बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
[Page Header] त्र्यशीतितमोऽध्यायः ७६५
[Sanskrit Text] एवं संपूज्य वाग्देवीं साक्षाद्वाग्वल्लभो भवेत् । ब्रह्मचर्यरतः शुद्धः शुद्धदंतनखादिकः ॥१०३॥ संस्मरन् सर्ववनितात: सततं देवताबिया । कवित्वं लभते धीमान् मासैर्द्वादशभिर्ध्रुवम् ॥१०४॥ पीत्वा तन्मंत्रितं तोयं सहस्रं प्रत्यहं मुने । महाकविर्भवेन्मत्री वत्सरेण न संशयः ॥१०५॥ उरोमात्रोदके स्थित्वा ध्यान्मार्तंडमंडले । स्थितां देवीं प्रतिदिनं त्रिसहस्रं जपेन्मनुम् ॥१०६॥ लभते मंडलात्सिद्धि वाचामप्रतीमां भुवि । पालाशविल्वकुसुमैर्जुहुयान्मधुरोक्षितैः ॥१०७॥ समिद्भिर्वा तदुत्थामिर्यशः प्राप्नोति वाक्पतेः । राजवृक्षसमुद्भूतैः प्रसूनैर्मधुराप्लुतैः ॥१०८॥ तत्समिद्भिश्च जुहुयात्कवित्वमतुलं लभेत् । अथ प्रवक्ष्ये विप्रेन्द्र सावित्रीं ब्रह्मणःप्रियाम् ॥१०८॥ यां समाराध्य ससृजे ब्रह्मा लोकाँश्चराचरान् । लक्ष्मो माया कामपूर्वा सावित्री ङेसन्मन्विता ॥११०॥ स्वाहांतो मनुराख्यातः सावित्र्या वसुवर्णवान् । ऋषिर्ब्रह्मास्य गायत्री छंदः प्रोक्तं च देवता ॥१११॥ सावित्रीं सर्वदेवानां सावित्री परिकीर्तिता । हृदंतिकैर्ब्रह्म विष्णुद्देश्वरसदाशिवैः ॥११२॥ सर्वात्मना च ङेयुक्तै रंगानां कल्पनं मतम् । तप्तकांचनवर्णाभां ज्वलन्तीं ब्रह्मतेजसा ॥११३॥ ग्रीष्ममध्याह्न मार्तंड सहस्रसमविग्रहाम् । ईषद्व्रास्यप्रसन्नास्यां रत्नभूषणभूषिताम् ॥११४॥ वह्निशुद्धांशुकाधानां भक्तानुग्रहकातराम् । सुखदां मुक्तिदां चैव सर्वसंपत्प्रदां शिवाम् ॥११५॥ वेदबीजस्वरूपां च ध्यायेद्वेदप्रसूं सतीम् । ध्यात्वैवं मण्डले विद्वान् त्रिकोणोज्ज्वलकर्णिके ॥११६॥
[Hindi Translation] इस प्रकार वाग्देवी की आराधना करनेवाला व्यक्ति साक्षात् वाचस्पति होता है। जो बुद्धिमान् मानव बारह मास तक दांत, नाखून आदि को पवित्र रखते हुए ब्रह्मचर्य एवम् शुचिता से रहता है और सकल महिलाओं को देवीबुद्धया देखता है, वह कवित्वशक्ति को निश्चित ही प्राप्त करता है। मुने ! जो व्यक्ति प्रत्येक दिन सरस्वती के मन्त्र से सहस्र बार जल को अभिमन्त्रित कर पान करता है, वह एक वर्ष के भीतर महाकवि हो जाता है, इसमें संशय नहीं । जो छातीभर जल में खड़ा होकर सूर्यमंडल में अवस्थित देवी का ध्यान करते हुए प्रतिदिन तीन हजार मंत्र का जप किया करता है, वह पृथ्वी पर अद्वितीय वाक्सिद्धि को प्राप्त करता है। जो मधुर मिश्रित पलाश एवम् बिल्व के पुष्पों से या समिधाओं से होम करता है वह वाक्पति के समान यशस्वी होता है ॥१०३-१०७॥ मधुरमिश्रित राजवृक्ष (सोन्दाल) के पुष्प तथा समिधा से हवन करनेवाला व्यक्ति अतुलनीय कवित्व-शक्ति को प्राप्त करता है। विप्रेन्द्र । अब मैं ब्रह्मा की प्रिया सावित्री के बारे में कहूँगा जिनकी आराधना करके चतुरानन ने चराचर जगत् की सृष्टि की। लक्ष्मी, माया, कामपूर्वा 'ङे' युक्त सावित्री तथा स्वाहा को जोड़कर सावित्री का अष्टाक्षर मन्त्र कहा गया है। इस मन्त्र के ऋषि ब्रह्मा है, छंद गायत्री है और देवता सावित्री है, जो समस्त देवों की उत्पादयित्री कही जाती है। सर्वतोभावेन 'ङे' से युक्त ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर तथा सदाशिव द्वारा हृदय में अंगों की कल्पना करनी चाहिए ॥१०८-११२॥ तदनन्तर विद्वान् व्यक्ति तप्त सुवर्ण के समान वर्णच्छटा वाली ब्रह्मतेज से जाज्वल्यमान ग्रीष्मऋतु के मध्याह्नकालीन सहस्र सूर्यों के समान शरीरवाली, किंचित् हास्य तथा प्रसन्नता से युक्त मुख वाली, रत्न के आभूषणों से भूषित, वह्नि के समान शुद्ध वस्त्रों से सुसज्जित, भक्तों के ऊपर अनुग्रह करने के लिये आतुर, सुख, मोक्ष तथा निखिल संप- त्तियों को देने वाली, कल्याणमयी, वेद की बीजस्वरूप, वेदजननी तथा सती सावित्री का ध्यान करे ॥११३- ११५३॥ फिर त्रिकोण तथा उजले कनेल से युक्त सौर पीठ पर दीप्ता आदि नौ शक्तियों के साथ सावित्री देवी का पूजन करे । मूल मंत्र से आवाहन कर देवी की प्रतिमा की पूजा करनी चाहिए। पश्चात् तीन कोणों में
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७६६ नारदीयपुराणम् सौरे पीठे यजेद्देवीं दीप्तादिनवशक्तिभिः । मूलमंत्रेण क्लृप्तायां मूतौ देवीं प्रपूजयेत् ॥११७॥ कोणेषु त्रिषु संपूज्या ब्राह्म्याद्याः शक्तयो बहिः । आदित्याद्यास्ततः पूज्या उषादिसहिताः क्रमात् ॥११८॥ ततः षडंगान्यभ्यर्च्य केसरेषु यथाविधि । प्रह्लादिनीं प्रभां पश्चान्नित्यां विश्वंभरां पुनः ॥११९॥ विलासिनीप्रभावत्यौ जयां शांतां यजेत्पुनः । कांति दुर्गासरस्वत्यौ विद्यारूपां ततः परम् ॥१२०॥ विशालसंज्ञितामीशां व्यापिनीं विमलां यजेत् । तमोपहारिणीं सूक्ष्मां विश्वयोनि जयावहाम् ॥१२१॥ पद्मालयां परां शोभां ब्रह्म रूपां ततोऽर्चयेत् । ब्राह्म्याद्याः शारणा बाह्ये पूजयेत्प्रोक्तलक्षणाः ॥१२२॥ ततोऽभ्यर्चद् ग्रहान्बाह्ये शक्राद्यानायुधैः सह । इत्थमावरणैर्देवीः दशभिः परिपूजयेत् ॥१२३॥ अष्टलक्षं जपेन्मंत्रं तत्सहस्रं हुनेत्तिलैः । सर्वपापविनिर्मुक्तो दीर्घमायुः स विंदति ॥१२४॥ अहणाब्जैस्त्रिमध्वक्तैर्जुहुयादयुतं ततः । महालक्ष्मीर्भवेत्तस्य षण्मासान्नात्र संशयः ॥१२५॥ ब्रह्मवृक्षप्रसूनैस्तु जुहुयाद्ब्रह्मतेजसे । बहुना किमिहोक्तेन यथावत्साधिता सती ॥१२६॥ साधकानामिदं विद्या भवेत्कामदुघा मुने । अथ ते संप्रवक्ष्यामि रहस्यं परमाद्भुतम् ॥१२७॥ सावित्रीपंजरं नाम सर्वरक्षाकरं नृणाम् । व्योमकेशालकासक्तां सुकिरीटविराजिताम् ॥१२८॥ मेघभ्रू कुटिलाक्रांतां विधिविष्णुशिवाननाम् । गुरुभार्गवकर्णा तां सोमसूर्याग्निलोचनाम् ॥१२९॥ इडापिंगलिकासूक्ष्मावायुनासापुटान्विताम् । संध्याद्विजोष्ठपुटितां लसद्वागुपजिव्हिकाम् ॥१३०॥ संध्यासूर्यमणिग्रीवां मरुद्वाहसमन्वितान् । पर्जन्यहृदयासक्तां वस्वाख्यप्रतिमंडलाम् ॥१३१॥ आकाशोदरविश्रांतां नाभ्यवांतरवीथिकाम् । प्रजापत्याख्यजघनां कटींद्राणीसमाश्रिताम् ॥१३२॥ ऊर्वोर्मलयमेरुभ्यां शोभमानां सरिद्वराम् । सुजानुजह्वू कुशिकां वैश्वदेवाह्वयसंज्ञिकाम् ॥१३३॥ ब्राह्मी आदि शक्तियों की अर्चना कर उषा आदि सहित आदित्य आदि देवों का क्रमशः पूजन करे। तदनन्तर छह अंगों की पूजा कर नागकेसर पुष्पों के ऊपर प्रह्लादिनी, प्रभा, नित्या, विश्वंभरा, विलासिनी, प्रभावती, जया, शान्ता, कांति, दुर्गा, सरस्वती, विद्यारूपा, विशाला, ईशा, व्यापिनी, विमला, तमोपहारिणी, सूक्ष्मा, विश्वयोनि जयावहा, पद्मालया, परा शोभा, ब्रह्मरूपा और शारणा का पूजन करे ॥११६-१२२॥ तत्पश्चात् ग्रहों और आयुधों सहित इन्द्र आदि देवताओं की आराधना करे। इस प्रकार दश आवरणों से देवियों की पूजा करे। आठ लाख मंत्र का जप करे और उतने ही हजार तिल से हवन करे। ऐसा करनेवाला व्यक्ति समस्त पापों से मुक्त होकर दीर्घायु होता है। तदनन्तर मधु मिलाकर तीन लाल कमलों से होम करना चाहिए। ऐसा करने से वह छह मास के भीतर ही महाधनवान् हो जाता है, इसमें संशय नहीं। ब्रह्मतेज के लिए ब्रह्मवृक्ष के पुष्पों से हवन करना चाहिए। मुने ! अधिक क्या कहूँ। विधिपूर्वक देवी की आराधना करने से साधक को कामधेनु की तरह विद्या- रूपिणी देवी सबकुछ प्रदान करती हैं ॥१२३-१२८॥ अब मैं मनुष्यों की सब तरह से रक्षा करने वाले सावित्री- पंजर नामक अत्यन्त अद्भुत रहस्य को बतलाता हूँ। साधक भगवती के इस रूप का ध्यान करे कि, आकाश उनका केश पाश है, वे सुन्दर मुकुट से शोभायमान हो रही हैं, मेघ उनकी कुटिल भ्रूकुटि है, ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव उनके मुख हैं, वृहस्पति एवम् शुक्र उनके कान हैं, सूर्य, चन्द्रमा तथा अग्नि उनके नेत्र हैं, इड़ा और पिंगला उनके नासिकापुट है, संध्या अधर एवम् ओष्ठ है, जिह्वा पर वाणी विराजमान रहती है, संध्या-कालीन सूर्य उनकी मणिग्रीवा है, वायु बाहें है, बादल हृदय है, वसुगण मंडल है, आकाश उदर है, नाभि के ऊपर रोमावलि रमणीय है, प्रजापति उनका जघन है, इंद्राणी कमर है, मलयाचल एवम् सुमेरु पर्वत उनके ऊरु हैं, वे बहुत कम- नीय हैं, सरिताओं में श्रेष्ठ है, जाह्नवी एवम् कौशिकी उनके घुटने हैं, वैश्वदेवी उनकी संज्ञा है, पृथ्वी, पर्वत तथा
त्र्यशीतितमोऽध्यायः ७६७ पादांघ्रिनखलोमाद्यभूनाद्रुम लक्षिताम् । ग्रहराश्यर्क्षयोगादिमूर्तावयवसंज्ञिकाम् ॥१३४॥ तिथिमासतुं पक्षाद्यैः संकेतनिमिषात्मिकाम् । मायाकल्पितवैचित्र्यसंध्याद्यच्छदनावृताम् ॥१३५॥ ज्वलत्कालानलप्रख्यां तडित्कोटिसमप्रभाम् । कोटिसूर्यप्रतीकाशां शशिकोटिसुशीतलाम् ॥१३६॥ सुधामंडलमध्यस्थां सांद्रानंदामृतात्मिकाम् । वागतीतां मनोऽगम्यां वरदां वेदमातरम् ॥१३७॥ चराचरमयीं नित्यां ब्रह्माक्षरसमन्विताम् । ध्यात्वा स्वात्मविभेदेन सावित्रीपंजरं न्यसेत् ॥१३८॥ पञ्जरस्य ऋषिः सोऽहं छंदो विकृतिरुच्यते । देवता च परो हंसः परब्रह्मादिदेवता ॥१३८॥ धर्मार्थकाममोक्षाप्त्यै विनियोग उदाहृतः । षडंगदेवतामन्त्रैरंगन्यासं समाचरेत् ॥१४०॥ विधामूलेन मेधावी व्यापकं हि समाचरेत् । पूर्वोक्तां देवतां ध्यायेत्साकारां गुणसंयुताम् ॥१४१॥ त्रिपदा हरिजा पूर्वमुखी ब्रह्मास्त्रसंज्ञिका । चतुर्विंशतितत्त्वाढ्या पातु प्राचीं दिशं मम ॥१४२॥ चतुष्पदा ब्रह्मदंडा ब्रह्माणी दक्षिणानना । षड्विंशतत्तत्त्वसंयुक्ता पातु मे दक्षिणां दिशम् ॥१४३॥ प्रत्यङ्मुखी पञ्चपदी पञ्चाशत्तत्त्वरूपिणी । पातु प्रतीचीमनिशं मम ब्रह्मशिरोंकिता ॥१४४॥ सौम्यासborder ब्रह्मा तुर्याढ्या साथर्वांगिरसात्मिका । उदीचीं षट्पदा पातु षष्टितत्त्वकलात्मिका ॥१४५॥ पञ्चाशद्वर्णरचिता नवपादा शताक्षरी । व्योमा संपातु मे वोर्ध्वं शिरो वेदांतसंस्थिता ॥१४६॥ विद्युन्निभा ब्रह्मसन्ध्या मृगारूढा चतुर्भुजा । चापेषुचर्मासिधरा पातु मे पावकीं दिशम् ॥१४७॥ ब्राह्मी कुमारी गायत्री रक्तांगी हंसवाहिनी । बिभ्रत्कमण्डलु चाक्षं स्रुवस्त्रुवौ पातु नैर्ऋतिम् ॥१४८॥
वृक्ष उनके चरण, नख एवम् लोम हैं, ग्रह, राशि, नक्षत्र तथा योग उनके अवयव हैं ॥१२६-१३४॥ तिथि, मास, ऋतु, पक्ष, क्षण और निमेष से वे युक्त हैं, अपनी माया से वे अनेक विचित्रताओं की कल्पना करती हैं, संध्या- रूपो आवरण से उनका शरीर ढंका हुआ है, जाज्वल्यमान कालाग्नि की तरह उनके शरीर में तेज विद्यमान है कोटि विद्युल्लताओं के समान उनकी कान्ति है । कोटि सूर्य के समान उनका स्वरूप हैं, कोटि चंद्रमा के तुल्य वे शीतल हैं, सुधामंडल के मध्य में वे रहती हैं, पूर्ण आनन्दरूपी अमृत का पान करती हैं, वाणी से परे हैं, मनसा गम्य हैं, वरदायिका एवम् वेदमाता हैं, चराचरमयी हैं, नित्या हैं, उन्हें ब्रह्माक्षर कहते हैं । इस प्रकार अनन्यमन से उनका ध्यान कर सावित्री पंजर (मंत्र) का न्यास करे । पंजर के ऋषि सोहम् है, छंद विकृति है, देवता परमहंस हैं और आदि देवता परब्रह्म हैं ॥१३५-१३८॥ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के लिये इसका विनियोग किया जाता है । षडंगदेवता के मंत्रो से अंगन्यास करे । विद्वान् ब्यक्ति मूलमंत्र से पूजा करे । पूर्वोक्त देवता का ध्यान साकार रूप में करना चाहिए, जो त्रिगुणमयी हो, तीन चरणवालो, विष्णु से उत्पन्न होने वाली, पूरब की ओर मुखवाली, ब्रह्मास्त्र संज्ञा वाली और चौबीस तत्त्वों से सम्पन्न भगवती पूर्व दिशा में मेरी रक्षा करे । चार चरणवाली, ब्रह्मदंड कहलाने वाली, दक्षिण की ओर मुखवाली और छब्बीस तत्त्वों से युक्त ब्रह्माणी दक्षिण दिशा में मेरी रक्षा करे । पांच पद वालो, पश्चिम की ओर मुखवाली, और ब्रह्मशिर धारण करने वाली देवी सदा पश्चिम दिशा में मेरी रक्षा करे ॥१४०-१४४॥ उत्तर की ओर मुख वाली, छह पैर वाली, तुरीय ब्रह्म से युक्त अंगिरस अयवं वेद तथा साठ तत्त्वों से सम्पन्न देवी उत्तर दिशा में मेरी रक्षा करे । पचास वर्णों से निर्मित, नौ चरण एवम् सौ अक्षरों से युक्त तथा वेदान्त निष्ठा ब्योमा देवी मेरे ऊर्ध्व भाग-शिर की रक्षा करे । विद्युत् की तरह आभा वालो, मृग पर आरूढ, चतुर्भुज, धनुष, बाण, कवच तथा खड्ग धारण करने वाली ब्रह्मसंध्या देवी अग्नि कोण में मेरी रक्षा करे । कुमारी, रक्तांगी हंसवाहिनी, कमंडलु
७६८ नारदीयपुराणम्
शुक्लवर्णा च सावित्री युवती वृषवाहना । कपालशूलाक्षस्रग्धारिणी पातु वायवीम् ॥१४८॥ श्यामा सरस्वती वृद्धा वैष्णवी गरुडासना । शंखचक्राभयकरा पातु शैवीं दिशं मम ॥१५०॥ चतुर्भुजा देवमाता गौरांगी सिंहवाहना । वराभयखड्गचर्मभुजा पात्वधरां दिशम् ॥१५१॥ तत्तत्पार्श्वे स्थिताः स्वस्ववाहनायुधभूषणाः । स्वस्वदिक्षु स्थिताः पांतु ग्रहशक्त्यंगसंयुताः ॥१५२॥ मंत्राधिदेवतारूपा मुद्राधिष्ठातृदेवताः । व्यापकत्वेन पांत्वस्मानापादतलमस्तकम् ॥१५३॥ इदं ते कथितं सत्यं सावित्रीपंजरं मया । संध्ययोः प्रत्यहं भक्त्या जपकाले विशेषतः ॥१५४॥ पठनीयं प्रयत्नेन भुक्तिं मुक्तिं समिच्छता । भूतिदा भुवना वाणी महावसुमती मही ॥१५५॥ हिरण्यजननी नन्दा सविसर्गा तपस्विनी । यशस्विनी सती सत्या वेदविच्चिन्मयी शुभा ॥१५६॥ विश्वा तुर्या वरेण्या च निसृणी यमुना भुवा । मोदा देवी वरिष्ठा च धीश्च शांतिमती मही ॥१५७॥ धिषणा योगिनी युक्ता नदी प्रज्ञाप्रचोदनी । दया च यामिनी पद्मा रोहिणी रमणी जया ॥१५८॥ सेनामुखी साममयी बगला दोषवर्जिता । माया प्रज्ञा परा दोग्ध्री मानिनी पोषिणी क्रिया ॥१५९॥ ज्योत्स्ना तीर्थमयी रम्या सौम्यामृतमया तथा । ब्राह्मी हैमी भुजंगी च वशिनी सुंदरी वनी ॥१६०॥ ओंकारहंसिनी सर्वा सुधा सा षड्गुणावती । माया स्वधा रमा तन्वी रिपुघ्नी रक्षणी सती ॥१६१॥ हैमी तारा विधुगतिर्विषघ्नी च वरानना । अमरा तीर्थदा दीक्षा दुर्धर्षा रोगहारिणी ॥१६२॥ नानापापनृशंसघ्नी षट्पदी वज्रिणी रणी । योगिनी विमला सत्या अबला बलदा जया ॥१६३॥ गोमती जाह्नवी रज्वी तपनी जातवेदसा । अचिरा वृष्टिदा ज्ञेया ऋतंतंत्रा ऋतात्मिका ॥१६४॥ सर्वकामदुधा सौम्या भवाहंकारवर्जिता । द्विपदा या चतुष्पदा त्रिपदा या च षट्पदा ॥१६५॥
रुद्राक्षमाला, सुक्र तथा स्रुवा धारण करने वाली ब्राह्मी गायत्री नैर्ऋत्य कोण में मेरी रक्षा करे । शुक्लवर्णा, युवती, वृषवाहना, कपाल, त्रिशूल तथा रुद्राक्ष माला धारण करने वाली सावित्री वायव्य कोण में मेरी रक्षा करे ॥१४५-१४८॥ श्यामा, वृद्धा वैष्णवी, गरुडासना तथा शंख, चक्र एवम् अभयास्त्र धारण करने वाली सरस्वती देवी ईशान कोण में मेरी रक्षा करे । चतुर्भुजा गौरांगी, सिंहवाहना तथा अभयास्त्र, खड्ग एवम् कवच धारण करने वालो देव माता अधर दिशा में मेरी रक्षा करे । उन देवियों की बगल में रहने वाली तत्तत् देवियों, जो अपने अपने वाहन अस्त्र तथा आभूषणों से भूषित एवम् ग्रह, शक्ति और अंगों से युक्त हैं, अपनी अपनी दिशा में मेरी रक्षा करें । मंत्र एवम् मुद्रा की अधिष्ठात्री देवियाँ व्यापक रूप से मेरे मस्तक से लेकर चरण तक की रक्षा करे ॥१५०-१५३॥ इस सत्य सावित्री पंजर को मैंने तुमसे बता दिया । भुक्ति-मुक्ति के इच्छुक व्यक्ति प्रत्येक दिन दोनों संध्या विशेष करके जप काल में इसका पाठ अवश्य करे । भूतिदा, भुवना, वाणी, महावसुमती, मही, हिरण्यजननी, नंदा, सविसर्गा, तपस्विनी, यशस्विनी, सती, सत्या, वेदवित्, चिन्मयी, शुभा, विश्वास, तुर्या, वरेण्या, निसृणी, यमुना, भुवा, मोदा, देवी, वरिष्ठा, धी, शान्ति, मति, मही, धिषणा, योगिनी, नदी, प्रज्ञा, प्रचोदिनी, दया, यामिनी, पद्मा, रोहिणी, रमणी, जया, सेनामुखी, साममयी, बगला, दोषवर्जिता, माया, प्रज्ञा, परा, दोग्धी, मानिनी, पोषिणी, क्रिया, ज्योत्स्ना, तीर्थमयी, रम्या, सौम्या, अमृतमया, ब्राह्मी, हैमी, भुजंगी, वशिनी, सुन्दरी, वनी, ओंकारहंसिनी, सर्वा, सुधा, षड्गुणावती, माया, स्वधा, रमा, तन्वी, रिपुघ्नी, रक्षणी, सती, हैमी, तारा, विधुगति, विषघ्नी वरानना, अमरा, तीर्थदा, दीक्षा, दुर्धर्षा, रोगहारिणी, नानापापनृशंसघ्नी, षट्पदी, वज्रि, रजी, योगिनी, विमला, अबला, सत्या, बलदा, जया, गोमती, जाह्नवी, रज्वी, तपनी, जातवेदसा, अचिरा, वृष्टिदा, ज्ञेया, ऋततंत्रा, ऋतात्मिका, सर्वकामदुधा, सौम्या, भवाहंकारवर्जिता, द्विपदा, चतुष्पदा, त्रिपदा, षट्पदा, अष्टपदी, नवपदी सहस्राक्षा,
चतुरशीतितमोऽध्यायः ७६६ अष्टापदी नवपदी सहस्राक्षरात्मिका। अष्टोत्तरशतं नाम्नां सावित्र्या यः पठेन्नरः ॥१६६॥ स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत् । एतत्ते कथितं विप्र पंचप्रकृतिलक्षणम् ॥१६७॥ मंत्राराधनपूर्वं च विश्वकामप्रपूरणम् ॥१६८॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे पञ्चप्रकृतिमन्त्रादिनिरूपणं नाम त्र्यशीतितमोऽध्यायः ॥८३॥ चतुरशीतितमोऽध्यायः सनत्कुमार उवाच कलिकल्पान्तरे ब्रह्मन् ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः। लोकपद्मे तपस्यस्य सृष्टयर्थं संबभूवतुः ॥१॥ विष्णुकर्णमलोद्भूतावरुरौ मधुकैटभौ। तौ जातमात्रौ पयसि लोकप्रलयलक्षणे ॥२॥ जानुमात्रे स्थितौ दृष्ट्वा ब्रह्माणं कमलस्थितम्। प्रवृत्तावुत्तमालक्ष्य तुष्टाव जगदंबिकाम् ॥३॥ ततो देवी जगत्कर्त्री शर्वी शक्तिरनुत्तमा। नारायणाक्षिसंस्थाना निद्रा प्रीता बभूव ह ॥४॥ तस्या मंत्रादिकं सर्वं कथयिष्यामि तच्छृणु। सारुणा क्रोधनी शांतिश्चंद्रालंकृतशेखरा ॥५॥ एकाक्षरीबीजमन्त्रऋषिः शक्तिरुदाहृता। गायत्री च भवेच्छन्दो देवता भुवनेश्वरी ॥६॥ अक्षरस्वरूपी—ये एक सो आठ नाम सावित्री देवी के कहे गये हैं। जो व्यक्ति इन नामों का पाठ करेगा, वह दीर्घायु सुखी, पुत्री, विजयी तथा विनयी होगा। विप्र ! यह मैं राधिका की पंचप्रकृतिलक्षण सृष्टि बतला दी, इनके मंत्र जप तथा आराधना करने से समस्त कामनायें पूरी होती हैं ॥१५४-१६८॥ श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त तृतीयपाद में पंचप्रकृति और मंत्र आदि निरूपण नामक तिरासीवाँ अध्याय समाप्त ॥८३॥ अध्याय ८४ जप होम की विधि सहित देवी-मंत्र का निरूपण सनत्कुमार बोले- ब्रह्मन् ! कलिकल्प में अव्यक्तजन्मा ब्रह्मा जब सृष्टि के निमित्त लोकपद्म पर तप कर रहे थे तब विष्णु के कर्णमल से मधु और कैटभ नामक दो असुर उत्पन्न हुए, जिनके घुटने तक ही जग- प्रलयकारी जल हुआ था। उत्पन्न होते ही वे कमलस्थित ब्रह्मा को देख कर उन्हें खाने के लिये यत्न करने लगे। तब चतुरानन ने जगदंबा की स्तुति की। स्तुति से जगत्कर्त्री, अत्युत्तमा शैवी शक्ति तथा विष्णु के नेत्र पर संस्थान करने वाली निद्रा देवी प्रसन्न हुईं। उनके मंत्र आदि सबकुछ मैं तुमसे बता देता हूँ, सुनो ॥१-४१/२॥ अरुणा, क्रोधनी, शांति, चन्द्रमा से अलंकृत ललाटवाली और एकाक्षरी-यह बीज मंत्र है। इसके ऋषि एवम् शक्ति भी कही गई है। गायत्री इसका छंद है और भुवनेश्वरी देवता है। छह दीर्घ मात्राओं से युक्त ९७—ना० पु०
७७० नारदीयपुराणम् षड्दीर्घयुक्तबीजेन कुर्यादंगानि षट् क्रमात् । संहारसृष्टिमार्गेण मातृकान्यस्तविग्रहः ॥७॥ मन्त्रन्यास ततः कुर्याद्देवताभावसिद्धये । हृल्लेखां मूर्ध्नि वदने गगनां हृदयांबुजे ॥८॥ रक्तां करालिकां गुह्ये महोच्छुष्मा पदद्वये । ऊर्ध्वप्राग्दक्षिमोदीच्यपश्चिमेषूत्तरेऽपि च ॥६॥ सद्यादिह्रस्वबीजायान्यस्तव्या भूतसंप्रभाः । अंगानि विन्यसेत्पश्चाज्जातियुक्तानि षट् क्रमात् ॥१०॥ ब्रह्माणं विन्यसेद्भाले गायत्र्या सह संयुतम् । सावित्र्या सहितं विष्णुं कपोले दक्षिणे न्यसेत् ॥११॥ वागीश्वर्या समायुक्तं वामंगंडं महेश्वरम् । श्रिया धनपतिं न्यस्य वामकर्णाग्रके पुनः ॥१२॥ रत्या स्मरं मुखे न्यस्य पुण्यागणपतिं न्यसेत् । सव्यकर्णोपरि निधाकर्णगंडांतरालयोः ॥१३॥ न्यस्तव्यं वदने मूलं रूपश्चैवांस्ततो न्यसेत् । कण्ठमूले स्तनद्वंद्वे वामांसे हृदयांबुजे ॥१४॥ सव्यांसे पार्श्वयुगले नाभिदेशे च देशिकः । भालांश्च पार्श्वजठरे पार्श्वोऽसावरके हृदि ॥१५॥ ब्रह्माण्याद्यास्तनौ न्यस्य विधिना प्रोक्तलक्षणाः । मूलेन व्यापकं देहे न्यस्य देवीं विचिंतयेत् ॥१६॥ उद्यद्दिवाकरनिभां तुंगरोजां त्रिलोचनाम् । स्मेरास्यामिंदुमुकुटां वरपाशांकुशाभयाम् ॥१७॥ रदलक्षं जपेन्मत्रं त्रिमध्वक्तैर्हुनेत्ततः । अष्टद्रव्यैर्दशांशेन ब्रह्मवृक्षसमिद्भरैः ॥१८॥ द्राक्षाखर्जूरवातामशर्करानालिकेरकम् । तन्दुलाज्यतिलं विप्र द्रव्याष्टकमुदाहृतम् ॥१६॥ दद्यादर्घ्यं दिनेशाय तत्र संचित्य पार्वतीम् । पद्दमष्टदलं बाह्ये वृत्तं षोडशभिद्दलैः ॥२०॥ विलिखेत्कर्णिकामध्ये षट्कोणमतिसुन्दरम् । ततः संपूजयेत्पीठं नवशक्तिसमन्वितम् ॥२१॥ जयाख्या विजया पश्चादजिताह्यापराजिता । नित्या विलासिनी दोग्ध्री त्वघोरा मंगला नव ॥२२॥ बीज मंत्र से क्रमशः षडंगन्यास करना चाहिये । साधक संहार एवम् सृष्टिमार्ग से मातृकान्यास कर देवता की भावसिद्धि के लिये मन्त्रन्यास करे । मस्तक पर हृल्लेखा, मुख में गगना, हृदयकमल में रक्ता, गुह्यप्रदेश में करालिका, चरणद्वय पर महोच्छुष्मा और ऊपर, पूर्व, दक्षिण, पश्चिम एवम् उत्तर में भूत के समान प्रभा वाली सद्या आदि तथा ह्रस्व, बीज आदि का न्यास करे । पश्चात् जातियुक्त छह अंगों का क्रमशः न्यास करना चाहिये ॥५-१०॥ ललाट पर गायत्री सहित ब्रह्मा का और दक्षिण कपोल पर सावित्री सहित विष्णु का न्यास करना चाहिये । वाम कपोल पर वागीश्वरी सहित महेश्वर का और वामकर्ण के अग्रभाग में लक्ष्मी सहित कुबेर का न्यास करे । मुख में रति सहित कन्दर्प का और बायें कान पर पुण्यासहित गणपति का न्यास करे ॥११-१२१/२॥ कान तथा तथा कपोल के मध्य में निधा का और वदन में मूलमन्त्र का न्यास करे । तदनन्तर कण्ठमूल, स्तनद्वय, वामस्कन्ध, दक्षिणस्कन्ध, हृदयकमल, पाश्र्वयुगल तथा नाभिदेश में चैत्रों का न्यास कर उदर, स्कन्ध तथा हृदय के एक देश में भालों का न्यास करे । फिर स्तन पर उक्तलक्षणा ब्रह्माणी आदि देवियों का न्यास कर देह में मूलमन्त्र से व्यापक का न्यास करे । तत्पश्चात् उदीयमान दिवाकर के समान तेजवाली, उत्तुंग कुच वाली, तीन नेत्रवाली, किंचित् हास्य-युक्त मुख वाली, चन्द्रमुकुट वाली, उत्तम पाश, अंकुश तथा अभ- यास्त्र धारण करने वाली देवी का ध्यान कर बत्तीस लाख मन्त्रों का जप करे । फिर त्रिमधु (घी, चीनी और मधु) मिश्रित अष्ट द्रव्य एवम् ब्रह्मवृक्ष की समिधा से उसका दशांश हवन करे ॥१३-१८॥ विप्र ! दाख खजूर, बादाम, शर्करा, नारियल, तन्दुल, घी तथा तिल -ये अष्ट द्रव्य कहलाते हैं । तदनन्तर सूर्य को अर्घ्य प्रदान कर पार्वती का ध्यान करे और कर्णिका के मध्य में अष्टदल, षोडशदल तथा परम सुन्दर षट्कोण का निर्माण करे । फिर नौ शक्तियों के साथ पीठ की पूजा करे । जया, विजया, अजिता, अपराजिता, नित्या,
चतुरशीतितमोऽध्यायः ७७१ बीजाढ्यमासनं दत्त्वा मूर्तिं तेनैव कल्पयेत् । तस्यां संपूजयेद्देवीमावाह्यावरणैः क्रमात् ॥२३॥ मध्यप्राग्द्याम्यसौम्येषु पूजयेदंगदेवताः । षट्कोणेषु यजेन्मन्त्री पश्चान्मिथुनदेवताः ॥२४॥ इन्द्रकोणे लसद्दंडकुण्डिकाक्षगुणामयाम् । गायत्रीं पूजयेन्मन्त्री ब्रह्माणमपि तादृशम् ॥२५॥ रक्षःकोणे शंखचक्रगदापंकजधारिणीम् । सावित्रीं पीतवसनां यजेद्विष्णुं च तादृशम् ॥२६॥ वायुकोणे परश्वक्षमालाभयवरान्विताम् । यजेत्सरस्वतीमच्छां रुद्रं तादृशलक्षणम् ॥२७॥ वह्निकोणे यजेद्रत्नकुम्भं मणिकरंडकम् । कराभ्यां बिभ्रतों पीतां तुन्दिलं धनदायकम् ॥२८॥ आलिंग्य सव्यहस्तेन वामे तांबूलधारिणीम् । धनदांकसमारूढां महालक्ष्मीं प्रपूजयेत् ॥२९॥ पश्चिमे मदनं बाणपाशांकुशशरासनम् । धारयंतं जपारक्तं पूजयेद्रक्तभूषणम् ॥३०॥ सव्येन पतिमाश्लिष्य वामेनोत्पलधारिणीम् । पाणिना रमणांकस्थां रतिं सम्यक्समर्चयेत् ॥३१॥ ऐशान्ये पूजयेत्सम्यक् विघ्नराजं प्रियान्वितम् । सृणिपाशधरं कांतं वरांगासृक्कलांगुलिम् ॥३२॥ माध्वीपूर्णकपालाढ्यं विघ्नराजं दिगंबरम् । पुष्करे विगलद्रत्नस्फुरच्चषकधारिणम् ॥३३॥ सिंदूरसदृशाकारामुद्दाममदविभ्रमाम् । धूतरक्तोत्पलामन्यपाणिना तु ध्वजस्पृशाम् ॥३४॥ आश्लिष्टकांतामरुणां पुष्टिभर्तेद्दिगंबराम् । कर्णिकायां निधी पूज्यौ षट्कोणस्याथ पार्श्वयोः ॥३५॥ अंगानि केसरेष्वेताः पश्चात्पत्रेषु पूजयेत् । अनंगकुसुमा पश्चाद्द्वितीयानंगमेखला ॥३६॥ अनंगगमना तद्वदनंगमदनातुरा । भुवनपाला गगनवेगा षष्ठी चैव ततः परम् ॥३७॥
विलासिनी, दोग्ध्री, अघोरा और मंगला—ये नौ शक्तियां हैं। बीजमन्त्र से उन्हें आसन देकर उसी मन्त्र से मूर्ति की कल्पना करे । उसी प्रतिमा में अंगो सहित देवी का आवाहन कर पूजा करे ॥१९-२३॥ साधक उत्तर दिशा में मध्यप्राज्ञा आदि अंगदेवताओं का पूजन कर षट्कोण में मिथुन देवताओं की आराधना करे। ईशान कोण में दंड, कुंडिका, रुद्राक्ष, यज्ञोपवीत तथा अभयास्त्र धारण करनेवाली गायत्री तथा तत्स्वरूप ब्रह्मा की पूजा करके नैर्ऋत्य कोण में शंख, चक्र, गदा, पद्म और पीतवस्त्र धारण करनेवाली सावित्री तथा उसी रूप के विष्णु की पूजा करे । वायुकोण में रुद्राक्षमाला तथा अभयास्त्र धारण करने वाली शुक्लवर्णा सरस्वती एवम् तादृश रुद्र की पूजा कर अग्निकोण में रत्न के घड़े तथा मणि की डाली को हाथों में धारण करनेवाली, पीतवर्णा वाली, दाहिने हाथ से तुन्दिल (बड़े पेट वाले) पति कुबेर का आलिंगन करनेवाली, बायें हाथ में तांबूल धारण करने वाली और धनपति को गोद में बैठने वाली महालक्ष्मी का पूजन करे ॥२४-२९॥ पश्चिम दिशा में बाण, पाश, अंकुश तथा धनुष धारण करने वाले, जपापुष्प के समान रक्तवर्ण वाले और रक्त आभूषण पहनने वाले पति कामदेव की दाहिने हाथ से आलिंगन करने वाली, बायें हाथ में कमल धारण करनेवाली और कांत की गोदी में बैठनेवाली रति की सम्यक् प्रकार से अर्चना करे ॥३०-३१॥ ईशान कोण में अंकुश तथा पाश धारण करने वाले, कमनीय, हाथी के समान शिर वाले, मद्यपूर्ण कपाल धारण करनेवाले, दिगंबर तथा सूंड़ से उत्तम रत्नों के बने मद्यपान पात्र (प्याला) को उठाने वाले, गणेश और सिंदूर के सदृश आकृतिवाली, अत्यन्त मद से विह्वल, एक हाथ में लाल कमल तथा दूसरे हाथ में पताका धारण करनेवाली, प्रियतम का आलिंगन करनेवाली, लाल वर्णवाली एवम् दिगंबर पुष्टि की अर्चना करे। षटकोण की दोनों बगल में कर्णिका पर निधियों का और केसरीं पर अंगों का पूजन करे ॥३२-३५॥ पश्चात् पत्रों पर अनंगकुसुमा, अनंगमेखला, अनंगगमना, अनंगमदनातुरा, भुवनपाला, षष्ठी, शशिखा और गगनलेखा इन आठ शक्तियों की पूजा करें।
७७२ | नारदीयपुराणम् शशिलेखा गगनलेखा चेत्यष्टौ यत्र शक्तयः । खङ्गखेटकधारिण्यः श्यामाः पूज्याश्च मातरः ॥३८॥ पद्माद्बहिः समभ्यर्च्यीः शक्तयः परिचारिकाः । प्रथमानंगद्वयास्यादनंगमदना ततः ॥३६॥ मदनातुरा भुवनवेगा ततो भुवनपालिका । स्यात्सर्वशिशिरानंगवेदनाऽनंगमेखला ॥४०॥ चषकं तालवृंतं च तांबूलं छत्रमुज्ज्वलम् । चामरे चांशुकं पुष्पं बिभ्राणाः करपंकजैः ॥४१॥ सर्वाभरणसंदीप्तान् लोकपालान्बहिर्यजेत् । वज्रादीन्यपि तद्बाह्ये देवीमित्थं प्रपूजयेत् ॥४२॥ मंत्री त्रिमधुरोपेतैर्हुत्वाश्वत्थसमिद्वरैः । ब्राह्मणान्वशयेश्चेत्तीत्रं पार्थिवान्पद्महोमतः ॥४३॥ पलाशपुष्पैस्तत्पत्नीं मन्त्रिणः कुमुदैरपि । पंचविंशतिधा जप्तैर्जलैः स्नानं दिने दिने ॥४४॥ आत्मानमभिषिञ्चेद्यः सर्वसौभाग्यवान्भवेत् । पंचविंशतिधा जप्तं जलं प्रातः पिबेन्नरः ॥४५॥ अवाप्य महतीं प्रज्ञां कवीनामग्रणीर्भवेत् । कर्पूरागरुसंयुक्तं कुंकुमं साधु साधितम् ॥४६॥ गृहीत्वा तिलकं कुर्याद्राजवश्यमनुत्तमम् । शालिपिष्टमयीं कृत्वा पुत्तलीं मधुरान्विताम् ॥४७॥ जप्तां प्रतिष्ठितप्राणां भक्षयेद्रविवासरे । वशं नयति राजानं नारीं वा नरमेव च ॥४८॥ कण्ठमात्नोदके स्थित्वा वीक्ष्य तोयोद्गतं रविम् । त्रिसहस्रं जपेन्मन्त्रं कन्यामिष्टां लभेत्ततः ॥४६॥ अन्नं तन्मंत्रितं मंत्री भुंजित श्रीप्रसिद्धये । लिखितां भस्मना मायां ससाध्यां फलकादिषु ॥५०॥ तत्कालं दर्शयेद्यंत्रं सुखं सूयेत गर्भिणी । भुवनेशीयमाख्याता सहस्रभुजसंभवा ॥५१॥ भुक्तिमुक्तिप्रदा नृणां स्मर्तॄणां द्विजसत्तम । ततः कल्पान्तरे विप्र कदाचिन्महिषासुरः ॥५२॥ फिर ढाल-तलवार धारण करनेवाली और श्यामवर्णवाली माताओं का पूजन करे। तत्पश्चात् करकमलों में चषक (प्याला), तालवृन्त (पंखा), ताम्बूल, उज्ज्वल छत्र, चामर, वस्त्र तथा पुष्प धारण करनेवाली परिचारिका शक्तियों की अर्चना करनी चाहिये । पहली अनंगद्वया, दूसरी अनंगमदना, तीसरी मदनातुरा, चौथी भुवनवेगा, पाँचवीं भुवनपालिका, छठीं सर्वशिशिरा, आठवीं अनंगवेदना और आठवीं अनंगमेखला नामक शक्तियाँ हैं, तदनन्तर समस्त आभूषणों से अलंकृत लोकपाल एवम् उनके वज्र आदि का पूजन करे ॥३६-४२॥ इस प्रकार देवी का पूजन करके त्रिमधुयुक्त पीपल की समिधा से हवन करने वाला साधक ब्राह्मणों को वश में करता है। कमल से हवन करनेवाला राजाओं को, पलाश के पुष्पों से हवन करने वाला राजपनियों को और कुमुद से होम करने वाला मन्त्रियों को वश में करता है। जो प्रतिदिन पच्चीस बार इस मन्त्र से जल को अभिमन्त्रित करके स्नान करता है, उसे अखिल सौभाग्य की प्राप्ति होती है। जो नर पचीस बार जल को अभिजप्त करके प्रातःकाल पान करता है वह महती प्रज्ञा को प्राप्त कर कवियों में सर्वश्रेष्ठ होता है। अच्छी तरह अभिमन्त्रित कर्पूर, अगर तथा कुंकुम का तिलक लगाने वाला व्यक्ति राजा को वश में करता है ॥४३-४६३॥ मधुयुक्त चावल को पीस कर गुड़िया बनाये और इस मन्त्र से उसकी प्राणप्रतिष्ठा करके रवि दिन उसका भक्षण करे। ऐसा करने से राजा-नारी या नर-वशीभूत होते हैं। कंठ प्रमाण जल में खड़े होकर जल से निकलते हुए सूर्य को देखकर तीन हजार मन्त्र के जप करने से अभीष्ट कन्या (पत्नी) का लाभ होता है। साधक श्री प्राप्ति के लिये अभिमन्त्रित अन्न का भक्षण करे। तख्ते आदि पर भस्म से लिखी देवी की प्रतिमा को दिखा देने से गर्भिणी स्त्री तत्काल सुख से प्रसव करती है। द्विजश्रेष्ठ ! ये देवी भुवनेशी कहलाती हैं। ये सहस्र भुजावाली तथा अपने भक्तों को भुक्ति-मुक्ति देने वाली हैं। विप्र ! दूसरे कल्प में किसी समय महिषासुर नामक दैत्यपति समस्त लोकपालों को जीत कर तीनों लोक का उपभोग करने लगा। तब उससे
चतुरशीतितमोऽध्यायः ७७३ बभूव लोकपालांस्तु जित्वा भुंक्ते जगत्त्रयम् । ततस्तत्पीडिता देवा वैकुंठं शरणं ययुः ॥५३॥ ततो देवी महालक्ष्मीश्चक्राद्यंगोत्थतेजसा । श्रीर्बभूव मुनिश्रेष्ठ मूर्ता व्याप्तजगत्त्रया ॥५४॥ स्वयं सा महिषादींस्तु निहत्य जगदीश्वरी । अरविंदवनं प्राप्ता भजतामिष्टदायिनी ॥५५॥ तस्याः समर्धनं वक्ष्ये संक्षेपेण शृणु द्विज । मृत्युक्रोधेन गुरुणा बिंदुभूषितमस्तका ॥५६॥ बीजमन्त्रः श्रियः प्रोक्तो भजतामिष्टदायकः । ऋषिर्भृगुर्निवृच्छंदो देवता श्रीः समीरिंता ॥५७॥ षड्दीर्घयुक्तबीजेन कुर्यादंगानि षट् क्रमात् । ततो ध्यायेज्जगद्देयां श्रियं संपत्तिदायिनीम् ॥५८॥ कांचनाभां गजैः श्वेतैश्चतुर्भिः स्वकरोद्धृतैः । हिरण्मया मृतघटैः सिच्यमानां सरोजगाम् ॥५९॥ वराभयाब्जस्रग्घस्तां क्षौमवस्त्रां किरीटिनीम् । सिद्धलक्षं जपेन्मन्त्रं तत्सहस्रं हुनेत्तथा ॥६०॥ सुगंधकुसुमैरिष्ट्वा कमलैर्मधुरप्लुतैः । महालक्ष्मुदिते पीठे मूर्तिं मूलेन कल्पयेत् ॥६१॥ यजेत्पूर्व्वददंगानि दिग्दलेष्वर्चयेत्ततः । वासुदेवं संकर्षणं प्रद्युम्नमनिरुद्धकम् ॥६२॥ हिमपीततमालेंद्रनोलाभांन्पीतवाससः । शंखचक्रगदापद्मधारीन्रस्तांश्चतुर्भुजान् ॥६३॥ विदिगंतेषु पत्रेषु दभ्रकादीन्यजेद्गजान् । दमकं पुण्डरीकं च गुग्गुलं च कुरंटकम् ॥६४॥ यजेच्छंखनिधिं देव्यां दक्षिणे प्रमदान्वितम् । मुक्तामाणिक्यसंकाशौ किंचित्स्मितमुखांबुजौ ॥६५॥ अन्योन्यालिंगनपरी शंखापंकजधारिणौ । विगलद्रत्नवर्ष्याभ्यां शंखाभ्यां मूर्ध्नि लांछितौ ॥६६॥ तुंदिलं कंबुकनिधिं वसुधारां घनस्तनीम् । वामतः पंकजविधिं प्रियया सहितं यजेत् ॥६७॥ पीड़ित देवगण विष्णु को शरण में गये ॥४७-५३॥ मुनिश्रेष्ठ ! वहां सब देवताओं के तेज से सांगोपांग महालक्ष्मी का आविर्भाव हुआ, जिनके तेज से तीनों जगत् व्याप्त हो गये । वे जगदीश्वरी देवी स्वयं महिषासुर आदि को निहत कर कमलवन में चली गईं । वे भक्तों की कामना पूरी करती हैं। मैं संक्षेप से उनका पूजन बतला देता हूँ, सुनो ! मृत्यु, क्रोध, गुरु एवम् बिंदु से भूषित मस्तक वाला अक्षर महालक्ष्मी का बीजमन्त्र है, जो साधकों के लिये इष्टदायक है। इस मन्त्र के ऋषि भृगु हैं, छंद निवृत् है और देवता श्री हैं ॥५४-५७॥ छह दीर्घ अक्षरों से युक्त बीजमन्त्र से क्रमशः षडंगन्यास करे । तदनन्तर विश्वविख्यात एवम् संपत्तिदायिनी लक्ष्मी का ध्यान करे । 'लक्ष्मी कमलों पर बैठी हैं, उनके हाथों में अभयास्त्र तथा पद्ममाला है, रेशमी वस्त्र पहने हुई हैं, मुकुट सुशोभित हो रहा है और सुवर्ण के समान कान्तिवाले चार श्वेत गज स्वर्णमय अमृतघटों को अपनी सूड़ों से उठाकर उनके ऊपर अमृत वर्षण कर रहे हैं।' तत्पश्चात् आठ लाख मन्त्र का जप करके उतने हजार सुगंधित पुष्पों तथा मधुरमिश्रित कमलों से होम करे । फिर महालक्ष्मी के नाम से प्रसिद्ध पीठ पर मूलमन्त्र से मूर्ति की कल्पना करके पहिले की तरह अंगों का पूजन करे ॥५८-६२॥ चारों दिशाओं में हिम, पीत, तमाल, इन्द्र और नील वर्ण वाले, पीताम्बर, शंख-चक्र-गदा-पद्मधारी तथा चतुर्भुज वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न एवम् अनिरुद्ध की पूजा करे । दिशाओं के कोनों में दमक, पुण्डरीक, गुग्गुल तथा कुरंट नामक गजों की अर्चना करे । देवी के दक्षिण भाग में पत्नी सहित शंखनिधि की आराधना करे । उन दोनों का वर्ण मुक्ता और मणि के समान है, मुखारविन्द किंचित हास्य से युक्त है, दोनों परस्परालिंगन में आसक्त हैं, शंख और कमल धारण किये हुए हैं, दोनों के मस्तक पर उत्तम रत्नों की वर्षा करने वाले शंखों का चिह्न विराजमान है। शंख निधि तुन्दिल हैं। और उनकी पत्नी (वसुधारा) पीनस्तनी है। देवी के वाम भाग में प्रिया सहित पंकजविधि की अर्चना करे
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७७४ नारदीयपुराणम् सिन्दूराभौ भुजश्लिष्टौ रक्तपद्मोत्पलान्वितौ । निःसरद्रत्नवर्षाभ्यां पद्माभ्यां मूर्ध्नि लांछितौ ॥६८॥ तुन्दिलं पंकजविधिं तत्त्वां वसुमतीमपि । दलाग्रेषु यजेदेता बलाकाद्याः समंततः ॥६९॥ बलाकी विमला चैव कमला वनमालिका । विभीषिका मालिका च शांकरी वसुमालिका ॥७०॥ पंकजद्वयधारिण्यो मुक्ताहारसमप्रभाः । लोकेशान्पूजयेदंते वज्राद्यस्त्राणि तद्बहिः ॥७१॥ इत्थं यो भजते देवी' विधिना साधकोत्तमः । धनधान्यसमृद्धः स्याच्छ्रियमाप्नोत्यनिंदिताम् ॥७२॥ वक्षःप्रमाणसलिले स्थित्वा मन्त्रमिमं जपेत् । त्रिलक्षमर्कगं ध्यायन्स भवेत्कमलालयः ॥७३॥ विष्णोगेहस्यबिल्वस्य मूले लक्षत्रयं जपेत् । साधको यः स लभते वांछितं धनसंचयम् ॥७४॥ अशोकवह्रावाज्याक्तैस्तंडुलैर्वशयेज्जगत् । होमेन खादिरे वह्नौ तंडुलैर्मधुरोक्षितैः ॥७५॥ राजा वश्यो भवेच्छीघ्रं महालक्ष्मीश्च वर्द्धते । बिल्वच्छायामधिंवसन्बिल्वमिश्रहविष्यभुक् ॥७६॥ संवत्सरत्रयं हुत्वा तत्फलैरथवांबुजैः । साधकेंदो महालक्ष्मीं चक्षुषा पश्यति ध्रुवम् ॥७७॥ अथ कल्पांतरे ब्रह्म देवराजविलुंपकौ । जातौ शुंभनिशुंभौ द्वावसुरौ लोककंटकौ ॥७८॥ ततो भ्रष्टाधिकारैस्तु शक्राद्यैः संस्तुता भुने । महासरस्वती देवी तदा चावततार ह ॥७९॥ हिमालये महापुण्ये शैलोद्देशेऽतिशोभने । ततः शुंभादिकान्हत्वा दैवतैः परिपूजिता ॥८०॥ वरं दत्त्वाविशद्देवी मानसं नाम वै सरः । तस्या मंत्रं प्रवक्ष्यामि शृणुष्वावहितो मुने ॥८१॥ ज्ञानामृता शशधरा क्रांतमालोपशोभिता । वाग्बीजं तेन चांगानि कल्पयेत्साधकोत्तमः ॥८२॥
॥६३-६७॥ उनकी आभा सिंदूर के समान हैं, दोनों परस्पर बाँहें मिलाये हुए हैं, हाथों में रक्तकमल शोभाय- मान हैं, मस्तक पर रत्न-वर्षण करने वाले पद्मों का लांछन है, पंकजनिधि तुन्दिल हैं और उनकी पत्नी धनवती है। पत्रों के ऊपर शंखनिधि आदि देवों की चारों ओर दो-दो कमल धारण करनेवाली तथा मुक्ताहार के समान प्रभा वाली, बलाकी, विमला, कमला, वनमालिका, विभीषिका, मालिका, शांकरी, तथा वसुमालिका की पूजा करनी चाहिये। अन्त में लोकपाल तथा उनके वज्र आदि अस्त्रों का पूजन करे। जो साधक श्रेष्ठ इस प्रकार विधि से देवी की आराधना करता है, वह धन-धान्य से परिपूर्ण होता है तथा अनिन्द्य लक्ष्मी को प्राप्त करता है। ॥६८-७३॥ छाती भर जल में स्थित होकर जो सूर्य का ध्यान करते हुए तीन लाख मन्त्र का जप करता है, वह महालक्ष्मीवान् होता है। जो साधक विष्णुमन्दिरस्थ बिल्ववृक्ष के मूल में तीन लाख मन्त्र का जप करता है, वह वांछित धन को प्राप्त करता है। अशोक की समिधा से प्रज्वलित की गई अग्नि में जो घृतमिश्रित चावल से होम करता है वह जगत् को वश में करता है, जो खैर के अग्नि में मधुरमिश्रित चावल से होम करता है वह राजा को शीघ्र वशीभूत कर लेता है और उसे अत्यन्त श्री की प्राप्ति होती है। जो साधक बिल्ववृक्ष की छाया में तीन वर्षों तक वास करता है तथा बिल्वमिश्रित हविष्य भक्षण करते हुए बिल्वफलों से या कमलों से हवन करता है, वह निश्चय ही महालक्ष्मी को आँखों से देखता है ॥७४-७७॥ ब्रह्मन् ! कल्पान्तर में इन्द्र के लूटनेवाले शुम्भ और निशुम्भ नामक दो जनतापकारक असुर हुए। मुने ! उसके द्वारा अपने-अपने अधिकार से वंचित किये गये शक्र आदि देवों ने महासरस्वती की स्तुति की। प्रसन्न होकर देवी ने हिमालय के महापवित्र तथा अति रमणीय शिखर पर अवतार ग्रहण किया। देवताओं ने उनकी अर्चना की। उन्होंने शुम्भ आदि को निहत कर देवों को वरदान देकर मानस सरोवर में प्रवेश किया। मुने ! मैं उनका मंत्र बता रहा हूँ, तुम सावधान होकर सुनो। "ज्ञानामृता' ..... 'वाग्" यह बीज मंत्र है,
चतुरशीतितमोऽध्यायः ७७५ ऋषिः सदाशिवश्चास्य छंदोऽनुष्टुबुदाहृतम् । देवता वाक्समाख्याता भजतामिष्टदायिनी ॥८३॥ श्वेतांबरां विसश्वेतां वीणापुस्तकधारिणीम् । दिव्यैराभरणैर्युक्तां ध्यायेद्देवीं निरंतरम् ॥८४॥ महासरस्वतीपीठे मूर्तिं मूलेन कल्पयेत् । देवीं संपुजयेत्तस्यामंगाद्यावरणैः सह ॥८५॥ आदावंगावृतिः पश्चादंबिकाद्यास्तमेरिताः । द्वितीया मातृभिः प्रोक्ता तृतीयाप्यष्टशक्तिभिः ॥८६॥ चतुर्थी पंचमी प्रोक्ता द्वात्रिंशच्छक्तिभिः पुनः । चतुःषष्ट्या स्मृता षष्ठी शक्तिभिर्लोकनायकैः ॥८७॥ सप्तमी पुनरेतेषामस्त्रैः स्यादष्टमावृतिः । एवं पूज्या जगद्धात्री श्रीमती वाग्भवाभिधा ॥८८॥ स्थानेषु पूर्वमुक्तेषु यजेदंगानि साधकः । अम्बिका वाग्भवा दुर्गा श्रीशक्तिश्चोक्तलक्षणा ॥८६॥ ब्रह्माद्याश्च ततः पूज्याः कराली विकराल्युमा । सरस्वती श्रीदुर्गा च लक्ष्मीश्चैव धृतिः स्मृतिः ॥६०॥ श्रद्धा मेधा रतिः कांतिरार्या षोडश शक्तयः । खड्गखेटकधारिण्यः श्यामाः पूज्याः स्वलंकृताः ॥६१॥ विषघ्नी पुष्टयः प्रज्ञा सिनीवाली कुहूः पुनः । रुद्रवीर्या प्रभा नंदा पोषणा बुद्धिदा शुभा ॥६२॥ कालरात्रिमंहारात्रिर्भद्रकाली कपर्दिनी । विकृतिर्दंडिमुण्डिन्यौ संडुखंडा शिखण्डिनी ॥६३॥ निशुम्भशुम्भमथनी चण्डमुण्डविनाशिनी । इन्द्राणी चैव रुद्राणी शंकराद्र्धशरीरिणी ॥६४॥ नारी नारायणी चैव त्रिशूलिन्यपि पालिनी । अम्बिका ह्लादिनी चैव द्वात्रिंशच्छक्तयः सितः ॥६५॥ चक्रहस्ताः पिशाचास्याः संपूज्याश्चारूभूषणाः । पिंगलाक्षी विशालाक्षी समृद्धिर्बुद्धिरैव च ॥६६॥ श्रद्धा स्वाहा स्वधा भिक्षा माया संज्ञा वसुंधरा । त्रिलोकधात्री गायत्री सावित्री त्रिदेशेश्वरी ॥६७॥ सरूपा बहुरूपा च स्कंदमाता श्रुतप्रिया । विमला कमला पश्चादरुणी पुनरारुणी ॥६८॥ प्रकृतिर्विकृतिः सृष्टिः स्थितिः संहृतिरेव च । सन्ध्या माता सती हंसी मर्डिका वज्रिका परा ॥६६॥
उत्तम साधक इसी से अंगों की कल्पना करे ॥७८-८२॥ मन्त्र के ऋषि सदाशिव हैं, छंद अनुष्टुप् है और देवता वाक् हैं, जो भक्तों की कामना पूर्ण करती हैं, साधक श्वेतवस्त्रा, विश्व में सब से शुक्ला, वीणापुस्तकधारिणी और दिव्य आभूषणों से अलंकृता देवो का निरंतर ध्यान करे । महासरस्वती पीठ पर मूलमंत्र से मूर्ति की कल्पना करके उसमें अंग आदि आवरणों के साथ देवी की अर्चना करे । पहिले अंगावृति पश्चात् अंबिका आदि का पूजन करे । फिर मातृवृन्द आठ शक्तियाँ सोलह शक्तियाँ बत्तीस शक्तियाँ, चौंसठ शक्तियाँ, लोकपाल तथा उनके अस्त्र-इन सबकी पूजा करे । इस प्रकार वाग्भवा श्रीमती जगद्धात्री की आराधना करनी चाहिये ॥८३-८८॥ साधक पूर्वोक्त स्थानों में अंगों की अर्चना करने के उपरान्त ब्राह्मी आदि का पूजन कर अम्बिका, वाग्भवी, दुर्गा, उक्तलक्षणा श्रीशक्ति, कराली, विकराली उमा, सरस्वती, श्रीदुर्गा, लक्ष्मी, धृति, स्मृति, श्रद्धा, मेधा, रति, कांति तथा आर्या-इन सोलह शक्तियों की पूजा करे। फिर खड्ग तथा खेटक (अस्त्र विशेष) धारण करने वाली सुमंडित श्यामाओं की अर्चना करे । विषघ्नी, पुष्टि, प्रज्ञा, शिनीवाली, कुहू, रुद्रवीर्या, प्रभा, नंदा, पोषणा, बुद्धिदा, शुभा कालरात्रि, महारात्रि, भद्रकाली, कपर्दिनी, विकृति, दंडिनी, मुंडिनी, संडुखंडा, शिखंडिनी, निशुंभमथनी, चंडमुंडविनाशिनी, इन्द्राणी, रुद्राणी, शंकराघंशरीरिणी, नारी, नारायणी, त्रिशूलिनी, पालिनी, अम्बिका, ह्लादिनी तथा सिता-ये बत्तीस शक्तियाँ हैं । ॥८९-९५॥ चक्रहस्ता, पिशाचास्या चारूभूषणा, पिंगलाक्षी, विशालाक्षी, समृद्धि, बुद्धि, श्रद्धा, स्वहा, स्वधा, भिक्षा, माया, संज्ञा, वसुंधरा, त्रिलोकधात्री, भयत्री, सावित्री त्रिदेशेश्वरी, सरूपा, बहुरूपा, स्कंदमाता, श्रुतप्रिया, विमला, कमला, आरूणी, प्रकृति, विकृति, सृष्टि, स्थिति, संहृति, संध्या माता, सती हंसी, मर्दिका, वज्रिका, देवमाता, भगवती, देवकी, कमलासना, त्रिमुखो, सप्तवदना, सुरासुर-
७७५ नारदीयपुराणम् देवमाता भगवती देवकी कमलासना । त्रिमुखीं सप्तवदना सुरासुरविमर्दिनी ॥१००॥ लंबोष्ठी चोर्ध्वकेशी च बहुशिश्ना वृकोदरी । रथरेखाह्वया पश्चाच्छशिरेखा तथापरा ॥१०१॥ गगनवेगा पवनवेगा वेगा च तदनंतरम् । ततो भुवनपालाख्या ततः स्यान्मदनातुरा ॥१०२॥ अनंगानंगवदना तथैवानंगमेखला । अनंगकुसुमा विश्वरूपा सुरभयंकरी ॥१०३॥ अक्षोभ्या सप्तवाहिन्या वज्ररूपा शुचिव्रता । वरदाऽथाय वागीशी चतुःषष्टिसमीरिताः ॥१०४॥ चापबाणधराः सर्वा ज्वालाजिह्वा महाप्रभाः । दंष्ट्रिण्यश्चोर्ध्वकेश्यस्ता युद्धोत्कांतमानसाः ॥१०५॥ सर्वाभरणसंदीप्ता पूजनीयाः प्रयत्नतः । लोकपाः पूर्ववत्पूज्यास्तद्ध्वजादिकास्त्वपि ॥१०६॥ जपेत्षोडशलक्षं च तद्दशांशं हुनेत्सुधीः । आज्येन खादिरे वह्नौ ततः सिद्धो भवेन्मनुः ॥१०७॥ कमलैरयुतं हुत्वा राजानं वशमानयेत् । उत्पलैर्जुह्वतो नूनं महालक्ष्मीः प्रजायते ॥१०८॥ पलाशकुसुमैर्हुत्वा वत्सरेण कविर्भवेत् । राजीलवणहोमेन वनितां वशमानयेत् ॥१०६॥ भूमौ भोगांस्तु भुक्त्वाते विष्णुलोकमवाप्नुयात् । वाणीबीजजपाद्यत्तो नात्र कार्या विचारणा ॥११०॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे देवीमंत्रनिरूपणं नाम चतुरशीतितमोऽध्यायः ॥८४॥
बिमर्दिनी, लंबोष्ठी, ऊर्ध्वकेशी, बहुशिश्ना, वृकोदरी, रथरेखा, शशिरंखा, गगनवेगा, पवनवेगा, वेगा, भुवनपाला, मदनातुरा, अनंगा, अनंगवदना, अनंगमेखला, अनंगकुसुमा, विश्वरूपा, सुरभयंकरी, अक्षोभ्या, सप्तवाहिनी, वज्ररूपा, शुचिव्रता, वरदा और वागीशी-ये चौंसठ शक्तियाँ हैं ॥६६-१०४॥ ये सब धनुष एवम् बाण धारण करने वाली, जाज्वल्यमान जिह्वा वाली, महाकान्ति वाली, दंष्ट्रिणी, ऊर्ध्वकेशी, युद्धाभिलाषिणी तथा सब प्रकार के आभूषणों से भूषिता हैं। इनकी यत्नपूर्वक पूजा करनी चाहिये। पहिले की तरह लोकपाल तथा उनके वज्र आदि का भी पूजन करे। विद्वान् व्यक्ति सोलह लाख मंत्र का जप करके उसका दशांश खैर के अग्नि में घी से हवन करे ! इससे मंत्र की सिद्धि होती है। कमलों से दश हजार हवन करने से राजा वश में आते हैं। रक्तकमलों से हवन करने वाला व्यक्ति महालक्ष्मी को प्राप्त करता है। एक वर्ष तक पलाश पुष्प से होम करने वाला कवि होता है। राई और नमक से हवन करने वाला व्यक्ति वनिता को वशीभूत करता है। सरस्वती के बीज मंत्र का जप करने वाला पृथ्वी पर भोगों को भोगकर अन्त में विष्णुलोक को प्राप्त करता है, इसमें संशय नहीं ॥१०५-११०॥ श्री नारदीय पुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त तृतीयपाद में देवीमन्त्रनिरूपण नामक चौरासीवां अध्याय समाप्त ॥८४॥
पञ्चाशीतितमोऽध्यायः सनत्कुमार उवाच वाग्देवतावतारोऽन्यः कालिकेति प्रकीर्तिता । तस्या मन्त्रं प्रवक्ष्यामि भुक्तिमुक्तिप्रदं नृणाम् ॥१॥ सृष्टिक्रियान्विता शांतिर्बिंद्वाढ्या च त्रिधा पुनः । अरुणाख्यादीपिका च बिंदुयुक्ता द्विधा ततः ॥२॥ मायाद्वयं ततः पश्चाद्दक्षिणे कालिके पदम् । पुनश्च सप्तबीजानि स्वाहांतोऽयं मनूत्तमः ॥३॥ भैरवोऽस्य ऋषिश्छन्द उष्णिक्काली तु देवता । बीजं मायादीर्घवत्सं शक्तिरुक्ता मुनीश्वर ॥४॥ षड्दीर्घाढ्येन बीजेन विद्याया अंगमीरितम् । मातृकार्णान्वश दश हृदये भुजयोः पदोः ॥५॥ विन्यस्य व्यापकं कुर्यान्मूलमंत्रेण साधकः । शिरः कृपाणमभयं वरं हस्तैश्च बिभ्रतीम् ॥६॥ मुंडस्रङ्मस्तकां मुक्तकेशां पितृवनस्थिताम् । सर्वालंकृतवर्णां च श्यामांगीं कालिकां स्मरेत् ॥७॥ एवं ध्यात्वा जपेल्लक्षं जुहुयादयुतं ततः । प्रसूनैः करवीरोत्थैः पूजायन्त्रमथोच्यते ॥८॥ विलिख्य पूर्वं षट्कोणं त्रिकोणत्रितयं ततः । पद्ममष्टदलं बाह्ये भूपुरं तत्र पूजयेत् ॥६॥ जया च विजया चापि अजिता चापराजिता । नित्या विलासिनी वापि दोग्ध्यघोरा च मंगला ॥१०॥ पीठस्य शक्तयो मायात्मनेहृत्पीठमंत्रकः । शिवरूपशवस्थां च शिवाभिर्दिक्षु वेष्टिताम् ॥११॥ महाकालरतासक्तां ध्यात्वांगान्यर्चयेत्पुरा । कालीं कपालिनीं कुल्लां कुरुकुल्लां विरोधिनीम् ॥१२॥ अध्याय ८५ वाग्देवता की अवतार-काली आदि के मन्त्रों का निरूपण सनत्कुमार बोले- वाग्देवता का दूसरा अवतार कालिकारूप में हुआ है । अब मैं मानवों के लिये मुक्ति- मुक्ति प्रदान करने वाले कालिका-मन्त्र के विषय में कहूँगा । सृष्टि क्रिया से युक्त, शान्ति, विद्यापूर्ण, अरुणाक्षी, आदीविका, बिंदुयुक्ता, माया, दक्षिण कालिका, सात बीज और अन्त में स्वाहा-ये उत्तम मन्त्र हैं। इसके ऋषि भैरव, छंद उष्णिक् और देवता काली हैं । मुनीश्वर ! माया इसका बीज है और दीर्घवत्सं शक्ति है । बीज सहित छः दीर्घ विद्या के अंग कहलाते हैं ।॥१-४।। साधक मातृक (अकारादि ४९ अक्षर) वर्णों में से दश-दश को हृदय, भुजा और चरणों में न्यस्त करके मूलमन्त्र से व्यापक' न्यास करे । तत्पश्चात् शिर, कृपाण तथा अभयास्त्र को हाथों में धारण करनेवाली, मुण्डमाला को मस्तक पर पहनने वाली, बिखरे केश वाली, श्मशान में रहने वाली, समस्त अलंकारों से विभूषित तथा श्यामांगी कालिका का ध्यान करे। ध्यानोत्तर एक लाख मन्त्र का जप करे और दश हजार करवीर के पुष्पों से हवन करे । अब पूजायंत्र के बारे में कहता हूँ। पहले षट्कोण को लिख कर तीन त्रिकोण का निर्माण करे । तदनन्तर अष्टदल कमल को लिखकर उस पर भूपुर की पूजा करे । जया, विजया, अजिता, अपराजिता, नित्या, विलासिनी, दोग्धी, अघोरा और मंगला-ये पीठ शक्तियाँ हैं। "मायात्मने... "-यह हृत्पीठ का मन्त्र है ॥५-१०३॥ पहिले शिवरूपा, शवस्था, चारों ओर शृगालियों से वेष्टिता, महाकालनिरता तथा आसक्ता काली का ध्यान करके अंगों की अर्चना करे । षट्कोण में काली, कपालिनी, कुल्ला, कुरुकुल्ला, विरोधिनी १. तन्त्रप्रसिद्ध सर्वाङ्ग सम्बन्धी न्यास । १८ ना० पु०
७७८ नारदीयपुराणम् विप्रचित्तां च षट्कोणे नवकोणे ततोऽर्चयेत् । उग्रामुष्णप्रभां दीप्तां नीलाधानां बलाकिताम् ॥१३॥ मात्रां मुद्रां तथा मित्रां पूज्याः पत्रेषु मातरः । पद्मस्यास्य सुयत्नेन ब्राह्मी नारायणीत्यपि ॥१४॥ माहेश्वरी च चामुण्डा कौमारी चापराजिता । वाराही नारसिंही च पुनरेतास्तु नूपुरे ॥१५॥ भैरवीं महदाद्यां तां सिंहाद्यां धूम्रपूर्वकाम् । भीमोन्मत्तादिकां चापि वशीकरणभैरवीम् ॥१६॥ मोहनाद्यां समाराध्य शक्रादीन्वायुधान्यपि । एवमाराधिता काली सिद्धा भवति मन्त्रिणाम् ॥१७॥ ततः प्रयोगान्कुर्वीत महाभैरवभाषितान् । आत्मनो वा परस्यार्थं क्षिप्रसिद्धिप्रदायकान् ॥१८॥ स्त्रीणां प्रहारं निंदां च कौटिल्यं वाप्रीयं वचः । आत्मनो हितमन्विच्छन् कालीभक्तो विवर्जयेत् ॥१९॥ सुदृशो मदनावासं पश्यन्द्यः प्रजपेन्मनुम् । अयुतं सोऽचिरादेव वाक्पतेः समतामियात् ॥२०॥ दिगम्बरो मुक्तकेशः श्मशानस्थोऽधियामिनि । जपेद्योऽयुतमेतस्य भवेयुः सर्वसिद्धयः ॥२१॥ शवस्य हृदये स्थित्वा निर्वासाः प्रेतभूमिगः । अर्कपुष्पसहस्रेणाभ्यक्तेन स्वीयरेतसा ॥२२॥ देवीं यः पूजयेद्भक्त्या जपन्नेकैकशो मनुम् । सोऽचिरेणैव कालेन धरणीप्रभुतां व्रजेत् ॥२३॥ रजःकीर्ण भगं नार्या ध्यायन्त्यो ह्युयुतं जपेत् । स कवित्वेन रम्येण जनान्मोहयति ध्रुवम् ॥२४॥ त्रिपञ्चारे महापीठे शिवस्य हृदि संस्थिताम् । महाकालेन देवेन मारयुद्धं प्रकुर्वतीम् ॥२५॥ तां ध्यायन्स्मेरवदनां विदधत्सुरतं स्वयम् । जपेत्सहस्रमपि यः स शंकरसमो भवेत् ॥२६॥ अस्थिलोमत्वचायुक्तं मांसं मार्जारमेषयोः । उष्ट्रस्य महिषस्यापि बलिं यस्तु समर्पयेत् ॥२७॥ भूताष्टम्योर्मध्यरात्रे वश्याः स्युस्तस्य जन्तवः । विद्यालक्ष्मीयशःपुत्रैः स चिरं सुखमेधते ॥२८॥ और विप्रचित्ता का पूजन कर नवकोण में पत्रों के ऊपर उग्रा, उष्णप्रभा, दीप्ता, नीलाधाना, बलाकिता, मात्रा, मुद्रा, मित्रा तथा माताओं की पूजा करे । पुनः अष्टदल कमल पर यत्नपूर्वक ब्राह्मी, नारायणी, माहेश्वरी, चामुण्डा, कौमारी, अपराजिता, वाराही तथा नारसिंही का पूजन करे । भैरवी, महदाद्या, सिंहाद्या, धूम्रपूर्विका, भीमा, उन्मत्ता, उर्दिका, वशीकरण भैरवी तथा मोहनाद्या की आराधना करके इन्द्र आदि देवगण एवम् उनके अस्त्रों की पूजा करनी चाहिये । इस तरह काली की आराधना करने से ये साधकों को सिद्ध हो जाती हैं ॥११-१७॥ अपने लिये या दूसरे के लिये महाभैरव द्वारा प्रतिपादित शीघ्र सिद्धि दायक मन्त्रों का प्रयोग करे । कल्याण के इच्छुक काली के भक्तों को चाहिये कि वह स्त्रियों के ऊपर प्रहार, उनकी निंदा, तथा उनके साथ वंचना एवम् कटु भाषण न करे । जो नर सुन्दरी के मदनावास (भग) की ओर ताकते हुए दस हजार मन्त्र का जप करता है, वह शीघ्र ही बृहस्पति तुल्य हो जाता है । जो व्यक्ति अर्धरात्रि के समय श्मशान में बालों को बिखेर कर नग्न होकर इस मन्त्र का दश हजार जप करता है, उसे सकल सिद्धियों की प्राप्ति होती है । जो नर श्मशान में नग्न होकर शव की छाती पर बैठ कर हजार आक के पुष्पों में अपना वीर्य मिलाकर उनसे भक्ति-पूर्वक देवी का पूजन करता है तथा प्रति पुष्प चढ़ाने में मन्त्र का जप करता है, वह थोड़े ही समय में पृथ्वी का प्रभु हो जाता है ॥१८-२३॥ जो नर नारी के रजःपूर्ण भग का ध्यान करते हुए दश हजार मन्त्र का जप करता है, वह निश्चय ही अपनी रमणीय कविता से जनता को मुग्ध करता है । जो व्यक्ति त्रिपञ्चार नामक महापीठ में शिव की छाती पर अवस्थित तथा महाकाल देव (शंकर) के साथ रतिसंग्राम करती हुई स्मेर वदना देवा का ध्यान करके स्वयं रतिक्रीड़ा करते हुए एक हजार भी मन्त्र का जप करता है, वह शंकर की समता को प्राप्त करता है ॥२४-२६॥ जो कृष्ण पक्ष की अष्टमी की मध्यरात्रि में बिलाड़, भेड़, ऊँट तथा महिष के अस्थि लोम एवम् त्वचा से युक्त मांस की बलि समर्पण करता है, उसके वश में समस्त प्राणी हो जाते हैं और वह विद्या, लक्ष्मी, यश तथा पुत्रों
७७६ पञ्चाशीतितमोऽध्यायः यो हविष्याशनरतो दिवा देवीं स्मरन् जपेत् । नक्तं निधुवनासक्तो लक्षं स स्याद्धरापतिः ॥२६॥ रक्तांभोजैर्हुनेन्मन्त्री धनैर्जयति वित्तपम् । बिल्वपत्रैर्भवेद्राज्यं रक्तपुष्पैर्वशीकृतिः ॥३०॥ असृजा महिषादीनां कालिकां यस्तु तर्पयेत् । तस्य स्युरचिरादेव करस्थाः सर्वसिद्धयः ॥३१॥ यो लक्षं प्रजपेन्मन्त्रं शवमारुह्य मन्त्रवित् । तस्य सिद्धो मनुः सद्यः सर्वेप्सितफलप्रदः ॥३२॥ तेनाश्वमेधप्रमुखैर्यागैरिष्टं सुजन्मना । दत्तं दानं तपस्तप्तं उपास्ते यस्तु कालिकाम् ॥३३॥ ब्रह्मा विष्णुः शिवो गौरी लक्ष्मीर्गणपती रविः । पूजिताः सकला देवा यः कालीं पूजयेत्सदा ॥३४॥ अथापरः सरस्वत्या ह्यवतारो निगद्यते । यां निषेव्य नरा लोके कृतार्थाः स्युर्न संशयः ॥३५॥ आप्यायिनी चन्द्रयुक्ता माया च वदनांतरे । सकामिका क्रुधा शांतिश्चन्द्रांलंकृतमस्तका ॥३६॥ दीपिका सासना चन्द्रयुगस्त्रं मनुरीरितः । मुनिरक्षोभ्य उद्दिष्टश्छन्दस्तु बृहती मतम् ॥३७॥ ताराख्या देवता बीजं द्वितीयञ्च चतुर्थकम् । शक्तिः षड्दीर्घयुक्तेन द्वितीयेनांगकल्पनम् ॥३८॥ षोढा न्यासं ततः कुर्यात्तारायाः सर्वसिद्धिदम् । श्रीकण्ठादोन्यसेद्रुद्रान्मातृकावर्णपूर्वकान् ॥३६॥ मातृकोक्तस्थले माया तृतीयक्रोधपूर्वकान् । चतुर्थीनमसायुक्तान्प्रथमो न्यास ईरितः ॥४०॥ शवपीठसमासीनां नीलकांतिं त्रिलोचनाम् । अर्द्धन्दुशेखरां नानाभूषणाढयां स्मरन्न्यसेत् ॥४१॥ द्वितीये तु ग्रहन्यासं कुर्यात्तां समनुस्मरन् । त्रिबीजस्वरपूर्वं तु रवत्सूर्य हृदि न्यसेत् ॥४२॥ को प्राप्त कर चिरकाल तक सुखोपभोग करता है। जो हविष्यभोजी होकर दिन में देवी का स्मरण करते हुए एक लाख मन्त्र का जप करता है और रात्रि में रतिक्रीड़ा में आसक्त रहता है, वह महीपति होता है। रक्त- कमल से हवन करनेवाला साधक धन में कुबेर को जीत लेता है। बिल्वपत्रों से हवन करने वालों को राज्य की प्राप्ति होती है। रक्तपुष्पों से होम करनेवाला वशीकरणसिद्धि को प्राप्त करता है ॥२७-३०॥ जो व्यक्ति महिष आदि के शोणित से कालिका को तृप्त करता है उसे सकल सिद्धियां प्राप्त हो जाती हैं। जो मन्त्रवेत्ता शव पर आरूढ़ होकर लाख बार मन्त्र का जप करता है, वह तुरन्त अभीष्ट फलदायक मन्त्र को सिद्ध कर लेता है। जो सुजन्मा व्यक्ति कालिका की उपासना करता है, वह मानो अश्वमेध आदि यज्ञ, दान तथा तप करता है। जो सदा काली का पूजन करता हो, वह मानो ब्रह्मा, विष्णु, महेश, गौरी, लक्ष्मी, गणेश तथा सूर्य आदि सकल देवों की पूजा करता है ॥३१-३४॥ इसके उपरान्त मैं सरस्वती के दूसरे अवतार का वर्णन करता हूँ, जिनकी आराधना करके मनुष्य कृतार्थ हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं। आप्यायिनी, चन्द्रयुक्ता, वदनान्तरवर्तिनी, माया, सकामिका, क्रुधा, शान्ति, चन्द्रमा से अलंकृत मस्तकवाली, दीपिका, सासना, और चन्द्रयुक्त अस्त्र (खड्ग) - यह उनका मन्त्र है। इस मन्त्र के ऋषि अक्षोभ्य हैं, छंद बृहती है और देवता तारा हैं। द्वितीय अक्षर बीज है और चतुर्थ अक्षर शक्ति है। छः दीर्घों से युक्त द्वितीय अक्षर से अंगों को कल्पना करे। तत्पश्चात् अखिल सिद्धिदायक तारा के षडंगन्यास करे। मातृका वर्ण पुरस्सर श्रीकंठ आदि रुद्रों का न्यास करके मातृकोक्त स्थल में तृतीय क्रोधपूर्वक माया का न्यास करे। तदनन्तर शव के पीठ पर आसीन नीलकांति, त्रिलोचना, विविध आभूषणों से भूषिता तथा ललाट पर अर्धचन्द्र को धारण करनेवाली देवी का ध्यान करके न्यास करना चाहिये, इसे प्रथम न्यास कहते हैं, पुनः उन्हीं का स्मरण करते हुए ग्रहों का न्यास करे। इसे द्वितीय न्यास कहते हैं॥३५-४१॥ तीन बीजस्वर के साथ रक्त सूर्यं का हृदय में न्यास करे। पवर्ग पूर्वक शुक्ल चन्द्र का दोनों भौंहों पर न्यास करे। कवर्ग पूर्वक रक्त मंगल का
७८० नारदीयपुराणम्
तथा षवर्गपूर्वं तु शुक्लं सोमं भ्रुवोर्द्वये । कवर्गपूर्वं रक्ताभं मंगलं लोचनत्रयम् ॥४३॥ चवर्गाद्यं बुधं श्यामं न्यसेद्वक्षःस्थले बुधः । तवर्गाद्यं पीतवर्णं कण्ठकूपे बृहस्पतिम् ॥४४॥ तवर्गाद्यं श्वेतवर्णं घटिकायां तु भार्गवम् । नीलवर्णं पवर्गार्थं नाभिदेशे शनैश्चरम् ॥४५॥ शवर्गार्थं धूम्रवर्णं ध्यात्वा राहुं मुखे न्यसेत् । त्रिबीजपूर्वकश्चैवं ग्रह्न्यासः समीरितः ॥४६॥ तृतीयं लोकपालानां न्यासं कुर्यात्प्रयत्नतः । मायादिवीजत्रितयं पूर्वकं सर्वसिद्धये ॥४७॥ स्वमस्तके ललाटादि विश्वत्रष्टस्वधउर्ध्वतः । ह्रस्वदीर्घकादिकाष्टवर्गपूर्वान्दिशाधिपान् ॥४८॥ शिवशक्त्यभिधे न्यासं चतुर्थे तु समाचरेत् । त्रिबीजपूर्वकान्न्यस्येत्षट् शिवाञ्छक्तिसंयुतान् ॥४९॥ आधारादिषु चक्रेषु स्वचक्रवर्णपूर्वकम् । ब्रह्माणं डाकिनोयुक्तं वादिसान्तांर्णपूर्वकम् ॥५०॥ मूलाधारे विन्यसेच्च चतुर्दलसमन्वितम् । श्रीविष्णुं राकिणीयुक्तत्वादिलांतार्णपूर्वकम् ॥५१॥ स्वाधिष्ठानाभिधे चक्रे लिंगस्थे षड्दले न्यसेत् । रुद्रं तु डाकिनीयुक्तं दादिकांतांणपूर्वकम् ॥५२॥ चक्रे दशदले न्यस्येन्नाभिस्थे मणिपूरके । ईश्वरं कादिठान्तार्णपूर्वकं शाकिनीयुतम् ॥५३॥ विन्यसेद्द्वादशदले हृदयस्थे त्वनाहते । सदाशिवं शाकिनीं च षोडशस्वरपूर्वकम् ॥५४॥ कण्ठस्थे षोडशदले विशुद्धाख्ये प्रविन्धसेत् । आज्ञाचक्रे परशिवं हाकिनीसंयुतं न्यसेत् ॥५५॥ लक्षार्णपूर्वं भ्रू मध्यसंस्थितेऽतिमनोहरे । तारादिपंचमं न्यासं कुर्यात्सर्वेष्टसिद्धये ॥५६॥ अष्टौ वर्गान्स्वरद्वंद्वपूर्वकान् बीजसंयुतान् । ताराद्या न्यासपूर्वाश्च प्रयोज्या अष्टशक्तयः ॥५७॥ तारायोग्रा महोग्रापि वञ्चा काली सरस्वती । कामश्वेरी च चामुंडा इत्यष्टौ तारिकाः स्मृताः ॥५८॥
नेत्रों पर न्यास करे । विद्वान् साधक चवर्गाद्य श्याम बुध का वक्षःस्थल पर न्यास करे । पीतवर्ण वाले दवर्गाद्य बृहस्पति का कंठकूप में न्यास करे ॥४२-४४॥ श्वेतवर्ण वाले तवर्गाद्य शुक्र का घटिका (नितम्ब) पर न्यास करे । नीलवर्ण वाले पवद्यि शनैश्चर का नाभि देश में न्यास करे । धूम्रवर्ण वाले शवर्गार्थ राहु का मुख में न्यास करे । ग्रहों का त्रिबीज पूर्वक न्यास इसी तरह कहा गया है ॥४५-४६॥ अब तीसरा न्यास लोकपालों का कहा गया है, जिसे यत्न पूर्वक करना चाहिये । मायादि तीन बीजों के साथ इसे करने से सब प्रकार की सिद्धियां प्राप्त होती हैं । अपने मस्तक और ललाट पर, आठों दिशाओं में नीचे एवम् ऊपर ह्रस्व दीर्घ आदि अष्ट वर्ग पूर्वक दिक्पालों का न्यास करना चाहिये ॥४७-४८॥ चौथा न्यास शिवशक्ति नामक है । शक्तियुक्त छः रुद्रों का त्रिबीज पूर्वक न्यास करना चाहिये । आधार आदि चक्रों में अपने चक्र के वर्णों के साथ इनका न्यास करे । तवर्ण पूर्वक डाकिनीयुक्त ब्रह्मा का न्यास करके मूलाधार में चतुर्दल समन्वित श्री विष्णु का न्यास करना चाहिये, जो राकिणी से और पवर्ग के अन्तिम वर्ण से युक्त हों स्वाधिष्ठान संज्ञक लिंगस्थ षड्दल चक्र में डाकिनीयुक्त रुद्र का 'ड' आदि 'फ' अन्तवर्णपूर्वक न्यास करना चाहिये मणिपूर नामक नाभिस्थ दशदल चक्र में लाकिनीयुक्त ईश्वर का 'क' आदि 'ठ' अन्तवर्ग पूर्वक न्यास करना चाहिये ॥४९-५३॥ अनाहत संज्ञक हृदयस्थ द्वादशदल चक्र में शाकिनी युक्त सदाशिव का सोलहस्वर पूर्वक न्यास करना चाहिये । विशुद्ध नामक कंठस्थित षोडशदलात्मक आज्ञाचक्र में हाकिनीयुक्त परशिव का न्यास करना चाहिये । सकल इष्ट सिद्धि के लिये अत्यन्त मनोहर भ्रूमध्य में लक्षवर्ण पूर्वक तारादि पंचम न्यास करना चाहिये । स्वर एवम् बिन्दु पूर्वक बीज संयुक्त अष्ट वर्गों का न्यास करके तारिका आदि आठ शक्तियों का न्यास करे । तारा, उग्रा, महोग्रा, वज्रा, काली, सरस्वती, कामेश्वरी और चामुंडा ये आठ तारिकायें कहलाती हैं । ब्रह्मरन्ध्र, ललाट, भ्रूमध्य, कंठदेश, हृदय, नाभि तथा मूलाधार में क्रमशः इनका न्यास करे । तदनन्तर सकल सिद्धि-
पञ्चाशीतितमोऽध्यायः ७८१ ब्रह्मरन्ध्रे ललाटे च भ्रूमध्ये कण्ठदेशतः । हृदि नाभौ फले मूलाधारे चेताः क्रमान्न्यसेत् ॥५९॥ अङ्गन्यासं ततः कुर्यात्पीठाख्यं सर्वसिद्धिदम् । आधारे कामरूपाख्यं बीजं ह्रस्वार्णपूर्वकम् ॥६०॥ हृदि जालन्धरं बीजं दीर्घपूर्वं प्रविन्यसेत् । ललाटे पूर्णगिर्याख्यं कवर्गार्चं न्यसेत्सुधीः ॥६१॥ उड्डीयानं चवर्गाय केशसन्धौ प्रविन्यसेत् । कण्ठे तु मथुरापीठं दशमं यादिकं न्यसेत् ॥६२॥ षोढा न्यासस्तु तारायाः प्रोक्तोऽभीष्टप्रदायकः । हृदि श्रीमदेकजटां तारिणीं शिरसि न्यसेत् ॥६३॥ वज्रोदके शिखां पातु उग्रतारां तु चर्मणि । महोग्रा वत्सरे नेत्रे पिंगाग्रैकजटास्त्रके ॥६४॥ षड्दीर्घयुक्तमायाया एतान्यष्टौ षडंगके । अंगुष्ठादिवंगुलीषु एवं विन्यस्य यत्नतः ॥६५॥ तर्जनीमध्यमाभ्यां तु कृत्वा तालत्रयं ततः । छोटिकामुद्रया कुर्याद्दिग्बन्धं देवतां स्मरन् ॥६६॥ विद्यया तारपुटया व्यापकं सप्तधा चरेत् । उग्रतारां ततो ध्यायेत्सद्यो वावेऽतिसिद्धिदाम् ॥६७॥ लयान्धावंबुजन्मस्थां नीलाभां दिव्यभूषणाम् । कम्बुं खड्गं कपालं च नीलाब्जं दधतीं करैः ॥६८॥ नागश्रेष्ठालंकृतांगीं रक्तनेत्रत्रयां स्मरेत् । जपेल्लक्षचतुष्कं हि दशांशं रक्तपद्मकैः ॥६९॥ हुनेत्क्षीराज्यसंमिश्रैः शंखं संस्थाप्य संजपेत् । नारीं पश्यन्स्पृशन्गच्छन्महानिशि बलिं चरेत् ॥७०॥ श्मशाने शून्यसदने देवागारेऽथ निर्जने । पर्वते वनमध्ये वा शवमारुह्य मंत्रवित् ॥७१॥ समरे शत्रुनिहतं यद्वा षाण्मासिकं शिशुम् । विद्यां साधयतः शीघ्रं साधितैवं प्रसिद्ध्यति ॥७२॥ मेघा प्रज्ञा प्रभा विद्या धीवृत्तिस्मृतिबुद्धयः । विश्वेश्वरीति संप्रोक्ताः पीठस्य नव शक्तयः ॥७३॥ भृगुमन्विन्दुसंयुक्तं मेघवर्त्म सरस्वती । योगपीठामने हार्दं पीठस्य मनुरीरितः ॥७४॥ दत्वानेनासनं मूत्ति मूलमंत्रेण कल्पयेत् । पूजयेद्विधिवद्देवींत द्विधानमयोच्यते ॥७५॥ दायक पीठ से एक अंग न्यास को करे । ॥५४-५६॥ आधार में ह्रस्ववर्ण पूर्वक कामरूप संज्ञक बीज का, हृदय में दीर्घ पूर्वक जालंधर नामक बीज का, ललाट पर कवर्ग पूर्वक पूर्णगिरि नामक बीज का, केश संधि में चवर्ग पूर्वक उड्डीयान नामक बीज का और कंठ में य' पूर्वक मथुरापीठ नामक दशम बीज का न्यास करे । कामना- दायक तारा के छः न्यास कहे जाते हैं । हृदय में श्रीमदेकजटा का, मस्तक पर तारिणी का, शिखा पर वज्रोदका का, त्वचा पर उग्र तारा का, छाती पर महोग्रा का और नेत्रों में पिंगाग्रैकजटा का न्यास करे । छः दीर्घों से युक्त माया का अंगुष्ठ आदि अंगुलियों में यत्नपूर्वक न्यास करके तर्जनी और मध्यमा से तीन बार ताली बजावे ॥६०-६५॥ फिर छोटिका मुद्रा से देवतास्मरण पूर्वक दिग्बन्ध करके तारामंत्र से संपुटित विद्या से सात बार सर्वांग सम्बन्धि न्यास करे । तदनन्तर सद्यः सिद्धि प्रदान करनेवाली, नीलवर्णवाली, दिव्य आभूषणवाली, हाथों में शंख, खड्ग, कपाल तथा नीलकमल धारण करनेवाली, उत्तम नाग से अलंकृत कार्यवाली और तीन लाल आँखों वाली उग्रतारा का ध्यान करके चार लाख मंत्र का जप करे और उसका दशांश दूध तथा घी मिलाये रक्त कमलों से हवन करे । फिर शंख की स्थापना कर के जप करे और महानिशा में नारी का दर्शन एवम् स्पर्श करते हुए बलि चढ़ावे ॥६६-७०॥ श्मशान, शून्य गृह, देवालय, निर्जनस्थान, पर्वत अथवा वनमध्य में शव के ऊपर आरूढ़ होकर मंत्रवेत्ता विद्या का साधन करे । शव छः महिने शिशु का हो या समर में शत्रुद्वारा निहत सैनिक का । ऐसा करने से विद्या शीघ्र सिद्ध हो जाती है । मेघा, प्रज्ञा, प्रभा, विद्या, धी, वृत्ति, स्मृति, बुद्धि तथा विश्वेश्वरी-ये नौ पीठ शक्तियाँ हैं ॥७१-७३॥ "भृगुमन् ....." यह मन्त्र है । इस मन्त्र से आसन देकर मूलमन्त्र से मूर्ति की कल्पना करे । तद- नन्तर विधिपूर्वक देवी की आराधना करे । विधान इस प्रकार है-"तारो माया...... स्वाहा" यह बलिमंत्र है।
७८२ नारदीयपुराणम् तारो माया भगं ब्रह्मा जटे सूर्यः सदीर्घकम् । यक्षाधिपतये तंद्री सोपनीतं बलिं ततः ॥७६॥ गृहयुग्मं शिवा स्वाहा बलिमंत्रोऽयमीरितः । दद्यान्नित्यं बलिं तेन मध्यरात्रे चतुष्पथे ॥७७॥ जलदानादिकं मंत्रैर्विदध्याद्दशभिस्ततः । ध्रुवो वज्रोदके वर्म फट्सप्तार्णो जलग्रहे ॥७८॥ ताराद्या वह्निजायांता माया हि क्षालने मता । तारो मायाः भृगुः कर्णी विशुद्धं धर्मवर्मतः ॥७९॥ सर्वपापानि शाम्यंते छेतो नेत्रयुतं जलम् । कल्पान्तनयनस्वाहा मंत्र आचमने मतः ॥८०॥ ध्रुवो मणिधरीत्यंते वज्रिण्यक्षियुता मृतिः । खरिविद्यायुग्ग्रिजश्च सर्ववांते बकोऽब्जवान् ॥८१॥ कारिण्यंते दीर्घवर्म अस्त्रं वह्निप्रियांतितः । त्रयोविंशतिवर्णात्मा शिखाया बंधने मनुः ॥८२॥ प्रणवो रक्षयुगलं दीर्घवर्मास्त्रठद्वयम् । नवार्णेनामुना मंत्रो कुर्याद्भूमिविशोधनम् ॥८३॥ नारांते सर्वविघ्नानुत्सारयेति पदं ततः । हुं फट् स्वाहा गुणैर्दर्भा मनुर्विघ्ननिवारणम् ॥८४॥ मायाबीजं जपापुष्पनिभं नाभौ विचिंतयेत् । तदुत्थेनाग्निना देहं दहेत्सार्द्धंस्वपाप्मना ॥८५॥ ताराबीजं सुवर्णाभं चिंतयेद्धृदि मंत्रवित् । पवनेन तदुत्थेन पापभस्म क्षिपेद्भुवि ॥८६॥ तुरीयं चन्द्रकुन्दाभं बीजं ध्यात्वा ललाटतः । तदुत्थसुधयादेहं स्वयं वै देवतानिशम् ॥८७॥ अनया भूतशुद्ध्या तु देवी सादृश्यमाप्नुयात् । तारोऽनंतो भृगुः कर्णी पद्मनाभयुतो बली ॥८८॥ खे वज्ररेखे क्रोधाख्यं बीजं पावकवल्लभा । अमुना द्वादशार्णेन रचयेन्मंडलं शुभम् ॥८९॥ तारो यथागता निद्रा सद्कूषेकभृगुविषम् । सदीर्घंस्मृतिरौ साक्षौ महाकालो भगान्वितः ॥९०॥ क्रोधोऽस्त्रं मनुवर्णोऽयं मनुः पुष्पाविशोधने । तारः पाशः परा स्वाहा पंचार्णश्चित्तशोधने ॥९१॥ मनवो दश संप्रोक्ता अर्घ्यस्थापनमुच्यते । सेंदुभ्यां मासतो माया भुवं संसृज्य भूगृहम् ॥९२॥ वृत्तं त्रिकोणसंयुक्तं कुर्यान्मंडलमंत्रतः । यजेत्तत्राधारशक्ति वह्निमंडलमध्यगाम् ॥ वह्निमंडलमभ्यर्च्य महाशंखं निधापयेत् ॥९३॥ वामकर्णेन्दुयुक्तेन फडंतेन विहायसा । प्रक्षालितं भृगुदंडी विमूर्तींडुयुतं पठेत् ॥९४॥
इससे मध्यरात्रि में चौराहे पर नित्य बलि अर्पण करे। तत्पश्चात् दश मन्त्रों से जलदान आदि करना चाहिये। "ध्रुवों......स्वाहा" इस मन्त्र से आचमन करना चाहिये। "ध्रुवो मणिधरी......त्रयोविंशतिवर्णात्मा इससे शिखा बांधे। "प्रणवो......द्वयम्" इससे भूमिशोधन करना चाहिये। नारांते......वर्णः" इसके जप से विघ्नों का निवारण होता है। साधक नाभि में जपापुष्प सदृश माया बीज का चिन्तन करे और कल्पना करे कि मायाबीज रूपी अग्नि से मेरा शरीर पापसहित जल गया। तदनन्तर हृदय में सुवर्णतुल्य प्रकाशमान तारा- बीज का ध्यान करके कल्पना करे कि ताराबीज रूपी वायु ने मेरे पापरूपी भस्म को उड़ा डाला। पुन: चन्द्र और कुन्द समान धवल तुरीय बीज का ध्यान करके भावना करे कि तुरीय बीजरूपी अमृत का पान कर मैं स्वयं देवतुल्य हो गया हूँ। इस प्रकार भूतशुद्धि करनेवाला साधक देवी के सादृश्य को प्राप्त करता है। "तारो ......पावकवल्लभा" इस मन्त्र से पवित्र मण्डल की रचना करे ॥७४-८९॥ "तारो यथागता...... मनुवर्णः" इससे पुष्पादि शोधन करे। "तारः पाशः परा स्वाहा" इससे चित्त शुद्धि करनी चाहिये। अर्घ्यदान में दश मन्त्र कहे गये हैं। "सेंदुभ्याम्......त्रिकोण संयुक्तम्" इससे मंडल का निर्माण कर उस पर वह्नि मण्डल के मध्य में जानेवाली आधारशक्ति की अर्चना करे। फिर अग्निमंडल का पूजन कर "वामकर्ण...... इंदुयुतम्" इस मन्त्र का पाठ करते हुए महाशंख की स्थापना करे। तत्पश्चात् वक्ष्यमाण चारों मन्त्रों का
पञ्चाशीतितमोऽध्यायः ७८३ ततोऽर्चयेन्महाशंखं जपन्मन्त्रचतुष्टयम्। दीर्घत्रयान्विता माया काली सृष्टिः सदीर्घसः ॥९५॥ प्रतिमासंयुतं मासं यवनं हृदयं ततः । एकादशार्णः प्रथमो महाशंखाचंने मनुः ॥९६॥ हंसो हरिमृजंगेशयुक्तो दीर्घत्रयेदुयुक् । तारिण्यंते कपाल पशो द्वादशाक्षरः ॥९७॥ स्वं दीर्घत्रयसम्बाढद्यमेषो वामदगन्वितः । लोकपालाय हृदयं तृतीयोऽयं शिवाक्षरः ॥९८॥ मायास्त्रीबोजमर्डेदुयुतं स्वं स्वर्गखादिमः । पालाय सर्वाधाराय सर्वः सर्वोद्भवस्तथा ॥९९॥ सर्वशुद्धिमयश्चेति डेंताः सर्वासुरांतिकम्। रुधिरा रतिदीर्घा च वायुः शुभ्रानिलःसुरा ॥१००॥ भाजनाय भगो सत्यो विकपालाय हृन्मनुः । तुर्यो रसेषु वर्णोऽयं महाशंखप्रपूजने ॥१०१॥ नवार्कमंडलं चेष्ट्वा सलिलं मूलमन्त्रतः । प्रपूरयेत्सुधाबुद्ध्या गंधपुष्पाक्षतादिभिः ॥१०२॥ मुद्रां त्रिखंडां संदर्य पूजयेच्चंद्रमंडलम् । वाक्सत्यपद्मागगने रेफानुग्रहबिंदुयुक् ॥१०३॥ मूलमंत्रो विपद्धंसमनुसर्गसमन्वितम् । अष्टकृत्वोऽमुना मंत्री मंत्रयेत्प्रयतो जलम् ॥१०४॥ मायया संदिशं क्षिप्त्वा खं योनिं च प्रदर्शयेत् । तत्र वृत्ताष्टषट्कोणं ध्यात्वा देवीं विचिंतयेत् ॥१०५॥ पूर्वोक्तां पूजयेत्त्वेलां मूलेनाथ प्रतर्पयेत् । तर्जनीमध्यमानामाकनिष्ठामिर्महेश्वरीम् ॥१०६॥ सांगुष्ठानिश्चतुर्वारं महाशंखस्थिते जले । खरेंफमनुबिंद्वाढ्यं भृगुर्मन्विदुयुतया ॥१०७॥ धूवाद्येन नमोतेन तर्पदानंद भैरवम् । ततस्तेनार्धतोयेन प्रोक्षेत्पूजनसाधनम् ॥१०८॥ योनिमुद्रां प्रदर्श्यापि प्रणमेद्भवतारिणीम् । विधानमर्घ संप्रोक्तं सर्वसिद्धिप्रदायकम् ॥१०६॥ पूर्वोक्ते पूजयेत्पीठे पद्मे षट्कोणकणिके । धरागुहावृते रम्ये देवीं रम्योपचारकैः ॥११०॥ महीगृहे चतुर्विश्व गणेशदीन्प्रपूजयेत् । पाशांकुशौ कपालं च त्रिशूलं दधतं करैः ॥१११॥ अलंकारचयोपेतं गणेशं प्राक्तमर्चयेत् । कपालशूले हस्ताभ्यां दधतं सर्पभूषणम् ॥११२॥
जप करते हुए महाशंख की आराधना करनी चाहिये ॥९०-९४३॥ "दीर्घत्रयान्विता ······हृदयं ततः” यह महाशंख पूजन का पहला मन्त्र है। "हंसो······अन्तः" यह दूसरा मन्त्र । "स्वम्······हृदयम्” यह तीसरा मन्त्र है। "माया······हृन्मनुः” यह चौथा मन्त्र है। इसके बाद नवीन सूर्यमंडल की अर्चना करके अमृतबुद्ध्या जल में मूलमन्त्र से गंध, पुष्प, अक्षत आदि डाले। त्रिखंडा मुद्रा को दिखा कर चंद्रमंडल की पूजा करे। साधक “वाक् ····अनुसर्ग समन्वितम्” इस मन्त्र से जल को अभिमन्त्रित करके ऊपर को मार्जन करे। फिर माया तथा खयोनि मुद्रा को दिखाकर घिरे हुए अष्टकोण एवम् षट्कोण पीठ का ध्यान करे और वहां देवी की चिन्तना करके मूलमन्त्र से उनकी पूजा करे ॥९५-१०५३॥ तर्जनी, मध्यमा, अनामिका और कनिष्ठा अंगु- लियों द्वारा महाशंखस्थित जलसे महेश्वरी तर्पण करके “एवम् ···नमः” इस मन्त्र से आनन्द भैरव को तृप्त करे। तदनन्तर अर्घ जल से पूजन सामग्री को सिक्त करके योनिमुद्रा दिखावे ओर भवतारिणी को प्रणाम करे। अर्घसम्बन्धी विधान सर्व सिद्धिदायक है। भूमि-गृह से आवृत, रमणीय, षट्कोण तथा पद्म एवम् कणिका से युक्त पीठ पर मनोहर उपचारों से देवी की आराधना करनी चाहिये । महीगृह में चारों तरफ गणेश आदि का पूजन करे। हाथों में पाश, अंकुश, कपाल तथा त्रिशूल धारण करने वाले ओर समस्त अलंकारों से विभूषित गणेश की पूरव दिशा में पूजा करे ॥१०६-१११३॥ करों में कपाल तथा त्रिशूल धारण करने वाले, सर्प रूपी आभूषण से भूषित, अपने गण से वेष्टित ओर मनोरम बटुक की दक्षिण दिशा में पूजा करे। हाथों में खङ्ग, शूल, कपाल डमरू धारण करने वाले, कृष्णवर्ण, दिगंबर तथा क्रूर क्षेत्रपाल की पश्चिम दिशा में पूजा करे।
स्वयूथवेष्टितं रम्यं बटुकं दक्षिणेऽर्चयेत् । असिशूलकपालानि डमरुं दधतं करैः ॥११३॥ कृष्णं दिगंबरं क्रूरं क्षेत्रपालं च पश्चिमे । कपालं डमरुं पाशं लिंगं संबिभ्रतीं करैः ॥११४॥ अध्र्याकन्यां रक्तवस्त्रां योगिनीमुत्तरे यजेत् । अक्षोभ्यं प्रयजेन्मूर्ध्नि देव्या मंत्रमृषिं शुभम् ॥११५॥ अक्षोभ्यं वस्त्रपुष्पं च प्रतीच्छानलवल्लभा । अक्षोभ्यपूजने मंत्रः षट्कोणेषु षडंगकम् ॥११६॥ वैरोचनं चामिताभं पद्मनामाभिधं तथा । शंखं पांडुरसंज्ञं च दिग्दलेषु प्रपूजयेत् ॥११७॥ लामकां मानकां चैव पांडुरां तारकां तथा । विदिक्पत्रानब्जपत्रेषु पूजयेदिष्टसिद्धये ॥११८॥ बिंदुनामादिवर्णाद्याः संबुद्ध्य तास्तथाभिधाः । व्रजपुष्पं प्रतीच्छाग्निप्रियांताः प्रणवादिकाः ॥११९॥ वैरोचनादिपूजायां मनवः परिकीर्तिताः । भूधरश्च चतुर्द्वार्विषु पद्मांतकयमांतकौ ॥१२०॥ विद्यांतकाभिधः पश्चान्नरांतक इमान्यजेत् । शक्रादींश्चैव वज्रादीन्प्रजपेत्तदनंतरम् ॥१२१॥ एवं संResource/पूजयन्देवी पांडित्यं धनमद्भूतम् । पुत्रान्पौत्राञ्छुभां कीर्ति लभते जनवश्यताम् ॥१२२॥ तारो माया श्रीमदेकजटे नीलसरस्वती । महोग्रतारे देवासः सनेत्रो गदियुग्मकम् ॥१२३॥ सर्वदेवपिशाकर्मो दीर्घोग्निमंसुसान्द्रस । अभ्रगुर्धम जाड्यं च छेदयद्वितयं रमा ॥१२४॥ मायास्त्राग्निप्रियांतोऽयं द्विपंचाशल्लिपिमंतुः । अनेन नित्यं पूजांतेऽन्वहं देव्यै बलिं हरेत् ॥१२५॥ एवं सिद्धे मनौ मंत्री प्रयोगान्विदधाति च । जातमात्रस्य बालस्य दिवसत्रितयावधः ॥१२६॥ जिह्वायां विलिखेन्मंत्रं मध्वाज्याभ्यां शलाकया । सुवर्णकृतया यद्वा मंत्री धवलदूर्वया ॥१२७॥ गतेऽष्टमेऽब्दे बालोऽपि जायते कविरद्भूतम् । तथापरैरजेयोऽपि भूपसंघैर्र्चार्चितः ॥१२८॥ उपरागे वतानीव नरदारुस्ररोजले । निर्माय कीलकं तेन तैलमध्वमृतैर्लिखेत् ॥१२६॥ सरोजिनीदले मंत्रं वेष्टयेन्मातृकाक्षरैः । निधाय तदलं कुंडे चतुरस्रे समेखले ॥१३०॥ संस्थाप्य पावकं तत्र जुहुयान्मनुनामुना । सहस्रं रक्तपद्मानां धेनुदुग्धजलाप्लुतम् ॥१३१॥ करों में कपाल, डमरू, पाश तथा लिंग धारण करनेवाली, अर्धकन्या रूपवाली और रक्तवस्त्र पहननेवाली योगिनी की उत्तर दिशा में पूजा करे। देवी के अक्षोभ्य नामक पवित्र मन्त्रऋषि की मस्तक पर पूजा करे। "अक्षोभ्य••••वल्लभा" इस मन्त्र से अक्षोभ्य की पूजा कर षट्कोण में षडंग देवता का पूजन करे ॥११२-११६॥ इष्ट सिद्ध्यर्थ दिक् पद्मपत्रों पर वैरोचन, अमिताभ, पद्मनाभ, पांडुर संज्ञक, शंख, लाभका, मानका, पांडुरा तथा तारका की अर्चना करनी चाहिये। "बिंदुनाम••••प्रणवादिकाः"-यह मन्त्र वैरोचनादि पूजन का कहा गया है। चारों द्वारों पर भूधर, पद्मांतक, यमांतक, विद्यांतक तथा नरांतक की पूजा करनी चाहिये। पश्चात् शक्र आदि की पूजा करके उनके वज्र आदि अस्त्रों का भी पूजन करे। इस प्रकार देवी की पूजा करने से उद्- भुत पांडित्य, पुत्र, पौत्र, निर्मल यश, तथा जनवश्यता (लोगों को अपने अधीन करना) की प्राप्ति होती है। "तारो••••स्वाहा" इस मन्त्र से पूजा के अन्त में प्रतिदिन देवी को बलि चढ़ावे ॥११७-१२५॥ इस प्रकार मन्त्र सिद्ध कर लेने पर मन्त्री उसका प्रयोग करे। सुवर्ण की शलाका या उज्ज्वल दूर्वा में मधु और घी लगाकर उससे सद्योजात बालक, जिसे तीन दिन भी न हुए हों, की जिह्वा पर यह मन्त्र लिख दे। ऐसा करने से आठ वर्ष होते-होते वह बालक महाकवि, दूसरों से अजेय तथा राजाओं से पूजित होगा। "उपरागे••••सरोजने" इस मन्त्र से एक कील बनाकर उससे कमलिनी पत्र पर तेल, मधु और अमृत (जल) से उपर्युक्त मन्त्र को लिखकर उसे मातृका अक्षरों से वेष्टित करे। तत्पश्चात् मेखला सहित चतुरस्र कुण्ड खोदकर उसमें अग्नि स्थापना करके