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भारतकोश
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बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

७५६ नारदीयपुराणम् औदार्यभावसाध्या च स्थूलसूक्ष्मातिरूपिणी । शिरीषपुष्पमृदुला गांगेयमुकुरप्रभा ॥१९४॥ नीलोत्पलजिताक्षी च सद्रत्नकवरान्विता । प्रेमपर्यंकनिलया तेजोमण्डलमध्यगा ॥१९५॥ कृष्णांगगोपनाऽभेदा लीलावरननायिका । सुधासिंधुसमुल्लासामृतास्यंदविधायिनी ॥१९६॥ कृष्णचित्ता रासचित्ता प्रेमचित्ता हरिप्रिया । अचिंत्यगुणग्रामा कृष्णलीला मलापहा ॥१९७॥ राससिंधुशशांका च रासमंडलमंडिनी । नतव्रता सिंहरीच्छा सुमतिः सुरवंदिता ॥१९८॥ गोपीचूडामणिर्गोपी गणेड्या विरजाधिका । गोपश्रेष्ठा गोपकन्या गोपनारी सुगोपिका ॥१९९॥ गोपधामा सुदामांबा गोपाली गोपमोहिनी । गोपभूषा कृष्णभूषा श्रीवृन्दावनचंद्रिका ॥२००॥ वीणादिघोषनिरता रासोत्सवविकासिनी । कृष्णचेष्टा परिज्ञाता कोटिकंदर्पमोहिनी ॥२०१॥ श्रीकृष्णगुणगानाढ्या देवसुन्दरिमोहिनी । कृष्णचंद्रमनोज्ञा च कृष्णदेवसहोदरी ॥२०२॥ कृष्णामिलाषिणी कृष्णप्रेमानुग्रहवांछिता । क्षेमा च मधुरालापा भुवोमाया सुभद्रिका ॥२०३॥ प्रकृतिः परमानंदा नीपद्रुमतलस्थिता । कृपाकटाक्षा बिम्बोष्ठी रंभा चारुनितंबिनी ॥२०४॥ स्मरकेलिनिधाना च गंडताटंकमंडिता । हेमाद्रिकांतिरुचिरा प्रेमाद्या मदमंथरा ॥२०५॥ कृष्णंचिता प्रेमंचिता रतिंचिता च कृष्णदा । रासंचिता भावंचिता शुद्धंचिता महारसा ॥२०६॥ अखिललोकनिवासिनी, अमृतरूपा, अद्भुतरूपा, श्रीमन्नारायण के समान स्तुत्य होने वाली, अक्षरस्वरूपा, कूटस्था (एकरस परमात्मरूपा), महापुरुष से उत्पन्न होने वाली, उदारभाव से उपासना करने योग्य, अत्यन्त स्थूल एवम् सूक्ष्म रूप वाली, शिरीष पुष्प के समान मृदुल, सुवर्ण तथा शीशे के समान प्रभावानी, नीलकमल को पराजित करने वाले नेत्रों से युक्त, उत्तम रत्नों से सुशोभित चोटी वाली, प्रेम पर्यंक पर शयन करने वाली, तेजोमंडल के बीच गमन करने वाली ॥१९४-१९५॥ कृष्ण की अंगरक्षिका, कृष्ण से अभिन्न, खेल में नायिका का भाग लेने वाली, सुधासिंधु को तरंगित करने वाली, अमृतवर्षा करने वाली, कृष्ण में चित्त को लगाने वाली, रास में दत्तचित्त, प्रेमाद्रं चित्त वाली, हरि की प्रिया, अचिन्त्य गुणों वाली, कृष्ण के साथ विलास करने वाली, मल दूर करने वाली, राससिंधु के लिए चन्द्रमा- स्वरूपा, रासमंडली को मंडित करने वाली, व्रतशीला, सिंह तथा रीछ का वाहन करने वाली, सुन्दर रूप वाली, देवों से वंदिता, गोपियों की चूडामणि, गोपीवृन्द से स्तुत्य, विरजा नाम वाली, उत्तम सखी, गोपों की अतिशय प्रिय, गोपकन्या, गोपनारी, सुगोपिका, गोपधामा, सुदामा की माता, गोपाली, गोपमोहिनी, गोपभूषा, कृष्णभूषा, श्रीवृन्दावन की चंद्रिका, वीणा बजाने में निरत, रासोत्सव करने वाली, कृष्ण की तरह चेष्टा करने वाली, अत्यन्त परिचित, कोटिकंदर्पमोहिनी, श्रीकृष्ण के गुणों का वर्णन करने वाली, देव-सुन्दरियों को मोहित करने वाली, कृष्ण चन्द्र की तरह मनोरम, कृष्णदेव की सहोदरी (अर्थात् योगमायारूप में यशोदा के गर्भ से उत्पन्न होने वाली), कृष्ण की अभिलाषा करने वाली, कृष्ण के प्रेम एवम् अनुग्रह की इच्छुक, कल्याण करने वाली, मधुर भाषण करने वाली, पृथ्वी पर माया कहलाने वाली, सुभद्रिका, प्रकृति, परमानन्दरूपिणी, कदम्ब वृक्ष के नीचे रहने वाली, कृपाकटाक्ष करने वाली, बिम्बोष्ठी, कदलीस्तम्भ की तरह जंघा वाली, शोभन नितम्ब वाली, कामक्रीडा-निधान, कपोल की शोभा बढाने वाले कर्णाभूषणों से युक्त, सुमेरु पर्वत की तरह मनोहर कांति वाली, आद्यप्रेमस्वरूपा, मद से अलसानेवाली ॥१९६-२०५॥ कृष्ण का चिन्तन करने वाली, प्रेमचिन्तन करने वाली, अतिचिन्तन करने वाली कृष्णभक्ति प्रदान करने वाली, शुद्ध चिन्तन

द्व्यशीतितमोऽध्यायः ७५७ कृष्णादृष्टित्रुटियुगा दृष्टिपक्ष्मविनिंदिनी । कंदर्पजननी मुख्या वैकुण्ठगतिदायिनी ॥२०७॥ रासभावा प्रियाश्लिष्टा प्रेष्ठा प्रथमनायिका । शुद्धा सुधादेहिनी च श्रीरामा रसमञ्जरी ॥२०८॥ सुप्रभावा शुभाचारा स्वर्णदी नर्मदांबिका । गोमती चंद्रभागेड्या सरयूस्ताम्रपर्णिसूः ॥२०६॥ निष्कलंकाचरित्रा च निर्गुणा च निरंजना । एतन्नामसहस्रं तु युगल रूपस्य नारद ॥२१०॥ पठनीयं प्रयत्नेन वृन्दावनरसावहे । महापापप्रशमनं वंध्यात्वविनिवर्तकम् ॥२११॥ दारिद्र्यशमनं रोगनाशनं कामदं महत् । पापापहं वैरिहरं राधामाधवभक्तिदम् ॥२१२॥ नमस्तस्मै भगवते कृष्णायाकुण्ठमेधसे । राधासंगसुधा सिंधौ नमोनित्यविहारिणे ॥२१३॥ राधादेवी जगत्कर्त्री जगत्पालनतत्परा । जगल्लयविधात्री च सर्वेशी सर्वसूतिका ॥२१४॥ तस्या नामसहस्रं वै मया प्रोक्तं मुनीश्वर । भुक्तिमुक्तिप्रदं दिव्यं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥२१५॥ इति श्री बृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे राधाकृष्णसहस्रनामकथनं नाम द्व्यशीतितमोऽध्यायः ॥८२॥ करने वालो, महारास वाली, सुन्दर नेत्र वाली, दृष्टि दोष को मिटाने वाली, कंदर्पजननी, मुख्या, वैकुण्ठ-गति- दायिका, रासभावा, प्रियतम का आलिंगन करने वाली, अत्यन्त प्रियपात्र, प्रथम नायिका, शुद्धा, सुधादेह वाली, श्रीरामा, रसमंजरी, महाप्रभावशालिनी, पवित्र आचरण वाली, गंगा तथा नर्मदा की जननी, गोमती और चन्द्रभागा के द्वारा स्तुत्य, सरयू तथा ताम्रपर्णी नदी को प्रकट करने वाली; निष्कलंकचरित्रा, गुणातीत और निर्मलस्वरूपा ॥२०६-२०९॥ नारद ! युगल रूप (राधा-कृष्ण के) ये सहस्र नाम हैं। वृन्दावन में यत्नपूर्वक इन नामों का पाठ करना चाहिये । ये सहस्र नाम महापापनाशन, वंध्यात्वमोचन, दारिद्र्यभंजक, रोगनाशक, कामदायक, पापहारी, शत्रुताध्वंसक और राधा-कृष्ण की भक्ति देने वाले हैं। अकुंठित मेधा वाले भगवान् कृष्ण को नमस्कार है। राधा-संग रूपी सुधासिंधु में नित्य विहार करने वाले माधव को नमस्कार है । मुनीश्वर ! राधादेवी जगत्कर्त्री, विश्व के पालन में निरत रहने वाली, संसार का ध्वंस करने वाली, सब की ईश्वरी और सब की माता हैं। उनके सहस्र नामों को मैंने बता दिया, जो दिव्य एवम् भुक्तिमुक्तिदायक हैं। इसके बाद क्या सुनना चाहते हो ? २१०-२१५॥ श्री नारदीय पुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त तृतीयपाद में राधाकृष्णसहस्रनामकथन नामक बयासीवां अध्याय समाप्त ॥८२॥

अथ त्र्यशीतितमोऽध्यायः श्रीशौनक उवाच साधु सूत महाभाग जगदुद्धारकारकम् । महातंत्रविधानं नः कुमारोक्तं त्वयोदितम् ॥१॥ अलभ्यमेतत्तंन्त्रेषु पुराणेष्वपि मानद । यदिहोदितमस्मभ्यं त्वयातिकरुणात्मना ॥२॥ नारदो भगवान्सूत लोकोद्धरणतत्परः । भूयः पप्रच्छ किं साधो कुमारं विदुषां वरम् ॥३॥ सूत उवाच श्रुत्वा स नारदो विप्राः युग्मनामसहस्रकम् । सनत्कुमारमप्याह प्रणम्य ज्ञानिनां वरम् ॥४॥ नारद उवाच ब्रह्मंस्त्वया समाख्याता विधयस्तंत्रचोदिताः । तत्रापि कृष्णमंत्राणां वैभवं ह्युदितं महत् ॥५॥ या तत्र राधिका देवी सर्वाद्या समुदाहृता । तस्या अंशावताराणां चरितं मंत्रपूर्वकम् ॥६॥ तंत्रोक्तं वद सर्वज्ञ त्वामहं शरणं गतः । शक्तेस्तंत्राण्यनेकानि शिवोक्तानि मुनीश्वर ॥७॥ यानि तत्सारमुद्धृत्य साकल्येनाभिधेहि नः । तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य नारदस्य महात्मनः ॥८॥ सनत्कुमारः प्रोवाच स्मृत्वाराधापदांबुजम् सनत्कुमार उवाच ॥८॥ श्रृणु नारद वक्ष्यामि राधांशानां समुद्भवम्

अध्याय ८३ राधा के अंश से उत्पन्न पाँच प्रकृतियों का लक्षण श्री शौनक बोले—महाभाग सूत ! साधुवाद ! आपने सनत्कुमार द्वारा कथित एवम् जगदुद्धारकारक महातंत्र का विधान हमने बता दिया ! मानदायक ! वह विधान तंत्रों में तथा पुराणों में भी अलभ्य है, जिसे आपने अत्यन्त कृपा करके हमें बतलाया है । सूत ! साधो ! लोगों के उद्धार करने में तत्पर भगवान् नारद ने विद्वद्वर कुमार से पुनः क्या प्रश्न किया ? ॥१-३॥ सूत बोले—विप्रवृन्द ! युगल सहस्र नाम को सुन कर नारद ने महाज्ञानी सनत्कुमार से प्रणामपूर्वक कहा ॥४॥ नारद बोले—ब्रह्मन् ! आपने मंत्र की विधियां बतलाईं, कृष्ण मंत्रों का महान् वैभव भी बतला दिया । अब जो राधिका देवी सब की आदि कही जाती हैं, उनके अंशावतारों का चरित्र मंत्रपूर्वक बता दीजिये, जो तंत्र के अनुकूल हो । सर्वज्ञ ! मैं आपका शरणापन्न हूँ । मुनीश्वर ! शिव ने शक्ति के अनेक तंत्र कहे हैं उन्हीं का सार निकाल कर आप विस्तार से वर्णन कीजिये । महात्मा नारद का यह वचन सुनकर सनत्कुमार राधा के चरणारविन्द का स्मरण करके कहने लगे ॥५-८½॥ सनत्कुमार बोले—नारद सुनो, मैं मंत्रों का साधन बताते हुए राधा के अंशों से उत्पन्न शक्तियों का

त्र्यशीतितमोऽध्यायः ७५६ शक्तीनां परमाश्चर्यं मंत्रसाधनपूर्वकम् । या तु राधा मया प्रोक्ता कृष्णाद्धांगसमुद्भवा ॥१०॥ गोलोकवासिनी सा तु नित्या कृष्णसहायिनी । तेजोमंडलमध्यस्था दृश्यादृश्यस्वरूपिणी ॥११॥ कदाचित्तु तया सार्द्ध स्थितस्य मुनिसत्तम । कृष्णस्य वामभागात् जातो नारायणः स्वयम् ॥१२॥ राधिकायाश्च वामांगान्महालक्ष्मीर्बभूव ह । ततः कृष्णो महालक्ष्मीं दत्त्वा नारायणाय च ॥१३॥ वैकुंठे स्थापयामास शश्वत्पालनकर्मणि । अथ गोलोकनाथस्य लोम्नां विवरतो मुने ॥१४॥ जाताश्चासंख्यगोपालास्तेजसा वयसा समाः । प्राणतुल्यप्रियाः सर्वे बभूवुः पार्षदा विभोः ॥१५॥ राधांगलोमकूपेभ्यो बभूवुर्गोपकन्यकाः । राधातुल्याः सर्वतश्च राधादास्यः प्रियंवदाः ॥१६॥ एतस्मिन्नंतरे विप्र सहसा कृष्णदेहतः । आविर्बभूव सा दुर्गा विष्णुमाया सनातनी ॥१७॥ देवीनां बीजरूपां च मूलप्रकृतिरीश्वरी । परिपूर्णतमा तेजःस्वरूपा त्रिगुणात्मिका ॥१८॥ सहस्रभुजसंयुक्ता नानाशास्त्रा त्रिलोचना । या तु संसारवृक्षस्य बीजरूपा सनातनी ॥१९॥ रत्नसिंहासनं तस्यै प्रददौ राधिकेश्वरः । एतस्मिन्नंतरे तत्र सस्त्रीकस्तु चतुर्मुखः ॥२०॥ ज्ञानिनां प्रवरः श्रीमान् पुमानोंकारमुच्चरन् । कमंडलुधरो जातस्तपस्वी नाभितो हरेः ॥२१॥ स तु संस्तूय सर्वेशं सावित्र्या भार्यया सह । निषसादासने रम्ये विभोस्तस्याज्ञया मुने ॥२२॥ अथ कृष्णो महाभाग द्विधारूपो बभूव ह । वामार्द्धांगो महादेवो दक्षार्द्धो गोपिकापतिः ॥२३॥ पंचवक्त्रस्त्रिनेत्रोऽसौ वामार्द्धांगो मुनीश्वरः । स्तुत्वा कृष्णं समाज्ञप्तो निषसाद हरेः पुरः ॥२४॥ अथ कृष्णश्चतुर्वक्त्रं प्राह सृष्टिं कुरु प्रभो । सत्यलोके स्थितो नित्यं गच्छ मां स्मर सर्वदा ॥२५॥

आश्चर्यजनक वर्णन करता हूँ। जिन राधा को मैंने कृष्ण की अर्द्धांगिनी कहा है, वे नित्य गोलोक में वास करती हुई कृष्ण की सहायता करती हैं। वे तेजोमंडल के मध्य में दृश्य एवम् अदृश्य रूप से विराजमान रहती हैं। मुनिश्रेष्ठ ! किसी समय राधा के साथ अवस्थित कृष्ण के वामभाग से स्वयम् नारायण उत्पन्न हुए और राधिका के वाम अंग से महालक्ष्मी उत्पन्न हुई। तब कृष्ण ने नारायण को महालक्ष्मी देकर निरन्तर पालन करने के लिये उन्हें वैकुण्ठ में स्थापित कर दिया। मुने ! तदनन्तर कृष्ण के लोमकूप से असंख्य गोपाल उत्पन्न हुए, जो समान तेज वाले, समवयस्क एवम् कृष्ण के प्राणतुल्य प्रिय थे। वे सब प्रभु के सभासद हुए ॥९-१५॥ राधा के लोमकूप से गोपकन्यायें उत्पन्न हुईं, जो सब तरह से राधा के तुल्य थीं। वे राधा की आज्ञाकारिणी दासी हुईं। विप्र ! इसी बीच एकाएक कृष्ण के शरीर से विष्णु की सनातनी माया दुर्गा प्रकट हुईं, जो देवियों की बीजरूप, मूल प्रकृति, ईश्वरी, परिपूर्णतमा, तेजःस्वरूपा, त्रिगुणात्मिका, सहस्रभुजाओं से संयुक्त, नानाशास्त्र- धारिणी, त्रिलोचना, संसाररूपी वृक्ष की बीजरूपा तथा सनातनी हैं। राधिकेश्वर ने उन्हें रत्न का सिंहासन प्रदान किया । इसी समय ज्ञानियों में श्रेष्ठ, श्रीमान् पुरुष, कमंडलुधारी एवम् तपस्वी ब्रह्मा ओंकार का उच्चा- रण करते हुए पत्नी सहित हरि की नाभि से उत्पन्न हुए ॥१६-२१॥ भार्या सावित्री के साथ वे सर्वेश्वर कृष्ण की स्तुति कर विभु की आज्ञा से रमणीय आसन पर बैठ गये । महाभाग ! तदुपरांत कृष्ण के दो रूप हो गये । बायें आधे अंग से महादेव हुए और दाहिने अर्धांग से गोपिकापति प्रकट हुए । बायें अर्धांग से समुत्पन्न पांच मुख वाले तथा तीन नेत्र वाले मुनीश्वर शिव कृष्ण की स्तुति कर उनकी आज्ञा से उनके सामने ही बैठ गये । तदनन्तर कृष्ण ने चतुर्मुख से कहा—"प्रभो ! आप सत्यलोक में नित्य वास करते हुए सृष्टि कीजिये और सदा मेरा स्मरण रखिये ॥२२-२५॥

७६० नारदीयपुराणम् एवमुक्तस्तु हरिणा प्रणम्य जगदीश्वरम् । जगाम भार्यया साकं स तु सृष्टिं करोति वै ॥२६॥ पितास्माकं मुनिश्रेष्ठ मानसीं कल्पदैहिकीम् । ततः पश्चात्पंचवक्त्रं कृष्णः प्राह महामते ॥२७॥ दुर्गां गृहाण विश्वेश शिवलोके तपश्चर । यावत्सृष्टिस्तदंते तु लोकान्संहार सर्वतः ॥२८॥ सोऽपि कृष्णं नमस्कृत्य शिवलोकं जगाम ह । ततः कालांतरे ब्रह्मन्कृष्णस्य परमात्मनः ॥२९॥ वक्त्रात्सरस्वती जाता वीणापुस्तकधारिणी । तामादिदेश भगवान् वैकुण्ठं गच्छ मानदे ॥३०॥ लक्ष्मोसमीपे तिष्ठ त्वं चतुर्भुजसमाश्रया । सापि कृष्णं नमस्कृत्य गता नारायणांतिकम् ॥३१॥ एवं पञ्चविधा जाता सा राधा सृष्टिकारणम् । आसां पूर्णस्वरूपाणां मंत्रध्यानाच्चनादिकम् ॥३२॥ वदामि शृणु विपेंद्र लोकानां सिद्धिदायकम् । तारः क्रियायुक् प्रतिष्ठा प्रीतपाढ्या च ततः परम् ॥३३॥ ज्ञानामृता क्षुधायुक्ता वह्नीजायांतको मनुः । सुतपास्तु ऋषिश्चंदो गायत्री देवता मनोः ॥३४॥ राधिका प्रणवो बीजं स्वाहा शक्तिरुदाहृता । षडक्षरैः षडंगानि कुर्याद्विन्दुविभूषितैः ॥३५॥ ततो ध्यायन्स्वहृदये राधिकां कृष्णभामिनीम् । श्वेतचंपकवर्णाभां कोटिचन्द्रसमप्रभाम् ॥३६॥ शरत्पार्वणचन्द्रास्यां नीलेंदीवरलोचनाम् । सुश्रोणीं सुतितंबां च पक्वविंवाधरांवराम् ॥३७॥ मुक्ताकुन्दामदशनां वह्निशुद्धांशुकाान्विताम् । रत्नकेयूरवलयहारकुण्डलशोभिताम् ॥३८॥ गोपीभिः सुप्रियाभिश्च सेवितां श्वेतचामरैः । रासमंडलमध्यस्थां रत्नसिंहासनस्थिताम् ॥३९॥

हरि के इतना कहने पर ब्रह्मा जगदीश्वर को प्रणाम करके भार्या सहित प्रस्थित हो गये । मुनिश्रेष्ठ ! तब से मेरे पिता मानसी एवम् दैहिकी सृष्टि करने लगे । महामतिमन् ! तत्पश्चात् कृष्ण ने पंचमुख शिव से कहा--"विश्वेश ! दुर्गा को स्वीकार कर शिवलोक में तपस्या कीजिये और सृष्टि के अन्त में समस्त लोकों का संहार कीजियेगा" ॥२६-२८॥ ब्रह्मन् ! तब शंकरजी कृष्ण को प्रणाम कर शिवलोक को चले गये । बाद में परमात्मा कृष्ण के मुख से वीणा-पुस्तकधारिणी सरस्वती उत्पन्न हुईं । उन्हें भगवान् ने आदेश दिया—"मानदे ! तुम वैकुण्ठ जाओ और विष्णु आश्रित होकर लक्ष्मी के समीप निवास करो ।" वे भी कृष्ण को प्रणाम कर नारायण के पास चली गईं ॥२९-३१॥ विप्रेन्द्र ! इस प्रकार राधा से पाँच प्रकार की सृष्टि हुई । अब सकल लोकों को सिद्धि प्रदान करने वाले उनके पूर्ण स्वरूप के मन्त्र, ध्यान, पूजन आदि के विषय में तुम सुनो । क्रियायुक्त तार (ह्रीं) देवी का मन्त्र, उनकी प्रतिष्ठा प्रीतिसम्पन्न है, ज्ञानामृत तथा क्षुधा से युक्त स्वाहा देवी मंत्र का अन्तिम भाग है । मंत्र के ऋषि सुतपा हैं, छंद गायत्री है, देवता राधिका हैं, बीज प्रणव है और शक्ति स्वाहा है । बिंदुभूषित छः अक्षरों से षडंगन्यास करना चाहिये । तदनंतर अपने हृदय में कृष्णप्रिया राधिका का ध्यान करना चाहिये, जिनको वर्णच्छवि श्वेत चंपा के समान है, कान्ति कोटि चन्द्रों के तुल्य है, मुख शरत्कालीन चन्द्रमा के सदृश है, नेत्र नील कमल के समान हैं, श्रोणी और नितम्ब मनोहर हैं, अधर पक्वबिंब के सदृश हैं, दांत मोती तथा कुंदपुष्पों के समान हैं, राधिका देवी स्वयं वह्नि के समान शुद्ध वस्त्रों, से अलंकृत और रत्न, केयूर, वलय (चूड़ी), हार तथा कुंडल से सुशोभित हैं । अत्यन्त प्यारी गोपियाँ श्वेत चामर से उनकी सेवा करती हैं । वे रासमंडल के मध्य में रत्न सिंहासन पर विराजमान हैं । इस प्रकार ध्यान कर उन्हें पुष्पांजलि समर्पित करते हुए षोडशोपचार पूजा करे । तत्पश्चात्

त्र्यशीतितमोऽध्यायः ७६१ ध्यात्वा पुष्पांजलिं क्षिप्त्वा पूजयेदुपचारकैः । लक्षषट्कं जपेन्मन्त्रं तद्दशांशं हुनेत्तिलैः ॥४०॥ आज्याक्तैर्मातृकापीठे पूजा चावरणेः सह । षट्कोणेषु षडंगानि तद्बाह्येऽष्टदले यजेत् ॥४१॥ मालावतीं माधवीं च रत्नमालां सुशीलिकाम् । ततः शशिकलां पारिजातां पद्मावतीं तथा ॥४२॥ सुन्दरीं च क्रमात्प्राच्यां दिग्विदिक्षु ततो बहिः । इन्द्राद्यान्सायुधानिष्ट्वा विनियोगांस्तु साधयेत् ॥४३॥ राधा कृष्णप्रिया रासेश्वरी गोपीगणाधिपा । निर्गुणा कृष्णपूज्या च मूलप्रकृतिरीश्वरी ॥४४॥ सर्वेश्वरी सर्वपूज्या वैराजजननी तथा । पूर्वाद्याशासु रक्षतु पांतु मां सर्वतः सदा ॥४५॥ त्वं देवि जगतां माता विष्णुमाया सनातनी । कृष्णमायादिदेवी च कृष्णप्राणाधिके शुभे ॥४६॥ कृष्णभक्तिप्रदे राधे नमस्ते मंगलप्रदे । इति सम्प्रार्थ्य सर्वेशों स्तुत्वा हृदि विसर्जयेत् ॥४७॥ एवं यो भजते राधां सर्वाद्यां सर्वमंगलाम् । भुक्त्वेह भोगानखिलांन्सोऽन्ते गोलोकमाप्नुयात् ॥४८॥ अथ तुभ्यं महालक्ष्म्‍या विधानं वच्मि नारद । यदाराधनतो भूयात्साधको भुक्तिमुक्तिमान् ॥४९॥ लक्ष्मीमायाकामवाणीपूर्वा कमलवासिनी । ङेता वह्निप्रियांतोऽयं मंत्रकल्पद्रुमः परः ॥५०॥ ऋषिर्नारायणश्चास्य छन्दो हि जगती तथा । देवता तु महालक्ष्मीर्द्विद्विवर्णैः षडंगकम् ॥५१॥ श्वेतचंपकवर्णाभां रत्नभूषणभूषिताम् । ईषद्धास्यप्रसन्नास्यां भक्तानुकम्पकातरामू ॥५२॥ बिभ्रतीं रत्नमालां च कोटिचन्द्रसमप्रभाम् । ध्यात्वा जपेदर्कलक्षं पायसेन दशांशतः ॥५३॥ जुहुयादेधिते वह्नौ श्रीद्रुकाष्ठैः समर्चयेत् । नवशक्तियुते पीठे ह्यंगैरावरणैः सह ॥५४॥ विभूतिरुन्नतिः कांतिः सृष्टिः कीर्तिश्च सन्नतिः । व्युष्टिरुत्कृष्टिश्च ऋद्धिश्च संप्रोक्ता नव शक्तयः ॥५५॥ छः लाख मंत्र का जप करके घृतयुक्त तिलसे उसका दशांश हवन करे ॥३२-४०॥ मातृकापीठ पर पूजन करना चाहिये । वहां वस्त्र का आवरण (चंदवा) लगाना चाहिये । छः कानों में अष्टदल कमल का निर्माण कर छः अंगों का पूजन करे । पूर्व दिशा में क्रमशः मालावती, माधवी, रत्नमाला, सुशीलिंका, शशिकला, पारिजाता, पद्मावती तथा सुन्दरी की पूजा करे । तदपश्चात् दिशा-विदिशाओं में आयुध सहित इन्द्र आदि देवों की अर्चना कर विनियोग का साधन करे । फिर प्रार्थना करे- "राधा, कृष्णप्रिया, रासेश्वरी, गोपियों की स्वामिनी, निर्गुणा, कृष्णपूज्या, मूलप्रकृति, ईश्वरी, सर्वेश्वरी, सर्वपूज्या तथा वैराजजननी पूर्व आदि दिशाओं में सब ओर से सदा मेरी रक्षा करें। देवि ! तुम जगन्माता विष्णु की माया, सनातनी, कृष्ण की माया तथा आदि- देवी हो । कृष्ण की प्राणाधिक प्रिये ! कल्याणि ! कृष्णभक्तिदायिके ! मंगलप्रदे ! राधे ! तुम्हें नमस्कार है ।" इस प्रकार सर्वेश्वरी की स्तुति एवम् प्रार्थना करके हृदय में उसका विसर्जन करे ॥४१-४७॥ जो व्यक्ति इस तरह सब की आदि तथा अखिलकल्याणदायिनी राधा की आराधना करता है, वह इस लोक में सकल भोगों को भोग कर अन्त में गोलोक को प्राप्त करता है । नारद ! अब मैं तुमसे महालक्ष्मी- पूजन का विधान बतला रहा हूँ, जिनकी आराधना करने से साधक भोग-मोक्ष को प्राप्त करता है। "लक्ष्मी- माया.........'स्वाहा" यह मन्त्र कल्पद्रुम से भी परे है । इसके ऋषि नारायण, छन्द जगती और देवता महालक्ष्मी हैं। दो-दो अक्षरों से षडंगन्यास कर श्वेतचम्पा के समान कान्तिवाली, रत्न के आभूषणों से भूषित, किञ्चित् हास्य से प्रसन्न मुखवाली, भक्तों के ऊपर अनुग्रह करने वाली, रत्नमाला को धारण करने वाली और कोटि चन्द्रों के समान प्रभा वाली महालक्ष्मी का ध्यान करे । फिर बारह लाख मन्त्र का जप करके उसका दशांश प्रज्वलित वह्नि में बेल की लकड़ी से हवन करे । हवन तो नौ शक्तियों से युक्त पीठ पर अंग तथा आवरण के साथ होना चाहिये ॥४८-५४॥ विभूति, उन्नति, कांति, सृष्टि, कीर्ति, सन्नति, व्युष्टि, उत्कृष्टि ९६-ना० पृ०

७६२ नारदीयपुराणम् अत्रावाह्य च मूलेन मूर्ति संकल्प्य साधकः । षट्कोणेषु षडंगानि दक्षिणे तु गजाननम् ॥५६॥ वामे कुसुमधन्वानं वसूपत्रे ततो यजेत् । उमां श्रीं भारतीं दुर्गां धरणीं वेदमातरम् ॥५७॥ देवीमुषां च पूर्वाद्रौ दिग्विंदिक्षु क्रमेण हि । जह्ननुसूर्यसुते पूज्ये पादप्रक्षालनोद्यते ॥५८॥ शंखपद्मनिधी पूज्यौ पार्श्वयोर्धृतचामरौ । धृतातपत्रं वरुणं पूजयेत्पश्चिमे ततः ॥५९॥ संपूज्य राशीन्परितो यथास्थानं नवग्रहान् । चतुर्दन्तैरावतादीन् दिग्विंदिक्षु ततोऽर्चयेत् ॥६०॥ तद्वबहिर्लोकपालांश्च तदस्त्राणि च तद्बहिः । दूर्वाभिराराज्यसिक्ताभिर्जुहुयादायुषे नरः ॥६१॥ गुडूचीमाज्यसंसिक्तां जुहुयात्सप्तवासरम् । अष्टोत्तरसहस्रं यः स जीवेच्छरदां शतम् ॥६२॥ हुत्वा तिलान्घृताभ्यक्तान्दोर्घमायुष्यमाप्नुयात् । आरभ्यार्कदिनं मंत्री दशाहं घृतसंप्लुतः ॥६३॥ जुहुयादर्कसमिधः शरीरारोग्यसिद्धये । शालिभिर्जुहुतो नित्यमष्टोत्तरसहस्रकम् ॥६४॥ अचिरादेव महती लक्ष्मी संजायते ध्रुवम् । उषाजाजीनालिकेररजोभिघृतमिश्रितैः ॥६५॥ हुनेदष्टोत्तरशतं पायसाशी तु नित्यशः । मण्डलाज्जायते सोऽपि कुबेर इव मानवः ॥६६॥ हविषा गुडमिश्रेण होमतो ह्यन्नवान्भवेत् । जपापुष्पाणि जुहुयादष्टोत्तरसहस्रकम् ॥६७॥ तांबूलरसमिश्रं तद्भस्मतिलकं चरेत् । चतुर्णामपि वर्णानां मोहनाय द्विजोत्तमः ॥६८॥ एवं यो भजते लक्ष्मीं साधकेन्द्रो मुनीश्वर । सम्पदस्तस्य जायंते महालक्ष्मीः प्रसीदति ॥६९॥ देहांते वैष्णवं धाम लभते नात्र संशयः । या तु दुर्गा द्विजश्रेष्ठ शिवलोकं गता सती ॥७०॥ तथा ऋद्धि—ये नौ शक्तियां हैं। साधक को चाहिये कि वह उस पीठ पर मूलमन्त्र से मूर्ति का आवाहन कर संकल्प करे। पश्चात् छह कोणों में छह अंगों का, दक्षिण दिशा में गणेश का और उत्तर दिशा में कन्दर्प का पूजन करे। पूजन अगस्त वृक्ष के पत्र पर होना चाहिये । तदनन्तर पूर्व आदि में उमा, श्रीं, भारती, दुर्गा, धरणी, वेदमाता, देवी तथा उषा की पूजा करनी चाहिये । (महालक्ष्मी के) चरण पखारने के लिये उद्यत गंगा यमुना का पूजन करना चाहिये। दोनों बगल में चामर धारण करने वालो शंखनिधि तथा पद्मनिधि की अर्चना करे। पश्चिम में छत्र धारण किये हुए वरुण का पूजन करे । फिर यथास्थान नवग्रहों का पूजन करे। दिशा-विदिशाओं में चतुर्दन्त ऐरावत आदि हस्तिर्यों का पूजन करे । ५५-६०॥ तदनन्तर लोकपालों का और फिर उनके अस्त्रों का पूजन कर घृतसिक्त दूर्वा से आयु के लिये हवन करे। जो मनुष्य सात दिन घृताक्त गुडूची (गुरूच) से एक हजार आठ बार हवन करता है, वह सौ वर्षों तक जीता है। घृतयुक्त तिल से हवन करने वाला व्यक्ति दीर्घायु होता है। जो साधक रवि दिन से प्रारम्भ कर दश दिनों तक घृतयुक्त आक की लकड़ी से होम करता है, वह शरीर से नीरोग होता है। जो व्यक्ति नित्य एक हजार आठ बार चावल से होम करता है, उसे अल्प काल में ही महती लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। जो मानव नित्य खीर भोजन करता है तथा उषाकाल में नारियल एवम् घी से अष्टोत्तरशत हवन करता है, वह शीघ्र ही कुबेर तुल्य हो जाता है ॥६१-६६॥ गुडमिश्रित घी से होम करने से अन्न की प्राप्ति होती है। जो द्विजवर चारों वर्णों को मोहित करना चाहता है, वह जपापुष्प से अष्टोत्तर सहस्र हवन करे और उसके भस्म में ताम्बूल का रस मिला कर तिलक लगाये ॥६७-६८॥ मुनीश्वर ! इस प्रकार जो साधक लक्ष्मी की आराधना करता है, उसे सकल संपत्तियों की प्राप्ति होती है, उसके ऊपर महालक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और वह देहावसान होने पर वैकुंठ को जाता है, इसमें संशय

त्र्यशीतितमोऽध्यायः ७६३ सा शिवाज्ञामनुप्राप्य दिव्यलोकं विनिर्ममे । देवीलोकेति विख्यातं सर्वलोकविलक्षणम् ॥७१॥ तत्र स्थिता जगन्माता तपोनियममास्थिता । विविधान् स्वावतारान्हि त्रिकाले कुरुतेऽनिशम् ॥७२॥ मायाधिका ह्लादिनीयुक् चंद्राढ्या सर्गिणी पुनः । प्रतिष्ठा स्मृतिसंयुक्ता क्षुधया सहिता पुनः ॥७३॥ ज्ञानासृता वह्निजायांतस्ताराद्यो मनुर्मतः । ऋषिः स्याद्वामदेवोऽस्य छंदो गायत्रमीरितम् ॥७४॥ देवता जगतामादिर्दुर्गा दुर्गतिनाशिनी । ताराद्यैकेकवर्णेन हृदयादित्रयं मतम् ॥७५॥ विभिर्वर्मक्षणं द्वाभ्यां सर्वैरस्त्रमुदीरितम् । महामरकतप्रख्यां सहस्रभुजमंडिताम् ॥७६॥ नानास्त्राणि दधतीं त्रिनेत्रां शशिशेखराम् । कंकणांगदहाराढ्यां क्वणन्नूपुरकान्विताम् ॥७७॥ किरीटकुंडलंघरां दुर्गा देवीं विचितयेत् । वसुलक्षं जपेन्मंत्रं तिलैः समधुरैहुनेत् ॥७८॥ पयोऽध्रसा वा सहस्रं नवपद्मात्मके यजेत् । ॥७६॥ प्रभा माया जया सूक्ष्मा विशुद्धानंदिनी पुनः । सुप्रभा विजया सर्वसिद्धिदा पीठशक्तयः ॥८०॥ अद्भिर्मह्रस्वत्रयक्लीबरहितैः पूजयेदिमाः । प्रणवो वज्रनखदंष्ट्रायुधाय महापदात् ॥८१॥ सिंहाय वर्मास्त्रं हृच्च प्रोक्तः सिंहमनुर्मुने । दद्यादासनमेतेन मूत्ति मूलेन कल्पयेत् ॥८२॥ अङ्गावृत्ति पुराभ्यर्च्य शक्तीः पत्रेषु पूजयेत् । जया च विजया कीर्तिः प्रीतिः पश्चात्प्रभा पुनः ॥८३॥ श्रद्धा मेधा श्रुतिश्चैव स्वनामाद्याक्षरादिकाः । पत्राग्रेष्वर्चयेदष्टावायुधानि यथाक्रमात् ॥८४॥ शंखचक्रगदाखड्गपाशांकुशशरांधनुः । लोकेश्वरांस्ततो बाह्ये तेषामस्त्राण्यनंतरम् ॥८५॥ इत्थं जपादिसिमंत्त्री मंत्रे सिद्धे विधानवित् । कुर्यात्प्रयोगानमुना यथा स्वस्वमनीषितम् ॥८६॥ नहीं । द्विजश्रेष्ठ ! जो सती दुर्गा शिवलोक में गईं, उन्होंने शंकर की आज्ञा से दिव्यलोक की सृष्टि की। वह देवीलोक के नाम से प्रसिद्ध है, जो अखिल लोकों से उत्तम है। वहां तप एवम् नियम में अवस्थित जगन्माता तीनों काल निरवच्छिन्न रूप से अपने विविध अवतारों का संपादन करती रहती हैं, माया, ह्लादिनी, चंद्राख्या, सर्गिणी, प्रतिष्ठा, स्मृति, क्षुधा तथा अन्त में स्वाहा और आदि में ओं--यहो मन्त्र बताया गया है। इस मन्त्र के ऋषि वामदेव, छन्द गायत्री और देवता भयंकर पीड़ा का नाश करने वाली जगन्माता दुर्गा है। ओं आदि मन्त्रों के एक-एक वर्ण से हृदय आदि तीन चीजें बताई जाती हैं। तीन अक्षरों से नेत्र और दो अक्षरों से सम्पूर्ण अस्त्र कहे गये हैं। महामरकतमणि के समान कान्ति वाली, सहस्र भुजाओं से अलंकृत, अनेक शस्त्रों को धारण करने वाली, तीन चक्षु वाली, ललाट पर चन्द्र धारण करने वाली, कंगन केयूर तथा हार से विभूषित, शब्दधायमान नूपुर से युक्त ओर मुकुट तथा कुंडल धारण करने वालो दुर्गा देवी का ध्यान करे । तदनन्तर मन्त्र का आठ लाख जप करके मधुर सहित तिल से हवन करे। अथवा खीर से नवपद्मात्मक पीठ पर सहस्रबार हवन करे। प्रभा, माया, जया, सूक्ष्मा, विशुद्धा, आनंदिनी, सुप्रभा, विजया तथा सर्वसिद्धिदा ये नौ पीठशक्तियां हैं ॥६९-८०॥ तीन ह्रस्व तथा क्लीबरहित जल से इन शक्तियों का पूजन करे। मुने! महा- पद से लेकर वज्र, नख, दंष्ट्रा तथा आयुध तक के लिये प्रणव और सिंह के लिये वर्मास्त्र एवम् हृदय कहा गया है। यही सिंह-मंत्र है। इस मंत्र से आसन प्रदान कर मूल मन्त्र से मूर्ति की कल्पना करे। पहिले अंगावृत्ति का पूजन कर पत्रों पर शक्तियों की अर्चना करे। जया, विजया, कीर्ति, प्रीति, प्रभा, श्रद्धा, मेधा तथा श्रुति अपने नाम के आद्य अक्षर और शंख, चक्र, गदा, खड्ग, पाश, अंकुश, बाण एवम् धनुष का क्रमशः पूजन करे। तदनन्तर लोकपाल तथा उनके अस्त्रों की पूजा करे विधानवेत्ता मन्त्री इस प्रकार जप आदि से मंत्र को सिद्ध कर अपनी अभीप्सित वस्तु के लिये उस मन्त्र का प्रयोग करे । ॥८१-८६॥ विधिपूर्वक नौ सुन्दर कलशों की

७६४ नारदीयपुराणम् प्रतिष्ठाप्य विधानेन कलशान्नवशोभनान् । रत्नहेमादिसंयुक्तान्घटेषु नवसु स्थितान् ॥८७॥ मध्यस्थे पूजयेद्देवीमितरेषु जयादिकाः । संपूज्य गन्धपुष्पाद्यैरभिषिञ्चेन्नराधिपम् ॥८८॥ राजा विजयते शत्रूञ्जयोऽधिको विजयश्रियम् । प्राप्नोत्यरोगो दीर्घायुः सर्वव्याधिविवर्जितः ॥८९॥ वन्ध्याभिषिक्ता विधिना लभते तनयं वरम् । मन्त्रेणानेन संजप्तमाज्यं क्षुद्रग्रहापहम् ॥९०॥ गर्भिणीनां विशेषेण जप्तं भस्मादिकं तथा । जृम्भश्वासे तु कृष्णस्य प्रविष्टे राधिकामुखम् ॥९१॥ या तु देवी समुद्भूता वीणापुस्तकधारिणी । तस्या विधानं विप्रेंद्र शृणु लोकोपकारकम् ॥९२॥ प्रणवो वाग्भवं माया श्रीः कामः शक्तिरीरिता । सरस्वती चतुर्थ्यंता स्वाहांतो द्वादशाक्षरः ॥९३॥ मनुर्नारायण ऋषिविराट् छन्दः समोरितम् । महासरस्वती चास्य देवता परिकीर्तिता ॥९४॥ वाग्भवेन षडङ्गानि कृत्वा वर्णान्न्यसेद् बुधः । ब्रह्मरंध्रे न्यसेत्तारं लज्जां भ्रूमध्यगां न्यसेत् ॥९५॥ मुखनासिकादिकर्णेषु गुदेषु श्रीमुखार्णकान् । ततो वाग्देवतां ध्यायेद्वीणापुस्तकधारिणीम् ॥९६॥ कर्पूरकुन्दधवलां पूर्णचंद्रोज्ज्वलाननाम् । हंसाधिरूढां भालेन्दुदिव्यालंकारशोभिताम् ॥९७॥ जपेद्द्वादशलक्षाणि ततसहस्रं सितांबुजैः । नागचंपकपुष्पैर्वा जुहुयात्साधकोत्तमः ॥९८॥ मातृकोक्ते यजेत्पीठे वक्ष्यमाणक्रमेण ताम् । वर्णाब्जेनासनं दद्यान्मूर्तिं मूलेन कल्पयेत् ॥९९॥ देव्या दक्षिणतः पूज्या संस्कृता वाङ्मयी शुभा । प्राकृता वामतः पूज्या वाङ्मयो सर्वसिद्धिदा ॥१००॥ पूर्वमंगानि षट्कोणे प्रजाद्याः पूजयेद्बहिः । प्रज्ञा मेधा श्रुतिः शक्तिः स्मृतिर्वागीश्वरी मतिः ॥१०१॥ स्वस्तिश्चेति समाख्याता ब्रह्माद्यास्तदनंतरम् । लोकेशानर्चयेद्भूयस्तदस्त्राणि च तद्बहिः ॥१०२॥

स्थापना करे, जो रत्न, सुवर्ण आदि से युक्त हों। बीच के कलश पर देवी की और इतर कलशों पर जया आदिकों की गंध, पुष्प आदि से अर्चना कर उस जल से राजा का अभिषेक करे। अभिषिक्त राजा शत्रुओं के ऊपर विजय, विजयलक्ष्मी, आरोग्य और दीर्घायु को प्राप्त करता है। वंध्या स्त्री विधिवूर्वक अभिषिक्त होने पर उत्तम पुत्र को प्राप्त करती है। घी को इस मन्त्र से अभिमंत्रित कर देने पर वह घी क्षुद्र ग्रहों का नाशक हो जाता है। उक्त मन्त्र से अभिमन्त्रित भस्म आदि गर्भिणियों के लिये विशेष लाभदायक है। विप्रेन्द्र ! कृष्ण की जंभाई राधिका के मुख में प्रविष्ट होने पर जो वीणा पुस्तक धारिणी देवी उत्पन्न हुई थीं उनके लोकोपकारक विधान को सुनो। उनके द्वादशाक्षर मन्त्र के अन्त में स्वाहा है और मंत्र के अन्तर्गत प्रणव, वाग्भव, माया, श्री, काम, शक्ति तथा सरस्वती हैं। मंत्र के ऋषि नारायण, छंद विराट् और देवता सरस्वती हैं ॥८७-९४॥ बुधजन वाग्भव मन्त्र से षडंगन्यास करके वर्णन्यास करे। ब्रह्मरंध्र में ओंका, भौं के मध्य में लज्जा का और मुख, नासिका, कर्ण एवम् गुदा में श्रीमुखवर्णों का न्यास करे। तदुपरान्त उत्तम साधक वीणा और पुस्तक धारण करने वाली, कर्पूर तथा कुन्दपुष्प के समान शुभ्र वर्ण वाली, पूर्णचंद्र के सदृश मुख वाली, हंस पर आरूढ और चंद्ररूप दिव्य अलंकार से सुशोभित ललाट वाली वाग्देवता (सरस्वती) का ध्यान कर बारह लाख मंत्र का जप करे। फिर उसका दशांश श्वेतकमल या नागचंपा से हवन करे ॥९५-९८॥ तत्पश्चात् मातृकापीठ पर वक्ष्यमाण क्रम से उनकी अर्चना करे। मूल से मूर्ति की कल्पना कर कमल का आसन प्रदान करे। देवी के दक्षिण भाग में पवित्र संस्कृत वाङ्मय देवी की पूजा करे और वामभाग में समस्त सिद्धियों को देने वाली प्राकृत वाङ्मयी देवी की आराधना करे। पहले षट्कोण में छह अंगों का पूजन कर बाद में ब्रह्मा, प्रज्ञा, मेधा, श्रुति, शक्ति, स्मृति, वागीश्वरी, मूर्ति तथा स्वस्ति का पूजन करे। तदनन्तर लोकपाल और उनके अस्त्रों की पूजा करनी चाहिए ॥९९-१०२॥

[Page Header] त्र्यशीतितमोऽध्यायः ७६५

[Sanskrit Text] एवं संपूज्य वाग्देवीं साक्षाद्वाग्वल्लभो भवेत् । ब्रह्मचर्यरतः शुद्धः शुद्धदंतनखादिकः ॥१०३॥ संस्मरन् सर्ववनितात: सततं देवताबिया । कवित्वं लभते धीमान् मासैर्द्वादशभिर्ध्रुवम् ॥१०४॥ पीत्वा तन्मंत्रितं तोयं सहस्रं प्रत्यहं मुने । महाकविर्भवेन्मत्री वत्सरेण न संशयः ॥१०५॥ उरोमात्रोदके स्थित्वा ध्यान्मार्तंडमंडले । स्थितां देवीं प्रतिदिनं त्रिसहस्रं जपेन्मनुम् ॥१०६॥ लभते मंडलात्सिद्धि वाचामप्रतीमां भुवि । पालाशविल्वकुसुमैर्जुहुयान्मधुरोक्षितैः ॥१०७॥ समिद्भिर्वा तदुत्थामिर्यशः प्राप्नोति वाक्पतेः । राजवृक्षसमुद्भूतैः प्रसूनैर्मधुराप्लुतैः ॥१०८॥ तत्समिद्भिश्च जुहुयात्कवित्वमतुलं लभेत् । अथ प्रवक्ष्ये विप्रेन्द्र सावित्रीं ब्रह्मणःप्रियाम् ॥१०८॥ यां समाराध्य ससृजे ब्रह्मा लोकाँश्चराचरान् । लक्ष्मो माया कामपूर्वा सावित्री ङेसन्मन्विता ॥११०॥ स्वाहांतो मनुराख्यातः सावित्र्या वसुवर्णवान् । ऋषिर्ब्रह्मास्य गायत्री छंदः प्रोक्तं च देवता ॥१११॥ सावित्रीं सर्वदेवानां सावित्री परिकीर्तिता । हृदंतिकैर्ब्रह्म विष्णुद्देश्वरसदाशिवैः ॥११२॥ सर्वात्मना च ङेयुक्तै रंगानां कल्पनं मतम् । तप्तकांचनवर्णाभां ज्वलन्तीं ब्रह्मतेजसा ॥११३॥ ग्रीष्ममध्याह्न मार्तंड सहस्रसमविग्रहाम् । ईषद्व्रास्यप्रसन्नास्यां रत्नभूषणभूषिताम् ॥११४॥ वह्निशुद्धांशुकाधानां भक्तानुग्रहकातराम् । सुखदां मुक्तिदां चैव सर्वसंपत्प्रदां शिवाम् ॥११५॥ वेदबीजस्वरूपां च ध्यायेद्वेदप्रसूं सतीम् । ध्यात्वैवं मण्डले विद्वान् त्रिकोणोज्ज्वलकर्णिके ॥११६॥

[Hindi Translation] इस प्रकार वाग्देवी की आराधना करनेवाला व्यक्ति साक्षात् वाचस्पति होता है। जो बुद्धिमान् मानव बारह मास तक दांत, नाखून आदि को पवित्र रखते हुए ब्रह्मचर्य एवम् शुचिता से रहता है और सकल महिलाओं को देवीबुद्धया देखता है, वह कवित्वशक्ति को निश्चित ही प्राप्त करता है। मुने ! जो व्यक्ति प्रत्येक दिन सरस्वती के मन्त्र से सहस्र बार जल को अभिमन्त्रित कर पान करता है, वह एक वर्ष के भीतर महाकवि हो जाता है, इसमें संशय नहीं । जो छातीभर जल में खड़ा होकर सूर्यमंडल में अवस्थित देवी का ध्यान करते हुए प्रतिदिन तीन हजार मंत्र का जप किया करता है, वह पृथ्वी पर अद्वितीय वाक्सिद्धि को प्राप्त करता है। जो मधुर मिश्रित पलाश एवम् बिल्व के पुष्पों से या समिधाओं से होम करता है वह वाक्पति के समान यशस्वी होता है ॥१०३-१०७॥ मधुरमिश्रित राजवृक्ष (सोन्दाल) के पुष्प तथा समिधा से हवन करनेवाला व्यक्ति अतुलनीय कवित्व-शक्ति को प्राप्त करता है। विप्रेन्द्र । अब मैं ब्रह्मा की प्रिया सावित्री के बारे में कहूँगा जिनकी आराधना करके चतुरानन ने चराचर जगत् की सृष्टि की। लक्ष्मी, माया, कामपूर्वा 'ङे' युक्त सावित्री तथा स्वाहा को जोड़कर सावित्री का अष्टाक्षर मन्त्र कहा गया है। इस मन्त्र के ऋषि ब्रह्मा है, छंद गायत्री है और देवता सावित्री है, जो समस्त देवों की उत्पादयित्री कही जाती है। सर्वतोभावेन 'ङे' से युक्त ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर तथा सदाशिव द्वारा हृदय में अंगों की कल्पना करनी चाहिए ॥१०८-११२॥ तदनन्तर विद्वान् व्यक्ति तप्त सुवर्ण के समान वर्णच्छटा वाली ब्रह्मतेज से जाज्वल्यमान ग्रीष्मऋतु के मध्याह्नकालीन सहस्र सूर्यों के समान शरीरवाली, किंचित् हास्य तथा प्रसन्नता से युक्त मुख वाली, रत्न के आभूषणों से भूषित, वह्नि के समान शुद्ध वस्त्रों से सुसज्जित, भक्तों के ऊपर अनुग्रह करने के लिये आतुर, सुख, मोक्ष तथा निखिल संप- त्तियों को देने वाली, कल्याणमयी, वेद की बीजस्वरूप, वेदजननी तथा सती सावित्री का ध्यान करे ॥११३- ११५३॥ फिर त्रिकोण तथा उजले कनेल से युक्त सौर पीठ पर दीप्ता आदि नौ शक्तियों के साथ सावित्री देवी का पूजन करे । मूल मंत्र से आवाहन कर देवी की प्रतिमा की पूजा करनी चाहिए। पश्चात् तीन कोणों में

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७६६ नारदीयपुराणम् सौरे पीठे यजेद्देवीं दीप्तादिनवशक्तिभिः । मूलमंत्रेण क्लृप्तायां मूतौ देवीं प्रपूजयेत् ॥११७॥ कोणेषु त्रिषु संपूज्या ब्राह्म्याद्याः शक्तयो बहिः । आदित्याद्यास्ततः पूज्या उषादिसहिताः क्रमात् ॥११८॥ ततः षडंगान्यभ्यर्च्य केसरेषु यथाविधि । प्रह्लादिनीं प्रभां पश्चान्नित्यां विश्वंभरां पुनः ॥११९॥ विलासिनीप्रभावत्यौ जयां शांतां यजेत्पुनः । कांति दुर्गासरस्वत्यौ विद्यारूपां ततः परम् ॥१२०॥ विशालसंज्ञितामीशां व्यापिनीं विमलां यजेत् । तमोपहारिणीं सूक्ष्मां विश्वयोनि जयावहाम् ॥१२१॥ पद्मालयां परां शोभां ब्रह्म रूपां ततोऽर्चयेत् । ब्राह्म्याद्याः शारणा बाह्ये पूजयेत्प्रोक्तलक्षणाः ॥१२२॥ ततोऽभ्यर्चद् ग्रहान्बाह्ये शक्राद्यानायुधैः सह । इत्थमावरणैर्देवीः दशभिः परिपूजयेत् ॥१२३॥ अष्टलक्षं जपेन्मंत्रं तत्सहस्रं हुनेत्तिलैः । सर्वपापविनिर्मुक्तो दीर्घमायुः स विंदति ॥१२४॥ अहणाब्जैस्त्रिमध्वक्तैर्जुहुयादयुतं ततः । महालक्ष्मीर्भवेत्तस्य षण्मासान्नात्र संशयः ॥१२५॥ ब्रह्मवृक्षप्रसूनैस्तु जुहुयाद्ब्रह्मतेजसे । बहुना किमिहोक्तेन यथावत्साधिता सती ॥१२६॥ साधकानामिदं विद्या भवेत्कामदुघा मुने । अथ ते संप्रवक्ष्यामि रहस्यं परमाद्भुतम् ॥१२७॥ सावित्रीपंजरं नाम सर्वरक्षाकरं नृणाम् । व्योमकेशालकासक्तां सुकिरीटविराजिताम् ॥१२८॥ मेघभ्रू कुटिलाक्रांतां विधिविष्णुशिवाननाम् । गुरुभार्गवकर्णा तां सोमसूर्याग्निलोचनाम् ॥१२९॥ इडापिंगलिकासूक्ष्मावायुनासापुटान्विताम् । संध्याद्विजोष्ठपुटितां लसद्वागुपजिव्हिकाम् ॥१३०॥ संध्यासूर्यमणिग्रीवां मरुद्वाहसमन्वितान् । पर्जन्यहृदयासक्तां वस्वाख्यप्रतिमंडलाम् ॥१३१॥ आकाशोदरविश्रांतां नाभ्यवांतरवीथिकाम् । प्रजापत्याख्यजघनां कटींद्राणीसमाश्रिताम् ॥१३२॥ ऊर्वोर्मलयमेरुभ्यां शोभमानां सरिद्वराम् । सुजानुजह्वू कुशिकां वैश्वदेवाह्वयसंज्ञिकाम् ॥१३३॥ ब्राह्मी आदि शक्तियों की अर्चना कर उषा आदि सहित आदित्य आदि देवों का क्रमशः पूजन करे। तदनन्तर छह अंगों की पूजा कर नागकेसर पुष्पों के ऊपर प्रह्लादिनी, प्रभा, नित्या, विश्वंभरा, विलासिनी, प्रभावती, जया, शान्ता, कांति, दुर्गा, सरस्वती, विद्यारूपा, विशाला, ईशा, व्यापिनी, विमला, तमोपहारिणी, सूक्ष्मा, विश्वयोनि जयावहा, पद्मालया, परा शोभा, ब्रह्मरूपा और शारणा का पूजन करे ॥११६-१२२॥ तत्पश्चात् ग्रहों और आयुधों सहित इन्द्र आदि देवताओं की आराधना करे। इस प्रकार दश आवरणों से देवियों की पूजा करे। आठ लाख मंत्र का जप करे और उतने ही हजार तिल से हवन करे। ऐसा करनेवाला व्यक्ति समस्त पापों से मुक्त होकर दीर्घायु होता है। तदनन्तर मधु मिलाकर तीन लाल कमलों से होम करना चाहिए। ऐसा करने से वह छह मास के भीतर ही महाधनवान् हो जाता है, इसमें संशय नहीं। ब्रह्मतेज के लिए ब्रह्मवृक्ष के पुष्पों से हवन करना चाहिए। मुने ! अधिक क्या कहूँ। विधिपूर्वक देवी की आराधना करने से साधक को कामधेनु की तरह विद्या- रूपिणी देवी सबकुछ प्रदान करती हैं ॥१२३-१२८॥ अब मैं मनुष्यों की सब तरह से रक्षा करने वाले सावित्री- पंजर नामक अत्यन्त अद्भुत रहस्य को बतलाता हूँ। साधक भगवती के इस रूप का ध्यान करे कि, आकाश उनका केश पाश है, वे सुन्दर मुकुट से शोभायमान हो रही हैं, मेघ उनकी कुटिल भ्रूकुटि है, ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव उनके मुख हैं, वृहस्पति एवम् शुक्र उनके कान हैं, सूर्य, चन्द्रमा तथा अग्नि उनके नेत्र हैं, इड़ा और पिंगला उनके नासिकापुट है, संध्या अधर एवम् ओष्ठ है, जिह्वा पर वाणी विराजमान रहती है, संध्या-कालीन सूर्य उनकी मणिग्रीवा है, वायु बाहें है, बादल हृदय है, वसुगण मंडल है, आकाश उदर है, नाभि के ऊपर रोमावलि रमणीय है, प्रजापति उनका जघन है, इंद्राणी कमर है, मलयाचल एवम् सुमेरु पर्वत उनके ऊरु हैं, वे बहुत कम- नीय हैं, सरिताओं में श्रेष्ठ है, जाह्नवी एवम् कौशिकी उनके घुटने हैं, वैश्वदेवी उनकी संज्ञा है, पृथ्वी, पर्वत तथा

त्र्यशीतितमोऽध्यायः ७६७ पादांघ्रिनखलोमाद्यभूनाद्रुम लक्षिताम् । ग्रहराश्यर्क्षयोगादिमूर्तावयवसंज्ञिकाम् ॥१३४॥ तिथिमासतुं पक्षाद्यैः संकेतनिमिषात्मिकाम् । मायाकल्पितवैचित्र्यसंध्याद्यच्छदनावृताम् ॥१३५॥ ज्वलत्कालानलप्रख्यां तडित्कोटिसमप्रभाम् । कोटिसूर्यप्रतीकाशां शशिकोटिसुशीतलाम् ॥१३६॥ सुधामंडलमध्यस्थां सांद्रानंदामृतात्मिकाम् । वागतीतां मनोऽगम्यां वरदां वेदमातरम् ॥१३७॥ चराचरमयीं नित्यां ब्रह्माक्षरसमन्विताम् । ध्यात्वा स्वात्मविभेदेन सावित्रीपंजरं न्यसेत् ॥१३८॥ पञ्जरस्य ऋषिः सोऽहं छंदो विकृतिरुच्यते । देवता च परो हंसः परब्रह्मादिदेवता ॥१३८॥ धर्मार्थकाममोक्षाप्त्यै विनियोग उदाहृतः । षडंगदेवतामन्त्रैरंगन्यासं समाचरेत् ॥१४०॥ विधामूलेन मेधावी व्यापकं हि समाचरेत् । पूर्वोक्तां देवतां ध्यायेत्साकारां गुणसंयुताम् ॥१४१॥ त्रिपदा हरिजा पूर्वमुखी ब्रह्मास्त्रसंज्ञिका । चतुर्विंशतितत्त्वाढ्या पातु प्राचीं दिशं मम ॥१४२॥ चतुष्पदा ब्रह्मदंडा ब्रह्माणी दक्षिणानना । षड्विंशतत्तत्त्वसंयुक्ता पातु मे दक्षिणां दिशम् ॥१४३॥ प्रत्यङ्मुखी पञ्चपदी पञ्चाशत्तत्त्वरूपिणी । पातु प्रतीचीमनिशं मम ब्रह्मशिरोंकिता ॥१४४॥ सौम्यासborder ब्रह्मा तुर्याढ्या साथर्वांगिरसात्मिका । उदीचीं षट्पदा पातु षष्टितत्त्वकलात्मिका ॥१४५॥ पञ्चाशद्वर्णरचिता नवपादा शताक्षरी । व्योमा संपातु मे वोर्ध्वं शिरो वेदांतसंस्थिता ॥१४६॥ विद्युन्निभा ब्रह्मसन्ध्या मृगारूढा चतुर्भुजा । चापेषुचर्मासिधरा पातु मे पावकीं दिशम् ॥१४७॥ ब्राह्मी कुमारी गायत्री रक्तांगी हंसवाहिनी । बिभ्रत्कमण्डलु चाक्षं स्रुवस्त्रुवौ पातु नैर्ऋतिम् ॥१४८॥

वृक्ष उनके चरण, नख एवम् लोम हैं, ग्रह, राशि, नक्षत्र तथा योग उनके अवयव हैं ॥१२६-१३४॥ तिथि, मास, ऋतु, पक्ष, क्षण और निमेष से वे युक्त हैं, अपनी माया से वे अनेक विचित्रताओं की कल्पना करती हैं, संध्या- रूपो आवरण से उनका शरीर ढंका हुआ है, जाज्वल्यमान कालाग्नि की तरह उनके शरीर में तेज विद्यमान है कोटि विद्युल्लताओं के समान उनकी कान्ति है । कोटि सूर्य के समान उनका स्वरूप हैं, कोटि चंद्रमा के तुल्य वे शीतल हैं, सुधामंडल के मध्य में वे रहती हैं, पूर्ण आनन्दरूपी अमृत का पान करती हैं, वाणी से परे हैं, मनसा गम्य हैं, वरदायिका एवम् वेदमाता हैं, चराचरमयी हैं, नित्या हैं, उन्हें ब्रह्माक्षर कहते हैं । इस प्रकार अनन्यमन से उनका ध्यान कर सावित्री पंजर (मंत्र) का न्यास करे । पंजर के ऋषि सोहम् है, छंद विकृति है, देवता परमहंस हैं और आदि देवता परब्रह्म हैं ॥१३५-१३८॥ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के लिये इसका विनियोग किया जाता है । षडंगदेवता के मंत्रो से अंगन्यास करे । विद्वान् ब्यक्ति मूलमंत्र से पूजा करे । पूर्वोक्त देवता का ध्यान साकार रूप में करना चाहिए, जो त्रिगुणमयी हो, तीन चरणवालो, विष्णु से उत्पन्न होने वाली, पूरब की ओर मुखवाली, ब्रह्मास्त्र संज्ञा वाली और चौबीस तत्त्वों से सम्पन्न भगवती पूर्व दिशा में मेरी रक्षा करे । चार चरणवाली, ब्रह्मदंड कहलाने वाली, दक्षिण की ओर मुखवाली और छब्बीस तत्त्वों से युक्त ब्रह्माणी दक्षिण दिशा में मेरी रक्षा करे । पांच पद वालो, पश्चिम की ओर मुखवाली, और ब्रह्मशिर धारण करने वाली देवी सदा पश्चिम दिशा में मेरी रक्षा करे ॥१४०-१४४॥ उत्तर की ओर मुख वाली, छह पैर वाली, तुरीय ब्रह्म से युक्त अंगिरस अयवं वेद तथा साठ तत्त्वों से सम्पन्न देवी उत्तर दिशा में मेरी रक्षा करे । पचास वर्णों से निर्मित, नौ चरण एवम् सौ अक्षरों से युक्त तथा वेदान्त निष्ठा ब्योमा देवी मेरे ऊर्ध्व भाग-शिर की रक्षा करे । विद्युत् की तरह आभा वालो, मृग पर आरूढ, चतुर्भुज, धनुष, बाण, कवच तथा खड्ग धारण करने वाली ब्रह्मसंध्या देवी अग्नि कोण में मेरी रक्षा करे । कुमारी, रक्तांगी हंसवाहिनी, कमंडलु

७६८ नारदीयपुराणम्

शुक्लवर्णा च सावित्री युवती वृषवाहना । कपालशूलाक्षस्रग्धारिणी पातु वायवीम् ॥१४८॥ श्यामा सरस्वती वृद्धा वैष्णवी गरुडासना । शंखचक्राभयकरा पातु शैवीं दिशं मम ॥१५०॥ चतुर्भुजा देवमाता गौरांगी सिंहवाहना । वराभयखड्गचर्मभुजा पात्वधरां दिशम् ॥१५१॥ तत्तत्पार्श्वे स्थिताः स्वस्ववाहनायुधभूषणाः । स्वस्वदिक्षु स्थिताः पांतु ग्रहशक्त्यंगसंयुताः ॥१५२॥ मंत्राधिदेवतारूपा मुद्राधिष्ठातृदेवताः । व्यापकत्वेन पांत्वस्मानापादतलमस्तकम् ॥१५३॥ इदं ते कथितं सत्यं सावित्रीपंजरं मया । संध्ययोः प्रत्यहं भक्त्या जपकाले विशेषतः ॥१५४॥ पठनीयं प्रयत्नेन भुक्तिं मुक्तिं समिच्छता । भूतिदा भुवना वाणी महावसुमती मही ॥१५५॥ हिरण्यजननी नन्दा सविसर्गा तपस्विनी । यशस्विनी सती सत्या वेदविच्चिन्मयी शुभा ॥१५६॥ विश्वा तुर्या वरेण्या च निसृणी यमुना भुवा । मोदा देवी वरिष्ठा च धीश्च शांतिमती मही ॥१५७॥ धिषणा योगिनी युक्ता नदी प्रज्ञाप्रचोदनी । दया च यामिनी पद्मा रोहिणी रमणी जया ॥१५८॥ सेनामुखी साममयी बगला दोषवर्जिता । माया प्रज्ञा परा दोग्ध्री मानिनी पोषिणी क्रिया ॥१५९॥ ज्योत्स्ना तीर्थमयी रम्या सौम्यामृतमया तथा । ब्राह्मी हैमी भुजंगी च वशिनी सुंदरी वनी ॥१६०॥ ओंकारहंसिनी सर्वा सुधा सा षड्गुणावती । माया स्वधा रमा तन्वी रिपुघ्नी रक्षणी सती ॥१६१॥ हैमी तारा विधुगतिर्विषघ्नी च वरानना । अमरा तीर्थदा दीक्षा दुर्धर्षा रोगहारिणी ॥१६२॥ नानापापनृशंसघ्नी षट्पदी वज्रिणी रणी । योगिनी विमला सत्या अबला बलदा जया ॥१६३॥ गोमती जाह्नवी रज्वी तपनी जातवेदसा । अचिरा वृष्टिदा ज्ञेया ऋतंतंत्रा ऋतात्मिका ॥१६४॥ सर्वकामदुधा सौम्या भवाहंकारवर्जिता । द्विपदा या चतुष्पदा त्रिपदा या च षट्पदा ॥१६५॥

रुद्राक्षमाला, सुक्र तथा स्रुवा धारण करने वाली ब्राह्मी गायत्री नैर्ऋत्य कोण में मेरी रक्षा करे । शुक्लवर्णा, युवती, वृषवाहना, कपाल, त्रिशूल तथा रुद्राक्ष माला धारण करने वाली सावित्री वायव्य कोण में मेरी रक्षा करे ॥१४५-१४८॥ श्यामा, वृद्धा वैष्णवी, गरुडासना तथा शंख, चक्र एवम् अभयास्त्र धारण करने वाली सरस्वती देवी ईशान कोण में मेरी रक्षा करे । चतुर्भुजा गौरांगी, सिंहवाहना तथा अभयास्त्र, खड्ग एवम् कवच धारण करने वालो देव माता अधर दिशा में मेरी रक्षा करे । उन देवियों की बगल में रहने वाली तत्तत् देवियों, जो अपने अपने वाहन अस्त्र तथा आभूषणों से भूषित एवम् ग्रह, शक्ति और अंगों से युक्त हैं, अपनी अपनी दिशा में मेरी रक्षा करें । मंत्र एवम् मुद्रा की अधिष्ठात्री देवियाँ व्यापक रूप से मेरे मस्तक से लेकर चरण तक की रक्षा करे ॥१५०-१५३॥ इस सत्य सावित्री पंजर को मैंने तुमसे बता दिया । भुक्ति-मुक्ति के इच्छुक व्यक्ति प्रत्येक दिन दोनों संध्या विशेष करके जप काल में इसका पाठ अवश्य करे । भूतिदा, भुवना, वाणी, महावसुमती, मही, हिरण्यजननी, नंदा, सविसर्गा, तपस्विनी, यशस्विनी, सती, सत्या, वेदवित्, चिन्मयी, शुभा, विश्वास, तुर्या, वरेण्या, निसृणी, यमुना, भुवा, मोदा, देवी, वरिष्ठा, धी, शान्ति, मति, मही, धिषणा, योगिनी, नदी, प्रज्ञा, प्रचोदिनी, दया, यामिनी, पद्मा, रोहिणी, रमणी, जया, सेनामुखी, साममयी, बगला, दोषवर्जिता, माया, प्रज्ञा, परा, दोग्धी, मानिनी, पोषिणी, क्रिया, ज्योत्स्ना, तीर्थमयी, रम्या, सौम्या, अमृतमया, ब्राह्मी, हैमी, भुजंगी, वशिनी, सुन्दरी, वनी, ओंकारहंसिनी, सर्वा, सुधा, षड्गुणावती, माया, स्वधा, रमा, तन्वी, रिपुघ्नी, रक्षणी, सती, हैमी, तारा, विधुगति, विषघ्नी वरानना, अमरा, तीर्थदा, दीक्षा, दुर्धर्षा, रोगहारिणी, नानापापनृशंसघ्नी, षट्पदी, वज्रि, रजी, योगिनी, विमला, अबला, सत्या, बलदा, जया, गोमती, जाह्नवी, रज्वी, तपनी, जातवेदसा, अचिरा, वृष्टिदा, ज्ञेया, ऋततंत्रा, ऋतात्मिका, सर्वकामदुधा, सौम्या, भवाहंकारवर्जिता, द्विपदा, चतुष्पदा, त्रिपदा, षट्पदा, अष्टपदी, नवपदी सहस्राक्षा,

चतुरशीतितमोऽध्यायः ७६६ अष्टापदी नवपदी सहस्राक्षरात्मिका। अष्टोत्तरशतं नाम्नां सावित्र्या यः पठेन्नरः ॥१६६॥ स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत् । एतत्ते कथितं विप्र पंचप्रकृतिलक्षणम् ॥१६७॥ मंत्राराधनपूर्वं च विश्वकामप्रपूरणम् ॥१६८॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे पञ्चप्रकृतिमन्त्रादिनिरूपणं नाम त्र्यशीतितमोऽध्यायः ॥८३॥ चतुरशीतितमोऽध्यायः सनत्कुमार उवाच कलिकल्पान्तरे ब्रह्मन् ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः। लोकपद्मे तपस्यस्य सृष्टयर्थं संबभूवतुः ॥१॥ विष्णुकर्णमलोद्भूतावरुरौ मधुकैटभौ। तौ जातमात्रौ पयसि लोकप्रलयलक्षणे ॥२॥ जानुमात्रे स्थितौ दृष्ट्वा ब्रह्माणं कमलस्थितम्। प्रवृत्तावुत्तमालक्ष्य तुष्टाव जगदंबिकाम् ॥३॥ ततो देवी जगत्कर्त्री शर्वी शक्तिरनुत्तमा। नारायणाक्षिसंस्थाना निद्रा प्रीता बभूव ह ॥४॥ तस्या मंत्रादिकं सर्वं कथयिष्यामि तच्छृणु। सारुणा क्रोधनी शांतिश्चंद्रालंकृतशेखरा ॥५॥ एकाक्षरीबीजमन्त्रऋषिः शक्तिरुदाहृता। गायत्री च भवेच्छन्दो देवता भुवनेश्वरी ॥६॥ अक्षरस्वरूपी—ये एक सो आठ नाम सावित्री देवी के कहे गये हैं। जो व्यक्ति इन नामों का पाठ करेगा, वह दीर्घायु सुखी, पुत्री, विजयी तथा विनयी होगा। विप्र ! यह मैं राधिका की पंचप्रकृतिलक्षण सृष्टि बतला दी, इनके मंत्र जप तथा आराधना करने से समस्त कामनायें पूरी होती हैं ॥१५४-१६८॥ श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त तृतीयपाद में पंचप्रकृति और मंत्र आदि निरूपण नामक तिरासीवाँ अध्याय समाप्त ॥८३॥ अध्याय ८४ जप होम की विधि सहित देवी-मंत्र का निरूपण सनत्कुमार बोले- ब्रह्मन् ! कलिकल्प में अव्यक्तजन्मा ब्रह्मा जब सृष्टि के निमित्त लोकपद्म पर तप कर रहे थे तब विष्णु के कर्णमल से मधु और कैटभ नामक दो असुर उत्पन्न हुए, जिनके घुटने तक ही जग- प्रलयकारी जल हुआ था। उत्पन्न होते ही वे कमलस्थित ब्रह्मा को देख कर उन्हें खाने के लिये यत्न करने लगे। तब चतुरानन ने जगदंबा की स्तुति की। स्तुति से जगत्कर्त्री, अत्युत्तमा शैवी शक्ति तथा विष्णु के नेत्र पर संस्थान करने वाली निद्रा देवी प्रसन्न हुईं। उनके मंत्र आदि सबकुछ मैं तुमसे बता देता हूँ, सुनो ॥१-४१/२॥ अरुणा, क्रोधनी, शांति, चन्द्रमा से अलंकृत ललाटवाली और एकाक्षरी-यह बीज मंत्र है। इसके ऋषि एवम् शक्ति भी कही गई है। गायत्री इसका छंद है और भुवनेश्वरी देवता है। छह दीर्घ मात्राओं से युक्त ९७—ना० पु०

७७० नारदीयपुराणम् षड्दीर्घयुक्तबीजेन कुर्यादंगानि षट् क्रमात् । संहारसृष्टिमार्गेण मातृकान्यस्तविग्रहः ॥७॥ मन्त्रन्यास ततः कुर्याद्देवताभावसिद्धये । हृल्लेखां मूर्ध्नि वदने गगनां हृदयांबुजे ॥८॥ रक्तां करालिकां गुह्ये महोच्छुष्मा पदद्वये । ऊर्ध्वप्राग्दक्षिमोदीच्यपश्चिमेषूत्तरेऽपि च ॥६॥ सद्यादिह्रस्वबीजायान्यस्तव्या भूतसंप्रभाः । अंगानि विन्यसेत्पश्चाज्जातियुक्तानि षट् क्रमात् ॥१०॥ ब्रह्माणं विन्यसेद्भाले गायत्र्या सह संयुतम् । सावित्र्या सहितं विष्णुं कपोले दक्षिणे न्यसेत् ॥११॥ वागीश्वर्या समायुक्तं वामंगंडं महेश्वरम् । श्रिया धनपतिं न्यस्य वामकर्णाग्रके पुनः ॥१२॥ रत्या स्मरं मुखे न्यस्य पुण्यागणपतिं न्यसेत् । सव्यकर्णोपरि निधाकर्णगंडांतरालयोः ॥१३॥ न्यस्तव्यं वदने मूलं रूपश्चैवांस्ततो न्यसेत् । कण्ठमूले स्तनद्वंद्वे वामांसे हृदयांबुजे ॥१४॥ सव्यांसे पार्श्वयुगले नाभिदेशे च देशिकः । भालांश्च पार्श्वजठरे पार्श्वोऽसावरके हृदि ॥१५॥ ब्रह्माण्याद्यास्तनौ न्यस्य विधिना प्रोक्तलक्षणाः । मूलेन व्यापकं देहे न्यस्य देवीं विचिंतयेत् ॥१६॥ उद्यद्दिवाकरनिभां तुंगरोजां त्रिलोचनाम् । स्मेरास्यामिंदुमुकुटां वरपाशांकुशाभयाम् ॥१७॥ रदलक्षं जपेन्मत्रं त्रिमध्वक्तैर्हुनेत्ततः । अष्टद्रव्यैर्दशांशेन ब्रह्मवृक्षसमिद्भरैः ॥१८॥ द्राक्षाखर्जूरवातामशर्करानालिकेरकम् । तन्दुलाज्यतिलं विप्र द्रव्याष्टकमुदाहृतम् ॥१६॥ दद्यादर्घ्यं दिनेशाय तत्र संचित्य पार्वतीम् । पद्दमष्टदलं बाह्ये वृत्तं षोडशभिद्दलैः ॥२०॥ विलिखेत्कर्णिकामध्ये षट्कोणमतिसुन्दरम् । ततः संपूजयेत्पीठं नवशक्तिसमन्वितम् ॥२१॥ जयाख्या विजया पश्चादजिताह्यापराजिता । नित्या विलासिनी दोग्ध्री त्वघोरा मंगला नव ॥२२॥ बीज मंत्र से क्रमशः षडंगन्यास करना चाहिये । साधक संहार एवम् सृष्टिमार्ग से मातृकान्यास कर देवता की भावसिद्धि के लिये मन्त्रन्यास करे । मस्तक पर हृल्लेखा, मुख में गगना, हृदयकमल में रक्ता, गुह्यप्रदेश में करालिका, चरणद्वय पर महोच्छुष्मा और ऊपर, पूर्व, दक्षिण, पश्चिम एवम् उत्तर में भूत के समान प्रभा वाली सद्या आदि तथा ह्रस्व, बीज आदि का न्यास करे । पश्चात् जातियुक्त छह अंगों का क्रमशः न्यास करना चाहिये ॥५-१०॥ ललाट पर गायत्री सहित ब्रह्मा का और दक्षिण कपोल पर सावित्री सहित विष्णु का न्यास करना चाहिये । वाम कपोल पर वागीश्वरी सहित महेश्वर का और वामकर्ण के अग्रभाग में लक्ष्मी सहित कुबेर का न्यास करे । मुख में रति सहित कन्दर्प का और बायें कान पर पुण्यासहित गणपति का न्यास करे ॥११-१२१/२॥ कान तथा तथा कपोल के मध्य में निधा का और वदन में मूलमन्त्र का न्यास करे । तदनन्तर कण्ठमूल, स्तनद्वय, वामस्कन्ध, दक्षिणस्कन्ध, हृदयकमल, पाश्र्वयुगल तथा नाभिदेश में चैत्रों का न्यास कर उदर, स्कन्ध तथा हृदय के एक देश में भालों का न्यास करे । फिर स्तन पर उक्तलक्षणा ब्रह्माणी आदि देवियों का न्यास कर देह में मूलमन्त्र से व्यापक का न्यास करे । तत्पश्चात् उदीयमान दिवाकर के समान तेजवाली, उत्तुंग कुच वाली, तीन नेत्रवाली, किंचित् हास्य-युक्त मुख वाली, चन्द्रमुकुट वाली, उत्तम पाश, अंकुश तथा अभ- यास्त्र धारण करने वाली देवी का ध्यान कर बत्तीस लाख मन्त्रों का जप करे । फिर त्रिमधु (घी, चीनी और मधु) मिश्रित अष्ट द्रव्य एवम् ब्रह्मवृक्ष की समिधा से उसका दशांश हवन करे ॥१३-१८॥ विप्र ! दाख खजूर, बादाम, शर्करा, नारियल, तन्दुल, घी तथा तिल -ये अष्ट द्रव्य कहलाते हैं । तदनन्तर सूर्य को अर्घ्य प्रदान कर पार्वती का ध्यान करे और कर्णिका के मध्य में अष्टदल, षोडशदल तथा परम सुन्दर षट्कोण का निर्माण करे । फिर नौ शक्तियों के साथ पीठ की पूजा करे । जया, विजया, अजिता, अपराजिता, नित्या,

चतुरशीतितमोऽध्यायः ७७१ बीजाढ्यमासनं दत्त्वा मूर्तिं तेनैव कल्पयेत् । तस्यां संपूजयेद्देवीमावाह्यावरणैः क्रमात् ॥२३॥ मध्यप्राग्द्याम्यसौम्येषु पूजयेदंगदेवताः । षट्कोणेषु यजेन्मन्त्री पश्चान्मिथुनदेवताः ॥२४॥ इन्द्रकोणे लसद्दंडकुण्डिकाक्षगुणामयाम् । गायत्रीं पूजयेन्मन्त्री ब्रह्माणमपि तादृशम् ॥२५॥ रक्षःकोणे शंखचक्रगदापंकजधारिणीम् । सावित्रीं पीतवसनां यजेद्विष्णुं च तादृशम् ॥२६॥ वायुकोणे परश्वक्षमालाभयवरान्विताम् । यजेत्सरस्वतीमच्छां रुद्रं तादृशलक्षणम् ॥२७॥ वह्निकोणे यजेद्रत्नकुम्भं मणिकरंडकम् । कराभ्यां बिभ्रतों पीतां तुन्दिलं धनदायकम् ॥२८॥ आलिंग्य सव्यहस्तेन वामे तांबूलधारिणीम् । धनदांकसमारूढां महालक्ष्मीं प्रपूजयेत् ॥२९॥ पश्चिमे मदनं बाणपाशांकुशशरासनम् । धारयंतं जपारक्तं पूजयेद्रक्तभूषणम् ॥३०॥ सव्येन पतिमाश्लिष्य वामेनोत्पलधारिणीम् । पाणिना रमणांकस्थां रतिं सम्यक्समर्चयेत् ॥३१॥ ऐशान्ये पूजयेत्सम्यक् विघ्नराजं प्रियान्वितम् । सृणिपाशधरं कांतं वरांगासृक्कलांगुलिम् ॥३२॥ माध्वीपूर्णकपालाढ्यं विघ्नराजं दिगंबरम् । पुष्करे विगलद्रत्नस्फुरच्चषकधारिणम् ॥३३॥ सिंदूरसदृशाकारामुद्दाममदविभ्रमाम् । धूतरक्तोत्पलामन्यपाणिना तु ध्वजस्पृशाम् ॥३४॥ आश्लिष्टकांतामरुणां पुष्टिभर्तेद्दिगंबराम् । कर्णिकायां निधी पूज्यौ षट्कोणस्याथ पार्श्वयोः ॥३५॥ अंगानि केसरेष्वेताः पश्चात्पत्रेषु पूजयेत् । अनंगकुसुमा पश्चाद्द्वितीयानंगमेखला ॥३६॥ अनंगगमना तद्वदनंगमदनातुरा । भुवनपाला गगनवेगा षष्ठी चैव ततः परम् ॥३७॥

विलासिनी, दोग्ध्री, अघोरा और मंगला—ये नौ शक्तियां हैं। बीजमन्त्र से उन्हें आसन देकर उसी मन्त्र से मूर्ति की कल्पना करे । उसी प्रतिमा में अंगो सहित देवी का आवाहन कर पूजा करे ॥१९-२३॥ साधक उत्तर दिशा में मध्यप्राज्ञा आदि अंगदेवताओं का पूजन कर षट्कोण में मिथुन देवताओं की आराधना करे। ईशान कोण में दंड, कुंडिका, रुद्राक्ष, यज्ञोपवीत तथा अभयास्त्र धारण करनेवाली गायत्री तथा तत्स्वरूप ब्रह्मा की पूजा करके नैर्ऋत्य कोण में शंख, चक्र, गदा, पद्म और पीतवस्त्र धारण करनेवाली सावित्री तथा उसी रूप के विष्णु की पूजा करे । वायुकोण में रुद्राक्षमाला तथा अभयास्त्र धारण करने वाली शुक्लवर्णा सरस्वती एवम् तादृश रुद्र की पूजा कर अग्निकोण में रत्न के घड़े तथा मणि की डाली को हाथों में धारण करनेवाली, पीतवर्णा वाली, दाहिने हाथ से तुन्दिल (बड़े पेट वाले) पति कुबेर का आलिंगन करनेवाली, बायें हाथ में तांबूल धारण करने वाली और धनपति को गोद में बैठने वाली महालक्ष्मी का पूजन करे ॥२४-२९॥ पश्चिम दिशा में बाण, पाश, अंकुश तथा धनुष धारण करने वाले, जपापुष्प के समान रक्तवर्ण वाले और रक्त आभूषण पहनने वाले पति कामदेव की दाहिने हाथ से आलिंगन करने वाली, बायें हाथ में कमल धारण करनेवाली और कांत की गोदी में बैठनेवाली रति की सम्यक् प्रकार से अर्चना करे ॥३०-३१॥ ईशान कोण में अंकुश तथा पाश धारण करने वाले, कमनीय, हाथी के समान शिर वाले, मद्यपूर्ण कपाल धारण करनेवाले, दिगंबर तथा सूंड़ से उत्तम रत्नों के बने मद्यपान पात्र (प्याला) को उठाने वाले, गणेश और सिंदूर के सदृश आकृतिवाली, अत्यन्त मद से विह्वल, एक हाथ में लाल कमल तथा दूसरे हाथ में पताका धारण करनेवाली, प्रियतम का आलिंगन करनेवाली, लाल वर्णवाली एवम् दिगंबर पुष्टि की अर्चना करे। षटकोण की दोनों बगल में कर्णिका पर निधियों का और केसरीं पर अंगों का पूजन करे ॥३२-३५॥ पश्चात् पत्रों पर अनंगकुसुमा, अनंगमेखला, अनंगगमना, अनंगमदनातुरा, भुवनपाला, षष्ठी, शशिखा और गगनलेखा इन आठ शक्तियों की पूजा करें।

७७२ | नारदीयपुराणम् शशिलेखा गगनलेखा चेत्यष्टौ यत्र शक्तयः । खङ्गखेटकधारिण्यः श्यामाः पूज्याश्च मातरः ॥३८॥ पद्माद्बहिः समभ्यर्च्यीः शक्तयः परिचारिकाः । प्रथमानंगद्वयास्यादनंगमदना ततः ॥३६॥ मदनातुरा भुवनवेगा ततो भुवनपालिका । स्यात्सर्वशिशिरानंगवेदनाऽनंगमेखला ॥४०॥ चषकं तालवृंतं च तांबूलं छत्रमुज्ज्वलम् । चामरे चांशुकं पुष्पं बिभ्राणाः करपंकजैः ॥४१॥ सर्वाभरणसंदीप्तान् लोकपालान्बहिर्यजेत् । वज्रादीन्यपि तद्बाह्ये देवीमित्थं प्रपूजयेत् ॥४२॥ मंत्री त्रिमधुरोपेतैर्हुत्वाश्वत्थसमिद्वरैः । ब्राह्मणान्वशयेश्चेत्तीत्रं पार्थिवान्पद्महोमतः ॥४३॥ पलाशपुष्पैस्तत्पत्नीं मन्त्रिणः कुमुदैरपि । पंचविंशतिधा जप्तैर्जलैः स्नानं दिने दिने ॥४४॥ आत्मानमभिषिञ्चेद्यः सर्वसौभाग्यवान्भवेत् । पंचविंशतिधा जप्तं जलं प्रातः पिबेन्नरः ॥४५॥ अवाप्य महतीं प्रज्ञां कवीनामग्रणीर्भवेत् । कर्पूरागरुसंयुक्तं कुंकुमं साधु साधितम् ॥४६॥ गृहीत्वा तिलकं कुर्याद्राजवश्यमनुत्तमम् । शालिपिष्टमयीं कृत्वा पुत्तलीं मधुरान्विताम् ॥४७॥ जप्तां प्रतिष्ठितप्राणां भक्षयेद्रविवासरे । वशं नयति राजानं नारीं वा नरमेव च ॥४८॥ कण्ठमात्नोदके स्थित्वा वीक्ष्य तोयोद्गतं रविम् । त्रिसहस्रं जपेन्मन्त्रं कन्यामिष्टां लभेत्ततः ॥४६॥ अन्नं तन्मंत्रितं मंत्री भुंजित श्रीप्रसिद्धये । लिखितां भस्मना मायां ससाध्यां फलकादिषु ॥५०॥ तत्कालं दर्शयेद्यंत्रं सुखं सूयेत गर्भिणी । भुवनेशीयमाख्याता सहस्रभुजसंभवा ॥५१॥ भुक्तिमुक्तिप्रदा नृणां स्मर्तॄणां द्विजसत्तम । ततः कल्पान्तरे विप्र कदाचिन्महिषासुरः ॥५२॥ फिर ढाल-तलवार धारण करनेवाली और श्यामवर्णवाली माताओं का पूजन करे। तत्पश्चात् करकमलों में चषक (प्याला), तालवृन्त (पंखा), ताम्बूल, उज्ज्वल छत्र, चामर, वस्त्र तथा पुष्प धारण करनेवाली परिचारिका शक्तियों की अर्चना करनी चाहिये । पहली अनंगद्वया, दूसरी अनंगमदना, तीसरी मदनातुरा, चौथी भुवनवेगा, पाँचवीं भुवनपालिका, छठीं सर्वशिशिरा, आठवीं अनंगवेदना और आठवीं अनंगमेखला नामक शक्तियाँ हैं, तदनन्तर समस्त आभूषणों से अलंकृत लोकपाल एवम् उनके वज्र आदि का पूजन करे ॥३६-४२॥ इस प्रकार देवी का पूजन करके त्रिमधुयुक्त पीपल की समिधा से हवन करने वाला साधक ब्राह्मणों को वश में करता है। कमल से हवन करनेवाला राजाओं को, पलाश के पुष्पों से हवन करने वाला राजपनियों को और कुमुद से होम करने वाला मन्त्रियों को वश में करता है। जो प्रतिदिन पच्चीस बार इस मन्त्र से जल को अभिमन्त्रित करके स्नान करता है, उसे अखिल सौभाग्य की प्राप्ति होती है। जो नर पचीस बार जल को अभिजप्त करके प्रातःकाल पान करता है वह महती प्रज्ञा को प्राप्त कर कवियों में सर्वश्रेष्ठ होता है। अच्छी तरह अभिमन्त्रित कर्पूर, अगर तथा कुंकुम का तिलक लगाने वाला व्यक्ति राजा को वश में करता है ॥४३-४६३॥ मधुयुक्त चावल को पीस कर गुड़िया बनाये और इस मन्त्र से उसकी प्राणप्रतिष्ठा करके रवि दिन उसका भक्षण करे। ऐसा करने से राजा-नारी या नर-वशीभूत होते हैं। कंठ प्रमाण जल में खड़े होकर जल से निकलते हुए सूर्य को देखकर तीन हजार मन्त्र के जप करने से अभीष्ट कन्या (पत्नी) का लाभ होता है। साधक श्री प्राप्ति के लिये अभिमन्त्रित अन्न का भक्षण करे। तख्ते आदि पर भस्म से लिखी देवी की प्रतिमा को दिखा देने से गर्भिणी स्त्री तत्काल सुख से प्रसव करती है। द्विजश्रेष्ठ ! ये देवी भुवनेशी कहलाती हैं। ये सहस्र भुजावाली तथा अपने भक्तों को भुक्ति-मुक्ति देने वाली हैं। विप्र ! दूसरे कल्प में किसी समय महिषासुर नामक दैत्यपति समस्त लोकपालों को जीत कर तीनों लोक का उपभोग करने लगा। तब उससे

चतुरशीतितमोऽध्यायः ७७३ बभूव लोकपालांस्तु जित्वा भुंक्ते जगत्त्रयम् । ततस्तत्पीडिता देवा वैकुंठं शरणं ययुः ॥५३॥ ततो देवी महालक्ष्मीश्चक्राद्यंगोत्थतेजसा । श्रीर्बभूव मुनिश्रेष्ठ मूर्ता व्याप्तजगत्त्रया ॥५४॥ स्वयं सा महिषादींस्तु निहत्य जगदीश्वरी । अरविंदवनं प्राप्ता भजतामिष्टदायिनी ॥५५॥ तस्याः समर्धनं वक्ष्ये संक्षेपेण शृणु द्विज । मृत्युक्रोधेन गुरुणा बिंदुभूषितमस्तका ॥५६॥ बीजमन्त्रः श्रियः प्रोक्तो भजतामिष्टदायकः । ऋषिर्भृगुर्निवृच्छंदो देवता श्रीः समीरिंता ॥५७॥ षड्दीर्घयुक्तबीजेन कुर्यादंगानि षट् क्रमात् । ततो ध्यायेज्जगद्देयां श्रियं संपत्तिदायिनीम् ॥५८॥ कांचनाभां गजैः श्वेतैश्चतुर्भिः स्वकरोद्धृतैः । हिरण्मया मृतघटैः सिच्यमानां सरोजगाम् ॥५९॥ वराभयाब्जस्रग्घस्तां क्षौमवस्त्रां किरीटिनीम् । सिद्धलक्षं जपेन्मन्त्रं तत्सहस्रं हुनेत्तथा ॥६०॥ सुगंधकुसुमैरिष्ट्वा कमलैर्मधुरप्लुतैः । महालक्ष्मुदिते पीठे मूर्तिं मूलेन कल्पयेत् ॥६१॥ यजेत्पूर्व्वददंगानि दिग्दलेष्वर्चयेत्ततः । वासुदेवं संकर्षणं प्रद्युम्नमनिरुद्धकम् ॥६२॥ हिमपीततमालेंद्रनोलाभांन्पीतवाससः । शंखचक्रगदापद्मधारीन्रस्तांश्चतुर्भुजान् ॥६३॥ विदिगंतेषु पत्रेषु दभ्रकादीन्यजेद्गजान् । दमकं पुण्डरीकं च गुग्गुलं च कुरंटकम् ॥६४॥ यजेच्छंखनिधिं देव्यां दक्षिणे प्रमदान्वितम् । मुक्तामाणिक्यसंकाशौ किंचित्स्मितमुखांबुजौ ॥६५॥ अन्योन्यालिंगनपरी शंखापंकजधारिणौ । विगलद्रत्नवर्ष्याभ्यां शंखाभ्यां मूर्ध्नि लांछितौ ॥६६॥ तुंदिलं कंबुकनिधिं वसुधारां घनस्तनीम् । वामतः पंकजविधिं प्रियया सहितं यजेत् ॥६७॥ पीड़ित देवगण विष्णु को शरण में गये ॥४७-५३॥ मुनिश्रेष्ठ ! वहां सब देवताओं के तेज से सांगोपांग महालक्ष्मी का आविर्भाव हुआ, जिनके तेज से तीनों जगत् व्याप्त हो गये । वे जगदीश्वरी देवी स्वयं महिषासुर आदि को निहत कर कमलवन में चली गईं । वे भक्तों की कामना पूरी करती हैं। मैं संक्षेप से उनका पूजन बतला देता हूँ, सुनो ! मृत्यु, क्रोध, गुरु एवम् बिंदु से भूषित मस्तक वाला अक्षर महालक्ष्मी का बीजमन्त्र है, जो साधकों के लिये इष्टदायक है। इस मन्त्र के ऋषि भृगु हैं, छंद निवृत् है और देवता श्री हैं ॥५४-५७॥ छह दीर्घ अक्षरों से युक्त बीजमन्त्र से क्रमशः षडंगन्यास करे । तदनन्तर विश्वविख्यात एवम् संपत्तिदायिनी लक्ष्मी का ध्यान करे । 'लक्ष्मी कमलों पर बैठी हैं, उनके हाथों में अभयास्त्र तथा पद्ममाला है, रेशमी वस्त्र पहने हुई हैं, मुकुट सुशोभित हो रहा है और सुवर्ण के समान कान्तिवाले चार श्वेत गज स्वर्णमय अमृतघटों को अपनी सूड़ों से उठाकर उनके ऊपर अमृत वर्षण कर रहे हैं।' तत्पश्चात् आठ लाख मन्त्र का जप करके उतने हजार सुगंधित पुष्पों तथा मधुरमिश्रित कमलों से होम करे । फिर महालक्ष्मी के नाम से प्रसिद्ध पीठ पर मूलमन्त्र से मूर्ति की कल्पना करके पहिले की तरह अंगों का पूजन करे ॥५८-६२॥ चारों दिशाओं में हिम, पीत, तमाल, इन्द्र और नील वर्ण वाले, पीताम्बर, शंख-चक्र-गदा-पद्मधारी तथा चतुर्भुज वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न एवम् अनिरुद्ध की पूजा करे । दिशाओं के कोनों में दमक, पुण्डरीक, गुग्गुल तथा कुरंट नामक गजों की अर्चना करे । देवी के दक्षिण भाग में पत्नी सहित शंखनिधि की आराधना करे । उन दोनों का वर्ण मुक्ता और मणि के समान है, मुखारविन्द किंचित हास्य से युक्त है, दोनों परस्परालिंगन में आसक्त हैं, शंख और कमल धारण किये हुए हैं, दोनों के मस्तक पर उत्तम रत्नों की वर्षा करने वाले शंखों का चिह्न विराजमान है। शंख निधि तुन्दिल हैं। और उनकी पत्नी (वसुधारा) पीनस्तनी है। देवी के वाम भाग में प्रिया सहित पंकजविधि की अर्चना करे

यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण देवनागरी पाठ पंक्ति-दर-पंक्ति (लाइन मार्कर्स सहित) प्रस्तुत है:

७७४ नारदीयपुराणम् सिन्दूराभौ भुजश्लिष्टौ रक्तपद्मोत्पलान्वितौ । निःसरद्रत्नवर्षाभ्यां पद्माभ्यां मूर्ध्नि लांछितौ ॥६८॥ तुन्दिलं पंकजविधिं तत्त्वां वसुमतीमपि । दलाग्रेषु यजेदेता बलाकाद्याः समंततः ॥६९॥ बलाकी विमला चैव कमला वनमालिका । विभीषिका मालिका च शांकरी वसुमालिका ॥७०॥ पंकजद्वयधारिण्यो मुक्ताहारसमप्रभाः । लोकेशान्पूजयेदंते वज्राद्यस्त्राणि तद्बहिः ॥७१॥ इत्थं यो भजते देवी' विधिना साधकोत्तमः । धनधान्यसमृद्धः स्याच्छ्रियमाप्नोत्यनिंदिताम् ॥७२॥ वक्षःप्रमाणसलिले स्थित्वा मन्त्रमिमं जपेत् । त्रिलक्षमर्कगं ध्यायन्स भवेत्कमलालयः ॥७३॥ विष्णोगेहस्यबिल्वस्य मूले लक्षत्रयं जपेत् । साधको यः स लभते वांछितं धनसंचयम् ॥७४॥ अशोकवह्रावाज्याक्तैस्तंडुलैर्वशयेज्जगत् । होमेन खादिरे वह्नौ तंडुलैर्मधुरोक्षितैः ॥७५॥ राजा वश्यो भवेच्छीघ्रं महालक्ष्मीश्च वर्द्धते । बिल्वच्छायामधिंवसन्बिल्वमिश्रहविष्यभुक् ॥७६॥ संवत्सरत्रयं हुत्वा तत्फलैरथवांबुजैः । साधकेंदो महालक्ष्मीं चक्षुषा पश्यति ध्रुवम् ॥७७॥ अथ कल्पांतरे ब्रह्म देवराजविलुंपकौ । जातौ शुंभनिशुंभौ द्वावसुरौ लोककंटकौ ॥७८॥ ततो भ्रष्टाधिकारैस्तु शक्राद्यैः संस्तुता भुने । महासरस्वती देवी तदा चावततार ह ॥७९॥ हिमालये महापुण्ये शैलोद्देशेऽतिशोभने । ततः शुंभादिकान्हत्वा दैवतैः परिपूजिता ॥८०॥ वरं दत्त्वाविशद्देवी मानसं नाम वै सरः । तस्या मंत्रं प्रवक्ष्यामि शृणुष्वावहितो मुने ॥८१॥ ज्ञानामृता शशधरा क्रांतमालोपशोभिता । वाग्बीजं तेन चांगानि कल्पयेत्साधकोत्तमः ॥८२॥

॥६३-६७॥ उनकी आभा सिंदूर के समान हैं, दोनों परस्पर बाँहें मिलाये हुए हैं, हाथों में रक्तकमल शोभाय- मान हैं, मस्तक पर रत्न-वर्षण करने वाले पद्मों का लांछन है, पंकजनिधि तुन्दिल हैं और उनकी पत्नी धनवती है। पत्रों के ऊपर शंखनिधि आदि देवों की चारों ओर दो-दो कमल धारण करनेवाली तथा मुक्ताहार के समान प्रभा वाली, बलाकी, विमला, कमला, वनमालिका, विभीषिका, मालिका, शांकरी, तथा वसुमालिका की पूजा करनी चाहिये। अन्त में लोकपाल तथा उनके वज्र आदि अस्त्रों का पूजन करे। जो साधक श्रेष्ठ इस प्रकार विधि से देवी की आराधना करता है, वह धन-धान्य से परिपूर्ण होता है तथा अनिन्द्य लक्ष्मी को प्राप्त करता है। ॥६८-७३॥ छाती भर जल में स्थित होकर जो सूर्य का ध्यान करते हुए तीन लाख मन्त्र का जप करता है, वह महालक्ष्मीवान् होता है। जो साधक विष्णुमन्दिरस्थ बिल्ववृक्ष के मूल में तीन लाख मन्त्र का जप करता है, वह वांछित धन को प्राप्त करता है। अशोक की समिधा से प्रज्वलित की गई अग्नि में जो घृतमिश्रित चावल से होम करता है वह जगत् को वश में करता है, जो खैर के अग्नि में मधुरमिश्रित चावल से होम करता है वह राजा को शीघ्र वशीभूत कर लेता है और उसे अत्यन्त श्री की प्राप्ति होती है। जो साधक बिल्ववृक्ष की छाया में तीन वर्षों तक वास करता है तथा बिल्वमिश्रित हविष्य भक्षण करते हुए बिल्वफलों से या कमलों से हवन करता है, वह निश्चय ही महालक्ष्मी को आँखों से देखता है ॥७४-७७॥ ब्रह्मन् ! कल्पान्तर में इन्द्र के लूटनेवाले शुम्भ और निशुम्भ नामक दो जनतापकारक असुर हुए। मुने ! उसके द्वारा अपने-अपने अधिकार से वंचित किये गये शक्र आदि देवों ने महासरस्वती की स्तुति की। प्रसन्न होकर देवी ने हिमालय के महापवित्र तथा अति रमणीय शिखर पर अवतार ग्रहण किया। देवताओं ने उनकी अर्चना की। उन्होंने शुम्भ आदि को निहत कर देवों को वरदान देकर मानस सरोवर में प्रवेश किया। मुने ! मैं उनका मंत्र बता रहा हूँ, तुम सावधान होकर सुनो। "ज्ञानामृता' ..... 'वाग्" यह बीज मंत्र है,

चतुरशीतितमोऽध्यायः ७७५ ऋषिः सदाशिवश्चास्य छंदोऽनुष्टुबुदाहृतम् । देवता वाक्समाख्याता भजतामिष्टदायिनी ॥८३॥ श्वेतांबरां विसश्वेतां वीणापुस्तकधारिणीम् । दिव्यैराभरणैर्युक्तां ध्यायेद्देवीं निरंतरम् ॥८४॥ महासरस्वतीपीठे मूर्तिं मूलेन कल्पयेत् । देवीं संपुजयेत्तस्यामंगाद्यावरणैः सह ॥८५॥ आदावंगावृतिः पश्चादंबिकाद्यास्तमेरिताः । द्वितीया मातृभिः प्रोक्ता तृतीयाप्यष्टशक्तिभिः ॥८६॥ चतुर्थी पंचमी प्रोक्ता द्वात्रिंशच्छक्तिभिः पुनः । चतुःषष्ट्या स्मृता षष्ठी शक्तिभिर्लोकनायकैः ॥८७॥ सप्तमी पुनरेतेषामस्त्रैः स्यादष्टमावृतिः । एवं पूज्या जगद्धात्री श्रीमती वाग्भवाभिधा ॥८८॥ स्थानेषु पूर्वमुक्तेषु यजेदंगानि साधकः । अम्बिका वाग्भवा दुर्गा श्रीशक्तिश्चोक्तलक्षणा ॥८६॥ ब्रह्माद्याश्च ततः पूज्याः कराली विकराल्युमा । सरस्वती श्रीदुर्गा च लक्ष्मीश्चैव धृतिः स्मृतिः ॥६०॥ श्रद्धा मेधा रतिः कांतिरार्या षोडश शक्तयः । खड्गखेटकधारिण्यः श्यामाः पूज्याः स्वलंकृताः ॥६१॥ विषघ्नी पुष्टयः प्रज्ञा सिनीवाली कुहूः पुनः । रुद्रवीर्या प्रभा नंदा पोषणा बुद्धिदा शुभा ॥६२॥ कालरात्रिमंहारात्रिर्भद्रकाली कपर्दिनी । विकृतिर्दंडिमुण्डिन्यौ संडुखंडा शिखण्डिनी ॥६३॥ निशुम्भशुम्भमथनी चण्डमुण्डविनाशिनी । इन्द्राणी चैव रुद्राणी शंकराद्र्धशरीरिणी ॥६४॥ नारी नारायणी चैव त्रिशूलिन्यपि पालिनी । अम्बिका ह्लादिनी चैव द्वात्रिंशच्छक्तयः सितः ॥६५॥ चक्रहस्ताः पिशाचास्याः संपूज्याश्चारूभूषणाः । पिंगलाक्षी विशालाक्षी समृद्धिर्बुद्धिरैव च ॥६६॥ श्रद्धा स्वाहा स्वधा भिक्षा माया संज्ञा वसुंधरा । त्रिलोकधात्री गायत्री सावित्री त्रिदेशेश्वरी ॥६७॥ सरूपा बहुरूपा च स्कंदमाता श्रुतप्रिया । विमला कमला पश्चादरुणी पुनरारुणी ॥६८॥ प्रकृतिर्विकृतिः सृष्टिः स्थितिः संहृतिरेव च । सन्ध्या माता सती हंसी मर्डिका वज्रिका परा ॥६६॥

उत्तम साधक इसी से अंगों की कल्पना करे ॥७८-८२॥ मन्त्र के ऋषि सदाशिव हैं, छंद अनुष्टुप् है और देवता वाक् हैं, जो भक्तों की कामना पूर्ण करती हैं, साधक श्वेतवस्त्रा, विश्व में सब से शुक्ला, वीणापुस्तकधारिणी और दिव्य आभूषणों से अलंकृता देवो का निरंतर ध्यान करे । महासरस्वती पीठ पर मूलमंत्र से मूर्ति की कल्पना करके उसमें अंग आदि आवरणों के साथ देवी की अर्चना करे । पहिले अंगावृति पश्चात् अंबिका आदि का पूजन करे । फिर मातृवृन्द आठ शक्तियाँ सोलह शक्तियाँ बत्तीस शक्तियाँ, चौंसठ शक्तियाँ, लोकपाल तथा उनके अस्त्र-इन सबकी पूजा करे । इस प्रकार वाग्भवा श्रीमती जगद्धात्री की आराधना करनी चाहिये ॥८३-८८॥ साधक पूर्वोक्त स्थानों में अंगों की अर्चना करने के उपरान्त ब्राह्मी आदि का पूजन कर अम्बिका, वाग्भवी, दुर्गा, उक्तलक्षणा श्रीशक्ति, कराली, विकराली उमा, सरस्वती, श्रीदुर्गा, लक्ष्मी, धृति, स्मृति, श्रद्धा, मेधा, रति, कांति तथा आर्या-इन सोलह शक्तियों की पूजा करे। फिर खड्ग तथा खेटक (अस्त्र विशेष) धारण करने वाली सुमंडित श्यामाओं की अर्चना करे । विषघ्नी, पुष्टि, प्रज्ञा, शिनीवाली, कुहू, रुद्रवीर्या, प्रभा, नंदा, पोषणा, बुद्धिदा, शुभा कालरात्रि, महारात्रि, भद्रकाली, कपर्दिनी, विकृति, दंडिनी, मुंडिनी, संडुखंडा, शिखंडिनी, निशुंभमथनी, चंडमुंडविनाशिनी, इन्द्राणी, रुद्राणी, शंकराघंशरीरिणी, नारी, नारायणी, त्रिशूलिनी, पालिनी, अम्बिका, ह्लादिनी तथा सिता-ये बत्तीस शक्तियाँ हैं । ॥८९-९५॥ चक्रहस्ता, पिशाचास्या चारूभूषणा, पिंगलाक्षी, विशालाक्षी, समृद्धि, बुद्धि, श्रद्धा, स्वहा, स्वधा, भिक्षा, माया, संज्ञा, वसुंधरा, त्रिलोकधात्री, भयत्री, सावित्री त्रिदेशेश्वरी, सरूपा, बहुरूपा, स्कंदमाता, श्रुतप्रिया, विमला, कमला, आरूणी, प्रकृति, विकृति, सृष्टि, स्थिति, संहृति, संध्या माता, सती हंसी, मर्दिका, वज्रिका, देवमाता, भगवती, देवकी, कमलासना, त्रिमुखो, सप्तवदना, सुरासुर-