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चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

DevanagariAwadhipublished520 पृष्ठ

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रात बीती और लोरिक न आता दिखाई पड़ा तो उसने रोकर शारदा का स्मरण किया और कहा कि यदि हम सानन्द हरदी पहुँच जायेंगे तो मैं तुम्हारी पूजा करूँगी और जो पहला बालक होगा, उसकी बलि मैं तुम्हें दूँगी। इतना सुनते ही देवी चन्दाकी सहायताके लिए आ गयीं और बोलीं— तुम चुपचाप यहीं बैठो मैं लोरिकको लाने जाती हूँ। वे लोरिकके मकान पहुँचीं। वहाँ उन्होंने मंजरीकी करामात देखी। देखकर सोचने लगीं कि उसने तो बड़ा प्रपंच रच रखा है। यदि मैं उसके सामने पड़ी तो वह मुझे शाप दे देगी। फलतः वे निद्रा देवीको बुलाकर ले आयीं। निद्रा देवी मंजरी के सिरपर सवार हो गयीं। तब मंजरीने लोरिकको शपथ देकर कहा कि जानेसे पहले मुझे जगा देना, मैं भी तुम्हारे साथ हरदी चलूँगी। यह कहकर वह सो गयी। तब देवीने लोरिकको जगाया और कहा कि चन्दा पेड़के नीचे बैठकर रो रही है। इतना सुनते ही लोरिक उठकर तैयार हो गया और कपड़े पहनकर धीरेसे पीछेका दरवाजा खोलकर बाहर निकला। वहीं से अपनी पत्नीको पुकार कर उसने कहा—तुमने जो शपथ दिया था उसकी मैं याद दिला रहा हूँ। मैं हरदी जा रहा हूँ, चलना हो तो चलो। पीछे दोष मत देना। इतना कहकर वह चल पड़ा और वहाँ पहुँचा जहाँ चन्दा बैठी थी। लोरिक- को देखकर चन्दा उलाहना देने लगी—यदि तुमको अपनी ब्याही पत्नी ही प्यारी थी तो मुझे घरसे बाहर क्यों निकाला ? रात बीतनेवाली है। गौरामें की गयी चोरी गौरामें ही पकड़ी जायगी। लोरिकने बात अनसुनी कर कहा—तुम अभी चुपचाप बैठो। मैं अपने गुरुसे भेंट करके आता हूँ। चन्दाने कहा—तुम तो गुरुसे भेंट करने जा रहे हो। पर यह तो बताओ सुबह मैं अपना मुँह कैसे दिखाऊँगी ? सब लोग वहाँ मेरा उपहास करेंगे। चाहे जो हो जब तक मैं गुरुसे भेंट नहीं कर लेता नहीं जाता। यह कहकर लोरिक चल पड़ा। मिताके घर पहुँचकर दरवाजा खटखटाया। मिताने दरवाजा खोला। लोरिकने तब मिताको बाँहमें समेटते हुए कहा—मैंने एक बहुत बड़ा अनुचित कार्य किया है। चन्दाको भगाकर हरदीबाजार ले जा रहा हूँ। आपसे भेंट करनेके लिए ही आया हूँ। मिताने कहा—इसमें कोई बुराई नहीं हुई है। तुम चन्दाको लेकर गौरामें ही रहो। जैसा भी होगा वैसे मैं सहदेवको मना लूँगा। नहीं मानेगा तो मैं उससे लल- कार कर युद्ध करूँगा और हम दोनों मिलकर उसे मार डालेंगे। लोरिकने उत्तर दिया—जिसके घरसे मैंने बेटी निकाली है उनसे मैं प्रत्यक्ष कैसे युद्ध करूँगा। दस-पाँच दिनमें सहदेवका गुस्सा अपने आप शान्त हो जायेगा। तब मैं वापस आ जाऊँगा। यह सुनकर मिताने आशीर्वाद दिया। लोरिक लौटकर चन्दाके पास आया

१८८ आदमी नहीं मिला जो तुम मेरे पीठपर अंगार डाल रही हो ? संसारमें न जाने कितने कुँवारे हैं। डिक्क पड़ाकर ब्याह क्यों नहीं कर लेती ? तुम मेरे पतिको भुलाकर मेरी सौत क्यों बन रही हो ? अभी कल तो वह मेरा गौना कराकर लाये और आज तुम सौत बन गयी। पन्वाका यह सुनना था कि वह मंजरीको गालियाँ देने लगी। बोली- अपने पतिको रस्सीमें बाँध क्यों नहीं रखती ! इतना सुनते ही मञ्जरीने दौड़कर उसका केश पकड़कर लीजा और लगी उसे पीटने । दोनोंको मारपीट करते देख भीड़ जमा हो गयी । लेकिन डरके मारे उन्हें छुड़ानेकी हिम्मत किसीको न हुई । जिस कोयरीका खेत था, वह अपने खेतको लथा नाथ होते देख भागा हुआ लोरिकके पास पहुँचा। सुनते ही लोरिक दौड़ा हुआ आया । मञ्जरीने लोरिकको देखते ही पन्वाको छोड़ दिया और घर चली आयी। लोरिक उसके पीछे-पीछे घर पहुँचा और मंजरीसे बोला-दूसरेकी बेटीका इस प्रकार उपहास क्यों करती हो ? बात क्या हुई जो इस प्रकार तुमने पन्वाका अप- मान किया ? यह सुनकर मञ्जरी बोली-तुम अपने मनकी बात सच-सच कहो ! पन्वा मुझसे किस बातमें अधिक है ? धनमें बुद्धिमें, रूपमें ? किस कारण तुम उसपर मोहित हो गये हो ? यदि तुमको उसपर ही लुभाना था तो मुझसे विवाह ही क्यों किया ! उसीसे ब्याह कर लेते । लोरिकने हँसकर कहा-सब लोग खेती करते हैं यह तो तुम जानती हो। अपने खेतमें अच्छा अनाज होते हुए भी लोग दूसरेके खेतसे कचरी उखाड़कर खाते हैं। बस, वही तुम समझ लो । उसके साथ तो बस चित्तका आमोद-प्रमोद है। तुम तो जीवन भरके लिए हो ! इतना कहकर लोरिक चला गया । धीरे धीरे सोमवारका दिन आया । शामको मञ्जरी सब तरहसे निश्चिन्त फिर चुकी तब उसने अपनी साससे कहा-आज जरा होशियार रहना। घरमें आज चोरी होनेवाली है। पन्वाको लेकर स्वामी हरदी भागने- का इरादा कर रहे हैं। यह सुनकर मूहकुण्डनने कही-मेरे हाथमें रुबड़ा (मोटा डंडा) दे दो और दरवाजेपर खाट बिछा दो । दरवाजेको कचकर नहीं छोड़ूँगी। जैसे ही पन्वाकी आवाज सुनायी देगी, वैसे ही यह रुबड़ा से मारूँगी। उसका सिर फूट जायेगा । मञ्जरी अपने कमरेमें आयी और लोरिकको मोचना कराकर बाहरका दरवाजा बन्द कर दिया । फिर लोरिकसे कहा-प्रतिदिन आप बाहर सोते हैं ! आज यहीं रह जावें । इतना कहकर वह सोनेका प्रबन्ध करने लगी । लोरिक थक गया और उसने मँजरीके साथ बातें करके जागते ही रात बिता दी । इधर पन्वा अपने पिताके भण्डारसे सोनेकी पिटारी उठाकर बाहर निकली। रास्तेम जहाँ-तहाँ सिन्दूरका टीका लगाती गयी और बढ़लीके पेड़के नीचे पहुँचकर लोरिककी प्रतीक्षा करने लगी। चार प्यासी

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रात बीती और लोरिक न आता दिखाई पड़ा तो उसने रोकर शारदा का स्मरण किया और कहा कि यदि हम सानन्द हरदी पहुँच जायेंगे तो मैं तुम्हारी पूजा करूँगी और जो पहला बालक होगा उसकी बलि मैं तुम्हें दूँगी। इतना सुनते ही देवी चन्दाकी सहायताके लिए आ गयीं और बोली-- तुम चुपचाप यहीं बैठो मैं लोरिकको लाने जाती हूँ। वे लोरिकके मकान पहुँचीं। वहाँ उन्होंने मंजरीकी करामात देखी। देखकर सोचने लगी कि उसने तो बड़ा प्रपंच रच रखा है। यदि मैं उसके सामने पड़ी तो वह मुझे शाप दे देगी। फलतः वे निद्रा देवीको बुलाकर ले आयीं। निद्रा देवी मंजरी के सिरपर सवार हो गयीं। तब मंजरीने लोरिकको शपथ देकर कहा कि जानेसे पहले मुझे जगा देना, मैं भी तुम्हारे साथ हरदी चलूँगी। यह कहकर वह सो गयी। तब देवीने लोरिकको जगाया और कहा कि चन्दा पेड़के नीचे बैठकर रो रही है। इतना सुनते ही लोरिक उठकर तैयार हो गया और कपड़े पहनकर धीरेसे पीछेका दरवाजा खोलकर बाहर निकला। वहीं से अपनी पत्नीकी पुकार कर उसने कहा-तुमने जो शपथ दिया था उसकी मैं याद दिला रहा हूँ। मैं हरदी जा रहा हूँ चलना हो तो चलो। पीछे दोष मत देना। इतना कहकर वह चल पड़ा और वहाँ पहुँचा जहाँ चन्दा बैठी थी। लोरिक को देखकर चन्दा उलाहना देने लगी-यदि तुमको अपनी प्यारी पत्नी ही प्यारी थी तो मुझे घरसे बाहर क्यों निकाला ? रात बीतनेवाली है। गौरामें की गयी चोरी गौरामें ही पकड़ी जायगी। लोरिकने बात अनसुनी कर कहा-तुम अभी चुपचाप बैठो ! मैं अपने गुरुसे भेंट करके आता हूँ। चन्दाने कहा-तुम तो गुरूसे भेंट करने जा रहे हो। पर यह तो बताओ सुबह मैं अपना मुँह कैसे दिखाऊँगी ? सब लोग यहाँ मेरा उपहास करेंगे। चाहे जो हो जब तक मैं गुरुसे भेंट नहीं कर लेता नहीं जाता। यह कहकर लोरिक चल पड़ा। मिझान घर पहुंचकर दरवाजा खटखटाया। मिझान दरवाजा खोला। लोरिकने तब मिझानको संक्षेपमें समेटते हुए कहा-मैंने एक बहुत बड़ा अनुचित कार्य किया है। चन्दाको भगाकर हरदीबाजार ले जा रहा हूँ। आपसे भेंट करनेके लिए ही आया हूँ। मिझान कहा--इसमें कोई बुराई नहीं हुई है। तुम चन्दाको लेकर गौरामें ही रहो। मन की डाँड़ा देने मैं महरेथको मना लूँगा। नहीं मानेगा तो मैं उसपर एक बार कर युद्ध करूंगा और हम दोनों मिलकर उसे मार डालेंगे। लोरिकने उत्तर दिया-जिनके घरसे मैंने बेटी निकाली है उनसे मैं प्रत्यक्ष कैसे युद्ध करूंगा। दस-पाँच दिनमें महरेथका गुस्सा शान्त और शान्त हो जायेगा। तब मैं वापस आ जाऊँगा। यह सुनकर मिझान आशीर्वाद दिया। लोरिक लौटकर चन्दाके पास आया

३९ ओर दोनों चल पड़े। चलते-चलते जब वे बोहाके पास पहुँचे तब लोरिकने कहा— जरा माईसे भी मिलता चलूँ ! चन्दाने कहा—तुम माईसे मिलने जाओगे तो वे तुम्हें आने न देंगे। उनकी बात छोड़ो। लोरिक बोला—यदि तुम्हें चलना है तो मेरे साथ सीधे चलो। नहीं तो अपने पिताके घर लौट जाओ। निदान चन्दा लोरिकके पीछे-पीछे चली। इतनेमें पौ फटी और सँवरू जगा। जब उसे चन्दाके नूपुरोंकी ध्वनि सुनाई दी तब उसने ननुकुवा चरवाहेसे कहा— जरा देख तो कौन बनिया बैल लादे जा रहा है जिसकी घंटी और घुँघरूकी झंकार सुनाई दे रही है। बाहर जानकर ननुकुआने देखा पर उसे कोई दिखाई नहीं दिया। इतने में उसकी नजर लोरिकपर पड़ी और उसके पीछे चन्दा आती दिखाई पड़ी। यह देखकर वह दौड़ा और सँवरूसे बोला—गौरामैं कुशल नहीं जान पड़ती है। लोरिक चन्दाको भगाकर जा रहे हैं। उसीके ये नूपुर बज रहे हैं। इतनेमें लोरिक स्वयं आ पहुँचा और सँवरूको अपने बाहोंमें कस लिया और फिर बोला—मैंने बहुत बड़ी बुराई की है। चन्दाको भगाकर मैं हरदी बाजार जा रहा हूँ। इतना सुनकर सँवरूने कहा—तुम्हें कहीं जानेकी आवश्यकता नहीं। तुम यहाँ रहो मैं गौरामें रहूँगा। लोरिकने कहा—आप मुझे केवल आशीर्वाद दें ताकि कुशलतापूर्वक हरदी बाजार जाऊँ। वहाँ सिर्फ दस दिन रहूँगा। इतना सुनकर सँवरूने उसे आशीर्वाद दिया और लोरिक चन्दाके साथ हरदी बाजारकी ओर चल पड़ा। रात समाप्त हुई और सुबह जब मंजरीकी नींद टूटी और उसे अपना पति दिखाई नहीं पड़ा तो वह रोने लगी। इस प्रकार लोरिकके भाग जानेका समाचार सारे परिवारमें फैल गया। महागिनने आकर समझाया—तुम घबड़ाओ मत! मैं अपने पतिके पास बोहा ख़बर भेजती हूँ। वह लोरिकको तुरत पकड़ मँगायेंगे। वह चन्दाके साथ हरदी नहीं जाने पायेगा और काकाको बोहा भेजा। काका जब सँवरूके पास पहुँचे तो उनकी बात सुनकर सँवरूने बताया कि जाते समय वह मुझसे मिलकर और सारी बात बता कर गया है। दस दिनमें वह लौटकर आ जायेगा। काकाने लौटकर सबको शान्त किया और धीरज बँधाया। सहदेवके महलमें जब चन्दा गायब हो जानेकी खबर फैली तो वे अपनी बदनामीके भयसे शिथिल हो उठे। लेकिन क्या करते। चलते-चलते चन्दा और लोरिकने बक्सर पहुँचकर नदी पार किया और

बिहिया पहुँचे। उस समय पहर भर रात बीत चुकी थी। अत' वे एक पकड़ीके सूखे पेड़के नीचे रुक गये। लोरिकने कहा—चलते-चलते मैं थक गया हूँ जरा मैं सो लूँ। इतना कहकर वह वहीं चादर तानकर सो गया। सोते ही उसे गहरी नींद आ गयी। चन्दा भी वहीं पासमें बैठ रही और उसे भी नींद आ गयी। उस पकड़ीके पेड़के पास एक साँप रहता था। वह साँप अपनी बिलसे निकला और निकलकर उसने चन्दाको काट खाया। जब सुबह हुई और लोरिककी नींद टूटी तो वह उठा और चन्दाको जगाने लगा। लेकिन जब वह नहीं जागी तो उसने ध्यानसे देखा और पाया कि वह तो मर गयी है। वह रोने लगा। चन्दाके वियोगमें वह पागल हो उठा और खीझकर सूखी हुई पकड़ीके पेड़के चारों ओर घूम घूमकर उसे काटने लगा। आने जाने वाले लोगोंको उसकी यह अवस्था देखकर कौतूहल हुआ। वे उसके चारों ओर एकत्र हो गये और उससे इसका कारण पूछने लगे। लोरिक रो रोकर अपनी सारी बात कह सुनायी और कहा—इस लकड़ीकी चिता बनाऊँगा और अपनी पत्नीके साथ सती हो जाऊँगा। यह सुनकर लोग हँसने लगे। बोले—पागल हुए हो। स्त्रीको तो पुरुषके साथ सती होते देखा है लेकिन स्त्रीके साथ किसी पुरुषके सती होनेकी बात नहीं सुनी गयी। पेड़ पर एक साँप रहता है उसीने उसको काट लिया होगा। नगरमें बहुतसे गुनी हैं जा तुम जाकर पुकार करो। किसी गुनीके कानम आवाज पहुँचेगी तो वह साँप काटनेकी बात सुनकर दौड़ा आयेगा। लोरिकने नगरमें जाकर पुकार की। उसकी बात सुनकर गुनी लोग एकत्र हुए। उन्होंने दूध मँगाकर नादमें भरवा दिया और मन्त्र पढ़कर चिली कौड़ी फेंकी। चिली कौड़ी जाकर साँपके माथेमें चिपक गयी। साँप गुस्सेमें भरा पकड़ीसे निकलकर चन्दाके पास आया। उसे देखते ही लोरिक गरुड़ होकर मारने दौड़ा तो सांप बिलमें फिर घुस गया। गुनी लोगोंने तरह तरहके उपाय करने पर भी जब वह न निकला तब उन्होंने लोरिकसे कहा कि तुम्हारे डरसे साँप नहीं निकल रहा है। जब तक तुम यहाँ रहोगे, साँप यहाँ नहीं आयेगा। गमछा बुझाकर उन्होंने टस वहाँसे हटाया तब सांप बिलसे निकलकर चन्दाके पास गया और अपना सारा विष खींच लिया और विषका वमन छोड़कर पकड़ीके छेदमें चला गया। चन्दा रामका नाम लेती हुई उठ खड़ी हुई। लोरिकने गुनियोंके प्रति कृतज्ञता प्रकट की। लोरिक जब आगे चलनेको उद्यत हुआ तो चन्दाने कहा— इस बिहिया बाजारका राजा अन्यायी है। उसने चन्दैनिया नामक एक सुन्दर नगर छोड़ा है जो गढ़ पचनेके बराबर जान पड़ता है। इसलिए राजाका राज्य छोड़कर अन्यत्र चले जाना।

११२ बड़ी तारीफ की। अब तो हम बिदिया बाजारके बीचसे ही चलेंगे। और गली-गली घूमेंगे और राज्यकी करतूत देखेंगे। चन्दाने समझाया-मेरा कहना मानो। महँसि लौट चलो। हमला हो जायेगा तो जो कुछ पैसा पासमें है वह सब लुट जायेगा और रास्तेका खर्च भी नहीं बचेगा। लोरिकने उत्तर दिया-मेरे बंधकी परम्परा ऐसी नहीं है। अगर हम किसी बगीचेकी बात सुन लेते हैं तो उसके पास आते हैं और दुर्गन्धकी बात होती है तो हम खुद कतरा जाते हैं। लोरिकके हठको समझ कर चन्दा बोली-अगर तुम नहीं मानते हो तो देखो समझना। मैं आगे-आगे चलती हूँ तुम जरा पीछे रुककर चलना। चन्दा चली। उसके नूपुरोंकी झंकार सुनकर रजवेनियाने उसकी ओर देखा और आकर रास्ता रोक दिया। बोला-बिदियाकी कौड़ी (कर) देकर जाओ। चन्दाने कहा-मैंने कोई गाड़ी नहीं लादी है। कौड़ी दूँ तो किस बातकी ! रजवेनिया बोला-बिदियामें तुम्हारे नूपुर बजते हुए जा रहे हैं। तो तुम्हें इनके बजनेकी कौड़ी देनी होगी। इतना सुनकर चन्दाने पैरोंसे नूपुरोंको उतार कर आँचलमें बाँध लिया। बोली-लो अब तुम्हारे बिदियामें नूपुर नहीं बजेंगे। और कहकर वह आगे बढ़ी। रजवेनिया फिर स्थान रोककर खड़ा हो गया और तरह-तरहकी बातें करनेके बाद उसने चन्दासे विवाह करनेका प्रस्ताव किया। उसकी बातें सुनकर चन्दाने उसे गालियाँ सुनायीं। गालियाँ सुनकर रजवेनिया क्रुद्ध हो गया और चन्दाकी ओर झपटा। तब चन्दाने पीछे मुड़कर देखा और लोरिकको इशारा किया। इशारा पाते ही लोरिक चन्दाके पास आ पहुँचा। उसने अपनी खाँड बाहर निकाल ली और वह रजवेनियाको मारने लगा। चन्दाने रोका और कहा कि इसकी दुर्गति करके ही छोड़ देना ठीक होगा। तदनुसार लोरिकने पास ही लगे भीलव (बेल) के पेड़से फल तोड़े और रजवेनियाके लम्बे लम्बे बालोंमें गूँथ दिये और फिर उसे घुमाना शुरू किया ! पक्के बेल के फल झूलकर उसके मुँहपर चोट करने लगे। जब लोरिकने देख लिया कि उसकी पूरी मरम्मत हो चुकी तो उसे छोड़ दिया। रजवेनिया भागा हुआ राजाके पास पहुँचा और अपनी दुर्व्यथाका हाल कह सुनाया। उसकी बात सुनते ही राजाने अपनी सेनाको लोरिकको घेर लेनेका आदेश दिया। लोरिकने जब रणभेरी सुनी तो चन्दाको एक शमीके वृक्षपर बैठाकर आप उनसे जूझनेके लिए आगे बढ़ा। देखते-देखते उसने सारी सेनाको काट गिराया! सेनाका विनाश देखकर राजा अपने हाथी पर भाग चला। लोरिकने दौड़कर उसे पकड़ लिया और रस्सीसे बाँध दिया। राजा हाथ जोड़ कर प्राणदान माँगने लगा। तब लोरिकने कर उठानेका वचन देने पर उसे छोड़ा और चन्दाको लेकर आगे बढ़ा।

१९३ आगे बढ़नेपर चन्दाने कहा—सड़कका रास्ता छोड़कर लोटौके रास्ते चलो । आगे सारंगपुर गाँव है, वहाँ महीपति नामक जुआरी रहता है, जिसके साथ तीन सौ साठ और जुआरी हैं । अगर उस रास्ते चलोगे तो वह तुम्हारा सारा धन जीत लेगा फिर हमारे पास रास्तेके खर्चका अभाव हो जायेगा । चन्दाकी बात सुनकर लोरिकने कहा—तुमने महीपति जुआरीका बखान किया । अब तो मैं जरूर उसका करतब देखूँगा । और वह महीपति जुआरीके घरके पास पहुँचा । जुआरियोंने उसे देखते ही घेर लिया और बोले—इस रास्ते जो भी आता है उसे एक दाव जुआ खेलना पड़ता है । अतः जुआ खेलकर ही आगे जा सकते हो । इतना सुनना था कि लोरिकने चन्दाको तो एक पेड़के नीचे बैठा दिया और स्वयं महीपतिके संग जुआ खेलने बैठ गया । खेलते खेलते लोरिक अपना सारा धन वस्त्र, हथियार सब कुछ हार गया । अन्तमें उसने चन्दाको ही दांवपर लगा दिया और उसे भी हार गया । तब महीपतिने पासेको एक ओर रखकर लोरिकसे कहा—अब मुँह क्या देखते हो । अपन रास्ते जाओ । और अपने आदमियोंसे कहा कि चन्दाको महलमें पहुँचा दो । जब महीपतिके आदमी चन्दाके पास पहुँचे और उससे लोरिकके हार जानेकी बात कही तो वह महीपतिके पास जाकर बोली—अभी एक दाव खेलनेके उपयुक्त मेरे गहने बचे हुए हैं । अतः तुम पहले मेरे साथ एक दाव खेलो । वह खेलने बैठ गयी । खेलते-खेलते उसने लोरिककी हारी हुई सभी चीज जीत ली और फिर महीपतिक्रा सब कुछ जीतकर सारंगपुर गाव भी जीत लिया । फिर लोरिकसे बोली—तुम्हारी इज्जत बच गयी । अब तत्काल हरदीके लिए चल दो । दोनों चल पड़े । उन्हें जाते देख महीपतिने अपने जुआरियोंको ललकारा कि जीती हुई स्त्री लिये जा रहा है । उसे मारकर छीन लो । यह सुनना था कि जुआरी लोरिकपर टूट पड़े । लोरिक भी उनसे गुथ गया और थोड़ी देरमें उन्हें मारकर समाप्त कर दिया । जुआरियोंको मारकर लोरिक चन्दाको लेकर आगे बढ़ा । चन्दाने आगे आनेवाले गांव कनकपुरको बतलाकर दूसरे रास्ते चलनेको कहा पर लोरिकने उसकी बातपर ध्यान नहीं दिया और चलता ही गया । जिस समय वे दोनों कनकपुरके निकट तालाबपर पहुँचे वे प्याससे व्याकुल हो रहे थे । वे तालाबमें घुसकर पानी पीने लगे । इतनेमें तालाबके पहरेदारोंने उन्हें देखा और तालाबको जूठा करनेके कारण उन्हें गाली देने लगे । गाली सुनकर लोरिकको गुस्सा आया और वह पहरेदारोंको मारने लगा । पहरेदार भागकर राजाके पास पहुँचे । राजाने लोरिकको परास्त करनेके लिए सेना भेजी । मगर लोरिकने सेनाको ही परास्त कर दिया । राजाने भागकर अपने घर में शरण ली ।

११४ लोरिक अपने रास्ते चल पड़ा और हरदी पहुँचकर महीचन्दका पता लगाया। महीचन्दने उन दोनोंका बड़े प्रेमसे बेटी-दामादकी तरह स्वागत किया। चम्बाने लोरिकको दो अशर्फी देकर कहा कि रास्तेमें तुम्हें बहुत बहना पड़ा; बहुत थक गये हो। जाकर शराब पी आओ, सारी थकान मिट जायेगी। तब तक मैं भोजन तैयार करती हूँ। लोरिक अशर्फियाँ लेकर निकला। भट्ठियोंमें जाकर शराबका नमूना चखने लगा। पर उसे अपने मनके अनुकूल कहीं शराब न मिली। अन्तमें जमुनी कलवारिनके भट्ठीपर पहुँचा। जमुनी लोरिकको देखते ही उसके रूपपर मोहित हो गयी और उसके लिए विशेष रूपसे शराब तैयारकर चखनेको दिया। उसे चखते ही लोरिक प्रसन्न हो उठा। देखते-देखते वह बारह बोतल शराब पी गया। तब उसने जमुनीपर दृष्टि डाली। दोनोंकी आँखें चार हुईं और वह वहीं जमुनीके संग सो रहा। आधी रातको यकायक लोरिकके कानमें ताल ठोकनेकी आवाज सुनाई पड़ी। सुनकर उसने जमुनीसे उसके सम्बन्धमें पूछा। पहले तो जमुनीने बात टालनेकी चेष्टा की। पर जब लोरिक न माना तो उसने बताया कि हरदीमें एक बुढ़िया रहती है। उसके एक लड़का है। एक दिन जब राजा महुअर्री अपने हाथीपर बाजारमें घूम रहे थे तो उस लड़केने उनके हाथीकी पूँछ पकड़ ली और पीछेकी ओर खींचने लगा। पीलवान कितना भी अंकुश लगाता हाथी पीछे ही हटता जाता। यह देखकर राजाने उस लड़केको अपने हाथीपर चढ़ा लिया और उसका नाम गजभीमक रखा। उन्होंने उसके लिए खाने-पीनेकी पूरी व्यवस्था कर दी है और मासिक वेतन निश्चित कर दिया है। उसे उन्होंने गेड़ुआपुर अखाड़ेका सरदार बनाकर भेज दिया है। वहाँ वह रोज सौ पहलवानोंको पछाड़ता है। उसीने गेड़ुआपुर अखाड़ेमें सलामी दी है, उसीकी यह आवाज थी। यह सुनकर लोरिक बोला—यह भीमक कैसा वीर है जिसकी हरदीमें प्रशंसा होती है। जिस समय मैं अगोरीदामें विवाह करने गया था उस समय मैंने तीन सौ साठ हाथियोंकी सूँड़ फाड़ डाली; मगर किसीने मेरा नाम नहीं बदला। मुझे लोग बाप-दादे रखे नामसे लोरिक ही पुकारते रहे। और इसने हाथीकी पूँछ पकड़कर पछीह भर दिया तो उसका नाम 'गज भीमक' हो गया। सुबह हुई तो लोरिक महीचन्दके घर लौटा। चम्बा लोरिकको देखते ही सभ्रम हो गयी—ससुरकी सिंदूरकी उपेक्षा कर, सुलारमें जाकर मैं इन्हें यहाँ ले आयी और यहाँ आते ही हरदीमें मेरी सौत पैदा हो गयी। यह सोचते हुए उसने लोरिकका स्वागत किया। लोरिक मुँह-हाथ धोकर जलपान कर सो रहा। नगरमें जिस किसीने भी लोरिकको देखा वह स्तब्ध हो उठा। लोग जाकर राजा महुअरके कान भरने लगे कि महीचन्दने किसी शत्रुको अपने यहाँ लाकर रख छोड़ा है। राजाने तत्काल महीचन्दके पास टिके परदेशीको बुला लानेके लिए सिपाही भेजे। सिपाहियोंने आकर यह बात महीचन्दसे कही। लोरिकने जब यह बात सुनी तो

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वह तत्काल चलनेको तैयार हो गया। जब जाने लगा तो चम्पाने कहा—राजा जातिको तेली है उसको कभी सलाम मत करना; और भूलकर भी उसके बायें मत बैठना। यदि इनमेंसे एक बात भी भूले तो तुम्हारे सात पुरखे नरकमें पड़ेंगे। तदनुसार लोरिक जाकर राजाके दरबारमें चुपचाप खड़ा हो गया और फिर आसन उठाकर राजाके दाहिने जा बैठा। यह देखकर दरबारके सभी लोग स्तब्ध हो गये। ये सब आपसमें कानाफूसी करने लगे कि इसने सारे दरबारका घोर अपमान किया। मगर किसीको खुलकर कुछ कहनेका साहस न हुआ। अन्तमें मन्त्रीने लोरिकसे गाँव-घर पूछा। लोरिकने अपने गाँव-घरका पता बताते हुए कहा—वहाँ दुर्भिक्ष पड़ा है। इसलिए यह सुनकर कि हरदीका राजा बड़ा धर्मात्मा है, वहाँ कोई भूखों नहीं मरता जो भी आदमी हरदीमें आता है, उसके उपयुक्त वह काम दिया करता है; मैं यहाँ आया हूँ। राजाने यह सुना तो मन्त्रीको लोरिकने उपयुक्त काम देनेका आदेश दिया। मन्त्रीने कहा—इसके उपयुक्त तो यहाँ काफी काम है। यहाँ छत्तीस वर्णके लोग रहते हैं। सभीके घर गाय-भैंसे हैं। उनकी चरवाही यह कर ले। नगरके दक्षिण जो परती भूमि पड़ी है उसीमें वह अपना छप्पर डाल ले और भैंसोंके लिए रथन बना ले। कोई इसे सत्तू और कोई आटा दे देगा। बस इसका दोनों वक्तका गुजारा हो जायेगा। प्रति वर्ष गोवर्धनकी पूजा होती है। उस अवसरपर कोई गमछा और कोई पुरानी धोती दे देगा। उन्हें जोड़-जाड़कर वह अपने पहनने लायक कपड़ा बना लियाकरे। यह सुनकर लोरिकको हँसी आ गयी। बमुस्कले हँसी रोककर गम्भीरताके साथ बोला—मन्त्रीजी, आपने सोच-समझकर ही मेरे उपयुक्त काम निश्चित किया है। किन्तु मेरी पत्नी धूप और हवा लगने मात्रसे कुम्हला जाती है। अतः आप अपनी बेटी या बहिनको सुबह-शाम भेज दिया करें वह आकर गायोंको दुहा किया करे। लेकिन अगर किसी भी गायका दूध बछड़ा पी गया तो मैं उसे मार बिना न रहूँगा। अगर यह बात मन्जूर हो तो आजसे ही मैं हरदीकी चरवाहीका भार उठाता हूँ। इतना कहकर लोरिक उठ खड़ा हुआ और चल आया। लोरिकके चले जानेपर राजा मन्त्रीपर बहुत बिगड़े—तुम्हारी वजहसे हम सबको गाली सुननी पड़ी। उसके बगलमें टंगे हथियारकी ओर ध्यान न देकर तुम उसकी जातिपर गये। उसे हम अपना चोबदीदार बनाकर रखते। जब कभी समर आ पड़ता उस समय वह हमारे काम आता। खैर, उसे बुलाकर तुम गोकुलपुर भेज दो जहाँ वह राजमहिन्सके साथ अखाड़ेमें रोझ करेगा। दूसरे दिन लोरिक स्वयं भीमलके अखाड़ेकी ओर चल पड़ा। रास्तेमें नदी पड़ी तो उसे उसने कूद कर पार किया। अखाड़ेपर पहुँच कर उसने अपनी साँड़ अखाड़ेके बाहर ही रख दी और भीतर जाकर अखाड़ेमे खेलनेकी इच्छा प्रकट की। भीमलके शिष्य रज्जूने कहा—पहले गुरू-पूजाकी व्यवस्था करो तब पाँव रोझना।

१९६ लोरिकने कहा—उसकी व्यवस्था मैं कल कर दूंगा। आज खेल लेने दो। यह सुनकर मीमरुने रजईसे कहा—न जाने कहाँका मूर्ख आकर मजाक कर रहा है। उसे धक्का देकर निकाल बाहर करो। यह सुनकर रजई लोरिकके पास आया और उससे भिड़ गया। पर वह लोरिकका कुछ न बिगाड़ सका। तब दूसरे मल्लाखिये भी आ जुटे पर लोरिकने उनको झटक दिया। अन्तमें मीमरु स्वयं लोरिकसे आ भिड़ा। उसे भी लोरिकने देखते-देखते परास्त कर दिया। यह देखकर जो लोग वहाँ थे वे भागकर हरदी पहुँचे और जाकर सारा हाल राजासे कहा। राजाने यह सुनकर अपनी सारा सेनाको तत्काल तैयार होनेका आदेश दिया। जब चन्दाने राजाको सेना लेकर आते देखा तो स्वयं भी अपनी सखियोंके साथ नदी के किनारे पहुँची और राजाको न मारनेका जो वचन लोरिकने दिया था उसे दिला- कर पीछे वापस ले जानेको प्रेरित किया और साथ ही लोरिकके क्रोधको भी शान्त किया। उस समय तो राजा वापस लौट आया। मगर लोरिकका हरदीमें रहना अपने लिए खतरेसे खाली न देख मन्त्रीसे कोई ऐसा उपाय करनेको कहा जिससे यह शत्रु सहज ही ढक जाय। यह सुनकर मन्त्रीने कहा—इसका सीधा उपाय है। हर साल नेठरपुरका हरेश भुताहा हरदी आता है और कई मासकी एकत्र की गयी सामग्री एक ही दिनमें समाप्त कर देता है और उससे सारे हरदीवासी परेशान हो उठते हैं। अतः इसे उसीके पास भेज देना चाहिए। उससे कहा जाय कि हरेशने नेठरपुरमें म्नेह राजकुमारको बन्दी कर रखा है। उसे छुड़ा लाओ। इस योजनाके अनुसार लोरिकसे नेठरपुर जानेको कहा गया। लोरिक घोड़ेपर सवार होकर नेठरपुर पहुँचा। आगेकी कथा उपलब्ध न हो सकी। जे डी बेगलरने अपने १८७१-१८७३ ई के पुरातत्त्वान्वेषण यात्राके विवरणमें बड़ागाँव (जिला शाहाबाद बिहार) के प्रसंगमें लोरिक-चन्दाकी कथा संक्षिप्त रूपमें दी है।१ उसमें आरम्भिक कथाओं यथा—लोरिकका जन्म, मंजरीके विवाह आदिकी कथा नहीं है। उन्होंने केवल लोरिक चन्दाके प्रेमकी कथा दी है। उसमें नेठरपुरवाली कथा भी नहीं है; फिर भी उससे कथाके अन्तका कुछ आभास मिलता है। बेगलरवाले रूपको डब्ल्यू. क्रूकने अपनी पुस्तक पापुलर रेलिजन एण्ड फोक लोर आफ नार्थनं इण्डियामें२ और वेरियर एलविनने फोकलोर आफ छत्तीसगढ़ में३ लगभग अविकल रूपमें उद्धृत किया है। वहींसे यह हिन्दीके कतिपय ग्रन्थोंमें भी उद्धृत हुई है। उसके अनुसार कथा इस प्रकार है :— १ आर्कोलाजिकल सर्वे रिपोर्ट १. ८-७ पृष्ठ ८ पृ. ७९-८ । २ खण्ड १,पृ ११७-१६१ ३ पृ ३१ ।

किसी समय शिवभर नामक एक व्यक्ति रहता था जिसे पार्वती ने नपुंसक हो जानेका शाप दे दिया था। शाप देनेके कारणको बेगलरने बताना उचित न समझकर नहीं दिया है। पार्वतीका शाप पानेसे पूर्व बचपनमें ही उसका विवाह हो गया था। यथा समय जब उसकी पत्नी चन्दन युवती हुई तो उसका गोना हुआ और शिवभर अपनी पत्नीको अपने घर लिवा लाया। शिवभरके नपुंसक्त्वके कारण उसकी पत्नी उससे असन्तुष्ट रहने लगी। उसने अपने गाँवके ही एक व्यक्ति चोरीसे सम्बन्ध स्थापित कर लिया और उसके साथ घरसे भाग निकली। शिवभरने उसका पीछा किया और उन्हें जा पकड़ा। लेकिन उसकी पत्नीने उपहास करते हुए लौटनेसे इन- कार कर दिया। बोली—जब मैं तुम्हारे घर थी तब तो तुमने परवाह न की और अब मेरे पीछे बेकार भाग रहे हो। लेकिन शिवभरने उसकी एक न सुनी। फलतः शिवभर और चोरी दोनोम घोर युद्ध हुआ और शिवभर हार गया। चोरी और चन्दन आगे चले। बड़गाँवके निकट जहाँ एक मुण्डहीन मूर्ति पड़ी है गङ्गापतिया नामक जुआरियोंके सरदारसे उनकी भेंट हुई। वह जुआगार गाँवका रहनेवाला था। चोरीने उसके साथ जुआ खेलनेकी इच्छा प्रकट की और दोनों खेलने बैठ गये। जुएमें चोरीके पास जो कुछ था वह तो हार ही गया साथ ही चन्दनको भी हार गया। जब गङ्गापतिया चन्दनको पकड़ने बढा तो चन्दन बोली—मानती हूँ कि मैं दाँवपर लगायी गयी थी और मैं हारी गयी हूँ किन्तु मेरे तनपर जो आभूषण हैं, वे दाँवपर नहीं लगाये गये थे। अतः उन आभूषणोंके साथ अभी एक दाँव और खेलो। जुआरी खेलने बैठ गया। चन्दन अपने प्रेमी चोरीके पीछे और जुआरीके सामने जुआ देखनेके बहाने जा खड़ी हुई। खेल देखनेमें लीन होनेका बहाना करते हुए उसने अपनेको इस ढंगसे विवस्त्र कर दिया मानों वह अनजाने अकस्मात् हो गया हो। जुआरी उसके रूप सौन्दर्यपर इस प्रकार मुग्ध हुआ कि उसकी ओरसे उसकी आँख हटती ही न थीं। फलतः वह हारने लगा। चोरीने न केवल अपना सब हारा हुआ धन जीत लिया वरन् उसके पास और जो कुछ भी था वह भी ले लिया। अन्तमें हार मानकर जुआरीने खेलना बन्द कर दिया। तब चन्दनने सामने आकर चोरीसे अपनी कारवाई कह सुनाइ और बताया कि जिस तरह वह उसे कञ्जाई औरतोंसे खेल रहा था। अन्तमें बोली कि इस दुष्टको मार डालो ताकि वह डींग न हाँक सके कि उसने मुझे विवस्त्र देखा है। चोरी बड़ा बली था। उसकी तलवार दो मनकी थी और उसका नाम था विज्ञाधर। एक ही झटकेमें उसने जुआरीका सर अलग कर दिया जो जुआगारमें जा गिरा और धड़ जहाँ वह बैठा था वहीं पाषाणयी हो गया। तबसे वहीं उसके शरीरके दोनों भाग पत्थर बने पड़े हैं। चोरी कुर्यरकटई नामक आकेरा नटका था। उसका विवाह भगोरी गाँव की जिसे अब रजोकी कहते हैं और वह हजारीबागसे बिहार जानेवाली सड़कपर स्थित

१८

है, एक लड़कीसे हुआ था। किन्तु उसकी पत्नी छठमैना अभी बच्ची थी और उसका गौना नहीं हुआ था। उसके एक बहन थी, जिसका नाम छुरी था। गोरीके एक भाई था जिसका नाम सेमरू था। अनाथ होनेके कारण उसे गोरीके पिताने अपने बेटेकी तरह पाला था। वह अगोरीके पास ही पाली नामक गाँवमें रहता था। गोरी और चन्देन दोनों हरहुंग पहुँचे। मुँगेरसे उत्तर वह जो बिजुकी मस्जिदपर स्थित था। उन्होंने वहाँके राजाको हराकर देश जीत लिए। हारे हुए राजाने कलिंगके राजासे सहायता ली और गोरीको गिरफ्तारकर एक कोठरीमें बन्द कर दिया। वहाँ उसे बिठाकर उसके हाथ-पैरोंमें कील ठोंक दिये गये और उसके छातीपर भारी सील रख दिया गया। इस तरह वहाँ वह बहुत दिनोंतक पड़ा रहा। अन्तमे आराधना करनेपर दुर्गा प्रसन्न हुईं और उसे छुटकारा मिला। छूटनेके बाद उसने राजासे फिर लड़ाई की और हरहुंगको जीत लिया और चन्देनसे उसका मिलन हुआ। वहाँ उनके एक पुत्र उत्पन्न हुआ और वे वहाँ बहुत दिनोंतक रहते रहे। एक दिन उनके मनमें स्वदेश लौटनेकी इच्छा जाग्रत हुई और वे बहुत सा धन लेकर पाली लौट आये। इस बीच उसके पोष्य भ्राता सेमरूको लोगोंने मारकर उसकी गायें और धन- दौलत लूट लिया था। उसके एक लड़का था। उसका परिवार बड़े कष्टसे जीवन बिता रहा था। गोरीकी पत्नी भी सयानी होकर सुन्दर युवती हो गयी थी और अपने मायकेमें ही कष्टके जीवन बिता रही थी। गोरीने पहुँचकर प्रचार किया कि दूर देशका एक राजा आया है। रूप इतना बदल गया था कि कोई उसे पहचान न सका। इस प्रकार अपनेको छिपाकर उसने अपनी पत्नीके सतीत्वकी परीक्षा लेनेका निश्चय किया। फलतः यह जानकर कि उसके शिविरमें दूध बेचने आनेवाली स्त्रियोंमें उसकी पत्नी भी है और उसे पहचानकर (उसकी पत्नीने उसे नहीं पहचाना) उसने अपने शिविर आनेके मार्गमें एक धोती फैला दी ताकि कोई भी उसे रौंदे बिना न आ सके। दूसरे दिन प्रातःकाल, जब औरतें दूध बेचने आयीं तो उसने अपनी पत्नी (चन्देन) से कहा कि उनसे लपककर आनेको कहे। छठमैना चन्देनके कहनेपर थोड़ीतक तो तेजीसे आयी मगर वहाँ आकर वह रुक गयी। दूसरी औरतें उसपर चलती चली गयीं। छठमैनाने धोतीको रौंदकर आनेके सिवा कोई रास्ता न देखकर धोती हटा देनेके लिए कहा। यह देखकर गोरी बहुत प्रसन्न हुआ। जब वह दूध बेच चुकी और दाम माँगने लगी तो गोरीने उसकी टोकरीम जवाहरात रखकर चावलसे ढक दिया। बिना किसी प्रकार सन्देह किये वह लेकर चली गयी। घरपर उसकी बहनने टोकरी खाली करते हुए उन जवाहरातोंको देखा और अनुमान किया कि उसने उन्हें दुराचार द्वारा प्राप्त किया है। तदनुसार वह छठमैनापर आरोप करने लगी। छठमैनाने जवाहरातोंके प्रति अपनी अनभिज्ञता प्रकट की। अन्तमें दोनोंने सन्देह दूर करनेके लिए एक साथ जानेका निश्चय किया। दूसरे दिन वे दोनों साथ गयीं। छुरीने गोरीको पहचान लिया और तब वास्तविकता प्रकट हो

२९९ गयी। लोगोंके हर्षका पारावार न रहा। लोरीको अपनी स्त्रीकी उपेक्षा करने और रखैलके साथ सुखपूर्वक रहनेपर काफी फटकार सुननी पड़ी। अन्ततोगत्वा व्यवस्था ऐसी हुई कि लोरीको अपनी रखैल छोड़नी न होगी। इस बीच लोरीके भतीजेने जब अपनी चाचीके दुराचारकी बात सुनी तो वह बड़ा बिगड़ा और लोरीसे लड़नेकी तैयारी की। घरपर हुर्की और सतमैनाको न पाकर वह और भी क्रुद्ध हुआ और उसने लोरीपर आक्रमण कर दिया। बहुत देरतक लड़ाई होती रही। लोरी परास्त हो गया और अपना जीवन खोने ही वाला था कि हुर्की और सतमैना भागी हुई वहाँ पहुँचीं और वास्तविकता प्रकट की। लड़ाई तत्क्षण बन्द हो गयी। लोरी अपनी प्रजापर न्यायपूर्वक शासन करने लगा। उसने कृषिको इतना प्रोत्साहन दिया कि रसोलीके आस-पासके जंगलोंको भी उपजाऊ भूमि बना दिया। फलतः पशु-पक्षियों, कीड़े-मकोड़ोंके रहने योग्य कोई जगह ही नहीं रही। सभी पशु पक्षी और कीट-मकोड़ोंने इन्द्रसे जाकर लोरीकी शिकायत की। लोरीको अपनी प्रजापर न्यायपूर्वक शासन करते देख इन्द्रको लगा कि उसे हानि पहुँचाना उनकी शक्तिसे बाहर है। जबतक वह कोई कुकर्म न करे, उसको हानि पहुँचाना सम्भव नहीं है। अतः उन्होंने दुर्गासे सलाह की। लोरीसे पापरत करनेके लिए दुर्गाने चन्दैनका रूप धारण किया और जिस तरह चन्दैन नित्य भोजन ले जाती थी भोजन लेकर लोरीके पास पहुँचीं। लोरीको इस मायाजालका कुछ ज्ञान न था। उसने देखा कि आज तो चन्दैन नित्यसे अधिक सुन्दरी लग रही है, वह उसके सौन्दर्यपर विमोहित हो गया। भोजन छोड़कर उसे आलिंगन करने लगा। उसने शरीर छुआ ही था कि दुर्गाने उसे पथभ्रष्ट जानकर कसकर एक तमाचा दिया, जिससे उसका सिर घूम गया। दुर्गा तत्काल अन्तर्धान हो गयीं। लोरीको यह देखकर अत्यन्त लज्जा आयी और खेद हुआ। उसने काशी जाकर मरनेका निश्चय किया। उसके सारे सम्बन्धी भी मोक्षवश उसके साथ गये। वहाँ वे सभी निद्राभूत हो मणिकर्णिका घाटपर पत्थर बने पड़े हैं। • मिर्जापुरी रूप मिर्जापुर जिले (उत्तर प्रदेश) में प्रचलित लोरिक और चन्दानी कथाका रूप जे० सी० नेस्फील्डने कलकत्ता रिव्यूमें प्रकाशित किया था। उसे लखनऊके दैनिक पायोनियरने अपने १९ मार्च १८८८ के अंकमें उद्धृत किया है। उक्त अनुसार यह कथा इस प्रकार है— गंगाके दक्षिणी किनारेपर स्थित रिसोंकोट्का राजा चेरो जातिका मकरा दुर्गतराय था। गंगाके उत्तरी किनारेपर रिसोंसे २ ३ मील दूर गौरा नामक एक दूसरा कोट था। वहाँ अहीर जातिका लोरिक नामक एक वीर रहता था। दोनों परस्पर घनिष्ठ मित्र थे।

कोई OCR पाठ नहीं।

लोग भागते हुए जब भरकुम्बी दर्रेके पास पहुँचे तो मंजरीने लोरिकसे अपने साथ लायी पिताकी साँडका प्रयोग करनेको कहा । किन्तु लोरिक न माना और अपनी ही साँड़से काम लेता रहा। जब उसकी साँड़ पत्थरकी चट्टानसे टकराकर दो टुकड़े हो गयी तो हारकर उसे मंजरीकी लायी हुई साँडको लेना पड़ा। उसके लगते ही पत्थरके चट्टानके टुकड़े-टुकड़े हो गये और लोरिक उसकी सहायतासे शत्रुओंको मार भगानेमें सफल रहा। इस प्रकार विजयपूर्वक वे लोग मंजरीको अपने घर ले आये।

भागलपुरी रूप

शरच्चन्द्र मित्रने अहीरोंमें दुर्गाकी पूजाके प्रचलनपर विचार करते हुए लोरिककी कथा इस प्रसंगसे दी है कि लोरिकने ही उसका आरम्भ किया था। उनकी दी हुई कथा स प्रकार है — लोरिक गौरका निवासी ग्वाला था और दुर्गाकी निरन्तर आराधना कर उनका प्रिय भक्त बन गया था। उसकी पत्नी माँजर ज्योतिष विद्यामे पारंगत थी। अकस्मात् उसे एक दिन अपने विद्या बलसे ज्ञात हुआ कि उसका पति लोरिकका उसीके गाँवके हीनजातीय राजाकी बेटी चानेनके साथ गुप्त प्रेम-सम्बन्ध चल रहा है। अपने विद्या बलसे उसे यह भी मालूम हुआ कि उसी रातका उसका पति चानेनको लेकर भाग जाने वाला है। उसने यह बात तत्काल अपनी सासको बतायी और कहा—आज धान इतनी देर तक कूटा जाय ताकि खाना बनानेमें देर हो जाय और अधिक-से-अधिक तरहकी चीजें बनायी जायें जिससे खाना तैयार होनेमें और भी देर हो। इस तरह खाना बनानेमें रात बहुत बीत गयी। जब सबेरा होनेको आया तब घरके लोग सोने गये। लोरिक भाग न जाय, इसलिए माँजरने उसे अपनी साड़ीसे बाँध दिया। बाहर जानेका रास्ता बन्द करनेके निमित्त उसकी मा दरवाजाके सामने खाट डालकर सोयी। जब राजाकी बेटी चानेनन उस पेड़के नीचे जहाँ लोरिकने मिलनेका वादा किया था उसे नहीं पाया तो बहुत घबरायी और दुर्गाका स्मरण कर उनसे सहायता की याचना की। दुर्गाने लोरिकको ले आनेका वचन दिया और कहा कि अगर लोरिकके आनेमें देर हुई और वह सबेरा होनेसे पहले न आ सका तो मैं रात सातगुनी कर दूँगी। पश्चात् दुर्गाने छप्पर फाड़कर लोरिकके लिए भाग बना दिया ताकि वह अपनी प्रेमिकाके साथ भाग सके। इस प्रकार दोनों प्रेमी नगरसे निकल कर हरदीके लिए रवाना हुए। रास्तेमें चानेनने कहा—जब तक तुम मुझे अपनी पत्नी न बना लोगे तब तक मैं तुम्हारी थालीमें नहीं खाऊँगी। निदान बहुत सोचोके पश्चात् लोरिकने चानेनके माथेमें सिन्दूर पहना दिया। यह तो विवाहका द्योतक मात्र था। वास्तविक विवाह तो पीछे देवी दुर्गाने अपनी सात बहनोंकी सहायतासे किया।

१ क्वार्टर्ली जर्नल आव द मिथिक सोसाइटी भाग ३ पृ १९३-१३ । ६१

४२ एक दिन रातको चानैन एक पेड़के नीचे सो रही थी कि उसे एक साँप ने डँस लिया और वह मर गयी। लोरिक उसके वियोगमें इतना दुखी हुआ कि चिता बनाकर चानैनके शवके साथ स्वयं जा बैठा और आग लगा दी। किन्तु तभी अदृश्य शक्तिने आकर उसकी अग्नि बुझा दी। लोरिकने पुनः आग लगायी और फिर उसी अदृश्य शक्तिने उसे बुझा दिया। यह क्रम कुछ देर तक चलता रहा। आकाशमें देवता यह देखकर बहुत चिंतित हुए कि एक पति अपने दिवंगत पत्नीकी चिता पर जल मरनेका प्रयत्न कर रहा है। अतः उसे इस कार्यसे विरत करनेके लिए उन्होंने दुर्गाको पृथ्वी पर भेजा। दुर्गा बुढ़ियाका रूप धारण कर लोरिकके पास आयीं और उसे समझाने लगीं कि वह चितापर न जले। किन्तु लोरिक अपने निश्चयसे टससे मस न हुआ। अन्ततोगत्वा हार मानकर दुर्गाने उसकी पत्नीको जीवित करनेका वचन दिया और जिस साँपने चानैनको डँसा था उसे बुलवाया। साँपने आकर घावसे अपना सारा जहर चूस लिया और चानैन पुनः जीवित हो गयी। दोनों प्रेमी वहाँसे आगे बढ़े और रोहिनी पहुँचे जहाँ महापतिवा नामक सुनार राज्य करता था। उस राजाके कर्मचारियोंने वहाँ उन्हें घेर कर महलमें चलकर जुआ खेलनेका आग्रह किया। राजा महाधूर्त था। उसने अपने बनाये हुए पासेसे जुआ खेलकर लोरिकका सब कुछ यहाँ तक कि उसकी सुन्दरी पत्नी चानैनको भी, जिसपर कि उसकी आँख गड़ी हुई थी, जीत लिया। किन्तु चानैनने कहा—जब तक मुझे खेलमें न हरा लो मैं आत्मसमर्पण न करूँगी। निदान फिर खेल आरम्भ हुआ। इस बार चानैनने बनावटी पासेको उठाकर फेंक दिया और अपने पासेसे खेलने लगी। राजाने जो कुछ जीता था उसने वह सब धीरे-धीरे जीत लिया। रोहिनीसे वे दोनों हरदी पहुँचे। लोरिक वहाँके राजाके पास गया। किन्तु उसने समुचित अभिवादन नहीं किया। इससे राजा बहुत रुष्ट हुआ और बोला—हमारी गायें चराना स्वीकार करो तभी तुम हमारे राज्यमें रह सकते हो। लोरिकने भी क्षुब्ध होकर उत्तर दिया—मैं तुम्हारी गायें तभी चराऊँगा जब तुम्हारी बेटी स्वयं दूध दुहाने आया करे। फलतः दोनोंमें युद्ध छिड़ गया और सात दिन सात रात निरन्तर युद्ध होता रहा। राजाकी बहुत बड़ी सेना मारी गयी। चानैनने दुर्गाकी मनौती मानी कि जीत होनेपर मैं अपने प्रथम जात पुत्रकी भेंट चढ़ाऊँगी। फलतः दुर्गाने आकर लोरिककी सहायता की और उसकी विजय हुई और हरदीके पराजित राजाने लोरिकको अपना सहगामी राजा घोषित किया। इस प्रकार लोरिक बारह बरस तक हरदीमें राज करता रहा। हरदीमें राज करते हुए एक दिन रातमें लोरिकने एक बुढ़ियाको बुरी तरह रोते सुना। उसका पुत्र किसी कामसे बाहर तीन दिनके लिए शहर गया हुआ था। यह रोना सुनकर उसे ध्यान आया कि इन बारह बरसोंमें उसकी माँ और पत्नीने

४०१

कितना रोया-कलप किया होगा । इसका ज्ञान होते ही वह तत्काल अपनी सुन्दरी प्रेयसी चानैनको लेकर अपेन घर चल पड़ा । घर पहुँच कर अपने घरके पास ही उसके लिए दूसरा घर बनवाया । यह कथा भागलपुर गजेटियरमें भी प्रायः इन्हीं शब्दोंमें अंकित है ।१ यत्र- तत्र थोड़ा विस्तार और कुछ नयी सूचनाएँ हैं । उक्त गजेटियरमें यह कथा हण्टर द्वारा संगृहीत स्टैटिकल एकाउण्टसे उद्धत की गयी है ।२ गजेटियरके अनुसार लोरिककी पत्नी मंजरने अपने पतिको एक दिन चानैनके साथ प्रेम-क्रीड़ा करते देख लिया । तब घर आकर उसने ज्योतिष ग्रन्थोंको देखा और उसे ज्ञात हुआ कि उसका पति उसी रातको भाग जानेकी योजना बना रहा है । इस ग्रन्थमें चानैनके पिताका नाम सहदीप माहार बताया गया है । गजेटियरमें दूसरी नयी बात यह है कि जब चानैन लोरिकको उस पेड़के नीचे नहीं पाती जहाँ उसने मिलनेका वादा किया था, तो उसपर डाक रंगसे पाँच चिह्न बनाकर पीछे हटकर दुर्गाका स्मरण करती है । तीसरी नयी सूचना गजेटियरमें यह है कि जब हरवीका राजा पराजित हो गया तो लोरिकसे बोला कि यदि तुम मेरे प्रतिद्वन्द्वी हेरवाके राजाका सिर काटकर ला दो मैं तुम्हें अपना आधा राज्य दे दूँगा । लोरिकने इसे स्वीकार कर लिया है और उसे पूरा कर दिखाया । अन्तिम नयी ज्ञातव्य बात गजेटियरमें यह है कि बुढ़ियाको रोते देखकर लोरिकने अपनी प्रेयसीको उसका कारण जाननेके लिए भेजा और स्वय भी उसके पीछे पीछे छिपकर गया और उन दोनोंकी बात सुनने लगा । बुढ़ियाने बताया—मेरा बेटा परदेस गया है । तीन दिनसे नित्य भोजन बनाकर उसकी प्रतीक्षा करती हूँ कि वह आता होगा किन्तु वह अबतक नहीं आया । निराश होकर तीन दिनके एकत्र भोजन को देखकर रो रही हूँ । चानैनने यह सोचकर कि लोरिकको यह बात मालूम होगी तो हो सकता है उसे भी अपने माँ और पत्नीकी याद आ जाये और वह उनके पास जानेको आतुर हो उठे । अतः वह बुढ़ियासे बोली—यदि लोरिक उसके रोनेका कारण पूछे तो वह अपने रोनेका यह कारण कोई दुर्व्यवहार बताये । लोरिकने छिपकर सभी बातें सुन ली थीं । अतः जब चानैन बाहर आकर बातें बनाने लगी तो उसने उसपर विश्वास न किया और बोला—अगर तीन दिनके लिए जरूरी कामसे आनेपर माँ अपने बेटेके लिए इस तरह रो सकती है तो मेरी माँ और पत्नी मेरे लिए, जो अपन आप वनवास लेकर यहाँ आ बैठा है, कितना रोती होंगी । और तत्काल अपनी प्रेयसीके साथ घर लौट आया ।

मैथिल रूप लोरिक-चाँदकी कथाका जो रूप मिथिलामें प्रचलित है वह प्रकाशित रूपमें अभी


१—पृष्ठ ४८-५ । २—इस पुस्तकका पृष्ठ निर्देश गजेटियरमें नहीं दिया गया है ।

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तक हमारे देखने में नहीं आया। बहेडा (जिला दरभंगा) निवासी ब्रजकिशोर वर्मा ने हमें सूचित किया है कि यह कथा मिथिलामें लोरिकानि अथवा महरायके नामसे प्रसिद्ध है। इस कथाके सात खण्ड हैं और एक-एक खण्ड आठ-आठ घण्टेमें गाये जाते हैं। इसके एक खण्डका नाम चनैन-खण्ड है। चन्दायमकी कथा इसी खण्डसे सम्बन्ध रखती है। अतः उन्होंने हमें केवल इसी खण्डका सारांश लिख भेजा है। वह इस प्रकार है— अगौरा नामक गाँवके राजाका नाम सहदेव था। उनके हलवाहेका नाम बूचे राउत और हलवाहेकी पत्नीका नाम कुवैन था। उन दोनोंके लोरिक और साँवर नामक दो बेटे थे। लोरिक बड़ा और साँवर छोटा था। ये दोनों छिल्हउके अखाड़ेमें कुश्ती खेला करते थे। लोरिक अत्यन्त बलवान और विशालकाय था। उसकी तलवार अस्सी मनकी थी। उसके तीन साथी थे—राउत धोबी, बप्पा चमार और शाह गुलाम। गौरा नामक एक दूसरे गाँवका राजा उसरा पँवार था जो अत्यन्त अत्याचारी और चरित्रहीन था। उसके राज्यकी प्रत्येक नवविवाहिताको, विवाहके पश्चात् पहली रात उस पँवार राजाके साथ बितानी पड़ती थी। उसी गाँवमें साठ गायोंकी स्वामिनी पद्मा मौहरि रहती थी। उसके मँजरि नामकी एक अत्यन्त रूपवती बेटी थी। उसरा पँवारकी आँखें उसपर लगी हुई थीं। वह इस प्रतीक्षामें था कि उसका विवाह हो और वह उसकी अंकशायिनी बने। अन्त- तोगत्वा मँजरिका विवाह लोरिकके साथ निश्चित हुआ और लोरिक अपने वीर पिता और योद्धा साथियोंके साथ मार्गमें अनेक युद्ध जीतता हुआ गौरा आया। धूम- धामके साथ उसका विवाह मँजरिके साथ सम्पन्न हुआ। तदनन्तर पँवारने लोरिकको मारकर मँजरिको छीन लेनेके अनेक प्रयत्न किये पर वह सफल न हो सका और लोरिकके हाथों मारा गया। लोरिक विपुल धनराशि प्राप्त कर अपनी पत्नी मँजरिके साथ अगौरा लौट आया। अगौराके राजा सहदेवके चनैन नामक एक रूपवती पुत्री थी। उसका विवाह शिवचर नामक राजकुमारसे हुआ था। वह बहुत बली था। एक दिन जब वह खड़ा होकर मूत्र त्याग कर रहा था उसी समय इन्द्र आकाश मार्गसे जा रहे थे। मूत्रके कुछ छींटे उनपर जा पड़े। फलतः इन्द्रने क्रुद्ध होकर शिवचरको नपुंसक हो जानेका शाप दे दिया और वह काम-शक्तिसे रहित हो गया।^१ अपनी इस अवस्थासे दुःखी होकर शिवचरने घर त्याग दिया और देवरा नदीके तटपर कुटी बनाकर रहने लगा। वहीं रहकर वह अपनी साठ गायोंको चराया करता। चनैन जब यौवनावस्थाको प्राप्त हुई और शिवचरका अपनी ओर आकृष्ट होत न पाया तो वह स्वयं एक दिन सोलहों शृंगार कर उसकी कुटीपर पहुँची।

१ चनैनकी दृष्टिसे नपुंसकताके इस कारणकी बात आजमगढ़के हुपनाम भिक्षुने भी हमसे कही थी। इससे जान पड़ता है कि भोजपुरी क्षेत्रके भी कुछ भागमें सम्भवतः यह कथा प्रचलित है।

किन्तु वह अपने पतिको अपनी ओर आकृष्ट करनेमें सफल न हो सकी। विवश होकर उसने इस प्रकारकी उपेक्षाका कारण पूछा। अपनी पत्नीके प्रश्नोंको सुनकर वह रोने लगा और रोते-रोते उसने अपनी काम-शक्तिहीनताकी बात कह सुनायी। तब चनैनने पूछा—ऐसी अवस्थामे मेरे उद्दाम यौवनका क्या होगा ? शिवधरने तत्काल किसी परपुरुषके संग जीवन व्यतीत करनेकी अनुमति दे दी। जब चनैन शिवधरके पाससे लौट रही थी तो रास्तेमें, गाँवके समीप ही, बण्ठा चमार मिल गया। वह उसके सौन्दर्यपर मुग्ध हो गया और उससे प्रणय निवेदन करने लगा। चनैनने उसे ठुकरा दिया तो वह बलात्कार करनेकी धमकी देने लगा। चनैनने इधर उधर देखा पर गाँव निकट होनेपर भी कोई आता-जाता दिखाई नहीं पड़ा जिसे वह अपनी सहायताके लिए पुकारती। इस संकटसे बचनेका उपाय वह सोच ही रही थी कि उसका ध्यान निकट ही खड़े एक अत्यन्त ऊँचे इमलीके वृक्षकी ओर गया। उसपर इमलीयोंके पके हुए गुच्छे लटक रहे थे। चनैनने कुछ सोचा और फिर मुस्कराकर बण्ठासे बोली—मुझे फुनगी (पेड़के सबसे ऊपरी भाग) पर लगी पकी इमलीयाँ खिलाओ। इतना सुनना था कि बण्ठा निशंक हो गया और बिना कुछ सोचे-समझे तत्काल अपनी पगड़ी और जूते उतार, मगन होता हुआ पेड़के सिरेपर चढ़ गया और इमली तोड़कर गिराने लगा। चनैनको अवसर मिला। उसने बण्ठाके जूते और पगड़ीको उठाकर दूर फेक दिया और स्वयं भाग निकली। जब तक बण्ठा पेड़से नीचे उतरकर अपनी पगड़ी और जूतेको सँभाले, तब तक चनैन महलमें जा पहुँची। निराश बण्ठा क्षुब्ध हो उठा और अगीरामें जाकर उत्पात मचाने लगा। लोरिकने उसे समझानेकी बहुत कोशिश की पर बण्ठा अपनी हरकतोंसे बाज नहीं आया। तब लोरिकने क्रुद्ध होकर उसे युद्धके लिये ललकारा। युद्धमें बण्ठा मारा गया। बण्ठाके मारे जानेकी खुशीमें चनैनने भोजका आयोजन किया और बण्ठाके विजेता लोरिकको विशेष रूपसे आमन्त्रित किया। जिस समय लोरिक भोजन कर रहा था ऊपरसे कुछ तिनके आकर उसकी पत्तलपर गिरे। लोरिकन आँख उठाकर ऊपर देखा। रूपसी चनैन अपने सत्तखण्डे महलके झरोखेपर खड़ी मुस्करा रही थी। उसे देखते ही लोरिक उसपर मुग्ध हो गया। दोनोंमें परस्पर कुछ सम्बत हुआ। तदनन्तर दोनों एक दूसरेसे छुप-छिपकर मिलने लगे। और एक दिन अंधेरी रातमें दोनों अपना गाँव छोड़कर भाग निकले और हरदीथान पहुँचे। हरदीधाम मौनगरके मौजनि राजाके राज्यम पड़ता था। वह राज्य अत्यन्त प्रतापी था। टिठरा नामक एक नाई उसका सेवक था। एक दिन अकस्मात् टिठरा नाईने चनैनको देख लिया। चनैनका रूप देखते ही वह मूच्छित हो गया। होश आनेपर वह मोपनि राजाके पास पहुँचा और बोला—एक आदमी लोरिक चनन्को चुराकर लाया है। आपकी सातो रानियाँ उस सुन्दर नाहुओंकी बावन भी नहीं हैं। यह सुनकर मंपनि राजाने चनैनको प्राप्त करनेके लिए षड्यन्त्र रचा।

४ ६ उसके सात सौ पहलवान गेरुवा नामक अखाड़ेमे कुश्ती लड़ा करते थे। गजभीमक उनका नायक था। वह अजेय समझा जाता था। राजाने लोरिकको बुलवाया और एक पत्र देकर उसे गजभीमकके पास भेजा। लोरिक पत्र ले जानेको तैयार हो गया। चनैनने राजाकी दुष्टतासे उसकी सवारीके लिये कटरा नामक प्रख्यात घोड़ेको चुना और उसपर सवार होकर लोरिक गजभीमकके पास चला। राजाने उस पत्रमें गजभीमकको आदेश दिया था कि पत्र देखते ही लोरिकको मार डालना। पर लोरिकको मारनेकी कौन कहे गजभीमक स्वयं लोरिकके हाथ अपने सात सौ पहलवानोंके साथ मारा गया! उस दिनसे मोचनि राजा लोरिकसे भयभीत रहने लगा और किसी प्रकार उसे मार डालनेकी फिक्रमें रहने लगा। इस बार उसने पत्र देकर लोरिकको हरेवा करेवाके पास भेजा। हरेवा-करेवा दो भाई थे और दोनों ही अत्यन्त अत्याचारी थे। उनके भयसे सारी प्रजा त्रस्त थी। लोरिक पत्र लेकर पहुँचा और मनविसुनीके मैदानमें उसकी हरेवा करेवासे लड़ाई शुरू हुई। युद्धमें पहले हरेवाका भागिनेय कोठा राघव का राजकुमार कुँवर अंगार मारा गया। पीछे लोरिकने हरेवा करेवाको भी अपने खड्गसे यमपुर पहुँचा दिया। वहॉँसे लौटकर लोरिकने राजा मोचनिको भी मार डाला। अब सोनहीघाटमें महल बनाकर लोरिक और चनैन सुखपूर्वक रहने लगे। चनैन राज-काज चलाने लगी। उधर लोरिकके वियोगमें उसकी पत्नी माँजरि सूखकर काँटा हो गयी। उसने गायोंको राजा कोल्हू मल्लवा छीन लेगया। उसके साथ लड़ते हुए लोरिकका भाई साँवर भी मारा गया और साँवरकी पत्नी भस्ममय देखकर सती होगयी। इस सब दुःखोंसे दुःखी होकर लोरिकके माता-पिता अन्धे हो गये। जब माँजरिने देखा कि उसका पति लौटकर नहीं आ रहा है तो उसने अपने पालतू कौवे—चाझिलके पैरमें पत्र बाँधकर लोरिकके पास भेजा। लोरिक पत्र पाकर घर लौटनेके लिये व्याकुल हो उठा और चनैनके लाख प्रतिरोध करनेपर भी उसे और अपने बेटे इन्द्रजीतको लेकर गौड़की ओर चल पड़ा। गौड़के निकट पहुँचकर लोरिक और चनैन दोनोंने अपना वेश बदल लिया और गौड़में अपना परिचय सलोनीके राजा-रानीके रूपमें दिया। चनैनके कहनेपर लोरिकके मनमें अपनी पत्नी माँजरिके प्रति संदेह जागा कि वह निश्चय ही अपना रूप सौन्दर्यमें बेचकर जीवन-यापन करती रही होगी। अतः अपने इस सन्देहकी पुष्टिके निमित्त उसने गाँव भरके दूधको खरीदनेकी योजना बना दी। फलतः गाँवकी सभी स्त्रियाँ उसके पास दूध बेचने आयीं। उनके साथ माँजरि भी आयी। चनैनने सब स्त्रियोंको तो दूधके मूल्यमें चावल दिये और माँजरिके दूध-पात्रको हीरे-मोतियोंसे भर दिये। चनैनने सोचा था कि हीरा-मोतियोंके प्रलोभनमें माँजरि पुनः आयेगी और उस राजा (लोरिक) की उपस्वामिनी बनना स्वीकार कर लेगी। किन्तु उसकी