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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

प्र० १ ] शारीरस्थानम् १६

प्र० १ ] शारीरस्थानम् १६ कहते हैं। क्योंकि स्मृति में स्थित वस्तु का स्मरण होना ही चाहिये, उसका स्मरण न होना ही 'स्मृतिभ्रंश' है॥ १०१ ॥ धीधृतिस्मृतिविभ्रष्टः कर्म यत्कुरुतेऽशुभम् । प्रज्ञापराधं तं विद्यात्सर्वदोषप्रकोपणम् ॥ १०२ ॥ प्रज्ञापराध—बुद्धि, धृति और स्मृति से भ्रष्ट हुआ पुरुष जो अशुभ, अहित कर्म करता है, वह सब शारीरिक एव मानसिक दोषो को कुपित करने वाला 'प्रज्ञापराध' कहा जाता है ॥१०२॥ उदीरणं गतिमतामुदीर्णानां च निग्रहः। सेवनं साहसानां च नारीणां चातिसेवनम् ॥ १०३ ॥ कर्मकालातिपातश्च मिथ्यारम्भश्च कर्मणाम् । विनयाचारलोपश्च पूज्यानां चाभिधर्षणम् ॥ १०४ ॥ ज्ञातानां स्वयमर्थानामहितानां निषेवणम् । परमोन्मादिकानां च प्रत्ययानां निषेवणम् ॥ १०५ ॥ अकालादेशसंचारौ मैत्री संक्लिष्टकर्मभिः । इन्द्रियोपक्रमोक्तस्य सद्-वृत्तस्य च वर्जनम् ॥ १०६ ॥ ईर्ष्यामानभयक्रोधलोभमोहमदभ्रमाः । तज्जं वा कर्म यत्क्लिष्टं यद्वा तद्देहकर्म च ॥ १०७॥ यच्चान्यदीदृशं कर्म रजोमोहसमुत्थितम् । प्रज्ञापराधं तं शिष्टा ब्रुवते व्याधिकारणम् ॥ १०८ ॥ गमनशील मूत्र पुरीष के अनुपस्थित वेगो को बलात् निकालना, उपस्थित मल मूत्रादि के वेगों को रोकना, साहसिक कार्यों का करना, स्त्रियों का अति सेवन, चिकित्साकाल का अतिक्रमण, मन आदि कार्यों का मिथ्या-आरम्भ, विनय और आचार का लोप, पूज्य जनों का तिरस्कार, जाने हुए अहितकारा पदाथो का सेवन, उन्माद रोग में कहे कारणो का सेवन करना, निषिद्ध समयों और निषिद्ध स्थानों में जाना, पतित आचार वाले मनुष्यों के साथ मैत्री करना, 'इन्द्रियोपक्रमणीय' (सूत्र० ८) अध्याय में कहे सद्वृत्त का पालन न करना, ईर्ष्या, मान, भय, क्रोध, लोभ, मोह, मद और भ्रम इन मानस दोषों का वा इन से उत्पन्न निन्दित कर्मों को करना, शरीर को दुःख देने वाले कर्म का करना, इनके अतिरिक्त और जो भी इस प्रकार रज और मोह से उत्पन्न कर्म होते हैं उन सब रोग कारक कारणों को शिष्ट मनुष्य 'प्रज्ञापराध' ही कहते हैं ॥ १०८ ॥

२० चरकसंहिता [ अ० १ बुद्ध्या विषमविज्ञानं विषमं च प्रवर्तनम् । प्रज्ञापराधं जानीयान्मनसो गोचर हि तत् ॥ १०६ ॥ बुद्धि से विषम ( सम के विपरीत, अयथार्थ ) जानना, विषम रूप मे प्रवृत्ति करना, यह प्रज्ञापराध है । यह प्रज्ञापराध मानस दोष है ॥ १०६ ॥ निर्दिष्टा कालसंप्राप्तिर्व्याधीना हेतुसंग्रहे । चयप्रकोपप्रशमाः पित्तादीना यथा पुरा ॥ ११० ॥ रोगों के हेतु रूप से काल को (कियन्त शिरसीय अध्याय सूत्र० १७ में) कह चुके है । वही पर पित्तादि का जय, प्रकोप एव प्रशमन भी काल के कारण कह दिया है ॥११०॥ मिथ्यातिहीनलिङ्गाश्च वर्षान्ता रोगहेतवः । जीर्णभुक्तप्रजीर्णान्नकालाकालस्थितिश्च या ॥ १११ ॥ पूर्वमध्यापराह्नाश्च रात्र्या यामाश्रयश्च ये । तेषु कालेषु नियता ये रोगास्ते च कालजाः ॥ ११२ ॥ कालज रोग—वर्षा के अन्त वा शरद् से प्रारम्भ होने वाली छः ऋतुए मिथ्या, हीन और अति लक्षणों वाली होती हैं । मिथ्या लक्षण जैसे ग्रीष्म ऋतु में शीत होना । हीनलिङ्ग जैसे—गरमी में गरमी का कम होना । अति- लिङ्ग जैसे—ग्रीष्म में गरमी का अधिक होना इत्यादि । जो भुक्त, जीर्ण और प्रजीर्ण काल में, जो पूर्वाह्न, मध्याह्न एव अपराह्न मे, और जो रोग रात्रि के पूर्व प्रहर, मध्यम प्रहर और अपर प्रहर में होते है वे सब रोग कालजन्य हैं । इन सब में काल कारण होता है । [ अन्न के खाने पर, पूर्वाह्न में और प्रदोष में श्लेष्मा प्रकुपित होता है । अन्न की पच्यमान अवस्था में, मध्याह्न में और रात्रि के मध्य प्रहर मे पित्त और अन्न के जीर्ण होने पर, अपराह्न मे और तीसरे याम मे वायु कुपित होता है । इन समयों में इन्ही दोषों के रोग होते हैं ] ॥ १११-११२ ॥ अन्येद्युष्को द्वयहग्राही तृतीयकचतुर्थकौ । स्वे स्वे काले प्रवर्तन्ते काले ह्येषा बलागमः ॥ ११३ ॥ एते चान्ये च ये केचित्कालजा विविधा गदाः । अनागते चिकित्स्यास्ते बलकालौ विजानता ॥ ११४ ॥ प्रतिदिन होने वाला, 'द्वयहग्राही' दिन में दो बार होने वाला, 'तृतीयक' एक दिन छोड़ कर तीसरे दिन आने वाला, 'चतुर्थक' बीच में दो दिन छोड़ कर होने वाला ( ज्वर ) अपने अपने समय में होते हैं, यही इनके बल का

अ० १ ] शारीरस्थानम् २१

अ० १ ] शारीरस्थानम् २१ समय होता है । ये अथवा जो यहा पर कालजन्य रोग नहीं कहे, इन सब रोगों में निदान आदि जन्य काल को जान कर बल और काल के आने से पूर्व ही चिकित्सा करनी चाहिये । ज्वर चढने के समय से पूर्व ही चिकित्सा करनी उचित है ॥ ११३-११४ ॥ कालस्य परिणामेन जरामृत्युनिमित्तजा । रोगाः स्वाभाविका दृष्टाः, स्वभावो निष्प्रतिक्रियः ॥ ११५ ॥ काल परिणाम से बुढापा, मृत्यु, मरणरूपी स्वाभाविक रोग होते हैं । इनकी कोई चिकित्सा नहीं, क्योंकि स्वभाव का कोई उपाय नहीं है ॥ ११५ ॥ निर्दिष्टं दैवशब्देन कर्म यत्पूर्वदैहिकम् । हेतुस्तदपि कालेन रोगाणामुपलभ्यते ॥ ११६ ॥ न हि कर्म महत्किंचित्फलं यस्य न भुज्यते । क्रियाघ्नाः कर्मजा रोगाः, प्रशमं यान्ति तत्क्षयात् ॥ ११७ ॥ पूर्व शरीर में किये कर्म को 'दैव' शब्द से कहा जाता है । यह कर्म भी काल वश से रोगों का कारण होता है । ऐसा कोई भी छोटा या बड़ा कर्म नहीं है, जिसका कि फल नही भोगना पड़ता । सब कर्मों का फल भोगना ही होता है । कर्मजन्य रोगो मे चिकित्सा सफल नहीं होती । ये रोग चिकित्सा क्रिया को नष्ट करने वाले हैं । वे रोगो के कारण रूप कर्मों के क्षय होने पर ही शान्त हो जाते है ॥ ११५-११७ ॥ अत्युग्रशब्दश्रवणाच्छ्रवणात्सर्वशो न च । शब्दाना चातिहीनाना भवन्ति श्रवणाज्जडाः ॥ ११८ ॥ परुषोद्वीषणाशस्ताप्रियव्यसनसूचकैः । शब्दैः श्रवणसंयोगो मिथ्यायोग स उच्यते ॥ ११९ ॥ असंस्पर्शोऽतिमस्पर्शो हीनसंस्पर्श एव च । स्पृश्याना सग्रहेणोक्तः स्पर्शनेन्द्रियबाधक ॥ १२० ॥ यो भूतविषवातानामकालेनागतश्च यः। स्नेहशीतोष्णसस्पर्शो मिथ्यायोगः स उच्यते ॥ १२१ ॥ रूपाणां भास्वता दृष्टिविनश्यति हि दर्शनात् । दर्शनाच्चातिसूक्ष्माणां सर्वशश्चाप्यदर्शनात् ॥ १२२ ॥ दृष्टभैरवबीभत्सदूरातिश्लिष्टदर्शनात् । तामसानां च रूपाणां मिथ्यासयोग उच्यते ॥ १२३ ॥ अत्यादानमनादानमोकसात्म्यादिभिश्च यत् ।

२२ चरकसंहिता [ अ० १ रसानां विषमादानमल्पादान च दूषणम् ॥ १२४ ॥ अतिमृद्वतितीक्ष्णानां गन्धानामुपसेवनम् । असेवनं सर्वशश्च घ्राणेन्द्रियविनाशनम् ॥ १२५ ॥ पूतिभूतविषद्दिष्टा गन्धा ये चाप्यनार्तवाः । तैर्गन्धैर्घ्राणसंयोगो मिथ्यायोगः स उच्यते ॥ १२६ ॥ अति उग्र शब्दों का सुनना यह शब्द का अतियोग है, शब्द का बिल्कुल न सुनना या बहुत धीमे शब्दों को सुनना हीनयोग और कठोर, भीषण, अशुभ, अप्रिय, विपत्तिसूचक शब्दों का सुनना मिथ्यायोग है । स्पृश्य वस्तुओं का बिल्कुल स्पर्श न करना असस्पर्श, थोड़ा स्पर्श करना हीनसस्पर्श, अधिक स्पर्श करना अतिसस्पर्श, निन्दित द्रव्य विष आदि का स्पर्श वा बिना क्रम से उष्ण, शीत स्पर्श करना, स्पर्शक्रिया का मिथ्यायोग है । यह स्पर्शन इन्द्रियो के नाशक हैं । चमकीले पदार्थों को देखने से दृष्टि नष्ट हो जाती है, इसी प्रकार अतिसूक्ष्म पदाथो को देखने वा रूप को बिल्कुल न देखना भी अयोग है । इससे भी दृष्टि नष्ट हो जाती है । अप्रतिकर, भयंकर, घृणाजनक, दूर के, वा मिले पदार्थों और तामस रूपो को देखना यह रूपो का मिथ्यायोग है । रसों का अति सेवन अतियोग, सर्वथा सेवन न करना या थोड़ा सेवन करना 'अयोग' ओकसात्म्य आदि से विषम ( राशि दोष को छोड़ कर शेष आहार विधि में कहे विशेष अथ्यों को ) सेवन करना मिथ्यायोग है । अति मृदु या अल्प गन्ध वाले पदाथो का सेवन अयोग, अति तीक्ष्ण पदाथो को सूंघना अतियोग, घ्राणेन्द्रिय के नाशक पूति ( दुर्गंध ) आदि गन्धों का तथा जो ऋतु काल के गन्ध नहीं है, उन गन्धों का सूंघना मिथ्यायोग है ॥११८-१२६॥ इत्यसात्म्येन्द्रियसंयोगस्त्रिविधो दोषकोपनः । असात्म्यमिति तद्विद्याद्यन्न याति सहात्मताम् ॥ १२७ ॥ जो आत्मा के अनुकूल नही होता उसे 'असात्म्य' जाने । यह असात्म्य तीन प्रकार का है । और अर्थों का आत्मा के साथ सयोग तीन प्रकार का है । अतियोग, अयोग और मिथ्यायोग । इन से दोष कुपित होते हैं ॥ १२७ ॥ मिथ्यातिहीनयोगेभ्यो यो व्याधिरुपजायते । शब्दादीना स विज्ञेयो व्याधिरैन्द्रियको बुधैः ॥ १२८ ॥ शब्द आदि इन्द्रियों से ग्राह्य विषयों के मिथ्यायोग, अयोग और अतियोग से जो व्याधि उत्पन्न होती है, उनको विद्वान् 'ऐन्द्रियक' ( इन्द्रियों से उत्पन्न

अ० १ ] शारीरस्थानम् २३

अ० १ ] शारीरस्थानम् २३ हुआ रोग ) कहते हैं। [ रस को छोड़ कर सब असात्म्य विषय अपनी २ इन्द्रिय के रोग उत्पन्न करते हैं। रस सम्पूर्ण शरीर में रोग उत्पन्न करता है, यह ध्यान रखना चाहिये ] ॥ १२८ ॥ वेदनानामसात्म्यानामित्येते हेतवः स्मृताः। सुखहेतुर्मतस्त्वेकः समयोग सुदुर्लभः ॥ १२६ ॥ यह विषयों का ( काल और बुद्धि का भी ) अतियोग, अयोग और मिथ्या- य ग शारीरिक एवं मानसिक दानों प्रकार के रोगों के तीन प्रकार के कारण है। असात्म्य दुःखों का कारण है। इन विषयों का ( काल और बुद्धि का भी ) समान योग अकेला ही सुख सञ्ज्ञक आरोग्य का कारण है। ऐसा समयोग दुर्लभ है ॥ १२६ ॥ नेन्द्रियाणि न चैवार्थाः सुखदुःखस्य हेतवः । हेतुस्तु सुखदुःखस्य योगो दृष्टश्चतुर्विध ॥ १३० ॥ न तो इन्द्रिया और न इनके विषय ही सुख दुःख का कारण हैं। जो योग सुख दुःख का कारण होता है वह चार प्रकार का है। इनमें समयोग सुख का कारण है, अतियाग, अयोग और मिथ्यायोग दुःख के कारण है ॥ १३० ॥ सन्तीन्द्रियाणि सन्त्यर्था योगो न च न चास्ति रुक् । न सुख, कारण तस्माद्याग एव चतुर्विध. ॥ १३१ ॥ क्योकि इन्द्रिया भी ह और विषय भी हैं। यदि योग चार प्रकार न हो तो न दुःख हो और न सुख हो । इसलिये अन्वय-व्यतिरेक से यह चार प्रकार का याग ही सुख-दुःख का कारण है ॥ १३१ ॥ नात्मेन्द्रियमनोबुद्धिगोचर कर्म वा विना । सुखदुःखं यथा यच्च बोद्धव्यं तत्तथोच्यते ॥ १३२ ॥ आत्मा, इन्द्रिय, बुद्धि ओर मन के बिना, इन्द्रियों के विषयों के बिना, अदृष्ट के बिना न सुख और न दुःख होता है। आत्मा आदि के होने पर जिस प्रकार से सुख दुःख होते हैं, उनको उसी प्रकार बतलाते है। [ आत्मा मे उपशय ( अनुकूलता ) होने से सुख और आत्मा में अनुपशय ( प्रतिकूलता ) हाने से दुःख होता है। अतियोग, अयोग और मिथ्यायोग ये अनुपशय के कारण हैं और समयोग उपशय का कारण है ] ॥ १३२ ॥ स्पर्शननेन्द्रियसंस्पर्शः स्पर्शो मानस एव च । द्विविधः सुखदुःखानां वेदनानां प्रवर्तकः ॥ १३३ ॥

२४ चरकसंहिता [अ० १ स्पर्शनेन्द्रिय (त्वचा) का सम्बन्ध और मानस स्पर्श यह दो प्रकार का स्पर्श सुख दुःख वेदनाओं का प्रवर्त्तक है। [त्वचा और मन का सयोग होने से ही ज्ञान होता है। त्वचा सब इन्द्रियों में व्याप्त है। मन का त्वचा के साथ सम्बन्ध होने से मन भी सब इन्द्रियो से सम्बन्धित हो जाता है। इस प्रकार मन अणु होने पर भी जिस इन्द्रिय के साथ सम्बन्ध करता है उसी इन्द्रिय का ज्ञान हो जाता है] ॥ १३३ ॥ इच्छाद्वेषात्मिका तृष्णा सुखदुःखात्प्रवर्त्तते । तृष्णा च सुखदुःखानां कारणं पुनरुच्यते ॥ १३४ ॥ उपादत्ते हि सा भावान् वेदनाश्रयसञ्ज्ञकान् । स्पृश्यते नानुपादाने नास्पृष्टो वेत्ति वेदनाः ॥ १३५ ॥ सुख दुःख मे इच्छा और द्वेष रूप तृष्णा उत्पन्न होती है। तृष्णा ही सुख दुःख में प्रवृत्ति करके जन्म का कारण होती है। क्योकि यही तृष्णा वेदनाओं के आश्रय स्थान (मन, देह और इन्द्रियों) को उत्पन्न करती है। वेदनाओं के आश्रयों की उत्पत्ति न होने से स्पर्शनेन्द्रिय और मन का स्पर्श नहीं होता। स्पर्शनेन्द्रिय और मन का स्पर्श न होने से वेदना भी नहीं होती ॥१३५॥ वेदनानामधिष्ठानं मनो देहश्च सेन्द्रियः । केशलोमनखाग्रान्नमलद्रवगुणैर्विना ॥ १३६ ॥ सुख दुख आदि वेदनाओं का आश्रय सत्व सञ्ज्ञक मन, इन्द्रियों सहित चेतना और जीवित शरीर है। इनमे केश (शिर के बाल), लोम (शरीर के बाल) नखों के अग्र भाग, अन्न के मल, द्रव और गुण जैसे—शब्द, गन्ध, रूप, रस, स्पर्श इन को छोड़ कर शेष इन्द्रियों सहित शरीर वेदनाओं का आश्रय स्थान है ॥१३६॥ योगे मोक्षे च सर्वासां वेदनानामवर्त्तनम् । मोक्षे निवृत्तिर्निःशेषा योगो मोक्षप्रवर्त्तकः ॥ १३७ ॥ आत्मेन्द्रियमनोर्थानां सन्निकर्षात्प्रवर्त्तते । सुखदुःखमनारम्भादात्मस्थे मनसि स्थिरे ॥ १३८॥ निवत्र्त्तन्ते तदुभयं वशित्वं चोपजायते । सशरीरस्य योगज्ञास्तं योगमृषयो विदुः ॥ १३६ ॥ योग और मोक्ष (परम मुक्ति) में सब प्रकार की वेदनाओं की समाप्ति हो जाती है। मोक्ष मे वेदनाओं की अत्यन्त निवृत्ति हो जाती है, योग में ऐसा नहीं होता। योग मोक्ष का प्रवर्त्तक (साधन) है।

अ० १ ] शारीरस्थानम् २५

अ० १ ] शारीरस्थानम् २५ जीवन्मुक्त दशा में रहता है, मोक्ष में परम मुक्ति हो जाती है ] । आत्मा, इन्द्रिय, अर्थ, और मन के सन्निकर्ष से सुख दुख उत्पन्न होते हैं और जब विषयों से हट कर मन आत्मा में स्थिर हो जाता है, तब कर्मों का आरम्भ न होने से सुख-दुख समाप्त हो जाते हैं और वशित्व उत्पन्न हो जाता है, यही योग का फल है । ⁂ योग को जानने वाले ऋषि शरीर युक्त इस दुख- निवृत्ति रूप स्थिति को योग कहते हैं ॥ १३७-१३६॥ आवेशश्चेतसो ज्ञानमर्थाना छन्दत क्रिया । दृष्टिः श्रोत्रं स्मृतिः कान्तिरिष्टतश्चाप्यदर्शनम् ॥ १४० ॥ इत्यष्टविधमाख्यातं योगिना बलमैश्वरम् । शुद्धसत्त्वसमाधानात्तत्सर्वमुपजायते ॥ १४१ ॥ योगियों का आठ प्रकार का ऐश्वर्य्य—आवेश (दूसरे के शरीर में प्रवेश करना), चित्त का ज्ञान अर्थात् (दूसरे के चित्त को जानना), विषयों का इच्छानुसार करना, इच्छानुसार दर्शन, श्रवण, अतीन्द्रिय और दूर के भी पदार्थों को देखना, शब्दों को सुनना, इच्छानुसार स्मरण (पूर्वजन्म का भी स्मरण), इच्छानुसार रूप बनाना और इच्छानुसार अदृश्य हो जाना यह योगियों का आठ प्रकार का यागजन्य बल है । यह सब शुद्ध सत्त्व, रज और तम से रहित मन को विषयों से हटा कर आत्मा मे लगाने से उत्पन्न होता है ॥ १४०-१४१ ॥ मोक्षो रजस्तमोऽभावाद्वलवत्कर्मसंक्षयात् । वियोगः सर्वसंयोगैरपुनर्भाव उच्यते ॥ १४२॥ रज और तम दो मानस दोष हैं। इनके निवृत्त होने पर और अवश्य भोक्तव्य कर्मा के ( फल भोग द्वारा ) क्षय होने से कर्मबन्धनों से मुक्ति अर्थात् मोक्ष हो जाता है । मोक्ष होने पर फिर जन्म ग्रहण नहीं करना होता, इसी को 'अपुनर्भव' कहते हैं ॥१४२॥ सतामुपासन सम्यगसता परिवर्जनम् । व्रतचर्योपवासश्च नियमाश्च पृथग्विधाः ॥ १४३ ॥ धारण धर्मशास्त्राणा विज्ञानं विजने रतिः । विषयेष्वरतिर्मोक्षे व्यवसायः परा धृतिः ॥ १४४ ॥ कर्मणामसमारम्भः कृताना च परिक्षयः । ⁂ आत्मस्थे मनसि शरीरस्य दुःखाभव स योग. ॥ वै० द० ५ । २ । १६ ॥

तत्त्वस्मृतेरुपस्थानात् सर्वमेतत्प्रवर्तते ॥ १४६ ॥

२६ चरकसंहिता [अ० १ नैष्कर्म्यमनहङ्कारः संयोगे भयदर्शनम् ॥ १४५ ॥ मनोबुद्धिसमाधानमर्थतत्त्वपरीक्षणम् । तत्त्वस्मृतेरुपस्थानात् सर्वमेतत्प्रवर्तते ॥ १४६ ॥ मोक्ष के उपाय—सज्जनों की सेवा, दुर्जनों का त्याग, ब्रह्मचर्य, उपवास, नाना प्रकार के नियम, धर्म शास्त्रों का अभ्यास, आत्मा आदि का जानना, निर्जन स्थान में रति, विषयों में अनासक्ति, मोक्ष में प्रयत्न करना, धैर्य, कार्यों के फल की इच्छा ने न करना, किये हुए कर्मों का फल भोग करके क्षय करना गृहस्थाश्रम से निकलना, सन्यास ग्रहण करना, अहङ्कार का परित्याग, शरीरादि संयोग में अथवा मनुष्यों के सम्पर्क में आने मे भय मानना, मन और बुद्धिका समाधान, वस्तुओं की तत्त्व रूप से परीक्षा करना, यह सब तत्त्वज्ञान योग के उपस्थित होने से होता है ॥ १४३–१४६ ॥ स्मृतिः सत्सेवनाद्यैश्च धृत्यन्तैरुपलभ्यते । स्मृत्वा स्वभावं भावाना स्मरन् दुःखात्प्रमुच्यते ॥ १४७ ॥ स्मृति—तत्त्वस्मृति सज्जन पुरुषों के संसर्ग से लेकर धैर्य तक कहें हुए लक्षणो से उपलब्ध हो जाती है, तब पुरुष आत्मा आदि भावों के स्वरूप का स्मरण करक तत्त्व को जानता हुआ दुःखों से छूट जाता है ॥ १४७ ॥ वक्ष्यन्ते कारणान्यष्टौ स्मृतिर्यैरुपजायते । निमित्तरूपग्रहणात्सा दृश्यात्सविपर्ययात् ॥ १४८ ॥ सत्त्वानुबन्धादभ्यासाज्ज्ञानयोगात्पुनः श्रुतात् । दृष्टश्रुतानुभूतानां स्मरणात्स्मृतिरुच्यते ॥ १४६ ॥ स्मृति की उत्पत्ति के आठ कारण—जिन कारणो से यह स्मृति उत्पन्न होती है उन २ कारणों का उपदेश करते हैं। जैसे-- (१) निमित्त-कारण से इनका ग्रहण, जैसे धूम को देख कर अग्नि का रूप दर्शन से (२) वातिक लक्षणो से वातिक रोग का स्मरण होता है। (३) सादृश्य से जैसे देवदत्त के समान चित्र को देख कर देवदत्त का स्मरण होता है (४) सादृश्य-विपर्यय अर्थात् असादृश्य से, अत्यन्त विरुद्ध वस्तु के दर्शन से दूसरे का स्मरण होता है जैसे दुःख से पूर्व अनुभूत सुख का स्मरण होता है । (५) सत्त्व (मन) के प्रणिधान अर्थात् मनोयोग करने से । (६) अभ्यास से । (७) तत्त्वज्ञान से । (८) फिर सुनने से भूली बात फिर स्मरण हो जाती है । पूर्व दृष्ट, पूर्व श्रुत और पूर्व अनुभूत पदार्थों के स्मरण को 'स्मृत' कहते हैं ॥ १४८-१४६ ॥

अ० १ ] शारीरस्थानम् २७

अ० १ ] शारीरस्थानम् २७ एतत्तदेकमयनं मुक्तैर्मोक्षस्य दर्शितम् । तत्त्वस्मृतिबलं, येन गता न पुनरागताः ॥ १५० ॥ मुक्त पुरुषों ने इस तत्त्वस्मृति के बल को मोक्ष का एक ऐसा श्रेष्ठ मार्ग बताया है जिस मार्ग से गये हुए पुरुष फिर यहा पर वापिस नही आते ॥१५०॥ अयनं पुनराख्यातमेतद्योगस्य योगिभिः । संख्यातधर्मैः सांख्यैश्च मुक्तैर्मोक्षस्य चायनम् ॥ १५१ ॥ योगी पुरुष इस तत्त्वस्मृति के बल को ही योग का मार्ग कहते हैं और सत्यज्ञानी और मुक्त पुरुष इस स्मृतिबल को भी मोक्ष का एक मार्ग कहते हैं ॥ १५१ ॥ सर्वं कारणवद् दुःखमस्वं चानित्यमेव च । न चात्मकृतकं तद्धि तत्र चोत्पद्यते स्वता ॥ १५२ ॥ यावन्नोत्पद्यते सत्या बुद्धिर्नैतदहं यथा । नैतन्मम च विज्ञाय ज्ञः सर्वमतिवर्तते ॥ १५३ ॥ कारणवान् अर्थात् उत्पन्न हाने वाला सम्पूर्ण वस्तुए बुद्धि, अहंकार आदि आत्मा से भिन्न दुःख रूप हैं, वे दुःख उत्पन्न करता हैं और कारणवान् होने से अनित्य है । आत्मा कारण रहित और नित्य है । जो वस्तु कारणवाली होती है, उसमें ममता उत्पन्न होती है । अनात्मा में आत्मबुद्धि 'यह मेरा शरीर, मैं गोरा हूं, मोटा हूं' इस प्रकार का मिथ्याज्ञान तब तक रहता है, जब तक सत्यबुद्धि अर्थात् तत्त्वज्ञान उत्पन्न नही होता । सत्यबुद्धि उत्पन्न हाने पर 'मेरा यह शरीर नहीं, मैं गोरा नहीं' यह ज्ञान हो जाता है । इस ज्ञान के होने पर ज्ञानी जन्म, कर्म आदि सब बन्धनों का अतिक्रमण कर जाता है । तभी सब वेदनाओ ( पीड़ाओं ) की अत्यन्त निवृत्ति होती है ॥ १५२-१५३ ॥ तस्मिंश्चरमसन्यासे समूलाः सर्ववेदनाः । असंज्ञानज्ञानविज्ञाना निवृत्तिं यान्त्यशेषतः ॥ १५४ ॥ इस अन्तिम सन्यास अवस्था में सब कर्मों के परित्याग करने पर मिथ्या ज्ञान रूपी कारणों से उत्पन्न सब वेदनायें, ज्ञेय के भली प्रकार से जान लेने से सम्पूर्ण रूप में निवृत्त हो जाती हैं ॥ १५४ ॥ अतः परं ब्रह्मभूतो भूतात्मा नोपलभ्यते । निःसृतः सर्वभावेभ्यश्चिह्नं यस्य न विद्यते ॥ १५५ ॥ इसके अनन्तर विदेह मोक्ष को प्राप्त करने के पीछे भूतात्मा ( जीव ) सब भावों से निकल कर ब्रह्म रूप हो जाने से कहीं भी उपलब्ध नहीं होता, वह

२८ चरकसंहिता [ अ० २ सब पदार्थों से पृथक् हो जाता है, तब इसके प्राण अपान आदि लक्षण नहीं रहते, इसलिये वे उपलब्ध नही होते ॐ ॥ १५५ ॥ गतिर्ब्रह्मविदां ब्रह्म तच्चाक्षरमलक्षणम् । ज्ञानं ब्रह्मविदां चात्र नाज्ञस्तज्ज्ञातुमर्हति ॥ १५६ ॥ ब्रह्म का जानने वालों की ब्रह्म ही गति है। वह ब्रह्म 'अक्षर' कभी नाश न होने वाला और लक्षण से रहित है, ब्रह्मविद् ही ब्रह्म को जानता है, अज्ञ, मूर्ख पुरुष इस ब्रह्म को नहीं जान सकता ॥ १५६ ॥ तत्र श्लोकः-प्रश्नाः पुरुषमाश्रित्य त्रयोविंशतिरुत्तमाः । कतिधापुरुषीयेऽस्मिन्निर्णीतास्तत्त्वदर्शिना ॥ १५७ ॥ इस 'कतिधापुरुषीय' शारीर में तत्त्वदर्शी भगवान् आत्रेय ने पुरुष को उपलक्ष्य करके तेईस उत्तम प्रश्नों का निर्णय कर दिया है ॥ १५७ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थाने कतिधापुरुषीय शारीर नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ द्वितीयोऽध्यायः । अथातोऽतुल्यगोत्रीयं शारीरं व्याख्यास्याम ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ पूर्व अध्याय में धातु-भेद से पुरुष का वर्णन किया है। अब गर्भ की उत्पत्ति को बताने के लिये 'अतुल्य गोत्रीय' नाम शारीर का व्याख्यान करेंगे । जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ अतुल्यगोत्रस्य रजःक्षयान्ते रहोविसृष्टं मिथुनीकृतस्य । किं स्याच्चतुष्पादप्रभवं च षड्भ्यो यत्स्त्रीषु गर्भत्वमुपैति पुंसः ॥३॥ स्त्री के गोत्र से भिन्न गोत्रवाले पुरुष का स्त्री के रजोधर्म हो चुकने के पश्चात् स्त्री के साथ एकान्त स्थान में सम्भोग करते हुए, स्त्री की योनि में त्याग और किया वह क्या पदार्थ है जो चतुष्पाद अर्थात् चार पाद अर्थात् गुणोंवाला छः तत्त्वो से उत्पन्न होता है ओर जो स्त्रियों के शरीरों मे गर्भ रूप हो जाता है। ३। शुक्रं तदस्य प्रवदन्ति धीरा यद्धीयते गर्भसमुद्भवाय । वाय्वग्निभूम्यद्गुणपादवत् तत्, षड्भ्यो रसेभ्यः प्रभवश्च तस्य ॥४॥ उत्तर--गर्भ की उत्पत्ति के लिये पुरुष जिस पदार्थ का स्त्री योनि मे ॐ ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति ।

अ० २ ] शारीरस्थानम् २६ आधान करता है, बुद्धिमान् पुरुष इस वस्तु को 'शुक्र' कहते हैं। यह शुक्र उत्तम वायु, अग्नि, पृथ्वी और जल इन चार भूतो के गुणों से युक्त होता है। ये ही चार इसके चार १पाद हैं। यह शुक्र मधुर आदि छः रसों वाले आहार- रस से उत्पन्न होता है। [ मधुर को शुक्रजनक और अम्ल रस को शुक्रविघातक कहा है उसका तात्पर्य अधिक उपयोग करने से है। वैसे छहों रसों से उत्पन्न वीर्य ही विशुद्ध शुक्र होता है] ॥४॥ संपूर्णदेहः समये सुखं च गर्भः कथं केन च जायते स्त्री । गर्भं चिराद् विन्दति सप्रजाऽपि भूत्वाऽथवा नश्यति केन गर्भः ॥५॥ प्रश्न—( १) गर्भ किस प्रकार से सम्पूर्ण शरीर वाला होता और ( २ ) किस प्रकार से और किस कारण से ठीक समय पर उत्पन्न होता है ? ( ३ ) किस प्रकार से गर्भ उत्पन्न होता और सुख से उत्पन्न होता है ? ( ४ ) स्त्री वन्ध्या न होते हुए भी किस कारण से देर में गर्भ धारण करती है ? ( ५ ) और गर्भ रह कर फिर किस कारण से नष्ट होना सम्भव है ॥ ५ ॥ शुक्रासृगात्माशयकालसंपद् यस्योपचारश्च हितैस्तथाऽर्थैः । गर्भश्च काले च सुखी सुखं च संजायते संपरिपूर्णदेहः ॥ ६ ॥ उत्तर—जिस गर्भ के बनने में शुक्र, आर्त्तव, आत्मा, गर्भाशय और काल ये गर्भकारक भाव (पदार्थ) उत्तम गुणवाले अविकृत हों और जिसका पालन पोषण भी उत्तम हितकारक अन्नो वा पदार्थों द्वारा हो २ वह गर्भ सम्पूर्ण शरीर वाला होकर सुखी, सब प्रकार के रोगों से मुक्त और ठीक समय पर उत्पन्न होता है। [ पुरुष के शुक्र और माता के रज तथा गर्भाशय का उष्ण होना यह उत्तम गुण है, शुक्र और रज के योग होने पर भी आत्मा पूर्व जन्म के उत्तम कर्मों से युक्त हो, काल, अतिगरमी, अति सरदी आदि तीक्ष्णस्वभाव का न हो, गर्भ के प्रसव का ठीक काल नवम मास के अनन्तर दसवे मास के भीतर २ है। गर्भ सुखी अर्थात् किसी रोग से पीड़ित न हो और १ यद्यपि आगे आकाश का भी गर्भोत्पत्ति में कारण कहेंगे, तथापि यहा पर आकाश के अक्रिय होने स इसको नहीं गिना। क्योंकि वायु आदि चारो भूत पुरुष के शरीर से निकल कर क्रियावान् की तरह गर्भाशय में जाते हैं, आकाश नहीं जाता । २ कही पर अन्न के स्थान पर 'अर्थ' पाठ है । यहा पर 'माता के सात्म्य विषयों के सेवन से' ऐसा अर्थ करना चाहिये ।

३० चरकसंहिता [ अ० २

सुख से हो अर्थात् प्रसव काल में माता को बहुत अस्वाभाविक पीड़ा वा बालक
की मृत्यु आदि न हो, बालक की गर्भ मे स्थिति भी ठीक २ हो ] ॥ ६ ॥
योनिप्रदोषान्ममसोऽभितापाच्छुक्रासृगाहारविहारदोषात् ।
अकालयोगाद्बलसंक्षयाच्च गर्भं चिराद्विन्दति सप्रजाऽपि ॥७॥
योनि के दोष से, मन के संताप से, शुक्र, आर्तव ( रज ) और आहार
विहार के दोष से, ऋतुकाल बीतने पर या निषिद्ध दिनों में पुरुष के साथ
सयोग करने से और दुर्बलता से स्त्री बन्ध्या न होती हुई भी देर मे गर्भ धारण
करती है । [ गर्भ धारण का काल (ऋतुकाल) चरक के मत से १६ रात्रि
और सुश्रुत के मत से १२ रात्रिया हैं ] ॥ ७ ॥
असृङ् निरुद्ध पवनेन नार्या गर्भ व्यवस्यन्त्यबुधाः कदाचित् ।
गर्भस्य रूपं हि करोति तस्यास्तदस्रमस्रावि विवर्धमानम् ॥८॥
मूढ व्यक्ति कभी २ [ सौम्य एव पुष्टिकारक आहार के सेवन करने से ]
वायु के द्वारा रुके हुए स्त्री के आर्तव ( रजो-रुधिर ) को ही 'गर्भ' समझ
लेते हैं, क्योकि वह रुका हुआ रुधिर ही बाहर न आकर गर्भाशय में प्रात
दिन बढता हुआ गर्भ के लक्षण प्रकट करता है ॥ ८ ॥
तदग्निसूर्य श्रमशोकरोगैरुष्णान्नपानैरथवा प्रवृत्तम् ।
दृष्ट्वाऽसृगेवं न च गर्भमज्ञा. केचिन्नरा भूतहृत वदन्ति ॥६॥
ओजोशनानां रजनीचरणामाहारहेतोर्न शरीरमिष्टम् ।
गर्भं हरेयुर्यदि ते न मातुलैब्धावकाशा न हरेयुरोजः ॥ १० ॥
वायु से रुका रक्त अग्नि, सूर्य अथवा थकान आदि से या वायु का अनु-
लोमन करने वाले उष्ण खान-पान मे स्वय प्रवृत्त हा जाता है, तब कई मूढ़
मनुष्य रक्तको ही अकेला देख कर ओर गर्भ को न देख कर इस गर्भ का
'भूत चुरा ले गये' ऐसा कहने लगते हैं। [ जो इस प्रकार कहते हैं, वे मूर्ख हैं।
क्योंकि भूतों द्वारा गर्भ का हरण सम्भव नहीं है ] । जिन का ओज ही भोजन
है, ऐसे रात में विचरने वाले भूतों के आहार के लिये शरीर की आवश्यकता
नहीं है। वे भूत गर्भ का अपहरण कर सकते हैं, यदि उनको अवकाश मिल
जाये, त। वे गर्भ का हरण न करके माता के ओज का ही अपहरण कर सकते हैं १
कन्या सुतं वा सहितौ पृथग्वा सुतौ सुते वा तनयान्यहून्या ।
कस्मात्प्रसूते सुचिरेण गर्भमेकोऽभिवृद्धि च यमेऽभ्युपैति ॥११॥
प्रश्न—( १ ) स्त्री कन्या को क्यों कर उत्पन्न करती है १ अथवा (२) पुत्र
को ही क्योंकर उत्पन्न करती है ? ( ३ ५) दो कन्या वा दो पुत्रों वा कन्या और

अ० २ ] शारीरस्थानम् ३१

अ० २ ] शारीरस्थानम् ३१ पुत्र दोनों को एक साथ क्योकर उत्पन्न करती है ? (६) किस कारण से बहुत से लड़कों को एक साथ उत्पन्न करती है ? (७) कभी चिरकाल मे गर्भ को क्यों प्रसव करती है ? (८) किस कारण से युगल संतति मे एक संतान अधिक वृद्धि को प्राप्त होती है ॥ ११ ॥ रक्तेन कन्यामधिकेन पुत्रं शुक्रेण, तेन द्विबिधीकृतेन । बीजेन कन्यां च सुतं च सूते यथास्वबीजान्यतराधिकेन ॥१२॥ शुक्राधिकं द्वैधमुपैति बीज यस्याः रुतौ सा सहितौ प्रसूते । रक्ताधिक वा यदि भेदमेति द्विधा सुते सा सहिते प्रसूते ॥१३॥ भिनत्ति यावद् बहुधा प्रपन्नः शुक्रार्तवं वायुरतिप्रवृद्धः । तावन्त्यपत्यानि यथाविभागं कर्मात्मकान्यस्ववशात्प्रसूते ॥ १४ ॥ माता आर्तव की अधिकता से कन्या को उत्पन्न करती है । शुक्र की अधिकता से पुत्र को उत्पन्न करती है और जिस समय शुक्र और रक्त रूपी बीज के दो भाग हो जावें, एक भाग में रक्त की अधिकता हो और दूसरे भाग में शुक्र की अधिकता रहे तब कन्या और पुत्र दोनों एक साथ उत्पन्न होते हैं । जिस स्त्री के गर्भ में शुक्र की अधिकता वाला बीज ( शुक्रार्त्तव ) दो भागों मे विभक्त हो जाता है, वह स्त्री दो पुत्रों को एक साथ उत्पन्न करती है और जब रक्त की अधिकता वाला बीज दो भागों में विभक्त हो जाता है, तब स्त्री दो कन्याओं को एक साथ उत्पन्न करती है । वायु बहुत प्रबल होकर बीज ( शुक्र आर्तव ) के जितने अधिक खण्ड कर देती है, उतने ही सन्तानों को अपने कर्म के कारण स्त्री उत्पन्न करती है । ॐ इस मे स्त्री का अपना कोई वश नहीं है । आहारमाप्नोति यदा न गर्भः शोषं समाप्नोति परिस्रुतिं वा । तं स्त्री प्रसूते सुचिरेण गर्भं पुष्टो यदा वर्षगणैरपि स्यात् ॥१५॥ कर्मात्मकत्वाद्विषमाशभेदाच्छुक्रासृजोर्वृद्धिमुपैति कुक्षौ । एकोऽधिको न्यूनतरो द्वितीय एव यमेऽप्यभ्यधिको विशेषः ॥१६॥ रसवाहिनी नाडी के दोष के कारण जिस समय गर्भ का आहार रस नहीं ॐ कुत्ता आद जन्तुआ म जिस प्रकार स चार पाच बच्चे एक साथ उत्पन्न होते हैं। इनमें शुक्र-आर्त्तव के जितने विभाग बनते हैं, इन विभागो में जिनमें शुक्र की अधिकता रहती है, उतने नर और जितनों में आर्त्तव की अधिकता रहती है, उतने मादा उत्पन्न होते हैं । इसी प्रकार मनुष्य-स्त्रियों में भी समझना चाहिये ।

३२ चरकसंहिता [ अ०२

मिलता, तब गर्भ गर्भाशय में सूखने लगता है। अथवा जब स्राव होने लगता है, तब भी गर्भ की वृद्धि नहीं होती, इसलिये वह देर तक गर्भाशय मे रुका रहता है। वह जब कभी बहुत समय के पीछे आहार मे पुष्ट होता है तब स्त्री चिरकाल में स्त्री प्रसव करती है। [वह गर्भ बहुत से वर्षों के बाद बहुत कष्ट से उत्पन्न होता है या माता के जीवन भर उत्पन्न ही नही होता। ऐसा वाग्भट आचार्य का लेख है। जिस समय गर्भ को पुष्ट होने का रस पर्याप्त नही मिलता और इस कारण से प्रसव में देर हो तो ऐसे गर्भ को 'नागोदर' कहते हैं। यदि परिस्राव होने से वर्षों का विलम्ब हो जावे तो उसको 'उपविष्टक' कहते हैं। जब वे बहुत वर्षो के बाद आहार से पुष्ट होकर पैदा होते हैं तब इनके प्रसव काल में गर्भाशय के भीतर ही केश और दात बड़े हो जाते हैं]। उत्पन्न होने वाले जीवों के कर्मों के कारण और न्यून-अधिक रूप में शुक्रार्त्तव के विषम विभाग होने से, जिस समय शुक्रार्त्तव गर्भाशय मे वृद्धि को प्राप्त होता है, तब एक भाग अधिक रहता है और दूसरा भाग न्यून रहता है। इस प्रकार से जोड़े सन्तान में भी यही विशेषता रहता है ॥ १६ ॥ कस्माद् द्विरेताः पवनेन्द्रियो वा सस्कारवाही नरनारिखण्डौ । वक्री तथेष्र्याभिरतिः कथ वा सजायते वातिकषण्डको वा ।' १७॥ प्रश्न--किस कारण से 'द्विरेत' अर्थात् दो वीर्य वाला जीव उत्पन्न होता हे ? किस कारण से पवनेन्द्रिय ( वायु मात्र वीर्य वाला ) उत्पन्न होता है ? किस कारण से सस्कारवाही (जिसको स्त्री वा पुरुष होने का सस्कार मात्र हो) होता है ? किस कारण से नरषण्ड (नपुंसक) और नारी षण्ड होती है ? किस कारण से वक्रध्वज (टेड़े लिंग वाला), ईर्ष्याभिरत (जो दूसरे को देख कर कामार्त्त हो) अथवा वातिक षण्ड (वीर्य के स्थान पर केवल वायु छोड़ने वाला) होता है ? ॥ १७ ॥ बीजात्समाशादुपतप्तबीजात्स्त्रीपुंमलिङ्गी भवति द्विरेताः । शुक्राशयं गर्भगतस्य हत्वा करोति वायुः पवनेन्द्रियत्वम् ॥ १८ ॥ शुक्राशयद्वारविघट्टनेन सस्कारवाह हि करोति वायुः । मन्दाल्पबीजावबलावहर्षौ क्लीबौ च हेतुर्विकृतिद्वयस्य ॥ १६ ॥ मातुर्व्यवायप्रतिघेन वक्री स्याद् बीजदौर्बल्यतया पितुश्च । ईर्ष्याभिभूतावपि मन्दहर्षौवीर्ष्यारतेरेव वदन्ति हेतुम् ॥ २० ॥

  • जिस प्रकार गान्धारी के दो साल गर्भ पेट मे रहा था।

अ० २ ] ३ शारीरस्थानम् ३३

अ० २ ] ३ शारीरस्थानम् ३३


वाय्वग्निदोषाद् वृषणौ तु यस्य नाशं गतौ वातिकषण्डकः सः । इत्येवमष्टौ विकृतिप्रकाराः कर्मात्मकानामुपलक्षणीयाः ॥ २१ ॥ जिस समय स्त्री पुरुष के बीज (शुक्र और आर्त्तव) समान भाग हों, अथवा जब बीज किसी दोष के प्रकोप के कारण दुष्ट होता है, तब स्त्री-पुरुषों के लक्षणों वाला 'द्विरेत' (नपुंसक) उत्पन्न होता है । वायु शुक्राशय को नष्ट करके गर्भाशय में स्थित गर्भ को 'पवनेन्द्रिय' वाला बना देता है । वायु शुक्राशय-द्वार को खोलकर संस्कारवाही षण्ड करता है । जिस समय स्त्री प्रथम सन्तुष्ट हो जाती है, तब पीछे पुरुष का उत्सृष्ट शुक्र हर्ष के कारण मन के अस्थिर होने से, स्त्री की वायु को चंचल कर देता है । साथ में पुरुष के शुक्रवाहक स्रोत भी पुष्ट हो जाते हैं, तब वातेन्द्रिय पुरुष उत्पन्न होता है । स्त्री के साथ सम्भोग करने पर शुक्र की भांति वायु ही आता है और जब यह वायु इस पुरुष के शुक्रवाही स्रोतो को नष्ट न करके केवल मुखों को बन्द कर देता है तब संस्कारवाही नपुंसक उत्पन्न होता है । संस्कार से (वाजीकरण, बस्ति, खान पान से) वह प्रवृत्त होता है । मन्द एव अल्प बीज वाले निर्बल एवं अल्प कामेच्छा वाले स्त्री-पुरुष नरषण्ड एव नारीषण्ड की उत्पत्ति मे कारण होते हैं । माता और पिता के मैथुन के प्रतिघात होने से (अनुचित रीति से सम्भोग करने पर) तथा बीज की निर्बलता से वक्रध्वज (टेढ़ी इन्द्रिय वाला) नपुंसक उत्पन्न होता है । ईर्ष्या से युक्त मन्द कामेच्छा वाले स्त्री पुरुष 'ईर्ष्या से रति करने वाले नपुंसक' का कारण है । जिस समय अल्पबल वाला पुरुष अल्प कामेच्छा या द्वेषवाली स्त्री के साथ काम-उद्वेग के कारण सम्भोग करता है, तब नरषण्ड उत्पन्न होता है । वह ईर्ष्या-रति नामक नपुंसक दूसरों को रति करते देख कर रति मे प्रवृत्त होता है, इसलिये इसे 'ईर्ष्याण्ड' कहते हैं । जिस पुरुष के गर्भ में वायु और अग्नि दोष के कारण वृषण नाश हो जाते हैं, उसे 'वातिक षण्ड' कहते है । गर्भ को ये आठ द्विरेत आदि विकृतिया आठ षण्डयोनिया कर्म की विचित्रता से होती है ॥ १८-२१ ॥ गर्भस्य सद्योऽनुगतस्य कुक्षौ स्त्री-पुं-नपुंसामुदरस्थितानाम् । किं लक्षणं कारणमिष्यते किं सरूपतां यन च यात्यपत्यम् ॥ २२ ॥ प्रश्न—गर्भाशय मे तत्काल गर्भ स्थिर होने क क्या लक्षण है ? उदर में स्थित स्त्री, पुरुष और नपुंसक के क्या लक्षण हैं ? और किस कारण से संतान में माता पिता का समान रूप आता है ? ॥ २२ ॥ निष्ठिवीका गौरवमङ्गसादस्तन्द्राप्रहर्षो हृदयव्यथा च । तृप्तिश्च बीजग्रहणं च योन्यां गर्भस्य सद्योऽनुगतस्य लिङ्गम् ॥२३॥

३४ चरकसंहिता [ अ० २ तुरन्त गर्भस्थिति के लक्षण—मुख से लार आना, योनि मे भारीपन, अगों का टूटना, तन्द्रा और हर्ष अर्थात् रोमाञ्च का अधिक होना और हृदय प्रदेश में पीड़ा, योनि मे तृप्ति, सतुष्टि, अर्थात् भोग की इच्छा न रहना, बीज (शुक्र) का ग्रहण अर्थात् उसका बाहर न आना, ये गर्भ के तुरन्त स्थित हो जाने के लक्षण हैं ॥ २३ ॥ सव्याङ्गचेष्टा पुरुषार्थिनी स्त्री स्त्रीस्वप्नपानाशनशीलचेष्टा । सव्यानगर्भा न च वृत्तगर्भा सव्यपदुग्धा स्त्रियमेव सूते ॥२४॥ पुत्रं त्वतो लिङ्गविपर्ययेण, व्यामिश्रलिङ्गां प्रकृतिं तृतीयाम् । गर्भ में स्थित कन्या और बालक के लक्षण—स्त्री बाए अगो से कार्य करने वाली, पुरुष का चाह रखने वाली, स्त्रियों के स्वप्न, स्वप्न में स्त्रीलिंग वाले खान पान करने वाली, स्त्रियो के शील एव चेष्टा मे प्रेम रखने वाली हो, बाए कोख में वृद्धि, गर्भ परिमण्डल अर्थात् गोल आकार का न हा, वाम स्तन मे प्रथम दूध का दर्शन हो तो वह स्त्री निश्चय से कन्या को ही उत्पन्न करती है। उपरोक्त कन्या क लक्षणों से विपरीत लक्षणों वाली स्त्री पुत्र को उत्पन्न करती है। जिस स्त्री में कन्या और पुत्र दोनो के लक्षण एक साथ दिखाई देते हैं तो वह नपुसक सतान उत्पन्न करती है ॥ २४ ॥ गर्भोत्पत्तौ तु मनः स्त्रिया यं जन्तु ब्रजेत्तत्सदृशं प्रसूते ॥ २५ ॥ माता पिता के सदृश सन्तान का कारण—गर्भ की उत्पत्ति अर्थात् बीज ग्रहण करने के समय स्त्री का मन जिस प्राणि या (वस्तु) का ध्यान करता है वह स्त्री उसी के समान संतान उत्पन्न करती है* ॥ २५ ॥ गर्भस्य चत्वारि चतुर्विधानि भूतानि मातापितृसभवानि । आहारजान्यात्मकृतानि चैव सर्वस्य सर्वाणि भवन्ति देहे ॥२६॥ तेषां विशेषाद् बलवन्ति यानि भवन्ति मातापितृकर्मजानि । तानि व्यवस्येत्सदृशत्वहेतुं सत्त्वं यथानूकमपि व्यवस्येत् ॥ २७ ॥ माता से उत्पन्न होने वाले रज रूप और पिता से उत्पन्न होने वाले शुक्र रूप तथा आहार से और अपने कर्मों मे उत्पन्न 'कर्मज' ये चार २ प्रकार के वायु, अग्नि, भूमि और जल इन चारों के १६ प्रकार के कर्मों में जो २ बलवान् होते हे, उन २ के समान ही गर्भ का शरीर बनता है। माता के किये कर्मों के बलवान् होने पर सन्तान माता के समान और पिता से उत्पन्न कर्मों के बलवान् होने पर पिता के समान बनती है। मन अपने पूर्व देह अभ्यास मे

  • इसीलिये पाण्डु-पीले, धृतराष्ट्र अन्धे थे। चूंकि एक व्यास के रूप का देखकर पीली पड़ गई थी, और दूसरी ने आंखें बन्द करली थीं।

अ० २ ] शारीरस्थानम् ३५

अ० २ ] शारीरस्थानम् ३५ उत्पन्न वासना के अनुकूल इस जन्म में होता है । [अर्थात् यदि देव शरीर मे ही वह आत्मा तुरन्त इस देह मे आवे तो उसका चित्त देवतुल्य, राक्षस शरीर से आवे तो चित्त राक्षसतुल्य और पशु शरीर मे आवे तो पशुतुल्य होता है ] ॥ २६-२७ ॥ कस्मात्प्रजा स्त्री विकृता प्रसूते हीनाधिकाङ्गीं विकलेन्द्रिया च । देहात्कथं देहमुपैति चान्यमात्मा सदा कैरनुबध्यते च ॥ २८॥ प्रश्न—(१) स्त्री किस कारण से विकृत रूपवाली प्रजा को उत्पन्न करती है ? (२-३) किस कारण से हीन अथवा अधिक अङ्गोंवाली प्रजा को उत्पन्न करती है ? (४) किस कारण से विकल इन्द्रियोंवाला प्रजा को उत्पन्न करती है ? (५) किस प्रकार से आत्मा इस शरीर मे दूसरे में पहुँचता हैं ? (६) सदा आत्मा किन २ से बन्धा रहता है ? ॥ २८ ॥ बीजात्मकर्माशयकालदोषैर्मातुस्तथाऽऽहारविहारदोषैः । कुर्वन्ति दोषा विविधानि दुष्टाः सस्थानवर्णेन्द्रियवैकृतानि ॥२९॥ बीज (शुक्र शोणित), आत्मा के अपने कर्म, गर्भाशय और काल इनके दोषो से तथा माता क आहार-विहार के दोषों से दूषित हुए दोष वात आदि सस्थान (रचना), वर्ण, इन्द्रिय आदि में नाना प्रकार के विकार उत्पन्न कर देते हैं ॥ २९ ॥ वर्षासु काष्ठाश्मघनाम्बुवेगास्तरोः सरित्स्रोतसि संस्थितस्य । यथैव कुर्युर्विकृति तथैव गर्भस्य कुक्षौ नियतस्य दोषाः ॥३०॥ जिस प्रकार वर्षा मे काठ, पत्थर और बरसात का पानी ये तीनों मिल कर नदी की धार में स्थित वृक्ष में विकार उत्पन्न कर देते है, इसी प्रकार तीनों दूषित दोष कर्म वश से गर्भाशय में स्थित गर्भस्थ जीव के शरीर में विकृति उत्पन्न कर देते हैं ॥ ३० ॥ भूतैश्चतुर्भिः सहितः सुसूक्ष्मैर्मनोजवो देहमुपैति देहात् । कर्मात्मकत्वान्न तु तस्य दृश्यं दिव्यं विना दर्शनमस्ति रूपम् ॥३१॥ यह आत्मा कर्मों क कारण आकाश को छोड़ कर शेष वायु, जल, अग्नि और पृथिवी इन चार सूक्ष्म भूतों (तन्मात्रो) के साथ लिंग शरीर रूप मे मन के वेग से एक देह दूसरे देह मे जाता है । अर्थात् मरने वाले देह से निकल कर अगले उत्पन्न होने वाले देह में जाता है । वह कर्मात्मक होने से, दिव्य चक्षुओं के बिना इसके सूक्ष्म रूप का दर्शन नहीं होता ॥ ३१ ॥ ॐ गीता मे भी कहा है—न तु मां शक्यसे द्रष्टु अनेनैव स्वचक्षुषा । दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ॥

स सर्वगः सर्वशरीरभृच्च स विश्वकर्मा स च विश्वरूपः । स चेतनाधातुरतीन्द्रियश्च स नित्ययुक्त सानुशयः स एव ॥ ३२ ॥ वह आत्मा कर्मो के कारण सब स्थानो में गमन करता है, देवता मनुष्य, तिर्यग् आदि सब देहो को धारण करता है, यह सब कर्मों के करने में समर्थ होने से 'विश्वकर्मा' है। यह आत्मा सर्व रूप होने से विश्वरूप है, यही चेतना धातु है, वह अतीन्द्रिय है। इसका कर्म आदि से नित्य सम्बन्ध है यही अनुशय (राग और द्वेष आदि) के साथ रहता है ॥ ३२ ॥ रसात्ममातापितृसंभवानि भूतानि विद्याद्दश षट् च देहे। चत्वारि तत्रात्मनि संश्रितानि स्थितस्तथाऽऽत्मा च चतुर्षु तेषु॥३३॥ भूतानि मातापितृसम्भवानि रजश्च शुक्रं च वदन्ति गर्भे । आप्यायते शुक्रमसृक्च भूतैर्यैस्तानि भूतानि रसोद्भवानि ॥३४॥ आहार के रस, आत्मकृत कर्म, माता और पिता इनसे उत्पन्न ये चार २ गुण वाले चार भूत (इस प्रकार से १६ भूत) गर्भ के शरीर में रहते हैं। इन सोलह के बीच में चार सूक्ष्म लिंग-शरीर रूप से (वायु, अग्नि, भूमि और जल तन्मात्रा रूप से) आत्मा में और ये चारों आत्मा में आश्रित है। गर्भ में माता से उत्पन्न चार भूत और पिता से उत्पन्न चार भूत और क्रम से रज और शुक्र ये पदार्थ गर्भ में कहे जाते हैं। भूतों द्वारा शुक्र और रक्त दानों का पोषण होता है और उन रस से उत्पन्न भूतो का पोषण और वृद्धि होती है। इस प्रकार से गर्भ के शरीर में १६ भूतों का योग होता है ॥ ३३-३४ ॥ भूतानि चत्वारि तु कर्मजानि यान्यात्मलीनानि विशन्ति गर्भम् । स बीजधर्मा ह्यपरापराणि देहान्तराण्यात्मनि याति याति ॥३५॥ आत्मा में गुप्त रूप से विद्यमान कर्म से उत्पन्न जो चार सूक्ष्म भूत गर्भ में प्रविष्ट होते हैं, वही सूक्ष्म शरीरी पुरुष बीज के समान धर्म वाला होकर एक के बाद दूसरे शरीरों में जाता रहता है। वह सूक्ष्म शरीर आत्मा पर आश्रित रहता है 🌼 ॥ ३५ ॥ रूपाद्धि रूपप्रभवः प्रसिद्धः कर्मात्मकानां मनसो मनस्तः । भवन्ति ये त्वाकृतिबुद्धिभेदा रजस्तमस्तत्र च कर्महेतु ॥३६॥ गर्भ के शरीर को बनाने वाले कर्मात्मक भूतोंके सूक्ष्म रूप से स्थूल रूप तथा मन से मन की उत्पत्ति होती है यह बात प्रसिद्ध है । कारण के अनुसार कार्य होता है । [ पूर्व जन्म में जैसा मन होता है, वैसा इस जन्म में भी हो 🌼 ससरति निरुपभोग भावैरधिवासित लिङ्गम् । सा० का० ४० ॥

अ० २ ] शारीरस्थानम् ३७

अ० २ ] शारीरस्थानम् ३७ जाता है ] । आकृति, बुद्धि और मन में जो भिन्नता होती है, वहा पर बलवान् रज, तम तथा पूर्वकर्म कारण होते हैं ॥ ३६ ॥ अतीन्द्रियैस्तैरतिसूक्ष्मरूपैरात्मा कदाचिन्न वियुक्तरूपः । न कर्मणा नैव मनोमतिभ्यां न चाप्यहङ्कारविकारदोषैः ॥ ३७ ॥ रजस्तमोभ्यां तु मनोऽनुबद्ध ज्ञानं बिना तत्र हि सर्वदोषाः । गतिप्रवृत्त्योस्तु निमित्तमुक्त मनः सदोष बलवच्च कर्म ॥ ३८ ॥ अतीन्द्रिय, अति सूक्ष्म रूपवाले वायु, अग्नि, भूमि और जल इन चार सूक्ष्म भूतो से आत्मा कभी भी वियुक्त नहीं होता । न कर्मों से, न मन मे, न बुद्धि एव अहंकार इन दोषों से भी कभी वह मुक्त होता है, प्रत्युत वह इन मे सदा सम्बद्ध रहता है । मन अर्थात् सत्त्व बलवान् रज तथा तम से सम्बद्ध होता है । तब तत्त्वज्ञान के बिना मन में सब दोष रहते हैं । दोषयुक्त मन और पूर्वजन्मों के बलवान् कर्म ही अन्य देह में जाने तथा धर्माधर्म क्रिया में प्रवृत्ति के कारण हैं ॥ ३७-३८ ॥ रोगाः कुतः संशमनं किमेषां हर्षस्य शोकस्य च कि निमित्तम् । शरीरसत्त्वप्रभवा विकाराः कथं न शान्ताः पुनरापतेयुः ॥ ३६ ॥ प्रश्न-(१) रोग किस कारण से उत्पन्न होते हैं ? (२) इन रोगों की शान्ति का उपाय क्या है ? (३) हर्ष का क्या कारण है ? (४) शोक का क्या कारण है ? (५) शरीर और मन से उत्पन्न विकार क्यों कर पूर्ण रूप से नष्ट नहीं होते ? (६) वे फिर क्यों हो जाते हैं ॥ ३६ ॥ प्रज्ञापराधो विषमास्तथाऽर्था हेतुस्तृतीयः परिणामकालः । सर्वामयानां त्रिविधा च शान्तिर्ज्ञानार्थकालाः समयोगयुक्ताः ॥४०॥ धर्म्याः क्रिया हर्षनिमित्तमुक्तास्ततोऽन्यथा शोकवशं नयन्ति । शरीरसत्त्वप्रभवास्तु दोषास्तयोरवृत्त्या न भवन्ति भूय ॥ ४१ ॥ रूपस्य सत्त्वस्य च संततिर्या नोक्तस्तदादिर्न हि सोऽस्ति कश्चित् । तयोरवृत्तिः क्रियते पराभ्यां धृतिस्मृतिभ्यां परया धिया च ॥ ४२ ॥ सत्याश्रये वा द्विविधे यथोक्ते पूर्वं गदेभ्यः प्रतिकर्म नित्यम् । जितेन्द्रियं नानुतरन्ति रोगास्तत्कालयुक्त यदि नास्ति दैवम् ॥४३॥ उत्तर—रोगों का प्रथम कारण प्रज्ञापराध, दूसरा कारण अतियोग, अयोग और मिथ्यायोग से इन्द्रियो के विषयों का उपभाग, तीसरा कारण परिणाम ( काल ) है । सब प्रकार के शारीरिक और मानसिक रोगों की शान्ति तीन प्रकार से होती है । समयोग से, ज्ञान, अर्थ ( इन्द्रियों के विषय ) और काल इन तीन का उपयोग करने से । और धार्मिक क्रियायें हर्ष का कारण कही गयी हैं ।

३८ चरकसंहिता [ अ० २

इससे विपरीत अधार्मिक क्रियाये पुरुष को शोक के अवान कर देती हैं । शरीर
और मन से उत्पन्न रोग जब तक शरीर और मन हैं, तब तक बार बार होते
रहते हैं । शरीर और मन की चेष्टा न रहने पर ये रोग भी फिर नहीं होते ।
रूप ( शरीर ) और सत्त्व ( मन ) इनका जो प्रवाह है उसका आदि नही
बतलाया अर्थात् वह अनादि है । आत्मा का शरीर और मन के साथ प्रथम
सम्बन्ध कब हुआ, इसे कोई नहीं कह सकता । शरीर और मन की निवृत्ति श्रेष्ठ
धृति ( धैर्य ) एव स्मृति तथा श्रेष्ठ बुद्धि से होती है । शरीर और मन ये दो
प्रकार के आश्रय होने से रोगो की उत्पत्ति से पूर्व ही प्रतिकार करना चाहिये ।
यदि रोगोत्पादक विपाक काल के साथ दैव सयुक्त नहीं है तो जितेन्द्रिय पुरुष
को रोग नहीं सताते । पूर्व कर्म से उत्पन्न व्याधिया तो कर्म के क्षय के बिना
शान्त नहीं होतीं ❄ ॥ ४०-४३ ॥
दैवं पुरा यत्कृतमुच्यते तत्, तत्पौरुषं यच्चिह कर्म दृष्टम् ।
प्रवृत्तिहेतुर्विषमः स दृष्टो निवृत्तिहेतुस्तु समः स एव ॥ ४४ ॥
पूर्वजन्म मे किये कर्म को 'दैव' कहा जाता है । इस जन्म मे जो कर्म
किया जाता है, उसे 'पौरुष' कहते हैं । ये दोनो कर्म अयोग, अतियोग और
मिथ्यायोग से विषम हैं । ये विषम रूप से रोग की प्रवृत्ति या ससार की प्रवृत्ति
में कारण हैं। इनका समान योग 'आरोग्य' या 'ससार निवृत्ति' अर्थात् मोक्ष
मे कारण है ॥ ४४ ॥
हैमन्तिकं दोषचयं वसन्ते प्रवाहयन् ग्रैष्मिकमभ्रकाले ।
घनात्यये वार्षिकमाशु सम्यक्प्राप्नोति रोगानृतुजान्न जातु ॥ ४५ ॥
वात, पित्त, कफ का संचय क्रम से ग्रीष्म, वर्षा और शिशिर मे होता है
और इनका प्रकोप क्रम से वषा, शरद् और वसन्त में होता है । इन में ग्रीष्म
में हुए दोष के सचय ( वात ) को वर्षा काल में, वर्षा काल मे सचित दोष
( पित्त ) को वर्षा काल के अनन्तर शरत् काल में तथा हेमन्त काल के सचित
दोष ( कफ ) को वसन्त अर्थात् चैत्र मे भली प्रकार प्रवाहित करके देह से
निकाल देवे तो मनुष्य को ऋतुजन्य रोग नहीं होते † ॥ ४५ ॥
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❄ देखिये चरक० शारीर, अ० १ मे— 'क्रियाघ्नाः कर्मजा रोगाः प्रशम
यान्ति तत्क्षयात् ।'
† दोष-प्रवाहण का नियम— प्रत्येक ऋतु के प्रथम मास में दोष प्रवाहण
करना चाहिये । यथा— 'माधवप्रथमे मासि नभस्य' प्रथमे पुन ।
सहस्य प्रथमे चैव हारयेद्दोषसञ्चयम् ॥