छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
३७८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ४
३७८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ४
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| एवं द्वावन्यावेकाङ्काय एवमेकोऽन्य इति । एवं दश सन्तस्तत्कृतं भवति । | अन्न हैं तथा जिस प्रकार एक अङ्कवाला पासा होता है उसी प्रकार इनसे भिन्न [ वायु और प्राण --ये अन्नादी ] हैं । इस प्रकार [ ४, ३, २, १ ] ये सब मिलकर दश होनेके कारण ही कृत हैं। |
| यत एवम्, तस्मात्सर्वासु दिक्षु दशस्वप्यग्न्याद्या वागाद्याश्च दशसंख्यासामान्यादन्नमेव । "दशाक्षरा विराट्" "विराडन्नम्" इति हि श्रुतिः । अतोऽन्नमेव दशसंख्यत्वात् । तत एव दश कृतं कृतेऽन्तर्भावाच्चतुरङ्कत्वेनेत्यवोचाम । सैषा विराड् दशसंख्या सत्यन्नं चान्नादी-अन्नादिनी च कृतत्वेन । कृते हि दशसंख्यान्तर्भूतातोऽन्नमन्नादिनी च सा । | क्योंकि ऐसा है, इसलिये सम्पूर्ण यानी दशों दिशाओंमें अग्न्यादि और वागादि—ये दश संख्यामें समान होनेके कारण अन्न ही हैं । "विराट् दश अक्षरोंवाला है" "विराट् अन्न है" ऐसी श्रुति भी है । अतः दश संख्यावाले होनेके कारण ये [ अग्न्यादि और वागादि ] अन्न ही हैं । इसीलिये ये दश कृत ही हैं, क्योंकि चार अङ्कवाला होनेसे कृतनामक पासेमें सब पासोंका अन्तर्भाव हो जाता है—ऐसा हम पहले कह चुके हैं । वह यह विराट् देवता दश संख्यावाली होती हुई अन्न और अन्नादी—अन्नादिनी अर्थात अन्न भक्षण करनेवाली है, क्योंकि वह कृतरूपा है । कृतमें दश संख्याका अन्तर्भाव है, इसलिये यह अन्न और अन्नादिनी है । |
खण्ड ३] शाङ्करभाष्यार्थ ३७९
| तथा विद्वान्दशदेवतात्मभूतः संवर्गविद्यायाः सन्विराट्त्वेन दशसर्वोपलब्धि-संख्यान्नं कृतफलत्वम् संख्ययान्नादी च । तथात्रान्नादित्येदं सर्वं जगद्दशदिक्संस्थं दृष्टं कृतसंख्याभूतयोपलब्धम् । एवंविदोऽस्य सर्वं कृतसंख्याभूतस्य दशदिक्संबद्धं दृष्टमुपलब्धं भवति । किञ्चान्नादश्च भवति य एवं वेद यथोक्तदर्शी । द्विरभ्यास उपासनसमाप्त्यर्थः ॥ ८ ॥ | इस प्रकार जाननेवाला उपासक दश देवताओंसे तादात्म्य प्राप्त कर दश संख्याके कारण विराट्रूपसे अन्न और कृतरूपसे अन्नादी हो जाता है । इस प्रकार कृतसंख्याभूत उस अन्न और अन्नादिनीद्वारा दशों दिशाओंसे सम्बद्ध यह सारा जगत् दृष्ट अर्थात् उपलब्ध कर लिया गया है । इस प्रकार जाननेवाले कृतसंख्याभूत इस विद्वान्को दशों दिशाओंसे सम्बद्ध सब कुछ दृष्ट यानी उपलब्ध हो जाता है । तथा पूर्वोक्तदृष्टिवाला जो उपासक इस प्रकार जानता है वह अन्नाद [दीप्ताग्नि] भी होता है । 'य एवं वेद य एवं वेद' यह द्विरुक्ति उपासनाकी समाप्तिके लिये है ॥ ८ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये तृतीयखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ३ ॥
</div>चतुर्थ खण्ड
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सत्यकामका ब्रह्मचर्य-पालन और वनमें जाकर गो चराना
| सर्वं वागाद्यग्न्यादि चान्नान्नादत्वसंस्तुतं जगदेकीकृत्य षोडशधा प्रविभज्य तस्मिन्ब्रह्मदृष्टिर्विधातव्येत्यारभ्यते। श्रद्धा-तपसोर्ब्रह्मोपासनाङ्गत्वप्रदर्शनायाख्यायिका। | अन्न और अन्नादरूपसे भली प्रकार स्तुत हुए वागादि और अग्न्यादिरूप सम्पूर्ण जगत्को कारणरूपसे एक कर फिर उसके सोलह-विभाग कर उसमें ब्रह्मदृष्टिका विधान करना है; इसीके लिये अब आरम्भ किया जाता है। यहाँ जो आख्यायिका है वह श्रद्धा और तपका ब्रह्मोपासनाका अङ्गत्व प्रदर्शित करनेके लिये है। |
सत्यकामो ह जाबालो जबालां मातरमामन्त्रयाञ्चक्रे ब्रह्मचर्यं भवति विवत्स्यामि किंगोत्रो न्वहमस्मीति ॥ १ ॥
जबालाके पुत्र सत्यकामने अपनी माता जबालाको सम्बोधित करके निवेदन किया—'हे पूज्ये ! मैं ब्रह्मचर्यपूर्वक [ गुरुकुलमें ] निवास करना चाहता हूँ; [ बता ] मैं किस गोत्रवाला हूँ ?' ॥ १ ॥
| सत्यकामो ह नामतः, हशब्द ऐतिह्यार्थः, जबालाया अपत्यं जाबालो जबालां स्वां मातरमामन्त्रयाञ्चक्र आमन्त्रितवान् । ब्रह्मचर्यं स्वाध्यायग्रहणाय हे भवति विवत्स्याम्याचार्यकुले | 'ह' शब्द इतिहासका द्योतक है। जबालाके पुत्रने, जो नामसे सत्यकाम था, अपनी माता जबालाको आमन्त्रित—सम्बोधित [ करके निवेदन] किया—'हे पूजनीये ! मैं स्वाध्यायग्रहणके लिये ब्रह्मचर्यपूर्वक आचार्यकुलमें निवास करूँगा। |
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३८१
| किंगोत्रोऽहं किमस्य मम गोत्रं सोऽहं किंगोत्रो न्वहमस्मीति ॥ १। | मैं किंगोत्र हूँ ? मेरा क्या गोत्र है ? अर्थात् मैं किस गोत्रवाला हूँ ?' ॥ १॥ |
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| एवं पृष्टा— | इस प्रकार पूछी जानेपर— |
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सा हैनमुवाच नाहमेतद्वेद तात यद्गोत्रस्त्वमसि बह्वहं चरन्ती परिचारिणी यौवने त्वामलभे साहमेतन्न वेद यद्गोत्रस्त्वमसि जबाला तु नामाहमस्मि सत्यकामो नाम त्वमसि स सत्यकाम एव जाबालो ब्रुवीथा इति ॥ २॥
उसने उससे कहा—'हे तात ! तू जिस गोत्रवाला है उसे मैं नहीं जानती । पहले मैं पतिके घर आये हुए बहुत-से अतिथियोंकी सेवा-टहल करनेवाली परिचारिका थी । [परिचर्यामें संलग्न होनेसे गोत्र आदिकी ओर मेरा ध्यान नहीं था ] उन्हीं दिनों युवावस्था में जब मैंने तुझे प्राप्त किया [ तुम्हारे पिता परलोकवासी हो गये, अतः उनसे भी पूछ न सकी ] इसलिये मैं यह नहीं जानती कि तू किस गोत्रवाला है ? मैं तो जबाला नामवाली हूँ और तू सत्यकाम नामवाला है । अतः तू अपनेको 'सत्यकाम जाबाल' बतला देना' ॥ २ ॥
| जबाला सा हैन पुत्रमुवाच— नाहमेतत्तव गोत्रं वेद, हे तात यद्गोत्रस्त्वमसि । कस्मान्न वेत्सि ? इत्युक्ताह-बहु भर्तृगृहे परिचर्याजातमतिथ्यभ्यागतादि चरन्त्यहं परिचारिणी. परिचरन्तीति परिचरणशीलैवाहम्, परिचरणचित्ततया गोत्रादिस्मरणे मम मनो | उस जबालाने अपने उस पुत्रसे कहा—'हे तात ! जिस गोत्रवाला तू है मैं इस तेरे गोत्रको नहीं जानती।' क्यों नहीं जानती ?--इस प्रकार कही जानेपर वह बोली—पतिके घरमें अतिथि और अभ्यागतादिकोंकी बहुत टहल करनेवाली मैं परिचारिणी—परिचर्या करनेवाली अर्थात् शुश्रूषापरायण थी । इस प्रकार परिचर्यामें चित्त लगा रहनेके कारण गोत्रादिको याद रखनेमें मेरा |
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३८२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ४
३८२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ४
| नाभूत् । यौवने च तत्काले त्वामलभे लब्धवत्यस्मि । तदैव ते पितोपरतः । अतोऽनाथां साहमेतन्न वेद यद्गोत्रस्त्वमसि । जबाला तु नामाहमस्मि सत्यकामो नाम त्वमसि स त्वं सत्यकाम एवाहं जाबालोऽस्मीत्याचार्याय ब्रूवीथाः, यद्याचार्येण पृष्ट इत्यभिप्रायः ॥ २ ॥ | मन नहीं था । तथा उस समय युवावस्थामें ही मैंने तुझे प्राप्त किया था । उसी समय तेरे पिताका देहान्त हो गया । इसलिये मैं अनाथा हो गयी और इसीसे मुझे इसका कुछ पता नहीं कि तू किस गोत्रवाला है । मैं तो जबाला नामवाली हूँ और तू सत्यकाम नामवाला है; अतः तात्पर्य यह है कि यदि आचार्य तुझसे पूछें तो तू यही कह देना कि 'मैं सत्यकाम जाबाल हूँ' ॥२॥ |
स ह हारिद्रुमतं गौतममेत्योवाच ब्रह्मचर्यं भगवति वत्स्याम्युपेयां भगवन्तमिति ॥ ३ ॥
उसने हारिद्रुमत गौतमके पास जाकर कहा—'मैं पूज्य श्रीमान्के यहाँ ब्रह्मचर्यपूर्वक वास करूँगा; इसीसे आपकी सन्निधिमें आया हूँ' ॥ ३ ॥
| स ह सत्यकामो हारिद्रुमतं हरिद्रुमतोऽपत्यं हारिद्रुमतं गौतमं गोत्रत एत्य गत्वोवाच ब्रह्मचर्यं भगवति पूजावति त्वयि वत्स्याम्यत्र उपेयामुपगच्छेयं शिष्यतया भगवन्तम् ॥ ३ ॥ | उस सत्यकामने, जो गोत्रतः गौतम थे, उन हारिद्रुमत-हरिद्रुमान्के पुत्रके पास जाकर कहा—'आप भगवान्--पूज्यवरके यहाँ मैं ब्रह्मचर्यपूर्वक वास करूँगा; इसीसे मैं आपकी सन्निधिमें उपसत्ति--शिष्यभावसे गमन करता हूँ' ॥ ३ ॥ |
| इत्युक्तवन्तम्— | इस प्रकार कहनेवाले— |
तँहोवाच किंगोत्रो नु सोम्यासीति स होवाच नाहमेतद्वेद भो यद्गोत्रोऽहमस्म्यपृच्छं मातरँसा मा प्रत्यब्रवीद्बह्वहं चरन्ती परिचारिणी यौवने त्वामलभे
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३८१
साहमेतन्न वेद यद्गोत्रस्त्वमसि जबाला तु नामाहमस्मि सत्यकामो नाम त्वमसीति सोऽहꣳसत्यकामो जाबालोऽस्मि भो इति ॥ ४ ॥
उससे [गौतमने] कहा—'हे सोम्य ! तू किस गोत्रवाला है ?' उसने कहा—'भगवन् ! मैं जिस गोत्रवाला हूँ उसे नहीं जानता । मैंने मातासे पूछा था । उसने मुझे यह उत्तर दिया कि 'पहले मैं पतिके घर आये हुए बहुतसे अतिथियोंकी सेवा-टहल करनेवाली परिचारिका थी [ परिचर्यामें संलग्न होनेसे ही गोत्र आदिकी ओर मेरा ध्यान नहीं रहा ] । उन्हीं दिनों युवावस्थामें जब मैंने तुझे प्राप्त किया [ तुम्हारे पिता परलोकवासी हो गये, अतः उनसे भी न पूछ सकी], इसलिये मैं यह नहीं जानती कि तू किस गोत्रवाला है ? मैं जबाला नामवाली हूँ और तू सत्यकाम नामवाला है ।' अतः हे गुरो ! मैं सत्यकाम जाबाल हूँ ॥ ४ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तं होवाच गौतमः—किंगोत्रो नु सोम्यासि ? इति, विज्ञातकुलगोत्रः शिष्य उपनेतव्यः, इति पृष्टः प्रत्याह सत्यकामः । स होवाच नाहमेतद्वेद भोः, यद्गोत्रोऽहमस्मि, किं त्वपृच्छं पृष्टवानस्मि, मातरम्; सा मया पृष्टा मां प्रत्यब्रवीन्माता—बह्वहं चरन्तीत्यादि पूर्ववत् । तस्या अहं वचः स्मरामि, सोऽहं सत्यकामो जाबालोऽस्मि भो इति ॥४॥ | उससे गौतमने कहा---'हे सोम्य ! तू किस गोत्रवाला है ? क्योंकि जिसके कुल और गोत्रका पता हो उसी शिष्यका उपनयन करना चाहिये ।' इस प्रकार पूछे जानेपर सत्यकामने उत्तर दिया । वह बोला—'भगवन् ! मैं जिस गोत्रवाला हूँ, उसे नहीं जानता किंतु मैंने मातासे पूछा था, मेरेद्वारा पूछे जानेपर माताने मुझे यही उत्तर दिया कि 'मैं बहुत-से अतिथियोंकी सेवा-टहल करनेवाली' इत्यादि पूर्ववत् समझना चाहिये । मुझे उसके वे वचन याद हैं; अतः हे गुरो ! मैं सत्यकाम जाबाल हूँ' ॥ ४ ॥ |
३८४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ४
३८४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ४
तं होवाच नैतदब्राह्मणो विवक्तुमर्हति समिधꣳ सोम्याहरोप त्वा नेष्ये न सत्यादगा इति तमुपनीय कृशानामबलानां चतुःशता गा निराकृत्योवाचेमाःसोम block-ान्वनुसंव्रजेति ता अभिप्रस्थापयन्नुवाच नासहस्रेणावर्तेयेति स ह वर्षगणं प्रोवास ता यदा सहस्रꣳ संपदुः ॥५॥
उससे गौतमने कहा—'ऐसा स्पष्ट भाषण कोई ब्राह्मणेतर नहीं कर सकता। अतः हे सोम्य ! तू समिधा ले आ, मैं तेरा उपनयन कर दूँगा; क्योंकि तूने सत्यका त्याग नहीं किया।' तब उसका उपनयन कर चार सौ कृश और दुर्बल गौएँ अलग निकालकर उससे कहा—'सोम्य ! तू इन गौओंके पीछे जा।' उन्हें ले जाते समय उसने कहा—'इनकी एक सहस्र गायें हुए बिना मैं नहीं लौटूँगा' जब तक कि वे एक सहस्र हुईं वह बहुत वर्षोंतक वनमें ही रहा ॥ ५ ॥
| तं होवाच गौतमो नैतदृचोऽब्राह्मणो विशेषेण वक्तुमर्हत्यार्जवार्थसंयुक्तम्। ऋजवो हि ब्राह्मणा नेतरे स्वभावतः। यस्मान्न सत्याद्ब्राह्मणजातिधर्मादगा नापेतवानसि, अतो ब्राह्मणं त्वामुपनेष्येऽतः संस्कारार्थं होमाय समिधं सोम्याहरेत्युक्त्वा तमुपनीय कृशानामबलानां गो- | उससे गौतमने कहा—'ऐसा सरलार्थयुक्त वचन विशेषतः कोई अब्राह्मण नहीं बोल सकता, क्योंकि ब्राह्मण तो स्वभावतः ही सरल होते हैं, और लोग नहीं। क्योंकि तू ब्राह्मणजातिके धर्म सत्यसे विचलित अर्थात् भ्रष्ट नहीं हुआ, अतः मैं तुझ ब्राह्मणका उपनयन-संस्कार करूँगा। इसलिये हे सोम्य ! संस्कारार्थ होम करनेके लिये तू समिध ले आ।' ऐसा कह उसका उपनयन करनेके अनन्तर उसने गौओंके यूथमेंसे |
| खण्ड ४ ] | शाङ्करभाष्यार्थ |
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| संस्कृत-भाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| यूथान्निराकृत्यापकृष्य चतुः-शता चत्वारि शतानि गवा-मुवाचेमा गाः सोम्यानुसंव्रजा-नुगच्छ ।<br><br>इत्युक्तस्ता अरण्यं प्रत्यभि-प्रस्थापयन्नुवाच नासहस्रेणा-पूर्णेन सहस्रेण नावर्तेय न प्रत्यागच्छेयम् । स एवमुक्त्वा गा अरण्यं तृणोदकबहुलं द्वन्द्व-रहितं प्रवेश्य स ह वर्षगणं दीर्घं प्रोवास प्रोषितवान् । ताः सम्यग्गावो रक्षिता यदा यस्मि-न्काले सहस्रं संपेदुः संपन्ना बभूवुः ॥ ५ ॥ | चार सौ कृश और निर्बल गौएँ अलग निकालकर उससे कहा—'हे सोम्य ! तू इन गौओंका अनुगमन कर—इनके पीछे-पीछे जा ।'<br><br>इस प्रकार कहे जानेपर उन्हें वनकी ओर हाँकते हुए सत्यकामने कहा—'बिना एक सहस्र हुए अर्थात् इनकी एक सहस्र संख्या पूरी हुए बिना मैं नहीं लौटूंगा ।' ऐसा कह वह उन गौओंको एक वनमें, जिसमें कि तृण और जलकी अधिकता थी तथा जो सर्वथा द्वन्द्व-रहित था, ले गया और वर्षोंतक—बहुत कालपर्यन्त, जबतक कि सम्यक् प्रकारसे रक्षा की हुई वे गौएँ एक सहस्र हुईं, वहीं रहा ॥ ५ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये
चतुर्थखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ४ ॥
पञ्चम खण्ड
—: o :—
वृषभद्वारा सत्यकामको ब्रह्मके प्रथम पादका उपदेश
| तमेतं श्रद्धातपोभ्यां सिद्धं वायुदेवता दिक्सम्बन्धिनी तुष्टा सत्यृषभमनुप्रविश्यर्षभभावमापन्नानुग्रहाय । | श्रद्धा और तपसे सिद्ध हुए उस इस सत्यकामसे दिक्सम्बन्धिनी वायुदेवता संतुष्ट होकर ऋषभ ( साँड ) में अनुप्रविष्ट हुई अर्थात् उसपर कृपा करनेके लिये ऋषभभावको प्राप्त हुई । |
अथ हैनमृषभोऽभ्युवाद सत्यकाम ३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव प्राप्ताः सोम्य सहस्रꣳ स्मः प्रापय न आचार्यकुलम् ॥ १ ॥
तब उससे साँडने 'सत्यकाम !' ऐसा कहा । उसने 'भगवन् !' ऐसा उत्तर दिया । [ वह बोला— ] 'हे सोम्य ! हम एक सहस्र हो गये हैं, अब तू हमें आचार्यकुलमें पहुँचा दे' ॥ १ ॥
| अथ हैनमृषभोऽभ्युवादा- <br> भ्युक्तवान्सत्यकाम ३ इति <br> संबोध्य, तमंसौ सत्यकामो <br> भगव इति ह प्रतिशुश्राव प्रति- <br> वचनं ददौ । प्राप्ताः सोम्य <br> सहस्रं स्मः, पूर्णा तव प्रतिज्ञा, <br> अतः प्रापय नोऽस्मानाचार्य- <br> कुलम् ॥ १ ॥ | तब उससे साँडने 'सत्यकाम !' <br> इस प्रकार सम्बोधन करते हुए <br> कहा । उसे सत्यकामने 'भगवन् !' <br> ऐसा कहकर प्रतिवचन—प्रत्युत्तर <br> दिया । [साँडने कहा—] 'हे सोम्य ! <br> हम एक सहस्र हो गये हैं, तेरी <br> प्रतिज्ञा पूरी हो गयी; अतः अब तू <br> हमें आचार्यकुलमें पहुँचा दे' ॥१॥ |
खण्ड ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३८७
| किं च— | तथा— |
|---|
ब्रह्मणश्च ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवा- निति तस्मै होवाच प्राची दिक्कला प्रतीची दिक्कला दक्षिणा दिक्कलोदीची दिक्कलैष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मणः प्रकाशवान्नाम ॥ २ ॥
‘[ क्या ] मैं तुझे ब्रह्मका एक पाद बतलाऊँ ?’ तब [ सत्यकामने ] कहा—‘भगवान् मुझे [ अवश्य ] बतलावें ।’ साँड उससे बोला—‘पूर्व दिक्कला, पश्चिम दिक्कला, दक्षिण दिक्कला और उत्तर दिक्कला, हे सोम्य ! यह ब्रह्मका ‘प्रकाशवान्’ नामक चार कलाओंवाला पाद है’ ॥ २ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-भाष्यार्थ |
|---|---|
| अहं ब्रह्मणः परस्य ते तुभ्यं पादं ब्रवाणि कथयानि ? इत्युक्तः प्रत्युवाच—ब्रवीतु कथयतु मे मह्यं भगवान् । इत्युक्त ऋषभस्तस्मै सत्यकामाय होवाच—प्राची दिक्कला ब्रह्मणः पादस्य चतुर्थो भागः तथा प्रतीची दिक्कला दक्षिणा दिक्कलोदीची दिक्कलैष वै सोम्य ब्रह्मणः पादश्चतुष्कलश्चतस्रः कला अवयवा यस्य सोऽयं चतुष्कलः पादो ब्रह्मणः प्रकाशवान्नाम प्रकाशवानित्येव नामाभिधानं यस्य । तथोत्तरेऽपि पादास्त्रयश्चतुष्कला ब्रह्मणः ॥२॥ | ‘[ क्या ] मैं तुझसे परब्रह्मका एक पाद बतलाऊँ—कहूँ ?’ ऐसा कहे जानेपर सत्यकामने उत्तर दिया—‘भगवान् मुझे [ अवश्य ] बतलावें ।’ इस प्रकार कहे जानेपर साँडने उस सत्यकामसे कहा—‘पूर्व दिक्कला उस ब्रह्मके पादका चौथा भाग है । इसी प्रकार पश्चिम दिक्कला, दक्षिण दिक्कला और उत्तर दिक्कला है—हे सोम्य ! यह ब्रह्मका चतुष्कलपाद है—जिसमें चार कलाएँ अवयव हैं ऐसा यह ब्रह्मका प्रकाशवान् नामका अर्थात् ‘प्रकाशवान्’ यही जिसका नाम है [ ऐसा एक पाद है ] । इसी प्रकार ब्रह्मके आगेके तीन पाद भी चार कलाओंवाले ही हैं’ ॥ २ ॥ |
छा० उ० १३—
३८८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४
| ३८८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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स य एतमेवं विद्वाँश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणः प्रकाशवानित्युपास्ते प्रकाशवानस्मिँल्लोके भवति प्रकाशवतो ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वाँश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणः प्रकाशवानित्युपास्ते ॥ ३ ॥
वह, जो इस प्रकार जाननेवाला पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्कल पादकी 'प्रकाशवान्' इस गुणसे युक्त उपासना करता है, इस लोकमें प्रकाशवान् होता है और प्रकाशवान् लोकोंको जीत लेता है, जो कि इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्कल पादकी 'प्रकाशवान्' इस गुणसे युक्त उपासना करता है ॥ ३ ॥
| स यः कश्चिदेवं यथोक्तमेतं ब्रह्मणश्चतुष्कलं पादं विद्वान्प्रकाशवानित्यनेन गुणेन विशिष्टमुपास्ते तस्येदं फलं प्रकाशवानस्मिँल्लोके भवति प्रख्यातो भवतीत्यर्थः । तथादृष्टं फलं प्रकाशवतो ह लोकान्देवादि सम्बन्धिनो मृतः सञ्जयति प्राप्नोति । य एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणः प्रकाशवानित्युपास्ते ॥ ३ ॥ | वह, जो कोई विद्वान् ब्रह्मके इस चतुष्कल पादकी इस प्रकार 'प्रकाशवान्' इस गुणसे युक्त उपासना करता है उसे यह फल मिलता है कि वह इस लोकमें प्रकाशवान् अर्थात् विख्यात होता है । तथा अदृष्टफल यह होता है कि वह मरनेपर देवतादिसे सम्बद्ध प्रकाशवान् लोकोंको जीत लेता है, जो विद्वान् कि इस प्रकार ब्रह्मके इस चतुष्कलपादकी 'प्रकाशवान्' इस रूपसे उपासना करता है ॥ ३ ॥ |
—: ० : —
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये
पञ्चमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ५ ॥
—: ०० :—
षष्ठ खण्ड
अग्निद्वारा ब्रह्मके द्वितीय पादका उपदेश
अग्निष्टे पादं वक्तेति स ह श्वोभूते गा अभिप्रस्था-
पयाञ्चकार । ता यत्राभिसायं बभूवुस्तत्राग्निमुपसमा-
धाय गा उपरुध्य समिधमाधाय पश्चादग्नेः प्राङ्-
पोपविवेश ॥ १ ॥
‘अग्नि तुझे [ दूसरा ] पाद बतलावेगा’—ऐसा [कहकर वृषभ मौन हो गया ] । दूसरे दिन उसने गौओंको [ गुरुकुलकी ओर ] हाँक दिया। वे सायंकालमें जहाँ एकत्रित हुईं वहीं अग्नि प्रज्वलित कर गौओंको रोक समिधाधान कर अग्निके पश्चिम पूर्वाभिमुख होकर बैठ गया ॥ १ ॥
| सोऽग्निस्ते पादं वक्तेत्युपररामर्षभः । स सत्यकामो ह श्वोभूते परेद्युर्नैत्यकं नित्यं कर्म कृत्वा गा अभिप्रस्थापयाञ्चकाराचार्यकुलं प्रति । ताः शनैश्चरन्त्य आचार्यकुलाभिमुख्यः प्रस्थिता यत्र यस्मिन्काले देशेऽभि सायं निशायामभिसंबभूवुरेकत्राभिमुख्यः संभूताः । तत्राग्निमुपसमाधाय गा उपरुध्य समिधमाधाय पश्चादग्नेः प्राङुपोपविवेश ऋषभवचो ध्यायन् ॥ १ ॥ | वह साँड 'अग्नि तुझे [दूसरा] पाद बतलावेगा'—ऐसा कहकर मौन हो गया । दूसरे दिन सत्यकामने नैत्यक—नित्यकर्म करनेके अनन्तर गौओंको गुरुकुलकी ओर चला दिया । वे गुरुकुलकी ओर धीरे-धीरे चलती हुई जिस समय और जिस स्थानमें अभि सायम्—रातमें एकत्रित हुईं वहीं अग्नि स्थापित कर गौओंको रोक समिधाधान कर साँडके वचनोंको याद करता हुआ अग्निके पश्चिम पूर्वाभिमुख होकर बैठ गया ॥ १ ॥ |
तमग्निरभ्युवाद सत्यकाम ३ इति भगव इति
ह प्रतिशुश्राव ॥ २ ॥
३१० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ४
३१० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ४
उससे अग्निने 'सत्यकाम !' ऐसा कहा । तब उसने 'भगवन् !' ऐसा प्रत्युत्तर दिया ॥ २ ॥
| तमग्निरभ्युवाद सत्यकाम ३ इति संबोध्य, तमसो सत्यकामो भगव इति ह प्रतिशुश्राव प्रतिवचनं ददौ ॥ २ ॥ | उससे अग्निने 'सत्यकाम !' इस प्रकार सम्बोधन करते हुए कहा । उसे सत्यकामने 'भगवन् !' ऐसा प्रत्युत्तर दिया ॥ २ ॥ |
—: ☸ :—
ब्रह्मणः सोम्य ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाच पृथिवी कलान्तरिक्षं कला द्यौः कला समुद्रः कलैष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मणोऽनन्तवान्नाम ॥ ३ ॥
'हे सोम्य ! मैं तुझे ब्रह्मका एक पाद बतलाऊँ ?' [ सत्यकामने कहा— ] 'भगवान् मुझे [ अवश्य ] बतलावें।' तब उसने उससे कहा— 'पृथिवी कला है, अन्तरिक्ष कला है, द्युलोक कला है और समुद्र कला है। हे सोम्य ! यह ब्रह्मका चतुष्कल पाद 'अनन्तवान्' नामवाला है' ॥३॥
| ब्रह्मणः सोम्य ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाच— पृथिवी कलान्तरिक्षं कला द्यौः कला समुद्रः कलेत्यात्मगोचरमेव दर्शनमग्निरब्रवीत् । एष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मणोऽनन्तवान्नाम ॥ ३ ॥ | 'हे सोम्य ! मैं तुझे ब्रह्मका एक पाद बतलाऊँ?' [सत्यकामने कहा—] 'भगवान् मुझे बतलावें।' तब उसने उससे कहा—'पृथिवी कला है, अन्तरिक्ष कला है, द्युलोक कला है और समुद्र कला है'—इस प्रकार अग्निने अपनेसे सम्बद्ध दर्शनका निरूपण किया—'हे सोम्य ! यह ब्रह्मका चार कलाओंवाला पाद 'अनन्तवान्' नामवाला है' ॥ ३ ॥ |
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खण्ड ६ ] शाङ्करभाष्यं ३९१
स य एतमेवं विद्वाँश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणोऽ- नन्तवानित्युपास्तेऽनन्तवानस्मिँल्लोके भवत्यनन्तवतो ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वाँश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणोऽनन्तवानित्युपास्ते ॥ ४ ॥
वह, जो इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्कल पादको 'अनन्तवान्' इस गुणसे युक्त उपासना करता है वह इस लोकमें अनन्तवान् होता है और अनन्तवान् लोकोंको जीत लेता है, जो कि इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्कल पादकी 'अनन्तवान्' इस गुणसे युक्त उपासना करता है ॥ ४ ॥
| स यः कश्चिद्यथोक्तं पादम- <br><br> नन्तवत्त्वेन गुणेनोपास्ते स <br><br> तथैव तद्गुणो भवत्यस्मिँल्लोके <br><br> मृतश्चानन्तवतो ह लोकान्स <br><br> जयति य एतमेवमित्यादि <br><br> पूर्ववत् ॥ ४ ॥ | वह, जो कोई पुरुष उपर्युक्त पाद-की अनन्तवत्त्वगुणसे युक्त उपासना करता है वह इस लोकमें उसी प्रकार—उसी गुणवाला हो जाता है, तथा मरनेपर अनन्तवान् लोकोंको जीत लेता है, जो कि इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष—इत्यादि शेष अर्थ पूर्ववत है ॥ ४ ॥ |
इति च्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये षष्ठखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ६ ॥
सप्तम खण्ड
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हंसद्वारा ब्रह्मके तृतीय पादका उपदेश
हꣳसस्ते पादं वक्तेति स ह श्वोभूते सा अभिप्रस्थापयाञ्चकार ता यत्राभि सायं बभूवुस्तत्राग्निमुपसमाधाय गा उपरुध्य समिधमाधाय पश्चादग्नेः प्राङ्ङोपविवेश ॥ १ ॥ तꣳहꣳस उपनिपत्याभ्युवाद सत्यकाम ३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव ॥२॥
'हंस तुझे [तीसरा] पाद बतलावेगा' ऐसा [कहकर अग्नि निवृत्त हो गया]। दूसरे दिन उसने गौओंको आचार्यकुलकी ओर हाँक दिया। वे सायङ्कालमें जहाँ एकत्रित हुईं वह उसी जगह अग्नि प्रज्वलित कर, गौओंको रोक और समिधाधान कर अग्निके पश्चिम पूर्वाभिमुख होकर बैठा ॥ १ ॥ तब हंसने उसके समीप उतरकर कहा—'सत्यकाम !' उसने उत्तर दिया—'भगवन् !' ॥ २ ॥
| सोऽग्निर्हंसस्ते पादं वक्तेत्युक्त्वोपरराम । हंस आदित्यः, शौक्ल्यात्पतनसामान्याच्च । स ह श्वोभूत इत्यादि समानम् ॥ १-२ ॥ | वह अग्नि 'हंस तुझे तीसरा पाद बतलावेगा' ऐसा कहकर उपरत हो गया। शुक्लता तथा उड़नेमें समानता होनेके कारण यहाँ आदित्यको हंस कहा गया है। 'स ह श्वोभूते' आदि वाक्यका अर्थ पूर्ववत् है ॥१-२॥ |
ब्रह्मणः सोम्य ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाचाग्निः कला सूर्यः कला चन्द्रः कला विद्युत्कलैष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मणो ज्योतिष्मान्नाम ॥ ३ ॥
खण्ड ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९३
[ हंसने कहा— ] हे सोम्य ! मैं तुझे ब्रह्मका पाद बतलाऊँ ?' [ सत्यकाम बोला— ] 'भगवान् मुझे बतलावें।' तब वह उससे बोला— 'अग्नि कला है, सूर्य कला है, चन्द्रमा कला है और विद्युत कला है। हे सोम्य ! यह ब्रह्मका चतुष्कल पाद 'ज्योतिष्मान्' नामवाला है' ॥३॥
स च एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणो ज्योतिष्मानित्युपास्ते ज्योतिष्मानस्मिँल्लोके भवति ज्योतिष्मतो ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणो ज्योतिष्मानित्युपास्ते ॥ ४ ॥
जो कोई इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्कल पादको 'ज्योतिष्मान्' ऐसे गुणसे युक्त उपासना करता है वह इस लोकमें ज्योतिष्मान् होता है तथा ज्योतिष्मान् लोकोंको जीत लेता है, जो कोई कि इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्कल पादको ज्योतिष्मान्' ऐसे गुणसे युक्त उपासना करता है ॥ ४ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अग्निः कला सूर्यः कला चन्द्रः कला विद्युतकलैष वै सोम्येति ज्योतिर्विषयमेव च दर्शनं प्रोवाचातो हंसस्यादित्यत्वं प्रतीयते। विद्वत्फलम्—ज्योतिष्मान्दीप्तियुक्तोऽस्मिँल्लोके भवति । चन्द्रादित्यादीनां ज्योतिष्मत एव च मृत्वा लोकाञ्जयति; समानमुत्तरम् ॥ ३-४ ॥ | 'अग्नि कला है, सूर्य कला है, चन्द्र कला है, विद्युत कला है, हे सोम्य यह' इत्यादि वाक्यसे उसने ज्योतिर्विषयक दर्शनका ही निरूपण किया है; इससे हंसका आदित्यत्व प्रतीत होता है । इस प्रकारके विद्वान्को प्राप्त होनेवाला फल—वह इस लोकमें ज्योतिष्मान्—दीप्तियुक्त होता है तथा मरनेपर चन्द्र एवं आदित्यादिके ज्योतिष्मान् लोकोंको ही जीत लेता है। आगेका अर्थ पूर्ववत् है ॥ ३-४ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये
सप्तमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ७ ॥
अष्टम खण्ड
मद्गुद्वारा ब्रह्मके चतुर्थ पादका उपदेश
मद्गुष्टे पादं वक्तेति स ह श्वोभूते गा अभिप्रस्थापयाञ्चकार ता यत्राभि सायं बभूवुस्तत्राग्निमुपसमाधाय गा उपरुध्य समिधमाधाय पश्चादग्नेः प्राङुपोपविवेश ॥ १ ॥
'मद्गु तुझे [ चौथा ] पाद बतलावेगा' ऐसा [ कहकर हंस चला गया ]। दूसरे दिन उसने गौओंको गुरुकुलकी ओर हाँक दिया। वे सायंकालमें जहाँ एकत्रित हुईं वहीं अग्नि प्रज्वलित कर गायोंको रोक समिधाधान कर अग्निके पीछे पूर्वाभिमुख होकर बैठ गया ॥ १ ॥
| हंसोऽपि मद्गुष्टे पादं वक्ते-<br><br>त्युपरराम । मद्गुरुदकचरः पक्षी<br><br>स चाप्सम्बन्धात्प्राणः । स ह<br><br>श्वोभूत इत्यादि पूर्ववत् ॥ १ ॥ | हंस भी 'मद्गु तुझे [ चौथा ] पाद बतलावेगा' ऐसा कहकर चला गया। 'मद्गु' जलचर पक्षीको कहते हैं; जलसे सम्बन्ध होनेके कारण वह प्राण ही है। 'स ह श्वोभूते' इत्यादि वाक्यका तात्पर्य पूर्ववत् है ॥ १ ॥ |
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तं मद्गुरुपनिपत्याभ्युवाद सत्यकाम ३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव ॥ २ ॥
मद्गुने उसके पास उतरकर कहा—'सत्यकाम !' तब उसने उत्तर दिया 'भगवन् !' ॥ २ ॥
खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९५
ब्रह्मणः सोम्य ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाच प्राणः कला चक्षुः कला श्रोत्रं कला मनः कलैष वै सोम्य चतुष्कलाः पादो ब्रह्मण आयतनवान्नाम ॥ ३ ॥
[ मद्गु बोला—] 'हे सोम्य ! मैं तुझे ब्रह्मका पाद बतलाऊँ ?' [ सत्यकाम बोला—] 'भगवान् मुझे बतलावें ।' तब वह उससे बोला— 'प्राण कला है, चक्षु कला है, श्रोत्र कला है और मन कला है । हे सोम्य ! यह ब्रह्मका चतुष्कल पाद 'आयतनवान्' नामवाला है' ॥ ३ ॥
| स च मद्गुः प्राणः स्वविषयमेव च दर्शनमुवाच प्राणः कलेत्याद्यायतनवानित्येवं नाम । आयतनं नाम मनः सर्वकरणोपहृतानां भोगानां तद्यस्मिन्पादे विद्यत इत्यायतनवान्नाम पादः ॥ २-३ ॥ | उस मद्गु यानी प्राणने भी 'प्राण कला है' इत्यादि 'आयतनवान्' इस नामवाला पाद है, ऐसा कहकर अपनेसे सम्बद्ध दर्शनका ही निरूपण किया । समस्त इन्द्रियोंद्वारा ग्रहण किये हुए भोगोंका आयतन मन ही है, वह जिस पादमें विद्यमान है वह पाद 'आयतनवान्' नामवाला है ॥ २–३ ॥ |
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स य एतमेवं विद्वाँश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मण आयतनवानित्युपास्त आयतनवानस्मिँल्लोके भवत्यायतनवतो ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वाँश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मण आयतनवानित्युपास्ते ॥ ४ ॥
३९६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४
३९६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४
वह जो इस प्रकार जाननेवाला पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्कल पादकी 'आयतनवान्' ऐसे गुणसे युक्त उपासना करता है वह इस लोकमें 'आयतनवान्' होता है और आयतनवान् लोकोंको जीत लेता है, जो कोई कि इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्कल पादकी 'आयतनवान्' ऐसे गुणसे युक्त उपासना करता है ॥ ४ ॥
| तं पादं तथैवोपास्ते यः स आयतनवानाश्रयवानस्मिँल्लोके भवति । तथायतनवत एव सावकाशाँल्लोकान्मृतो जयति । य एतमेवमित्यादि पूर्ववत् ॥ ४ ॥ | उस पादकी जो उसी प्रकार उपासना करता है वह इस लोकमें 'आयतनवान्'—आश्रयवाला होता है तथा मरनेपर आयतनवान्—अवकाशयुक्त लोकोंको ही जीतता है । 'य एतमेवम्' इत्यादि वाक्य का अर्थ पूर्ववत् है ॥ ४ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्यायेऽष्टमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ८ ॥
नवम खण्ड
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सत्यकामका आचार्यकुलमें पहुँचकर आचार्यद्वारा पुनः उपदेश ग्रहण करना
| स एवं ब्रह्मवित्सन्— | इस प्रकार वह ब्रह्मवेत्ता होकर— |
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प्राप हाचार्यकुलं तमाचार्योऽभ्युवाद सत्यकाम ३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव ॥ १ ॥
आचार्यकुलमें पहुँचा । उससे आचार्यने कहा—'सत्यकाम !' तब उसने उत्तर दिया—'भगवन् !' ॥ १ ॥
| आप ह प्राप्तवानाचार्यकुलम् । तमाचार्योऽभ्युवाद सत्यकाम ३ इति । भगव इति ह प्रतिशुश्राव ॥ १ ॥ | आचार्यकुलमें पहुँचा । उससे आचार्यने 'सत्यकाम !' ऐसा कहा । तब उसने 'भगवन् !' ऐसा उत्तर दिया ॥ १ ॥ |
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ब्रह्मविदिव वै सोम्य भासि को नु त्वानुशशासेत्यन्ये मनुष्येभ्य इति ह प्रतिजज्ञे भगवांस्त्वेव मे कामे ब्रूयात् ॥ २ ॥
'हे सोम्य ! तू ब्रह्मवेत्ता-सा भासित हो रहा है; तुझे किसने उपदेश दिया है ?' ऐसा [आचार्यने पूछा] तब उसने उत्तर दिया 'मनुष्योंसे भिन्न [देवताओं] ने मुझे उपदेश दिया है, अब मेरी इच्छाके अनुसार आप पूज्यपाद ही मुझे विद्याका उपदेश करें' ॥ २ ॥
| ब्रह्मविदिव वै सोम्य भासि । <br><br> प्रसन्नेन्द्रियः प्रहसितवदनश्च | 'हे सोम्य ! तू ब्रह्मवेत्ता-सा भासित हो रहा है।' कृतार्थ ब्रह्मवेत्ता ही प्रसन्नेन्द्रिय, हास्ययुक्त मुख- |
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