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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

तत्त्वस्मृतेरुपस्थानात् सर्वमेतत्प्रवर्तते ॥ १४६ ॥

२६ चरकसंहिता [अ० १
नैष्कर्म्यमनहङ्कारः संयोगे भयदर्शनम् ॥ १४५ ॥
मनोबुद्धिसमाधानमर्थतत्त्वपरीक्षणम् ।
तत्त्वस्मृतेरुपस्थानात् सर्वमेतत्प्रवर्तते ॥ १४६ ॥
मोक्ष के उपाय—सज्जनों की सेवा, दुर्जनों का त्याग, ब्रह्मचर्य, उपवास,
नाना प्रकार के नियम, धर्म शास्त्रों का अभ्यास, आत्मा आदि का जानना,
निर्जन स्थान में रति, विषयों में अनासक्ति, मोक्ष में प्रयत्न करना, धैर्य, कार्यों
के फल की इच्छा ने न करना, किये हुए कर्मों का फल भोग करके क्षय करना
गृहस्थाश्रम से निकलना, सन्यास ग्रहण करना, अहङ्कार का परित्याग, शरीरादि
संयोग में अथवा मनुष्यों के सम्पर्क में आने मे भय मानना, मन और बुद्धिका
समाधान, वस्तुओं की तत्त्व रूप से परीक्षा करना, यह सब तत्त्वज्ञान योग के
उपस्थित होने से होता है ॥ १४३–१४६ ॥
स्मृतिः सत्सेवनाद्यैश्च धृत्यन्तैरुपलभ्यते ।
स्मृत्वा स्वभावं भावाना स्मरन् दुःखात्प्रमुच्यते ॥ १४७ ॥
स्मृति—तत्त्वस्मृति सज्जन पुरुषों के संसर्ग से लेकर धैर्य तक कहें हुए
लक्षणो से उपलब्ध हो जाती है, तब पुरुष आत्मा आदि भावों के स्वरूप का
स्मरण करक तत्त्व को जानता हुआ दुःखों से छूट जाता है ॥ १४७ ॥
वक्ष्यन्ते कारणान्यष्टौ स्मृतिर्यैरुपजायते ।
निमित्तरूपग्रहणात्सा दृश्यात्सविपर्ययात् ॥ १४८ ॥
सत्त्वानुबन्धादभ्यासाज्ज्ञानयोगात्पुनः श्रुतात् ।
दृष्टश्रुतानुभूतानां स्मरणात्स्मृतिरुच्यते ॥ १४६ ॥
स्मृति की उत्पत्ति के आठ कारण—जिन कारणो से यह स्मृति उत्पन्न
होती है उन २ कारणों का उपदेश करते हैं। जैसे-- (१) निमित्त-कारण
से इनका ग्रहण, जैसे धूम को देख कर अग्नि का रूप दर्शन से (२) वातिक
लक्षणो से वातिक रोग का स्मरण होता है। (३) सादृश्य से जैसे देवदत्त के
समान चित्र को देख कर देवदत्त का स्मरण होता है (४) सादृश्य-विपर्यय
अर्थात् असादृश्य से, अत्यन्त विरुद्ध वस्तु के दर्शन से दूसरे का स्मरण होता है
जैसे दुःख से पूर्व अनुभूत सुख का स्मरण होता है । (५) सत्त्व (मन) के
प्रणिधान अर्थात् मनोयोग करने से । (६) अभ्यास से । (७) तत्त्वज्ञान से ।
(८) फिर सुनने से भूली बात फिर स्मरण हो जाती है । पूर्व दृष्ट, पूर्व श्रुत
और पूर्व अनुभूत पदार्थों के स्मरण को 'स्मृत' कहते हैं ॥ १४८-१४६ ॥

अ० १ ] शारीरस्थानम् २७

अ० १ ] शारीरस्थानम् २७
एतत्तदेकमयनं मुक्तैर्मोक्षस्य दर्शितम् ।
तत्त्वस्मृतिबलं, येन गता न पुनरागताः ॥ १५० ॥
मुक्त पुरुषों ने इस तत्त्वस्मृति के बल को मोक्ष का एक ऐसा श्रेष्ठ मार्ग
बताया है जिस मार्ग से गये हुए पुरुष फिर यहा पर वापिस नही आते ॥१५०॥
अयनं पुनराख्यातमेतद्योगस्य योगिभिः ।
संख्यातधर्मैः सांख्यैश्च मुक्तैर्मोक्षस्य चायनम् ॥ १५१ ॥
योगी पुरुष इस तत्त्वस्मृति के बल को ही योग का मार्ग कहते हैं और
सत्यज्ञानी और मुक्त पुरुष इस स्मृतिबल को भी मोक्ष का एक मार्ग
कहते हैं ॥ १५१ ॥
सर्वं कारणवद् दुःखमस्वं चानित्यमेव च ।
न चात्मकृतकं तद्धि तत्र चोत्पद्यते स्वता ॥ १५२ ॥
यावन्नोत्पद्यते सत्या बुद्धिर्नैतदहं यथा ।
नैतन्मम च विज्ञाय ज्ञः सर्वमतिवर्तते ॥ १५३ ॥
कारणवान् अर्थात् उत्पन्न हाने वाला सम्पूर्ण वस्तुए बुद्धि, अहंकार आदि
आत्मा से भिन्न दुःख रूप हैं, वे दुःख उत्पन्न करता हैं और कारणवान् होने
से अनित्य है । आत्मा कारण रहित और नित्य है । जो वस्तु कारणवाली होती
है, उसमें ममता उत्पन्न होती है । अनात्मा में आत्मबुद्धि 'यह मेरा शरीर, मैं
गोरा हूं, मोटा हूं' इस प्रकार का मिथ्याज्ञान तब तक रहता है, जब तक
सत्यबुद्धि अर्थात् तत्त्वज्ञान उत्पन्न नही होता । सत्यबुद्धि उत्पन्न हाने पर 'मेरा
यह शरीर नहीं, मैं गोरा नहीं' यह ज्ञान हो जाता है । इस ज्ञान के होने पर
ज्ञानी जन्म, कर्म आदि सब बन्धनों का अतिक्रमण कर जाता है । तभी सब
वेदनाओ ( पीड़ाओं ) की अत्यन्त निवृत्ति होती है ॥ १५२-१५३ ॥
तस्मिंश्चरमसन्यासे समूलाः सर्ववेदनाः ।
असंज्ञानज्ञानविज्ञाना निवृत्तिं यान्त्यशेषतः ॥ १५४ ॥
इस अन्तिम सन्यास अवस्था में सब कर्मों के परित्याग करने पर मिथ्या
ज्ञान रूपी कारणों से उत्पन्न सब वेदनायें, ज्ञेय के भली प्रकार से जान लेने से
सम्पूर्ण रूप में निवृत्त हो जाती हैं ॥ १५४ ॥
अतः परं ब्रह्मभूतो भूतात्मा नोपलभ्यते ।
निःसृतः सर्वभावेभ्यश्चिह्नं यस्य न विद्यते ॥ १५५ ॥
इसके अनन्तर विदेह मोक्ष को प्राप्त करने के पीछे भूतात्मा ( जीव ) सब
भावों से निकल कर ब्रह्म रूप हो जाने से कहीं भी उपलब्ध नहीं होता, वह

२८ चरकसंहिता [ अ० २
सब पदार्थों से पृथक् हो जाता है, तब इसके प्राण अपान आदि लक्षण नहीं
रहते, इसलिये वे उपलब्ध नही होते ॐ ॥ १५५ ॥
गतिर्ब्रह्मविदां ब्रह्म तच्चाक्षरमलक्षणम् ।
ज्ञानं ब्रह्मविदां चात्र नाज्ञस्तज्ज्ञातुमर्हति ॥ १५६ ॥
ब्रह्म का जानने वालों की ब्रह्म ही गति है। वह ब्रह्म 'अक्षर' कभी नाश
न होने वाला और लक्षण से रहित है, ब्रह्मविद् ही ब्रह्म को जानता है, अज्ञ,
मूर्ख पुरुष इस ब्रह्म को नहीं जान सकता ॥ १५६ ॥
तत्र श्लोकः-प्रश्नाः पुरुषमाश्रित्य त्रयोविंशतिरुत्तमाः ।
कतिधापुरुषीयेऽस्मिन्निर्णीतास्तत्त्वदर्शिना ॥ १५७ ॥
इस 'कतिधापुरुषीय' शारीर में तत्त्वदर्शी भगवान् आत्रेय ने पुरुष को
उपलक्ष्य करके तेईस उत्तम प्रश्नों का निर्णय कर दिया है ॥ १५७ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थाने कतिधापुरुषीय
शारीर नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
द्वितीयोऽध्यायः ।
अथातोऽतुल्यगोत्रीयं शारीरं व्याख्यास्याम ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
पूर्व अध्याय में धातु-भेद से पुरुष का वर्णन किया है। अब गर्भ की
उत्पत्ति को बताने के लिये 'अतुल्य गोत्रीय' नाम शारीर का व्याख्यान करेंगे ।
जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥
अतुल्यगोत्रस्य रजःक्षयान्ते रहोविसृष्टं मिथुनीकृतस्य ।
किं स्याच्चतुष्पादप्रभवं च षड्भ्यो यत्स्त्रीषु गर्भत्वमुपैति पुंसः ॥३॥
स्त्री के गोत्र से भिन्न गोत्रवाले पुरुष का स्त्री के रजोधर्म हो चुकने के
पश्चात् स्त्री के साथ एकान्त स्थान में सम्भोग करते हुए, स्त्री की योनि में त्याग
और किया वह क्या पदार्थ है जो चतुष्पाद अर्थात् चार पाद अर्थात् गुणोंवाला
छः तत्त्वो से उत्पन्न होता है ओर जो स्त्रियों के शरीरों मे गर्भ रूप हो जाता है। ३।
शुक्रं तदस्य प्रवदन्ति धीरा यद्धीयते गर्भसमुद्भवाय ।
वाय्वग्निभूम्यद्गुणपादवत् तत्, षड्भ्यो रसेभ्यः प्रभवश्च तस्य ॥४॥
उत्तर--गर्भ की उत्पत्ति के लिये पुरुष जिस पदार्थ का स्त्री योनि मे
ॐ ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति ।

अ० २ ] शारीरस्थानम् २६
आधान करता है, बुद्धिमान् पुरुष इस वस्तु को 'शुक्र' कहते हैं। यह शुक्र
उत्तम वायु, अग्नि, पृथ्वी और जल इन चार भूतो के गुणों से युक्त होता है।
ये ही चार इसके चार १पाद हैं। यह शुक्र मधुर आदि छः रसों वाले आहार-
रस से उत्पन्न होता है। [ मधुर को शुक्रजनक और अम्ल रस को शुक्रविघातक
कहा है उसका तात्पर्य अधिक उपयोग करने से है। वैसे छहों रसों से उत्पन्न
वीर्य ही विशुद्ध शुक्र होता है] ॥४॥
संपूर्णदेहः समये सुखं च गर्भः कथं केन च जायते स्त्री ।
गर्भं चिराद् विन्दति सप्रजाऽपि भूत्वाऽथवा नश्यति केन गर्भः ॥५॥
प्रश्न—( १) गर्भ किस प्रकार से सम्पूर्ण शरीर वाला होता और ( २ )
किस प्रकार से और किस कारण से ठीक समय पर उत्पन्न होता है ? ( ३ )
किस प्रकार से गर्भ उत्पन्न होता और सुख से उत्पन्न होता है ? ( ४ ) स्त्री
वन्ध्या न होते हुए भी किस कारण से देर में गर्भ धारण करती है ? ( ५ )
और गर्भ रह कर फिर किस कारण से नष्ट होना सम्भव है ॥ ५ ॥
शुक्रासृगात्माशयकालसंपद् यस्योपचारश्च हितैस्तथाऽर्थैः ।
गर्भश्च काले च सुखी सुखं च संजायते संपरिपूर्णदेहः ॥ ६ ॥
उत्तर—जिस गर्भ के बनने में शुक्र, आर्त्तव, आत्मा, गर्भाशय और
काल ये गर्भकारक भाव (पदार्थ) उत्तम गुणवाले अविकृत हों और जिसका
पालन पोषण भी उत्तम हितकारक अन्नो वा पदार्थों द्वारा हो २ वह गर्भ
सम्पूर्ण शरीर वाला होकर सुखी, सब प्रकार के रोगों से मुक्त और ठीक समय
पर उत्पन्न होता है। [ पुरुष के शुक्र और माता के रज तथा गर्भाशय का
उष्ण होना यह उत्तम गुण है, शुक्र और रज के योग होने पर भी आत्मा
पूर्व जन्म के उत्तम कर्मों से युक्त हो, काल, अतिगरमी, अति सरदी आदि
तीक्ष्णस्वभाव का न हो, गर्भ के प्रसव का ठीक काल नवम मास के अनन्तर
दसवे मास के भीतर २ है। गर्भ सुखी अर्थात् किसी रोग से पीड़ित न हो और
१ यद्यपि आगे आकाश का भी गर्भोत्पत्ति में कारण कहेंगे, तथापि यहा
पर आकाश के अक्रिय होने स इसको नहीं गिना। क्योंकि वायु आदि चारो
भूत पुरुष के शरीर से निकल कर क्रियावान् की तरह गर्भाशय में जाते हैं,
आकाश नहीं जाता ।
२ कही पर अन्न के स्थान पर 'अर्थ' पाठ है । यहा पर 'माता के सात्म्य
विषयों के सेवन से' ऐसा अर्थ करना चाहिये ।

३० चरकसंहिता [ अ० २

सुख से हो अर्थात् प्रसव काल में माता को बहुत अस्वाभाविक पीड़ा वा बालक
की मृत्यु आदि न हो, बालक की गर्भ मे स्थिति भी ठीक २ हो ] ॥ ६ ॥
योनिप्रदोषान्ममसोऽभितापाच्छुक्रासृगाहारविहारदोषात् ।
अकालयोगाद्बलसंक्षयाच्च गर्भं चिराद्विन्दति सप्रजाऽपि ॥७॥
योनि के दोष से, मन के संताप से, शुक्र, आर्तव ( रज ) और आहार
विहार के दोष से, ऋतुकाल बीतने पर या निषिद्ध दिनों में पुरुष के साथ
सयोग करने से और दुर्बलता से स्त्री बन्ध्या न होती हुई भी देर मे गर्भ धारण
करती है । [ गर्भ धारण का काल (ऋतुकाल) चरक के मत से १६ रात्रि
और सुश्रुत के मत से १२ रात्रिया हैं ] ॥ ७ ॥
असृङ् निरुद्ध पवनेन नार्या गर्भ व्यवस्यन्त्यबुधाः कदाचित् ।
गर्भस्य रूपं हि करोति तस्यास्तदस्रमस्रावि विवर्धमानम् ॥८॥
मूढ व्यक्ति कभी २ [ सौम्य एव पुष्टिकारक आहार के सेवन करने से ]
वायु के द्वारा रुके हुए स्त्री के आर्तव ( रजो-रुधिर ) को ही 'गर्भ' समझ
लेते हैं, क्योकि वह रुका हुआ रुधिर ही बाहर न आकर गर्भाशय में प्रात
दिन बढता हुआ गर्भ के लक्षण प्रकट करता है ॥ ८ ॥
तदग्निसूर्य श्रमशोकरोगैरुष्णान्नपानैरथवा प्रवृत्तम् ।
दृष्ट्वाऽसृगेवं न च गर्भमज्ञा. केचिन्नरा भूतहृत वदन्ति ॥६॥
ओजोशनानां रजनीचरणामाहारहेतोर्न शरीरमिष्टम् ।
गर्भं हरेयुर्यदि ते न मातुलैब्धावकाशा न हरेयुरोजः ॥ १० ॥
वायु से रुका रक्त अग्नि, सूर्य अथवा थकान आदि से या वायु का अनु-
लोमन करने वाले उष्ण खान-पान मे स्वय प्रवृत्त हा जाता है, तब कई मूढ़
मनुष्य रक्तको ही अकेला देख कर ओर गर्भ को न देख कर इस गर्भ का
'भूत चुरा ले गये' ऐसा कहने लगते हैं। [ जो इस प्रकार कहते हैं, वे मूर्ख हैं।
क्योंकि भूतों द्वारा गर्भ का हरण सम्भव नहीं है ] । जिन का ओज ही भोजन
है, ऐसे रात में विचरने वाले भूतों के आहार के लिये शरीर की आवश्यकता
नहीं है। वे भूत गर्भ का अपहरण कर सकते हैं, यदि उनको अवकाश मिल
जाये, त। वे गर्भ का हरण न करके माता के ओज का ही अपहरण कर सकते हैं १
कन्या सुतं वा सहितौ पृथग्वा सुतौ सुते वा तनयान्यहून्या ।
कस्मात्प्रसूते सुचिरेण गर्भमेकोऽभिवृद्धि च यमेऽभ्युपैति ॥११॥
प्रश्न—( १ ) स्त्री कन्या को क्यों कर उत्पन्न करती है १ अथवा (२) पुत्र
को ही क्योंकर उत्पन्न करती है ? ( ३ ५) दो कन्या वा दो पुत्रों वा कन्या और

अ० २ ] शारीरस्थानम् ३१

अ० २ ] शारीरस्थानम् ३१
पुत्र दोनों को एक साथ क्योकर उत्पन्न करती है ? (६) किस कारण से बहुत
से लड़कों को एक साथ उत्पन्न करती है ? (७) कभी चिरकाल मे गर्भ को
क्यों प्रसव करती है ? (८) किस कारण से युगल संतति मे एक संतान
अधिक वृद्धि को प्राप्त होती है ॥ ११ ॥
रक्तेन कन्यामधिकेन पुत्रं शुक्रेण, तेन द्विबिधीकृतेन ।
बीजेन कन्यां च सुतं च सूते यथास्वबीजान्यतराधिकेन ॥१२॥
शुक्राधिकं द्वैधमुपैति बीज यस्याः रुतौ सा सहितौ प्रसूते ।
रक्ताधिक वा यदि भेदमेति द्विधा सुते सा सहिते प्रसूते ॥१३॥
भिनत्ति यावद् बहुधा प्रपन्नः शुक्रार्तवं वायुरतिप्रवृद्धः ।
तावन्त्यपत्यानि यथाविभागं कर्मात्मकान्यस्ववशात्प्रसूते ॥ १४ ॥
माता आर्तव की अधिकता से कन्या को उत्पन्न करती है । शुक्र की
अधिकता से पुत्र को उत्पन्न करती है और जिस समय शुक्र और रक्त रूपी
बीज के दो भाग हो जावें, एक भाग में रक्त की अधिकता हो और दूसरे भाग
में शुक्र की अधिकता रहे तब कन्या और पुत्र दोनों एक साथ उत्पन्न होते हैं ।
जिस स्त्री के गर्भ में शुक्र की अधिकता वाला बीज ( शुक्रार्त्तव ) दो भागों मे
विभक्त हो जाता है, वह स्त्री दो पुत्रों को एक साथ उत्पन्न करती है और जब
रक्त की अधिकता वाला बीज दो भागों में विभक्त हो जाता है, तब स्त्री दो
कन्याओं को एक साथ उत्पन्न करती है । वायु बहुत प्रबल होकर बीज ( शुक्र
आर्तव ) के जितने अधिक खण्ड कर देती है, उतने ही सन्तानों को अपने कर्म
के कारण स्त्री उत्पन्न करती है । ॐ इस मे स्त्री का अपना कोई वश नहीं है ।
आहारमाप्नोति यदा न गर्भः शोषं समाप्नोति परिस्रुतिं वा ।
तं स्त्री प्रसूते सुचिरेण गर्भं पुष्टो यदा वर्षगणैरपि स्यात् ॥१५॥
कर्मात्मकत्वाद्विषमाशभेदाच्छुक्रासृजोर्वृद्धिमुपैति कुक्षौ ।
एकोऽधिको न्यूनतरो द्वितीय एव यमेऽप्यभ्यधिको विशेषः ॥१६॥
रसवाहिनी नाडी के दोष के कारण जिस समय गर्भ का आहार रस नहीं
ॐ कुत्ता आद जन्तुआ म जिस प्रकार स चार पाच बच्चे एक साथ उत्पन्न
होते हैं। इनमें शुक्र-आर्त्तव के जितने विभाग बनते हैं, इन विभागो में
जिनमें शुक्र की अधिकता रहती है, उतने नर और जितनों में आर्त्तव की
अधिकता रहती है, उतने मादा उत्पन्न होते हैं । इसी प्रकार मनुष्य-स्त्रियों में
भी समझना चाहिये ।

३२ चरकसंहिता [ अ०२

मिलता, तब गर्भ गर्भाशय में सूखने लगता है। अथवा जब स्राव होने लगता
है, तब भी गर्भ की वृद्धि नहीं होती, इसलिये वह देर तक गर्भाशय मे रुका रहता
है। वह जब कभी बहुत समय के पीछे आहार मे पुष्ट होता है तब स्त्री चिरकाल में
स्त्री प्रसव करती है। [वह गर्भ बहुत से वर्षों के बाद बहुत कष्ट से उत्पन्न होता
है या माता के जीवन भर उत्पन्न ही नही होता। ऐसा वाग्भट आचार्य का
लेख है। जिस समय गर्भ को पुष्ट होने का रस पर्याप्त नही मिलता और इस
कारण से प्रसव में देर हो तो ऐसे गर्भ को 'नागोदर' कहते हैं। यदि परिस्राव
होने से वर्षों का विलम्ब हो जावे तो उसको 'उपविष्टक' कहते हैं। जब वे बहुत
वर्षो के बाद आहार से पुष्ट होकर पैदा होते हैं तब इनके प्रसव काल में
गर्भाशय के भीतर ही केश और दात बड़े हो जाते हैं]।
उत्पन्न होने वाले जीवों के कर्मों के कारण और न्यून-अधिक रूप में
शुक्रार्त्तव के विषम विभाग होने से, जिस समय शुक्रार्त्तव गर्भाशय मे वृद्धि को
प्राप्त होता है, तब एक भाग अधिक रहता है और दूसरा भाग न्यून रहता है।
इस प्रकार से जोड़े सन्तान में भी यही विशेषता रहता है ॥ १६ ॥
कस्माद् द्विरेताः पवनेन्द्रियो वा सस्कारवाही नरनारिखण्डौ ।
वक्री तथेष्र्याभिरतिः कथ वा सजायते वातिकषण्डको वा ।' १७॥
प्रश्न--किस कारण से 'द्विरेत' अर्थात् दो वीर्य वाला जीव उत्पन्न होता
हे ? किस कारण से पवनेन्द्रिय ( वायु मात्र वीर्य वाला ) उत्पन्न होता है ?
किस कारण से सस्कारवाही (जिसको स्त्री वा पुरुष होने का सस्कार मात्र हो)
होता है ? किस कारण से नरषण्ड (नपुंसक) और नारी षण्ड होती है ? किस
कारण से वक्रध्वज (टेड़े लिंग वाला), ईर्ष्याभिरत (जो दूसरे को देख कर
कामार्त्त हो) अथवा वातिक षण्ड (वीर्य के स्थान पर केवल वायु छोड़ने
वाला) होता है ? ॥ १७ ॥
बीजात्समाशादुपतप्तबीजात्स्त्रीपुंमलिङ्गी भवति द्विरेताः ।
शुक्राशयं गर्भगतस्य हत्वा करोति वायुः पवनेन्द्रियत्वम् ॥ १८ ॥
शुक्राशयद्वारविघट्टनेन सस्कारवाह हि करोति वायुः ।
मन्दाल्पबीजावबलावहर्षौ क्लीबौ च हेतुर्विकृतिद्वयस्य ॥ १६ ॥
मातुर्व्यवायप्रतिघेन वक्री स्याद् बीजदौर्बल्यतया पितुश्च ।
ईर्ष्याभिभूतावपि मन्दहर्षौवीर्ष्यारतेरेव वदन्ति हेतुम् ॥ २० ॥

  • जिस प्रकार गान्धारी के दो साल गर्भ पेट मे रहा था।

अ० २ ] ३ शारीरस्थानम् ३३

अ० २ ] ३ शारीरस्थानम् ३३


वाय्वग्निदोषाद् वृषणौ तु यस्य नाशं गतौ वातिकषण्डकः सः ।
इत्येवमष्टौ विकृतिप्रकाराः कर्मात्मकानामुपलक्षणीयाः ॥ २१ ॥
जिस समय स्त्री पुरुष के बीज (शुक्र और आर्त्तव) समान भाग हों,
अथवा जब बीज किसी दोष के प्रकोप के कारण दुष्ट होता है, तब स्त्री-पुरुषों
के लक्षणों वाला 'द्विरेत' (नपुंसक) उत्पन्न होता है । वायु शुक्राशय को नष्ट
करके गर्भाशय में स्थित गर्भ को 'पवनेन्द्रिय' वाला बना देता है । वायु
शुक्राशय-द्वार को खोलकर संस्कारवाही षण्ड करता है । जिस समय स्त्री प्रथम
सन्तुष्ट हो जाती है, तब पीछे पुरुष का उत्सृष्ट शुक्र हर्ष के कारण मन के
अस्थिर होने से, स्त्री की वायु को चंचल कर देता है । साथ में पुरुष के
शुक्रवाहक स्रोत भी पुष्ट हो जाते हैं, तब वातेन्द्रिय पुरुष उत्पन्न होता है । स्त्री
के साथ सम्भोग करने पर शुक्र की भांति वायु ही आता है और जब यह वायु
इस पुरुष के शुक्रवाही स्रोतो को नष्ट न करके केवल मुखों को बन्द कर देता
है तब संस्कारवाही नपुंसक उत्पन्न होता है । संस्कार से (वाजीकरण, बस्ति,
खान पान से) वह प्रवृत्त होता है । मन्द एव अल्प बीज वाले निर्बल एवं
अल्प कामेच्छा वाले स्त्री-पुरुष नरषण्ड एव नारीषण्ड की उत्पत्ति मे कारण
होते हैं । माता और पिता के मैथुन के प्रतिघात होने से (अनुचित रीति से
सम्भोग करने पर) तथा बीज की निर्बलता से वक्रध्वज (टेढ़ी इन्द्रिय वाला)
नपुंसक उत्पन्न होता है । ईर्ष्या से युक्त मन्द कामेच्छा वाले स्त्री पुरुष 'ईर्ष्या से
रति करने वाले नपुंसक' का कारण है । जिस समय अल्पबल वाला पुरुष
अल्प कामेच्छा या द्वेषवाली स्त्री के साथ काम-उद्वेग के कारण सम्भोग करता
है, तब नरषण्ड उत्पन्न होता है । वह ईर्ष्या-रति नामक नपुंसक दूसरों को रति
करते देख कर रति मे प्रवृत्त होता है, इसलिये इसे 'ईर्ष्याण्ड' कहते हैं । जिस
पुरुष के गर्भ में वायु और अग्नि दोष के कारण वृषण नाश हो जाते हैं, उसे
'वातिक षण्ड' कहते है । गर्भ को ये आठ द्विरेत आदि विकृतिया आठ
षण्डयोनिया कर्म की विचित्रता से होती है ॥ १८-२१ ॥
गर्भस्य सद्योऽनुगतस्य कुक्षौ स्त्री-पुं-नपुंसामुदरस्थितानाम् ।
किं लक्षणं कारणमिष्यते किं सरूपतां यन च यात्यपत्यम् ॥ २२ ॥
प्रश्न—गर्भाशय मे तत्काल गर्भ स्थिर होने क क्या लक्षण है ? उदर में
स्थित स्त्री, पुरुष और नपुंसक के क्या लक्षण हैं ? और किस कारण से संतान
में माता पिता का समान रूप आता है ? ॥ २२ ॥
निष्ठिवीका गौरवमङ्गसादस्तन्द्राप्रहर्षो हृदयव्यथा च ।
तृप्तिश्च बीजग्रहणं च योन्यां गर्भस्य सद्योऽनुगतस्य लिङ्गम् ॥२३॥

३४ चरकसंहिता [ अ० २
तुरन्त गर्भस्थिति के लक्षण—मुख से लार आना, योनि मे भारीपन, अगों
का टूटना, तन्द्रा और हर्ष अर्थात् रोमाञ्च का अधिक होना और हृदय प्रदेश
में पीड़ा, योनि मे तृप्ति, सतुष्टि, अर्थात् भोग की इच्छा न रहना, बीज (शुक्र)
का ग्रहण अर्थात् उसका बाहर न आना, ये गर्भ के तुरन्त स्थित हो जाने
के लक्षण हैं ॥ २३ ॥
सव्याङ्गचेष्टा पुरुषार्थिनी स्त्री स्त्रीस्वप्नपानाशनशीलचेष्टा ।
सव्यानगर्भा न च वृत्तगर्भा सव्यपदुग्धा स्त्रियमेव सूते ॥२४॥
पुत्रं त्वतो लिङ्गविपर्ययेण, व्यामिश्रलिङ्गां प्रकृतिं तृतीयाम् ।
गर्भ में स्थित कन्या और बालक के लक्षण—स्त्री बाए अगो से कार्य करने
वाली, पुरुष का चाह रखने वाली, स्त्रियों के स्वप्न, स्वप्न में स्त्रीलिंग वाले
खान पान करने वाली, स्त्रियो के शील एव चेष्टा मे प्रेम रखने वाली हो, बाए
कोख में वृद्धि, गर्भ परिमण्डल अर्थात् गोल आकार का न हा, वाम स्तन मे
प्रथम दूध का दर्शन हो तो वह स्त्री निश्चय से कन्या को ही उत्पन्न करती है।
उपरोक्त कन्या क लक्षणों से विपरीत लक्षणों वाली स्त्री पुत्र को उत्पन्न करती
है। जिस स्त्री में कन्या और पुत्र दोनो के लक्षण एक साथ दिखाई देते हैं तो
वह नपुसक सतान उत्पन्न करती है ॥ २४ ॥
गर्भोत्पत्तौ तु मनः स्त्रिया यं जन्तु ब्रजेत्तत्सदृशं प्रसूते ॥ २५ ॥
माता पिता के सदृश सन्तान का कारण—गर्भ की उत्पत्ति अर्थात् बीज
ग्रहण करने के समय स्त्री का मन जिस प्राणि या (वस्तु) का ध्यान करता है
वह स्त्री उसी के समान संतान उत्पन्न करती है* ॥ २५ ॥
गर्भस्य चत्वारि चतुर्विधानि भूतानि मातापितृसभवानि ।
आहारजान्यात्मकृतानि चैव सर्वस्य सर्वाणि भवन्ति देहे ॥२६॥
तेषां विशेषाद् बलवन्ति यानि भवन्ति मातापितृकर्मजानि ।
तानि व्यवस्येत्सदृशत्वहेतुं सत्त्वं यथानूकमपि व्यवस्येत् ॥ २७ ॥
माता से उत्पन्न होने वाले रज रूप और पिता से उत्पन्न होने वाले शुक्र
रूप तथा आहार से और अपने कर्मों मे उत्पन्न 'कर्मज' ये चार २ प्रकार के
वायु, अग्नि, भूमि और जल इन चारों के १६ प्रकार के कर्मों में जो २ बलवान्
होते हे, उन २ के समान ही गर्भ का शरीर बनता है। माता के किये कर्मों के
बलवान् होने पर सन्तान माता के समान और पिता से उत्पन्न कर्मों के
बलवान् होने पर पिता के समान बनती है। मन अपने पूर्व देह अभ्यास मे

  • इसीलिये पाण्डु-पीले, धृतराष्ट्र अन्धे थे। चूंकि एक व्यास के रूप का
    देखकर पीली पड़ गई थी, और दूसरी ने आंखें बन्द करली थीं।

अ० २ ] शारीरस्थानम् ३५

अ० २ ] शारीरस्थानम् ३५
उत्पन्न वासना के अनुकूल इस जन्म में होता है । [अर्थात् यदि देव शरीर मे
ही वह आत्मा तुरन्त इस देह मे आवे तो उसका चित्त देवतुल्य, राक्षस
शरीर से आवे तो चित्त राक्षसतुल्य और पशु शरीर मे आवे तो पशुतुल्य
होता है ] ॥ २६-२७ ॥
कस्मात्प्रजा स्त्री विकृता प्रसूते हीनाधिकाङ्गीं विकलेन्द्रिया च ।
देहात्कथं देहमुपैति चान्यमात्मा सदा कैरनुबध्यते च ॥ २८॥
प्रश्न—(१) स्त्री किस कारण से विकृत रूपवाली प्रजा को उत्पन्न
करती है ? (२-३) किस कारण से हीन अथवा अधिक अङ्गोंवाली प्रजा को
उत्पन्न करती है ? (४) किस कारण से विकल इन्द्रियोंवाला प्रजा को उत्पन्न
करती है ? (५) किस प्रकार से आत्मा इस शरीर मे दूसरे में पहुँचता हैं ?
(६) सदा आत्मा किन २ से बन्धा रहता है ? ॥ २८ ॥
बीजात्मकर्माशयकालदोषैर्मातुस्तथाऽऽहारविहारदोषैः ।
कुर्वन्ति दोषा विविधानि दुष्टाः सस्थानवर्णेन्द्रियवैकृतानि ॥२९॥
बीज (शुक्र शोणित), आत्मा के अपने कर्म, गर्भाशय और काल
इनके दोषो से तथा माता क आहार-विहार के दोषों से दूषित हुए दोष वात
आदि सस्थान (रचना), वर्ण, इन्द्रिय आदि में नाना प्रकार के विकार
उत्पन्न कर देते हैं ॥ २९ ॥
वर्षासु काष्ठाश्मघनाम्बुवेगास्तरोः सरित्स्रोतसि संस्थितस्य ।
यथैव कुर्युर्विकृति तथैव गर्भस्य कुक्षौ नियतस्य दोषाः ॥३०॥
जिस प्रकार वर्षा मे काठ, पत्थर और बरसात का पानी ये तीनों मिल कर
नदी की धार में स्थित वृक्ष में विकार उत्पन्न कर देते है, इसी प्रकार तीनों
दूषित दोष कर्म वश से गर्भाशय में स्थित गर्भस्थ जीव के शरीर में विकृति
उत्पन्न कर देते हैं ॥ ३० ॥
भूतैश्चतुर्भिः सहितः सुसूक्ष्मैर्मनोजवो देहमुपैति देहात् ।
कर्मात्मकत्वान्न तु तस्य दृश्यं दिव्यं विना दर्शनमस्ति रूपम् ॥३१॥
यह आत्मा कर्मों क कारण आकाश को छोड़ कर शेष वायु, जल, अग्नि
और पृथिवी इन चार सूक्ष्म भूतों (तन्मात्रो) के साथ लिंग शरीर रूप मे मन
के वेग से एक देह दूसरे देह मे जाता है । अर्थात् मरने वाले देह से निकल
कर अगले उत्पन्न होने वाले देह में जाता है । वह कर्मात्मक होने से, दिव्य
चक्षुओं के बिना इसके सूक्ष्म रूप का दर्शन नहीं होता ॥ ३१ ॥
ॐ गीता मे भी कहा है—न तु मां शक्यसे द्रष्टु अनेनैव स्वचक्षुषा ।
दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ॥

स सर्वगः सर्वशरीरभृच्च स विश्वकर्मा स च विश्वरूपः ।
स चेतनाधातुरतीन्द्रियश्च स नित्ययुक्त सानुशयः स एव ॥ ३२ ॥
वह आत्मा कर्मो के कारण सब स्थानो में गमन करता है, देवता मनुष्य,
तिर्यग् आदि सब देहो को धारण करता है, यह सब कर्मों के करने में समर्थ
होने से 'विश्वकर्मा' है। यह आत्मा सर्व रूप होने से विश्वरूप है, यही चेतना
धातु है, वह अतीन्द्रिय है। इसका कर्म आदि से नित्य सम्बन्ध है यही अनुशय
(राग और द्वेष आदि) के साथ रहता है ॥ ३२ ॥
रसात्ममातापितृसंभवानि भूतानि विद्याद्दश षट् च देहे।
चत्वारि तत्रात्मनि संश्रितानि स्थितस्तथाऽऽत्मा च चतुर्षु तेषु॥३३॥
भूतानि मातापितृसम्भवानि रजश्च शुक्रं च वदन्ति गर्भे ।
आप्यायते शुक्रमसृक्च भूतैर्यैस्तानि भूतानि रसोद्भवानि ॥३४॥
आहार के रस, आत्मकृत कर्म, माता और पिता इनसे उत्पन्न ये चार २
गुण वाले चार भूत (इस प्रकार से १६ भूत) गर्भ के शरीर में रहते हैं। इन
सोलह के बीच में चार सूक्ष्म लिंग-शरीर रूप से (वायु, अग्नि, भूमि और जल
तन्मात्रा रूप से) आत्मा में और ये चारों आत्मा में आश्रित है। गर्भ में
माता से उत्पन्न चार भूत और पिता से उत्पन्न चार भूत और क्रम से रज और
शुक्र ये पदार्थ गर्भ में कहे जाते हैं। भूतों द्वारा शुक्र और रक्त दानों का पोषण
होता है और उन रस से उत्पन्न भूतो का पोषण और वृद्धि होती है। इस प्रकार
से गर्भ के शरीर में १६ भूतों का योग होता है ॥ ३३-३४ ॥
भूतानि चत्वारि तु कर्मजानि यान्यात्मलीनानि विशन्ति गर्भम् ।
स बीजधर्मा ह्यपरापराणि देहान्तराण्यात्मनि याति याति ॥३५॥
आत्मा में गुप्त रूप से विद्यमान कर्म से उत्पन्न जो चार सूक्ष्म भूत गर्भ
में प्रविष्ट होते हैं, वही सूक्ष्म शरीरी पुरुष बीज के समान धर्म वाला होकर एक
के बाद दूसरे शरीरों में जाता रहता है। वह सूक्ष्म शरीर आत्मा पर आश्रित
रहता है 🌼 ॥ ३५ ॥
रूपाद्धि रूपप्रभवः प्रसिद्धः कर्मात्मकानां मनसो मनस्तः ।
भवन्ति ये त्वाकृतिबुद्धिभेदा रजस्तमस्तत्र च कर्महेतु ॥३६॥
गर्भ के शरीर को बनाने वाले कर्मात्मक भूतोंके सूक्ष्म रूप से स्थूल रूप तथा
मन से मन की उत्पत्ति होती है यह बात प्रसिद्ध है । कारण के अनुसार कार्य
होता है । [ पूर्व जन्म में जैसा मन होता है, वैसा इस जन्म में भी हो
🌼 ससरति निरुपभोग भावैरधिवासित लिङ्गम् । सा० का० ४० ॥

अ० २ ] शारीरस्थानम् ३७

अ० २ ] शारीरस्थानम् ३७
जाता है ] । आकृति, बुद्धि और मन में जो भिन्नता होती है, वहा पर बलवान्
रज, तम तथा पूर्वकर्म कारण होते हैं ॥ ३६ ॥
अतीन्द्रियैस्तैरतिसूक्ष्मरूपैरात्मा कदाचिन्न वियुक्तरूपः ।
न कर्मणा नैव मनोमतिभ्यां न चाप्यहङ्कारविकारदोषैः ॥ ३७ ॥
रजस्तमोभ्यां तु मनोऽनुबद्ध ज्ञानं बिना तत्र हि सर्वदोषाः ।
गतिप्रवृत्त्योस्तु निमित्तमुक्त मनः सदोष बलवच्च कर्म ॥ ३८ ॥
अतीन्द्रिय, अति सूक्ष्म रूपवाले वायु, अग्नि, भूमि और जल इन चार
सूक्ष्म भूतो से आत्मा कभी भी वियुक्त नहीं होता । न कर्मों से, न मन मे, न
बुद्धि एव अहंकार इन दोषों से भी कभी वह मुक्त होता है, प्रत्युत वह इन मे
सदा सम्बद्ध रहता है । मन अर्थात् सत्त्व बलवान् रज तथा तम से सम्बद्ध होता
है । तब तत्त्वज्ञान के बिना मन में सब दोष रहते हैं । दोषयुक्त मन और
पूर्वजन्मों के बलवान् कर्म ही अन्य देह में जाने तथा धर्माधर्म क्रिया में प्रवृत्ति
के कारण हैं ॥ ३७-३८ ॥
रोगाः कुतः संशमनं किमेषां हर्षस्य शोकस्य च कि निमित्तम् ।
शरीरसत्त्वप्रभवा विकाराः कथं न शान्ताः पुनरापतेयुः ॥ ३६ ॥
प्रश्न-(१) रोग किस कारण से उत्पन्न होते हैं ? (२) इन रोगों की शान्ति
का उपाय क्या है ? (३) हर्ष का क्या कारण है ? (४) शोक का क्या कारण
है ? (५) शरीर और मन से उत्पन्न विकार क्यों कर पूर्ण रूप से नष्ट नहीं
होते ? (६) वे फिर क्यों हो जाते हैं ॥ ३६ ॥
प्रज्ञापराधो विषमास्तथाऽर्था हेतुस्तृतीयः परिणामकालः ।
सर्वामयानां त्रिविधा च शान्तिर्ज्ञानार्थकालाः समयोगयुक्ताः ॥४०॥
धर्म्याः क्रिया हर्षनिमित्तमुक्तास्ततोऽन्यथा शोकवशं नयन्ति ।
शरीरसत्त्वप्रभवास्तु दोषास्तयोरवृत्त्या न भवन्ति भूय ॥ ४१ ॥
रूपस्य सत्त्वस्य च संततिर्या नोक्तस्तदादिर्न हि सोऽस्ति कश्चित् ।
तयोरवृत्तिः क्रियते पराभ्यां धृतिस्मृतिभ्यां परया धिया च ॥ ४२ ॥
सत्याश्रये वा द्विविधे यथोक्ते पूर्वं गदेभ्यः प्रतिकर्म नित्यम् ।
जितेन्द्रियं नानुतरन्ति रोगास्तत्कालयुक्त यदि नास्ति दैवम् ॥४३॥
उत्तर—रोगों का प्रथम कारण प्रज्ञापराध, दूसरा कारण अतियोग, अयोग
और मिथ्यायोग से इन्द्रियो के विषयों का उपभाग, तीसरा कारण परिणाम
( काल ) है । सब प्रकार के शारीरिक और मानसिक रोगों की शान्ति तीन
प्रकार से होती है । समयोग से, ज्ञान, अर्थ ( इन्द्रियों के विषय ) और काल इन
तीन का उपयोग करने से । और धार्मिक क्रियायें हर्ष का कारण कही गयी हैं ।

३८ चरकसंहिता [ अ० २

इससे विपरीत अधार्मिक क्रियाये पुरुष को शोक के अवान कर देती हैं । शरीर
और मन से उत्पन्न रोग जब तक शरीर और मन हैं, तब तक बार बार होते
रहते हैं । शरीर और मन की चेष्टा न रहने पर ये रोग भी फिर नहीं होते ।
रूप ( शरीर ) और सत्त्व ( मन ) इनका जो प्रवाह है उसका आदि नही
बतलाया अर्थात् वह अनादि है । आत्मा का शरीर और मन के साथ प्रथम
सम्बन्ध कब हुआ, इसे कोई नहीं कह सकता । शरीर और मन की निवृत्ति श्रेष्ठ
धृति ( धैर्य ) एव स्मृति तथा श्रेष्ठ बुद्धि से होती है । शरीर और मन ये दो
प्रकार के आश्रय होने से रोगो की उत्पत्ति से पूर्व ही प्रतिकार करना चाहिये ।
यदि रोगोत्पादक विपाक काल के साथ दैव सयुक्त नहीं है तो जितेन्द्रिय पुरुष
को रोग नहीं सताते । पूर्व कर्म से उत्पन्न व्याधिया तो कर्म के क्षय के बिना
शान्त नहीं होतीं ❄ ॥ ४०-४३ ॥
दैवं पुरा यत्कृतमुच्यते तत्, तत्पौरुषं यच्चिह कर्म दृष्टम् ।
प्रवृत्तिहेतुर्विषमः स दृष्टो निवृत्तिहेतुस्तु समः स एव ॥ ४४ ॥
पूर्वजन्म मे किये कर्म को 'दैव' कहा जाता है । इस जन्म मे जो कर्म
किया जाता है, उसे 'पौरुष' कहते हैं । ये दोनो कर्म अयोग, अतियोग और
मिथ्यायोग से विषम हैं । ये विषम रूप से रोग की प्रवृत्ति या ससार की प्रवृत्ति
में कारण हैं। इनका समान योग 'आरोग्य' या 'ससार निवृत्ति' अर्थात् मोक्ष
मे कारण है ॥ ४४ ॥
हैमन्तिकं दोषचयं वसन्ते प्रवाहयन् ग्रैष्मिकमभ्रकाले ।
घनात्यये वार्षिकमाशु सम्यक्प्राप्नोति रोगानृतुजान्न जातु ॥ ४५ ॥
वात, पित्त, कफ का संचय क्रम से ग्रीष्म, वर्षा और शिशिर मे होता है
और इनका प्रकोप क्रम से वषा, शरद् और वसन्त में होता है । इन में ग्रीष्म
में हुए दोष के सचय ( वात ) को वर्षा काल में, वर्षा काल मे सचित दोष
( पित्त ) को वर्षा काल के अनन्तर शरत् काल में तथा हेमन्त काल के सचित
दोष ( कफ ) को वसन्त अर्थात् चैत्र मे भली प्रकार प्रवाहित करके देह से
निकाल देवे तो मनुष्य को ऋतुजन्य रोग नहीं होते † ॥ ४५ ॥
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❄ देखिये चरक० शारीर, अ० १ मे— 'क्रियाघ्नाः कर्मजा रोगाः प्रशम
यान्ति तत्क्षयात् ।'
† दोष-प्रवाहण का नियम— प्रत्येक ऋतु के प्रथम मास में दोष प्रवाहण
करना चाहिये । यथा— 'माधवप्रथमे मासि नभस्य' प्रथमे पुन ।
सहस्य प्रथमे चैव हारयेद्दोषसञ्चयम् ॥

अ० ३ ] शारीरस्थानम् ३६

अ० ३ ] शारीरस्थानम् ३६
नरो हिताहारविहारसेवी समीक्ष्यकारी विषयेष्वसक्तः ।
दाता समः सत्यपरः क्षमावानाप्तोपसेवी च भवत्यरोगः ॥ ४६ ॥
हितकारी आहार और हितकारी विहार का सेवन करने तथा सोच विचार
कर कार्य करने वाले, विषयों मे न फँसे, त्यागशील, दानी, सब प्राणियों मे
समान भाव रखने वाले, सत्यपरायण, क्षमाशील, आप्त जन के सेवी, सत्संग
करने वाले पुरुष को रोग नहीं सताते, वह सदा नीरोग रहता है ॥ ४६ ॥
मतिर्वचः कर्म सुखानुबन्धि सत्त्वं विधेयं विशदा च बुद्धिः ।
ज्ञानं तपस्तत्परता च योगे यस्यास्ति तं नानुत्तपन्ति रोगाः ॥ ४७ ॥
जिसकी मति, ( मन ) कर्म और वचन सुख उत्पन्न करने वाले हो, जिसका
मन, पाप रहित और वश में है जिनकी बुद्धि विशुद्ध हो, जो स्वयं तप और
योग में तत्पर होता है, उसको रोग नहीं सताते ॥ ४७ ॥
तत्र श्लोकाः ।
इहाग्निवेशस्य महार्थयुक्तं षट्त्रिंशकं प्रश्नगणं महर्षिः ।
अतुल्यगोत्रे भगवान् यथावन्निर्णितवाञ्ज्ञानविवर्धनार्थम् ॥ ४८ ॥
भगवान् पुनर्वसु आत्रेय ने इस अतुल्य गोत्रीय शारीर में शिष्यों के ज्ञान
बढ़ाने के लिये बड़े अर्थयुक्त छत्तीस प्रश्नों का यथावत् निर्णय किया है ।
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थाने अतुल्य-
गोत्रीयशारीरं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
तृतीयोऽध्यायः ।
अथात खुड्डीकां गर्भावक्रान्ति शारीरं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे खुड्डीका गर्भावक्रान्ति (गर्भाशय में जीव के आगमन) नामक
शारीर का व्याख्यान करेंगे। जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥
पुरुषस्यानुपहतरेतसः स्त्रियाश्चाप्रदुष्ट-योनि शोणित-गर्भाशयाया-
यदा भवति संसर्ग ऋतुक़ाले, यदा चानयोस्तथैव युक्ते च संसर्गे शुक्र-
शोणित-संसर्गमन्तर्गर्भाशयगत जीवोऽवक्रामति सत्त्वसंप्रयोगात्तदा
गर्भोऽभिनिर्वर्त्तते, स सात्म्यरसोपयोगादरोगोऽभिसंवर्धते सम्यगुपचा-

४० चरकसंहिता [ अ० ३
रैश्चोपचर्यमाणस्ततः प्राप्तकालः सर्वेन्द्रियोपपन्नः परिपूर्णसर्वशरीरो बल-
वर्ण-सत्त्व-संहनन-संपदुपेतः सुखेन जायते समुदायादेषां भावानाम् ॥३॥
दोष से रहित वीर्य वाला पुरुष, जब दोष से रहित योनि रक्त (रज) और
गर्भाशय वाली स्त्री के साथ ऋतु-समय में ससर्ग करता है और जब इनके
ऋतु-काल में ससर्ग करने पर शुक्र गर्भाशय में पहुच कर शोणित (रज) के
साथ मिलता है तब मन से युक्त जीव (चेतन) उसमें आ जाता है, तब गर्भ
बनता है। और यह गर्भ सात्म्य रसों के उपयोग से तथा गर्भिणी के गर्भाशय में
हितकारक उपचारों से पोषित होकर नीरोग रह कर बढ़ता है। पीछे ठीक
प्रसव काल (नवम या दशम मास) तक सब इन्द्रियों से युक्त पूर्ण शरीर
वाला, बल, वर्ण, सत्त्व और शरीर रचना के उत्तम गुणों से युक्त होकर निम्न-
लिखित माता आदि छ पदार्थों के मयोग से सुखपूर्वक उत्पन्न हो जाता है ॥३॥
मातृजश्चायं गर्भः पितृजश्चाऽऽत्मजश्च सात्म्यजश्च रसजश्च । अस्ति
च सत्त्वमुपपादुकमिति होवाच भगवानात्रेयः ॥ ४ ॥
इसलिये यह गर्भ माता से उत्पन्न अर्थात् (शोणितजन्य) है, पिता से उत्पन्न
(शुक्रजन्य) है, आत्मा से उत्पन्न, सात्म्य से उत्पन्न, रस से उत्पन्न है और
सत्त्वसंज्ञावाला मन भी इसकी उत्पत्ति में घटक है। [क्योंकि शुक्र शोणित के
साथ ही यह मन आत्मा का सम्बन्ध कराता है, इसलिये गर्भ सत्त्वजन्य भी है]।
ऐसा भगवान् आत्रेय ने उपदेश किया है ॥ ४ ॥
नेति भरद्वाजः । किं कारणम् । न हि माता, न पिता, नात्मा, न
सात्म्यं, न पानाशन-भक्ष्य-लेह्योपयोगा गर्भं जनयन्ति, न च परलोका-
देत्य गर्भं सत्त्वमवक्रामति ॥ ५ ॥
विद्वान् भरद्वाज ने कहा—नही यह बात नहीं है। क्योंकि न माता, न
पिता, न आत्मा, न सात्म्य, न पान, अशन, भक्ष्य और लेह्य इन से उत्पन्न
रस गर्भ को उत्पन्न करते हैं और न 'सत्त्व' (चित्त) परलोक से आकर गर्भ मे
प्रवेश करता है, अतः गर्भ माता आदि छः पदार्थों से उत्पन्न नहीं होता ॥ ५ ॥
यदि हि मातापितरौ गर्भं जनयेताम् भूयस्यः स्त्रियः पुमांसश्च
भूयासः पुत्रकामाः, ते सर्वे पुत्रजन्माभिसंधाय मैथुनधर्ममापद्यमानाः
पुत्रानेव जनयेयुर्दुहितॄर्वा दुहितृकामाः, न तु काश्चित् स्त्रियः केचिद्वा
पुरुषा निरपत्याः स्युरपत्यकामा वा परिदेवेरन् ॥ ६ ॥
यदि गर्भ की उत्पत्ति मे माता पिता कारण हों तो बहुत सी स्त्रियाँ और
बहुत से पुरुष पुत्रकामना और कन्याकामना वाले होते है। वे पुत्र की कामना
से पुत्रों और कन्या की कामना से कन्याओं को उत्पन्न कर लिया करें। कोई

अ० ३ ] शारीरस्थानम् ४१

अ० ३ ] शारीरस्थानम् ४१

भी स्त्री वा पुरुष बिना संतान के न रहे । कोई संतान की इच्छा वाले स्त्री वा
पुरुष संतान के लिये कभी दुःखी न हों और न विलाप किया करे ॥ ६ ॥
न चाऽऽत्माऽऽत्मानं जनयति । यदि ह्यात्माऽऽत्मानं जनयेज्जातो
वा जनयेदात्मानमजातो वा ? तच्चोभयथाऽप्ययुक्तं, न हि जातो जनयति,
सत्त्वात्, न चाजातो जनयति, असत्त्वात्, तस्मादुभयथाऽप्यनुपपत्तिः,-
तिष्ठतु तावदेतत्, यद्ययमात्मानं शक्तो जनयितुं स्यात् , नत्वेवमिष्टास्वेव
कथ योनिषु जनयेदृशिनमप्रतिहतगति कामरूपिण तेजो बल-जव-वर्ण-
सत्त्व-संहनन-समुदितमजरममरुजममरम् । एवविधं ह्यात्माऽऽत्मान-
मिच्छत्यतो वा भूयः ॥ ७ ॥
आत्मा भी आत्मा को उत्पन्न नहीं करता । यदि आत्मा आत्मा को उत्पन्न
करे तब तो क्या वह स्वयं उत्पन्न होकर दूसरे आत्मा को उत्पन्न करता है या
बिना उत्पन्न हुए ही दूसरे को पैदा करता है ? दोनो प्रकार से सम्भव नही है ।
क्योंकि स्वयं उत्पन्न होकर दूसरे आत्मा को पैदा नही करता, क्योकि वह स्वयं
ही अविद्यमान है ? और उत्पन्न हुए बिना भी ( कारण का अभाव होने से )
वह उत्पन्न नहीं कर सकता । क्योंकि वह स्वयं नहीं है, इसलिये दोनों ही प्रकार
से आत्मा की उत्पत्ति नहीं हो सकती । अच्छा यही मान लेते हैं कि-आत्मा
आत्मा को उत्पन्न करता है, तो फिर आत्मा इष्ट योनियों में ही जन्म क्यों न
लेवे ? अनिष्ट योनियों में क्यों जन्म लेवे ? यदि आत्मा आत्मा को उत्पन्न कर
सके तो जिसके अधीन यह भूत-भौतिक सब ससार है ऐसे वशी, अप्रतिहत गति
वाले (बे-रोकटोक जाने वाले), यथेच्छ रूपधारी, तेज, बल, वर्ण, सत्त्व, संहनन से
युक्त अजर, अमर, नीरोग आत्मा को ही उत्पन्न करे । क्योकि आत्मा अपनी
आत्मा को इन उपरोक्त गुणों से युक्त अथवा इन से भी अधिक गुणो वाला
चाहता है ॥ ७ ॥
असात्म्यजश्चायं गर्भः । यदि हि सात्म्यज स्यात्, नहि सात्म्य-
सेविनामेवैकान्तेन प्रजा स्यात्,असात्म्यसेविनश्च निखिलेनानपत्याःस्युः,
तच्चोभयमुभयत्रैव दृश्यते ॥ ८ ॥
यह गर्भ सात्म्य से भी उत्पन्न नहीं होता है। यदि गर्भ की उत्पत्ति मे सात्म्य
ही कारण हो तो सात्म्यसेवियो के ही केवल संतान उत्पन्न होनी चाहिये और असा-
त्म्यसेवी सब के सब बिना संतान के रहने चाहिये । परन्तु दोनों दोनों प्रकार के
देखे जाते हैं ॥ ८ ॥
अरसजश्चायं गर्भः, यदि हि रसजः स्यात् , न केचित्स्त्रीपुरुषेष्वन-
पत्याः स्युः, न हि कश्चिदस्त्येषां यो रसान्नोपयुङ्क्ते । श्रेष्ठरसोपयोगिनां चेद्

४२ चरकसंहिता [ अ० ३
गर्भा जायन्ते इत्यतोऽभिप्रत, इत्येवं सत्याजौरभ्र-मार्ग-मायूर-रस-गोक्षीर-
दधि-घृत-मधु-तैल-सैन्धवेक्षु-रस-मुद्ग-शालिभृतानामेवैकान्तेन प्रजा
स्यात्, श्यामाक-वरकोद्दाल कोरदूषक-कन्द-मूल-भक्ष्याश्च निखिलेनान-
पत्याः स्युः, तच्चोभयमुभयत्रैव दृश्यते ॥ ६ ॥
गर्भ रस से भी उत्पन्न नहीं होता। यदि रस से उत्पन्न होता तो कोई भी
स्त्री वा पुरुष बिना सन्तान के न रहते । ऐसा काई भी मनुष्य नहीं जो रसों का
सेवन नहीं करता । यदि यह अभिप्राय है कि श्रेष्ठ रस सेवन करने वालों के ही
सन्तान होती है तो बकरा, मेढ़ा, मृग, मोर, इनके मांस रस, गाय का दूध, दही,
घी, शहद, तेल, नमक, गन्ने का रस, मूंग, शालि धान्य आदि से पुष्ट व्यक्तियों
के ही सन्तान होवे और श्यामाक, वर, कोद्दालक, कोरदूषक, कन्द, मूल, फल आदि
हीन धान्य खाने वाले सब बिना सन्तान के रहने चाहिये । परन्तु दोनों में दोनों
बातें देखी जाती है ॥ ६ ॥
न खल्वपि परलोकादेत्य सत्त्वं गर्भमवक्रामति । यदि ह्येनमवक्रामेन्
नास्य किंचिदेव पौर्वदेहिकं स्यादविदितमदृष्टं वा, न च किंचिदपि
स्मरति ॥ १० ॥
तस्मादेतद् ब्रूमहे-अमातृजश्चायं गर्भोऽपितृजश्चानात्मजश्चासात्म्य-
जश्चार सजश्च, न चास्ति सत्त्वमौपपादुकमिति होवाच भरद्वाजः ॥११॥
सत्त्व भी परलोक से आकर भी गर्भ में नहीं आता । क्योंकि यदि सत्त्व पर-
लोक से आकर जन्म ग्रहण करे तो इस गर्भ को पूर्व जन्म की कोई भी बात
अज्ञात और न देखी होनी चाहिये, प्रत्युत उसे पिछले जन्म की सब बाते ज्ञात
रहना चाहिये । परन्तु वह पूर्व जन्म की कोई भी बात स्मरण नहीं रखता । इस-
लिये सत्त्व भी कारण नहीं । इसी लिये हम कहते हैं कि गर्भ न माता से, न
पिता से, न आत्मा से, न सात्म्य से, न रस से उत्पन्न होता है और न सत्त्व ही
इसका उत्पत्ति कारण है ॥ ११ ॥
नेति भगवानात्रेयः, सर्वेभ्य एभ्यो भावेभ्यः समुदितेभ्यो गर्भोऽभि-
निवर्त्तते ॥ १२ ॥
मातृजश्चायं गर्भः । न हि मातुर्विना गर्भोपपत्तिः स्यान्न च जन्म-
जरायुजानाम् । यानि खल्वस्य गर्भस्य मातृजानि यानि चास्य मातुतः
सम्भवतः सम्भवन्ति, तान्यनुव्याख्यास्यामः । तद्यथा—त्वक् च लोहितं
च मांसं च मेदश्च नाभिश्च हृदयं च क्लोम च यकृच्च प्लीहा च वृक्कौ च
बस्तिश्च पुरीषाधानं चाऽऽमाशयश्च पक्वाशयश्चोत्तरगुदं चाधरगुदं च
क्षुद्रान्त्रं च स्थूलान्त्रं च वपा च वपावहनं चेति मातृजानि ॥ १३ ॥

[अ० ३] शारीरस्थानम् ४३

[अ० ३] शारीरस्थानम् ४३

भगवान् आत्रेय कहते हैं—भरद्वाज का ऐसा कथन ठीक नहीं है। क्योकि
माता आदि इन सब पदार्थो के मिलने से ही गर्भ बनता है। यह सब गर्भ माता
से उत्पन्न होता है। माता के बिना गर्भ की उत्पत्ति सम्भव नहीं है। जरायु से
उत्पन्न प्राणियों की उत्पत्ति माता के बिना सम्भव ही नहीं। इस गर्भ के जो
अवयव माता से उत्पन्न होते हैं, उनको विस्तार से कहते हैं। यथा—त्वचा, रक्त,
मांस, मेद, नाभि, हृदय, क्लोम, (तिलक), यकृत्, प्लीहा, दो वृक्क (दो कुक्षि
गोष्ठक, गुर्दै), बस्ति, पक्वाशय, आमाशय, मलाशय, (बृहदान्त्र), उत्तर गुदा
अधर गुदा, क्षुद्रान्त्र, स्थूलान्त्र और वपा (हृदयस्थ मेद), तथा वपावाही स्रोत
ये सब मृदु भाग माता से उत्पन्न होते हैं ॥ १२-१३ ॥
पितृजश्चायं गर्भः, न हि पितुऋते गर्भोत्पत्तिः स्यान्न च जन्म
जरायुजानाम्। यानि खल्वस्य गर्भस्य पितृजानि, यानि चास्य पितृतः
सम्भवतः सम्भवन्ति, तान्यनुव्याख्यास्यामः । तद्यथा—केश-श्मश्रु-नख-
लोम-दन्तास्थि-सिरा-स्नायु-धमन्यः शुक्रमिति पितृजानि ॥ १४ ॥
यह गर्भ पिता से भी उत्पन्न होता है। पिता के बिना गर्भ की उत्पत्ति
नहीं हो सकती ओर न जरायुज प्राणि ही उत्पन्न हो सकते हैं। इस गर्भ के जो
अवयव पिता से बनते हैं उनका अब वर्णन करते हैं। जैसे-केश, श्मश्रु, लोम,
नख, दन्त, अस्थि (हड्डी) सिरा, स्नायु, धमनियां और शुक्र ॥ १४ ॥
आत्मजश्चायं गर्भः । गर्भात्मा ह्यन्तरात्मा यस्तं जीव इत्याचक्षते
शाश्वतमरुजमजरममरमक्षयमभेद्यमच्छेद्यमलोड्यं विश्वरूपं विश्व-
कर्माणमव्यक्तमनादिनिधनमक्षरमपि । स गर्भाशयमनुप्रविश्य शुक्र-
शोणिताभ्यां संयोगमेत्य गर्भत्वेन जनयत्यात्मानं, आत्मसञ्ज्ञा हि गर्भे ।
तस्य पुनरात्मनो जन्मनादित्वाच्चोपपद्यते, तस्मादजात एवायं गर्भं
जनयति, अजातो ह्ययमजातं गर्भं जनयति । स चैव गर्भः कालान्तरेण
बाल-युव-स्थविर-भावानवाप्नोति, स यस्यां यस्यामवस्थायां वर्तते
तस्यां तस्यां जातो भवति, या त्वस्य पुरस्कृता तस्यां जनिष्यमाणश्च,
तस्मात्स एव जातश्चाजातश्च युगपद्भवति, यस्मिंश्चैतदुभयं सम्भवति
जातत्वं जनिष्यमाणत्वं च, स च जातो जन्यते, स चैवानागतेष्ववस्था-
न्तरेष्वजातो जनयत्यात्मनाऽऽत्मानं, सतां ह्यवस्थान्तरगमनमात्रमेव
हि जन्म चोच्यते तत्र तत्र वयसि तस्यां तस्यामवस्थायां, यथा सता-
मेव शुक्रशोणितजीवानां प्राक्संयोगाद् गर्भत्वं न भवति, तच्च संयोगा
द्भवति, यथा सततस्तस्यैव च पुरुषस्य प्रागपत्यात्पितृत्वं न भवति, तच्चा-
पत्याद्भवति, तथा सततस्तस्यैव गर्भस्य तस्यां तस्यामवस्थायां जातत्व-
मजातत्त्वं चोच्यते ॥ १५ ॥

४४ चरकसंहिता [ अ० ३

यह गर्भ आत्मा से उत्पन्न है, गर्भ के आत्मा को ही अन्तरात्मा कहते हैं,
यही जीव है । इसीको शाश्वत , अज, अमर, अक्षय, अभेद्य, अच्छेद्य, अलोढ्य,
विश्वरूप, विश्वकर्मा, अव्यक्त, अनादि, अनिधन, अक्षर आदि पर्य्यायो से कहते
हैं । यह अन्तरात्मा जीव, गर्भाशय में प्रविष्ट होकर शुक्रशोणित के साथ मिलकर
अपने आप को रूप मे उत्पन्न करता है । इसलिये गर्भ में इसका नाम 'आत्मा'
है । इस आत्मा के अनादि होने से इस का जन्म नहीं होता । इसलिये वह
स्वयं उत्पन्न न होकर भी आत्मा गर्भ को ही उत्पन्न करता है, स्वयं उत्पन्न हुए
बिना ही वह न उत्पन्न हुए गर्भ को उत्पन्न करता है । यह गर्भ कालक्रम से
बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था को प्राप्त होता है । यह जिस जिस
अवस्था में रहता है, उस उस अवस्था मे उत्पन्न हुआ कहा जाता है । जो
अवस्था इसकी आगे भविष्य में आने को होती है उसमें यह अज्ञात, अनुत्पन्न
रहता है । इस लिये वह उत्पन्न और अनुत्पन्न एक समय में दोनों ही एक
साथ रहता है । क्योकि उसमें उत्पन्न और भविष्य में उत्पन्न होना यह दोनों
धर्म रहते हैं । अत यह आत्मा उत्पन्न होकर भी अनुत्पन्न ही है और भविष्य
में आनेवाली अवस्थाओं में न उत्पन्न हो कर ही अपने को अपने आप उत्पन्न
करता है । सत् विद्यमान आत्मा का एक अवस्था से दूसरी अवस्था में विद्य-
मान रहते हुए भी उस उस आयु और उस उस अवस्था मे जाने का नाम ही
'जन्म' है और शुक्र-आर्त्तव और जीव इनके संयोग होने से पूर्व गर्भ नही
होता । इनके संयोग से ही गर्भ बनता है और जिस प्रकार पुरुष के रहते हुए
भी पुत्र के बिना हुए इसमें पितृभाव नहीं होता, पुत्र उत्पन्न होने से वह पिता
हो जाता है, इसी प्रकार आत्मा के रहते हुए भी उस उस अवस्था मे 'उत्पन्न'
होने से वह उत्पन्न और न होने से 'अनुत्पन्न' हो जाता है ॥ १५ ॥
न तु खलु गर्भस्य मातुर्न पितुर्नात्मनः सर्वभावेषु यथेष्टकारित्वमस्ति ।
ते किञ्चित्स्ववशात्कुर्वन्ति किंचित् कर्मवशात्, क्वचिच्चैषां करणशक्तेर्भव-
त्ति क्वचिन्न भवति, यत्र सत्त्वादिकरणसपत्तत्र यथाबलमेव यथेष्टकारि-
त्वमतोऽन्यथा विपर्ययः । न च करणदोषादकरणमात्मा संभवति गर्भ-
जनने, दृष्टं चेष्टयोनिरैश्वर्यं मोक्षश्चात्मविद्भिरात्मायत्तं, न ह्यान्यः
सुखदुःखयोः कर्ता, न चान्यतो गर्भो जायते जायमानः, न चाङ्कु-
रोत्पत्तिर्बीजात् ॥ १६ ॥
गर्भ के बारे में माता, पिता और आत्मा अपनी इच्छा से सब कुछ नहीं
कर सकते । वे कुछ अपनी इच्छा से करते हैं और कुछ कर्मों के वश से करते
हैं । कहीं पर इनके साधन, उपाय आदि का शक्ति स कार्य होता है और कही

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अ० ३ ] शारीरस्थानम् ४५


पर नहीं होता । जहां पर सत्त्व आदि साधन उत्तम होते हैं, वहा पर साधनों के
बल के अनुसार वे यथेष्ट कर सकते हैं। इस के विपरीत अर्थात् करण उत्तम
न रहने पर वे यथेष्ट नही कर सकते । इस प्रकार 'साधन के दोष से आत्मा
गर्भोत्पत्ति में कारण नहीं' यह कहना ठीक नहीं। देखा भी है कि इष्ट योनि,
ऐश्वर्य्य ( आवेश आदि ) और मोक्ष ये सब आत्मा के अधीन हैं, इसका
आत्मविद् ज्ञानियों ने साक्षात् अनुभव किया है । आत्मा के सिवाय दूसरा कोई
सुख दुख का कर्त्ता नहीं है । उत्पन्न होने वाला गर्भ आत्मा के सिवाय दूसरे
से उत्पन्न नहीं होता । जैसे बीज के बिना अंकुर की उत्पत्ति नहीं हो सकती
उसी प्रकार आत्मा के विना गर्भ उत्पन्न नहीं हो सकता ॥१६॥

यानि तु खल्वस्य गर्भस्याऽऽत्मजानि, यानि चास्याऽऽत्मतः संभ-
वत संभवन्ति, तान्यनुव्याख्यास्यामः । तद्यथा-तासु तासु योनिषू-
त्पत्तिरायुरात्मज्ञानं मन इन्द्रियाणि प्राणापानौ प्रेरणं धारणमाकृतिस्वर-
वर्णविशेषाः सुखदुःखे इच्छाद्वेषौ चेतना धृतिर्बुद्धि स्मृतिरहङ्कारः
प्रयत्नश्चेत्यात्मजानि ॥ १७ ॥

गर्भ की जो बाते आत्मा से उत्पन्न होती हे, या आत्मा के होने पर ही
होनी संभव है, उनका वर्णन करते हैं । जैसे-मनुष्य, तिर्यग् आदि नाना
योनियों मे जन्म, आयु, आत्मज्ञान, मन, इन्द्रिया, प्राण और अपान, प्रेरण
( इन्द्रिय मन का विषयो मे प्रेरित करना ) शरीर का धारण करना आदि
[ उन्मेष, निमेष, प्रयत्न आदि कर्म भी ], नाना आकृतिया, नाना स्वर और
नाना वर्ण आदि सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, चेतना, धृति, बुद्धि, स्मृति, अहंकार
और प्रयत्न । इतनी बातें आत्मा से उत्पन्न होती है ॥ १७ ॥

सात्म्यजश्चायं गर्भः । न ह्यसात्म्यसेवित्वमन्तरेण स्त्रीपुरुषयोर्व-
न्ध्यत्वमस्ति गर्भेषु वाऽप्यनिष्टो भावः, यावत्खल्वसात्म्यसेविनां स्त्री-
पुरुषाणा त्रयो दोषाः प्रकुपिता. शरीरमुपसर्पन्तो न शुक्रशोणितगर्भा-
शयोपघातायोपपद्यन्ते, तावत्समर्था गभजननाय भवन्ति । सात्म्यसे-
विनां पुनः स्त्रीपुरुषाणामनुपहत-शुक्र-शोणित-गर्भाशयानामृतुकाले संनि-
पतितानां जीवस्यानवक्रमणाद् गर्भा न प्रादुर्भवन्ति, न हि केवलं
सात्म्यज एवायं गर्भ , समुदायोऽत्र कारणमुच्यते, यानि तु खल्वस्य
गर्भस्य सात्म्यजानि, यानि चास्य सात्म्यतः संभवतः संभवन्ति, तान्य-
नुव्याख्यास्यामः, तद्यथा-आरोग्यमनालस्यमलोलुपत्वमिन्द्रियप्रसादः
स्वर-वर्ण-बीज-संपत् प्रहर्षभूयस्त्वं चेति सात्म्यजानि ॥ १८ ॥