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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

वे पन्हालगढ़ के किलेदार को इस तरह का गुप्त पत्र भेजते?" "महाराज! हुकुमनामे की लिखावट चिटणीस की नहीं थी, वह उनके बेटे आवजी बाबा की थी।" येसूबाई का प्रतिवाद शम्भूराजा सहन न कर सके। उन्होंने कठोर दृष्टि से येसूबाई की ओर देखा। उन्होंने कहा, "बोलो मत! बालाजी काका की गैरहाजरी में आवजी के हस्ताक्षर और उनकी मुद्रा चलती है। यह बात स्वराज्य साढ़े तीन सौ गड़करियों और असंख्य कर्मचारियों को अच्छी तरह मालूम है।" "मेरा मन अभी भी यही कह रहा है कि इस हुक्मनामे में बालाजी चाचा की सम्मति नहीं होगी।" संभाजी का स्वभाव था कि वे जिससे प्रेम करते थे। पूरी भक्ति और निष्ठा के साथ करते थे। बालाजी आवजी और राजपरिवार में प्रगाढ़ स्नेह था। चिटणीस के साथ यह स्नेह सम्बन्ध शिवाजी महाराज और संभाजी ने अच्छी तरह निभाया था। ऐसी स्थिति में बालाजी का दिया गया धोखा संभाजी को बहुत अखर रहा था। कर्मचारियों के षड्यन्त्रों और असहयोग से राज्य का वातावरण बिगड़ गया था। इसलिए शम्भुमहाराज बहुत व्यथित थे। धीरे धीरे वातावरण बदल रहा था। साधारण सिपाहियों के लिए शम्भुमहाराज नाक के बाल थे। इस बीच राजधानी रायगढ़ पाचाण महाड पोलापुर से लेकर कोंकण पट्टी तक और घाटी में रहने वाली सामान्य जनता भी विद्रोह कर उठी थी। शिवाजी के पुत्र का प्रकृति प्रदत्त उत्तराधिकार नकारा जा रहा था। राज्य के कर्मचारी षड्यन्त्र रच रहे थे। राजा के अधिकारों को छीना जा रहा था। इसलिए प्रजा क्रुद्ध हो गयी थी। इतना ही नहीं सन्तप्त जनता ने 16 मई, 1680 के दिन मोरोपन्त और अण्णाजी दत्तो के घर धावा बोला। दोनों के घर लूट लिए। इन विद्रोहियों ने रायगढ़ पर क़ब्ज़ा करके संभाजी के पास पन्हालगढ़ पर सन्देश भेजा—'महाराज जल्दी आइए।' बदली हुई परिस्थिति ने शम्भुमहाराज में नया उत्साह और जोश भर दिया। उन्होंने एक ही समय में अनेक कार्यों को कर लेने की योजना बनाई। श्रृंगारपुर दूत भेजकर अपने ससुर पीलाजी को दस हजार की सेना लेकर रायगढ़ पहुँचने की प्रार्थना की। साथ ही हंबीरराव के नेतृत्व में पाँच हजार की नयी फौज तैयार की। अपनी फौज को दो महीने का अग्रिम वेतन दे दिया। मावल के चौबीस और नेरा छत्तीस गाँवों में शम्भूराजा का सन्देश गया। तबेलों से हिनहिनाते घोड़ों को बाहर निकालकर लोग भाले-तलवार नचाते हुए पन्हालगढ़ की ओर बढ़ने लगे। चिन्ताएँ मिट रही थीं। पेंच खुल रहे थे। रुकावटों के लिए नये निकल रहे थे, शम्भूराजा की गद्दी के सामने के उद्यान में भाँति भाँति के फूल खिल रहे थे। सम्भाजी :. 199

राजमहल में खेल रही नन्ही भवानी की पायल के घुँघरू छम-छम बज रहे थे। एक सुबह महारानी येसूबाई चौक के बड़े तुलसी चौरे में पानी डाल रही थीं। तुलसी का पौधा भी बड़ी समृद्धि के साथ पनप रहा था। पीछे से किसी पुरुष के पैर की आहट मिली। शम्भूमहाराज के चलने की शैली ऐसी नहीं थी। तो फिर बिना कोई सूचना भेजे अन्तःपुर प्रवेश करने का साहस किसने किया होगा? यह सोचकर येसूबाई झट से पीछे मुड़ीं तो देखा कि छः फीट लम्बे, दुबले पतले, साँवले, चौड़े मस्तक बड़ी बड़ी आँखों और घनी मूँछों वाले गणोजी शिर्के वहाँ हँसते हुए खड़े थे। येसूबाई ने पूजा शीघ्रता से समाप्त करके भाई का स्वागत किया। गणोजी वहीं चन्दनी झूले पर आराम से बैठ गये। झूले के झूलने से पतली जंजीरों की आवाज आने लगी। भविष्य में रायगढ़ की महारानी बनने वाली अपनी छोटी बहन को गणोजी बड़ी उत्सुकता से देख रहे थे। शिवाजी का करोड़ों मुहरों वाला हिन्दवी स्वराज्य अब येसूबाई के चरणों के समीप पहुँचने वाला था। अपने भाई का स्वागत करते हुए येसूबाई ने कहा— "बड़े भाई साहब, यहाँ आने की बजाय आप सीधे रायगढ़ चले गये होते तो कितना अच्छा होता? वहाँ के कार्य, वहाँ की व्यवस्थाएँ " "कितनी चिन्ता करोगी येसू! तुम्हारी प्रतीक्षा के दिन अब समाप्त हो रहे हैं। तुम्हारा सौभाग्य छाया की तरह तुम्हारा पीछा कर रहा है। लेकिन येसू महारानी के वस्त्राभूषण धारण करने के बाद अपने इस भाई को भूल तो नहीं जाओगी?" "भाई साहब कितना मजाक उड़ाएँगे अपनी बहन का?" "वैसी बात नहीं है। हम गरीबों का तो बस इतना कहना है कि अब आप सब का भाग्य पूरी तरह खिल गया है, उसमें से थोड़ा प्रकाश अपने भाई की ओर भी आने दो।" येसूबाई ने सम्भ्रमित होकर कहा, "ऐसी पहेलियाँ क्यों बुझा रहे हो?" "पहेली क्या? साफ-साफ तो कह रहा हूँ। एक बार सत्ता के घोड़े पर सवार होकर राजा ने रकेब में पाँव जमा लिया तो अपने करीबी लोगों को भूल जाते हैं। इसलिए सोचा कि समय पर स्मरण दिला दूँ तो अच्छा रहेगा।" येसूबाई आश्चर्य से गणोजी की ओर देखने लगी। अपने हाथों की उँगलियाँ व्यग्रता से नचाते हुए गणोजी ने कहा, "जिस दिन रायगढ़ में महारानी के रूप में तुम्हारे सिर पर छत्र और चँवर सुशोभित होगा, उसी दिन अपने भाई के घर पर भी जागीर का एक छोटा-सा वन्दनवार तुम बाँधोगी तो बड़ा उपकार होगा?" "कौन-सी जागीर?" 200 :: सम्भाजी

“हम राजा शिर्के हैं। हमें कुछ नहीं चाहिए। पीढ़ी-दर-पीढ़ी से चली आ रही दाभोल की हमारी जागीर हमें दिला दीजिए।” येसूबाई अधीर हो गयीं। अपने बड़े भाई की कटूक्ति में किसी गम्भीर प्रकरण का आभास उनकी तीक्षण बुद्धि ने कर लिया। तब उन्होंने कहा, “राजमहल में कुछ काम धाम चल रहा है। महाराज अभी तक रायगढ़ नहीं पहुँचे हैं। अभी तक उन्होंने राज्य का सूत्र अपने हाथ में नहीं लिया है। थोड़ा धैर्य मे काम लेना है। फिर भी मैं महाराज से कह कर देखूँगी।” दो दिन बीत गये। शिर्के राजमहल में ही बने रहे। तीसरे दिन उन्होंने येसूबाई को फिर टोका—“‘येसू, तुम्हारे मायके की दाभोल वाली जागीर का क्या हुआ?” “हाँ भाई साहब, मैंने महाराज से कहा है। उन्होंने कुछ समय रुकने के लिए कहा।” “येसू, भोसले घराने की बहू बनकर राजा शिर्के के मूर्य कुल के खून को भूल गयी हो क्या?” “परन्तु भाई माहब मैं कहती हूँ कि इस समय इतना हठ करना उचित होगा। क्या?” “इसमें हमारा कोई अपराध नहीं है। तुम्हारे ससुर शिवाजी ने हम शिर्के लोगों पर अत्याचार किया है। परम्परा से चली आ रही दाभोल की हमारी जागीर को जबरदस्ती हड़प लिया।” दाँत चबाते हुए गणोजी ने कहा। “भाई साहब शिवाजी महाराज को क्यों दोष दे रहे हो? यह भूल गये क्या कि आप भी उन्हीं शिवाजी महाराज के दामाद हो?” “बड़ा छँटा हुआ आदमी था तुम्हारा ससुर। डाँट-डपट कर दहशत से हमारी जागीर दबोच ली। ऊपर शहद की उँगली चटाते हुए कहा कि जब गणोजी राव को पुत्ररत्न प्राप्त होगा तो जागीर वापस कर देंगे। वाह रे-वाह!” “देख येसू, दाभोल की जागीर से भोसले लोगों का कोई सम्बन्ध नहीं है। उसे बीजापुर के आदिलशाह ने हमें ईनामस्वरूप दिया था। हम तुमसे भीख नहीं, अपना हक माँग रहे हैं।” जब गणोजी शिर्के ने बहुत आफत मचाई और बड़े भाई के अधिकार से येसूबाई की नाक में दम कर दिया। तब येसूबाई ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “जागीर जैसे नाजुक मामले में हम इस तरह उतावली में कैसे निर्णय ले सकते हैं? आप चाहें तो स्वयं महाराज से मिल लें।” गणोजी रूठ गये। तुरन्त जाने के लिए उठ खड़े हुए। विदा देते समय येसूबाई ने झुक कर उन्हें प्रणाम किया। उन्होंने कहा, “भाई साहब इस छोटी-सी बात को मन में न लाएँ, क्रोध न करें। आपकी समस्या का समाधान अवश्य निकलेगा। और सम्भाजी :: 201

भाई साहब राजा के राज्यारोहण समारोह में आप रायगढ़ अवश्य पधारें। " येसूबाई पर नफरत भरी नजरों से देखते हुए गणोजी ने पूछा- "किसलिए ? आपके माथे पर झूलने वाले राजपद् के चँवर को देखने और अपने माथे पर अपमान और उपेक्षा का ईंट-पत्थर झेलने के लिए।" तीन शिवाजी महाराज के महानिर्वाण को दो महीने बीत चुके थे। अब अधिक समय राजधानी से बाहर रहना उचित नहीं था। कविराज भी सुझाव दे रहे थे-'महाराज को अधिक समय तक राजधानी से बाहर नहीं रहना चाहिए।' सारे अनिष्ट दूर हो गये हैं। गढ़ पर रसद पहुँचाने की योजना निश्चित हो गयी। उसी समय शम्भूराजा अपनी सेना के साथ कराड के रास्ते से रायगढ़ की ओर निकले । मार्ग में प्रतापगढ़ की भवानी का शम्भूराजा ने दूध-दही से अभिषेक किया। भवानी मन्दिर से चलकर महाराज एक बुर्ज के ऊपर खड़े हो गये। वहाँ से उन्हें सह्याद्रि की हरी भरी पहाड़ियों के दर्शन हुए। घने वृक्षों की पंक्तियाँ कहीं समानान्तर कहीं वक्र तो कहीं अर्धवर्तुलाकार दिखाई दे रही थीं। पंचमी को झिम्मा खेलने वाली सहेलियों की तरह वे एक-दूसरे के गले मिल रही थीं। नीचे की ओर सह्याद्रि की खंडित चोटियाँ और ढलानें दिखाई दे रही थीं। आसमान एकदम स्वच्छ था। इसलिए साठ सत्तर मील की दूरी पर रायगढ़ के भवानी मन्दिर का कलश स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ रहा था। महाराज ने दाहिनी ओर महाबलेश्वर की चोटियों पर दृष्टि डाली। चैतमास के नये पल्लवों की हरी सजावट से सारा वन प्रदेश सज गया था। सौभाग्य से आन्तरिक विद्रोह की आग कुछ समय के लिए बुझ गयी थी। हंबीरराव की प्रभावी भूमिका के कारण सभी सेनाधिकारी और पूरी सेना संभाजी के साथ हो गये थे। रायगढ़ की जनता ने सरदार मालसावन्त को कैद कर लिया था। राज्य के सारे सूत्र शम्भूराजा की मुट्ठी में आ गये थे। एक बार जिम्मेदारी का बोझ सिर पर आ जाता है तो व्यक्ति श्रद्धालु और संवेदनशील बन जाता है। मार्ग में आते हुए शम्भूराजा कोरटी के सदानन्द और मल्हार गोसावी से मिले जैसे सन्त पुरुषों से मिले। उन्होंने उनका आशीर्वाद लिया। उनके मठों एवं अन्य धार्मिक कार्यों के लिए 202 :. सम्भाजी

आर्थिक सहायता पहले से दी जा रही थी। खबर मिल चुकी थी कि औरंगजेब राजपूताना के युद्ध में उलझा हुआ है। इसलिए शम्भूराजा प्रसन्न मन और निर्द्वन्द्व भाव से यात्रा कर रहे थे। राजा गढ़ उतर कर 'पार' नामक गाँव में पहुँचे। उसी समय पोलादपुर की घाटी की ओर से सेना की एक टुकड़ी दौड़ती हुई आती दिखाई पड़ी। टुकड़ी के समीप आते ही सेना में खलबली मच गयी। आवाज आने लगी—'हिरोजी पकड़े गये। हिरोजी फर्जन्द को कैद हो गयी।' चिवलून में महाराज के सैनिकों ने हिरोजी फर्जन्द बन्दी बना लिया था। उनके द्वारा चुराकर ले जायी गयी रत्नों की पेटियाँ और बचा हुआ खजाना जब्त कर लिया गया था। अपराध बहुत बड़ा था। किन्तु अपराधी भी कोई सामान्य व्यक्ति न था। इसलिए सभी के सामने फर्जन्द की पेशी लेना टाल दिया। पार के पाटिल की कोठी में फर्जन्द को राजा के सामने प्रस्तुत किया गया। साठ वर्ष की उम्र पार किये हिरोजी फर्जन्द के रोबदार शरीर की ओर शम्भूमहाराज चकित होकर देख रहे थे। उनकी शंक्वाकार ठोड़ी, गरुड़ जैसी नाक, लम्बी सुघर दाढ़ी, शिवाजी महाराज की जैसी बड़ी-बड़ी सतेज आँखें। अपने पिता का स्मरण करते हुए स्तम्भित होकर संभाजी महाराज फर्जन्द की ओर देख रहे थे। हिरोजी के चेहरे पर तेज नहीं दिख रहा था। उनका गोरा-चिट्टा चेहरा अपराधबोध के कारण लज्जित था। शम्भूराजा के सामने एक शब्द भी बोलना उनके लिए असम्भव हो गया था। हिरोजी के मुँह से कोई शब्द निकले उसके पहले उनकी आँखें छलछला उठीं। उनका गला भर आया। वे बड़ी कठिनाई से बोले—"शम्भू बेटे! मरे हुए को अब और अधिक न मारो।" "हिरोजी फर्जन्द मेरे बहादुर चाचा। आपका कैसा नाम? आपकी कितनी ख्याति ? बुढ़ापे में आपको यह क्या सूझी ? पिताजी चले गये। हमें ममता से गले लगाने की जगह, मौके का लाभ उठाकर आप चोर उचक्कों की तरह खजाना लेकर भागे ? फर्जन्द चाचा आपने यदि अपनी इच्छा प्रकट की होती तो आपके चरणों में पूरा राजकोष निछावर कर देता। आपने यह चोर-उचक्कों की राह क्यों पकड़ी ?" पास के दालान में जाकर संभाजी ने अपने सहयोगियों के साथ विचार-विमर्श किया। महाराज ने कहा, "जाने दीजिए! जो कुछ हुआ उसे भूल जाएँगे। हिरोजी को क्षमा कर देंगे।" बीच में हस्तक्षेप करते हुए हंबीरराव ने कहा, "आपके मन का बड़प्पन हम सम्भाजी :: 203

समझ सकते हैं। परन्तु अब आप युवराज नहीं, राजा हैं। आपकी उदारता का गलत अर्थ निकालेंगे, गलत लाभ भी उठाएँगे। दंड का डर न होगा तो गुंडे और भी गुंडागर्दी मचाएँगे।" पूरी बात पर विचार करने के बाद शम्भूराजा ने निर्णय लिया कि हिरोजी को कुछ दिन और नजरबन्द रखा जायेगा। परन्तु उन पर बेड़ियाँ नहीं डाली जाएँगी। उनका किसी भी प्रकार का अपमान किये बिना, बाइज्जत रायगढ़ ले जाया जाएगा। शम्भूराजा ने अपने सैनिकों को इस प्रकार का आदेश दिया। शम्भूराजा के चेहरे पर विषाद छाया हुआ था। उन्हें चिन्तित देखकर कवि कलश ने पूछा—"राजन्! आप इतने चिन्ताग्रस्त क्यों हैं?" "कविराज! जब अपने विश्वासपात्र श्रेष्ठ जनों के षड्यन्त्र के ऐसे नाखून निकल रहे हैं। ऐसी स्थिति में मेरी बुद्धि तो कुछ काम नहीं करती।" "कुछ भी ठीक नहीं है, अनेकों के मत्सर, द्वेष, शाप और हाय के हम लक्ष्य बन चुके हैं।" सेना ने वीरवाड़ी पार की। महाड के समीप चाँभार की घाटी का चक्कर लगाकर सामने की घनी वृक्षावली में प्रविष्ट हो गयी। बीच बीच की छोटी छोटी पहाड़ियाँ कभी पाँव फैलाकर बैठे बैलों की तरह तो कभी शानदार हाथी की तरह दिखाई पड़ती थीं। सामने वृक्षों की संख्या कम हुई तो सामने आसन मारकर बैठे गरुड़ की तरह दिखाई देने लगा। गरूड़ जिस प्रकार सबसे ऊँचे टीले के शीर्ष पर अपना बसेरा बनाता है, वैसे शिवाजी महाराज ने रायगढ़ को चुना था। शम्भूराजा के भीतर अनेक भावनाओं की तरंगें हिलोरें ले रही थीं। यह कितना लम्बा वनवास था ? रायगढ़ के जिस परिसर में शम्भूराजा ने अपना बचपन बिताया था, पुष्प पल्लवों से संवाद करते हुए जहाँ किशोरावस्था को पार किया था। उसी रमणीय परिसर का दर्शन तीन वर्षों बाद हो रहा था। रायगढ़ ने नये राजेश्वर के स्वागत के लिए अपने पंचक्रोशी में नया रूप धारण कर लिया था। फूलों के भार से लदी मेहराबें झुक गयी थीं। ढोल, लेजिम, शहनाई नगाड़ा और तुरुहियों की ध्वनि के साथ शम्भूमहाराज का स्वागत हुआ। पाचाड़ के मैदान पर मानो मेला लग गया था। नीचे तलहटी में वाद्यों की तुमुल ध्वनि हो रही थी। गढ़ पर तोपों की धड़ाम धुडूम की आवाज उठने लगी थी। शिवाजी महाराज की असमय मृत्यु के कारण जो रायगढ़ काला पड़ गया था आन्तरिक षड्यन्त्रों के कारण पागल हो रहा था, वही अब फिर से सज सँवर गया था, उसमें नया जोश भर गया था। वह मंगलदाई दिखाई देने लगा था। गढ़ पर इससे पहले ही राहुजी सोमनाथ कान्होजी मांडवलकर और माल सावंत जैसे षड्यन्त्रकारियों को पकड़ लिया गया था। 204 सम्भाजी

पाचाड़ के सिंहद्वार पर शम्भूराजा के सम्मुख पिलाजीराव शिर्के स्वयं उपस्थित थे। उन्होंने गढ़ सभी महत्त्वपूर्ण जगहों पर पहरे बिठाकर सुरक्षा का उत्तम बन्दोबस्त किया था। अपना दामाद हिन्दवी स्वराज्य का दूसरा छत्रपति बन रहा है। इससे मिलने वाला आनन्द उनके चेहरे पर स्पष्ट झलक रहा था। येसूबाई अपने बड़े भाई गणोजी शिर्के की ओर आश्चर्य से देख रही थी। पन्द्रह दिन पहले वे यह कहकर गये थे—"जब तक मेरी जागीर का कार्य नहीं हो जाता मैं मुँह नहीं दिखाऊँगा।" किन्तु ऐसा कुछ हुआ नहीं। गणोजी शिर्के बड़े कुतूहल से येसूबाई की ओर देख रहे थे। महादजी निम्बालकर का प्रसन्न चेहरा भी महाराज से ओझल न था। जोत्याजी केसरकर महाराज के कान से लगकर कह रहे थे—"आपने सुना क्या महादजी ने मुगलों की नौकरी हमेशा के लिए छोड़ दी।" "ऐसा?" आश्चर्यचकित होकर शम्भूराजा ने कहा। "अपने सगे साले के छत्रपति बन जाने पर दूसरे की नौकरी कौन करेगा?" शम्भूराजा जीजा माता की समाधि के समीप गये। वे वहाँ पर नत मस्तक समाधि के खुरदुरे पत्थरों पर हाथ फेरा। उस स्पर्शमात्र से वे भाव विह्वल हो गये। उनकी आँखों में आँसू भर आये—दुख के भी और आनन्द के भी। यह दृश्य देखकर वहाँ उपस्थित लोगों का मन भर आया। सन्ध्या का समय था। रंगीन फेंटा और नये कम्बलों के साथ भोइयों का जत्था खड़ा था। सोने की पालकी सजाई गयी थी। संभाजी राजा बड़ी प्रसन्नता से पालकी में सवार हो गये। कला वन्तुओं को बगल करते अपनी बाईस वर्षीय तेजस्वी मुखमुद्रा से लोगों को आनन्दित करते हुए शम्भूमहाराज आगे निकल गये। पालकी आगे बढ़ने लगी। साथ की पालकियों में कवि कलश, येसूबाई, पिलाजी शिर्के, हंबीरराव जैसे लोग बैठे थे। जब पालकी चितदरवाजे के पास पहुँची तो शम्भूमहाराज ने कहारों को रोका और नीचे उतरकर एक अतिसामान्य व्यक्ति की तरह पत्थर पर पैर समेटकर बैठ गये। यह देखकर सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ। यकायक शम्भूराजा का गला भर आया। वे पिलाजी राव से अत्यन्त पीड़ित स्वर में बोले, "मामा साहब! अब इस सूने गढ़ पर किसलिए जाना है? भगवान के बिना मन्दिर और शिवाजी महाराज के बिना रायगढ़ देखना एक जैसा ही है।" उनका गौर और सरल चेहरा लाल हो गया। बात करते करते संभाजी का कवि मन अत्यन्त भावुक हो उठा। शम्भूराजा भाव विभोर होकर कहने लगे—"मनुष्य कितने भी पुण्य अर्जित करे, चारों धामों की यात्राएँ करे ईश्वर का ध्यान लगाये, यह मेरे लिए व्यर्थ है। मथुरा, वृन्दावन, काशी और रामेश्वरम् किसके लिए हैं? केवल उस अभागे के लिए जिसने रायगढ़ न देखा हो।" सम्भाजी : 205

सहयोगियों ने शम्भूराजा को बहुत समझाया-बुझाया तब जाकर कहीं पालकी आगे बढ़ी। ऊपर महादरवाजे पर शम्भूराजा का धूम-धाम से स्वागत हुआ। वहाँ से वे जगदीश्वर का दर्शन करने गये। दरबार में कार्यकर्ताओं की भीड़ एकत्र थी। महाराज ने उनसे बातचीत की। उस रात टकमक नोंक किसी राक्षस के जबड़े की तरह भयानक दिखाई पड़ रहा था। वहाँ तूफानी हवा चल रही थी। ऊँची-ऊँची पहाड़ियों से टकराती तेज हवा, सनसनाहट की आवाज से सीटी की तरह बजा रही थी। उस अँधेरी रात में विद्रोही गद्दारों की आँखों पर पट्टी बाँध दी गयी। उन्हें टकमक के ऊँचे सिरे से नीचे फेंक दिया गया। उनके शरीर ज्वारी के गट्ठे की तरह नीचे गिरते हुए पत्थरों से टकराते गये। वे गिद्धों और गीदड़ों का भोजन बन गये। एक दिन सुबह पाचाड़ के किले का दरवाजा खुला। वहाँ से अण्णाजी दत्तो और मोरोपन्त जैसे अव्वल दर्जे के कैदियों को बाहर निकाला गया। वे पहरेदारों के संरक्षण में पैदल ही गढ़ पर चढ़ने लगे। मोरोपन्त को अपने अपराध का बोध हो गया था। वे बहुत लज्जित थे। वे थके-हारे और गलित गात्र दिखाई पड़ रहे थे। किन्तु अण्णाजी दत्तो का मन कठोर हो गया था। वे आँखें उठाकर अगल-बगल की ऊँची तटबन्दी को देख रहे थे। अण्णाजी ने जब सुना कि विद्रोही गद्दारों को टकमक की चोटी से नीचे फेंक दिया गया तो उन्हें अनुभव हुआ कि उनका अपराध कितना गम्भीर है? किले पर चढ़ते-चढ़ते दोनों की दृष्टि बार-बार टकमक नोक की ओर जा रही थी। मोरोपन्त ने अण्णाजी से कहा, "अण्णाजी आपका साथ देकर हमने अपनी जिन्दगी नष्ट कर ली। सेवा में कलंक लगा और बाल बच्चों के बीच उपहास के पात्र बन गये।" "जाने दो मोरोपन्त! मैंने तो अब भविष्य के बारे में सोचना ही बन्द कर दिया।" उन्होंने दुखी स्वर में कहा, "मोरोपन्त यदि भाग्य ने साथ दिया तो आप को दंड में कुछ रियायत अवश्य मिल जाएगी। किन्तु मुझसे तो ऐसा कोई भी काम नहीं हुआ है कि शम्भूराजा मुझे जीवित छोड़ें।" उन दो राजबन्दियों को उन्हीं के राजमहलों में बन्द कर दिया गया था। दरवाजे पर सख्त पहरा बिठा दिया गया था। उसी दिन शम्भूराजा ने इन्दुलकर को सामने खड़ा किया। इन्दुलकर की आधी उम्र रायगढ़ के निर्माण में बीती थी। वे जीवन भर राजमहल गढ़िया, चौक और उद्यान बनाते रहे। शरीर को झुलसा देने वाली गर्मी में आषाढ़ की रचना करने में दिन-रात जुटे रहते थे। शिवाजी महाराज विनोद में उन्हें एक अभिमन्त्रित पिशाच कहते थे। यह सोचकर सभी दुखी थे कि ऐसा भला आदमी गद्दारों के साथ कैसे फँस गया? १०५ सम्भाजी

भर दरबार में शम्भूमहाराज ने इन्दूलकर को अपने समीप बुलाया। इन्दूलकर की खुरदुरी अँगुलियों को अपने हाथों में लेते हुए वे बोले, "इन्दूलकर! ये बूढ़ी उँगलियाँ बड़ी पुण्यवान हैं। परन्तु आपने अविवेकी कर्मचारियों का साथ देकर इन पवित्र उँगलियों को कलंकित कर लिया।" सभी को दो दिन पहले टकमक नोक से फेंके गये गद्दारों का स्मरण हो रहा था। सभी गम्भीर हो गये थे। इन्दूलकर के लिए सभी का कलेजा टूट रहा था। शम्भूराजा ने इन्दूलकर की उँगलियों को कसकर पकड़ लिया। इन्दूलकर की आँखों के आगे अँधेरा छा गया। महाराज ने ऊँची आवाज में कहा- "इन्दूलकर ताजमहल की कहानी मालूम है न? ताजमहल जब पूरा हो गया तो औरंगजेब के बाप शाहजहाँ ने उन कुशल कारीगरों की उँगलियाँ तोड़ डाली थीं। ऐसा कहा जाता है।" महाराज की बातों से इन्दूलकर भीतर से टूट गये। सभी लोग घबरा रहे थे। सभी का ध्यान इसी बात पर केन्द्रित था कि महाराज अन्ततः क्या निर्णय लेते हैं? शम्भूराजा हँसते हँसते कहने लगे- "पिताजी की दिव्य दृष्टि ने इन्दूलकर आपको परखा था। पारस के समान आपका यह करामाती हाथ यदि हम बचा न सके तो अगली पीढ़ियाँ मुझसे प्रश्न करती रहेंगी- 'जो राजा संस्कृत, ब्रज भाषा, नाट्यशास्त्र और काव्य का गहन अभ्यासक है उसमें रसज्ञता का थोड़ा अंश था या नहीं?' जाइए अपनी उँगलियों के जादू को इसी तरह बनाए रखिए।" शम्भूराजा के इस निर्णय से सभी स्तम्भित रह गये। इन्दूलकर ने राजा का हाथ अपने सीने से लगा लिया। राजा के सामने नतमस्तक होते हुए। वहाँ एकत्र हुए सभी लोगों की ओर हाथ उठाते हुए आँसू भरी आँखों से इन्दूलकर ने कहा, "अरे कौन कहता है कि बड़े महाराज गुजर गये हैं? वे शम्भूराजा के रूप में आज भी हमारे महाराज जीवित हैं।" चार दोपहर को शंभूराजा और येसूबाई ने जगदीश्वर का अभिषेक रास्ते में शिकोई देवी का भी दर्शन किया। आने की रात को ही उन्होंने पुतलाबाई से भेंट करके उन्हें सम्भाजी :: 207

सान्त्वना दी। वे शिवाजी के वियोग में सूखकर काँटा हो गयी थीं। सोयराबाई की अपेक्षा शम्भूमहाराज को पुतलाबाई अधिक याद आती थीं। अपने पति के आकस्मिक निधन से बेचारी एकदम टूट गयी थीं। उसी बीच जब शम्भूमहाराज को मालूम हुआ कि वे अग्नि में प्रवेश कर सती होने जा रही हैं तो वे और भी अधिक चिन्तित हो गये। उन्हें स्मरण हो रहा था कि शहाजी महाराज की मृत्यु के बाद जब जीजा माता सती होने के लिए निकलने लगी तो उन्हें रोकने के लिए शिवाजी महाराज को कितना प्रयत्न करना पड़ा था। अचानक शम्भूराजा को प्रकांड पंडित गागाभट्ट की याद आ गयी। शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक के समय भट्टजी के साथ उनकी अच्छी दोस्ती हो गयी थी। उस समय उन्होंने अनेक शास्त्रों और पुराण ग्रन्थों पर भट्टजी के साथ चर्चा की थी। बड़े महाराज से गागाभट्ट ने युवराज की तीक्ष्ण बुद्धि की बड़ी प्रशंसा की थी। इन्हीं बातों का स्मरण करते हुए उन्होंने कवि कलश का ध्यान आकर्षित किया। कविराज उस समय पुस्तकों को क्रमानुसार रख रहे थे। उन्होंने कहा, “कलशजी! गागाभट्ट को आज ही एक पत्र भेजिए! साथ ही एक हजार मुहरों की थैली भी।” “राजन्!” “हाँ कविराज! गागाभट्ट से हमें एक नया ग्रन्थ तैयार करवाना है। राजा को धर्म और नीति का पालन किस प्रकार करना चाहिए? इस विषय पर उनके जैसे अधिकारी विद्वान द्वारा लिखा गया ग्रन्थ हमारे लिए मार्गदर्शक होगा।” सूर्य अस्त होने को था। सन्ध्या काल की सुनहरी किरणें गढ़ पर चारों ओर बिखर गयीं। मशालें और चिराग प्रज्ज्वलित हो गये। शम्भूराजा का मन बहुत व्यग्र था। वे पुतलाबाई के महल की ओर निकले। पुतलाबाई सफेद वस्त्रों में शिवाजी महाराज के पलँग के पास बैठी थीं। पलँग पर महाराज की खड़ाऊँ, बैजन्ती माला, रेशमी कुर्ता, फूल और अगरबत्ती जैसी चीजें रखी हुई थीं। ये सभी चीजें भक्ति भाव से रखी थीं। शम्भूमहाराज पुतलाबाई के समीप गये। पुतलाबाई ने बड़े वत्सल भाव से उन्हें गले लगाया। उन्होंने हिचकियाँ लेते हुए राजा से पूछा, “शम्भू बेटे! मृत्यु ने इतनी जल्दी महाराज को क्यों निगल लिया? अभी उनकी उम्र ही क्या थी?” येसूबाई और शम्भूमहाराज ने पुतलाबाई को सान्त्वना दी। जैसे काली घटा के बरस जाने के बाद आसमान साफ हो जाता है उसी तरह पुतलाबाई भी आँसू पोंछकर प्रकृतिस्थ हो गयीं। वे बोलीं, “शम्भूराजा आप आ गये यह बहुत अच्छा हुआ। हम आपकी ही राह देख रहे थे। हमारी आँख आपकी ही ओर लगी थी। महाराज के चले जाने पर हमारे लिए यह दुनिया यह धन-दौलत व्यर्थ है। उनके साथ ही अपनी यह जीवन लीला समाप्त करने का निश्चय किया था। किन्तु दो कारणों से मुझे 208 :: सम्भाजी

रुकना पड़ा। एक तो यदि सती के वस्त्र मँगाने के लिए किसी कर्मचारी को बाहर बाजार भेजती तो महाराज की मृत्यु का समाचार बाहर फैल जाता।'' ‘‘माताजी! अब इस सारे दुख को भूल जाइए।’’ पुतळाबाई कहती रहीं-‘‘मेरे सती न होने का दूसरा कारण यह था कि राजाराम बेटे का विवाह हुआ और केवल सत्रह अठारह दिनों में ही हमारे ऊपर आसमान टूट पड़ा। अन्तिम दस-बारह दिनों में महाराज बेसुध ही रहे। अपनी आँखों को दीया बनाकर हम रात-दिन उनके पास ही बैठे रहे। एक रात महाराज को अचानक होश आया। उन्होंने मुझे समीप बुलाकर कहा -बातें सुनते-सुनते शम्भूमहाराज को रोमांच हो आया। येसूबाई और शम्भूराजा कान लगाकर सुनने लगे। पुतळाबाई अपने क्षीण स्वर में कह रही थीं- ‘‘महाराज ने अपने दुबले पतले हाथों में मेरा हाथ थामकर कहा-पुतला, मुझे नहीं लगता कि शम्भू बेटे से हमारी भेंट हो पाएगी। उन्हें हमारा सन्देश दे देना। कहना, 'शम्भू हम अपनी अन्तिम यात्रा पर निकल चुके हैं। जनता के आँसू और पसीने से खड़ा किया गया यह स्वराज्य, कष्ट उठाने वाले श्रमिकों का यह राज्य केवल आपके हाथों में सुरक्षित रह सकता है। इसका हमें पूरा यकीन है। मृत्यु से पूर्व यदि एक बार आपको सीने से लगाकर रो लेता तो उन आँसुओं में मन का सारा मैल धुल जाता और मैं धन्य हो जाता। यदि वह पापी औरंगजेब इस पुण्यभूमि पर आक्रमण करने आता है तो उसके पैरों में लोहे के नाल ठोंककर उसे हटाने की शक्ति, शम्भू बेटे केवल आपमें है। हम अल्पायु ठहरे किन्तु भगवान और भाग्य ने हमारे ललाट पर कीर्ति और वैभव का वन्दनवार सजाया है। जगदीश्वर से हमारी प्रार्थना है कि आपके साथ भी ऐसी ही ईश्वर-कृपा सदैव बनी रहे'।'' महाराज का यह अन्तिम सन्देश सुनकर शम्भूमहाराज अपने आँसू रोक नहीं पाये। उन्होंने महाराज के मुकुट और उनकी तलवार को सीने से लगाकर कहा, ‘‘माता जी! पिताजी के स्वास्थ्य के इतने बिगड़ने पर सन्देश तो भेजना चाहिए था।’’ ‘‘शम्भू बेटे! कैसे भेजती? हम विवश थे। उस समय यह राजधानी किसके क़ब्जे में थी। यह भी क्या कोई बताने की चीज है?’’ राजधानी में पहुँचते ही शम्भूमहाराज ने राजाराम को नजरबन्द रखने का आदेश दे दिया था। सोयराबाई के स्मरण मात्र से शम्भूमहाराज प्रक्षुब्ध हो जाते थे। दो-तीन दिन तक सोयराबाई के महल की ओर जाना उन्होंने टाल दिया। पुतळाबाई के त्यागी और सेवा धर्मी स्वभाव के सामने सोयराबाई का कुटिल और महत्त्वाकांक्षी स्वभाव और भी घृणास्पद लग रहा था। अचानक एक दिन संयम का बाँध टूट गया। सन्ध्या समय शम्भूमहाराज बड़ी शीघ्रता से सोयराबाई के महल की ओर निकले। सम्भाजी :: 209

दरवाजे के पास ही तेजस्वी आँखों वाले दस वर्ष के कोमल स्वभाव वाले बालक राजाराम दिखाई पड़ गये। शम्भुराजा को देखते ही वे 'दादा साहबऽऽ' कहकर चिल्लाये। दोनों एक दूसरे मे मिलने के लिए आगे दौड़ पड़े। शम्भुराजा ने राजाराम को गले से लगा लिया। उनके गालों को बार-बार चूमा। तब रूठते हुए राजाराम ने कहा, "दादा साहब हम आपसे बहुत नाराज हैं।" "क्यों?" "हमारी शादी में आप नहीं आए।" बड़े दुखी स्वर में शम्भूमहाराज ने कहा, "बच्चे, मुझे निमन्त्रण नहीं दिया गया।" "घर के लोगों के लिए कैसा निमन्त्रण?" शम्भूमहाराज ने गम्भीर होकर कहा, "पन्हालगढ़ के हमारे दास-दासियों को भी तुम्हारी माताजी ने निमन्त्रित किया था। आखिर अपमान की भी कोई हद होती है। जाने दीजिए। जब बड़े हो जाओगे तो स्वयं ही सब कुछ समझ जाओगे।" प्रह्लाद निराजी के हाथ में राजाराम को देकर शम्भूमहाराज अकेले ही महल के भीतर दाखिल हुए। महल के दरवाजे पर महाराज की क्रुद्ध और उग्र मुद्रा देखकर दासियाँ और सेविकाएँ चिल्लाने लगीं। सोयराबाई पहले तो कुछ घबरायीं किन्तु तुरन्त अपनी अकड़ में खड़ी हो गयीं। शम्भूमहाराज सन्तप्त स्वर में बोले, "माताजी! पुत्र मोह में किसी व्यक्ति को कितना पागल होना चाहिए? आप भी इन स्वार्थी और अपना पेट पालने वाले कर्मचारियों के हाथ की कठपुतली बन गयीं?" सोयराबाई को अपने अपराधों का बोध हो गया था। अष्टप्रधानों के सहयोग मे उन्होंने इस षड्यन्त्र का दाव खेला था। अपने राजाराम के लिए उन्होंने संभाजी नाम की ज्वाला को स्वयं अपने ऊपर ओढ़ा था। अण्णाजी जैसे कर्मचारियों ने उस आग पर अपना पापड़ भूनने का खूब प्रयत्न किया था। पर अब वह आग उन्हीं पर उलट पड़ी थी। अपने हाथों से सोयराबाई को बैठने का संकेत करते हुए शम्भुराजा ने ऊँचे स्वर में कहा, "माताजी आपकी इच्छा हो या न हो, आपको अच्छा लगे या बुरा, मैंने तो अब राजमुकुट पहन लिया है। एक सामान्य शिष्टाचार के नाते आप मेरे स्वागत की शिष्टता दिखातीं? "स्वागत की आरती उतारने की अपेक्षा मुझसे क्यों करते हो? यहाँ आते ही सात-आठ लोगों को टकमक नोक से नीचे झोंक दिया। उनकी प्रेतात्माओं द्वारा किया जाने वाला स्वागत क्या पर्याप्त नहीं है?" सोयराबाई ने क्रोध से पूछा। "आप माँ हैं या दुश्मन? यह माँ का हृदय है या किसी पिशाचिनी का?" 210 : सम्भाजी

"संभाजी, आपका दिमाग है या गोला बारूद का भंडार? कितना गुस्सा करते हो? सारा विवेक ही भस्म कर देते हो। हिरोजी फर्जन्द जैसे वरिष्ठ और अनुभवी सरदार को भी आपने कैद में डाल दिया। उनकी आयु का उनके अनुभव का कुछ विचार किया क्या? सोयराबाई ने पूछा सच कहें तो फर्जन्द की लिंगाणा की कालकोठरी में हमेशा के लिए झोंक देना चाहिए था। अण्णाजी दत्तो और मोरोपन्त जैसे अपराधियों को पहले तोप के मुँह में डाल देना चाहिए था। किन्तु ऐसा कुछ न करके मैंने उन्हें उन्हीं के घरों में नजरबन्द कर दिया है। उनका कोई अपमान नहीं किया। माताजी ! अपने पिताजी से और कुछ भले ही न सीखा हो किन्तु राज्य व्यवहार में देशकाल परिम्स्थिति के अनुसार क्या करना चाहिए यह अच्छी तरह सीखा है।" शम्भूमहाराज के क्रोधावेश की पहली लहर चली गयी। तब सोयराबाई ने कहा, "आपने और आपके मूर्ख मित्रों ने चारों ओर मेरी बदनामी फैला रखी है। कहते हैं, मैंने महाराज को विष दिया और उसी से उनकी मृत्यु हुई।" सोयराबाई के आरोप से शम्भूमहाराज ने अपनी गर्दन झुका ली। उन्होंने कहा, "नहीं माता ऐसा आरोप आप पर किसी को भी नहीं लगाना चाहिए। आज भले ही पुत्र प्रेम ने आपको अन्धा बना दिया हो। पर आपका हृदय स्फटिक-सा शुभ्र और संवेदनशील है। इसका हमें अनुभव है। फिर भी मेरे प्रति द्वेष रखने के कारण आपके द्वारा किये गये अपराध क्षमा करने योग्य कतई नहीं हैं।" सोयराबाई घबरा गयी। शम्भुराजा के हाथ अभी भी थरथरा रहे थे। उनका मस्तक तप रहा था। वे अब क्रूरता के चरम शिखर पर पहुँच चुके थे। उन्होंने अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं। इतने में उनकी दृष्टि पीछे की ओर गयी। वहाँ दरवाजे के पास बालक राजाराम घबराये हुए छिपकली की तरह दीवार से चिपके खड़े थे। यह देखकर जैसे पानी की धार से नमक पिघल जाता है वैसे ही शम्भूमहाराज द्रवित हो गये। उनके मस्तिष्क में उठा क्रोध का तूफान शान्त हो गया। शम्भुराजा आगे बढ़े और घबराये हुए राजाराम को अपने पास लेकर कहने लगे- "राजाराम, पिताजी के बाद ममता की छाया देनेवाला अब मेरे अतिरिक्त तुम्हारा है ही कौन ?" "दादा साहब, आप हमारी माताजी को बन्दी तो नहीं बनाएँगे न?" राजाराम ने पूछा। "आप दोनों पर पापी षड्यन्त्रकारियों की नजर न पड़े। आप लोगों का उपयोग कोई प्यादों के रूप में न करे। हमारी जान को कोई खतरा न पैदा हो। इसके लिए आप लोगों को हमें नजरबन्द तो रखना ही पड़ेगा। राजा के रूप में इतनी चिन्ता तो मुझे करनी ही पड़ेगी।" "दादा साहब, जैसी आपकी आज्ञा।" राजाराम ने कहा। संभाजी :: 211

माँ बेटे से विदा लेते हुए शम्भुराजा ने सोयराबाई से कहा, "माताजी, आज हम शपथ लेकर कहते हैं कि इसके बाद यह संभाजी छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा स्थापित लोक मर्यादा के अनुसार ही कार्य करेगा। प्रश्न केवल इतना ही है कि अब तक जो हुआ सो हुआ लेकिन इसके आगे आपका व्यवहार उस युग पुरुष की सह धर्मचारिणी जैसा होगा या नहीं?'' पाँच तीन हफ्ते सूखे पत्ते की तरह उड़ गये। माघ सुदी एकादशी के दिन शिवाजी महाराज के अस्थि कलश के साथ पुतलाबाई सती हो गयी। शम्भूमहाराज ने उन्हें इस निर्णय से विमुख करने का बहुत प्रयत्न किया। किन्तु उनके अटल निश्चय के आगे किसी की न चली। पुतलाबाई के सती हो जाने के बाद शम्भूमहाराज ने गढ़ पर बड़ा दान पुण्य किया। 20 जुलाई, 1680 को शम्भूमहाराज का सिंहासनारोहण होने वाला था। इसलिए राजधानी में सम्बन्धियों और मित्र परिवारों की बड़ी भीड़ एकत्र थी। शम्भुराजा की बड़ी बहन सखुबाई और महादजी निम्बालकर, अम्बिकाबाई और हरजी राजा महाड़िक की पालकियाँ अभी गढ़ से नीचे उतरी न थीं। गणोजी राजा शिर्के के परिवार का रूआब सबसे अधिक दिखाई दे रहा था। एक ओर शम्भुराजा की बहन राजकुँवरि गणोजी शिर्के की पत्नी थी तो दूसरी ओर गणोजी शिर्के येसूबाई के बड़े भाई थे। इस दुहरे सम्बन्ध के कारण गणोजी की साधारण बात को भी बड़ा महत्त्व मिल रहा था। शम्भुराजा ने प्रातःकाल स्नान किया और वैसे ही अधभीगे वस्त्रों में देवघर की ओर निकल पड़े। वहाँ पूजा की सामग्री तथा जैस्मिन एवं सोनजुही के सुगन्धित फूलों की टोकरी लिए येसूबाई खड़ी थीं। इतने सुन्दर प्रातःकाल में भी राजा की मुद्रा गम्भीर और खिन्न दिखाई पड़ रही थी। देवघर में प्रवेश करने से पूर्व ही वे येसूबाई से बोले, "येसू, इस मंगल और उत्सव के समय में बहन राणूबाई और दुर्गा की बहुत याद आ रही है। कैसी होंगी वे दोनों?'' राजा के काँपते स्वर को सुनकर येसूबाई का कलेजा भर आया। उन्होंने बड़े दुखी मन से कहा, "महाराज! आपकी तरह ही मेरी आँखें भी तरस रही हैं। उचित 212 :: सम्भाजी

समय देखकर शत्रु पर आक्रमण करें और उन दोनों को मुक्त करके राजधानी में ले आयें। " शम्भूमहाराज पूजा के लिए गर्भगृह में प्रवेश करने ही वाले थे कि उनके कानों में आवाज आयी- 'शम्भू ! थोड़ा रुकिए।' महाराज ने गर्दन घुमाकर देखा तो वहाँ शम्भूमहाराज से बड़ी किन्तु बहनों में सबसे छोटी, सबसे प्रिय बहन अम्बिकाबाई कोने में खड़ी थीं। उन्हें वहाँ देखकर राजा को आश्चर्य हुआ। क्योंकि इतने सवेरे अम्बिकाबाई को उठने की कभी आदत ही नहीं थी। शम्भूराजा कुछ पूछें उसमे पहले ही वे बोल पड़ीं - "शम्भू भैया, कर्नाटक की ओर का जिंजी इलाका अपने राज्य की दृष्टि से सोने की खान है।" "बिलकुल दीदी।" "राजा साहब! प्रश्न यह है कि वहाँ की लगान का सारा पैसा अपने खजाने तक पहुँच पाता है कि नहीं?" अम्बिकाबाई ने सीधा उत्तर माँगा। "न पहुँचने जैसा क्या हुआ? रघुनाथपन्त हणमन्ते जैसा खरा व्यक्ति वहाँ का सर्वेसर्वा है। ऐसा श्रेष्ठ, अनुभवी और ईमानदार आदमी तो अब मिलना भी मुश्किल है। दीदी, आपको मालूम है कि रघुनाथपन्त को किसने नियुक्त किया था? हमारे दादाजी शहाजीराजा भोसले ने। तब से यानी पिछले तीस वर्षों से हमाग दक्षिणी इलाका वे ही सँभाल रहे हैं और वह भी बिना किसी शिकायत के। रघुनाथपन्त के इतने गौरव से अम्बिकाबाई लज्जित हो गयीं। फिर भी उनके गौर ललाट पर खिंच आयी शिकन उनके बड़े कुंकुम के टीके के पीछे छिप न सकी। शम्भूराजा ने ही उनसे पूछा, "दीदी, आपको आज हुआ क्या है? आज सवेरे-सवेरे आपने यह विषय छेड़ दिया।" "सच कहूँ संभाजी राजा, आज आप भले ही रायगढ़ के राजा बन गये हों पर हो तो हमारे प्रिय छोटे भाई ही। पिताजी के पीछे छोटे भाई की चिन्ता करना उसका ध्यान रखना बड़ी बहन का कर्तव्य है। आपका जन्म सिद्ध उत्तराधिकार होने पर यहाँ के अधिकारियों और कर्मचारियों ने गद्दारी की है।" राजा ने हँसते हुए कहा, "दीदी, विद्रोह की वह आग अब बुझ चुकी है।" "देखिए राजा साहब, आपको अच्छा लगे या बुरा, विश्वास हो या न हो; यही रघुनाथपन्त सोयराबाई के साथ गुप्त पत्राचार करते रहे हैं। चाहे तो पूछताछ कर लीजिए। हमें क्या? हमने तो सचेत करने का काम किया है।" "इतनी नागज क्यों हो रही हो, दीदी?" "हमारा रिश्ता खून का है इसीलिए कलेजा जलता है। इसीलिए सचेत कर रही हूँ कि यदि अपने राज्य का सबसे समृद्ध इलाका विरोधी के हाथ में सौंपा गया तो धोखा होगा। शिवाजी महाराज की बेटी होने के नाते से माँ जगदम्बा ने इतनी सम्भाजी १२३

बुद्धि तो अवश्य दी है।" इतना कहकर अम्बिकाबाई शीघ्रतापूर्वक वहाँ से निकल गयी। संभाजी ने जल्दी से पूजा समाप्त की फिर अपना वस्त्र धारण करके बाहर आ गये। परिचारक उन्हें मोतियों की माला पहना रहे थे। उनकी कमर में कमरबन्द बाँधा जा रहा था। इसी समय सवेरे-सवेरे मस्तिष्क में विचारों का तूफान उठाने वाली अंबिकाबाई आकर सामने खड़ी हो गयीं। संभाजी के मुख से अनायास ही निकला-"दीदी, मान लीजिए कि कर्नाटक-जिंजी का प्रदेश हमने रघुनाथपन्थ हणमंते से निकाल लिया तो उनकी जगह लेने वाला दूसरा कौन है? इतनी दूर जाकर कार्य भार सँभाल सके, ऐसा कौन है?" दीदी की पलकें एक क्षण के लिए झुकीं दूसरे ही क्षण वे राजा की आँखों में आँखें डालकर बोलीं, "मेरे पति हरजीराजा महाडिक क्या कम योग्य हैं? कम हिम्मत वाले हैं? चाहें तो अपने कलश से विचार-विमर्श कर लीजिए।" शम्भू महाराज स्तब्ध रह गये। अम्बिकाबाई निकल गयीं। शिवाजी महाराज के शब्द उनके कानों में गूँजने लगे। उन्होंने कहा था-"हमारे चारों दामादों में हरजी राजा ही हमें शेर जैसी हिम्मत वाले लगते हैं। सीधे शेर के मुँह में हाथ डाल देने वाला शम्भुराजा के समान केवल हरजीराजा ही साहसी है।" बात समाप्त हो गयी। बाहर बहुत सा कार्य पड़ा था। दरबार में कुछ निर्णय तत्काल लेने थे। सिंहासनारोहण के मुहूर्त के लिए केवल दो दिन शेष थे। अनेक धार्मिक अनुष्ठान आरम्भ हो चुके थे। शम्भूमहाराज जल्दी जल्दी महल से बाहर निकले। दरबार में कवि कलश, प्रह्लाद निराजी तथा अन्य लोग राजा की प्रतीक्षा में बैठे थे। सबसे पहले अष्टांगार में कुछ कोंकणी किसानों का एक समूह महाराज से मिला। इस वर्ष पनवेल, पेण से श्रीबाग, चेऊल से आगे हबसाणा की सीमा तक भयानक अकाल पड़ा हुआ था। श्रावण महीने से ही बरसात का दर्शन तक नहीं हुआ था। शम्भुराजा ने उस क्षेत्र के किसानों के लिए लगान माफी का आदेश जारी किया। साथ ही सरकार की ओर से किसानों को बीज आदि की आपूर्ति का आदेश भी तत्काल दे दिया। कृतज्ञता से शम्भुराजा का अभिवादन करते हुए किसान बाहर निकल गये। "राजन! पिछले चार दिनों से पुर्तगाली टोपीकर आपसे मिलने के लिए काले हौद के समीप वकीली महल में रुका हुआ है।" "ऐसा? कविराज एक साथ अनेक शत्रुओं का सामना करना बुद्धिमानी नहीं है। शत्रु चाहे घर के हों या बाहर के। परिवार के भीतरी कलह के धुएँ से मेरी साँस घुट रही है। इसके साथ ही गोवा के पानी से पुर्तगाली नाम का मगरमच्छ, कोंकण 214 सम्भाजी

के किनारे जंजीरे का सिद्दी नामक विषधर सर्प, आज नहीं तो कल आक्रमण करने के लिए दिल्ली में तैयारी कर रहा औरंगजेब नाम का विषैला भुजंग और इनके अतिरिक्त अंग्रेज, डच जैसे विषैले सरीसृप तो आसपास हैं ही। इन सभी के गुंजलक से स्वराज्य को बचाना है, कविराज ! "जंजीरे के हब्शियों ने औरंगजेब का मांडलिक होना स्वीकार कर लिया है। किन्तु औरंगजेब और पुर्तगालियों के बीच मित्रता होने के पहले ही गोवा के पुर्तगालियों को ठिकाने लगाना है। गोला बारूद और अस्त्र शस्त्र की दृष्टि से पुर्तगालियों की शक्ति बहुत बड़ी है।" दो घंटे बाद पुर्तगाली वकील को दरबार में निमन्त्रित किया गया। वर्तुलाकार टोपी पहने, मोटे कपड़े की पतलून पहने, लाल रंग के लिबास में दो फिरंगी वकील दरबार में आये। उन्होंने शम्भूमहाराज को भारतीय शैली में अभिवादन किया। दुभाषिया के रूप में उनके साथ रामचन्द्र शेणवी था। उनके साथ शम्भुराजा के गोवा के वकील रामजी ठाकुर और येसाजी गम्भीरराव भी आये थे। रामचन्द्र शेणवी ने वाइसराय द्वारा भेजा गया सन्देश मराठी में पढ़कर सुनाया। "सिंहासनाधीश शम्भूमहाराज गोवा के नये वाइसराय का कौष्ट द-आल्ह्वेर का सादर नमन ! महाराज आपसे स्नेह सम्बन्ध स्थापित करने के लिए हम आपसे भी कहीं अधिक उत्सुक हैं।" शम्भुराजा ने हँसते हुए कहा, "वाइसराय साहब की सम्बन्ध जोड़ने की इच्छा से हमें बड़ी प्रसन्नता हो रही है।" पुर्तगाली दूतों ने दुभाषिये के माध्यम से स्पष्ट किया- "उसका एक कारण यह है कि सावन्तवाड़ी कुडाल के इलाके में आपकी और हमारी सीमाएँ आपस में जुड़ी हैं। इसलिए वाइसराय ने आपके लिए विशेष सन्देश भेजा है कि आप दक्षिणी सीमा पर अपना एक भी सिपाही तैनात न करें।" "क्यों ?" "क्योंकि आपके सिपाही बनकर पुर्तगाली स्वयं उस सीमा की रक्षा करेंगे।" "वाहऽऽ ! वाहऽऽ !" राजा ने हँसते हुए दाद दी। फिरंगियों ने अनेक बहुमूल्य वस्तुएँ राजा को भेंटस्वरूप प्रदान कीं। फिरंगी शिष्ट मंडल निकलकर चला गया। दोपहर को कुछ धार्मिक विधियाँ समाप्त हुईं। राज्यारोहण की जोरदार तैयारी हो रही थी। मंगल वाद्य बज रहे थे। गढ़ पर का वातावरण अत्यन्त उत्सवी और उत्साहपूर्ण था। सन्ध्या समय सभी नजदीकी सम्बन्धी एक वृत्त बनाकर खड़े हो गये थे। सभी की आँखें बातें कर रही थीं। संभाजी ने समझ लिया कि ये लोग किसी सम्भाजी :: 215

महत्त्वपूर्ण मुद्दे की चर्चा करना चाहते हैं। महादजी निम्बालकर ने कहा- "शम्भूमहाराज ! रायगढ़ पर साक्षात् स्वर्ग अवतरित हो गया है। आप अब सिंहासनासीन होंगे। आपके ऊपर छत्र-चँवर सुशोभित होंगे। आपके इस आनन्द में हम भी सहभागी हैं, परन्तु...?" "कहिएऽऽ बताइएऽऽ।" "महाराज! आपने अपने प्रासादी को दाहिनी ओर अष्टप्रधानों के महलों की ओर कभी देखा क्या?" "मतलब ?" पिछले दो ढाई महीनों से बालाजी पन्त चिटणीस, अण्णाजी दत्तो, हिरोजी फर्जन्द जैसे बुजुर्ग लोग नजरबन्द हैं। उनके दरवाजों पर कड़ा पहरा है। महाराज ! हम सभी को लगता है कि अपने दीवाली और कर्मचारियों के घर होली का दृश्य देखना हमें अच्छा नहीं लग रहा है।" हरजी राजा महाडिक और येसूबाई ने कहा। शम्भूराजा बड़ी देर तक वैसे ही मौन बने रहे। जैसे किसी पहाड़ और घाटी से बादल आते और जाते रहते हैं वैसे ही उनके चेहरे के भाव बदल रहे थे। थोड़ी देर बाद उनके चेहरे की रेखाएँ ढीली पड़ने लगीं। लम्बी साँस भरते हुए उन्होंने कहा- "देखिए इन कर्मचारियों के लिए मेरा मन आपसे अधिक संवेदनशील है। क्योंकि ये सभी पिताजी के समीपी लोग हैं। उनकी गोद में, उनके कन्धे पर खेलते हुए हम बड़े हुए हैं। हिरोजी फर्जन्द रिश्ते में हमारे चाचा हैं। इन सभी को क्षमा कर देने का विचार आपसे पहले मेरे मस्तिष्क में आया था। परन्तु इसके बाद क्या ये हमारे राज्य के प्रति निष्ठावान बने रहेंगे ?" शम्भूमहाराज का प्रश्न का सुनकर सभी का सिर नीचे झुक गया। राजा ने येसूबाई की ओर देखा। येसूबाई ने सहज भाव से कहा, "महाराज, आप व्यर्थ ही इतनी चिन्ता कर रहे हैं। गुनाह किससे नहीं होता? गलतियाँ कौन नहीं करता ?" येसूबाई के शब्द शम्भूमहाराज के कलेजे में कटार की तरह चुभ गये। परन्तु उन्होंने चेहरे पर यह भाव आने नहीं दिया। रात के भोजन के बाद अम्बिकाबाई पुनः शम्भूराजा के सामने खड़ी हो गयीं। उन्होंने कुछ कहा नहीं किन्तु शम्भूराजा ने उनकी आँखों के प्रश्न को पढ़ लिया। "उचित समय पर उचित निर्णय अवश्य लेंगे।" कहकर शम्भूराजा ने उनसे बिदा ली। वे अपने शयनकक्ष में आये तब फीकी हँसी हँसते हुए येसूबाई ने कहा, "अम्बिकाबाई के प्रस्ताव से स्वामी कितना बेचैन हो रहे हैं? छत्रपति का सम्बन्धी होना कोई गुनाह तो नहीं है न महाराज?" 216 : सम्भाजी

शम्भूराजा ने तुरन्त कहा, "यह कोई पुण्य भी तो नहीं है। सत्ता और सम्पत्ति की पालकी के सामने ये सम्बन्धी विदूषक की तरह नाचेंगे, किन्तु यदि एक बार बुरा समय आ गया तो ये रिश्तेदार मुँह छिपाकर दूर भाग जाएँगे, येसूरानी। मैं एक बात तुम्हें स्पष्ट बताना चाहता हूँ। पिताजी ने इन सम्बन्धियों की भीड़ जानबूझकर दूर ही रखी थी। उन्होंने मिट्टी में से मुहरें चुनी थीं। इसीलिए स्वराज्यमन्दिर का यह कलश इतना चमक रहा है।" सहजता से बात करते करते चुटकियाँ बजाते हुए शम्भूराजा ने पूछा— "युवराज्ञी, क्या आपको मालूम है कि बड़े महाराज ने सह्याद्रि की घाटी-पहाड़ियों से घिरे इस रायगढ़ को राजधानी बनाने के लिए क्यों चुना?" प्रश्न सुनकर येसूबाई राजा की ओर देखती रहीं। तब राजा ने ही कहा, "मिर्जाराजा जयसिंह और दिलेरखान ने पुरन्दर पर आक्रमण किया था। उस समय पिताजी मुगलों के आक्रमण को कोई महत्त्व नहीं दे रहे थे। दिल्ली का दबाव बढ़ता गया। राजगढ़ के आसपास के साठ-सत्तर गाँवों को उन्होंने तहस-नहस कर दिया। भविष्य में प्रजा की कभी ऐसी हालत न हो, इसलिए अपनी राजधानी मैदानी इलाके से दूर बनाने का निश्चय किया। रायगढ़ के चारों ओर बस्ती बहुत कम है और ऊँची-ऊँची पहाड़ियों से घिरा किला अपनी प्राकृतिक सुरक्षा में सिर ऊँचा किये खड़ा है। रायगढ़ पहुँचने के लिए बस एक छोटी-सी राह। रायगढ़ की चोटी पर केवल तूफानी हवाएँ और बरसाती पानी की धाराएँ ही पहुँच पाती हैं।" शम्भूराजा रुके। फिर विषमण्डता से हँसते हुए बोले, "रायगढ़ को राजधानी बनाने का एक और भी महत्त्वपूर्ण कारण है। यहाँ की प्रकृति भरोसेमन्द है। स्वराज्य के पीछे खड़े रहने वाले कुनबी, कोली, भंडारी जैसी सामान्य जातियों के लोग बहुत ईमानदार हैं। इसके विपरीत घाट पर रहने वाले अपने भाई बन्धुओं और नाते रिश्तेदारों में आपसी झगड़े और द्वेषभाव बने रहते हैं। वहाँ के विद्रोही, अलगाववादी, स्वार्थी और अभिमानीवृत्ति के मराठों से दूर रहने के लिए रायगढ़ सर्वोत्तम स्थान है। शम्भूराजा की बात पर येसूबाई को हँसी आ गयी। उन्होंने कहा, "महाराज! दरबार मे यहाँ आने के पहले आपने बालाजी पन्त चिटणीस, अण्णाजी दत्तो, हिरोजी फर्जन्द जैसे जिन जिन लोगों ने अपराध किये थे उन्हें बड़ी दिलेरी से क्षमा कर दिया, यह अच्छा ही हुआ। इसमें हरजीराजा ने कोई गुनाह नहीं किया उनकी स्लेट अभी कोरी है।" "इतना भरोसा है आपको महाडिक पर?" "हाँ, क्यों नहीं? वे बुद्धि से कुशाग्र हैं, उनमें कुछ कर दिखाने का आत्मविश्वास है।" शम्भूराजा खुलकर हँसे और कहने लगे—"चलो ठीक है सम्भाजी 217

हरजीराजा तकदीर का धनी है।'' वह कैसे?'' येसूबाई ने उत्सुकता से पूछा। कल ही जासूसों के पत्र मिले। आपने सुना होगा कि बंगलूर की चौकी सही अर्थों में हमारे दादा शहाजीराज भोसले ने कायम की थी। उसे विराटनगरी का रूप दिया हमारे पिताजी ने और एकोजी राजा ने दक्षिण में मराठी शासन को सुदृढ़ बनाया। परन्तु हमारे उसी दक्षिणी उपजाऊ प्रान्त के लिए खतरा उत्पन्न हो गया है।'' किससे?'' मैसूर के चिक्कदेवराजा से। युवराज्ञी कर्नाटक की ओर तंजौर मदुरई से मैसूर और बंगलूर तक जगह जगह हमारी जागीरदारियाँ हैं। किन्तु उसी क्षेत्र में चिक्कदेवराज नीचे त्रिचनापल्ली की ओर से घुस आया है। समय रहते उस पर अंकुश लगाना आवश्यक है। ऐसे समय में अपनी तेज बुद्धि और तेज तलवार का उपयोग करके दक्षिण का क्षेत्र सँभालने वाले एक समर्थ पुरुष की आवश्यकता थी।'' इसीलिए अपने बहनोई साहब को .'' नहीं येसूरानी, बहनोई के नाते नहीं, एक सुयोग्य, कर्तव्यपरायण और साहसी मराठा सूबेदार के नाते हम हरजी राजा को कर्नाटक की ओर भेजने का मन बना रहे हैं।'' शम्भूराजा बिछौने पर विचारमग्न अवस्था में पड़े थे। इसी बीच येसूबाई के सुबह निकले सहज उद्गारों का स्मरण हो आया। 'महाराज गुनाह किससे नहीं होता? गलतियाँ कौन नहीं करता?' उन शब्दों का स्मरण करते हुए शम्भूमहाराज ने दुखी मन से कहा, रानी साहिबा आपके वे शब्द मेरे कलेजे में बाणों की तरह गहराई से घुस गये हैं। यदि आपने वैसा न कहा होता तो अच्छा था।'' क्षमा करें महाराज! किसी भी रूप में मेरा आशय आप पर आक्षेप करना नहीं था।'' येसूबाई शान्तिपूर्वक बोली, महाराज, शिवाजी महाराज जैसे महान पिता को छोड़कर दिलेरखान के पास जाना, भले थोड़े दिनों के लिए क्यों नहीं, आपका अपराध ही था।'' नहीं येसू, वह अपराध नहीं था। वह यौवन का नशा था, एक प्रकार की बेहोशी थी। उस दिलेरखान के पास जाकर मिलने का नाटक करना, उसे बेवकूफ बनाकर शत्रु के पेट में घुसना, फिर उसका पेट फाड़कर बाहर निकलना, कर्तृत्व का नया कीर्तिमान स्थापित करना, दूसरे प्रदेश से संचित धन प्राप्त करके सुयश चन्द्रज्योत्स्ना से पिताजी की आँखों को चकाचौंध कर देना ही उस बेहोशी के पीछे 218 : सम्भाजी