बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
अथ प्राणदशा फलाध्यायः । ५८१
व्रतहा सूर्यवर्तिश्च विदेशे वसुनाशनम् ।
विरोधो धननाशश्च गुरोः प्राणगते शनौ ।।३९।। (वृ.श.)
गुरु के सूक्ष्मान्तर में शनि की प्राण दशा में व्रत की हानि, विदेश में धन
की हानि विरोध और धन की हानि होती है।।३९।।
विद्याधर्मविवृद्धिश्च गुरुब्राह्मणपूजनम् ।
भाग्योदयसुखप्राप्तिर्गुरोः प्राणगते बुधे ।।४०।। (वृ.बु.)
गुरु के सूक्ष्मान्तर में बुध की प्राणदशा में विद्या और धर्म की वृद्धि, गुरु
और ब्राह्मण का पूजन, भाग्योदय और सुख का लाभ होता है।।४०।।
ज्ञानं विभवपांडित्यं शास्त्रश्रोता शिवार्चनम् ।
अग्निहोत्रं गुरोर्भक्तिर्गुरोः प्राणगते ध्वजे ।।४१।। (वृ.के.)
गुरु के सूक्ष्मान्तर में केतु के प्राण दशा में ज्ञान, वैभव और पांडित्य, शास्त्र
श्रवण, शिवपूजन, अग्नि होत्र और गुरु भक्ति होती है।।४१।।
रोगान्मुक्तिः सुखं भोगं धन धान्यसमागमम् ।
पुत्रदारादि सौख्यं गुरोः प्राणगते भृगौ ।।४२।। (वृ.शु.)
गुरु के सूक्ष्मान्तर में शुक्र के प्राण दशा में रोग से मुक्ति, सुख, भोग, धन,
धान्य का आगमन, पुत्र स्त्री का सुखं होता है।।४२।।
वातपित्तप्रकोपं च श्लेष्मोद्रेकं तु दारूणम् ।
रसव्याधिकृतं शूलं गुरोः प्राणगते रवौ ।।४३।। (वृ.सू.)
गुरु के सूक्ष्मान्तर से सूर्य के प्राण दशा में वायु पित्त के प्रकोप से कष्ट, और
भयंकर कफवृद्धि तथा रस से उत्पन्न व्याधि होती है।।४३।।
छत्रचामरसंयुक्तं वैभवंपुत्रसम्पदम् ।
नेत्रकुक्षिगता पीडा गुरोः प्राणगतेविधौ ।।४४।। (वृ.चं)
गुरु के सूक्ष्मान्तर में चन्द्रमा की प्राण दशा में छत्र चामर का सुख,
वैभव, पुत्र सम्पत्ति का लाभ और नेत्र तथा कुक्षि (कोष्ठय) में कष्ट होता
है।।४४।।
स्त्रीजनाच्च विषोत्पत्तिर्वधनं चातिविग्रहः ।
देशांतरगमोभ्रांतिर्गुरोः प्राणगते कुजे ।।४५।। (वृ.मं.)
५८२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
गुरु के सूक्ष्मान्तर में भौम की प्राणदशा में स्त्रियों से कष्ट बंधन अत्यंत विरोध
देशांतर की यात्रा और भ्रांति होती है॥४५॥
व्याधिभिः परिभूतः स्याच्चौरैरपहृतं धनम् ।
सर्पवृश्चिकदष्टत्वं गुरोः प्राणगतेप्यहौ ॥४६॥ (वृ.रा.)
गुरु के सूक्ष्मान्तर में राहु की प्राणदशा में व्याधि से व्याप्त, चोर द्वारा द्रव्य
की हानि सर्प-बिच्छू के काटने का भय होता है॥४६॥
इति गुरोः प्राणदशा फलम्।
अथ शनेः प्राणदशा फलम्-
ज्वरेण ज्वलिता कान्तिःकुष्ठरोगोदरादिरूक् ।
जलाग्निकृतमृत्युः स्यान्मन्दप्राणदशाफलम् ॥४७॥ (श.श.)
शनि के सूक्ष्मांतर में शनि की प्राणदशा में ज्वर से कान्ति नष्ट हो जाती है,
कुष्ठ रोग की संभावना, जल अग्नि से मृत्यु की संभावना होती है॥४७॥
धनं धान्यं च मांगल्यं व्यवहाराभिपूजनम् ।
देवब्राह्मणभक्तिश्चः शनैः प्राणगते बुधे ॥४८॥ (श.बु.)
शनि के सूक्ष्मान्तर में बुध की प्राणदशां में धन, धान्य, मंगल कृत्य, व्यवहार
से पूजन, देवता ब्राह्मण में भक्ति होती है॥४८॥
मृत्युवेदन दुःखं च भूतोपद्रवसंभवः ।
परदाराभिभूतत्वं शनैः प्राणगते ध्वजे ॥४९॥ (श.के.)
शनि के सूक्ष्मान्तर में केतु की प्राणदशा में मृत्यु तुल्य कष्ट, भूत उपद्रव
की संभावना और पर स्त्री के वश में होने की संभावना होती है॥४९॥
पुत्रार्थविभवैः सौख्यं क्षितिपालादिना सुखम् ।
अग्निहोत्रं विवाहश्च शनैः प्राणगते भृगौ ॥५०॥ (श.शु.)
शनि के सूक्ष्मान्तर में शुक्र की प्राणदशा में पुत्र, धन और वैभव का सुख,
राजा आदि से सुख, अग्निहोत्र और विवाह होता है॥५०॥
अग्निपीडा शिरोव्याधिः सर्पशत्रुभयं भवेत् ।
अर्थहानिः महाक्लेशः शनैः प्राणगते रवौ ॥५१॥ (श.सू.)
अथ प्राणदशा फलाध्यायः। ५८३
शनि के सूक्ष्मान्तर में सूर्य की प्राणदशा में अग्नि से कष्ट, शिर का रोग,
सर्प तथा शत्रु से भय, धन की हानि और महाकष्ट होता है।।५१।।
आरोग्यं पुत्रलाभश्च शान्तिपौष्टिक वर्धनम् ।
देवब्राह्मणभक्तिश्च शनेः प्राणगते विधौ ।।५२।। (श.चं.)
शनि के सूक्ष्मान्तर में चंद्रमा की प्राणदशा में आरोग्यता, पुत्र का लाभ,
शान्तिक पौष्टिक क्रियायों की वृद्धि और देवता ब्राह्मण में भक्ति होती है।।५२।।
गुल्मरोगः शत्रुभीतिर्मृगया प्राणनाशनम् ।
सर्पाग्निशत्रुतोभीतिः शनेः प्राणगते कुजे ।।५३।। (श.मं.)
शनि के सूक्ष्मान्तर में भौम की प्राणदशा में गुल्म रोग। शत्रु का भय, प्राण
जाने का भय, सर्प तथा अग्नि से भय होता है।।५३।।
देशत्यागो नृपाद्भीतिर्मोहनं विषभक्षणम् ।
वातपित्तकृतापीड़ा शनेः प्राणगतेप्यहौ ।।५४।। (श.रा.)
शनि के सूक्ष्मान्तर में राहु की प्राणदशा में देश का त्याग, राजा से भय और
अहित, विषपान, वायु-पित्त से कष्ट होता है।।५४।।
सेनापत्यं भूमिलाभं संगमं स्वजनैः सह ।
गौरवं बुधसन्मानं शनेः प्राणगते गुरौ ।।५५।। (श.बृ.)
शनि के सूक्ष्मान्तर में गुरु की प्राणदशा में सेनापति का अधिकार, भूमि का
लाभ, आत्मीय जनों से समागम, गुरुता और राजा से सम्मान होता है।।५५।।
इति शनेः प्राणदशा फलम्।
अथ बुध प्राणदशा फलम्-
आरोग्यं सुखसम्पत्तिर्धर्मकर्मादिसाधनम् ।
समत्वं सर्वभूतेषु बुधप्राणदशाफलम् ।।५६।। (बु.बु.)
बुध के सूक्ष्मान्तर में बुध की प्राणदशा में आरोग्यता, सुख संपत्ति,
धर्म कर्म आदि का साधन और सभी प्राणियों में समता होती है।।५६।।
दहनं चौरविद्धांगं परमाधिविषोद्भवा ।
देहांतकरणे दुःखं बुधप्राणगते ध्वजे ।।५७।। (बु.के.)
५८४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
बुध के सूक्ष्मान्तर में केतु की प्राणदशा में अग्नि भय, चौर से शरीर में चोट
और विष से व्याधि की संभावना तथा मरण तुल्य कष्ट होता है।।५७।।
प्रभुत्वं धनसम्पत्तिः कीर्तिर्धर्मः शिवार्चनम् ।
पुत्रदारादिकं सौख्यं बुधप्राणगते भृगौ ।।५८।। (बु.शु.)
बुध के सूक्ष्मान्तर में शुक्र की प्राणदशा में प्रभुता, धन संपत्ति का लाभ, कीर्त्ति,
धर्म और शिव पूजन, और पुत्र स्त्री का सुख होता है।।५८।।
अन्तर्दाहोज्वरोन्मादौ बांधवानां रतिः स्त्रिया ।
पापनिस्तेय सम्पत्तिर्बुधप्राणगते रवौ ।।५९।। (बु.सू.)
बुध के सूक्ष्मान्तर में सूर्य की प्राणदशा में अंतर्गत दाह, ज्वर और उन्माद
बांधवों से तथा स्त्री से प्रेम और पापाचार से संपत्ति का लाभ होता है।।५९।।
स्त्रीलाभश्चार्थसम्पत्तिः कन्यालाभो धनागमः ।
लभते सर्वतः सौख्यं बुध प्राणगते विधौ ।।६०।। (बु.चं.)
बुध के सूक्ष्मान्तर में चंद्रमा की प्राणदशा में स्त्री, धन सम्पत्ति का लाभ, कन्या
की उत्पत्ति, धन का आगम और सर्वत्र सुख की प्राप्ति होती है।।६०।।
पतितः कुक्षिरोगी च दंतनेत्रादिजा व्यथा ।
अर्शार्तिः प्राणसंदेहो बुधप्राणगते कुजे ।।६१।। (बु.मं.)
बुध के सूक्ष्मान्तर में भौम की प्राणदशा में पतन, कुक्षि में रोग, दांत नेत्र
में पीड़ा अर्श रोग और प्राण हानि की संभावना होती है।।६१।।
वस्त्राभरणसम्पत्तिः वियोगो विप्रवैरिता ।
सन्निपातोद्भवं दुःखं बुधप्राणगतेप्यहौ ।।६२।। (बु.रां.)
बुध के सूक्ष्मान्तर में राहु की प्राणदशा में वस्त्र आभूषण आदि संपत्ति से वियोग,
ब्राह्मण से वैर, सन्निपात रोग से कष्ट होता है।।६२।।
गुरुत्वं धनसम्पत्तिर्विद्या सद्गुण संग्रहः ।
व्यवसायेन सल्लाभो बुधप्राणगते गुरौ ।।६३।। (बु.वृ.)
बुध के सूक्ष्मान्तर में गुरु की प्राणदशा में गुरुता, धन संपत्ति विद्या और अच्छे
गुणों का संग्रह, और व्यवसाय से लाभ होता है।।६३।।
चौर्येण निधनप्राप्तिर्विधनत्वं दरिद्रता ।
याचकत्वं विशेषेण बुधप्राणगते शनौ ।।६४।। (बु.श.)
अथ प्राणदशा फलाध्यायः। ५८५
बुध के सूक्ष्मान्तर में शनि की प्राणदशा में चोर से मृत्युभय, निर्धनता और
भिक्षावृत्ति का प्रादुर्भाव होता है॥६४॥
इति बुध प्राणदशा फलम्।
अथ केतोः प्राणदशा फलम्-
अश्वपातेन घातं च पादस्खलनमेवच।
निर्विचारवधोत्पत्तिः केतोः प्राणदशाफलम्॥६५॥(के.के.)
केतु के सूक्ष्मान्तर में केतु की प्राणदशा में घोड़े पर से गिरने से चोट, पैर
फिसलने से चोट, कुत्सित विचार की उत्पत्ति होती है॥६५॥
क्षेत्रलाभो वैरिनाशो हयलाभो मनः सुखम्।
पशुक्षेत्रधनाप्तिश्च केतोः प्राणगते भृगौ॥६६॥(के.शु.)
केतु के सूक्ष्मान्तर में शुक्र की प्राणदशा में कुशल-लाभ, शत्रुओं का नाश,
मन को सुख, पशु, क्षेत्र और धन का लाभ होता है॥६६॥
स्तेयाग्निरिपुभीत्यादिघातश्चैवावरोधयुक् ।
प्राणांतकरणं कृच्छ्रं केतोः प्राणगते रवौ॥६७॥(के.सू.)
केतु के सूक्ष्मान्तर में सूर्य के प्राणदशा में चोर, अग्नि और शत्रु का भय,
अवरोध जनित घात और प्राणांत तुल्य कष्ट होता है॥६७॥
देवद्विजगुरोः पूजा दीर्घयात्रा धनं सुखम्।
कंठाश्रिते नेत्ररोगो केतोः प्राणगते विधौ॥६८॥(के.चं.)
केतु के सूक्ष्मान्तर में चन्द्रमा की प्राणदशा में देवता, ब्राह्मण और गुरु की
पूजा दूर की यात्रा, धन और सुख, कंठ और नेत्र का रोग होता है॥६८॥
तीव्ररोगोलसावृद्धिर्विभ्रमः सन्निपातजः।
स्वबंधुजनविद्वेषः केतोः प्राणगते कुजे॥६९॥(के.मं.)
केतु के सूक्ष्मान्तर में भौम के प्राणदशा से तीव्र रोग, आलसी बुद्धि, सन्निपात
से भ्रम रोग और अपने बंधुओं से विरोध होता है॥६९॥
विरोधः स्त्रीसुताद्यैश्च गृहान्निष्क्रमणंभवेत्।
स्वसाहसात्कार्यहानिः केतोः प्राणगतेप्यहौ॥७०॥(के.रा.)
५८६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
केतु के सूक्ष्मांतर में राहु की प्राणदशा में स्त्री, पुत्र आदि से विरोध, घर से
निकाला होता है और साहस करने से कार्य की हानि होती है।।७०।।
शस्त्रव्रणैर्महारोगैर्हृत्पीडादिसमुद्भवः ।
सुतदारवियोगश्च केतो प्राणगते गुरौ ।।७१।। (के.बु.)
केतु के सूक्ष्मान्तर में गुरु की प्राणदशा में शस्त्र, व्रण और महारोग से हृदय
में पीड़ा की संभावना, पुत्र, स्त्री आदि से वियोग होता है।।७१।।
मतिविभ्रमतीक्ष्णश्च क्रूरकर्मरतः सदा ।
व्यसनाद्बंधनं दुःखं केतोः प्राणगते शनौ ।।७२।। (के.श.)
केतु के सूक्ष्मान्तर में शनि की प्राणदशा में बुद्धि में भ्रम, स्वभाव में तीक्ष्णता,
सदा क्रूरकर्म में आसक्त, व्यसन से बंधन और दुःख होता है।।७२।।
कुसुमं शयनं भूषा लेपनं भोजनादिकम् ।
सौख्यं सर्वाङ्गभोग्यं च केतोः प्राणगते बुधे ।।७३।। (के.बु.)
केतु के सूक्ष्मान्तर में बुध की प्राणदशा में पुष्प शय्या, आभूषण, लेपन,
भोजनादि की प्राप्ति, सुख और सर्वांग का भोग प्राप्त होता है।।७३।।
इति केतोः प्राणदशा फलम्।
अथ भृगोः प्राणदशा फलम्-
ज्ञानमीश्वरभक्तिश्च तोषकर्मरसायनम् ।
पुत्रपौत्रसमृद्धिश्च शुक्रप्राणगते फलम् ।।७४।। (शु.शु.)
शुक्र के सूक्ष्मान्तर में शुक्र के प्राणदशा में ज्ञान की प्राप्ति ईश्वर में भक्ति,
संतोष, रसायन और पुत्र पौत्र तथा समृद्धि का लाभ होता है।।७४।।
लोकप्रकाशकीर्तिश्च सुतसौख्यं विवर्जितः ।
उष्णादिरोगजं दुःखं शुक्रप्राणगते रवौ ।।७५।। (शु.सू.)
शुक्र के सूक्ष्मांतर में सूर्य के प्राणदशा में संसार में कीर्त्ति, पुत्र सुख से हीन,
गर्मी से रोग और दुःख होता है।।७५।।
देवार्चनैकर्मरतिर्मन्त्रतोषणतत्परः ।
धनसौभाग्यसम्पत्तिः शुक्रप्राणगते विधौ ।।७६।। (शु.चं.)
अथ प्राणदशा फलाध्यायः। ५८७
शुक्र के सूक्ष्मान्तर में चन्द्रमा की प्राणदशा में देवपूजन में प्रवृत्ति, संतोष,
धन, सौभाग्य और सम्पत्ति का लाभ होता है॥७६॥
ज्वरो मसूरिका स्फोटकंडूचिपिटकादिकाः ।
देवब्राह्मणपूजा च शुक्र प्राणगते कुजे ।।७७।। (शु.मं.)
शुक्र के सूक्ष्मान्तर में भौम की प्राणदशा में ज्वर, मसरिका, चेचक, खलुली,
रोग और देवता ब्राह्मण का पूजन होता है।।७७।।
नित्यं शत्रुकृता पीडा नेत्रकुक्षिरुजादयः ।
विरोधः सुहृदां पीडा शुक्र प्राणगतेप्यहौ ।।७८।। (शु.रा.)
शुक्र के सूक्ष्मान्तर में राहु की प्राणदशा में नित्य शत्रु से पीड़ा नेत्र, कुक्षि
में रोग, मित्रों से विरोध और पीड़ा होती है।।७८।।
आयुरारोग्यमैश्वर्यं पुत्रस्त्री धनवैभवम् ।
छत्रवाहनसंप्राप्तिः शुक्रप्राणगते गुरौ ।।७९।।
शुक्र के सूक्ष्मान्तर में गुरु की प्राणदशा में आयु, आरोग्यता और ऐश्वर्य की
प्राप्ति, पुत्र स्त्री धन का सुख द्रव्य वाहन का लाभ होता है।।७९।।
राजोपद्रवजाभीतिः सुखहानिर्महारुजः ।
नीचैः सह विवादं च शुक्रप्राणगते शनौ ।।८०।। (शु.श.)
शुक्र के सूक्ष्मान्तर में शनि की प्राणदशा में राजा के उपद्रव का भय, सुख,
की हानि महारोग और नीचों से विवाद होता है।।८०।।
संतोषं राजसन्मानं नानादिग्भूमिसम्पदः ।
नित्यमुत्साहवृद्धिः स्याच्छुक्रप्राणगते बुधे ।।८१।। (शु.बु.)
शुक्र के सूक्ष्मान्तर में बुध की प्राणदशा में संतोष, राजा से सम्मान, अनेक
दिशा से भूमि सम्पत्ति का लाभ और नित्य उत्साह में वृद्धि होती है।।८१।।
जीवितात्मयशोहानिर्धनधान्यपरिच्छदः ।
त्यागयोगधनानिस्युः शुक्रप्राणगते ध्वजे ।।८२।। (शु.के.)
शुक्र के सूक्ष्मान्तर में केतु की प्राणदशा में आत्मा, यश की हानि, धन धान्य
की हानि और त्यागवृत्ति होती है।।८२।।
इति भृगोः प्राणदशाफलम्।
५८८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
अथ समस्त ज्योतिः शास्त्रतत्वकामधेनुरूपम्
सुदर्शन चक्रम्।
[सुदर्शन चक्र: लग्न, चन्द्र तथा सूर्य से द्वादश भावों एवं ग्रहों की स्थिति]
सुदर्शनं द्वादशारं जन्मभेन्द्वर्कराशितः ।
ग्रहान् संस्थाप्य भावेषु वर्षमासादिकल्पयेत् ।।१।।
केन्द्रकोणाष्टगो राहुः पापात्यै च शुभोमुदे ।
विरिःफादि शुभैः पापैस्त्रिषडायेषु बै शुभम् ।।२।।
तं तं भावं प्रकल्प्यांगं तत्तत्तन्वादिजं फलम् ।
गुरुपदेशात्संवाच्यं भोजनं स्वप्नपूर्वकम् ।।३।।
सुदर्शनचक्रम्। ५८९
चक्र परिचय-
यह चक्र वृत्ताकार जन्मपत्र में ग्रहों की स्थिति प्रगट करने को खींचा
गया है। बाहरी वृत्त में जन्म लग्न से प्रारम्भ कर ग्रह लिखे गये हैं। दूसरे में
चन्द्रमा से ग्रहों की स्थिति लिखी गई है तथा तीसरे वृत्त में सूर्य से ग्रहों की
स्थिति लिखी गई है। इस प्रकार से यह चक्र एक ही में तीनों स्थितियों की
तुलना को दिखलाता है।
भाव विचार करने के नियम-
किसी भाव का विचार करते समय उस भाव को प्रगट करने वाली तीनों
राशियों का विचार करना चाहिये, जैसे दूसरे स्थान का विचार करते समय
लग्न से चन्द्र से और सूर्य से दूसरे स्थान से स्थित ग्रहों का विचार करना
चाहिये।
१।४।७।१०।८ भाव में राहु या पापग्रह हो तो कष्टकारक होते हैं।
शुभ ग्रह हों तो शुभ होता है। १२ वें भाव को छोड़कर अन्य भावों में शुभग्रह
और ३।६।११ भावों में पापग्रह शुभ फल देनेवाले होते हैं। विशेषरूप से
राहु जहाँ रहता है वह अशुभ फल देता है। यदि किसी भाव में शुभग्रह है
तो उस भाव का फल शुभ होगा और पूर्ण प्रभावशाली होगा। शुभग्रह शुभ
फल ही देते हैं। जहाँ भी पापग्रह हो यदि उस पर शुभग्रह की दृष्टि हो तो
शुभफल कहना चाहिये।
सप्तवर्ग में अधिक अशुभ वर्गोंवाले शुभग्रह के अपने शुभकारी गुण
नष्ट हो जाते हैं। अनेक शुभग्रहों के वर्गों से युक्त होने पर पापग्रह भी अपेक्षया
शुभद हो जाता है।
यदि कोई स्थान या भाव रिक्त हो तो उसका प्रभाव उस भाव के
देखनेवाले ग्रहों से निकालना चाहिये। यदि कोई न देखता हो तो उसके स्वामी
को देखना चाहिये।
उदाहरण-जैसे सुदर्शन चक्र में १०वाँ स्थान रिक्त है तथा अपने स्वामी
से देखा जाता है जो चन्द्रमा के साथ बैठा है। अतः यहाँ यह कहा जा सकता
है कि यह व्यक्ति अपने पेशे में पूर्णरूप से सफल होगा।
विशेष-सूर्य प्रथम भाव में शुभफल देनेवाला माना जाता है अन्य स्थानों
में अशुभ माना जाता है। पापग्रह अपनी राशि में अशुभ नहीं होते हैं।
५९० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
वार्षिक भविष्यवाणियाँ-
सुदर्शन चक्र से वार्षिक फल कहने के लिये जन्म से प्रथम १२ मास
तक प्रथम भाव को लग्न मानकर किया जाता है। दूसरे वर्ष में द्वितीय भाव
को लग्न माना जाता है, तीसरे वर्ष में तीसरा स्थान ही लग्न माना जाता है।
इस प्रकार में लग्न प्रति वर्ष एक-एक राशि खिसकता जाता है। वार्षिक
भविष्यवाणियों में मंदगति वाले ग्रहों राहु केतु शनि आदि का ही विचार किया
जाता है। १२।२४।३६।४८ वें वर्ष के अन्त में वैसी ही स्थिति हो जाती
है जैसी कि जन्मकाल में होती है। इसी प्रकार लग्नादि १२ भाव एक-एक
मास के द्योतक होते हैं। दिन फल कहने के लिये एक-एक भाव में ढाई दिन
कल्पना करना चाहिये।
अथ राहुदृष्टिमाहुः-
सुतमदननवांते पूर्णदृष्टिं तमस्य
युगलदशमगेहे चार्धदृष्टिंवदन्ति ।
सहजरिपुविपश्यन् पाददृष्टिं मुनीन्द्रा
निजभवनमुपेतोलोचनान्धः प्रदिष्टः ।।
ग्रहाणामुदयवर्षाणि-
आकृत्योजिनसम्मितागजकरा नेत्राग्नयः षोडश-
तत्त्वान्यङ्गगुणाद्विवेद प्रमिताः सूर्यादिकानां समा
यः खेटः स्वगृहे स्वतुङ्गभवने षड्वर्गशुद्धश्च यः-
तस्याब्दे हि नृणां भवेदति सुखं भाग्योदयो निश्चितम् ।।
इति सुदर्शनचक्र विवरणं समाप्तम्।
इति वृहत्पाराशरहोरायाः पूर्वार्धे सूर्यादि ग्रहाणां प्राणदशा
फलाध्यायः।
समाप्तश्चायं पूर्वार्धभागः।
श्रीः
वृहत्पाराशरहोरायाः उत्तरार्धम्
भाषाटीका सहितम्
अष्टकवर्गाध्यायः ।
मैत्रेय उवाच-
भगवन्सर्वमाख्यातं जातकं विस्तरेण मे ।
सहस्रायुतश्लोकैरशीत्यध्यायसंयुतैः ॥१॥
मैत्रेयजी ने कहा- हे भगवन् ! आपने एक हजार श्लोकों से युक्त ८०
अध्याय (पूर्वखंड) में विस्तार पूर्वक सभी जातक को मुझसे कहा।।१।।
संकरात्तत्फलानां तु ग्रहाणां गतिसंकरात् ।
नान्येनहीदृगस्येदमिति वक्तुमलं नराः ॥२॥
किन्तु ग्रहों की गति का परस्पर (संकर) मिश्रण होने से उनके फल में भी
मिश्रण हो जाता है अतः इस प्रमाण से ऐसा फल कहना ऐसा निश्चय कर कहने
को कोई समर्थ नहीं होता है।।२।।
कलौ युगे ततोऽल्पैव बुद्धिः पापोत्तरा नराः ।
अतो न चास्य प्रचयगमनं न प्रयोजनम् ॥३॥
क्योंकि कलियुग में पूर्व युग से अल्प ही बुद्धि के और अधिक पापी होते
हैं अतः उनके लिये इस महान् ग्रंथ का विचार करना और उसके प्रयोजन का कहना
दुर्लभ ही है।।३।।
एतावंतं कलामस्य प्रयोजनं प्रचयगमनं च कथमासीत् इति
शंकायामाह-
अत्र त्रेतायुगे केचिद्द्वापरे च कृतेयुगे ।
कुशाग्रमतयः सर्वे पुण्यभाजश्चिरायुषः ॥४॥
आप यह कह सकते हैं इतने काल पर्यन्त इस ग्रंथ का उपयोग कैसे हुआ
और अब क्यों नहीं हो पा रहा है, इसका उत्तर स्वयं दे रहे हैं- हे मुनीश्वर! इस
त्रेतायुग में, द्वापर में तथा सत्ययुग में मनुष्य कुशाग्रबुद्धि, पुण्यवान् और दीर्घायु
होते थे। अतः वे पूर्व के कहे हुये शास्त्र को देखने और कहने में समर्थ थे।।४।।
५९२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
अतोऽल्पबुद्धिगम्यं यच्छास्त्रमेतद्वदस्य मे ।
लोकयात्रापरिज्ञानमायुषो निर्णयं तथा ॥५॥
इसलिये इस युग (कलियुग) के अल्पबुद्धि वाले लोगों के जानने योग्य शास्त्र
का निर्देश करें जिसके अभ्यास से प्राणियों की लोकयात्रा (सुख दुःख) का परिज्ञान
हो और आयुष्य का निर्णय भी हो सके॥५॥
पराशर उवाच-
साधुपृष्टं त्वया ब्रह्मन्वदामि तव सुव्रत ।
लोकयात्रापरिज्ञानमायुषो निर्णयं तथा ॥६॥
पराशरजी ने कहा— हे ब्रह्मन्! तुमने बड़ा ही अच्छा प्रश्न किया है मैं
लोकयात्रा का ज्ञान और आयुष्य का निर्णय॥६॥
संकरस्याविरोधं च शास्त्रस्यापि प्रसिद्धये ।
प्रयोजनस्य लोकानामुपकाराय तच्छृणु ॥७॥
और ग्रहों की गति की संकरता से फल में विपर्यास होता है इसे भी शास्त्र
की सिद्धता के लिये अविरोध प्रकार और प्रयोजन भी लोकोपकार के लिये कहता
हूँ उसे सुनो॥७॥
भावानांशुभाशुभत्वमाह-
लग्नादिव्ययपर्यंता भावाः संज्ञानुरूपतः ।
फलदाः शुभसंदृष्टायुक्ता वा शोभना मताः ॥८॥
लग्न से लेकर व्यय भाव पर्यन्त सभी भाव यदि शुभग्रह से युक्त वा दृष्ट हों
तो उन भावों के संज्ञानुरूप शुभफल को देते हैं॥८॥
पापदृष्टयुताभावाः कल्याणोतरदायकाः ।
नितरां शत्रुनीचस्थैर्न च मित्रोच्चगैश्च तैः ॥९॥
पापग्रह से दृष्ट या युक्त हों तो अशुभ फल को देते हैं। यदि पापग्रह अपने
शत्रु की राशि में वा नीचराशि में हों तो अत्यंत अशुभ फल देता है किन्तु अपने
मित्र की राशि या उच्चराशि में हों तो शुभफल को ही देता है॥९॥
एवं सामान्यतः प्रोक्तं होराविद्भिस्तु सूरिभिः ।
मयैतत्सकलं प्रोक्तं पूर्वाचार्यानुवर्तिनी ॥१०॥
अष्टकवर्गाध्यायः । ५९३
इस प्रकार होराशास्त्र के जानने वालों ने सामान्य रीति से कहा है उसे मैंने
संपूर्ण पूर्वाचार्यों के अनुसार कहा है॥११०॥
आयुश्च लोकयात्रा च शास्त्रेऽस्मितत्प्रयोजनम् ।
निश्चेतुं तन्न शक्नीति वशिष्ठो वा बृहस्पतिः ॥१११॥
इस शास्त्र में आयु का प्रमाण और मनुष्यों के सुख दुःख का वर्णन है यही
इसका प्रयोजन है। किन्तु उन सबके निर्णय करने में वशिष्ठ या बृहस्पति भी समर्थ
नहीं हो सकते हैं॥१११॥
किं पुनर्मनुजास्तत्र विशेषात्तु कलौ युगे ।
नष्टादिषु च नातीव द्रेष्काणादि फलेषु च ॥११२॥
साधारण मनुष्य कहां से निश्चय कर सकता है। विशेषकर कलियुग में
विशेषकर नष्ट चौर आदि के प्रश्नों के उत्तर द्रेष्काणादि से देने में समर्थ नहीं
हो सकते हैं॥११२॥
आचार्यस्य मुखादेतच्छास्त्रं तु शृणुयाद्बुधः ।
संप्रदायेन यः श्रोतश्चास्मिञ्छास्त्रे महामतिः ॥११३॥
इस शास्त्र को आचार्य के मुख से सुन कर संप्रदायानुसार इसमें परिश्रम करने
वाला पुरुष श्रेष्ठ दैवज्ञ होता है॥११३॥
कर्मज्ञानविदा वेदो द्विधा यद्वत्तदाह्वये ।
होराशास्त्रं द्विधा प्रोक्तं संकीर्णनिश्चयादिति ॥११४॥
जिस प्रकार कर्मकांड और ज्ञानकांड से युक्त वेद एक होते हुये भी दो प्रकार
का है उसी प्रकार से संकीर्ण और निश्चय से यह ज्योति शास्त्र भी दो प्रकार का
है॥११४॥
प्रोक्तः संकीर्णभागस्तु निश्चयांशस्तु कथ्यते ।
योवेत्ति सम्यगेतत्तु दैवज्ञः स उदाहृतः ॥११५॥
इसमें संकीर्णभाग पूर्वार्ध (पूर्वभाग) में वर्णित है और निश्चय भाग को इस
उत्तरार्ध में कह रहा हूँ जो सम्यक् प्रकार से इसे जानता है उसे ही दैवज्ञ कहते
हैं॥११५॥
भावदृष्ट्यांदिषु प्रोक्तानर्थान्सम्यग्विचार्य च ।
समीचीनांस्तु संगृह्य विरुद्धांस्तु परित्यजेत् ॥११६॥
५९४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
तनु आदि बारह भाव और उसपर दृष्टि का योग ठीक-ठीक विचार कर जो
उत्तम बल हों उनको ग्रहण कर हीनवल का त्याग कर दे।।१६।।
आयुर्दायैः परं योगैः फलान्यष्टकवर्गंतः ।
तन्वादीनां तु भावानां सूक्तैर्भावादिभिः फलैः ।।१७।।
ज्ञात्वादौ करणं स्थानं बिन्दुरेखे च वर्गणाम् ।
क्रमादष्टकवर्गस्य पृथक्कृत्य फलं वदेत् ।।१८।।
पहले आयुष्य का ज्ञान करे इसके बाद नाभासादिक योगों के फल का ज्ञान
करें दोनों का ज्ञान हो जाने के बाद प्रत्येक भावों के अष्टकवर्ग के अनुसार करण
और स्थान को बिन्दु और रेखा के स्थान पर मानकर योगकर उन भावों के फल
को कहे।।१८।।
अथ रवेः करणसंख्यां-करणप्रदग्रहांश्चाह-
तनुस्वायुस्त्रिरिष्फेषु पंचकामेऽर्णवाः सुखे ।
अरौ भाग्ये त्रयः पुत्रे षट् करौ खे भवे चभूः ।।१९।।
लग्नेकुजीवशुक्रज्ञास्तन्नौखे मरणेऽपि च ।
रविभौमार्कि चन्द्रार्या व्यये ज्ञेन्दुसितार्यकाः ।।२०।।
अष्टक वर्ग क्या है— प्रायः फलकहने के तीन प्रकार हैं (१) जन्म लग्न
से ग्रहों की स्थिति के अनुसार। (२) चन्द्रलग्न से ग्रहों की स्थिति के अनुसार।
(३) नवांश कुंडली के अनुसार फल कहने की विधि है। जातक के जन्म
लग्न से उसके शरीर के सुख दुःखादि का विचार किया जाता है और चन्द्रमा
से मन का विचार किया जाता है। मन ही की शान्ति एवं अशान्ति और सबलता
वा निर्बलता के अनुसार इहलौकिक और पारलौकिक सभी शुभ अशुभ कार्य
हुआ करते हैं। अतः फलादेश का मुख्य अंग चन्द्रमा ही हुआ, इसलिये ही
आचार्यों ने यह निश्चय किया है कि मनुष्य के जन्म के समय चन्द्रमा जिस
राशि पर हो उस राशि से जिन जिन भावों में ग्रहगण भ्रमण करते हुये जाते
हैं वैसा वैसा ही फल उस उस समय में मनुष्यको होते हैं। इसी को गोचर
फल कहते हैं। किन्तु यह विधि गौण है। क्यों कि सम्पूर्ण मानव मात्र के चन्द्रमा
इन्हीं बारह राशियों में से किसी राशि में रहता है। अतः साधारण गोचर फल
केवल बारह ही प्रकार का होगा किन्तु ऐसा होता नहीं है। इसलिये आचार्यों
अष्टकवर्गाध्यायः । ५९५
ने जन्मकालीन ग्रहस्थिति और जन्मलग्न स्थित राशि इन आठ स्थानों से यदि
गोचर फल का विचार किया जाय तो अवश्य विश्वास योग्य होगा। ऐसा निश्चय
किया है। इसी को अष्टक वर्ग विधि कहते हैं। प्रत्येक जन्मकुंडली में सातग्रह
और जन्मलग्न अर्थात् इन आठ पदार्थों से किसी न किसी स्थान में शुभ और
अशुभ फलों में विशेषता हो जाती है। इसी को आचार्यों ने प्रत्येक ग्रह एवं
लग्न अपने अपने स्थान से जिन जिन स्थानों में शुभ फल देता है इस शुभफल
दायित्व स्थान को रेखा या बिन्दुद्वारा दिखलाया है। किसी आचार्य ने बिन्दु
संकेत से शुभफल माना है और किसी ने रेखा द्वारा शुभ फल माना है इसके
भ्रम में नहीं पड़ना चाहिये चाहे जिस चिह्न से मानाजाय। इस ग्रंथ में शून्य
को करण कहते हैं। अतः सूर्य की करण संख्या कह रहे हैं- सूर्य से १,
२, ८, ३, १२ भावों में पांच पांच करण होता है।, ७, ४ भाव में चार
चार करण होता है। ६, ९ भाव में तीन तीन करण होता है। ५ भाव में ६
करण होता है। १० भाव में दो करण और ११ भाव में एक करण होता
है। १९ अर्थात् सूर्य से १, २, ८ भाव में लग्न, चंद्र, शुक्र और बुध ये
पांच ग्रह करण देने वाले हैं, १२ वें भाव में सूर्य, भौम, शनि, चंद्र, गुरु
ये पांच करण देने वाले हैं।।२०।।
सुखे होरेन्दुशुक्राश्च धर्मेऽर्कार्किकुजा अरौ ।
होराज्ञार्येंदवः कामे भवे दैत्येन्द्रपूजितः ॥२१॥
४ थे भाव में बुध, चन्द्र, शुक्र, गुरु ये चार ग्रह करण देने वाले हैं। नवम
भाव में लग्न, चन्द्र, शुक्र ये तीन ग्रह करण प्रद हैं। ६ भाव में सूर्य शनि, मंगल
ये तीन ग्रह करण देने वाले हैं। ७ भाव में लग्न, बुध, शुक्र, चंद्र ये चार ग्रह करण
देने वाले हैं। ११ भाव में केवल शुक्र करण देने वाले हैं।।२१।।
सहजेऽर्कार्किशुक्रार्यभौमाः खे गुरुभार्गवौ ।
सुतेऽर्कार्कीन्दुलग्नारशुक्राः स्युः करणं रवेः ॥२२॥
तीसरे भाव में सूर्य, शनि, शुक्र, गुरु, मंगल ये पांच ग्रह करण देने वाले
हैं। १० भाव में गुरु, शुक्र ये दो ग्रह करण देने वाले हैं। ५ भाव में सूर्य, शनि,
चंद्र, लग्न, मंगल, शुक्र ये छः ग्रह करण देने वाले हैं। यह सूर्य की करण संख्या
है।।२२।।
? Actually, in Devanagari OCR and transcription of this verse from BPHS: Let's transcribe what is visible: Most faithfully: होरार्कारार्किभृगवोऽङ्गार्केन्द्वार्किभार्गवाः ॥२४॥(or if it looks like झ:होरार्कारार्किभृगवोऽझार्केन्द्वार्किभार्गवाःorहोरार्कारार्किभृगवोऽङ्गार्केन्द्वार्किभार्गवाः). Wait, look at ङ्ग: In Devanagari, ङ्गis composed ofङ+ग. Does it look like ङwith aगunderneath? Yes! Look at it! Top:ङ(short stem, S-shape, with a dot? or just S-shape). Bottom:गsuspended below theङ! In classical Devanagari fonts (like Nirnaya Sagar), the conjunct ligature ङ्गis: an upperङand a lowerगhanging from the bottom of theङ! And to its right is the vowel sign ा(aa-matra)! Wait! An upperङand a lowerगlooks EXACTLY like a letter with a loop at the bottom, and withाit becomesङ्गा! YES! That is the ligature ङ्ग! In old fonts,
अष्टकवर्गाध्यायः । ५९७
दूसरे भाव में लग्न, बुध, सूर्य, चन्द्रमा, शनि और शुक्र, ये ६ करण देने
वाले हैं। तीसरे भाव में केवल गुरु करण देने वाला है। चौथे भाव में सूर्य, शनि,
चन्द्र, लग्न, भौम ये पांच करण प्रद हैं। पाचवें भाव में लग्न, चन्द्र, गुरु, रवि ये
चार करण प्रद हैं। छठे भाव में शुक्र, बुध, गुरु ये तीन ग्रह करण प्रद हैं। सातवें
भाव में भौम लग्न, शनि ये तीन करण प्रद हैं। आठवें भाव में भौम, लग्न, शनि,
शुक्र, चन्द्रमा ये ५ करण प्रद हैं।।२५।।
होराकरार्किविज्जीवाः शनिः खं सकलाःक्रमात्।
नवम भाव में लग्न, सूर्य, भौम, शनि, बुध, गुरु ये ६ ग्रह करण प्रद हैं।
दशम भाव में केवल शनि करण प्रद है, एकादश भाव में शून्य और बारहवें भाव
में सभी करणप्रद होते हैं।
स्पष्टार्थचन्द्रकरणचक्रम्।
| मा. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | ल. | सू. | स. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त. | ० | ० | ० | ० | ० | ५ | |||
| ध. | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ६ | ||
| स. | ० | १ | |||||||
| सु. | ० | ० | ० | ० | ० | ५ | |||
| सु. | ० | ० | ०. | ० | ४ | ||||
| रि. | ० | ० | ० | ३ | |||||
| जा | ० | ० | ० | ३ | |||||
| मृ. | ० | ० | ० | ० | ० | ५ | |||
| ध. | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ६ | ||
| क. | ० | १ | |||||||
| आ | |||||||||
| व्य | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ८ |
| अथ भौमस्यकरणसंख्यांकरणप्रदग्रहांश्चाह- | |||||||||
| व्ययवेश्मसुतस्त्रोषु षट्सप्त धनधर्मयोः ।।२६।। | |||||||||
| होराभृत्योः शरा वेदा विक्रमे खेत्रयः क्षते । | |||||||||
| द्वौभवे शून्यमेवं स्यात्करणं भूमिजस्य तु ।।२७।। | |||||||||
| 'भौम से १२, ४, ५, ७ भाव में ६ करण, २, ९ भाव में ७ करण।।२६।। | |||||||||
| १, ८ भाव में ५ करण, ३ भाव में ४ करण, २ भाव में ३ करण, ६ भाव में | |||||||||
| २ करण, ११ भाव में शून्य करण होते हैं।।२७।। |
५९८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्।
कुजस्यार्केन्दुविज्जीवसिता लग्नशनी च ते ।
सितारगुरुमंदाः स्युर्धर्मोक्तेषु कुजं विना ।।२८।।
भौम से १ भाव में सूर्य, चंद्रमा, बुध, गुरु, शुक्र ये ५ करणप्रदग्रह हैं, २
भाव में लग्न, शनि, सूर्य, चन्द्र, बुध, गुरु, शुक्र ये ७ करणप्रद ग्रह हैं। ३ भाव
में शुक्र, भौम, गुरु, शनि ये ४ करणप्रद हैं। ४ भाव में सूर्य, चंद्र, बुध, गुरु,
शुक्र लग्न ये ६ ग्रह करणप्रद हैं।।२८।।
चन्द्रारगुरुशुक्रार्किलग्नानि कुजभास्करी ।
ज्ञेन्द्वर्कसितलग्नार्या एषु शुक्रं विना ततः ।।२९।।
५ भाव में चन्द्र, भौम, गुरु, शुक्र, शनि, लग्न ये ६ ग्रह करणप्रद हैं। ६
भाव में भौम, शनि ये दो करणप्रद हैं, ७ भाव में बुध, चंद्र, सूर्य, शुक्र, गुरु
ये ६ करणप्रद ग्रह हैं।।२९।।
विना शनिं सप्तधर्मे सितेन्दुज्ञा वियत्ततः ।
अर्कार्किक्षेंदुलग्णाराः करणं प्रोच्यते क्रमात् ।।३०।।
८ भाव में बुध, चंद्र, सूर्य, गुरु, लग्न ये ५ करणप्रद ग्रह हैं, ९ भाव में
सूर्य, चन्द्र, भौम, बुध, गुरु, शुक्र लग्न ये ७ करणप्रद ग्रह है, १० भाव में शुक्र,
चंद्र, बुध ये तीन करणप्रद ग्रह हैं। ११ भाव में शून्य और १२ भाव में सूर्य,
शनि, बुध, चंद्र, लग्न, भौम ये ६ करणप्रद ग्रह हैं।।३०।।
स्पष्टार्थभौमकरणचक्रम्।
| भा. | सू. | चं. | मं. | बु. | वृ. | शु. | श. | ल. | स. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त. | ० | ० | ० | ० | ० | ५ | |||
| ध. | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ७ | |
| स | ० | ० | ० | ० | ४ | ||||
| सु. | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ६ | ||
| सु. | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ६ | ||
| रि. | ० | ० | २ | ||||||
| जा | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ६ | ||
| मृ. | ० | ० | ० | ० | ० | ५ | |||
| ध. | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ७ | |
| क. | ० | ० | ० | ३ | |||||
| आ | |||||||||
| व्य | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ६ |
अष्टकवर्गाध्यायः। ५९९
अथ बुधस्य करण संख्यां करणप्रदग्रहांश्चाह-
तनुस्वगृहकर्मारि धर्मेष्वग्निर्मृतौ करौ ।
मातृस्त्रियों रसा लाभे शून्यं पुत्रे व्यये शराः ॥३१॥
बुध से १,२,४,१०,६,९ भाव में तीन करण, ८ भाव में २ करण, ३,
७ भाव में ६ करण, ११ भाव में शून्य और १२ भाव में ५ करण होता है॥३१॥
बुधस्यार्केन्दुगुरवो गुरुसूर्यबुधाः क्रमात् ।
लग्नाक्रारार्विचंद्रार्या ज्ञाकार्या हि बुधस्यतु ॥३२॥
बुध से १ भाव में सूर्य, चंद्र, गुरु ये तीन करणप्रद ग्रह हैं, २ भाव में गुरु,
सूर्य, बुध ये तीन करणप्रद ग्रह हैं। ३ भाव में लग्न, सूर्य, शनि, चंद्र, भौम, गुरु
ये ६ करणप्रद ग्रह हैं, ४ भाव में बुध, सूर्य, गुरु ये तीन करणप्रद ग्रह हैं॥३२॥
जीवारेन्द्वार्किलग्नानि शुक्रमंदधरासुताः ।
ज्ञेन्दुलग्नार्कशुक्रार्या ज्ञाकौ जीवेन्दुलग्नकाः ॥३३॥
अकार्यशुक्राः शून्यं च होरेन्द्वारार्किभार्गवाः ।
५ भाव में गुरु, भौम, चंद्र, शनि, लग्न ये ५ करणप्रद ग्रह हैं। ६ भाव में
शुक्र, शनि, भौम ये तीन करणप्रद ग्रह हैं। ७ भाव में बुध, चंद्र, लग्न, सूर्य, शुक्र,
गुरु ये ६ करणप्रद ग्रह हैं, ८ भाव में बुध, सूर्य ये दो करणप्रद ग्रह हैं। ८ भाव
में बुध, सूर्य ये दो करणप्रद ग्रह हैं। ९ भाव में गुरु, चंद्र, लग्न ये ३ करणप्रद ग्रह
हैं, १० भाव में सूर्य, गुरु, शुक्र ये तीन करणप्रद ग्रह हैं, ११ भाव में शून्य और
१२ भाव में लग्न, चंद्र, भौम, शनि, शुक्र ये ५ करणप्रद ग्रह हैं॥३३॥
स्पष्टार्थबुधकरणचक्रम्।
| मा | सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | ल. | स |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त. | ० | ० | ० | ३ | |||||
| ध. | ० | ० | ० | ३ | |||||
| स. | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ६ | ||
| सु. | ० | ० | ० | ३ | |||||
| सु. | ० | ० | ० | ० | ० | ५ | |||
| रि. | ० | ० | ० | ३ | |||||
| जा. | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ६ | ||
| मृ. | ० | ० | २ | ||||||
| क. | ० | ० | २ | ||||||
| धः | ० | ० | ० | ३ | |||||
| आ | |||||||||
| व्य | ० | ० | ० | ० | ० | ५ |
६०० · बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
अथ गुरोः करण संख्यां करणप्रदग्रहांश्चाह-
रूपं धनाययोः खे द्वौ व्यये सप्तक्षतेऽर्णवाः ॥३४॥
गुरु से २ रे भाव में १ करण, १० भाव में २ करण, ११ भाव में १ करण,
१० भाव में २ करण, १२ भाव में ७ करण, ६ भाव में ४ करण ।। ३४ ।।
मृतिविक्रमयोः पंच गुरोः शेषेषु वह्नयः ।
शुक्रेन्दुमंदा लग्ने स्वे आये मंदश्च विक्रमे ।। ३५ ।।
८, ३ भाव में ५ करण और शेष भावों (१, ४, ५, ७, ९) में ३ करण
होते हैं। गुरु से १ भाव में शुक्र, चंद्र, शनि ये तीनग्रह करणप्रद हैं, २ और ११
भाव में केवल शनि करणप्रद है ।। ३५ ।।
लग्णारेन्दुज्ञभृगवः सुतेऽकार्यकुजा गृहे ।
शुक्रमंदेदवो द्यूने बुधशुक्रशनैश्चराः ।। ३६ ।।
३ भाव में लग्न, भौम, चंद्र, बुध, शुक्र ये पांच ग्रह करणप्रद हैं। ५ भाव
में सूर्य, गुरु, भौम ये तीन करणप्रद हैं, ४ भाव में शुक्र, शनि, चंद्र ये तीन ग्रह
करणप्रद हैं, ७ भाव में बुध, शुक्र, शनि ये तीन ग्रह करणप्रद हैं ।। ३६ ।।
जीवाराकैन्दवः शत्रौ मंदं विना व्यये सर्वे ।
कर्मणीन्दुशनी धर्मे मंदारगुरवो मृतौ ।। ३७ ।।
६ भाव में गुरु, भौम, सूर्य, चन्द्र ये चार ग्रह करणप्रद हैं, १२ भाव में
शनि को छोड़कर सभी ग्रह करणप्रद हैं, १० भाव में चंद्र, शनि ये २ ग्रह, ९
भाव में शनि, भौम, गुरु ये तीन ग्रह करणप्रद हैं ।। ३७ ।।
स्पष्टार्थगुरुकऱणचक्रम् ।
| मा | सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | ल. | स |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त. | ० | ० | ० | ३ | |||||
| ध. | ० | १ | |||||||
| स. | ० | ० | ० | ० | ० | ५ | |||
| सु. | ० | ० | ० | ३ | |||||
| सु. | ० | ० | ० | ३ | |||||
| रि. | ० | ० | ० | ० | ४ | ||||
| जा | ० | ० | ० | ३ | |||||
| मृ. | ० | ० | ० | ० | ० | ५ | |||
| ध. | ० | ० | ० | ३ | |||||
| क. | ० | ० | २ | ||||||
| आ. | ० | १ | |||||||
| व्य | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ७ |