भारतकोश
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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

द्वाविंश खण्ड

—: o :—

विनर्दिगुणविशिष्ट सामकी उपासना

सामोपासनप्रसङ्गेन गानविशेषादिसंपदुद्गातुरुपदिश्यते; फलविशेषसंबन्धात् ।सामोपासनाके प्रसङ्गसे उद्गाताको गानविशेषादि¹ सम्पत्तिका उपदेश किया जाता है, क्योंकि इससे फलविशेषका सम्बन्ध होता है ।

विनर्दि साम्नो वृणे पशव्यमित्यग्नेरुद्गीथोऽनिरुक्तः प्रजापतेर्निरुक्तः सोमस्य मृदु श्लक्ष्णं वायोः श्लक्ष्णं बलवदिन्द्रस्य क्रौञ्चं बृहस्पतेरपध्वान्तं वरुणस्य तान्सर्वानेवोपसेवेत वारुणं त्वेव वर्जयेत् ॥ १ ॥

सामके ‘विनर्दि’ नामक गानका वरण करता हूँ; वह पशुओंके लिये हितकर है और अग्निदेवतासम्बन्धी उद्गीथ है । प्रजापतिका उद्गीथ अनिरुक्त है, सोमका निरुक्त है, वायुका मृदुल और श्लक्ष्ण ( सरलतासे उच्चारण किये जानेयोग्य ) है, इन्द्रका श्लक्ष्ण और बलवान् है, बृहस्पति का क्रौञ्च ( क्रौञ्चपक्षीके शब्दके समान ) है और वरुणका अपध्वान्त (भ्रष्ट) है । इन सभी उद्गीथोंका सेवन करे; केवल वरुणसम्बन्धी उद्गीथका ही परित्याग कर दे ॥ १ ॥

विनर्दि विशिष्टो नर्दः स्वरविशेष ऋषभकूजितसमोऽस्यास्तीति विनर्दि गानमिति वाक्य-विनर्दि—जिसका नर्द यानी स्वरविशेष ऋषभ ( बैल ) के शब्दके समान विशिष्ट है वह विनर्दिगान है, यहाँ ‘गान’ शब्द वाक्यशेष है । वह विनर्दि गान पशुओंके

१. ‘आदि’ शब्दसे स्वर एवं वर्णादि समझने चाहिये ।

खण्ड २२ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०९


शाङ्करभाष्यशाङ्करभाष्यार्थ
शेषः। तच्च साम्नः संबन्धि पशुभ्यो हितं पशव्यमग्नेरग्निदैवत्यं चोद्गीथ उद्गानम्। तदहमेवं विशिष्टं वृणे प्रार्थय इति कश्चिद्यजमान उद्गाता वा मन्यते।लिये हितकर और अग्निदेवतासम्बन्धी उद्गीथ—उद्गान है। इस प्रकारके उस विशिष्ट सामका मैं वरण करता हूँ अर्थात् उसके लिये प्रार्थना करता हूँ—इस प्रकार कोई यजमान अथवा उद्गाता मानता है।
अनिरुक्तोऽमुकसम इत्यविशेषितः प्रजापतेः प्रजापतिदैवत्यः स गानविशेषः, आनिरुक्त्यात्प्रजापतेः। निरुक्तः स्पष्टः सोमस्य सोमदैवत्यः स उद्गीथ इत्यर्थः। मृदु श्लक्ष्णं च गानं वायोर्वायुदैवत्यं तत्। श्लक्ष्णं बलवच्च प्रयत्नाधिक्योपेतं चेन्द्रस्यैन्द्रं तद्गानम्। क्रौञ्चं क्रौञ्चपक्षिनिनादसमं बृहस्पतेर्बार्हस्पत्यं तत्। अपध्वान्तं भिन्नकांस्यस्वरसमं वरुणस्यैतद्गानम्। तान् सर्वानिवोपसेवेत प्रयुञ्जीत वारुणं त्वेवैकं वर्जयेत् ॥ १ ॥प्रजापतिका जो गानविशेष है, वह अनिरुक्त है अर्थात् अमुकके तुल्य है—इस प्रकार विशेषरूपसे निरूपित नहीं किया जा सकता; क्योंकि प्रजापति भी विशेषरूपसे निरूपित नहीं किया जाता। सोमका अर्थात् सोमदेवतासम्बन्धी जो उद्गीथ है, वह निरुक्त यानी स्पष्ट है। जो गान मृदु और श्लक्ष्ण है, वह वायुका यानी वायुदेवतासम्बन्धी है। जो श्लक्ष्ण और बलवान् यानी अधिक प्रयत्नकी अपेक्षावाला है, वह इन्द्रका यानी इन्द्रसम्बन्धी गान है। जो क्रौञ्च यानी क्रौञ्चपक्षीके शब्दके समान है, वह बृहस्पतिका यानी बृहस्पतिदेवतासम्बन्धी गान है। अपध्वान्त अर्थात् फूटे हुए काँसेके स्वरके समान जो है, वह वरुणदेवतासम्बन्धी गान है। उन सभीका सेवन अर्थात् प्रयोग करे, एकमात्र वरुणसम्बन्धी गानका ही त्याग करे ॥ १ ॥

२१० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय २

२१० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय २

स्तवनके समय ध्यानका प्रकार

अमृतत्वं देवेभ्य आगायानीत्यागायेत्स्वधां पितृभ्य आशां मनुष्येभ्यस्तृणोदकं पशुभ्यः स्वर्गं लोकं यजमानायान्नमात्मन आगायानीत्येतानि मनसा ध्यायन्नप्रमत्तः स्तुवीत ॥ २ ॥

मैं देवताओंके लिये अमृतत्वका आगान ( साधन ) करूँ—इस प्रकार चिन्तन करते हुए आगान करे। पितृगणके लिये स्वधा, मनुष्योंके लिये आशा (उनकी इष्ट वस्तुओं), पशुओंके लिये तृण और जल, यजमानके लिये स्वर्गलोक और अपने लिये अन्नका आगान करूँ—इस प्रकार इनका मनसे ध्यान करते हुए प्रमादरहित होकर स्तुति करे ॥२॥

| अमृतत्वं देवेभ्य आगायानि साधयानि । स्वधां पितृभ्य आगायान्याशां मनुष्येभ्य आशां प्रार्थितमित्येतत् । तृणोदकं पशुभ्यः स्वर्गं लोकं यजमानायान्नमात्मने मह्यमागायानीत्येतानि मनसा चिन्तयन्ध्यायन्नप्रमत्तः स्वरोष्मव्यञ्जनादिभ्यः स्तुवीत ॥ २ ॥ | मैं देवताओंके लिये अमृतत्वका आगान—साधन करूँ; पितृगणके लिये स्वधाका आगान करूँ; मनुष्योंके लिये आशा यानी प्रार्थित वस्तुका [ साधन करूँ ]। पशुओंके लिये तृण और जल, यजमानके लिये स्वर्गलोक और अपने लिये अन्नका आगान करूँ—इस प्रकार इन बातोंका मनसे ध्यान-चिन्तन करते हुए स्वर, ऊष्म और व्यञ्जनादिके उच्चारणमें प्रमादरहित होकर स्तुति करे ॥ २ ॥ |


स्वरादि वर्णोंकी देवात्मकता

सर्वे स्वरा इन्द्रस्यात्मनः सर्व ऊष्माणः प्रजापते- रात्मानः सर्वे स्पर्शा मृत्योरात्मानस्तं यदि स्वरेषूपाल-

खण्ड २२ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ २११

भेतेन्द्रꣳशरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा प्रति वक्ष्यतीत्येनं ब्रूयात् ॥ ३ ॥

सम्पूर्ण स्वर इन्द्रके आत्मा हैं, समस्त ऊष्मवर्ण प्रजापतिके आत्मा हैं, समस्त स्पर्शवर्ण मृत्युके आत्मा हैं। [इस प्रकार जाननेवाले] उस उद्गाताको यदि कोई पुरुष स्वरोंके उच्चारणमें दोष प्रदर्शित करे तो वह उससे कहे कि मैं इन्द्रके शरणागत हूँ; वही तुझे इसका उत्तर देगा ॥३॥

| सर्वे स्वरा अकारादय इन्द्रस्य बलकर्मणः प्राणस्यात्मानो देहावयवस्थानीयाः । सर्वे ऊष्माणः शषसहादयः प्रजापतेर्विराजः कश्यपस्य वात्मानः । सर्वे स्पर्शाः कादयो व्यञ्जनानि मृत्योरात्मानः । | अकारादि सम्पूर्ण स्वर, बल ही जिसका कर्म है उस इन्द्र यानी प्राणके आत्मा अर्थात् देह देहावयवस्थानीय हैं। श ष स ह आदि समस्त ऊष्मवर्ण प्रजापतिके अर्थात् विराट् या कश्यपके आत्मा हैं। क आदि (कवर्गसे लेकर पवर्ग तक) सम्पूर्ण स्पर्शवर्ण यानी व्यञ्जन मृत्युके आत्माके हैं। | | तमेवंविदमुद्गातारं यदि कश्चित्स्वरेषूपालभेत स्वरस्त्वया दुष्टः प्रयुक्त इत्येवमुपालब्ध इन्द्रं प्राणमीश्वरं शरणमाश्रयं प्रपन्नोऽभूवं स्वरान्प्रयुञ्जानोऽहं स इन्द्रो यत्तव वक्तव्यं त्वा त्वां प्रति वक्ष्यति स एव देव उत्तरं दास्यतीत्येनं ब्रूयात् ॥ ३ ॥ | इस प्रकार जाननेवाले उद्गाताको यदि कोई पुरुष स्वरोंमें उपालम्भ दे—'तूने दोषयुक्त स्वरका प्रयोग किया है'—इस प्रकार उपालम्भ दिये जानेपर वह उसे यह उत्तर दे कि स्वरोंका प्रयोग करते समय मैं इन्द्र अर्थात् प्राणरूप ईश्वरके शरणागत—आश्रित था; अतः तुझे जो कुछ उत्तर देना होगा, वह इन्द्रदेव ही देगा ॥ ३ ॥ |

—:०:—

२१२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २

२१२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय २

अथ यद्येनमूष्मसूपालभेत प्रजापतिँशरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा प्रति पेक्ष्यतीत्येनं ब्रूयादथ यद्येनꣳस्पर्शोषूपालभेत मृत्युँशरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा प्रति धक्ष्यतीत्येनं ब्रूयात् ॥ ४ ॥

और यदि कोई इसे ऊष्मवर्णोंके उच्चारणमें दोष प्रदर्शित करे तो उससे कहे कि 'मैं प्रजापतिके शरणागत था, वही तेरा मर्दन करेगा।' और यदि कोई इसे स्पर्शोंके उच्चारणमें उलाहना दे तो उससे कहे कि 'मैं मृत्युकी शरणको प्राप्त था, वही तुझे दग्ध करेगा' ॥ ४ ॥

| अथ यद्येनमूष्मसु तथैवोपालभेत प्रजापतिं शरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा त्वां प्रति पेक्ष्यति संचूर्णयिष्यतीत्येनं ब्रूयात् । अथ यद्येनं स्पर्शेषूपालभेत मृत्युं शरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा त्वां प्रति धक्ष्यति भस्मीकरिष्यतीत्येनं ब्रूयात् ॥ ४ ॥ | और यदि उसी प्रकार कोई पुरुष इसे ऊष्मवर्णोंके उच्चारणमें दोष प्रदर्शित करे तो वह उससे कहे कि 'मैं प्रजापतिकी शरणको प्राप्त था, वही तुझे पीसेगा अर्थात् [तेरे मदको] अच्छी तरह चूर्ण करेगा।' और यदि कोई इसे स्पर्शोंके उच्चारणमें उलाहना दे तो उससे कहे कि 'मैं मृत्युके शरणागत था, वही तुझे दग्ध यानी भस्मीभूत करेगा' ॥४॥ |

वर्णोंके उच्चारणकालमें चिन्तनीय

सर्वे स्वरा घोषवन्तो बलवन्तो वक्तव्या इन्द्रे बलं ददानीति सर्व ऊष्माणोऽग्रस्ता अनिरस्ता विवृता वक्तव्याः प्रजापतेरात्मानं परिददानीति सर्वे स्पर्शा लेशोनानभिनिहिता वक्तव्या मृत्योरात्मानं परिहराणीति ॥ ५ ॥

सम्पूर्ण स्वर घोषयुक्त और बलयुक्त उच्चारण किये जाने चाहिये; अतः [ उनका उच्चारण करते समय ] 'मैं इन्द्रमें बलका आधान करूँ'

खण्ड २२ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१३

ऐसा [चिन्तन करना चाहिये]। सारे ऊष्मवर्ण अग्रस्त, अनिरस्त एवं विवृतरूपसे उच्चारण किये जाते हैं [अतः उन्हें बोलते समय ऐसा चिन्तन करना चाहिये कि] 'मैं प्रजापतिको आत्मदान करूँ'। समस्त स्पर्शवर्णोंको एक दूसरेसे तनिक भी मिलाये बिना ही बोलना चाहिये और उस समय 'मैं मृत्युसे अपना परिहार करूँ' [ऐसा चिन्तन करना चाहिये॥ ५॥

| यत इन्द्राद्यात्मानः स्वरादयोऽतः सर्वे स्वरा घोषवन्तो बलवन्तो वक्तव्याः । तथाहमिन्द्रे बलं ददानि बलमादधानीति । तथा सर्व ऊष्माणोऽग्रस्ता अन्तरप्रवेशिता अनिरस्ता बहिरप्रक्षिप्ता विवृता विवृतप्रयत्नोपेताः प्रजापतेरात्मानं परिददानि प्रयच्छानीति । सर्वे स्पर्शा लेशेन शनकैरनभिनिहिता अनभिनिक्षिप्ता वक्तव्या मृत्योरात्मानं बालानिव शनकैः परिहरद्भिर्मृत्योरात्मानं परिहराणीति ॥५॥ | क्योंकि ये स्वरादि इन्द्रादिरूप हैं, अतः सम्पूर्ण स्वर घोषयुक्त और बलयुक्त बोले जाने चाहिये। तथा [उस समय] 'मैं इन्द्रमें बलका आधान करूँ' ऐसा [चिन्तन करना चाहिये]। इसी प्रकार समस्त ऊष्म-वर्ण अग्रस्त—भीतर बिना प्रवेश कराये हुए, अनिरस्त—बाहर बिना निकाले हुए, और विवृत—विवृत¹ प्रयत्नसे युक्त उच्चारण किये जाने चाहिये और [उनका उच्चारण करते समय] 'मैं प्रजापतिको आत्मदान करूँ' ऐसा [चिन्तन करना चाहिये]। तथा सम्पूर्ण स्पर्शवर्ण लेशमात्र—थोड़े-से भी अनभिनिहित-परस्पर बिना मिले हुए बोलने चाहिये और [उस समय यह चिन्तन करना चाहिये कि] जिस प्रकार लोग धीरे-धीरे बालकोंको जल आदि-से बचाते हैं उसी प्रकार मैं अपनेको धीरे-धीरे मृत्युसे हटाऊँ ॥ ५ ॥ |

—: ० :— इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये द्वाविंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २२ ॥ —: ० :—


१. वर्णोंके स्पृष्ट, ईषत्स्पृष्ट, विवृत और संवृत ये चार प्रयत्न होते हैं। इसमें स्वर और ऊष्मोंका विवृत, स्पर्शोंका स्पृष्ट, अन्तःस्थोंका ईषत्स्पृष्ट और ह्रस्व अवर्णका संवृत प्रयत्न होता है।

त्रयोविंश खण्ड


तीन धर्मस्कन्ध

ओङ्कारस्योपासनविध्यर्थं त्रयो धर्मस्कन्धा इत्याद्यारभ्यते । नैवं मन्तव्यं सामावयवभूतस्यैवोद्गीथादिलक्षणस्योङ्कारस्योपासनात्फलं प्राप्यत इति । किं तर्हि ? यत्सर्वैरपि सामोपासनैः कर्मभिश्चाप्राप्यं तत्फलममृतत्वं केवलादोङ्कारोपासनात्प्राप्यत इति । तत्स्तुत्यर्थं सामप्रकरणे तदुपन्यासः—ओङ्कारोपासनाका विधान करनेके लिये 'त्रयो धर्मस्कन्धाः' इत्यादि प्रकरणका आरम्भ किया जाता है । ऐसा नहीं मानना चाहिये कि एकमात्र सामके अवयवभूत उद्गीथादिरूप ओङ्कारकी ही उपासनासे फलकी प्राप्ति होती है । तो फिर क्या बात है ? [ऐसा प्रश्न होनेपर कहते हैं—] जो सभी सामोपासनाओं और कर्मोंसे भी अप्राप्य है, वह अमृतत्वरूप फल केवल ओङ्कारोपासनासे ही प्राप्त हो जाता है । अतः उसकी स्तुतिके लिये सामोपासनाके प्रकरणमें उसका उल्लेख किया जाता है—

त्रयो धर्मस्कन्धा यज्ञोऽध्ययनं दानमिति प्रथमस्तप एव द्वितीयो ब्रह्मचार्याचार्यकुलवासी तृतीयोऽत्यन्तमात्मानमाचार्यकुलेऽवसादयन्सर्व एते पुण्यलोका भवन्ति ब्रह्मसँस्थोऽमृतत्वमेति ॥ १ ॥

धर्मके तीन स्कन्ध (आधारस्तम्भ) हैं—यज्ञ, अध्ययन और दान—यह पहला स्कन्ध है । तप ही दूसरा स्कन्ध है । आचार्यकुलमें रहनेवाला

खण्ड २३ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१५


ब्रह्मचारी जो आचार्यकुलमें अपने शरीरको अत्यन्त क्षीण कर देता है, तीसरा स्कन्ध है। ये सभी पुण्यलोकके भागी होते हैं। ब्रह्ममें सम्यक् प्रकारसे स्थित [चतुर्थाश्रमी संन्यासी] अमृतत्वको प्राप्त होता है ॥ १ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
त्रयस्त्रिसंख्याका धर्मस्य स्कन्धा धर्मस्कन्धा धर्मप्रविभागा इत्यर्थः । के ते ? इत्याह—यज्ञोऽग्निहोत्रादिः । अध्ययनं सनियमस्य ऋगादेरभ्यासः । दानं बहिर्वेदि यथाशक्तिद्रव्यसंविभागो भिक्षमाणेभ्यः । इत्येष प्रथमो धर्मस्कन्धः । गृहस्थसमवेतत्वान्निर्वर्तकेन गृहस्थेन निर्दिश्यते । प्रथम एक इत्यर्थो द्वितीयतृतीयश्रवणान्नाद्यार्थः ।धर्मस्कन्ध—धर्मके स्कन्ध यानी धर्मके विभाग त्रयः अर्थात् तीन संख्यावाले हैं। वे कौन-से हैं ? इसपर कहते हैं, यज्ञ—अग्निहोत्रादि, अध्ययन—नियमपूर्वक ऋग्वेदादिका अभ्यास और दान—वेदीके बाहर भिक्षा माँगनेवालोंको यथाशक्ति धन देना—इस प्रकार यह पहला धर्मस्कन्ध है। यह धर्म गृहस्थधर्मसम्बन्धी होनेके कारण उसके साधक गृहस्थरूपसे उसका निर्देश किया जाता है। यहाँ 'प्रथम' शब्दका अर्थ एक है, श्रुतिमें 'द्वितीय, तृतीय' शब्द होनेसे इसका प्रयोग आद्य अर्थमें नहीं किया गया।
तप एव द्वितीयस्तप इति कृच्छ्रचान्द्रायणादि तद्वांस्तापसः परिव्राड् वा न ब्रह्मसंस्थ आश्रमधर्ममात्रसंस्थो ब्रह्मसंस्थस्य त्वमृतत्वश्रवणात् । द्वितीयो धर्मस्कन्धः ।तप ही दूसरा धर्मस्कन्ध है। 'तप' इस शब्दसे कृच्छ्रचान्द्रायणादि समझने चाहिये, उनसे युक्त तपस्वी या परिव्राजक, ब्रह्मनिष्ठ नहीं बल्कि जो केवल आश्रमधर्ममें ही स्थित है; क्योंकि श्रुतिने ब्रह्मनिष्ठके लिये तो अमृतत्वकी प्राप्ति बतलायी है। यह दूसरा धर्मस्कन्ध है ।

२१६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय २

२१६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय २

| ब्रह्मचार्याचार्यकुले वस्तुं शीलमस्येत्याचार्यकुलवासी । अत्यन्तं यावज्जीवमात्मानं नियमैराचार्यकुलेऽवसादयन्क्षपयन्देहं तृतीयो धर्मस्कन्धः । अत्यन्तमित्यादिविशेषणान्नैष्ठिक इति गम्यते । उपकुर्वाणस्य स्वाध्यायग्रहणार्थत्वान्न पुण्यलोकत्वं ब्रह्मचर्येण । | जिसका स्वभाव आचार्यकुलमें निवास करनेका है, वह आचार्यकुलवासी ब्रह्मचारी, जो कि अत्यन्त अर्थात् यावज्जीवन अपनेको नियमोंद्वारा आचार्यकुलमें ही अवसन्न करता रहता है, यानी अपने देहको क्षीण करता रहता है, तीसरा धर्मस्कन्ध है । 'अत्यन्तम्' इत्यादि विशेषणोंसे यह जाना जाता है कि यहाँ नैष्ठिक ब्रह्मचारी अभिप्रेत है, क्योंकि उपकुर्वाण ब्रह्मचारीका ब्रह्मचर्य स्वाध्यायके लिये होनेसे उसके द्वारा पुण्यलोककी प्राप्ति नहीं हो सकती । | | सर्व एते त्रयोऽप्याश्रमिणो यथोक्तैर्धर्मैः पुण्यलोका भवन्ति । पुण्यो लोको येषां त इमे पुण्यलोका आश्रमिणो भवन्ति । अवशिष्टस्त्वनुक्तः परिव्राड् ब्रह्मसंस्थो ब्रह्मणि सम्यक्स्थितः सोऽमृतत्वं पुण्यलोकविलक्षणममरणभावमात्यन्तिकमेति नापेक्षिकं देवाद्यमृतत्ववत्; पुण्यलोकात् पृथगमृतत्वस्य विभागकरणात् । | ये सभी अर्थात् तीनों आश्रमोंवाले उपर्युक्त धर्मोंके कारण पुण्यलोकोंके भागी होते हैं । जिन्हें पुण्यलोक प्राप्त हो ऐसे ये आश्रमी पुण्यलोक कहलाते हैं। इनसे बचा हुआ, जिसका यहाँ उल्लेख नहीं किया गया, वह चतुर्थ परिव्राजक ब्रह्मसंस्थ ब्रह्ममें सम्यक् प्रकारसे स्थित होकर अमृतत्वको—पुण्यलोकोंसे भिन्न आत्यन्तिक अमरणभावको प्राप्त हो जाता है, देवादिकोंके अमरत्वके समान उसका अमृतत्व आपेक्षिक नहीं होता; क्योंकि यहाँ पुण्यलोकसे अमृतत्वका पृथक् विभाग किया गया है । |

खण्ड २३ ]शाङ्करभाष्यार्थ२१७
शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
यदि च पुण्यलोकातिशयमात्रममृतत्वमभविष्यत्ततःपुण्यलोकत्वाद्विभक्तं नावक्ष्यत् । विभक्तोपदेशादात्यन्तिकममृतत्वमिति गम्यते ।यदि पुण्यलोकका अतिशयमात्र (अधिकता) ही अमृतत्व होता तो पुण्यलोकरूप ही होनेके कारण इसका उससे पृथक् वर्णन न किया जाता। अतः पृथक् उपदेश किया जानेके कारण यहाँ आत्यन्तिक अमृतत्व ही अभिप्रेत है—ऐसा जाना जाता है।
अत्र चाश्रमधर्मफलोपन्यासः प्रणवसेवास्तुत्यर्थं न तत्फलविध्यर्थम् । स्तुतये च प्रणवसेवा या आश्रमधर्मफलविधये चेति हि भिद्येत वाक्यम् । तस्मात्स्मृतिसिद्धाश्रमफलानुवादेन प्रणवसेवाफलममृतत्वं ब्रुवन्प्रणवसेवां स्तौति । यथा पूर्णवर्मणः सेवा भक्तपरिधानमात्रफला राजवर्मणस्तु सेवा राज्यतुल्यफलेति तद्वत् ।यहाँ जो आश्रमधर्मोंके फलोंका उल्लेख किया है, वह प्रणवोपासनाकी स्तुतिके लिये ही है, उनके फलोंका विधान करनेके लिये नहीं है। परंतु यदि यह कहा जाय कि 'यह वाक्य प्रणवसेवाकी स्तुतिके लिये और आश्रमधर्मके फलका विधान करनेके लिये भी है, तो वाक्यभेद हो जायगा। अतः यह मन्त्र स्मृतिप्रतिपादित आश्रमफलके अनुवादद्वारा 'प्रणवसेवाका फल अमृतत्व है' यह बतलाता हुआ प्रणवोपासनाकी ही स्तुति करता है। जिस प्रकार [कोई कहे कि] पूर्णवर्माकी सेवा भोजन-वस्त्रमात्र फल देनेवाली है और राजवर्माकी सेवा राज्यके समान फल देनेवाली है। उसी प्रकार यहाँ समझना चाहिये।
प्रणवश्च तत्सत्यं परं ब्रह्म तत्प्रतीकत्वात् । "एतद्ध्येवाक्षरंप्रणव ही वह सत्य परब्रह्म है, क्योंकि यह उसका प्रतीक है।

२१८ | छान्दोग्योपनिषद् — | [अध्याय २

२१८छान्दोग्योपनिषद् —[अध्याय २
संस्कृतहिन्दी अनुवाद
ब्रह्म, एतद्ध्येवाक्षरं परम्" (क० उ० १।२।१६) इत्याद्याम्नायात्काठके युक्तं तत्सेवातोऽमृतत्वम्।कठोपनिषद्में "यह अक्षर ही ब्रह्म है, यह अक्षर ही पर है" इत्यादि श्रुति होनेसे उसकी सेवाद्बारा अमृतत्वकी प्राप्ति होना उचित ही है।
परमतोपन्यासः —<br>अत्राहुः केचिच्चतुर्णामाश्रमिणामविशेषेण स्वकर्मानुष्ठानात्पुण्यलोकतेहोक्ता ज्ञानवर्जितानां सर्व एते पुण्यलोका भवन्तीति। नात्र परिव्राडवशेषितः। परिव्राजकस्यापि ज्ञानं यमा नियमाश्च तप एवेति 'तप एव द्वितीयः' इत्यत्र तपःशब्देन परिव्राट्तापसौ गृहीतौ। अतस्तेषामेव चतुर्णां यो ब्रह्मसंस्थः प्रणवसेवकः सोऽमृतत्वमेतीति; चतुर्णामधिकृतत्वाविशेषाद् ब्रह्मसंस्थत्वेऽप्रतिषेधाच्च। स्वकर्मच्छिद्रे च ब्रह्मसंस्थतायां सामर्थ्योपपत्तेः।यहाँ कुछ लोग ऐसा कहते हैं कि 'इस मन्त्रमें ये सभी पुण्यलोकके भागी होते हैं' इस वाक्यद्वारा ज्ञानरहित चारों ही आश्रमियोंको समानरूपसे अपने-अपने धर्मोंका पालन करनेसे पुण्यलोककी प्राप्ति बतलायी गयी है। इनमें परिव्राजकको भी छोड़ा नहीं है। परिव्राजकके भी ज्ञान, यम और नियम—ये तप ही हैं, अतः 'तप ही दूसरा धर्मस्कन्ध है' इस वाक्यमें 'तप' शब्दसे परिव्राजक और वानप्रस्थ दोनोंका ग्रहण किया गया है। अतः उन चारोंहीमें जो ब्रह्मनिष्ठ प्रणवोपासक होता है, वही अमृतत्वको प्राप्त हो जाता है, क्योंकि इन चारोंका ही अधिकार समान है और ब्रह्मनिष्ठामें भी किसीका प्रतिषेध नहीं किया गया, क्योंकि अपने-अपने कर्मोंके अनुष्ठानसे अवकाश मिलनेपर सभीको ब्रह्ममें स्थित होनेका सामर्थ्य होना सम्भव है।

खण्ड २३] शाङ्करभाष्यार्थ २१९


शाङ्करभाष्यशाङ्करभाष्यार्थ
न च यववराहादिशब्दवद्ब्रह्मसंस्थशब्दः परिव्राजके रूढः, ब्रह्मणि संस्थिति निमित्तमुपादाय प्रवृत्तत्वात् । न हि रूढिशब्दा निमित्तमुपाददते । सर्वेषां च ब्रह्मणि स्थितिरुपपद्यते । यत्र यत्र निमित्तमस्ति ब्रह्मणि संस्थितिस्तस्य तस्य निमित्तवतो वाचकं सन्तं ब्रह्मसंस्थशब्दं परिव्राडेकविषये संकोचे कारणाभावान्निरोद्धुमयुक्तम् । न च पारिव्राज्याश्रमधर्ममात्रेणामृतत्वम्, ज्ञानानर्थक्यप्रसङ्गात् ।इसके सिवा 'यव' और 'वराह' आदि शब्दोंके समान 'ब्रह्मसंस्थ' शब्द परिव्राजकमें ही रूढ भी नहीं है, क्योंकि यह तो ब्रह्ममें स्थितिरूप निमित्तको लेकर ही प्रवृत्त हुआ है। रूढ शब्द किसी निमित्तको स्वीकार नहीं करते। और ब्रह्ममें सभीकी स्थिति होनी सम्भव है। अतः जहाँ-जहाँ भी ब्रह्ममें स्थितिरूप निमित्त है उसी-उसी निमित्तवान्‌का वाचक होनेसे ब्रह्मसंस्थ शब्द केवल परिव्राट्का ही वाचक है—ऐसे संकोचका कोई कारण न होनेसे उसे उसी अर्थमें निरुद्ध करना उचित नहीं है। इसके सिवा पारिव्राज्य (संन्यास) आश्रमधर्ममात्रसे भी अमृतत्वका प्राप्त होना सम्भव नहीं है, क्योंकि इससे ज्ञानकी निरर्थकताका प्रसङ्ग उपस्थित हो जाता है।
पारिव्राज्यधर्मयुक्तमेव ज्ञानममृतत्वसाधनमिति चेन्न; आश्रमधर्मत्वाविशेषात् । धर्मो वा ज्ञानविशिष्टोऽमृतत्वसाधनमित्येतदपि सर्वाश्रमधर्मा-यदि कहो कि पारिव्राज्यधर्मसहित ही ज्ञान अमृतत्वका साधन है, तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि आश्रमधर्मतत्त्वमें अन्य आश्रमोंके धर्मोंसे उसमें कोई विशेषता नहीं है। अथवा यदि यों कहो कि ज्ञानविशिष्ट धर्म ही अमृतत्वका साधन है तो यह नियम भी समस्त

२२० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २

२२०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय २
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
णामविशिष्टम्। न च वचनमस्ति परिव्राजकस्यैव ब्रह्मसंस्थस्य मोक्षो नान्येषामिति। ज्ञानान्मोक्ष इति च सर्वोपनिषदां सिद्धान्तः। तस्माद्य एव ब्रह्मसंस्थः स्वाश्रमविहितकर्मवतां सोऽमृतत्वमेतीति।आश्रमधर्मोंके लिये एक-सा है। ऐसा कोई शास्त्रवाक्य भी नहीं है कि एकमात्र ब्रह्मनिष्ठ संन्यासीको ही मोक्ष प्राप्त हो सकता है, औरोंको नहीं। ज्ञानसे मोक्ष होता है—यही सम्पूर्ण उपनिषदोंका सिद्धान्त है। अतः अपने-अपने आश्रमधर्मका पालन करनेवालोंमें जो कोई भी ब्रह्मनिष्ठ होगा वही अमृतत्वको प्राप्त होगा।
न; कर्मनिमित्तविद्याप्रत्यययोर्विरोधात्। [पूर्वोपन्यस्त-मतनिराकरणम्] कर्त्रादिकारकक्रियाफलभेदप्रत्ययवत्त्वं हि निमित्तमुपादायेदं कुर्विदं मा कार्षीरिति कर्मविधयः प्रवृत्ताः। तच्च निमित्तं न शास्त्रकृतम्, सर्वप्राणिषु दर्शनात्। "सद्... एकमेवाद्वितीयम्" (छा० उ० ६।२।१) "आत्मैवेदं सर्वम्" (छा० उ० ७।२५।२) "ब्रह्मैवेदं सर्वम्" (नृसिंहो० उ० ७) इति शास्त्रजन्यप्रत्ययो विद्यारूपः स्वाभाविकं क्रियाकारकफलभेदप्रत्ययं कर्मविधिनिमित्त-सिद्धान्ती—ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि कर्मके निमित्तभूत प्रत्यय और ज्ञानोत्पादक प्रत्ययोंमें परस्पर विरोध है। कर्ता आदि कारक, क्रिया और फलके भेदसे युक्त होनारूप निमित्तको लेकर ही 'यह करो' और 'यह मत करो' इस प्रकारकी कर्मविधियाँ प्रवृत्त होती हैं। और वह निमित्त शास्त्रका किया हुआ नहीं है, क्योंकि वह सभी प्राणियोंमें देखा जाता है। "एक ही अद्वितीय सत् है" "यह सब आत्मा ही है" "यह सब ब्रह्म ही है" यह जो शास्त्रजनित विद्यारूप प्रत्यय है, वह कर्मनिमित्तक स्वाभाविक क्रिया, कारक और फलभेदरूप प्रत्ययको नष्ट किये बिना

खण्ड २३ ] शाङ्करभाष्यार्थ २२१


मूल शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
मनुपमृद्य न जायते भेदाभेदप्रत्ययोविरोधात् । न हि तैमिरिकद्विचन्द्रादिभेदप्रत्ययमनुपमृद्य तिमिरापगमे चन्द्राद्येकत्वप्रत्यय उपजायते, विद्याविद्याप्रत्यययोविरोधात् ।<br><br>तत्रैवं सति यं भेदप्रत्ययमुपादाय कर्मविधयः<br><br>(परिव्राज एव ब्रह्मसंस्थत्वम्)<br><br>प्रवृत्ताः स यस्योपमर्द्दितः “सद्... एकमेवाद्वितीयम्” (छा० उ० ६।२।१) “तत्सत्यम्” (छा० उ० ६।८।७) “विकारभेदोऽनृतम्” इत्येतद्वाक्यप्रमाणजनितेनैकत्वप्रत्ययेन स सर्वकर्मभ्यो निवृत्तो निमित्तनिवृत्तेः। स च निवृत्तकर्मा ब्रह्मसंस्थ उच्यते स च परिव्राडेवान्यस्यासंभवात् ।<br><br>अन्यो ह्यनिवृत्तभेदप्रत्ययः सोऽन्यत्पश्यञ्शृण्वन्मन्वानो विजानन्निदं कृत्वेदं प्राप्नुयामिति हि मन्यते । तस्यैवं कुर्वतो नउत्पन्न नहीं होता, क्योंकि भेद और अभेद प्रत्ययोंमें परस्पर विरोध है। तिमिररोगके नष्ट होनेपर तिमिररोगजनित द्विचन्द्रदर्शनादि भेदप्रत्ययका नाश हुए बिना चन्द्रादिके एकत्वकी प्रतीति भी नहीं होती, क्योंकि ज्ञान और अज्ञानकी प्रतीतियोंमें परस्पर विरोध है।<br><br>ऐसी अवस्थामें, जिस भेदप्रतीतिको स्वीकार कर कर्मविधियाँ प्रवृत्त हुई हैं, वह भेदप्रतीति जिसकी “एक ही अद्वितीय सत् है” “वही सत्य है” “विकाररूप भेद मिथ्या है” इत्यादि वाक्यप्रमाणजनित एकत्वप्रतीतिके द्वारा नष्ट हो गयी है, वही कर्मविधिके निमित्तकी निवृत्ति हो जानेसे सम्पूर्ण कर्मोंसे निवृत्त हो जाता है, वह कर्मोंसे निवृत्त हुआ पुरुष ही ब्रह्मसंस्थ कहा जाता है और वह परिव्राजक ही हो सकता है, क्योंकि दूसरेके लिये ऐसा होना असम्भव है।<br><br>उससे भिन्न जिसकी भेदप्रतीति निवृत्त नहीं हुई है, वह अन्य पदार्थोंको देखता, सुनता, मानता और जानता हुआ 'ऐसा करके इसे प्राप्त करूँगा' यह मानता है। ऐसा करनेवाले उस पुरुषको ब्रह्मनिष्ठता

२२२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २

२२२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय २
संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
ब्रह्मसंस्थता। वाचारम्भणमात्रविकारानृताभिसंधिप्रत्ययवत्त्वात्। न चासत्यमित्युपमर्दिते भेदप्रत्यये सत्यमिदमनेन कर्तव्यं मयेति प्रमाणप्रमेयबुद्धिरुपपद्यते। आकाश इव तलमलबुद्धिर्विवेकिनः।नहीं हो सकती, क्योंकि वह वाचारम्भणमात्र विकारमें मिथ्याभिनिवेशरूप प्रतीति करनेवाला होता है। यह असत्य है—इस प्रकार भेदप्रतीतिके बाधित हो जानेपर उसमें 'यह सत्य है, इससे मुझे यह कर्तव्य है' ऐसी प्रमाण-प्रमेयरूप बुद्धि होनी सम्भव नहीं है, जिस प्रकार कि विवेकी पुरुषको आकाशमें तलमलबुद्धि होनी।
उपमर्दितेऽपि भेदप्रत्यये कर्मभ्यो न निवर्तते चेत्प्रागिव भेदप्रत्ययोपमर्दनादेकत्वप्रत्ययविधायकं वाक्यमप्रमाणीकृतं स्यात्। अभक्ष्यभक्षणादिप्रतिषेधवाक्यानां प्रामाण्यवद्युक्तमेकत्ववाक्यस्यापि प्रामाण्यम्; सर्वोपनिषदां तत्परत्वात्।यदि भेदप्रतीतिके नष्ट हो जानेपर भी बोधवान् पुरुष भेदज्ञानकी निवृत्ति होनेसे पूर्वके समान कर्मोंसे निवृत्त नहीं होता तो वह मानो एकत्वविधायक वाक्योंको अप्रामाणिक सिद्ध करता है। अभक्ष्यभक्षणका प्रतिषेध करनेवाले वाक्योंकी प्रामाणिकताके समान एकत्वप्रतिपादक वाक्यकी प्रामाणिकता भी उचित ही है; क्योंकि सम्पूर्ण उपनिषदें उसीका प्रतिपादन करनेमें तत्पर हैं।
(कर्मविधीनामप्रामाण्यनिरसनम्)<br>कर्मविधीनामप्रामाण्यप्रसङ्ग इति चेत् ?**पूर्व०—**इस प्रकार तो कर्मविधियोंकी अप्रामाणिकताका प्रसंग उपस्थित हो जायगा।
न; अनुपमर्दितभेदप्रत्ययवत्पुरुषविषये प्रामाण्योपपत्तेः, स्वप्नादिप्रत्यय इव प्राक्प्रबोधात्।**सिद्धान्ती—**नहीं, जिस पुरुषका भेदज्ञान निवृत्त नहीं हुआ है उसके सम्बन्धमें उनकी प्रामाणिकता हो सकती है, जिस प्रकार कि जागनेसे पूर्व स्वप्नादिका ज्ञान प्रामाणिक माना जाता है!
खण्ड २३ ]शाङ्करभाष्यार्थ२२३

संस्कृत मूलहिन्दी भाष्यार्थ
विवेकिनामकरणात्कर्मविधि- <br> प्रामाण्योच्छेद इति चेत् ?पूर्व०— किंतु विवेकियोंके न करनेसे तो कर्मविधिकी प्रमाणताका उच्छेद मानना ही होगा।
न, काम्यविध्यनुच्छेददर्शनात् <br> न हि कामात्मता न प्रशस्तेत्येवं <br> विज्ञानवद्भिः काम्यानि कर्माणि <br> नानुष्ठीयन्त इति काम्यकर्मविधय <br> उच्छिद्यन्तेऽनुष्ठीयन्त एव कामि- <br> भिरिति । तथा ब्रह्मसंस्थैर्ब्रह्मवि- <br> द्भिर्नानुष्ठीयन्ते कर्माणीति न <br> तद्विधय उच्छिद्यन्तेऽब्रह्मविद्भिर- <br> नुष्ठीयन्त एवेति ।सिद्धान्ती— नहीं, क्योंकि काम्य-विधिको उच्छेद होता देखा नहीं गया। 'सकामता अच्छी नहीं है' ऐसा जिन्हें ज्ञान हो गया है उन पुरुषोंद्वारा काम्यकर्म नहीं किये जाते, अतः काम्यकर्मोंकी विधियोंका उच्छेद हो गया हो—ऐसी बात देखनेमें नहीं आती; बल्कि [ उस समय भी ] सकाम पुरुषोंद्वारा उनका अनुष्ठान किया ही जाता है। इसी प्रकार यदि ब्रह्मनिष्ठ ब्रह्मवेत्ताओंद्वारा कर्मोंका अनुष्ठान नहीं किया जाता तो इससे उनकी विधिका ही उच्छेद नहीं हो जाता। जो ब्रह्मवेत्ता नहीं हैं उनके द्वारा उनका अनुष्ठान किया ही जाता है।
परिव्राजकानां भिक्षाचरणा- <br> दिवदुत्पन्नैकत्वप्रत्ययानामपि <br> गृहस्थादीनामग्निहोत्रादिकर्मा- <br> निवृत्तिरिति चेत् ?पूर्व०— जिस प्रकार संन्यासीलोग भिक्षाटन करते हैं उसी प्रकार जिन्हें एकत्वज्ञान उत्पन्न हो गया है उन गृहस्थोंके भी अग्निहोत्रादि कर्मोंकी निवृत्ति नहीं होनी चाहिये, यदि ऐसी शङ्का हो तो ?
न; प्रामाण्यचिन्तायां पुरुष- <br> प्रवृत्तेरदृष्टान्तत्वात् । न हिसिद्धान्ती— नहीं, क्योंकि प्रमाणता-का विचार करनेमें पुरुषकी प्रवृत्ति दृष्टान्तरूप नहीं हो सकती।

२१४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय २

२१४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय २


संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
नाभिचरेदिति प्रतिषिद्धमप्यभिचरणं कश्चित्कुर्वन्दृष्ट इति शत्रौ द्वेषरहितेनापि विवेकिनाभिचरणं क्रियते। न च कर्मविधिप्रवृत्तिनिमित्ते भेदप्रत्यये बाधितेऽग्निहोत्रादौ प्रवर्तकं निमित्तमस्ति। परिव्राजकस्येव भिक्षाचरणादौ बुभुक्षादि प्रवर्तकम्।'अभिचार न करे' इस प्रकार प्रतिषिद्ध होनेपर भी किसीको अभिचार करते देखा है--इतनेहीसे जिसका शत्रुके प्रति द्वेषभाव भी नहीं है वह विवेकी पुरुष—भी अभिचार करने लगे—यह सम्भव नहीं है। इसी प्रकार कर्मविधिकी प्रवृत्तिके निमित्तभूत भेदप्रत्ययका बोध हो जानेपर बोधवान् पुरुषको अग्निहोत्रादि कर्ममें प्रवृत्त करनेवाला कोई निमित्त नहीं है, जिस प्रकार कि संन्यासीको भिक्षाटनादिमें प्रवृत्त करनेवाला क्षुधादिरूप निमित्त है।
इहाप्यकरणे प्रत्यवायभयं प्रवर्तकमिति चेत् ?पूर्व०--यहाँ भी नित्यकर्म न करनेपर प्रत्यवाय होनेका भय ही प्रवृत्त करनेवाला है-यदि ऐसा मानें तो?
न, भेदप्रत्ययवतोऽधिकृतत्वात्। भेदप्रत्ययवानुपमर्दितभेदबुद्धिर्विद्यया यः स कर्मण्यधिकृत इत्यवोचाम। यो ह्यधिकृतः कर्मणि तस्य तदकरणे प्रत्यवायो न निवृत्ताधिकारस्य;सिद्धान्ती--नहीं, क्योंकि कर्मानुष्ठानका अधिकारी भेदज्ञानी ही है। जिसकी भेदबुद्धि ज्ञानसे नष्ट नहीं हुई है वह भेदज्ञानी ही कर्मका अधिकारी है—ऐसा हम पहले कह चुके हैं। इस प्रकार जो कर्मका अधिकारी है उसे ही उसके न करनेपर प्रत्यवाय हो सकता है। जो उसके अधिकारसे बाहर है उसे प्रत्यवाय नहीं हो सकता, जिस

खण्ड २३ ] शाङ्करभाष्यार्थ २२५


गृहस्थस्यैव ब्रह्मचारिणो विशेषधर्माननुष्ठाने ।प्रकार कि ब्रह्मचारीके विशेष धर्मका अनुष्ठान न करनेपर गृहस्थको प्रत्यवाय नहीं हो सकता।
एवं तर्हि सर्वः स्वाश्रमस्थ उत्पन्नैकत्वप्रत्ययः परिव्राडिति चेत् ?पूर्व०— इस प्रकार तब तो जिसे एकत्वका ज्ञान हो गया है वह कोई भी पुरुष अपने आश्रममें रहता हुआ ही परिव्राजक हो सकता है ?
न; स्वस्वामित्वभेदबुद्धयनिवृत्तेः । कर्मार्थत्वाच्चेतराश्रमाणां; "अथ कर्म कुर्वीय" (बृ० उ० १।४।१७) इति श्रुतेः । तस्मात्स्वस्वामित्वाभावाद्भिक्षुरेव एव परिव्राट्; न गृहस्थादिः ।सिद्धान्ती— नहीं, क्योंकि उनकी स्वस्वामित्वरूप^१ भेदबुद्धि निवृत्त नहीं होती, क्योंकि अन्य आश्रम कर्मानुष्ठानके ही लिये हैं; जैसा कि "[स्त्री-पुत्रादिकी प्राप्तिके] अनन्तर मैं कर्म करूँगा" इस श्रुतिसे सिद्ध होता है। अतः स्वस्वामिभावका अभाव हो जानेसे एकमात्र भिक्षु ही परिव्राट् हो सकता है, गृहस्थादि अन्य आश्रमावलम्बी नहीं हो सकता।
एकत्वप्रत्ययविधिजनितेन प्रत्ययेन विधिनिमित्तभेदप्रत्ययस्योपमर्दितत्वाद्यमनियमाद्यनुपपत्तिः परिव्राजकस्येति चेत् ?पूर्व०— एकत्वकी प्रतीति करानेवाले विधिवाक्यसे उत्पन्न हुए ज्ञानद्वारा कर्मविधिनिमित्तक भेदज्ञानके निवृत्त हो जानेसे तो संन्यासीको यमनियमादिका पालन करना भी सम्भव नहीं है [अतः उसका स्वेच्छाचारी हो जाना बहुत सम्भव है]।

^१ यह मेरा है और मैं इसका स्वामी हूँ ऐसी अधिकृत-अधिकारोरूप।

२२६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २

२२६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय २

| न; बुभुक्षादिनैकत्वप्रत्ययात् प्रच्यावितस्योपपत्तेर्निवृत्त्यर्थत्वात्। <br><br> न च प्रतिषिद्धसेवाप्राप्तिः; एकत्वप्रत्ययोत्पत्तेः प्रागेव प्रतिषिद्धत्वात्। न हि रात्रौ कूपे कण्टके वा पतित उदितेऽपि सवितरि पतति तस्मिन्नेव। तस्मात्सिद्धं निवृत्तकर्मा भिक्षुक एव ब्रह्मसंस्थ इति। <br><br> (तपःशब्देन परिव्राड्ग्रहणस्य प्रत्याख्यानम्) <br> यत्पुनरुक्तं सर्वेषां ज्ञानवर्जितानां पुण्यलोकतेति, सत्यमेतत्। यच्चोक्तं तपःशब्देन परिव्राडप्युक्त इति, एतदसत्; कस्मात् ? परिव्राजकस्यैव ब्रह्मसंस्थतासंभवात्। स एव ह्यवशेषित इत्यवोचाम। एकत्वविज्ञानवतोऽग्निहोत्रादिवत्तपोन्निवृत्तेश्च। भेदबुद्धि मत एव हि तपः- | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि क्षुधा आदिद्वारा एकत्वप्रत्ययसे च्युत कर दिये जानेपर उसके द्वारा अनुचित कर्मोंसे निवृत्ति-के लिये उनका पालन किया जाना सम्भव है। इसके सिवा उसके द्वारा प्रतिषिद्धि कर्मोंका सेवन किया जाना भी सम्भव नहीं है, क्योंकि उनका प्रतिषेध तो वह एकत्वज्ञानकी उत्पत्तिसे पूर्व ही कर चुकता है। रात्रिके समय कुएँ या काँटोंमें गिर जानेवाला पुरुष सूर्योदय होनेपर भी उन्हींमें नहीं गिर जाता। अतः सिद्ध होता है कि कर्मोंसे निवृत्त हुआ भिक्षुक ही ब्रह्मनिष्ठ हो सकता है। <br><br> तथा यह जो कहा कि सम्पूर्ण ज्ञान-रहित पुरुषोंको पुण्यलोककी प्राप्ति होती है सो ठीक ही है; परंतु ऐसा जो कहा कि 'तपः' शब्दसे संन्यासी-का भी कथन है सो ठीक नहीं। ऐसा क्यों है ? क्योंकि परिव्राजककी ही ब्रह्मनिष्ठता होनी सम्भव है। और वही [पुण्यलोकको प्राप्त होनेवालों-मेंसे] बच रहा है—ऐसा हम पहले कह चुके हैं, क्योंकि एकत्वविज्ञानवान्‌का तो अग्निहोत्रादिके समान तप भी निवृत्त हो ही जाता है। भेदबुद्धिमान्‌में ही तपकी |

खण्ड २३ ] शाङ्करभाष्यार्थ २२७


मूल संस्कृतभाष्यार्थ
कर्तव्यता स्यात् । एतेन कर्मच्छिद्रे ब्रह्मसंस्थतासामर्थ्यम्, अप्रतिषेधश्च प्रत्युक्तः । तथा ज्ञानवानेव निवृत्तकर्मा परिव्राडिति ज्ञानवैयर्थ्यं प्रत्युक्तम् ।कर्तव्यता भी रह सकती' है । इससे अन्य आश्रमवालोंको भी कर्मोंसे अवकाश मिलनेपर ब्रह्मस्थितिके सामर्थ्यका तथा उनके लिये ब्रह्मनिष्ठाके अप्रतिषेधका भी निषेध कर दिया गया । तथा ज्ञानी ही निवृत्तकर्मा परिव्राट् हो सकता है—इससे ज्ञानकी निरर्थकताका भी खण्डन कर दिया गया !
(परिव्राजके ब्रह्मसंस्थशब्दस्यारूढत्वनिरासः)<br>यत्पुनरुक्तं यववराहादिशब्दवत्परिव्राजके न रूढो ब्रह्मसंस्थशब्द इति तत्परिहृतम् । तस्यैव ब्रह्मसंस्थतासंभवान्नान्यस्येति ।तथा ऐसा जो कहा कि 'यव' और 'वराह' आदि शब्दोंके समान 'ब्रह्मसंस्थ' शब्द परिव्राजकमें रूढ नहीं है उसका भी परिहार कर दिया गया, क्योंकि उसीकी ब्रह्मनिष्ठा होनी सम्भव है, और किसीकी नहीं ।
('रूढिनिमित्तं नोपादत्ते' इति न्यायस्यानित्यत्वम्)<br>यत्पुनरुक्तं रूढशब्दा निमित्तं नोपाददत इति, तन्न, गृहस्थतक्षपरिव्राजकादिशब्ददर्शनात् । गृहस्थितिपरिव्राज्यतक्षणादिनिमित्तोपादाना अपि गृहस्थपरिव्राजकावाश्रमविशेषे विशिष्टजातिमति च तक्षेति रूढा दृश्यन्ते शब्दाः । न यत्र यत्र तानि निमित्तानि तत्र तत्रइसके सिवा वादीने जो कहा कि रूढ शब्द निमित्तको स्वीकार नहीं करता, सो ऐसी बात नहीं है, क्योंकि गृहस्थ, तक्षा और परिव्राजकादि शब्द देखे जाते हैं । गृहमें रहना, पारिव्राज्य सब कुछ त्याग कर चला जाना और तक्षण काष्ठ छेदन आदि निमित्तोंको स्वीकार करते हुए भी 'गृहस्थ' और 'परिव्राजक' शब्द आश्रमविशेषोंमें और 'तक्षा' शब्द जातिविशेषमें रूढ देखे जाते हैं । ये गृहस्थादि शब्द जहाँ-जहाँ वे निमित्त हैं वहीं-वहीं प्रवृत्त

छा० उ० ८—