चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् ३२७
अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् ३२७
निवृत्तेऽपि ज्वरे तस्माद्यथावस्थं यथाबलम् ।
यथाप्राणं हरेद्दोषं प्रयोगैर्वा शमं नयेत् ॥ ३३९ ॥
मृदुभिः शोधनैः शुद्धिर्यापना वस्तयो हिताः ।
हिताश्च लघवो यूषा जाङ्गलामिषजा रसाः ॥ ३४० ॥
अभ्यङ्गोद्वर्त्तनस्नानधूपनाभ्यञ्जनानि च ।
हितानि पुनरावृत्ते ज्वरे तिक्तघृतानि च ॥ ३४१ ॥
गुर्व्यभिष्यन्द्यसात्म्यानां भोजनात्पुनरागते ।
लङ्घनोष्णोपचारादिः क्रमः कार्यश्च पूर्ववत् ॥ ३४२ ॥
किराततिक्तं तिक्ता मुस्तं पर्पटकोऽमृता ।
घ्नन्ति पीतानि चाभ्यासात्पुनरावर्तकं ज्वरम् ॥ ३४३ ॥
तस्यां तस्यामवस्थायां ज्वरितानां विचक्षणः ।
ज्वरक्रियाक्रमापेक्षी कुर्यात्तत्र चिकित्सितम् ॥ ३४४ ॥
रोगराट् सर्वभूतानामन्तकृद्दारुणो ज्वरः ।
तस्माद्विशेषतस्तस्य यतेत प्रशमं भिषक् ॥ ३४५ ॥ इति ।
( ३ ) ज्वर से मुक्त पुरुष के लक्षण—क्लम ( थकान ) और सन्ताप से
रहित, व्यथा से रहित, प्रसन्न इन्द्रियों वाले, स्वाभाविक मन वाले पुरुष को ज्वर
से मुक्त समझना चाहिये ।
( ४ ) ज्वर वाले और ज्वर से मुक्त दोनो पुरुषो को चाहिये कि विदाही,
गुरु, असात्म्य अन्नपान और विरुद्ध भोजन का परित्याग कर दे । इसी प्रकार से
व्यवाय ( स्त्रीसंग ), अधिक चलना-फिरना, स्नान, अधिक खाना
इनका भी परित्याग करे । इस प्रकार करने से ज्वर शान्त हो जाता है और
फिर दुबारा नहीं होता । ( ५ ) ज्वर से उठे रोगी जब तक बलवान् न हो तब
तक व्यायाम, मैथुन, स्नान और घूमना-फिरना परित्याग कर देवे । ज्वर से मुक्त
निर्बल व्यक्ति यदि इनका सेवन करे, तो ज्वर पुनः लौट आता है । (६) दोषों
के भली प्रकार बाहर न निकलने पर जो ज्वर शान्त हो जाता है, वह थोडे से
भी मिथ्या आहार-विहार से पुन आ जाता है । पुन लोट कर आया ज्वर देर
से पीडित, निर्बल, कमजोरमन वाले, पुरुष को शीघ्र.ही मार देता है । (७) अथवा
अवशिष्ट दोष ज्वर का पुन न करके धातुओ मे धीरे वीरे पकते रहते है । वे
ज्वर को उत्पन्न करके अन्य हानियाँ करते है । जैसे—दीनता, शोथ, ग्लानि,
पाण्डुता, भोजन मे अनिच्छा, कण्डू ( खाज ), कोठ, पिडकाये और मन्दाग्नि
करते है । ( ८ ) इसी प्रकार से दोषो के सम्पूर्ण न निकलने पर जो रोग एक
३२८ चरकसंहिता [ अ० ४
बार नष्ट हो चुकते है, वे अहिताचरण से पुन हो जाते है। (६) इसलिये
ज्वर के उतर जाने पर भी अवस्था, बल और श क के अनुसार दोषो का
सशोधन अथवा प्रयोगो द्वार। इनका शमन करे। इसके लिये मृदु सशोधनो से
शुद्धि, मुस्तादि यापना वस्तियाँ, लघु गुणवाले यूष, जाँगल पशु पक्षियो का
मास-रस हितकारी है। इसी प्रकार अभ्यग, उबटन, स्नान, धूपन, अजन और
तिक्त द्रव्यो से सावित या पञ्चतिक्त घृत ज्वर के पुन होजाने पर हितकारी है।
(१०) जो ज्वर गुरु, अभिष्यन्दी और असात्म्य भोजन के सेवन से पुनः हुआ
हो उसके लिये लङ्घन और उष्ण उपचार आदि प्रथम कहा हुआ क्रम पूर्व की
भाँ ति बरते। (११) चिरायता, कुटकी, नागरमोथा, पित्त पापड़ा और गिलोय
इनका कषाय कुछ दिनो तक लगातार पीने से बार बार लौट कर आने वाला
ज्वर नष्ट हो जाता है। ज्वराक्रान्त रोगी की उस उस अवस्था मे ज्वर-चिकित्सा-
क्रम के अनुसार वैसी वैसी चिकित्सा कर । ज्वर रोगो का राजा है, सब प्राणियो
का अन्त करने वाला है, वह कष्टदायक है। इसलिये वैद्य इसकी शान्ति मे
विशेषतः प्रयत्न करे ॥३२६-३४५॥
तत्र श्लोकः—यथाक्रमं यथाप्रश्नमुक्त ज्वरचिकित्सितम् ।
अत्रिजेनाग्निवेशाय भूताना हितमिच्छता ॥ ३४६ ॥
भगवान् आत्रेय ने प्राणियो की हितकामना से अग्निवेश के प्रश्नो के क्रम से
ज्वर की चिकित्सा का वर्णन कर दिया है ॥ ३४६ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृते चिकित्सास्थाने
तृतीयोऽध्याय समाप्त ॥ ३ ॥
चतुर्थोऽध्यायः
ज्वर के सताप से रक्त-पित्त उत्पन्न होता है, इसलिये ज्वर के पीछे रक्त-
पित्त की चिकित्सा के लिये इस अध्याय का अवतरण करते है।
अथातो रक्तपित्तचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब हम 'रक्त-पित्त चिकित्सित' की व्याख्या करते है भगवान् आत्रेय ने ऐसा
उपदेश किया है ॥ १-२ ॥
अ० ४ ] चिकित्सितस्थानम् ३२६
अ० ४ ] चिकित्सितस्थानम् ३२६
विहरन्तं जितात्मानं पञ्चगङ्गे पुनर्वसुम् ।
प्रणम्योवाच निर्मोहमग्निवेशोऽग्निवर्चसम् ॥ ३ ॥
भगवन् रक्तपित्तस्य हेतुरुक्तः सलक्षणः ।
वक्तव्यं यत्परं तस्य वक्तुमर्हसि तद् गुरो ॥ ४ ॥
गुरुरुवाच—महागदं महावेगमग्निवच्छीघ्रकारि च ।
हेतुलक्षणविच्छीघ्रं रक्तपित्तमुपाचरेत् ॥ ५ ॥
तस्योष्णं तीक्ष्णमम्लं च कटूनि लवणानि च ।
घर्माश्चान्नविदाहश्च हेतुः पूर्वं निदर्शितः ॥ ६ ॥
तैर्हेतुभिः समुत्क्लिष्टं पित्तं रक्तं प्रपद्यते ।
तद्योनित्वात्प्रपन्नं च वर्धते तत्प्रदूषयेत् ॥ ७ ॥
तस्योष्मणा द्रवो धातुर्धातोर्धातोः प्रसिच्यते ।
स्विद्यतस्तेन संवृद्धिं भूयस्तदधिगच्छति ॥ ८ ॥
सयोगाद् दूषणात्तत्तु सामान्याद् गन्धवर्णयोः ।
रक्तस्य पित्तमाख्यातं रक्तपित्तं मनीषिभिः ॥ ९ ॥
प्लीहानं च यकृच्चैव तदधिष्ठाय वर्तते ।
स्रोतांसि रक्तवाहीनि तन्मूलानि हि देहिनाम् ॥ १० ॥
पञ्चगग (पजाब या पचनद) मे घूमते हुए जितेन्द्रिय, मोह से रहित,
अग्नि के समान तेजस्वी पुनर्वसु को अग्निवेश ने नमस्कार कर निवेदन किया—
हे भगवन् ! आपने प्रथम निदान-स्थान मे रक्त-पित्त के कारण और लक्षण
का उपदेश किया है। इसके आगे रक्त-पित्त के विषय मे जो कुछ और अधिक
कहना है, वह भी कृपा करके कहिये ।
भगवान् आत्रेय ने कहा—हेतु और लक्षणो को जानने वाले वैद्य का
चाहिये कि अति वेग वाले, अग्नि के समान शीघ्र प्राणनाशक, महारोग रक्त-पित्त
की चिकित्सा तुरन्त करे । इस रक्त-पित्त के कारण—उष्ण, तीक्ष्ण, अम्ल, कटु,
लवण, घर्म (गरमी) और अन्न का विदाह ये रक्त-पित्त के कारण निदानस्थान
मे कह दिये हैं। इन उपरोक्त कारणो मे प्रकुपित पित्त रक्तस्थान (यकृत् और
प्लीहा) मे पहुच जाता है। रक्त के प्रभवस्थान यकृत् और प्लीहा मे पहुच कर
पित्त बढता है और रक्त को भी दूषित करता है । इस पित्त की उष्णिामा से
मासादि धातुओ मे स्वेद होने से द्रव धातु (रक्त) चूने लगता है। इसी कारण
से रक्तभी मात्रा मे बढ जाता है।
रक्तपित्त नाम का कारण—रक्त के साथ सयुक्त होने के कारण, रक्त को
३३० चरकसंहिता [ अ० ४
दूषित करने और रक्त के समान ही गन्ध और वर्ण होने से बुद्धिमान् व्यक्ति
पित्त को 'रक्त-पित्त' कहते हैं। यह रक्त प्लीहा और यकृत् का आश्रय लेकर
प्रवृत्त होता है। मनुष्यों के देह में रक्तवाही स्रोतों के मूल ये ही यकृत् और
प्लीहा हैं ॥ ३-१० ॥
सान्द्रं सपाण्डु सस्नेहं पिच्छिलं च कफान्वितम् ।
श्यावारुणं सफेनं च तनु रूक्षं च वातिकम् ॥ ११ ॥
रक्तपित्तं कषायाभं कृष्णं गोमूत्रसन्निभम् ।
मेचकागारधूमाभमञ्जनाभं च पैत्तिकम् ॥ १२॥
संसृष्टलिङ्गं संसर्गात् त्रिलिङ्गं सान्निपातिकम् ।
कफ आदि दोषों के संसर्ग—रक्त-पित्त में यदि कफ का भी मिश्रण हो तो
रक्त का रंग पाण्डुवर्ण, रक्त घट्ट ( गाढा, ) स्नेहयुक्त और चिकनास वाला होता
है । यदि वायु का योग होता काला-लाल सा, झागयुक्त, पतला और रूखा
होता है। पित्त की प्रबलता से रक्त-पित्त होता रक्त कषाय वर्ण की झलक वाला,
काला, गोमूत्र के समान, मेचक ( काला, चिकना ), गृहधूम, अञ्जन, काजल के
समान काला होता है, इसमे चमक रहती है। दो दोषों के मिलने पर उन दो
दोषों के लक्षण दीखते है और तीनो दोषों के मिलने पर सान्निपातिक लक्षण
दीखते है। [ जिस प्रकार सब गुल्मों मे वायु की प्रधानता रहने पर अन्य दोषों
के मिलने पर पित्तगुल्म आदि होते है, उसी प्रकार रक्तपित्त मे पित्त की प्रधा-
नता रहने पर भी पित्त-गुल्म आदि होते है। इनमे ऊर्ध्व गति वाले रक्तपित्त मे
कफ का मिश्रण और अधोगति वाले रक्तपित्त मे वायु का मिश्रण रहता है]॥११-१२-॥
एकदोषानुगं साध्यं द्विदोषं याप्यमुच्यते ॥ १३ ॥
यत् त्रिदोषमसाध्यं तन्मन्दाग्नेरतिवेगवत् ।
व्याधिभिः क्षीणदेहस्य वृद्धस्यानश्नतश्च यत् ॥ १४ ॥
साध्य-असाध्य—इनमे से जो रक्तपित्त एक दोष से सम्बन्धित होता है,
वह साध्य है। जिस रक्तपित्त मे दो दोष मिले रहते है वह याप्य है। जिसमे
तीनों दोषों का योग रहता है वह असाध्य है। इसी प्रकार से मन्दाग्निवाले
पुरुष मे एक दोष वाले रक्तपित्त का वेग यदि प्रबल हो तो वह भी असाध्य है।
इसी तरह रोगों के कारण निर्बल शरीरवाले व्यक्ति मे, वृद्ध पुरुष मे आहार
न करने वाले व्यक्ति से एक मार्ग वाला रक्तपित्त भी असाध्य है ॥१३-१४॥
गतिरूर्ध्वमधश्चैव रक्तपित्तस्य दर्शिता ।
ऊर्ध्वा सप्तविधद्वारा द्विद्वारा त्वधरा गतिः ॥ १५ ॥
सप्तच्छिद्राणि शिरसि, द्वे चाधः, साध्यमूर्ध्वगम् ।
अ० ४ ] चिकित्सास्थानम् ३३१
याप्यं त्वधोग, मागौ तु द्वावसाध्य प्रपद्यते ॥ १६ ॥
यदा तु सर्वच्छिद्रेभ्यो रोमकूपेभ्य एव च ।
वर्तते तामसङ्ख्येया गतिं तस्याऽऽहुराान्तिकाम् ॥ १७ ॥
यच्चोभयाभ्या मार्गाभ्यामतिमात्र प्रवर्तते ।
तुल्य कुणपगन्धेन रक्त कृष्णमतीव च ॥ १८ ॥
ससृष्ट कफवाताभ्या कण्ठे सज्जति चापि यन् ।
यच्चायुपद्रवैः सर्वैर्यथोक्तैः समभिद्रुतम् ॥ १९ ॥
हारिद्रनीलहरितताम्रैर्वर्णैरुपद्रुतम् ।
क्षीणस्य कासमानस्य यच्च तच्च न सिध्यति ॥ २० ॥
यद् द्विदोषानुग यद्वा शान्त शान्त प्रकुप्यति ।
मार्गान्मार्गं चरेद्यद्वा याप्य पित्तमसृक् च तत् ॥ २१ ॥
एकमार्ग बलवतो नातिवेग नवोत्थितम् ।
रक्तपित्त सुखे काले साध्य स्यान्निरुपद्रवम् ॥ २२ ॥
रक्तपित्त की गति—निदानस्थान मे रक्तपित्त की ऊर्ध्वगति के सात द्वार
( दो कान, दो नाक, दो आखे आर एक मुख ) है । इन सात मार्गों से रक्त
बाहर आता है । अधोगति के दो मार्ग है गुदा और उपस्थ । स्त्रियो मे योनि-
मार्ग का अन्तर्भाव उपस्थ मे ही हो जाता है । इनमे से ऊ॰ गति वाला
रक्तपित्त साध्य है और अधोमार्ग से जाने वाला याप्य है, और जो रक्तपित्त
दोनो मार्गों से प्रवृत्त होता है वह असाध्य है । जिस समय रक्तपित्त शरीर के
नौ छिद्रो से तथा रोमकूपो से जाने लगता है, तब इसकी असख्य वा आन्तकी
गति कहाती है । उस समय इसकी गति के मार्ग गिने नहीं जा सकते और
रागी शीघ्र मर जाता है । जो रक्तपित्त दोनो मागो से बहुत मात्रा मे प्रवृत्त
हाता है, जिस रक्तपित्त मे मुर्दे की सी बास आती हे, जिसका रग बहुत काला
हाता है, जिसमे कफ और वायु का मिश्रण रहता है, जो रक्तपित्त गले से बाहर
नहीं आता, वही रुक जाता है, निदानस्थान मे वर्णित दुर्बलता आदि उपद्रवो
से युक्त, पीला, नीला, हरा, ताबे के समान रग का दीखता हो, क्षीण व्यक्ति
का तथा जिसको खासी उठती हो, उसका 'रक्तपित्त' असाध्य है । जिस रक्तपित्त
मे दो दोषो का मिश्रण रहता है, अथवा जो रुक रुक कर उत्पन्न होता है,
अथवा कभी ऊर्ध्व मार्ग से चले और कभी अधोमार्ग से प्रवृत्त होता हो, वह
रक्तपित्त याप्य होता है । बलवान् पुरुप मे एक मार्ग से प्रवृत्त होने वाला,
जो बहुत प्रबल रूप मे न हो, नया ही उत्पन्न हुआ हा, साथ मे किसी प्रकार का
उपद्रव न हो तो रक्तपित्त सुखकाल ( हेमन्त और शिशिर ऋतु ) मे साध्य है ।
३३२ चरकसंहिता [ अ० ४
[ हेमन्त शिशिर ऋतु मे उत्पन्न रक्तपित्त साध्य है, यहा पर ऊर्ध्वगामी
रक्तपित्त का ही ग्रहण करना चाहिये ]॥ १५-२२ ॥
स्निग्धोष्णमुष्णरूक्षं च रक्तपित्तस्य कारणम् ।
अधोगस्योत्तर प्रायः पूर्वं स्यादूर्ध्वगस्य तु ॥ २३ ॥
ऊर्ध्वगं कफसंसृष्टमधोगं मारुतानुगम् ।
द्विमार्गं कफवाताभ्यामुभाभ्यामनुबध्यते ॥ २४ ॥
रक्तपित्त का कारण—ऊर्ध्वगामी रक्तपित्त का मुख्य कारण स्निग्ध और उष्ण
आहार है, अधोगामी रक्तपित्तका कारण उष्ण और रूक्ष आहार है । इनमे ऊर्ध्व-
गामी रक्तपित्त मे कफ का और अधोगामी मे वायु का मिश्रण रहता है । दोनो
मार्गो से जाने वाले रक्तपित्त मे कफ और वायु दोनो का ही मिश्रण
रहता है ॥ २३-२४ ॥
अक्षीणबलमांसस्य रक्तपित्तं यदश्नतः ।
तद्दोषदुष्टमुत्क्लिष्टं नादौ स्तम्भनमर्हति ॥ २५ ॥
गलग्रहं पूतिनस्यं मूर्च्छाऽयमरुचिं ज्वरम् ।
गुल्मं प्लीहानमानाहं किलासं कृच्छ्रमूत्रताम् ॥ २६ ॥
कुष्ठान्यर्शासि वीसर्पं वर्णनाशं भगन्दरम् ।
बुद्धीन्द्रियोपरोधं च कुर्यात्स्तम्भितमादितः ॥ २७ ॥
तस्मादुपेक्ष्यं बलिनो बलदोषविचारिणा ।
रक्तपित्तं प्रथमतः प्रवृद्धं सिद्धिमिच्छता ॥ २८ ॥
चिकित्सा विधि—जिस पुरुष का बल और मास क्षीण नही हुआ ओर जो
अच्छी प्रकार से खाता पीता हो, रक्त दोषो से दूषित और बाहर की ओर
निकलने की प्रवृत्ति रखता हो तो प्रारम्भ मे एकदम इसको न रोकना चाहिये ।
सहसा प्रारम्भ मे रोक देने से—गलग्रह, पूतिनस्य, मूर्च्छा, अरुचि, ज्वर, गुल्म,
प्लीहा, आनाह, किलास (कुष्ठभेद), मूत्रकृच्छ्र, कुष्ठ, अर्श, वीसर्प, विवर्णता,
भगन्दर, बुद्धि और इन्द्रियो का अपने विषयो मे प्रवृत्त न होना, ये उपद्रव
होते है । इसलिये बल और दोष को समझने वाले वैद्य को चाहिये कि बलवान्
पुरुष मे प्रथम रक्त को रोके नही, बढे हुए रक्त को बहने दे । जब बल घट
जाये या दोष कम हो जाये तब इसको बन्द करे ॥ २५-२८ ॥
प्रायेण हि समुत्क्लिष्टमामदोषाच्छरीरिणाम् ।
वृद्धिं प्रयाति पित्तासृक्तस्माल्लङ्घ्यमादितः ॥ २९ ॥
मार्गान्दोषानुबन्धं च निदानं प्रसमीक्ष्य च ।
अ० ४ ] चिकित्सितस्थानम् ३३३
अ० ४ ] चिकित्सितस्थानम् ३३३
लङ्घनं रक्तपित्ताचौ तर्पणं वा प्रयोजयेत् ॥ ३० ॥
प्रायः करके पुरुषों मे आम-दोष के कारण से ही उत्क्लेशित रक्त-पित्त
वृद्धि को प्राप्त होता है, इसलिये प्रथम लङ्घन कराना चाहिये । मार्ग, दोषों के
अनुबन्ध और निदान को देखकर रक्त-पित्त में लङ्घन अथवा तर्पण का प्रयोग
करना चाहिये । [ अर्थात् ऊर्ध्वमार्ग, साम पित्त, कफ दोष, स्निग्ध और उष्ण
निदान हो तो लङ्घन करावे । अधोमार्ग, वायु, दोष और रूक्ष और उष्ण
निदान हो तो संतर्पण (भोजन जैसे—यवागू या लाजासक्तु) देवे] ॥२९-३०॥
ह्रीबेरचन्दनोशीरमुस्तपर्पटकैः शृतम् ।
केवलं शृतशीतं वा दद्यात्तोयं पिपासवे ॥ ३१ ॥
ऊर्ध्वगे तर्पणं पूर्वं पेया पूर्वमधोगते ।
कालसात्म्यानुबन्धज्ञो दद्यात्प्रकृतिकल्पवित् ॥ ३२ ॥
रक्तपित्त मे प्यास लगने पर, ह्रीबेर (गन्धवाला ), लाल चन्दन, खस,
नागरमोथा, पित्तपापडा इनका शृत कषाय (क्वाथ) अथवा पानी को पका कर
ठण्डा करके (औषध से द्वेष करने वाले को) देना चाहिये। काल, सात्म्य,
अनुबन्ध (दोषों के), प्रकृति (गुरु लाघव आदि कल्पना) के सस्कार का
समझने वाले वैद्य को चाहिये कि ऊर्ध्वगामी रक्तपित्त मे प्रथम लाजा-सत्तू से
संतर्पण कराये और अधोगामी रक्तपित्त मे पेया का पान करावे । यदि रोगी
लङ्घन के योग्य हो तो प्रथम लङ्घन करावे । पीछे से तर्पण या पेया दे । अयोग्य
हो तो प्रथम से ही तर्पण या पेया का प्रयोग करे ॥ ३१-३२ ॥
जलं खर्जूरमृद्वीकामधूकैः सपरूषकैः ।
शृतशीतं प्रयोक्तव्यं तर्पणार्थं सशर्करम् ॥ ३३ ॥
तर्पणं सघृतक्षौद्रं लाजचूर्णैः प्रयोजयेत् ।
ऊर्ध्वगं रक्तपित्तं तत् पीतं काले व्यपोहति ॥ ३४ ॥
मन्दाग्नेरम्लसात्म्याय तत्साम्लमपि कल्पयेत् ।
दाडिमामलकैर्विद्वानम्लार्थं चानुदापयेत् ॥ ३५ ॥
रक्तपित्त मे तर्पण—(१) पिण्डखजूर, मुनक्का, महुवे का फूल,
फालसा इनका २ पल लेकर, ३२ तोला पानी मे पका कर पञ्चमांश रहने
पर छान कर शर्करा मिला कर तर्पण (प्यास बुझाने) के लिये देवे । अथवा
षडगपानीय विधि से पकावे ।
(२) लाजा (खीलो) के चूर्ण को घी और शहद के साथ देवे । इस
तर्पण को उचित काल मे देने से ऊर्ध्वगामी रक्तपित्त मिटता है । [ इसको
खर्जूरादि क्वाथ मे घोल कर भी दे सकते हैं । ]
३३४ चरकसंहिता [ अ० ४
( ३ ) जिस पुरुष की अग्नि मन्द हो और उसको अम्ल-सात्म्य अर्थात् खट्टे
पदार्थ अनुकूल पडते हो तो इसका अनार या आवले से खट्टा बना कर पूर्वोक्त
तर्पण दे । [ मधु, खर्जूर दाख, फालसा ओर चीनी का शरबत वा चसार
के साथ खीलो के सत्तूओ के साथ मन्थ वा अनार का शरबत देना
चाहिये ] ॥३३-३५॥
शालिषष्टिकनीवारकोरदूषप्रशांतिकाः ।
श्यामाकश्च प्रियङ्गुश्च भोजनं रक्तपित्तिनाम् ॥ ३६ ॥
मुद्गा मसूराश्चणकाः समकुष्ठाढकीफलाः ।
प्रशस्ताः सूपयूपार्थे कल्पिता रक्तपित्तिनाम् ॥ ३७ ॥
पटोलनिम्बवेत्राग्रलक्षवेत्सपल्लवाः ।
किराततिक्तकं शाकं गण्डीरः सकठिल्लकः ॥ ३८ ॥
कोविदारस्य पुष्पाणि काश्मर्याश्चाथ शाल्मलेः ।
अन्नपानविधौ शाक यच्चान्यद्रक्तपित्तनुत् ॥ ३९ ॥
शाकार्थं शाकसात्म्यानां तच्छस्त रक्तपित्तिनाम् ।
स्विन्नं वा सर्पिषा भृष्टं यूषवद्वा विपाचितम् ॥ ४० ॥
पारावतान्कपोतांश्च लावान् रक्ताक्षवर्तकान् ।
शशान्कपिज्जलानेणान् हरिणान्कालपुच्छकान् ॥ ४१ ॥
रक्तपित्ते हितान्विद्याद्रसांस्तेषा प्रयोजयेत् ।
ईषदम्लाननम्लान् वा घृतभृष्टान् सशर्करान् ॥ ४२ ॥
कफानुगे यूषशाक दद्याद्वातानुगे रसम् ।
रक्तपित्ती का भोजन-( १ ) रक्तपित्त के रोगी को भोजन के लिये शालि
(हेमन्त धान्य ), साठी, नीवार, कारदूष ( कोदो ), प्रशातिका, श्यामाक, प्रियंगु
(कगनी) इनका भोजन करावे ।
( २ ) मूग, मसूर, चना, मोठ, आढकी ( अरहर ) इन दालो का सूप
तथा यूष रक्तपित्त रोगी को दे ।
( ३ ) परवल, नीम, बेत का अग्रभाग, पिलखन के पत्ते, वेतस के पत्ते,
चिरायता, गण्डीर ( दो प्रकार का है स्थलजन्य और जलजन्य, इसमे जलजन्य
रामठ शाक ), कठिल्लक ( पुनर्नवा ), कोविदार ( कचनार ) के फूल, गम्भारी
के फूल और सिम्बल के फूल तथा अन्नपान विधि मे जो रक्तपित्त नाशक शाक
कहे है, उनका भी उपयोग करे । जिन पुरुषो को शाक सात्म्य ( अनुकूल ) है
उनको इनका शाक देवे ।
अ० ४ ] चिकित्सितस्थानम् ३३५
अ० ४ ] चिकित्सितस्थानम् ३३५
(४) कबूतर, कपोत, बटेर, रक्ताक्ष (चकोर), वर्त्तक, शशक, कपिञ्जल,
एण, हरिण, कालपुच्छ, इनके मास को स्विन्न करके (भाप से सिझाकर)
अथवा घी मे भूनकर या यूष के समान पकाकर (अनार आदि के रस से खट्टा
बनाकर) मास रस देवे। ये रक्तपित्त रोग मे हितकारी है। इनको खट्टा करके
अथवा बिना खट्टा बनाये घी से भूनकर शक्कर के साथ प्रयोग करे।
(५) यदि रक्तपित्त मे कफ का मिश्रण हो तो यूष शाक देवे और यदि
वायु का अनुबन्ध हो तो मास-रस देवे ॥३६-४२॥
रक्तपित्ते यवागूनामतः कल्पः प्रवक्ष्यते ॥ ४३ ॥
पद्मोत्पलाना किञ्जल्क-पृश्निपर्णी-प्रियङ्गुकाः ।
जले साध्या रसे तस्मिन् पेया स्याद्रक्तपित्तिनाम् ॥ ४४ ॥
चन्दनोशीरलोध्राणा रसे तद्वत्सनागरे ।
किराततिक्तकोशीरमुस्ताना तद्वदेव च ॥ ४५ ॥
धातकीधन्वयासाम्बुबिल्वाना वा रसे शृताः ।
मसूरपृश्निपर्ण्योर्वा स्थिरा मुद्गरसेऽथवा ॥ ४६ ॥
रसे हरेणुकाना वा सघृते सबलारसे ।
सिद्धाः पारावतादीना रसे वा स्युः पृथक्पृथक् ॥ ४७ ॥
इत्युक्ता रक्तपित्तघ्न्यः शीताः समधुशर्कराः ।
यवाग्वः, कल्पना चैषा कार्या मांसरसेष्वपि ॥ ४८॥
शशः सवास्तुकः शस्तो विबन्धे रक्तपित्तिनाम् ।
वातोल्बणे तित्तिरिः स्यादुदुम्बररसे शृतः ॥ ४९ ॥
मयूरः प्लक्षनिर्य्यूहे न्यग्रोधस्य च कुक्कुटः ।
रसे बिल्वोत्पलादीना वर्तकक्रकरौ हितौ ॥ ५० ॥
रक्तपित्त मे यवागू कल्प—इसके आगे रक्तपित्त रोग मे यवागुओ का कल्प
कहते है—
(१) पद्मोत्पलादि रस से साधित पेया—कमल, नीला कमल, केशर,
पृश्निपर्णी, प्रियगु, इनको षडगपानीय विधि से पकाकर जलक्वाथ सिद्ध करे।
इस क्वाथ मे पेया बनावे। यह पेया रक्तपित्त मे हितकारी है। (२) चन्दनादि
साधित पेया—लाल चन्दन, खस, लोध, साठ, इनके क्वाथ मे साधित पेया
रक्तपित्त मे हितकर है। (३) किराततिक्तादि साधित पेया—चिरायता, मोथा
और खस इनके क्वाथ मे साधित पेया रक्तपित्त मे हितकर है। (४) धात-
क्यादि जल से साधित पेया—धाय के फूल, धमासा, गन्धबला और बेलगिरी
इनके रस मे साधित पेया रक्तपित्त मे हितकर है। (५) मसूरादि जल से साधित
३३६ चरकसंहिता [ अ० ४
पेया—मसूर, पृश्निपर्णी से सिद्ध पेया अथवा (६) स्थिरा (शालपर्णी) और
मूग से साधित पेया रक्तपित्त मे हितकारी है । (७) रेणुका के रस मे (८)
घृतयुक्त बला रस मे या (६) पारावत आदि के मास-रस मे साधित पेया
रक्तपित्त मे हितकारी है । पेया के लिये शालि, साठी, नीवार आदि धान्या का
उपयोग करे । इन यवागू, पेयाअं को ठण्डा करके मधु और शर्करा से मीठा
बनाकर देवे । जिस प्रकार से उपरोक्त रसों मे यवागू तैयार की जाती है, उसी
प्रकार इन रसा मे मास-रस भी सिद्ध करके देवे । रक्तपित्त रोग मे यदि विवन्ध
(कब्ज) हो तो बथुए के साथ खरगोश का मास सिद्ध करके देवे । यदि रक्त-
पित्त म वायु का जार हा तो गूलर के रस मे तीतर का मासरस सिद्ध करके
देवे । मोर को पिलखन के रस मे, सुगे को बरगद के रस मे, बेलगिरी और
कमल के रस से बर्त्तक और कुक्कुर के मासरस को सिद्ध करके देवे । उष्णवीर्य
होने पर भी प्रतिनियत सावक द्रव्य के संयोग से ही ये वस्तुए रक्तपित्त मे
हितकारी है ॥ ४३-५० ॥
तृष्यते तिक्तकैः सिद्धं तृष्णाघ्नं वा फलोदकम् ।
सिद्धं विदारिगन्धाद्यैरथवा शृतशीतलम् ॥ ५१ ॥
ज्ञात्वा दोषावनुबलौ बलमाहारमेव च ।
जलं पिपासवे दद्याद्विसर्गादल्पशोऽपि वा ॥ ५२ ॥
निदानं रक्तपित्तस्य यत्किंचित्संप्रकाशितम् ।
जीवितारोग्यकामैस्तन्न सेव्यं रक्तपित्तिभिः ॥ ५३ ॥
इत्यन्नपानं निर्दिष्टं क्रमशः रक्तपित्तिषु ।
रोगी को प्यास लगे तो तिक्त द्रव्यों से सिद्ध जल, तृष्णानाशक फालसा
आदि फलो का पानी या विदारीगन्धादि (स्वल्प पञ्चमूल) गण से सिद्ध जल
अथवा गरम करके ठण्डा बनाया पानी देवे । रक्तपित्त रोग मे दोष (कफ
और वायु) का तथा रोगी के बल और आहार का पहिचान कर प्यास की
शान्ति के लिये यथेच्छ अथवा थोड़ा थोड़ा पानी देवे । यदि अग्नि बलवान् हो
और शरीर महान् हो तो यथेच्छ पानी देवे, वैसे थोडा २ देवे । रक्तपित्त के
जिन रोगियो को जीवन और आरोग्य की चाह हो, रक्तपित्त रोग के जो
कारण बतलाये है वे उनका सेवन न करे, वे उनसे परहेज करते रहे । इस
प्रकार रक्तपित्त रोगियों की यथाक्रम चिकित्सा कह दी है ॥ ५१-५३ ॥
वक्ष्यते बहुदोषाणां कार्यं बलवता च यत् ॥ ५४ ॥
अक्षीणबलमांसस्य यस्य संतर्पणोत्थितम् ।
अ० ४] २२ चिकित्सितस्थानम् ३३७
अ० ४] २२ चिकित्सितस्थानम् ३३७
बहुदोष बलवतो रक्तपित्तं शरीरिणः ॥ ५५ ॥
काले संशोधनार्हस्य तद्धरेन्निरुपद्रवम् ।
विरेचनेनोर्ध्वभागमधोगं वमनेन च ॥ ५६ ॥
त्रिवृतामभयां प्राज्ञः फलान्यारग्वधस्य वा ।
त्रायमाणागवाक्ष्यौर्वा मूलमामलकानि वा ॥ ५७ ॥
विरेचनं प्रयुञ्जीत प्रभूतमधुशर्करम् ।
रसः प्रशस्यते तेषां रक्तपित्ते विशेषतः ॥ ५८ ॥
वमनं मदनोन्मिश्रो मन्थः सक्षौद्रशर्करः ।
सशर्करं वा सलिलमिक्षूणां रस एव वा ॥ ५९ ॥
वत्सकस्य फलं मुस्तं मदनं मधुकं मधु ।
अधोगे रक्तपित्ते तु वमनं परमुच्यते ॥ ६० ॥
ऊर्ध्वगे शुद्धकोष्ठस्य तर्पणादिक्रमो हितः ।
अधोवहे यवाग्वादिर्न चेत्स्यान्मारुतो बली ॥ ६१ ॥
अब बलवान् और बहुदोष वाले रोगियों की चिकित्सा कहते हैं । जिस
रोगी का बल और मांस क्षीण न हुआ हो, बलवान् हो, सन्तर्पण के कारण बहुत
दोष उत्पन्न हुए हों, साथ में कोई उपद्रव न हो तो, रोगी संशोधन के योग्य
हो तो उचित समय में संशोधन देवे । इसके लिये यदि रक्तपित्त ऊर्ध्वगामी हो
तो विरेचन, अधोगामी हो तो वमन देवे ।
विरेचन के लिये—निशोथ और हरड़, या अमलतास के फलों की मज्जा,
या त्रायमाण और इन्द्रायण की जड़, अथवा आँवले का प्रचुर मधु और शर्करा
के साथ देवे । रक्तपित्त में विशेष कर इनको रस के रूप में, क्वाथ के रूप में
भी देना अच्छा है ।
वमन के लिये—मैनफल से युक्त मन्थ में घी और शर्करा मिलाकर, पानी
में शर्करा मिलाकर अथवा गन्ने का रस, अथवा इन्द्रजौ, मोथा, मैनफल, मुल-
हठी और मधु इनको मिलाकर वमन के लिये चटावे । अधोगामी रक्तपित्त में
यह वमन श्रेष्ठ है ।
ऊर्ध्वगामी रक्तपित्त में विरेचन द्वारा कोष्ठ के शुद्ध होने पर लाजा सक्तु
आदि से तर्पण करना हितकारी है । अधोगामी रक्तपित्त में यदि वायु बलवान्
हो तो यवागू आदि का प्रयोग कर ॥ ५४-६१ ॥
बलमांसपरिक्षीणं शोकभाराध्वकर्शितम् ।
ज्वलनादित्यसंतप्तमन्यैर्वा क्षीणमामयैः ॥ ६२ ॥
३३८ चरकसंहिता [अ० ४
गर्भिणी स्थविर बाल रूक्षाल्पप्रमिताशनम् ।
अवम्यमविरेच्यं वा यं पश्येद्रक्तपित्तिनम् ॥ ६३ ॥
शोषेण सानुबन्धं वा तस्य सशमनी क्रिया ।
शस्यते रक्तपित्तस्य परं चातः प्रवक्ष्यते ॥ ६४ ॥
आटरूषकमुद्रीकापथ्याक्वाथः सशर्करः ।
मधुमिश्रः श्वासकासरक्तपित्तनिबर्हणः ॥ ६५ ॥
आटरूषकनिर्यूहे प्रियङ्गु मृत्तिकाञ्जने ।
विनीय लोध्रं क्षौद्रं च रक्तपित्तहर पिबेत् ॥ ६६ ॥
पद्मकं पद्मकिञ्जल्कं दूर्वा वास्तुकमुत्पलम् ।
नागपुष्पं च लोध्रं च तेनैव विधिना पिबेत् ॥ ६७ ॥
प्रपौण्डरीकं मधुक मधु चाश्वशकृद्रसे ।
यवासभृङ्गरजसोर्मूलं वा गोशकृद्रसे ॥ ६८ ॥
विनीय रक्तपित्तघ्नं पेय स्यात्तण्डुलाम्बुना ।
युक्तं वा मधुसर्पिभ्यां लिह्याद् गोऽश्वशकृद्रसम् ॥ ६९ ॥
खदिरस्य प्रियङ्गूणा कोविदारस्य शाल्मलेः ।
पुष्पचूर्णानि मधुना लिह्यान्ना रक्तपैत्तिकः ॥ ७० ॥
शृङ्गाटकाना लाजाना मुस्तखर्जूरयोरपि ।
लिह्याच्चूर्णानि मधुना पद्मानां केशरस्य च ॥ ७१ ॥
धन्वजानामसृग्लिह्यान्मधुना मृगपक्षिणाम् ।
सक्षौद्र प्रथिते रक्ते लिह्यात्पारावतं शकृत् ॥ ७२ ॥
जिनका बल और मास क्षीण हो गया हो, जो शाक, भार, वा मुसाफिरी से
कृश हो गये हों, आग या सूर्य की गरमी से अथवा रोगा से जो क्षीण हो गया
है, गर्भवती,वृद्ध, बालक, रूक्ष, अल्प और नियमित भोजन करने वालो को,
जो वमन या विरेचन के अयोग्य हो, यक्ष्मा रोग से पीडित हो तो इनकी सश-
मनी चिकित्सा करे । रक्तपित्त रोगी के लिये जो सशमनी क्रिया है, उसका अब
उपदेश करते हैं ।
सशमनी क्रिया — ( १ ) वासा, मुनक्का, हरड के क्वाथ मे शर्करा और
मधु मिलाकर देवे । यह श्वास, कास और रक्तपित्त का नाशक है । ( २ )
वासा के क्वाथ मे प्रियगु, मिट्टी, अजन, लोध्र [ मिलित एक कर्ष ] और शहद
एक कर्ष मिलाकर पीवे यह रक्तपित्त नाशक है। ( ३ ) इसी प्रकार पद्माख,
कमल का केशर, दूर्वा, बथुवा, नीला कमल, नाग केशर, लोध्र, इनका भी
अ० ४ ] चिकित्सितस्थानम् ३३६
अ० ४ ] चिकित्सितस्थानम् ३३६
क्वाथ या इनके चूर्ण को वासा के क्वाथ मे शहद डालकर पीवे । ( ४ ) बोडे की
लोद के रस मे पुण्डरीक काष्ठ और मधु तथा मुलहठी मिलाकर देना चाहिये ।
( ५ ) गोबर के रस मे जवासा और भागरे की जड का चूर्ण मिलाकर चावलों
के धोवन के साथ पीवे । ( ६ ) खैर, प्रियंगु, कचनार और सिम्बल के फूलो
के चूर्ण को मधु के साथ मिलाकर चाटे, यह रक्तपित्त नाशक है । ( ७ )
सिंघाडा, खील, मौथा, खजूर और कमल का केशर इनको मधु के साथ चाटे ।
( ८ ) जागल पशु पक्षियों के रक्त का शहद के साथ मिलाकर पीवे । यदि
रक्त जमा हुआ (घट्ट) हो तो पारावत (कबूतर) की वीट को शहद
के साथ चाटे ॥ ६२-७२ ॥
उशीर-कालीय क-लोध्र-पद्मक-प्रियङ्गुका-कट्फल शङ्ख-गैरिकाः ।
पृथक्पृथक् चन्दनतुल्यभागिकाः सशर्करास्तण्डुलधावनाप्लुताः ॥७३॥
रक्तं सपित्तं तमकं पिपासां दाहं च पीताः शमयन्ति सद्यः ।
किराततिक्तं क्रमुकं समुस्तं प्रपुण्डरीकं कमलोत्पले च ॥ ७४॥
ह्रीवेरमूलानि पटोलपत्रं दुरालभा पर्पटको मृणालम् ।
धनञ्जयोदुम्बर-वेतसत्वङ्-न्यग्रोध-शालेय-यवासक-त्वक् ॥ ७५ ॥
तुगालतावेतसतण्डुलीयँ ससारिवं मोचरसः समङ्गा ।
पृथक् पृथक् चन्दनयोजितानि तेनैव कल्पेन हितानि तत्र ॥ ७६ ॥
निशि स्थिता वा स्वरसीकृता वा कल्कीकृता वा मृदिता शृता वा ।
एते समस्ता गणाः पृथग्वा रक्तं सपित्तं शमयन्ति योगाः ॥ ७७ ॥
( ६ ) खस, कालीयक (पीत काष्ठ), पठानी लोध, पद्माख, प्रियंगु,
कायफल, शंख और शोधित स्वर्ण गेरू इनको पृथक् पृथक् चन्दन के समान
मिलाकर खाड के समपरिमाण मे चावलों के धोवन के साथ देवे ।
( १० ) प्रत्येक वस्तु के समान भाग चन्दन मिला कर दोनों के बराबर
खाड मिलाकर इनको चावलों के धोवन के साथ देवे । इससे रक्तपित्त, तमक
श्वास, प्यास, दाह शीघ्र शान्त होते है ।
( ११ ) पुण्डरीक, कमल (श्वेत), नीला कमल, हीवेर (गन्धवाला)
इनके मूल, परवल के पत्ते, दुरालभा, पित्तपापडा, मृणाल (बिसनाल),
धनञ्जय (अर्जुन), गूलर, वेतस इनकी छाल, न्यग्रोध (बरगद), शालेय
(चावलो का भेद या जामुन), बासे की छाल, तुगा (वशलोचन), लता
(श्यामलता या प्रियंगु), नागकेशर, तण्डुलीय (चावल), सारिवा (अनन्त
मूल), मोचरस, समगा (लाजवन्ती) इनको पृथक् पृथक् लेकर, चन्दन के
३४० चरकसंहिता [ अ० ४
साथ मिलाकर, खाड का योग देकर चावलो के बावन के साथ दे । इन औष-
वियो को पृथक् पृथक् या सम्मिलित रूप मे मिलाकर शीत कषाय, क्वाथ,
चूर्ण, फाण्ट, स्वरस के रूप मे प्रयोग करे, ये योग रक्तपित्त का शमन
करते है ॥ ७३-७७ ॥
मुद्गाः सलाजाः सयवाः सकृष्णाः सोशीरमुस्ताः सह चन्दनेन ।
बलाजले पर्युषितः कषायो रक्त सपित्त शमयत्युदीर्णः ॥ ७८ ॥
वैडूर्यमुक्तामणिगैरिकाणा मृच्छङ्खहेमामलकोदकानाम् ।
मधूदकस्येक्षुरसस्य चैव पानाच्छम गच्छति रक्तपित्तम् ॥ ७९ ॥
उशीरपद्मोत्पलचन्दनाना पङ्कस्य लोष्ट्रस्य च यः प्रसादः ।
सशर्करः क्षौद्रयुतः सुशीतो रक्तातिर्यागप्रशमाय देयः ॥ ८० ॥
प्रियङ्गुकाचन्दनलोध्रसारिवामधूकमुस्ताभयधातकीजलम् ।
समृत्प्रसाद सह षष्टिकाम्बुना सशर्कर रक्तनिबर्हण परम् ॥ ८१ ॥
( १२ ) मूग, लाजा ( खील ), जौ, पिप्पली, खस, मोथा और चन्दन
इनको रात भर बला क्वाथ मे भिगो कर प्रात. पीना चाहिये । यह तीव्र रक्तपित्त
का शान्त करता है । बला-क्वाथ षडगपानीय विधि से बनाये । ( १३ ) वैडूर्य
( लहसनिया ), मोती, मणि, स्वर्ण गैरिक, मिट्टी सोरठी, शङ्ख, हेम (नागकेसर),
आवला, गन्धबाला इनके चूर्ण को पानी के साथ ( इसमे घोल कर ) लेना
चाहिये । अथवा शहद के शरबत को या गन्ने के रस को पीने से रक्तपित्त शान्त
होता है । (१४) खस, कमल, नील कमल, लाल चन्दन इनको कूट कर रात मे
पानी मे भिगो दे । प्रात. नितार कर इसमे शक्कर और मधु मिला कर दे,
इसी प्रकार पके हुए मिट्टी के ढेले को तोड कर पानी मे घोल दे । इस पानी
को भी मधु और शर्करा के साथ दे यह याग अति रक्त-स्राव मे उपयोगी है ।
[ कही २ 'लोध्र' भी पाठ है । परन्तु अष्टाग-सग्रह मे सुनी हुई मिट्टी का पाठ
है ] । (१५) प्रियगु, चन्दन, लोध, अनन्तमूल, महुआ, माथा, हरड़ और धाय
के फूल इनके जल को पकी हुई मिट्टी के जल के साथ मिला कर साठी चावलो
के साथ खाड डाल कर पिलावे, यह रक्तपित्त का नष्ट करता है ॥ ७८-८१ ॥
कषाययोगैर्विविधैर्यथोक्तैर्दीप्तेऽनले श्लेष्मणि निर्जिते च ।
यद्रक्तपित्तं प्रशमं न याति तत्रानिलः स्यादनु तत्र कार्यम् ॥ ८२ ॥
छाग पयः स्यात्प्रथम प्रयोगे गव्य शृतं पञ्चगुणे जले वा ।
सशर्करं माक्षिकसंप्रयुक्त विदारिगन्धादिगणैः शृतं वा ॥ ८३ ॥
द्राक्षाशृतं नागरकैः शृतं वा बलाथृतं गोक्षुरकैः शृत वा ।
अ० ४ ] चिकित्सितस्थानम् ३४१
सजीवक सर्षभक ससर्पिः पयः प्रयोज्यं सितया शृतं वा ॥ ८४ ॥
शतावरीगोक्षुरकैः शृतं वा शृत पयो वाऽप्यथ पर्णिनीभिः ।
रक्तं हिनस्त्याशु विशेषतस्तु यन्मूत्रमार्गात्सरुजं प्रयाति ॥ ८५ ॥
विशेषतो विट्पथसंग्रवृत्ते पयो हितं मोचरसेन सिद्धम् ।
वटावरोहैर्वटशुङ्गकैर्वा ह्रीवेरनीलोत्पलनागरैर्वा ॥ ८६ ॥
कषाययोगान्वयसा पुरा वा पीत्वा तु चाद्यात्पयसैव शालीन् ।
कषाययोगैरथवा विपक्वमेतैः पिबेत्सपिरतिस्रुते च१ ॥ ८७ ॥
उपरोक्त इन कषाय योगों से अग्नि के दीप्त होने पर और कफ के क्षीण
हो जाने पर भी जो रक्तपित्त शान्त नहीं होता, उसमें वायु की प्रबलता समझें ।
इसके लिये—( १६ ) प्रथम बकरी का दूध दे अथवा गाय के दूध को पाच
गुणे पानी मे पका कर अथवा स्वल्प पञ्चमूल ( विदारी गन्वादि गण ) से
साधित गाय का दूध शर्करा ओर मधु के साथ दे । ( १७ ) द्राक्षा, सोंठ, बला-
मूल और गोखरू इन मे से किसी एक से सिद्ध गाय के दूध का अथवा जीवक,
ऋषभक और घी इनका उबाले दूध मे प्रक्षेप डाल कर मधु मिला कर दे ।
( १८ ) शतावरी और गोखरू से साधित या मुद्गपर्णी, माषपर्णी, पृश्नि-
पर्णी और शालपर्णी इन चारों से सावित दूध को देने से रक्तपित्त नष्ट होता
है, खास कर मूत्र मार्ग से पीडा के साथ बहने वाला रक्तपित्त नष्ट होता है ।
(१६) गुदा मार्ग से बहने वाले रक्त के लिये—मोचरस द्वारा सिद्ध दूध देवे ।
( २० ) या बरगद अङ्कुर या वटजटा से अथवा गन्धबाला, नीला कमल और
सोंठ से सिद्ध दूध देना चाहिये । ( २१ ) पहिले कहे वासक आदि कषायों
को दूध के साथ पीकर पीछे से दूध चावल खावे । ( २२ ) अथवा इन क्वाथों
से घृत सिद्ध करके रक्त स्राव मे पीवे ॥ ८२-८७ ॥
वासा सशाखा सपलाशमूला कृत्वा कषायं कुसुमानि चास्य ।
प्रदाय कल्क विपचेद् घृत तत्सक्षौद्रमाश्वेव निहन्ति रक्तम् ॥ ८८ ॥
इति वासाघृतम् ।
पलाशवृन्तस्य रसेन सिद्धं तस्यैव कल्केन मधुद्रवं हि ।
लिह्याद् घृत वत्सककल्कसिद्ध तद्वत्समङ्गोत्पललोध्रसिद्धम् ॥ ८९ ॥
स्यात् त्रायमाणाविविरेष एव सोदुम्बरे चैव पटोलपत्रे ।
सर्पींषि पित्तज्वरनाशनानि सर्वाणि शस्तानि च रक्तपित्ते ॥ ९० ॥
घृतपाक—( १ ) वासा घृत—शाखा, मूल, फल और पत्तो समेत वासा
१ 'रतिस्रवेच्च' इति च पाठ ।
३४० चरकसंहिता [अ० ४
को लेकर उसका क्वाथ करे । इस क्वाथ मे इसी के फल का कल्क मिला कर
घृत पकावे । इस घृत को शहद के साथ मिला कर खाने से रक्तपित्त अच्छा
होता है । [कही २ 'सपलाशमूल' पाठ है । पाकविधि-गोधृत २ प्रस्थ, वासा
के क्वाथ भाग ४ प्रस्थ, पानी ३२ प्रस्थ, शेष ४ प्रस्थ, कल्क (वासा के फूल
का ) ४ पल यथाविधि पाक करना चाहिये । इसमें कल्क का परिमाण एक ग्रन्थ
मे चार पल है । अष्टाग-सग्रह मे भी यह प्रयोग है । वहा पर टीकाकार ने चतु-
र्थाश या छठा भाग कल्क डालना लिखा है ।]
(२) ढाक के वृन्तो (आगे लगे पत्ते) के स्वरस मे इन्ही के कल्क के
साथ घृत पाक करे । इस सिद्ध घृत को चतुर्थांश मधु के साथ चाटे ।
(३) इन्द्रजौ या कुडे के कल्क से घी सिद्ध करके, अथवा समगा
(लाजवन्ती), नीला कमल, लोध इनसे सिद्ध घी का उपयोग करना चाहिये ।
इसी प्रकार त्रायमाणा के साथ, गूलर और परवल के पत्तो के साथ घृत को
पकाना चाहिये । ये घृत तथा पित्त ज्वर को नाश करने वाले घृत रक्तपित्त
मे उत्तम है ॥ ८८-६० ॥
अभ्यङ्गयोगाः परिषेचनानि सेकावगाहाः शयनानि वेश्म ।
शीतो विधिर्बस्तिविधानमग्र्यं पित्तज्वरे यत्प्रशमाय दृष्टम् ॥ ६१ ॥
तद्रक्तपित्ते निखिलेन कार्यं काल च मात्रा च पुरा समीक्ष्य ।
सर्पिर्गुडा ये च हिताः क्षतेभ्यस्ते रक्तपित्तं शमयन्ति सद्यः ॥ ६२ ॥
(१) पित्त ज्वर को नाश करने के लिये जो दाह ज्वरनाशक अभ्यग
प्रयोग, परिषेक, अवगाहन, शमन घर तथा शीत विधि और बस्ति विधि कही
है, इन सब को काल और मात्रा के अनुसार रक्तपित्त मे प्रयोग करे । उरःक्षत
अध्याय मे जो सर्पिर्गुड कहे है वे सब रक्तपित्त को तुरन्त अच्छा कर देते है ।
सर्पिर्गुड उर क्षत के रोगियो के लिये हितकर है ॥ ६१-६२ ॥
कफानुबन्धे रुधिरे सपित्ते कण्ठागमे स्याद् ग्रथिते प्रयोगः ।
युक्तस्य युक्त्या मधुसर्पिषोश्च क्षारस्य चैवोत्पलनालजस्य ॥ ६३ ॥
(२) रक्तपित्त मे यदि कफ का अनुबन्ध हो, ग्रथित होने के कारण रक्त
गले मे आकर रुक जाये तब कमलनाल के क्षार को मधु और घी के साथ मिला
कर युक्तिपूर्वक प्रयोग करे ॥ ६३ ॥
मृणालपद्मोत्पलकेशराणां तथा पलाशस्य तथा प्रियङ्गोः ।
तथा मधूकस्य तथाऽसनस्य क्षाराः प्रयोज्या विधिनेव तेन ॥ ६४ ॥
(३) इसी प्रकार से कमलनाल, कमल का केसर, नीलोत्पल का केसर
अ० ४] चिकित्सितस्थानम् ३४३
अ० ४] चिकित्सितस्थानम् ३४३
इनके क्षार को, ढाक को, प्रियंगु के क्षार को, महुए के क्षार को, असन के क्षार
को मधु और घी के साथ चटावे ॥ ६४ ॥
शतावरीदाडिमतिन्तिडीकं काकोलिमेदो मधुकं विदारीम् ।
पिष्ट्वा च मूलं फलपूरकस्य घृतं पचेत्क्षीरचतुर्गुणेन ॥ ६५ ॥
कासज्वरानाहविबन्धशूलं तद्रक्तपित्तं च घृतं निहन्यात् ।
(४) शतावरी घृत—शतावर, अनार, इमली, काकोली, मेदा,
मुलहठी, विदारीकन्द और बिजौरे की जड इनके कल्क के साथ चतुर्गुण दूध में
घृत का पाक करे । यह घृत कास, ज्वर, आनाह, विबन्ध, शूल और रक्तपित्त
को नष्ट करता है ॥ ६५- ॥
यत्पञ्चमूलैरथ पञ्चभिर्वा सिद्धं घृतं तच्च तदर्थकारि ॥६६ ॥
इति शतमूलादिघृतम् ।
(५) रसायन अध्याय में कहे पाच पञ्चमूलो में सिद्ध किया हुआ घी भी
कास, ज्वर, आनाह, विबन्ध ओर रक्तपित्त को नष्ट करता हे । इस घृत को
कषाय और कल्क दोनो मे सिद्ध करे ॥ ६६ ॥
कषाययोगा य इहोपदिष्टास्ते चावपीडे भिषजा प्रयोज्याः ।
(६) जिस समय दूषित दाप नाक से बहने वाले रक्त के साथ निकल
चुके तब रक्तस्राव को रोकने के लिये उपराक्त कषायो को कूट कर इनसे रस
निकाल कर नासिका मे डालना चाहिये । प्रारम्भ मे रक्त का बन्द करना
अच्छा नहीं ।
घ्राणात्प्रवृत्तं रुधिरं सपित्तं यदा भवेन्निःस्रुतदुष्टदोषम् ॥ ६७ ॥
रक्ते प्रदुष्टे ह्यवपीडबन्धे दुष्टप्रतिश्यायशिरोविकाराः ।
रक्तं सपूंयं कुणपञ्च गन्धः स्याद् घ्राणनाशः कृमयश्च दुष्टाः ॥६८॥
नीलोत्पलं गैरिकशङ्खयुक्तं सचन्दनं स्यात्तु सिताजलेन ।
नस्यं तथाऽऽम्रास्थिरसः समङ्गा मधातकीमोचरसः सलोध्रः॥६६॥
(७) अवपीडन द्वारा यदि आरम्भ में ही रक्तावराव हा जाय तो दूषित
दाष के अन्दर रुक जाने से दूषित प्रतिश्याय (पुरातन या दारुण) और शिरो-
राग उत्पन्न हा जाते हे, तथा पूय मिश्रित रक्त, मुर्दे की गन्ध (रक्त मे,
नासिका मे), गन्ध की अनभिज्ञता ओर दूषित कृमि उत्पन्न हा जाते है। इसी
प्रकार से आम की गुठली (गीली या पानी में कूट कर) का स्वरस या नीला
कमल, स्वर्ण गैरिक ओर शख भस्म, श्वेत चन्दन इनके कल्क को शरबत के
साथ पीस कर अवपीड़न करे । लाजवन्ती या मजीठ को धाय के फूल के साथ
अथवा मोचरस और लोध को जल से पीसकर अवपीडन करे ॥ ६७-६६ ॥
३४४ चरकसंहिता [ अ०४
द्राक्षारसस्येक्षुरसस्य नस्य क्षीरस्य दूर्वास्वरसस्य चैव ।
यवासमूलानि पलाण्डुमूलं नस्यं तथा दाडिमपुष्पतोयम् ॥१००॥
प्रियालतैल मधुकं पयश्च सिद्ध घृतं माहिषमाजकं वा ।
आम्रास्थि पूर्णैः पयसा च नस्य ससारिदैः स्यात्कमलोत्पलैश्च ॥१०१॥
निम्न वस्तुओ का नस्य देवे—( १ ) अगूर का रस, गन्ने का रस, दूध, दूब
का स्वरस, जवासे की जड का स्वरस, प्याज का रस और अनार के फूल के
रस को नंस्य के लिये देवे । ( २ ) पियाल के तैल को मलहठी के कल्क और
दूध के साथ सिद्ध करके उसका नस्य देवे । ( ३ ) अथवा पियाल के तैल या
मुलहठी को दूध के साथ पीस कर उसका नस्य देवे । ( ४ ) भैस या बकरी के
घी को आम की गुटली के साथ, लाजवन्ती और धाय के फूल के साथ, मोच-
रस और लोध के साथ, अगूर के रस, गन्ने के रस, दूब, दूब का स्वरस, जबसे
की जड़का रस, प्याज का रस या अनार के फूल के रस के साथ सिद्ध करके
देवे । ( ५ ) अथवा भैस या बकरी के घी को अनन्तमूल, कमल और नीलो-
त्पल के फूलो के कल्क से पका कर नस्य देवे । पकाने मे सब द्रव्य घृत के
समान, कल्क घी से चतुर्थांश लेवे ॥ १००-१०१ ॥
भद्रश्रियं लोहितचन्दनं च प्रपोण्डरीकं कमलोत्पले च ।
उशीरवानीरजलं मृणालं सहस्रवीर्या मधुक पयस्या ॥ १०२ ॥
शालीक्षमूलानि यवासगुन्द्रामूल नलाना कुशकाशयोश्च ।
कुचन्दनं शैवलमप्यनन्ता कालानुसार्या तृणमूलमृद्धिः ॥ १०३ ॥
मूलानि पुष्पाणि च वारिजाना प्रलेपनं पुष्करिणीमृदश्च ।
उदुम्बराश्वत्थमधूकलोध्राः कषायवृक्षाः शिशिराश्च सर्वे ॥१०४॥
प्रदेहकल्पे परिषेचने च तथाऽवगाहे घृततैलसिद्धौ ।
रक्तस्य पित्तस्य च शान्तिमिच्छन् भद्रश्रियादीनि भिषक्प्रयुञ्ज्यात् ॥१०५॥
भद्रश्रिया ( श्वेत चन्दन ), लाल चन्दन, पोण्डरीक, श्वेत कमल, नीला
कमल, खस, बानीर ( जलवेतस ), जल ( गन्धवाला ), मृणाल ( कमल नाल )
सहस्रवीर्या (दूर्वा ), मुलहठी, क्षीरकाकोळी, शालि मूल, गन्ने की जड, जवासे
की जड, गुन्द्रा ( तृणविशेष ) की जड़, नड़ सर, कुश, कास की जड़े,
कुचन्दन ( लाल चन्दन ), सरवाल, सारिवा, कालानुसारी ( तगर ), गन्धतृण
की जड़, ऋद्धि, कमलों की जड और पुष्प, और पोखर ( तालाब ) की मिट्टी
का लेप, गूलर, पीपल, महुआ, लोध तथा कषाय रस वाले और शीतक वृक्ष ये
सब रक्तपित्त की शान्ति के लिये प्रदेह, परिषेचन, अवगाहन, घी, तैल पाक मे
प्रयोग करने चाहिये । इनसे घी आदि सिद्ध करके रक्तपित्त मे बरते ॥१०५॥
अ० ४ ] चिकित्सितस्थानम् ३४५
धारागृह भूमिगृहं च शीत वनं च रम्यं जलवातशीतम् ।
वैदूर्यमुक्तामणिभाजनाना स्पर्शाश्च दाहे शिशिराम्बुशीताः ॥१०६॥
दाह की शान्ति के लिये—धारागृह (फव्वार वाले घर), भूमिगृह
(तहखाने), जल और वायु से शीतल सुन्दर वन, लहसुनिया, मोती, मणि
आदि से बने तथा शीतल पानी से ठण्डे किये बर्तनों का स्पर्श करना चाहिये
इन पात्रा मे बर्फ का पानी या चन्दनोदक भर कर स्पर्श करे ॥ १०६ ॥
पत्राणि पुष्पाणि च वारिजाना क्षौम च शीत कदलीदलं च ।
प्रच्छादनार्थं शयनासनाना पद्मोत्पलाना च दलाः प्रशस्ताः ॥१०७॥
बिस्तर और आसन पर बिछाने के लिये जल म उत्पन्न कमल आदि के
पत्ते या फूल, शीतल क्षौम वस्त्र, केले के पत्ते, कमल या नीले कमल के पत्ते
बिछा कर उन पर सोवे ॥ १०७ ॥
प्रियङ्गुकाचन्दनरूपिताना स्पर्शा. प्रियाण च वराङ्गनानाम् ।
दाहे प्रशस्ताः सजलाः सुशीताः पद्मोत्पलाना च कलापवाताः ॥१०८॥
दाह मे प्रियगु, श्वेतचन्दन मे लिप्त अगो वाली प्रिय वारागनाओ (स्त्रियों)
का स्पर्श, कमल, नीले कमल का स्पर्श अथवा इनका और मोर के पखो से बने
पखों को शीतल पानी से भिगो कर हिलाना उत्तम है ॥ १०८ ॥
सरिद्ध्रदाना हिमवद्गरीणा चन्द्रोद्याना कमलाकराणाम् ।
मनोऽनुकूलाः शिशिराश्च सर्वाः कथाः सरक्त शमयन्ति पित्तम् ॥१०६॥
नदिया, तालाव, पर्वता की गुफाये, चन्द्रमा की किरणे, तालाबो का सेवन,
मन के अनुकूल शान्ति देने वाली सब कथाये रक्तपित्त को शान्त करती है॥१०६॥
तत्र श्लोकौ—हेतुं वृद्धि संज्ञा स्थानं लिङ्ग पृथक् प्रदुष्टस्य ।
मार्गौ साध्यमसाध्य याप्यं कार्यक्रम चैव ॥ ११० ॥
पानान्नमिष्टमेव च वर्ज्यं संशोधनं च शमनं च ।
गुरुरुक्तवान् यथावच्चिकित्सिते रक्तपित्तस्य ॥ १११ ॥
रक्तपित्त रोग के कारण, वृद्धि, सज्ञा, स्थान, लक्षण (पृथक् पृथक् ),
दानो मार्ग, साध्यता असाव्यता, याप्य, चिकित्सा क्रम, हितकर खान-पान,
त्याज्य पदार्थ, सशाधन, सशमन ये सब भगवान् आत्रेय ने इस रक्तपित्त
चिकित्सा मे कह दिये है ॥ ११०-१११ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृते चिकित्सास्थाने
रक्तपित्तचिकित्सित नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
अब हम गुल्म की चिकित्सा का उपदेश करते हैं। भगवान् आत्रेय ने
३४६ चरकसंहिता [ अ० ५
पञ्चमोऽध्यायः
अथातो गुल्मचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब हम गुल्म की चिकित्सा का उपदेश करते हैं। भगवान् आत्रेय ने
ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥
सर्वप्रजानां पितृवच्छरण्यः पुनर्वसुर्भूतभविष्यदीशः ।
चिकित्सितं गुल्मनिबर्हणार्थं प्रोवाच सिद्धं वदतां वरिष्ठः ॥ ३ ॥
विट्श्लेष्मपित्तातिपरिस्रवाद्वा तैरैव वृद्धैरतिपीडनाद्वा ।
वेगैरुदीर्णैर्विहितैरधो वा बाह्याभिघातैरतिपीडनैर्वा ॥ ४ ॥
रूक्षान्नपानैरतिरोचितैर्वा शोकेन मिथ्याप्रतिकर्मणा वा ।
विचेष्टितैर्वा विषमातिमात्रैः कोष्ठे प्रकोपं समुपैति वायुः ॥ ५ ॥
कफं च पित्तं च स दूषयित्वा प्रोद्धूय मार्गान्विनिबद्ध्य ताभ्याम् ।
हृन्नाभिपार्श्वोदरबस्तिशूलं करोत्यधो याति न बद्धमार्गः ॥ ६ ॥
सब प्राणियों के लिये पिता के समान मंगलकारी भूत और भविष्य के
स्वामी, वाग्मियों में श्रेष्ठ, पुनर्वसु ने गुल्म के नाश के लिये खूब सुपरीक्षित
चिकित्सा का उपदेश किया ।
कोष्ठ मे वायु के कुपित होने के कारण—( १ ) पुरीष, कफ और पित्त
इनके अतिस्राव से, अथवा ( २ ) इनके अधिक बढ़कर रुकावट पैदा करने
से, ( ३ ) मलमूत्र के उपस्थित वेगों को रोकने से, ( ४ ) चोट लगने से,
( ५ ) अति दबाव पड़ने से, ( ६ ) रूक्ष, खान-पान के अति सेवन से, ( ७ )
शोक से, ( ८ ) वमन-विरेचन के मिथ्याचरण से और ( ९ ) विषम चेष्टाओ
से कोष्ठ में वायु प्रकुपित हो जाता है। यह कुपित वायु कफ और पित्त को
दूषित और अपने स्थान से विचलित करके मागों को रोक लेता है। इससे
हृदय, नाभि, पार्श्व, उदर तथा बस्ति में शूल उत्पन्न होता है। मार्ग के रुकने
से वायु नीचे गुदा की ओर नही जा सकता ॥ ३-६ ॥
पक्वाशये पित्तकफाशये वा स्थितः स्वतन्त्रः परसंश्रयो वा ।
स्पर्शोपलभ्यः परिपिण्डितत्वाद् गुल्मो यथादोषमुपैति नाम ॥ ७ ॥
पक्वाशय में, पित्ताशय में, कफाशय में स्वतन्त्र या परतन्त्र रूप से जब वायु
स्पर्श से जानने योग्य पिण्डाकार रूप मे हो जाता है तब दोषानुसार इसके
वात-गुल्म आदि नाम होते हैं।