छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
आफ़त एक आधी रात का समय। हड्डी कँपा देने वाली शीत लहर चल रही थी। हजार कोशिश करने पर भी आज गोदू को नींद नहीं आ रही थी। घर के पास पुराने पीपल के पेड़ की डालों और समीप के बाँसवन से वायु के वेग का पता चल रहा था। पीपल के छोटे-छोटे फल टप-टप की आवाज करते खपरैल की छत पर गिर रहे थे। गोदू ने करवट बदलने के लिए गर्दन घुमाई। उसकी कलाई पर हरी चूड़ियाँ चमक रही थीं। अभी उतारी नहीं गयी थीं (मराठी प्रथा के अनुसार शादी के अवसर पर पहनाई गयी चूड़ियाँ 17 दिन, 1 वर्ष या 12 महीना बाद उतारी जाती हैं और दूसरी चूड़ियाँ पहनाई जाती हैं)। अभी उसकी शादी हुए एक महीना भी पूरा नहीं हुआ था। संध्या समय की लालिमा ढल जाने के बाद मन्दिर के बाहर सासू माँ का बिछौना लगाकर गोदू अपने कमरे में आ जाती थी। अपने कमरे में लेटते ही गोदू को अपने पति के दबे पाँव आने की आहट सुनाई देती थी। आज की रात गोदू को कुछ अजीब-सी लग रही थी। मन्दिर के दीये कब के बुझ चुके थे। दूसरी ओर से सासू माँ के खर्राटों की आवाज आ रही थी। रात बहुत हो चुकी थी। किन्तु कमरे के बाहर उसके पति निवासराव का कहीं अता-पता न था। हाँ, तबेले में जानवर और दड़बे में मुर्गे-मुर्गियाँ अभी भी जाग रहे थे। आज की रात गोदू को बहुत अजीब, उदास और भयंकर लग रही थी। बीच ही में वह बिस्तर से उठी। बरामदे को पार करके उसने धीरे-से आँगन की ओर आँख घुमाई। मुख्य दरवाजे के भीतरी हिस्से में एक तेज मशाल जल रही थी। गोदू के ससुर त्र्यम्बकराव चिन्तित मुद्रा में दोनो पैरों पर बैठे थे। उनके ठीक सामने निवासराव कुछ खोये-खोये से अपने पिताजी को एकटक देख रहे थे। उस मन्त्रणा में भयानक चेहरे वाले तीन व्यक्ति और थे जिन्हें गोदू नहीं पहचानती थी। त्र्यम्बकराव बारह गाँव के देशपांडे अर्थात् अधिकारी थे। गोदू ने सोचा देशपांडे नाम इसी पद के कारण बना होगा। गोदू ने इस मुद्दे को टालने की कोशिश की। सम्भाजी :: 11
वैसे गोदू का मायका महाड़ के पास एक बहुत पिछड़े हुए गाँव में था, किन्तु गोदू का व्यावहारिक ज्ञान बहुत अच्छा था। उसके मौसा छत्रपति शिवाजी महाराज के अष्ट प्रधान मंडल में सुरनवींस थे। उनका नाम था अण्णाजी दत्तो प्रभुणीकर। प्रभुणीकर रायगढ़ किले के नीचे पाचाड़ गाँव में रहते थे। गोदू अनेक बार अपने मौसा-मौसी के पास पाचाड़ गाँव जाती थी। शिवाजी के राज्य में क्या चल रहा है, किन नयी लड़ाइयों की योजनाएँ बन रही हैं आदि बातें उसके कानों तक आती थीं। छत्रपति शिवराय पर गोदू की अपार भक्ति थी। वह उन्हें अपने प्राणों से भी अधिक महत्त्व देती थी। आसमान के सूर्य, चाँद और शिवाजी महाराज उसे प्राणों से भी अधिक प्रिय थे। कुछ वर्ष पहले गोदू कोंकण के एक छोटे-से गाँव बिरवाड़ी में कुछ दिन रहने के लिए गयी थी। एक शाम को उसके रिश्तेदार के आँगन में कुछ गपशप चल रही थी तभी एक भयानक खबर वहाँ पहुँची। खबर थी कि पूना के समीप कोढाणा किले को जीतते-जीतते सरदार तानाजी भालुसरे युद्ध में शहीद हो गये। शिवाजी ने किला तो जीत लिया था किन्तु सिंह को खो दिया था। यह हृदय विदारक समाचार सुनकर सभी व्यथित हो गये। जैसे-जैसे यह खबर गली-कूचों में फैली चारों ओर दुःख का ज्वार आ गया। घाघरा-चोली पहने गोदू अपने छोटे-छोटे कानों से यह सब सुन रही थी। "बहादुर तानाजी का शव पालकी में रखा गया है। डोली किले के दरवाजे पर आ रही है। डोली स्वयं शिवाजी महाराज ने अपने कन्धे पर उठाई है।" इन समाचारों को सुनते-सुनते ही कुछ नवयुवक उत्साहित होकर खड़े हो गये। उन्होंने डोली के दर्शन का निश्चय किया। फिर क्या था। युवकों की टोली बन्दरों की तरह छलाँग लगाते, पर्वत घाटियों को पार करते, जंगलों को चीरते हुए कोढाणा की ओर बढ़ने लगी। एक घंटे के बाद जंगल से गुजरते बच्चों ने अनुभव किया कि उनके पीछे घास फूस और झाड़ियों के बीच से एक हल्की-सी आवाज आ रही थी। हिरनी की तेजी से कोई उनका पीछा कर रहा है। उनके पीछे-पीछे कोई दौड़ता हुआ आ रहा है। सभी पीछे मुड़कर देखने लगे। सभी ने देखा, आठ साल की गोदू उनके पीछे-पीछे दौड़ती चली आ रही है। इस अविस्मरणीय शव यात्रा की गोदू कभी भी भूलने वाली नहीं थी। तानाजी का गिरना किसी अपराजेय किले के बुर्ज के गिर जाने जैसा था। वस्तुतः तानाजी नाम का शिवाजी महाराज का हाथ गिर गया था। शिवाजी महाराज के तेजस्वी मुखमंडल की कांति पूरी तरह से लुप्त हो गयी थी। चारों ओर सूतक की छाया मँडरा रही थी। जिसे देखना भी मुश्किल हो रहा था। आसपास के गाँवों से लोगों के झुंड के झुंड आकर इकट्ठे हो रहे थे, पालकी रोकी गयी। तानाजी के मुख 12 :: सम्भाजी
पर से कफन हटाया गया तो तानाजी का फूल जैसा मुरझाया चेहरा दिखाई पड़ा। शिवाजी महाराज जैसा धैर्यवान भी विह्वल हो उठा। पालकी के साथ जाने वाली दो-तीन हजार लोगों की भीड़, नदी के बाढ़ जैसा रोर-शोर करता उनका वेग, बलिदान के भाव से रोमांचित होने वाली बाँहें, जन समूह का महासागर, वेदनाबोध की तीव्रता, छिलते पाँव आदि आज भी गोदू के मन पर यथावत अंकित था। गोदू फिर उठी और दरवाजे पर आकर खड़ी हो गयी। पहले से चलती हुई मन्त्रणा अभी समाप्त नहीं हुई थी। बल्कि जाड़े के दिनों में जिस तरह अलाव को चारों और घेरकर बैठते हैं उसी प्रकार एक दूसरे से सटे हुए बैठे थे। बातें बहुत मन्द स्वर में हो रही थीं। लोग बहुत धीमी आवाज में बोल रहे थे। उनके श्वासोच्छ्वास में षड्यन्त्र की तीव्र धार चढ़ी हुई थी। गोदू का ससुर एकाएक हा-हा करके हँसा। अपनी बिल्ली जैसी आँखें गोल-गोल घुमाते हुए व्यंग्य के स्वर में बोला, "बस! सिर्फ कल दोपहर होने की देर है। कल रायगढ़ की रंगपंचमी भोसले खानदान की होली बनेगी। सवेरे नौ बजे शिवाजी महाराज की सवारी के किले के होली माल पर आने की देर है। बाघ दरवाजे पर जो तोप है उसको पलीता लगाएँगे। रंगपंचमी का रंग उड़ाएँगे और रंग की आड़ में उन्मत्त शिवाजी की भोसले को भी उड़ा देंगे।" "यदि कुछ गड़बड़ हो गयी तो?" आशंका भरे स्वर में भयभीत निवासराव ने पूछा। "बहादुरगढ़ की छावनी जाकर हमने इस षड्यन्त्र की सारी बात खान साहब से कर ली है। त्योहार देखने के बहाने बारह लड़ाकू जवान पहले ही रायगढ़ पर पहुँच चुके हैं। शिवाजी के समाप्त होने का संकेत जैसे ही तोप द्वारा दिया जाएगा, पास की झाड़ियों में छिपी यवन सेना अपनी तोपों के साथ तीव्र गति से बाहर निकल आएगी और रायगढ़ के साथ मराठों की नाक काटकर रख देगी। षड्यन्त्र की यह बात इतनी स्पष्टता से बताते हुए त्र्यम्बकराव की आँखें भयानक दिखाई दे रही थीं। त्र्यम्बकराव ने अपने दुपट्टे को प्रसन्नता से झटका। अपनी लम्बी चोटी की गाँठ बाँधी और सामने पसरे अँधेरे को विजेता की मुद्रा से देखने लगा। गोदू का गला सूख गया था। वह इस भयंकर षड्यन्त्र की कल्पना करते ही घबरा गयी। वह अपनी साँस से भी भयभीत होने लगी। इसलिए उसने अपना आँचल मुँह में भर लिया। वह तेजी से घर के पीछे के दरवाजे की ओर भागी। बाहर की तेज हवा गोदू के मस्तिष्क में भर गयी। उसके पैरों की गति तेज हो गयी। उसने तबेले में जाकर ऊपर टाँगी हुई घोड़े की काठी निकाल ली। तबेले में बँधे साठ-सत्तर घोड़ों में से पंछी नामक तेज गति वाले घोड़े को चुना। यह पंखों वाले पंछी की भाँति फर्राटे से दौड़ने वाला घोड़ा था। वह झटपट छलाँग लगाकर सम्भाजी :: 13
घोड़े पर बैठ गयी। उसने घोड़े को एड़ लगाकर लगाम को पीछे की ओर खींचा। रात की ठंडी हवा और गहरे अँधेरे में उसका घोड़ा रायगढ़ की ओर दौड़ने लगा। गोदू मानो हवा पर सवार हो गयी थी। रास्ते में पड़ने वाले पेड़ों, नदी, नालों, झरनों आदि की उसने कोई चिन्ता नहीं की रिकाब में दृढ़तापूर्वक पैर टिकाए, पीठ को झुकाकर, पेट के बल पर झुककर, रिकाब के आधार पर वह आधी खड़ी हो जाती थी। 'चल मेरे बहादुर घोड़े, और तेज दौड़ो' कहकर चिल्ला उठती थी। घोड़े के मुँह से झाग निकलने लगी थी और छींटे उसके मुख पर पड़ रहे थे। देखते-देखते गोदू पाचाड़ गाँव की सीमा पर जा पहुँची। रात समाप्त हो रही थी। पहाड़ की नुकीली चोटियाँ, किले का पहरे वाला मचान, हिरकणी बुर्ज, कीकण दिवे का ऊँचा पहाड़, सभी पहाड़ों की कतारें, पहाड़ों की ऊँची चोटियाँ अँधेरे में से अपना सिर ऊपर उठा रहे थे। "बापू। थोड़ी देर पहले अपने घर के पिछवाड़े किसी जानवर के पाँव की आहट सुनाई पड़ी थी। देखिए।" निवासराव ने अपनी आशंका व्यक्त की। तीनों घबरा गये। आशंका के बिच्छू ने हृदय पर डंक मार दिया। बाड़े के पिछवाड़े कुछ गड़बड़ी हुई । सभी लोग जल्दी से अपनी मन्त्रणा वार्ता छोड़कर उठ गये और घर के पिछवाड़े की ओर दौड़े। पिछवाड़े का दरवाजा खुला था। तबेले का दरवाजा पूरा खुला था और सबसे आश्चर्य की बात यह भी थी कि पंछी नाम का सबसे तेज और तगड़ा घोड़ा अपनी जगह पर नहीं था। पत्तों की आवाज में बोलने वाले पीपल के पेड़ के नीचे सभी डरे हुए खड़े थे। इतने में ही दहाड़ मारकर रोते हुए निवासराव भीतर से बाहर आये। "बापू धोखा हुआ धोखा। भाग गयी आपकी बहू भाग गयी।" "क्या मतलब है रे।" "मैं सौगन्ध लेकर कहता हूँ। वह छिनाल, रंडी शिवाजी की भक्त है। वही घोड़ा लेकर गयगढ़ की ओर भागी होगी, अपने षड्यन्त्र का भांडाफोड़ करने के लिए।" पिता पुत्र के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं। छोटी दाढ़ी और भयानक चेहरे वाले मेहमान भी डर गये। एक के बाद एक पाँच-छह घोड़े तबेले से बाहर निकाले गये। सभी लोग वायुवेग से रायगढ़ की ओर घोड़े दौड़ाने लगे। अन्त में चितदरवाजे की ऊपरी कमान दिखाई पड़ी। हाँफती हुई गोदू ने अपना घोड़ा रोक दिया। वह पसीने से तरबतर हो रही थी। घोड़ा भी थककर चूर हो गया था। घोड़े के मुँह से झाग का प्रवाह चालू था। हाथ में लिये भाले की लकड़ी के सहारे वह सीधी हुई और नट-कला दिखाने वाली किसी बाजीगर की कन्या की भाँति आगे की ओर उछलकर नीचे आ गयी। बिना एक क्षण विलम्ब किये वह तीर की तरह दरवाजे की ओर दौड़ी। दरवाजे को जोर-जोर से धक्का मारते हुए वह 14 :: सम्भाजी
ऊँची आवाज में चिल्लाने लगी, "अरे धोखा हुआ है धोखा। दरवाजा खोलो, दरवाजा खोलो।" गोदू की चीख अँधेरे को चीरती चली गयी। रातभर जागकर पहरा देनेवाले दो-तीन पहरेदार दरवाजे की ड्योढ़ी तक आये। मशाल के लाल प्रकाश में उन्होंने नीचे खड़ी गोदू को देखा। गोदू के शरीर से लिपटी साड़ी फट गयी थी। वह पूरा जोर लगाकर चिल्लाई, विह्वल होकर बोली, "पहरेदार चाचा दरवाजा खोलो न, दरवाजा खोलो। मुझे महाराज से अविलम्ब मिलना है। अभी का अभी।" "किलेदार सुबह सात बजे चाभियों का गुच्छा लेकर आएँगे। दरवाजा तभी खुलेगा। उसके पहले नहीं।" पहरेदार की रूखी आवाज आयी। "मगर तब तक धोखा हो जाएगा। महाराज की जान को खतरा है। दया करो। मुझे अन्दर आने दो।" पहरेदार हँस पड़े। रात-बिरात ऐसे बहुत से पागल और भूत-प्रेत दरवाजे के आसपास घूमते रहते हैं। ऐसा लोग कहते हैं। गोदू पर पागलपन सवार हो गया। वह किसी भी तरह इस भयानक खबर को किले पर पहुँचाना चाहती थी। उसने पहरेदारों से बहुत विनती की, जोर-जोर से चिल्लायी। जब प्रार्थना करके थक गयी तब उसने अनुभव किया कि वहाँ रुककर समय बिताने का कोई उपयोग नहीं था। गोदू वहाँ से धीरे-धीरे हट गयी। करौंदों की झाड़ियों के बीच से वह चितदरवाजे से पश्चिम की ओर भूत की तरह सरकने लगी। माँ की गोद से ही वह हिरकणी की बहादुरी की कथा सुनती आयी। एक बार सन्ध्या समय तोप से दी गयी सूचना के अनुसार किले के दरवाजे बन्द हो गये। परिणाम यह हुआ कि दूध देने के लिए किले के अन्दर आयी हिरकणी अन्दर ही फँस गयी। किले के नीचे ही उसका गाँव था। उसका दूध पीता बच्चा घर में अकेला था। अपने बच्चे को दूध पिलाने के लिए उसकी ममता व्याकुल हो उठी। उसी भावावेश में वह रात के घने अँधेरे में किले की खतरनाक ढलान बहादुरी से उतर कर नीचे आ गयी थी। बच्चे की भूख के कारण एक माँ ने अपनी जान की बाजी लगा दी थी। यहाँ तो एक बहादुर महायोद्धा की जान को खतरा पैदा हो गया है। ऐसा योद्धा जिससे अस्तित्व से यहाँ के पत्थरों को बंजर जमीन को स्वराज्य की रोली लगाई गयी है। जिस शिवाजी के कारण गाँव-गाँव से, जंगल-जंगल सियार भाग गये थे। गरीब लोगों की बहू- बेटियों की इज्जत बची थी, उसी शिवाजी महाराज, मराठों के पंचप्राण की जान संकट में थी। इसके लिए तो कुछ-न कुछ करना ही चाहिए था। कोढाणा जीतने वाली तानाजी की यशवन्ती गोह की भाँति गोदू की जान तिलमिलाने लगी। वह झाड़ियों से भरे घने जंगल को पार करते हुए ऊपर चढ़ने के सम्भाजी :: 15
लिए किसी गुप्त रास्ते की तलाश कर रही थी। उसे अधिक देर तक खोज नहीं करनी पड़ी। वर्षा के पानी को बाहर निकालने के लिए पुसाटी बुर्ज के पास एक पतली-सी सुराख बनी हुई थी। वह सुराख उस समय खाली थी। गोदू ने बिना एक क्षण गँवाए, बिना कुछ आगा-पीछा सोचे उस सुराख में अपना सिर डाल दिया और अगल-बगल के पत्थरों पर अपनी कुहनी टिकाते सरकने लगी। रायगढ़ किले पर अँधेरा छँट रहा था। भोर से ही रंगपंचमी उत्सव की तैयारी आरम्भ हो चुकी थी। किले के ऊपर के राजमार्ग फूल मालाओं और तोरणों से सजाये गये थे। शिवाजी महाराज के प्रासाद के सामने शहनाई बज रही थी। नये-नये झुल्ल डालकर और मस्तक पर नये-नये आभूषणों को पहनाकर हाथियों को सजाया जा रहा था। साधु, संन्यासी, छोटे बच्चे आदि सभी तरह-तरह के कपड़े पहन कर इधर-उधर घूम रहे थे। कमर में तलवार लटकाए, हाथ में भाला-बर्छी लिये पहरेदार महाराज के दरवाजे पर तत्परता से पहरा दे रहे थे। इसी बीच घबराई हुई गोदू वहाँ दौड़ती हुई आयी। वह पहरेदारों से हाथ पैर जोड़ने लगी, अधीर होकर प्रार्थना करने लगी। पहरेदागों के बार-बार रोकने पर भी वह वहाँ से हटी नहीं। पहरेदार जोर से चिल्लाए, "आखिर क्यों मिलना चाहती है तू महाराज से?" इसी समय दूसरी ओर से घोड़ों की टापों की तेज आवाज सुनाई पड़ी। सर्जा नामक एक ऊँचे और बादल के रंग वाले घोड़े पर एक बहुत सुन्दर राजकुमार बैठा था। उसकी पगड़ी में हरे रंग के रत्नों की झालर लगी थी। उसका रंग हल्का अरुणाभ, प्रशस्त भाल, गरूड़ जैसी नाक, काली गहरी आँखें ऐसे विलक्षण व्यक्तित्व का निर्माण करते थे जिसे देखकर कोई भी सहज रूप से आकर्षित हो जाता था। उसकी सुन्दर दाढ़ी घनी मूँछें, कन्धे पर लटकने वाली रेशमी अलकें आदि उसकी लोकोत्तर सुन्दरता में चार चाँद लगाती थीं। वह बहादुर योद्धा घोड़ा दौड़ाते हुए वहीं आ पहुँचा। उसके आते ही लोग 'शम्भुराजा, संभाजी राजा' कहकर आपस में फुसफुसाने लगे। शम्भुराजा के पीछे घेरदार परिधान में जोत्याजी केसकर, कवि कलश, जगदेव राव जैसे राजा के कुछ सहयोगी भी घोड़े दौड़ाते वहीं आ गये। उनके साथ ही महार जाति का रायप्पा नाक भी चल रहा था। उसके सिर पर जरीदार टोपी नहीं थी, मराठों को पेचदार पगड़ी भी नहीं थी। उसके बदले सिर पर एक सादा साफा बँधा था और शरीर पर कम्बल से बना, आधे शरीर को ढकने वाला, कंचुकी जैसा वस्त्र था। वह काले रंग का, करारी मूँछों, भेदक आँखों वाला किमान था। किन्तु वह अगना घोड़ा शम्भुराजा और कवि कलश के साथ ही दौड़ा रहा था। रंगपंचमी के दिन वैसे भी युवराज शम्भूमहाराज बहुत प्रसन्न और मनमौजी दिखते थे किन्तु आज उनके चेहरे पर रात्रि जागरण की थकान दिखाई पड़ रही थी। 16 : : सम्भाजी
उनकी आँखें बाज पक्षी की आँखों की तरह कुछ खोज रही थीं। उनके साथी भी आधी रात के बाद से युवराज के साथ ही भवानी कड़ा और टकमक टोक की ओर घूमकर आये थे। युवराज को आशंका थी कि रंगपंचमी के त्योहार पर कुछ गड़बड़ होने वाली है। यही कारण था कि उनकी पहले से सतेज और सावधान आँखें थकी होने पर भी तत्परता से चारों ओर देख रही थीं। गोदू पहरेदारों से बड़ी व्यग्रतापूर्वक कह रही थी कि महाराज की जान को खतरा है। इसी समय शम्भूराजा का घोड़ा फुरफुर करता वहाँ आकर रुका। अपने फटे हुए कपड़ों, हड़बड़ाई हुई गोदू तीर की गति से शम्भूराजा की ओर दौड़ी। वह जोर से चिल्लाई, "युवराज! युवराज अपने महाराज की जान को खतरा है। महाराज की जान को खतराऽऽ...'' शम्भूराजा ने जोत्याजी और रायप्पा को संकेत किया, "सबके सामने इसे कुछ कहने का अवसर न दो, चलो, इस स्त्री को साथ लेकर चलो।" शम्भूराजा का घोड़ा अपने महल की ओर चल पड़ा। उनके अन्य सहयोगी भी गोदू को साथ लेकर शीघ्रता से चले। अन्दर ले जाकर अपने व्यक्तिगत कक्ष में शम्भूराजा ने गोदू से पूछताछ आरम्भ की। गोदू ने अपने ससुर और पति की पाप कथा का आख्यान किया। शम्भू महाराज को गोदू की बात पर सहज ही विश्वास हो गया। बाहर की गड़बड़ी की भनक पाकर येसूबाई भी वहाँ आ गयीं। गोदू की कहानी सुनकर युवराज ने कवि कलश से कहा, "अब तो आपको यकीन हुआ न कविराज; मुझे तो यह विश्वास हो गया था कि इस रंगपंचमी पर कुछ-न-कुछ होगा।" "आप समय पर सावधान हो गये, यह तो बहुत अच्छा हुआ। लेकिन राजन! किले के सारे पहरों, नाकों आदि की जाँच तो कर ली गयी है। अभी तक तो कोई धोखा नजर नहीं आ रहा है।" "ऐसा कहने से नहीं चलेगा कविराज! जैसा कि हमारे पिताजी कहते हैं, हमें निरन्तर सावधान रहना चाहिए। चलिए हम सभी अपने-अपने मोर्चे पर चलें। और कविराज! वे वाड़कर पिता-पुत्र यहीं कहीं होंगे। उन्हें तुरन्त बन्दी बनाइए। आवश्यक हो तो किसी को उनके गाँव भेजिए लेकिन हर हालत में उन्हें आज ही बन्दी बनाइए।" "जैसी आज्ञा राजन।" ऐसा कहते हुए बिना मुड़े, युवराज को मुजरा करते हुए सभी साथी अपने-अपने कार्य के लिए बाहर निकले । बहुत ही डरी, सहमी और काँपती हुई गोदू पर युवराज ने एक दृष्टि डाली। उन्होंने येसूबाई से कहा, "इसको पहनने के लिए अच्छे कपड़े दे दो। हमें लग रहा है कि रायगढ़ पर आयी हुई महान विपत्ति इसी की वजह से टल गयी। इसकी जान को खतरा हो सकता है। इस गोदू को आप स्वयं सुरक्षा प्रदान करें।" सम्भाजी :: 17
युवराज शीघ्रता से स्नानगृह की ओर मुड़े। उन्हें पूजा आदि समाप्त करके शीघ्र ही बाहर निकलना था। अब तक रायगढ़ पर प्रकाश पूरी तरह फैल चुका था। जगह जगह पर लेज़िम और गतका खेलने वाले बच्चों के झुंड जमा हो रहे थे। शहनाई और नगाड़े बज रहे थे। फूलों की सजावट और रंगोलियाँ सज रही थीं। नवयुवक इधर-उधर घूम रहे थे। इस प्रकार शिवाजी महाराज के महल के सामने उत्सव का वातावरण बना हुआ था। इसी समय पूरी तरह भयभीत त्र्यम्बकराव और निवासराव वहाँ पहुँचे। वहीं पर उन्हें पता चला कि गोदू संभाजी महाराज के महल में गयी है। पिता पुत्र इस बात को अच्छी तरह जानते थे कि यदि गोदू उनसे पहले शिवाजी महाराज के पास पहुँच गयी और उनके षड्यन्त्र का भंडाफोड़ कर दिया तो उनके लिए मारकर खाई में फेंक देने के अतिरिक्त कोई अन्य सजा नहीं होगी। वाड़कर पिता-पुत्र कुछ डरे किन्तु तुरन्त ही सँभल गये। उन्होंने सोचा कि गोदू हमारे बारे में शिवाजी महाराज से कुछ कहे उससे पहले हम ही उसको बदनाम कर दें। यह मौका अपने आप उन्हें मिल गया था। यह मौका था अपने गले में पड़ी जलती फटाकों की माला को असावधान युवराज के गले में डाल देने का। औरतों के नाम पर युवराज को बदनाम करने का षड्यन्त्र पहले से ही चल रहा था। उसमें गोदू का एक नाम और जोड़ देना था। उन्होंने सोचा कि आयी हुई यह विपत्ति किसी प्रकार टल जाय तो अच्छा है। वाड़कर पिता पुत्र युवराज के महल की ओर बढ़े। किन्तु महल के पास पहुँचने पर उनके पैर डर के मारे काँपने लगे। दोनों ने एक दूसरे को उकसाने का प्रयत्न किया किन्तु सिंह की गुफा में जाकर उसे ललकारने का साहस उनमें नहीं था। भयभीत होकर पिता पुत्र ने अपने घोड़े शिवाजी महाराज के महल की ओर दौड़ाये। आज रंगपंचमी के उत्सव में सम्मिलित होने के लिए महाराज के महल के सामने बहुत भीड़ जमा हो गयी थी। पाँच पाँच कोस की दूरी से शौकीन और उत्साही लोग उत्सव में भाग लेने के लिए आये थे। थोड़ी ही देर में महाराज पालकी में बैठकर जगदीश्वर मन्दिर की ओर जाने वाले थे। इसी समय त्र्यम्बकराव उल्टी मुट्ठी मुँह पर रखकर जोर-जोर से चिल्लाने लगा, "भगा ले गये हो भगा ले गये युवराज इस गरीब की पुत्रवधू को भगा ले गये!'' “अब मैं बिना पत्नी के कहाँ जाऊँ? अपने रिश्तेदारों को क्या मुँह दिखाऊँ?” अपने ही हाथों से अपने मुँह पर चपत लगाते हुए निवासराव जोर-जोर से रोने लगा। वहाँ पर इकट्ठा हुए दर्शक और सरदार यह दृश्य देखकर चकरा गये। शिवाजी महाराज के ज्येष्ठ पुत्र पर कोई ऐसा आरोप लगाता है क्या! कल राजगद्दी 18 :: सम्भाजी
के स्वामी होने वाले पर कोई इस तरह कीचड़ उछालता है क्या। वह भी महाराज के राजमहल के ठीक सामने। चारों ओर से भीड़ बढ़ गयी। भीड़ को देखकर त्र्यम्बकराव और निवासराव ने और जोर से दहाड़ें मारना शुरू किया। अपने मुँह पर स्वयं थप्पड़ मारते हुए त्र्यम्बकराव चिल्लाए, “लोगो देखो न्याय के घर में ही ऐसा अन्याय होगा तो हम गरीब कहाँ जाएँगे। अमीर उमरावों की नजर से बचाने के लिए क्या हमें अपनी बहू बेटियों को कत्ल कर देना होगा। “ऐ बुड्ढे तुमको तोप के गोले खाकर मरना है क्या?” एक सिपाही ने सामने आकर पूछा। “तुम्हारे पास क्या सबूत है?” दूसरे ने पूछा। “उल्टे मुझसे क्या सबूत पूछते हो; जाओ युवराज के महल की ओर, दरवाजा खोलो और देखो अपनी आँखों से कि किस तरह वहाँ मेरी बहू को बन्दी बनाया है। हे भगवान अब मैं कहाँ जाऊँ!” कुछ समय पश्चात् भीड़ के पीछे कुछ हलचल हुई। एक विशेष पालकी लेकर पालकी वाले शीघ्रता से वहाँ आये। शिवाजी महाराज के अष्टप्रधान मंडल में से एक न्यायाधीश प्रहलाद निराजी पालकी से उतरे। वाड़कर पिता पुत्र का तमाशा वहाँ चालू था। ‘सु’ कहते ही सुरहुरपुर समझ लेने वाले प्रहलाद निराजी के ध्यान में सारी बात आ गयी। उन्हें भी बहुत दुःख हुआ। उन्होंने बाहर के अशोभनीय प्रकरण को महाराज को बताया। इसके बाद हिन्दवी स्वराज्य के विद्वान काजी मुल्ला साबही वहाँ पर पहुँचे। वे भी घबराई निगाह से महाराज की ओर देखने लगे। महाराज ने तुरन्त निर्णय लिया। उन्होंने पिता पुत्र को अन्दर बुलाया। महाराज के चरणों पर अपना सिर जोर जोर से पटकते हुए चिल्लाकर बोला, “महाराज स्वयं युवराज ऐसी गलती करते रहेंगे तो हम जिन्दा कैसे रह सकेंगे? मुगलों के शासन में कहते हैं कि यदि कोई सुन्दर औरत रास्ते में दिखती है तो उसे अपने जनानखाने में खींच ले जाते हैं और यहाँ!” “खामोशऽऽ,” महाराज ऊँची और तीखी आवाज में बोले, “अपनी जबान सँभालो, अब तक बहुत बोल चुके हो।” शिवाजी महाराज की मुद्रा बहुत गम्भीर दिखाई देने लगी। सच बात यह थी कि भोर में भगवान की पूजा करके कीमती वस्त्रों को पहन कर महाराज रंगपंचमी मनाने के लिए बाहर निकलने वाले थे। इसकी तो उन्हें कल्पना तक न थी कि आज त्योहार मुहूर्त पर रंग के बदले उनके ऊपर बदनामी का अबीर फेंका जाएगा। युवराज शम्भूराजा की सौतेली माँ पुतलीबाई त्योहार के अवसर पर नीचे पाचाड़ गाँव के घर से किले पर आयी थीं। उन्होंने पोलादपुर के जौहरी से विशेष प्रकार के रत्नों की एक कंठमाला बनवायी थी। होली के विशेष अवसर पर वह अपने प्रिय युवराज शम्भूराजा को यह कंठमाला उपहारस्वरूप देना चाहती थी। किन्तु यहाँ पर यह सम्भाजी :: 19
प्रकरण देखकर माँ पुतलीबाई आश्चर्य से हतवाक हो गयीं। बड़े महाराज के साथ पूजा के लिए सोयराबाई बाहर निकलने वाली थीं। गले में रत्नहार, सोने की करधनी पहनकर, जरीदार शाल ओढ़े वे पूरी तरह तैयार खड़ी थीं। पर बाहर के इस अप्रत्याशित प्रकरण को देखकर वे भी आश्चर्य से ठगी-सी रह गयीं। वे प्रयत्न कर रही थीं कि उनके चेहरे पर उभरने वाले भावों को कोई समझ न पाये। कुछ दिन पहले अण्णाजी दत्तो की पुत्री हंसा और शम्भूराजा के सम्बन्ध में कुछ ऐसी ही अफवाहें फैली थीं। शम्भूराजा के साथ ऐसा क्यों होता है? त्योहार के मांगलिक अवसर पर ऐसी बदनामी का प्रसंग क्यों आता है। यह सोचकर महाराज को दुःख हो रहा था। औरंगजेब के साथ अन्य शत्रुओं के सामने सदैव उन्नत रहने वाला उनका सिर आज शर्म से झुका हुआ था। किन्तु उनके भीतर एक समझदार राजा बैठा था। उन्होंने भावना की बाढ़ को भीतर-ही भीतर नियन्त्रित कर लिया महाराज के मन में शम्भूराजा के लिए ममता का प्रवाह सूखने लगा था। कर्तव्य पालन वाला राजदंड महाराज ने अपने हाथ में कसकर पकड़ रखा था। वे शान्त भाव और धीमी आवाज में केवल इतना ही बोले, "देखा त्र्यम्बकराव। बाहर पालकी का उत्सव समाप्त होने दीजिए। तब तक तुम यहीं पर निश्चिन्त होकर बैठे रहो। गुनहगार चाहे जितना भी महान हो, उसकी पूछताछ ठीक ठीक करवाई जाएगी। तुमको न्याय अवश्य मिलेगा।" बाहर निकलते हुए महाराज के कदम डगमगाये। उन्होंने काजी मुल्ला साहब को अपने पास बुलाया। उनकी सफेद लम्बी दाढ़ी पर महाराज को अत्यधिक विश्वास था। राज्य के एक नेक न्यायदाता के रूप में मुल्ला साहब मुसलमानों से भी अधिक मराठी प्रजा में लोकप्रिय थे। महाराज ने उन्हें कुछ सूचनाएँ दीं। मुल्ला साहब ने महाराज को बड़े आदर से कोर्निस की और अगली कार्यवाही के लिए तुरन्त बाहर निकल गये। राजदरबार से बाहर निकलते हुए पुतलीबाई ने शम्भूराजा के महल पर एक नजर डाली, उनकी आँखों से गर्म आँसू ढल पड़े। रायगढ़ की यह रंगपंचमी बदरंग हो गयी थी। आज की शोभायात्रा में हाथियों के 20 :: सम्भाजी
हौद, पालकी, ढोल-तेजिम की आवाज आदि की ओर लोगों का ध्यान अधिक नहीं गया। उत्सव के दर्शक और रिश्तेदार तरह-तरह की बातें कर रहे थे। आपस में बड़बड़ा रहे थे। "कैसा है यह युवराज का साहस! देखा दूसरे की स्त्री को घोड़े पर बिठाया और खींच लाये अपने राजमहल में और वह भी दिन दहाड़े।" रंगपंचमी का उत्सव किसी प्रकार समाप्त हो गया। सूर्य पश्चिम दिशा में ढल गया। शिवाजी महाराज बैठे थे। उनकी मुखमुद्रा अत्यन्त तनावपूर्ण थी। ऐसा लगता था वे किसी बड़े बोझ के दबाव से बेचैन हो रहे हैं। "शम्भूराजा को तुरन्त उपस्थित होना है।" ऐसे सन्देश नहीं बल्कि सख्त आदेश उन्होंने भेजा था। बैठक के सामने नीचे की गद्दी पर त्र्यम्बकराव और निवासराव अल्लाह की गाय की तरह असहाय की तरह उदाम बैठे थे। वे अब भी इसी अभियोग की मुद्रा में थे कि उनके साथ बड़ा अन्याय हुआ था। इसी समय बाहर किसी के आने की आहट सुनाई पड़ी। अपने गले में पड़ी पाँच लड़ की माला के साथ खेलते हुए धीमी गति से किन्तु बड़े आत्मविश्वास के साथ शम्भूराजा वहाँ पर आ पहुँचे। एक दम गोरा रंग हल्की लाल मुद्रा, उन्नत भाल, कमानीदार भौंहें, काली-काली गहरी और बोलती हुई आँखें। राजकुमारों के बीच सभी से अलग दिखाई देनेवाला शम्भूराजा का व्यक्तित्व अत्यन्त आकर्षक था। उन्होंने महाराज की नजर से नजर मिलायी। किन्तु बड़े महाराज की आँखों में उमड़ते दुख के सागर को देखकर युवराज की आँखें नीचे झुक गयीं। पिता-पुत्र की उपस्थिति में उनकी शोभा से पूरा महल दमक रहा था। दोनों को ही विधाता ने अपार सौन्दर्य का उपहार दिया था। दोनों को एकत्र देखकर ऐसा लगता था मानो सूर्य से मिलने के लिए चाँद आकर खड़ा हो। बैठक में तनाव बहुत बढ़ गया था। युवराज पर लगाये इस आरोप से उनके यार दोस्त भी हैरान थे। उनका बचपन का दोस्त रायप्पा महार और जोत्याजी केसकर महल के बाहर दुखी मन से मुँह लटकाए खड़े थे। युवराज के पीछे पीछे उनकी पत्नी येसूबाई भीतर आयीं। उनके अचानक वहाँ आने से बड़े महाराज आश्चर्यचकित हो गये। महाराज ने देखा कि येसूबाई के पीछे साफ सुथरे कपड़ों में एक अपरिचित नवयुवती खड़ी थी। उस नवयुवती की ओर वाड़कर पिता पुत्र की भी नजरें गयीं। महाराज ने अनुमान लगाया कि शम्भूराजा के अन्याय की शिकार यही अपरिचित युवती होगी। किन्तु येसुबाई जैसी समझदार पुत्रवधू की वहाँ उपस्थिति से महाराज की हैरानी बढ़ गयी थी। उन्होंने कहा- "ध्यान से सुनो, बहूरानी ! शम्भूराजा के अपराध और उनकी बढ़ती जा रही सम्भाजी :: 21
हरकतों को पिता के रूप में एक बार नजरअन्दाज कर दूँ तो भी राजा को अपना राज दंड ममता के गहरे पानी में फेंक देना सम्भव नहीं।" गम्भीर मन्त्रघोष की तरह महाराज की आवाज गूँजने लगी। येसूबाई एक भी शब्द बोल नहीं सकी। युवराज संभाजी के चेहरे पर अपमान का भाव झलकने लगा। असाधारण तनाव के कारण उनकी गर्दन नीचे झुक गयी। इस स्थिति के कारण ऐसा लगा कि त्र्यम्बकराव और निवासराव का साहस कुछ बढ़ गया है। पिता-पुत्र साहस के साथ खड़े हो गये। त्र्यम्बकराव ने अपना उत्तरीय झटक दिया। वह पीपल के पत्ते की तरह काँप रहा था। उसने कहा, "महाराज मुझे अपनी पुत्रवधू चाहिए।" "महाराज मुझ गरीब की पत्नी मुझे वापस दे दो न।" निवासराव ने गिड़गिड़ाते हुए कहा। महाराज ने एक तीखी नजर संभाजी राजा की ओर घुमायी—"दुर्भाग्य केवल दुर्भाग्य। आज इस स्वराज में किसी भी स्त्री की इज्जत सुरक्षित नहीं है। हमारी प्रजा यदि खुलकर ऐसा बोलने लगी तो हम किसका मुँह देखेंगे।" महल में पूरी स्तब्धता छा गयी। महाराज की कठोर वाणी से युवराज और युवराज्ञी की वाणी कुंठित हो गयी। वाड़कर पिता पुत्र के झूठ को बढ़ावा मिला किन्तु गोदू की साँस अटक गयी। इससे आगे उससे चुप न रहा गया। वह सीधे आकर महाराज के पैरों पर गिर पड़ी और व्याकुल होकर कहने लगी— "महाराज, मैं माँ भवानी की कसम खाकर कहती हूँ कि ये दोनों स्वराज्य के दुश्मन और धोखेबाज हैं। आज रंगपंचमी की भीड़ का लाभ उठाकर रायगढ़ किले पर ही महाराज की हत्या का षड्यन्त्र इन दुष्टों ने रचा था।" हमारे ऊपर शस्त्र उठाना ! वह भी यहाँ रायगढ़ में, यहाँ आकर हमारे ऊपर ? उस गम्भीर परिस्थिति में भी महाराज अपनी हँसी नहीं रोक सके। राजा के नौकर और पहरेदार भी हँस पड़े। त्र्यम्बकराव का साहस इससे और बढ़ गया। वह हाथ जोड़कर दीनता से बोला, "देखा न महाराज, आपके युवराज ने इस गरीब की पुत्रवधू पर कैसा जादू डाला है। महाराज ! युवराज तो रंग उठाते हैं किन्तु इस गरीब की इज्जत तो धूल में मिल गयी।" महाराज ऊपर से थोड़ा ही विचलित दिखायी पड़ रहे थे किन्तु भीतर से उनका धैर्य छूट चुका था। महाराज को शम्भुराजा के पराक्रम के सम्बन्ध में तनिक भी सन्देह नहीं था किन्तु उनके चरित्र में आजकल उनका विश्वास डगमगा गया था। अष्टप्रधान ने, नौकरों ने, सरदारों ने महाराज को अनेक बार यह संकेत दिया था कि किसी सुन्दर स्त्री पर निगाह पड़ जाने पर युवराज किसी भी सीमा तक जा सकते हैं। 22 . सम्भाजी
इन्हीं सूचनाओं के कारण महाराज बहुत खिन्न थे। इसी बीच दरवाजे के बाहर कुछ गड़बड़ी की आहट मिली। अपना जरी के किनारे वाला उत्तरीय सँभालते हुए, ऊँचे कद, मजबूत हड्डियों वाले अण्णाजी अचानक अन्दर आये। उनकी घनी मूँछें, बोलती आँखें, कानों के हिलते कुंडल, तेजस्वी साँवला रंग आदि अहंकारी व्यक्तित्व का प्रमाण दे रहे थे। पैंसठ वर्ष के अण्णाजी ने महाराज के साथ अनेक ग्रीष्म और वर्षा ऋतुएँ देखी थीं। पन्त कुछ रुके। आगे का शब्द बोलने से पहले अण्णाजी दत्तो ने संभाजी राजा को गौर से देखा। युवराज ने भी क्रुद्ध होकर उनकी आँख से आँख मिलायी। युवराज की चमकती पुतलियाँ पन्त को बरछी के नोक जैसी धारदार और चमकदार दिखायी पड़ीं। ये दोनों एक-दूसरे को फूटी आँख नहीं सुहाते थे। अण्णाजी पन्त ने अपने माथे का पसीना उत्तरीय से पोंछ दिया। अपनी बात सँवारते हुए वे बोले, "महाराज यह बेचारी गोदू मेरी पत्नी की बहन की बेटी है। ये त्र्यम्बक मेरे करीबी रिश्तेदार हैं, महाराज!'' कहते कहते अण्णाजी की नजर गोदू के निश्छल निष्पाप चेहरे पर पड़ी और उनका मन फूट फूट कर रोने लगा। उनकी इकलौती बेटी हंसा की छवि उनकी कल्पना में नाचने लगी। हंसा वस्तुतः एक जीती-जागती जीवन-लीला थी। पंछियों की तरह क्रीड़ाशील, मोर की तरह नाचने वाली, तितली की तरह पन्त के इर्द-गिर्द घूमने वाली हंसा और उसकी स्मृतियाँ अण्णाजी का पीछा छोड़ने को तैयार न थीं। रायगढ़ के परिसर में होने वाली बारिश और वर्षा के पानी से पग पग पर बहने वाले झरने और इन्हीं पवित्र झरनों की तरह हंसा यौवन के उत्सव में सदैव नाचती रहती थी। अण्णाजी पन्त ने हंसा की शादी कुछ जल्दीबाजी में रचा दी थी। वह अपनी ससुराल पेण से पहली बार मायके आयी थी। एक दिन मंगला गौर के बहाने हंसा राजमहल में गयी। वहाँ से दुखी नहीं घायल होकर वापस लौटी। दो तीन दिन के बाद पाचाड़ के एक भरे हुए कुएँ में लोगों ने उसका तैरता हुआ शव देखा। उसके इस तरह अचानक जाने से सारा परिसर व्यथित हो गया। इस घटना के सम्बन्ध में जितने लोग उतनी बातें कर रहे थे। कोई कहता था कि हंसा पर बलात्कार हुआ। कोई कहता था कि उसके मन पर कोई गहरा आघात हुआ जिसके कारण उसने स्वयं ही मृत्यु को गले लगा लिया। किन्तु अण्णाजी पन्त तो अभी भी अपनी लाड़ली बेटी की याद में पागल हो जाते थे। पन्त के आगमन से वातावरण और भी गम्भीर हो गया न्यायाधीश प्रह्लाद निगजी घबरा गये। त्र्यम्बकराव ने अपनी पगड़ी उतारकर शिवाजी महाराज के पैरों पर रख दी। वह दुखी स्वर में चिल्लाया—"महाराज! गरीब की बहू को वापस उसे करो।" सम्भाजी :. 23
अण्णाजी दत्तो ने लज्जा से अपना सिर झुका लिया। महाराज भी बहुत शर्मिन्दा दिखाई दे रहे थे। उन्होंने क्रोध से येसूबाई की ओर नजर घुमायी। येसूबाई पर इस घटना का कोई भी प्रभाव दिखाई नहीं दे रहा था। बल्कि एक तरह के अभिमान और आत्मविश्वास से वह अधिक तेजस्विनी प्रतीत हो रही थी। येसूबाई ने पन्त की बात काटते हुए सीधा प्रश्न किया—‘‘बिना प्रमाण के उल्टा-सीधा कोई भी आरोप लगाने का अधिकार किसी को भी नहीं है। जहाँ तक इज्जत का सवाल है, वह जैसे प्रजा को प्रिय होती है वैसे ही युवराज को भी।’’ येसूबाई के इस अचानक आक्रमण से पन्त कुछ लज्जित हुए। परन्तु महाराज ने बीच में हस्तक्षेप करके येसूबाई को रोक दिया—‘‘बहूरानी ! हो सकता है कि तुम पर पतिप्रेम का जादू चढ़ गया हो किन्तु पिता होने के नाते युवराज को हम तुमसे अधिक अच्छी तरह पहचानते हैं।’’ पहले से जिनके चारों ओर आरोपों की आँधी घूम रही थी। शम्भूराजा चुप थे। केवल सुन रहे थे। अब और अधिक उनसे चुप नहीं रहा गया। दुखी स्वर में शम्भूराजा बोले— ‘‘पिताजी दुख इसी बात का है कि हमसे कोई अपराध नहीं हुआ है फिर भी हमें अपराधी ठहराया जा रहा है। यह बहुत बड़ा अन्याय है पिताजी। आज की घटना की जाँच पड़ताल आप अवश्य कीजिए। जाँच के बाद आपको भी विश्वास हो जाएगा कि आज होली मनाने की जगह पर, ठीक शोभा यात्रा के समय तोपों से पटाखों की बारूद के बदले असली बारूद के गोले दागे जाने वाले थे। षड्यन्त्रकारी आपकी जान लेने पर तुले हुए थे, पिताजी। यही सूचना देने के लिए यह निष्पाप गोदू दौड़ी-भागती आयी। वह मूर्ख मान ली गयी और मैं बदनाम हुआ। ‘‘शम्भूराजा ! केवल काल्पनिक कथाओं के आधार पर राज काज नहीं चलाया जाता। उसके लिए ठोस सबूत की आवश्यकता होती है।’’ अण्णाजी पन्त का दबा हुआ गुस्सा भड़क उठा था। अपने उत्तराधिकारी पर खुलेआम आरोप लगाये जाने से बड़े महाराज भी बेचैन हो गये थे। इसी समय मुल्ला हैदर वहाँ आये। महाराज ने उन्हें बड़ी आशा भरी दृष्टि से देखा। उनकी न्यायबुद्धि पर महाराज को बहुत विश्वास था। साठ वर्ष के मुल्ला साहब अपनी पलकों को झपकाते हुए बोले, ‘‘महाराज ! आपकी आज्ञा के अनुसार बाघ दरवाजे की ओर पहुँचाये गये बारूद की हमने बारीकी से जाँच की। पता चला कि उसमें पटाखे की बारूद थी ही नहीं।’’ वहाँ उपस्थित सभी लोग आश्चर्यचकित हो गये। हिन्दवी स्वराज की राजधानी में इस प्रकार का घातक षड्यन्त्र चिन्ता का विषय था। मुल्ला हैदर ने 24 :: सम्भाजी
अपनी जाँच का विस्तृत ब्यौरा प्रस्तुत कर दिया था। किले के ऊपर के बारूदखाने से तोप के गोले बाघ दरवाजे पर ही नहीं कहीं भी नहीं भेजे गये थे। उसी दोपहर में काले हौज के पास सन्दिग्ध अवस्था में देखे गये छः-सात लोगों को गड़करी कान्होंजी भांडवलकर की बटालियन ने रोका था। ये चोर अपने को बचाने के लिए भवानी कड़ा की ओर भागे। उन्होंने उस भयानक कड़े के ऊपर से नीचे की करौंदों की झाड़ियों में छलाँग लगायी। उस जगह पर अभी भी उनकी तलाश जारी है। थोड़ी देर में कान्होंजी राव स्वयं दरबार में उपस्थित हुए। उन्होंने शिवाजी महाराज को बताया—"महाराज! उन सन्दिग्ध लोगों में से चार जनों के शव मिले हैं। लिबास को देखने से वे बाहर से आये हुए पठान दिखाई पड़ते हैं। इससे पहले इन्हें इस क्षेत्र में किसी ने नहीं देखा।" शिवाजी महाराज के चेहरे पर उभरी तनाव की रेखायें ढीली पड़ गयीं! उन्होंने अपनी चमकती आँखों से गोदू की ओर कृतज्ञता से देखा। महाराज को विश्वास हो गया था कि शत्रुओं ने एक बहुत बड़ी साजिश का जाल बुना था। महाराज शम्भूराजा की ओर रुख करके बोले, "इतनी जरूरी खबर थी तो बाघ दरवाजे की ओर दौड़ने से पहले आपने मुझे क्यों नहीं सूचित किया?" "वहाँ दौड़कर पहुँचना और तोपों को नाकाम करके मराठों के प्राणों की रक्षा करना मेरा प्रथम कर्तव्य था, पिताजी।" शम्भूराज ने उत्तर दिया। शिवाजी महाराज की तीखी नजर वाड़कर पिता-पुत्र पर पड़ी। वे दोनों बहुत घबरा रहे थे। वे हकलाते हुए महाराज की ओर देख रहे थे। सारा प्रसंग बता रहा था कि दाल में कुछ काला था। दाल में काले का अनुमान अण्णाजी को भी हो गया था। उनकी शुरू में चढ़ी हुई त्योरी अपने आप ढीली हो गयी। सभी की नजर महाराज की ओर उठी। बड़े महाराज की नीर-क्षीर विवेकीवाणी फूटी— "अण्णाजी पन्त! यह घटना जटिल होती जा रही है। इसकी पूरी जाँच करना आवश्यक है। कान्होंजी! जाँच पड़ताल पूरा होने तक इन पिता-पुत्र को सामान्य कैद में रखो।" त्र्यम्बकराव और निवामराव को ऐसा लगा जैसे उनकी पीठ में भाले की नोक चुभ गयी हो। उन्हें कैदखाने की ओर ले जाया गया। अण्णाजी उनकी कोई सहायता नहीं कर सके। गोदू पहले की तरह ही सहमी खड़ी थी। अण्णाजी उसके पास गये और उसके सिर पर हाथ रखकर बोले, "चल बेटी! कल से तुम्हें बहुत परेशानी उठानी पड़ी है। चल अपनी मौसी के पास।" गोदू ने अण्णाजी का हाथ झटक दिया। उसने कोई उत्तर नहीं दिया। वह महाराज से इतना ही बोली, "महाराज! मुझे किसी रिश्तेदार के पास नहीं जाना है। सम्भाजी :: 25
जो हो गया वही बहुत है। " शिवाजी महाराज बड़े संकट में पड़ गये। गोदू के प्रति महाराज के मन में बड़ी दया उमड़ रही थी। यदि दूसरा अवसर होता तो महाराज उसकी बहादुरी के लिए अपने गले का रत्नहार उसे पहना देते। किन्तु वाड़कर पिता पुत्र के अपराधी सिद्ध होने पर भी वे अण्णाजी के रिश्तेदार थे। पूछताछ पूरी होने तक अपने अष्टप्रधानों में से किसी का भी अपमान होना महाराज की नीति के विरुद्ध था। वे किसी भी अधिकारी को अपमानित नहीं होने देते थे। किन्तु गोदू का क्या किया जाय ! महाराज इस बात को लेकर बहुत चिन्तित थे। अण्णाजी गोदू को अपने घर ले जाना चाहते थे। किन्तु उनके घर के लिए तैयार न थी। महाराज ने अन्त में निर्णय सुनाते हुए कहा, "गोदू छोटी बच्ची नहीं है। वह अपने बारे में स्वयं निर्णय ले लेगी।" महाराज अपना निर्णय सुनाकर मुक्त हो गये। किन्तु गोदू की समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि वो कहाँ जाय ? हवा की चपेट में आकर जिस तरह कोई सूखा पत्ता अटक जाता है उसी तरह गोदू भी कुछ समय तक खड़ी रही। उसने पहले शम्भुराजा की प्रशान्त और गम्भीर मुद्रा की ओर देखा। उसकी दृष्टि युवराज की बगल में खड़ी येसूबाई पर पड़ी। येसूबाई भगवान की मूर्ति के सामने जलती दीप शिखा की तरह तेजस्विनी, ममता की मूर्ति, स्वभाव से शीतल और कोमल मन की दिखाई पड़ रही थी। गोदू एकाएक भाव विभोर हो उठी। वह दौड़कर येसूबाई की बाँहों में समा गयी। वह व्याकुल होकर बोली, "युवराज्ञी आप ही मुझे अपने आँचल में सम्भाल लो। आपकी दासी बनकर मैं आपकी हर आज्ञा मानने और हर काम करने के लिए तैयार हूँ।" जिसके कारण येसू के पति पर लांछन लगाया था वही उसके गले पड़ रही थी। अचानक घटित इस प्रसंग से सभी संकट का अनुभव कर रहे थे। गोदू का शरीर सहायता प्रतीक्षा में थर थर काँप रहा था। येसू ने गोदू के चेहरे पर ममता से इस तरह हाथ फेरा मानो मक्खन के पिंड को सहला रही हों। युवराज्ञी ने बड़ी बहादुरी से कहा, "ठीक है गोदू! जब तक तेरी कोई समुचित व्यवस्था नहीं हो जाती तू हमारे अन्तःपुर में रह सकती है।" एक नौकर को आदेश देते हुए येसूबाई ने कहा, "इसको लेकर मेरे महल में जाओ। मैं भी पीछे आ रही हूँ।" पन्त का विचार था कि शिवाजी महाराज येसूबाई के इस व्यवहार में हस्तक्षेप करेंगे किन्तु महाराज ने उस ओर ध्यान ही नहीं दिया। इसके विपरीत उन्होंने मुल्ला हैदर को बाघ दरवाजे के पास घटी घटना अच्छी तरह 26 सम्भाजी
जाँच करने का आदेश दिया। अपने प्रति महाराज की बेरुखी और उपेक्षा से लज्जित हुए। अपनी नाराजगी को व्यक्त न करते हुए अपना उत्तरीय झटककर क्रोध से दरबार से बाहर चले गये। अब महल में बड़े महाराज, सम्भाजी राजा और येसूबाई के अतिरिक्त और कोई नहीं था। महाराज बड़ी दुख भरी नजरों से युवराज को देख रहे थे। युवराज की मुख मुद्रा में अनेक प्रकार की भावनाओं का ज्वार उमड़ रहा था। सम्भाजी राजा के धीरज का बाँध टूट गया। वे बड़ी विनम्रता से बोले, "पिताजी! क्षमा करें! मैंने आपको बड़ा कष्ट दिया है। किन्तु...।" "पिताजी! कोई अपराध न करने पर भी किसी को अपराधी ठहराकर दंडित करना कहाँ का न्याय है? पिताजी थोड़ी देर के लिए मान भी लिया जाय कि आपका युवराज चरित्रहीन है। परन्तु रायगढ़ की सुरक्षा में इतनी शिथिलता कब से होने लगी?" "मतलब?" "चितदरवाजों के फौलादी किवाड़ आजकल कभी भी रात बिगत कैसे खोल दिये जाते हैं। स्वयं छत्रपति इस किले पर रहते हैं, तब भी?" शिवाजी महाराज व्यंग्यपूर्वक हँसे और बोले, "पागल हो गये हो क्या बेटा? अरे, शाम को जब एकबार चितदरवाजा बन्द हो जाता है तो दूसरे दिन सुबह तक आदमी तो क्या कोई कीड़ा भी ऊपर नीचे नहीं हो सकता।" महाराज की बात सुनकर संभाजी राजा ने कहा, "यदि ऐसी बात है तो उसी दरवाजे से, जैसा कि अण्णाजी पन्त और दूसरे लोग कहते हैं, भोर में आदमी जाते कैसे और सुबह होने से पहले वाड़कर की बहू, को भगाकर कैसे ले आते हैं?" शम्भुराजा के इस प्रश्न पर शिवाजी महाराज बहुत विचलित हो गये। युवराज के ऊपर बदनामी के कीचड़ उछाले जाने और घटित हो रही घटनाओं के बीच निश्चय ही कुछ गड़बड़ है। यह महाराज भी अनुभव कर रहे थे। युवराज के शब्दों ने महाराज के हृदय के टुकड़े टुकड़े कर दिये—"पिताजी! आजकल हमारे दिन इतने बुरे हैं कि महाराज ने अपने दिल के दरवाजे शम्भू के लिए बन्द कर लिए हैं। और चोर डाकू कभी भी आ जा सकें इसलिए चितदरवाजे के किवाड़ों को पैर लग गये हैं।" युवराज की बातें सुनकर महाराज के हृदय में ममता का बाँध टूट पड़ा। उन्होंने शम्भुराजा के कंधे पर हाथ रखकर बड़े प्यार से कहा, "मन को इतना खट्टा न करो बेटा! कहीं पर कुछ गड़बड़ी जरूर है। हम इसका पता अवश्य लगाएँगे।" पिताजी! स्पष्ट रूप से बताता हूँ। आपको अपने प्यारे पुत्र से अलग करने के लिए सारी अच्छी बुरी ताकतें एकजुट हो गयी हैं।" सम्भाजी · 27
महाराज ने बड़े प्यार से शम्भूराजा को अपने समीप बिठाया। उनकी पीठ पर अपना ममता भरा हाथ फेरते हुए बोले, "हमारे कर्मचारियों से यदि कुछ त्रुटियाँ हुई होंगी तो निश्चय ही हम उनकी जाँच पड़ताल करेंगे। परन्तु बेटा, एक बात ध्यान रखना कि हमारे अष्ट प्रधान, हमारे सरदार, स्वराज्य का प्रासाद खड़ा करने में विगत चालीस वर्षों से रात-दिन, एक करने वाले हमारे प्राणों से भी प्रिय साथी रहे हैं। उनकी मान-मर्यादा उनके सम्मान का ध्यान रखना युवराज होने के नाते आपका भी कर्तव्य है। आप अपना व्यवहार सुधारें। नहीं तो...।" "नहीं तो क्या?" शम्भूराजा की आँखों ने प्रश्न किया, "आपसे अलग अकेले में जीने की हमें आदत डालनी होगी।" महाराज के इन कठोर शब्द को सुनते ही शम्भूराजा ने ऐसा अनुभव किया जैसे बाढ़ के बहाव में कोई बड़ा पेड़ उखड़ कर गिर गया हो। युवराज की आँखों में आँसू आ गये। उन्होंने कहा- "पिताजी! आपसे अलग रहने की कल्पना भी हमारे हृदय को चिथड़े चिथड़े कर देती है। एक बार इस संभाजी को हाथी के पाँव के नीचे कुचलकर मार डालने की सजा भले दे दीजिए। वह सजा मैं खुशी-खुशी स्वीकार कर लूँगा। किन्तु आपसे अलग रहने की कल्पना से मेरा हृदय विकल हो उठता है। अचानक शम्भूराजा को अपनी दादी जीजा माता का स्मरण हो आया। उन्होंने युवराज के कान में एक ही मन्त्र दिया था-"मेरे बच्चे शम्भू तू सदैव ही शिवाजी की छाया में रहना।" लेकिन अब समय बदल गया था। पूरी दुनिया को ममता की छाया देने वाले महाराज को शम्भू के लिए समय ही नहीं था। शम्भूराजा अचानक गद्गद स्वर में बोल पड़े-"पिताजी! कभी इस पागल संभाजी के बिना शिवाजी महाराज जीवित रह सकेंगे किन्तु आपकी छाया से दूर होकर इस संभाजी का जीवित रहना असम्भव है। बस वही हमारा दोष है।" शिवाजी महाराज ने अनुभव किया कि कहीं कोई भूल हो रही है। शम्भूराजा ने अपनी जन्मदात्री माँ का मुँह कभी नहीं देखा था। पुत्र के समान प्रेम से पालने वाली उनकी दादी जीजा माता भी कभी की भगवान को प्यारी हो गयी थीं। शिवाजी महाराज सोचने लगे, राज्याभिषेक समारोह तक जिसे होनहार पुत्र मानते थे; जिसने छोटी उम्र में कर्नाटक में कोलार की वतनदारी सम्भाली थी; फ्रांसीसी, पुर्तगाली, अंग्रेज जैसे अनेक देशों के वकील महाराज से मिलने से पहले जिससे परामर्श करते थे, जिसकी प्रखर बुद्धि और दिलेरी को देखकर लोग कह उठते थे- "यह तो भविष्य का सवाई शिवाजी है।" इस प्रकार जिसकी मुक्त कंठ से प्रशंसा होती थी वही अपना पुत्र पास होते हुए भी दूर जा रहा है। किसी-न-किसी से अवश्य चूक हो रही है। यह सोचकर शिवाजी विचलित हो उठे और शम्भूराजा को बाँहों में भर लेने के लिए आगे बढ़े लेकिन शम्भूराजा तो वहाँ थे ही नहीं। वे और 28 :: सम्भाजी
उनके पीछे येसूबाई राजमहल का आँगन पार करके बाहर निकल रहे थे। शिवाजी महाराज, आश्चर्यचकित होकर शम्भूराजा को पीछे से देखते रह गये। तीन उस दिन महादरवाजे के पहरे पर रायप्पा था। दोपहर में किले पर चहल-पहल कम होती है। उसी समय एक सजी हुई साँड़नी दरवाजे के सामने आकर खड़ी हुई। उसके साथ भास्कर ठाकुर और दो फिरंगी सवार थे। उनके आते ही पहरे पर तैनात सूबेदार ने अन्दर जाने का संकेत किया। वे लोग अन्दर प्रवेश करने ही वाले थे कि रायप्पा अड़ गया। वह कड़ी आवाज में पूछने लगा— "कौन हैं आप? कहाँ से आये हैं?" "जाने दे रे रायप्पा, गोवेकर वकील रामजी ठाकुर के लोग हैं। उनको अण्णाजी पन्त के बाड़े में जाना है।" ऐसा लगा कि सूबेदार को उनके आने के पहले से ही उनके बारे में जानकारी थी। रायप्पा कुछ हड़बड़ाया किन्तु तत्काल सँभलते हुए बोला, "वकील के लोग हैं तो उन्हें महाराज को मिलना चाहिए।" "परन्तु उनको पन्त सुरनवीस (एक पद) को मिलना होगा तो?" "पर इस प्रकार का आदेश कहाँ सूबेदार?" "रायप्पा किसलिए फालतू बखेड़ा करता है? बड़े महाराज आज किले में नहीं हैं।" "तब ये लोग युवराज से मिलें।" सूबेदार रायप्पा को मनाने लगा। इससे रायप्पा और सावधान हो गया। वह बाहर से भले ही जंगली और मतलबी दिखे लेकिन जंगली पक्षियों की धीमी आवाज की तरह चोरों की हल्की आवाज को सहज ही पहचानता था। इसलिए पुर्तगाली वाइसराय के वकील का अण्णाजी पन्त को चोरी से कुछ भेजने में उसे दाल में काले की शंका हुई। उसने गोवेकर लोगों को वहीं पर रोककर युवराज के पास सन्देश भेजा। शम्भूराजा का आदेश मिला तो रायप्पा ने सभी को ले जाकर शम्भूराजा के दरवाजे पर खड़ा किया। शम्भूराजा ने भास्कर ठाकुर से कड़ी आवाज में पूछा, "सच-सच बताओ, किसका है यह सामान? क्या है इस सन्दूक में?" लिपिक गोवेकर हड़बड़ा गया। उसने साफ-साफ बोल दिया—"दो बड़े सम्भाजी :: 29
रत्नहार हैं। फिरंगियों के वकील रामजी ठाकुर ने गोवा से भेजे हैं।" "किसके लिए?" "सुरनवीस अण्णाजी पन्त के लिए।" "ईनाम के रूप में?" "वैसे नहीं। पर...।" भास्कर ठाकुर ने 'त...त...प...प' हकलाते हुए सारी बात साफ कर दी। उसने बताया-"क्या हुआ युवराज कि दो महीने पहले हमारे वकील स्वयं महाराज से मिलने के लिए रायगढ़ आये थे। तब उन्होंने वाइसराय की ओर से एक बहुमूल्य उपहार महाराज को दिया था। "ठीक है। फिर?" "परन्तु...परन्तु...उस समय सुरनवीस अण्णाजी पन्त और मोरोपन्त पेशवा के लिए कुछ ले आना भूल गये थे। मोरोपन्त ने तो इस विषय में एक शब्द भी नहीं कहा किन्तु अण्णाजी ने पिछले तीन महीने में तीन चिट्ठियाँ भेजीं। रामजी पन्त को बहुत पीड़ित किया। पन्त ने कहा- "राज्य के कार्य व्यापार में कर्मचारी असन्तुष्ट हो जाय तो बड़े-बड़े काम भी धूल में मिल जाते हैं। इसलिए..." "आगे?" "आगे बोले तो उन्होंने दो बड़े रत्नहार खरीद लिये। वही लेकर हम आज पन्त को मिलने के लिए आये हैं। "ठीक है। युवराज की हैसियत से हम इसे स्वीकार करते हैं।" शम्भुराजा ने बगल में देखा। वहाँ पर पीठ पर अपने लम्बे बालों को खुला छोड़े, ऐंठी मूँछों वाले, गेहुँए रंग के, तीस वर्ष के, बलिष्ठ और लम्बी कद काठी के कवि कलश खड़े थे। उनकी ओर देखते हुए युवराज ने कहा, "कविराज इन लोगों को लिखित रसीद दे दीजिए और इन्हें तुरन्त वापस जाने दीजिए।" गोवेकर दूत चले गये तब हाथ जोड़कर कवि कलश ने युवराज से निवेदन किया-"राजन! थोड़े संयम से काम लें। रुकना सीखें।" शम्भुराजा हँसते हुए बोले, "क्यों? अण्णाजी पन्त तो उठते बैठते नाक ऊँची करके ही बोलते हैं न कि, 'हम किसी लफड़े में पड़ते ही नहीं हैं। चालीस साल से बहुत ही ईमानदारी के साथ महाराज की सेवा की है। वे ऐसा ही दावा करते हैं न'?" "परन्तु राजन! आप इन रत्नहारों का क्या करेंगे?" "जिनकी चीज है उनको दे देंगे। परन्तु उसे माँगने के लिए उन्हें मुझसे मिलना चाहिए।" शम्भुराजा ने हँसते हुए कहा। उसी शाम को अण्णाजी के छोटे भाई सोमाजी बड़ी शीघ्रता से शम्भुराजा के पास आये और कहने लगे, "युवराज दो महीने पहले बड़े भाई ने गोवा में पैसे भेजे 30 :: सम्भाजी