चरेत् । अमुकस्य श्रृंखलां त्रोटय द्वितयमीरयेत् ॥१६६॥ बंधमोक्षं कुरुयुगं स्वाहांतोऽयं मनुर्मतः । ईश्वरोऽस्य मुनिश्च्छन्दोऽनुष्टुप्च देवता पुनः ॥१६७॥ श्रृंखलामोचकः श्रीमान्हनुमान्पवनात्मजः । हं बीजं ठद्वयं शक्तिर्बंधमोक्षे नियोगता ॥१६८॥ षड्दीर्घवह्निसंयुक्तेन बीजेनांगानि कल्पयेत् । बामे शैलं वेरिमदं विशुद्धं टंकमन्यतः ॥१६९॥ दधानं स्वर्णवर्णं च ध्यायेत्कुंडलिनं हरिम् । एवं ध्यात्वा जपेल्लक्षदशांशं चूतपल्लवैः ॥१७०॥ जुहुयात्पूर्ववत्प्रोक्तं यजनं वास्य सुरिभिः । महाकारागृहे प्राप्तो ह्ययुतं प्रजपेन्नरः ॥१७१॥ शीघ्रं कारागृहान्मुक्तः सुखी भवति निश्चितम् । यंत्रं चास्य प्रवक्ष्यामि बन्धमोक्षकरं शुभम् ॥१७२॥ अष्टच्छदांतः षट्कोणं साध्यनामसमन्वितम् । षट्कोणेषु ध्रुवं ङेऽतमांजनेयपदं लिखेत् ॥१७३॥ अष्टच्छदेषु विलिखेतप्रणवौ वातुद्वात्विति । गोरोचनाकुंकुमेन लिखित्वा यंत्रमुत्तमम् ॥१७४॥ धृत्वा मूर्ध्नि जपेन्मंत्रमयुतं बन्धमुक्तये । यन्त्रमेतल्लिखित्वा तु मृत्तिकोपरि मार्जयेत् ॥१७५॥ दक्षहस्तेन मन्त्रज्ञः प्रत्यहं मंडलावधि । एवं कृते महाकारागृहान्मंत्री विमुच्यते ॥१७६॥ मन्त्र के समान ही हैं। परन्तु देवता प्लीहरोग (प्लीहा) का हरण करने वाले हरि हैं ॥१५९-१६१॥ जिसके पेट में यह रोग हो उसके पेट पर पान का पत्ता रख आठ (तहके) वस्त्रों से उसे ढांक दे। फिर हनुमान् का ध्यान कर बाँस का एक टुकड़ा उस पर रख छोड़े। अनन्तर इस मन्त्र को पढ़ते हुए बेर की लाठी से सात बार उस टुकड़े का ताड़न करे। वह लाठी दावाग्नि में तपी होनी चाहिये। उससे उदरस्थित वंशखंड का सात बार ताड़न करने से प्लीहा निश्चय छूट जातो है ॥१६२-१६५॥ "ओं नमो भगवते आंजनेयाय, अमुकस्य श्रृंखलां त्रोटय, बंधमोक्षं कुरु युगं स्वाहा" यह मन्त्र है। इसके मुनि ईश्वर, छंद अनुष्टुप् और देवता श्रृंखला (बंधन) को तोड़ने वाले वायुसुत श्रीमान् हनुमान् हैं। इसका बीज 'हं' है और शक्ति ठद्वय। बंधनमोक्ष में इसका नियोग किया जाता है, छः दीर्घ मात्रा और वह्नियुक्त बीज से अंगन्यास करना चाहिये। तत्पश्चात् बाँयें हाथ पर पर्वत और दाहिने हाथ में गदा धारण करने वाले स्वर्णवर्ण हनुमान् का ध्यान करे, जिनके कानों में कुण्डल सुशोभित होते हैं। ध्यानोपरान्त इस मन्त्र का एक लाख जप करे और उसका दशांश आम्रपल्लवों से हवन करे। विद्वान् साधक इस मन्त्र का पूजन आदि पूर्व मन्त्र की तरह करे। जो मनुष्य कारागार में पड़ा है, वह दश हजार इस मन्त्र के जप करने से शीघ्र कारागार से मुक्त होकर सुखी होता है ॥१६७-१७१॥ इसका यंत्र भी मैं बता देता हूँ, जो शुभकारी तथा बंधन से छुड़ाने वाला है। अष्टदल कमल के भीतर षटकोण बनाकर उनकी कर्णिका में साध्य पुरुष का नाम लिखे। छह कोणों में 'ओं आञ्जनेयाय' का उल्लेख करे। अष्टपत्रों पर प्रणव तथा 'वातु, वातु' लिखना चाहिये। बंधन से मुक्ति पाने के लिये गोरोचन तथा कुंकुम से इस उत्तम यंत्र को लिखकर मस्तक पर धारण करके उक्त मन्त्र का दश हजार जप करे। इस मन्त्र को लिख कर साधक प्रति दिन दाहिने हाथ से मिट्टी के ऊपर मंडलाकार में इसे घुमाये। ऐसा करने से वह कारागार से मुक्त हो जाता है ॥१७२-१७६॥ गगन (ह), नेत्र (इ)
६५४ नारदीयपुराणम् गगनं ज्वलनः साक्षी मर्कटेति द्वयं ततः । तोयं शशेषे मकरे परिमुंचति मुंचति ॥१७७॥ ततः शृंखलिकां चेति वेदनेत्राक्षरो मनुः । इमं मंत्रं दक्षकरे लिखित्वा वामहस्ततः ॥१७८॥ दूरीकृत्य जपेन्मंत्रमष्टोत्तरशतं बुधः । विसप्ताहात्प्रबद्धोऽसो मुच्यते नात्र संशयः ॥१७९॥ मुन्याद्यर्वादिकं सर्वमस्य पूर्ववदाचरेत् । लक्षं जपो दशांशेन शुभैर्द्रव्यैश्च होमयेत् ॥१८०॥ पुच्छाकारे सुवस्त्रे च लेखन्या खुरकोत्थया । गन्धाष्टकैर्लिखेद्रूपं कपिराजस्य सुन्दरम् ॥१८१॥ तन्मध्येऽष्टदशार्णं तु शत्रुनामान्वितं लिखत् । तेन मन्त्राभिजप्तेन शिरोबध्देन भूमिपः ॥१८२॥ जयत्यरिगणं सर्वं दर्शनादेव निश्चितम् । चन्द्रसूर्योपरागादौ पूर्वोक्तं लेखयेद्ध्वजे ॥१८३॥ ध्वजमादाय मन्त्रतः संस्पर्शान्मोक्षणावधि । मातृकां जापयेत्पश्चाद्दशांशेन च होमयेत् ॥१८४॥ तिलैःसर्षपसंमिश्रैः संस्कृते हव्यवाहने । गजे ध्वजं समारोप्य गच्छेद्युद्धाय भूपतिः ॥१८५॥ गजस्थं तं ध्वजं दृष्ट्वा पलायन्तेऽरयो ध्रुवम् । महारक्षाकरं यन्त्रं वक्ष्ये सम्यग्धनूमतः ॥१८६॥ लिखेद्द्षदलं पद्मं साध्याख्यायुक्तकर्णिकम् । दलेऽष्टकोणमालिख्य मालामन्त्रेण वेष्टयेत् ॥१८७॥ तद्वहिर्माययावेष्ट्य प्राणस्थापनमाचरेत् । लिखितं स्वर्णलेखन्या भूर्जपत्रे सुशोभने ॥१८८॥ काश्मीररोचनाभ्यां तु त्रिलोहेन च वेष्टितम् । सम्पातसाधितं यंत्रं भुजे वा मूर्ध्नि धारयेत् ॥१८९॥ रणे दुरोदरे वादे व्यवहार जयं लभेत् । ग्रहैर्विघ्नैर्विषैः शस्त्रैश्चौरैर्नैवाभिभूयते ॥१९०॥ सर्वान्रोगानपाकृत्य चिरं जीवेच्छतं समाः । षड्दीर्घयुक्तं गगनं वह्निचाढ्यं तारसंपुटम् ॥१९१॥ युक्त ज्वलन (र) अर्थात् हरि पद के पश्चात् दो बार 'मर्कट' शब्द बोलकर शेष (आ) सहित तोय (व) अर्थात् 'वा' का उच्चारण करके 'मकरे' पद बोले । फिर 'परिमुञ्चति मुञ्चति शृङ्खलिकाम्' का उच्चारण करे । पूरा मन्त्र-(हरि मर्कट मर्कट वाम करे परिमुञ्चति शृङ्खलिकाम्) यह २४ अक्षरों का मन्त्र है। इसको बाँये हाथ से लिख कर दाहिने हाथ में धारण करके एक सौ आठ बार जप करे । तीन सप्ताह ऐसा करने से बंधन से मुक्ति मिल जाती है इसमें संशय नहीं । इसके मुनि आदि पूर्ववत् हैं। अर्चना आदि भी पूर्ववत् ही करनी चाहिये । एक लाख मन्त्र जप करने के उपरान्त उसका दशांश पवित्र द्रव्यों से हवन करे । खुर की बनाई हुई लेखनी से पुच्छाकार सुवस्त्र पर अष्टगन्धों से कपिराज का सुन्दर चित्र बनाये ।।१७७-१८१।। उसके मध्य में शत्रुनाम सहित अट्ठारह अक्षरों वाला मन्त्र लिखे । पुनः मन्त्र से अभिमंत्रित कर उसे शिर में बांध ले । ऐसा करने वाला राजा शत्रुसमूह को देखते ही जीत लेता है, यह निश्चित बात है । चन्द्र-सूर्य-ग्रहण के समय पूर्वोक्त मन्त्र को पताका पर लिख कर स्पर्श से लेकर मोक्षकाल पर्यन्त उसका धारण करते हुए मातृका जप करे । पश्चात् सुसंस्कृत अग्नि में तिलमिश्रित सरसों से हवन कर उस पताका को हाथी पर फहराये और फिर उस हाथी पर चढ़कर राजा युद्ध करने के लिये जाय । रणभूमि में हाथी पर फहराते हुए उस पताका को देखते ही शत्रु भाग जाते हैं ।।१८२-१८५३॥ अब मैं महारक्षाकारी हनुमान् के मन्त्र को बतलाता हूँ । कर्णिका सहित अष्टदलकमल लिख कर उस पर साध्य का नाम लिखे । पुनः पत्रों पर अष्टकोण लिखकर मालामन्त्र से उसे वेष्टित करे । उसके बाहर माया बीज से आवृत कर प्राणप्रतिष्ठा करे । सुन्दर भोजपत्र पर सोने की लेखनी से यंत्र लिखना चाहिये । गोरोचन तथा कुंकुम से यदि लिखे तो त्रिलोह से उसे वेष्टित कर दे । जो इस प्रकार संसाधित यंत्र को भुजा या मस्तक पर धारण करता है, वह घोर संग्राम, शास्त्रार्थ तथा व्यवहार में विजयी होता है। उसके ऊपर ग्रह, विघ्न, विष, शस्त्र तथा चोरों का प्रभाव नहीं पड़ता । वह समस्त व्याधियों से मुक्त होकर सौ वर्ष जीता है ।।१८६-१९०३॥ यह दीर्घ स्वर से युक्त गगन (ह) और वह्नि (र) को तार (ओ) से संपुटित कर देने से आठ अक्षरों का महामन्त्र
६५५ चतुःसप्ततितमोऽध्यायः अष्टार्णोऽयं महामंत्रो मालामंत्रोऽथ कथ्यते । प्रणवो वज्रकायेति वज्रतुंडेति संपठेत् ॥१६२॥ कपिलांते पिंगलेति ऊर्ध्वकेशमहापदम् । बलरक्तमुखांते तु तडिज्जिह्व महा ततः ॥१६३॥ रौद्रदंष्ट्रोत्कटं पश्चात्कहद्वंद्वं करालिति । महद्दृढप्रहारेण लंकेश्वरवधाततः ॥१६४॥ वायुमंहासेतुपदं बंधांते च महा पुनः । शैलप्रवाह गगनेचर एह्येहि संवदेत् ॥१६५॥ भगवन्महाबलांते पराक्रमपदं वदेत् । भैरवाज्ञापयैह्येहि महारौद्रपदं ततः ॥१६६॥ दीर्घपुच्छेन वर्णांते वद्वेष्टय वैरिणम् । जंभयद्वयमाभाष्य वर्मस्त्रांतो मनुर्मतः ॥१६७॥ मालाह्वयो द्विजश्रेष्ठ शरनेत्रधराक्षरः । मालामंत्राष्टांर्णयोश्च मुन्याद्यर्चा तु पूर्ववत् ॥१६८॥ जप्तो युद्धे जयं दद्याद्व्याधौ व्याधिविनाशनः । एवं यो भजते मंत्री वायुपुत्रं कपिश्वरम् ॥१६९॥ सर्वांन्स लभते कामान्देवेरपि सुदुर्लभान् । धनं धान्यं सुतान्पौत्रान्सौभाग्यमतुलं यशः ॥२००॥ मेधां विद्यां प्रभां राज्यं विवादे विजयं तथा । वश्याद्यानि च कर्माणि संगरे विजयं तथा ॥२०१॥ उपासितोऽञ्जनागर्भसंभूतः प्रददात्यलम् । ॥२०२॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने सनत्कुमारविभागे तृतीयपादे हनुमन्मंत्रकथनं नाम चतुःसप्ततितमोऽध्यायः ॥७४॥
बनता है। अब मालामन्त्र को बताता हूँ। प्रणव (ओं) के बाद वज्रकाय और वज्रतुण्ड का पाठ करे। उसके बाद क्रमशः कपिल, पिंगल, ऊर्ध्वकेश, बलरक्तमुख, तडिज्जह्व, रौद्रदंष्ट्र, कट, कहद्वन्द्व, कराल, महद्दृढप्रहारेण लंकेश्वरवधाततः। वायुमंहासेतुपदं बंधांते च महा पुनः । शैलप्रवाह, गगनेचर एहि एहि मह उच्चारंण करने के बाद 'भगवन्' महाबल, महापराक्रम, भैरव, आज्ञापय, एहि एहि, महारौद्र। दीर्घपुच्छेन वैरिणं वेष्टय, द्वयं जम्भय, यह कहने के बाद 'हूं' तथा 'फट्' जोड़ देना चाहिए। द्विजश्रेष्ठ ! इस मालामन्त्र के तथा अष्टाक्षर मन्त्र के मुनि आदि पूर्ववत् हैं और अर्चना आदि भी पूर्ववत् ही करनी चाहिये। युद्ध में इसका जप करने से विजय प्राप्त होती है और व्याधिनिवारणार्थ जपने से रोग का नाश होता है। जो व्यक्ति पूर्वोक्त रीति से वायुपुत्र हनुमान् की आराधना करता है, उसे देवदुर्लभ कामनाओं की प्राप्ति होती है। धन, धान्य, पुत्र, पौत्र, सौभाग्य तथा अतुलनीय यश उसे लाभ होता है। अंजना के गर्भ से उत्पन्न होने वाले हनुमान् का उपासक प्रचुर मेधा, विद्या, प्रभा, राज्य, विवाद में विजय, रण में विजय और वशीकरण आदि सिद्धियों को प्राप्त करता है॥१९१-२०२॥ श्रीनारदीयपुराण के बृहदुपाख्यानयुक्त पूर्वार्ध में सनत्कुमार-विभागीय तृतीयपाद में हनुमन्मन्त्रकथन नामक चौहत्तरवां अध्याय समाप्त ॥७४॥
पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः सनत्कुमार उवाच अथ दीपविधिं वक्ष्ये सरहस्यं हनूमतः । यस्य विज्ञानमात्रेण सिद्धो भवति साधकः ॥१॥ दीपपात्रप्रमाणं च तैलमानं क्रमेण तु । द्रव्यस्य च प्रमाणं वै तत्तु जानमनुक्रमात् ॥२॥ स्थानभेदं च मंत्रं च दीपदानमनुं पृथक् । पुष्पवासिततैलेन सर्वकामप्रदं मतम् ॥३॥ तिलतैलं श्रियः प्राप्त्यै पथिकागमनं प्रति । अतसीतैलमुद्दिष्टं वश्यकर्मणि निश्चितम् ॥४॥ सार्षपं रोगनाशाय कथितं कर्मकोविदैः । मारणे राजिकोत्थं वा विभीतकसमुद्भवम् ॥५॥ उच्चाटने करंजोत्थं विद्वेषे मध्वृक्षजम् । अलाभे सर्वतैलानां तिलजं तैलमुत्तमम् ॥६॥ गोधूमाश्च तिला माषा मुद्गा वै तंडुलाः क्रमात् । पंचधान्यमिदं प्रोक्तं नित्यदीपं तु मारुतेः ॥७॥ पंचधान्यसमुद्भूतं पिष्टमात्रं सुशोभनम् । सर्वकामप्रदं प्रोक्तं सर्वदा दीपदानके ॥८॥ वश्ये तंडुलपिष्टोत्थं मारणे माषपिष्टजम् । उच्चाटने कृष्णतिलपिष्टजं च प्रकीर्तितम् ॥९॥ पथिकागमने प्रोक्तं गोधूमोत्थं सतंडुलम् । मोहने त्वाढकीजातं विद्वेषे च कुलत्थजम् ॥१०॥ अध्याय ७५ हनुमान् के लिए दीपदान का विधान सनत्कुमार बोले--अब इसके उपरान्त हनुमान् के उद्देश्य से दीपदान करने का विधान रहस्य सहित बता देता हूँ, जिसके ज्ञानमात्र से साधक सिद्ध हो जाता है। दीपदान का प्रमाण, तेल का मान तथा द्रव्य का प्रमाण मैं अनुक्रम से बतलाऊँगा। दीपदान के विविध स्थान तथा मन्त्र को भी कहूँगा। पुष्प-वासित तेल से दीपक को जलाना समस्त अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाला है। तिल के तेल से दीप जलाने से श्री प्राप्त होती है और पथिक (बटोही) सकुशल मार्ग को तय करता है। वशीकरण के लिये अलसी का तेल कहा गया है ॥१-४॥ कर्म के ज्ञाताओं ने रोगनाश के लिये सरसों का तेल बतलाया है। मारण में पीले सरसों या बहेड़ा का तेल प्रयोग कर सकते हैं। उच्चाटन में करंज का तेल और विद्वेष में महुए का तेल व्यवहार करना चाहिये। समस्त तेलों के अभाव में तिल का तेल ही उत्तम माना गया है। गेहूँ, तिल, उड़द, मूंग और चावल--इन पाँचों अन्नों का बनाया हुआ दीप नित्यदीप के रूप में हनुमान् को समर्पित किया जाता है ॥५-७॥ पञ्चधान्यों को पीस कर उससे बनाया गया सुन्दर दीप सकल कामनाओं को देने वाला है। वह सदा दीपदान के लिये प्रशस्त माना गया है। चावल के पिसान का बनाया दीप वशीकरण में, उड़द का मारण में, काले तिल का उच्चाटन में, चावल मिश्रित गेहूँ का यात्री के सकुशल लौट आने में, अरहर का मोहन में, कुलथी का विद्वेष में, केवल उड़द का संग्राम
६५७ पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः संग्रामे केवला माषाः प्रोक्ता दीपस्य पात्रके । संधौ त्रिपिष्टजं लक्ष्मीहेतोः कस्तूरिकामवम् ॥११॥ एलालवंगकर्पूरमृगनाभिसमुद्भवम् । कन्याप्राप्त्यै तथा राजवश्ये सख्ये तथैव च ॥१२॥ अलाभे सर्ववस्तूनां पंचधान्यं वरं स्मृतम् । अष्टमुष्टिर्भवेत्कुञ्चित्कुञ्चिदष्टौ च पुष्कलम् ॥१३॥ पुष्कलानां चतुर्णां च ह्याढकः परिकीर्तितः । चतुराढको भवेद्द्रोणः खारी द्रोणचतुष्टयम् ॥१४॥ खारीचतुष्टयं प्रस्थसंज्ञा च परिकीर्तिता । अथवान्यप्रकारेण मानमत्र निगद्यते ॥१५॥ पलद्वयं तु प्रसृतं द्विगुणं कुडवं मतम् । चतुर्भिः कुडवैः प्रस्थस्तैश्चतुर्भिस्तथाढकः ॥१६॥ चतुराढको भवेद्द्रोणः खारी द्रोणचतुष्टयम् । क्रमेणैतेन ते ज्ञेयाः पात्रे षट्कर्मसंभवे ॥१७॥ पञ्च सप्त नव तथा प्रमाणास्ते यथाक्रमम् । सौगन्धे नैव मानं स्यात्तद्यथारुचि संमतम् ॥१८॥ नित्यपात्रे तु तैलानां नियमो वार्तिकोद्भवः । सोमवारे गृहीत्वा तद्धान्यं तोयप्लुतं घरेत् ॥१९॥ पश्चात्प्रमाणतो ज्ञेयं कुमारीहस्तपेषणम् । तत्पिष्टं शुद्धपात्रे तु नदीतोयेन पीडितम् ॥२०॥ दीपपात्रं ततः कुर्याच्छुद्धः प्रयतमानसः । दीपपात्रे ज्वाल्यमाने मारुतेः कवचं पठेत् ॥२१॥ शुद्धभूमौ समास्थाप्य भौमे दीपं प्रदापयेत् । मालामन्तूनां ये वर्णाः साध्यनामसमन्विताः ॥२२॥ वर्तिकायां प्रकर्त्तव्यास्तंतवस्तत्प्रमाणकाः । तंस्त्रिंशंशेन वा ग्राह्या गुरुकार्येऽखिलाढ्यता ॥२३॥ कूटतुल्याः स्मृता नित्ये सामान्येऽथ विशेषके । रुद्राः कूटगणाः प्रोक्ता न पात्रे नियमो मतः ॥२४॥ एकविंशतिसंख्याकास्तन्तवोऽथाध्वनि स्मृताः । रक्तसूत्रं हनुमतो दीपदाने प्रकीर्तितम् ॥२५॥ कृष्णमुच्चाटने द्वेषेऽरुणं मारणकर्मणि । कूटतुल्यपलं तैलं गुरुकार्ये शिवैर्गुणम् ॥२६॥
त्रिपिष्ट (?) का संधि करने में, कस्तूरी का लक्ष्मी प्राप्ति में, और इलायची, लवंग तथा कपूर का कन्या-प्राप्ति, मित्रता तथा राजा के वशीकरण में उपयोग करना चाहिये । अन्य सब वस्तुओं के न मिलने पर पञ्चधान्य उत्तम माना गया है । आठ मुट्ठियों की एक कुञ्चि १ होती है, आठ कुञ्चियों का एक पुष्कल, १ चार पुष्कलों का एक आढक, चार आढकों का एक द्रोण, चार द्रोणों की एक खारी और चार खारियों का एक प्रस्थ होता है । अथवा इस संबन्ध में अन्य प्रकार का भी मान कहा गया है । १८-१५॥ दो पलों २ का एक प्रसृत, दो प्रसूतों का एक कुडव, चार कुडवों का एक प्रस्थ, चार प्रस्थों का एक आढकं, चार आढकों का एक द्रोण और चार द्रोणों की एक खारी होती है। इस क्रम से षट्कर्मोपयोगी पात्र में ये मान समझने चाहिए । पाँच, सात तथा नौ-ये क्रमशः दीपक के प्रमाण हैं । सुगंधित तेल से जलने वाले दीपक का कोई मान नहीं है। उसका मान अपनी रुचि के अनुसार ही माना गया है। तेलों के नित्य पात्र में केवल बत्ती का विशेष नियम होता है। सोमवार को धान्य लेकर उसे जल में डुबोकर रखे । फिर प्रमाण के अनुसार कुमारी के हाथ से उसे पिसा कर शुद्ध पात्र में नदी के जल से उसे गूंधे ॥१६-२०॥ तदनन्तर पवित्र मन से दीपपात्र तैयार कर उसे जला कर हनुमान् का कवच पाठ करे। मंगल दिन पवित्र भूमि पर दीपक को रख कर दान करे। साध्यनाम सहित मालाओं में जितने अक्षर हैं उतने ही तंतु (सूत) दीपक की बत्ती में होने चाहिये । अथवा अक्षरों के तीसवें अंश के बराबर (अर्थात् तीस अक्षरों को छोड़कर बचे अक्षरों के प्रमाण) तंतुओं को रखे। भारी काम करना हो तो पूर्व प्रमाण के ही अनुसार तंतु रखना चाहिये । नित्यपात्र में कूटतुल्य (ग्यारह) और विशेषपात्र में पूर्व कथितानुसार तंतु रखे। कूट ग्यारह संख्या को कहते हैं। पात्र में कोई नियम नहीं है। रास्ते पर जलाये जाने वाले दीपक की बत्ती में इक्कीस तंतु चाहिये । हनुमान् को समर्पित किये जाने वाले दीप की बत्ती लाल रंग की होनी चाहिये। उच्चाटन कार्य के लिये काले रंग की और १-ये सब मान (तौल) के भेद हैं। २. आठ रत्ती और दो मासे की तोल । ८३ ना० पृ०
६५८ नारदीयपुराणम् ॥२७॥ नित्ये पंचपलं प्रोक्तमथवा मानसी रुचिः हनुमत्प्रतिमायास्तु सन्निधौ दीपदापनम् । शिवालयॆऽथवा कुर्यान्नित्यनैमित्तिके स्थले ॥२८॥ विशेषोऽस्त्यत्र यः कश्चिन्मारुतेरुच्यते मया ॥२६॥ प्रतिमाये प्रमोदेन ग्रहभूतग्रहेषु च । चतुष्पथे तथा प्रोक्तं षट्सु दीपप्रदापनम् ॥३०॥ सन्निधौ स्फाटिके लिंगे शालग्रामस्य सन्निधौ । नानाभोगश्रियै प्रोक्तं दीपदानम् हनूमतः ॥३१॥ गणेशसन्निधौ विघ्नमहाकंटकनाशने । विषव्याधिभये घोरे हनुमत्सन्निधौ स्मृतम् ॥३२॥ दुर्गायाः सन्निधौ प्रोक्तं संग्रामे दोपदानम् । चतुष्पथे व्याधिनष्टौ दुष्टदृष्टौ तथैव च ॥३३॥ राजद्वारे बंधमुक्तौ कारागारेऽथवा मतम् । अश्वत्थवटमूले तु सर्वकार्यप्रसिद्धये ॥३४॥ वश्ये भये विवादे च वेश्मसंग्रामसंकटे । द्यूते दृष्टेस्तंभने च विद्वेषे मारणे तथा ॥३५॥ मृतकोत्थापने चैव प्रतिमाचालने तथा । विचे व्याधौ ज्वरे भूतग्रहे कृत्याविमोचने ॥३६॥ क्षतग्रंथौ महारण्ये दुर्गे व्याघ्रे च दंतिनि । क्रूरसत्त्वेषु सर्वेषु शश्वद्बंधविमोक्षणे ॥३७॥ पथिकागमने चैव दुःस्थाने राजमोहने । आगमे निर्गमे चैव राजद्वारे प्रकीतितम् ॥३८॥ दीपदानं हनुमतो नात्र कार्या विचारणा ॥३६॥ रुद्रैर्कावशत्पिडांश्च त्रिधा मंडलमानकम् । लघुमानं स्मृतं पंच सप्त वा नव वा तथा ॥४०॥ क्षीरेण नवनीतेन दध्ना वा गोमयेन च । प्रतिमाकरणं प्रोक्तं मारुतेर्दीपदापने ॥४१॥ दक्षिणाभिमुखं वीरं कृत्वा केसरिविक्रमम् ॥४२॥ द्वेष तथा मारण कर्म के लिये लाल रंग की बत्ती बनाये। किसी महान् कार्य की सिद्धि करनी हो तो ग्यारह पलों के प्रमाण से तेल दीपक में डाले। नित्यदीप में पाँच पल अथवा जितनी रुचि हो उतना तेल डाले। हनुमान् को प्रतिमा के समीप में दीपदान करना चाहिये ॥२५-२७१/२॥ शिवालय में या नित्य-नैमित्तिक स्थान में दीपदान कर सकते हैं। इस दोपदान के सन्दर्भ में जो विशेष बातें हैं, वह मैं बतलाता हूँ ॥२१-२९॥ प्रतिमा के आगे हर्षपूर्वक दीप समर्पण करे। इससे दुष्ट ग्रहों एवम् भूतों का उपद्रव शान्त होता है। चौराहे पर, स्फटिकमय शिवलिंग के समीप तथा शालग्राम के निकट दीप चढ़ाना चाहिये। हनुमान् को दीपक चढ़ाने से विविध प्रकार के भोग तथा श्री की प्राप्ति होती है। गणेश के समीप दीपदान करने से विघ्न तथा महासंकट का नाश होता है। भयंकर व्याधि तथा विष का भय दूर करना हो तो हनुमान् को दीप समर्पित करे ॥३०-३२॥ दुर्गा को दीपदान करने से संग्राम में विजय प्राप्त होती है। चौराहे पर दीप जलाने से व्याधि एवम् दृष्टि दोष नष्ट हो जाता है। राजद्वार पर दोप जलाने से बंधनमुक्ति या कारागार से मुक्ति मिलती है ॥३३३॥ पीपल तथा वटवृक्ष के मूल में दीप जलाने से अशेष कार्यों की सिद्धि होती है। वशीकरण, भय, विवाद, घरेलू संकट, रण-संकट, द्यूत, दृष्टि-दोष-निवारण, विद्वेष, मारण, मृतकोत्थापन, प्रतिमाचालन, विष, व्याधि, ज्वर, भूतग्रह, कृत्यामोचन, विस्फोटक, महारण्य, दुर्गम स्थान, बाघ, हाथी तथा भयानक जन्तुओं के भय, बंधनमोचन, पथिक के आगमन, दुष्ट स्थान, राजमोहन और राजद्वार में प्रवेश तथा निर्गमन-इन कार्यों में हनुमान् को दीपदान करने से सफलता मिलती है, इसमें विचार करने की आवश्यकता नहीं। ग्यारह, इक्कीस और पिण्ड-तीन प्रकार का मण्डलमान होता है। पाँच, सात अथवा नौ-इन्हें लघुमान कहा गया है ॥३४-४०॥ दीपदान के समय दूध या मक्खन या दही या गोबर से हनुमान् की प्रतिमा बनानी चाहिये। दीवाल पर या वस्त्र पर या पीठ पर वायुनन्दन का ऐसा चित्र बनाये, जो वीर तथा सिंह तुल्य पराक्रमी दिखाई पड़े, जिसका मुख दक्षिण दिशा की
पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः ६५६ ऋक्षविन्यस्तपादं च किरीटेन विराजितम् । लिखेदिमत्तौ पटे वापि पीठे वा मारुतेः शुभे ॥४३॥ मालामंत्रेण दातव्यं दीपदानं हनूमतः । नित्यदीपः प्रकर्त्तव्यो द्वादशाक्षरविद्यया ॥४४॥ विशेषस्तत्र यस्तं वै दीपदानेऽवधारय । षष्ठ्यादौ च द्वितीयादाविमं दीपमितोरयेत् ॥४५॥ गृहाणेति पदं पश्चाच्छेषं पूर्ववदुच्चरेत् । कूटार्दो नित्यदीपे च मंत्रं सूर्याक्षरं वदेत् ॥४६॥ तत्र मालाद्वयमनुना तत्तत्कार्येषु कारयेत् । गोमयेनोपलिप्तायां भूमौ तद्गतमानसः ॥४७॥ षट्कोणं वमुपत्रं च भूमौ रेखासमन्वितम् । कमलं च लिखेद्भद्रं तत्र दीपं निधापयेत् ॥४८॥ शैवे वा वैष्णवे पीठे पूजयेदंजनासुतम् । कूटषट्कं च षट्कोणे अंतराले परं लिखेत् ॥४६॥ षट्कोणेषु षडंगानि बीजयुक्तानि संलिखेत् । सौम्यं मध्यगतं लेख्यं तत्र संपूज्य मारुतिम् ॥५०॥ षट्कोणेषु षडंगानि नामानि च पुरोक्तवत् । वसुपत्रे क्रमात्पूज्या अष्टावेते च वानराः ॥५१॥ सुग्रीवायांगदायाथ सुषेणाय नलाय च । नीलायाथो जांबवते प्रहस्ताय तथैव च ॥५२॥ सुवेषाय ततः पश्चाद्यजेत्षडंगदेवताः । आदावंजनापुत्राय ततश्च रुद्रमूर्तये ॥५३॥ ततो वायुसुतायाथ जानकीजीवनाय च । रामदूताय ब्रह्मास्त्रनिवारणाय तत्परम् ॥५४॥ पंचोपचारैः संपूज्य देशकालौ च कीर्तयेत् । कुशोदकं समादाय दीपमंत्रं समुच्चरेत् ॥५५॥ उत्तराभिमुखो जप्त्वा साधयेत्साधकोत्तमः । तं मंत्रं कूटघा जप्त्वा जलं भूमौ विनििक्षिपेत् ॥५६॥ ततः करपुटं कृत्वा यथाशक्ति जपेन्मनुम् । अनेन दीपवर्येण उदङ्मुखगतेन वै ॥५७॥ तथा विधेहि हनुमन्ममस्युर्न मनोरथाः । त्रयोदशैव द्रव्याणि गोमयं मृत्तिका मसी ॥५८॥
ओर हो, पैर ऋक्ष (एतन्नामक पर्वत या रीछ ?) पर अवस्थित हो और मस्तक मुकुट से सुशोभित हो । हनुमान् को दीपदान मालामन्त्र से करना चाहिये । परन्तु नित्यदीप का दान द्वादशाक्षर मन्त्र से करे ॥४१-४४॥ अब दीपदान के संबन्ध में जो विशेष बातें हैं, उन्हें सुन लो । षष्ठी, द्वितीया आदि तिथियों में 'यह दीप स्वीकार कीजिये' यह कहकर शेष क्रिया पहिले ही की तरह करनी चाहिये । कूटदीप (राजद्वार आदि पर दिये जाने वाले दीप) तथा नित्यदीप दान करने के समय द्वादशाक्षर मन्त्र को पढ़े । अन्य दीपों के दान में तो माला मन्त्र से ही काम लेना चाहिये । गोबर से लिपी हुई भूमि पर एकाग्रचित्त हो षट्कोण अंकित करे । उसके बाह्य भाग में अष्टदल कमल बनावे तथा उसके बाह्य भाग में भूपुर-रेखा खींचे। उस कमल में दीपक रखे । शैव अथवा वैष्णव पीठ पर अञ्जनीनन्दन हनुमान् की पूजा करे । छह कोणों के अन्तराल में 'ह्रीं ह्स्फें स्फ्रें ह्स्त्रौं हुस्ख्फ्रें ह्सौं' इन छह कूटों का उल्लेख करे ।।४-४६।। छहो कोणों में वीज युक्त षडंग देवताओं का मन्त्र लिख कर मध्य में चन्द्रमन्त्र लिखे । उस पर वायुपुत्र को पूजा कर षट्कोण में षडंगदेवों के नाम भी पूर्वोक्त प्रकार से लिखे । अनन्तर अष्टदल पर सुग्रीव, अंगद, सुषेण, नल, नील, जांबवान, प्रहस्त तथा सुवेष नामक आठो बन्दरों का क्रमशः पूजन करे । तत्पश्चात् षडंगदेवताओं को भी पूजा करनी चाहिये । पहिले अंजनिपुत्र की अर्चना कर क्रमशः रुद्र- मूर्ति, वायुसुत, जानकीजीवन, रामदूत तथा ब्रह्मास्त्रनिवारक का पंचोपचार पूजन करे । तब देश, काल का उच्चारण कर कुश, जल लेकर दीपमन्त्र को पढ़े । उत्तम साधक उत्तर मुंह होकर पाँच बार इस मन्त्र को जप कर भूमि पर जल गिरा दे । तदुपराम्त अंजलि बांध कर यथाशक्ति मन्त्र का जप करते हुए प्रार्थना करे - "हे हनुमान् जो ! इस उत्तराभिमुख मनोरम दोप के दान से मेरे सकल मनोरथ पूर्ण हों।" ॥५०-५७३॥ (हनुमान् की पूजा का दूसरा विधान इस तरह है कि) गांबर, मिट्टी, स्याही, महावर, दरद (खस),
६६० नारदीयपुराणम् अलक्तं दरदं रक्तचंदनं चंदनं मधु । कस्तूरिका दधि क्षीरं नवनीतं घृतं तथा ॥५८॥ गोमयं द्वि विधं तत्र प्रोक्तं गोमहिषीभवम् । पश्चाद्विनष्टद्रव्याप्तौ माहिषं गोमयं स्मृतम् ॥६०॥ पथिकागमने दूरान्महादुर्गस्य रक्षणे । बालादिरक्षणे चैव चौरादिभयनाशने ॥६१॥ स्त्रीवश्यादिषु कार्येषु शस्तं गोगोमयं मुने । भूमिस्पृष्टं न तद्ग्राह्यमंतरिक्षाच्च भाजने ॥६२॥ चतुर्विधा मृत्तिका तु श्वेता पीतारुणासिता । तत्र गोपीचंदनं तु हरितालं च गैरिकम् ॥६३॥ मषी लाक्षारसोद्भूता सर्वं वान्यत्स्फुटं मतम् । कृत्वा गोपीचंदनेन चतुरस्रं गृहं सुधीः ॥६४॥ तन्मध्ये माहिषेणाथ कुर्यान्मूर्ति हनूमतः । बीजं क्रोधाच्च तत्पुच्छं लिखेन्मन्त्री समाहितः ॥६५॥ तैलेन स्नापयेन्मूर्तिं गुडेन तिलकं चरेत् । शतपत्रसमो धूपः शालनिर्याससंभवः ॥६६॥ कुर्याच्च तैलदीपं तु वर्तिपंचकसंयुतम् । दध्योदनेन नैवेद्यं दद्यात्साधकत्तमः ॥६७॥ वारत्रयं कठदेशे सशेषविषमुच्चरन् । एवं कृते तु नष्टानां महिषीणां गवामपि ॥६८॥ दासीदासादिकानां च नष्टानां प्राप्तिरीरिता । चौरादिदुष्टसत्त्वानां सर्पादीनां भये पुनः ॥६९॥ तालेन च चतुर्द्वारं गृहं कृत्वा सुशोभनम् । पूर्वद्वारे गजः स्थाप्यो दक्षिणे महिषस्तथा ॥७०॥ सर्पस्तु पश्चिम द्वारे व्याघ्रश्चैवोत्तरे तथा । एवं क्रमेण खङ्गं च क्षुरिकादण्डमुद्गरान् ॥७१॥ विलिख्य मध्ये मूर्ति च महिषीगोमयेन वै । कृत्वा डमरुहस्तां च चकिताक्षीं प्रयत्नतः ॥७२॥ रक्तचन्दन, चन्दन, मधु, कस्तूरी, दही, दूध, मक्खन और घी--इन तेरह वस्तुओं को एकत्रित करे । जिनमें गोबर गाय या भैंस का होना चाहिये। खोई हुई वस्तु की प्राप्ति के लिये भैंस के गोबर का उपयोग करे और दूर देश से पथिक के आगमन, दुर्ग की रक्षा, बालक आदि की रक्षा, चोर आदि के भयनाश तथा स्त्री वशीकरण आदि कार्यों के लिये गाय का गोबर उपयोग में लाना चाहिए। धरती पर गिरा हुआ गोबर नहीं लेना चाहिए, अपितु (गोबर करते समय) आकाश से ही किसी पात्र में रोक लिये गये गोबर से कार्य करना चाहिए। मृत्तिका चार प्रकार की होनी चाहिए-उजली, पीली, लाल तथा काली। जिनमें गोपीचन्दन, हरिताल और गेरु प्रशस्त मानी गई है ।। ५८-६३।। मसी लाक्षा के रस में बनी होनी चाहिए। अन्य चीजें तो स्पष्ट ही हैं। विद्वान् व्यक्ति गोपी- चन्दन से चौकोर मण्डल का निर्माण कर उसके मध्य में भैंस के गोबर से हनुमान् की मूर्ति बनाये । अनन्तर साधक सावधान होकर बीज और क्रोध (ह्रं) से उनकी पूँछ अंकित करे। फिर मूर्ति को तेल से नहा कर गुड़ से तिलक लगाये। शाल (साखू) के रस से बना धूप, जो कमल के समान सुगंधित हो, हनुमान् को समर्पित करे । उत्तम साधक पाँच बत्तियों से युक्त तेल दीप तथा दही-भात का नैवेद्य समर्पण करे। उस समय वह तीन वार शेष (आ) सहित विष (म्) का उच्चारण करे'। ऐसा करने से खोई भैंस, गाय, दासी एवम् दास की पुनः प्राप्ति हो जाती है । ॥६४-६८॥ चार आदि तथा सर्प आदि दुष्ट जीवों के भय को दूर करने के लिए हरिताल से चार द्वार वाला मनोहर घर बनाये । पूर्व द्वार पर हाथी, दक्षिण द्वार पर भैंस, पश्चिम द्वार पर सांप और उत्तर द्वार पर बाघ की प्रतिमाओं का स्थापित कर उसो क्रम से तलवार, छुरी, दंड तथा मुद्गर का चित्र खींचे। फिर मध्य में भैंस के गोबर से मूर्ति बनाये । जिसके हाथ में डमरू हो और आंखें आश्चर्य-चकित-सी मालूम पड़ती हों। उस मूर्ति की १. 'मा मा मा' इस प्रकार उच्चारण करना चाहिए।
६६१ पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः पयसा स्नपनं रक्तचंदनेनानुलेपनम् । जातीपुष्पैस्तु संपूज्य शुद्धधूपं प्रकल्पयेत् ॥७३॥ घृतेन दीपं दत्त्वाथ पायसान्नं निवेदयेत् । गगनं दीपिकेंद्वार्य्यं शास्त्रं च पुरतो जपेत् ॥७४॥ एवं सप्तदिनं कृत्वा मुच्यते महतो भयात् । अनयोर्भौमवारे तु कुर्य्यादारंभमादरात् ॥७५॥ शत्रुसेनाभये प्राप्ते गैरिकेण तु मंडलम् । कृत्वा तदंतरे तालमीषन्नम्रं समालिखेत् ॥७६॥ तवावलंबमानां च प्रतिमां गोमयेन तु । वामहस्तेन तालाग्रं दक्षिणे ज्ञानमुद्रिका ॥७७॥ तालमूलात्स्रवत्काष्ठार्थी मार्गे हस्तमिते गृहम् । चतुरस्रं विधायथ तन्मध्ये मूर्त्तिमालिखेत् ॥७८॥ दक्षिणाभिमुखीं रम्यां हृदये विहितांजलिम् । तोयेन स्नानगंधादि यथासंभवमर्पयेत् ॥७९॥ कृशरान्नं च नैवेद्यं साज्यं तस्यै निवेदयेत् । किलिद्वयं जपं प्रोक्तमेवं कुर्याद्दिने दिने ॥८०॥ एवं कृते भवेच्छीघ्रं पथिकानां समागमः । श्यामपाषाणखण्डेन लिखित्वा भूपतेर्गृहम् ॥८१॥ प्राकारं तु चतुर्द्वारयुक्तं द्वारेषु तत्र वै । अन्योन्यपुच्छपरिधित्रययुक्तां हनूमतः ॥८२॥ कुर्यान्मूर्त्तिं गोमयेन धत्तूरकुसुमैर्यजेत् । जठामांसीभवं धूपं तैल क्तवृतदीपकम् ॥८३॥ नैवेद्यं तिलतैलाक्तसक्षारा माषरोटिका । ध्येयो दक्षिणहस्तेन रोटिकां भक्षयन्हरिः ॥८४॥ वामहस्तेन पाषाणैस्त्रासयन्परसैनिकान् । मारयन्भ्रुकुटीं बद्ध्वा भीषणन्मथयन्स्थितः ॥८५॥ जपेच्च भुकुभुकिति वै सहस्रं ध्यानतत्परः । एवं कृतविधानेन परसैन्यं विनाशयेत् ॥८६॥ रक्षा भवति दुर्गाणां सत्यं सत्यं न संशयः । प्रयोगा बहवस्तत्र संक्षेपादूगदिता मया ॥८७॥ दूध से नहा कर रक्तचन्दन का लेप लगाये ॥६९-७२॥ फिर जूही के फूलों से उसकी अर्चना कर शुद्ध धूप, घृतदीप तथा पायस नैवेद्य समर्पण करते हुए गगन (ह), दीपिका (ऊ) और इन्दु (अनुस्वार) अर्थात् 'हूँ' शस्त्र (फट्) यह आराध्य देवता के आगे जपे । सात दिनों तक ऐसा करने से महाभय का नाश होता है । इन दोनों कार्यों को सिद्धि के लिये मंगल दिन आदरपूर्वक पूजा आरंभ करनी चाहिए। शत्रुसेना का भय उपस्थित होने पर गेरू से मंडल बनाकर उसके भीतर थोड़ा-सा झुका हुआ एक तालवृक्ष का चित्र लिखे। फिर उस वृक्ष से लटकती हुई एक गोबर की प्रतिमा बनाये । जिसके बाँये हाथ में ताल का अग्रभाग और दाहिने हाथ में ज्ञानमुद्रा हो । तालमूल से एक हाथ अपनी दिशा में एक चौकोर घर का निर्माण कर उसके मध्य में एक सुन्दर प्रतिमा बनाये ॥७३-७८॥ जिसका मुख दक्षिण दिशा की ओर हो और हाथों की अंजलि हृदय पर बंधी हो । उस मूर्ति को जल से स्नान करा कर यथाशक्ति गंध आदि उपचार समर्पण करे एवम् घी-खीर नैवेद्य चढ़ाये । उसके आगे 'किलि-किलि' का जप बताया गया है। ऐसा प्रति दिन करना चाहिये। ऐसा करने से पथिक शीघ्र आ जाता है। काले पत्थर के टुकड़े से राजगृह का निर्माण कर चार द्वार वालो चहारदीवारी बनाये ॥७९-८१॥ तीन द्वारों पर मंडलाकार में हनुमान् की पूँछ की रेखा खींचे और चौथे द्वार पर गोबर से हनुमान् की मूर्ति बनाये । उस मूर्ति की धतूरे के फूलों से पूजा कर जटामांसी के रस से बना धूप, तेल मिलाये घी का दीपक और उड़द की नमकीन पूरी, जो तिल से बनी हुई हो, नैवेद्य समर्पण करे । तदनन्तर हनुमान् के इस स्वरूप का ध्यान करे कि वे दाहिने हाथ से रोटी खा रहे हैं, बाँयें हाथ में पत्थर के टुकड़े लेकर शत्रुसैनिकों को मार रहे हैं और भ्रुकुटी टेढी करके उन्हें डराते हुए मानो कुचल रहे हैं ॥८२-८५॥ पश्चात् ध्याननिष्ठ होकर "भुकू भुकू" इसका एक सहस्र जप करे । ऐसा करने से शत्रुसेना का नाश और दुर्गों की रक्षा होती है। यह बिल्कुल सत्य है । इसमें संदेह करने की
१६२ नारदीयपुराणम् प्रत्यहं यो विधानेन दीपदानं हनूमतः । तस्यासाध्यं न वै किंचिद्विद्यते भुवनत्रये ॥८८॥ न देयं दुष्टहृदये दुष्टचित्तनबुद्धये । अविनीताय शिष्याय पिशुनाय कदाचन ॥८९॥ कृतघ्नाय न दातव्यं दातव्यं च परीक्षिते । बहुना किमिहोक्तेन सर्वं दद्यात्कपीश्वरः ॥९०॥ अथ मन्त्रान्तरं वक्ष्ये तत्त्वज्ञानप्रदायकम् । तारो नमो हनुमते जाठरत्रयमीरयेत् ॥९१॥ दनक्षोभं समाभाष्य संहरद्वयमीरयेत् । आत्मतत्त्वं ततः पश्चात्प्रकाशयुगं ततः ॥९२॥ वर्मास्त्रवह्निजायांतः सार्द्धषड्विंशदर्णवान् । वसिष्ठोऽस्य मुनिश्चन्दोऽनुष्टुप् च देवताः पुनः ॥९३॥ हनुमान्मुनिसप्ततु वेदाष्टनिगमैः क्रमात् । मंत्रांगैश्च षडंगानि कृत्वा ध्यायेत्कपीश्वरम् ॥९४॥ जानुस्थवामबाहुं च ज्ञानमुद्रापरं हृदि । अध्यात्मचित्तमासीनं कदलीवनमध्यगम् ॥९५॥ बालार्ककोटिप्रतिमं ध्यायेज्ज्ञानप्रदं हरिम् । ध्यात्वैवं प्रजपेल्लक्षं दशांशं जुहुयात्तिलैः ॥९६॥ साज्यैः संपूजयेत्पीठे पूर्वोक्ते पूर्ववत्प्रभुम् । जप्तोऽयं मदनक्षोभं नाशयत्येव निश्चितम् ॥९७॥ तत्त्वज्ञानमवाप्नोति कपींद्रस्य प्रसादतः । अथ मंत्रांतरं वक्ष्ये भूतविद्रावणं परम् ॥९८॥ तारः कार्शीकुक्षिपखराहश्चांजनापदम् । पवनो वनपुत्रांते आवेशिद्वयमीरयेत् ॥९९॥ तारः श्रीहनुमत्पश्चाद्वस्वरचभुजाक्षरः । ब्रह्मा मुनिः स्याद्गायत्री छंदोऽत्र देवता पुनः ॥१००॥ हनुमान्कमला बीजं फट् शक्तिः परिकीर्तितः । षड्दीर्घाढ्येन बीजेन षडङ्गानि समाचरेत् ॥१०१॥ आंजनेयं पाटलास्यं स्वर्णाद्रिसमविग्रहम् । पारिजातद्रुमूलस्थं चिंतयेत्साधकोत्तमः ॥१०२॥ आवश्यकता नहीं है । मैंने संक्षेप से अनेक प्रयोगों को बता दिया । जो व्यक्ति प्रतिदिन हनुमान् को दीप चढ़ाता है, उसके लिये तीनों लोक में कुछ भी असाध्य नहीं है । यह रहस्य दुष्ट हृदय, दुर्बुद्धि, अविनीत, पिशुन और कृतघ्न व्यक्ति को नहीं बतलाना चाहिए । किसी भी व्यक्ति की अच्छी तरह परीक्षा करके तब बताना चाहिये । बहुत क्या कहें, यह दीपदान करने से हनुमान् जी सब कुछ दे देते हैं ।।८६-९०।। अब मैं तत्त्वज्ञान प्रदान करने वाले दूसरे मन्त्र का वर्णन करूंगा । 'तार (ओं) नमो हनुमते' इतना कहकर तीन बार जाठर (म) का उच्चारण करे । फिर 'दनक्षोभम्' कहकर दो बार 'संहर' यह क्रियापद बोले । उसके बाद 'आत्मतत्त्वम्' बोलकर दो बार 'प्रकाशय' का उच्चारण करे । उसके बाद वर्म (हूँ), अस्त्र (फट्) और वह्निजाया (स्वाहा) का उच्चारण करे । (पूरा मंत्र--ओं नमो हनुमते मम मदनक्षोभं संहर संहर आत्म- तत्त्वं प्रकाशय प्रकाशय हुं फट् स्वाहा, यह साढ़े छत्तीस अक्षरों का मन्त्र है । इसके मुनि वशिष्ठ, छंद अनुष्टुप् और देवता हनुमान् हैं । सात, सात, छह, चार, आठ तथा चार मंत्राक्षरों द्वारा षडंगन्यास करके कपीश्वर का इस प्रकार ध्यान करे--पवननंदन आजानबाहु हैं । उनके हाथ में ज्ञानमुद्रा सुशोभित है । वह बैठकर सदा अध्यात्मचिन्तन में लगे रहते हैं । केले के वन में विचरण करते हैं। करोड़ों बालसूर्यों के समान उनकी कान्ति है । वे ज्ञानदायक हैं ।' इस प्रकार ध्यान कर एक लाख मंत्र को जपे और उसका दशांश घृतयुक्त तेल से हवन करे । पूर्वोक्त पीठ पर पहिले ही की तरह महावीर का पूजन करना चाहिये । उक्त मंत्र का जप करने से कामोद्वेग नहीं होता, प्रत्युत हनुमान् की कृपा से तत्त्वज्ञान की प्राप्ति होती है ।।६१-६७॥ इसके उपरान्त भूतों को छुड़ाने वाला एक अन्य मंत्र बतलाता हूँ, 'ओं श्री महाह्वजनाय पवनपुत्रावेशया- वेशय ओं श्री हनुमते फट् ।' यह पचीस अक्षर का मन्त्र है । इस मन्त्र के मुनि ब्रह्मा, छंद गायत्री, देवता हनुमान्, बीज, लक्ष्मी और शक्ति 'फट्' है । छह दीर्घ मात्राओं से युक्त बीज मन्त्र से षडंगन्यास कर किंचित् रक्तमुख बाले सुवर्ण पर्वत के समान शरीरवाले और पारिजात वृक्ष के मूल में अवस्थित होनेवाले हनुमान् का ध्यान करे।
पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः ६६३ एवं ध्यात्वा जपेल्लक्षं दशांशं जुहुयात्तिलैः । त्रिमध्वक्तैर्यजेत्पीठे पूर्वोक्ते पूर्ववत्सुधीः ॥१०३॥ अनेन मनुना मंत्री ग्रहग्रस्तं प्रमार्जयेत् । आक्रंदस्तं विमुच्याथ ग्रहः शीघ्रं पलायते ॥१०४॥ मनवोऽमी सदा गोप्या न प्रकाश्या यतस्ततः । परीक्षिताय शिष्याय देया वा निजसूनवे ॥१०५॥ हनुमद्भजनासक्तः कार्तवीर्यार्जुनं सुधीः । विशेषतः समाराध्य यथोक्तं फलमाप्नुयात् ॥१०६॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे दीपविधि निरूपणं नाम पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः ॥७५॥
अथषट्सप्ततितमोऽध्यायः नारद उवाच कार्तवीर्यप्रभृतयो नृपा बहुविधा भुवि । जायतेऽथ प्रलीयन्ते स्वस्वकर्मानुसारतः ॥१॥ तत्कथं राजवर्योऽसौ लोके सेव्यत्वमागतः । समुल्लंघ्य नृपानन्यानेतंन्मे नुद संशयम् ॥२॥
पश्चात् इस मन्त्र का एक लाख जप कर उसका दशांश त्रिमधुयुक्त तिल से हवन करे । फिर पूर्वोक्त पीठ पर पहिले की तरह पूजन कर विद्वान् साधक इस मन्त्र से ग्रहगृहीत व्यक्ति को झाड़ दे। ऐसा करने से ग्रह रोते हुए उस व्यक्ति को छोड़ कर शीघ्र भाग जाता है। ॥६८-१०४॥ ये मन्त्र सदा गोपनीय हैं। यत्र-तत्र इनको प्रकाशित नहीं करना चाहिये । परीक्षित शिष्य या अपने पुत्र को ये बताने चाहिये। हनुमान् के भजन में आसक्त विद्वान् कार्तवीर्यार्जुन की विशेष आराधना करके यथा वर्णित फल को प्राप्त करे ।। १०५-१०६।। श्रीनारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त तृतीयपाद में दीपविधिनिरूपण नामक पचहत्तरवाँ अध्याय समाप्त ।।७५।।
अध्याय ७६ कार्तवीर्य की महिमा नारद बोले-पृथ्वी पर कार्तवीर्य प्रभृति राजा अपने-अपने कर्म के अनुसार उत्पत्ति एवम् लय को प्राप्त करते हैं। तब अन्य राजाओं का अतिक्रमण करके केवल नृपवर कार्तवीर्य ही कैसे लोगों के सेव्य कहलाये ? — यह मेरा संशय है। इसका निराकरण कीजिये ॥१-२॥