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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्‌। ) द्द्द्द्द्द्द्द्दद्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्

१२६ चरकसंहिता [ अ० ८ सर्पिस्तैलाभ्यामभ्यज्य वेष्टयेदुदरं महता वाससा, तथा 'तस्या न वायु- रुदरे विकृतिमुत्पादयत्यनवकाशत्वात् । जीर्णे तु स्नेहे पिप्पल्यादिभिरेव सिद्धा यवागू सुस्निग्धा द्रवा मात्रशः पाययेत्, उभयतः कालमच्छेन चोष्णोदकेन परिषेचयेत्प्राक्स्नेहयवागूरानाभ्याम् । एव पञ्चरात्रं सप्तरात्रं वानुपाल्य ततः क्रमेणाप्याययेत् । स्वस्थवृत्तमेतावत्सूतिकायाः ॥ ४९ ॥ जच्चा स्त्री को भूख लगने पर शक्ति के अनुसार खूब यत्न से स्नेहपान कराना चाहिये । घी, तैल, वसा या मज्जा ५ जो स्नेह जच्चा के प्रकृति के अनुकूल हो, उसके साथ पिप्पलीमूल, चविका, चित्रक और सोंठ का चूर्ण मिला कर देना चाहिये । स्नेहपान करते समय पेट पर घी या तैल मल कर भारी वस्त्र लपेट देना चाहिये । इस प्रकार करने से उदर में वायु विकार उत्पन्न नहीं होते, क्योंकि वायु को अवकाश नहीं मिलता । स्नेह के जीर्ण होने पर पिप्पलीमूल आदि से सिद्ध की हुई, घृत युक्त, पतली यवागू को थोड़ी मात्रा में प्रातः और सायं दोनो समय देना चाहिये । स्नेह और यवागू पिलाने से पूर्व निर्मल गरम पानी से स्नान करवा देना चाहिये । इस प्रकार पांच या सात रात्रि तक इस विधि को बरत कर पीछे क्रम से [ साधारण आहार-विहार ] बढ़ाना चाहिये । यह सूतिका स्त्री का स्वस्थवृत्त है ॥ ४९ ॥ तस्यास्तु खलु यो व्याधिरुत्पद्यते स कृच्छ्रसाध्यो भवत्यसाध्यो वा गर्भवृद्धि क्षयित-शिथिल-सर्वशरीर-धातुत्वात्प्रवाहण-वेदना-क्लेदन-रक्त- निःस्रुति-विशेष-शून्य-शरीरत्वाच्च, तस्मात्ता यथोक्तेन विधिनोपचरत् । भौतिक जीवनीय-बृहणीय-मधुर-वातहर-सिद्धैरभ्यङ्गोत्सादन-परिषेका- वगाहनान्नपान-विधिभिर्विशेषतश्चोपचरेत् । विशेषतो हि शून्यशरीराः स्त्रियः प्रजाता भवन्ति ॥ ५० ॥ प्रसूता स्त्री को विपरीत आहार विहार के कारण जो रोग उत्पन्न हो जाता है, वह कष्टसाध्य अथवा असाध्य होता है । क्योंकि गर्भ की वृद्धि के कारण अन्य धातुओं का पोषण न होने से सब धातु क्षीण और शिथिल हो जाते हैं । इसी प्रकार गर्भ के प्रवाहण के कारण उत्पन्न वेदना, क्लेदन ( स्राव ), तथा रक्त के विशेष रूप में निकलने से सम्पूर्ण शरीर शून्य, नि सज्ञ बना होता है । भूतहर गुग्गुलु, महापैशाचादि घृत, जीवनीय, बृहणीय, मधुर और वातहर ओषधियों से सिद्ध स्नेह-पान, अभ्यग, उत्सादन, परिषेक, अवगाहन, खान- पान विधि विशेष रूप से बरतनी चाहिये । इस विधि के सेवन से अचेत हुई स्त्रियों में भी चेतना आ जाती है ॥ ५० ॥

अ० ८] शारीरस्थानम १२७

अ० ८] शारीरस्थानम १२७ दशम्यां निश्यतीताया सपुत्रा स्त्री सर्वगन्धोषधैर्गौरसर्षपैश्च स्नाता लघ्वहतशुचिवस्त्रं परिधाय पवित्रेट्ट लघु-विचित्र-भूषणवती च संस्पृश्य मङ्गलान्युचितामर्चयित्वा च देवता शिखिनः शुक्लवाससोऽव्यङ्गांश्च ब्राह्मणान् स्वस्ति वाचयित्वा, कुमारमहतेन शुचिवाससाऽऽच्छादयेत् प्राक्शिरसमुदक्शिरसं वा सवेश्य, 'देवतापूर्वं द्विजातिभ्यः प्रणमती'- त्युक्त्वा, कुमारस्य पिता द्वे नामनी कारयेन्नाक्षत्रिकं नामाभिप्रायिकं च । तत्राभिप्रायिकं नाम घोषवदाद्यन्तस्थान्तमूष्मान्तं वा वृद्धत्रिपु- रुषानुकमनवप्रतिष्ठितं, नाक्षत्रिकं तु नक्षत्र-देवतासमानाख्यं द्व्यक्षरं चतुरक्षरं वा ॥ ५१ ॥ दसवें दिन स्त्री पुत्र के साथ सम्पूर्ण गन्ध युक्त ओषधियों से तथा श्वेत सरसों के उबटन से स्नान करके लघु (हल्के), नवीन और पवित्र वस्त्र को धारण करे । पवित्र, मन चाहे लघु, विचित्र आभूषणों को धारण करे । मङ्गल जनक (घी, दही आदि) वस्तुओं को स्पर्श करके, इष्ट देव की पूजा करके शिखा वाले, शुक्ल वस्त्र पहिने, व्यङ्गरहित, शोभन आकृतिवाले ब्राह्मणों से स्व- स्ति पाठ करावे, कुमार के लिये नवीन वस्त्रों का सङ्ग्रह करे । शिशु का सिर पूर्व दिशा अथवा उत्तर दिशा की ओर करके, कहे कि बालक देवा और विद्वानों को नमस्कार करता ह ऐसा कह कर शिशु का पिता नक्षत्र देवता वाला [ जिस नक्षत्र में कुमार उत्पन्न हुआ है उस नक्षत्र के सकेत वाला ] शिशु का नाम करे । बच्चे के दो प्रकार के नाम करे, एक नक्षत्र-देवता के नाम पर और दूसरा अभिप्राय अर्थात् अर्थयुक्त । इनमें अभिप्राय वाला नाम घोषवर (वर्ग का चौथा अक्षर-घ, झ, ढ, ध, भ,), अन्तस्थ (य र ल व ) और उष्मान्त (श, ष, स, ह,), और कुल के वृद्ध तीन पुरुषों के नामों में से किसी एक के समान, निन्दारहित नाम करना चाहिये । नक्षत्र देवतावाला नाम नक्षत्र देवता के समान होना चाहिये । नाम दो अक्षर वाला अथवा चार अक्षरों वाला रखना चाहिये ॥ ५१ ॥ कृते च नामकर्मणि कुमारं परीक्षितुमुपक्रमेतायुषः प्रमाणज्ञान- हेतोः। तत्रेमान्यायुष्मतां कुमाराणां लक्षणानि भवन्ति । तद्यथा एके- कजा मृद्वोऽल्पाः स्निग्धाः सुबद्धमूलाः कृष्णाः केशाः प्रशस्यन्ते, स्थिरा बहला त्वक् प्रकृत्या, प्रकृतिसुसम्पन्नमीषत्प्रमाणातिवृत्तमनुरूपमात- पत्रोपमं शिरः, व्यूढं दृढं समं सुश्लिष्ट-शङ्ख-सन्ध्यूर्ध्व-व्यञ्जनमुपचितं बिलनमर्धचन्द्राकृति ललाटं, बहलौ विपुलसमपीठौ नीचैर्वृद्धौ पृष्ठतोऽ-

१२८ चरकसंहिता [अ० ८ वनतौ सुश्लिष्ट-कर्ण पुत्रकौ महाच्छिद्रौ कर्णौ, ईषत्प्रलम्बिन्यावसद्भगते समे संहते महत्यौ भ्रुवौ, समे समाहितदर्शने व्यक्तभागविभागे बल- वती तेजसोपपन्ने स्वङ्ग-पाङ्गे चक्षुषी, ऋज्वी महोच्छ्वासा वंशसंपन्ने- षदनवताग्रा नासिका, महदृजु-सुनिषिष्टदन्तमास्य, आयामविस्तारोप- पन्ना श्लक्ष्णा तन्वी प्रकृतिवर्णयुक्ता जिह्वा, श्लक्ष्ण युक्तोपचयमूष्मोपपन्नं रक्तं तालु, महानदीनः स्निग्धोऽनुनादी गम्भीरसमुत्था धारः स्वरः, नातिस्थूला नातिकृशावास्यप्रच्छादनो रक्तावोष्ठौ, महत्यौ हनू, वृत्ता नातिमहती ग्रीवा व्यूढमुपचितमुरः, गूढ जत्रु पृष्ठवशश्च, विप्रकृष्टा- न्तरो स्तनौ, असपातिनी स्थिरे पार्श्वे, वृत्तपारेपूर्णापतो बाहू, सक्थिनी अङ्गुलयश्च, महदुपचित पाणिपाद, स्थिरा वृत्ताः स्निग्धास्ताम्रास्तुङ्गा कूर्माकारा करजाः, प्रदक्षिणावर्ती सोत्सङ्गा च नाभिः, उरस्त्रिभागाह्वाना समा समुपचिनमांसा कटी, वृत्तौ स्थिरोपचितमासौ नात्युन्नतौ स्फिचौ, अनुपूर्ववृत्तावुपचययुक्तावूरू, नात्युपचिते नात्यपचिते एणांपदे प्रगूढ- सिरास्थि सन्धी जङ्घे, नात्युपचितौ नात्यपचितौ गुल्फौ, पूर्वोपदिष्ट- गुणौ पादौ कूर्माकारौ, प्रकृतियुक्तानि वातमूत्रपुरीषाणि तथा स्वप्न- जागरणायास-स्मित-रुदित-स्तनग्रहणानि । यच्च किंचिदन्यदप्यनुक्तमस्ति तदपि सर्व प्रकृतिमुक्तमिष्टम्, विपरीत पुनरनिष्टम्। इति दीर्घायु- र्लक्षणानि ॥ ५२ ॥ नामकरण सस्कार हो चुकने पर आयु के प्रमाण ज्ञान के लिये कुमार की परीक्षा करना चाहिये । आयुष्य वाले कुमारो के निम्न लक्षण होते ह। यथा— एक एक पृथक्, कोमल, छोटे, स्निग्ध, दृढमूल वाले काले बाल उत्तम हैं। स्थिर, स्वाभाविक त्वचा प्रशस्त है। प्रकृति (छ अगुल ऊंचा, ३२ अगुल चौड़ा ) सम्पन्न, शरीर के अनुरूप, छाते के समान गोल शिर प्रशस्त है। चाड़ा दृढ, समान शंख सधि से भली प्रकार जुड़ा, ऊपर को उठा, बलवान्, अर्द्धच- न्द्राकार ललाट प्रशस्त है । बड़े, विशाल, समान पीठ वाले, नीचे की ओर बड़े, पीछे से नीचे, खूब मिले कर्णपुत्रक, प्रशस्त है । बहुत बड़े छिद्रों वाले, थोड़े लटकते हुए कान (जैसे कि कान भगवान् बुद्ध की मूर्त्तियों मे बने होते हैं) प्रशस्त है। परस्पर न मिलीं परन्तु परस्पर समान एक दूसरे के तुल्य बड़ी भोंहे प्रशस्त हैं। समान तुल्य, उत्तम दृष्टि युक्त, काला और श्वेत भाग स्पष्ट दीखता हो, बलवान्, तेज से युक्त, अपने अग और उपाग युक्त आखें प्रशस्त हैं। सीधी, बड़े उच्छ्वास से युक्त, उन्नत वश वाली आगे से थोड़ी, झुकती नासिका प्रशस्त है। महान्, सरल, खूब एक समान जुड़े हुए दान्तों वाला मुख उत्तम है।

अ० ८ ] ६ शरीरस्थानम् १२६

अ० ८ ] ६ शरीरस्थानम् १२६ लम्बाई और विस्तार से युक्त, चिकनी, पतली, स्वाभाविक वर्ण से युक्त जीभ प्रशस्त है । चिकना, ठीक प्रमाण में बढ़ा, गरमी से युक्त, लाल तालु प्रशस्त है। नदी के आवाज के समान महान्, स्निग्ध, प्रतिध्वनि युक्त, गम्भीर और धीर स्वर प्रशस्त है। न तो बहुत मोटे और न बहुत पतले, मुख को ढापने वाले लाल ओठ प्रशस्त है। बड़ी हनु (जबाड़े) गाल बहुत बड़े न हों, छोटी ग्रीवा प्रशस्त है। चौड़ी उन्नत छाती प्रशस्त है। गूढ छिपे हुए जत्रु (अश सन्धि) पृष्ठ वश, उत्तम है—जत्रु और पृष्ठ वंश की अस्थिया छूने पर प्रतीत न हो। दूर दूर अन्तरवाले स्तन प्रशस्त हैं। कक्षा से बाहर निकले स्थिर पार्श्व प्रशस्त है। गोल, परिपूर्ण, लम्बे बाहू, टागे और अगुलिया प्रशस्त हैं। बड़े २ भरे हुए हाथ और पाव प्रशस्त है । स्थिर गोल, स्निग्ध ताम्र रग के उन्नत, कछुए के समान उठे हुए नख प्रशस्त हैं। दक्षिण आवर्त्त वाली और उन्नत नाभि प्रशस्त है। छाती से एक तिहाई कम, समान, उपचित मास वाली कटि प्रशस्त है। गोल, स्थिर, उन्नत मास वाले न तो बहुत उन्नत और न बहुत नीचे कूल्हे प्रशस्त है। गोल, स्थिर, मास से भरी टागें प्रशम्त हैं। न तो बहुत बढे हुए और न बहुत घटे हुए, हरिणी की जंघा के समान छिपी सिग, अस्थि, और सन्धि वाली जघाए प्रशस्त है न तो बहुत मोटे, और न बहुत दवे हुए गुल्फ प्रशस्त हैं। पूर्वोक्त गुणो से युक्त, कछुवे के आकार के (मेहराबदार) पाव प्रशस्त हैं। स्वाभाविक रूप में वायु, मूत्र, मल का आना और नींद, जागरण, आयास, हास्य, रोदन, स्तनपान आदि बातों का प्रकृतिसिद्ध, स्वाभाविक रूप मे होना उत्तम है। इनके अति- रिक्त और जो बातें यहा पर नहीं कही, वे भी स्वाभाविक रूप मे होनी चाहियें यही इष्ट है। प्राकृतिक बातों से विपरीत होना बुरा, अनिष्टकारक है। ये दीर्घायु कुमारों के लक्षण हैं ॥ ५२ ॥ अतो धात्रीपरीक्षामुपदेक्ष्यामः—अथ ब्रूयात् धात्रीमानयतेति, समानवर्णां यौवनस्थां निभृतामनातुरामव्यङ्गामव्यसनामविरूपामजु- गुप्सितां देशजातीयामक्षुद्रामक्षुद्रकर्मिणीं कुलेजातां वत्सलां जीवद्वत्सां पुंवत्सा दोग्ध्रीमप्रमत्ता१मशायिनीमनुच्चारशायिनीमनन्त्यावशायिनी कुशलोपचारां शुचिमशुचिद्वेषिणीं स्तनस्तन्यसंपदुपेतामिति ॥ ५३ ॥ इसके अनन्तर धात्री की परीक्षा का उपदेश करते हैं। अब आज्ञा देवे कि धात्री (धाई) को लाओ धात्री माता की समान जाति वाली, युवती, नम्र- १. 'अप्रमत्तामनन्त्यावशायिनीं' इतिपाठः ।

१३० • चरकसंहिता [ अ० ८ स्वभाव, नीरोग, सुन्दर अंगों वाली, सब प्रकार के व्यसनों से रहित, सुन्दर- रूपवती, घृणायोग्यरूप से रहित, जो मैली कुचैली न रहती हो, समान देश वाली, उदार चित्त वाली, घिनौने कमीने विचारों और कर्मों से रहित, नीच कर्म न करने वाली, उत्तम कुल मे उत्पन्न, बच्चे से प्यार करने वाली, प्रमाद से रहित, न सोनेवाली, बालक को मलमूत्रादि में न लेटाने वाली, नीच, चण्डाल कुलों से भिन्न कुल की, सेवा मे कुशल, पवित्र, स्वच्छ, अपवित्रता से द्वेष करने वाली, स्तन और दूध के उत्तम गुणों से युक्त, स्त्री को धात्री के रूप मे नियुक्त करें। [धात्री को तभी नियुक्त करना चाहिये जब बच्चे की माता अति निर्बल हो, दूध काफी न उतरता हो, या दूध बालक के अनुकूल न पड़ता हो।]॥५३॥ तत्रेयं स्तनसंपत्-नात्यूर्ध्वौ नातिलम्बावनतिकृशावनतिपीनौ युक्तपिप्पलको सुखप्रपानौ चेति स्तनसंपत् ॥ ५४ ॥ स्तन के उत्तम लक्षण-स्तन न बहुत ऊचे, न बहुत लटकने वाले, न बहुत कृश, न बहुत मोटे, उत्तम चूचुक (घुण्डियो) वाले, ऐसे हों जिन से बच्चा सुख से दूध पी सके, ये स्तन के उत्तम लक्षण हैं ॥ ५४ ॥ स्तन्यसंपत्तु—प्रकृत वर्ण-गन्ध-रस-स्पर्शमुदपात्रे दुह्यमानमुदक व्येति प्रकृतिभूतत्वात्, तत्पुष्टिकदमारोग्यकर चेति स्तन्यसंपत् ॥५५॥ दूध के उत्तम लक्षण-दूध का स्वाभाविक वर्ण हो, स्वाभाविक गन्ध हो, स्वाभाविक रस हो और स्वाभाविक स्पर्श ह', यदि दूध को जल के पात्र मे दुहा जाय तो वह सारे जल में फैल जावे। क्योकि यह दूध का स्वाभाविक गुण है। इसके अतिरिक्त दूध पुष्टिकारक और आरोग्यकारक होना आवश्यक है, ये दूध के उत्तम लक्षण हैं ॥५५॥ अतोऽन्यथा व्यापन्नं ज्ञेयम् । तस्य विशेषाः - श्यावारुणवर्णं कषायानुरसं विशदमनतिलक्ष्यगन्धं रूक्षं द्रवं फेनिल लघ्वतृप्तिकर कर्षणं, वातविकाराणां कर्तृ वातोपसृष्टं क्षीरमभिज्ञेयम् । कृष्ण-नील- पीत-ताम्रावभासं तिक्ताम्लकद्वकानुरस कुणपरुधिरगन्धि भृशोष्णं पित्त- विकाराणा कर्तृ पित्तोपसृष्ट क्षीरमभिज्ञेयम् । अत्यर्थशुक्लमहिमाधु- यपपन्न लवणानुरसं घृत-तैल-वसा-मज्ज-गन्धि पिच्छिल तन्तुमदुदपा- त्रेडवसीदच्छ्लेष्म विकाराणां कर्तृ श्लेष्मोपसृष्टं क्षीरमभिज्ञेयम् ॥५६॥ इन लक्षणों से विपरीत दूध दूषित समझना चाहिये। इसके विशेष लक्षण ये हैं-वात विकार वाली स्त्रियों का वात से दूषित दूध, श्याव (लाल-काले) रंग का, कषाय अनुरस वाला, विशद (फुटकी वाला), स्पष्ट गन्ध से रहित,

अ० ८] शारीरस्थानम् १३१

अ० ८] शारीरस्थानम् १३१ रूक्ष, द्रव, झाग वाला, हलका, पीने पर पूर्ण तृप्ति नहीं करने तथा शिशु को सुखाने वाला होता है। ऐसा दूध वात के विकारों को उत्पन्न करता है। वह वात से दूषित दूध होता है। पित्त से दूषित दूध—काला, नीला, पीला, ताम्बे के रंग का, तिक्त, अम्ल, कटु अनुरस वाला, दुर्गन्ध या रक्त की गन्ध वाला, बहुत गरम होता है। कफ विकार वाला वा कफ से दूषित दूध—बहुत सफेद, बहुत मधुर, पीने पर पिछे मे नमकीन स्वाद वाला, घी, तैल, वसा, मज्जा की गन्ध से युक्त, पिच्छिल, धागे या सूत्रों वाला, जो पानी के पात्र में नीचे बैठ जाता है, ऐसे दूध को कफ के विकारों को उत्पन्न करनेवाला, कफ से दूषित जानना चाहिये ॥५६॥ तेषां त्रयाणामपि क्षीरदोषाणां प्रति प्रतिविशेषमभिसमीक्ष्य यथास्वं यथादोषं च वमनविरेचनास्थापनानुवासनानि विभज्य कृतानि प्रश- मनाय। इन तीनों प्रकार के दूध के दोषों में वात, पित्त, कफ प्रत्येक दोष के अनुसार अपने अपने दोष के लक्षणों को देख कर वमन, विरेचन, आस्थापन, अनुवासन आदि का विभाग करके उचित रूप में शान्ति के लिये व्यवहार करना चाहिये। पानाशनविधिस्तु दुष्टक्षीराया यव-गोधूम-शालि षष्टिक-मुद्ग-हरे- णुक-कुलत्थ सुरा सावीरक-तुषोदक मैरेय-मेदक-लशुन-करञ्ज-प्राय.स्यात्, क्षीरदोष-विशेषांश्चावेक्ष्यावेक्ष्य तत्तद्विधानं कार्यं स्यात्, पाठा-महौषध- सुरदारु-मुस्त-मूर्वा-गुडूची-वत्सक-फलकिरात - तिक्त - कटुक - रोहिणी- सारिबा-कषायाणा च पानं प्रशस्यते । तथाऽन्येषा तिक्त-कषाय-कटुक- मधुराणा द्रव्याणां प्रयोग इति क्षीर-विकार-विशेषानभिसमीक्ष्य मात्रां काल चेति क्षीरविशोधनानि ॥ ५७ ॥ दूषित दूध वाला स्त्री के दूध के शोधने लिये खान पान विधि—जिस स्त्री का दूध दूषित हो उसे जौ, गेहूँ, हेमन्त धान्य, साठी चावल, मूग, हरेणु, कुलत्थी, सुरा, सौवीरक, धान्याम्ल, तुषोदक, मैरेय, मेदक, लशुन, करंज आदि का सेवन करना चाहिये । दूषित क्षीर के विशेष २ लक्षणों को (वात आदि को) देख २ कर उनकी यथायोग्य चिकित्सा करनी चाहिये। पाठा, सोंठ, देवदारु, नागरमोथा, मूर्वा, गिलोय, इन्द्रजौ, चिरायता, कुटकी, सारिवा इन पदार्थों के कषायों का पान उत्तम है । इसी प्रकार अन्य तिक्त, कषाय, कटु और मधुर रस वाले द्रव्यों का प्रयोग दूध के विकारों के कारणों को जान कर मात्रा में समय पर करना चाहिये। यह दूधको साफ़ करने वाले उपायोंका वर्णन कर दिये हैं।

१३२ चरकसंहिता [ अ० ८ क्षीरजननानि तु मद्यानि सीधुवर्ज्यानि ग्राम्यानूपौदकानि च शाक-धान्य मांसानि द्रव-मधुराम्ल-भूयिष्ठाश्चाहाराः क्षीरिण्यश्चौषधयः क्षीरपान चानायासश्चेति, वीरण-शालि-षष्टिकेश्रुवालिका-दर्भ-कुश-काश- गुन्द्रेत्कट-मूल कषायाणां च पानमिति क्षीरजननान्युक्तानि ॥ ५८ ॥ दूध-वर्धक पदार्थ-सीधु नामक मद्य को छोड़ कर शेष सब मद्य, ग्राम्य और आनूप देशों मे उत्पन्न शाक, धान्य या मांस, द्रव, मधुर, अम्ल, लवण, बहुत भोजन, दूध-वर्धक ओषधिया, दूध का पान और मेहनत न करना । वीरण, साठी, हेमन्त धान्य, गन्ना, दाभ, कुश, काश गुन्द्रा, इत्कट इनकी जड़ों के कषायों को पिलाना दूध-वर्धक है ॥५८॥ धात्री तु यदा स्वादु-बहुल-शुद्ध-दुग्धा स्यात्तदा स्नातानुलिप्ता शुक्ल वस्त्रं परिधायैन्द्री ब्राह्मी शतवीर्याममोघामव्यथा शिवामरिष्टा वाट्यपुष्पी विष्वक्सेनकान्ता वा बिभ्रत्योषधि कुमारं प्राङ्मुख प्रथम दक्षिण स्तनं पाययेदिति धात्रीकर्म ॥ ५६ ॥ धात्री की नियुक्ति-जिस समय धात्री का दूध बहुत स्वाद, बहुत शुद्ध हो, उस दिन स्नान कराके, चन्दन लगाकर सफेद बस्त्रों को पहिनाकर ऐन्द्री, ब्राह्मी, शतवीर्या, सहस्रवीर्या, अमोघा, गिलोय, शिरा, वाट्यपुष्पी, अरिष्टा, विष्वक्सेन- कान्ता आदि ओषधियो को धारण कराके, शिशु का शिर पूर्व की ओर करके प्रथम दक्षिण स्तन पीने के लिये देना चाहिये । यह धात्री-कर्म का उपदेश कर दिया है ॥५६॥ अतोऽनन्तरं कुमारागारविधिमनुव्याख्यास्यामः--वास्तु-विद्या- कुशलः प्रशस्तं रम्यमत्तमस्क निवातं प्रवातैकदेश दृढमपगत-श्वापद-पशु दंष्ट्रि-मूषिक पतङ्ग सुसंविभक्त-सलिलोदूखल-मूत्र-वर्चः-स्थान-स्नान- भूमि-महानसमृतुसुख यथर्तुशयनासनास्तरणसंपन्न कुर्यात्तथा सुविहित- रक्षा-विधान-बलि-मङ्गल-होम प्रायश्चित्तं शुचि-वृद्ध-वैद्यानुरक्त-जन-सपू- र्णमिति कुमारागारविधिः ॥ ६० ॥ कुमारागार विधि-इसके आगे कुमारागार विधि का वर्णन करते हैं। मकान की रचना को जानने वाला वास्तुविद्या में कुशल पुरुष उत्तम, सुन्दर, प्रकाशयुक्त, वायुदार ( परन्तु जोर से चारों ओर की वायु न आये ), मजबूत, गाय, बकरी, पशु आदि और बिछी आदि दाढ़ वाले पशु, चूहे, पतंग आदि से रहित, पानी, उलूखल, मूत्रस्थान, मलस्थान, स्नानगृह, रसोई आदि पृथक् पृथक् ऋतु के अनुकूल, ऋतु के अनुसार, बिस्तर आसन, बिछौने से युक्त घर

अ० ८ ] शारीरस्थानम् १३३

अ० ८ ] शारीरस्थानम् १३३ को सजावे । इस घर मे भली प्रकार से रक्षा का प्रबन्ध करे । बलि, मगल, होम, प्रायश्चित्त आदि क्रिया करे । पवित्र, वृद्ध, वैद्य, स्नेही मित्रों से भरा रहे । यह कुमारागार विधि है ॥ ६० ॥ शयनासनास्तरण-प्रावरणानि कुमारस्य मृदु लघु शुचि-सुगन्धीनि स्युः । स्वेदमलजन्तुमन्ति मूत्रपुरीषोपसृष्टानि च वर्ज्यानि स्युः ॥६१॥ असति संभवेऽन्येषा तान्येव च सुप्रक्षालितोपधूपितानि सुशुद्ध- शुष्काण्युपयोगं गच्छेयुः॥ ६२ ॥ कुमार के बिस्तर, आसन, विछौने आदि कोमल, हल्के, पवित्र और सुग- न्धियुक्त हों, वे पसीने, जू आदि वाले तथा मूत्र मल वाले न हों। यदि अन्य दूसरे वस्त्र न हों तो इन्हीं वस्त्रो को भली प्रकार धोकर सुगन्धा कर (धुवा देकर ) साफ और शुष्क करके काम में लाया जावे ॥ ६२ ॥ धूपनानि पुनर्वाससां शयनास्तरणप्रावरणानां च यव-सर्षपातसी- हिङ्गु गुग्गुलु-वचा चोरक-वयःस्था-गोलोमी-जटिला पलङ्कषाशोक-रोहि- णीसर्पनिर्मोकाणि घृतसक्तानि स्युः॥ ६३ ॥ वस्त्रों के रोगनाशक धूम—बिस्तर, आसन, बिछौने चादर आदि कपड़े को धुवा देने के लिये जौ, सरसों अलसी, हींग, गुग्गुल, वच, चोरक, ब्राह्मी, श्वेत दूब, जटामासी, गुग्गुलु, अशोक, कुटकी और साप की केंचली इनको घी में मिला कर इनसे धुवा देना चाहिये ॥ ६३ ॥ मणयश्च धारणीयाः कुमारस्य खड्ग-रुरु-गवय-वृषभाणा जीवतामेव दक्षिणेभ्यो विषाणेभ्यस्त्वग्राणि गृहीतानि स्युः । मत्राद्याश्चौषधयो जीव- कर्षभकौ यानि चान्यान्यपि ब्राह्मणाः प्रशंसेयुरथर्ववेदविदः॥ ६४॥ बालक के आभूषण—शिशु को नाना प्रकार की मणिया, जीवित गैडा रुरु (मृग ), गवय (नीलगाय ) और साड के दक्षिण सीग के अगले भागों को लेकर धारण कराने चाहिये । मंत्र आदि, जीवक, ऋषभक आदि ओषधियों को तथा अन्य जिन २ वस्तुओ को अथर्व वेद के जानने वाले विद्वान् ब्राह्मण बतावे वे २ पदार्थ धारण करावे ॥ ६४ ॥ क्रीडनकानि खल्वस्य विचित्राणि घोषवन्त्यभिरामाण्यगुरूष्यतीक्ष्णा- ग्राण्यनास्यप्रवेशीन्यप्राणहराण्यवित्रासनानि च स्युः ॥ ६५ ॥ बच्चे के खिलौने—कुमार के खिलौने विचित्र रूप के, शब्द करने वाले, सुन्दर, हलके, जिनके अग्रभाग तीखे न हो, जो बच्चे के मुख में न जा सकें,

१३४ चरकसंहिता [ अ० ८ बच्चों का प्राणहरण करने वाले न हों तथा बच्चों को भय देने वाले न हों ऐसे होने चाहिये ॥ ६५ ॥ न ह्यस्य वित्रासनं साधु तस्मात्तस्मिन् रुदत्यभुञ्जाने वाऽन्यत्र वाऽ- विधेयतां गच्छति राक्षस-पिशाच-पूतनाद्याना नामानि चाऽऽह्वयता कुमारस्य वित्रासनार्थं नामग्रहणं न कार्यं स्यात् ॥ ६६ ॥ शिशु को भय देना—शिशु को डराना, भय दिखाना अच्छा नहीं, रोते हुए भोजन न करने पर अथवा अन्य इसी प्रकार की अवस्था में जब बालक काबू में न आवे तो शिशु को डराने के लिये राक्षस, पिशाच, पूतना आदि का नाम नहीं लेना चाहिये ॥ ६६ ॥ यदि त्वातुर्यं किंचित्कुमारमागच्छेत्तत्प्रकृति-निमित्त-पूर्वरूप-लिङ्गो- पशय-विशेषैस्तत्त्वतोऽनुबुध्य सर्वविशेषानातुरौषध-देश-क-लाश्रयानवे- क्षमाणश्चिकित्सितुमारभेतेनं मधुर-मृदु-लघु-सुरभि-शीत-शङ्करं कर्म प्रवर्तयन्, एवं सात्म्या हि कुमारा भवन्ति, तथा ते शर्म लभन्तेऽचि- राय । अरोगेष्वरोगवृत्तमातिष्ठेत् ॥ ६७ ॥ यदि कभी शिशु रोगी हो जाये तो वात आदि प्रकृति, कारण, पूर्वरूप, लक्षण, उपशय आदि से रोग का वास्तविक रूप जान कर रोगी सम्बन्धी सब बातों की देश, काल और शरीर का देखकर चिकित्सा आरम्भ करे। चिकित्सा मे मधुर, मृदु, लघु, सुगन्धित, शीतल, कल्याणकारी कर्म (औषध) करना चाहिये। कुमार भी इसी सात्म्य के (मधुर, मृदु, शीतल, लघु) होते हैं, ऐसी ही औषध उनको लाभदायक है। इस प्रकार से बालक शीघ्र ही सुखी, नीरोग हो जाते हैं। स्वस्थ अवस्था में स्वस्थ वृत्त का पालन करना चाहिये ॥६७॥ देश-कालात्म-गुण-विपर्ययेण वर्तमानः क्रमेणासात्म्यानि परिवर्त्यो- पयुञ्जानः सर्वाण्यहितानि वर्जयेत् । तथा बलवर्णशरीरायुषां संपद- मवाप्नोतीति ॥ ६८ ॥ देश, काल और आत्मा इनके गुणों के विपरीत अवस्था मे कुमार को असात्म्य देश, काल से क्रमश सात्म्य देश, काल, आत्म-गुणों पर बदलना चाहिये। सब प्रकार के अहित वस्तुओं का त्याग करना चाहिये। इस प्रकार से उत्तम बल, वर्ण शरीर और उत्तम आयु प्राप्त होती है ॥ ६८ ॥ एवमेनं कुमारमायौवनप्राप्तेर्धर्मार्थकौशलागमनाच्चानुपालयेत् ।

अ० ८ ] शारीरस्थानम् १३५

अ० ८ ] शारीरस्थानम् १३५ इस प्रकार से कुमार की यौवनावस्था के आने तक धर्म, अर्थ, कौशल उत्पन्न होने तक रक्षा करनी चाहिये । इति पुत्राशिषा समृद्धिकरं कर्म व्याख्यातम् । तदाचरन् यथोक्तै- र्विधिभिः पूजा यथेष्टं लभतेऽनसूयक इति ॥ ६६ ॥ पुत्र को चाहने वालों के लिये फलकारक और समृद्धिकारक कर्म का उप- देश कर दिया है। बच्चों को देखकर चित्त में बुरा भाव न रखने और पुत्र को अत्यन्त उत्तमता को चाहने वाला मनुष्य यथोक्त विधि से इन कर्मों का करता हुआ, यथेष्ट फल और पूजा ( आदर ) को प्राप्त करता है ॥ ६६ ॥ तत्र श्लोकौ । पुत्राशिषा कर्म समृद्धिकारकं यदुक्तमेतन्महदर्थसंहितम् । तदाचरन् ज्ञो विधिभिर्यथातथ पूजां यथेष्ट लभतेऽनसूयकः ॥७०॥ शरीरं चिन्त्यते सर्वं दैवमानुषसम्पदा । सर्वभावैर्यतस्तस्माच्छारीर स्थानमुच्यते ॥ ७१ ॥ पुत्र की प्रार्थनानुरूप फलकारक, समृद्धिकारक, बहुत अर्थ से परिपूर्ण जो कार्य कहा है, जो बुद्धिमान् मनुष्य इस कर्म को विधिपूर्वक करता है वह परम समृद्धि को देख कर न कुढने वाला भला आदमी यथेष्ट आदर को प्राप्त करता है । देवता और मनुष्यों के उत्तम २ लक्षणो सहित सब प्रकार मे यहा सम्पूर्ण शरीर का विचार करते है । इसलिये यह शारीरस्थान महाप्रकरण कहा जाता है ॥ ७०-७१ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृते शारीरस्थाने जातिमूत्रीयशारीर नामाष्टमोऽध्याय. ॥ ८ ॥ ॥ इति शारीरस्थानं समाप्तम् ॥

इन्द्रियस्थानम्

इन्द्रियस्थानम् प्रथमोऽध्यायः । अथातो वर्णस्वरीयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ इसके आगे 'वर्णस्वरीय इन्द्रिय' नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे, जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ [ शारीरस्थान के पीछे चिकित्सास्थान आना आवश्यक है । परन्तु चिकि- त्सा साध्य-रोगो मे ही कही जाती है, असाध्य रोगों मे नहीं । क्योंकि असाध्य रोग मे चिकित्सा करने से धन, विद्या और यश की हानि और बदनामी होती है । इन्द्रिय का अर्थ है रिष्ट । जब रोगी मरणासन्न होता है उस समय के विशेष लक्षणों को 'रिष्ट' वा 'अरिष्ट' कहा जाता है । विना रिष्ट ज्ञान के साध्य और असाध्य का ज्ञान भी नही हो सकता । इस लिये चिकित्सा के पूर्व इन्द्रिय- स्थान कहा गया है । ] इह खलु वर्णश्च स्वरश्च गन्धश्च रसश्च स्पर्शश्च चक्षुश्च श्रोत्रं च घ्राणं च रसनं च स्पर्शनं च सत्त्वं च भक्तिश्च शौचं च शीलं चाचारश्च स्मृति- श्चाऽऽकृतिश्च बलं च ग्लानिश्च तन्द्रा चाऽऽरम्भश्च गौरवं च लाघवं चाऽऽ- हारगुणाश्चाऽऽहारपरिणामश्चोपायश्चापायश्च व्याधिश्च व्याधिपूर्वरूपं च वेदनाश्चोपद्रवाश्च छाया च प्रतिच्छाया च स्वप्नदर्शनं च दूताधिकारश्च पथि चौत्पातिकाश्चाऽऽतुरकुले भावावस्थान्तराणि च भेषजसंवृत्तिश्च भेषज-विकार युक्तिश्चेति परीक्ष्याणि प्रत्यक्षानुमानोपदेशैरायुषः प्रमाण- विशेषं जिज्ञासमानेन भिषजा ॥ ३ ॥ रोगी के आयुष्य को विशेष रूप से जानने की इच्छा रखने वाले वैद्य के लिये आवश्यक है कि वह प्रत्यक्ष, अनुमान और आप्त ( शब्द ) प्रमाण द्वारा रोगी के वर्ण, स्वर, गन्ध, रस, स्पर्श, चक्षु, श्रोत्र, घ्राण, रसना, स्पर्श, सत्त्व ( मन ), भक्ति ( इच्छा ), शौच, शील, आचार, स्मृति, आकृति, बल, ग्लानि, तन्द्रा ( नींद ), आरम्भ, [ अरिष्ट-व्याधि में उत्पत्ति का प्रारम्भ ], भारीपन, लघुता, आहार, आहार का परिणाम, उपाय ( उपगमन ), अपाय (अपगमन),

अ० १ ] इन्द्रियस्थानम् १३७

अ० १ ] इन्द्रियस्थानम् १३७ व्याधि, व्याधि के पूर्वरूप, वेदना, उपद्रव, शरीर की छाया, ( शारीरिक ), प्रतिछाया, स्वप्न-दर्शन, दूताधिकार, मार्ग के उपद्रव के दृश्य, रोगी के घर की अवस्था, इसके भाव, औषध-सफलता और औषध की रोग सम्बन्ध में योजना—इन सब बातों की अवश्य परीक्षा करे। इनका विस्तार आगे यथास्थान किया जायेगा ॥ ३ ॥ तत्र खल्वेषा परीक्ष्याणां कानिचित्पुरुषमनाश्रितानि कानिचिच्च पुरुषसंश्रयाणि। तत्र यानि पुरुषमनाश्रितानि तान्युपदेशतो युक्तितश्च परीक्षेत, पुरुषसंश्रयाणि पुनः प्रकृतितश्च विकृतितश्च ॥ ४ ॥ इन उपरोक्त परीक्षा करने योग्य बातों में से कुछ बातें तो पुरुष में आश्रित हैं और कुछ बातें पुरुष मे आश्रित नहीं हैं। इसलिये जो परीक्षायें पुरुष में आश्रित नहीं हैं, उनकी परीक्षा आप्तजनों के उपदेश से जाननी चाहिये और जो परीक्षायें पुरुष के शरीर मे आश्रित हैं उनकी परीक्षा प्रकृति और विकृति से करनी चाहिये ॥ ४ ॥ तत्र प्रकृतिर्जातिप्रसक्ता च कुलप्रसक्ता च देशानुपतिनी च काला- नुपातिनी च वयोऽनुपातिनी च प्रत्यात्मनियता च । जाति-कुल-देश- काल-वयः-प्रत्यात्मनियता हि तेषां तेषां पुरुषाणां ते ते भावविशेषा भवन्ति ॥ ५ ॥ इनमे प्रकृति छः प्रकार की है—(१) जाति से प्राप्त ( २ ) काल से प्राप्त ( ३ ) देशानुसार ( ४ ) कालानुसार ( ५ ) वय के अनुसार और ( ६ ) प्रतिव्यक्ति नियत जाति, देश, कुल, काल, आयु और प्रत्येक पुरुष की भिन्नता के कारण पुरुषों की प्रकृति भिन्न २ हो जाती है ॥ ५ ॥ [ जाति—जापानी लोगों को हैजा कम होता है, हिन्दुओं और यहूदियो को 'मधुमेह' अधिक होता है । कुल—जिस कुल में क्षय या अर्श रोग चलता हो, उसमें विवाह सम्बन्ध का शास्त्र ने निषेध किया है । देश—मरुस्थल प्रदेश में कफजन्य रोग बहुत कम होते हैं । मदुरा मे हाथीपग ( पील-पाव ) और उड़ीसा मे अण्ड-वृद्धि बहुत है । काल--वसन्त ऋतु मे चेचक रोग तथा टायफाइड ( आन्त्रज्वर ) फैलता है । वयस्--प्लेग और क्षय जवान ( १८ से २८ तक ) पुरुषो को ही होते हैं । प्रत्यात्म--जिस आदमी को एक बार चेचक हो जाती है, उसको फिर नहीं होती और कई आदमी जन्म से ही किसी किसी रोग के लिये प्रतिशक्त होते हैं । ( २ ) इसका अर्थ यह भी है कि कइयों में

१३८ चरकसंहिता [ अ० १ शौच आदि गुण प्रकृति से होते हैं यथा—ब्राह्मण में। कई कुलों में, कई जातियों में शौच गुण (स्वच्छता) विशेष रहता है]। विकृति पुनर्लक्षणनिमित्ता च लक्ष्यनिमित्ता च निमित्तानुरूपा च। तत्र लक्षणनिमित्ता नाम सा, यस्याः शरीरे लक्षणान्येव हेतुभूतानि भवन्ति देवात्। लक्षणानि हि कानिचिच्छरीरोपनिबद्धानि भवन्ति, यानि हि तस्मिंस्तस्मिन् काले तत्राधिष्ठानमासाद्य तां तां विकृतिमुत्पा- दयन्ति। लक्ष्यनिमित्ता तु सा, यस्या उपलभ्यते निमित्तं यथोक्तं निदा- नेषु। निमित्तानुरूपा तु निमित्तार्थकारिणी या। नामनिमित्ता निमित्त- मायुषः प्रमाणज्ञानार्थेच्छन्ति भिषजो भूयश्चायुषः क्षयनिमित्ता प्रेतलि- ङ्गानुरूपाम्। यामायुषोऽन्तादस्य ज्ञानार्थमुपदिशन्ति धीराः। यामधि- कृत्य पुरुषसंश्रयाणि मुमूर्षता लक्षणान्युपदिश्याम इत्युद्देश । तद्विस्तरे- णानुव्याख्यास्याम ॥ ६ ॥ विकृति तीन प्रकार की ह । यथा—( १ ) लक्षण के निमित्त से, ( २ ) लक्ष्य के निमित्त से और ( ३ ) निमित्तों के अनुरूप ॥ ६ ॥ ( १ ) लक्षणनिमित्ता—जिसके दैववश हेतु रूप लक्षण ही शरीर में उत्पन्न होते हैं। कई एक लक्षण शरीर से ही सम्बद्ध रहते हैं। वे भिन्न २ अनेक समयों में अपना आश्रय बना कर भिन्न २ विकृति (विकार, रोग, पीड़ा) को उत्पन्न करते हैं। हाथों में नख रेखा-पद्मादि सामुद्रिक लक्षण होना । ( २ ) लक्ष्यनिमित्ता—जैसा निदानों में निमित्त बतलाया है। तदनुसार जिसका निमित्त उपलब्ध होता है। ( ३ ) निमित्तानुरूप—विकृति वह है जो निमित्त के कार्य रूप प्रयोजन को पूरा करती है, उस निमित्त से भिन्न विकृति को भी वैद्य लोग आयु के परिमाण ज्ञान का निमित्त मानते हैं, और जिसका, समाप्त होने वाली आयु के ज्ञान के लिये विद्वान् लोग उपदेश करते हैं। जिसका प्रकरण उठा कर पुरुष मे आश्रित, मरणासन्न पुरुषों के लक्षणों का हम उपदेश करेंगे । यह उद्देश अर्थात् अभी नाममात्र कहा है। अब इसका विस्तार से वर्णन करेंगे ॥ ६ ॥ तत्राऽऽदित एव वर्णाधिकारः, तद्यथा—कृष्णः कृष्णश्यामः श्यामाव- दातोऽवदातश्चेति प्रकृतिवर्णाः शरीरस्य भवन्ति, यांश्चापरानुप्रेक्षमाणो विद्यादनूक्ततोऽन्यथा वापि निर्दिश्यमानांस्तज्ज्ञैः। नील-श्याम-ताम्र-हरित- शुक्लाश्च वर्णा शरीरस्य वैकारिका भवन्ति। यांश्चापरानुप्रेक्षमाणो विद्यात्, ऽविकृतानभूत्वोत्पन्नान्। इति प्रकृतिवर्णा भवन्त्युक्ताः शरीरस्य ॥७॥

अ० १ ] इन्द्रियस्थानम् १३६

अ० १ ] इन्द्रियस्थानम् १३६

सबसे प्रथम वर्णाधिकार कहते हैं जैसे-कृष्ण (काला) कृष्णश्याम
(काला-सावला) और श्याम-अवदात (श्याम-गौर) और अवदात (शुद्धगौर)
ये चार शरीर के प्राकृतिक वर्ण हैं। इनके सिवाय जिन वर्णों का यहा वर्णन
नहीं किया और जो इन वर्णों के अनुकूल समान रूप लक्षणो से मिलें वा
जिनका विद्वान् मनुष्य वर्णन करे उनको भी प्रकृतिवर्ण जानना चाहिये।
नीला, श्याम, ताम्बे का रग, हरा और श्वेत ये शरीर के वैकारिक (विकृति से
उत्पन्न होने वाले) वर्ण हैं। इसी प्रकार उपराक्त प्राकृतिक वर्णों से भिन्न वर्ण
जिनको प्रत्यक्ष देख कर जान लें अथवा पहिले कभी उत्पन्न न हुए, बाद में
उत्पन्न हुए हों ऐसे जो वर्ण हों उनको वैकृतिक वर्ण समझना चाहिये। इस
प्रकार से प्राकृतिक और वैकृतिक वर्ण कह दिये हैं ॥ ७ ॥
तत्र प्रकृतिवर्णमर्धशरीरे विकृतिवर्णमर्धशरीरे द्वावपि वर्णौ मर्यादा-
विभक्तौ दृष्ट्वा यदेव सव्य-दक्षिण-विभागेन यदेव पूर्व-पश्चिम-विभागेन
यदुत्तराधरविभागेन यदन्तर्बहिर्विभागेनाऽऽतुरस्य रिष्टमिति विद्यात् ॥८॥
जिस मनुष्य के आधे शरीर मे प्रकृति वर्ण और आधे शरीर में विकृति का
वर्ण हो और शरीर मे दोनो का विभाग पृथक् २ स्पष्ट दीखता हो, या वाम और
दक्षिण भाग में अथवा ऊपर नीचे के भाग में, या अन्दर बाहर के विभाग में
हो तो इनको रोगी की मृत्यु का लक्षण समझे ॥८॥
एवमेव वर्णभेदो मुखेऽप्यन्तो वर्तमानो मरणाय भवति ॥ ६ ॥
वर्णभेदेन ग्लानि-हर्ष-रौक्ष्य-स्नेहा व्याख्याताः ॥ १० ॥
इसी प्रकार मुख में दूसरा बदला हुआ वर्ण मृत्यु के लिये होता है। वर्ण
के भेद से, ग्लानि, हर्ष, रूक्षता और स्नेह का भी उपदेश समझे। [अर्थात्
शरीर के आधे भाग में रूक्षता आदि ओर आधे में स्नेह आदि का होना मृत्यु
का सूचक है।] ॥ ६-१० ॥
तथा पिप्लु-व्यङ्ग-तिलकालक-पिड़कानामानने जन्माऽऽतुरस्यैवमेवा-
प्रशस्तं विद्यात् ॥ ११ ॥
नख-नयन-वदन-मूत्र-पुरीष-हस्त-पादौष्ठादिष्वपि च वैकारिकोक्तानां
वर्णानामन्यतमस्य प्रादुर्भावो हीन-बल-वर्णेन्द्रियेषु लक्षणमायुषः क्षयस्य
भवति ॥ १२ ॥
जिस रोगी के मुख पर सहसा पिप्लु, व्यंग, तिल, कालक अथवा पिड़िका
निकल आये, इसको भी बुरा लक्षण समझे। इसी प्रकार नख, आंख, मुख, मूत्र,
पुरीष (मल), हाथ, पाव, ओंठ आदि अगों में वैकारिक रंगों में से किसी एक

१४० चरकसंहिता [ अ० १ रंग का उत्पन्न हो जाना, बल वर्ण और इन्द्रियों मे हीनता का आ जाना, ये आयु के क्षय के लक्षण हैं ॥ ११-१२ ॥ यच्चान्यदपि किंचिद्वर्णवैकृतमभूतपूर्वं सहसोत्पद्येतानिमित्तमेव हीय- मानस्याऽऽतुरस्य शश्वत्, तच्चारिष्टम् । इति वर्णाधिकारः ॥ १३ ॥ इनके अतिरिक्त और जो कोई वैकृतिक वर्ण, जो पहिले कभी भी नहीं था ऐसा बिना कारण के सहसा उत्पन्न हो जाये, इसको निश्चय रूप से मृत्यु का लक्षण समझना चाहिये ॥ १३ ॥ यह वर्णाधिकार समाप्त हुआ । स्वराधिकारस्तु—हंस-क्रौञ्च-नेमि दुन्दुभि-कलविङ्क-काक-कपोत-झर्झ- रानुकाराः प्रकृतिस्वरा भवन्ति, यांश्चापरानुपपेक्षमाणोऽपि विद्यादनूक- तोऽन्यथा वाऽपि निर्दिश्यमानांस्तज्ज्ञैः ॥ १४ ॥ स्वराधिकार—मनुष्यों का जो स्वर हंस, क्रौञ्च, नेमि, दुन्दुभि, कलविङ्क- आदि के स्वर और कौवा, कबूतर इनके स्वर के समान हो, उसको प्राकृतिक स्वर समझना चाहिये । इनके अतिरिक्त इन स्वरों के समान जो प्रकृति स्वर यहां पर नहीं कहे गये और देखने में आवें या सादृश्य से या जिनको तत्त्वज्ञानी लोग बतलावें उनको भी जाने ॥ १४ ॥ एडक-कल-ग्रस्ताव्यक्त-गद्गद-क्षाम दीनानुकीर्णास्त्वातुराणां स्वरा वैकारिका भवन्ति । यांश्चापरानुपपेक्षमाणोऽपि विद्यात्प्राग्विकृतानभूत्वो- त्पन्नान् । इति प्रकृतिविकृतिस्वरा व्याख्याताः ॥ १५ ॥ वैकृतिक स्वर—रोगी का स्वर एडक (मेडा) के समान, भे भे की सी आवाज़ हो, अस्पष्ट, गद्गद (भरा हुआ), क्षाम (निर्बल), दीन (दुःख से बोला जाने वाला), कल (सूक्ष्म), ग्रस्त (निगली सी आवाज, मुख से शब्द न निकले), रोगियों के इस प्रकार के शब्द विकृति के होते हैं। इसी प्रकार जो स्वर प्राकृतिक स्वर से विपरीत अथवा नये प्रकार के देखने में आवें जो पहिले कभी न उत्पन्न हुए हों, उनको भी वैकृतिक स्वर समझे । इस प्रकार से प्राकृतिक और वैकृतिक स्वरो का वर्णन कर दिया ॥ १५ ॥ तत्र प्रकृतिवैकारिकाणां स्वराणामाश्वभिनिर्वृत्तिः स्वरानेकत्वमेकस्य चानेकत्वमप्रशस्तम् । इति स्वराधिकारः ॥ १६ ॥ जो स्वर प्रकृति और वैकृतिक स्वरो का शीघ्र उत्पन्न होना अथवा एक स्वर का कभी एडक की भांति और कभी दीन या क्षाम हो जाना, यह अमगळ सूचक है । यह स्वराधिकार समाप्त हुआ ॥ १६ ॥

अ० १] इन्द्रियस्थानम् १४१

अ० १] इन्द्रियस्थानम् १४१ इति वर्णस्वराधिकारौ यथावदुक्तौ मुमूर्षता ज्ञानार्थमिति ॥१७॥ मरणोन्मुख रोगी के लक्षणों को जानने के लिये वर्ण और स्वर के लक्षण यथावत् कह दिये हैं ॥ १७ ॥ भवन्ति चात्र—यस्य वैकारिको वर्णः शरीर उपजायते । अर्धे वा यदि वा कृत्स्ने निमित्तं न च नास्ति सः ॥ १८ ॥ जिस रोगी के आधे या सम्पूर्ण शरीर मे निमित्त के बिना वैकृतिक वर्ण उत्पन्न हो जाता है तो वह मनुष्य के मरने का लक्षण ही है ॥ १८ ॥ नीलं वा यदि वा श्याव ताम्र वा यदि वाऽरुणम् । मुखार्धमन्यथा वर्णो मुखार्धेऽरिष्टमुच्यते ॥ १६ ॥ जिस रोगी का आधा मुख नीला, काला, ताम्बे के रंग का अथवा लाल रंग का हो जाता है और आधा मुख दूसरे प्रकार का रंग का हो, यह लक्षण मृत्यु का है ॥ १६ ॥ स्नेहो मुखार्धे सुव्यक्तो रौक्ष्यमर्धमुखे भृशम् । ग्लानिरर्धे तथा हर्षो मुखार्धे प्रेतलक्षणम् ॥ २० ॥ यदि मुख के आधे भाग में स्नेह दीखता हो और आधे में रूखता दीखता हो, आधे मुख मे ग्लानि और आधे मुख पर हर्ष के चिह्न हों तो यह मरने वाले के लक्षण हैं ॥ २० ॥ तिलकाः पिप्लवो व्यङ्गा राजयश्च पृथग्विधाः । आतुरस्याशु जायन्ते मुखे प्राणान्मुमुक्षतः ॥ २१ ॥ प्राण त्यागने वाले रोगी के मुख पर तथा मुख के अन्दर तिल, फुन्सी ( पिप्लु ), व्यंग, भिन्न २ प्रकार की रेखायें शीघ्र उत्पन्न होती हैं ॥ २१ ॥ पुष्पाणि नखदन्ते वा पङ्को वा दन्तसश्रितः । चूर्णको वाऽपि दन्तेषु लक्षणं मरणस्य तत् ॥ २२ ॥ जिस रोगी के नख या दातों पर फूल, दातों में मैल और चूर्ण उत्पन्न हो जाता है, यह मरने का लक्षण है ॥ २२ ॥ ओष्ठयोः पादयोः पाण्योरक्षणोर्मूत्र-पुरीषयोः । नखेष्वपि च वैवर्ण्यमेतत्क्षीणबलेऽन्तकूत् ॥ २३ ॥ क्षीण हुए रोगी के ओंठ, पाव हाथ, आख मूत्र और मल तथा नख इनमें रंग परिवर्त्तन होना रोगी का अन्त कर देता है ॥ २३ ॥ यस्य नीलावुभावोष्ठौ पक्व-जाम्बव-सन्निभौ । मुमूर्षुरिति तं विद्यान्नरो धीरो गतायुषम् ॥ २४ ॥

१४२ चरकसंहिता [ अ० २

जिस रोगी के दोनों ओठ नीले रंग के अथवा पके जामुन के समान हो जाये, उसको मरने वाला समझना चाहिये, उसकी आयु समाप्त हो गई है ॥२४॥ एको वा यदि वाऽनेको यस्य वैकारिकः स्वरः । सहसोत्पद्यते जन्तोर्हीयमानस्य नास्ति सः ॥ २५ ॥ जिस रोगी में वैकारिक स्वर एक या अनेक प्रकार के स्वर उत्पन्न हो जाते हैं, वह क्षीण होता हुआ रोगी जीवित नहीं रहता ॥ २५ ॥ यच्चान्यदपि किञ्चित्स्याद्वैकृतं स्वरवर्णयोः । बलमांसविहीनस्य तत्सर्वं मरणोदयम् ॥ २६ ॥ बल, मांस से विहीन रोगी में इनके अतिरिक्त स्वर और वर्ण में कुछ वैका- रिक भाव आ जाये तो यह सब मृत्यु के सूचक हैं ॥ २६ ॥ तत्र श्लोकः—इति वर्णस्वरावुक्तौ लक्षणार्थं मुमूर्षताम् । यस्तु सम्यग्विजानाति नाऽऽयुर्ज्ञाने स मुह्यति ॥ २७ ॥ जो वैद्य मरणोन्मुख पुरुषों के वर्ण स्वर के इन लक्षणों को भली प्रकार जानता है, वह आयु के परिज्ञान में कभी धोखा नहीं खाता ॥ २७ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने वर्णस्वरीयमिन्द्रिय नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

द्वितीयोऽध्यायः अथातः पुष्पितमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ इसके आगे ‘पुष्पितक इन्द्रिय’ नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ पुष्पं यथा पूर्वरूपं फलस्येह भविष्यतः । तथा लिङ्गमरिष्टाख्यं पूर्वरूपं मरिष्यतः ॥ ३ ॥ अप्येवं तु भवेत्पुष्पं फलेनाननुबन्धि यत् । फलं चापि भवेत्किञ्चिद्यस्य पुष्पं न पूर्वजम् ॥ ४ ॥ न त्वरिष्टस्य जातस्य नाशोऽस्ति मरणादृते । मरणं चापि तन्नास्ति यन्नारिष्टपुरःसरम् ॥ ५ ॥ जिस प्रकार भविष्य में होने वाले फल का पूर्वरूप ‘पुष्प’ होता है, उसी प्रकार मरणोन्मुख पुरुष के लक्षण ‘अरिष्ट’ नाम से होते हैं ।

अ० २ ] इन्द्रियस्थानम् १४३

अ० २ ] इन्द्रियस्थानम् १४३ अपवाद—ऐसे पुष्प भी होते हैं जिनमें फल उत्पन्न नहीं होता और कई ऐसे फल होते हैं जिनमें पहिले फूल नहीं आता [ जैसे बेंत मे बिना फूल आए ही शाखा से ही फल पैदा होता है, इसी प्रकार गूलर में भी फूल नहीं होता ], परन्तु अरिष्ट लक्षणों में ऐसा नहीं होता । ऐसा मरण नही जिसके पूर्व अरिष्ट लक्षण उत्पन्न नहीं होते और अरिष्ट लक्षण उत्पन्न होने के बाद मरण हुए बिना नही रहता । [ अरिष्ट लक्षण दो प्रकार के हैं। (१) नियत और (२) अनि- यत । नियत अरिष्ट वे हैं जिनसे मृत्यु का होना निश्चित ही है, अनियत (अनि- श्चित) वे हैं जिनसे मरण संदेह में होता है। रसायन और तप द्वारा इन लक्षणो को दूर भी किया जा सकता है। ] ॥ ३-५ ॥ मिथ्यादृष्टमरिष्टाभमनरिष्टमजानता । अरिष्टं चाप्यसबुद्धमेतत्प्रज्ञापराधजम् ॥ ६ ॥ अरिष्ट लक्षणो को यथार्थ न समझना, न उत्पन्न हुए अरिष्ट लक्षणों को बुद्धि दोष से अरिष्ट लक्षण समझ लेना, अथवा उत्पन्न हुए अरिष्ट लक्षणो को न पहिचान सकना, ये सब बुद्धिदोष से होता है ॥ ६ ॥ ज्ञानसंबोधनार्थं तु लिङ्गैरमरणपूर्वजैः । पुष्पितानुपदेक्ष्यामो नरान् बहुविधेर्बहून् ॥ ७ ॥ नानापुष्पोपमो गन्धो यस्य वाति दिवानिशम् । पुष्पितस्य वनस्येव नानाद्रुमलतावतः ॥ ८ ॥ तमाहुःपुष्पितं धीरा नरं मरणलक्षणे । स ना संवत्सराद्देहं जहातीति विनिश्चयः ॥ ९ ॥ पुष्पित का लक्षण— ज्ञान कराने के लिये मृत्यु से पूर्व होने वाले लक्षणों द्वारा 'पुष्पित' अरिष्ट युक्त नानाप्रकार के रोगियो का वर्णन करते है । (१) जिस पुरुष के शरीर से नाना प्रकार के वृक्ष लताओं से भरे वन की भाति नाना प्रकार के फूलो की गन्ध के तुल्य गन्ध रात दिन बहती है, उस पुरुष को बुद्धिमान् पुरुष 'पुष्पित' कहते हैं, ये मृत्यु के लक्षण हैं। इन लक्षणो से मनुष्य एक साल के भीतर ही प्राणों को छोड़ता है ॥ ७-९ ॥ एवमेकैकश पुष्पैर्यस्य गन्धः समो भवेत् । इष्टैर्वा यदि वाऽनिष्टैः स च पुष्पित उच्यते ॥ १० ॥ समासेनाशुभान् गन्धानेकत्वेनाथ वा पुमान् । आजिघ्रेद्यस्य गात्रेषु तं विद्यात्पुष्पितं भिषक् ॥ ११ ॥

१४४ चरकसंहिता [ अ० २ आप्लुतानाप्लुते काये यस्य गन्धाः शुभाशुभाः । व्यत्यासेनानिमित्ताः स्युः स च पुष्पित उच्यते ॥ १२ ॥ ( २ ) इसी प्रकार जिस मनुष्य के शरीर से अच्छी या बुरी, किसी एक फूल की गन्ध के समान गन्ध आये, इसको भी ‘पुष्पित’ कहा जाता है । संक्षेप से, ( ३ ) जिस पुरुष के शरीर से नाना प्रकार की अशुभ गन्धों को वैद्य सूँघ ले उसे भी 'पुष्पित' ही जाने । ( ४ ) स्नान किये अथवा बिना ही स्नान किये जिसके शरीर से सुगन्ध या दुर्गन्ध आये, वह पुष्पित' कहा जाता है [ अर्थात् स्नान करने पर अशुभ और स्नान न करने पर शुभ गन्ध आये तो 'पुष्पित' समझना चाहिये ] ॥ १२ ॥ तद्यथा चन्दनं कुष्ठं तगरागुरूणी मधु । माल्यं मूत्रपुरीषे च मृतानि कुणपानि च ॥ १३ ॥ ये चान्ये विविधात्मानो गन्धा विविधयोनयः । तेऽप्येनेनानुमानेन विज्ञेया विकृतिं गताः ॥ १४ ॥ इदं चाप्यतिदेशार्थं लक्षणं गन्धसंश्रयम् । वक्ष्यामो यदभिज्ञाय भिषङ् मरणमादिशेत् ॥ १५ ॥ वियोनिर्विदुरो यस्य गन्धो गात्रेषु दृश्यते । इष्टो वा यदि वाऽनिष्टो न स जीवति ता समाम् ॥ १६ ॥ एतावद् गन्धविज्ञानम् । चन्दन, कूठ, तगर, मधु, फूल, मूत्र, मल, मुर्दे या दूसरे सड़े गन्ध अथवा नाना प्रकार के जो अन्य नाना पदार्थों से उत्पन्न होते हैं उन गन्धों को भी अनुमान से विकारजन्य जानना चाहिये । गन्ध के आश्रित लक्षणों को भी विस्तार से कहेगे; जिनको जान कर वैद्य रोगी के मरण को बतला सके । जिस रोगी के शरीर से बिना कारण के स्थिर गन्ध अथवा अच्छी या बुरी गन्ध आती हो, वह एक सालमें अवश्य मर जाता है । गन्ध-विज्ञान प्रकरण इतना ही है ॥१६॥ रसज्ञानमतः परम् । आतुराणां शरीरेषु वक्ष्यामो विधिपूर्वकम् ॥ १७ ॥ यो रसः प्रकृतिस्थानां नराणां देहसंभवः । स एषा चरमे काले विकारान् भजते द्वयम् ॥ १८ ॥ कश्चिदेवास्य वैरस्यमत्यर्थमुपपद्यते । स्वादुत्वमपरश्चापि विपुलं भजते रसः ॥ १९ ॥