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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

अ० ६ ] चिकित्सास्थानम् ४५७

अ० ६ ] चिकित्सास्थानम् ४५७
तद्वद् व्योषं हरिद्रे द्वे मञ्जिष्ठाहिङ्गुसर्षपाः ।
शिरीषबीजं चोन्मादग्रहापस्मारनाशनम् ॥ ७२ ॥
इति नस्यमञ्जनम् ।
(८) यदि उन्माद रोगी उपरोक्त ओषधि समूहों से वश मे न आवे, वह
कहा न माने, तब (१) हिंगु, कल्याणक आदि घृतो मे वर्णित ओषधियों से
अञ्जन, उत्सादन (उबटन), आलेप और नस्य करे । (२) शिरीष के बीज,
मुलहठी, हींग, लहसुन, तगर, वच, कूठ, इन सब को बकरी के मूत्र मे पीस कर
इसका नस्य और अञ्जन दे। (३) इसी प्रकार से व्योष (त्रिकटु, सोंठ,
मरिच, पिप्पली), हल्दी, दारु-हल्दी, मजीठ, हींग, सरसो, सिरस के बीज
इनको बकरी के मूत्र मे पीस कर नस्य और अञ्जन करे यह उन्माद, ग्रह और
अपस्मार रोगो को नष्ट करता है ॥७०-७२॥
पिष्ट्वा तुल्यमपामार्गहिङ्गनी१ हिङ्गुपत्रिकाम् ।
वत्तिः स्यान्मरिचार्धांशा पित्ताभ्या गोशृगालयोः ॥ ७३ ॥
तयाऽञ्जयेदपस्मारभूतोन्मादज्वरार्दितान् ।
भूतातानमरातांश्च नरार्ताँश्च गोमये ॥ ७४ ॥
मरिचं चाऽऽतपे मास सपित्त स्थितमञ्जनम् ।
वैकृतं पश्यतः कार्य दोषभूतहतस्मृतेः ॥ ७५ ॥
इत्यञ्जनम् ।
(४) अपामार्ग (चिरचिटा) के बीज, हींग और हींगुपत्रि प्रत्येक एक
एक भाग, काली मिर्च आधा भाग, इनको गाय और गीदड के पित्त के साथ
पीस कर वर्ती बनावे । इस वर्त्ती को अपस्मार, उन्माद तथा ज्वर रोगी, भूत
और देवताओ से पीडित व्यक्तियो मे तथा नेत्र रोगो मे प्रयोग करे। (५) वात
आदि दोष के कारण से अथवा भूतो के कारण से यदि दृष्टि विकृत हो गई हो
तो काली मिरच को गाय और शृगाल के पित्त मे एक मास तक व्याप्त करके
धूप मे रखे, फिर इसका अञ्जन करे ॥७३-७५॥
सिद्धार्थको वचा हिङ्गुकरञ्जे देवदारु च ।
मञ्जिष्ठा त्रिफला श्वेता कटभीत्वक् कटुत्रिकम् ॥ ७६ ॥
समांशानि प्रियंगुश्च शिरीषो रजनीद्वयम् ।
बस्तमूत्रेण पिष्टोऽयमगदः पानमञ्जनम् ॥ ७७ ॥
नस्यमालेपनं चैव स्नानमुद्वर्तनं तथा ।
१. 'अपामार्ग हिङ्गुल' इति वा पाठः ।

अपस्मार-विषोन्माद-कृत्यालक्ष्मीज्वरापहः ॥ ७८ ॥
भूतेभ्यश्च भयं हन्ति राजद्वारे च शस्यते ।
( ६ ) सिद्धार्थ ( श्वेत सरसो ), वच, हींग, करञ्ज, देवदारु, मजीठ,
त्रिफला, श्वेता ( श्वेत अपराजिता ), कटभी ( वापुभा ), त्वक् ( दालचीनी ),
त्रिकटु ( सोठ, मरिच, पिप्पली ), प्रियङ्गु, शिरीष के बीज, हल्दी, दारुहल्दी
इन सबका समान भाग लेकर बकरी के मूत्र मे पीस ले। यह अगद पान, नस्य,
आलेपन, अञ्जन, उद्वर्त्तन ओर स्नान मे प्रयोग करने पर अपस्मार, विष,
उन्माद, कृत्या ( मारण क्रिया ), अलक्ष्मी ओर ज्वर को नष्ट करता है।
इस अगद के पानादि से भूतो से भय नहीं रहता। राजसभा मे सफलता
मिलता है ॥ ७६-७८ ॥
सर्पिरेतेन सिद्ध वा सगोमूत्रं तदर्थकृत् ॥ ७९ ॥
प्रसेके पीनसे गन्धैर्धूमवर्ति कृता पिबेत् ।
वैरेचनिकधूमोक्तेः श्वेताद्यैर्वा सहिङ्गुभिः ॥ ८० ॥
( १० ) सिद्धार्थक आदि वस्तुओ द्वारा गोमूत्र मे सिद्ध किया घृत भी यही
फल देता है, मुख से पानी बहने पर, पीनस मे, उन्माद मे गन्ध-वस्तुओ ( दाह
ज्वर चिकित्सा मे कथित अगरु आदि वस्तुओ ) से बनी धूमवर्त्ति तथा सूत्र-
स्थान मे कथित श्वेता, ज्योतिष्मती आदि वैरेचनिक वस्तुओ को हींग के साथ
धूमवर्त्ती करके प्रायोगिक धूम विधि से पीवे १ ॥ ७६-८० ॥
शल्लकालूकमार्जारजम्बूकवृकबस्तजैः ।
मूत्र-पित्तःशकृल्लोम-नखैश्चर्मभिरेव च ॥ ८१ ॥
सेकाञ्जनं प्रधमनं नस्यं धूमं च कारयेत् ।
वातश्लेष्मात्मके प्रायः—
( ११ ) शल्लक ( शजार ), उल्लू, बिल्ली, गीदड, भेडिया, बकरा इन
पशुओ के मूत्र, पित्त, शकृत् ( मल ), लोम, नख, चमडे से परिषेक, अञ्जन,
प्रधमन ( विरेचन चूर्ण रूप नस्य ), नस्य, धूम, वातजन्य और कफजन्य उन्माद
मे प्रायः करके करना चाहिये ॥८१-॥
पैत्तिके च प्रशस्यते ॥ ८२ ॥
तिक्तकं जीवनीय च सर्पिः स्नेहश्च मिश्रकः ।
शीतानि चान्नपानानि मधुराणि मृदूनि च ॥ ८३ ॥
१ वैरेचनिक धूम—'श्वेता ज्योतिष्मती चैव हरितालमन शिला।
गन्धाश्चागुरुपत्राद्या धूमो मूर्धविरेचने' ॥

अ० ९ ] चिकित्सितस्थानम् ४५९

अ० ९ ] चिकित्सितस्थानम् ४५९
(१२) पित्तजन्य उन्माद मे तिक्त वस्तुओ से तथा जीवनीय-गण
की ओषधियो से सिद्ध घृत का पान, तथा मिश्रक स्नेह (यमक) का प्रयोग
करे । इसी प्रकार से शीतल, मधुर, लघु खान-पान देने चाहिये ॥८२-८३॥
शङ्खे केशान्तसन्धौ वा मोक्षयेऽज्ञो भिषक् सिराम् ।
उन्मादे विषमे चैव ज्वरेऽपस्मार एव च ॥ ८४ ॥
(१३) शस्त्र कर्म को जानने वाले वैद्य को चाहिये कि उन्माद, अपस्मार
आर विषम-ज्वर म, शख प्रदेश, कान, ललाट क मध्य मे ओर केशो के अन्तिम
भाग के सन्धि स्थान मे स्थित सिरा का वेधन करे १ ॥ ८४ ॥
घृतमासविदृप्तं वा निवाते स्थापयेत्सुखम् ।
त्यक्त्वा मतिस्मृतिभ्रंशं संज्ञां लब्ध्वा प्रमुच्यते ॥ ८५ ॥
(१४) अथवा रोगी को कल्याणक घृत आदि ओर मास से तृप्त कराके
सामने की वायु से रहित घर म आराम के साथ रखे । इस प्रकार करने से
बुद्धि और स्मृति के भ्रश को छोड़ कर रोगी सज्ञा (चेतना) को प्राप्त कर
लेता है और उन्माद रोग से मुक्त हा जाता है ॥ ८५ ॥
आश्वासयेत्सुहृद्द्वा तं वाक्यैर्धर्मार्थसंहितैः ।
ब्रूयादिष्टविनाशं वा दर्शयेदद्भुतानि वा ॥ ८६ ॥
(१५) मित्र लोग धर्म, अर्थयुक्त वचनो से आश्वासन देवे, इष्ट वस्तु के
नाश को कहे, आश्चर्यकारक वस्तुओ को दिखावे ॥ ८६ ॥
बद्धं सर्षपतैलाक्तं न्यसेद्रोत्तानमातपे ।
कपिकच्छ्वाऽथवा तप्तलोहतैलजलैः स्पृशेत् ॥ ॥ ८७ ॥
कशाभिस्ताडयित्वा वा सुबद्धं विजने गृहे ।
रुन्ध्याच्चेतो हि विभ्रान्तं व्रजत्यस्य यथा शमम् ॥ ८८ ॥
(१६) शरीर पर सरसो का तैल लगाकर, हाथ, पाव बाध कर पीठ के
भार धूप मे लेटावे । कौच या गरम लोहे, गरम तैल या गरम जल से स्पर्श
करे । कशा (कोडो) से पीटे, बाधे, एकान्त घर मे बन्द रखे । इस प्रकार
करने से रोगी का विक्षिप्त चित्त शान्त हो जाता है ॥ ८७-८८ ॥
सर्पेणोद्धृतदंष्ट्रेण दान्तैः सिंहैर्गजैश्च तम् ।
त्रासयेच्छस्त्रहस्तैर्वा तस्करैः शत्रुभिस्तथा ॥ ८९ ॥
अथवा राजपुरुषा बहिर्नीत्वा सुसंयतम् ।
त्रासयेयुर्वधेनैनं तर्जयन्तो नृपाज्ञया ॥ ९० ॥
१ सुश्रुते—शखकेशान्तसन्धिगतामुरोऽपागललाटेषु चोन्मादे ।

४६० चरकसंहिता [ अ० ९
देहदुःखभयेभ्यो हि परं प्राणभयं महत्।
तेन याति शमं तस्य सर्वतो विप्लुतं मनः॥ ९१॥
(१७) विष का दाढ निकाले हुए सर्प से, दान्त (पले हुए, नम्र) सिंह
और हाथी अथवा हाथ मे शस्त्र लिये हुए चोरो या शत्रुओ से उसको डरावे।
अथवा राजकर्मचारी इसको बाहर लेजा कर, इसके हाथ पाव बाध कर मारने
का भय दिखाये और कहे राजा ने तुम्हारे वध की आज्ञा दी है। क्योकि
कषादि के ताडन रूपी शरीर-क्लेश से प्राणो का भय कही अधिक होता है, इस
कारण से विक्षिप्त मन शान्त हो जाता है॥ ८६-९१॥
इष्टद्रव्यविनाशात्तु मनो यस्योपहन्यते।
तस्य तत्सदृशप्राप्तिशान्त्याश्वासः शम नयेत् ॥ ९२ ॥
काम-शोक-भय-क्रोध-हर्षेर्ष्या-लोभ-सम्भवान्।
परस्परप्रतिद्वन्द्वैरेभिरेव शमं नयेत्॥ ९३॥
इष्ट वस्तु के नाश होने से जिसका मन विक्षिप्त हुआ हो, उस रोगी को उस
वस्तु के समान वस्तु की प्राप्ति से, सान्त्वना तथा आश्वासन द्वारा शान्त करे।
काम, शोक, मद, क्रोध, हर्ष, ईर्ष्या और लोभ के कारण त जिसका मन विक्षिप्त
हुआ हो तो परस्पर विरुद्ध द्वन्द्वो से वह शान्त हो जाता है। कामजन्य उन्माद
क्रोध से, क्रोधजन्य काम से, भयजन्य और शोकजन्य क्रोध ओर काम से,
शान्त हो जाते है ॥ ९२ ६३॥
बुद्ध्वा देशं वयःसात्म्य दोषं कालं बलाबले।
चिकित्सितमिदं कुर्यादुन्मादं भूतदोषजे ॥ ९४॥
देवर्षिपितृगन्धर्व्वैरुन्मत्तस्य तु बुद्धिमान्।
वर्जयेदञ्जनादीनि तीक्ष्णानि क्रूरकर्म च॥ ९५॥
सर्पिष्पानादि तस्येह मृदुभैषज्यमाचरेत्।
पूजा बल्युपहाराश्च मन्त्राञ्जनविधींस्तथा ॥ ९६॥
शान्तिकर्मेष्टिहोमाश्च जपस्वस्त्ययनानि च।
वेदोक्तान् नियमांश्चापि प्रायश्चित्तानि चाऽऽचरेत् ॥ ९७॥
दोषजन्य (निज) और आगन्तुज उन्माद मे देश, वय, सात्म्य, दोष,
काल, बल और अबल की परीक्षा करके उपरोक्त चिकित्सा करे। बुद्धिमान् वैद्य
को चाहिये कि देवग्रह, ऋषिग्रह, पितृग्रह, गन्धर्वग्रह इनसे आक्रान्त उन्माद
रोगी मे तीक्ष्ण अञ्जन आदि तथा क्रूर कर्मों का प्रयोग न करे। इनकेलिये
घृत आदि कोमल ओषधि का प्रयोग करे १।
१ सुश्रुत मे भी कहा है—न च रूक्ष प्रयुञ्जीत प्रयोग देवताग्रहे।
ऋ ते पिशाचादन्यत्र प्रतिकूल न चाचरेत् ॥

अ० ९ ] चिकित्सितस्थानम् ४६१

अ० ९ ] चिकित्सितस्थानम् ४६१
दैवव्यपाश्रय चिकित्सा—पूजा, बलि कर्म, उपहार कर्म, मन्त्र, अजनविधि,
शान्ति कर्म, यज्ञ, होम, जप, मगलकर्म, वेदोक्त नियम, प्रायश्चित्त आदि
सेवन करे ॥ ९४-९७ ॥
भूतानामधिपं देवमीश्वरं जगतः प्रभुम् ।
पूजयन् प्रयतो नित्य जयत्युन्मादजं भयम् ॥ ९८ ॥
रुद्रस्य प्रमथा नाम गणा लोके चरन्ति ये ।
तेषा पूजा च कुर्वाण उन्मादेभ्यो विमुच्यते ॥ ९९ ॥
बलिभिर्मङ्गलैर्होमैरौषध्यगदधारणैः ।
सत्याचारतपोज्ञानप्रदाननियमव्रतैः ॥ १०० ॥
देवगुह्यकविप्राणां गुरूणां पूजनेन च ।
आगन्तुः प्रशमं याति सिद्धैर्मन्त्रौषधैस्तथा ॥ १०१ ॥
नित्य प्रति भूतों ( प्राणियो ) के अधिपति, जगत् के ईश्वर-महेश्वर का पूजन
करने से उन्माद का भय नही रहता । रुद्र के 'प्रमथ' नामक जो गण लोक मे
विचरते हैं, उनकी प्रतिदिन पूजा करने से आगन्तुज उन्माद से मनुष्य मुक्त
हो जाता है । बलि कर्म से, मागलिक कार्यों से, होम से, ओषधियां और अगदो
के धारण करने से, सत्य आचार से, तप से, ज्ञान से, दान से, नियम, व्रत के
पालन से, देवता, गाय, ('गुह्यक', पाठ हो तो यक्ष), ब्राह्मण, गुरु-जनों के
पूजन से, सिद्ध फलदायक मन्त्र तथा ओषधियां से आगन्तुज-उन्माद शान्त
होता है ॥ ९८-१०१ ॥
यच्चोपदेक्ष्यते किंचिदपस्मारचिकित्सिते ।
उन्मादे तच्च कर्तव्यं सामान्याद्धेतुदूष्ययोः ॥ १०२ ॥
निवृत्तामिषमद्यो यो हिताशी प्रयतः शुचिः ।
निजागन्तुभिरुन्मादैः सत्त्ववान् न स युज्यते ॥१०३॥
उन्माद और अपस्मार रोग मे हेतु और दूष्य की समानता है । इसलिये
अपस्मार चिकित्सा मे जो कुछ विशेष कहेगे वह सब इस उन्माद मे भी वर-
तना चाहिये । मांस और मद्य के सेवन से पृथक्, पथ्यभोजी, अन्दर और
बाहर से पवित्र तथा सत्त्वगुण से युक्त और जो जितेन्द्रिय व्यक्ति होता है,
वह निज और आगन्तुज दोनो प्रकार के उन्मादों से मुक्त रहता है॥१०२-१०३॥
प्रसादश्चेन्द्रियार्थानां बुद्ध्यात्ममनसां तथा ।
धातूनां प्रकृतिस्थत्वं विगतोन्मादलक्षणम् ॥ १०४ ॥
उन्माद से छूटने के लक्षण—इन्द्रियों तथा इनके विषयो मे निर्मलता,
बुद्धि, आत्मा और मन की प्रसन्नता, वात आदि धातुओ का अपनी स्वाभाविक

उपसहार—निज और आगन्तुज उन्मादो के कारण, लक्षण, चिकित्सा

४६२ चरकसंहिता [ अ० १०
स्थिति मे आ जाना, ये उन्माद से मुक्त (प्रायः सब रोगो से मुक्त) व्यक्ति के
लक्षण हैं ॥ १०४ ॥
तत्र श्लोकः—उन्मादानां समुत्थानां लक्षणं सचिकित्सितम् ।
निजागन्तुनिमित्तानामुक्तवान् भिषगुत्तमः ॥ १०५ ॥
उपसहार—निज और आगन्तुज उन्मादो के कारण, लक्षण, चिकित्सा
को वैद्यो मे श्रेष्ठ भगवान् आत्रेय ने इस अध्याय मे कह दिया ॥ १०५ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृते चिकित्सास्थाने
उन्मादचिकित्सितं नाम नवमोऽध्यायः ॥ ६ ॥
दशमोऽध्यायः ।
अथातोऽपस्मारचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे अपस्मार-रोग की चिकित्सा की व्याख्या करते है, भगवान्
आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥
स्मृतेरपगमं प्राहुरपस्मारं भिषग्विदः ।
तमःप्रवेशं बीभत्सचेष्टं धीसत्त्वसंप्लवात् ॥ ३ ॥
वैद्यो मे ज्ञानी अथवा भेषज को जानने वाले विद्वान् स्मृति के नष्ट होने को
ही अपस्मार कहते है¹ । इसमे बुद्धि और सत्त्व (मन) के विभ्रंश होने से
अन्धकार मे घुसने के समान प्रतीति अर्थात् ज्ञान का अभाव या मोह और
शरीर की चेष्टाये बीभत्स हो जाती हैं ॥ ३ ॥
विभ्रान्तबहुदोषाणामहिताशुचिभोजिनाम् ।
रजस्तमोभ्यां विहते सत्त्वे दोषावृते हृदि ॥ ४ ॥
चिन्ताकामभयक्रोधशोकोद्वेगादिभिस्तथा ।
मनस्यभिहते नृणामपस्मारः प्रवर्त्तते ॥ ५ ॥
१ सुश्रुत मे अपस्मार-सज्ञा की व्याख्या इस प्रकार की है ।
स्मृतिर्भूतार्थविज्ञानमपस्तत्परिवर्जने ।
अपस्मार इति प्रोक्तस्ततोऽय व्याधिरन्तकृत् ॥ सुश्रुते ॥
अपगतः स्मारः स्मरणं अनुभूतार्थविज्ञानं यस्मिन् रोगे सोऽपस्मार ।
जिस रोग मे स्मृति अर्थात् अनुभूत पदार्थ का ज्ञान नष्ट हों जाता है वह
'अपस्मार' कहलाता है । यह रोग रोगी का मृत्युकारक होता है ।

अ० १० ] चिकित्सितस्थानम् ४६३

अ० १० ] चिकित्सितस्थानम् ४६३

निदानपूर्वक सम्प्राप्ति—अपथ्यसेवी और अपवित्र भोजन करने वालो मे
तथा जिन पुरुषो मे शरीर दोष अस्थिर तथा बहुत होते है, उनमे सत्त्वगुण
वाले मन मे रज और तम के बढने से तथा चिन्ता, काम, भय, क्रोध, शोक,
उद्वेग आदि मानसिक विकारो से मन पर आघात होने पर (इन मानसिक
कारणो से रज और तम बढते है ) और चेतना स्थान हृदय के शारीरिक
वातादि दोषो से व्याप्त हो जाने पर अपस्मार रोग उत्पन्न होता है ॥ ४-५ ॥
धमनीभिः श्रिता' दोषाहृदय पीडयन्ति हि ।
सपीज्यमानो व्यथते मूढो भ्रान्तेन चेतसा ॥ ६ ॥
जिस समय आश्रित (वात आदि शारीरिक) दोष वेग को उत्पन्न करके
हृदयमूल वाली धमनियो द्वारा हृदय मे पहुच जाते है, उस समय चेतना-स्थान
हृदय के पीडित होने से पुरुष भ्रान्तचित्त और मोह को प्राप्त होकर
दुःखी होता है ॥ ६ ॥
पश्यत्यसन्ति रूपाणि पतति प्रस्फुरत्यपि ।
जिह्माक्षिभ्रूः स्रवल्लालो हस्तौ पादौ च विक्षिपन् ॥ ७॥
दोषवेगे च विगते सुप्तवत्प्रतिबुद्ध्यते ।
सामान्य लक्षण—अपस्मार रोगी असत् (अविद्यमान) रूपो को भी देखता
है, भूमि पर गिरता है, कापता है। आख और भौहे टेढी (कुटिल) हो जाती
हैं, मुख से लार बहती है, हाथ और पाव को इधर-उधर फेकता है, इस प्रकार
से बीभत्स चेष्टाए करता है। दोष के वेग के शान्त होने पर रोगी सो कर
उठने के समान जागता है ॥ ७-॥
पृथग्दोषैः समस्तैश्च वक्ष्यते स चतुर्विधः ॥ ८ ॥
दोषो के पृथक् पृथक् तथा समस्त होने से अपस्मार चार प्रकार का
है। (१) वातिक, (२) पैत्तिक, (३) श्लैष्मिक और (४) सन्निपातजन्य,
चारों के लक्षण कहते है ॥ ८ ॥
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१ 'धमनीभिश्चिता' इति वा पाठः ।
२ सुश्रुत मे भी कहा है—
सञ्ज्ञावहेषु स्रोतस्सु दोषव्याप्तेषु मानवः ।
रजस्तम परीतेषु मूढो भ्रान्तेन चेतसा ॥
विक्षिपन् हस्तपादौ च विजिह्मभ्रूविलोचनः ।
दन्तान् खादन् वमन्फेन विवृताक्षः पतेत् क्षितौ ॥

४६४ चरकसंहिता [ अ० १०

कम्पते प्रदशेद्दन्तान्१ फेनोद्वामी श्वसित्यपि ।
परुषाणि च कृष्णानि पश्येद्रूपाणि चानिलात् ॥ ६ ॥
(१) वातिक-अपस्मार के लक्षण—वायु के कारण उत्पन्न अपस्मार का
रोगी कापता हे, दाता का काटता है, मुख से झाग उगलता है, जोर जोर से
सास लेता है, कठोर तथा काले रग के रूपो को देखता है। [ इसमे बार बार
प्रबोध ओर बार बार अपस्मार होता है ] ॥ ६ ॥
पीतफेनाङ्गवक्त्राक्षः पीतासृग्रूपदर्शनः ।
सतृष्णोष्णानलव्याप्तलोकदर्शी च पैत्तिकः ॥ १० ॥
(२) पैत्तिक अपस्मार के लक्षण—रोगी के मुख से निकला झाग, नख
आदि अग, मुख और आखे पीली होती है, पोले, लाल रूपों को देखता है,
रोगी को प्यास और गरमी अनुभव होती है, शरीर गरम रहता है, सब जगत्
को आग से व्याप्त अर्थात् चारो ओर आग ही आग देखता है ॥ १० ॥
शुक्लफेनाङ्गवक्त्राक्षः शीतहृष्टाङ्गजो गुरुः ।
पश्यञ्छुक्लानि रूपाणि श्लैष्मिको मुच्यते चिरात् ॥ ११ ॥
(३) कफजन्य अपस्मार के लक्षण—रोगी के मुख से निकली झाग, नख
आदि अग, मुख और आखे श्वेत होती है, शरीर ठण्डा, रोमाञ्चित और भारी
होता है, रोगी श्वेत रूपो को देखता है, यह रोगी देर मे सञ्ज्ञा ( चेतना )
प्राप्त करता है ॥ ११ ॥
सर्वैरेतैः समस्तैस्तु लिङ्गैर्ज्ञेयस्त्रिदोषजः ।
अपस्मारः स चासाध्यो यः क्षीणस्यानवश्च यः ॥ १२ ॥
(४) त्रिदोषजन्य अपस्मार मे इन तीनो दोषो के लक्षण मिले रहते हैं।
यह सन्निपातजन्य अपस्मार असाध्य हाता है, इसी प्रकार क्षीण पुरुष मे हुआ
तथा पुराना अपस्मार असाध्य होता है ॥ १२ ॥
पक्षाद्वा द्वादशाहाद्वा मासाद्वा कुपिता मलाः ।
अपस्माराय कुर्वन्ति वेगं किंचिदथान्तरम् ॥ १३ ॥
मल (अपस्मार के प्रारम्भिक दोष) बारह दिन, पन्द्रह दिन या एक
मास मे अथवा कुछ कम या अधिक समय मे [ जब काल, प्रकृति, दूष्य आदि
से ] बलवान् हो जाते है। तब अपस्मार रोग को उत्पन्न करते है ॥ १३ ॥
तैरावृताना हृत्स्रोतोमनसां संप्रबोधनम् ।
तीक्ष्णैरादौ भिषक् कुर्यात्कर्मभिर्वमनादिभिः ॥ १४ ॥
१. ‘दशते दन्तान्’ इति वा पाठः।

अ० १० ] ३० चिकित्सितस्थानम् ४६५

अ० १० ] ३० चिकित्सितस्थानम् ४६५
वातिकं बस्तिभूयिष्ठैः पैत्तं प्रायो विरेचनैः ।
श्लैष्मिकं वमनप्रायैरपस्मारमुपाचरेत् १ ॥ १५ ॥
चिकित्सा—वैद्य को चाहिये कि प्रथम अपस्मार के उत्पन्न होने पर ही
तीक्ष्ण वमन आदि कार्यों द्वारा हृदयवह तथा मनोवह स्रोतों को रोकने वाले
शारीरिक तथा मानसिक दोषो को निकाल कर हृदयवह और मनोवह स्रोतों का
प्रबोधन करे। वातिक अपस्मार मे बस्ति कर्म, पैत्तिक में विरेचन कर्म और
श्लैष्मिक अपस्मार मे वमन कर्म प्रधानत करने चाहियें, और शेष कर्म भी
करने चाहिये ॥ १४-१५ ॥
सर्वतः सुविशुद्धस्य सम्यगाश्वासितस्य च ।
अपस्मारविमोक्षार्थं योगान्संशमनाञ्छृणु ॥ १६ ॥
जिस समय ऊर्ध्व ( ऊपर के ) और अध ( नीचे के ) सब मार्गों का
शोधन हो जाये, और भली प्रकार अन्न-सेवन आदि से शरीर मे बल आ जावे,
तब अपस्मार को शान्त करने के लिये जिन निम्नलिखित योगों को बरतना
चाहिये उनको सुनो ॥ १६ ॥
गोशकृद्रसदध्यम्लक्षीरमूत्रैः समैर्घृतम् ।
सिद्धं पिबेदपस्मारकामलाज्वरनाशनम् ॥ १७ ॥
इति पञ्चगव्यं घृतम् ।
( १ ) पञ्चगव्य घृत—गाय के गोबर का रस, गाय का दही, गाय का
दूध, गाय का मूत्र इनके बराबर गाय का घृत लेकर घृतपाक-विधि से सिद्ध
करे । यह घृत अपस्मार, कामला आर ज्वर को नष्ट करता है ॥१७॥
द्वे पञ्चमूल्यौ त्रिफला रजन्यौ कुटजत्वचम् ।
सप्तपर्णमपामार्गं नीलिनीं कटुरोहिणीम् ॥१८॥
सम्पाकं फल्गुमूलं च पौष्करं सदुरालभम् ।
द्विपलानि जलद्रोणे पक्त्वा पादावशेषिते ॥ १९ ॥
भार्गीं पाठां त्रिकटुका त्रिवृता निचुलानि च ।
श्रेयसीमाढकीं मूर्वा दन्ती भूनिम्बचित्रकौ ॥ २० ॥
द्वे सारिवे रोहिषं च भूतीकं मदयन्तिकाम् ।
क्षिपेत्पिष्ट्वाऽक्षमात्राणि तैः प्रस्थं सर्पिषः पचेत् ॥ २१ ॥
गोशकृद्रसदध्यम्लक्षीरमूत्रैश्च तत्समैः ।
पञ्चगव्यमिति ख्यातं महत्तदमृतोपमम् ॥ २२ ॥
१ 'समाचरेत्' इति च ।

४६६ चरकसंहिता [ अ० १०
अपस्मारे तथोन्मादे श्वयथावुदरेषु च ।
गुल्मार्शःपाण्डुरोगेषु कामलासु भगन्दरे ।
अलक्ष्मीग्रहरोगघ्नं चातुर्थिकविनाशनम् ॥ २३ ॥
इति महापञ्चगव्यं घृतम् ॥
(२) महापञ्चगव्य घृत—क्षुद्र और लघु दोनो पञ्चमूल (दशमूल),
त्रिफला (हरड़, बहेडा, आंवला), हल्दी, दारुहल्दी, कडे की छाल, सतवन
की छाल, चिरचिटा, नील, कुटकी, अमलतास, काकोडुम्बरिका (छठ गूलर) की
जड, पोहकरमूल, दुरालभा प्रत्येक वस्तु दो पल, पानी एक द्रोण इनका क्वाथ-
विधि से क्वाथ करे। जब चतुर्थांश रह जाये तब छान ले। इसमे भार्गी, पाठा,
त्रिकटु (सोठ, मरिच, पिप्पली), निशोथ, निचुल (जलवेतस या समुद्रफल)
के फल, श्रेयसी (गर्जपिप्पली), आढकी (तुवर), मूवा, दन्तीमूल, चिरायता,
चीता, श्वेत सारिवा और कृष्ण सारिवा, रोहिष तृण, भूतीक (अजवायन),
मदयन्तिका (नवमल्लिका) ये द्रव्य प्रत्येक एक कर्ष ले, इनको बारीक पीस
कर क्वाथ मे डाले। गाय का घी एक प्रस्थ और घी के बराबर गोबर का रस
और गौ के ही दही, दूध और मूत्र लेकर घृत सिद्ध करे। इस घृत का नाम
'महापञ्चगव्य' घृत है। यह घृत अपस्मार, उन्माद ज्वर, कास, शोथ, उदररोग,
गुल्म, अर्श, पाण्डु, कामला और हलीमक रोगो मे अमृत के समान है, यह घृत
अलक्ष्मी (दुभगता), ग्रह रोगों और चातुर्थिक-ज्वर का विनाश करता है १८-२३
ब्राह्मीरसवचाकुष्ठशङ्खपुष्पीभिरेव च ।
पुराणं घृतमुन्मादालक्ष्म्यपस्मारपाप्मजित् ॥ २४ ॥
(३) ब्राह्मी घृत—ब्राह्मी का स्वरस, वच, कूठ और शखपुष्पी इन से
पुरातन गो-घृत सिद्ध करे। यह घृत उन्माद, अलक्ष्मी, अपस्मार और पाप को
नष्ट करता है ॥ २४ ॥
घृतं सैन्धवहिङ्गुभ्या वर्षे बास्ते चतुर्गुणे ।
मूत्रे सिद्धमपस्मारहृद्रोगमहामयानाशनम् ॥ २५ ॥
(४) बैल और बकरे का मूत्र चार भाग, सैन्धव और हींग का कल्क
एक भाग, इनसे सिद्ध किया घृत अपस्मार, हृदय रोग, ग्रह रोगो को नष्ट करता
है। [यहा पर गौ और बकरी स्त्री जाति का मूत्र न लेकर नर बैल और बकरे
का ही मूत्र लेना चाहिये' ] ॥ २५ ॥
१ यद्यपि चतुष्पाद मे स्त्रीलिंग ही प्रशस्त है, तथापि यहा पर पुल्लिंग ही
लेना चाहिये। कहा भी है—स्त्रीणा गुरु च तीक्ष्ण च न तु पुंसा तथाविधम् ।
पित्ताशिका. स्त्रियो यस्मात् सौम्यास्तु पुरुषाः स्मृताः ॥

अ० १० ] चिकित्सितस्थानम् ४६७
वचासम्पाककैटर्यवयःस्थाहिङ्गुचोरकैः ।
सिद्धं पलङ्कषायुक्तैर्वातश्लेष्मात्मके घृतम् ॥ २६ ॥
(५) वचा, सम्पाक (अमलतास), कैटर्य (कट्फल), वयःस्था (आवला
या गिलोय), हींग, चोरक (चोरपुष्पी सुगन्धित द्रव्य), पलंकषा (गुग्गुलु),
इनके कल्क से, चार गुणे पानी मे सिद्ध घृत वातिक, श्लैष्मिक अथवा गुल्म
के समान वात, कफ दोनो से उत्पन्न अपस्मार मे हितकारी है ॥२६॥
तैलप्रस्थं घृतप्रस्थं जीवनीयैः पलोन्मितैः ।
क्षीरद्रोणे पचेत्सिद्धमपस्मारविनाशनम् ॥ २७ ॥
(६) तिल का तैल एक प्रस्थ, घी एक प्रस्थ, जीवनीय गण की दस
औषधियो मे से प्रत्येक एक-एक पल लेकर इनका कल्क, दूध एक द्रोण, इनमे
घृत सिद्ध करे, यह घृत अपस्मार का नाशक है ॥ २७ ॥
कंसे क्षीरेक्षुरसयोः काश्मर्येऽष्टगुणे रसे ।
कार्षिकैर्जीवनीयैश्च घृतप्रस्थं विपाचयेत् ॥ २८ ॥
वातपित्तोद्भवं क्षिप्रमपस्मारं नियच्छति ।
(७) दूध एक आढक, गन्ने का रस एक आढक, काश्मरी (गम्भारी)
का क्वाथ घी से आठ गुणा, जीवनीय आदि ओषधिया प्रत्येक एक कर्ष, इनके
कल्क से एक प्रस्थ गो घृत सिद्ध करे । यह घृत वातजन्य और पित्तजन्य
(अथवा वात-पित्तजन्य) अपस्मार को शीघ्र नष्ट करता है ॥ २८-॥
तद्वत्काशविदारीक्षुकुशक्वाथशृतं घृतम् ॥ २९ ॥
(८) इसी प्रकार से कास (सरकण्डा), विदारीकन्द, गन्ना, कुश, इनके
क्वाथ मे सिद्ध घृत वातजन्य, पित्तजन्य अपस्मार को नष्ट करता है ॥२९॥
मधुकद्विपले कल्के द्रोणे चामलकीरसात् ।
तद्वत्सिद्धं घृतप्रस्थं पित्तापस्मारभेषजम् ॥ ३० ॥
(६) आवले का रस एक द्रोण, मुलहठी का कल्क दो पल, घी एक प्रस्थ
इनसे यथाविधि सिद्ध घृत पैत्तिक अपस्मार को नष्ट करता है ॥३०॥
अभ्यङ्गः सार्षपं तैल बस्तमूत्रे चतुर्गुणे ।
सिद्धं स्याद् गोशकृन्मूत्रे स्नानोत्सादनमेव च ॥३१॥
अभ्यंग-(१) बकरे का मूत्र चार सेर, सरसो का तैल एक सेर, इनसे
सिद्ध किये तैल का अभ्यंग करे । इसी प्रकार गाय के गोबर से उबटन और
गाय के मूत्र से स्नान करे ॥ ३१ ॥

४६८ चरकसंहिता [ अ० १०
कटभीनिम्बकट्वङ्गमधुशिग्रुत्वचा रसे ।
सिद्धं मूत्रसमं तैलमभ्यङ्गार्थे प्रशस्यते ॥ ३२ ॥
( २ ) कटभी ( वापुबा ) नीम की छाल, कट्वङ्ग ( श्योनाक ), मधुशिग्रु
( लाल शोभांजन की छाल ) इनके क्वाथ मे गोमूत्र के समान सरसो का तैल
मिला कर तैल सिद्ध करे, यह तैल अभ्यग के लिये उत्तम है । [ इसमे क्वाथ
चतुर्थांश के स्थान पर तृतीयाश करे तभी स्नेह से चतुर्गुण होगा ] ॥३२॥
पलङ्कषावचापध्यावृश्चिकाल्यर्कसर्षपैः ।
जटिलापूतनाकेशीनाकुलीहिगुचोरकैः ॥ ३३ ॥
लशुनातिरसाचित्राकुष्ठैर्विङ्भिश्च पक्षिणाम् ।
मांसाशिनां यथालाभ बस्तमूत्रे चतुर्गुणे ॥ ३४ ॥
सिद्धमभ्यञ्जनं तैलमपस्मारविनाशनम् ।
( ३ ) पलकषा ( गुग्गुलु ), वचा, पथ्या ( हरड़ ), वृश्चिकाली ( बिच्छू-
बूटी ), सरसो, जटिला ( जटामासी ), पूतना ( हरड़ ), केशी ( भूत केशी ),
नाकुली ( रास्ना या सर्पगन्धा ), हींग, चोरक ( चोर पुष्पी, सुगन्धित द्रव्य ),
लसुन, अतिरसा ( शतावरी या जलज यष्टि मधु ), चित्रक, कूठ, मासाहारी
पक्षियो ( गीध, चील आदि ) की बीठ इनमे से जो भी मिल सके उनका कल्क
चतुर्थांश, सरसो का तैल एक भाग और बकरे का मूत्र चार भाग लेकर तैल
सिद्ध करना चाहिये, इससे अपस्मार-रोग शान्त होता है ॥३३-३४-॥
एतैश्चैवौषधैः कार्य धूपनं संप्रलेपनम् ॥ ३५ ॥
( ४ ) गुग्गुलु आदि ओषधियोसे ही धूपन और प्रलेप भी करना
चाहिये ॥३५॥
पिप्पली लवणं शिग्रुं हिङ्गु हिगुशिराटिकाम्¹ ।
काकोली सर्षपान्काकनासा कैटर्यचन्दने ॥ ३६ ॥
शुनः स्कन्धास्थिनखराम्पर्शुकाश्चेति पेषयेत् ।
बस्तमूत्रेण पुष्यर्क्षे प्रदेहः स्यात्सधूपनः ॥ ३७ ॥
( ५ ) पिप्पली, सैन्वा नमक, सहजन, हीग, हिगुशिराटिका ( वंशपत्री या
डीकामारी ), काकोली, सरसों, काकनासा ( कौआदूटी ), कैटर्य ( कट्फल ),
चन्दन, कुत्ते के कंधे की हड्डी, नख और पसलियो को बकरे के मूत्र के साथ
पुष्य-नक्षत्र मे पीस कर उनका प्रलेप और धूप देना चाहिये ॥३६-३७॥
१ 'हिङ्गुशिवाटिकाग्' इति वा पाठ ।

अ० १० ] चिकित्सितस्थानम् ४६६

अ० १० ] चिकित्सितस्थानम् ४६६
अपेतराक्षसीकुष्ठपूतनाकेशिचोरकैः ।
उत्सादनं मूत्रपिष्टैर्मूत्रैरेवावसेचनम् ॥ ३८ ॥
( ६ ) अपेतराक्षसी ( कृष्ण तुलसी ), कूठ पूतना ( हरड), भूतकेशी,
चोरक इनको बकरे के मूत्र मे पीस कर उबटन करे और मूत्रों से अवसेचन
( स्नान ) करावे ॥३८॥
जलौकाशकृता तद्वद् दग्धैर्वा बस्तलोमभिः ।
खरास्थिभिर्हस्तिनखैस्तथा गोपुच्छलोमभिः ॥ ३६ ॥
( ७ ) इसी प्रकार जाक की विष्ठा से अथवा बकरे के बालों को जलाकर
उनसे, या गधे की अस्थि से, अथवा हाथी के नखो के चूर्ण से, या गाय की
पूंछ के बालो को जला कर इनको बकरे के मूत्र मे पीसकर उबटन लगावे १ ॥३६॥
कपिलाना गवा मूत्रं नावनं परम हितम् ।
श्वशृगालबिडालाना सिंहादीना च शस्यते ॥ ४० ॥
नस्य—( १ ) पिंगल वर्ण की ( कपिला ) गायो का मूत्र नस्य के लिये
॰अति उत्तम है । इसी प्रकार कुत्ते, गीदड, बिल्ली, सिंह आदि का मूत्र भी
नस्य के लिये उत्तम है ॥ ४० ॥
भार्गी वचा नागदन्ती श्वेतश्वेता२ विषाणिका ।
ज्योतिष्मती नागदन्ती पादोक्ता मूत्रपेषिताः ॥ ४१ ॥
योगास्त्रयोऽतः षड बिन्दून् पञ्च वा नावयेद्भिषक् ।
( २ ) तीन योग—( १ ) भार्गी, वचा और नागदन्ती, ( २ ) श्वेतश्वेता
( श्वेत अपराजिता या दूर्विया वच ) और विषाणिका ( मेढासिंगी ), ( ३ )
ज्योतिष्मती ( मालकगनी ) और नागदन्ती ( बडी दन्ती, पर्व पुष्पिका )
इनको मूत्र के साथ पीस ले । ये तीन योग है। इनके पाच या छ बिन्दुओ से
वैद्य अपस्मार रागी की नाक मे नस्य देवे ॥ ४१ ॥
त्रिफलान्योषपीतद्रुयवक्षारफणिज्जकैः ॥ ४२ ॥
श्यामापामार्गकारञ्जफलैर्मूत्रैश्च बस्तजैः ।
साधित नावनं तैलमपस्मारविनाशनम् ॥ ४३ ॥
( ३ ) त्रिफला, सोठ, मरिच, पिप्पली, पीतद्रु ( हल्दू ), यवक्षार, फणि-
ज्जक ( तुलसी भेद ), श्यामा, ( त्रिवृत् ), अपामार्ग, करजुवा इनका कल्क
१ 'जलौका' के स्थान पर 'जतुका' पाठ हो तो मकडी का ग्रहण करना
उचित है । २ 'शतश्वेता' इति वा ।

४७० चरकसंहिता [ अ० १०

चतुर्थांश, सरसो या तिल का तैल एक भाग, बकरे का मूत्र चार भाग लेकर
तैल सिद्ध करे । इसका नस्य लेने से अपस्मार-रोग नष्ट होता है ॥ ४२-४३ ॥
पिप्पली वृश्चिकाली च कुष्ठं च लवणानि च ।
भार्गी च चूर्णितं नस्तः कार्यं प्रधमनं परम् ॥ ४४ ॥
(४) पिप्पली, वृश्चिकाली (बिच्छू बूटी), कूठ ओर पांचो नमको मे से
जो मिले और भार्गी इन सब का चूर्ण करके नाक मे फूक द्वारा नस्य देना
चाहिये । यह एक उत्तम औषध है ॥ ४४ ॥
कायस्थाञ्छारदान्मुद्गान्मुस्तोशीरयवास्तथा ।
सव्योषान् बस्तमूत्रेण पिष्ट्वा वर्तीः प्रकल्पयेत् ॥ ४५ ॥
अपस्मारे तथोन्मादे सर्पदष्टे गरार्दिते ।
विषपीते जलमृते चैताः स्युरमृतोपमाः ॥ ४६ ॥
अञ्जन—(१) कायस्था (तुलसी या छोटी इलायची), शरद्-ऋतु मे
उत्पन्न मूग (हरे मूग), मोथा, उशीर (खस), जौ, त्रिकटु (सोठ, मरिच,
पिप्पली) इन सब को बकरे के मूत्र मे पीस कर नेत्राञ्जन वर्त्ती बनावे। अपस्मार,
उन्माद, साप का काटा, अर्दित-वात, विषपान, गर (सयोगज विष) से
पीडित और जलमृत अर्थात् जल मे डूबा पुरुष (पेट मे बहुत पानी जाने से
जो मृत के तुल्य हो)१ उसके लिये ये वर्तिया अमृत के समान जीवनप्रद
होती है ॥ ४५-४६ ॥
मुस्तं वयःस्था त्रिफला कायस्था हिङ्गु शाद्वलम् ।
व्योषं माषान् यवान्मूत्रैर्बास्तमेषभभंस्त्रिभिः ॥ ४७ ॥
पिष्ट्वा कृत्वा च ता वर्तिमपस्मारे प्रयोजयेत् ।
किलासे च तथोन्मादे ज्वरेषु विषमेषु च ॥ ४८ ॥
(२) मोथा, वयस्था (गिलोय), त्रिफला, कायस्था (हरड़), हींग,
शाद्वल (दूब, नई घास), सोठ, मरिच पीपल, उड़द और जौ इनको बकरे,
बैल और मेढ़े के मूत्र मे पीसकर (तीनो के मूत्र से) नेत्राञ्जन वर्त्ती बनावे ।
-------------------------------------------------------------
१ जलमग्न पुरुष के लक्षण--
विष्टब्धपायुमूर्वाक्षमाध्मातोदरमेहनम् ।
विद्याज्जलमृत जन्तु शीतपादकराननम् ॥
गुदा, सिर, आखे अकड जावे, पेट और लिंग फूल जावे, पैर, हाथ और
मुख ठण्डे पड जावे उसे जलमृत पुरुष जाने ।

अ० १० ] चिकित्सितस्थानम् ४७१

अ० १० ] चिकित्सितस्थानम् ४७१
इनका प्रयोग अपस्मार, उन्माद, किलास (श्वेत कुष्ठ) और विषम-ज्वर
मे करे ॥ ४७-४८ ॥
पुष्योद्धृतं शुनः पित्तमपस्मारघ्नमञ्जनम् ।
(३) पुष्य-नक्षत्र मे कुत्ते के पित्त को लेकर उसका अञ्जन करने से
अपस्मार नष्ट होता है।
तदेव सर्पिषा युक्तं धूपनं परमं मतम् ॥ ४६ ॥
धूपन—(१) पुष्य-नक्षत्र मे कुत्ते के पित्त का लेकर पुराने घृत के साथ
मिलाकर धूपन देना भी अपस्मार की उत्तम औषध है ॥ ४६ ॥
नकुलोलूकमार्जारगृध्रकीटाहिकाकजैः ।
तुण्डैः पक्षैः पुरीषैश्च धूपन मारयेद्भिषक् ॥ ५० ॥
आभिः क्रियाभिः सिद्धाभिर्हृदयं सम्प्रबुध्यते ।
स्रोतांसि चापि शुध्यन्ति स्मृति संज्ञा स विन्दति ॥ ५१ ॥
(२) नेवला, उल्लू, बिल्ली, गीध, कीट (बिच्छू), साप और कौवा
इनके मुख, पख और पुरीषो मे अपस्मार-रोगी को धूपन देवे। इन उपरोक्त
सिद्ध फलदायक कर्मो से अपस्मार-रोगी के हृदय और मनोवह-स्रोत शुद्ध हो
जाते है और रोगी को सज्ञा (चेतना) आ जाती है ॥ ५०-५१ ॥
यस्यातुबन्धस्त्वागन्तुदोषलिङ्गाधिकाकृतिम् ।
पश्येत्तस्य भिषक्कुर्यादागन्तून्मादभेषजम् ॥ ५२ ॥
जिस अपस्मार मे वात आदि दोषो सं अधिक लक्षण दिखाई देते हों,
उसको आगन्तुज समझे। इस आगन्तुज-अपस्मार मे आगन्तुज-उन्माद की
चिकित्सा करे अर्थात् घृतपान और मत्रादि-चिकित्सा करे ॥ ५२ ॥
अतत्त्वाभिनिवेश नामक महारोग का निदान और चिकित्सा —
अनन्तरमुवाचेदमग्निवेशः कृताञ्जलिः ।
भगवान् प्राक् समुद्दिष्टः श्लोकस्थाने महागदः ॥ ५३ ॥
अतत्त्वाभिनिवेशो यस्तद्धेत्वाकृतिभेषजम् ।
तत्र नोक्तं ततः श्रोतुमिच्छामि तदिहोच्यताम् ।
शुश्रूषवे वचः श्रुत्वा शिष्यायाऽऽह पुनर्वसुः ॥ ५४ ॥
अपस्मार¹ का हेतु, लक्षण, चिकित्सा सुनने के अनन्तर हाथ जोड़ कर
अग्निवेश ने भगवान् आत्रेय से निवेदन किया—भगवन् ! आपने सूत्रस्थान
१. अतत्त्वाभिनिवेश-रोग का लक्षण और चिकित्सा का अंश आर्ष नही
है, यह चक्रदत्त और उनके गुरु-जनो, का मत है।

४७२ चरकसंहिता [ अ० १०
में 'अतत्त्वाभिनिवेश' नामक जो महारोग कहा हे, उसकी आकृति, लक्षण, हेतु
वक्ष पर आपने नहीं कहे थे, उनको मैं सुनना चाहता हूँ। उसे आप यहा पर
कहिये। सुनने की इच्छा वाले शिष्य के वचन को सुन कर भगवान् महर्षि
ने कहा—॥ ५३-५४ ॥
महागदं सौम्य शृणु सहेत्वाकृतिभेषजम् ।
मलिनाहारशीलस्य वेगान्प्राप्तान्निगृह्णतः ।
शीतोष्णस्निग्धरूक्षाद्यैर्हेतुभिश्चातिसेवितैः ॥ ५५ ॥
हृदयं समुपाश्रित्य मनोबुद्धिवहाः सिराः ।
दोषाः संदूष्य तिष्ठन्ति रजोमोहावृतात्मनः ॥ ५६ ॥
हे सौम्य ! महागद के हेतु, लक्षण ओर चिकित्सा को सुनो—जो व्यक्ति
नित्यप्रति मलिन (अपवित्र) और अपथ्य आहार का सेवन करता है, मूत्र,
पुरीष आदि के उपस्थित वेगो को रोकता है, शत, उष्ण, स्निग्ध और रूक्ष
आदि कारणो को अति सेवन करता है रजोग्रस्त और मो-(तम) से आवृत
उस पुरुष मे प्रकुपित शारीरिक वात आदि दोष हृदय मे पहुँच कर मनोवह
और बुद्धि-वह (सज्ञावह), सिराओ (स्रोतो) को दूषित कर देते है ॥५५-५६॥
रजस्तमोभ्यां वृद्धाभ्यां बुद्धौ मनसि चाऽऽवृते ।
हृदये व्याकुले दोषैरथ मूढालपचेतसः ॥ ५७ ॥
करोति विषमां बुद्धिं नित्यानित्ये हिताहिते ।
अतत्त्वाभिनिवेशं तमाहुराप्ता महागदम् ॥ ५८ ॥
रज और तम रूपी मानस दोषो के अधिक बढने से सत्त्व-सञ्ज्ञक मन और
बुद्धि घिर जाते है, ढप जाते है। शारीरिक दोषों के बढने से हृदय व्याकुल
हो जाता है। इस अवस्था मे पुरुष को मोह (मूर्च्छा) आ जाती है, चेतना
कम हो जाती है, नित्य, अनित्य और हित, अहित कार्यों मे विपरीत बुद्धि
करने लगता है। आप्त विद्वान् इसको 'अतत्त्वाभिनिवेश' नामक महाराग
कहते हैं ॥ ५७-५८ ॥
स्नेहस्वेदोपपन्नं तं संसाध्य वमनादिभिः ।
कृतसंसर्जनं मेध्यैरन्नपानैरुपाचरेत् ॥ ५६ ॥
चिकित्सा—रोगी को प्रथम स्नेहन और स्वेदन कराके वमन आदि
क्रियाओ से शुद्ध करे। पीछे से अग्नि को बढाने के लिये पेया आदि कर्म तथा
मेधावर्धक, पवित्र अन्नपानो से चिकित्सा करे ॥५६॥

अ० १० ] चिकित्सितस्थानम् ४७३

अ० १० ] चिकित्सितस्थानम् ४७३
ब्राह्मीस्वरसयुक्तं यत् १ पञ्चगव्यमुदाहृतम् ।
तत्सेव्यं शङ्खपुष्पी च यच्च मेध्यं २ रसायनम् ॥ ६० ॥
ब्राह्मी के ( कूठ आदि से मिले ) स्वरस से युक्त जो पंचगव्य घृत प्रथम
कहा है, उसका सेवन करना चाहिये । शंखपुष्पी का स्वरस और जो मेधावर्धक
रसायन प्रथम कहे है, उनका सेवन करना चाहिये ॥६०॥
सुहृदश्चानुकूलास्तं स्वाप्तधर्मार्थवादिनः ।
संयोजयेयुर्विज्ञानधैर्यस्मृतिसमाधिभिः ॥ ६१ ॥
मन के अनुकूल अच्छे आप्त, धर्म और हित की बात कहने वाले मित्र
लोग उस रोगी को विज्ञान ( शिल्प-शास्त्र ), धैर्य ( चित्त की स्थिरता ), स्मृति
( भूतार्थ-विज्ञान ) और समाधि ( मन के नियमन ) मे लगावे ॥६१॥
प्रयुञ्ज्यात्तैललशुनं पयसा वा शतावरीम् ।
ब्राह्मीरसं कुष्ठरसं वचा वा मधुसंयुताम् ॥ ६२ ॥
( १ ) तिल तैल के साथ मिला लहसुन का रस प्रतिदिन सेवन करे ।
( २ ) शतावरी के रस का दूध के साथ ले, ( ३ ) ब्राह्मी स्वरस, ( ४ ) कूट
के स्वरस, या ( ५ ) वच के चूर्ण को मधु के साथ प्रयोग करे ये पाच
योग है ॥ ६२ ॥
दुश्चिकित्स्यो ह्यपस्मारश्चिरकारी कृतास्पदः ।
तस्माद्रसायनैरेनं प्रायशः समुपाचरेत् ॥ ६३ ॥
अपस्मार रोग मे शारीरिक और मानसिक दोष एक साथ कुपित होते है
और वह महामर्मों मे आश्रित होता है । और यदि यह रोग देह मे एक बार
स्थान पा जावे और चिरस्थायी हो जावे तो वह अति कष्टसाध्य हो जाता है ।
इसलिये इस अपस्मार की प्रायः अनेक रसायनो से चिकित्सा करे ॥६३॥
जलाग्निद्रुमशैलेभ्यो विषमेभ्यश्च तं सदा ।
रक्षेदुन्मादिनं चैव सद्यः प्राणहरा हि ते ॥ ६४ ॥
अपस्मार और उन्माद के रोगियो की जल, अग्नि, वृक्ष, पर्वत और
अन्य विषम स्थानो से सदा रक्षा करे । क्योकि इन का देखने मात्र से उत्पन्न
हुआ वेग प्राणघातक होता है ॥ ६४ ॥
तत्र श्लोकौ—हेतुः कुर्वन्त्यपस्मारं दोषाः प्रकुपिता यथा ।
सामान्यतः पृथक्त्वाच्च लिङ्गं तेषां च भेषजम् ॥६५॥
१. 'स्वरसंयुक्त' इति । २ 'सेव्यं' इति वा ।

४७४ चरकसंहिता [ अ० ११
महागदसमुत्थानं लिङ्गं चोवाच सौषधम् ।
मुनिर्व्याससमासाभ्यामपस्मारचिकित्सिते ॥ ६६ ॥
उपसहार—अपस्मार-राग के कारण, प्रकुपित दोष जिस प्रकार से अप-
स्मार-रोग का उत्पन्न करते है, सामान्य लक्षण तथा पृथक्-पृथक् लक्षण और
चिकित्सा, अतत्त्वाभिनिवेश नामक महागद के कारण, लक्षण और चिकित्सा,
यह सब विषय भगवान् आत्रेय ने प्रजा की हितकामना से 'अपस्मार-चिकित्सित'
अध्याय मे कह दिये ॥ ६५-६६ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृतेऽपस्मारचिकित्सित नाम दशमोऽध्यायः॥१०॥
एकादशोऽध्यायः।
अथातः क्षतक्षीणचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे क्षतक्षीण-चिकित्सा की व्याख्या करते है, भगवान् आत्रेय ने
ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥
उदारकीर्तिर्ब्रह्मर्षिरात्रेयः परमार्थवित् ।
क्षतक्षीणचिकित्सार्थमिदमाह चिकित्सितम् ॥ ३ ॥
उदार कीर्ति, ब्रह्मर्षि तथा परमार्थ तत्त्व के जानने वाले, भगवान् पुनर्वसु
ने उरःक्षत से क्षीण व्यक्ति की चिकित्सा के लिये निम्नलिखित चिकित्सा-विधि
का उपदेश किया है ॥ ३ ॥
धनुषाऽऽयस्यतोऽत्यर्थं भारमुद्वहतो गुरुम् ।
पततो विषमोच्चेभ्यो युध्यमानस्य चाधिकैः ॥ ४ ॥
वृषं हयं वा धावन्तं दम्यं वान्यं निगृह्णतः ।
शिलाकाष्ठाश्मनिर्घातान् क्षिपतो निघ्नतः परान् ॥ ५ ॥
अधीयानस्य वाऽत्युच्चैर्दूरं वा व्रजतो द्रुतम् ।
महानदीं वा तरतो हयैर्वा सह धावतः ॥ ६ ॥
सहसोत्पततो दूरं तूर्णं चातिप्रनृत्यतः ।
तथाऽन्यैः कर्मभिः क्रूरैर्भृशमभ्याहतस्य वा ॥ ७ ॥
विक्षते वक्षसि व्याधिर्बलवान् समुदीर्यते ।
स्त्रीषु चातिप्रसक्तस्य रूक्षाल्पप्रमिताशिनः ॥ ८

अ० ११ ] चिकित्सितस्थानम् ४७५

अ० ११ ] चिकित्सितस्थानम् ४७५
कारण और सम्प्राप्ति—धनुष को अधिक खींचते हुए, अति अधिक
भारी भार को उठा कर ले जाते हुए, ऊंची-नीची जगह से गिरने पर, अपने
से अधिक बलवान् व्यक्तियो से युद्ध करते हुए, दौड़ते हुए घोडे या बैल को
वा दम्य ( तरुण बैल, घोडे या भैंसे ) को रोकते हुए, शिला, काष्ठ (लकडी ),
पत्थर, निघोत ( मुद्गर ) आदि को दूर फेकते वा दूसरो पर मारते हुए, बहुत
जोर-जोर से ऊंचे स्वर से पढते हुए, दूर तक अति वेग से भागते हुए, बड़ी
भारी नदी को तैरते हुए, घोड़ों के साथ-साथ दौड़ते हुए, एक दम अचानक
कूदते हुए, बहुत तेजी के साथ नाचते हुए, तथा इसी प्रकार के अन्य क्रूर
कार्यो से अथवा दूसरे व्यक्ति से वक्षस्थल पर जोर से चोट लगने पर, स्त्रियों
मे अतिप्रसङ्ग करनेवाले के, रूखा, अल्प ( हीन मात्रा मे ), वा प्रमित अर्थात्
एक रस खानेवाले व्यक्ति के, वक्ष स्थल मे क्षत हो जाता है, इससे क्षतक्षीण
नामक बलवान् रोग उत्पन्न होता है १ ।
[जल्पकल्पतरुकार ने क्षतक्षीण को दो प्रकार का माना है। एक अति स्त्री-
प्रसग, प्रमिताशन आदि से उत्पन्न और दूसरा क्रूरकार्यो से उत्पन्न । परन्तु
परन्तु शुक्र-क्षय से क्षत-क्षय उत्पन्न नही होता, वह तो क्षयजन्य यक्ष्मा है उसको
प्रथम कह दिया है।] ॥ ४-८ ॥
उरो विरुज्यते तस्य भिद्यतेऽथ विदह्यते ।
प्रपीड्यते ततः पार्श्वे शुष्यत्यङ्गं प्रवेपते ॥ ६ ॥
क्रमाद्वीर्यं बलं वर्णो रुचिरग्निश्च हीयते ।
ज्वरो व्यथा मनोदैन्यं विड्भेदोऽग्निवधस्तथा ॥ १० ॥
दुष्टः श्यावः सदुर्गन्धिः पीतो विग्रथितो बहुः ।
कासमानस्य चाभीक्ष्णं कफः सास्रः प्रवर्तते ॥ ११ ॥
स क्षतः क्षीयतेऽत्यर्थं तथा शुक्रौजसोः क्षयात् ।
लक्षण—उर स्थल ( छाती ) मे अत्यन्त वेदना या पीडा होती है, छाती
फटती, दो टुकडे होती प्रतीत होती है, जलन सी प्रतीत होती है, पार्श्व दबते
प्रतीत होते हैं, अग शुष्क हो जाते है, अग कापते है । वीर्य ( सामर्थ्य ), बल,
वर्ण ( कान्ति ), रुचि ( भोजन मे इच्छा ) ओर अग्नि धीरे-धीरे घट जाती
है । ज्वर, पीडा, मन की दीनता ( उदासी ), अतिसार, जाठर-अग्नि का नाश
१ राजयक्ष्मा और क्षतक्षीण मे भेद करना चाहिये । क्षतक्षीण की उपेक्षा
से यक्ष्मा अनुबन्ध के रूप मे उत्पन्न हो जाता है । भेद कहा भी है—
शोषप्लीहाढ्यवाताश्च स्वरभेदं क्षत क्षयम् ॥

४७६ चरकसंहिता [ अ० ११
( भोजन का अविपाक या न पचना ), उत्पन्न हो जाता है । बार बार खासी
आती है, खासने मे दूषित, काला या पीला, दुर्गन्धयुक्त, बँधा हुआ ( ग्रथित ),
मात्रा मे बहुत तथा रक्त मिश्रित कफ बाहर आता है । शुक्र और ओज के
क्षीण होने से उर क्षत का रोगी अत्यन्त क्षीण ( दुर्बल ) हो जाता है ॥६-११॥
अव्यक्तं लक्षणं तस्य पूर्वरूपमिति स्मृतम् ॥ १२ ॥
छाती मे दर्द आदि पूर्वोक्त लक्षण जब तक अव्यक्त या थोड़े से व्यक्त
होते हैं, वही इस रोग के पूर्वरूप है ॥ १२ ॥
उरोरुक् शोणितच्छर्दिः कासो वैशेषिकः क्षते ।
क्षीणे सरक्तमूत्रत्वं पार्श्वपृष्ठकटिग्रहः ॥ १३ ॥
उरःक्षत होने पर—छाती मे दर्द, रक्त का वमन ओर कास विशेष रूप से
होता है । क्षतक्षीण अर्थात् शुक्र के क्षय से रक्तमिश्रित मूत्र तथा पार्श्व, पीठ
और कटि मे जकडाहट, वेदना अथवा स्थिरता आ जाती है ॥ १३ ॥
अल्पलिङ्गस्य दीप्ताग्ने साध्यो बलवतो नवः ।
परिसंवत्सरो याप्यः सर्वलिङ्गं तु वर्जयेत् ॥ १४ ॥
साध्य और असाध्य के रूप—यदि रोगी बलवान् हो, अग्नि भी प्रदीप्त
हो, लक्षण थोडे हों और रोग नया ( एक साल से कम का ) हो तो वह साध्य
होता है । जो रोग एक साल पुराना हो गया हो तो वह याप्य है, जिस रोगी
मे सब लक्षण विद्यमान हों वह असाध्य है । वह चिकित्सा करने योग्य
नहीं है ॥ १४ ॥
चिकित्सा—
उरो मत्वा क्षतं लाक्षां पयसा मधुसंयुताम् ।
सद्य एव पिबेज्जीर्णे पयसाऽद्यात्सशर्करम् ॥ १५ ॥
(१) जब छाती मे क्षत हुआ पता लगे तब लाख को मधु मे मिला
कर दूध के साथ पी लेवे । इसके जीर्ण होने पर दूध और शर्करा के साथ
अन्न खावे १ ॥ १५ ॥
पार्श्वबस्तिरुजश्चाल्पपित्ताग्निस्ता सुरायुताम् ।
भिन्नविट्कः समुस्तातिविषा पाठा सवत्सकाम् ॥ १६ ॥
(२) रोगी को पार्श्वशूल और बस्तिशूल हो तथा अल्पपित्त और अल्पाग्नि
१ अष्टांगसंग्रह मे कहा है—
उरस्यन्त क्षते सद्यो लाक्षा क्षौद्रयुता पिबेत् ।
क्षीरेण शालीन् जीर्णेऽद्यात् क्षीरेणैव सशर्करान् ॥