भारतकोश
संग्रह पर लौटें

चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

DevanagariAwadhipublished520 पृष्ठ

१९१ १९२ (रौशनम १४८) भज महरा बेगानये आमदने लोरक ब पाय उफ्तादने मैना ( लोरकका घर आना और मैनाका पैर पर गिरना ) देबस दहाँ दिसि फिरि फिरि आवइ । चाँद लागि निसि रोइ निहावइ॥१ रिन एक सग साथ न पैसै । गया अमर बन मंदिरहि पैसै ॥२ मना आइ पाइ लै परी । लोरक बैसु कहूँ एक घरी ॥३ नहाइ धोइ बस्तर पहिराऊँ । औ घिसि चन्दन सीस फिराऊँ ॥४ सेज बिछाइ फूल पर डासा । पिरम लागि मन सान्त करासों ॥५ उतर न देहि प्रेम छल छूटा, सोइ नार बिललाइ ।६ साँ नहिं सुनै चँवर घर चिन्ता, रहा नैन दोइ लाइ ॥७ टिप्पणी-(१) दहाँदिसि -दसो दिशा । (३) कहूँ-कही। १९३ (रौशनम १४९) महरा गिरफ्तने लोरक अज कमाये रियाक चाँदा ( चाँदाके वियोगमें लोरकका बन-गमन ) रैन चाँद जा टेउ बयानाँ । मगेँ मरौं कँ दूबस तुलाना ॥१ चला धीर बनखण्ड जहाँ । सिंघ सिंदूर सँकारहिं वहाँ ॥२ मकर दिषम बन भम्भी भैषइ । रन आइ गामर महँ गँषइ ॥३ मङ्गु चाँदा रिन एक. म्म्रिगवइ । तिहिँ असरेनिम गामराँ आवइ॥४- मिरग पय रोइ लागे हायइ । पाउ धरत सुरु चाँदा आवइ ॥५ इँह पर रैन पुरावइ, आ दिन पुनि इँह भाँन ।६ चाँदा मनह पडगश, तिल एक हाइ न भाँन ॥७ टिप्पणी-(२) सिंघ सिंदूर - देखिए दि० टी० १७५।५ । (४) मगरी-आसन । (७) पडगश-पागल हुआ ।

१९९ १९४ ( रीकेण्ड्स १५ ) बेकरार शुदने चाँदा सब कबाले इश्क लोरक ( लोरकके प्रेममें चाँदकी विकलता ) परी गनेझ सेज न भावइ । रैन चाँद बिइफइ झुपलावइ ॥१ कहु विहिँ सुरुज कवन पर बसा । मिख सर चढ़ा पीव मोर हसा ॥२ जहिँ कहुँ होइ सिंह आइ पुलाबहु । सुरुज आनि सेन बैसावहु ॥३ चाँद मरत लै सुरुज जियावइ । तू का करसि मोसें हुत आवइ ॥४ आनि विरस्पत सूंपा सरनाँ । रात देबस आइ मँह मरनाँ ॥५ अग दाइ मन चटपटी, घर बाहर न सुहाइ ।६ चाँद न जिये भानु बिनु, आनु बिरस्पत जाइ ॥७ टिप्पणी—(१) बिहफइ—बिहइ पाठ भी सम्भव है। दोनो ही निरस्पत (बृहस्पति) का देशज रूप है । (७) भानु—सूरज । यहाँ तात्पर्य लोरकसे है । भानु—से भानो । १९५ ( रीकेण्ड्स १५१ ) पेकन । दर बेकरारी चाँदा गोबर ( चाँदकी व्याकुलता ) हां निमि चाँद सुरुज कप पावडें । देबस होइ चढ़ि सरग मोलावउँ ॥१ पाँधे पँवर पँवरिया आगहिँ । तमकत पीर दड़ि डर भागहिँ ॥२ तो यहिँ कहाँ ईत पोसाऊ । रैन करैंट हिय उठे सताऊ ॥३ पाउम रात डगि अँधियारी । कितहुत सुरुज हँकारउँ नारी ॥४ जा मन रुचि माइ पियारा । भुरँग आंत किद्दि पाऊगुबारा ॥५ दसम भाग तुम्ह माधन, इहूँ जियं के आस ।६ चाँद सुरुज म पिगउप, पाँहु भाग बिलाम ॥७

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१४ १९८ (रीडिंग्स १५४) बुरदने बिरहस्त लोरक रा ब नमूढने राहे कस चाँदा (बिरहस्पतका चाँदके बौराहरका रास्ता दिखाना) जो सो बचन बिरस्पत कहा। लोर पीर हियें कै गहा ॥१ मन रहँसा कहु आजु मरावा। जिहलंग सूर मरग बइ पावा ॥२ बिरह झार अजहुत कुँमलानाँ। रहँसा कँवल भाँत बिहसाना ॥३ सो महि बाट आइ दिखराउ। जिहँ चड़ि आउँ चाँद कइ ठाउ ॥४ धनि सो रात जिहिँ मजन बुलाइँ। चाँद सुरुज दोइ गवन कराइ ॥५ चली बिरस्पत सरगहिँ, सुरुज गोइन लाइ। ६ जहाँ चाँद निसि बिसरइ, गई सो पँथ दिखराइ ॥७ टिप्पणी—(७) बिसरइ—बिश्राम करती है। १९९ (रीडिंग्स १५५) ख़रीदने लोरक अबरेशामे लाल बराय बाफ़्तने कमन्द (कमन्द बनानेके लिए लोरकका पाट खरीदना) पाट बघनियाँ लोर बिसाहा। परत सात गुन कीत बराहा ॥१ बन माँझ लोरक तस सानौँ। बानु सरग कइँ रची बिबानौँ ॥२ मुख माँग हुत सनु घर काड़ा। हाथ तीस एक आछँ ठाड़ा ॥३ अँहुरी मार गरेँ तिहिँ लाइ। जिहिँ सरि परि तिहँ पँखत न जाइ ॥४ उँड मँड राग फाँद सँचारी। बीर पाउ जिहिँ धरि धरै सँभारी ॥५ देखि पुष्ठि अस मैना, परहा करियहु काइ। ६ परी मँइल अठमारफ, बाँधे चाहत आइ ॥७ टिप्पणी—( ) बिसाहा—खरीदा। बराहा—बरहा मोटी रस्सी। (४) मार—मोड़ा। (७) मैइल—मैल।

१९५ २०० ( रीकेण्ड्स १५६ ) रवान शुदने लोरक दर शबे तारीका व बर शिगाल सूए कस चाँदा ( अँधेरी रातमें लोरकका चाँदेके पीराहरकी ओर जाना ) । छठ भादों निसि भइ अँधियारी । नैन न सूझे पाँइ पसारी ॥१ चला मीर घरहा गर लावा । जियकै धरै दूसरहिँ भुलावा ॥२ खिन गरजे फिर दइउ घरीसा । खोर भरे जर घाट न दीसा ॥३ दादुर रर्रहि बीजु चमकाई । अइस न जानु कौन दिसि जाई॥४ मसहूर दीख झरोखें पासा । लोर जानु नखत परगासा ॥५ चित भुलान बिसँभारा, मंदिर कौन दिसि आह ।६ देबस होत जा खित घरौँ, उतर कहूँ तो काह ॥७ टिप्पणी-(३) दइउ-दैव बादल । खोर-गाँवका कच्चा रास्ता । जर-जल । (४) दादुर-मेंढक । रर्रहि-टर्र टर्र करत है । अइस-ऐसा । (७) उतर-उत्तर दिशा । २०१ ( रीकेण्ड्स १५७ ) बरख्शीदने वर्क व शिनाख्तने लोरक खानए चांदा (बिजली चमकना और लोरकका चाँदाका आवास पहचानना ) काँधा लँके भा उबियारा । थिर भिया लौर मंदिर मनस्यारा ॥१ सँघरसि मीच केर पोमाऊ । मेलसि परह रोपि धरि पाऊ ॥२ परा परह तो चाँदा जागी । अँकुरी देखि धाँखण्टे लागो ॥३ झाँसा चाँद लोर तर आवा । अँकुरी काढ़ि परह झटकावा ॥४ जेठ अँउ मेलि मंदिर तर जाइ। हँसि हँसि चाँदा दइ झटकाई ॥५ एक वार परा तो, मेलो परह फिराइ ।६ कागै ठार अइस एक, जौ न मंदिर पर बाइ ॥७ टिप्पणी-(१) काँधा-चमका । लँके-बिजली ।

१९५ (२) बासारू—पुरुषार्थ । मेलसि—फेंका । रापि—अड़ा करके । (४) झाँपा—झाँक कर देखना । तर (तल)—नीचे । (५) जइँ जइँ—ज्यों ज्यों । २०२ ( रीडँग्स १५८ : काधी ) अरभात कर्दने चाँदा बज बाज गुजाफ्तने कमन्द ( चाँदाका कमन्द छोड़ देने पर खद ) चाँद कहा अब लोरक नाहइ । मन उसरैं फुनि बहुरि न आइइ ॥१ हौं अस बोलेउँ चतुर सयानी । बरहा छोड़उँ कवन अपानी ॥२ हाथ क माँग समुँद मँह जाई । बहुरि¹ सो हाथ न चढ़े² आई ॥३ कइ औगुन सँसातें कें तोरा । परा परहँ³ पुनि होनै होरा ॥४ दई ठाउँ जो माँगा पाऊँ । मेठि बरह खाँभ लै लाऊँ ॥५ दइ बिधाता बिनवौं, सीस नाइ कर जोरि ।६ परा फाँद धन मोरैं, जाइ बरह जनि छोरि ॥७ पाठान्तर—काधी प्रति— दीगर रीडेण्ड्स प्रतिये समान ही केवल 'बज बाज' शब्द नहीं है। १—अन्तिम दो शब्द कुछ भिन्न हैं जो पढ़े नहीं जाते । २—शब्द भिन्न है जो पढ़ा नहीं जाता । ३—चढ़े म । ४—क ओगुन सें मैं गुन तोरा । ५—'बरह' शब्द नहीं है । ६—पंक्ति ६-७ नदारद हैं। टिप्पणी—(१) नाहइ—जायेगा । आइह—आवेगा । (२) अपानी—अज्ञानी । २०३ ( रीडंग्डस् १५९ ) कमन्द अन्दाफ्तने लोरक व रिहा कर्दने चाँदा दस्तून ( लोरकका कमन्द फेंकना और चाँदका उसे खम्भेस बाँधना ) घर भवा पठवरइ फिर आवा । दस मेलसि दस नक्षत्र ठनाबा ॥१ परा परह (तो) चाँदा पाई । जँकुरी मंदिर खाँभ लै छाई ॥२

१९७ रहा परह लाएक धरि मानाँ। पान जुगुति सौं धरमि परानाँ ॥३ पीर पयान परन को कादा। पढ़िन बाँस चढ़न जनु आढ़ा ॥४ पाँचे टरि बार गा आई। मँज ममर हाइ पमरी जाइ ॥५ पड़ा नार घोंघहर, दरगमि विगम अगम ।६ निरग नियर घर भाँहट बँध न एऊ पाम ॥७ मूलपाठ- ——— । टिप्पणी-(१) बेर - बेर । अहा-कुआँ । बढ़-बढ़न । (४) बैरिय-नदी। (५) पमरी-फैली। (७) नियर-मकान की तरह। घर भाँहट-उलट दिया। बैठ- बैठेगा। २०५ ( हंसदूत ११ ) वा दूतह हम हाथ दे—यह तो न सुनाने सरकार पान व ( मान्धता कै दूत हस्तिनापुर भेजा । हस्तिबोधेका समाचार दूत ने कहा ) गाहब मत्त गाँव दरगौहीं। सो दरगमि जो डगा नारी ॥१ निंदा मारि गा गाँव दरहीं। अगहक थल पनाय्य कहँहीं ॥२ ईरित हार घर पग जाड़ा। मग्ग नगर जनु पाट छाड़ा ॥३ धरौं मार जा दरह परैहीं। जासु अराम समरथी रहीं ॥४ विमरा पाँत सहन्न महाँ। मानिक बार गहाड़ अहाँ ॥ इन हँसि जग निंदा जोरी ईंट पुजार ।५

१९८ २०५ ( रीड्सबर्ग्स १४१; पंजाब [प ] ) सिस्ते नखशती चौरन्सी ( चौरण्डीकी चित्रसरीका वर्णन ) झार चौरुन्डी इगुर पानी । चित्र उरेह फीन्द सुनपानी ॥१ लंक उरेह भमीखन रेहा । सैंध मान दसगर र्क देहा ॥२ सीता हरन राम मंग्राऊँ । दुर पांडो कुरुखेत क ठाँऊँ ॥३ करपाँ पार कोइया सुभारू । अजपी नगरी अगिया बँतारू ॥४ साँझी पञ्चकाश्च भइ लावा । चक्रव्यूह अगिँ उथापा ॥५ सीह-सैंसूर मिरघ मिरपावन आनीं भाँत ।६ कपा-काथ परलोक निसारैंभ, लिख लीँयी जिहँ पाँत ॥७ पाठान्तर—पंजाब प्रति— शीर्षक—फट गया है । १—पूरी पंक्ति अस्पष्ट है पढा नहीं जाता । २—राउलदा (?) । ३—पंक्ति ६-७ अस्पष्ट हैं पढ़े नहीं जाते । टिप्पणी—(१) झार—पोतकर, रगड़कर । इंगुर—(सं हिङ्गुल>इङ्गुल>ईंगुर> इंगुर) एक प्रकारका लाल रंग जिसे अभ्रक पारद तथा गन्धक घोट कर बनाते हैं। स्त्रियाँ इसे अपना माँग भरनेके लिए सिन्दूरकी तरह काममें लाती हैं । बानी—(सं वर्णिक)-रंग । सुनबानी—सोनेका रेखांकन । इगुरी पृष्ठ भूमि पर सोनेसे रेखांकित चित्र चौदहवीं- पन्द्रहवीं शताब्दीमें काफी प्रचलित थे और उसके नमूने बड़ी मात्रामें चित्रित जैन ग्रन्थोंमें देखनेको मिलते हैं । (२) लंक—रावणका निवासस्थान । भमीखन—विभीषण । रेहा— रेखांकित किया । दसगर—दशकन्ध, रावण । (३) दुर—दुर्योधन । कुरुखेत—कुरुक्षेत्र, जहाँ महाभारत हुआ था । (४) इस पंक्तिम लोककथाओंमें प्रचलित पात्र जान पड़ते हैं किन्तु उनकी पहचान हम नहीं कर सके हैं । अगिया बैताल (अगिया बैतार)— विक्रमादित्यकी सिद्ध दो बैतालोंमेंसे एक । (५) चक्रव्यूह—चक्रव्यूह । (६) मिरखावन—मृगारण्य शिकारगाह । आनीं—अनेक प्रकारके ।

१९९ २०६ (रीडींग्स १६१) सिफ़ते खुश्बूए हर किस्से आरास्त: गोयद (प्रत्येक प्रकारकी सुगन्धिका वर्णन) लौटि देखि जो कुंकू लोरा। चन्दन घिसि मरि घरै कचोरा ॥१ बेर्ना परिमल इस औ छरा। ठौर ठौर पर सेडिया जरा ॥२ मेध सुगन्ध आइ असराऊ। चोवा पास होय मैंहकारू ॥३ खैर कपूर सुरंग सुपारी। पान अदा कर घरी सँवारी ॥४ नरियर दाख फिराँजी आहा। खाँड खँदोर कहूँ तिह काहा ॥५ लोरहिं लीन्ह खौम परछाईं, तुर उघाइ मुख जोइ ।६ धन बिरास चाँदा कैं, बास माँहिं निसि सोइ ॥७ टिप्पणी—( ) बेर्ना = ख बीरण, उस। परिमल—अनेक सुगन्धियोंको मिलाकर बनायी हुई सुगन्धि। इस—सम्भवतः इत्र। (३) मेध—मेद एक प्रकारकी सुगन्धि जो किसी पशुके नाभिस बनायी जाती थी। (आइन-अकबरी, आइन ३, पृ ८७)। चोवा—एक सुगन्धि जिसके तैयार करनेकी विधिका आइन अकबरीमें उल्लेख है। (४) कपूर—'केवर' पाठ भी सम्भव है। उस स्थितिम उसका तात्पर्य 'केवड़ा' होगा। २०७ (रीडींग्स १६१) सिफ़ते तख्त बरीं व मुकक्कल बे ज्याहिराते चिराग (शय्या वर्णन) पालँग सेब ओ आनि बिछाइ। धरत पाठ सुई लागे जाइ ॥१ पान बनै अरु फूलहिं भारी। सोनें झारी ढाँस गुंदारी ॥२ सुरंग चीर एक आन बिछावा। घरती पैंस झँपन अस आवा ॥३ सिद्धि धदि छत रखतें बिफगरा। खोंपा छूट छिटक गये भारा ॥४ यहि भैंति फरै फूल पहि पासी। फरेंकी धारि फूर भर दासी ॥५

२०० लोर जान आये समरि, पुहुप बास रस आइ ॥६ निसा हाथ पसारे, छाँपि उठे कर पाइ ॥७ टिप्पणी—(१) आधि—शकर । धरत—रखते ही। पाइ—पैर। धूर—भूमि । (३) सुरंग—लाल । अचँव—मूढ़ा । अस—ऐसा । (४) खोंवा—रेशमका जूड़ा। बाल—बाल केश । (५) काँड़ी—पुलकी टोकरी । कूर—कूड । २०८ ( रीडिंग्स १६० ) पैदाइ बदने लोरक चाँदा रा बज रजाब ( लोरकका चाँदाको जगाना ) गूँदवा गाँद परा मधकाई । दीन पतीसैं बैठे आई ॥१ मुखा कँवल जनु बिगसत आहा । अधर सुरंग बिरंगू फाहा ॥२ सोवत फिरा हियें कर धीरू । अपन देखि सुरँगि गा बीरू॥३ चितई गइँ अब आप जनाऊँ । पाइ धरउँ कै मकत सुनाऊँ ॥४ फिरि कै लोर झों अस आवा । मन संका नहि सोवत जगावा॥५ कापर जान भरपूर गहि, बीरहि यकति न आठ ।६ जीठ दान मन संका, किहि बिधि सोवत जगाउ ॥७ २०९ ( रीडिंग्स १६५ : पंजाब [क] ) बीदार शुदने चाँदा व गिरफ्तन मोये सरे लोरक व फरियाद बर आवर्दन ( चाँदाका जागकर लोरकके केस पकड़कर चिल्लाना ) ठहरत पेर गही कर भारी । नैन सांझहि मन आगि कुभारी ॥१ पुन खतरी आ नियरें आवा । कर गहि केस बाँद गुहरावा ॥२ बार बार कहि फेड न जागे । मानुस सुत सो गुहार न लागे ॥३

२१ ऊँच पोल तो चेरी जागहिं । चोर देखि भय जीयें लागहिं ॥४ छाड़ न केम घरसि दइ फेरा । करहि गुहार चोर महिं हेरा ॥५ मन रहँसै धनि अस कहै, जिये आस तुलान ।६ दयी ठाँठ जो माँगेउँ, सो महँ सरबस आन ॥७ पाठान्तर—पंजाब प्रति— शीर्षक—अंश अप्राप्य है । १—सूख । २—गुहरवा । ३—पूरी पंक्ति अप्राप्य है । ४—चोर देखि बहु जियसे डरारहिं । ५—पंक्ति ६-७ वाला अंश कट गया है । टिप्पणी—(१) बेर—समय । गढ़ी—पकड़ा । बारी—बाला युवती । (२) नियरेँ—निकट । गुहरावा—पुकार लगाऊं । (५) हेरा—देखा । (६) तुलान—पूरी हुई । (७) गुहार—पुकार । (८) सरबस—सर्वस्व सब कुछ । २१० ( रोकेण्ड्स १६१ ) जवाब दादने लोरक मर चाँदा रा बानरमी ( लोरुकका चाँदासे धीरे कहना ) मन अचरत छनि भीमर छोली । अपने जनम न कीन्हेउँ चोरी ॥१ आयउँ तोरैं नेह कुंवारी । कही चोर आँ दीन्ही गारी ॥२ चोर होवेउँ तोर अमरन लेवेउँ । पूर गहन ऊँ ऊघदि देवेउँ ॥३ घरी केम तूँ महिँ गुहरावसि । सोवत लोग फेरि अरय जगापसि॥४ अमरन काज न आयइँ मोरे । रूप भुलानेउँ चाँदा तोरें ॥५ तोहि लागि जो मरेउँ, नेह न छाडेउँ काउ ।६ पिरत तुम्हार लाग मोर हिरदें, जै दिठ बिनु आइ तो खाउ ॥७ टिप्पणी—गुहरावसि—पुकारती हो ।

२४ पुरुख न आपु सराहै, पूछति कहइ बात ॥६ घोर घोल सो मारै, जो मन पाउर रात ॥७ टिप्पणी—(१) च्छिन्हि—पहचानती हो । गह्म—ग्रहण । उबारेंउ—उबार दिया। (२) साझ—साथ । प्हरेउँ—भगाया । (३) भगरीं—सभों । (४) गार—गिरा । (७) पाउर—पागल । रात—अनुरक्त होकर । २१५ (रीडिंग्स १७ ब) रुपाऊ कर्दने चाँदा बर मेहानते लोरक (चाँदाका लोरकका उपहास करना) आपुहि बीर सराहसि काहा । जात गुवार आइ घरमाहा ॥१ हमरें घेर सहस एक जाहींहें । काज कहा नहीं तिइ एक न छेपहें॥२ जति कप्तान जो पूँछ पहारा । असवारहि कउँ फेरि न आवा ॥३ माझें लोर कीन्हि मिठार्ड । सिंह के मंदिर कस पैठेउ धाई ॥४ ऐसें नर आ सेउ कराइइ । साईं दोह अस छोड़ न आवइ ॥५ सुन जो पावइ महर जस, गोचरा परिहँइ बेरि ।६ एक धरति सो परि पर्ह, हँ डोलहु फिरि केरि ॥७ टिप्पणी—(१) गुवार—ग्वाल । जाइ—हो । (७) परिहँइ—पड़ेगी । बेरि—बेड़ी । २१६ (रीडिंग्स १७ ब) जवाब दादने लोरक बर चाँदा रा (लोरकका उत्तर) साईं दोइ अस बोलै नारी । रात आइ अइनातें भारी ॥१ कै आपन बिरुबार सँभारै । कै बिनाय धर्मा मई मारै ॥२

२०५ झेंकरें काज जीठ लै दीजा। ताकहँ चाँद दोह कइ कीजा ॥३ महर फाब घसि गोबराँ लेऊँ। बीउ जो माँग फाड़ि कै देऊँ ॥४ हमरैं दोह न कीजै घनाँ। दोहँ करहिं तिह कोइ न गुनाँ ॥५ गुन अवगुन सभ कोइ न जानै, जो मन आइ सरीर ।६ आयन पाठ घर आयउँ, हौँ पूछेउँ मझ नीर ॥७ टिप्पणी—(१) अहबाई—अनायास, बिना किसी कारणके। (२) बायस—निमन्त्रण। दियाप—दाद। (३) झंकरैँ—जिसके। २१७ (रीडिंग्स १०१अ) स्वाल कर्दन् चौंदा बर लोरक दर इश्क (चाँदका लोरकसे प्रेम-प्रश्न) पूछेउँ लोरक कहु सत मोही। (के) एती बुधि दीन्हेँ तोही ॥१ सतैंहि तरै सायर महँ नावा। बिनु सत बूड़े थाह न पावा ॥२ जिहँ सत होइ सो लागै तीरा। सत कइ हनै युद्ध मँझ नीरा ॥३ सत गुन खींचि तीर लै लावा। सत छाँड़ेँ गुन तोर बहावा ॥४ सत सँभार सो पावइ थाहा। बिनु सत थाह होइ अवगाहा ॥५ सत साथी सत साँमल, सतैं नाव गुनधार ।६ कह सत कित तूँ आयसि, यहु बुध दइ करतार ॥७ मूलपाठ—(१) के (लिपिकार काफ़पर ऊपर मरकज़ देना भूल गया है)। टिप्पणी—(१) एती—इतनी। (२) सायर—सागर। (४) गुन—रस्सी। (६) गुनधार—यह कँडहार भी पढ़ा जा सकता है। पद्मावत और मधु- मालतीमें यह शब्द अनेक बार आया है और कदा इस माताप्रसाद गुप्तने 'कँडहार' ही पढ़ा है और उसे 'कर्णधार'का रूप बताया है। वासुदेवशरण अग्रवालने भी इस रूपको स्वीकार कर उसका अर्थ 'पतवार धारण करनेवाला (माझी) दिया है। वस्तुतः उसके लिए

१२ २११ ( रीकैण्ड्स १५७ ) गुफ़्तनै चाँदा लोरक रा खुन्द ( चाँदा उत्तर ) लोर रैन जो घोरी आवइ । अमरन लेत तिन्हि कवन छुड़ावइ॥१ लोरहु नेह फइइ दुनि फाहा । अइस उतर कहु आइत आहा ॥२ मैं तिन्हको का संदेस पठावा । कौन सकति ऐं मो पहँ आवा ॥३ जा तिन्हिं पखि उठी जो आई । रहे न पाठ सो मरे उड़ाई ॥४ डिठ दइ पाहु आइ सो बेरा । नीन्द न फोठ लोर महिं हेरा ॥५ मींजु तार तूँ आनसि, फँसै मेट न जाइ ।६ पाठ धरहु तिहँ बिस्तर, लायहु जीठ गँवाइ ॥७ टिप्पणी—(१) मो—मुझ । २१२ ( रीकैण्डस १५८क ) सवाल करदने लोरक ब नमूदन तमसील ( लोरकका कथन ) जाँलहि जीठ घट महँ होई । तौलहि सरग न आवइ कोई ॥१ प्रथम मानुम जीउ गँवावइ । तो पाछैं थइ सरगहिं आवइ ॥२ मर कै चाँद सरग हौं आवा । जो डिठ होइ डराइ डरावा ॥३ हौं तो मरतें बिनहु सो देखी । तोहि देख धन मुएऊँ बिसोखी ॥४ सुर्ये जो मारे सो कस आहा । चाँद सुर्ये कर मारग काहा ॥५ देख रूप डिठ दीन्हों, तो आयउँ तिहिं पास ।६ रहे नैन तिहिं देखेवैं, रहे जीइ सें साँस ॥७ टिप्पणी—(१) जाँलहि—जब तक । तौलहि—तब तक । (२) पाछैं—पीछे, बादमें । (५) मारग—मारना ।

९३ २१३ ( रीकेन्ह्स १६८५ ) गुवाश्तने चाँदा मुये खरे लोरक व गिरफ्तने कमरबन्दे ऊ ( चाँदाका केश छोड़कर काँचुक पकड़ना ) लोर मन उठा सरोहू । चाँदा चितईं भुझानेवँ कोहू ॥१ केस छाड़ि धनि आँचर गहा । चाँद बैठि नर ठाढ़ा रहा ॥२ धोर नाँव आपुन कहु मोही । बोल सबद मकु चीन्हों तोही ॥३ कउन जात तुर घर है कहाँ । कउन लोक तुम्ह आछ जहाँ ॥४ मता पिता तोरें चिन्त न करिहैँ । रैन फिरत तिहि धाघ न घरिहैँ ॥५ कहत बचन मईं अस भा, फारुहिँ फरियहुँ तोहि ।६ महर रोस लै फरहिँ, सर हत्या फुनि मोहि ॥७ टिप्पणी—(२) धनि—स्त्री । आँचर—आँचल । गहा—ग्रहण किया, पकड़ा । ठाढ़ा—खड़ा । (३) नाँव—नाम । (४) कउन—कौन । तुर—तेरा । आछ—रहते हो । (७) रोस—रोष क्रोध । २१४ ( रीकेन्ह्स १६९ ) जवाब दायने लोरक चाँदा रा ( चाँदाको लोरकका उत्तर ) आजु कहु चाँद न चीन्हसि मोही । गहनें लेत उपारेउँ तोही ॥१ तुम्हरे साख जो छीन्ह न काऊ । मारेउँ पीठ खदेरेउँ राऊ ॥२ आनों चीर देख तोर अह । सगरँ चीर मोर मुख चह ॥३ हौं सो आइ धनि कँकू तोरा । खाँड परत जँ अग न मोरा ॥४ महर काजि में जीउ निपारेउँ । गार पमेरू तहाँ रोह हारेउँ ॥५

१४

पुरुख न आपु सराहे, पूंछति कहइ मात ।६ चोर पोल सो मारै, जो मन बाउर रात ॥७

टिप्पणी—(१) बिगहसि—पहचानती हो । गहन—ग्रहण । उघारइँ—उद्धार रिया । (२) सान्ध—साथ । न्हेडैइँ—भगाया । (३) सगरै—सभी । (४) गार—गिरा । (७) बाउर—पागल । रात—अनुरक्त होकर ।

२१५

( रीलैण्ड्स १० अ ) सखन करने चाँदा दर मेहानते लोरक ( चाँदाका लोरकका उपहास करना )

आपुहि बीर सराहसि काहा । आत गुवार आइ घरबाहा ॥१ इमरैं सेर सहस एक भाईहिँ । काज कहा नही तिह एक न छेबहिँ ॥२ अति फकान जो पूँछ बढ़ाबा । असबारहि कहँ फेरि न आवा ॥३ जाकहँ छोर कीन्हि मिताई । सिंह के मंदिर कस पैठेउ धाइ ॥४ ऐसें नर जो सेउ करावइ । साईं दोइ अस छोइ न आवइ ॥५ सुन सो पावइ महर अस, गोवरा परिहँइँ बेरि ।६ एक घरति सो मरि पहँ, तूँ डोलहु किह फेरि ॥७

टिप्पणी—(१) गुवार—ग्वाल । आइ—हो । (७) परिहँइँ—देँगी । बेरि—बेड़ी ।

२१६

( रीलैण्ड्स १ ब ) जवाब दादने लोरक बर चाँदा रा ( लोरकका उत्तर )

साईं दोइ अस बोलैं नारी । रात आइ अहनाहूँ मारी ॥१ कै पायन बिरुवार सँचारै । कै दिनाय पूनों महँ सारै ॥२

२०५ शेकरैं काज बीठ लै दीजा। ताकहँ चाँद दोह कइ कीजा ॥३ महर काज घसि गोबरौं लेऊँ। बीठ जो माँग फाड़ि कै देऊँ ॥४ हमरैं दोह न कीजै घनों। दोहैं करहिं तिन्ह कोइ न गुनों ॥५ गुन अवगुन सम कोइ न जानै, जो मन आइ सरीर ।६ पायन् पाउ घर आयउँ, हाँ बूड़ेउँ मझ नीर ॥७ टिप्पणी—(१) जइगातैं—अनायास, बिना किसी कारणके । (२) बायस—निमन्त्रण। विथाय—वाद । (३) शेकरैं—जिसके । २१७ ( रीडिङ्ग्स १०१क ) सवाल कर्दन चाँदा बर लोरक दर इश्क ( चाँदका लोरकस प्रेम प्रश्न ) पूँछेउँ लोरक कहु सत मोही । (के) एती बुधि दीन्हें तोही ॥१ सत्तैंन्हि तरै सायर महँ नावा । बिनु सत बूड़े थाह न पावा ॥२ जिहँ सत होइ सो लागै तीरा । सत कइ इनैं बूड़ मँझ नीरा ॥३ सत गुन खीचि तीर लै लावा । सत छाड़ैं गुन तोर पठावा ॥४ सत सँभार तो पावहू थाहा । बिनु सत थाह होइ अवगाहा ॥५ सत साथी सत साँमल, सत्त नाव गुनधार ।६ कह सत कित तँ आयसि, यह पुछ दइ करतार ॥७ मूलपाठ—(१) के (लिप्तिकार काफ़ के ऊपर मरकज़ देना भूल गया है)। टिप्पणी—(१) एती—इतनी । ( ) सायर—सागर । (४) गुन—रस्सी । (६) गुनधार—यह 'कँडहार' भी पढ़ा जा सकता है। पदमावत और मधु मालति में यह शब्द अनेक बार आया है और वहाँ इसे माताप्रसाद गुप्तने 'कँडहार' ही पढ़ा है और उसे 'कर्णधार' का रूप बताया है। वासुदेवशरण अग्रवालने भी इस रूपको स्वीकार कर उसका अर्थ 'पतवार धारण करनेवाला (माझी)' किया है। वस्तुतः उनके लिए

९६ 'करिया' शब्द है। पतवारवाहक का काम नावको नदी के बीच सम्हाले रहना है। नावको किनारे से रस्सी खींचनेवाला माँझी ही होता है। अतः प्रस्तुत प्रसंग मे उचित पाठ 'गुनधार' होगा 'कँडहार' नहीं। २१८ (रैडिंग्स १०१ब) जवाब दादन लोरक चाँदा रा ( लोरकका उत्तर ) जिहँ दिन चाँद गयउँ जेउनारा। देख बिमाहेउँ रूप तुम्हारा ॥१ तुम्हरे जोत भयउ उजियारा। परेउँ पतंग होइ मैं बिसमौँरा ॥२ सो रंग रहा न चित हुत जाइ। जिसहिँ माँझ रंग गड़िया छाई ॥३ रंग जेउँ रंग भोजन करउँ। रंग बिन जियउँ न रंग बिन मरउँ ॥४ तिहि रंग नैन नीर नइ पहा। बिनु सच घूड़ होइ अवगाहा ॥५ रंग जो देहि मन मारी, बिन रंग उठे न पाउ ।६ जीउ पाइ रंग डोलहि, सुन चाँदा सचभाउ ॥७ २१९ (रैडिंग्स ११८ब) गुफ्तने चाँदा हिकायते इश्क (चाँदा प्रेमकी बात कहना) रंग क बात कहउँ सुनु लोरा। कैसें रात मोह मन चोरा ॥१ जात अहीर रंग आइ न तोही। रंग बिनु निरग न राता होई ॥२ कहु दुख जो तैं सम निस सहा। बिन दुख यह रंग कैसे रहा ॥४ धो न दिप नर राँडइ घाऊ। रंग रत एक होइ न फाडू ॥४ अगिन झार बिनु रंग न हाइ। जिहि रंग होइ आवत मर साइ ॥५ अन न रूप रंग पड़ा, बाइ नींद निसि जाग ।६ मात पूत तूँ लारक, कहु कैसें रंग लाग ॥७

२०७ २२० ( रीड्स १०२ब ) जवाब दादन लोरक चाँदा रा ( लोरकका चाँदको उत्तर ) मान भयेउँ चाँदा तिहि जोगू । सर दइ खेलेउँ चित घर मोगू ॥१ काट गहेउँ अस सोवा सारी । खांढ पेम दोइ कीन्हेउँ मारी ॥२ आविस फादि कीन्ह दोई आधा । आवसु चाँद में आपुहि साधा ॥३ पिरह दगध हौं वो तों कीन्हा । जरत नीर तिइ ऊपर दीन्हा ॥४ अन छाड़तँ बिरह कँ झारा । पानी के हौं रहेउँ अधारा ॥५ कहैं धिरत सब आपन, आप जो पूछहु पास ।६ अधर घर के पेरें, तिहि रंग बारें रात ॥७ २२१ ( रीड्स १०३अ ) गुफ्तने चाँदा हिकायते मैना बा लोरक ( चाँदका लोरकसे मैनाकी प्रार्थना ) सुरग सेज मरि फूल बिछावसि । फेँवल फली तस मना रावसि ॥१ अस घनि छाड़ जो अनतँ धावा । किये सनेह तो हँइ छुटकारा ॥२ भँवर फूल पर रहइ लुभाइ । रमल बाकहि फिरि नहि जाइ ॥३ काइ लाग तूँ कुवरी करमी । सनेह के लिलार फूँट न धरमी ॥४ अरे लोर हूँ फिरँ परावमु । तिहँ पराउ जहाँ कछु पावसु ॥५ का अछत हाँ पाउडर, कें तू लोर धोरायसि ।६ कें सनेह महँ झरँबयस, जिग भावइ तित जायसि ॥७ टिप्पणी-(१) अनतँ—अन्यत्र । (३) बाकहिं—दशन । फिरि—लौटकर । (५) परावमु—भुलावा देता है; बहकाता है। पराउ—दरवाजा ।

१८ २२२ ( रौङ्गस १०३५ ) जवाब दादने लोरक चाँदा रा ( लोरकस चाँदाको उत्तर ) जिहँ दिन चाँद देखो फङ्गा । तिह दिन देखि तोर रंग चढ़ा ॥१ (बिसरा लोग कुटुँब घर बारा) । बिसरा अरथ दरब मोबारा ॥२ सुख तँबोल सिर तेल बिसारा । बिसरा परिमल फूल कँ हारा ॥३ अन न रूख निसि नीद बिसारी । बिसरी सेज सफ़ल फुलवारी ॥४ बुध बिसरी रंग भयलैं समाइ । ताकहँ न रंग गड़े माराइ ॥५ नेह तोरें रग पुरावा, हिरईं लागेउँ आइ ।६ कूहष सरग भइ धरती, जे सर बाइ तो बाइ ॥७ मूलपाठ—(२) बिसरा लोग कुटुँब घर बार निथारा । २२३ ( रौङ्गस १०३७ ) गुफ़्तन चाँदा हिकायते इश्के खुद बर लोरक रा ( चाँदाका लोरकस अपने प्रेमकी बात कहना ) जिहि दिन सारक रन मिति आयहु । पैठि नगर धाइ दिखरायहु ॥१ तिह दिन हुत मैं अन न करायी । परी न नीदु सेज न सुहाई ॥२ पेट पैसि जिठ लीन्हा फाड़ी । बिनु सीठ नारि बीउ बर ठाड़ी ॥३ मैं तुम्ह लाग बेठनार कराइ । अंतस फरी पिवहिं हँकराइ ॥४ महु तुम्ह एक टक देखैं पायेउँ । देख रूप मुख नैन सराहेउँ ॥५ तिहि दिन हुत हौं भूखेउँ, मोर जीउ तुम्हकौं भानु ।६ चिर बिथा पिरम तुम्हारा, तोर धुनि करियहि फाडु ॥७