भारतकोश
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चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

DevanagariAwadhipublished520 पृष्ठ

१८७ १७९ ( रिसंग्रहम १२७ ) बाज गश्तन चाँद अज़ बुतखाना व आमदने ब खानये खुद ( चाँदका मन्दिरसे घर लौटना ) बाहर मदिर चाँद जो आई । सूरुज दिसत मुख गा कुँमलाई ॥१ पूछी चाँद बिरस्पत धाई । काह कहाँ कछु कही न जाइ ॥२ जोहि सीस मँझि कहुँ नाया । परा मुरुस मुख बकत न आवा ॥३ डार्य पाउ सर हर न सँभारी । धुन धुन सीस मंदिर सौं मारी ॥४ हार पिराइ सहेलिहिं दीन्हा । हँस कें चाँद पहिर गिय लीन्हा ॥५ कहा बिरस्पत चाँदा, चलहु बेग घर जाहिं ।६ चाँद सुरुज हैं अँधवत, महरी घरे डराहिं ॥७ टिप्पणी—(१) जोहि—जैसे ही; जिस समय; कर । बकत—बोली आवाज । (४) पाउ—पैर । (७) अँधवत—डूब रहे । घरे—घर पर । १८०-१८१ ( अप्राप्त ) १८२ ( रिसंग्रहम १२८ । बम्बई ९ ) बकियत दर तनहाइये लोरक शुबद ( लोरककी एकान्तताका वर्णन ) माता पिता पन्धु¹ न भाई² । मग न साथी मीत न धाइ³ ॥१ इहँ पनगंट कइ पाव न आवइ । पा३ग परन मुख नीर चुआवइँ ॥२ दह दिपन जीउ भर भंगाग । पॉपनि भीमतारि गदि पाग ॥३ सपन यनक में फलु दगा । भिन नवैमारउँ मग्न पिगरा ॥४ काह उगाह पैसार गँभार । इहँ कथा फल दइँ⁵ ईंकार ॥५

१८५ देखि पूछि तूं जो आहा, हौं कस गा बिसँभार ।६ रूपा एक मुख फेफर, मोर" लिय कछु न सँभार ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—राफ्तने सोरठ सुरखते खुद व पुरसीदने खुद रा (सोरठका जल- हाय अवस्थामे देखतासे प्रश्न) इस प्रतिमें पंक्ति ३ ४ ५ का क्रम ५ ३ ४ है। १—बहून (नागरी छोटे अक्षरोंमें 'बन्धु' भी) । २—बाद। ३— भाई। ४—आबा। ५—फोर्त। ६—भुआवा। ७—के। ८—सँभार। ९—भान। १०—को गहे। ११—मोरैं। १८३ (रीडंग्स १३९) जबाब बादने बुत बर सोरफ रा (देखताका उत्तर) एक अचम्भा सुनु तूं लोरा । सुतक सेतें भयउ जिहूँ तोरा ॥१ जहरिन्ह फेर मुण्ड इक आवा । सो तैं अहरिन्ह देख न पावा ॥२ हूँ तिहूँ देखि परा मुरझाइ । हौं रे पौन भर गएउँ बिलाइ ॥३ भा झंकार जो सिहूँ फोनों । डम्बर उठा बहुत गिय सोनों ॥४ खिन एकइस मबन तिहूँ कीन्हौं । फिर पयान उत्तर मुख दीन्हौं ॥५ सीस उघाइ जो देखउँ, मंदिर चहूँ दिसि सून ।६ सहन मोर जियैं उठरी, लोर तुम्हारे पून ॥७ टिप्पणी—(१) सुतक सेते—छोये हुए के समान । १८४ (रीडंग्स १४ ) तल्बीदने चाँदा बिरहपत रा व पुरसीदने हिकायत सोरफ (बिरहपतको बुलाकर चाँदका सोरठके सम्बन्धमें जिज्ञासा) चाँद पिरम्पत पास बुलाई। पिरम कह्रानी कहु मोहि आई ॥१ जिहूँ रग सफर पिरम बिमारें। रग डघरा हिरदै मरि भारूँ ॥२

१८७

रस अहार सँह देह अघाई । बिरह झारें रस न बुझाई ॥३ पहुल रसायन देखेउँ चाखी । रस कहहानी कहु महँ माखी ॥४ रस कै रात सपूरन [मानइ*] । औ रस मन सुख निंदरा आवइ ॥५ कहहु रस पचन बिरस्पत, जिहिं चित करउँ मिठाइ ।६ रस के घड़े भरावहु, दुख संताप सब जाइ ॥७

१८५ ( सोरिनुद्दम् १४१ ) जबान दादन बिरस्पतका चाँदा रा ( बिरस्पतका चान्दको उत्तर ) तूँ रस बिरस चाँद का जानसि । हाँ रस कहौं घिरत ओ सानसि ॥१ घिरत खाँड सोँ करउँ मेरावा । चाँद लइस अपनहि तुम पावा ॥२ रस पर जिहि कै परै अहारू । रसहि पूर आछहिँ ससारू ॥३ रस कें दाध अन-पानि न भावा । रसजो आन भाँखद पड़ लावा ॥४ रस कें मात चितहि जो घरसी । रस कै घड़े बिरस जनु करसी ॥५ रस कै कुण्ड परा मदि, सँवर गुन खीर ।६ रस कह घूंट घरु माँह, चाँदा लावहु तीर ॥७

१८६ ( सोरिनुद्दम् १४२ ) ज्याबदादन चाँदा बर बिरस्पत रा बागुस्सा ( चाँइका बिरस्पत पर क्रोध ) निलज बिरस्पत लाजन धरसी। महि बिगरािर सा मग्भर करसी ॥१ बिरस्पत ताँइँ मन अस आवा । जो हैं मदि मैयर दिगगया ॥२ बिहुँ रन चाँद गुरुज दिगगया । तिहँ दिन हून पड़ि अउर न भावा ॥३ नैन पँगि चित्त छीनसि थानूँ । पाप कीन्हि हां अन्न न खानूँ ॥४ हँ जा देगाइ बिरस्पत कहा । मा हीउ मं लागि पिस रहा ॥५

१८८

लोर सुरुज यह निरमल, तहँ सुवन उजियार ॥६ चाँद आहि घनि ठाकर, सुरुज नाँह हमार ॥७ टिप्पणी—(१) सरभर—समानता बराबरी। (४) पैसि—पैठ कर। कोलिसि—लिया। काहूँ—स्थान। अन्त—अन्य, किसी दूसरेको। (७) घनि—पत्नी। नाँह—पति। १८७ (रीकैण्ड्स १४३) बाज़ नमूने बिरहस्त हिराफ्ते लोरक पेश चांदा (बिरहपतका चाँदासे लोरकके प्रेमकी बात कहना) वह सो महर धिय तोर भिखारी। भीख लेइ जो देसु हँकारी ॥१ दरसन राता भयउ तिह जोगी। भीख न माँग पुरुख है मोगी ॥२ तिहि कारन मुख मसम चढ़ावा। बचन देहि तोहि सिघ पावा ॥३ तोरें रस कर आस पियासा। नित नहि आवै लै मरि सासा ॥४ चाँद बचन एक सुनु तुम्ह मोरा। तूँ औखद वह रोगिया तोरा ॥५ हस्त चढ़ा दिखरावतें, पुनि आनेहँ जेठनार।६ सोइ मड़ि महँ, देखत गा बिसँभार ॥७ टिप्पणी—(१) जो—यदि। देसु—दो। हँकारी—बुलाकर। (६) आनिहँ—ले आई। (७) गा—गया। १८८ (रीकैण्ड्स १४४) बपसरेह कर्दन चांदा अज बेहोशी लोरक दर कुलराना (मन्दिरमें लोरकके मूर्छित होने पर चाँदाका खेद) मड़ि मदिर सो लोरक अहा। हँ न बिरहपत मोसेतैं कहा ॥१ 'जुगुति जुगुति तिह जोग देतों। धिरत मिर बचन सुन सेंतों ॥२

१४९ अबँहि जाइ घर माँह उँचावहु । पिरह बमूत मन पानि पियावहु ॥३ अस जनि कहि चाँद पठायउँ । पूछत कहसि चलि हों आयउँ ॥४ गहुँआ पानि नगर खंड लेहू । कै खंडवान बिरसपत देहूँ ॥५ मुख बभूत औ कत्था, अग कहु धरहु उतार ।६ दइ मयंत तुम्ह परसाँन, पूजहिँ आस तुम्हार ॥७ टिप्पणी—(१) तँ—तूने । मोसउँ—मुझसे । (२) सुगुति—(स युक्ति)—भोजन । सुगुति—युक्ति । जोग—योग्य । देवौं—देवी । (३) अबँहि—अभी । उचावहु—उठाओ । घरि—पकड़ कर । बमूत— भस्म । (४) जनि—मत । (५) गहुवा—पानी रखने का पात्र । खंडवान—खाँडका पानी शरबत । (७) परसाँन—प्रसन्न । १८९ ( रीछमहम १४५ ) चकरो बगदाद बिरसतादने चाँदा बिरसत रा बर कारह दर गुलदाना ( चाँदा बिरसपतरो कोरकके हाथ गाँड थार पान देकर भेजना ) चाँद खाँड दइ पान बिसारी । सुरंग बिरम्पत मद भिखारी ॥१ गाँव बिरम्पत मद पैठी । सहवों चाँद सुरुज भइ दीठी ॥२ बिरम्पत दसन पीजु चमकाये । मँधर रकत नैन झर लाये ॥३ बिरस्पत पाय गुरुज लँ रहा । तुम जो चाँद निरायन कहा ॥४ जागत रहँउँ जो नींद गपानी । अन न रूख औ भाइ न पानी ॥५ हों वा चाँद सँ आयउँ, कीन्ह महिँ परकास ।६ भयर नींन्द सुने, गइ रिंदार सिंह पास ॥७ टिप्पणी - (२) सहवां-जिस तरह । दीठी - याद दी । (४) निरायन-बिना भगवान्‌को वा ।

० १९० (रीडिंग्स १८४) पन्द दाबने बिरस्पत चाँदा लोरक रा के दूर मुन विभासे बांग (बिरस्पतका चाँदकी ओरसे लोरक योगी वेश त्यागनेको कहना) अबहिं पुरुख मन राख रखावहू। बहुत चाँद सर दरसन पावहु ॥१ तजु लोर दरसन औ मढ़ी। सरग चाँद बिधि मगबन गढ़ी॥२ जो हर बसे तराइ भावइ। चाँद सुरुज फिरि ओर पठावइ ॥३ सो बचन सुनी लोरक भभुरा। दोउ पायँ सीस धर परा ॥४ बिरस्पत बचन लोर जो मानी। मैं सँहवान पियायसि आनी ॥५ प्रथम देउ मनायउँ, फुनि २ बिरस्पत तोहि ॥६ [ ] परौं लै तारा, चाँद मिलावहु मोहि ॥७ १९१ (रीडिंग्स १८०) पुन आवर्दन लोरक जिराले जोग व बेतानमे रसीद रखने लोरक व बिरस्पत (लोरका योगी बेस त्यागना। लोरक और बिरस्पतका अपने अपने घर जाना) सँबर दरसन जाग उतारा। मढ़ि तजि परै मंदिर सिधारा ॥१ चली बिरस्पत सुरुझ पठाइ। चाँद नारि कहुँ पात जनाई ॥२ चाँद बिरस्पत सउँ अस कहा। कहु मढ़ि सँबर कँवें अहा ॥३ नन रकत झरौं असराख्। सुगुति न जानी नींद अहारू ॥४ मिलन काम बिथा न सँभार। चाँद चाँद निसि ठाड़ि पुकार ॥५ मीन घुनत सिंह दिउ रैन, बनु नाउत अरुझाइ ।६ पद्म गुनत अपहाँहुत, आयउँ मदिर पठाइ ॥७ टिप्पणी—(४) भभुरा (पा भभुभाना) = मुँह का आग पर उकसहीत पडना।

१९१ १९२ (रौशनम १४८) भज महरा बेगानये आमदने लोरक ब पाय उफ्तादने मैना ( लोरकका घर आना और मैनाका पैर पर गिरना ) देबस दहाँ दिसि फिरि फिरि आवइ । चाँद लागि निसि रोइ निहावइ॥१ रिन एक सग साथ न पैसै । गया अमर बन मंदिरहि पैसै ॥२ मना आइ पाइ लै परी । लोरक बैसु कहूँ एक घरी ॥३ नहाइ धोइ बस्तर पहिराऊँ । औ घिसि चन्दन सीस फिराऊँ ॥४ सेज बिछाइ फूल पर डासा । पिरम लागि मन सान्त करासों ॥५ उतर न देहि प्रेम छल छूटा, सोइ नार बिललाइ ।६ साँ नहिं सुनै चँवर घर चिन्ता, रहा नैन दोइ लाइ ॥७ टिप्पणी-(१) दहाँदिसि -दसो दिशा । (३) कहूँ-कही। १९३ (रौशनम १४९) महरा गिरफ्तने लोरक अज कमाये रियाक चाँदा ( चाँदाके वियोगमें लोरकका बन-गमन ) रैन चाँद जा टेउ बयानाँ । मगेँ मरौं कँ दूबस तुलाना ॥१ चला धीर बनखण्ड जहाँ । सिंघ सिंदूर सँकारहिं वहाँ ॥२ मकर दिषम बन भम्भी भैषइ । रन आइ गामर महँ गँषइ ॥३ मङ्गु चाँदा रिन एक. म्म्रिगवइ । तिहिँ असरेनिम गामराँ आवइ॥४- मिरग पय रोइ लागे हायइ । पाउ धरत सुरु चाँदा आवइ ॥५ इँह पर रैन पुरावइ, आ दिन पुनि इँह भाँन ।६ चाँदा मनह पडगश, तिल एक हाइ न भाँन ॥७ टिप्पणी-(२) सिंघ सिंदूर - देखिए दि० टी० १७५।५ । (४) मगरी-आसन । (७) पडगश-पागल हुआ ।

१९९ १९४ ( रीकेण्ड्स १५ ) बेकरार शुदने चाँदा सब कबाले इश्क लोरक ( लोरकके प्रेममें चाँदकी विकलता ) परी गनेझ सेज न भावइ । रैन चाँद बिइफइ झुपलावइ ॥१ कहु विहिँ सुरुज कवन पर बसा । मिख सर चढ़ा पीव मोर हसा ॥२ जहिँ कहुँ होइ सिंह आइ पुलाबहु । सुरुज आनि सेन बैसावहु ॥३ चाँद मरत लै सुरुज जियावइ । तू का करसि मोसें हुत आवइ ॥४ आनि विरस्पत सूंपा सरनाँ । रात देबस आइ मँह मरनाँ ॥५ अग दाइ मन चटपटी, घर बाहर न सुहाइ ।६ चाँद न जिये भानु बिनु, आनु बिरस्पत जाइ ॥७ टिप्पणी—(१) बिहफइ—बिहइ पाठ भी सम्भव है। दोनो ही निरस्पत (बृहस्पति) का देशज रूप है । (७) भानु—सूरज । यहाँ तात्पर्य लोरकसे है । भानु—से भानो । १९५ ( रीकेण्ड्स १५१ ) पेकन । दर बेकरारी चाँदा गोबर ( चाँदकी व्याकुलता ) हां निमि चाँद सुरुज कप पावडें । देबस होइ चढ़ि सरग मोलावउँ ॥१ पाँधे पँवर पँवरिया आगहिँ । तमकत पीर दड़ि डर भागहिँ ॥२ तो यहिँ कहाँ ईत पोसाऊ । रैन करैंट हिय उठे सताऊ ॥३ पाउम रात डगि अँधियारी । कितहुत सुरुज हँकारउँ नारी ॥४ जा मन रुचि माइ पियारा । भुरँग आंत किद्दि पाऊगुबारा ॥५ दसम भाग तुम्ह माधन, इहूँ जियं के आस ।६ चाँद सुरुज म पिगउप, पाँहु भाग बिलाम ॥७

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१४ १९८ (रीडिंग्स १५४) बुरदने बिरहस्त लोरक रा ब नमूढने राहे कस चाँदा (बिरहस्पतका चाँदके बौराहरका रास्ता दिखाना) जो सो बचन बिरस्पत कहा। लोर पीर हियें कै गहा ॥१ मन रहँसा कहु आजु मरावा। जिहलंग सूर मरग बइ पावा ॥२ बिरह झार अजहुत कुँमलानाँ। रहँसा कँवल भाँत बिहसाना ॥३ सो महि बाट आइ दिखराउ। जिहँ चड़ि आउँ चाँद कइ ठाउ ॥४ धनि सो रात जिहिँ मजन बुलाइँ। चाँद सुरुज दोइ गवन कराइ ॥५ चली बिरस्पत सरगहिँ, सुरुज गोइन लाइ। ६ जहाँ चाँद निसि बिसरइ, गई सो पँथ दिखराइ ॥७ टिप्पणी—(७) बिसरइ—बिश्राम करती है। १९९ (रीडिंग्स १५५) ख़रीदने लोरक अबरेशामे लाल बराय बाफ़्तने कमन्द (कमन्द बनानेके लिए लोरकका पाट खरीदना) पाट बघनियाँ लोर बिसाहा। परत सात गुन कीत बराहा ॥१ बन माँझ लोरक तस सानौँ। बानु सरग कइँ रची बिबानौँ ॥२ मुख माँग हुत सनु घर काड़ा। हाथ तीस एक आछँ ठाड़ा ॥३ अँहुरी मार गरेँ तिहिँ लाइ। जिहिँ सरि परि तिहँ पँखत न जाइ ॥४ उँड मँड राग फाँद सँचारी। बीर पाउ जिहिँ धरि धरै सँभारी ॥५ देखि पुष्ठि अस मैना, परहा करियहु काइ। ६ परी मँइल अठमारफ, बाँधे चाहत आइ ॥७ टिप्पणी—( ) बिसाहा—खरीदा। बराहा—बरहा मोटी रस्सी। (४) मार—मोड़ा। (७) मैइल—मैल।

१९५ २०० ( रीकेण्ड्स १५६ ) रवान शुदने लोरक दर शबे तारीका व बर शिगाल सूए कस चाँदा ( अँधेरी रातमें लोरकका चाँदेके पीराहरकी ओर जाना ) । छठ भादों निसि भइ अँधियारी । नैन न सूझे पाँइ पसारी ॥१ चला मीर घरहा गर लावा । जियकै धरै दूसरहिँ भुलावा ॥२ खिन गरजे फिर दइउ घरीसा । खोर भरे जर घाट न दीसा ॥३ दादुर रर्रहि बीजु चमकाई । अइस न जानु कौन दिसि जाई॥४ मसहूर दीख झरोखें पासा । लोर जानु नखत परगासा ॥५ चित भुलान बिसँभारा, मंदिर कौन दिसि आह ।६ देबस होत जा खित घरौँ, उतर कहूँ तो काह ॥७ टिप्पणी-(३) दइउ-दैव बादल । खोर-गाँवका कच्चा रास्ता । जर-जल । (४) दादुर-मेंढक । रर्रहि-टर्र टर्र करत है । अइस-ऐसा । (७) उतर-उत्तर दिशा । २०१ ( रीकेण्ड्स १५७ ) बरख्शीदने वर्क व शिनाख्तने लोरक खानए चांदा (बिजली चमकना और लोरकका चाँदाका आवास पहचानना ) काँधा लँके भा उबियारा । थिर भिया लौर मंदिर मनस्यारा ॥१ सँघरसि मीच केर पोमाऊ । मेलसि परह रोपि धरि पाऊ ॥२ परा परह तो चाँदा जागी । अँकुरी देखि धाँखण्टे लागो ॥३ झाँसा चाँद लोर तर आवा । अँकुरी काढ़ि परह झटकावा ॥४ जेठ अँउ मेलि मंदिर तर जाइ। हँसि हँसि चाँदा दइ झटकाई ॥५ एक वार परा तो, मेलो परह फिराइ ।६ कागै ठार अइस एक, जौ न मंदिर पर बाइ ॥७ टिप्पणी-(१) काँधा-चमका । लँके-बिजली ।

१९५ (२) बासारू—पुरुषार्थ । मेलसि—फेंका । रापि—अड़ा करके । (४) झाँपा—झाँक कर देखना । तर (तल)—नीचे । (५) जइँ जइँ—ज्यों ज्यों । २०२ ( रीडँग्स १५८ : काधी ) अरभात कर्दने चाँदा बज बाज गुजाफ्तने कमन्द ( चाँदाका कमन्द छोड़ देने पर खद ) चाँद कहा अब लोरक नाहइ । मन उसरैं फुनि बहुरि न आइइ ॥१ हौं अस बोलेउँ चतुर सयानी । बरहा छोड़उँ कवन अपानी ॥२ हाथ क माँग समुँद मँह जाई । बहुरि¹ सो हाथ न चढ़े² आई ॥३ कइ औगुन सँसातें कें तोरा । परा परहँ³ पुनि होनै होरा ॥४ दई ठाउँ जो माँगा पाऊँ । मेठि बरह खाँभ लै लाऊँ ॥५ दइ बिधाता बिनवौं, सीस नाइ कर जोरि ।६ परा फाँद धन मोरैं, जाइ बरह जनि छोरि ॥७ पाठान्तर—काधी प्रति— दीगर रीडेण्ड्स प्रतिये समान ही केवल 'बज बाज' शब्द नहीं है। १—अन्तिम दो शब्द कुछ भिन्न हैं जो पढ़े नहीं जाते । २—शब्द भिन्न है जो पढ़ा नहीं जाता । ३—चढ़े म । ४—क ओगुन सें मैं गुन तोरा । ५—'बरह' शब्द नहीं है । ६—पंक्ति ६-७ नदारद हैं। टिप्पणी—(१) नाहइ—जायेगा । आइह—आवेगा । (२) अपानी—अज्ञानी । २०३ ( रीडंग्डस् १५९ ) कमन्द अन्दाफ्तने लोरक व रिहा कर्दने चाँदा दस्तून ( लोरकका कमन्द फेंकना और चाँदका उसे खम्भेस बाँधना ) घर भवा पठवरइ फिर आवा । दस मेलसि दस नक्षत्र ठनाबा ॥१ परा परह (तो) चाँदा पाई । जँकुरी मंदिर खाँभ लै छाई ॥२

१९७ रहा परह लाएक धरि मानाँ। पान जुगुति सौं धरमि परानाँ ॥३ पीर पयान परन को कादा। पढ़िन बाँस चढ़न जनु आढ़ा ॥४ पाँचे टरि बार गा आई। मँज ममर हाइ पमरी जाइ ॥५ पड़ा नार घोंघहर, दरगमि विगम अगम ।६ निरग नियर घर भाँहट बँध न एऊ पाम ॥७ मूलपाठ- ——— । टिप्पणी-(१) बेर - बेर । अहा-कुआँ । बढ़-बढ़न । (४) बैरिय-नदी। (५) पमरी-फैली। (७) नियर-मकान की तरह। घर भाँहट-उलट दिया। बैठ- बैठेगा। २०५ ( हंसदूत ११ ) वा दूतह हम हाथ दे—यह तो न सुनाने सरकार पान व ( मान्धता कै दूत हस्तिनापुर भेजा । हस्तिबोधेका समाचार दूत ने कहा ) गाहब मत्त गाँव दरगौहीं। सो दरगमि जो डगा नारी ॥१ निंदा मारि गा गाँव दरहीं। अगहक थल पनाय्य कहँहीं ॥२ ईरित हार घर पग जाड़ा। मग्ग नगर जनु पाट छाड़ा ॥३ धरौं मार जा दरह परैहीं। जासु अराम समरथी रहीं ॥४ विमरा पाँत सहन्न महाँ। मानिक बार गहाड़ अहाँ ॥ इन हँसि जग निंदा जोरी ईंट पुजार ।५

१९८ २०५ ( रीड्सबर्ग्स १४१; पंजाब [प ] ) सिस्ते नखशती चौरन्सी ( चौरण्डीकी चित्रसरीका वर्णन ) झार चौरुन्डी इगुर पानी । चित्र उरेह फीन्द सुनपानी ॥१ लंक उरेह भमीखन रेहा । सैंध मान दसगर र्क देहा ॥२ सीता हरन राम मंग्राऊँ । दुर पांडो कुरुखेत क ठाँऊँ ॥३ करपाँ पार कोइया सुभारू । अजपी नगरी अगिया बँतारू ॥४ साँझी पञ्चकाश्च भइ लावा । चक्रव्यूह अगिँ उथापा ॥५ सीह-सैंसूर मिरघ मिरपावन आनीं भाँत ।६ कपा-काथ परलोक निसारैंभ, लिख लीँयी जिहँ पाँत ॥७ पाठान्तर—पंजाब प्रति— शीर्षक—फट गया है । १—पूरी पंक्ति अस्पष्ट है पढा नहीं जाता । २—राउलदा (?) । ३—पंक्ति ६-७ अस्पष्ट हैं पढ़े नहीं जाते । टिप्पणी—(१) झार—पोतकर, रगड़कर । इंगुर—(सं हिङ्गुल>इङ्गुल>ईंगुर> इंगुर) एक प्रकारका लाल रंग जिसे अभ्रक पारद तथा गन्धक घोट कर बनाते हैं। स्त्रियाँ इसे अपना माँग भरनेके लिए सिन्दूरकी तरह काममें लाती हैं । बानी—(सं वर्णिक)-रंग । सुनबानी—सोनेका रेखांकन । इगुरी पृष्ठ भूमि पर सोनेसे रेखांकित चित्र चौदहवीं- पन्द्रहवीं शताब्दीमें काफी प्रचलित थे और उसके नमूने बड़ी मात्रामें चित्रित जैन ग्रन्थोंमें देखनेको मिलते हैं । (२) लंक—रावणका निवासस्थान । भमीखन—विभीषण । रेहा— रेखांकित किया । दसगर—दशकन्ध, रावण । (३) दुर—दुर्योधन । कुरुखेत—कुरुक्षेत्र, जहाँ महाभारत हुआ था । (४) इस पंक्तिम लोककथाओंमें प्रचलित पात्र जान पड़ते हैं किन्तु उनकी पहचान हम नहीं कर सके हैं । अगिया बैताल (अगिया बैतार)— विक्रमादित्यकी सिद्ध दो बैतालोंमेंसे एक । (५) चक्रव्यूह—चक्रव्यूह । (६) मिरखावन—मृगारण्य शिकारगाह । आनीं—अनेक प्रकारके ।

१९९ २०६ (रीडींग्स १६१) सिफ़ते खुश्बूए हर किस्से आरास्त: गोयद (प्रत्येक प्रकारकी सुगन्धिका वर्णन) लौटि देखि जो कुंकू लोरा। चन्दन घिसि मरि घरै कचोरा ॥१ बेर्ना परिमल इस औ छरा। ठौर ठौर पर सेडिया जरा ॥२ मेध सुगन्ध आइ असराऊ। चोवा पास होय मैंहकारू ॥३ खैर कपूर सुरंग सुपारी। पान अदा कर घरी सँवारी ॥४ नरियर दाख फिराँजी आहा। खाँड खँदोर कहूँ तिह काहा ॥५ लोरहिं लीन्ह खौम परछाईं, तुर उघाइ मुख जोइ ।६ धन बिरास चाँदा कैं, बास माँहिं निसि सोइ ॥७ टिप्पणी—( ) बेर्ना = ख बीरण, उस। परिमल—अनेक सुगन्धियोंको मिलाकर बनायी हुई सुगन्धि। इस—सम्भवतः इत्र। (३) मेध—मेद एक प्रकारकी सुगन्धि जो किसी पशुके नाभिस बनायी जाती थी। (आइन-अकबरी, आइन ३, पृ ८७)। चोवा—एक सुगन्धि जिसके तैयार करनेकी विधिका आइन अकबरीमें उल्लेख है। (४) कपूर—'केवर' पाठ भी सम्भव है। उस स्थितिम उसका तात्पर्य 'केवड़ा' होगा। २०७ (रीडींग्स १६१) सिफ़ते तख्त बरीं व मुकक्कल बे ज्याहिराते चिराग (शय्या वर्णन) पालँग सेब ओ आनि बिछाइ। धरत पाठ सुई लागे जाइ ॥१ पान बनै अरु फूलहिं भारी। सोनें झारी ढाँस गुंदारी ॥२ सुरंग चीर एक आन बिछावा। घरती पैंस झँपन अस आवा ॥३ सिद्धि धदि छत रखतें बिफगरा। खोंपा छूट छिटक गये भारा ॥४ यहि भैंति फरै फूल पहि पासी। फरेंकी धारि फूर भर दासी ॥५

२०० लोर जान आये समरि, पुहुप बास रस आइ ॥६ निसा हाथ पसारे, छाँपि उठे कर पाइ ॥७ टिप्पणी—(१) आधि—शकर । धरत—रखते ही। पाइ—पैर। धूर—भूमि । (३) सुरंग—लाल । अचँव—मूढ़ा । अस—ऐसा । (४) खोंवा—रेशमका जूड़ा। बाल—बाल केश । (५) काँड़ी—पुलकी टोकरी । कूर—कूड । २०८ ( रीडिंग्स १६० ) पैदाइ बदने लोरक चाँदा रा बज रजाब ( लोरकका चाँदाको जगाना ) गूँदवा गाँद परा मधकाई । दीन पतीसैं बैठे आई ॥१ मुखा कँवल जनु बिगसत आहा । अधर सुरंग बिरंगू फाहा ॥२ सोवत फिरा हियें कर धीरू । अपन देखि सुरँगि गा बीरू॥३ चितई गइँ अब आप जनाऊँ । पाइ धरउँ कै मकत सुनाऊँ ॥४ फिरि कै लोर झों अस आवा । मन संका नहि सोवत जगावा॥५ कापर जान भरपूर गहि, बीरहि यकति न आठ ।६ जीठ दान मन संका, किहि बिधि सोवत जगाउ ॥७ २०९ ( रीडिंग्स १६५ : पंजाब [क] ) बीदार शुदने चाँदा व गिरफ्तन मोये सरे लोरक व फरियाद बर आवर्दन ( चाँदाका जागकर लोरकके केस पकड़कर चिल्लाना ) ठहरत पेर गही कर भारी । नैन सांझहि मन आगि कुभारी ॥१ पुन खतरी आ नियरें आवा । कर गहि केस बाँद गुहरावा ॥२ बार बार कहि फेड न जागे । मानुस सुत सो गुहार न लागे ॥३

२१ ऊँच पोल तो चेरी जागहिं । चोर देखि भय जीयें लागहिं ॥४ छाड़ न केम घरसि दइ फेरा । करहि गुहार चोर महिं हेरा ॥५ मन रहँसै धनि अस कहै, जिये आस तुलान ।६ दयी ठाँठ जो माँगेउँ, सो महँ सरबस आन ॥७ पाठान्तर—पंजाब प्रति— शीर्षक—अंश अप्राप्य है । १—सूख । २—गुहरवा । ३—पूरी पंक्ति अप्राप्य है । ४—चोर देखि बहु जियसे डरारहिं । ५—पंक्ति ६-७ वाला अंश कट गया है । टिप्पणी—(१) बेर—समय । गढ़ी—पकड़ा । बारी—बाला युवती । (२) नियरेँ—निकट । गुहरावा—पुकार लगाऊं । (५) हेरा—देखा । (६) तुलान—पूरी हुई । (७) गुहार—पुकार । (८) सरबस—सर्वस्व सब कुछ । २१० ( रोकेण्ड्स १६१ ) जवाब दादने लोरक मर चाँदा रा बानरमी ( लोरुकका चाँदासे धीरे कहना ) मन अचरत छनि भीमर छोली । अपने जनम न कीन्हेउँ चोरी ॥१ आयउँ तोरैं नेह कुंवारी । कही चोर आँ दीन्ही गारी ॥२ चोर होवेउँ तोर अमरन लेवेउँ । पूर गहन ऊँ ऊघदि देवेउँ ॥३ घरी केम तूँ महिँ गुहरावसि । सोवत लोग फेरि अरय जगापसि॥४ अमरन काज न आयइँ मोरे । रूप भुलानेउँ चाँदा तोरें ॥५ तोहि लागि जो मरेउँ, नेह न छाडेउँ काउ ।६ पिरत तुम्हार लाग मोर हिरदें, जै दिठ बिनु आइ तो खाउ ॥७ टिप्पणी—गुहरावसि—पुकारती हो ।

२४ पुरुख न आपु सराहै, पूछति कहइ बात ॥६ घोर घोल सो मारै, जो मन पाउर रात ॥७ टिप्पणी—(१) च्छिन्हि—पहचानती हो । गह्म—ग्रहण । उबारेंउ—उबार दिया। (२) साझ—साथ । प्हरेउँ—भगाया । (३) भगरीं—सभों । (४) गार—गिरा । (७) पाउर—पागल । रात—अनुरक्त होकर । २१५ (रीडिंग्स १७ ब) रुपाऊ कर्दने चाँदा बर मेहानते लोरक (चाँदाका लोरकका उपहास करना) आपुहि बीर सराहसि काहा । जात गुवार आइ घरमाहा ॥१ हमरें घेर सहस एक जाहींहें । काज कहा नहीं तिइ एक न छेपहें॥२ जति कप्तान जो पूँछ पहारा । असवारहि कउँ फेरि न आवा ॥३ माझें लोर कीन्हि मिठार्ड । सिंह के मंदिर कस पैठेउ धाई ॥४ ऐसें नर आ सेउ कराइइ । साईं दोह अस छोड़ न आवइ ॥५ सुन जो पावइ महर जस, गोचरा परिहँइ बेरि ।६ एक धरति सो परि पर्ह, हँ डोलहु फिरि केरि ॥७ टिप्पणी—(१) गुवार—ग्वाल । जाइ—हो । (७) परिहँइ—पड़ेगी । बेरि—बेड़ी । २१६ (रीडिंग्स १७ ब) जवाब दादने लोरक बर चाँदा रा (लोरकका उत्तर) साईं दोइ अस बोलै नारी । रात आइ अइनातें भारी ॥१ कै आपन बिरुबार सँभारै । कै बिनाय धर्मा मई मारै ॥२

२०५ झेंकरें काज जीठ लै दीजा। ताकहँ चाँद दोह कइ कीजा ॥३ महर फाब घसि गोबराँ लेऊँ। बीउ जो माँग फाड़ि कै देऊँ ॥४ हमरैं दोह न कीजै घनाँ। दोहँ करहिं तिह कोइ न गुनाँ ॥५ गुन अवगुन सभ कोइ न जानै, जो मन आइ सरीर ।६ आयन पाठ घर आयउँ, हौँ पूछेउँ मझ नीर ॥७ टिप्पणी—(१) अहबाई—अनायास, बिना किसी कारणके। (२) बायस—निमन्त्रण। दियाप—दाद। (३) झंकरैँ—जिसके। २१७ (रीडिंग्स १०१अ) स्वाल कर्दन् चौंदा बर लोरक दर इश्क (चाँदका लोरकसे प्रेम-प्रश्न) पूछेउँ लोरक कहु सत मोही। (के) एती बुधि दीन्हेँ तोही ॥१ सतैंहि तरै सायर महँ नावा। बिनु सत बूड़े थाह न पावा ॥२ जिहँ सत होइ सो लागै तीरा। सत कइ हनै युद्ध मँझ नीरा ॥३ सत गुन खींचि तीर लै लावा। सत छाँड़ेँ गुन तोर बहावा ॥४ सत सँभार सो पावइ थाहा। बिनु सत थाह होइ अवगाहा ॥५ सत साथी सत साँमल, सतैं नाव गुनधार ।६ कह सत कित तूँ आयसि, यहु बुध दइ करतार ॥७ मूलपाठ—(१) के (लिपिकार काफ़पर ऊपर मरकज़ देना भूल गया है)। टिप्पणी—(१) एती—इतनी। (२) सायर—सागर। (४) गुन—रस्सी। (६) गुनधार—यह कँडहार भी पढ़ा जा सकता है। पद्मावत और मधु- मालतीमें यह शब्द अनेक बार आया है और कदा इस माताप्रसाद गुप्तने 'कँडहार' ही पढ़ा है और उसे 'कर्णधार'का रूप बताया है। वासुदेवशरण अग्रवालने भी इस रूपको स्वीकार कर उसका अर्थ 'पतवार धारण करनेवाला (माझी) दिया है। वस्तुतः उसके लिए

१२ २११ ( रीकैण्ड्स १५७ ) गुफ़्तनै चाँदा लोरक रा खुन्द ( चाँदा उत्तर ) लोर रैन जो घोरी आवइ । अमरन लेत तिन्हि कवन छुड़ावइ॥१ लोरहु नेह फइइ दुनि फाहा । अइस उतर कहु आइत आहा ॥२ मैं तिन्हको का संदेस पठावा । कौन सकति ऐं मो पहँ आवा ॥३ जा तिन्हिं पखि उठी जो आई । रहे न पाठ सो मरे उड़ाई ॥४ डिठ दइ पाहु आइ सो बेरा । नीन्द न फोठ लोर महिं हेरा ॥५ मींजु तार तूँ आनसि, फँसै मेट न जाइ ।६ पाठ धरहु तिहँ बिस्तर, लायहु जीठ गँवाइ ॥७ टिप्पणी—(१) मो—मुझ । २१२ ( रीकैण्डस १५८क ) सवाल करदने लोरक ब नमूदन तमसील ( लोरकका कथन ) जाँलहि जीठ घट महँ होई । तौलहि सरग न आवइ कोई ॥१ प्रथम मानुम जीउ गँवावइ । तो पाछैं थइ सरगहिं आवइ ॥२ मर कै चाँद सरग हौं आवा । जो डिठ होइ डराइ डरावा ॥३ हौं तो मरतें बिनहु सो देखी । तोहि देख धन मुएऊँ बिसोखी ॥४ सुर्ये जो मारे सो कस आहा । चाँद सुर्ये कर मारग काहा ॥५ देख रूप डिठ दीन्हों, तो आयउँ तिहिं पास ।६ रहे नैन तिहिं देखेवैं, रहे जीइ सें साँस ॥७ टिप्पणी—(१) जाँलहि—जब तक । तौलहि—तब तक । (२) पाछैं—पीछे, बादमें । (५) मारग—मारना ।