चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५७३
अ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५७३ वचोमूत्रानिलकृतान्विबन्धानग्निमार्दवम् ॥ १५२ ॥ कासं गुल्ममुदावर्त्तं फलारिष्टो व्यपोहति । अग्निसन्दीपनो ह्येष कृष्णात्रेयेण भाषितः ॥ १५३ ॥ इति फलारिष्टः । ( ३८ ) फलारिष्ट—गुठलीरहित हरड़ १ प्रस्थ, गुठलीरहित आवले १ प्रस्थ, विशाला ( इन्द्रवारुणा ), कपित्थ ( कैथ ), पाठा और चित्रक- मूल प्रत्येक द्रव्य दो पल इन सब वस्तुओ को कूट कर दो द्रोण पानी मे क्वाथ करना चाहिये । चतुर्थांश रहने पर छान लेना चाहिये । इसमे गुड़ १०० पल मिला कर घी से भावित घडे मे १५ दिन तक रख देना चाहिये । इसके पीछे ग्रहणी, अर्शारोग, हृदय, पाण्डुरोग, प्लीहा, कामला, विषम ज्वर, मल-मूत्र वायुजन्य विबन्धो मे, अग्निमान्द्य मे, कास, गुल्म और उदावर्त्त मे पीना चाहिये । यह फलारिष्ट अग्नि-सन्दीपक है । इसका कृष्णात्रेय ने उपदेश किया है ॥ १४६-१५३ ॥ दुरालभायाः प्रस्थः स्याच्चित्रकस्य वृषस्य च । पथ्यामलकयोश्चैव पाठाया नागरस्य च ॥ १५४ ॥ दन्त्याश्च द्विपलान् भागाञ्जलद्रोणे विपाचयेत् । पादावशेषे पूते च सुशीते शर्कराशतम् ॥ १५५ ॥ दत्त्वा कुम्भे दृढे स्थाप्यं मासार्धं घृतभाजने । प्रलिप्ते पिप्पलीचव्यप्रियङ्गुक्षौद्रसर्पिषा ॥ १५६ ॥ तस्य मात्रा पिवेत्काले शार्करास्य यथाबलम् । अर्शांसि ग्रहणीदोषमुदावर्त्तमरोचकम् ॥ १५७॥ शकृन्मूत्रानिलोद्गारविबन्धानग्निमार्दवम् । हृद्रोग पाण्डुरोग च सर्वमेतेन साधयेत् ॥ १५८ ॥ इति शर्करासवः । ( ३६ ) शर्करारिष्ट—दुरलभा १ प्रस्थ, चीता, बासा, हरड़, आवला, पाठा, सोठ, दन्तीमूल प्रत्येक द्रव्य दो पल लेकर एक द्रोण पानी मे क्वाथ करना चाहिये । चतुर्थांश रहने पर छान लेना चाहिये । इसमे गुड़ १०० पल मिला कर घी से भावित घड़े मे १५ दिनो तक रख देना चाहिये । घड़े को पिप्पली, चव्य, प्रियगु, मधु और घी के कल्क से प्रथम लेप कर देना चाहिये । पीछे तैय्यार होने पर बल और मात्रानुसार इसको पीना चाहिये, इसको प्रति- दिन प्रातः पीना चाहिये । यह अर्श, ग्रहणी, उदावर्त्त, अरुचि, मल-मूत्र और
५७४ चरकसंहिता [ अ० १४ वायु के विबन्ध, उद्गार, अग्नि-मार्दव ( मन्दता ) हृदयरोग और पाण्डुरोग सब को शान्त करता है ॥ १५४-१५८॥ नवस्यामलकस्यैका कुर्याज्जर्जरिता तुलाम् । कुडवांशांश्च पिप्पल्यो विडङ्गं मरिचं तथा ॥ १५६॥ पाठां मूलं च पिप्पल्याः क्रमुकं चव्यचित्रकौ । मञ्जिष्ठा वालुकं लोध्रं पलिकानुपकल्पयेत् ॥ १६० ॥ कुष्ठं दारुहरिद्रा च सुराह्वां सारिवाद्वयम् । इन्द्राह्वं भद्रमुस्तं च कुर्यादर्धपलोन्मितम् ॥ १६१ ॥ चत्वारि नागपुष्पस्य पलान्यभिनवस्य च । द्रोणाभ्यामम्भसो द्वाभ्या साधयित्वाऽवतारयेत् ॥ १६२॥ पादावशेषे पूते च शीते तस्मिन्समावपेत् । मृद्वीकाद्वयाढकरसं शीतं निर्यूहसंमितम् ॥ १६३ ॥ शर्करायाश्च भिन्नाया दद्याद् द्विगुणितां तुलाम् । कुसुमस्य रसस्यैकमर्धप्रस्थं नवस्य च ॥ १६४ ॥ त्वगेलासवपत्राम्बुसेन्यक्रमुककेशरान् । चूर्णयित्वा तु मतिमान्कार्षिकानत्र दापयेत् ॥ १६५ ॥ तत्सर्वं स्थापयेत्पक्षं सुचौक्षे घृतभाजने । प्रलिप्ते सर्पिषा किञ्चिच्छर्करागुरुधूपिते ॥ १६६ ॥ पक्षादूर्ध्वमरिष्टोऽय कनको नाम विश्रुतः । पेयः स्वादुरसो हृद्यः प्रयोगाद्वक्त्ररोचनः ॥ १६७॥ अशांसि ग्रहणीदोषमानाहमुदर ज्वरम् । हृद्रोग पाण्डुता शोषं गुल्म वर्चोविनिग्रहम् ॥ १६८॥ कासं श्लेष्मामयाश्चोग्राञ् सर्वानैवापकर्षति । वलीपलितखालित्यं दोषज च व्यपोहति ॥ १६६ ॥ इति कनकारिष्टः । (४०) कनकारिष्ट—नूतन आवला १०० पल लेकर इसको जर्जरित कर लेना चाहिये । पिप्पली ४ पल, बायविडंग, मरिच, पाठा, पिप्पली मूल, क्रमुक ( सुपारी), चव्य, चित्रक, मजीठ, एलावालुक, लोध्र प्रत्येक द्रव्य एक पल, कूट, दारुहल्दी, देवदारु [ वृद्ध वाग्भट में शताह्वा पाठ होने से सौंफ ], श्वेत सारिवा, कृष्ण सारिवा, इन्द्रजौ, नागरमोथा प्रत्येक द्रव्य आधा पल, नूतन नागकेसर ४ पल इन सब द्रव्यों को कूट कर दो द्रोण पानी में पकाना चाहिये । जब आधा रह जाये तब उतार लेना चाहिये । इसको छान
अ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५७५ कर शीतल होने पर इसमे द्राक्षा का क्वाथ १ आढक (द्राक्षा को दो आढक पानी मे पका कर जब आधा रह जाये तब छान कर) मिलाना चाहिये। इसमे बारीक शक्कर २०० पल, मधु आधा प्रस्थ, दालचीनी, इलायची, प्लव (कैवर्त्त मुस्ता), तेजपात, अम्बु, (बालक), सेव्य (खस), क्रमुक (सुपारी), नाग- केसर प्रत्येक द्रव्य का चूर्ण एक कर्ष मिला लेना चाहिये। इन सब को घी से भावित शर्करा, गुड़ से दूषित, पवित्र पात्र मे रख देना चाहिये। पन्द्रह दिन के पीछे स्वर्ण के समान वर्ण करने से कनकारिष्ट नामक अरिष्ट बनता है। इसको प्रतिदिन पीना चाहिये। यह मधुर रस, हृदय के लिये प्रिय अन्न मे रुचिकारक, अर्श, ग्रहणी रोग, आनाह, उदररोग, ज्वर, हृदयरोग, पाण्डु- रोग, शोथ, गुल्म, मलबन्ध, कास, कफजन्य, रोगो को तथा दोषजन्य वलि, पलित (वालोका श्वेत होना) और खालित्य (गज) को नष्ट करता है॥१५६-१६६॥ पत्रभङ्गोदकैः शौचं कुर्यादुष्णेन चाम्भसा। इति शुष्कार्शसा सिद्धमुक्तमेतच्चिकित्सितम् ॥ १७० ॥ चिकित्सितमिदं सिद्ध स्राविणां शृण्वतः परम् । (४१) पत्रभग एरण्ड आदि वातनाशक पत्तों के क्वाथ से तथा गरम पानी से शौच कार्य करना चाहिये। यह शुष्कार्शो की सिद्ध फल चिकित्सा कह दी है। इसके आगे स्रावी (आर्द्र) अर्शों की सिद्ध फल चिकित्सा को कहते हैं १ ॥ १७०- ॥ तत्रानुबन्धो द्विविधः श्लेष्मणो मारुतस्य च ॥ १७१ ॥ विट् श्यावं कठिनं रूक्षं चाधो वायुर्न वर्तते । तनु चारुणवर्णं च फेनिलं चासृगर्शसाम् ॥ १७२ ॥ कट्यूरूदशूलं च दौर्बल्यं यदि चाधिकम् । तत्रानुबन्धो वातस्य हेतुर्यदि च रूक्षणम् ॥ १७३ ॥ रक्त-पित्तोल्बण स्रावयुक्त अर्शों की चिकित्सा— रक्त पित्तोल्बण (स्रावयुक्त) अर्शों मे दो प्रकार का अनुबन्ध होता है। एक वायु का और दूसरा कफ का। इसमे यदि मल कृष्ण वर्ण, कठिन, रूक्ष हो, अपान वायु बाहर न आये, अर्श में से निकलने वाला रक्त पतला झागदार, लाल रंग का हो, कटि, गुदा १ पत्रभंग—अर्श नाशक, जो वस्तुऐ अर्शनाशक है, वे वातनाशक है। इसलिये वातनाशक पत्तो के क्वाथ से शौच कार्य करना चाहिये। जैसे-'पत्रभङ्गै- रिति वातघ्नैः ऐरण्डादिपल्लवैः ।' डल्हण ।
५७६ चरकसंहिता [अ० १४ और ऊरु मे दर्द होता हो, निर्बलता अधिक हो, अर्श रोग का कारण रूक्ष हो तो वायु का अनुबन्ध समझना चाहिये ॥ १७१-१७३ ॥ शिथिलं श्वेतपीतं च विट् स्निग्धं गुरु शीतलम् । यद्यर्शसा घनं चासृक् तन्तुमत् पाण्डु पिच्छिलम् ॥ १७४ ॥ गुदं सपिच्छं स्तिमितं गुरु स्निग्ध च कारणम् । श्लेष्मानुबन्धो विज्ञेयस्तत्र रक्ताशसा बुधः ॥ १७५ ॥ यदि मल शिथिल (पतला), श्वेत या पीले रंग का, स्निग्ध, गुरु ओर शीतल हो, अर्श मे से निकलने वाला रक्त घना रेशे वाला, पाण्डु वर्ण ओर पिच्छिल (चिकासयुक्त) हो, गुदा पिच्छा (चिकास) से युक्त और स्तिमित हो, रोग का कारण गुरु आर स्निग्ध खानपान हो तो रक्तजन्य अशो मे कफ का अनुन्ध समझना चाहिये ॥ १७४-१७५ ॥ स्निग्धशीतं हितं वाते रूक्षशीतं कफानुगे । चिकित्सितमिदं तस्मात् सम्प्रधार्ये प्रयोजयेत् ॥ १७६ ॥ वायु के अनुबन्ध मे स्निग्ध और शीतल चिकित्सा, कफ के अनुबन्ध मे रूक्ष और शीतल चिकित्सा हितकारी है यह सोच कर कार्य प्रारम्भ करना चाहिये ॥ १७६ ॥ पित्तश्लेष्माधिकं मत्वा शोधनेनोपपादयेत् । स्रवणं चाप्युपेक्षेत लंघनैर्वा समाचरेत् ॥ १७७ ॥ अर्श मे पित्त-कफ की प्रधानता को देखकर प्रथम शोधन (विरेचन) करना चाहिये । अथवा लघन कराना चाहिये । बहते हुए दूषित रक्त की उपेक्षा करनी चाहिये, इसको रोकना नहीं चाहिये ॥ १७७ ॥ प्रवृत्तमादावर्शोभ्यो यो निगृह्णात्यबुद्धिमान् । शोणितं दोषमलिनं तद्रोगाञ्जनयेद्बहून् ॥ १७८ ॥ रक्तपित्तं ज्वरं तृष्णामग्निनाशमरोचकम् । कामलां श्वयथु शूलं गुदवंक्षणसंश्रयम् ॥ १७९ ॥ कण्ड्वूरुःकोठपिडकाः कुष्ठं पाण्ड्वामयं गदम् । वातमूत्रपुरीषाणा विबन्धं शिरसो रुजम् ॥ १८० ॥ स्तैमित्यं गुरुगात्रत्वं तथाऽन्यान्रक्तजान् गदान् । तस्मात्स्रुते दुष्टरक्तं रक्तसंग्रहणं मतम् ॥ १८१ ॥ जो वैद्य प्रथम अर्शों से बहते हुए दूषित रक्त को रोक देता है, वह मूढ है । क्योकि रोका हुआ दूषित रक्त बहुत से रोगों को उत्पन्न कर देता है।
अ० १४ ] ३७ चिकित्सितस्थानम् ५७७
अ० १४ ] ३७ चिकित्सितस्थानम् ५७७ जैसे—रक्तपित्त, ज्वर, तृष्णा, अग्निमान्द्य, अरोचक, कामला, श्वयथु, गुदा मे शूल, वक्षण ( कोख ) मे शूल, कण्डू, कोठ, पिडकाये, कुष्ठ, पाण्डुरोग, वायु, मूत्र, मल की विबन्धता, शिरोवेदना, स्तिमितता, शरीर मे भारीपन, अन्य रक्त- जन्य रोगो को उत्पन्न कर देता है । इसलिये दूषित रक्त के निकल जाने पर ही रक्त का रोकना हितकारी है । प्रारम्भ मे नही रोकना चाहिये ॥ १७८-१८१ ॥ हेतुलक्षणकालज्ञो बलशोणितवर्णवित् । कालं तावदुपेक्षेत यावन्नात्ययमाप्नुयात् ॥ १८२ ॥ हेतु, लक्षण और काल को समझने वाले तथा बल और शुद्ध एव अशुद्ध रक्त के वर्ण की पहिचान करने वाले वैद्य को चाहिये कि रक्तस्राव की उपेक्षा उस समय तक करता रहे जब तक कि भयानक रूप धारण न करले, अथवा काई घातक रूप पैदा न करे १ ॥ १८२ ॥ अग्निसन्दीपनार्थं च रक्तसङ्ग्रहणाय च । दोषाणा पाचनार्थं च परं तिक्तेरुपाचरेत् ॥ १८३ ॥ ( ४२ ) अग्नि को बढ़ाने के लिये और रक्त को रोकने के लिये तथा दोषा के पाचन के लिये तिक्त क्वाथों से या तिक्त घृतो से चिकित्सा करना श्रेष्ठ है॥१८३॥ यत्तु प्रक्षीणदोषस्य रक्त वातोल्बणस्य च । वर्तते स्नेहसाध्य तत्पानाभ्यङ्गातुवासनैः ॥ १८४ ॥ यत्तु पित्तोल्बण रक्तं घर्मकाले प्रवर्त्तते । स्तम्भनीय तदेकान्तान्न चेद्वातकफानुगम् ॥ १८५ ॥ जिस व्यक्ति के दोष क्षीण हो गये हो और रक्त मे वायु की प्रधानता हो, उसके लिये पान, अभ्यग और अनुवासन मे स्नेह क्रिया का उपयोग करना चाहिये । वह रोगी स्नेहसाध्य है और जिस रक्त मे पित्त की प्रधानता हो तथा ग्रीष्म काल मे रक्त स्रवित होता है, उसके लिये स्तम्भन-चिकित्सा करनी चाहिये, इस रक्त का रोकना ही उत्तम है । परन्तु स्तम्भन क्रिया मे यह देख लेना चाहिये कि इस रक्त मे वायु और कफ का ससर्ग न हो । यदि कफ का अनुबल हो तो उपेक्षा अथवा लघन करना चाहिये ॥१८४-१८५॥ कुटजत्वङ्निर्यूहः सनागरः स्निग्धरक्तसंग्रहणः । त्वग्दाडिमस्य तद्वत्सनागरश्चन्दनरसश्च ॥ १८६ ॥ १ शुद्ध रक्त की परीक्षा—तपनेन्द्रगोपप्रतिम पद्माक्तकसन्निभम् । गुञ्जाफलसवर्णं च विशुद्धं विद्धि शोणितम् ॥च०सू०२४॥ अशुद्ध रक्त के लिये देखिये चरक०सूत्रस्थान अ०२४और सुश्रुतसूत्रस्थान अ०१२॥
५७८ चरकसंहिता [ अ० १४ ( ४३ ) कूड़े की छाल के क्वाथ के साथ थोडा सा सोठ चूर्ण मिला कर लेने से स्निग्ध रक्त (कफ मिश्रित रक्त का) अवरोध होता है । इसी प्रकार से अनार की छाल और चन्दन के क्वाथ को सोंठ के चूर्ण के साथ देने से स्निग्ध रक्त का अवरोध होता है ॥ १८६ ॥ चन्दनकिराततिक्तकधन्वयवासाः सनागराः कथिताः । रक्तार्शासां प्रशमना दार्बीत्वगुशीरनिम्बाश्च ॥ १८७ ॥ (४४) चन्दन, चिरायता, धमासा, बासा और सोंठ, दारुहल्दी की छाल, खस तथा नीम की छाल इनका क्वाथ रक्तजन्य अर्श मे शान्ति करता है । दारुहल्दी की छाल, खस और नीम की छाल इनको पृथक् भी प्रयोग करने से रक्त रुकता है ॥ १८७ ॥ सातिविषा कुटजत्वक् फलं च सरसाञ्जनं मधुयुतानि । रक्तापहानि दद्यात्पिपासवे तण्डुलजलेन ॥ १८८ ॥ (४५) अतीस, कूड़े की छाल, इन्द्रजौ, रसौत इनके चूर्ण को मधु मे मिला कर प्यास लगने पर तण्डुलोदक के साथ देना चाहिये । यह योग रक्तनाशक है ॥ १८८ ॥ कुटजत्वचो विपाच्यं पलशतमाद्रं महेन्द्रसलिलेन १ । यावत्स्याद् गतरसं तद्द्रव्यं पूतो रसस्ततो ग्राह्यः ॥ १८९ ॥ मोचरसः समङ्गा फलिनी च पलांशिकै २ स्त्रिभिस्तैश्च । वत्सकबीजं तुल्यं चूर्णीकृतमत्र प्रदातव्यम् ॥ १९० ॥ पूतोत्कथितः सान्द्रः स रसोऽदार्वाप्रलेपनो ग्राह्यः । मात्राकालोपहिता रसक्रियैषा जयत्यसृक्स्रावम् ३ ॥ १९१ ॥ छागलिपयसा युक्ता ४ पेया मण्डेन वा यथाग्निबलम् । जीर्णौषधश्च शालीन् पयसा छागेन भुञ्जीत ॥ १९२ ॥ रक्तार्शांस्यतिसारं रक्तं सासृग्रुजो निहन्त्याशु । बलवच्च रक्तपित्तं रसक्रियैषा जयत्युभयभागम् ॥ १९३ ॥ इति कुटजादिरसक्रिया । (४६) कुटजादि-रस-क्रिया—कूडे की गीली छाल १०० पल लेकर बरसात का पानी एक द्रोण लेकर इसमे क्वाथ करना चाहिये । जब सब रस निकल जाये और अष्टमाश रह जाये तब छान लेना चाहिये । इसमें मोचरस (सीम्बल का १ 'तु मेघसलिलेन' इति, २ 'समांशिकै' इति, ३ 'जयति रक्तम्' इति, ४ 'पीता' इति च पाठान्तराणि ।
अ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५७६ गोंद ), समंगा ( मजीठ या लाजवन्ती ) और फलिनी ( प्रियंगु ) प्रत्येक द्रव्य समान भाग ( १, १ पल ) और तीनो के बराबर इन्द्रजौ का चूर्ण ( ३ पल ) इस क्वाथ मे मिलाना चाहिये । इसको अग्नि पर गरम करना चाहिये । जिस समय पकते-पकते यह अवलेह के समान हो जाये तथा कड़छी के साथ उठने लगे तो इसको उतार लेना चाहिये । इसमे से अग्नि बल के अनुसार रस-क्रिया की मात्रा खानी चाहिये । यह अवलेह रक्त को शान्त करता है । औषध के जीर्ण होने पर पेया को बकरी के दूध के साथ अथवा मण्ड के साथ पीना चाहिये । अथवा बकरी के दूध के साथ चावलो को खाना चाहिये । यह रस-क्रिया, रक्तजन्य अर्शोग को, रक्तातिसार को, रक्त सहित वेदना को ( रक्त-स्राव से उत्पन्न रोगो को ) बलवान् रक्तपित्त को चाहे वह किसी भी मार्ग से प्रवृत्त होता है, सब को शान्त करता है । ऊर्ध्वग रक्तपित्त साध्य है, अधोगामी याप्य है ॥ १८६-१६३ ॥ नीलोत्पलं समङ्गा मोचरसश्चन्दनं तिला लोध्रम् । पीत्वा छागलिपयसा भोज्यं पयसैव शाल्यन्नम् ॥ १६४ ॥ ( ४७ ) नीला कमल, समगा ( लाजवन्ती ), मोचरस (सीम्बल की गोद), तिल, पठानी लोध इनको समान भाग लेकर चूर्ण कर लेना चाहिये । इसको ( ६ माशे लेकर ) बकरी के दूध के साथ पीना चाहिये । जीर्ण होने पर बकरी के दूध के साथ चावल ( हेमन्त ऋतु मे पके ) खाने चाहिये ॥ १६४ ॥ छागलिपयः प्रयुक्तं निहन्ति रक्तं सवास्तुकंरसं च । धन्वविहङ्गमृगाणां रसो निरम्लः कदम्लो वा ॥ १६५ ॥ ( ४८ ) बथुए के रस मे बकरी का दूध मिलाकर पीने से रक्तस्राव रुकता है । इसी प्रकार जागल पशु-पक्षियो के मास-रस को अनार के रस आदि से थोड़ा खट्टा बना कर अथवा बिना खट्टा किये पीने से रक्त-स्राव रुकता ॥ १६५ ॥ पाठा वत्सकबीजं रसाञ्जनं नागरं यवान्यश्च । बिल्वमिति चार्शसैश्र्चूर्णितानि पेयानि सशूलेषु ॥ १६६ ॥ ( ४६ ) पाठा, इन्द्रजौ, रसौत, सोंठ, अजवायन और बेलगिरी इनको परस्पर समान भाग लेकर चूर्ण कर लेना चाहिये । इस चूर्ण को ( ६ माशा मात्रा में ) पानी के साथ पीने से शूलयुक्त अर्श-रोग शान्त होते हैं ॥ १६६ ॥ दार्वी किरातातिक्तं मुस्तं दुःस्पर्शकश्च रुधिरघ्नम् । रक्तेऽतिवर्तमाने शूले च घृतं विधातव्यम् ॥ १६७ ॥
५८० चरकसंहिता [ अ० १४ (५०) दारूहल्दी, चिरायता, नागरमोथा और कौंच इनका चूर्ण या क्वाथ रक्तनाशक है । परन्तु यदि रक्त बहुत होता हो और शूल हो तो इनके क्वाथ में इन्हीं के कल्क से घृत सिद्ध करके प्रयोग करना चाहिये ॥ १६७ ॥ कुटजफलवल्ककेशरनीलोत्पललोध्रधातकीकल्कैः । सिद्धं घृतं विधेयं शूले रक्तार्शसां भिषजा ॥ १६८ ॥ (५१) वैद्य को चाहिये कि रक्तार्श में यदि शूल भी हो तो कुड़े की छाल और इन्द्रजो, नागकेशर, नीला कमल, पठानी लोध, धाय के फूल इनका कल्क मिलित १ पाव, पानी ४ सेर और घृत १ सेर लेकर घृत सिद्ध करना चाहिये । यह घृत रक्तार्श में उत्तम है ॥ १६८ ॥ सर्पिः सदाडिमरसं सयावशूकं जयत्याशु । रक्तं सशूलमथवा निदिग्धिकादुग्धिकासिद्धम् ॥ १६६ ॥ (५२) अनार के रस में और यावशूक (जवासे) के रस में घी सिद्ध करके लेने से अथवा छोटी कटेरी और दधि के रस में सिद्ध किया घृत शूलयुक्त रक्त-स्राव को शान्त करता है ॥ १६६ ॥ लाजापेया पीता चुक्रिका केशरोत्पलैः सिद्धा । हन्त्याश्वस्रक्स्रावं तथा बलापृश्निपर्णीभ्याम् ॥ २०० ॥ (५३) चुक्रिका (चांगेरी), केशर (नागकेशर) और कमलगट्टे से सिद्ध की हुई लाजा से बनी पेया पीने से रक्तस्राव रुकता है । अथवा बला और पृश्निपर्णी द्वारा लाजा से बनी पेया को सिद्ध करके पीना चाहिये ॥ २०० ॥ ह्रीबेरबिल्वनागरनिर्यूहे साधिता सनवनीताम् । वृक्षाम्लदाडिमाम्लामम्लीकाम्ला सकोलाम्लाम् ॥ २०१ ॥ गृञ्जनकसुरासिद्धां भृष्टा यमकेन वा पिबेत्पेयाम् । रक्तातिसारशूलप्रवाहिकाशोथनिग्रहणीम् ॥ २०२ ॥ (५४) ह्रीवेर (नेत्रबाला), बेलगिरी, सोंठ इनके क्वाथ में पेया को सिद्ध करे । इस पेया को वृक्षाम्ल (समगदाना), अनारदाना, इमली, खट्टे बेर इनसे खट्टा बना कर मक्खन मिला कर पीना चाहिये । अथवा गृञ्जनक (शलजम या प्याज) के रस में सिद्ध पेया को घी और तैल यमक में भून कर पीना चाहिये। ये पेया रक्तातिसार, शूल, प्रवाहिका और शोथ को हटाती है ॥२०२॥ काश्मर्यामलकानां सकर्बुदारफलाम्लानाम् । गृञ्जनकशाल्मलीनां क्षीरिण्याश्चुक्रिकायाश्च ॥ २०३ ॥
अ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५८१
अ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५८१ न्यग्रोधशुङ्गानां खडास्तथा कोविदारपुष्पाणाम् । दध्नः सरेण सिद्धान्द्याद्रक्ते प्रवृत्तेऽति ॥ २०४ ॥ (५५) रक्त के अतिस्राव होने पर—गम्भारी, आवला और कर्बुदार (कचनार का भेद) इनके फलो से गृञ्जनक (प्याज़), सिम्बल, दूधी तथा चागेरी (चोपतिया), बरगद के कोमल पत्ता से, कोविदार (कचनार) के फूलो से सिद्ध किये पदाथो (पेया आदि) को दही की मलाई के साथ देना चाहिये ॥ २०३-२०४ ॥ सिद्धं पलाण्डुशाकं तक्रेणोपोदिकां सबदराम्लाम् । रुधिरस्रुतौ प्रदद्यान्मसूरयूषं च तक्राम्लम् ॥ २०५ ॥ (५६) तीनयोग—(१) प्याज के शाक को बेर से खट्टा करके तक्र के साथ, (२) उपोदिका (पोई या लुणी शाक) के शाक को बेर से खट्टा करके तक्र के साथ, (३) मसूर की दाल को तक्र से खट्टा करके रक्त स्राव मे देना चाहिये । ये तीन योग है ॥ २०५ ॥ पयसा शृतेन यूषैर्मसूरमुद्गाढकीमकुष्ठानाम् । भोजनमद्यादम्लैः शालिश्यामाककोद्रवजम् ॥२०६॥ (५७) शालि धान्य, श्यामाक (सावक), कोद्रव (कोदों) धान्यों को दूध मे सिद्ध करके मसूर, मूग, अरहर या मोठ इनको अनार, आवला, बेर आदि द्वारा खट्टे बनाये यूषो के साथ खाना चाहिये ॥ २०६ ॥ शशहरिणलावमासैः कपिञ्जलैणेयैः सुसिद्धैश्च । भोजनमद्यादम्लैर्मधुरैरुपत्समरिचैर्वा ॥ २०७ ॥ (५८) अथवा शशक, हरिण, बटेर, कपिञ्जल, एण (हरिण का भेद) इनके मास-रसो को सिद्ध करके अनार के रस से थोडा खट्टा मधुर करके थोड़ा सा काली मरिच का चूर्ण मिला कर खाना चाहिये ॥ २०७ ॥ दक्षशिखिनित्तिररसैर्द्विककुल्लोपाकजैश्च मधुराम्लैः । अद्याद्रसैरतिवहेष्वर्शःस्वनिलोल्वणशरीरः ॥ २०८ ॥ (५६) दक्ष (कुक्कुट), शिखि (मोर), तीतर, द्विककुद (ऊट) और लोपाक (शृगाल का भेद) इनके मास-रसो को मीठा खट्टा (अनार रस या बेर द्वारा) बना कर वात-प्रधान रक्तार्शो मे खाना चाहिये ॥ २०८ ॥ रसखड्यूषयवागूसंयोगतः १ केवलोऽथवा जयति । रक्तमतिवर्तमानं वातं च पलाण्डुरुपयुक्तः ॥ २०६॥ १ 'संयुक्त' इति वा पाठ ।
५८२ चरकसंहिता [ अ० १४ (६०) पलाण्डु (प्याज) अकेला स्वतन्त्र रूपमे अथवा मास-रस खड, यूष वा यवागू के साथ लेने से अति रक्तस्राव और वायु का शमन करता है ॥२०६॥ छागान्तराधितरुणं सरुधिरमुपसाधितं बहुपलाण्डु । व्यत्यासान्मधुराम्ल विट्शोणितसङ्क्षये देयम् ॥२१०॥ (६१) जवान बकरी के शरीर का मध्य भाग ( यकृत् भाग और फेफड़े ) रक्त सहित लेकर प्याज के साथ सिद्ध करना चाहिये । मल और रक्त का क्षय होने पर क्रमशः मधुर तथा अम्ल रूप मे प्रयोग करना चाहिये । प्रथम मधुर देना चाहिये, पीछे अम्ल और फिर मधुर फिर अम्ल इस प्रकार से देना चाहिये २१० नवनीततिलाभ्यासात्केसरनवनीतशर्कराभ्यासात् । दधिसरमथिताभ्यासादर्शारस्यपयान्ति रक्तानि ॥२११॥ (६२) रक्तजन्य अर्शों के लिये तीन योग—( १ ) मक्खन और तिल का चूर्ण नित्य प्रति खाना चाहिये । ( २ ) नागकेशर, मक्खन और मिश्री नित्य खानी चाहिये । ( ३ ) दही की मलाई का मथ कर प्रतिदिन खाने से रक्तजन्य अर्श शान्त होते है ॥ २११ ॥ नवनीतघृतं छागं मांसं सषष्टिकः शालिः । तरुणश्च सुरामण्डस्तरुणी च सुरा निहन्त्यस्रम् ॥२१२॥ ( ६३ ) नवनीत (ताजा मक्खन ), घी ( बकरी का ), बकरी का मास, साठी चावल, तरुण सुरामण्ड ओर तरुणसुरा ( जो पुरातन न हो ) ये रक्तस्राव को नष्ट करते है ॥ २१२ ॥ प्रायेण वातबहुलान्यर्शांसि भवन्त्यतिस्रुते रक्ते । दुष्टेऽपि कफपित्ते तस्मादनिलोऽधिको ज्ञेयः॥२१३॥ कफ, पित्त, दूषित होने पर भी रक्त का अधिक स्राव होने से प्राय. अर्श में वायु की प्रबलता हो जाती है, इसलिये वायु को मुख्य समझना चाहिये २१३ दृष्ट्वा तु रक्तपित्त प्रबल कफवातलिङ्गमल्पं च । शीताः क्रियाः प्रयोज्या यथेरिता वक्ष्यते चान्या ॥२१४॥ मधुकं सपञ्चवल्कं बदरीत्वगुदुम्बर धवपटोलम् । परिषेचने विदध्याद् वृषककुभमयवासनिम्बांश्च ॥२१५॥ यदि रक्त, पित्त प्रबल हों, वायु और कफ के लक्षण मन्द हो तो पूर्वकथित तथा अन्य आगे कहे जाने वाली शीतल क्रियाये बरतनी चाहिये । ( ६४ ) मुलहठी, पचवल्कल ( बरगद, गूलर, पीपल, पारस पीपल, जामुन इनकी छाल ), बेर की छाल, गूलर, धव ( धवा ), पटोल, वासा, ककुभ
अ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५८३ ( अर्जुन ), यवास ( जवासा ) और नीम की छाल इनका क्वाथ करके परि- षेचन करना चाहिये ॥ २१४-२१५ ॥ रक्तेऽतिवर्तमाने दाहे क्लेदेऽवगाहयेच्चापि । मधुकमृणालपद्मकचन्दनकुशकाशनिःक्वाथे ॥ २१६ ॥ इक्षुरसमधुकवेतसनिर्यूहे शीतले पयसि वा तम् । अवगाहयेत्प्रदिग्धं पूर्वं शिशिरेण तैलेन ॥ २१७॥ ( ६५ ) रोगी को जलन हो, रक्त का अतिस्राव होता हो, आर्द्रता हो तो मुलहठी, मृणाल ( कमलनाल ), पद्माख, चन्दन, कुश और काश इनके क्वाथ मे रोगी को अवगाहन कराना चाहिये । अथवा शरीर पर चन्दनादि शीतल द्रव्यो से साधित शीतल तैल लगवा कर रोगी को शीतल दूध मे या जल मे अथवा गन्ने का रस, मुलहठी और अम्लवेतस इनके शीतल क्वाथ में अवगाहन देना चाहिये ॥ २१६-२१७ ॥ दत्त्वा घृत सशर्करमुपस्थदेशे त्रिके च गुददेशे । शिशिरजलस्पर्शसुखा धारा प्रस्तम्भनी योज्या ॥ २१८ ॥ ( ६६ ) उपस्थ प्रदेश ( शिश्न भाग पेड़ू से सम्पूर्ण निचला प्रदेश ), गुदा ओर त्रिक ( कूल्हा ) प्रदेश पर शर्करा मिश्रित घृत मिलाकर लेप करना चाहिये । फिर इन स्थानों पर ठण्डे जल की धारा जो सहन हो सके बल से गिरानी चाहिये । इस प्रकार करने से रक्तस्राव रुक जाता है। जल-धारा बहुत तीव्र नही गिरानी चाहिये ॥ २१८ ॥ कदलीदलरभिनवः पुष्करपत्रैश्च शीतजलसिक्तैः । प्रच्छादनं मुहुर्मुहुरिष्टं पद्मोत्पलदलैश्च ॥ २१६ ॥ ( ६७ ) केले के नये कोमल पत्ता या कमल के पत्तों को शीतल जल से गीला करके अथवा पद्म और उत्पल के पत्तो से उपस्थ प्रदेश, गुदा और त्रिक- भाग पर बार बार रखना चाहिये । पुनः गरम होने पर उनका हटा कर फिर नये पत्ते रखने चाहिये ॥ २१६ ॥ दूर्वाघृत प्रदेहः शतधौतसहस्रधोतमपि सर्पिः । व्यजनपवनश्च शीतो रक्तस्राव जयत्याशु ॥ २२० ॥ ( ६८ ) दूर्वा के घृत का लेप, शतधौत या सहस्रधौत घृत का लेप अर्श मे करना चाहिये । इस प्रकार से पंखे की शीतल वायु रक्तस्राव को शान्त करती है ॥ २२० ॥ समङ्गामधुकाभ्यां तिलमधुकाभ्यां रसाञ्जनघृताभ्याम् । सर्जरसघृताभ्यां वा निम्बघृताभ्यां मधुघृताभ्यां च ॥२२१॥
५८४ चरकसंहिता [ अ० १४
दार्वीत्वक्सर्पिर्भ्यां सचन्दनाभ्याम्थोत्पलघृताभ्याम् ।
दाहे क्लेदे च गुदभ्रंशे गुदजाः प्रतिसारणीयाः स्युः ॥२२२॥
( ६६ ) अर्श के मस्सो पर प्रतिसारण करने के लिये नौ योग—(१) लाज-
वन्ती और मुलहठी का चूर्ण, ( २ ) तिल और मुलहठी का चूर्ण, ( ३ ) रसोत
और घी का लेप, ( ४ ) राल और घी का लेप, ( ५ ) नीम की छाल ओर घी,
( ८ ) चन्दन और घी के साथ, ( ६ ) मल और घी को दाह मे, क्लेद मे,
गुदभ्रंश मे ओर अर्श-रोग मे मस्सो पर प्रतिसारण करना चाहिये ॥२२१-२२२॥
आभिः क्रियाभिरथवा शीताभिर्यस्य तिष्ठति न रक्तम् ।
तं काले स्निग्धोष्णैर्मांसरसैस्तर्पयेन्मतिमान् ॥ २२३ ॥
अवपीडकसर्पिर्भिः कोष्णैर्घृततैलिकैस्तथाऽभ्यङ्गैः ।
क्षीरघृततैलसेकैः कोष्णैः समुपाचरेदाशु ॥ २२४ ॥
( ७० ) उपरोक्त प्रतिसारण से अथवा शीतल क्रियाओं द्वारा भी जिस
रोगी का रक्त बन्द न हो उसके लिये बृंहण-विधि बरतनी चाहिये ।
बुद्धिमान् वैद्य को चाहिये कि भोजन काल मे रोगी को स्निग्ध, उष्ण मास-
रसों से तर्पण करे । इसके लिये अवपीड़क-घृत ( भोजन के ऊपर अथवा
अधिक मात्रा में घृतपान ) का प्रयोग करना चाहिये । थोड़े गरम सुहाते हुए
गरम तैल और घृत से मालिश करनी चाहिये । कवोष्ण दूध या घी अथवा
तैल से सेक करना चाहिये ॥ २२३-२२४ ॥
कोष्णेन वातप्रबले घृतमण्डेनानुवासयेच्छीघ्रम् ।
पिच्छाबस्तिं दद्याद् बस्ति काले तस्याथवा सिद्धम् ॥ २२५ ॥
( ७१ ) वायु की प्रधानता होने पर कवोष्ण घृत-मण्ड से अनुवासन-बस्ति
देनी चाहिये । अथवा रोगी को समय २ पर सिद्ध पिच्छा की बस्तिया
देनी चाहिये ॥ २२५ ॥
यवासकुशकाशानां मूलं पुष्पं च शाल्मलम् ।
न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थशुङ्गांश्च द्विपलोन्मिताः ॥ २२६ ॥
त्रिप्रस्थं सलिलस्यैतत्क्षीरप्रस्थं च साधयेत् ।
क्षीरशेषं कषायं च पूतं कल्कैर्विमिश्रयेत् ॥ २२७ ॥
कल्काः शाल्मलिर्नियाससमङ्गाचन्दनोत्पलम् ।
वत्सकस्य च बीजानि प्रियङ्गु पद्मकेशरम् ॥ २२८ ॥
पिच्छाबस्तिरयं सिद्धः सघृतक्षौद्रशर्करः ।
प्रवाहिकागुदभ्रंशरक्तस्रावज्वरापहः ॥ २२६ ॥
इति पिच्छाबस्तिः ।
अ० १४ ] चिकित्सितस्थानम ५८५
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अ० १४ ] चिकित्सितस्थानम ५८५ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ( ७२ ) पिच्छाबस्ति—जवासा, कुश, काश की जडे, सीम्बल के पत्ते और वड़, गूलर, पीपल इनके कोमल पत्ते प्रत्येक वस्तु दो-दो पल, पानी तीन प्रस्थ, दूध १ प्रस्थ मिलाकर काथ करना चाहिये । जब केवल दूध मात्र शेष रह जाये तब छान लेना चाहिये । इसमे सीम्बल का गोद, लाजवन्ती, चन्दन, कमलगट्ठा, इन्द्रजौ, फूल, प्रियगु और पद्मकेशर ( कमल का केसर ) सब द्रव्य परस्पर समान भाग और मिलित दूध से चतुर्थांश लेकर दूध मे मिला देना चाहिये । इसमे घी, शहद ओर शक्कर भी मिला देना चाहिये । यह पिच्छा- बस्ति प्रवाहिका, गुदभ्रश, रक्तस्राव, ओर ज्वर मे प्रयोग करनी चाहिये ॥२२६-२२६॥ प्रपौण्डरीकं मधुकं पेष्यान् बस्तौ १ यथेरितान् । पिच्छाऽनुवासनं स्नेहं क्षीरद्विगुणितं पचेत् ॥ २३० ॥ ( ७३ ) प्रपौण्डरीकादि अनुवासन—पुण्डरीक काष्ठ, मुलहठी तथा पिच्छा- बस्ति मे कहे गये मोचरस आदि कल्क-द्रव्यो को पीस कर दुगने दूध से तैल- पाक करना चाहिये ॥ २३० ॥ ह्रीवेरमुत्पलं लोध्रं समङ्गाचव्यचन्दनम् । पाठा सातिविषा बिल्वं धातकी देवदारु च ॥ २३१ ॥ दार्वीत्वङ् नागरं मांसी मस्तं क्षारो यवाग्रजः । चित्रकञ्चेति पेष्याणि चाङ्गेरीस्वरसे घृतम् ॥ २३२ ॥ ऐकध्यं साधयेत्सर्पं तत्सर्पिः परमौषधम् । अर्शोतिसारग्रहणीपाण्डुरोगज्वराऽरुचौ ॥ २३३ ॥ मूत्रकृच्छ्रे गुदभ्रंशे बस्त्याध्माने २ प्रवाहणे । पिच्छास्रावेऽर्शसा शूले योज्यमेतत्तिदोषनुत् ॥ २३४ ॥ इति ह्रीवेरादिघृतम् । ( ७४ ) ह्रीवेरादि घृत—ह्रीवेर ( बाल ), कमल, लोध, लाजवन्ती या मजीठ, चव्य, चन्दन, पाठा, अतीस, बेलगिरी, धाय के फूल, देवदारु, दारु- हल्दी की छाल, सोंठ, जटामासी, मोथा, यवक्षार, चीता इन सब को समान भाग लेकर एक पाव ( २० तोला ) कल्क तैय्यार करना चाहिये । चागेरी ( चौपतिया ) का स्वरस ४ सेर, घी १ सेर लेकर घृतविधि से घृत पकाना चाहिये । यह घी अर्श, अतीसार, ग्रहणी, पाण्डुरोग, ज्वर, अरुचि, मूत्रकृच्छ्र, गुदभ्रश, बस्ति के आनाह मे, पिच्छा-स्राव मे और अर्जजन्य शूल मे प्रयोग करना चाहिये, यह घृत त्रिदोष नाशक है ॥ २३१-२३४ ॥
१. 'पिच्छाबस्तौ' इति वा पाठः । २ 'बस्त्यानाहे' इति पाठान्तरम् ।
५८६ चरकसंहिता [ अ० १४ अवाक्पुष्पी बला दार्वा पृश्निपर्णी त्रिकण्टकः । न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थशुङ्गाश्च द्विपलोन्मिताः ॥ २३५ ॥ कषाय एषा पेष्यास्तु जीवन्ती कटुरोहिणी । पिप्पली पिप्पलीमूलं नागरं सुरदारु च ॥ २३६ ॥ कलिङ्गाः शाल्मलं पुष्प वीरा चन्दनमुत्पलम् । कट्फल चित्रकं मुस्तं प्रियङ्ग्वतिविषास्थिराः ॥ २३७ ॥ पद्मोत्पलाना किञ्जल्कः समङ्गा सनिदिग्धिक। । बिल्वं मोचरसः पाठा भागाः कर्षसमन्विताः ॥ २३८ ॥ चतुःप्रस्थे शृतं प्रस्थं कषायमवतारयेत् । त्रिशत्पलानि प्रस्थोऽत्र विज्ञेयो द्विपलाधिकः ॥ २३९ ॥ सुनिषण्णकचाङ्गेर्याः प्रस्थौ द्वौ स्वरस्य च । सर्वैरेतैैर्यथोद्दिष्टैर्घृतप्रस्थ विपाचयेत् ॥ २४० ॥ एतदशर्शःस्वतीसारे रक्तस्रावे त्रिदोषजे । प्रवाहणे गुदभ्रंशे पिच्छासु विविधासु च ॥ २४१ ॥ उत्थाने चातिबहुशः शोथशूले गुदाश्रये । मूत्रग्रहे मूढवाते मन्देऽग्नावरुचावपि ॥ २४२ ॥ प्रयोज्यं विधिवत्सर्पिर्बलवर्णामिवर्धनम् । विविधेष्वन्नपानेषु केवलं वा निरत्ययम् ॥ २४३ ॥ इति सुनिषण्णकचाङ्गेरीघृतम् । (७५) चागेरी घृत—अवाक् पुष्पी (ओधा हुली), खरैटी, दारु हल्दी, पृश्निपर्णी, गोखरू, बरगद, गूलर, पीपल इनके कोमल पत्ते प्रत्येक वस्तु दो-दो पल लेकर चार प्रस्थ पानी मे कषाय करना चाहिये । जब एक प्रस्थ रह जाये तब उतार कर छान लेना चाहिये । यह कषाय एक प्रस्थ, चागेरी का स्वरस दो प्रस्थ और सुनिषण्णक (सुरवारी) का स्वरस दो प्रस्थ, घी एक प्रस्थ, कल्कर्थ—जीवन्ती, कुटकी, पिप्पली, पिप्पलीमूल, सोठ देवदारु, इन्द्रजौ, सिम्बल के फूल, वीरा (शालपर्णी या शतावरी), चन्दन, कमल, कायफल, चीता, मोथा, प्रियगु, अतीस, शालपर्णी, पद्म का केशर, उत्पल का केशर, लाजवन्ती, छोटी कटेरी, बेलगिरी, सिम्बल का गोंद, पाठा प्रत्येक वस्तु एक कर्ष लेकर, पीस कर कल्क बनाना चाहिये । इन सब से यथाविधि घृत-पाक करना चाहिये । यह घृत अर्शंरोग मे, अतीसार मे, त्रिदोषजन्य रक्तस्राव मे, प्रवाहण मे, गुदभ्रश मे, नाना प्रकार की पिच्छाओं मे, बार-बार थोड़ा-थोड़ा मल त्याग होने मे, गुदा की शोथ या शूल मे, मूत्र की रुकावट में, मूढवात मे,
[च० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५८७
[च० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५८७ अग्निमान्द्य मे और अरुचि मे इसका प्रयोग करना चाहिये । यह घृत बल, वर्ण और अग्नि को बढाता है । इस घृत को स्वतंत्र रूप से या नाना प्रकार के खान-पानो से मिला कर देना चाहिये । इस घृत-साधन मे प्रस्थ का परिमाण ३२ पल समझना चाहिये १ ॥ २३५-२४३ ॥ भवन्ति चात्र—व्यत्यासान्मधुराम्लानि शीतोष्णानि च योजयेत् । नित्यमग्निबलापेक्षी जयत्यर्शःकृतान् गदान् ॥ २४४ ॥ अग्नि, बल की अपेक्षा से अग्नि बल को बढाने के लिये परस्पर अदल- बदल से मधुर और अम्ल तथा शीत और उष्ण क्रिया का प्रयोग करना चाहिये । एक बार मधुर रस फिर अम्ल, एक बार शीतक्रिया फिर उष्णक्रिया करनी चाहिये । इस प्रकार से अर्शजन्य रोग शान्त होते है ॥ २४४ ॥ त्रयो विकाराः प्रायेण ये परस्परहेतवः । अर्शांसि चातिसारश्च ग्रहणीदोष एव च ॥ २४५ ॥ एषामग्निबले हीने वृद्धिवृद्धे परिक्षयः । तस्मादग्निबलं रक्ष्यमेषु त्रिषु विशेषतः ॥ २४६ ॥ अर्श, अतीसार और ग्रहणी ये तीन राग परस्पर एक दूसरे रोग की उत्पत्ति मे कारण है । इन तीनो रोगो मे अग्नि बल के घटने से रोग बढता है और अग्नि-बल के बढने पर रोग घटता । इसलिये इन तीन रोगो मे खास कर अग्नि के बल की रक्षा करनी चाहिये ॥ २४५-२४६ ॥ भृष्टैः शाकैर्यवागूभिर्यूषैर्मांसरसैः खडैः । क्षीरतक्रप्रयोगैश्च विचित्रैर्गुदजाञ्जयेत् ॥ २४७ ॥ भूने हुए शाको से (तैल, घी मे बने पत्तो के शाको से ), यवागुओ से, यूष से, मास रसो से, खड से तथा नाना प्रकार से दूध या तक्र का प्रयोग करने से अर्श-रोग की शान्ति करनी चाहिये ॥ २४७ ॥ यद्वायोरानुलोम्याय यदग्निबलवृद्धये । अन्नपानौषधद्रव्यं तत्सेव्यं नित्यमर्शसैः ॥ २४८ ॥ जो औषध वायु का अनुलोमन करे, जो खान-पान अग्नि को बढ़ाये, ये सब खान-पान तथा औषध प्रतिदिन अर्श रोगियो को सेवन करनी चाहिये ॥२४८॥ यदतो विपरीतं स्यान्निदाने यत्प्रदर्शितम् । गुदजाद्विपरीतेन तत्सेव्यं न कदाचन २ ॥ २४६ ॥ १. इस घृत को गदनिग्रह मे 'अवाक्पुष्पादि घृत' कहा है । २ 'कथचन' इति वा पाठः ।
स्थानसंस्थानलिङ्गानि साध्यासाध्यविनिश्चयः ॥ २५० ॥
५८८ चरकसंहिता [अ० १४ जो खान पान वायु का अनुलोमन न करे, अग्नि को न बढाये तथा निदान कारणों मे जिसकी गणना की गई है, वह सब अर्श-रोगी के लिये अपथ्य है। वह उनका सेवन कदापि न करे ॥ २४६ ॥ तत्र श्लोकाः-अर्शसा द्विविधं जन्म पृथगायतननि च । स्थानसंस्थानलिङ्गानि साध्यासाध्यविनिश्चयः ॥ २५० ॥ अभ्यङ्गाः स्वेदनं धूमाः सावगाहाः प्रलेपनाः । शोणितस्यावसेकश्च योगा दीपनपाचनाः ॥ २५१ ॥ पानान्नविधिरुग्र्यश्च वातवर्चोऽनुलोमनः । योगाः संशमनीयाश्च सर्पींषि विविधानि च ॥ २५२ ॥ बस्तयस्तक्रयोगाश्च वरारिष्टाः सशर्कराः । शुष्काणामर्शसा शस्ताः स्राविणा लक्षणानि च ॥ २५३ ॥ द्विविधं सानुबन्धाना तेषां चेष्टं यदौषधम् । रक्तसंग्रहणाः क्वाथाः पेयाश्च विविधात्मकाः ॥ २५४ ॥ स्नेहाहारविधिश्चाग्र्यो योगाश्च प्रतिसारणाः । प्रक्षालनावगाहाश्च प्रदेहाः सेचनानि च ॥ २५५ ॥ अतिवृत्तस्य रक्तस्य विधातव्यं यदौषधम् । तत्सर्वमिह निर्दिष्टं गुदजानां चिकित्सिते ॥ २५६ ॥ उपसहार-दो प्रकार के अर्श-रोग की उत्पत्ति, पृथक् पृथक् इनके कारण, स्थान, आकृति, लक्षण, साध्य-असाध्य, अभ्यग, स्वेदन, धूम प्रयोग, अवगाहन, प्रलेप, रक्त का अवसेक, दीपन-पाचन योग, वायु और मल की अनुलोमक खान पान विधि, सशमनीय योग, नाना प्रकार के घृत, बस्तिया, तक्र-प्रयोग, शुष्क अर्श रोगियो के लिये हितकारी शर्करारिष्ट, अरिष्ट, रक्तस्राव रोगियो के लक्षण, दो प्रकार का (वायु ओर कफ का) अनुबन्ध इनमे जो चिकित्सा योग्य नहीं है, रक्तसग्राहक प्रयोग, नाना प्रकार की पेया, स्नेहपान विधि, खान- पान की श्रेष्ठ विधि, परिपेक, अवगाहन, प्रदेह, प्रतिसारण, रक्त के अति स्राव होने पर जो क्रिया करनी चाहिये, यह सब इस अर्श-रोग-चिकित्सा मे कह दिया है ॥ २५०-२५६ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृते चिकित्सास्थानेऽ- र्शश्चिकित्सित नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
अ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ५८६
अ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ५८६ पञ्चदशोऽध्यायः अथातो ग्रहणीचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ इसके आगे ग्रहणी-चिकित्सा की व्याख्या करते हैं। भगवान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥ आयुर्वर्णो बलं स्वास्थ्यमुत्साहोपचयौ प्रभा । ओजस्तेजोऽग्नयः प्राणाश्चोक्ता देहाग्निहेतुकाः ॥ ३ ॥ आयु, वर्ण, बल, स्वास्थ्य, उत्साह, उपचय (पुष्टि), प्रभा, ओज, तेज, अग्निया और प्राण इन सब की स्थिति का कारण देह की जाठर अग्नि ही है १॥३॥ शान्तेऽग्नौ म्रियते युक्ते चिरं जीवत्यनामयः । रोगी स्याद्विकृते मूलमग्निस्तस्मान्निरुच्यते ॥ ४ ॥ अग्नि के शान्त होने पर प्राणी मर जाता है और अग्नि के युक्त अर्थात् समभाव मे रहने पर प्राणी देर तक नीरोग रह कर जीता है। अग्नि के विकृत होने (मन्द या तीक्ष्ण अथवा विषम हो जाने) पर मनुष्य रोगी हो जाता है। इसलिये देहाग्नि को आयु, वर्ण, बल आदि का प्रधान कारण कहा जाता है ॥४॥ यदन्नं देहधात्वोजोबलवर्णादिपोषकम् । तत्राग्निर्हेतुराहारान्न ह्यपक्वाद्रसादयः ॥ ५ ॥ जो अन्न (भुक्त द्रव्य) देह के धातु, ओज, बल, वर्ण आदि का पोषक है, वहा पर भी यही अग्नि कारण है। क्योकि बिना पचे आहार से रस-आदि धातुओं की उत्पत्ति नही होती ॥ ५ ॥ अन्नमादानकर्मा तु प्राणः कोष्ठं प्रकर्षति । तद्द्रवैर्भिन्नसंघातं स्नेहेन मृदुतां गतम् ॥ ६ ॥ समानेनावधूतोऽग्निरुदीर्यः पवनेन तु । काले भुक्तं समं सम्यक् पचत्यायुर्विवृद्धये ॥ ७ ॥ आहार की परिपाक-विधि—आदान (ग्रहण करना) कर्म वाला प्राण वायु अन्न को कोष्ठ (आमाशय) मे ले जाता है। यह अन्न द्रव-समूहों से (क्लेदक कफ के द्रव भाग से) मिल कर छिन्न भिन्न होकर टुकड़े २ हो जाता १. गीता—अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रित । प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥
५६० चरकसंहिता [ अ० १५ है और स्नेह द्वारा ( क्लेदक-कफ के स्निग्ध भाग के कारण ) यह अन्न कोमल हो जाता है । उचित काल मे समयोग अर्थात् उचित मात्रा मे खाये हुए इस मृदु आहार को समान नामक वायु से प्रज्वलित जाठर अग्नि आयु की वृद्धि के लिये भली प्रकार से पचाता है १ ॥ ६-७ ॥ एवं रसमलायान्नामाशयस्थमधःस्थितः । पचत्यग्निर्यथा स्थाल्यामोदनायाम्बुतण्डुलम् ॥ ८ ॥ अन्नस्य भुक्तमात्रस्य षड्रसस्य प्रपाकतः । मधुरात्प्राक् कफोद्भावात्फेनभूत उदीर्यते ॥ ९ ॥ परं तु पच्यमानस्य विदग्धस्याम्लभावतः । आशयाच्च्यवमानस्य पित्तमच्छमुदीर्यते ॥ १० ॥ जिस प्रकार पतीली मे रक्खे जल और चावलो को नीचे जलती हुई अग्नि पका कर भात मे बदल देती है, उसी प्रकार यह जाठराग्नि आमाशय मे स्थित आहार को पका कर ( जीर्ण करके ) रस और मल मे बदल देती है । आहार के प्रसाद भाग से रस बनता और शेष मल बन जाता है २ । खाते समय ही छ. रस वाले अन्न के प्रथम पाक काल मे सबसे पूर्व मधुर रस ( माधुर्य ) उत्पन्न होता है । [ थूक का 'टाईलीन' भोजन के निशास्ता भाग को शर्करा मे बदल देता है ] । इससे झाग के समान कफ उत्पन्न होता है । पीछे से पचता हुआ यह अन्न विदग्ध होकर ( आमाशय मे पहुच कर आमाशयिक रस की क्रिया होने पर ) अम्ल-भाव मे परिणत हो जाता है । यह अम्लभूत अन्न जब आमाशय से निकल कर पच्यमानाशय ( ग्रहणी के आन्त्र भाग ) में आता है तब स्वच्छ पित्त बढता है ३ ॥ ८-१० ॥ १. आहारपरिणामकरास्त्विमे भावा भवन्ति । तद्यथा ऊष्मा वायुः क्लेद स्नेहः काल. समयोगश्चेति ( चक्र० ) । २. कई आचार्य अन्न के पाक से तीन भागों की उत्पत्ति मानते हैं, स्थूल, सूक्ष्म और मल-भाग । जिस प्रकार गन्ने के रस को पकाने से उस पर बार-बार मलाई आती है, इसी प्रकार धातुओं के अग्नि द्वारा परिपाक होने पर अन्न के तीन भाग हो जाते हैं । ( १ ) सूक्ष्म भाग अगली धातु मे जाता है और ( २ ) स्थूल भाग उसी धातु का पोषण करता है । ( ३ ) मल भाग बाहर हो जाता है । अन्त मे शुक्राग्नि के पाक से स्थूल और सूक्ष्म दो ही भाग बनते हैं मल भाग नही रहता है । ३. पच्यमानाशय में आहार रस की क्रिया क्षारीय बन जाती है । इसमे
अ० १५ ] चिकित्सास्थानम् ५६१
अ० १५ ] चिकित्सास्थानम् ५६१ पक्वाशयं तु प्राप्तस्य शोष्यमाणस्य वह्निना । परिपिण्डितपक्वस्य वायुः स्यात्कटुभावतः ॥ ११ ॥ जिस समय भुक्त आहार पित्ताशय मे पहुंचता है और वहा पर अग्नि के द्वारा सुखाया जाता है तब पानी (द्रव) के सूख जाने से यह पक कर पिण्डित बन जाता है । इसके कटु-भाव से इस समय वायु की वृद्धि होती है । क्योकि पच्यमानाशय मे आहार रस, आत्र रस, क्लोमरस तथा पित्ताशय के पित्त के मिलने से कटु बन जाता है, इसलिये अब वायु की वृद्धि होती है (क्योंकि कटु रस वायु को बढाता है) ॥ ११ ॥ अन्नमिष्टं ह्युपकृतमिष्टैर्गन्धादिभिः पृथक् । देहे प्रीणाति गन्धादीन् प्राणादीनिन्द्रियाणि च ॥ १२ ॥ इष्ट गन्ध आदि से युक्त प्रिय और हितकर अन्न शरीर मे पृथक् २ गन्ध आदि गुण घ्राण आदि इन्द्रियों को पृथक् २ तर्पण करता है । अर्थात् स्वादु और हितकर अन्न के पार्थिव आदि भाग अपने अपने गुणों से अपनी अपनी इन्द्रियो का तर्पण करते हैं ॥ १२ ॥ भौमाप्याग्नेयवायव्याः पञ्चोष्माणः सनाभसाः । पञ्चाहारगुणान्स्वान् स्वान्पार्थिवादीन्पचन्ति हि ॥ १३ ॥ भौम, आप्य, आग्नेय, वायव्य और नाभस से पाच प्रकार की ऊष्माए आहार के अपने अपने पार्थिव आदि पाच प्रकार के गुणो का पाक करती है (पार्थिव आदि अपने अपने गुणों को बढाती है) ॥ १३ ॥ यथास्वैरेव पुष्यन्ते देहे द्रव्यगुणाः पृथक्¹ । पार्थिवाः पार्थिवानेव शेषाः शेषांश्च कृत्स्नशः ॥ १४ ॥ अन्न भी पाचभौतिक है, शरीर भी पाचभौतिक है । जाठराग्नि के द्वारा जब अन्न का पाक होता है उस समय भौम अग्नि अपने पार्थिव गुण को बढाती है, आप्य अग्नि जलीय गुण को, वायव्य अग्नि वायु गुण को, आग्नेय अग्नि अग्नि गुण का और नाभस्य अग्नि आकाश गुण को बढाती है । क्योकि शरीर मे द्रव्यों के गुण पृथक् २ अपने २ अंशो से ही पुष्ट होते हैं । पार्थिव गुण पा- र्थिव गुणों को ही सम्पूर्ण रूप मे पुष्ट करते हैं और आप्य आदि शेष अश अपने अम्ली-क्रिया नही रहती क्योंकि पित्त, क्लोम रस, आत्र रस इसको क्षारीय बना देते हैं इससे कटु हो जाता है । बृहदान्त्र मे पानी का शोषण होने से मल कठोर हो जाता है । १ 'यथास्वं-स्व च पुष्यन्ति देहद्रव्यगुणाः पृथक्' इति ।
५८२ चरकसंहिता [ अ० १५ अपने आप्य आदि गुणो को ही पोषण देते है। यथा—गुरु, खर, कठिन आदि पार्थिव गुण है, ये गुण शरीर के गुरु, खर, कठिन आदि भावो को ही बढाएगे गुरु आहार से शरीर मे गुरुता ही आयगी, खर आहार से शरीर मे खरता की ही वृद्धि होगी ॥ १४ ॥ सप्तभिर्देहधातारो धातवो द्विविधं पुनः¹ । यथास्वमग्निभिः पाकं यान्ति किट्टप्रसादतः ॥ १५ ॥ देह का धारण करने वाले सात धातु अपनी २ अग्नियो द्वारा दो प्रकार के पाक को प्राप्त होते है। (१) किट्ट और (२) प्रसाद ॥ १५ ॥ रसाद्रक्तं ततो मांसं मांसान्मेदस्ततोऽस्थि च । अस्थ्नो मज्जा ततः शुक्लं शुक्राद् गर्भः प्रसादजः² ॥ १६ ॥ प्रसादज धातु—रस से रक्त, रक्त से मास, मास से मेद, मेद से अस्थि, अस्थि से मज्जा, मज्जा से शुक्र और शुक्र से गर्भ की उत्पत्तिहोती है³ । (१) खलेकपोतन्याय—दाना बिखेर देने पर जिस प्रकार से बहुत से कबूतर आकर बैठते हे और दूर या निकट जाने की अपेक्षा स्वय चुग कर चल पड़ते है उसी प्रकार से एक ही काल मे सब धातुओ का पोषण आहार रस से होता है। (२) केदार-कुल्या-न्याय—अर्थात् रस ही उत्तरोत्तर धातुओ को आप्लावित करता है। जिस प्रकार कुल्या (खेत की नाली), प्रथम क्यारी को सींच कर अगली क्यारी मे चली जाती है इसी प्रकार से रस भी आगे जाता है। (३) क्षीर-दधिन्याय—जिस प्रकार से सम्पूर्ण दूध दही मे बदल जाता है, इसी प्रकार से सम्पूर्ण रस रक्त रूप मे परिणत होता है, रक्त मास में इसी तरह। (४) उत्तरोत्तर धातुओ की वृद्धि—पूर्व धातु रस उत्तर धातु रक्त को बढ़ाता है। रस का प्रसाद भाग (सूक्ष्म भाग) रक्त को बढ़ाता है, रक्त का प्रसाद (सूक्ष्म भाग) मास को बढ़ाता है इसी प्रकार मे आगे ॥१६॥ रसात्स्तन्यं स्त्रिया रक्तमसृजः कण्डराः सिराः । मांसाद्वसा त्वचः षट् च मेदसः स्नायुसंभवः ॥ १७ ॥ उपधातु—रस से स्त्रियों मे स्तन्य (दूध) और आर्तव तथा रक्त से कण्ड- राये और शिराये (नाड़िया), मास से वसा और छः त्वचाये और मेद से स्नायु की उत्पत्ति होती है ॥१७॥ १ ‘द्विविधाश्च पुनःपुनः’ इति । २ ‘प्रजापते’ इति च पाठः । ३. धातुओं की उत्पत्ति प्रसाद भाग से ही है। रस से अगले धातु किस प्रकार बनते हैं, इसमे तीन मत हैं।