चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
८१ १ (बीकानेर प्रतिके प्रकाशित पाठके आधारपर) पहिले गावउँ सिरजनहारा । जिन सिरजा इह देषस यपारा ॥१ सिरजसि धरती और अकासू । सिरजसि मेरु मँदर कबिलासू ॥२ सिरजसि चाँद सुरुज उजियारा । सिरजसि सरग नखत का मारा ॥३ सिरजसि छाँह सीउ औ घूपा । सिरजसि फिरतन और सरूपा ॥४ सिरजसि मेघ पवन अँधकारा । सिरजसि बीजु करै चमकारा ॥५ बाफर सबै पिरिथिमी, कहेउँ एक सो गाइ ॥६ हिय पषरै मन हुलसै, दूसर चित न समाइ ॥७ टिप्पणी-(१) सिरजनहारा-सृष्टिकर्त्ता, ईश्वर । यपारा-वायु । (२) मेरु-सुमेरु पर्वत । मँदर-मन्दराचल । कबिलास-(कैलास> कब्लास>कबिलास (बकारका प्रक्षेप-कबिलास) कैलास पर्वत; ऊँचे महल और स्वर्गके अर्थमें भी जायसी आदिने कबिलासका प्रयोग किया है। (४) सीउ-शीत ! (५) अँधकारा-अन्धकार । बीजु-बिजली । ६ (बीकानेर प्रतिके प्रकाशित पाठके आधारपर) पुरुख एक सिरजसि उजियारा । नाँउ मुहम्मद जगत पियारा ॥१ तहिँ लगि सपै पिरिथिमी सिरी । औ तिह नाँउ मौनदी फिरी ॥२ टिप्पणी-(२) मौनदी-मुनादी; ढिंढोरा । ७ (बीकानेर प्रतिके प्रकाशित पाठके आधारपर) अबाबकर उमर उसमान, अली सिंघ ये चारि ॥६ ये निहचु कर बिज तिस, तुरहि झाले मारि ॥७ टिप्पणी-(१) मुहम्मद साहबके पश्चात् अबा बकर (अबू बकर) (६३२-६३४ ई ) उमर (६३४-६४४ ई ) अली (६४४-६५६ ई ) और उसमान ९
८२ (६३२-६६१ ई ) क्रमशः उनके उत्तराधिकारी खलीफ़ा हुए। ये चार यारक नामसे पुकारे जाते हैं। अबू बकर सिद्दीक (सत्यवादी) उमर फ़ारूक (न्यायी) उसमान विनम्र और अली आलिम (विद्वान) कहे जाते हैं। ८ (बीकानेर प्रतिके प्रकाशित पाठके आधारपर) साहि फिरोज दिल्ली बड़ राजा। छात पाट औ टोपी छाबा ॥१ एक पण्डित औ है पखिआहा। दान अपूरिस सराहै काहा ॥२ टिप्पणी-(१) फिरोजशाह-फीरोजशाह तुगलकवंशीय दिल्ली सुल्तान गयासुद्दीन तुगलकके छोटे भ्राता रजबका पुत्र और मुहम्मद तुगलकका चचेरा भाई था। मुहम्मद तुगलककी मृत्युके पश्चात् वह २३ मार्च १३५१ ई को सुल्तान घोषित किया गया और ३७ वर्षतक शासन करनेके पश्चात् २१ सितम्बर १३८८ ई को उसकी मृत्यु हुई। उसके समयमें प्रजा अपेक्षाकृत सुखी और समृद्धिपूण थी। छात-छत्र। पाट (त पट्ट) - राजपाट सिंहासन। टोपी-मुकुट। छाबा- (प्रा काच्छादेण कृञ्ज) सुशोभित होना । ९ (बीकानेर प्रतिके प्रकाशित पाठके आधारपर) सेख जैनदी हौ पखिलाना। धरम पन्थ सिंह पाप गँवाना ॥१ पाप दीन्ह मैं गाँग बहाई। धरम नाव हौ सीन्द चढ़ाई ॥२ टिप्पणी-(१) संख जैनदी- शेख जैनुद्दीन सुप्रसिद्ध चिश्ती सन्त हजरत नसीरुद्दीन महमूद लखमी 'चिराग ए-दिल्ही' की बड़ी बहनके बेटे थे। बड़ी बहनके बेटे होनेके साथ साथ वे उनके शिष्य और साहिबे पाख (मुख्य लेखक) भी थे। ११ (बीकानेर प्रतिके प्रकाशित पाठके आधारपर) खानजहाँ घरि जुग जुग खानी। अति नागर गुनबन्त बिनानी ॥१ चतुर सुजान मारु सब जाना। रूपवन्त मन्तरी सुखाना ॥२
८१ टिप्पणी—(१) खानजहाँ—यह दिल्लीके तुगलकवंशीय सुल्तानोंकी ओरसे दी जाने वाली एक उपाधि थी। यहाँ खानजहाँसे तात्पर्य खानजहाँ मक़बूलसे है, जिन्हें खाने-आज़म और कवाम-उल-मुल्ककी भी उपाधि प्राप्त थी। वे मूलतः तेलंगानाके निवासी ब्राह्मण थे और उनका नाम कन्नू था। मुसलमान हो जानेपर वे सुल्तान मुहम्मद तुगलकके कृपापात्र बने। निरक्षर होते हुए भी वे अत्यन्त कुशाग्र बुद्धि थे। मुहम्मद तुगलक उनका अत्यन्त सम्मान करता था। फीरोज तुगलक ने उन्हें अपना वज़ीर नियुक्त किया। वे फीरोजशाहके इतने विश्वास- पात्र थे कि जब कभी वह राजधानीसे बाहर रहता उस समय वे ही उसका प्रतिनिधित्व करते थे। वे अत्यन्त धार्मिक, प्रभावोत्पादक और दीनबन्धु थे। सुप्रसिद्ध इतिहासकार अफ़ीफ़ने उनके जीवन चरित और उनके कार्योंका बड़े विस्तारसे वर्णन किया है। उसका कहना है कि ख़ॉनजहाँ मक़बूल चिश्ती सन्त नसीरुद्दीन महमूद अवधीके मुरीद (भक्त) थे। ७७२ हिजरी (१३७४ ई ) में उनकी मृत्यु हुई। १२ ( बम्बई १ ) ऐजन; बहु, पी मदहे खानजहाँ दर बाबे अदल व इन्साफ ( बहो खानजहाँकी प्रशंसा और उसके न्यायकी चर्चा ) एक खम्भ मेदिनि कहँ कीन्हा। डोल परै जो होत न दीन्हा ॥१ एकै पैरैं लोग चढ़ावइ। कर गुन खीचि तीर लइ लावइ ॥२ हिन्दू तुरुक दुहूँ सम राखै। सत जो होइ दुहुन्ह कहँ भाखै ॥३ गउव सिंह एक पन्थ रँगावइ। एक घाट दुहुँ पानि पियावइ ॥४ एक दीठि देखइ सँसारू। अधल न चलै चलै बेवहारू ॥५ मेरु धरनि जस भारन, सग मारन संस्यार ॥६ खानजहानहु कौन बड़ाई, बड़ जो कीन्हि करतार ॥७ टिप्पणी—(४) गउव—गौ गाय। वासुदेवशरण अग्रवालकी धारणा है कि यह सम्भवतः (रा ) गवय (नील गाय)का रूप है। जंगलमें नील गाय और शेरका मिलना और एक ही मागपर साथ चलकर पानी पीना अधिक सम्भव है (पद्मावत, पृ १५)। किन्तु अवधी-भोजपुरी क्षेत्रोंमें गायके लिए ही गउव सामान्य और प्रचलित शब्द है।
८४ १३ ( होकर प्रति ) मम्हूदे मालिक उरू-उमरा मलिक मुबारिक इब्न मालिक बयाँ मरतअ श्मूह बूद ( मालिक बयाँ के पुत्र मालिक मुबारिककी प्रशंसा ) मलिक मुबारिक दुनि क सिंगारू । दान जूझ बड़ बीर अपा[रू*] ॥१ खड़ग राहूँ रूँदि परहिं पहारा । बासुकि काँपैं नाहिं उबारा ॥२ काध छोरइ रकत बहावइ । धर सिर धन तिन्ह माँझ परापइ ॥३ बिधना मारि दस महँ आनी । मागहिं राह छोड़ि निसि रानी ॥४ बिन्द सर दह मुदगर फर पाठू । फेरि नहिं धरै सीध कें पाठू ॥५ जिन्ह जग परा भगानौँ, छोड़ देस नृप भाग ॥६ बीर देखि सरब रुण्ड, गय ते भयौँ लाग ॥७ टिप्पणी—(१) मालिक मुबारिक—इनके सम्बन्धकी जानकारी अन्यत्र उपलब्ध नहीं है। इस ग्रन्थ से केवल इतना ही ज्ञात होता है कि ये मालिक बयाँके पुत्र और डालमऊके मीर (न्यायाधीश) थे। सम्भवतः उन्हें मालिक- उरू उमराकी उपाधि प्राप्त थी। बहुत सम्भव है कि ये चन्दायनके रचयिता मौलाना दाऊदके पिता हों। डालमऊके किलेके लश्करम एक कब्र है जिसे लोग शेख मुबारिककी कब्र बताते हैं। उनके सम्बन्धमें कहा जाता है कि वे सैयद सालार मसूद गाजीके साथ आये थे। नाम साम्यके कारण मित्रों ने उनकी ओर मेरा ध्यान आकृष्ट किया है। किन्तु वे इन मलिक मुबारिकसे सर्वथा भिन्न थे। १७ (बीकानेर प्रतिके प्रकाशित पाठके आधारपर) बरिख सात सै होइ इक्यासी । तिहि आइ कवि सरसेठ भासी' ॥१ साहि फिरोज दिल्ली सुरुतान् । जौनासाहि वजीरु बखानू ॥२ डलमठ नगर बसे नवरंगा । ऊपर कोट तले बहि गंगा ॥३ धरमी लोग बसहिं भगवन्ता । गुनगाहक नागर जसबन्ता' ॥४ मलिक बयाँ पूत उबरन भीरू । मलिक मुबारिक तहाँ के पीरू ॥५
८५ [ ] ॥६ [ ] ॥७ पाठान्तर—परशुराम चतुर्वेदीने इस कड़बकके प्रथम चार पंक्तियोंका त्रिलोकीनाथ दीक्षितसे प्राप्त एक पाठ प्रकाशित किया है (हिन्दी साहित्य द्वितीय खण्ड, पृ २७, पाद टिप्पणी २)। यह उन्हें किसी मौखिक परम्परासे प्राप्त हुआ था (हमारे नाम दीक्षितका १९ अगस्त १९५६ का पत्र)। उसमें प्राप्त मुख्य पाठान्तर इस प्रकार हैं— १—इते उन्यासी २–रहिया यह फणि सरस अमासी ३-चितवन्ता । टिप्पणी—(१) जौनासाहि—यह फीरोजशाह तुगलकके वजीर खानजहाँ मकबूलके पुत्र थे। उनका जन्म उस समय हुआ जब खानजहाँके अधिकारमें मुल्तानका इक्त था। उस समय सुल्तान मुहम्मद तुगलकने स्वयं फरमान भेज कर शिशुका नामकरण जौनाशाह किया था। उसे उस समय सुप्रसिद्ध सन्त जकरिया मुल्तानीके नाती सुहरवर्दी सन्त रुक्नुद्दीनका भी आशीर्वाद प्राप्त हुआ था। पिताकी मृत्युपर जौना शाह ७७२ हिजरी (१६७ ई) में फीरोजशाह तुगलकके वजीर हुए और उन्हें भी खानजहाँकी उपाधि मिली। उनकी ख्याति अत्यन्त मेधावी और दूरदर्शी राजनीतिज्ञके रूपमें है। वे बीस बरसों तक फीरोजशाहके विश्वस्त सलाहकार रहे। किन्तु अन्तिम दिनोंमें उनका सुल्तानके अधिकारोंके प्रश्नको लेकर शाहजादा मुहम्मदसे जो पीछे सुल्तान बना मनमुटाव हो गया। निदान ७८१ हिजरी (सन् १३८६ ई ) में वे वजीरके पदसे हटा दिये गये और उनका मकान लूट लिया गया। उसी वर्ष उन्हें मलिक याकूब उर्फ सिकन्दर खाँने मार डाला। (२) डलमऊ—यह उत्तर प्रदेशके रायबरेली जिलेका एक प्रसिद्ध कस्बा है और रायबरेलीसे ४४ मील और कानपुरसे ६१ मील पर स्थिति रेलवे जंक्शन है। यहाँ गंगाके कगारके ऊपर किलेका भग्नावशेष अब भी मौजूद है। १८ (बीकानेर प्रतिके प्रकाशित पाठके आधारपर) गोबर फह्रां महर फर ठाऊँ। कूवा पाइ बहुत अँभराऊँ ॥१ नरियर गोवा कें तहँ रूखा। देखत रहै न लागे भूखा ॥२
८४ १३ ( होकर प्रति ) महूरे मलिक उल-उमरा मलिक मुबारिक इब्न मलिक वर्षा मखदूम रफूह कूद ( मलिक बयाँ के पुत्र मलिक मुबारिककी प्रशंसा ) मलिक मुबारफ दुनि क सिंगारू । दान जूस पड़ वीर अपा[रू०] ॥१ खड्ग खाइ तैंहि परहिं पहारा । बासुकि काँपै नाहिं उबारा ॥२ फाघ तोरइ रकत पहापइ । घर सिर वन विन्ह माँस परापइ ॥३ बिछना मारि दस महँ आनी । मागहिं राइ छाड़ि निसि रानी ॥४ जिन्ह सर दइ मुदगर कर पाळू । फिरि नहिं घरै सीध क पाऊ ॥५ सिन्धु अग परा भगानाँ, छाड़ देस नृप भाग ॥६ फीर पेन्ह सरब रुण्ड गये ते भयाँ छाग ॥७ टिप्पणी—(१) मलिक मुबारिक—इनके सम्बन्धकी जानकारी अन्यत्र उपलब्ध नहीं है । इस ग्रन्थ से केवल इतना ही ज्ञात होता है कि ये मलिक बयोंके पुत्र और डलमऊके मीर (न्यायाधीश) थे । सम्भवतः इन्हें मलिक उल-उमराकी उपाधि प्राप्त थी। बहुत सम्भव है कि ये चन्दायनके रचयिता मौलाना दाऊदके पिता हों । डलमऊक किलेके खण्डहर में एक कब्र है जिसे लोग शेख मुबारिककी कब्र बताते हैं। उनके सम्बन्धमें कहा जाता है कि वे सैयद सालार मसूद गाजीके साथ आये थे। नाम साम्यके कारण मित्रों ने उनकी ओर मेरा ध्यान आकृष्ट किया है। किन्तु वे इन मलिक मुबारिकसे सर्वथा भिन्न थे। १७ (बीकानेर प्रतिके प्रकाशित पाठके आधारपर) वरिस सात सै होइ इक्यासी । तिहि बाद कमि सरसेउ मासी' ॥१ साहि फिरोज दिल्ली सुरतान् । जौनासाहि वजीरु बखान् ॥२ डलमउ नगर बसे नभरगा । ऊपर कोट तले यहि गंगा ॥३ धरमी लोग बसहिं मगवन्ता । गुनगाइक नागर बसवन्ता' ॥४ मलिक बयाँ पूत ठघरन पीरू । मलिक मुबारिफ तहाँ के मीरू ॥५
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(६) बर—बड़ । पीपरा—पीपल । मंदिकी—इसकी । सेवार—अधिक । (७) बारी—बगीचा । २० ( रीकैण्ड्स २ ) सिफते बुतखानः बर हौज व मानदन जोगियान मकान व अस्नान हरु (सरोवरके ऊपर स्थित मन्दिरका वर्णन जहाँ चौ-पुदथ जोगी रहते हैं।) नारा पोखर कुण्ठ बनाये । मढ़ि देव जेहि पास उठाये ॥१ अनफाट नितइ आवहिं तहाँ । औ मगवन्त रहें तिह महाँ ॥२ निष [अ - - - ] छाये । पुरुख नाँउँ तिह ठौर न जाये ॥३ भेरा डँवरू ढाक बजाये । समद सुहाष इँदर मन माये ॥४ जोगी सहस पाँच एक गावहिं । सींगी पूरहिं भसम चढावहिं ॥५ सिद्ध पुरुख गुन आगर, देखि लुभाने ठाउँ ॥६ कहत सुनत अस आनै, दूनि चलि देखें जाउँ ॥७ टिप्पणी—(१) मढ़ि-मण्डप, देवस्थान । (४) भेरा-मुँहसे फूँककर बजानेवाला बड़ा बाजा । डँवरू—डमरू । ढाक-टंकार। (५) सींगी-(सं श्रृंग) सींगका बना फूकनेका बाजा । २१ ( रीकैण्ड्स ३ : पंजाब [१] ) सिफते शेज व स्तायशे आबे उ गोयद (सरोवर और उसके निर्मल जल का वर्णन) सरवर एक सफरि भरि रहा । झरनों सहस पाँच तिह पहा ॥१ अति अवगाह न पायइ थाहा । बातैं चूक सराहउँ काहा ॥२ [बास केमूरैं कह नित आवई] । देखत मोतीधूर सुहावई ॥३ [हुँवर लाख दोइ पानी चाहैं] । तीर पैठि ते लेहिं भर आवैं ॥४ [ठाँठ ठाँउ बैठे रखपारा] । पोर नहाइ न कोऊ पारा ॥५ [आप होइ महरहिं कै, - सों कह ] नी पाट ।६ [पाप रूप सरवर कै, रोवत माँ]घी घाट ॥७
८४ दारिउँ दाख बहुत लै लाई। नारिंग हरिफ फरै न आई ॥३ कटहर तार फरे अभिरामा। जामुन के गिनती को जाना ॥४ [ ]। [ ]॥५ बाँस खजूर बर पीपरा, बैंबिली भई सेबार ॥६ राय महर कै बारी, देखत होइ अँधियार ॥७ टिप्पणी—(१) गोवर—दौलतक़ाज़ीने अपने सति मयना उ कोर-चन्द्राउनीमें इसका नाम गोहारि दिया है। उसकी विवेचना करते हुए हरिनारायण द्विवेदीने उसे ग्वालियर बतानेका प्रयत्न किया है (साधन कृत मैना सत पृ १११-११४)। किन्तु गोवर अगर ग्वालियरसे सर्वथा भिन्न था यह छिताईवार्ताके साक्ष्यसे सिद्ध है। अगरचन्द नाहटाको इसकी जो प्रति मिली है उसमें देवनन्दनने दामोदरका परिचय देते हुए उनका जन्मस्थान गोवर बताया है (कायस्थया दामोदरौ आता। गोवर गिरी तिनकी उत्पाता ॥) और अपने जन्मस्थानके रूपमें ग्वालियरका नाम लिया है (देवीसुत कवि विठलनडु माउ। जन्म भूमि गोपाचल गाऊं ॥)। लोक-कथाओंमें इसका नाम गौर या गौराके रूपमें आता है। सतीशचन्द्रदासका कहना है कि यह मालदा जिले (बंगाल) में है। (जर्नल आव द मिक्किक सोसाइटी खण्ड २५, पृ १२२)। सत्यव्रत सिन्हाने लिखा है कि बिहारके शाहाबाद जिलेमें डुमराँव तहसीलमें गठरा नामक ग्राममें अहीरोंकी एक बहुत बड़ी बस्ती है। लोरिकीके गायकसे यह ज्ञात हुआ कि लोरिक इसी गठराका रहनेवाला था। अहीरों की बड़ी बस्ती से हम यह अनुमान कर सकते हैं कि लोरिकका स्थान वही है (भोजपुरी लोकगाथा पृ १२)। प्रस्तुत काव्यमें जो भौगोलिक सूत्र उप- लब्ध हैं उनसे ज्ञात होता है कि गोवर गंगा नदीसे बहुत दूर न रहा होगा। गोवर के निकट देवहा नदी होने का पता भी इस काव्यमें मिलता है। देवहा नदीकी पहचान होनेपर इस स्थानका निश्चय अधिक प्रामाणिकतासे किया जा सकेगा। अभी इसके सम्बन्धमें इतना ही कहा जा सकता है कि यह गंगाके मैदानमें पूर्वी उत्तरप्रदेश अथवा बिहारमें कहीं रहा होगा। कूप—कूप। बाई—बापी। अँवराउँ—आम्राराम; आम का बगीचा। (२) गौवा—(सं गुवाक) एक प्रकारकी सुपारी। करिवर—नारियल। (३) दारिउँ—दाड़िम, अनार। दाख—अंगूर। (४) कटहर—कटहल। तार—ताड़।
(६) बर—बड़। पीपरा—पीपल। अंबिकी—इमली। सेबार—अंभिक। (७) बारी—बगीचा। २० (रीडिंग्स् २) सिफते बुतखानः बर हौज व मानदन जोगियान मदान व कनान इरा (सरोवरके ऊपर स्थित मन्दिरका वर्णन जहाँ की-मुख्य जोगी रहते हैं।) नारा पोखर कुण्ड खनाये। मढ़ि देष जेहिं पास उठाये ॥१ कानफाट नितइ आवहिं तहाँ। औ भगवन्त रहैं तिह् महाँ ॥२ सिव [अ - ] छाये। पुरुष नाँउँ तिह ठौर न जाये ॥३ मेग सँबरू डाफ बजाये। सबद सुहाव इँदर मन माये ॥४ जोगी सहस पाँच एक गावहिं। सींगी पूरहिं भसम चढ़ावहिं ॥५ सिद्ध पुरुष गुन आगर, देखि लुभाने ठाठँ ॥६ कहत सुनत अस आवैं, दुनि चलि देखूँ जाठँ ॥७ टिप्पणी—(१) मढ़ि-मण्डप देवस्थान। (४) मेग-मुँहसे फूँककर बजानेवाला बड़ा बाजा। सँबरू—डमरू। डाफ-डंफा। (५) सींगी-(स शृंग) सींगका बना फूकनेका बाजा। २१ (रीडिंग्स् ३ : पंजाब [प] ) सिफते हौज व कताफते आबे उ गोयद (सरोवर और उसके निर्मल जल का वर्णन) सरवर एक सफरि भरि रहा। झरनाँ सहस पाँच तिह बहा ॥१ अति अवगाह न पायइ थाहा। घातें कूफ सराहउँ काहा ॥२ [घास फेफरें फह नित आवइँ]। देखत मोतीचूर सुहावइँ ॥३ [हुँवर लाख दोइ पानी बाहें]। तीर बैठि से लेहिं भर आहैं ॥४ [ठाँउ ठाँउ बैठे रखवारा]। छोर नहाइ न फेंक पारा ॥५ [आप होइ महरई के, - धोँ कह ] नी पाट ।६ [पाप रूप सरवर कै, रोवत धोँ]वी पाट ॥७
८८ पाठान्तर—१-भावा। २-मुरावा। टिप्पणी—२ '...' प्रतिका यह पृष्ठ पड़ा है जिसके कारण अंतिम तीन चमरौंकी पूर अद्याभियों तथा मध्यका अभिप्राय नष्ट हो गया है। पंजाब प्रतिका उद्धरण फोटो भी अत्यन्त अस्पष्ट है जिसके कारण पत्रांक के नर अर्धांश समुचित उद्धार सम्भव न हो सका। (१) सङ्गरी—मछली। सुमर पात भी सम्भर है—सुमर सरोवर रंघा बन्हि कराहि (पदमावत)। (२) अनगाह (सं —अगाध वराण्ड प्रच्छेउले अवगाह)—गम्भीर, अथाह। कूड—समाप्त हो गया। २३ ( ई०प्र० ४ ) सिफते बानावरी दर औ हौद गोवर (सरोवर के जन्तुओं का वर्णन) पैरहिं हंस माँछ पहिराहं। चकवा चकवी केलि फराहीं ॥१ दबला डेंक बैठ झरपाये। बगुला बगुली सहरी खाये ॥२ बनसेने सुबन पना जल छाये। अरु जलकुकुरी कर छाये ॥३ पसरीं पुरइं मूल मतूला। हरियर पात छह रात फूला ॥४ पाँखी आइ देस फन परा। कार कैंरबवा जलहर भरा ॥५ सारस कुरलहिं रात, नींद तिल एक न आवइ ।६ सबद सुहाव कान पर, जागहिं रैन बिहावइ ॥७ टिप्पणी—(१) डंक—धौंजा बगुला। सहरी—सफरी मछली। (४) पसरी—(स प्रसार) फैली। पुरइं—पुरइन (सं पद्मिनी) कमल की बेल। हरियर—हरी। पात—पत्ती। रात—(स रक्त) लाल। ( ) पाँखी—पक्षी। देस कर (मुहावरा)—नाना प्रकारक। कार— काला। करंवा—करज पक्षी विशेष। (६) कुरकहिं—तहकते हैं। २४ ( ई०प्र० ५ ) सिफत खन्दक कर गिर्दे शहर गोवर गोयद ( गोवर नगर की खाई का वर्णन ) आइ देख गोवर [केँ] खाइ। पुरिख पचास केर गहराई ॥१
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८८ पाठान्तर—१-आवा । २-सुहाबा । टिप्पणी—दीवेड्स प्रतिका यह पृष्ठ फटा है जिसके कारण अंतिम तीन चमक्रौकी पूर्व अर्द्धालियों तथा घत्तारो अभिसाख नष्ट हो गया है । पंजाब प्रतिका उपलब्ध फोटो भी अत्यन्त अस्पष्ट है जिसके कारण पप्ताके नष्ट अंशोंका समुचित उद्धार सम्भव न हो सका । (१) सफरी—मउली । सुभर पात भी सम्भव है—सुभर सरोवर हया चंकेि कराहिं (पद्मावत) । (२) अवगाह (सं —अगाध वकारके प्रस्लेवसे अवगाह)—गम्भीर, अथाह । बुडू—समाप्त हो गया । २३ ( रीवेड्स ४ ) सिफते जानावरों दर औं हौज गोयद ( सरोवरके जन्तुओंका वर्णन ) पैरहिं हंस माँछ महिंराहीं । चकवा चकवी केरि कराहीं ॥१ दबला ढेंक बैठ झरपाये । बगुला बगुली सहरी खाये ॥२ बनछेद सुबन पना जल छाये । अरु जलकुक्कुरी चर छाये ॥३ पसरी पुरइं कूल मतूला । हरियर पात बस रात फूला ॥४ पोंछी आइ बेस कर परा । फार फँरजवा अलहर भरा ॥५ सारस कुरलहिं रात, नींद तिल एक न आवइ ।६ सबद सुहाव कान पर, जागहिं रैन बिहावइ ॥७ टिप्पणी—(१) ढेंक—भोजन बगुला । सहरी—सफरी मछली । (४) पसरी—(ध प्रकार) फैली । पुरईं—पुरइन (सं पुण्ड्रिनी), कमल- की बेल । हरियर—हरी । पात—पत्ती । रात—(स रक्त) लाल । (५) पोंछी—पक्षी । बेस कर (मुहावरा)—नाना प्रकारके । कार— काला । फँरजवा—करज पक्षी विशेष । (६) कुरलहिं—रहते हैं । २४ ( रीवेड्स ५ ) सिफत रबक दर गिर्द शहर गोबर गोयद ( गोबर नगरकी खाईका वर्णन ) खाई देख गोवर [के] खाइ । पुरिस पचास फेर गहराई ॥१
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१ २६ ( रौकेन्स ० ) सिफत बहके-बाहर बस वस्ना महल्ल दरत्रों शाहरे-मज़कूर ( उक्त नगरके निवासियोँका वर्णन ) बाँभन खत्री बसहिं गुबारा । गहरवार औ आगरवारा ॥१ बसहिं तिवारी औ पचवानौं । घागर धूनी औ इजमानौं ॥२ बसहिं गँधाई औ बनजारा । सात सरावग औ बनवारा ॥३ सोनी बसहिं सुनार बिनानी । राउत लोग बिसाती आनी ॥४ ठाकुर बहुत बसहिं चौहानों । परजा पौनि गनति को जानौं ॥५ बहुत आस दरभर अधह, खोरहिं डीढ न बाइ ।६ सँस पा देस गोवर, मानुस चलत भुलाइ ॥७ टिप्पणी-(१) बाँभन-ब्राह्मण । खतरी-खत्री अथवा क्षत्रिय । गुबारा-आभीर अहीर । गहरवार-गहड़वाल राजपूतोंका एक वर्ग । आगरवारा- अग्रवाल वैश्योंका एक प्रमुख वर्ग । (२) तिवारी-त्रिपाठी ब्राह्मणोंका एक वर्ग । पचवानौँ-पंचम वर्ण । घागर-निम्न वर्गकी एक जाति जिनकी स्त्रियाँ जन्मके अनन्तर शिशुके नाल काटने और सूतिका-गृहके अन्य काम करती थीं । इजमानौं-इमाम, साहु । (३) गँधाई-गन्धी, तैल सुगन्धितका काम करनेवाले । बनजारा- ( स वाणिज्यारक > बाणिज्जारक ) व्यापारी, यह सार्थवाह शब्दका मध्यकालीन पर्यायवाची था और इसका प्रयोग उन व्यापारियोंके लिए किया जाता था जो टाँड लाद कर ( सामूहिक रूपसे माल लाद कर ) दूर देशोंसे व्यापार करने जाया करते थे । सरावग-( स श्रावक ) जैन धर्मावलम्बी गृहस्थ । बनवारा- बरणवाल वैश्योंकी एक जाति पनवारा पाठ भी सम्भव । उस समय इसका अर्थ होता-पानवाला बरई । (४) सोनी-सोनेका काम करनेवाले । बिनानी-विज्ञानी । राउत- ( स -राजपुत्र > राउत > राउत् > राउत ) राजपूतोंका वर्ग विशेष मूलतः यह राजघरौँसे सम्बन्ध रखनेवाले लोगोंकी उपाधि थी । बिसाती-फेरी लगाकर बेचनेवाले व्यापारी ।
९१ (५) ठाकुर—क्षत्रियौंकी उपाधि भोजपुरी-अवधी आदि प्रदेशोंम यह क्षत्रिय जातिका बोधक है। परजा पानि—सेवाकाज करनेवाले लोग। (६) खोर—गली रास्ता मार्ग। हूँड—टटोहना, ढूँढना। (७) तैस—ऐसा। का (क्रिया)—है। २७ (रिउण्ड्यस ८) सिफते मजलिस चरकधन्बन्वान राय महर गोयद (राय महरके सैनिकों (?) का वर्णन) राजकुरँ कँ पीस ठठारी। हम पुनि तहाँ बैठहिं बाठी ॥१ अति बिधवाँस पँडित ते बड़े। रूपमरार दयी के गढ़े ॥२ अधरन लागे पान पभाही। मुख मँह दाँत सड़सो जिहँ माहीं ॥३ दान शूज कर विरुद बुलावहिं। माटहिं कयपर घोर दिखावहिं ॥४ हाथ खरग धीरहि सर दीन्हें। धीरहि ऊपर धीरा लीन्हें ॥५ झेतस फरे राज नित, भूँजहि सासन गाँव ।६ देस कँ डाँड आठ महरँ कहुँ, तिहँ गउरहुँ कै नाँउ ॥७ टिप्पणी—(१) इस यमकका सन्तोषजनक पाठोद्धार सम्भव नहीं हो सका। प्रथम बाचनके समय हमने पूर्वपदको 'राज करें कै फेस उठाइ पढ़ा था पर आगेक यमकोंके प्रसगमें यह पाठ असंगत जान पड़ा। प्राय ही यह परिवर्तित पाठ भी सन्दिग्ध है विशेषरूपसे अन्तिम शब्दका पाठ। उत्तर पदके किसी शब्दक पाठस भी हम सन्तोष नहीं है। 'तहाँ'का पाठ 'थान' और 'बैठहि'का पाठ 'मये तिहि भी हा सकता है। पर किसी भी पाठके साथ कोर अथ नहीं निकलता। (२) बिधँवास-विद्वान। रूपमरार-इस शब्दका प्रयोग रूपका कथन करते हुए कविने अनेक स्थानोंपर किया है। जायसीने भी पदमावतूम इसका प्रयोग किया है। वहाँ इसे 'रूपमुरारी' पढ़ा गया है और वासुदेवशरण अग्रवालने टीका करते हुए इसका अर्थ 'रूपमें कृष्णक भांति सुन्दर' किया है। किन्तु न तो यह पाठ ही ठीक जान पड़ता और न अथ ही। चौदहवीं शताब्दीमें कृष्ण रूप-सौन्दर्यके प्रतीक बन गये थे, इसका कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है। हमारी धारणा है कि इन कवियोंने यहाँ कृष्णवाचक 'मुरारि'का प्रयोग नहीं किया
१२ है। यह कोई सौन्दर्य-बोधक विशेषण है। जिसका भाव और अर्थ हमें स्पष्ट नहीं हो रहा है। शिवसहाय पाठकका सुझाव है कि 'मराउ' का तात्पर्य 'मराळ' से है और 'रुप-मराउ' का भाव है 'मयूरके समान सुन्दर'। (४) सापर-सपन। बार-घोड़ा। (५) सरम-सदृश, तद्रूपकार। (६) मूँजहि-उद्वेग कर। सासन (सं शासन)—राजाज्ञा अंकित ताम्र- पत्र। सासन गाँव-राज्यादेशसे प्राप्त ग्राम। २८ ( रत्नकण्ड ९ ) सिफत बाजार शरिपात शहरे गोबर व खरीद्ने खल्क (गोबर नगरके सुगन्धिके बाजार तथा वहाँकी खरीददारीका वर्णन) सुनो फूल हाट सब फूला। बीठ विमोइ गा देखत भूला ॥१ अगर चन्दन सब धरा बिकाने। कुंकुं परिमल सुगंधि गंधाने ॥२ बेनाँ और केवर सुहाया। मोल किये [पर*] महँक (सुँघाया) ॥३ पान नगरखण्ड सुरंग सुपारी। जैफर लौंग झिकरी झारी ॥४ दौंनाँ मरबा कुन्द निवारी। गूँदह हार ते बेचहिं नारी ॥५ खाँड चिरौंजी दाख खुरहुरी, बैठे लोग बिसाइ ।६ हीर पनेर सों भल कायड़, जित चाहे सब आइ ॥७ मुखपाठ-(१) सुनावा। टिप्पणी-(२) धरा-धड़ा पाँच सेरका तौल। कुंकूँ-केसर। परिमल-कई सुग न्धियोंको मिलाकर बनाई हुई विशेष बात (वासुदेवशरण अग्रवाल)। (३) बेना-बीरन छत। केवर-केवड़ा। (४) जैफर-जायफल। (५) दौंनाँ-तुलसीकी जातिका पौधा जिसकी पत्तियोंमें सुगन्धि होती है। मरबा-(सं मरुवक) यह फाल्गुन-चैतमें फूलता है। इसके फूल लाल और सफेद दो रंगोंके होते हैं। कुन्द-सफेद रंगका छोटा फूल जो अगहन-पूसमें फूलता है। नेवारी-इसे निवाड़ी भी कहते हैं। यह चैतमें फूलनेवाला सफेद फूल है। आइने अकबरीमें इसे एक दलेका फूल कहा गया है। यह रायबेलसे मिलता जुलता है। सवेरे फूल इतने अधिक आते हैं कि पेड़ ढक जाता है।
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(६) खाँड—शक्कर, चीनी। खुरहुरी—पद्मावतमें इसका उल्लेख हुआ है। वहाँ वासुदेवशरण अग्रवालने इसकी व्युत्पत्ति क्षुद्रखुरली—क्षुदखुरली—खुरहरी बताया है और वाट कृत डिक्शनरी आफ द इकनामिक प्राडक्ट्स (भाग २, पृष्ठ ११४) से इसके अनेक नाम गिनाये हैं। (पद्मावत २८।४)। पर हमारी दृष्टिमें यहाँ तात्पर्य छुहारेसे है। (७) हीर—इसके कई अर्थ हो सकते हैं। (१) ईराक स्थित हीरक बने हुए वस्त्र। इब्न-बतूताने वहाँके बने दीवाज (जरीका बना वस्त्र) हरीर (रेशम) और चित्रित तासीकी चर्चाकी है जो वहाँ इस्लामके उद्भवसे पूर्व तैयार होते थे (आल इस्लामिया, खण्ड २, पृ ८९)। किन्तु इस्लामके युगमें इस स्थानका महत्त्व घट गया था। इस कारण कदाचित इससे यहाँ तात्पर्य यह न होगा। (२) मोतीचन्द्रका कहना है कि हेरातके मार्गसे जो वस्त्र भारत आते थे वे पट्टहरि अथवा हीरपट्ट कहे जाते थे। (कास्ट्यूम्स ऐण्ड टेक्सटाइल्स इन सल्तनत पीरियड पृ १४)। (३) ऐसा वस्त्र जिसपर हीरेकी आकृति हो (यह सुझाव भी मोतीचन्द्रका ही है)। हो सकता है यहाँ इसीसे तात्पर्य हो, क्योंकि लहर-पटोर ऐसा प्रयोग पद्मावतमें मिलता है (१२९।१) जिसका तात्पर्य लहरियादार पटोर है। उसी प्रकार यहाँ हीर पटोरसे तात्पर्य हीरेकी आकृति अंकित पटोरसे हो सकता है। (४) लोककी बोलचालमें किसी वस्तुकी सर्वोत्तम छाँटी हुई वस्तुको उस वस्तुका हीर कहा करते हैं। हमारी समझमें उसी अर्थमें यहाँ इसका प्रयोग हुआ है। हीर पटोरसे तात्पर्य है उच्च कोटिका पटोर, अथवा बारीक किस्मका पटोर। पटोर—देखिये आगे १२।७।
२९ ( सैकँण्ड्स १ ) सिफ्ते बाजीगरों दर बाजार शहर गोबर गोयर (गोबर नगरके बाजीगरोंका वर्णन)
हाट छरेंटा पेखन होई। देखहिं निसर मनुस औ जोई ॥१ परढा राम रमायन कहहीं। गावैहिं कबिच नाच मल फरहीं ॥२ बहुरुपिये बहु भेस मराषा। मार युद्ध चलि देरैं आवा ॥३ रासैं गावैंहिं भइ झलझार्वहिं। संग मूद बिस बँह वहावैहिं ॥४ फीनर गावैंहि होई पँवारा। नट नाचहिं औ बाजहिं तारा ॥५
नाट हँकारे कूद धरि, हम देखा होइ अबार ।६ नवैइ बधावा गोवर, घर घर मंगलाचार ॥७ टिप्पणी—(१) छरहूँ—सं० च्छरह = छलका बाजार, जादूका तमाशा । पेखन— सं० प्रेक्षण = नाटक तमाशा । जोई—स्त्री । (३) परथा—पत्री । राम रमायन—इस उल्लेखसे यह स्पष्ट प्रकट होता है कि तुलसीदास कृत रामायणकी रचनासे बहुत पूर्व लोकमें राम कथा ख्यात हो चुकी थी और लोग रामयण नामक किसी रचनासे खूब परिचित थे और उसका पाठ किया करते थे । मखतूल उठक चिन बनते थे यह २ ५८ कड़वकसे ज्ञात होता है । अन्यत्र भी कई स्थानों पर रामायणकी घटनाएँ अभिप्राय रूपमें गृहीत हैं । (५) सीसर—सिषर, सम्भवतः यहाँ तात्पर्य हिचकोले है । (६) भवान—भवाणी > भवानी > भवान गृह । ३० ( रीव्ह्यूंस ११ ) सिषत दरबारे राज महर गौरब ( राज महरके दरबारका वर्णन ) कञ्चा महरिह बारि बखानि । बैठ सींह गइ से घरै बनानी ॥१ बहुत बीर तिंह देख पराहीं । हियें लाग डर खेंद न खाहीं ॥२ देखत पौर दीठि फिरि जाइ । एक पूत सतधार उँचाई ॥३ आँट रूप कै पानी ढारा । अस कै महरि दुआरि सँबारा ॥४ साठ लोह एकहिं कौटाने । बबर केवार पौर गइ छाने ॥५ राखहिं वैसे चौकी, कुन्त ढरग रहि छाइ ।६ पाखर सहस साठ फिरि, खाँड़ेहिं सैंचर न जाइ ॥७ टिप्पणी—(१) बारि—घर, निवास स्थान । सींह—सिंह; मध्यकालीन घरोंके प्रवेश-द्वारपर दोनों ओर दो सिंह बनानेकी प्रथा थी। उन्हें प्रायः मरोड़दार पूँछ फटकाते और जीभ निकाले हुए बनाया जाता था। बनानी—बन्द, भाँतिने तुलना कीजिये—सहु बनानके बाहर गये (पदमावत ४१। )। (५) केवार—किवाट दरवाजा । (६) कुन्त—पैदल सैनिकों द्वारा प्रयोगमें आनेवाला बर्छा ।
९५ ३१ (रॉइण्ड्स १२) सिफत करूसहाय राय महर गोयद (राय महरके महलोंका वर्णन) पुनि हौं कहौं धौराहर पाता । इंगुर पानि ढार कइ राता ॥१ सतखंड पाटा आनों भाँती । सात चौखण्डी मयी जिह पाँती ॥२ चौरासी [ ] बसे उछाई । छत्री दररें अती सुहाई ॥३ अस रचना कै कीन बनाई । सातौँ कलस धरै सुनपानी ॥४ कनक खम्भ जड़ मानिक परे । जगमगाहिं जनु सरउँ भरे ॥५ अगर चंदन अन्तो लै, अछर सुहावन बास ।६ देख लोग अस भाखहिं, महुँ आइ कबिलास ॥७ टिप्पणी-(१) धौराहर-ध वलहगृह राजमहलके भीतर रनिवास धौराहर कहलाता था । इसे अन्तःपुर भी कहते थे । (२) सतखंड-सप्तभूमिक प्रासाद सप्तमंजिला महल । इस प्रकारके राजप्रासादोंकी कल्पना गुप्तकालसे ही इस देशम प्रचलित थी । दतियामे सतखण्डी दतीका बीरसिंह देवका महल सतखण्डा है । आनों-अन्यान्य अनेक प्रकारके भाँति-भाँतिके तरह-तरहक । लोकमें बहु प्रचलित इस सीधे सादे शब्दसे परिचित न होनेके कारण माताप्रसाद गुप्तने पद्मावत और मधुमालतीमे सर्वत्र फारसी लिपिमें लिखे 'अलिफ़', 'नून' 'वाव' 'नून'को अनबन' पढा है और उसके अनकन <अन्यवर्णके विकृत पाठ होनेकी क्लिष्ट कल्पना की है । चौखण्डी-चार खण्डकी चौकियाँ अथवा बुर्ज । (४) कलस-कलश गुम्बद । सुनपानी-सोनेके पानीवाला, सुनहरा । (७) महुँ-मानों। कबिलास-स्वर्ग। ३२ (रॉइण्ड्स १३) सिफत हरमाँ राय महर हफ्ताद व चहार बूदन्द (राय महरकी चौरासी रानियोंका उल्लेख) राय महर रानी चौरासी । एक एक के तर चरि अकासी ॥१ जेकर जेकर होइ ओठनारा । जेकर मंदिर सेज सँभारा ॥२
९६ पाटमहादेवि फुलारानी । स्यँ अचेत पह अह सयानी ॥३ अगर चँदन फूल औ पानूँ । कुँकूँ सेंदुर परसेंहि आनूँ ॥४ रचैं हिंडोला झूल नारी । गावहिं अपुरुप जोबनबारी ॥५ अरथ दरब पोर औ हति, गिनत न आवइ काउ ।६ अन धन पाट-पटोर भल, कातुक भूला राउ ॥७ टिप्पणी-(१) तर-नीच आधीन । चेरि-दासी । अपछरी-अप्सरा । (६) बेञ्ज बेञ्ज-अलग अलग, तरह-तरहक । जेउनवार-(प्रा जेमणवार) भोजन रसाद् । (५) जोबनबारी-यौवनवाला युवती । (६) दरब-द्रव्य हति-हाथी । (७) पाट-हमें इस शब्दका प्रयोग किसी पूर्ववर्ती साहित्यमें नहीं मिला। समवर्ती साहित्यमें भी केवल नरपति नाल्ह कृत बीसलदेव रासामें इसका उल्लेख 'पाट पटम्बर'के रूपमें है। परवर्ती साहित्यमें पदमा वतमें एक स्थानपर इसका उल्लेख है (२६२।६) । सम्भवतः यह शब्द संस्कृत पट या पट्टने निकला है । ग्यारहवीं शतीक वैजयन्ती कोष (१६८।२११) और बारहवीं शतीक अभिधान चिन्तामणि कोष (३।५६६-६७) क अनुसार पट वस्त्रकी सामान्य संज्ञा थान पड़ती है । अभिधानमें पुराने कपड़ेके लिए पटच्चर शब्द है ( ३। ६७८) । दसवीं शतीक प्रारम्भमें लिखे गये क्षितिसंग्रह कृत नलचम्पूमें दमयन्तीकी माताको सम्बोधित करते हुए कहलावा गया है कि-इन चीनांशुक पट्टोंको स्वीकार करें जो अगणनीयदम् (अग्नि द्वारा स्वच्छ किये जानेवाले) हैं। स्पष्टतः यहाँ चीनके बने अशनके वस्त्रोंसे तात्पर्य है। इससे भी यही लगता है कि पट सामान्य रूपसे वस्त्रको कहते थे । इसके विपरीत अनेक ऐसे भी उल्लेख प्राप्त होते हैं जिनसे ज्ञात पड़ता है कि पट किसी विशेष प्रकार, सम्भवतः रेशमी वस्त्रको कहते थे । पश्चिमी चालुक्य नरेश सोमेश्वर (११२४- ११३८ ई ) ने अपने मानसोल्लासमें विभिन्न वस्त्रोंक विविध सूत्रोंका उल्लेख किया है उसमें कपास (कर्पास, तूर्ल) कीम (कृन पाट आदि कीड़ोंसे निकाले जानेवाले सूत) रोम (ऊन) के साथ साथ पट्टसूत्रका भी उल्लेख किया है जो प्रसंगके अनुसार रेशमी सूत अनुमान किया जा सकता है। कल्हणके राजतरंगिणीमें एक स्थानपर इस बातका उल्लेख है कि श्रीनगरसे कराढमूल (शरामूल) जानेवाले मार्गमें स्थित पट्टन (आधुनिक पटन) पट्टनानाम् (पट्टकी