छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
३४० | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय ३
| ३४० | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय ३ |
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| मित्येते पादा इत्यध्यात्मम् । अथाधिदैवतमाकाशस्य ब्रह्मणोऽग्निर्वायुरादित्यो दिश इत्येते । एवमुभयमेव चतुष्पाद्ब्रह्मादिष्टं भवत्यध्यात्मं चैवाधिदैवतं च ॥ २ ॥ | दृष्टि है । अब अधिदैवत बतलाते हैं—आकाशसंज्ञक ब्रह्मके अग्नि, वायु, आदित्य और दिशाएँ ये पाद हैं । इस प्रकार अध्यात्म और अधिदैवत दोनों प्रकारके चतुष्पाद् ब्रह्मका आदेश किया गया ॥ २ ॥ |
| तत्र— | उनमें— |
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वागेव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः । सोऽग्निना ज्योतिषा भाति च तपति च। भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद ॥ ३ ॥
वाक् ही ब्रह्मका चौथा पाद है; वह अग्निरूप ज्योतिसे दीप्त होता है और तपता है। जो ऐसा जानता है वह कीर्ति, यश और ब्रह्मतेजके कारण देदीप्यमान होता और तपता है ॥ ३ ॥
| वागेव मनसो ब्रह्मणश्चतुर्थः पाद इतरपादत्रयापेक्षया । वाचा हि पादेनेव गवादि वक्तव्यविषयं प्रति तिष्ठति । अतो मनसः पाद इव वाक् । तथा प्राणो घ्राणः पादः । तेनापि गन्धविषयं प्रति च क्रामति । तथा चक्षुः पादः श्रोत्रं पाद | वाक् ही मनरूप ब्रह्मका, अन्य तीन पादोंकी अपेक्षा चौथा पाद है । जिस प्रकार गौ आदि जीव पादद्वारा इष्ट स्थानपर जाकर उपस्थित होते हैं उसी प्रकार वाणीसे ही मन वक्तव्य विषयपर ठहरता है। अतः वाक् मनके पादके समान है। इसी प्रकार प्राण—घ्राण भी उसका पाद है । उसके द्वारा भी वह गन्धरूप विषयके प्रति जाता है । ऐसे ही चक्षु पाद है और श्रोत्र भी पाद है । इस प्रकार यह |
खण्ड १८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३४१
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| इत्येवमध्यात्मं चतुष्पात्त्वं मनसो ब्रह्मणः । | मनरूप ब्रह्मका अध्यात्म चतुष्पात्त्व है। |
| अथाधिदैवतमग्निवाय्वादित्यदिश आकाशस्य ब्रह्मण उदर इव गोः पादा वि लग्ना उपलभ्यन्ते । तेन तस्याकाशस्याग्न्यादयः पादा उच्यन्ते । एवमुभयमध्यात्मं चैवाधिदैवतं चतुष्पाद्दिष्टं भवति । तत्र वागेव मनसो ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः । सोऽग्निनाधिदैवतेन ज्योतिषा भाति च दीप्यते तपति च संतापं चौष्ण्यं करोति । | तथा अधिदैवतदृष्टि इस प्रकार है—जिस तरह गौके उदरसे पैर जुड़े रहते हैं उसी प्रकार आकाशरूप ब्रह्मके उदरमें अग्नि, वायु, आदित्य और दिशाएँ—ये दिखायी देते हैं । इसलिये ये अग्नि आदि उस आकाशरूप ब्रह्मके पाद कहे जाते हैं । इस प्रकार अध्यात्म और अधिदैवत दोनों प्रकारके चतुष्पाद् ब्रह्मका उपदेश किया जाता है । उनमें वाक् ही उस मनरूप ब्रह्मका चौथा पाद है। वह अग्निरूप अधिदैवत ज्योतिसे भासित—दीप्त होता और तपता अर्थात् संताप यानी उष्णता करता है । |
| अथवा तैलघृताद्याग्नेयाशनेनेद्धा वाग्भाति च तपति च वदनायोत्साहवती स्यादित्यर्थः। | अथवा तैल और घृत आदि आग्नेय (तेजोमय) पदार्थोंके भक्षणसे दीप्त हुई वाक् प्रकाशित होती और तपती है; अर्थात् बोलनेके लिये उत्साहयुक्त होती है । इस प्रकारकी उपासना करनेवालेको |
| विद्वत्फलम्—भाति च तपति च | प्राप्त होनेवाला फल—जो पूर्वोक्त |
३४२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ३
३४२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ३
| कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य<br><br>एवं यथोक्तं वेद ॥ ३ ॥ | अर्थको जानता है वह कीर्ति¹, यश² और ब्रह्मतेजसे प्रकाशित होता और तपता है ॥ ३ ॥ |
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प्राण एव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः । स वायुना ज्योतिषा भाति च तपति च । भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद ॥ ४ ॥
प्राण ही मनोमय ब्रह्मका चौथा पाद है । वह वायुरूप ज्योतिसे प्रकाशित होता और तपता है । जो इस प्रकार जानता है वह कीर्ति, यश और ब्रह्मतेजसे प्रकाशित होता और तपता है ॥ ४ ॥
चक्षुरेव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः । स आदित्येन ज्योतिषा भाति च तपति च । भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद ॥ ५ ॥
चक्षु ही मनःसंज्ञक ब्रह्मका चौथा पाद है । वह आदित्यरूप ज्योतिसे प्रकाशित होता और तपता है । जो इस प्रकार जानता है वह कीर्ति, यश और ब्रह्मतेजसे प्रकाशित होता और तपता है ॥ ५ ॥
श्रोत्रमेव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः । स दिग्भिर्ज्योतिषा भाति च तपति च । भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद य एवं वेद ॥ ६ ॥
श्रोत्र ही मनोरूप ब्रह्मका चौथा पाद है । वह दिशारूप ज्योतिसे प्रकाशित होता और तपता है । जो इस प्रकार जानता है वह कीर्ति, यश और ब्रह्मतेजसे प्रकाशित होता और तपता है ॥ ६ ॥
१. प्रत्यक्ष प्रशंसा । २. परोक्ष प्रशंसा ।
खण्ड १८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३४३
| तथा प्राण एव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः । स वायुना गन्धाय भाति च तपति च । तथा चक्षुरादित्येन रूपग्रहणाय श्रोत्रं दिग्भिः शब्दग्रहणाय । विद्याफलं समानम् । सर्वत्र ब्रह्मसंपत्तिरदृष्टं फलं य एवं वेद । द्विरुक्तिर्दर्शनसमाप्त्यर्था॥४-६॥ | इसी प्रकार प्राण ही ब्रह्मका चौथा पाद है । वह वायुद्वारा गन्धग्रहणके लिये प्रकाशित होता और तपता है [ अर्थात् उत्साहित होता है ] । इसी तरह चक्षु रूपग्रहणके लिये आदित्यद्वारा और श्रोत्र शब्दग्रहणके लिये दिशाओंके द्वारा उत्साहित होता है । इस प्रकारकी उपासनाका फल सर्वत्र समान है । जो ऐसा जानता है उसे सर्वत्र ब्रह्मप्राप्तिरूप 'अदृष्ट फल मिलता है । 'य एवं वेद, य एवं वेद' यह द्विरुक्ति विद्याकी समाप्तिके लिये है ॥ ४–६ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये अष्टादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १८ ॥
एकोनविंश खण्ड
आदित्य और अण्डदृष्टिसे अध्यात्म एवं आधिदैविक उपासना
| आदित्यो ब्रह्मणः पाद उक्त इति तस्मिन्सकलब्रह्मदृष्ट्यर्थमिदमारभ्यते— | आदित्यको ब्रह्मका पाद बतलाया गया है; अतः उसमें समस्त ब्रह्मकी दृष्टि करनेके लिये इस खण्डका आरम्भ किया जाता है— |
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आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशस्तस्योपव्याख्यानमसदेवेदमग्र आसीत्। तत्सदासीत्तत्समभवत्तदाण्डं निरवर्तत तत्संवत्सरस्य मात्रामशयत तन्निरभिद्यत ते आण्डकपाले रजतं च सुवर्णं चाभवताम् ॥ १ ॥
आदित्य ब्रह्म है—ऐसा उपदेश है; उसीकी व्याख्या की जाती है। पहले यह असत् ही था। वह सत् (कार्याभिमुख) हुआ। वह अङ्कुरित हुआ। वह एक अण्डेमें परिणत हो गया। वह एक वर्षपर्यन्त उसी प्रकार पड़ा रहा। फिर वह फूटा; वे दोनों अण्डेके खण्ड रजत और सुवर्णरूप हो गये ॥ १ ॥
(पार्श्व-टिप्पणी: असत्कार्यवाद-समीक्षा)
| आदित्यो ब्रह्मेत्यादेश उपदेशस्तस्योपन्याख्यानं क्रियते स्तुत्यर्थम्। असद्व्याकृतनामरूपमिदं जगदशेषमग्रे प्रागवस्थाया- | 'आदित्य ब्रह्म है' यह आदेश-उपदेश है। उस आदित्यका स्तुतिके लिये उपाख्यान किया जाता है। पहले अर्थात् अपनी उत्पत्तिसे पूर्वकी अवस्थामें यह सम्पूर्ण जगत् असत्—जिसके नाम-रूपोंकी अभिव्यक्ति नहीं हुई है ऐसा था; सर्वथा असत [शून्य] |
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खण्ड १९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३४५
| संस्कृत भाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| म्युत्पत्तेरासीन्न त्वसदेव; 'कथमसतः सज्जायेत' इत्यसत्कार्यत्वस्य प्रतिषेधात् । | ही नहीं था; क्योंकि 'असत्से सत्की उत्पत्ति कैसे हो सकती है' इस प्रकार [ आगे छठे अध्यायमें ] श्रुतिने असत्कार्यत्वका प्रतिषेध किया है । |
| नन्विहासदेवेति विधानाद्विकल्पः स्यात् । | पूर्व०—किंतु यहाँ 'असदेव आसीत्' ऐसा विधान होनेके कारण विकल्प* हो सकता है । |
| न; क्रियास्वेव वस्तुनि विकल्पानुपपत्तेः । | सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि क्रियाओंके समान वस्तुमें विकल्प होना सम्भव नहीं है । |
| कथं तर्हीदमसदेवेति ? | पूर्व०—तो फिर 'इदम् असत् एव' यह वाक्य क्यों कहा गया है ? |
| नन्ववोचामाव्याकृतनामरूपत्वादसदिवासदिति । | सिद्धान्ती—हम कह चुके हैं न, कि नाम-रूपकी अभिव्यक्तिसे रहित होनेके कारण मानो असत्की तरह 'असत्' था । |
| नन्वेवशब्दोऽवधारणार्थः । | पूर्व०—किंतु 'एव' शब्द तो निश्चयार्थक है ! |
| सत्यमेवम् , न तु सत्त्वाभावमवधारयति । | सिद्धान्ती—यह तो ठीक है, किंतु यह सत्ताके अभावका निश्चय नहीं करता । |
| किं तर्हि ? | पूर्व०—तो फिर क्या करता है ? |
| व्याकृतनामरूपाभावमवधारयति; नामरूपव्याकृतविषये सच्छब्दप्रयोगो दृष्टः । तच्च नामरूपव्याकरणमादित्यायत्तं प्रायशो | सिद्धान्ती—व्यक्त नाम-रूपके अभावका निश्चय करता है । 'सत्' शब्दका प्रयोग, जिनके नाम-रूप व्यक्त हो गये हैं उन पदार्थोंके विषयमें देखा गया है; और जगत्के नाम-रूपकी अभिव्यक्ति प्रायः आदित्यके अधीन |
* अर्थात् सृष्टिके पूर्व यह सब कुछ 'असत्' अथवा सत्' था, इस प्रकार विकल्प हो सकता है ।
३४६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ३
३४६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ३
| जगतः । तदभावे ह्यन्धं तम इदं न प्रज्ञायेत किञ्चन, इत्यतस्तत्स्तुतिपरे वाक्ये सदपीदं प्रागुत्पत्तेर्जगदसदेवेत्यादित्यं स्तौति ब्रह्मदृष्ट्यर्हत्वाय । <br><br> आदित्यनिमित्तो हि लोके सदिति व्यवहारः; यथासदेवेदं राज्ञः कुलं सर्वगुणसंपन्ने पूर्णवर्मणि राजन्यसतीति तद्वत् । न च सत्त्वमसत्त्वं वेह जगतः प्रतिपिपादयिषितम्, आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशपरत्वात् । उपसंहरिष्यत्यन्ते 'आदित्यं ब्रह्मेत्युपास्ते' इति । <br><br> तत्सदासीत्, तदसच्छब्दवाच्यं प्रागुत्पत्तेः स्तिमितमनिस्पन्दमसदिव सत्कार्याभिमुखमीषदुप- | है, क्योंकि उसके अभावमें घोर अन्धकाररूप हुआ यह जगत् कुछ भी नहीं जाना जाता। इसलिये आदित्यके स्तवनपरक वाक्यमें, सत् होनेपर भी उत्पत्तिसे पूर्व यह जगत् 'असत ही था' ऐसा कहकर श्रुति, यह सूचित करनेके लिये कि आदित्य ब्रह्मदृष्टिके योग्य है, उसकी स्तुति करती है। <br><br> लोकमें आदित्यके कारण ही 'सत' ऐसा व्यवहार होता है, जिस प्रकार 'सर्वगुणसम्पन्न राजा पूर्णवर्माके न रहनेसे यह राजवंश नहीं-सा रह गया है' ऐसा कहा जाता है, उसी प्रकार यहाँ समझना चाहिये। इसके सिवा यहाँ इस वाक्यसे जगत्की सत्ता अथवा असत्ताका प्रतिपादन करना अभीष्ट भी नहीं है, क्योंकि यह 'मन्त्र आदित्य ब्रह्म है' ऐसा आदेश करनेके लिये ही है; तथा अन्तमें भी 'आदित्य ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है—ऐसा कहकर श्रुति इसका उपसंहार करेगी। <br><br> 'तत्सदासीत्'—वह, 'असत्' शब्दसे कहा जानेवाला तत्त्व, जो उत्पत्तिसे पूर्व स्तब्ध, स्पन्दनरहित और असत्के समान था, सत् यानी कार्याभिमुख होकर कुछ प्रवृत्ति |
| खण्ड १९ ] | शाङ्करभाष्यार्थं | ३४७ |
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| जातप्रवृत्ति सदासीत् ततो लब्धपरिस्यन्दं तत्समभवदल्पतरनामरूपव्याकरणेनाङ्कुरीभूतमिव बीजम् । ततोऽपि क्रमेण स्थूलीभवत्तदद्भ्य आण्डं समवर्तत संवृत्तम् । आण्डमिति दैर्घ्यं छान्दसम् ।<br><br>तदण्डं संवत्सरस्य कालस्य प्रसिद्धस्य मात्रां परिमाणमभिन्नस्वरूपमेवाशयत् स्थितं बभूव । तत्ततः संवत्सरपरिमाणात्कालादूर्ध्वं निरभिद्यत निर्भिन्नं वयसामिवाण्डम् । तस्य निर्भिन्नस्याण्डस्य कपाले द्वे रजतं च सुवर्णं चाभवतां संवृत्ते ॥ १ ॥ | पैदा होनेसे 'सत्' हो गया । फिर उससे भी कुछ स्पन्दन प्राप्त कर वह थोड़ेसे नाम-रूपकी अभिव्यक्तिके कारण अङ्कुरित हुए बीजके समान हो गया । उस अवस्थासे भी वह क्रमशः कुछ और स्थूल होता हुआ जलसे अण्डेके रूपमें परिणत हो गया । 'आण्डम्' यह दीर्घ प्रयोग वैदिक है ।<br><br>वह अण्डा संवत्सर नामसे प्रसिद्ध कालकी मात्रा यानी परिमाणतक [अर्थात् पूरे एक वर्ष] उसी प्रकार एकरूपसे पड़ा रहा । तत्पश्चात् एक वर्षपरिमाणकालके अनन्तर वह पक्षियोंके अण्डेके समान फूट गया । उस फूटे हुए अण्डेके जो दो खण्ड थे वे रजत और सुवर्णरूप हो गये ॥ १ ॥ |
तद्यद्रजतꣳसेयं पृथिवी यत्सुवर्णꣳसा द्यौर्यज्जरायु ते पर्वता यदुल्बꣳसमेघो नीहारो या धमनयस्ता नद्यो यद्वास्तेयमुदकꣳ स समुद्रः ॥ २ ॥
उनमें जो खण्ड रजत हुआ वह यह पृथिवी है और जो सुवर्ण हुआ वह द्युलोक है। उस अण्डका जो जरायु (स्थूल गर्भवेष्टन) था [वही] वे पर्वत हैं, जो उल्ब (सूक्ष्म गर्भवेष्टन) था वह मेघोंके सहित कुहरा
३४८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३
| ३४८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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है, जो धमनियां थीं वे नदियाँ हैं तथा जो वस्तिगत जल था वह समुद्र है ॥ २ ॥
| तत्तयोः कपालयोर्यद्रजतं कपालमासीत्, सेयं पृथिवी पृथिव्युपलक्षितमधोऽण्डकपालमित्यर्थः। यत्सुवर्णं कपालं सा द्यौर्द्युलोकोपलक्षितमूर्ध्वं कपालमित्यर्थः। यज्जरायु गर्भपरिवेष्टनं स्थूलमण्डस्य द्विशकलीभावकाल आसीत्, ते पर्वता बभूवुः। यदुल्बं सूक्ष्मं गर्भपरिवेष्टनम्, तत्सह मेघैः समेघो नीहारोऽवश्यायो बभूवेत्यर्थः। या गर्भस्य जातस्य देहे धमनयः शिराः, ता नद्यो बभूवुः। यत्तस्य वस्तौ भवं वास्तेयमुदकम्, स समुद्रः ॥२॥ | उन खण्डोंमें जो रजतमय खण्ड था वही यह पृथिवी अर्थात् पृथिवीरूपसे उपलक्षित नीचेका अण्डार्द्ध है; और जो सुवर्णमय खण्ड था वह द्यौः अर्थात् द्युलोकरूपसे उपलक्षित ऊपरका अण्डार्द्ध है। तथा दो खण्डोंमें विभक्त होनेके समय उस अण्डेका जो जरायु—स्थूल गर्भवेष्टन था वह पर्वतसमूह हुआ, जो उल्ब—सूक्ष्म गर्भवेष्टन था वह मेघोंके सहित नीहार—अवश्याय अर्थात् कुहंरा हुआ, जो उत्पन्न हुए उस गर्भके शरीरमें धमनियाँ—[रक्तवाहिनी] नाडियाँ थीं, वे नदियाँ हुईं और जो उसके वस्तिस्थान (मूत्राशय) में जल था, वह समुद्र हुआ ॥ २ ॥ |
अथ यत्तदजायत सोऽसावादित्यस्तं जायमानं घोषा उल्लूलवोऽनूदतिष्ठन्सर्वाणि च भूतानि सर्वे च कामास्तस्मात्तस्योदयं प्रति प्रत्यायनं प्रति घोषा उल्लूलवोऽनूत्तिष्ठन्ति सर्वाणि च भूतानि सर्वे च कामाः ॥३॥
फिर उससे जो उत्पन्न हुआ वह यह आदित्य है। उसके उत्पन्न होते ही बड़े जोरोंका शब्द हुआ तथा उसीसे सम्पूर्ण प्राणी
खण्ड १९ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ३४९
और सारे भोग हुए हैं । इसीसे उसका उदय और अस्त होनेपर दीर्घ-शब्दयुक्त घोष उत्पन्न होते हैं तथा सम्पूर्ण प्राणी और सारे भोग भी उत्पन्न होते हैं ॥ ३ ॥
| संस्कृत-भाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| अथ यत्तदजायत गर्भरूपं तस्मिन्नण्डे, सोऽसावादित्यः, | फिर उस अण्डेमें जो गर्भरूपसे उत्पन्न हुआ वह यह आदित्य है। |
| तमादित्यं जायमानं घोषाःशब्दा | उस आदित्यके उत्पन्न होनेपर |
| उलूळव ऊरुरवो विस्तीर्णरवा | उलूळव—ऊरुरव यानी सुदूरव्यापी शब्दवाले घोष-शब्द उपस्थित हुए— |
| उदतिष्ठन्नुत्थितवन्तः, ईश्वरस्येवेह प्रथमपुत्रजन्मनि; सर्वाणि च | उत्पन्न हुए, जिस प्रकार कि लोकमें किसी राजाके यहाँ प्रथम पुत्रजन्म होनेपर [ उत्सवपूर्ण कोलाहल हुआ करता है ] तथा उसी समय |
| स्थावरजङ्गमानि भूतानि सर्वे च | समस्त स्थावर-जङ्गम जीव और उन |
| तेषां भूतानां कामाः काम्यन्त इति विषयाः स्त्रीवस्त्रान्नादयः । | जीवोंके काम—जिनकी कामना की जाती है वे स्त्री, वस्त्र एवं अन्न आदि विषय उत्पन्न हुए । |
| यस्मादादित्यजन्मनिमित्ता | क्योंकि प्राणिवर्ग और उसके भोगोंकी उत्पत्ति आदित्यके जन्मके |
| भूतकामोत्पत्तिस्तस्मादद्यत्वेऽपि | कारण ही हुई है इसलिये आजकल |
| तस्यादित्यस्योदयं प्रति प्रत्यायनं प्रत्यस्तगमनं च प्रति, अथवा | भी उस सूर्यदेवके उदयके प्रति और प्रत्यायन अर्थात् प्रत्यस्तगमन (अस्त) के प्रति अथवा पुनःपुनः |
| पुनः पुनः प्रत्यागमनं प्रत्यायनं तत्प्रति तन्निमित्तीकृत्येत्यर्थः, | प्रत्यागमन ही प्रत्यायन है, उसके प्रति अर्थात् उसे ही निमित्त बनाकर |
| सर्वाणि च भूतानि सर्वे च कामा घोषा उलूळवश्चानूत्तिष्ठ- | सम्पूर्ण भूत, सारे भोग और दीर्घ शब्दयुक्त घोष उत्पन्न होते हैं । |
३५० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३
| ३५० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| न्ति, प्रसिद्धं ह्येतदुदयादौ सवितुः ॥ ३ ॥ | सूर्यके उदय आदि होनेके समय ये सब प्रसिद्ध ही हैं ॥ ३ ॥ |
स य एतमेवं विद्वानादित्यं ब्रह्मेत्युपास्तेऽभ्याशो ह यदेनꣳसाधवो घोषा आ च गच्छेयुरुप च निम्रेडेरन्निम्रेडेरन् ॥ ४ ॥
वह जो इस प्रकार जाननेवाला होकर आदित्यकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है, [ वह आदित्यरूप हो जाता है, तथा ] उसके समीप शीघ्र ही सुन्दर घोष आते हैं और उसे सुख देते हैं, सुख देते हैं ॥४॥
| स यः कश्चिदेतमेवं यथोक्तमहिमानं विद्वान्सन्नादित्यं ब्रह्मेत्युपास्ते स तद्भावं प्रतिपद्यत इत्यर्थः। किञ्च दृष्टं फलमभ्याशः क्षिप्रं तद्धिदः, यदिति क्रियाविशेषणम्, एनमेवंविदं साधवःशोभना घोषाः, साधुत्वं घोषादीनां यदुपभोगे पापानुबन्धाभावः। आ च गच्छेयुरागच्छेयुश्च, उप च | वह जो कोई इस आदित्यको ऐसी महिमावाला जानकर इसकी 'यह ब्रह्म है, इस प्रकार उपासना करता है' वह तद्रूप ही हो जाता है—ऐसा इसका भावार्थ है। तथा उसे यह दृष्टफल भी मिलता है—इस प्रकार जाननेवाले उस उपासकके समीप अभ्याशः—शीघ्र ही साधु—सुन्दर घोष आकर प्राप्त होते हैं। मूलमें 'यत्' शब्द क्रियाविशेषण है। घोषादिकी साधुता यही है कि उनका उपभोग करनेपर पापानुबन्ध नहीं होता। वे घोष |
खण्ड १९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३५१
| निम्रेडेरन्नुपनिम्रेडेरंश्च न केवल-<br>मागमनमात्रं घोषाणामुपसुखये-<br>युश्चोपसुखं च कुर्युस्त्यर्थः ।<br>द्विरभ्यासोऽध्यायपरिसमाप्त्यर्थ<br>आदरार्थश्च ॥ ४ ॥ | आते हैं और उसे सुख देते हैं, उसे<br>सुख देते हैं । तात्पर्य यह है कि<br>घोषोंका केवल आगमन ही नहीं<br>होता वे उसे सुख भी देते हैं, सुख<br>भी देते हैं । 'निम्रेडेरन्निम्रेडेरन्' यह<br>द्विरुक्ति अध्यायकी समाप्ति सूचित करने<br>और आदरप्रदर्शनके लिये है ॥४॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याय एकोन-<br> विंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १९ ॥
—: ० :—
इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य<br> श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ छान्दोग्योपनिषद्विवरणे<br> तृतीयोऽध्यायः समाप्तः ॥ ३ ॥
चतुर्थ अध्याय
चतुर्थ अध्याय
—: o :—
प्रथम खण्ड
—: o :—
राजा जानश्रुति और रैक्वका उपाख्यान
| वायुप्राणयोर्ब्रह्मणः पाददृष्ट्य-<br>ध्यासः पुरस्ताद्वर्णितः । अथे-<br>दानीं तयोः साक्षाद्ब्रह्मत्वेनोपा-<br>स्यत्वायोत्तरमारभ्यते। सुखाव-<br>बोधार्थारख्यायिका विद्यादान-<br>ग्रहणविधिप्रदर्शनार्था च ।<br>श्रद्धान्नदानानुद्धतत्वादीनां च<br>विद्याप्राप्तिसाधनत्वं प्रदर्श्यत<br>आख्यायिकया— | वायु और प्राणमें ब्रह्मकी पाद-<br>दृष्टिके अध्यासका वर्णन पहले<br>(तृतीय अध्यायमें) कर दिया गया।<br>अब इस समय उनका साक्षात्<br>ब्रह्मरूपसे उपास्यत्व बतलानेके<br>लिये आगेका प्रकरण आरम्भ किया<br>जाता है। यहाँ जो आख्यायिका है<br>वह सरलतासे समझनेके लिये तथा<br>विद्याके दान और ग्रहणकी विधि<br>प्रदर्शित करनेके लिये है। साथ ही<br>इस आख्यायिकाद्वारा श्रद्धा, अन्नदान<br>और अनुद्धतत्व (विनय) आदिका<br>विद्याप्राप्तिमें साधनत्व भी प्रदर्शित<br>किया जाता है— |
ॐ जानश्रुतिर्ह पौत्रायणः श्रद्धादेयो बहुदायी बहुपाक्य आस । स ह सर्वत आवसथान्मापयाञ्चक्रे सर्वत एव मेऽत्स्यन्तीति ॥ १ ॥
जनश्रुतकी संतान-परम्परामें उत्पन्न एवं उसके पुत्रका पौत्र श्रद्धापूर्वक देनेवाला एवं बहुत दान करनेवाला था और उसके यहाँ [दान करनेके लिये]
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थे ३५३
बहुत-सा अन्न पकाया जाता था। उसने, इस आशयसे कि लोग सब जगह मेरा ही अन्न खायँगे, सर्वत्र निवासस्थान (धर्मशाले) बनवा दिये थे ॥१॥
| संस्कृत-भाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| जानश्रुतिर्जनश्रुतस्यापत्यम्, ह ऐतिह्यार्थः, पुत्रस्य पौत्रः पौत्रायणः स एव श्रद्धादेयः श्रद्धापुरःसरमेव ब्राह्मणादिभ्यो देयमस्येति श्रद्धादेयः । बहुदायी प्रभूतं दातुं शीलमस्येति बहुदायी । बहुपाक्यो बहु पक्तव्यमहन्यहनि गृहे यस्यासौ बहुपाक्यः। भोजनार्थिभ्यो बह्वस्य गृहेऽन्नं पच्यत इत्यर्थः । एवंगुणसम्पन्नोऽसौ जानश्रुतिः पौत्रायणो विशिष्टे देशे काले च कस्मिंश्चिदास बभूव । | जानश्रुतिका—जनश्रुतका अपत्य ( वंशधर ), 'ह' यह निपात इतिहासका द्योतक है, पुत्रके पोतेको पौत्रायण कहते हैं; वही श्रद्धादेय था, उसके पास जो कुछ था वह ब्राह्मण आदिको श्रद्धापूर्वक देनेके लिये ही था, इसलिये उसे श्रद्धादेय कहा गया है; बहुदायी—जिसका स्वभाव बहुत दान करनेका था और बहुपाक्य—जिसके घरमें नित्यप्रति बहुत-सा पाक्य—पकाया हुआ अन्न रहता था अर्थात् जिसके घर भोजनार्थियोँके लिये बहुत-सा अन्न पकाया जाता था—ऐसा था, ऐसे गुणोंसे युक्त वह जनश्रुतकी संततिमें उत्पन्न हुआ उसका प्रपौत्र किसी उत्तम देश और कालमें हुआ था। |
| स ह सर्वतः सर्वासु दिक्षु ग्रामेषु नगरेषु चावसथानेत्य वसन्ति येष्वित्यावसथास्तानमापयाञ्चक्रे कारितवानित्यर्थः । सर्वत एव मे ममान्नं तेष्वावसथेषु | प्रसिद्ध है, उसने सब ओर—समस्त दिशाओंमें ग्राम और नगरोंके भीतर आवसथ ( धर्मशाला )—जिनमें आकर यात्री ठहरते हैं वे आवसथ कहलाते हैं—निर्मित कराये अर्थात् बनवा दिये थे। इससे उसका यह अभिप्राय था कि |
| ३५४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४ |
| ३५४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| वसन्तोऽत्स्यन्ति भोक्ष्यन्त इत्येवमभिप्रायः ॥ १ ॥ | उन धर्मशालाओंमें निवास करनेवाले लोग सर्वत्र मेरा ही अन्न भोजन करेंगे ॥ १ ॥ |
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| तत्रैवं सति राजनि तस्मिन् घर्मकाले हर्म्यतलस्थे— | वहाँ इस प्रकार रहता हुआ वह राजा जब एक बार गर्मीके समय अपने महलकी छतपर बैठा था— |
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अथ ह हꣳसा निशायामतिपेतुस्तद्धैवꣳहꣳसो हꣳसमभ्युवाद हो होऽयि भल्लाक्ष भल्लाक्ष जानश्रुतेः पौत्रायणस्य समं दिवा ज्योतिराततं तन्मा प्रसाङ्क्षीस्तत्त्वा मा प्रधाक्षीरिति ॥ २ ॥
उसी समय रात्रिमें उधरसे हंस उड़कर गये । उनमेंसे एक हंसने दूसरे हंससे कहा—'अरे ओ भल्लाक्ष ! ओ भल्लाक्ष ! देख, जानश्रुति पौत्रायणका तेज द्युलोकके समान फैला हुआ है; तू उसका स्पर्श न कर, वह तुझे भस्म न कर डाले' ॥ २ ॥
| अथ ह हंसा निशायां रात्रावतिपेतुः । ऋषयो देवता वा राज्ञोऽन्नदानगुणैस्तोषिताः सन्तो हंसरूपा भूत्वा राज्ञो दर्शनगोचरेऽतिपेतुः पतितवन्तः । तत्तस्मिन्काले तेषां पततां हंसानामेकः पृष्ठतः पतन्नग्रतः पतन्तं हंसम- | उसी समय निशा अर्थात् रात्रिमें उधरसे हंस उड़कर गये । राजाके अन्नदानसम्बन्धी गुणोंसे संतुष्ट हुए ऋषि या देवता हंसरूप होकर राजाकी दृष्टिके सामने होकर उड़े । उस समय उड़कर जाते हुए उन हंसोंमेंसे पीछे उड़ते हुए एक हंसने आगे उड़कर जाते हुए दूसरे हंससे 'अरे ओ भल्लाक्ष ! ओ भल्लाक्ष !' |
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| खण्ड १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ३५५ |
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| संस्कृत भाष्य | भाष्यार्थ |
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| भ्युवादाभ्युक्तवान् हो होऽयीति भो भो इति सम्बोध्य भल्लाक्ष भल्लाक्षेत्यादरं दर्शयन्नयथा पश्य पश्याश्चर्यमिति तद्वत् । भल्लाक्षेति मन्ददृष्टित्वं सूचयन्नाह । अथवा सम्यग्ब्रह्मदर्शनाभिमानवत्त्वात्तस्यासकृदुपालब्धस्तेन पीड्यमानोऽमर्षितया तत्सूचयति भल्लाक्षेति । | इस प्रकार सम्बोधन करते हुए और जैसे कि 'देखो, देखो, बड़ा आश्चर्य है' इत्यादि कथनमें देखा जाता है, उसी प्रकार 'भल्लाक्ष ! भल्लाक्ष !' ऐसा कहकर [ अपने कथनके प्रति ] आदर प्रदर्शित करते हुए कहा । 'भल्लाक्ष !' ऐसा कहकर उसकी मन्ददृष्टिताको सूचित करते हुए वह बोला । अथवा सम्यक् ब्रह्मज्ञानके अभिमानसे युक्त होनेके कारण उस (आगे उड़नेवाले हंस) से निरन्तर छेड़े जानेसे पीड़ित होकर क्रोधवश उसे 'भल्लाक्ष' कहकर सूचित करता है । [क्या सूचित करता है ? यह बतलाते हैं—] |
| जानश्रुतेः पौत्रायणस्य समं जानश्रुतेः तुल्यं दिवा द्युलोकेन प्रभाववर्णनम् ज्योतिः प्रभास्वरमन्नदानादिजनितप्रभावजमाततं व्याप्तं द्युलोकस्पृगित्यर्थः । दिवाह्ना वा समं ज्योतिरित्येतत् । तन्मा प्रसाङ्क्षीः सञ्जनं सक्तिं तेन ज्योतिषा सम्बन्धं मा कार्षीरित्यर्थः । तत्प्रसञ्जनेन तज्ज्योतिस्त्वा त्वां मा प्रधा- | जानश्रुति पौत्रायणकी ज्योति— अन्नदानादिजनित प्रभावसे प्राप्त हुई कान्ति द्युलोकके समान फैली हुई है; अर्थात् द्युलोकका स्पर्श करनेवाली है । अथवा इसका यह भी तात्पर्य हो सकता है कि दिवा यानी दिनके समान है । उससे प्रसङ्ग—सञ्जन यानी सक्ति न कर अर्थात् उस ज्योतिसे सम्बन्ध न कर । उसका सङ्ग करनेसे वह ज्योति तुझे भस्म अर्थात् दग्ध न कर |
छा० उ० १२—
३५६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४
३५६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४
| क्षीर्मा दहत्वित्यर्थः । पुरुषव्यत्ययेन मा प्रधाक्षीदिति ॥२॥ | डाले। यहाँ पुरुषका परिवर्तन करके ['मा प्रधाक्षी:'※के स्थानमें] 'मा प्रधाक्षीत्' ऐसा पाठ समझना चाहिये ॥२॥ |
तमु ह परः प्रत्युवाच कम्बर एनमेतत्सन्तँसयुग्वानमिव रैक्वमात्थेति यो नु कथँसयुग्वा रैक्व इति ॥ ३ ॥
उससे दूसरे [अग्रगामी] हंसने कहा—'अरे ! तू किस महत्त्वसे युक्त रहनेवाले इस राजाके प्रति इस तरह सम्मानित वचन कह रहा है ? क्या तू इसे गाड़ीवाले रैक्वके समान बतलाता है ?' [इसपर उसने पूछा—] 'यह जो गाड़ीवाला रैक्व है, कैसा है ?' ॥ ३ ॥
| [जानश्रुतेर्निकृष्टत्वकथनम्] तमेवमुक्तवन्तं पर इतरोऽग्रगामी प्रत्युवाचारे निकृष्टोऽयं राजा वराकस्तं कम् उ एनमेतत्सन्तं केन माहात्म्येन युक्तं सन्तमिति कुत्सयत्येनमेवं सबहुमानमेतद्वचनमात्थ ? रैक्वमिव सयुग्वानं सह युग्वना गन्त्र्या वर्तत इति सयुग्वा रैक्वः, तमि- | इस प्रकार कहते हुए उस हंससे दूसरे आगे चलनेवाले हंसने कहा—अरे ! यह बेचारा राजा तो बहुत तुच्छ है। भला किस रूपमें वर्तमान-कैसे महत्त्वसे युक्त रहनेवाले इस राजाके प्रति तू इस प्रकार यह अत्यन्त सम्मानपूर्ण शब्द कह रहा है—ऐसा कहकर वह उसकी अवज्ञा करता है—क्या तू इसे गाड़ीवाले रैक्वके समान [बतलाता है ?] जो युग्वा अर्थात् गाड़ीके साथ स्थित है उसे सयुग्वा कहते हैं; ऐसा जो रैक्व है उसके समान तू |
※ क्योंकि 'प्रधाक्षी:' मध्यम पुरुषकी क्रिया है और इसका कर्ता है 'ज्योति:' जो प्रथम पुरुष है। इसलिये इसका रूप भी प्रथम पुरुषके अनुसार 'प्रधाक्षीत्' ऐसा होना चाहिये ।
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थं [ ३५७
| वात्थैनम् ? अननुरूपमस्मिन्, न युक्तमीदृशं वक्तुं रैक्व इवेत्यभिप्रायः। इतरश्चाह—यो नु कथं त्वयोच्यते सयुग्वा रैक्वः। इत्युक्तवन्तं भल्लाक्ष आह—शृणु यथा स रैक्वः॥ ३॥ | इसे बतला रहा है? यह कथन इसके अनुरूप नहीं है; अर्थात् 'यह रैक्वके समान है' ऐसा कहना उचित नहीं। इसपर दूसरेने कहा—'जिसके विषयमें तुम कह रहे हो वह गाड़ीवाला रैक्व कैसा है?' ऐसा कहनेवाले उस हंससे भल्लाक्ष बोला—'जैसा वह रैक्व है, सुन' ॥ ३ ॥ |
यथा कृतायविजितायाधरेयाः संयन्त्येवमेनꣳसर्वं तदभिसमेति यत्किञ्च प्रजाः साधु कुर्वन्ति यस्तद्वेद यत्तत्स वेद स मयैतदुक्त इति ॥ ४ ॥
जिस प्रकार [द्यूतक्रीडामें] कृतनामक पासेके द्वारा जीतनेवाले पुरुषके अधीन उससे निम्न श्रेणीके सारे पासे हो जाते हैं उसी प्रकार प्रजा जो कुछ सत्कर्म करती है वह सब उस (रैक्व) को प्राप्त हो जाता है। जो बात वह रैक्व जानता है उसे जो कोई भी जानता है उसके विषयमें भी मैंने यह कह दिया ॥ ४ ॥
| [रैक्वस्य महत्त्वम्]<br>यथा लोके कृतायः कृतो नामायो द्यूतसमये प्रसिद्धश्चतुरङ्कः, स यदा जयति द्यूते प्रवृत्तानां तस्मै विजिताय तदर्थमितरे त्रिद्व्येकाङ्का अधरेयास्त्रेताद्वापरकलिना- | जिस प्रकार लोकमें द्यूतक्रीडाके समय जो चार अङ्कवाला कृत-नामक पासा प्रसिद्ध है, जब द्यूतमें प्रवृत्त हुए पुरुषोंका वह कृतनामक पासा जय प्राप्त करता है तो उसके द्वारा विजय प्राप्त करनेवालेको ही तीन, दो और एक अङ्कसे युक्त त्रेता, द्वापर और कलिनामक |
३५८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४
| ३५८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| मानः संयन्ति संगच्छन्तेऽन्त- | नीचेके पासे भी प्राप्त हो जाते हैं | | र्भवन्ति। चतुरङ्के कृताये त्रिव्ये- | अर्थात् उसके अधीन हो जाते हैं; | | काङ्कानां विद्यमानत्वात्तदन्तर्भ- | तात्पर्य यह है कि चार अङ्कसे युक्त | | वन्तीत्यर्थः। यथायं दृष्टान्तः, | कृतनामक पासेमें तीन, दो और | | एवमेनं रैक्वं कृतायस्थानीयं | एक अङ्कवाले पासे भी विद्यमान | | त्रेताद्ययस्थानीयं सर्वं तदभि- | रहनेके कारण वे भी उसके अन्तर्गत | | समेत्यन्तर्भवति रैक्वे। किं तत् ? | हो जाते हैं। जैसा यह दृष्टान्त है; | | यत्किञ्च लोके सर्वाः प्रजाः साधु | उसी प्रकार कृतस्थानीय इस रैक्व- | | शोभनं धर्मजातं कुर्वन्ति तत्सर्वं | को त्रेतादिस्थानीय वह सब प्राप्त हो | | रैक्वस्य धर्मेऽन्तर्भवति। तस्य | जाता है—सब उस रैक्वके अन्तर्गत | | च फले सर्वप्राणिधर्मफलमन्तर्भ- | हो जाता है। वह क्या है ? वह | | वतीत्यर्थः। | यह कि जो कुछ लोकमें प्रजा साधु | | तथान्योऽपि कश्चिद्यस्तद्वेद्यं | —शोभन यानी धर्मकार्य करती है | | वेद, किं तत् ? यद्वेद्यं स रैक्वो | सब-का-सब रैक्वके धर्ममें समा | | वेद तद्वेद्यमन्योऽपि यो वेद तमपि | जाता है। तात्पर्य यह है कि | | सर्वप्राणिधर्मजातं तत्फलं च | समस्त प्राणियोंके धर्मफल उसके | | रैक्वमिवाभिसमेतीत्यनुवर्तते। स | धर्मफलके अन्तर्गत हो जाते हैं। | | एवंभूतोऽरैक्वोऽपि मया विद्वानेत- | तथा दूसरा पुरुष भी, जो कोई | | | उस वेद्यको जानता है—वह वेद्य | | | क्या है ? जिसे कि वह रैक्व | | | जानता है उस वेद्यको दूसरा भी | | | जो कोई जानता है उसे भी रैक्वके | | | समान समस्त प्राणियोंका धर्मसमूह | | | और उसका फल प्राप्त हो जाता है | | | इस प्रकार यहाँ ‘सर्वं तदभिसमेति’ इस | | | पूर्ववाक्यका अनुवर्तन होता है। वह | | | इस प्रकारका रैक्वसे भिन्न विद्वान् | | | भी मैंने ऐसा कहकर बतला दिया। |
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३५९
| दुक्त एवमुक्तः, रैक्वत्स एव कृतायस्थानीयो भवतीत्यभिप्रायः ॥ ४ ॥ | तात्पर्य यह है कि रैक्वके समान वही कृतनामक पासेके सदृश होता है ॥ ४ ॥ |
तदु ह जानश्रुतिः पौत्रायण उपशुश्राव । स ह संजिहान एव क्षत्तारमुवाचाङ्गारारे ह सयुग्वानमिव रैक्वमात्थेति यो कथँसयुग्वा रैक्व इति ॥ ५ ॥ यथा कृतायविजितायाधरेयाः संयन्त्येवमेनँसर्वं तदभिसमेति यत्किञ्च प्रजाः साधु कुर्वन्ति यस्तद्वेद यत्स वेद स मयैतदुक्त इति ॥ ६ ॥
इस बातको जानश्रुति पौत्रायणने सुन लिया। [ दूसरे दिन सबेरे ] उठते ही उसने सेवकसे कहा—'अरे भैया ! तू गाड़ीवाले रैक्वके समान मेरी स्तुति क्या करता है !' [ इसपर सेवकने पूछा— ] 'यह जो गाड़ीवाला रैक्व है, कैसा है ?' ॥ ५ ॥ [ राजाने कहा— ] 'जिस प्रकार कृतनामक पासेके द्वारा जीतनेवाले रुषके अधीन उससे निम्नवर्ती समस्त पासे हो जाते हैं उसी प्रकार उस रैक्वको जो कुछ प्रजा सत्कर्म करती है, वह सब प्राप्त हो जाता है तथा जो कुछ वह ( रैक्व ) जानता है उसे जो कोई जानता है उसके विषयमें भी इस कथनद्वारा मैंने बतला दिया' ॥ ६ ॥
| तदु ह तदेतदीदृशं हंसवाक्यमात्मनः कुत्सारूपमन्यस्य विदुषो रैक्वादेः प्रशंसारूपमुपशुश्राव श्रुतवान्हर्म्यतलस्थो राजा जानश्रुतिः पौत्रायणः । तच्च हंसवाक्यं | महलकी छतपर स्थित राजा जानश्रुति पौत्रायणने अपनी निन्दारूप और रैक्व आदि किसी अन्य विद्वान्की प्रशंसारूप यह इस प्रकारका हंसका वचन सुन लिया । तथा उस हंसके वचनको पुनः- |