भारतकोश
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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४१


तद्वा एतदनुज्ञाक्षरं यद्धि किं चानुजानात्योमि-
त्येव तदाहं एषा एव समृद्धिर्यदनुज्ञा । समर्धयिता
ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथ-
मुपास्ते ॥ ८ ॥

वह यह ओंकार ही अनुज्ञा (अनुमतिसूचक) अक्षर है। [मनुष्य] किसीको जो कुछ अनुमति देता है तो 'ॐ' (हाँ) ऐसा ही कहता है। यह अनुज्ञा ही समृद्धि है। जो इस प्रकार जाननेवाला पुरुष इस उद्गीथ अक्षरकी उपासना करता है, वह निश्चय ही सम्पूर्ण कामनाओंको समृद्ध करनेवाला होता है ॥ ८ ॥

संस्कृतहिन्दी
तद्वा एतत्प्रकृतमनुज्ञाक्षरम-<br><br>नुज्ञा च साक्षरं च तत् । अनुज्ञा<br><br>चानुमतिरोङ्कार इत्यर्थः । कथ-<br>मनुज्ञा? इत्याह श्रुतिरेव—यद्धि<br>किं च यत्किं च लोके ज्ञानं धनं<br>वानुजानाति विद्वान्धनी वा<br>तत्रानुमतिं कुर्वन्नोमित्येव तदाह।<br><br>तथा च वेदे—"त्रयस्त्रिंशदित्यो-<br>मिति होवाच" (बृ० उ० ३ ।<br>९ । १) इत्यादि । तथा च<br>लोकेऽपि तवेदं धनं गृह्णामीत्युक्त<br>ओमित्येवाह !वह यह ओंकार ही, जिसका प्रक-<br>रण चल रहा है, अनुज्ञाक्षर है। जो<br>अनुज्ञा हो और अक्षर भी हो उसे<br>अनुज्ञाक्षर कहते हैं। अनुज्ञा अनुमति-<br>का नाम है, अर्थात् ॐकार अनुज्ञा<br>है। वह अनुज्ञा किस प्रकार है ?<br>सो स्वयं श्रुति ही बतलाती है—<br>लोकमें कोई विद्वान् या धनी पुरुष<br>जिस किसी ज्ञान अथवा धनके लिये<br>अनुमति देता है तो उस सम्बन्धमें<br>अपनी अनुमति देते हुए वह 'ॐ'<br>ऐसा ही कहता है। तथा वेदमें भी<br>"तैंतीस ऐसा कहनेपर [शाकल्यने]<br>'ॐ' ऐसा कहा" * इत्यादि उदा-<br>हरण हैं और लोकमें भी 'मैं तेरा<br>यह धन लेता हूँ' ऐसा कहनेपर<br>'ॐ' (हाँ) ऐसा ही कहते हैं।

* शाकल्यनामक एक ब्राह्मणने याज्ञवल्क्यसे पूछा कि कितने देवता हैं ? उसके उत्तरमें याज्ञवल्क्यने कहा—'तैंतीस' । तब शाकल्यने 'ॐ' ऐसा कहकर अपनी अनुमति प्रकट की । (बृहदारण्यकोपनिषद्)

| ४२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |

४२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १

| अत एषा उ एवैषैव समृद्धि-<br><br>र्यदनुज्ञा; यानुज्ञा स समृद्धिस्त-<br><br>न्मूलत्वादनुज्ञायाः । समृद्धो<br><br>ह्योमित्यनुज्ञां ददाति । तस्मात्<br><br>समृद्धिगुणवानोङ्कार इत्यर्थः ।<br><br>समृद्धिगुणोपासकत्वात्तद्धर्मा सन् समर्धयिता ह वै कामानां यजमानस्य भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्त इत्यादि पूर्ववत् ॥ ८ ॥ | अतः 'एषा उ एव' अर्थात् यही समृद्धि है। जो कि अनुज्ञा कहलाती है। जो अनुज्ञा है वही समृद्धि है, क्योंकि अनुज्ञा समृद्धिमूलक होती है। समृद्ध पुरुष ही 'ॐ' ऐसी अनुज्ञा देता है। अतः तात्पर्य यह है कि ओंकार समृद्धि गुणवाला है। जो ऐसा जाननेवाला पुरुष इस उद्गीथ अक्षरकी उपासना करता है, वह समृद्धिगुणयुक्त वस्तुका उपासक होनेके कारण उसके ही समान धर्मवाला होकर अपने यजमानकी कामनाओंको समृद्ध (पूर्ण) करनेवाला होता है—इत्यादि पूर्ववत् जानना चाहिये ॥ ८ ॥ |

ओंकारकी स्तुति

| अथेदानीमक्षरं स्तौत्युपास्य-<br><br>त्वात्प्ररोचनार्थम्, कथम् ? | इसके बाद अब श्रुति उस अक्षर (ॐ) में रुचि उत्पन्न करनेके लिये उसकी स्तुति करती है, क्योंकि वह उपास्य है। कैसे स्तुति करती है, [ यह बताते हैं ]— |

तेनेयं त्रयी विद्या वर्तत ओमित्याश्रावयत्यो-<br> मिति शꣳसत्योमित्युद्गायत्येतस्यैवाक्षरस्यापचित्यै<br> महिम्ना रसेन ॥ ९ ॥

उस अक्षरसे ही यह [ऋग्वेदादिरूप] त्रयीविद्या प्रवृत्त होती है। 'ॐ' ऐसा कहकर ही [अध्वर्यु] आश्रावण कर्म करता है, 'ॐ' ऐसा कहकर ही होता शंसन करता है तथा 'ॐ' ऐसा कहकर ही उद्गाता उद्गान करता है। इस अक्षर [परमात्मा] की पूजाके लिये ही [सम्पूर्ण वैदिक कर्म हैं] तथा इसीकी महिमा और रस (व्रीहि-यवादि हवि) के द्वारा [सब कर्म प्रवृत्त होते हैं] ॥ ९ ॥

खण्ड १ ]शाङ्करभाष्यार्थ४३
शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
तेनाक्षरेण प्रकृतेनेयमृग्वेदा-<br>दिलक्षणा त्रयीविद्या त्रयी-<br>विद्याविहितं कर्मेत्यर्थः । न हि<br>त्रयीविद्यैवांश्रावणादिभिर्वर्तते ।<br>कर्म तु तथा प्रवर्तत इति प्रसि-<br>द्धम्। कथम् ? ओमित्याश्रावयत्यो-<br>मिति शंसत्योमित्युद्गायतीति<br>लिङ्गाच्च सोमयाग इति गम्यते ।<br>तच्च कर्मैतस्यैवाक्षरस्यापचि-<br>त्यै पूजार्थम् । परमात्मप्रतीकं<br>हि तत् । तदपचितिः परमात्मन<br>एव सा । “स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य<br>सिद्धिं विन्दति मानवः” (गीता<br>१८ । ४६) इति स्मृतेः ।<br>किं चैतस्यैवाक्षरस्य महिम्ना<br>महत्त्वेन ऋत्विग्यजमानादि-उस प्रकृत अक्षरसे ही यह ऋग्वेदादिरूप त्रयीविद्या अर्थात् त्रयीविद्यासे विधान किया हुआ कर्म प्रवृत्त होता है, क्योंकि आश्रावण आदि कर्मोंद्वारा स्वयं त्रयीविद्या ही प्रवृत्त नहीं हुआ करती । हाँ, यह प्रसिद्ध ही है कि कर्म इस प्रकार प्रवृत्त हुआ करता है। किस प्रकार ? [ सो बतलाते हैं— ] ॐ ऐसा कहकर [अध्वर्यु ] आश्रावण करता है, ॐ ऐसा कहकर [होता] शंसन करता है और ॐ ऐसा कहकर [उद्गाता] उद्गान करता है । इस प्रकार आश्रावण आदि तीनों कर्मोंके समाहाररूप लिङ्ग* (लक्षण) से जाना जाता है कि यह सोमयागका वर्णन है।<br>तथा वह कर्म भी इस अक्षरकी ही अपचिति—पूजाके लिये है, क्योंकि वह परमात्माका प्रतीक है, अतः उसकी पूजा परमात्माकी ही पूजा है; जैसा कि “अपने कर्मसे उसका पूजन करके मनुष्य सिद्धि लाभ करता है” इस स्मृतिसे सिद्ध होता है ।<br>तथा इस अक्षरकी महिमा—महत्त्व, यानी ऋत्विज् एवं यजमान

* अध्वर्यु होता और उद्गाता—इन तीनोंके कर्मोंका समाहार दर्शपूर्णमास आदिमें सम्भव नहीं है । अग्निष्टोम आदि यज्ञोंमें ही जो सोमयागसंस्थाके अन्तर्गत हैं उसकी सम्भावना है । अतः यहाँ उक्त तीनों कार्योंके समाहाररूप लिंग ( लक्षण ) से यह सूचित होता है कि यहाँ ॐकारसे आरम्भ होनेवाले त्रयीविद्या-विहित कर्म-सोमयागका ही वर्णन है ।

४४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १

४४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १

| प्राणैरित्यर्थः । तथैतस्यैवाक्षरस्य रसेन व्रीहियवादिरसनिर्वृत्तेन हविषेत्यर्थः; यागहोमाद्यक्षरेण क्रियते । तच्चादित्यमुपतिष्ठते । ततो वृष्ट्यादिक्रमेण प्राणोऽन्नं च जायते । प्राणैरन्नेन च यज्ञस्तायते । अत उच्यते 'अक्षरस्य महिम्ना रसेन' इति ॥९॥ | आदिके प्राणोंसे ही तथा इस अक्षरके रस—व्रीहि-यवादिरससे निष्पन्न हुए हविष्यसे ही [वैदिककर्म सम्पन्न होते हैं] । [तो क्या वे प्राण और हवि उस अक्षरके विकार हैं ? इसपर कहते हैं—] वे याग-होमादि इस अक्षरके उच्चारणपूर्वक ही किये जाते हैं । वे कर्म आदित्यको प्राप्त होते हैं । फिर उससे वृष्टि आदि क्रमसे प्राण और अन्नकी उत्पत्ति होती है तथा प्राण और अन्नसे यज्ञका अनुष्ठान किया जाता है। इसीलिये 'इस अक्षरकी महिमासे और रससे' ऐसा कहा गया है ॥९॥ |

उद्गीथविद्याके जानने और न जाननेवालेके कर्मका भेद

| तत्राक्षरविज्ञानवतः कर्म कर्तव्यमिति स्थितमाक्षिपति — | ऐसी अवस्थामें जिसे अक्षर-विज्ञान है उसीको कर्म करना चाहिये—इस अवस्थामें श्रुति आक्षेप करती है— |

तेनोभौ कुरुतो यश्चैतदेवं वेद यश्च न वेद ।
नाना तु विद्या चाविद्या च यदेव विद्यया करोति
श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवतीति खल्वेत-
स्यैवाक्षरस्योपव्याख्यानं भवति ॥१०॥

जो इस (अक्षर) को इस प्रकार जानता है और जो नहीं जानता वे दोनों ही उसके द्वारा [कर्म] करते हैं । किंतु विद्या और अविद्या—दोनों भिन्न-भिन्न [फल देनेवाली] हैं । जो कर्म विद्या, श्रद्धा और योगसे युक्त होकर किया जाता है वही प्रबलतर होता है, इस प्रकार निश्चय ही यह सब इस अक्षरकी ही व्याख्या है ॥ १० ॥

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
तेनाक्षरेणोभौ यश्चैतदक्षरमेवं व्याख्यातं वेद यश्च कर्ममात्रविद्वक्षरयाथात्म्यं न वेद तावुभौ कुरुतः कर्म। तयोश्च कर्मसामर्थ्यादेव फलं स्यात्किं तत्राक्षरयाथात्म्यविज्ञानेनेति। दृष्टं हि लोके हरीतकीं भक्षयतोस्तद्रसाभिज्ञेतरयोर्विरेचनम्। नैवम्, यस्मान्नाना तु विद्या चाविद्या च भिन्ने हि विद्याविद्ये। तु शब्दः पक्षव्यावृत्त्यर्थः।उस अक्षरके द्वारा दोनों ही प्रकारके लोग कर्म करते हैं; [कौन-कौन ? ] ( १ ) जो इस अक्षरको जैसी कि ऊपर व्याख्या की गयी है उसी प्रकार जानते हैं; और ( २ ) जो केवल कर्मको ही जानते हैं, अक्षरके यथार्थ स्वरूपको नहीं जानते, वे दोनों ही कर्मानुष्ठान करते हैं। [ अब यदि कोई कहे कि ] उन्हें कर्मके सामर्थ्यसे ही फलकी प्राप्ति हो जायगी, अक्षरके याथात्म्यको जाननेकी क्या आवश्यकता है, क्योंकि लोकमें हरीतकी (हर्रे) के रसको जाननेवाले और न जाननेवाले इन दोनोंको ही हरीतकी खानेसे दस्त होते देखे गये हैं—तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि विद्या और अविद्या इन दोनोंमें भेद है—विद्या और अविद्या दोनों ही भिन्न-भिन्न हैं। 'तु' शब्द पक्षकी व्यावृत्ति करनेके लिये है।
न ओंकारस्य कर्माङ्गत्वमात्रविज्ञानमेव रसतमाप्तिसमृद्धिगुणवद्विज्ञानम्, किं तर्हि ? ततोऽभ्यधिकम्। तस्मात्तदङ्गाधिक्यात्फलाधिक्यं युक्तमित्यभिप्रायः। दृष्टं हि लोके वणिक्छबरयोःओंकार रसतम् तथा आप्ति और समृद्धि इन गुणोंसे युक्त है—ऐसा जानना उसे केवल कर्माङ्गमात्र जाननेके ही तुल्य नहीं है, तो फिर कैसा है ? उससे सब प्रकार बढ़ा हुआ है। अतः अभिप्राय यह है कि कर्माङ्गज्ञानसे उत्कृष्ट होनेके कारण उसके फलकी उत्कृष्टता भी उचित ही है। लोकमें यह देखा ही गया है कि व्यापारी और भील—

४६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १

४६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १

| पद्मरागादिमणिविक्रये वणिजो विज्ञानाधिक्यात्फलाधिक्यम् । तस्माद्यदेव विद्यया विज्ञानेन युक्तः सन् करोति कर्म श्रद्धया श्रद्धावानश्च सन्नुपनिषदा योगेन युक्तश्चेत्यर्थः, तदेव कर्म वीर्यवत्तरमविद्वत्कर्मणोऽधिकफलं भवतीति । विद्वत्कर्मणो वीर्यवत्तरत्ववचनादविदुषोऽपि कर्म वीर्यवदेव भवतीत्यभिप्रायः ।<br><br>न चाविदुषः कर्मण्यनधिकारः । औषस्त्ये काण्डेऽविदुषामप्यार्त्विज्यदर्शनात् । रसतमाप्तिसमृद्धिगुणवदक्षरमित्येकमुपासनम्, मध्ये प्रयत्नान्तरादर्शनात् । अनेकैर्हि विशेषणैरनेकधोपास्यत्वात् खल्वेतस्यैव प्रकृतस्योद्गीथाख्यस्याक्षरस्यौपव्याख्यानं भवति ॥ १० ॥ | इन दोनोंमेंसे व्यापारीको पद्मरागादि मणियोंकी बिक्रीका अधिक ज्ञान होनेके कारण अधिक फल होता है । अतः विद्या अर्थात् विज्ञानसे युक्त होकर श्रद्धासे यानी श्रद्धालु होकर और उपनिषद् अर्थात् योगसे युक्त होकर जो कर्म करता है वही प्रबलतर होता है—अविद्वान्‌के कर्मसे अधिक फल देनेवाला होता है । विद्वान्‌का कर्म प्रबलतर बतलाया गया है, इससे यह अभिप्राय सूचित होता है कि अविद्वान्‌का भी कर्म प्रबल तो होता ही है ।<br><br>अविद्वान्‌का कर्ममें अधिकार न हो—ऐसी बात भी नहीं है; क्योंकि औषस्त्यकाण्डमें (इस अध्यायके दशम खण्डमें) अविद्वानोंको भी ऋत्विक्कर्म करते देखा जाता है । वह अक्षर रसतम् तथा आप्ति और समृद्धि गुणोंसे युक्त है—ऐसी एक उपासना है, क्योंकि इसका निरूपण करते समय बीचमें कोई और प्रयत्न नहीं देखा गया। अनेकों विशेषणों द्वारा अनेक प्रकारसे उपास्य होनेके कारण निश्चय ही यह सब इस उद्गीथसंज्ञक प्रकृत अक्षर (ॐ)की ही व्याख्या है॥ १० ॥ |

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याये प्रथम खण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १ ॥

द्वितीय खण्ड

प्राणोपासनाकी उत्कृष्टता सूचित करनेवाली आख्यायिका

देवासुरा ह वै यत्र संयेतिरे उभये प्राजापत्या-
स्तद्ध देवा उद्गीथमाजह्रुरनेनैनानभिभविष्याम
इति ॥ १ ॥

प्रसिद्ध है, [पूर्वकालमें] प्रजापतिके पुत्र देवता और असुर किसी कारणवश परस्पर युद्ध करने लगे। उनमेंसे देवताओंने यह सोचकर कि, इसके द्वारा इनका पराभव करेंगे, उद्गीथका अनुष्ठान किया ॥ १ ॥

| [आख्यायिकार्थनिर्वचनम्]<br>देवासुरा देवाश्चासुराश्च। देवा दीव्यतेर्द्योतनार्थस्य शास्त्रोद्भासिता इन्द्रियवृत्तयः। असुरास्तद्विपरीताः स्वेष्वेवासुषु विष्वग्विषयासु प्राणनक्रियासु रमणात्स्वाभाविक्यस्तमआत्मिका इन्द्रियवृत्तय एव। ह वा इति पूर्ववृत्तोद्भासकौ निपातौ। यत्र यस्मिन्निमित्त इतरेतरविषयापहारलक्षणे संये- | देवासुराः—देवता और असुरगण। 'देव' शब्द द्योतनार्थक 'दिव्' धातुसे सिद्ध हुआ है। इसका अभिप्राय शास्त्रालोकित इन्द्रियवृत्तियाँ हैं। तथा उसके विपरीत, जो अपने ही असुओं (प्राणों) में यानी विविध विषयोंमें जानेवाली प्राणनक्रियाओंमें (जीवनोपयोगी प्राणव्यापारोंमें) ही रमण करनेवाली होनेके कारण स्वभावसे ही तमोमयी इन्द्रियवृत्तियाँ हैं, वे ही 'असुर' कहलाती हैं। 'ह' और 'वै' ये पूर्ववृत्तान्तको सूचित करनेवाले निपात हैं। 'यत्र' जिस निमित्तसे अर्थात् एक-दूसरेके विषयोंके अप- |

४८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १ ]

४८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १ ]


संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
तिरे । संपूूर्वस्य यततेः सङ्ग्रामार्थत्वमिति सङ्ग्रामं कृतवन्त इत्यर्थः ।हरणरूप जिस किसी निमित्तसे संयत हुए । 'सम्' उपसर्गपूर्वक 'यत्' धातुका अर्थ संग्राम होनेके कारण इसका अभिप्राय 'उन्होंने संग्राम किया'—ऐसा समझना चाहिये ।
शास्त्रीयप्रकाशवृत्त्यभिभवनाय प्रवृत्ताः स्वाभाविक्यस्तमोरूपा इन्द्रियवृत्तयोऽसुराः । तथा तद्विपरीताः शास्त्रार्थविषयविवेकज्योतिरात्मानो देवाः स्वाभाविकतमोरूपासुराभिभवनाय प्रवृत्ता इत्यन्योन्याभिभवोद्भवस्वरूपः सङ्ग्राम इव सर्वप्राणिषु प्रतिदेहं देवासुरसङ्ग्रामोऽनादिकालप्रवृत्त इत्यभिप्रायः । स इह श्रुत्याख्यायिकारूपेण धर्माधर्मोत्पत्तिविवेकविज्ञानाय कथ्यते प्राणविशुद्धिविज्ञानविधिपरतया ।शास्त्रीय प्रकाशवृत्तिका पराभव करनेके लिये प्रवृत्त हुई स्वभावसे ही तमोरूपा इन्द्रियवृत्तियाँ असुर हैं । तथा उनके विपरीत शास्त्रार्थविषयक विवेकज्योतिःस्वरूप देवगण स्वाभाविक तमोरूप असुरोंका पराभव करनेके लिये प्रवृत्त हैं । इस प्रकार परस्परकी वृत्तियोंके अभिभव-उद्भवस्वरूप संग्रामके समान यह देवासुर-संग्राम अनादिकालसे सम्पूर्ण प्राणियोंमें प्रत्येक देहमें होता आ रहा है—ऐसा इसका अभिप्राय है । यहाँ श्रुति धर्माधर्मकी उत्पत्तिके विवेकका बोध करानेके लिये प्राणोंकी विशुद्धिके विज्ञानका विधान करते हुए आख्यायिका-रूपसे उसीका वर्णन कर रही है ।
अत उभयेऽपि देवासुराः प्रजापतेरपत्यानीति प्राजापत्याः। प्रजापतिःकर्मज्ञानाधिकृतः पुरुषःइसीसे ये देवता और असुर, दोनों प्रजापतिके पुत्र हैं इसलिये प्राजापत्य, "पुरुष ही उक्थ है, यही महान् प्रजापति है" इस अन्य श्रुतिके अनुसार प्रजापति, कर्म और ज्ञान

खण्ड २ ] • शाङ्करभाष्यार्थ • ४९


“पुरुष एवोक्थमयमेव महान्प्रजापतिः” इति श्रुत्यन्तरात्। तस्य हि<br><br>शास्त्रीयाः स्वाभावक्यश्च करणवृत्तयो विरुद्धा अपत्यानीव, तदुद्भवत्वात्।<br><br>तत्तत्रोत्कर्षापकर्षलक्षणनिमित्ते<br><br>ह देवा उद्गीथमुद्गीथभक्त्युपलक्षितमौद्गात्रं कर्माजह्रुराहृतवन्तः।<br><br>तस्यापि केवलस्याहरणासंभवा-<br><br>ज्ज्योतिष्टोमाद्याहृतवन्त इत्यभिप्रायः। तत्किमर्थमाजहुः ? इत्युच्यते—अनेन कर्मणैनानसुरानभिभविष्याम इत्येवमभिप्रायाः सन्तः॥ १॥( उपासना ) के अधिकारी पुरुषका नाम है [ ब्रह्माका नहीं ]। उसीकी शास्त्रीय और स्वाभाविक—ये परस्पर-विरुद्ध इन्द्रियवृत्तियाँ संतानके समान हैं, क्योंकि इनका आविर्भाव उसीसे होता है।<br><br>उत्कर्ष-अपकर्षरूप निमित्तके कारण होनेवाले उस संग्राममें देवताओंने उद्गीथका यानी उद्गीथ-भक्तिसे उपलक्षित उद्गाताके कर्मका आहरण—अनुष्ठान किया। अकेले उसीका अनुष्ठान होना असम्भव होनेके कारण उन्होंने ज्योतिष्टोम आदिका अनुष्ठान किया—ऐसा इसका अभिप्राय है। उन्होंने उसका अनुष्ठान किसलिये किया ? यह बतलाया जाता है—इस कर्मसे हम इन असुरोंका पराभव कर देंगे—ऐसे अभिप्रायवाले होकर [ उन्होंने उद्गीथका अनुष्ठान किया ] ॥१॥

घ्राणादिका सदोषत्व

यदा च तदुद्गीथं कर्माजिहीर्षवस्तदा—जिस समय उन्होंने उस उद्गीथ-कर्मका अनुष्ठान करना चाहा उस समय—

५० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १

५० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १


ते ह नासिक्यं प्राणमुद्गीथमुपासांचक्रिरे ।
तँ हासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात्तेनोभयं जिघ्रति सुरभि च दुर्गन्धि च पाप्मना ह्येष विद्धः ॥ २ ॥

उन्होंने नासिकामें रहनेवाले प्राणके रूपमें उद्गीथकी उपासना की। किन्तु असुरोंने उसे पापसे विद्ध कर दिया। इसीसे वह सुगन्ध और दुर्गन्ध दोनोंको सूँघता है, क्योंकि वह पापसे बिंधा हुआ है ॥२॥

| ते ह देवा नासिक्यं नासिकायां भवं प्राणं चेतनावन्तं घ्राणं प्राणमुद्गीथकर्तारमुद्गातारमुद्गीथभक्त्योपासांचक्रिरे कृतवन्त इत्यर्थः। नासिक्यप्राणदृष्ट्योद्गीथाख्यमक्षरमोङ्कारमुपासांचक्रिर इत्यर्थः। एवं हि प्रकृतार्थपरित्यागोऽप्रकृतार्थोपादानं च न कृतं स्यात्। 'खल्वेतस्यैवाक्षरस्य' इत्योङ्कारो ह्युपास्यतया प्रकृतः। <br><br> ननूद्गीथोपलक्षितं कर्माहृतवन्त इत्यवोचः, इदानीमेव कथं नासिक्यप्राणदृष्ट्योङ्कारमुपासांचक्रिर इत्यात्थ ? | प्रसिद्ध है, उन देवताओंने नासिक्य—नासिकामें रहने वाले प्राण यानी चेतनावान् घ्राणेन्द्रियकी, जो उद्गीथकर्ता—उद्गाता है, उद्गीथ-भक्तिसे उपासना की, तात्पर्य यह है कि उद्गीथसंज्ञक ओंकार अक्षरकी नासिकामें रहनेवाले प्राणके रूपमें उपासना की। इस प्रकार प्रकृत अर्थ-का परित्याग और अप्रकृत अर्थका ग्रहण नहीं करना पड़ता; क्योंकि 'खल्वेतस्यैवाक्षरस्य' इस श्रुतिवचन-के अनुसार यहाँ उपास्यरूपसे ओंकारका ही प्रकरण है। <br><br> शंका—किंतु तुमने तो कहा था कि उन्होंने 'उद्गीथ' शब्दसे उप-लक्षित कर्मका अनुष्ठान किया। अब ऐसा क्यों कहते हो कि उद्गीथ-संज्ञक ओंकार अक्षरकी ही नासिकामें स्थित प्राणके रूपमें उपासना की ? |

खण्ड २ ]शाङ्करभाष्यार्थ५१
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
नैष दोषः; उद्गीथकर्मण्येव हि तत्कर्तृप्राणदेवतादृष्ट्योद्गीथभक्त्यवयवश्चोङ्कार उपास्यत्वेन विवक्षितो न स्वतन्त्रः। अतस्तादर्थ्येन कर्माहृतवन्त इति युक्तमेवोक्तम्।**समाधान—**यह कोई दोष नहीं हैं, क्योंकि यहाँ उद्गीथ कर्ममें ही उसका कर्ता जो प्राणदेवता है उसीकी दृष्टिसे उद्गीथभक्तिका अवयवभूत ओंकार उपास्यरूपसे विवक्षित है—स्वतन्त्र ओंकार नहीं। अतः उसीके लिये उद्गाताके कर्मका अनुष्ठान किया—ऐसा जो कहा है वह उचित ही है।
तमेवं देवैर्वृतमुद्गातारं हासुराः स्वाभाविकतम आत्मानो ज्योतीरूपं नासिक्यं प्राणं देवं स्वोत्थेन पाप्मना धर्मासङ्गरूपेण विविधुर्विद्धवन्तः संसर्गं कृतवन्त इत्यर्थः। स हि नासिक्यः प्राणः कल्याणगन्धग्रहणाभिमानासङ्गाभिभूतविवेकविज्ञानो बभूव। स तेन दोषेण पाप्मसंसर्गी बभूव। तदिदमुक्तमसुराः पाप्मना विविधुरिति।देवताओंसे इस प्रकार वरण किये हुए उस उद्गाता ज्योतिःस्वरूप नासिकास्थित प्राणदेवको स्वभावसे ही तमोमय असुरोंने अधर्म और आसक्तिरूप अपने पापसे बेध दिया; अर्थात् उससे संयुक्त कर दिया। वह जो नासिकास्थित प्राण है उसमें पुण्य गन्धको ग्रहण करनेके अभिमान और आसक्तिरूप दोष आ जानेसे उसके विवेक और विज्ञानका अभाव हो गया। उस दोषके कारण वह पापसे संसर्ग रखनेवाला हो गया। इसीसे यह कहा है कि असुरोंने उसे पापसे विद्ध कर दिया।
यस्मादासुरेण पाप्मना विद्धस्तस्मात्तेन पाप्मना प्रेरितो घ्राणः प्राणो दुर्गन्धग्राहकः प्राणिनाम्। अतस्तेनोभयं जिघ्रति लोकःक्योंकि प्राण आसुर पापसे विद्ध है इसलिये उस पापसे प्रेरित हुआ ही वह प्राणियोंका घ्राणसंज्ञक प्राण दुर्गन्धको ग्रहण करनेवाला है। इसीसे लोक सुगन्धि और दुर्गन्धि

५२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १

५२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १


| सुरभि च दुर्गन्धि च पाप्मना ह्येष यस्माद्विद्धः। उभयग्रहणमविवक्षितम्, 'यस्योभयं हविरार्तिमार्च्छति' इति यद्वत्। <br><br> "यदेवेदमप्रतिरूपं जिघ्रति" (बृ० उ० १।३।३) इति समानप्रकरणश्रुतेः॥ २ ॥ | दोनोंहीको सूँघता है, क्योंकि यह पापसे बिंधा हुआ है। जिस प्रकार "जिसकी द्रवात्मक एवं पुरोडाशात्मक दोनों हवियाँ दूषित हो जायँ (वह इन्द्र देवताके लिये पाँच सकोरोंमें भात अर्पण करे)" इसवाक्यमें 'दोनों' पद विवक्षित नहीं है; उसी प्रकार यहाँ भी 'उभय' पदका ग्रहण करना इष्ट नहीं है।* [बृहदारण्यक-श्रुतिमें भी] इसीके समान प्रकरणमें यही सुना गया है कि "जो इस प्रतिकूल गन्धको सूँघता है।" [इससे भी यही सिद्ध होता है कि यहाँ 'उभय' शब्दको ग्रहण करना उचित नहीं है] ॥२॥ |


अथ ह वाचमुद्गीथमुपासांचक्रिरे। ताँहासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात्तयोभयं वदति सत्यं चानृतं च पाप्मना ह्येषा विद्धा ॥ ३ ॥

फिर उन्होंने वाणीके रूपमें उद्गीथकी उपासना की। किंतु असुरोंने उसे पापसे विद्ध कर दिया। इसीसे लोक उसके द्वारा सत्य और मिथ्या दोनों बोलता है, क्योंकि वह पापसे बिंधी हुई है ॥ ३ ॥

अथ ह चक्षुरुद्गीथमुपासांचक्रिरे । तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात्तेनोभयं पश्यति दर्शनीयं चादर्शनीयं च पाप्मना ह्येतद्विद्धम् ॥ ४ ॥


१. द्रवात्मक या पुरोडाशात्मक किसी एक प्रकारकी हवि भी यदि काक आदि के स्पर्शसे दूषित हो जाय तो उसके लिये प्रायश्चित्तकी आवश्यकता होती है, फिर उपर्युक्त वाक्यमें दोनों हवियोंके दूषित होनेपर प्रायश्चित्तकी व्यवस्था क्यों बतायी गयी। अवश्य ही वहाँ 'दोनों' (उभयम्) पद अनावश्यक या अविवक्षित है।
* क्योंकि 'पापसे विद्ध होनेके कारण लोक दुर्गन्धको ग्रहण करता है।' केवल इतना ही कहना उचित है।

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५३


फिर उन्होंने चक्षुके रूपमें उद्गीथकी उपासना की। असुरोंने उसे भी पापसे विद्ध कर दिया। इसीसे लोक उससे देखनेयोग्य और न देखनेयोग्य दोनों प्रकारके पदार्थोंको देखता है, क्योंकि वह (चक्षु-इन्द्रिय) पापसे बिंधा हुआ है ॥ ४ ॥

अथ ह श्रोत्रमुद्गीथमुपासांचक्रिरे । तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात्तेनोभयँ शृणोति श्रवणीयं चाश्रवणीयं च पाप्मना ह्येतद्विद्धम् ॥ ५ ॥

फिर उन्होंने श्रोत्रके रूपमें उद्गीथकी उपासना की। असुरोंने उसे भी पापसे बेध दिया। इसीसे लोक उससे सुननेयोग्य और न सुननेयोग्य दोनों प्रकारकी बातोंको सुनता है, क्योंकि वह (श्रोत्रेन्द्रिय) पापसे बिंधा हुआ है ॥ ५ ॥

अथ ह मन उद्गीथमुपासांचक्रिरे । तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात्तेनोभयँ संकल्पयते संकल्पनीयं चासंकल्पनीयं च पाप्मना ह्येतद्विद्धम् ॥ ६ ॥

फिर उन्होंने मनके रूपमें उद्गीथकी उपासना की। असुरोंने उसे भी पापसे बेध दिया। इसीसे उसके द्वारा लोक संकल्प करनेयोग्य और संकल्प न करनेयोग्य दोनोंहीका संकल्प करता है, क्योंकि वह पापसे बिंधा हुआ है ॥ ६ ॥

| मुख्यप्राणस्योपास्यत्वाय तद्विशुद्धत्वानुभवार्थोऽयं विचारः श्रुत्या प्रवर्तितः। अतश्चक्षुरादि- | मुख्य प्राणको उपास्य सिद्ध करनेके लिये उसकी विशुद्धताका अनुभव करानेके प्रयोजनसे श्रुतिने इस विचारका आरम्भ किया है। अतः चक्षु आदि |

५४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १

५४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १

| देवताः क्रमेण विचार्यासुरेण पाप्मना विद्धा इत्यपोह्यन्ते । समानमन्यत् । अथ ह वाचं चक्षुः श्रोत्रं मन इत्यादि । अनुक्ता अप्यन्यास्त्वग्रसनादिदेवता द्रष्टव्याः “एवमु खल्वेता देवताः पाप्मभिः”(बृ०उ० १।३।६) इति श्रुत्यन्तरात्॥ ३–६॥ | देवता आसुर पापसे विद्ध हैं—इस प्रकार क्रमशः विचार करके उनका अपवाद किया जाता है। शेष सब भी इसीके समान हैं। इसी प्रकार उन्होंने वाक्, चक्षु, श्रोत्र और मन आदिको भी [पापसे विद्ध कर दिया] “इस प्रकार निश्चय ही ये देवता पापसे संयुक्त हैं” इस अन्य श्रुतिके अनुसार, यहाँ जिनका नाम नहीं लिया गया है, उन त्वक् एवं रसना आदि अन्य देवताओंको भी ऐसे ही पापविद्ध समझना चाहिये ॥ ३–६ ॥ |

—: ० :—

मुख्य प्राणद्वारा असुरोंका पराभव

आसुरेण विद्धत्वादघ्राणादिदेवता अपोह्य—आसुर पापसे विद्ध होनेके कारण घ्राणादि देवताओंका त्याग कर—

अथ ह य एवायं मुख्यः प्राणस्तमुद्गीथमुपासांचक्रिरे । तँहासुरा ऋत्वा विदध्वंसुर्यथाश्मानमाखणमृत्वा विध्वंसेत ॥ ७ ॥

फिर यह जो प्रसिद्ध मुख्य प्राण है उसीके रूपमें उद्गीथकी उपासना की। उस (प्राणके) समीप पहुँचकर असुरगण इस प्रकार विध्वस्त हो गये जैसे दुर्भेद्य पाषाणके पास पहुँचकर मिट्टीका ढेला नष्ट हो जाता है ॥७॥

अथानन्तरं य एवायं प्रसिद्धो मुखे भवो मुख्यः प्राणस्तमुद्गीथमुपासांचक्रिरे । तं हासुराः पूर्व-अथ--इसके पश्चात् जो कि यह प्रसिद्ध मुख्य—मुखमें रहनेवाला प्राण है उसीके रूपमें उद्गीथकी उपासना की । असुरगण पूर्ववत्
खण्ड २ ]शाङ्करभाष्यार्थ५५

| बद्दृत्वा प्राप्य विदध्वंसुर्विनेशुः, अभिप्रायमात्रेण, अकृत्वा किंचिदपि प्राणस्य । <br> कथं विनेशुः ? इत्यत्र दृष्टान्तमाह—यथा लोकेऽश्मानमाखणं—न शक्यते खनितुं कुद्दालादिभिरपि, टङ्कैश्चच्छेत्तुं न शक्योऽखणः, अखण एव आखणस्तमृत्वा सामर्थ्याल्लोष्टः पांसुपिण्डः श्रुत्यन्तराच्चाश्मनि क्षिप्तोऽश्मभेदनाभिप्रायेण तस्याश्मनः किंचिदप्यकृत्वा स्वयं विध्वंसेत विदीर्येतैव विद्ध्वंसुरित्यर्थः । एवं विशुद्धोऽसुरैरधर्षितत्वात् प्राण इति ॥ ७ ॥ | उसे प्राप्त होते ही—प्राणका कुछ भी न बिगाड़कर केवल उसे विद्ध करनेका संकल्प करके ही विध्वस्त हो गये । <br> वे किस प्रकार नष्ट हो गये ? इसमें दृष्टान्त कहते हैं—जिस प्रकार लोकमें आखण—पाषाणको प्राप्त होकर—जिसे कुद्दालादिसे भी न खोदा जा सके तथा जो टाँकियोंसे भी छिन्न न किया जा सके उसे 'अखण' कहते हैं, 'अखण' ही 'आखण' (अभेद्य) कहा गया है उसीको प्राप्त होकर अर्थात् पाषाणकी ओर उसे फोड़नेके अभिप्रायसे फेंका हुआ लोष्ट-पांसुपिण्ड यानी मिट्टीका ढेला उस पत्थरका कुछ भी न बिगाड़ कर स्वयं नष्ट हो जाता है उसी प्रकार वे असुर भी विनष्ट हो गये । इस प्रकार असुरोंसे पराभूत न होनेके कारण मुख्य प्राण शुद्ध रहा—यह इसका तात्पर्य है । यहाँ प्रकरणके सामर्थ्यसे और दूसरी श्रुतिके अनुसार 'लोष्ट' शब्द अध्याहृत किया गया है। ७। |


प्राणोपासकका महत्त्व

एवंविदः प्राणात्मभूतस्येदं फलमाह—इस प्रकार जाननेवाले प्राणात्मभूत व्यक्तिके लिये श्रुति यह फल बतलाती है—

५६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १

५६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १


एवं यथाऽश्मानमाखणमृत्वा विध्वꣳसत एवꣳहैव स विध्वꣳसते य एवंविदि पापं कामयते यश्चैनमभिदासति स एषोऽश्माखणः ॥ ८ ॥

जिस प्रकार [ मिट्टीका ढेला ] दुर्भेद्य पाषाणको प्राप्त होकर विनष्ट हो जाता है उसी प्रकार वह व्यक्ति नाशको प्राप्त हो जाता है जो इस प्रकार जाननेवाले पुरुषके प्रति पापाचरणकी कामना करता है अथवा जो इसको कोसता या मारता है; क्योंकि यह प्राणोपासक अभेद्य पाषाण ही है॥ ८॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
यथाश्मानमिति, एष एव दृष्टान्तः; एवं हैव स विध्वंसते विनश्यति; कोऽसौ? इत्याह—य एवंविदि यथोक्तप्राणविदि पापं तदनर्हं कर्तुं कामयत इच्छति यश्चाप्येनमभिदासति हिनस्ति प्राणविदं प्रत्याक्रोशताडनादि प्रयुङ्क्ते सोऽप्येवमेव विध्वंसत इत्यर्थः। यस्मात्स एष प्राणवित् प्राणभूतत्वादश्माखण इवाश्माखणोऽधर्षणीय इत्यर्थः।**जिस प्रकार पाषाणको प्राप्त होकर इत्यादि—**यही इसमें दृष्टान्त है। उसी प्रकार निश्चय ही वह नष्ट हो जाता है; कौन नष्ट हो जाता है? सो बतलाते हैं—जो इस प्रकार पूर्वोक्त प्राणको जाननेवाले उपासकके प्रति उसके अयोग्य **पापाचरण करनेकी कामना—**इच्छा **करता है; तथा जो इसका हनन करता है—**इस प्राणवेत्ताके प्रति गाली-गलौज एवं ताडनादिका प्रयोग करता है वह भी इसी प्रकार नष्ट हो जाता है—यह इसका अभिप्राय है; क्योंकि वह प्राणवेत्ता प्राणस्वरूप होनेके कारण दुर्भेद्य पाषाणके समान दुर्भेद्य पाषाण अर्थात् दुर्धर्ष है।

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७


ननु नासिक्योऽपि प्राणो वा-<br>य्वात्मा यथा मुख्यस्तत्र नासि-<br>क्यः प्राणः पाप्मना विद्धः प्राण<br>एव सन्न मुख्यः कथम् ?<br><br>नैष दोषः; नासिक्यस्तु स्थान-<br>करणवैगुण्याद्विद्धो वाय्वात्मापि<br>सन्; मुख्यस्तु तदसंभवात्<br>स्थानदेवताबलीयस्त्वाच्च विद्ध<br>इति युक्तम् । यथा वास्याद् यः<br>शिक्षावत्पुरुषाश्रयाः कार्यविशेषं<br>कुर्वन्ति नान्यहस्तगतास्तद्वद्द्दोष-<br>बद्घ्राणसचिवत्वाद्विद्धा घ्राण-<br>देवता न मुख्यः ॥ ८ ॥शंका—जैसा कि मुख्य प्राण है उसी प्रकार नासिकास्थित प्राण भी तो वायुरूप ही है; किंतु प्राणरूप होते हुए भी केवल नासिकागत प्राण ही पापसे विद्ध है, मुख्य प्राण नहीं है—सो कैसे ?<br><br>समाधान—यह कोई दोष नहीं है। नासिकामें रहनेवाला प्राण तो वायुरूप होनेपर भी स्थानावच्छिन्न इन्द्रियके दोषके कारण असुरोंद्वारा पापसे विद्ध हो गया है; किंतु मुख्य प्राण आश्रयदोषकी असम्भवताके कारण तथा स्थानदेवतासे प्रबलतर होनेके कारण पापसे विद्ध नहीं हुआ—यह उचित ही है। जिस प्रकार बसूला आदि औजार सुशिक्षित पुरुषके हाथमें रहनेपर विशेष कार्य करते हैं, किंतु दूसरेके हाथमें पड़नेपर वैसा नहीं करते, उसी प्रकार दोषयुक्त घ्राणका साथी होनेके कारण घ्राणदेवता पापसे विद्ध है और मुख्य प्राण पापविद्ध नहीं है ॥ ८ ॥
यस्मान्न विद्धोऽसुरैर्मुख्यस्त-<br>स्मात्—क्योंकि मुख्य प्राण असुरोंद्वारा पापविद्ध नहीं हुआ, इसलिये—

५८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १

५८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १
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नैवैतेन सुरभि न दुर्गन्धि विजानात्यपहतपाप्मा ह्येष तेन यदश्नाति यत्पिबति तेनेतरान्प्राणानवति । एतमु एवान्ततोऽवित्त्वोत्क्रामति व्याददात्येवान्तत इति ॥ ९ ॥

लोक इस (मुख्य प्राण) के द्वारा न सुगन्धको जानता है और न दुर्गन्धको ही जानता है; क्योंकि यह पापसे पराभूत नहीं है। अतः यह जो कुछ खाता या पीता है उससे अन्य प्राणोंका (इन्द्रियोंका) पोषण करता है। अन्तमें इस मुख्य प्राणको प्राप्त न होनेके कारण ही [घ्राणादि प्राणसमूह] उत्क्रमण करता है और इसीसे अन्तमें पुरुष मुख फाड़ देता है ॥ ९ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
नैवैतेन सुरभि दुर्गन्धि वा विजानाति घ्राणेनैव तदुभयं विजानाति लोकः। अतश्च पाप्मकार्यादर्शनादपहतपाप्माप-हतो विनाशितोऽपनीतः पाप्मा यस्मात्सोऽयमपहतपाप्मा ह्येष विशुद्ध इत्यर्थः।लोक इस मुख्य प्राणके द्वारा न सुगन्धको जानता है और न दुर्गन्ध-को ही, इन दोनोंको वह घ्राणके द्वारा ही जानता है। अतः पापका कार्य न देखे जानेके कारण यह अपहतपाप्मा है—जिससे पाप अपहत-विनाशित अर्थात् दूर कर दिया गया है वह यह मुख्य प्राण अपहतपाप्मा अर्थात् विशुद्ध है।
यस्माच्चात्मंभरयः कल्याणा-द्यासङ्गवत्त्वाद्व्राणादयो न तथात्मंभरिर्मुख्यः, किं तर्हि ? सर्वार्थः कथम् ? इत्युच्यते—तेन मुख्येन यदश्नाति यत्पिबतिक्योंकि घ्राणादि इन्द्रियाँ अपने-अपने कल्याणमें आसक्त होनेके कारण अपना ही पोषण करनेवाली हैं और मुख्य प्राण उस प्रकार अपना ही पोषण करनेवाला नहीं है; तो फिर वह कैसा है ? वह तो सभीका हितकारी है। किस प्रकार ? सो बतलाया जाता है—उस मुख्य
खण्ड २ ]शाङ्करभाष्यार्थ५९

| लोकस्तेनाशितेन पीतेन चेतरान् घ्राणादीनवति पालयति। तेन हि तेषां स्थितिर्भवतीत्यर्थः। अतः सर्वंभरिः प्राणोऽतो विशुद्धः।<br><br>कथं पुनर्मुख्याशितपीताभ्यां स्थितिरेषां गम्यते ? इत्युच्यते-<br>एतं मुख्यं प्राणम्, मुख्यप्राणस्य वृत्तिमन्नपाने इत्यर्थः, अन्ततोऽन्ते मरणकालेऽवित्त्वालब्ध्वोत्क्रामति घ्राणादिप्राणसमुदाय इत्यर्थः। अप्राणो हि न शक्नोत्यशितुं पातुं वा। तेन तदोत्क्रान्तिः प्रसिद्धा घ्राणादिकलापस्य।<br><br>दृश्यते ह्युत्क्रान्तौ प्राणस्याशिशिषा। अतो व्याददात्येवास्यविदारणं करोतीत्यर्थः। तद्ध्यन्नालाभ उत्क्रान्तस्य लिङ्गम् ॥९॥ | प्राणके द्वारा लोग जो कुछ खाते-पीते हैं उस खाये-पीयेसे वह मुख्य प्राण घ्राणादि दूसरे प्राणोंका पोषण करता है, क्योंकि उसीसे उन सब-की स्थिति होती है। इसलिये मुख्य प्राण सभीका पोषण करनेवाला है, अतः वह विशुद्ध है।<br><br>किंतु मुख्य प्राणाद्वारा खाये-पीये पदार्थोंसे अन्य प्राणोंकी स्थिति किस प्रकार जानी जाती है ? सो बतलाते हैं—इस मुख्य प्राणको अर्थात् इस मुख्य प्राणकी वृत्तिरूप अन्न-पानको न पाकर ही अन्त समय—मरण-कालमें घ्राणादि इन्द्रिय-समुदाय उत्क्रमण करता है, क्योंकि प्राणहीन पुरुष खाने या पीनेमें समर्थ नहीं होता। इसीसे उस समय घ्राणादि इन्द्रिय-समुदायकी उत्क्रान्ति प्रसिद्ध है। उत्क्रमणके समय प्राणकी भोजन करनेकी इच्छा स्पष्ट देखी जाती है। इसीसे उस समय वह मुख बा देता है। यही उत्क्रमण करनेवाले घ्राणादिको अन्नादि प्राप्त न होनेका चिह्न है ॥ ९ ॥ |

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प्राणकी आङ्गिरस संज्ञा होनेमें हेतु

तꣳ हाङ्गिरा उद्गीथमुपासांचक्र एतमु एवाङ्गिरसं मन्यन्तेऽङ्गानां यद्रसः ॥ १० ॥

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६० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १

६०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १

अङ्गिरा ऋषि‍ने इस [मुख्य प्राण] के ही रूपमें उद्गीथकी उपासना की थी। अतः इस प्राणको ही आङ्गिरस मानते हैं, क्योंकि यह सम्पूर्ण अङ्गोंका रस है ॥ १० ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
तं हाङ्गिरास्तं मुख्यं प्राणं हाङ्गिरा इत्येवंगुणमुद्गीथमुपासांचक्रे उपासनं कृतवान्बको दाल्भ्य इति वक्ष्यमाणेन संबध्यते । तथा बृहस्पतिरिति, आयास्य इति चोपासांचक्रे बक इत्येवं संबन्धं कृतवन्तः केचित्; 'एतमु एवाङ्गिरसं बृहस्पतिमायास्यं प्राणं मन्यन्ते' इति वचनात् ।<br><br>भवत्येवं यथाश्रुतासंभवे संभवति तु यथाश्रुतम्, ऋषिचोदनायामपि श्रुत्यन्तरवत्; "तस्माच्छतर्चिन इत्याचक्षत एतमेव सन्तमृषिमपि" । तथा माध्यमो गृत्समदो विश्वामित्रो वामदेवोऽत्रिरित्यादीन् ऋषीनेव प्राणमापादयति श्रुतिः । तथैतानप्यृषीन् प्राणोपासकानङ्गिरोबृहस्पत्यायास्यान्प्राणं करोत्यभेदविज्ञानाय'तं हाङ्गिराः' अर्थात् अङ्गिरा-ऐसे गुणवाले इस मुख्य प्राणरूप उद्गीथकी दाल्भ्य बकने उपासना की—इस प्रकार इसका आगेसे सम्बन्ध है। तथा किसी-किसीने 'दलभपुत्र बकने बृहस्पति और आयास्यगुणवाले प्राणरूप उद्गीथकी उपासना की'—इस तरह इसका सम्बन्ध लगाया है; क्योंकि यहाँ 'इस प्राणको ही आङ्गिरस बृहस्पति और आयास्य मानते हैं' ऐसा वचन है ।<br><br>ठीक है, यदि यथाश्रुत अर्थ (श्रुतिका सरलार्थ) सम्भव न हो तो ऐसा [दूरान्वयी] अर्थ भी लिया जा सकता है । किंतु यहाँ तो "अतः ऋषि होनेपर भी इसे (प्राणको) 'शतर्चिन' ऐसा कहकर पुकारते हैं" इस अन्य श्रुतिके अनुसार ऋषियोंका प्रतिपादन करनेमें प्रवृत्त यथाश्रुत अर्थ भी सम्भव है ही । इसी प्रकार श्रुति माध्यम, गृत्समद, विश्वामित्र, वामदेव और अत्रि आदि ऋषियोंको ही प्राणभावकी प्राप्ति कराती है; ऐसे ही प्राण ही पिता है; प्राण ही माता है' इत्यादिके समान अङ्गिरा,