चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
६ चरकसंहिता [अ० १
वाला (आकाश, वायु, अग्नि, जल) और पृथिवी पाच गुणों वाली है।
इस प्रकार अगले भूत का गुण क्रम से दूसरे २ भूत में आता जाता है १ ॥२८॥
खरद्रवचलोष्णत्वं भूजलानिलतेजसाम् ।
आकाशस्याप्रतीघातो दृष्टं लिङ्गं यथाक्रमम् ॥ २६ ॥
लक्षणं सर्वमेवैतत्स्पर्शनेन्द्रियगोचरम् ।
स्पर्शनेन्द्रियविज्ञेयः स्पर्शो हि सविपर्ययः ॥ ३० ॥
पञ्च महाभूतों के लक्षण - खरत्व, द्रवत्व, चलत्व, उष्णत्व और अप्रतिहनन
ये पृथिवी, जल, वायु, अग्नि और आकाश के क्रमशः लक्षण समझने चाहिये ।
ये सब लक्षण स्पर्शनेन्द्रिय (त्वचा) से ग्रहण करने योग्य है । इनमें आकाश
का अप्रतिहनन (रोक न करना) भी स्पर्श के विपरीत अस्पर्श होने से ही
त्वचा से ग्रहण करने योग्य है। [क्योंकि जो द्रव्य जिस इन्द्रिय से ग्रहण किया
जाता है, उस द्रव्य के अभाव का भी उसी इन्द्रिय से ग्रहण होता है ।
इसलिये आकाश का अप्रतिघात गुण भी स्पर्शनेन्द्रिय से ही ग्रहण करने
योग्य है ] ॥ २९-३० ॥
गुणाः शरीरे गुणिनां निर्दिष्टाश्चिह्नमेव च ।
अर्थाः शब्दादयो ज्ञेया गोचरा विषया गुणाः ॥ ३१ ॥
ग्राह्य-विषय- शरीर में गुणियों के गुण चिह्न रूप ही कहे हैं। इसलिये
खरत्व आदि गुणों का लक्षण शब्द से ही कह दिया है। शब्द आदि पाच
भूतों के गुण हैं, वे ही अर्थ हैं। इनको इन्द्रियगोचर या विषय अथवा गुण
करके जानना चाहिये ॥ ३१ ॥
या यदिन्द्रियमाश्रित्य जन्तोर्बुद्धिः प्रवर्तते ।
याति सा तेन निर्देशं मनसा च मनोभवा ॥ ३२ ॥
प्राणी की जो बुद्धि (ज्ञान) जिस इन्द्रिय की सहायता से उत्पन्न होती
है, वह बुद्धि उसी इन्द्रिय से कही जाती है। जैसे आख से प्रवृत्त होने वाली
बुद्धि चक्षुर्बुद्धि कही जाती है। इसी प्रकार मन से उत्पन्न होने वाली बुद्धि
मनोभवा बुद्धि कहाती है ॥ ३२ ॥
भेदात्कार्येन्द्रियार्थानां बह्व्यो वै बुद्धयः स्मृताः ।
आत्मेन्द्रियमनोर्थानामेकैकसंनिकर्षजा ॥ ३३ ॥
१ आकाशपवनदहनतोयभूमिषु यथासङ्ख्यमेकोत्तरपरिवृद्धा शब्दस्पर्शरूप-
रसगन्धाः । (सुश्रुतसूत्र ४२ अ०)
अ० १ ] शारीरस्थानम् ७
अंगुल्यंगुष्ठतलजस्तंत्रीवीणानखोद्भवः ।
दृष्टः शब्दो यथा बुद्धिर्दृष्टा संयोगजा तथा ॥ ३४ ॥
कार्य, इन्द्रिय और विषयों के बहुत भेद होने से बुद्धिया भी बहुत प्रकार
की हैं। इनमें एक एक बुद्धि आत्मा का मन से, मन का इन्द्रियों से और
इन्द्रियों का विषय के साथ सयोग होने से उत्पन्न होती हैं। जिस प्रकार शब्द
मध्यमांगुलि, अगुष्ठ, हथेली तन्त्री (तात), वीणा और नख के सयोग से
उत्पन्न होता है, उसी प्रकार प्रत्यक्ष ज्ञान भी आत्मा, इन्द्रिय, मन और विषय
के सन्निकर्ष से उत्पन्न होता है ॥ ३३-३४ ॥
बुद्धीन्द्रियमनोर्थाना विद्याद्योगधरं परम् ।
चतुर्विंशक इत्येष राशिः पुरुषसंज्ञकः ॥ ३५ ॥
बुद्धि, इन्द्रिय, मन और विषय इन के संयोग को शरीर रूप से धारण
करने वाला इनसे पृथक् 'अव्यक्त' आत्मा है। पाच महाभूत, पाच विषय,
दस इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहकार और महान् इन चौबीस तत्त्वों का राशि
समूह को 'पुरुष' कहते है ॥ ३५ ॥
रजस्तमोभ्यां युक्तस्य संयोगोऽयमनन्तवान् ।
ताभ्यां निराकृताभ्यां तु सत्त्ववृद्ध्या निवर्तते ॥ ३६ ॥
रज और तम से युक्त पुरुष का यह सयोग अन्त वाला नही होता,
लगातार चलता ही रहता है। सत्त्व के प्रबल होने पर संसार बन्धन के
कारणरूप रज और तम के हटने पर यह सयोग भी समाप्त हो जाता है। यही
पुरुष का मोक्ष है ॥ ३६ ॥
अत्र कर्मफलं चात्र ज्ञानं चात्र प्रतिष्ठितम् ।
अत्र मोहः सुखं दुःख जीवितं मरणं स्वता ॥ ३७ ॥
एवं यो वेद तत्त्वेन स वेद प्रलयोदयौ ।
पारम्पर्यं चिकित्सा च ज्ञातव्य यच्च किंचन ॥ ३८ ॥
पुरुष आत्मा — अदृष्ट (कर्म), कर्मफल, ज्ञान, अज्ञान, अनुकूल एवं प्रति-
कूल वेदनायें, जन्म, मरण, मेरी स्त्री, मेरा पुत्र आदि ममत्व ये सब बाते इसी
राशिसंज्ञक शरीरपुरुष में प्रतिष्ठित हैं। जो पुरुष इन सब बातों को यथार्थ रूप
से जानता है, वह प्रलय (प्रकृति का महत् आदि में लय) एव उदय (उत्पत्ति)
इन दोनों को जानता है। वह वेदनाओं के पारम्पर्य सम्बन्ध और चिकित्सा को
भी जानता है। इसके अतिरिक्त इस पुरुष में और भी जो कुछ जानने योग्य
होता है वह उस सब को जानता है ॥३७-३८॥
८ चरकसंहिता [ अ० १
भास्तमः सत्यमनृतं वेदाः कर्म शुभाशुभम् ।
न स्यात्कर्ता वेदिता च पुरुषो न भवेद्यदि ॥ ३९ ॥
नाशयो न सुखं नार्तिर्न गतिर्नागतिर्न वाक् ।
न विज्ञानं न शास्त्राणि न जन्म मरणं न च ॥ ४० ॥
न बन्धो न च मोक्षः स्यात्पुरुषो न भवेद्यदि ।
कारणं पुरुषस्तस्मात्कारणज्ञैरुदाहृतः ॥ ४१ ॥
न चेत्कारणमात्मा स्याद्भा'दयः स्युरहेतुकाः ।
न चैषु संभवेज्ज्ञानं न च तैः स्यात्प्रयोजनम् ॥ ४२ ॥
कृतं मृद्दण्डचक्रैश्च कुम्भकारादृते घटम् ।
कृतं मृत्तृणकाष्ठैश्च गृहकाराद्विना गृहम् ॥ ४३ ॥
यो वदेत्स वदेद्देहं संभूय करणैः कृतम् ।
विना कर्तारमज्ञानाद्युक्त्यागमबहिष्कृतः ॥ ४४ ॥
आत्मा—यदि कर्ता, वेदिता (ज्ञाता) पुरुष न हो तो प्रकाश, अन्धकार
सत्य, झूठ, स्वर्गादि के प्रतिपादक वेद, शुभाशुभ कर्म ये सब निष्प्रयोजन हो
जाय । यदि कर्त्ता, बोद्धा पुरुष न हो तो धर्म और अधर्म का कोई आश्रय न
रहे, धर्म और अधर्म निराश्रय हो जाए । सुख, दुःख, जाना, आना, सत्य वाणी,
शास्त्रज्ञान, शास्त्र, जन्म, मरण, बन्ध और मोक्ष कुछ भी न रहे। क्योंकि पुरुष के
लिये ही ये सब हैं । इसलिये कारण को जानने वालो ने पुरुष को कारण कहा
है। यदि आत्मा कारण न हो तो दीप्ति आदि बिना कारण के हो जाय । पुरुष
के न होने पर शरीर की सृष्टि बिना कारण की हो जाय । इतना ही नहीं, इन
भूतों से बने शरीर में ज्ञान (चैतन्य) भी संभव नहीं। (क्योंकि भूतों मे ज्ञान
(चैतन्य) का अभाव है), ज्ञान और चेतना का कारण आत्मा है। आत्मा के
न होने पर ये सब निष्प्रयोजन हो जाते हैं । जिस प्रकार कोई कहे कि 'बिना
कुम्हार के मिट्टी, दण्डे और चक्र ने मिल कर घड़ा बना दिया, अथवा बिना
घर बनाने वाले के मिट्टी तिनके और काष्ठ से घर बन गया, उसी प्रकार कर्ता
रूप आत्मा के बिना ही कारणरूप पञ्चमहाभूतों ने मिल कर स्वय इस शरीर को
बनाया है, यह कहना अज्ञान से पूर्ण और युक्ति आदि प्रमाण से रहित है ॥४४॥
कारणं पुरुषः सर्वैः प्रमाणैरुपलभ्यते ।
येभ्यः प्रमेयं सर्वेभ्यः आगमेभ्य प्रमीयते ॥ ४५ ॥
१ खादय.-यो०
अ० १ ] शारीरस्थानम् ६
अ० १ ] शारीरस्थानम् ६
कारण रूप पुरुष सब प्रमाणों से सिद्ध है । जिन सब प्रमाणों से प्रमेय जाना
जाता है, उन सब प्रमाणों (प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम आदि) से पुरुष कारण
है, यही ज्ञान होता है ॥ ४५ ॥
न ते तत्सदृशास्त्वन्ये पारम्पर्यसमुत्थिताः ।
सारूप्यात्ते त एवेति निर्दिश्यन्ते नवा नवाः ॥ ४६ ॥
भावस्तेषां समुदयो निरीशः सत्त्वसंज्ञकः ।
कर्ता भोक्ता न स पुमानिति केचिद् व्यवस्थिताः ॥ ४७ ॥
नास्तिक मत—जो शरीर में जल आदि पदार्थ दिखाई देते हैं। वे वे
नहीं हैं। परन्तु परम्परा से उत्पन्न वे उनके सदृश वा भिन्न ही पदार्थ हैं।
समान रूप होने से नये से नये भी वे ही हे, ऐसे कहे जाते हैं। उनका समु
दाय जिसका कोई स्वामी नहीं है, 'सत्त्व' कहाता है, पुरुष कोई कर्त्ता और
भोक्ता नहीं है, ऐसा कई मानते हैं। इसी प्रकार जो भाव बाल्यावस्था में होते
हैं वे यौवनावस्था में नहीं रहते । अन्य भाव पूर्व के समान होते हैं, परम्परा
से उत्पन्न होने के कारण उनके समान होते हैं। इस प्रकार से नये से नये भाव
समान रूप और सादृश्य होने से वे ही (पूर्वके ही) कहे जाते हैं। बाल्यावस्था
के देवदत्त युवावस्था में भी रहता है। इन भावों का समुदाय (पूर्वापर
सन्तान) आत्मारहित सत्त्व-सञ्ज्ञक, प्राणी होता है। इनके मत में कर्त्ता, कर्मों
का भोक्ता, देह से अतिरिक्त पुरुष नहीं है। ऐसा कोई देह को ही आत्मा
मानने वाले नास्तिक मानते हैं ॥ ४६--४७॥
तेषामन्यैः कृतस्यान्ये भावा भावैर्नवा फलम् ।
भुञ्जते सदृशाः प्राप्तं यैरात्मा नोपदिश्यते ॥ ४८ ॥
नास्तिक मत में दोष—जो लोग शरीर से पृथक् आत्मा की स्थिति नहीं
मानते उनके मत में अन्य 'भावों' (पदार्थों) द्वारा किये शुभाशुभ कर्मों के
फल उनके समान नये नये अन्य 'भाव' भोगते हैं। जो कर्म करते हैं उन को
किये कर्म का फल भोगना नहीं पडता ॥ ४८ ॥
करणान्यन्यथा दृष्ट्वा कर्तु कर्ता स एव तु ।
कर्ता हि करणैर्युक्तः कारणं सर्वकर्मणाम् ॥ ४९ ॥
करने वाले कर्त्ता के करण भी अनेक देखे जाते हैं। परन्तु करने वाला
वह अकेला होता है। इसी प्रकार यह कर्त्ता इन्द्रिय आदि अनेक उपकरणों से
युक्त होकर दर्शन आदि नाना कर्म करता है। इसलिये देह से भिन्न आत्मा
सब कर्मों का कारण है ॥४९॥
२० चरकसंहिता [ अ० १
निमेषकालाद्भावानां कालः शीघ्रतरोऽत्यये ।
भग्नानां न १पुनर्भावः कृत नान्यमुपैति च ॥ ५० ॥
मतं तत्त्वविदामेतद्यस्मात्तस्मात् स कारणम् ।
क्रियोपभोगे भूतानां नित्यः पुरुषसंज्ञकः ॥ ५१ ॥
जितने समय में आंख की पलक झपकती है यह 'निमेष काल' कहाता है ।
इस निमेष काल से भी अधिक शीघ्रता से भाव बदल रहे हैं, नाश हो रहे हैं ।
नाश हुए पदार्थों का पुनः सद्भाव नहीं होता और एक के किये कर्म का फल
दूसरा नहीं भोगता, अपितु जिसने किया होता है वही भोगता है । यही सब
तत्त्वज्ञानियों का सिद्धान्त है । इसलिये प्राणियों के किये हुए कर्म का फल
भोगने वाला देह से अतिरिक्त नित्य 'पुरुष' नामक चेतन आत्मा है ॥५०-५१॥
अहङ्कारः फलं कर्म देहान्तरगतिः स्मृतिः ।
विद्यते सति भूतानां कारणे देहमन्तरा ॥ ५२ ॥
आत्मा के देह से पृथक् होने पर ही अहंकार-भाव ( मैंने यह किया, मैं
यह जानता हूँ), फल को उद्देश्य रख कर काम करना, किये कर्म का फल
भोगना, एक शरीर से दूसरे शरीर में जाना, स्मृति अर्थात् स्मरण (बाल्या-
वस्था का यौवनावस्था में स्मरण), ये सब बातें होती हैं ॥ ५२ ॥
प्रभवो न ह्यनादित्वाद्भिद्यते परमात्मनः ।
पुरुषो राशिसंज्ञस्तु मोहेच्छाद्वेषकर्मजः ॥ ५३ ॥
परमात्मा का कोई उत्पत्ति कारण नहीं है, क्योंकि वह अनादि है । परन्तु
राशि-संज्ञक पुरुष को भोगों के आयतन (आश्रय) रूप शरीर का मोह, इच्छा,
राग और द्वेष ये तीन२ उत्पन्न करते हैं ॥ ५३ ॥
आत्मा ज्ञः, करणैर्योगज्ज्ञानं त्वस्य प्रवर्तते ।
करणानामवैमल्यादयोगाद्वा न वर्तते ॥ ५४ ॥
१ 'भग्नानां च पुनर्भाव' इति पाठान्तरम् । अर्थात् टूटे हाथ पांव आदि
भी पुन बन जाते हैं, यह भी आत्मा की सत्ता का प्रमाण है ।
२ तीनों दोषों के तीन पक्ष हैं । यथा—(१) रागपक्ष—काम, मत्सर,
स्पृहा तृष्णा और लोभ । (२) द्वेषपक्ष—क्रोध, ईर्ष्या, असूया, द्रोह, अमर्ष ।
(३) मोहपक्ष—मिथ्याज्ञान, विचिकित्सा, मान और प्रमाद ।
वात्स्यायन (न्या० ४ । १ ३)
पूर्वकृतफलानुबन्धात् तदुत्पत्तिः। न्याय । दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानाना-
मुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः ॥
अ० १ ] शरीरस्थानम् ११
अ० १ ] शरीरस्थानम् ११
पश्यतोऽपि यथाऽऽदर्शे सक्लिन्ने नास्ति दर्शनम् ।
तत्त्वं जले वा कलुषे चेतस्युपहते तथा ॥ ५५ ॥
आत्मा ज्ञानी है। करण—मन, बुद्धि और इन्द्रियों इनके सयोग से इस
आत्मा को ज्ञान होता है । करण अर्थात् साधनों के निर्मल न होने वा इनके
सयोग न होने से ज्ञान नही होता । जिस प्रकार आख से देखने पर भी मलिन
दर्पण मे मुख दिखाई नहीं देता और जिस प्रकार मलिन जल में प्रतिबिम्ब
नही दीखता, उसी प्रकार चक्षु आदि इन्द्रिय और चित्त रूप साधनों के विकृत
या दुष्ट होने पर भी ज्ञान नही होता ॥ ५४-५५ ॥
करणानि मनो बुद्धिर्बुद्धिकर्मेन्द्रियाणि च ।
कर्तुः संयोगजं कर्म वेदना बुद्धिरेव च ॥ ५६ ॥
नैकः प्रवर्तते कर्तुं भूतात्मा नाश्नुते फलम् ।
संयोगाद्वर्तते सर्वं तदृते नास्ति किंचन ॥ ५७ ॥
मन बुद्धि, ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिया करण हैं । करने वाले आत्मा के
सयोग से कर्म होता है । करने वाले के सयोग से ही बुद्धि और वेदना भी
उत्पन्न होती है। अकेला भूतात्मा बिना करणो के प्रवृत्त नही हो सकता और
न फल का उपभोग कर सकता है । किन्तु शरीर, सत्त्व, (मन) इन्द्रिय इनके
सयोग से ही सब कुछ होता है। सयोग के बिना कुछ नही होता ॥५६-५७॥
न ह्येको वर्तते भावो वर्तते नाप्यहेतुकः ।
शीघ्रगत्वात्स्वभावाच्चस्वभावो न व्यावर्तते ॥ ५८ ॥
कारण रूप भाव अकेला कार्य-उत्पत्ति में प्रवृत्त नही होता, किन्तु सयोग
होने पर ही प्रवृत्त होता है। भाव एक रूप वाले नहीं हैं। क्योकि परिणामी हैं,
बिना हेतु के भी नहीं हैं, वे भाव शीघ्रगामी स्वभाव को नहीं छोड़ते। जैसा
पहिले सूत्रस्थान अ० १६ में कहा है कि—'प्रवृत्तिर्हेतुर्भावाना न निरोधेऽस्ति-
कारणम् ।' इति ॥ ५८ ॥
अनादिः पुरुषो नित्यो विपरीतस्तु हेतुजः ।
सदकारणवन्नित्य दृष्ट हेतुजमन्यथा ॥ ५९ ॥
तदेव भावादग्राह्य नित्यत्व न कुतश्चन ।
भावाज्ज्ञेयं तद्व्यक्तमचिन्त्यं व्यक्तमन्यथा ॥ ६० ॥
अनादि पुरुष (आत्मा) नित्य है। मोह, इच्छा, द्वेष आदि निमित्त से
उत्पन्न 'राशि' सज्ञक पुरुष इस से विपरीत अर्थात् अनित्य है। जो सत् और
अकारणवान् अर्थात् कारण से रहित है वह नित्य है, तथा जो कारणजन्य है
१२ चरकसंहिता [ अ० १
वह अनित्य है। १'कोई वस्तु उत्पत्ति कारण वाली होने से नित्य नहीं हो
सकती। जो वस्तु कारणजन्य है, वह वस्तु किसी भी प्रकार से नित्य नही हो
सकती। क्योंकि उसकी उत्पत्ति हुई है। कारणवान् होने से अनित्य है। इस-
लिये यह नित्य-अव्यक्त है, ग्रहण न होने से अव्यक्त है, अचिन्त्य है। इससे
विपरीत व्यक्त और अनित्य है ॥ ५६-६० ॥
अव्यक्तमात्मा क्षेत्रज्ञः शाश्वतो विभुरव्ययः ।
तस्माद्यदन्यत्तद् व्यक्तं, वक्ष्यते चापरं द्वयम् ॥ ६१ ॥
व्यक्तं चैन्द्रियकं चैव गृह्यते तद्यदिन्द्रियैः ।
अतोऽन्यत्पुनरव्यक्तं लिङ्गग्राह्यमतीन्द्रियम् ॥ ६२ ॥
आत्मा को अव्यक्त शब्द से कहा जाता है। इसी आत्मा को क्षेत्रज्ञ,
शाश्वत, विभु और अव्यय कहते है। आत्मा से पृथक् जो कुछ है वह सब
व्यक्त है। अन्य प्रकार मे भी व्यक्त-अव्यक्त कहे जाते ह। जो ऐन्द्रियक अर्थात्
इन्द्रियों मे उपलब्ध होता है वह सब व्यक्त है। जो इन्द्रिय से ग्रहण नहीं होता
वह अतीन्द्रिय और अव्यक्त है। लक्षणों से इस अव्यक्त का अनुमान होता है ॥६२॥
खादीनि बुद्धिरव्यक्तमहङ्कारस्तथाऽष्टमः ।
भूतप्रकृतिरुद्दिष्टा—
पाच सूक्ष्म भूत, पंच तन्मात्रा (आकाश, वायु, अग्नि, जल और
पृथिवी), बुद्धि और महान् (अव्यक्त) ये सात अव्यक्त मूल प्रकृति तथा
अहङ्कार यह आठ भूत-प्रकृति कही हैं ॥
विकाराश्चैव षोडश ॥ ६३ ॥
बुद्धीन्द्रियाणि पञ्चैव पञ्च कर्मेन्द्रियाणि च ।
समनस्काश्च पञ्चार्था विकारा इति सञ्ज्ञिताः । ६४ ॥
इनके सोलह विकार हैं। पाच ज्ञानेन्द्रिय, पाच कर्मेन्द्रिय ओर मन के
साथ पाच अर्थ (विषय-शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध) ये १६ विकार
कहे हैं ॥ ६३-६४ ॥
इति क्षेत्रं समुद्दिष्टं सर्वमव्यक्तवर्जितम् ।
इन चौबीस तत्त्वो में अव्यक्त (मैलित प्रकृति और पुरुष) को छोड़ कर
शेष तेईस तत्त्वों को क्षेत्र (शरीर) कहा जाता है।
अव्यक्तमस्य क्षेत्रस्य क्षेत्रज्ञमृषयो विदुः ॥ ६५ ॥
ऋषि लोग अव्यक्त को इस क्षेत्र का जानने वाला 'क्षेत्रज्ञ' कहते हैं ॥६५॥
१ 'सदकारणवन्नित्यम्' वै० द० ४।१।१।
अ० १ ] शारीरस्थानम् १३
अ० १ ] शारीरस्थानम् १३
जायते बुद्धिरव्यक्ताद्बुद्ध्याऽहमिति मन्यते ।
परं खादीन्यहङ्कारादुत्पद्यन्ते यथाक्रमम् ॥ ६६ ॥
ततः सम्पूर्णसर्वाङ्गो जातोऽभ्युदित उच्यते ।
पुरुषः प्रलये चेष्टैः पुनर्भावैर्वियुज्यते ॥ ६७ ॥
अव्यक्त ( मूल प्रकृति से मिले हुए पुरुष ) से बुद्धितत्त्व उत्पन्न होता है ।
बुद्धि से 'मै' ऐसा अभिमान करता है । अर्थात् बुद्धि से अहङ्कार उत्पन्न होता
है । इसके पश्चात् अहङ्कार से क्रमशः आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी
ये पांच सूक्ष्म भूत ( तन्मात्रा ) उत्पन्न होते हैं १ । इन पञ्च तन्मात्राओ से पञ्च
महाभूत, इन भूतों से इन्द्रिया उत्पन्न होती हैं । इन पाच भूतों से सम्पूर्ण अगों
वाला पुरुष अव्यक्त अवस्था से व्यक्त अवस्था मे उत्पन्न होता है । अब
इसको उत्पन्न हो गया वा 'अभ्युदित' ऐसा कहते है और फिर यह पुरुष प्रलय
में ( शरीराम्भक भूतों के कारण में लय होने पर ) बुद्धि आदि इष्ट भावों
( कार्य पदार्थों ) से पृथक् हो जाता है, यही मृत्यु है । अव्यक्त कारण से व्यक्त
होना 'जन्म' कहाता है । व्यक्त का कारण में लीन होना 'मृत्यु' है ॥६६-६७॥
अव्यक्ताद् व्यक्ततां याति व्यक्तादव्यक्ततां पुनः ।
रजस्तमोभ्यामाविष्टश्चक्रवत्परिवर्तते ॥ ६८ ॥
पुरुष रज और तम के कारणों से बधा हुआ अव्यक्त ( कारण ) से व्यक्त
रूप में आता है, यही 'जन्म' है । व्यक्त अवस्था से फिर अव्यक्त अवस्था
( कारण ) में लीन हो जाता है । यही 'मरण' है । वह फिर व्यक्त होता है ।
फिर अव्यक्त होता है, इस प्रकार चक्र के भाति जब तक मोक्ष नहीं होता,
घूमता रहता है २ ॥ ६८ ॥
येषां द्वन्द्वे पराऽऽसक्तिरहङ्कारपराश्च ये ।
उदयप्रलयौ तेषां, न तेषां ये त्वतोऽन्यथा ॥ ६९ ॥
जिन पुरुषों की रज और तम के जोड़े मे अत्यन्त आसक्ति है और जो
'मै और यह मेरा है' ऐसा मिथ्या अभिमान रखते है, उनका ही उदय और
प्रलय अर्थात् जन्म और मरण होता है, और जो रज और तम से पृथक् और
निरहङ्कार हैं उनका जन्म और मरण नहीं होता ॥ ६९ ॥
१ तन्मात्रा का अर्थ अकेला वही तत्त्व, उसमे और किसी भूत का ससर्ग
नहीं-जैसे-शब्दतन्मात्र, रूपतन्मात्र आदि ।
२ अव्यक्तादीनि भूतानि, व्यक्तमध्यानि भारत ।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥ गीता० अ० २।२८
१४ चरकसंहिता [ अ० १
प्राणापानौ निमेषाद्या जीवनं मनसो गतिः ।
इन्द्रियान्तरसञ्चारः प्रेरणं धारणं च यत् ॥ ७० ॥
देशान्तरगतिः स्वप्ने पञ्चत्वग्रहणं तथा ।
दृष्टस्य दक्षिणेनाक्ष्णा सव्येनावगमस्तथा ॥ ७१ ॥
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं प्रयत्नश्चेतना धृतिः ।
बुद्धिः स्मृतिरहङ्कारो लिङ्गानि परमात्मनः ॥ ७२ ॥
यस्मात्समुपलभ्यन्ते लिङ्गान्येतानि जीवतः ।
न मृतस्यात्मलिङ्गानि तस्मादाहुर्महर्षयः ॥ ७३ ॥
पुरुष के लक्षण-शरीर से अतिरिक्त आत्मा के लक्षण प्राण (शरीर में
श्वास लेना) और अपान (श्वास पुनः छोड़ना) अर्थात् वायु की ऊर्ध्व और
अधोगति होना, उन्मेष-निमेष, जीवन, शरीर की वृद्धि, क्षत और भग्न का
संरोहण कार्य, मन का अभिमत विषय में गमन, एक इन्द्रिय को छोड़ कर दूसरी
इन्द्रिय में मन का जाना, इन्द्रियों को विषय में प्रवृत्त करना, देह को धारण
करना, स्वप्नावस्था में देशान्तर में जाना, मृत्यु का ज्ञान कर लेना, दायें आंख
ने देखे पदार्थ का बायें आंख से ग्रहण करना, इच्छा (स्वार्थ या परार्थ को प्राप्त
करने की चाह), द्वेष (अनिष्ट पदार्थ को त्यागने की इच्छा), सुख (आत्मा
के अनुकूल वेदनीय), दुःख (प्रतिकूल वेदनीय), प्रयत्न, उत्साह, चेतना, धृति
(धैर्य), बुद्धि (ज्ञान), स्मृति और अहंकार ये परम अर्थात् सर्वोपरि आत्मा
के लक्षण हैं। १ये प्राण आदि समस्त लक्षण जीवित पुरुष में ही उपलब्ध होते
हैं, मृत पुरुष में आत्मा के ये चिह्न नहीं मिलते, इसलिये महर्षियों ने प्राण,
अपान आदि सब को आत्मा का लक्षण कहा है ॥७०-७३॥
शरीरं हि गते तस्मिन् शून्यागारमचेतनम् ।
पञ्चभूतावशेषत्वात् पञ्चत्वं गतमुच्यते ॥ ७४ ॥
इस चेतन आत्मा के शरीर से चले जाने पर शरीर शून्य घर की भांति चेतना
से रहित हो जाता है। इस शरीर में केवल पांच भूत ही शेष रह जाते हैं, इस
लिए शरीर को पञ्चत्व को प्राप्त हुआ कहते हैं ॥ ७४ ॥
अचेतनं क्रियावच्च मनश्चेतयिता परः ।
युक्तस्य मनसा तस्य निर्दिश्यन्ते विभोः क्रियाः ॥ ७५ ॥
चेतनावान् यतश्चात्मा ततः कर्ता निरुच्यते ।
अचेतनत्वाच्च मनः क्रियावदपि नोच्यते ॥ ७६ ॥
१ प्राणापाननिमेषोन्मेषजीवनमनोगतीन्द्रियान्तरविकाराः सुखदुःखेच्छाद्वेष-
प्रयत्नाश्चात्मनो लिङ्गानि । वैशेषिक० ३ । २ । ४ ।
अ० १ ] शारीरस्थानम् १५
अ० १ ] शारीरस्थानम् १५
मन अचेतन और क्रियावान् है। शरीर को चेतन करने वाला आत्मा
चेतन मन से भी पर अर्थात् मुख्य है। क्रियाशील मन के साथ इस विभु आत्मा
का योग होने पर आत्मा की ही वे सब क्रिया कही जाती हैं। क्योंकि आत्मा
चेतनावान् है, इसी लिये वह कर्ता कहा जाता है। मन क्रियावान् होने पर भी
अचेतन है, इसलिये कर्ता नहीं कहा जाता ॥ ७५-७६ ॥
यथास्वेनात्मनाऽऽत्मानं नयते सर्वयोनिषु ।
प्राणैस्तन्त्रयते प्राणी न ह्यन्योऽस्त्यस्य तन्त्रकः ॥ ७७ ॥
वशी तत्कुरुते कर्म यत्कृत्वा फलमश्नुते ।
वशी चेत समाधत्ते वशी सर्वं निरस्यति ॥ ७८ ॥
आत्मा सब प्राणियों, नर, पशु आदि योनियो मे अपने आप अपने को ले
जाता है और अपने आप अपने को प्राणों से युक्त करता है। इस आत्मा का
कोई दूसरा सचालक नहीं है। वह स्वयं वशी ( सब को परवश करने वाला )
आत्मा उस कर्म को करता है जिसे करके वह फल भोगता है। वह वशी आत्मा
ही चित्त को लगाता है और वह वशी ही सब कुछ त्याग देता है । [ अर्थात्
वही फलार्थी होकर कर्म करता है और चाहे तो कभी फलाकाक्षा को त्याग भी
सकता है ] ॥७७-७८॥
देही सर्वगतो ह्यात्मा स्वे स्वे सस्पर्शनेन्द्रिये ।
सर्वाः सर्वाश्रयस्थास्तु नात्माऽतो वेत्ति वेदनाः ॥ ७९ ॥
आत्मा सब मे व्याप्त होकर भी देहवान् बनकर केवल अपनी स्पर्शननेन्द्रिय
से युक्त देह मे रहता है। इसलिये अन्य सब शरीरों की वेदनाओ को नहीं जानता ७९
विभुत्वमत एवास्य यस्मात्सर्वगतो महान् ।
मनसश्च समाधानात्पश्यत्यात्मा तिरस्कृतम् ॥ ८० ॥
आत्मा सब मे व्याप्त और महा परिमाण है, अत 'विभु' है । मन को
एकाग्र कर, समाधि के बल से भित्ति आदि से छिपे पदार्थों को भी देख लेता है।८०।
नित्यानुबन्धं मनसा देहकर्मानुपातिना ।
सर्वयोनिगतं विद्यादेकयोनावपि स्थितम् ॥ ८१ ॥
शरीर और कर्मों का अनुसरण करने वाले मन के साथ आत्मा का नित्य
सम्बन्ध है। वह एक योनि में स्थित होने पर भी उसे मन के द्वारा सब योनियों
मे व्याप्त समझना चाहिये ॥ ८१ ॥
आदिर्नास्त्यात्मन क्षेत्रपारम्पर्यमनादिकम् ।
अतस्तयोरनादित्वात्कि पूर्वमिति नोच्यते ॥ ८२ ॥
१६ चरकसंहिता [ अ० १
क्षेत्रज्ञ आत्मा का आदि नहीं है। क्षेत्र अर्थात् शरीर की परम्परा (एक
छूटने पर दूसरा प्राप्त होना) भी अनादि है। आत्मा का शरीर के साथ प्रथम
सम्बन्ध कब हुआ इस को कोई नहीं जानता। इसलिये दोनों के अनादि होने
से क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ में कौन पहिले था यह नहीं कहा जा सकता ॥ ८२ ॥
ज्ञः साक्षीत्युच्यते नाज्ञः साक्षी ह्यात्मा यतः स्मृतः।
सर्वे भावा हि सर्वेषा भूतानामात्मसाक्षिकाः ॥ ८३ ॥
ज्ञानवान् चेतन ही साक्षी कहा जाता है, अज्ञानवान् पाषाण आदि को
साक्षी नहीं कहते। इसलिये आत्मा ही साक्षी है। आकाश आदि (अव्यक्त)
सब भूतों के सब ग्राह्य धर्म आत्मा को ही साक्षात् होते हैं ॥ ८३ ॥
नैकः कदाचिद् भूतात्मा लक्षणैरुपलभ्यते ।
विशेषोऽनुपलभ्यस्य तस्य नैकस्य विद्यते ॥ ८४ ॥
संयोगपुरुषस्येष्टो विशेषो वेदनाकृतः ।
वेदना यत्र नियता विशेषस्तत्र तत्कृतः ॥ ८५ ॥
अकेला, केवल शरीर से भिन्न आत्मा कभी भी लक्षणों से उपलब्ध नहीं होता।
इसलिये लक्षणों से जिसकी उपलब्धि न हो सके ऐसे आत्मा मे वेदनाकृत कोई
विशेष धर्म नहीं है। वेदनाजन्य विशेष धर्म संयोगजन्य पुरुष अर्थात् राशिसंज्ञक
पांचभौतिक शरीर-पुरुष में ही होते हैं। क्योंकि सुख दुःख रूप वेदनाए जहा रहती
हैं वहीं पर इन वेदनाओं से होने वाले विशेष धर्म भी रहते हैं ॥ ८४-८५ ॥
चिकित्सति भिषक्सर्वास्त्रिकाला वेदना इति ।
यथा युक्त्या वदन्त्येके सा युक्तिरुपधार्यताम् ॥ ८६ ॥
पुनस्तच्छिरसः शूलं ज्वरः स पुनरागतः ।
पुनः स कासो बलवांश्छर्दिः सा पुनरागता ॥ ८७ ॥
एभिः प्रसिद्धवचनैरतीतागमनं मतम् ।
कालश्चायमतीतानामार्तीना पुनरागतः ॥ ८८ ॥
तमर्तिकालमुद्दिश्य भेषजं यत्प्रयुज्यते ।
अतीताना प्रशमन वेदनाना तदुच्यते ॥ ८९ ॥
आपस्ताः पुनरायाता याभिः शल्यं पुरा हतम् ।
यथा प्रक्रियते सेतुः प्रतिकर्म तथाऽऽश्रये ॥ ९० ॥
पूर्वरूपं विकाराणा दृष्ट्वा प्रादुर्भाविष्यताम् ।
'या क्रिया क्रियते सा च वेदना हन्त्यनागताम् ॥ ९१ ॥
पारम्पर्यानुबन्धस्तु दुःखाना विनिवर्तते ।
सुखहेतूपचारेण सुखं चापि प्रवर्तते ॥ ९२ ॥
अ० १ ] २ शारीरस्थानम् १७
अ० १ ] २ शारीरस्थानम् १७
वैद्य जिस युक्ति से अतीत, भविष्यत् और वर्त्तमान तीनों कालो के रोगों
की चिकित्सा करता है वह युक्ति सुनो। वही शिर का दर्द फिर आ गया, वही
ज्वर फिर हो गया, वह खासी फिर जोर पकड़ गई, वह वमन फिर होने लगा,
इन लोक प्रसिद्ध वचनों मे अतीत वेदना का पुनः आना सिद्ध है। अतीत
अर्थात् लुप्त हुए, रोगों का समय फिर आ गया। इस रोग के समय को लक्ष्य
मे रख कर जो औषध दी जाती है, वह अतीत वेदनाओं की शान्ति के लिये है
ऐसा कहा जाता है। जैस—जिस पानी की बाढ़ से धान का पहले नाश हुआ
है, वह फिर आ जाती है। वह बाढ़ न आये, अतः उसको रोकने के लिये बाध
बाधा जाता है, उसी प्रकार शरीर में वेदना नाशक प्रतिकर्म अर्थात् चिकित्सा
की जाती है। शरीर मे उत्पन्न होने वाले रोगों के पूर्वरूप को देख कर इनको
शान्त करने के लिये जो कर्म किया जाता है, वह भविष्य के रोगों को नाश
करता है। इससे एक के पीछे आने वाला अन्य रोग छूट जाता है, सुख के
कारण का उपाय करने से सुख भी हो जाता है ॥ १८६-६२ ॥
न समा यान्ति वैषम्यं विषमाः समता न च ।
हेतुभिः सदृशा नित्य जायन्ते देहधातवः ॥ ६३ ॥
युक्तिमेता पुरस्कृत्य त्रिकालां वेदना भिषक् ।
हन्तीत्युक्त्वा चिकित्सा तु नैष्ठिकी या विनोपधाम् ॥ ६४ ॥
जो धातु समानावस्था में हैं, वे विषम नही बनते और जो विषम हैं, वे
स्वय समान नही होते। शरीर के धातु सदा हेतु के समान हो जाते हैं। हेतु के
विषम होने से विषम और हेतु के सम होने से सम हो जाते हैं। इस युक्ति से
वैद्य अतीत, वर्त्तमान और भविष्य तीनों कालों की वेदनाओं का नाश करता
है। उपधारहित अर्थात् दोषरहित चिकित्सा ही दुःख का सम्पूर्ण रूप से नाश
करने वाली है १ ॥ ६३-६४ ॥
उपधा हि परो हेतुर्दुःखदुःखाश्रयप्रदः ।
त्याग सर्वोपधाना च सर्वदुःखव्यपोहकः ॥ ६५ ॥
कोषकारो यथा ह्यंशून्पादत्ते वधप्रदान् ।
उपादत्ते तथाऽर्थेभ्यस्तृष्णामज्ञः सदातुरः ॥ ६६ ॥
यस्त्वग्निकल्पानर्थान् ज्ञो ज्ञात्वा तेभ्यो निवर्त्तते ।
अनारम्भादसयोगात्तं दुःखं नोपतिष्ठते ॥ ६७ ॥
१ उपधा — 'भावदोष उपधा । अदोषोऽनुपधा ।' वै० द० । १ । ४ ।
अश्रद्धामदमानासूयाप्रभृतिर्मानसदोष उपधा ॥
१८ चरकसंहिता [ अ० १
उपधा—भावदोष ही दुःख और दुःख के आश्रय भूत शरीर का मूल
कारण है। सब प्रकार की उपधा का परित्याग करना सब प्रकार के शारीरिक
एव मानसिक दुःखों के नाश का कारण है। जिस प्रकार रेशम का कीड़ा आप
ही सूत्रों को उत्पन्न करके स्वय उन घातक सूत्रों में बध जाता है, इसी प्रकार
मूढ, आतुर व्यक्ति विषयजन्य तृष्णा में फस जाता है। इसलिये मूढ़ मनुष्य
सदा दुःखी रहता है और जो ज्ञानी अग्नि के समान दुःखदायी विषयो को
जान कर इन से हट जाता है, तृष्णा नहीं रखता, कर्म नहीं करता, वह वीतराग
होने से शरीर, इन्द्रिय का सयोग न होने से दुःख नहीं भोगता। जन्म न होने
से दुःख नहीं होता १ ॥ ९५-६७ ॥
धीधृतिस्मृतिविभ्रंशः संप्राप्तिः कालकर्मणाम् ।
असात्म्यार्थागमश्चेति ज्ञातव्या दुःखहेतवः ॥ ६८ ॥
दुख के कारण—धी, धृति, स्मृति (ये प्रज्ञा के भेद है) इनका विभ्रंश
होना 'प्रज्ञापराध' है। काल अर्थात् परिणाम-काल और पूर्व कृत, कर्म और दैव
शब्द से कहे जाने वाले कर्म और असात्म्य-इन्द्रियार्थ सयोग ये दुःखों के कारण
है। कर्मजन्य रोगों का प्रज्ञापराध मे ही अन्तर्भाव करना चाहिये ॥ ६८ ॥
विषमाभिनिवेशो यो नित्यानित्ये हिताहिते ।
ज्ञेयः स बुद्धिविभ्रंशः, समं बुद्धिर्हि पश्यति ॥ ६६ ॥
नित्य और अनित्य, हित और अहित में सम के विपरीत जो विषम अर्थात्
यथावत् ज्ञान का अभाव है, उसे 'बुद्धि का विभ्रंश' समझना चाहिये। क्योंकि
बुद्धि नित्य अनित्य, हित और अहित को सम (यथार्थ) रूप में देखती है ॥६६॥
विषयप्रवणं चित्तं २ धृतिभ्रंशान्न शक्यते ।
नियन्तुमहितादर्थाद् धृतिर्हि नियमात्मिका ॥ १०० ॥
धृति मन का नियन्त्रण करती है। विषय की ओर जाते हुए मन का निय-
न्त्रण न करना 'धृतिभ्रंश' है। धृतिभ्रंश हो जाने से विषय की ओर लगा हुआ
चित्त अहित विषय से रोका नहीं जा सकता ॥ १०० ॥
तत्त्वज्ञाने स्मृतिर्यस्य रजोमोहावृतात्मनः ।
भ्रश्यते स स्मृतिभ्रंशः, स्मर्तव्य हि स्मृतौ स्थितम् ॥ १०१ ॥
स्मृतिभ्रंश—जिस पुरुष की स्मृति रज और तम से ढकी रहती है,
अतः वह पुरुष तत्त्वज्ञान का स्मरण नही कर सकता, इसको 'स्मृतिभ्रंश'
———————————————————————————————————————————
१ 'वीतरागजन्मादर्शनात् ।” न्याय० ३ । १ । २५ ।
२ 'सत्त्व' इति पाठान्तरम् ।
प्र० १ ] शारीरस्थानम् १६
प्र० १ ] शारीरस्थानम् १६
कहते हैं। क्योंकि स्मृति में स्थित वस्तु का स्मरण होना ही चाहिये, उसका
स्मरण न होना ही 'स्मृतिभ्रंश' है॥ १०१ ॥
धीधृतिस्मृतिविभ्रष्टः कर्म यत्कुरुतेऽशुभम् ।
प्रज्ञापराधं तं विद्यात्सर्वदोषप्रकोपणम् ॥ १०२ ॥
प्रज्ञापराध—बुद्धि, धृति और स्मृति से भ्रष्ट हुआ पुरुष जो अशुभ, अहित
कर्म करता है, वह सब शारीरिक एव मानसिक दोषो को कुपित करने वाला
'प्रज्ञापराध' कहा जाता है ॥१०२॥
उदीरणं गतिमतामुदीर्णानां च निग्रहः।
सेवनं साहसानां च नारीणां चातिसेवनम् ॥ १०३ ॥
कर्मकालातिपातश्च मिथ्यारम्भश्च कर्मणाम् ।
विनयाचारलोपश्च पूज्यानां चाभिधर्षणम् ॥ १०४ ॥
ज्ञातानां स्वयमर्थानामहितानां निषेवणम् ।
परमोन्मादिकानां च प्रत्ययानां निषेवणम् ॥ १०५ ॥
अकालादेशसंचारौ मैत्री संक्लिष्टकर्मभिः ।
इन्द्रियोपक्रमोक्तस्य सद्-वृत्तस्य च वर्जनम् ॥ १०६ ॥
ईर्ष्यामानभयक्रोधलोभमोहमदभ्रमाः ।
तज्जं वा कर्म यत्क्लिष्टं यद्वा तद्देहकर्म च ॥ १०७॥
यच्चान्यदीदृशं कर्म रजोमोहसमुत्थितम् ।
प्रज्ञापराधं तं शिष्टा ब्रुवते व्याधिकारणम् ॥ १०८ ॥
गमनशील मूत्र पुरीष के अनुपस्थित वेगो को बलात् निकालना, उपस्थित
मल मूत्रादि के वेगों को रोकना, साहसिक कार्यों का करना, स्त्रियों का अति
सेवन, चिकित्साकाल का अतिक्रमण, मन आदि कार्यों का मिथ्या-आरम्भ,
विनय और आचार का लोप, पूज्य जनों का तिरस्कार, जाने हुए अहितकारा
पदाथो का सेवन, उन्माद रोग में कहे कारणो का सेवन करना, निषिद्ध समयों
और निषिद्ध स्थानों में जाना, पतित आचार वाले मनुष्यों के साथ मैत्री करना,
'इन्द्रियोपक्रमणीय' (सूत्र० ८) अध्याय में कहे सद्वृत्त का पालन न करना,
ईर्ष्या, मान, भय, क्रोध, लोभ, मोह, मद और भ्रम इन मानस दोषों का वा
इन से उत्पन्न निन्दित कर्मों को करना, शरीर को दुःख देने वाले कर्म का करना,
इनके अतिरिक्त और जो भी इस प्रकार रज और मोह से उत्पन्न कर्म होते हैं
उन सब रोग कारक कारणों को शिष्ट मनुष्य 'प्रज्ञापराध' ही कहते हैं ॥ १०८ ॥
२० चरकसंहिता [ अ० १
बुद्ध्या विषमविज्ञानं विषमं च प्रवर्तनम् ।
प्रज्ञापराधं जानीयान्मनसो गोचर हि तत् ॥ १०६ ॥
बुद्धि से विषम ( सम के विपरीत, अयथार्थ ) जानना, विषम रूप मे
प्रवृत्ति करना, यह प्रज्ञापराध है । यह प्रज्ञापराध मानस दोष है ॥ १०६ ॥
निर्दिष्टा कालसंप्राप्तिर्व्याधीना हेतुसंग्रहे ।
चयप्रकोपप्रशमाः पित्तादीना यथा पुरा ॥ ११० ॥
रोगों के हेतु रूप से काल को (कियन्त शिरसीय अध्याय सूत्र० १७ में)
कह चुके है । वही पर पित्तादि का जय, प्रकोप एव प्रशमन भी काल के
कारण कह दिया है ॥११०॥
मिथ्यातिहीनलिङ्गाश्च वर्षान्ता रोगहेतवः ।
जीर्णभुक्तप्रजीर्णान्नकालाकालस्थितिश्च या ॥ १११ ॥
पूर्वमध्यापराह्नाश्च रात्र्या यामाश्रयश्च ये ।
तेषु कालेषु नियता ये रोगास्ते च कालजाः ॥ ११२ ॥
कालज रोग—वर्षा के अन्त वा शरद् से प्रारम्भ होने वाली छः ऋतुए
मिथ्या, हीन और अति लक्षणों वाली होती हैं । मिथ्या लक्षण जैसे ग्रीष्म
ऋतु में शीत होना । हीनलिङ्ग जैसे—गरमी में गरमी का कम होना । अति-
लिङ्ग जैसे—ग्रीष्म में गरमी का अधिक होना इत्यादि । जो भुक्त, जीर्ण
और प्रजीर्ण काल में, जो पूर्वाह्न, मध्याह्न एव अपराह्न मे, और जो
रोग रात्रि के पूर्व प्रहर, मध्यम प्रहर और अपर प्रहर में होते है वे सब
रोग कालजन्य हैं । इन सब में काल कारण होता है । [ अन्न के खाने
पर, पूर्वाह्न में और प्रदोष में श्लेष्मा प्रकुपित होता है । अन्न की पच्यमान
अवस्था में, मध्याह्न में और रात्रि के मध्य प्रहर मे पित्त और अन्न के जीर्ण
होने पर, अपराह्न मे और तीसरे याम मे वायु कुपित होता है । इन समयों में
इन्ही दोषों के रोग होते हैं ] ॥ १११-११२ ॥
अन्येद्युष्को द्वयहग्राही तृतीयकचतुर्थकौ ।
स्वे स्वे काले प्रवर्तन्ते काले ह्येषा बलागमः ॥ ११३ ॥
एते चान्ये च ये केचित्कालजा विविधा गदाः ।
अनागते चिकित्स्यास्ते बलकालौ विजानता ॥ ११४ ॥
प्रतिदिन होने वाला, 'द्वयहग्राही' दिन में दो बार होने वाला, 'तृतीयक'
एक दिन छोड़ कर तीसरे दिन आने वाला, 'चतुर्थक' बीच में दो दिन छोड़
कर होने वाला ( ज्वर ) अपने अपने समय में होते हैं, यही इनके बल का
अ० १ ] शारीरस्थानम् २१
अ० १ ] शारीरस्थानम् २१
समय होता है । ये अथवा जो यहा पर कालजन्य रोग नहीं कहे, इन सब रोगों
में निदान आदि जन्य काल को जान कर बल और काल के आने से पूर्व ही
चिकित्सा करनी चाहिये । ज्वर चढने के समय से पूर्व ही चिकित्सा करनी
उचित है ॥ ११३-११४ ॥
कालस्य परिणामेन जरामृत्युनिमित्तजा ।
रोगाः स्वाभाविका दृष्टाः, स्वभावो निष्प्रतिक्रियः ॥ ११५ ॥
काल परिणाम से बुढापा, मृत्यु, मरणरूपी स्वाभाविक रोग होते हैं ।
इनकी कोई चिकित्सा नहीं, क्योंकि स्वभाव का कोई उपाय नहीं है ॥ ११५ ॥
निर्दिष्टं दैवशब्देन कर्म यत्पूर्वदैहिकम् ।
हेतुस्तदपि कालेन रोगाणामुपलभ्यते ॥ ११६ ॥
न हि कर्म महत्किंचित्फलं यस्य न भुज्यते ।
क्रियाघ्नाः कर्मजा रोगाः, प्रशमं यान्ति तत्क्षयात् ॥ ११७ ॥
पूर्व शरीर में किये कर्म को 'दैव' शब्द से कहा जाता है । यह कर्म भी
काल वश से रोगों का कारण होता है । ऐसा कोई भी छोटा या बड़ा कर्म नहीं
है, जिसका कि फल नही भोगना पड़ता । सब कर्मों का फल भोगना ही होता
है । कर्मजन्य रोगो मे चिकित्सा सफल नहीं होती । ये रोग चिकित्सा क्रिया को
नष्ट करने वाले हैं । वे रोगो के कारण रूप कर्मों के क्षय होने पर ही शान्त हो
जाते है ॥ ११५-११७ ॥
अत्युग्रशब्दश्रवणाच्छ्रवणात्सर्वशो न च ।
शब्दाना चातिहीनाना भवन्ति श्रवणाज्जडाः ॥ ११८ ॥
परुषोद्वीषणाशस्ताप्रियव्यसनसूचकैः ।
शब्दैः श्रवणसंयोगो मिथ्यायोग स उच्यते ॥ ११९ ॥
असंस्पर्शोऽतिमस्पर्शो हीनसंस्पर्श एव च ।
स्पृश्याना सग्रहेणोक्तः स्पर्शनेन्द्रियबाधक ॥ १२० ॥
यो भूतविषवातानामकालेनागतश्च यः।
स्नेहशीतोष्णसस्पर्शो मिथ्यायोगः स उच्यते ॥ १२१ ॥
रूपाणां भास्वता दृष्टिविनश्यति हि दर्शनात् ।
दर्शनाच्चातिसूक्ष्माणां सर्वशश्चाप्यदर्शनात् ॥ १२२ ॥
दृष्टभैरवबीभत्सदूरातिश्लिष्टदर्शनात् ।
तामसानां च रूपाणां मिथ्यासयोग उच्यते ॥ १२३ ॥
अत्यादानमनादानमोकसात्म्यादिभिश्च यत् ।
२२ चरकसंहिता [ अ० १
रसानां विषमादानमल्पादान च दूषणम् ॥ १२४ ॥
अतिमृद्वतितीक्ष्णानां गन्धानामुपसेवनम् ।
असेवनं सर्वशश्च घ्राणेन्द्रियविनाशनम् ॥ १२५ ॥
पूतिभूतविषद्दिष्टा गन्धा ये चाप्यनार्तवाः ।
तैर्गन्धैर्घ्राणसंयोगो मिथ्यायोगः स उच्यते ॥ १२६ ॥
अति उग्र शब्दों का सुनना यह शब्द का अतियोग है, शब्द का बिल्कुल
न सुनना या बहुत धीमे शब्दों को सुनना हीनयोग और कठोर, भीषण, अशुभ,
अप्रिय, विपत्तिसूचक शब्दों का सुनना मिथ्यायोग है । स्पृश्य वस्तुओं का
बिल्कुल स्पर्श न करना असस्पर्श, थोड़ा स्पर्श करना हीनसस्पर्श, अधिक स्पर्श
करना अतिसस्पर्श, निन्दित द्रव्य विष आदि का स्पर्श वा बिना क्रम से उष्ण,
शीत स्पर्श करना, स्पर्शक्रिया का मिथ्यायोग है । यह स्पर्शन इन्द्रियो के
नाशक हैं ।
चमकीले पदार्थों को देखने से दृष्टि नष्ट हो जाती है, इसी प्रकार अतिसूक्ष्म
पदाथो को देखने वा रूप को बिल्कुल न देखना भी अयोग है । इससे भी
दृष्टि नष्ट हो जाती है । अप्रतिकर, भयंकर, घृणाजनक, दूर के, वा मिले
पदार्थों और तामस रूपो को देखना यह रूपो का मिथ्यायोग है । रसों का
अति सेवन अतियोग, सर्वथा सेवन न करना या थोड़ा सेवन करना 'अयोग'
ओकसात्म्य आदि से विषम ( राशि दोष को छोड़ कर शेष आहार विधि में
कहे विशेष अथ्यों को ) सेवन करना मिथ्यायोग है । अति मृदु या अल्प
गन्ध वाले पदाथो का सेवन अयोग, अति तीक्ष्ण पदाथो को सूंघना अतियोग,
घ्राणेन्द्रिय के नाशक पूति ( दुर्गंध ) आदि गन्धों का तथा जो ऋतु काल के
गन्ध नहीं है, उन गन्धों का सूंघना मिथ्यायोग है ॥११८-१२६॥
इत्यसात्म्येन्द्रियसंयोगस्त्रिविधो दोषकोपनः ।
असात्म्यमिति तद्विद्याद्यन्न याति सहात्मताम् ॥ १२७ ॥
जो आत्मा के अनुकूल नही होता उसे 'असात्म्य' जाने । यह असात्म्य
तीन प्रकार का है । और अर्थों का आत्मा के साथ सयोग तीन प्रकार का है ।
अतियोग, अयोग और मिथ्यायोग । इन से दोष कुपित होते हैं ॥ १२७ ॥
मिथ्यातिहीनयोगेभ्यो यो व्याधिरुपजायते ।
शब्दादीना स विज्ञेयो व्याधिरैन्द्रियको बुधैः ॥ १२८ ॥
शब्द आदि इन्द्रियों से ग्राह्य विषयों के मिथ्यायोग, अयोग और अतियोग
से जो व्याधि उत्पन्न होती है, उनको विद्वान् 'ऐन्द्रियक' ( इन्द्रियों से उत्पन्न
अ० १ ] शारीरस्थानम् २३
अ० १ ] शारीरस्थानम् २३
हुआ रोग ) कहते हैं। [ रस को छोड़ कर सब असात्म्य विषय अपनी २ इन्द्रिय
के रोग उत्पन्न करते हैं। रस सम्पूर्ण शरीर में रोग उत्पन्न करता है, यह ध्यान
रखना चाहिये ] ॥ १२८ ॥
वेदनानामसात्म्यानामित्येते हेतवः स्मृताः।
सुखहेतुर्मतस्त्वेकः समयोग सुदुर्लभः ॥ १२६ ॥
यह विषयों का ( काल और बुद्धि का भी ) अतियोग, अयोग और मिथ्या-
य ग शारीरिक एवं मानसिक दानों प्रकार के रोगों के तीन प्रकार के कारण है।
असात्म्य दुःखों का कारण है। इन विषयों का ( काल और बुद्धि का भी )
समान योग अकेला ही सुख सञ्ज्ञक आरोग्य का कारण है। ऐसा समयोग
दुर्लभ है ॥ १२६ ॥
नेन्द्रियाणि न चैवार्थाः सुखदुःखस्य हेतवः ।
हेतुस्तु सुखदुःखस्य योगो दृष्टश्चतुर्विध ॥ १३० ॥
न तो इन्द्रिया और न इनके विषय ही सुख दुःख का कारण हैं। जो योग
सुख दुःख का कारण होता है वह चार प्रकार का है। इनमें समयोग सुख का
कारण है, अतियाग, अयोग और मिथ्यायोग दुःख के कारण है ॥ १३० ॥
सन्तीन्द्रियाणि सन्त्यर्था योगो न च न चास्ति रुक् ।
न सुख, कारण तस्माद्याग एव चतुर्विध. ॥ १३१ ॥
क्योकि इन्द्रिया भी ह और विषय भी हैं। यदि योग चार प्रकार न हो तो
न दुःख हो और न सुख हो । इसलिये अन्वय-व्यतिरेक से यह चार प्रकार का
याग ही सुख-दुःख का कारण है ॥ १३१ ॥
नात्मेन्द्रियमनोबुद्धिगोचर कर्म वा विना ।
सुखदुःखं यथा यच्च बोद्धव्यं तत्तथोच्यते ॥ १३२ ॥
आत्मा, इन्द्रिय, बुद्धि ओर मन के बिना, इन्द्रियों के विषयों के बिना,
अदृष्ट के बिना न सुख और न दुःख होता है। आत्मा आदि के होने पर जिस
प्रकार से सुख दुःख होते हैं, उनको उसी प्रकार बतलाते है। [ आत्मा मे
उपशय ( अनुकूलता ) होने से सुख और आत्मा में अनुपशय ( प्रतिकूलता )
हाने से दुःख होता है। अतियोग, अयोग और मिथ्यायोग ये अनुपशय के
कारण हैं और समयोग उपशय का कारण है ] ॥ १३२ ॥
स्पर्शननेन्द्रियसंस्पर्शः स्पर्शो मानस एव च ।
द्विविधः सुखदुःखानां वेदनानां प्रवर्तकः ॥ १३३ ॥
२४ चरकसंहिता [अ० १
स्पर्शनेन्द्रिय (त्वचा) का सम्बन्ध और मानस स्पर्श यह दो प्रकार का
स्पर्श सुख दुःख वेदनाओं का प्रवर्त्तक है। [त्वचा और मन का सयोग होने
से ही ज्ञान होता है। त्वचा सब इन्द्रियों में व्याप्त है। मन का त्वचा के साथ
सम्बन्ध होने से मन भी सब इन्द्रियो से सम्बन्धित हो जाता है। इस प्रकार
मन अणु होने पर भी जिस इन्द्रिय के साथ सम्बन्ध करता है उसी इन्द्रिय
का ज्ञान हो जाता है] ॥ १३३ ॥
इच्छाद्वेषात्मिका तृष्णा सुखदुःखात्प्रवर्त्तते ।
तृष्णा च सुखदुःखानां कारणं पुनरुच्यते ॥ १३४ ॥
उपादत्ते हि सा भावान् वेदनाश्रयसञ्ज्ञकान् ।
स्पृश्यते नानुपादाने नास्पृष्टो वेत्ति वेदनाः ॥ १३५ ॥
सुख दुःख मे इच्छा और द्वेष रूप तृष्णा उत्पन्न होती है। तृष्णा ही
सुख दुःख में प्रवृत्ति करके जन्म का कारण होती है। क्योकि यही तृष्णा
वेदनाओं के आश्रय स्थान (मन, देह और इन्द्रियों) को उत्पन्न करती है।
वेदनाओं के आश्रयों की उत्पत्ति न होने से स्पर्शनेन्द्रिय और मन का स्पर्श नहीं
होता। स्पर्शनेन्द्रिय और मन का स्पर्श न होने से वेदना भी नहीं होती ॥१३५॥
वेदनानामधिष्ठानं मनो देहश्च सेन्द्रियः ।
केशलोमनखाग्रान्नमलद्रवगुणैर्विना ॥ १३६ ॥
सुख दुख आदि वेदनाओं का आश्रय सत्व सञ्ज्ञक मन, इन्द्रियों सहित
चेतना और जीवित शरीर है। इनमे केश (शिर के बाल), लोम (शरीर के
बाल) नखों के अग्र भाग, अन्न के मल, द्रव और गुण जैसे—शब्द, गन्ध,
रूप, रस, स्पर्श इन को छोड़ कर शेष इन्द्रियों सहित शरीर वेदनाओं का
आश्रय स्थान है ॥१३६॥
योगे मोक्षे च सर्वासां वेदनानामवर्त्तनम् ।
मोक्षे निवृत्तिर्निःशेषा योगो मोक्षप्रवर्त्तकः ॥ १३७ ॥
आत्मेन्द्रियमनोर्थानां सन्निकर्षात्प्रवर्त्तते ।
सुखदुःखमनारम्भादात्मस्थे मनसि स्थिरे ॥ १३८॥
निवत्र्त्तन्ते तदुभयं वशित्वं चोपजायते ।
सशरीरस्य योगज्ञास्तं योगमृषयो विदुः ॥ १३६ ॥
योग और मोक्ष (परम मुक्ति) में सब प्रकार की वेदनाओं की समाप्ति
हो जाती है। मोक्ष मे वेदनाओं की अत्यन्त निवृत्ति हो जाती है, योग में
ऐसा नहीं होता। योग मोक्ष का प्रवर्त्तक (साधन) है।
अ० १ ] शारीरस्थानम् २५
अ० १ ] शारीरस्थानम् २५
जीवन्मुक्त दशा में रहता है, मोक्ष में परम मुक्ति हो जाती है ] । आत्मा,
इन्द्रिय, अर्थ, और मन के सन्निकर्ष से सुख दुख उत्पन्न होते हैं और जब
विषयों से हट कर मन आत्मा में स्थिर हो जाता है, तब कर्मों का आरम्भ
न होने से सुख-दुख समाप्त हो जाते हैं और वशित्व उत्पन्न हो जाता है,
यही योग का फल है । ⁂ योग को जानने वाले ऋषि शरीर युक्त इस दुख-
निवृत्ति रूप स्थिति को योग कहते हैं ॥ १३७-१३६॥
आवेशश्चेतसो ज्ञानमर्थाना छन्दत क्रिया ।
दृष्टिः श्रोत्रं स्मृतिः कान्तिरिष्टतश्चाप्यदर्शनम् ॥ १४० ॥
इत्यष्टविधमाख्यातं योगिना बलमैश्वरम् ।
शुद्धसत्त्वसमाधानात्तत्सर्वमुपजायते ॥ १४१ ॥
योगियों का आठ प्रकार का ऐश्वर्य्य—आवेश (दूसरे के शरीर में
प्रवेश करना), चित्त का ज्ञान अर्थात् (दूसरे के चित्त को जानना),
विषयों का इच्छानुसार करना, इच्छानुसार दर्शन, श्रवण, अतीन्द्रिय और
दूर के भी पदार्थों को देखना, शब्दों को सुनना, इच्छानुसार स्मरण
(पूर्वजन्म का भी स्मरण), इच्छानुसार रूप बनाना और इच्छानुसार
अदृश्य हो जाना यह योगियों का आठ प्रकार का यागजन्य बल है । यह सब
शुद्ध सत्त्व, रज और तम से रहित मन को विषयों से हटा कर आत्मा मे लगाने
से उत्पन्न होता है ॥ १४०-१४१ ॥
मोक्षो रजस्तमोऽभावाद्वलवत्कर्मसंक्षयात् ।
वियोगः सर्वसंयोगैरपुनर्भाव उच्यते ॥ १४२॥
रज और तम दो मानस दोष हैं। इनके निवृत्त होने पर और अवश्य
भोक्तव्य कर्मा के ( फल भोग द्वारा ) क्षय होने से कर्मबन्धनों से मुक्ति अर्थात्
मोक्ष हो जाता है । मोक्ष होने पर फिर जन्म ग्रहण नहीं करना होता, इसी को
'अपुनर्भव' कहते हैं ॥१४२॥
सतामुपासन सम्यगसता परिवर्जनम् ।
व्रतचर्योपवासश्च नियमाश्च पृथग्विधाः ॥ १४३ ॥
धारण धर्मशास्त्राणा विज्ञानं विजने रतिः ।
विषयेष्वरतिर्मोक्षे व्यवसायः परा धृतिः ॥ १४४ ॥
कर्मणामसमारम्भः कृताना च परिक्षयः ।
⁂ आत्मस्थे मनसि शरीरस्य दुःखाभव स योग. ॥ वै० द० ५ । २ । १६ ॥