छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
गोले की दक्षिणी दिशा को नदी का नाम दिया जाता है। कौड़ियों को इकट्ठा करके गोले में फेंकते हैं। सिपाहियों का विश्वास है कि जिस सिपाही की कौड़ी गोले में पड़ेगी, उसकी कब्र उसी नदी के किनारे बनेगी। क्या बताऊँ आलम पनाह? हमारी सारी फौज भयाक्रान्त है। हर एक भीतर ही भीतर तड़प रहा है। सभी एक दूसरे से पूछते रहते हैं कि 'हम गंगा-यमुना की ओर जिन्दा लौटेंगे या यहीं कहीं लावारिस की तरह हमारी लाश गिरेगी'?" "वजीर यह बात यहीं तक सीमित नहीं है। तुम्हारे फौजी यह भी जानने का खेल खेलते हैं कि बादशाह की कब्र कहाँ खोदी जाएगी? क्यों? बोलो! बोलो!!" हताश बादशाह व्यंग्यपूर्ण हँसी हँसकर बोला, किन्तु उसके क्रोध के पीछे जो वेदना थी उसे छुपा पाना सम्भव नहीं था। विषय को बदलते हुए बादशाह ने वजीर से पूछा, "वजीर, नासिक और बागलाण की क्या खबर है?" "जहाँपनाह, आपके वफादार महावतखान ने वहाँ पर बड़े जोश से काम किया है। त्र्यंबक के किले पर पिछले छह महीने से घेरा डाल रखा है। रसद का एक दाना भी किले पर नहीं पहुँच रहा है। किले पर मराठे भूख से छटपटा रहे हैं। दो दिनों में ही किला कब्जे में आ जाएगा।" इसी बीच बादशाह का तीस वर्षीय पोता मोमिन खान दौड़ते हुए आया और बड़े उत्साह से कहने लगा, "मुबारक हो जहाँपनाह। बहुत अच्छी खबर-" "क्यों, क्या हुआ?" अपने पोते पर दृष्टि खड़ाते हुए बादशाह ने पूछा, "ओ जहन्नमी सम्भा अल्लाह को प्यारा हुआ या पकड़ा गया?" "नहीं, नहीं, वैसा नहीं, लेकिन दादाजान-" पोता हकलाया। "वैसा नहीं तो तुरन्त अपना मुँह काला करके निकल जाओ। इस किले पर घेरा डाला, उस किले पर घेरा डाला, ऐसी बकवास अब बन्द करो। बेवकूफो, उस पापी शिवा और सम्भा के तीन सौ से भी अधिक किले हैं। तुम्हारी इन फिजूल की बातों को सुनते-सुनते जिन्दगी समाप्त हो गयी, शैतानो।" मोमिन खान उल्टे पैर भाग गया। क्रोधित बादशाह उखड़ते हुए फिर वजीर से बोला, "पाँच लाख की फौज और पिछले आठ-नौ वर्षों का समय? हमारे तैमूरवंश में बाबर हुए, अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ, इतने खुदा के बन्दे आकर गये। पिछले दो सौ वर्षों से हमने हिन्दुस्तान पर राज्य किया। परन्तु इस तरह की आठ- नौ वर्षों की जालिम लड़ाई देखी थी किसी ने?" "बादशाह सलामत थोड़ा धीरज धारण करें।" असदखान ने आत्मीयता से कहा। "वजीर, आपको मालूम नहीं, हमारी सारी फौज को पागल होना ही बाकी है। पिछले आठ वर्षों से हमारे सैनिकों को घर मकान, बाले-बच्चे, किसी भी बात 592 :: सम्भाजी
का कुछ पता नहीं है। फौज ने रास्ते में मिली कितनी औरतों और बाजारू वेश्याओं को बर्बाद कर दिया। बहुत-सी मर गयीं। बहुत से फौजियों को असाध्य रोग ने जकड़ लिया है। रात के अँधेरे में पुरुष ही पुरुषों पर अत्याचार कर रहे हैं। यहाँ शैतानी बारिश, महामारी और यहाँ के भयानक अकाल से सारी फौज जर्जर हो गयी है। उनका मनोबल टूट चुका है। यदि समय पर इस स्थिति से सँभाला न गया तो एक दिन ये सारे सैनिक सन्तप्त होकर बादशाह को ही जिन्दा दफन कर देंगे।" अल्लाह ने बादशाह को बड़े जटिल चक्कर में फँसा दिया था। उसकी फौज में निरन्तर विवाद बढ़ रहे थे। अमदखान पहले शहंशाह से बड़े अदब से बोलता था। किन्तु परिस्थिति के कारण वह भी बदल गया था। वह फौज की समस्या को बादशाह से कह रहा था। "मेरे आका, अब ज्यादा समय तक फौज को रोके रखना कठिन है।" "हम किसी भी युक्ति से उस सम्भा को सह्याद्रि पर्वत से बाहर निकालेंगे।" "उसकी भी सारी कोशिशें बेकार हो गयीं। सम्भा बाहर आता ही नहीं। वहाँ पर फौजी चौकियाँ बनाने में भी कोई हमारी सहायता नहीं कर रहा है। वह गणोजी शिर्के भी डरपोक निकला, किबला ए आलम।" "इसे कितनी बड़ी बदकिस्मती कहा जाय, वजीरे आजम? वर्षों से उस शिवाजी के दो जामाता हमारे साथ हैं। तीसरा भी हमें ही चाहता है। उसके दस- बारह बड़े सरदार भागकर हमारे साथ आ गये हैं। फिर भी उसका लौंडा सम्भा हमारी पकड़ में नहीं आ रहा है?" बादशाह ने कड़कते हुए कहा, "कुछ भी करो, साम, दाम, दंड, भेद किसी भी हथियार का इस्तेमाल करो किन्तु शिकार हाथ में आना चाहिए।" दंड भेद नीति की बात करते करते बादशाह को अचानक स्मरण हुआ, "जुल्फिकार, क्या हुआ उस खवासखान का?" "जहाँपनाह, वह पाचाड़ के करीब पहुँच गया है।" "आगे की बात कर, कमबख्त।" एकाएक बादशाह की आँखें चमकीं। "सम्भा को छोड़ो, कम से कम राजाराम को तो हाथ में आने दो। वह छोकरा मुट्ठी में आ जाये तो मराठों का दूसरा राजसिंहासन स्थापित करूँ। तब हम गुर्राने वाले उस सम्भा को भी ठिकाने लगाएँगे।" दो दिन में ही बहादुरगढ़ से महादजी निंबालकर और पन्हाला से गणोजी शिर्के आकर मिलने वाले थे। सचमुच उन्हें तुरन्त मिलने का आदेश बादशाह ने ही दिया था। बादशाह अपने समीपी सहयोगियों से बार-बार कह रहा था कि, "रामशेज के किले ने हमें यह सबक सिखा दिया है कि मराठों का यह मूर्ख महाराष्ट्र तोपों के गोलों से नहीं झुकता। झुकेगा भी नहीं। किन्तु षड्यन्त्रों और सम्भाजी :: 593
धोखों से उनकी कमर तोड़ी जा सकती है।'' एक बार फिर बादशाह की नींद उड़ गयी। वह महाराष्ट्र के अनेक जमींदारों और जागीरदारों को पत्र लिख रहा था— "खानदानी मराठो! हमारे पास आओ। हम आपका सम्मान करते हैं। मुगलों की सल्तनत आपके लिए परायी नहीं है। यह आलमगीर आपको पराया क्यों लगता है? अपने मन के सन्देह को मिटा दीजिए। भाइयो आइये और अपनी जागीरों को लिखवाकर ले जाइये। आपके शिवाजी के साथ हमारी इतनी जानी दुश्मनी थी, वह सब हमने भुला दिया। शिवाजी के जमाई राजा इस औरंगजेब के दल में ऐशोआराम भोग रहे हैं। निंबालकर को हमने बहादुरगढ़ की थानेदारी सौंपी है। जहाँ पर हमारी जनानियों का आवास, रसद भंडार और बड़े बड़े बारूदखाने हैं—ऐसी महत्त्वपूर्ण चौकी हमने महादजी को सौंपी है। महाड़िक जेधे, माने, जगदाले जैसे अनेक नेक मराठे, अनेक गाँवों के मुखिया, बुद्धिमान ब्राह्मण सभी यहाँ पर आनन्द से जी रहे हैं। शिवा का बच्चा सम्भा ही कैसे ऐसा सिरफिरा निकला, पता नहीं। चाहे तो उस बेचारे को भी लेकर आइये। प्रेम से समझाकर और तत्काल पकड़कर यहाँ ले आइये। मुगलों की सल्तनत क्या और आपका स्वराज्य क्या ? हम सब एक हैं।'' बहादुरगढ़ से महादजी निंबालकर आये। उन्होंने बादशाह को एक सुन्दर उपहार भेंट किया। उनके बलिष्ठ शरीर, चौड़े भुजदंड, मजबूत गर्दन और तेजस्वी व्यक्तित्व देखकर औरंगजेब बहुत प्रसन्न हुआ। बड़े आदर से अपने घुटनों तक झुके महादजी के सिर को हाथ से ऊपर उठाते हुए बादशाह बोला, "महादजी आपकी तो तकदीर खुल गयी है। बहादुरगढ़ की थानेदारी करने की जगह हमने आपको रायगढ़ का सिंहासन देने का निश्चय किया है।'' "जहाँपनाह, रायगढ़ की उस पहाड़ी से आपके चरणों के पास की जमीन कहीं अधिक पवित्र है।'' "महादजी, बड़ी फौज दे रहा हूँ आपकी सहायता के लिए। शिवाजी का जमाई सेना लेकर रायगढ़ पर चढ़ाई कर रहा है, यह खबर कितनी बहादुरी की मानी जाएगी। '' महादजी ने बादशाह के पैर पकड़ लिये। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में स्वीकार किया, "ऐसी बहादुरी मुझसे नहीं हो पाएगी!'' उसने अधीरता से कहा, "हुजूर आपके पास रहते हुए ही मैं वहाँ का कार्य सम्पन्न करता हूँ।'' "वह कैसे?'' महादजी ने महाराष्ट्र के पठार के अनेक जमींदारों को पत्र लिखा था। उनकी प्रतिलिपियाँ उन्होंने बादशाह को दिखाईं। बाड़ी के खेमसावन्त को लिखा गया पत्र इस प्रकार था— "औरंगजेब बादशाह के समान बहादुर दूसरा कोई नहीं है। उन्होंने 594 :: सम्भाजी
गोलकुंडा को ध्वस्त कर दिया। बीजापुर के आदिलशाह की नाक में पानी भर दिया। अब उनकी तलवार के नीचे पापी और घमंडी सम्भाजी का भी बेड़ा गर्क होने वाला है। इसलिए इस खानदानी मराठा महादजी की शिवाजी के जामाता की आप सभी से प्रार्थना है कि आप सभी अपने औरंगजेब की सेवा में प्रस्तुत हो जायँ और अपनी सात पीढ़ियों का उद्धार करें।'' सीधे युद्ध में जाने से महादजी घबरा रहे थे। इसलिए बादशाह कुछ रुष्ट हुआ। रात को उसने असदखान से गम्भीर होकर बोला, "असदखान, पिछले अनेक वर्षों से मैं इस दक्षिण में जड़ जमाकर बैठा हूँ। मैंने मराठों को अच्छी तरह पहचाना है। वजीरे आजम बताइये, इन मराठों की कितनी जातियाँ हैं?" "जहाँपनाह! छियानबे या बानबे, ऐसा कुछ ये लोग बकते रहते हैं।" "नहीं असदखान, मेरे विचार से मराठों की सिर्फ दो ही जातियाँ हैं—एक मांडलिक मराठा, दूसरे मर्द मराठा। जिन्होंने पहले से कुतुबशाह, निजामशाह जैसा मालिक खोज लिया, उनकी सहायता से जागीर, महल संस्थान बनाकर, शानशौकत की जिन्दगी बिताते आ रहे हैं, वे मांडलिक मराठे हैं। किन्तु जो जागीर के लिए नहीं बल्कि अपने देश धर्म के लिए वर्षा धूप सहकर अपनी जिन्दगी दाव पर लगाते हैं, वे मर्द मराठे हैं। ये शिवा और सम्भा मर्द मराठों के सरताज हैं।" "जहाँपनाह, जो अपने दोस्त बने हैं उनकी तारीफ करने की जगह आप उन्हीं को दोष दे रहे हैं?" "वजीरे आजम, वे काहे के हमारे दोस्त? वे जागीर के टुकड़ों के दोस्त हैं। उनमें हमारा फायदा हो रहा है। यह अलग बात है?" "तो क्या जहाँपनाह सम्भा से दोस्ती करना चाहते हैं?" असदखान ने आँखों को सिकोड़ते हुए सीधा प्रश्न किया। "वजीरे आजम एक डेढ़ वर्ष पहले, जब गोलकुंडा का कुतुबशाह पूरी तरह हमारे कब्जे में आ गया था, उस समय उसकी और सम्भा की गुप्त दोस्ती का हमें पता था। कुतुबशाह की सहायता से मैंने सम्भा के पास दोस्ती का पैगाम भेजा था। सोचा लाखों की फौज लेकर इस बुढ़ापे में कितने वर्षों तक भटकता रहूँ?" असदखान ने अपने मन की बात भीतर ही दबाकर पूछा, "हजरत आपने सम्भा से क्या माँगा था?" "उसके सभी बड़े किले। उसके बदले में हम सम्भा को जितनी चाहिए उतनी जागीर देने वाले थे, लेकिन मैदानी भाग की।" "सम्भा ने क्या जवाब दिया?" "क्या देगा?" बादशाह का स्वर कटु हो गया, उसने कहा, "समझौते का पैगाम लेकर गये वकील के मुँह पर इतने जोर से थूका कि वकील बहुत देर तक सम्भाजी :: 595
अपनी आँख ही नहीं खोल सका।" दो दिन में ही पन्हाला से गणोजी शिर्के आये। आते ही उन्होंने बादशाह के पैर पकड़ लिए। जिस प्रकार घर के किसी बड़े बुजुर्ग के मिलने पर उसके गले लगकर कोई अपने ऊपर हुए अन्याय का दुखड़ा रोकर मन हल्का करता है। उसी प्रकार गणोजी बहुत देर तक बोलते रहे। उसके बोलते हुए बादशाह बड़ी होशियारी से उससे जानकारी प्राप्त कर रहा था। पन्हाला, विशालगढ़, मलकापुर, करहाड़, पीछे की सह्याद्रि की घाटी, जंगली रास्ते जैसी अनेक बातें पूछ रहा था। सम्भाजी और कवि कलश ने उसकी जिन्दगी किस तरह तबाह की, इसकी सारी कहानी गणोजी सुना गया। उसकी कहानी ध्यान से सुनते हुए बादशाह ने कहा, "गणोजी तुम नेक इन्सान हो, काम के आदमी हो, योग्य हो, किन्तु तुम्हारे पास कोई बड़ी फौज नहीं है।" बादशाह की इस जानकारी से गणोजी चौंक गया। किन्तु तत्काल अपने को सँभालते हुए बोला, "बादशाह सलामत, मेरे स्वामी, जैसा आप कह रहे हैं, वैसी फौजी शक्ति न होने से मैं सामने से वार नहीं कर सकता किन्तु अपने हाथ की छोटी खंजर से पीठ में ऐसा घाव करूँगा कि एकाध राज्य भी रसातल का चला जा सकता है।" "वाह गणोजी, अरे आपके जैसे नेक और बहादुर व्यक्ति को अपने जमाई के रूप में ऐसे ही थोड़े चुना होगा, शिवाजी ने।" बादशाह ने वस्त्र और आभूषण देकर गणोजी का सम्मान किया। उनके साथ दो दिन तक विचार विमर्श किया। गणोजी के विदा होते समय जितनी चाहिए उतनी जागीर देने का आश्वासन देकर बादशाह ने बल देकर कहा, "हमारे शहजादे आजम साहब से तो तुम मिले ही हो। पन्हाला की ओर आते जाते रहिये। किसी चीज की जरूरत हो तो आजम साहब से बेहिचक माँग लीजिए।" "बड़ी कृपा की आपने, बादशाह सलामत।" "आप चिन्ता न करें। आपके पन्हाला पहुँचने के पहले ही आजमसाहब के पास हमारा सन्देशा पहुँच जाएगा।"
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कवि कलश शम्भू महाराज को एक खुशखबरी सुनाने लगे, "समय पर भगवान की 596 :: सम्भाजी
कृपा हुई है, राजन! जिंजी से बड़ी अच्छी खबर आयी है। " "कौन सी कविराज ?" "हरजी राजा ने तीन हजार बैलों पर लादकर धन और अनाज भेजा है। पन्द्रह दिन पहले ही लोग वहाँ से बैलों को लेकर चल चुके हैं।" "अच्छा हुआ।" महाराज प्रसन्न हो गये। बड़े सन्तोष के साथ उन्होंने कहा, "हरजी शूरवीर और होशियार हैं। यहाँ की अकाल और अभाव की खबरों को सुनकर उनकी आँखें खुल गयी होंगी। कुछ भी हो जो हुआ अच्छा ही हुआ। दो चार दिन ही बीते थे कि कृष्णाजी कोन्हेरे कवि कलश और शम्भूजी महाराज के पास दौड़ते हुए आये। अपने कन्धे के उत्तरीय को झटकते हुए कहने लगे, "पत्र आया है, अथणी से, दिगोजी निंबालकर की खबर कुछ अच्छी नहीं है।" शम्भू महाराज और कवि कलश ने आँखें उठाकर कोन्हेरे की ओर देखा। कोन्हेरे ने कहा, "जिंजी से पीठ पर धनधान्य लादे बैल जत के मैदान में पहुँच गये। वहाँ बादशाह की फौज ने उन्हें लूट लिया। परन्तु दिगोजी पन्त का कहना है कि सम्भव है कि बैलों को हाँकने वाले रास्ता भूलकर बादशाह की फौज में पहुँच गये होंगे।" शम्भू महाराज ने इस पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। दो दिन बाद ही हरजी राजा का पत्र आया। उन्होंने लिखा था, "अनाज पहुँचा या नहीं कृपया इसी हरकारे से शीघ्रातिशीघ्र सूचित करें। कवि कलश ने आश्चर्य से पूछा, "राजन गलती किससे हुई? आदमियों से या बैलों से ?" उदास भाव से हँसते हुए शम्भू महाराज ने कहा, "कविराज तीन हजार बैलों को हाँकने वाले कितने रहे होंगे ?" "कम से कम साठ सत्तर।" "हरजी के ही न ?" "नहीं तो और किसके ?" "फिर उसका दोष उन चौपाए जानवरों को क्या दिया जाय ? दो पैर वाले के दिमाग से निकली यह कोई योजना है।" "मतलब ?" "मैं पहले से ही कहता आया हूँ कि हमारे हरजी 'जीजा जितने बहादुर हैं, उतने ही चालाक भी। यह योजना तो उनकी पहले से बनी बनाई है।" "वह कैसे ?" "हमें रसद भेजने की सूचना देकर उसी समय रसद जानबूझकर औरंगजेब के पास भेज दी गयी। भविष्य में अगर हमारे दुर्भाग्य से बादशाह की विजय हुई तो सम्भाजी :: 597
उनके पास दंडवत होने के लिए ये तैयार रहेंगे। यह भी कहेंगे कि हम तो पहले से ही बादशाह के सेवक रहे हैं। कोई और रास्ता न होने के कारण साले के पास रुके थे। वफादारी का सबूत पेश करने के लिए ये बैल उपयोगी सिद्ध होंगे।" आठ सवेरे सवेरे जुल्फिकार आकर बादशाह के सामने खड़ा हो गया तो बादशाह ने उसके चेहरे की ओर देखा। औरंगजेब का कलेजा काँप गया था। उसके मौसेरे भाई का चेहरा इतना ठगा सा हो गया था कि आगे कुछ पूछने की बादशाह की हिम्मत ही नहीं हो रही थी। करुण एवं उदास स्वर में जुल्फिकार किसी प्रकार बोला, "रहम करें जहाँपनाह! यह बुरी खबर देने के लिए मेरी जबान उठ ही नहीं रही है। हमारे जैनुद्दीन और उसके साथियों ने बड़ी कोशिश की थी। पाचाड़ के राजमन्दिर में राजाराम ने उन्हें खाने पर बुलाया था। उसी रात को उसे गिरफ्तार करना था। किन्तु उसी समय सम्भाजी की पत्नी येसूबाई वहाँ पहुँच गयी। उसने हमारे बहादुरों की आँखों में नाचती चोर दृष्टि को तत्काल पहचान लिया। 'दुश्मन, दुश्मन' कहकर ऐसा शोर मचाया कि मराठे सैनिक दौड़ पड़े। फिर क्या था, मराठों ने हमारे सारे साथियों को काट डाला। बचे हुए दो को कैद कर लिया गया है।" बादशाह ने कुछ भी कहा नहीं। खिन्न मन से लालबारी के दरबार वाले डेरे में जाकर बैठ गया। चुपचाप नित्य की भाँति अपना कार्य शुरू किया। उसी दिन दोपहर को मंसूरखान की एक हजार सवारों की एक फौज, दौड़ते हुए जत के मैदान में आयी। सेना अपने साथ कुछ कैदियों को भी लेकर आयी थी। औरंगजेब ने तुरन्त उन्हें भीतर बुलाया। बादशाह के सामने गोसांई की वेश भूषा में आठ हट्टे कट्टे नौजवान आँखें लाल किये निर्भीक भाव से खड़े थे। उनके काले कठोर चेहरे और उनकी लाल आँखों को देखने का साहस नहीं हो रहा था। "मंसूरखान! कौन हैं ये लोग?" "जहाँपनाह! कल ही हिन्दुओं के एक शिवमन्दिर में मिल गये। ये बदमाश सम्भा के आदमी हैं।" "आठ?" "नहीं हजरत! चार पाँच और भी थे। हमारे सूबेदार ने रात को धावा बोला तो ५७४ सम्भाजी
अँधेरे का फायदा उठाकर चार-पाँच भाग गये। इनका लिबास गोसाइयों और फकीरों का है, मगर ये पेशे से फौजी हैं। एक एक के शरीर में दस दस आदमी की ताकत है।‘‘ बादशाह ने अपनी जप माला को सीने मे लगाते हुए पूछा, ‘‘और इन लोगों का मकसद?’’ मंसूरखान हड़बड़ा गया। वह अन्य उपस्थित लोगों की ओर देखने लगा। तब बादशाह ने सभी को बाहर जाने के लिए आँखों मे संकेत किया। गुप्तचर, नौकर, मेहमान सभी बाहर चले गये। उन आठ लोगों पर औरंगजेब ने एक बारीक नजर डाली और तुरन्त मंसूरखान से पूछा, ‘‘इन लोगों का मकसद?’’ ‘‘आपकी मौत। जहाँपनाह।‘‘ ऐसा कहते हुए खान ने अपना सिर नीचे झुका लिया। मंसूरखान ने मराठों की इस टोली को पहले ही बहुत पीटा था। उनके शरीर पर अनेक घाव दिख रहे थे। किन्तु उनकी आँखों में तेज था। उनके बारे में बादशाह ने खास पूछताछ की-‘’मंसूरखान फौज में इनका ओहदा क्या था? सरदार सूबेदार?’’ ‘‘नहीं हुजूर, साधारण सैनिक। किन्तु इनके पद की अपेक्षा इनका मकसद बहुत ही खतरनाक था। आपको बीच ही में कहीं पर फँसाकर कत्ल कर देने का इनका इरादा था। इसीलिए ये यहाँ आये थे।‘‘ औरंगजेब ने सकट के एक और विषैले घूँट को पी लिया। अपने पर काबू करते हुए, उसने एक फौजी संन्यासी से प्रश्न किया, ‘‘क्यों जवाँमर्द सम्भा ने तुम्हें क्या हुक्म दिया था?’’ बिना एक क्षण का विलम्ब किये वह तरुण बोला, ‘‘महाराज ने हमसे इतना ही कहा था। औरंगजेब हमारे देश, धर्म और ईश्वर के लिए सकट हैं। वह जहाँ भी और जिस रूप में मिले उसे वहीं और उसी रूप मे खत्म कर दो।‘‘ औरंगजेब मन्द हँसी हँसकर मंसूरखान से पूछने लगा, ‘‘अथणी के देवालय मे सम्भा के दूसरे साथी भाग गये थे क्या?’’ ‘‘नहीं नहीं जहाँपनाह! इतना ही नहीं है।‘‘ खाँसते और गला साफ करते हुए मंसूर ने कहा, ‘‘अपनी जान की बाजी लगाकर आपका खात्मा करने के लिए ऐसी दस बारह टोलियाँ, जत, अथणी, पंढरपुर, मंगलवेढ़ा आदि क्षेत्रों में घूम रही हैं।‘‘ मंसूरखान का आखिरी वाक्य तपती सलाख की तरह घूम गया। प्रयत्न करने पर भी वह अपने चेहरे की भीति रेखा को छुपा नहीं पाया। वह सन्तप्त होकर बोला, ‘‘जिस समय वह बदमाश हंबीरराव मरा, उस समय लगा था कि सम्भा झुक
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जाएगा। जब काफिरों की सहायता करने वाली कुतुबशाही और आदिलशाही का खात्मा किया था, तभी भी ऐसा ही लगा था। लेकिन—लेकिन—" बादशाह की बात अधूरी ही रह गयी। उस दिन बादशाह ने अपना लालबारी का दरबार जल्दी ही समाप्त कर दिया। संकटों के आघात को मनुष्य झेल सकता है, किन्तु जब समय ही आघात करने लगे तो मनुष्य का अपने ऊपर से विश्वास उठने लगता है। बीजापुर की महामारी झेलकर और अपनी पचहत्तर हजार सेना गँवाकर भी बादशाह बड़े उत्साह और हिम्मत से आगे बढ़ा था। किन्तु उसका नसीब ही धोखा दे रहा था। पन्हाला की ओर से शहजादे आजम से कोई समाचार नहीं मिल रहा था। मराठों ने सर्जाखान, शहाबुद्दीन, पोलादखान, बरामदखान जैसे बहादुरों को वहीं उलझा रखा था। उसी में राजाराम को पकड़ने की खतरनाक कोशिश भी नाकाम हो गयी थी। धन का अभाव, रसद का अभाव, उत्तर से सहायता का निरन्तर कम होते जाना, दक्खिन में जगह-जगह अकाल, अन्तिम सफलता न मिलने से हताश होती फौज, उद्धत होते सवार-सरदार, मनोबल और धीरज खो चुकी फौज और ऊपर से वह कौड़ी कबरी का खेल!'' बादशाह के दिमाग में किसी ने कौड़ी-कबरी का जालिम खेल भर दिया था। उससे भी अधिक मंसूरखान द्वारा ले आये गये अथणी के वे कैदी उसे आतंकित कर रहे थे। सम्भा द्वारा इधर भेजी गयी टोलियाँ और उनके द्वारा कही गयी वह हकीकत। लगता है वह काफिर का बच्चा अपनी गर्दन पर बैठा है। बादशाह सारी रात छटपटाता रहा। डेरे की कनात के पास हवा से यदि कोई पत्ता खड़का या घोड़े के पाँव से हल्की-सी आवाज हुई तो बादशाह घबराकर उठ जाता था। किस नदी के किनारे अपनी कब्र बनाई जाएगी? मेरी जान लेने के सम्भा के द्वारा भेजे गये शैतान यहाँ कैसे आ पाएँगे? इसी प्रकार की शंकाओं ने बादशाह को पागल बना दिया था। आँखों के सामने हीराबाई, पानी के बिन तड़पता शाहजहान, रक्त से सना दारा का सिर नाच रहा था। दक्खिन का सह्याद्रि छाती पर टूटता हुआ सा प्रतीत हो रहा था। बड़े सवेरे ही बादशाह को तेज बुखार चढ़ा। उदयपुरी बेगम उसका सिर पकड़कर पास ही बैठी थी। किसी भी उपाय से बुखार उतर नहीं रहा था। किन्तु हकीम ने बताया था कि वह प्लेग का बुखार नहीं है। यह जानकर सभी की जान में जान आयी। बुखार से तड़पते बादशाह के कानों में किसी की आवाज आयी। "मुकर्रबखान उस ओर सांगोला के समीप आया है।" बादशाह ने तुरन्त उसके पास हरकारा भेजा। दूसरे दिन दुर्बल बादशाह अपने बिस्तर में पड़ा था। कनात की खिड़कियों से 600 :: सम्भाजी
डूबते सूर्य की किरणें भीतर आने की कोशिश कर रही थीं। बादशाह ने नजर उठाई तो उसे पलँग के पास मुकर्रबखान हैदराबादी दिखाई पड़ा। उसके हाथ में फलों की टोकरी थी। अपने बीमार स्वामी से मिलने के लिए वह दौड़ता हुआ आया था। बादशाह ने इशारे से अपने सिरहाने बिठा लिया। मुकर्रबखान ने चिन्तित स्वर में पूछा, "मेरे आका शाही हकीम आकर गया कि नहीं?" बादशाह ने अपने कोमल हाथ के पंजे से मुकर्रबखान का हाथ पकड़ लिया। बड़े प्रेम से हाथ को दबाते हुए बादशाह ने भावुक होकर कहा, "मुकर्रबऽ तू ही मेरा सच्चा हकीम है।" मुकर्रबखान को देखते-देखते औरंगजेब की डूबती आँखों में जान आ गयी। उसने उसकी ओर घूरकर देखा। बबूल के तने जैसा ऊँचे साँवले चमकती आँखों वाले तेजस्वी मुकर्रबखान को देखकर बादशाह का साहस और भी बढ़ गया। जैसे कोई व्यक्ति पुराने कपड़ों को छोड़कर नये कपड़े धारण कर लेता है, वैसे ही बादशाह ने अपनी बीमारी को छोड़कर नया जोश धारण कर लिया। बादशाह उठकर बिस्तर में बैठ गया। मुकर्रबखान की हथेली को बड़े प्यार से सहलाते हुए उसने कहा, "मुझे पता है मुकर्रबखान कि," कहते-कहते बादशाह की दृष्टि पास बैठी उदयपुरी बेगम पर पड़ी। राजनीति की बात चलने पर बेगम ही नहीं, अन्य किसी को भी वहाँ रुकने की इजाज़त नहीं थी। उदयपुरी बेचारी तुरन्त वहाँ से दूसरी ओर चली गयी। "हाँ, हाँ। मुझे पता है मुकर्रबखान! दक्खिन के सभी मुसलमान सरदारों में एक तू ही केवल बहादुर योद्धा ही नहीं अल्लाह के दरबार का सच्चा सिपाही भी है।" "मैं तो आपका एक साधारण सेवक हूँ, बादशाह सलामत।" अब मुकर्रब खूब सावधान हो गया था। बादशाह ने किस उद्देश्य से इतनी शीघ्रता से उसे मिलने के लिए बुलाया था, यह उसकी समझ में नहीं आया था। किन्तु उसे बहुत देर तक भ्रम में न रखकर औरंगजेब ने कहा, "शेख मुकर्रब! उस नारकी सम्भा ने कितना उपद्रव मचा रखा है, यह आपको बताने की जरूरत नहीं है। वह कैसा कुत्ता और कमीना है यह भी आप जानते हैं। इस काफिर बच्चे के बाप शिवा को भी मैंने पुरन्दर की सन्धि के समय काबू में कर लिया था। किन्तु आज नौ-दस वर्षों से यह शैतान औरंगजेब को मूर्ख फकीरों की तरह दक्षिण के वनों और मैदानों में भटका रहा है।" बादशाह ने मुक्त मन से साँस ली। बोलते बोलते वह बहुत भावुक हो गया। उसकी आँखों में आँसू उमड़ आये। गाजर की भाँति बादशाह की लाल नाक और भी लाल दिखने लगी। उसने व्याकुलता से कहा, "मुकर्रब! किस बुरे मुहूर्त में मैं इस मुहिम पर निकला? कौन जाने। मराठों के महत्त्वपूर्ण किले अभी भी क़ब्जे में सम्भाजी :: 601
नहीं आये। सम्भा का कुछ पता नहीं चलता। मेरे सभी शहजादे मूर्ख हैं। पोते भी बेवकूफ निकले। फौज का मनोबल भी टूट चुका है। मेरी उम्र हो गयी है। उठते- बैठते हड्डियाँ बजती हैं। अल्लाह की सेवा में टोपियाँ बनाने के लिए भी नजर काम नहीं देती। अपनी सेना पर भी अब मुझे भरोसा नहीं है। सह्याद्रि की घाटियों का स्मरण करके ही सैनिक घबरा जाते हैं। वे हरामजादे कबड्डी-कबरी का खेल खेलते हैं। वे यह अन्दाज लगाने की भी कोशिश करते हैं कि बादशाह की कब्र दक्षिण में किस नदी के किनारे बनाई जाएगी।" "जहाँपनाह। लानत है ऐसी जिन्दगी पर।" मुकर्रब बीच में ही बोल पड़ा, "चार-पाँच लाख फौज के मालिक और हिन्दुस्तान के शहंशाह, जिसके आसपास सैनिकों का समुद्र, ऐसे बादशाह की आँखों में आँसू? फिर ऐसी फौज किस काम की?" "इसीलिए तो हम तुम्हें पन्हाला की ओर भेज रहे हैं।" "आप सारी फिक्र छोड़ दें जहाँपनाह। अब मैं खुले मैदान में उस सम्भा की चमड़ी उधेड़ता हूँ। नहीं तो उस जंगली बन्दर को नचाते हुए आपके पास ले आता हूँ।" "ऐसा शैतानी ख्वाब कभी मत देखना मुकर्रबखान! अरे बेवकूफ वह सम्भा खुली जंग में बन्दी होने वाला होता तो यह बादशाह पिछले आठ नौ वर्षों तक फकीरों की तरह क्यों भटकता? आज मेरे सभी सरदार और तीन साढ़े तीन लाख की फौज नाकामयाब है और सह्याद्रि की पहाड़ियों में राज्य करने वाला वह शिवा का कुत्ता दिन-ब-दिन मगरूर होता जा रहा है।" बादशाह खयालों में खो गया। उसने अपने आपसे कहा, 'यह सच है कि सह्याद्रि की उन पहाड़ियों पर मेरा भरोसा कभी नहीं रहा। आज तो खुद पर भी मेरा भरोसा नहीं है। इस फौजी जुलूस पर तो बिलकुल नहीं। अरे रामशेज जैसे छोटे से किले पर कब्जा करने के लिए हमारे इन हरामजादों को साढ़े छह वर्ष हो रहे हैं। तो इनका भरोसा कैसे किया जाय? रामशेज तो नाशिक के पास है जबकि गयगढ, राजगढ़, प्रतापगढ़ तो सह्याद्रि के हृदय में बसे हुए हैं।' "तो क्या हुआ जहाँपनाह? हम जाएँगे। चलिए मैं आपके साथ हूँ।" "हम किसलिए जाएँगे? अपनी कब्र की जगह खोजने के लिए?" बादशाह कुछ हताश हुआ। किन्तु फिर ममझाने के स्वर में बोला, "मुकर्रब तू मुझे अपने सगे भाइयों से भी अधिक प्रिय है। इसलिए बताता हूँ। मुझे एक शैतानी ख्वाब रात दिन आना रहता है कि उस रायगढ़ और राजगढ़ किले पर सिंह का एक घायल बच्चा निरन्तर गश्त लगा रहा है। यह घूमता हुआ सिंहशावक मुझे रात-दिन सता रहा है। 602 सम्भाजी
यह ख्वाब मेरी आँखों को डँसता है और मेरे पूरे शरीर में कँपकँपी छूट जाती है।" बादशाह की यह दीन-हीन दशा देखकर मुकर्रबखान स्वयं शर्मिन्दा हो गया। बहुत देर तक दोनों में बातें होती रहीं। अपने मन की बात मुकर्रब के सामने स्पष्ट करते हुए बादशाह ने कहा, "मुकर्रब, अब समय बर्बाद न कर तुम पन्द्रह हजार की फौज लेकर पन्हालगढ़ की ओर बढ़ो।" "पन्हाला की ओर?" मुकर्रब ने चकराकर बादशाह की ओर देखा। "क्यों? मैंने वहाँ शहजादे आजम को पहले ही भेजा है, इसलिए?" "जी हाँ!" "उसकी तुम बिलकुल चिन्ता न करो। वहाँ का सारा सूत्र मैं तुम्हारे हाथ में सौंपता हूँ। हमारा शहजादा भी तुम्हारे हुक्म के अनुसार कार्य करेगा। ऐसा फरमान मैं आज ही जारी कर देता हूँ। तुम्हारी दिशा, तुम्हारा मकसद, तुम्हारा ध्येय है सम्भाऽऽ, सिर्फ सम्भाऽऽ।" "शुक्रिया, जहाँपनाह! इस साधारण बन्दे पर आपने असीम कृपादृष्टि दिखाई है।" सीने पर मुट्ठी मारकर बादशाह के सामने झुकते हुए मुकर्रबखान ने कहा, "मैं भी इसी दक्खिन की मिट्टी का वीर सैनिक हूँ। उस सम्भा को ठिकाने लगाने की हर सम्भव कोशिश करूँगा। मेरी तेज नजर काफिर की हर गतिविधि पर बनी रहेगी। बिजली की तरह तेज और बाणों की तरह तीव्र गति वाले जासूसों को मैं वहाँ भेजूँगा, जो हवा के वेग से पहाड़ियों से टकराकर, उसी वेग से समाचार लेकर वापस आ जाएँगे। लेकिन बादशाह सलामत एक मेहरबानी और कीजिए। मेरे साथ भरपूर खजाना भी दीजिए।" "बेशक, बिलकुल!" "एक राज की बात बताता हूँ जहाँपनाह। मराठों जैसी परोपकारी और लालची जाति पूरी दुनिया में कहीं नहीं होगी। थोड़े से धन की लालच में वे अपने सगे भाई का भी गला घोंट सकते हैं।" "वाह क्या परख है?" आलमगीर प्रसन्न हो गया। "जहाँपनाह, मुर्गे के सामने जैसे दाने डाले जाते हैं, वैसे ही मैं इन मराठों के सामने हीरे जवाहरात फेंकने वाला हूँ। यदि खर्च बढ़ गया तो उसे सरकार द्वारा मंजूर किया जाय।" औरंगजेब बहुत सन्तुष्ट हुआ। रामशेज पर जब क़ब्ज़ा नहीं हो पा रहा था तब औरंगजेब ने द्रव्यलोभ के हथियार का उपयोग किया था। अब्दुल करीम नाम के जमादार के माध्यम से रामशेज के नये मराठा किलेदार को लालच देकर अपनी ओर सम्भाजी ७०३
मिला लिया था। हजारों तोपों से जो सफलतां नहीं मिल पायी थी उसे विश्वासघात की तीक्ष्ण कटार ने प्राप्त कर लिया। इसी अस्त्र के उपयोग का बादशाह ने निश्चय किया था। जिस प्रकार किसी भूखे ऊँट को रेगिस्तान में हरी घास दिखाई दे जाये वैसे ही औरंगजेब को मुकर्रबखान से आशा की प्रतीति हुई। उसने मुकर्रबखान की आँखों में दृढ़ निश्चय का तेज देखा। वह प्रसन्न होकर अपनी जगह से उठा और बड़े प्यार से मुकर्रब की पीठ थपथपाते हुए बोला, "बहादुर! धन की चिन्ता बिलकुल न करो। चाहिए तो निकलते समय हमारा आधा खजाना हाथी पर लादकर भले ही ले जाओ। किन्तु कार्य में सफलता मिलनी चाहिए।" बोलते-बोलते आलमगीर पुनः गम्भीर हो गया। गहरी साँस लेकर बोला, "लेकिर मुकर्रब इस मुहिम में एक क्षण के लिए भी गफलत नहीं करना। हंगामा मचाकर वेग से आक्रमण करने, छुप-छुपकर आक्रमण करके शत्रु को परेशान की कुशलता में वह सम्भा माहिर है। वह अपने बाप शिवा से दस गुना तेज और सताने वाला है। कुछ भी करो किन्तु उस काफिर बच्चे को लगाम जरूर पहनाओ। यही अल्लाह की इच्छा है, यही उसकी सच्ची खिदमत है।"
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उद्घोष एक सन्ध्या समय शीतल बयार चल रही थी। केर्ल्या के पठार पर मुकर्रबखान का पड़ाव पड़ा था। तम्बू के द्वार पर मशालें भकभका रही थीं काले भुजंग से मशालची मशालों में तेल भरते जा रहे थे। ऊँट और घोड़ों को दो दिनों के बाद विश्राम मिला था। वे गीला सूखा जो भी चारा मिला उसे चबा रहे थे। अपने खूँटे के चारों ओर घूम कर पूँछ झाड रहे थे या जुगाली कर रहे थे। छावनी के मध्यभाग में मुकर्रबखान का डेरा था। उसके शामियाने के चारों ओर मशालें फुरफुरा रही थीं। हाथों में नंगी तलवारें लिये सिपाही पहरा दे रहे थे। मशालों के प्रकाश में तलवारें चमचमा रही थीं। अपने डेरे पर मुकर्रबखान मखमली मसनद से टिका आराम कर रहा था। उसके चेहरे पर चिन्ता की रेखाएँ साफ-साफ झलक रही थीं। वह बार बार दाईं ओर बनी कनात की खिड़की की ओर देख रहा था। सामने की काली पहाड़ी पर स्थित पन्हालगढ़ उस अँधेरे में जैसे उसे मुँह चिढ़ा रहा हो। इसी समय बाहर कुछ दूरी पर कुत्ते जोर-जोर से भूँकने लगे। बीस पच्चीस घुड़सवारों का एक दल, अपने घोड़ों को हवा की गति से दौड़ाता हुआ छावनी की ओर आ रहा था। इस दल के बीच में मुकर्रबखान का एक पुत्र और एक दीवान था। उन दोनों के पीछे कुछ मराठा सैनिकों के घोड़े दौड़ रहे थे। तेजी से आ रहा दल प्रवेश द्वार पर रुक गया। शहजादे के पीछे एक पैंतालीस वर्ष का मराठा सरदार घोड़े से उतरा। उसके शरीर पर जख्मों के निशान थे और चेहरा सूजा हुआ था। कुछ दिन पहले ही उसकी एक आँख में चोट आयी थी इसलिए वह आँख लाल थी। दल के सभी लोग खान का झुककर अभिवादन करते हुए उसके सामने गये। उस विकृत चेहरे वाले मराठा सरदार ने शान से ऐंठकर बैठे हुए मुकर्रबखान को देखा। उसे देखकर वह इतना आनन्दित हो गया मानो उसे अपने कुलदेवता का सम्भाजी :: 605
दर्शन हो गया हो। वह मराठा सरदार रोते हुए मुकर्रबखान के चरणों में गिर पड़ा। वह अपनी आँख और नाक खान के पैरों में रगड़-रगड़कर हिचकियाँ लेते हुए बोला, "बचाओऽऽ, खानसाहब बचाओऽऽ।" मराठा सरदार के इस अप्रत्याशित व्यवहार से मुकर्रबखान कुछ हड़बड़ा गया। उसने सलीम से पूछा, "कौन है यह पागल आदमी?" "बाबाजान! यही है वह गणोजी राजे शिर्के। सम्भाजी का सगा साला, शिवाजी का जमाई।" "उठिए गणोजी राजे।" कहते हुए मुकर्रबखान ने बड़े प्रेम से उसकी पीठ पर एक थपकी दी और पूछा, "गणोजी बादशाह की छावनी में तुम्हारी इतनी इज्जत है तो फिर तुम एक बेसहारा दासी की तरह यहाँ रो क्यों रहे हो?" "क्या करें खानसाहब उस सम्भा और कलुशा ने हमारे शिर्के परिवार को बेघर कर दिया है। सारे शिर्के लोगों को खदेड़ दिया है। हमारी कुटरे गाँव की हवेली पर क़ब्ज़ा कर लिया है। हमारे दो-तीन चचेरे भाइयों को मार डाला है। मैं खुद और मेरे साथ देवजी और दौलतराव जैसे लोग भागकर मुगलों की शरण में आये हैं। क्या कहें! क्या बताएँ खान साहब ! अब हमारे बीवी बच्चे भी शिरकान में नहीं रहते।" "लेकिन भोसले तो तुम्हारे निकट सम्बन्धी हैं न?" "ऐसे सम्बन्धी नष्ट हो जायँ तो ही अच्छा। सम्भाजी और उसके उस मूर्ख मान्त्रिक ने शिरकान में हड़कम्प मचा रखा है। हमारे खेत-खलिहान लूट लिये, खड़ी फसल जलाकर खाक कर दी, हमारे पहरेदारों को गड्ढे में पुआल डालकर जिन्दा जला दिया।" गणोजी की ओर दयापूर्वक देखते हुए मुकर्रबखान हँसा और बड़े उत्साह से बोला, "अजी राजा साहब! इस तरह रोने-धोने की जगह तुम सम्भाजी पर सीधे तलवार क्यों नहीं उठाते?" "खान साहब ! पूरी तैयारी कर ली थी। सम्भा ने पहले कलुशा को हमारे ऊपर चढ़ाई करने को भेजा था। उस समय मैंने अनेक सरदारों को और दक्षिण कोंकण के सभी इज्जतदार जागीरदारों को इकट्ठा कर लिया था। अच्छी खासी दस हजार की सेना बना ली थी। उस समय हमने कलुशा को दूर भगा दिया था।" "फिर?" "फिर क्या? उस मूर्ख कलुशा ने रायगढ़ से सम्भा को बुला लिया। उन दोनों के पास सिर्फ पाँच हजार सेना थी।" "तुम्हारी संख्या तो दुगुनी थी न?" "उसका क्या फायदा, खानसाहब?" कौन जाने इस भोसले की औलाद ने 606 :: सम्भाजी
रणचंडिका को ही अपने बस में कर लिया है। वह सम्भा जब हवा से बात करने वाले घोड़े पर बैठकर रण भूमि में उतरता है तो उसके शत्रु भी मन्त्रमुग्ध होकर उसकी ओर देखने लगते हैं। उसकी केवल एक ललकार सैनिकों में बारह भैंसों की शक्ति भर देती है। खानसाहब क्या बताएँ? बताने में भी शर्म आती है। सम्भा ने शिरकान में कदम रखा और हमारी जागीरदारों की संगठित सेना बड़ी मुश्किल से दो-तीन घंटे ही उसके सामने टिक पायी। उसके बाद सभी उल्टे पैर खेतों और जंगलों में शरण लेने के लिए भाग खड़े हुए।" मुकर्रबखान ने गणोजी को थोड़ी देर शान्त होने दिया। परिचारकों ने बीजापुरी ठंडा शरबत पेश किया। गणोजी का यथोचित स्वागत करके मुकर्रबखान ने उन्हें सान्त्वना दी। मुकर्रबखान ने कहा, "गणोजी, जिस तरह सम्भाजी बादशाह के लिए एक संकट है उसी तरह तुम जैसे खानदानी जागीरदारों के लिए भी है।" "खानसाहब, इस गणोजी के पीछे अनेक सच्चे मराठा सरदार और वफादार ब्राह्मण सरदार भी हैं। पीठ पीछे सभी लोग अपनी शेखी बघारते हैं, मूँछों को घी लगाकर ऐंठते हैं किन्तु सम्भा के मैदान में उतरते ही बन्दरों की तरह पूँछ दबाकर भागते हैं! बस! अब और क्या? अब तो हम सभी का यही विचार है.. यह सम्भाजी रणभूमि में..।" एकाएक गणोजी की आँखें भर आयीं। वह भरे गले से बोला, "बादशाह सलामत के हुक्म के अनुसार मैं तैयार हो गया था। मैंने उनसे वादा भी किया था कि हमारे क्षेत्र में वे आयें और जितने चाहें उतने मुगलों के मोर्चे बनाएँ। लेकिन उस महाविनाशक सम्भा ने हमारा सारा शिकराना जलाकर खाककर दिया। जो शिर्के कभी राजा थे आज उजड़े गाँव के भिखारी बन गये हैं। खान साहब आप जो चाहें सो करें, लेकिन उस सम्भा को कसाई के बकरे की तरह छाँट दें।" मुकर्रबखान ने सारी स्थिति का जायजा लिया। उसने गणोजी के शरीर के अंग प्रत्यंग से, उसकी तेज चलती गर्म साँसों से, उसकी मिचमिचाती आँखों से और सम्भाजी के प्रति द्वेष से भरे उसके सिर के बालों से लेकर पैर के नाखून तक का पूरा अन्दाजा लगा लिया। अब उसे विश्वास होने लगा कि गणोजी शिर्के सम्भाजी का नहीं औरंगजेब का ही साला है। देर रात तक विचार विमर्श चलता रहा। मुकर्रबखान की निगाह कनात की खिड़की से बार बार पन्हालगढ़ की ओर जा रही थी। चर्चा अधूरी ही रह गयी। दूसरे दिन सवेरे ही पुनः खान और गणोजी की बातचीत शुरू हो गयी। भोर में ही शहजादा आजम और औरंगजेब की ओर से कई महत्त्वपूर्ण सन्देशे आये। उनका सूक्ष्मता से वाचन किया गया। अब पन्हालगढ़ की पहाड़ी स्वच्छ प्रकाश में जगमगा रही थी। मुकर्रब ने हँसते हुए गणोजी से पूछा, "शिर्के सिंह तो हाथ लगता सम्भाजी :. 607
नहीं है, कम से कम सामने का वह किला तो हमारे क़ब्ज़े में दो।" "पन्हाला?" "हाँ, पन्हाला पर क़ब्ज़ा करो ऐसा जहाँपनाह से हुक्म आया है। इसके अतिरिक्त हमारी सैनिक गतिविधियों के लिए भी वह किला बहुत महत्त्वपूर्ण है। बस एक बार उस पर हमारा क़ब्ज़ा हो जाये फिर पीछे के मसाई पठार, उससे थोड़ी ही दूरी पर घोड़ दरी, विशालगढ़ वह अम्बाघाटी आदि सम्पूर्ण इलाके पर अपनी हुकूमत स्थापित करना हमारे लिए बहुत आसान हो जाएगा।" गणोजी कुछ सकपकाया। गला साफ करते हुए भरे गले से उसने कहा, "खान साहब! बड़ा ही कठिन काम बताया है आपने! वहाँ के किलेदार त्र्यंबक महाड़कर और प्रह्लाद पन्त जैसे खुर्राट और निष्ठावान जैसे बुजुर्ग हैं। वे जरा सा भी विचलित होने वाले नहीं हैं।" "अब जाने भी दो गणोजी राजे! अनेक मजबूत और खुर्राट मरगट्ठे लड़ते लड़ते थक गये हैं अब उन्हें शान्ति चाहिए। उन्हें सिर्फ जागीर, जमींदारी, शान्ति और सम्पत्ति चाहिए, बस। जाओ! साथ में हीरे जवाहरात भरी थैलियाँ ले जाओ। किले के रक्षकों, प्रशासकों को द्रव्य दो, उनमें फूट डालो, उन्हें फोड़ो।" "सरकार, बाकी सभी मान जाएँगे, मात्र वह प्रह्लाद पन्त जैसा खुर्राट बूढ़ा आदमी है। उसे बस में करना बहुत मुश्किल है।" गणोजी ने कहा। "शिर्के छोटे बच्चों की तरह बेकार की बातें मत करो। तुम अपने राष्ट्र भक्त उस प्रह्लाद पन्त का यह पत्र ठीक से देखो जो उसने शहजादा आजम को भेजा है।" गणोजी का मुँह आश्चर्य से खुला रह गया। उन्होंने झपट्टा मारकर वह पत्र मुकर्रबखान के हाथ से ले लिया और साँस रोककर प्रह्लाद पन्त का पत्र पढ़ने लगा— "शहजादे आजम, दया करो। हमें बचाओ। हमारा राजा अविचारी और विवेकहीन ही नहीं पागल भी है। किसी क्लर्क या कर्मचारी की यदि कोई शिकायत उसके पास आते ही वह एक नीति का अनुसरण करता है। वह बिना सोचे-समझे उसे पकड़वाकर मारता-पीटता है और उसका सब कुछ लूट पाट लेता है। उसके लिए कवि कलश ही उसका विश्वासपात्र है शेष सभी उसके लिए बेईमान हैं। महाराज उस कलशा के जाल में बुरी तरह फँस गये हैं। शिर्के ही नहीं किसी का भी घर बर्बाद करने में उसे कोई हिचक नहीं। जागीरदारों को बेइज्जत करना, ओछे और कमीने लोगों की बात मानना उसका स्वभाव बन गया है। वह कान का कच्चा है और एकदम पगला गया है। 608 :: सम्भाजी
बादशाह ! दया करें और जुल्मी सम्भाजी के अत्याचारों से हमारी रक्षा करें। मराठों का राज्य बचा लें। हमारे राजा के साथ राज्य भी क्षयग्रस्त हो गया है। हमारे राज्य का विनाश निश्चित है। बादशाह सलामत हमारे राज्य को बचा लें। राजाराम को गद्दी पर बिठाएँ। आपकी सेवा के लिए हमलोगों की मजबूत और बुद्धिमान मंडली पूरी तरह तैयार है।'" गणोजी ने एक ही साँस में पत्र को तीन बार पढ़ लिया। उसकी प्रसन्नता छुपाए नहीं छिप रही थी। एक आँख को सिकोड़कर, अपनी मूँछों को बड़े प्यार से ऐंठते हुए गणोजी आह्लादित होकर बोला, "बस सरकार, स्वयं प्रह्लाद पन्त की ओर से ऐसा प्रस्ताव मिल जाने के बाद और क्या चाहिए ? अब आप आगे का कार्य मुझ पर छोड़ दीजिए।" बीच में दो रातें बीत गयीं। इस बीच गणोजी और देवजी शिर्के स्वयं रात के अँधेरे में पन्हालगढ़ का चक्कर लगा आये थे। वहाँ से लौटते ही वे मुकर्रबखान के डेरे में घुस गये। दोनों मुकर्रबखान से ऐसे लिपटे मानो विवाह मंडप में साले बहनोई गले मिल रहे हों। उनके आनन्द की कोई सीमा नहीं थी। वे जोश में आकर उन्मादी की तरह बोल पड़े, "बस खानसाहब ! अब केवल दो दिन और इन्तजार करें। अब पन्हालगढ़ पर फिर भगवा झंडा दिखाई नहीं देगा। बिना किसी कोशिश के किला स्वयं अपनी झोली में आ गिरेगा। आप बस हिम्मत से उसे अपने अधिकार में लेने की तैयारी रखें।" दो पन्हालगढ़ जैसे शक्तिशाली और महत्त्वपूर्ण किले को अजगर ने अपनी चपेट में लेना आरम्भ कर दिया था। यह खबर पाते ही कि उपराजधानी पन्हालगढ़ खतरे में है, शम्भूराजा और कवि कलश ने अपने घोड़े उसी ओर दौड़ाये। कवि कलश ने विशालगढ़ से निकलते ही मलकापुर की अपनी चौकी के लिए सन्देश भेज दिया था। शहाली और कड़वी नदी के पानी से पोसे गये दस हजार घोड़ों में से तीन हजार घोड़ों ने पन्हालगढ़ की ओर उड़ान भरी। राजद्रोहियों ने गढ़ के ऊपर के निशान जानबूझकर हटा दिए थे। आधा किला मुगलों के अधिकार में जा चुका था। इसी बीच पश्चिम मसाई पठार की ओर से सम्भाजी 609
शम्भूराजा किले में प्रवेश किये। सम्भाजी और कविराज दोनों युद्ध में कूद पड़े। किले पर चढ़कर बुर्ज की ओर भागने वाली मुगल सेना को उन्होंने काटकर गिरा दिया। इस प्रकार पुनः किले को अधिकार में कर लिया। यह ऐसा ही कार्य था जैसे अजगर के मुँह में चले गये आधे से अधिक भक्ष्य को उसका दाँत तोड़कर बाहर निकाल लिया गया हो। रात में गद्दार राजद्रोहियों की तलाशी ली गयीं। प्रह्लादपन्त को बन्दी बना लिया गया। राजद्रोही येसाजी और शिदोजी फर्जन्द को दंड के रूप में खड़ी चट्टान से नीचे फेंक दिया गया। शम्भूराजा ने अपने बाहुबल से खोये हुए किले को फिर से अपने अधिकार में कर लिया। कवि कलश ने कहा, "राजन! हम बाल-बाल बच गये। भूख-प्यास भूलकर आप विशालगढ़ से तीर की तरह दौड़कर पन्हालगढ़ आ गये अन्यथा मुकर्रबखान तो किले को निगल ही चुका था।" "कविराज पन्हाला की विजय से आज हमें कोई प्रसन्नता नहीं हो रही है। हमारी जरा-सी चूक से वह नीच गणोजी शिर्के हमारे हाथ से बच निकला। इसी पश्चाताप की आग से मेरा मन झुलस रहा है।" "सत्य है राजन! उस धूर्त कुटिल सियार ने अँधेरे का लाभ उठा लिया और बगल करौंदी के झुरमुट से चम्पत हो गया। यह हमारा दुर्भाग्य है, और क्या?" "कविराज, मनुष्य के हाथ से कभी कभी ऐसी चूक हो जाती है जिसके प्रायश्चित का भार उसे आजीवन ढोना पड़ता है। जिसको अपना समझकर हमेशा सँभाला, रक्षा की, उसी ने ही कलेजा छलनी कर दिया।" शम्भूराजा ने व्यथित स्वर में कहा, "रायगढ़ पर पिछली भेंट के समय गणोजी की जीभ में नागफनी के काँटे उग आये थे। इसे येसूरानी सहन न कर सकीं और मेरी ही म्यान से तलवार खींच ली थी। भाई के टुकड़े टुकड़े कर देने के लिए वे दौड़ पड़ी थीं। उस दिन यदि मैंने उसे जीवन-दान न दिया होता तो क्या आज ये दिन देखने पड़ते?" "सच है राजन! आज एक गणोजी बहुत महँगा पड़ रहा है।" "नहीं, ऐसी बात नहीं है कविराज! स्वराज्य में आज अकेला गणोजी ही नहीं है। वह तो एक जंग लगा मुखौटा भर है जिसकी आड़ में अनेक बेचैन जमींदार, बाल-बच्चों की चिन्ता से ग्रस्त जागीरदार और न जाने कितने लोग मेरे विरुद्ध एकत्र हो गये हैं। यह व्याधि आज की नहीं बहुत पुरानी है। "ये धूर्त जागीरदार पिताजी के समय में भी भीतर से बहुत दुखी थे। वे वस्तुतः केवल मेरे पिताजी की मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहे थे। जब तक वे जीवित थे तब तक उनके स्वाभिमानी और कट्टर स्वभाव के सामने जागीरदारों की एक न चलती थी। चुपचाप रहने के अतिरिक्त उनके पास कोई चारा भी नहीं था।" "फिर ?" 610 :: सम्भाजी
"फिर क्या? इस शिवाजी के पुत्र को व्यभिचारी, व्यसनी, झक्की, मनमौजी आदि कहकर पागल सिद्ध करने के अनेक प्रयास किये गये। किन्तु यह सम्भाजी इन दुष्ट और षड्यन्त्रकारी बूढ़ों के मन की गाँठों को अच्छी तरह पहचानता था। मुझे कत्ल करने के तीन प्रयास अब तक असफल हो चुके हैं। पन्हाळा का यह दाँव चौथा और अन्तिम है।" एक बार दोपहर में कराड के बाजार में नागोजी माने का मतवाला काठियावाड़ी घोड़ा चला जा रहा था। इसी समय उसे घोड़ों पर सवार गिरोजी और अर्जोजी यादव दिखाई पड़े। यादव बन्धुओं का उपहास करते हुए उसने पूछा, "क्यों रे यादवोऽऽ सम्भाजी से तुम्हें जागीर के कागजात मिले क्या?" "हमारी जागीर का फैसला पुराना है। मिल ही जाएँगे मुहर लगे कागज।" गिरोजी ने कहा। "मूर्ख हो तुम सभी। भोसलों की औलाद ने किसी को भी कभी इस तरह जागीर लिखकर दी है, जो तुम्हें दे देंगे? पराया होने पर भी उस बादशाह को हम जागीरदारों पर दया आती है किन्तु इन भोसलों को नहीं।" बातों बातों में ही नागोजी ने कब इन भाइयों के दिमाग में भेद का जहर घोल दिया, उन्हें पता ही नहीं चला। वे दोनों निराश हो गये। गिरोजो जी निराशा के स्वर में बोला, "जाने दो सूबेदार जी, हमारी किस्मत ही खराब है, हमारी राशि में ही दोष है।" "क्यों रे?" "पिछली बार पक्का फैसला होने वाला था कि उन्हीं दो दिनों में बड़े महाराज चल बसे—" अर्जोजी ने निवेदन किया। उन दोनों की ओर देखकर व्यंग्य से हँसते हुए नागोजी ने कहा, "अब छोटे महाराज चल बसें, इससे पहले ही अपने कागज रँगवा लो।" "सरकार, ऐसी अशुभ बात क्यों कहते हैं?" यादव बन्धुओं ने पूछ लिया। नागोजी की जबान सूख गयी। उसने अनुभव किया अचानक उसके मुँह से गलत बात निकल गयी है। अपने को सँभालते हुए उसने कहा, "समय किसी से पूछकर तो नहीं आता है न? अरे भाई जब तक शम्भू जीवित हैं जागीरी अपने पल्ले से बाँध लो। जो चीज गणोजी को एड़ियाँ रगड़कर भी नहीं मिल रही है वही जमाई की कृपा से तुम्हें सहज ही मिल जाएगी। इसलिए बाकी के सभी काम छोड़कर इसे पूरा कर लो। छोटे महाराज कहाँ हैं आजकल? पन्हालगढ़, विशालगढ़ या श्रृंगारपुर? खैर जहाँ भी हों वहीं पर जाकर उनके पैरों में गिर पड़ो। नहीं तो पछताना पड़ेगा। तब यही कहोगे कि भाग्य ने तो दिया था किन्तु कर्म ने खो दिया।" सम्भाजी :: 611