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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २९३

अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २९३ १मनस्यभिहते पूर्वं कामाद्यैर्न तथा बलम् । ज्वरः प्राप्नोति वाताद्यैर्मनो यावन्न दुष्यति ॥ १२८ ॥ काम आदि द्वारा मन के आक्रान्त होने पर उत्पन्न ज्वर प्रथम अधिक बलवान् नहीं होता । परन्तु जब शरीर के वातादि दोषों में मिल जाता है, तब अधिक बलवान् हो जाता है ॥ १२८ ॥ संसृष्टाः सन्निपतिताः पृथग्वा कुपिता मलाः । रसाख्यं धातुमन्वेत्य पक्ति स्थानान्निरस्य च ॥ १२९ ॥ स्वेन तेनोष्मणा चैव कृत्वा देहोष्मणो बलम् । स्रोतांसि रुद्ध्वा सम्प्राप्ताः केवलं देहमुल्बणाः ॥ १३० ॥ सन्तापमधिकं देहे जनयन्ति नरस्तदा । भवत्यत्युष्णसर्वाङ्गो ज्वरितस्तेन चोच्यते ॥ १३१ ॥ स्रोतसां संनिरुद्धत्वात्स्वेदं ना नाधिगच्छति । स्वस्थानात्प्रच्युते चाग्नौ प्रायस्तरुणे ज्वरे ॥ १३२ ॥ ज्वर—पृथक् पृथक्, द्वन्द्व रूप में या सन्निपात रूप में कुपित वातादि दोष रस नामक धातु का सहारा लेकर अग्नि को उसके असली स्थान से (आमा- शय से) निकाल कर, अपनी गरमी से देह की गरमी को बढ़ाकर, स्रोतों को बन्द करके, देह में फैलकर शरीर में अधिक (मात्रा से अधिक) सन्ताप उत्पन्न कर देते हैं । उससे मनुष्य का ज्वर उत्पन्न हो जाता है । उसके सब अंग गरम हो जाते हैं, इस अवस्था का 'ज्वर' कहते हैं । स्रोतों के रुक जाने से और अग्नि के अपना स्थान छोड़ देने के कारण तरुण (नूतन) ज्वर में पसीना नहीं आता ॥ १२९-१३२ ॥ अरुचिश्चाविपाकश्च गुरुत्वमुदरस्य च। हृदयस्याविशुद्धिश्च तन्द्रा चाऽऽलस्यमेव च ॥ १३३ ॥ ज्वरोऽविसर्गी बलवान दोषाणामप्रवर्तनम् । लालाप्रसेको हृल्लासो क्षुन्नाशो विरस मुखम् ॥ १३४ ॥ स्तब्धमुग्रगुरुत्वं च गात्राणां बहुमूत्रता । न निङ्गीर्णा न च ग्लानिर्ज्वरस्याऽऽमस्य लक्षणम् ॥ १३५ ॥ आमज्वर के लक्षण—अरुचि, अविपाक, पेट में भारीपन, हृदय (आमा- शय) का साफ न होना, तन्द्रा, आलस्य, निरन्तर ज्वर का बना रहना, ज्वर १ मनस्यभिद्रुते पूर्वं कामाद्यैर्न तथा बलम् । ज्वर प्राप्नोति कामाद्यैर्मनो यावन्न दुष्यति ॥ इति गंगाधरसम्मतः पाठः ।

२६४ चरकसंहिता [अ० ३ का बलवान् होना, मल वा दोषों का बाहर न निकलना, मुख से लार बहना, जी मचलाना, भूख का न लगना, मुख का स्वाद बदल जाना (विरसता), गात्रो मे जडता, सुप्तता और भारीपन, बार बार थोडा २ मूत्र का आना, कच्चे मल का आना और ग्लानि ये आमज्वर के लक्षण है ॥ १३३-१३५ ॥ ज्वरवेगोऽधिकस्तृष्णा प्रलापः श्वसनं भ्रमः । मलप्रवृत्तिरुत्क्लेशः पच्यमानस्य लक्षणम् ॥ १३६ ॥ पच्यमान ज्वर के लक्षण—ज्वर का अधिक बढना, प्यास, प्रलाप, सास का जोर से चलना, चक्कर आना, मल की प्रवृत्ति, उत्क्लेश (वमन की अभिरुचि), ये पच्यमान ज्वर के लक्षण है ॥ १३६ ॥ क्षुत्क्षामता लघुत्वं च गात्राणां ज्वरमार्दवम् । दोषप्रवृत्तिरष्टाहो निरामज्वरलक्षणम् ॥ १३७॥ निराम ज्वर—भूख का लगना, शरीर मे हल्कापन, ज्वर का घट जाना, मल-मूत्र स्वेद का बाहर निकलना, तथा आठवे दिन तक दोष का रहना ये निराम ज्वर के लक्षण है । [ साधारणत आठवे दिन मे दोषो का परिपाक हो जाता है। परन्तु कई बार दोष आठ दिन से पूर्व भी पच जाते है और कई बार इससे भी अधिक देर मे पचते है । इसलिये लक्षणा को देख कर पक्व दोष की परीक्षा करे । जब ज्वर आप से आप कम हो जावे, देह हलका हो, मल विचलित हो, तब दोषो का पाक हुआ जाने ] ॥ १३७ ॥ नवज्वरे दिवास्वप्नस्नानाभ्यङ्गान्नमैथुनम् । क्रोधप्रवातव्यायामकषायांश्च विवर्जयेत् ॥ १३८ ॥ नवज्वर मे अपथ्य—दिन मे साना, स्नान करना, मालिश, मैथुन, क्रोध, प्रवात (वायु का सीधा आना ), व्यायाम और कषाय रसवाले (कषाय स्तम्भक होने से) सेवन नही करने चाहिये । [ कषाय शब्द से कपाय रस वाले क्वाथ तथा अन्य कषाय कल्पना का भी निषेध है । परन्तु इस अवस्था मे साधन कषाय न देकर, पाचक, मधुर कषाय दे सकते है। सोल्ह गुण जल मे चतुर्थ भाग शेष करने से 'कषाय' बनता है। यह कषाय तरुण ज्वर मे न देना चाहिये ] ॥ १३८ ॥ ज्वरे लङ्घनमेवादावुपदिष्टमृते ज्वरात् । क्षयानिलभयक्रोधकामशोकश्रमोद्भवात् ॥ १३६ ॥ लङ्घनेन क्षयं नीते दोषे संधुक्षितेऽनले । विज्वरत्वं लघुत्वं च क्षुच्चैवास्योपजायते ॥ १४० ॥

अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २६५

अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २६५ प्राणाविरोधिना चैनं लङ्घनेनोपपादयेत् । बलाधिष्ठानमारोग्यं यदर्थोऽयं क्रियाक्रमः ॥ १४१ ॥ ज्वर मे लङ्घन—आम से मिलकर दोष अग्नि को मन्द कर देते है, इसलिये ज्वर मे लङ्घन ( उपवास या लघु-भोजन ) करना चाहिये । सब अवस्थाओ मे अग्नि को बढाना चाहिये । इस समय का लङ्घन अमृत के समान गुणकारी होता है । परन्तु क्षयजन्य, वातजन्य, भयजन्य, क्रोधजन्य, कामजन्य, शोकजन्य, श्रमजन्य ज्वरो मे लङ्घन नहीं कराना चाहिये¹ । लङ्घन ( उपवास ) से दोषों का क्षय होने पर जाठराग्नि प्रबल हो जाती है, बुखार उतर जाता है, शरीर हल्का हो जाता है, भूख लगने लगती है² । लङ्घन तब तक ही कराना चाहिये जिससे कि प्राण या बल ( शक्ति ) का ह्रास न होने पाये । क्योकि आरोग्य बल पर ही निर्भर करता है और यह सब चिकित्सा आरोग्य के लिये ही हैं ॥ १३६–१४१ ॥ लङ्घनं स्वेदनं कालो यवाग्वस्तिक्तको रसः । पाचनान्यविपक्कानां दोषाणां तरुणे ज्वरे ॥ १४२ ॥ तृष्यते सलिलं चोष्णं दद्याद्वातकफज्वरे । मद्योत्थे पैत्तिके वाऽथ शीतलं तिक्तकैः शृतम् ॥ १४३ ॥ दीपनं पाचनं चैव ज्वरघ्नमुभयं हि तत् । स्रोतसां शोधनं बल्यं रुचिस्वेदकरं शिवम् ॥ १४४ ॥ दोषो के पाचन—लङ्घन, स्वेदन ( पसीना लाना ), समय पर यवागू, तिक्त रस ये वस्तुएँ तरुण ज्वर मे आम दोषो को पकाती हे । वात-कफजन्य ज्वर मे प्यास लगने पर उष्ण जल देना चाहिये । मद्यपान से उत्पन्न ज्वर मे तिक्त वस्तुओ से साधित शीतल जल देना चाहिये । यह दोनो प्रकार का पानी अग्निदीपक, पाचक, ज्वरनाशक, स्रोतो का शोधक, बलकारक, रुचिकारक, पसीना लाने वाला और कल्याणकारक है ॥ १४२–१४४ ॥ १ लङ्घन से अभिप्राय शरीर का हल्का करने वाले कर्म और द्रव्यो से है । जब दोष आमाशय मे हो और उत्क्लेश ( उवकाई ) हो तो वमन करना उत्तम है । जब तक रोगी के दोष घनीभूत बने रहे तब तक रोगी अनशन करे, उसके बाद भोजन करे ! २ लङ्घन की पहिचान —वात, मूत्र, मल हो, गात्र हल्का हो, डकार हो, हृदय और कण्ठ शुद्ध हो, आलस्य न हो, पसीना हो, भूख, प्यास एक साथ लगे, चित्त प्रसन्न हो तो जाने लङ्घन ठीक हुआ है ।

२६६ चरकसंहिता [अ० ३ मुस्तपर्पटकौशीरचन्दनोदीच्यनागरैः । शृतशीतं जलं दद्यात्पिपासाज्वरशान्तये ॥ १४५ ॥ षडग पानीय—मोथा, पित्तपापडा, खस, लाल चन्दन, नेत्रबाला और सोंठ इनको एक एक कर्ष लेकर दो प्रस्थ पानी मे उबाले । एक प्रस्थ रहने पर छानकर ठण्डा करके देना चाहिये । इससे प्यास और ज्वर की शान्ति होती है । [कई स्थान मे सोंठ के स्थान पर 'पद्माख' डालना लिखा है ] ॥१४५॥ कफप्रधानानुत्क्लिष्टान्दोषानामाशयस्थितान् । बुद्ध्वा ज्वरकरान् काले वम्यानां वमनैर्हरेत् ॥ १४६ ॥ अनुपस्थितदोषाणां वमनं तरुणे ज्वरे । हृद्रोगं श्वासमानाहं मोहं १ च जनयेद् भृशम् ॥ १४७ ॥ सर्वदेहानुगाः सामा धातुस्था ॰दुःखनिर्हराः । दोषाः फलेभ्य आमेभ्यः स्वरसा इव सात्ययाः ॥ १४८ ॥ वमितं लङ्घितं काले यवागूभिरुपाचरेत् । यथा स्वौषधसिद्धाभिर्मण्डपूर्वाभिरादितः ॥ १४९ ॥ यावज्ज्वरमृदूभावात्षडहं वा विचक्षणः । तस्याग्निर्दीप्यते ताभिः समिद्भिरिव पावकः ॥ १५० ॥ ताश्च भेषजसंयोगाल्लघुत्वाच्चाग्निदीपनाः । वातमूत्रपुरीषाणां दोषाणां ॰चानुलोमनाः ॥ १५१ ॥ स्वेदनाय द्रवोष्णत्वाद् द्रवत्वात्तृट्प्रशान्तये । आहारभावात्प्राणाय सरत्वाल्लाघवाय च ॥ १५२ ॥ ज्वरघ्न्यो ज्वरसात्म्यत्वात्तस्मात्पेयाभिरादितः । ज्वरानुपचरेद्धीमानृते मद्यसमुत्थितात् ॥ १५३ ॥ साम ज्वरो मे उपचार—आमाशय मे स्थित कफप्रधान दोष यदि ज्वर का कारण हो, इन दोषो का उत्क्लेश अर्थात् बाहर निकलने की ओर प्रवृत्ति हो, परन्तु बाहर न निकले और रोगी वमन कराने के योग्य हो तो उचित काल मे वमन करा के दोषो को बाहर कर देना चाहिये । [ उत्क्लेश का लक्षण—मुख मे बहुत पानी या डकार आकर भी अन्न बहुत कष्ट देकर भी न निकले, हृदय पीडित हो उसे 'उत्क्लेश' कहते है ] यह वमन प्रात काल देना चाहिये । यदि तरुण ज्वर मे दोष बाहर की ओर निकलने की प्रवृत्ति न रखते हो, तो रोगी को १ 'कास' इति च पाठ । २ 'असुनिर्हराः' इति च पाठ. । ३ 'विबन्धस्यानुलोमिका' इति च पाठ. ।

अ० ३ चिकित्सितस्थानम् २६७

अ० ३ चिकित्सितस्थानम् २६७ वमन करान से हृदय-रोग, श्वास, आनाह, मोह (मूर्च्छा), आदि उपद्रव हो जाते हैं। सम्पूर्ण शरीर मे व्याप्त, धातुओ मे स्थित साम दोष को निकालना ऐसे ही अति कठिन और खतरे से खाली नहीं जिस प्रकार कच्चे फलो से स्वरस को निकालना कठिन होता है, और कभी कभी इस मे फल का भी नाश हो जाता है। वमन या लङ्घन करने के पश्चात् उचित समय पर (भोजन काल मे औष- धियो से सिद्ध मण्ड और यवागू देनी चाहिये। अधिक द्रव होने से प्रथम मण्ड देना चाहिये, पीछे से यवागू (विलेपी) देनी चाहिये। इस समय पाचक औष- धियो से सिद्ध करके मण्ड देना चाहिये। जब तक ज्वर घटे नहीं अथवा छ दिनो तक मण्ड ओर यवागू का प्रयोग करना चाहिये। इसके प्रयोग से जिस प्रकार समिधाओ से अग्नि बढती है, जाठराग्नि प्रदीप्त होती है। औषधियो का सयोग होने से, लघु होने से, यवागू अग्नि को बढाती है, वायु, मल मूत्र ओर दोषो का अनुलोमन करती है, द्रव ओर उष्ण होने से पसीना लाती है, द्रव होने से प्यास बुझाती है, आहार होने के कारण प्राण बल देती है, खर होने से लघुता उत्पन्न करती है ज्वर मे सात्म्य होने से ज्वरनाशक है। इसलिये बुद्धिमान् को चाहिये कि प्रथम पेयाओ द्वारा ज्वर की चिकित्सा करे। यदि ज्वर मद्य मे उत्पन्न हुआ है तो पेया न देवे ॥ १४६-१५३ ॥ मदात्यये मद्यनित्ये ग्रीष्मे पित्तकफाधिके । ऊर्ध्वगे रक्तपित्ते च यवागूर्न हिता ज्वरे ॥ १५४ ॥ निम्न अवस्थाओ मे यवागू नहीं देनी चाहिये—मद्यपान से उत्पन्न ज्वर मे, मदात्यय मे, नित्य मद्यपान करने वाले को, ग्रीष्म ऋतु मे, पित्तकफ प्रधान ज्वर में, ऊर्ध्वग रक्त पित्त मे यवागू हितकर नहीं होती ॥ १५४ ॥ तत्र तर्पणमेवाग्रे प्रयोज्यं लाजसक्तुभिः । ज्वरापहैः फलरसैर्युक्तं समधुशर्करम् ॥ १५५ ॥ द्राक्षादाडिमखर्जूरप्रियालैः सपरूषकैः । तर्पणार्हेषु कर्त्तव्यं तर्पणं ज्वरशान्तये ॥ १५६ ॥ ततः सात्म्यबलापेक्षी भोजयेज्जीर्णतर्पणम् । तनुना मुद्गयूषेण जाङ्गलाना रसेन वा ॥ १५७ ॥ इन उपरोक्त अवस्थाओ मे—लाजा के सत्तूओ को मधु, खाड तथा अनार आदि फलो के रस के साथ देना चाहिये। यवागू के स्थान पर लाजाओ का तर्पण प्रथम देना चाहिये। जो रोगी तर्पण के योग्य हो उनको ज्वर की शान्ति के लिये अगूर, अनार, खजूर, पियाल, फालसा इनके रसो से

२६८ चरकसंहिता [ अ० ३


तर्पण करना चाहिये । तर्पण के जीर्ण होने पर सात्म्य और बल की अपेक्षा से
मृग के यूष या जंगल के पशु पक्षियों के मांस रस के साथ चावल
देना चाहिये ॥ १५५-१५७ ॥
अन्नकालेषु चाप्यस्य विधेयं दन्तधावनम् ।
योऽस्य वक्त्ररसस्तस्माद्विपरीत प्रियं च यत् ॥ १५८ ॥
तदस्य मुखवैशद्यं प्रकाङ्क्षां चान्नपानयोः ।
धत्ते रसविशेषाणामभिज्ञत्वं करोति यत् ॥ १५९ ॥
विशोध्य द्रुमशाखाग्रैरास्यं प्रक्षाल्य चासकृत् ।
मस्त्विक्षुरसमद्याद्यैर्यथाहारमवाप्नुयात् ॥ १६० ॥
पाचनं शमनीयं वा कषायं पाययेत्तु तम् ।
अन्न काल में रोगी को दातुन करानी चाहिये । दातुन ऐसी होनी चाहिये
जिसका रस रोगी के मुख के रस से विपरीत हो, और रोगी को प्रिय लगे ।
दातुन करने से मुख स्वच्छ होता है, खान-पान में रुचि होती है, भिन्न भिन्न
रसों का परिज्ञान होता है । दातुन से मुख को साफ करके गरम पानी से मुख
को स्वच्छ करके, मस्तु (दही का पानी), गन्ने का रस, मद्य आदि (मूग के
यूष) के साथ भोजन करना चाहिये । [कुछ विद्वानों की सम्मति में इनका
केवल मुख में धारण करना चाहिये] । छठे दिन के बीत जाने पर लघु अन्न
का भोजन कराके अगले दिन पाचनीय या शमनीय कषाय देना चाहिये ।
[लङ्घन की मर्यादा—दोष के अनुसार ही ज्वर के निमित्त ३, २, या छः रात
लङ्घन करे ।] अपक्व आहार अपक्व दोषों को तथा अपक्व रस को पकाने वाले
कषाय को 'पाचक' कहते हैं । जो दुष्ट दोषों को बाहर नहीं निकालता, प्रकुपित
दोषों को शमन करता है, प्रकृतिस्थ दोषों, धातुओं में परिवर्त्तन नहीं लाता
उसको 'शमनीय' कहते हैं । [प्रथम लङ्घन से दोषों को शान्त करना (पचाना)
चाहिये । छः दिन तक लङ्घन कराने पर भी यदि दोष न पके तो पाचनीय
कषाय देना चाहिये । और जब दोषों का परिपाक हो जाये तो शमनीय कषाय
देना चाहिये] ॥ १५८-१६० ॥
ज्वरितं षडहेऽतीते लघ्वन्नप्रतिभोजितम् ॥ १६१ ॥
स्तभ्यन्ते न विपच्यन्ते कुर्वन्ति विषमज्वरम् ।
दोषा बद्धाः कषायेण स्तम्भित्वात्तरुणे ज्वरे ॥ १६२ ॥
न तु कल्पनमुद्दिश्य कषायः प्रतिषिध्यते ।
यः कषायः कषायः स्यात्स वर्ज्यस्तरुणज्वरे ॥ १६३ ॥

यूषैरम्लैरनम्लैर्वा जाङ्गलैर्वा रसैर्हितैः । दशाहं यावदश्नीयाल्लघ्वन्नं ज्वरशान्तये ॥ १६४ ॥ तरुण ज्वर मे ही कषाय का निषेध है । [ सात दिन तक ज्वर तरुण कहाता है, १२ दिन तक मध्यम और इससे आगे पुराना ज्वर कहाता है ] चूंकि कषाय स्तम्भकारक होते है, इसलिये कषाय से दोष जड बन जाते है, पचते नही और विषम ज्वर को उत्पन्न करते है । स्वरस, कल्क, श्रुत, शीत और फाण्ट इस कल्पना का लेकर तरुण ज्वर मे कषाय का निषेध नही है । अपितु जो कषाय कषाय रस वाला है, उसका निषेध तरुण ज्वर मे हे । ज्वर की शान्ति के लिये दसवे दिन अनार, आंवला आदि फलो के रस से खट्टे बनाये या खट्टे किये बिना मूंग आदि का यूष अथवा जांगल पशु-पक्षियो का मास- रस हल्के भोजन के साथ देना चाहिये ॥ १६१–१६४ ॥ अत ऊर्ध्वं कफे मन्दे वातपित्तोत्तरे ज्वरे । परिपक्वेषु दोषेषु सर्पिष्पानं यथाऽमृतम् ॥ १६५ ॥ घृत पान—ज्वर मे जब कफ मन्द हो जाय, वात या पित्त अथवा वात- पित्तप्रधान हो और दोषो का पक्तिपाक हो जाये, उस समय घृत का पान कराना अमृत के समान है ॥ १६५ ॥ निर्दशाहमपि ज्ञात्वा कफोत्तरमलङ्घितम् । न सर्पिः पाययेद्वैद्यः शमनैस्तमुपाचरेत् ॥ १६६ ॥ दस दिन हो जाने पर भी यदि वैद्य को पता लग जाये कि रोगी को लङ्घन नहीं कराया गया तो इसको घृत का पान नही करावे अपितु शमनीय ओषधियो से चिकित्सा करे ॥ १६६ ॥ यावल्लघुत्वादशनं दद्यान्मांसरसेन च । बलं ह्यलं दोषहरं परं तच्च बलप्रदम् ॥ १६७ ॥ जब तक शरीर मे लघुता न आये तब तक मास-रस के साथ लघु आहार देना चाहिये । बल ही दोषो का नष्ट करने मे समर्थ है और मासरस उत्तम बलवर्द्धक है ॥ १६७ ॥ दाहतृष्णापरीतस्य वातपित्तोत्तरं ज्वरम् । बद्धप्रच्युतदोषं वा निरामं पयसा जयेत् ॥ १६८ ॥ दाह और तृष्णा से आक्रान्त, वात-पित्तप्रधान निराम ज्वर मे जब कि दोष रुके हो, परन्तु अपने स्थान से हिल गये हो तो उनको दूध के द्वारा जीतना चाहिये ॥ १६८ ॥

३०० चरकसंहिता [ अ० ३ ~ ~ ~ क्रियाभिराभिः प्रशमं न प्रयाति यदा ज्वरः । अक्षीणबलमांसाग्नेः शमयेत्तं विरेचनैः ॥ १६९ ॥ यदि उपरोक्त क्रियाओ से ज्वर शान्त न हो ओर रोगी का बल और अग्नि क्षीण न हुए हो तो विरेचन द्वारा ज्वर को शान्त करना चाहिये ॥ १६९ ॥ ज्वरक्षीणस्य न हितं वमनं न विरेचनम् । कामं तु पयसा तस्य निरूहैर्वा हरेन्मलान् ॥ १७० ॥ ज्वर के कारण क्षीण हुए व्यक्ति को वमन या विरेचन देना हितकारी नही है । यदि अभीष्ट हो तो दूध के द्वारा अथवा निरूह बस्तियो द्वारा मल को निकालना चाहिये ॥ १७० ॥ निरूहो बलमग्निं च विज्वरत्वं मुदं रुचिम् । परिपक्वेषु दोषेषु प्रयुक्तः शीघ्रमावहेत् ॥ १७१ ॥ ज्वर मे दोषो के परिपक्व होने पर दिया हुआ निरूह बल ( शक्ति ) और अग्नि को बढाता है, ज्वर को हटाता है, प्रसन्नता उत्पन्न करता है, भोजन मे रुचि उत्पन्न करता है ॥ १७१ ॥ पित्तं वा कफपित्तं वा पित्ताशयगतं हरेत् । स्रसनं, त्रीन्मलान् बस्तिर्हरेत्पक्वाशयस्थितान् ॥ १७२ ॥ स्रसन ( विरेचन ) पित्ताशय ओर ग्रहणी मे स्थित पित्त और कफपित्त का ही निकालता है । परन्तु वस्ति पक्वाशय ( बृहदन्त्र ) मे स्थित वात, पित्त, कफ तीनो मलो को बाहर निकालती है ॥ १७२ ॥ ज्वरे पुराणो संक्षीणे कफपित्ते दृढाग्नये । रूक्षबद्धपुरीषाय प्रदद्यादनुवासनम् ॥ १७३ ॥ पुराने ज्वर मे कफ पित्त के क्षीण होने पर, मल के कठोर तथा रूक्ष होने पर यदि रोगी की अग्नि प्रबल हो तो अनुवासन ( स्निग्ध वस्ति ) देना चाहिये ॥ १७३ ॥ गौरवे शिरसः शूले विबद्धेष्विन्द्रियेषु च । जीर्णज्वरे रुचिकरं कुर्यान्मूर्धविरेचनम् ॥ १७४ ॥ अभ्यङ्गांश्च प्रदेहांश्च सस्नेहान् सावगाहनान् । विभज्य शीतोष्णतया कुर्याज्जीर्णे ज्वरे भिषक् ॥ १७५ ॥ तैराशु हि शमं याति बहिर्मार्गगतो ज्वरः । लभन्ते सुखमङ्गानि बल वर्णश्च वर्धते ॥ १७६ ॥ धूपनाञ्जनयोगैश्च यान्ति जीर्णज्वराः शमम् ।

अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् ३०१

अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् ३०१ शिरोविरेचन—जीर्णज्वर मे देह के गुरु हाने पर, शिरोवेदना मे, इन्द्रिना के अपने विषय मे प्रवृत्त न होने पर शिरोविरेचन देना चाहिये। यह विरेचन रुचि ( विपयो मे प्रीति ) करता है । [ यहा पर वैरेचनिक नस्य से अभिप्राय है। परन्तु यदि शिर मे शून्यता अनुभव हो तो स्नैहिक धूम नस्य, यदि दाह हो तो पित्तनाशक शमनीय धूम का प्रयोग करना चाहिये । ] वैद्य का चाहिये कि जीर्णज्वर मे शीतकारण से उत्पन्न तथा उष्ण कारण से उत्पन्न ज्वर की विवेचना करके अभ्यग, प्रदेह, स्नेहयुक्त अवगाहन देवे । यदि शोत कारण से ज्वर उत्पन्न हो तो उष्ण अभ्यग आदि देने चाहिये । उष्ण कारण से उत्पन्न हो ता शीतल अभ्यग देने चाहिये । इन क्रियाओ से बहिर्माग ( त्वचा एव रक्त धातु ) मे पहुँचा ज्वर शीघ्र शान्त हो जाता है, अगो को सुख मिलता है, रोगी का बल और कान्ति बढती है ॥ १७६ ॥ त्वङ्मात्रशेषा येषा च भवत्यागन्तुरन्वयः ॥ १७७ ॥ इति क्रियाक्रमः सिद्धो ज्वरघ्नः सम्प्रकाशितः । जा ज्वर केवल त्वचा मे ही शेष रह गये हो, या जिन ज्वरो के साथ आगन्तुज अनुबन्ध लगा रहता है, वे जीर्णज्वर धूपन, अजन प्रयाग से शान्त हो जाते हं । यह ज्वरनाशक, फलप्रद चिकित्सा विवि कह दी ॥ १७७ ॥ येषा त्वेष क्रमस्तानि द्रव्याण्यूर्ध्वमतः शृणु ॥ १७८ ॥ रक्तशाल्यादयः शस्ताः पुराणाः षष्टिकैः सह । यवाग्वोदनलाजार्थे ज्वरिताना ज्वरापहाः ॥ १७६ ॥ अम्लाभिलाषी तामेव दाडिमाम्ला सनागराम् । सृष्टविट् पैत्तिको वाऽथ शीता मधुयुता पिबेत् ॥ १८० ॥ लाजपेया सुखजरा पिप्पलीनागरैः शृताम् । पिबेज्ज्वरी ज्वरहरा क्षुद्धानलपामिरादितः ॥ १८१ ॥ पेया वा रक्तशालीना पार्श्वबस्तिशिरोरुजि । श्वदंष्ट्राकण्टकारीभ्या सिद्धा ज्वरहरा पिबेत् ॥ १८२ ॥ ज्वरातिसारी पेया वा पिबेत्साम्ला शृता नरः । पृश्निपर्णीबलाबिल्वनागरोत्पलधान्यकैः ॥ १८३ ॥ शृता विदारीगन्धाद्यैर्दीपनी स्वेदनी नरः । कासी श्वासी च हिक्को च यवागू ज्वरितः पिबेत् ॥ १८४ ॥ विबद्धवर्चाः सयवा पिप्पल्यामलकैः शृताम् । सर्पिष्मती पिबेत्पेया ज्वरी दोषानुलोमनीम् ॥ १८५॥

३०० चरकसंहिता [ अ० ३ कोष्ठे विबद्धे सरुजि पिबेत्पेयां शृता ज्वरी । मृद्वीकापिप्पलीमूलचव्यामलकनागरैः ॥ १८६ ॥ पिबेत्सविल्वां पेया वा ज्वरे सपरिकर्तिके । बलावृक्षाम्लकोलाम्लकल्शीधावनीशृताम् ॥ १८७ ॥ अस्वेदनिद्रस्तृष्णार्तः पिबेत्पेयां सशर्कराम् । नागरामलकैः सिद्धां घृतभृष्टां ज्वरापहाम् ॥ १८८ ॥ जिन द्रव्यों का यह क्रम है, उनको अब सुनो—(१) ज्वर के रोगी के ज्वर को नाश करने के लिये यवागू, ओदन, लाज, प्रयोग करने के लिये पुराने लाल चावल और पुराने साँठी के चावलों का व्यवहार करना चाहिये । (२) जिस ज्वर-रोगी की अग्नि मन्द हो जाये उसको चाहिये कि भूख लगने पर प्रथम ज्वरनाशक, सुख से पचने वाली, पिप्पली और सोंठ से साधित लाजाओं की पेया पीये । जिस रोगी को खट्टे रस की चाह हो, उसको चाहिये कि माठ से साधित लाजा की पेया मे अनार का रस (अनारदाना) मिलाकर पीये । जिस रोगी को मल पतला आता हो अथवा पैत्तिक प्रकृति हो उसको चाहिये कि लाजा की पेया को ठण्डा करके शहद मिलाकर पीये । (३) पार्श्व (पसलियों), बस्ति (मूत्राशय) और शिर मे वेदना होने पर लाल चावलों की पेया को गोखरू और छोटी कटेरी के साथ सिद्ध करके पीये । यह पेया फलदायक तथा ज्वरनाशक है । (४) ज्वर-अतिसार के रोगी को चाहिये कि पृश्निपर्णी (पिठवन), खरैटी, बेलगिरी, सोंठ, नीला कमल (कमलगट्टा) और धनिया इनसे सिद्ध पेया को अनार के रस से खट्टा करके पान करे । (५) ज्वर रोगी को यदि कास, श्वास, हिचकी आती हो तो विदारी- गन्धादि गण से सिद्ध पेया को पिये । यह पेया अग्निदीपक और पसीना लाने वाली है । (विदारीगन्धादि गण मे अभिप्राय स्वल्प पञ्चमूल से है, विदारी- गन्धा, पृश्निपर्णी, बृहती, छोटी कटेरी और गोखरू) । (६) ज्वर-रोगी को मल रूखा और बधा आता हो तो उसको चाहिये कि जौ, पिप्पली, और आंवलो से सिद्ध पेया मे घी डालकर पान करे । यह पेया दोषो का अनुलोमन करती है । (७) यदि कोष्ठ मे कब्ज हो तथा पेट मे दर्द हो तो मुनक्का, पिप्पलीमूल, चव्य, आंवला और सोंठ से साधित पेया पीवे । (८) ज्वर मे यदि परिकर्त्तिका (मलत्याग के समय कटने के समान पीडा) होती हो तो खरैटी, वृक्षाम्ल (तिन्तडीक, कोकम, समाकदाना), खट्टे

अ० ३ ] चिकित्सास्थानम् ३०३

अ० ३ ] चिकित्सास्थानम् ३०३ बेर, पृश्निपर्णी, और शालपर्णी इनसे साधित यवागू मे विल्व के चूर्ण का प्रक्षेप डाल कर पीवे । (६) जिस ज्वर मे रोगी का नींद और पसीना न आता हा, तथा प्यास लगती हो उसको सेंठ, आवले से साधित घी मे भूनी पेया को शर्करा डालकर देना चाहिये । यह पेया ज्वरनाशक हे । [ यवागू-पाक की पाक-विधि देश लोक मे प्रसिद्ध व्यवहार से देखनी चाहिये । तीक्ष्ण वीर्य द्रव्या से आधा कर्ष, मृदु द्रव्यो से एक पल लेना, मध्यम वीर्य द्रव्यो का दो कर्ष लेना चाहिये । यह रस- प्रधान द्रव्यो की विधि है । क्वाथ द्रव्य ४ पल, जल २ आढक, चतुर्थांश बचाना चाहिये । ] ॥ १७८-१८८ ॥ मुद्गांन्मसूरांश्चणकान् कुलत्थान् समकुष्ठकान् । यूषार्थे यूषसात्म्याना ज्वरिताना प्रकल्पयेत् ॥ १८६ ॥ ज्वर मे जिन पुरुषा का यूष सात्म्य ( अनुकूल ) हो, उनके यूष के लिये मूग, मसूर, चने, कुलत्थी आर मोठ इनका उपयोग करना चाहिये ॥ १८६ ॥ पटोलपत्र सफलं कुलक पापचेलिकाम् । कर्कोटकं कठिल्ल च विद्याच्छाक ज्वरे हितम् ॥१६० ॥ ज्वर रोगी के शाक के लिये परवल के पत्ते, परवल का फल, कुलक ( पर- वल भेद, या करेला ), पापचेलिका ( पाठा ), कर्कोटक ( ककोड़ा ), कठिल्लक ( लाल पुनर्नवा ) देना चाहिये । इनका शाक हितकारी है ॥ १६० ॥ लावान् कपिञ्जलानेणांश्चकोरानुपचक्रकान् । कुरङ्गान कालपुच्छांश्च हरिणान्पृषतान् शशान् ॥ १६१ ॥ कुक्कुटांश्च मयूरांश्च तित्तिरिक्रौञ्चवर्तकान् । प्रदद्यान्माससात्म्याय ज्वरिताय ज्वरापहान् ॥ १६२ ॥ ईषदम्लाननम्लान्वा रसान् काले विचक्षणः । गुरूष्णत्वान्न शसन्ति ज्वरे केचिच्चिकित्सकाः ॥ १६३ ॥ लंघनेनानिलबलं ज्वरे यद्यधिकं भवेत् । भिषग् मात्रविकल्पज्ञो दद्यात्तानपि कालवित् ॥ १६४ ॥ जिस ज्वर के रोगी को मास रस का सात्म्य ( अनुकूलता ) हो उसके लिये- बटेर, कपिंजल (श्वेत तीतर ), एण ( काला हरिण ), चकार, उपचक्रक ( चकोर का भेद ), कुरग, कालपुच्छ, हरिण और पृषत ( हरिण भेद ) और खरगोश इनके मास से रस बनाकर देना चाहिये । इस मास रस को अनार के रस आदि से खट्टा करके या बिना खट्टा बनाये देना चाहिये । यह मास रस ज्वरनाशक है । कई चिकित्सको की सम्मति हे कि मुर्गा, मोर, तीतर, क्रौंच, बत्तक पक्षियो

३०४ चरकसंहिता [ अ० ३ का मांस गुरु और उष्ण है, इसलिये इनका उपयोग ज्वर मे नही करना चाहिये। परन्तु यदि ज्वर मे उपवास के कारण वायु का बल प्रबल हो जाये तो मात्रा और विकल्पो को जानने वाले वैद्यको चाहिये कि इनका भी प्रयोग करे ॥१६४॥ घर्माम्बु चानुपानार्थं तृषिताय प्रदापयेत् । मद्यं वा मद्यसात्म्याय यथादोषं यथाबलम् ॥ १६५ ॥ गुरूष्णस्निग्धमधुरकषायांश्च नवज्वरे । ज्वर मे प्यास लगने पर उपरोक्त आहार के अनुपान मे गरम पानी देना चाहिये। जिस रोगी को मद्य-सात्म्य हो, उसका दोष और बल के अनुसार मद्य देना चाहिये ॥ १६५ ॥ आहारान् दोषपक्त्यर्थं प्रायशः परिवर्जयेत् ॥ १६६ ॥ अनुपानक्रमः सिद्धो ज्वरघ्नः संप्रकाशितः । नवज्वर (तरुण ज्वर) मे दोषो के पाचन के लिये गुरु, उष्ण, स्निग्ध, मधुर और कषाय रस वाले भोजनो का प्राय करके त्याग कर देना चाहिये । इस प्रकार से ज्वरनाशक और फलप्रद अनुपान क्रम कह दिया ॥ १६६ ॥ अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यन्ते कषाया ज्वरनाशनाः ॥ १६७ ॥ पाक्यं शीतकषायं वा मुस्तपर्पटकं पिबेत् । सनागरं पर्पटकं पिबेद्वा सदुरालभम् ॥ १६८ ॥ किराततिक्तकं मुस्तं गुडूचीं विश्वभेषजम् । पाठामुशीरं सोदीच्यं पिबेद्वा ज्वरशान्तये ॥ १६६ ॥ ज्वरघ्ना दीपनाश्चैते कषाया दोषपाचनाः । तृष्णाऽरुचिप्रशमना मुखवैरस्यनाशनाः ॥ २०० ॥ पटोलं सारिवां मुस्तं पाठां कटुकरोहिणीं । कलिङ्गकाः पटोलस्य पत्रं कटुकरोहिणी ॥ २०१ ॥ निम्बः पटोलस्त्रिफला मृद्वीका मुस्तवत्सकौ । किराततिक्तममृता चन्दनं विश्वभेषजम् ॥ २०२ ॥ गुडूच्यामलकं मुस्तमर्धश्लोकसमापनाः । कषायाः शमयन्त्याशु पञ्च पञ्चविधाञ्ज्वरान् ॥ २०३ ॥ सन्ततं सततमन्येद्युस्तृतीयकचतुर्थकान् । वत्सकारग्वधं पाठां षड्ग्रन्थां कटुरोहिणीम् ॥ २०४ ॥ मूर्वां सातिविषां निम्बं पटोलं धन्वयासकम् । वचां मुस्तमुशीराणि मधुकं त्रिफलां बलाम् ॥ २०५ ॥

अ० ३ ] २० चिकित्सास्थानम् ३०५

अ० ३ ] २० चिकित्सास्थानम् ३०५ पाक्यं शीतकषायं वा पिबेज्ज्वरहरं नरः । मधूकमूस्तमृद्वीकाकाश्मर्याणि परूषकम् ॥ २०६ ॥ त्रायमाणामुशीराणि त्रिफला कटुरोहिणीम् । पीत्वा निशिस्थितं जन्तुर्ज्वराच्छीघ्रं विमुच्यते ॥ २०७ ॥ बृहत्यौ वत्सकं मुस्तं देवदारु महौषधम् । कोलपल्ली च योगोऽय सन्निपातज्वरापहः ॥ २०८ ॥ जात्यामलकमुस्तानि तद्वद्धन्वयवासकम् । विबद्धदोषो ज्वरितः कषाय सगुड पिवेत् ॥ २०९ ॥ त्रिफला त्रायमाणा च मृद्वीका कटुरोहिणीम् । पित्तश्लेष्महरस्त्वेषा कषायो ह्यानुलोमिकः ॥ २१० ॥ त्रिवृताशर्करायुक्तः पित्तश्लेष्मज्वरापहः । शटी पुष्करमूलं च व्याघ्री शृङ्गी दुरालभा ॥ २११ ॥ गुडूची नागर पाठा किरात कटुरोहिणी । एष शट्यादिको वर्गः सन्निपातज्वरापहः ॥ २१२ ॥ कासहृद् ग्रहपार्श्वार्त्तिश्वासतन्द्रासु शस्यते । बृहत्यौ पुष्कर भार्गी शटी शृङ्गी दुरालभा ॥ २१३ ॥ वत्सकस्य च बीजानि पटोल कटुरोहिणी । बृहत्यादिर्गणः प्रोक्तः संनिपातज्वरापहः ॥ २१४ ॥ कासादिषु च सर्वेषु दद्यात्सोपद्रवेषु च । कषायाश्च यवाग्वश्च पिपासाज्वरनाशनाः ॥ २१५ ॥ निर्दिष्टा भेषजाध्याये भिषक्तानपि योजयेत् । इसके आगे ज्वरनाशक कषायो का उपदेश करते हे । (१) मोथा, पित्तपापडा, (पित्त ज्वर मे), २—साठ, पित्तपापडा (पित्त प्रधान ज्वर मे) । ३—पित्तपापडा और दुरालभा (मन्दाग्नियुक्त पित्त कफ मे) । ४ चिरा- यता, मोथा, गिलोय और सांठ (शीतप्राय ज्वर मे) । ५-पाठा, उशीर, उदीच्य नेत्रबाला (दाहप्रधान ज्वर मे) । इनका क्वाथ या शीत कषाय ज्वर की शान्ति के लिये रोगी को देना चाहिये । १ ये कषाय ज्वरनाशक, अग्निदीपक, १आचार्य ने कोई भेद नहीं किया है । इसलिये गगाधर सेन तो तीन योग मानते है । प्रथम योग पूर्व के समान, दूसरा योग सोंठ, पित्तपापड़ा और दुरालभा तक । तीसरा योग सात द्रव्यो का पाठा-सप्तक है । जतुकर्ण ने चौथे और पाचवे को एक ही योग माना है। चिरायता आदि को सप्तक माना है ।

३०६ चरकसंहिता [ अ० ३ दोषो को पचाने वाले, तृष्णा अरुचि को नष्ट करते है और मुख की विरसता को मिटाते है । ( २ ) पाच कषाय - १-इन्द्रजौ, परवल, कुटकी । २-परवल, सारिवा, नागरमोथा, पाठा, कुटकी । ३-नीम की छाल, परवल, त्रिफला, मुनक्का नागरमोथा, इन्द्रजौ । ४-चिरायता, गिलोय, लाल चन्दन, सोठ । ५-गिलोय, आवला और मोथा ये आवे श्लोक पर समाप्त होने वाले पाच कषाय क्रमश सन्तत, सतत, अन्येद्युष्क, तृतीयक और चतुर्थक पाचो प्रकार के ज्वरो को नष्ट करते है । ( ३ ) इन्द्रजौ, अमलतास, पाठा, श्वेत वच, कुटकी, मूवो, अतीस, नीम, परवल, बमासा, वच, नागरमोथा, खस, मुलहठी, त्रिफला और बला, इनका क्वाथ या शीत कषाय ज्वरनाशक हे । [ कई आचार्य कुटकी तक एक योग, बमासा तक दूसरा ओर बला तक तीसरा योग मानते है । षड्ग्रन्था से श्वेत वच लेनी चाहिये । ] ( ४ ) महुवे के फूल, मोथा, मुनक्का, गम्भारी की छाल, फालसा, त्रायमाणा, खस, त्रिफला, कुटकी इनको कूट कर रात्रि मे भिगो देना चाहिये । प्रात काल छानकर पीना चाहिये । इसके पीने से ज्वर शीघ्र नष्ट होता है । ( ५ ) छोटी और बडी कटेरी दोना, इन्द्रजौ, मोथा, देवदारु, कोल वल्ली ( चबिका या गज पीपल ) इनका क्वाथ सन्निपात ज्वर को नष्ट करता है । ( ६ ) जाती ( चमेली के पत्ते ), आवला, मोथा, धमासा इनके क्वाथ मे गुड डालकर पीने से रुके हुए दोष शान्त होते है । ( ७ ) त्रिफला, त्रायमाणा ( इन्द्रायण की जड ), मुनक्का, कुटकी, इनका क्वाथ पित्त-कफज्वर को नष्ट करता है । परन्तु यदि मलावरोध हो तो इस क्वाथ मे निशोथ ओर मिलाकर क्वाथ करके इसमे शर्करा मिलाकर पीना चाहिये । वह क्वाथ पित्त- कफज्वर का नाशक तथा मल और वायु का अनुलोमन करता है । ( ८ ) शटी ( कचूर ) पोहकरमूल, छोटी कटेरी, काकडसिंगी, दुरालभा, गिलोय, सोठ, पाठा, चिरायता, कुटकी यह शट्यादि वर्ग है । इससे सन्निपात ज्वर, कास, हृदयरोग, पार्श्व-शूल, श्वास, तन्द्रा नष्ट होती है । इसका क्वाथ प्रयोग करना चाहिये । ( ६ ) बृहत्यादि गण-छोटी और बडी कटेरी दोनो, पोहकरमूल, भार्गी, कचूर, काकडाशृगी, दुरालभा, इन्द्रजौ, परवल कुटकी इनका क्वाथ सन्निपात ज्वर का नाशक तथा कास आदि से युक्त ज्वर मे देना चाहिये । सूत्रस्थान के भेषजचतुष्क अध्यायो मे पिपासा और ज्वर को नाश करने वाले जो कषाय और यवागू कहे है, उनका भी विवेचनापूर्वक प्रयोग वैद्य को करना चाहिये ॥ १६७-२१५ ॥ जैजट ने दो योग माने हैं। चिरायता, मोथा, गिलोय और सोठ को 'चातुर्भद्र' भी कहते है । इनको पृथक् २ या मिलाकर भी प्रयुक्त कर सकते है ।

अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् ३०७

अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् ३०७ ज्वराः कषायैर्वमनर्लङ्घनैर्लघुभोजनैः ॥ २१६ ॥ रूक्षस्य ये न शाम्यन्ति सर्पिस्तेषां भिषग्जितम् । रूक्षं तेजो ज्वरकरं तेजसा रूक्षितस्य च ॥ २१७ ॥ यः स्यादनुबलो धातुः स्नेहसाव्यः स चानिलः । कषायाः सर्व्व उच्चैस्ते सर्पिषा सह योजिनाः ॥ २१८ ॥ प्रयोज्या ज्वरशान्त्यर्थमग्निसंधुक्षणाः शिवाः । रूक्ष शरीर वाले रोगी का जो ज्वर कषाय, वमन, लङ्घन, लघु भोजन से शान्त नहीं होते, उनके लिये घृत का प्रयोग करना चाहिये । ऐसे रोगियों की औषध घी है । ज्वर को उत्पन्न करने वाला तेज ( पित्त ) रूक्ष होता है, तेज के कारण रोगी का शरीर भी रूक्ष हो जाता है । रूक्षता के कारण जो धातु पीछे से बलवान् हो जाता है, वह वायु घी से ही शान्त होता है । स्नेह से ही वायु और पित्त दोनों शान्त होते हैं । प्रथम कहे हुए कषायों का घी के साथ प्रयोग करना चाहिये । इस प्रकार प्रयोग करने से ज्वर शान्त होता है, अग्नि प्रवल होती है और ये कषाय हितकारी हैं ॥ २१६-२१८ ॥ पिप्पलीचन्दनं मुस्तमुशीरं कटुरोहिणी ॥ २१९ ॥ कलिङ्गकस्तामलकी सारिवाऽतिविषा स्थिरा । द्राक्षामलकबिल्वानि त्रायमाणा निदिग्धिका ॥ २२० ॥ सिद्धमेतैर्घृतं सद्यो जीर्णज्वरमपोहति । क्षयं कासं शिरःशूलं पार्श्वशूलं हलीमकम् ॥ २२१ ॥ अंसाभितापमग्निं च विषमं संनियच्छति । पिप्पल्यादि घृत—पिप्पली, लाल चन्दन, मोथा, खस, कुटकी, इन्द्र, जौ, भुई आंवला, सारिवा, अतीस, शालपर्णी, द्राक्षा, आंवला, बेलगिरी, त्रायमाणा, छोटी कटेरी इनसे सिद्ध घृत जीर्ण ज्वर को शीघ्र नष्ट करता है । क्षय, कास, शिरोवेदना, पार्श्वशूल, हलीमक, असामिताप और विषम अग्नि को नष्ट करता है । [ यह घृत सुश्रुत और चिकित्सा-कलिका आदि मे कुछ थोडे से परिवर्त्तन से आया है । यहा पर घृत का पाक पिप्पल्यादि के कल्क से ही अथवा इनके कल्क तथा क्वाथ दोनो से सिद्ध करने की परिपाटी है । कही कहीं पर इसमे दूध का भी योग होता है ] । [ घृतपाक मे—प्रथम घी का सम्मूर्च्छन करना चाहिये । इसके लिये घी को आग पर गरम करना चाहिये । जब झाग रहित हो जाये तब इसमे नीचे उतार कर हरड, बहेडा, आवला, मोथा, हल्दी इनका कल्क, बिजौरे का रस एक

३०८ चरकसंहिता [ अ० ३ पल, पानी ८ प्रस्थ मे घोल कर घी १ प्रस्थ मे मिलाना चाहिये फिर पकाना चाहिये । मन्द मन्द आग पर पकाने से जब थोडा सा पानी रह जाये तब उतार लेना चाहिये । इसमे आम दोष नष्ट हो जाता है । इसको क्वाथ मे मिलाना चाहिये । इस घृत को पिप्पल्यादि क्वाथ ओर कल्क से दूब के साथ सिद्ध किया जाये तो अधिक उत्तम होगा ] ॥ २१६-२२१ ॥ वासा गुडूची त्रिफला त्रायमाणा यवासकम् ॥ २२२ ॥ पक्त्वा तेन कषायेण पयसा द्विगुणेन च । पिप्पलीमुस्तमृद्वीकाचन्दनोत्पलनागरैः ॥ २२३ ॥ कल्कीकृतैश्च विपचेद्घृतं जीर्णज्वरापहम् । वासाद्य घृत—वासा, गिलोय, त्रिफला, त्रायमाण, जवासा इनके क्वाथ से दुगने (घी से) गाय के दूध के साथ, पिप्पली, माथा, मुनक्का, लाल चन्दन, नीला कमल और सोठ इनके कल्क से घृतपाक करना चाहिये । यह घृत जीर्ण ज्वर को नष्ट करता है । [ गव्य घृत २ प्रस्थ, वासामूल त्वक् का कपाय ४ प्रस्थ, दूध ४ प्रस्थ, कल्क १ शराव । अथवा कपाय आठ प्रस्थ, दूध ४ प्रस्थ, घी २ प्रस्थ, कल्क १ शराव लेकर भी घृत सिद्ध किया जा सकता है ॥ २२२-२२३ ॥ बला श्वदंष्ट्रा बृहती कलसी धावनी स्थिराम् ॥ २२४ ॥ निम्बं पर्पटक मुस्तं त्रायमाणा दुरालभाम् । कृत्वा कपाय पेष्यार्थे दद्यात्तामलकी शटीम् ॥ २२५ ॥ द्राक्षा पुष्करमूलं च मेदामामलकानि च । घृत पयश्च तत्सिद्धं सर्पिर्ज्वरहरं परम् ॥ २२६ ॥ क्षयकासशिरःशूलापार्श्वशूलासतापनुत् । ज्वरिभ्यो बहुदोषेभ्य ऊर्ध्व चाधश्च बुद्धिमान् ॥ २२७ ॥ दद्यात्संशोधनं काले कल्पे यदुपदेक्ष्यते । बलाद्य घृत—बला (खरैटी), गोखुरू, बडी कटेरी, पृश्निपर्णी, कण्टकारी, शालपर्णी, नीम की छाल, पित्तपापडा, मोथा, त्रायमाणा, दुरालभा इनका क्वाथ ८ प्रस्थ, कल्कार्थ, भूम्यामलकी, कचूर, मुनक्का, पोहकरमूल, मेदा, आवला, मिलित १ शराव, दूध, घृत के सम-परिमाण २ प्रस्थ, घी २ प्रस्थ यथाविधि लेकर पाक करना चाहिये । [कई आचार्य यहा पर घृत से द्विगुण दूध लेते है]। यह घृत ज्वर को नष्ट करता है । क्षय, कास, शिरोवेदना, पार्श्वशूल और अस- वेदना को नष्ट करता है । ज्वर के रोगियों मे यदि दोष की मात्रा अधिक हो तो बुद्धिमान् वैद्य को चाहिये कि कल्पस्थान मे वर्णित सशोधनों (वमन और विरेचनों) को समय २ पर देवे ॥ २२४-२२७

अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् ३०६

अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् ३०६ मदनं पिप्पलीभिर्वा कलिङ्गैर्मधुकेन वा ॥ २२८ ॥ युक्तमुष्णाम्बुना पेय वमनं ज्वरशान्तये । क्षौद्राम्बुना रसेनेक्षोरथवा लवणाम्बुना ॥ २२६ ॥ ज्वरे प्रच्छर्दनं शस्तं मद्यैर्वा तर्पणेन वा । वमन के योग—(१) मैनफल को पिप्पली के साथ, (२) मैनफल को इन्द्रजौ के साथ, (३) मैनफल को मुलहठी के साथ, गरम जल के अनुपान से ज्वर-रोगी को वमन देना चाहिये । अथवा पानी के स्थान पर शहद मिला पानी, गन्ने का रस, नमक मिला पानी या मद्य वा लाजा सत्तूओ से तर्पण, दोष और रोगी के बलाबलानुसार प्रयोग करे ॥ २२८-२२६ ॥ मृद्वीकामलकाना वा रस प्रस्कन्दनं पिबेत् ॥ २३० ॥ रसमामलकानां वा घृतभृष्टं ज्वरापहम् । लिह्याद्वा त्रिवृत चूर्णं संयुक्तं मधुसर्पिषा ॥ २३१ ॥ पिबेद्वा क्षौद्रमासाद्य सघृत त्रिफलारसम् । आरग्वध वा पयसा मृद्वीकाना रसेन वा ॥ २३२ ॥ त्रिवृता त्रायमाणा वा पयसा ज्वरितः पिबेत् । ज्वराद्विमुच्यते पीत्वा मृद्वीकाभिः सहाभयाम् ॥ २३३ ॥ पयोऽनुपानमुष्णं वा पीत्वा द्राक्षारसं नरः । कासाच्छ्वासाच्छिरःशूलात्पार्श्वशूलाच्चिरज्वरात् ॥ २३४ ॥ मुच्यते ज्वरितः पीत्वा पञ्चमूलशृतं पयः । विरेचन के योग—अंगूरों का रस (द्राक्षा का क्वाथ) और आवले का रस मिलाकर विरेचन के लिये पीना चाहिये, या आवलों के रस को घी मे भून कर पीना चाहिये । इससे ज्वर नष्ट होता है । अथवा निशोथ के चूर्ण को घी और शहद के साथ चाटना चाहिये । अथवा त्रिफला के क्वाथ (रस) मे घी ओर मधु मिलाकर पीना चाहिये । अथवा अमलतास के गुदे को दूध के साथ खाना चाहिये । निशोथ या त्रायमाण के चूर्ण को दूध के साथ पीना चाहिये । हरड के साथ ३ गूरों को या द्राक्षाओ को देना चाहिये । अथवा द्राक्षा रस को पीकर पीछे से गरम पानी पीना चाहिये, इससे ज्वर छूट जाता है । पञ्चमूल (कटेरी, बडी कटेरी, शालिपर्णी पृश्निपर्णी और गोखरू अथवा बृहत्पञ्चमूल) के क्वाथ के साथ सिद्ध किया हुआ दूध, कास, श्वास, शिरो- वेदना, पार्श्वशूल और पुरातन ज्वर को नष्ट करता है१ ॥ २३०-२३४ ॥ १ पञ्चमूल २ तोले, दूध १६ तोले, पानी ६४ तोले इसमे से दूध बचाना चाहिये ।

३१० चरकसंहिता [ अ० ३

एरण्डमूलोत्कथितं ज्वरात्सपरिकर्तिकात् ॥ २३५ ॥
पयो विमुच्यते पीत्वा तद्वद्विल्वशलाटुभिः ।
ज्वर में परिकर्तिका साथ हो तो एरण्ड-मूल के क्वाथ से साधित दूध अथवा
बेलगिरी (कच्ची) से साधित दूध पीवे । मल त्याग से पीडा होती हो तो इनका
क्वाथ देवे ॥ २३५-॥
त्रिकण्टकवलाव्याघ्रीगुडनागरसाधितम् ॥ २३६ ॥
वर्चोमूत्रविवन्धघ्नं शोफज्वरहरं पयः ।
त्रिकण्टकाद्य दूध—गोखरू, खरैंटी, छोटी कटेरी, गुड, सोंठ इनसे साधित
गाय का दूध मल मूत्र के अवरोध का, सूजन का ओर ज्वर को नष्ट करता है ॥२३६॥
सनागरं समृद्वीकं सघृतक्षौद्रशर्करम् ॥ २३७ ॥
शृतं पयः सखर्जूरं पिपासाज्वरनाशनम् ।
चतुर्गुणेनाम्भसा वा शृतं ज्वरहरं पयः ॥ २३८ ॥
धारोष्णं वा पयः सद्यो वातपित्तज्वरं जयेत् ।
सोंठ, मुनक्का और खजूर इनके कल्क से यथाविधि साधित दूध में गाय
का घी, शर्करा और मधु (ठण्डा होने पर) मिला कर पीने से प्यास तथा
ज्वर नष्ट होता है । चौगुने जल में सिद्ध किया दूध अथवा धारोष्ण दूध शीघ्र
ही वात-पित्त ज्वर को नष्ट करता है ॥ २३७-२३८ ॥
जीर्णज्वराणां सर्वेषां पयः प्रशमनं परम् ॥ २३६ ॥
पेयं तदुष्णं शीतं वा यथास्वं भेषजैः शृतम् ।
सब प्रकार के पुरातन ज्वरों में दूध का प्रयोग करना उत्तम है। दूध को
गरम या ठण्डा करके और यथादोष ओषधियो से सिद्ध करके देवे ॥ २३६ ॥
प्रयोजयेज्ज्वरहरान्निरूहान् सानुवासनान् ॥ २४० ॥
पक्वाशयगते दोषे वक्ष्यन्ते ये च सिद्धिषु ।
पक्वाशय (बृहदन्त्र) में स्थित दोषों को निकालने के लिये सिद्धिस्थान
में कहे ज्वरनाशक निरूह और अनुवासन बस्तियों का प्रयोग करे ॥ २४० ॥
पटोलारिष्टपत्राणि सोशीरंश्वतुरङ्गुलः ॥ २४१ ॥
ह्रीबेरं रोहिणी तिक्ता श्वदंष्ट्रा मदनानि च ।
स्थिरा बला च तत्सर्वं पयस्यर्धोदके शृतम् ॥ २४२ ॥
क्षीरावशेषं निर्यूहं सयुक्तं मधुसर्पिषा ।
कल्कैर्मदनमुस्तानां पिप्पल्या मधुकस्य च ॥ २४३ ॥
वत्सकस्य च संयुक्तं बस्तिं दद्याज्ज्वरापहम् ।

अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् ३११

शुद्धे मार्गे हृते दोषे विप्रसन्नेषु धातुषु ॥ २४४ ॥ गताङ्गशूलो लघ्वङ्गः सद्यो भवति विज्वरः । पटोलाद्य बस्ति—परवल, नीम के पत्ते, खस, अमलतास, हीवेर ( नेत्र- वाला ), कुटकी, गोखरू, मैनफल, शालिपर्णी और बला इनको आधे जलमि- श्रित दूध मे डाल कर पकाना चाहिये । जब केवल दूध शेष रह जाये तब इस क्वाथ मे घी और मधु, मैनफल, नागरमोथा, पिप्पली, मुलहठी, इन्द्रजौ इनके कल्क से बस्ति सिद्ध करनी चाहिये । यह ज्वर को नष्ट करती है । मार्ग के शुद्ध होने पर और दोषो के निकल जाने पर, धातुओ के निर्मल होने पर मनुष्य ज्वररहित हो जाता है । अगो की वेदना नष्ट हो जाती है, अग लघु हो जाते है, ज्वर शीघ्र नष्ट होता है । [इस क्वाथ मे दूध के बराबर पानी मिलाना चाहिये। क्वाथ द्रव्यो से आठ गुणा जल उतना ही दूध मिलाना चाहिये।] ॥२४१-२४४॥ आरग्वधमुशीराणि मदनस्य फलानि च ॥ २४५ ॥ चतस्रः पर्णिनीश्चैव निर्यूहमुपकल्पयेत् । प्रियङ्गुर्मदनं मुस्तं अताह्वा मधुयष्टिका ॥ २४६ ॥ कल्कः सर्पिर्गुडः क्षौद्रं ज्वरघ्नो बस्तिरुत्तमः । आरग्वधादि बस्ति—अमलतास, खस, मैनफल, चारो पर्णिया ( माष- पर्णी, मूगपर्णी, शालपर्णी और पृश्निपर्णी ) इनके क्वाथ बनावे । इस क्वाथ मे फूल प्रियगु, मैनफल, नागरमाथा, सौफ, मुलहठी इनका कल्क डाले । घी और गुड तथा शहद मिलावे यह ज्वर नाशक उत्तम बस्ति है ॥ २४५-२४६ ॥ गुडूचीं त्रायमाणा च चन्दनं मधुक वृषम् ॥ २४७ ॥ स्थिरा बला पृश्निपर्णी मदनं चेति साधयेत् । रसं जाङ्गलमांसस्य रसेन सहितं भिषक् ॥ २४८ ॥ पिप्पलीफलमुस्तानां कल्केन मधुकस्य च । ईषत्सलवणं युक्त्या निरूहं मधुसर्पिषा ॥ २४९ ॥ ज्वरप्रशमनं दद्याद्बलस्वेदरुचिप्रदम् । गुडूच्यादि निरूह—गिलोय, त्रायमाणा, लाल चन्दन, मुलहठी, बासे की मूल की छाल, स्थिरा ( शालपर्णी ), खरैंटी, पृश्निपर्णी, मैनफल इनका क्वाथ सिद्ध करे । इस क्वाथ मे जगल मास का रस और पिप्पली, मैनफल, नागर- मोथा, मुलहठी इनका कल्क डाले । इसमे युक्तिपूर्वक थोडा नमक, घी और मधु भी मिलावे । यह बस्ति ज्वरनाशक, बल, स्वेद को बढाने वाला और रुचिकर है । [ अष्टाग-संग्रह के अनुसार गिलोय आदि क्वाथ द्रव्यो के साथ ही मास का पाक करे । पृथक् मासरस सिद्ध नही करे ] ॥ २४७-२४९ ॥

३१२ चरकसंहिता [ अ० ३ जीवन्ती मधुकं मेदां पिप्पली मरिचं वचाम् ॥ २५० ॥ ऋद्धि रास्ना बलां विश्व शतपुष्पा शतावरीम् । पिष्ट्वा क्षीर जल सर्पिस्तैल च विपचेद्विपक् ॥ २५१ ॥ आनुवासनिकं स्नेहमेतद्विद्याज्ज्वरापहम् । जीवन्त्याद्यनुवासन—जीवन्ती, मुल्हठी, मेदा, पिप्पली, मरिच, वच, ऋद्धि, रास्ना, खरैटी, सोंठ, सौंफ, शतावरी, इनके कल्क के साथ दूध, घी, जल और तैल पकावे । यह अनुवासन वस्ति ज्वर का नष्ट करती है ॥२५१-॥ पटोलपिचुमर्दाभ्या गुडूच्या मधुकेन च ॥ २५२ ॥ मदनैश्च शृतः स्नेहो ज्वरङ्गमनुवासनम् । पटोल पत्र, नीम की छाल, गिलोय, मुल्हटी, मैनफल इनसे साधित स्नेह अनुवासन रूप मे प्रयोग करने से ज्वर को नष्ट करता है ॥ २५२ ॥ चन्दनागुरुकान्मर्यपटोलमधुकोत्पलैः ॥ २५३ ॥ सिद्धः स्नेहो ज्वरहरः स्नेहवरितः प्रयुज्यते । लाल चन्दन, अगर, गम्भारी, परवल, मुल्हठी, नीला कमल, इनसे सिद्ध स्नेह अनुवासन-रूप मे प्रयोग करने से ज्वर को नष्ट करता है ॥ २५३ ॥ यदुक्तं भेषजाध्याये विमाने रोगभेषजे ॥ २५४ ॥ शिरोविरेचनं कुर्याद् युक्तिज्ञस्तज्ज्वरापहम् । यच्च नावनिकं तैलं याश्च प्राग्घूमवर्त्तयः ॥ २५५ ॥ मात्राशितीये निर्दिष्टाः प्रयोज्यास्ता ज्वरेष्वपि । भेषज-चतुष्क अध्यायो मे और विमानस्थान के रोगभेषज प्रकरण मे जो शिरोविरेचन कहे है, उन ज्वरनाशक शिरोविरेचनो का भी युक्ति को समझने वाला वैद्य ही प्रयोग करे । मात्राशितीय अध्याय मे जो नावनिक तैल ( अणु तैल ) और शिरोविरेचन के लिये धूम-वर्त्तिया कही है, उनका भी ज्वर मे प्रयोग करे ॥ २५४-२५५ ॥ अभ्यङ्गाश्च प्रदेहाश्च परिषेकाश्च कारयेत् ॥ २५६ ॥ यथाभिलापं शीतोष्ण विभज्य द्विविधं ज्वरम् । १ कविराज गगाधर सेन मरिच के स्थान पर 'मदन' पढते है । अष्टाग- सग्रह मे भी यही पाठ है । अष्टाग-सग्रह के टीकाकार इन्दु के अनुसार दूध, जल, घी और तिल-तैल चारो समान चाहिये । चक्रपाणि के अनुसार दूध, घी और तेल समान, जल तीन गुना और कल्क चतुर्थाश होना चाहिये । इस प्रकार से जल और दूध स्नेह से चौगुना हो जाते है । तैल और घी बराबर- बराबर या दोष की अपेक्षा से कम अधिक ले सकते है ।