छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
ने राजाराम और ताराबाई को एक बड़े झाबे में बैठने की आज्ञा दी। साथ में कुछ सैनिक भी जाने वाले थे। येसूबाई ने चिन्तित स्वर में कहा; "समय एकदम नष्ट न करो। चलिए पहले बाहर निकलिए। अपने किले में अभी भी अनेक स्थलों पर किलेबन्दी बची हुई है। उसी ओर भागिए। अपनी जान बचाइए, राज्य बचाइए, लड़ते रहिए।" "किन्तु भाभी जी आप?" राजाराम ने कातर स्वर में पूछा। "नहींऽ दीदी आपको भी हमारे साथ आना होगा। आप पीछे रह गयीं तो कैद हो जाएँगी।" ताराबाई हकलाते हुए बोली। उनकी आँखें अश्रुपूरित हो गयी थीं। "मैंने जानबूझकर कैद होने की तैयारी कर ली है। तुम दोनों जितनी जल्दी हो सके निकल जाओ। नहीं तो हम सभी कैद हो जाएँगे।" "मतलब?" "मेरे कैद होने में लाभ है। शम्भू महाराज के कुटुम्ब के बन्दी हो जाने के आनन्द से हमारा शत्रु दो-चार दिन के लिए ढीला पड़ जाएगा। उसी अवधि में आप दोनों खतरे की सीमा के पार निकल जाइए।" येसूबाई की असाधारण उदारता और अद्भुत बौद्धिक कौशल देखकर राजाराम और ताराबाई को बहुत आश्चर्य हुआ। वे रो पड़े। शत्रु की फौज रायगढ़ पर अधिकार करने के लिए रात में ही कूच कर चुकी थी उनका शोर अब पास ही सुनाई देने लगा था। हाथ ऊँचा करके महारानी से विदा लेने तक का अवसर राजाराम और ताराबाई को नहीं मिला। मजबूत रस्सियों में बँधे झाबे में बिठाकर वे नीचे छोड़ दिये गये। येसूबाई ने सन्तोष की साँस ली और थोड़ी देर के लिए अपनी आँखें मूँद लीं। मन ही मन जगदीश्वर का आभार माना। सोलह "बेवकूफ बादशाह, मौत हमें कबूल है किन्तु तुम्हारा धर्म स्वीकार करना नहीं। यह शिवपुत्र तुम्हारे मजहबी जाल में कभी भी फँसने वाला नहीं है।" सम्भाजी ने मुँहतोड़ उत्तर दिया। "मजहब के लिए मैं रुका भी नहीं हूँ।" औरंगजेब कुत्सित हँसी हँसते हुए बोला। 752 : सम्भाजी
"खजाने की बात करते हो तो हमारा प्रत्येक किला खजाना ही है। तेरे बूढ़े शरीर में यदि अभी भी कुछ ताकत बची हो तो अल्लाह के घर जाने से पहले शिवाजी-सम्भाजी के किले जीतकर दिखा।" सम्भाजी ने चुनौती भरे शब्दों में कहा। "सम्भाऽऽ, हमारा सवाल मजहब की आरज़ू और खजाने की चाहत से परे है। हमें हिन्दुस्तान की राजनीति आगे भी चलानी है। इसलिए शासक होने के नाते तुमसे साफ साफ जवाब चाहता हूँ। बोलऽ, तुम्हारे साथ और उन दो शिया राजाओं के साथ हमारे कौन-कौन से लोग खुफिया के तौर पर शामिल थे। इस एक सवाल का ठीक ठीक जवाब दोगे तो अभी भी अपनी प्यारी जिन्दगी बचा सकते हो।" "हमारी मौत का फतवा तो तुम्हारे काजी ने कल दोपहर में ही जारी कर दिया है।" "काज़ी, मौलवी, फतवा आदि तो हम राजनीतिज्ञों की कटारों के मखमली आवरण होते हैं। जब चाहें कोई भी फतवा खारिज कर दें। फतवे का अमल करना न करना हमारी मुट्ठी में होता है। बोलऽऽ, हमारे कौन कौन से धोखेबाज तुम्हारे माथ मिले हुए थे। वे कौन हैं जिन्होंने पिछले नौ वर्षों तक दक्खिन के जंगलों में मुझे फकीर की तरह भटकाया और उन बदमाश मक्कारों ने तेरे जैसे जहन्नमी की मदद की? कौन हैं वे लोग?" सम्भाजी राजा का पेट पीठ से सट गया था। पिछले कुछ दिनों से पेट में अन्न का एक टुकड़ा तक न गया था। उनके होंठ सूख गये थे। आँखों के आगे अँधेरा छा रहा था। स्वास्थ्य एकदम खराब हो गया था। इस अवस्था में भी सम्भाजी राजा बेहोशी में हँसे और बादशाह से बोले, "जो जवाब तुम्हें चाहिए वह हम कभी भी नहीं दे सकते-" "क्यूँ?" "हम अपने शत्रु पर सामने से तलवार चलाते हैं और अपने मित्रों की पीठ बचाकर रखते हैं। हम ऐसा उनकी पीठ थपथपाकर शाबासी देने के लिए करते हैं, धोखे से उनकी पीठ में खंजर भोंकने के लिए नहीं।" सम्भाजी के आखिरी उत्तर से बादशाह जलभुन उठा। उसे सम्भाजी राजा से कोई भी बात मालूम नहीं हो सकी। इससे वह बहुत चिढ़ गया था। बन्दीखाने के चारों कोनों में धुआँ फेंकती मशालें बादशाह के अगले कदम की प्रतीक्षा कर रही थीं। पास में रखी सुराही का पानी उसने गट गट पिया। उसने ध्यानपूर्वक सामने देखा। सामने कवि कलश आपाद मस्तक जकड़े हुए रखे गये थे। बादशाह को वहाँ अधिक देर तक ठहरना नहीं था। वह उठा और तेज कदमों से कैदखाने से बाहर आ गया। मशालों के उजाले में सैकड़ों आँखें उसकी ओर घूर सम्भाजी :: 753
रही थीं। थोड़ी दूर जाकर बादशाह के पैर ठिठक गये। वह स्वयं से प्रश्न पूछने लगा, 'आखिर तुमने क्या निश्चित किया? अपने जन्मजात शत्रु को यों ही जिन्दा रखना है? काजी के फतवा जारी करने के बाद भी?' सत्रह वह अमावस्या के पहले की रात थी। भीमा नदी के किनारे सन्नाटा पसरा पड़ा था। अँधेरा घनीभूत हो गया था। नदी में बाढ़ का बहाव था और हवा तेजी से बह रही थी। तुलापुर की पहाड़ी की दूसरी ओर रह-रहकर सियारों का शोर उठता था। कहीं कोई कुत्ता गला फाड़कर रोने लगता था। कहीं कोई बेपरवाह टिटिहरी नदी की धारा पर टींऽऽ, टींऽऽ की कर्कश आवाज करती, इधर-उधर उड़ती थी। नदी के किनारे ही बाँस और घास से बना वह बन्दीखाना था। जैसे जानवरों को घेरकर रखा जाता है, उसी प्रकार सम्भाजी राजा और कवि कलश को रखा गया था। इन दोनों हतभाग्य प्राणियों को पिछले अड़तीस-चालीस दिनों से ठीक से नहाने को नहीं मिला था। मियाँखान और उसके कुछ साथी अभी भी बन्दीखाने के पहरे पर थे। ये लोग यथा सम्भव राजा की सेवा शुश्रूषा कर दिया करते थे। उन दोनों राजबन्दियों के शरीर पर बहुत खुजली उभरती थी दुर्गन्ध आती थी, ऐसी शिकायतें समय-समय पर की गयी थीं। इसी कारण बीच-बीच में पानी का बर्तन लेकर आते थे। जिस प्रकार बैलों या भैंसों पर पानी मारा जाता है उसी प्रकार कभी चार दिनों में इनके ऊपर पानी फेंक दिया जाता था। इन दिनों बार-बार की मार-पीट के कारण उनके शरीर में जगह-जगह पर छाले पड़ गये थे। सिर के बाल भी पहरेदारों ने अनेक बार खींचे थे। बालों की जड़ें टूटने से वहाँ अभी भी पीड़ा हो रही थी। इस प्रकार की यातनाएँ शरीर के अंग-प्रत्यंग को आग की तरह जला रही थीं। कविराज के तो जीभ ही नहीं थी। वे तो अपनी वेदना को व्यक्त भी नहीं कर सकते थे। मध्यरात्रि बीत गयी। नदी के पाट के बहाव पर हवा का एक आवर्त निर्मित हुआ। कुछ समय तक यह आवर्त वहीं पर घूमता रहा। देखते-देखते हवा का वह झोंका मानवी आकार में बदल गया। करुण और वेदनामय आवाज करता हुआ वह हवा का झोंका नदी की कछार चढ़कर ऊपर आया। देखते-देखते वह बन्दीखाने की दरार मे भीतर चला गया। 754 :. सम्भाजी
वह सरसराती हवा सम्भाजी राजा के शरीर के साथ खेलने लगी। जैसे कोई वैद्य सिर पर हाथ रखकर घाव को सहला रहा हो उसी तरह वह हवा सम्भाजी राजा के मस्तक के आसपास घूमने लगी। उनके सारे शरीर के साथ क्रीड़ा करने लगी। उन्हें अपने आलिंगन में लेने लगी। सम्भाजी राजा ग्लानि से जागे। उन्होंने सोचा कि इस मनहूस काली रात में कौन है जो अपनी ममतामयी उँगलियाँ बालों में घुमा रहा है? यह किसके पैरों की आवाज है। घावों से जर्जर इस शरीर को कौन अपनी ममतामयी गोद में ले रहा है? किसके शरीर की गन्ध और किसकी उष्ण साँस है यह? यह कौन है नितान्त अपना सा, पहचाना सा? सम्भाजी राजा का शरीर प्रफुल्लित होने लगा। जख्मी और ज्योतिहीन आँखों से चिपचिपा द्रव बहने लगा। वे पूर्णरूप से मोहमुग्ध हो गये। शरीर के अंगों की भीतरी वेदना पर आनन्द की लहर दौड़ गयी। सामने के अदृश्य हाथों की हथेली सम्भाजी राजा के माथे को सहलाने लगी। कपोलों पर चुम्बन का स्पर्श हुआ। उस शरीर से सोनचम्पा की सुगन्ध आ रही थी, उसके स्पर्श में अपूर्व ममता थी। उस आभासमूर्ति की गोद में अपनी देह को झोंकते हुए सम्भाजी राजा अपूर्व आनन्द का अनुभव कर रहे थे। वे आनन्द से किलकते हुए बोले, "पिताजीऽऽ पिताजीऽऽ, आखिर आप आखिरी रात में आ ही गये अपने बालक सम्भा से मिलने।" माथे पर फिरने वाला हाथ अब सम्भाजी राजा के पीठ पर फिरने लगा। वह आभासमूर्ति और भी समीप आ गयी। उसने सम्भाजी को प्रगाढ़ आलिंगन में ले लिया। आभासमूर्ति करुणार्द्र स्वर में बोली, "शम्भू बेटे! कितनी क्रूर है यह दैव गति?" "पिताजीऽऽ आप।" "हाँ, मैं ही हूँ।" "पिताजी, आप आखिर मिल ही गये। मैं तो धन्य हो गया। इस शम्भू से कोई भूल चूक हुई हो तो क्षमा कर दीजिएगा।" "मेरे बेटे ऐसा मत बोलो। घोड़े की पीठ पर अपना सिंहासन लादने वाला ऐसा कोई विरला योद्धा ही होगा जो देश, धर्म और भूमि के लिए आठ वर्षों तक निरन्तर लड़ता रहे। यश अपयश और घोर आक्रमणों की परवाह किये बिना, केवल बत्तीस वर्ष की आयु में औरंगजेब जैसे कराल कलिकाल से तुम्हारा मुकाबला अद्वितीय और अद्भुत है, बेटा शम्भू।" "पिताजी, शरीर में जितना बल था, जितनी शक्ति थी, वह सब मैंने देश- सेवा में लगा दी।" "नींद का स्वाँग करके सोने वाले स्वार्थी कुम्भकर्ण तुम्हारे इस महान साहस सम्भाजी .. 755
का अनदेखा कर सकते हैं। किन्तु सह्याद्रि की प्रत्येक घाटी और रास्ते, घाट और मैदान, बुरहानपुर से तमिल देश तक, जिन पत्थरों और भूखंडों को तुमने और तुम्हारे हजारों सहयोगियों ने अपने रक्त से सींचा है। वह मिट्टी और पाषाण तुम्हें कैसे भूल सकेंगे? क्या मनुष्य जाति इतनी कृतघ्न है?'' "पिताजीऽऽ हम तो बदनाम-" "बिल्कुल नहींऽऽ, बिल्कुल नहीं, धीरोत्तम राजकुमार, बलशाली, सच्चा महाराष्ट्र पुत्र। ऐसी दुर्बल भावना कभी मन में भी नहीं ले आना। ऊपर आकाश की चाँदनी की आँखों से पिछले आठ वर्षों से निरन्तर देखता रहा हूँ।" "शम्भू बेटे! तुम्हें एक सच्ची बात बताऊँ?" "पिताजी - ?" "जन्म मृत्यु के दैवी चक्र से हमारे हाथ बँधे हुए हैं, नहीं तो स्वर्ग के महादरवाजे से निकलकर हम कब के बाहर आ गये होते। अपने पराक्रमी बेटे की सहायता के लिए मैं स्वयं तुम्हारे पास भागता हुआ आया होता।" "पिताजी, भाग्य का यह दुश्चक्र, अपने आत्मीय और विश्वस्त लोगों द्वारा कलेजे पर घात, मन बिलकुल भर गया था। कराल काल ने हाथों से शस्त्र छीन लिये, आँखें ले लीं।" "शम्भू बेटे! अन्धकारपूर्ण और काँटोंभरी राहों पर चलते हुए तुमने अपने क्रिया-कलाप में निराशा का एक रोड़ा भी कभी आने नहीं दिया। अब दिल के किसी कोने में भी अपराध भावना को स्थान मत दो। आज नहीं तो कल तुम्हारे कार्यों के समक्ष सभी को आदरभाव से नतमस्तक होना ही पड़ेगा। अपने बुद्धिबल और बाहुबल से तुमने पाँच लाख सैनिकों और चार लाख जानवरों वाली विशाल मुगल सेना की महाबाढ़ को इतने दिन रोक रखा। अन्यथा दुर्भाग्यवश पाँच छह महीने में ही सब कुछ समाप्त हो जाता और औरंगजेब की जीत हो जाती। हाथ में जजियाकर का अस्त्र लेकर आयी मुगल सेना के सामने अपना प्रदेश विनष्ट हो गया होता, फिर तुकोबा रामदास और शिवाजी का महाराष्ट्र कहाँ और कितना बच पाता?'' सम्भाजी राजा ने महाराज के कन्धों पर अपना सिर टिका दिया। उस ममतामयी ऊष्मा से सम्भाजी राजा स्वयं को कृतार्थ अनुभव कर रहे थे। "शम्भू, मेरे बहादुर बेटे, औरंगजेब अनेक राहु-केतुओं को मिलाकर बनाया गया एक दुष्ट और क्रूरकर्मी है। संसार की एक बलशाली शक्ति को तुमने बड़ी हिम्मत से टक्कर दी है। इससे पहले जब यह महादैत्य दिल्ली या आगरे के राजमहल में बैठता था तब उसके सन्देश मात्र से ही दक्षिण के राज्य थरथर काँपते थे। आदिलशाही और कुतुबशाही जैसी हुकूमतें उसकी परछाईं से ही डर जाती थीं। 756 :: सम्भाजी
शम्भू बेटे, उस राक्षस के कारण न चाहकर भी तुम्हारे साथ आगरे तक जाना पड़ा था। पुरन्दर की वह घटना हमारे जीवन का अपमानपर्व था। बेटे, इस प्रकार का घातक, कपटी और निरंकुश शत्रु जब विशाल सेना समुद्र लेकर महाराष्ट्र तक आया तो कोई अन्य व्यक्ति उस सागर की तरंगों को देखकर ही जान बचाकर भाग गया होता। किन्तु बिना तनिक भी घबराए, अपनी पीठ पर सह्याद्रि की श्रेणियों को बाँधे उस दुष्ट से बड़ी कठोरता से दीर्घकाल तक लड़ते रहे। "जब बहुतों की तलवारों को जंग लग रही थी, बुद्धिमानों की प्रज्ञा समाप्त हो चुकी थी, मर्दों के पैर पंगु हो गये थे, सामान्य जनता भुखमरी से जूझ रही थी, तब बचे खुचे लोगों को एकत्र करके, मुसीबतों से टकराते हुए तुमने संकट की कन्दराओं से अपना मार्ग निकाला। इतनी बड़ी फौज के साथ, इतने कम साधनों में, इतने लम्बे समय तक मुकाबला करने वाला, जवाँ मर्द खोज करने के लिए इतिहास के पृष्ठों में गहन शोध करनी पड़ेगी। सच कहूँ शम्भूऽऽ, मुझे तो लगता है कि तुम्हारे भावी पराक्रम को ध्यान में रखकर ही तुकोबा माउली ने ये पंक्तियाँ रची थीं— पुत्र हो तो ऐसा मुस्तंडा, जिसका तीनो लोक मे झंडा। "बस, बस, पिताजी, मृत्यु महामन्दिर की ओर प्रयाण के पूर्व आप मिल गये यह मेरा सौभाग्य है। आपके इन शब्दों ने मुझे इतना तृप्त कर दिया है कि अब शरीर पर सहस्रों मरणों की वर्षा भी मुझे दुखी नहीं कर सकती।" "शम्भू बेटे, आज इस शिवाजी का कलेजा तिल तिल करके टूट रहा है तो केवल दो बातों के लिए। अपने स्वजनों ने घात करके तुम्हारे पराक्रमी पैर तोड़ दिये। दूसरे नियति क्रूर चक्र को देखकर भी आत्मा आहत होती है—" "पिताजीऽऽ!" "हाँ, शम्भू बेटे, क्या मेरी जिन्दगी में ऐसी कठिन परीक्षा के क्षण कम आये हैं? कुटिल अफजलखान से मिलने हम पालकी में जा रहे थे। कहारों के पदक्षेप के साथ मृत्यु मेरे साथ चल रही थी। वहाँ से मैं केवल भाग्यवश ही बच सका। आगरे के कैदखाने के सामने हजारों यवनों का घेरा क्या कम भयानक था? तुम्हारे साथ ही वहाँ से भी सकुशल छूट गये। जालनापुर जीतकर लौटते हुए संगमनेर के पास जंगलों में रणमस्तखान की धोखादायक कुटिल रणनीति से तो बाल बाल बचा था। थोड़ा ही अन्तर पड़ा था, नहीं तो जो दुर्दैव तुम पर संगमेश्वर में आया, वह मुझ पर संगमनेर में आ गया होता।" शिवाजी महाराज रुके, उन्हें जोर का झटका लगा। शम्भूराजा की ओर सम्भाजी 757
देखकर, विशेष रूप से उनकी आँखों के रिक्त खाँचों की-ओर देखकर वे बुरी तरह काँप गये। शम्भूराजा के श्रान्त और जख्मी सिर को अपनी छाती से सटाकर वे आर्द्र स्वर में बोले, "शम्भूऽऽ मेरी जिन्दगी में ईश्वर ने, भाग्य ने, सद्भाग्य की पिटारी भरकर मेरे कदमों में रख दिया था। क्या ही अच्छा होता कि उसमें से दो-चार मुट्ठी बचाकर मेरे शम्भू के लिए रख लिया होता। यही सोचकर दुख होता है।" "पिताजीऽऽ!" "मेरे बच्चे, कहाँ गयीं तेरी तेजस्वी आँखें?" "पिताजी, केवल जागीर के लोभी अपनी भूमि के अनेक लोगों ने हमारे साथ धोखा किया। आज मृत्यु से पहले मेरे नेत्र चले गये तो अच्छा ही हुआ। जागीरों के लोभ के लिए स्वाभिमान को नष्ट करने वाले इस महाराष्ट्र को देखने की अपेक्षा तो नेत्रों का चला जाना ही अच्छा है।" "बेटा, तुम्हारी बात बिलकुल ठीक है। अकाल के प्रकोप का प्रजा ने सामना किया। सामान्य गरीब लोग हिन्दवी स्वराज्य की रक्षा के लिए तुम्हारे झंडे के नीचे खड़े हुए। उन्होंने अगरबत्ती की तरह अपनी देह जला दी। किन्तु यहाँ के स्वार्थी जागीरदारों ने तुम्हारे साथ धोखा किया। अन्यथा संगमेश्वर से तुलापुर तक की लम्बी यात्रा में सभी ने मिलकर एक साथ पत्थर फेंके होते तो भी बादशाह कभी का परलोक सिधार गया होता। परन्तु यहाँ के स्वार्थी सयाने लोग तो यही सोचते हैं कि राजा मरे चाहे राज्य डूबे, उनकी जागीर बची रहनी चाहिए। तुम्हारे साथ हुआ यह भयानक धोखा इसी प्रवृत्ति का परिणाम है।" "आपके शब्दों ने अनेक जटिल प्रश्नों को सुलझा दिया, पिताजी।" "वाह, महाराष्ट्र! सफलतापूर्वक जीवन कैसे जिया जाए - इसे इस शिवाजी ने तुम्हें सिखाया होगा, परन्तु देश, धर्म और मिट्टी के लिए प्राण कैसे दें इसका बोध प्रजा को मेरे बेटे शम्भू से सीखना होगा। हे महाराष्ट्र, इस शिवाजी के गौरव के उन्माद में हमारे शम्भूराजा के बलिदान को दुर्लक्षित करने का प्रमाद कभी न करना। शम्भू पराक्रम से भरे तुम्हारे यश कलश को देखकर एक बात कहने की इच्छा हो रही है। कुछ वर्ष पूर्व सिसोदिया वंश के साथ अपने सम्बन्धों की खोज के लिए मैंने बालाजी चिटणीस को राजपूताना भेजा था। किन्तु शम्भूराजा के जुझारू जीवन की गाथा जिस दिन लोगों के सामने आएगी और लोग तुम्हारे अपूर्व पराक्रम से परिचित होंगे तब कोई अपनी वंशावली की खोज के लिए राजस्थान की रेत की ओर नहीं दौड़ेगा। इसके विपरीत बाहरी योद्धा सहनशीलता के इस फौलादी महापर्वत से अपना सम्बन्ध खोजते दौड़े आएँगे।" "पिताजी, आपके शब्दों से हम पावन हो गये। मृत्यु की देह देहरी पर पहुँचकर अब मेरे कलेजे में कोई भी काँटा बचा नहीं है। इसके विपरीत मृत्यु को 758 :. सम्भाजी
गले लगाने के लिए हम अधीर हो रहे हैं। इस सम्भा की मृत्यु से यदि मृतप्राय महाराष्ट्र जागृत हो सके, आलमगीर बादशाह की कब्र यहीं दक्षिण में बनाई जा सके, तो ऐसी मृत्यु को मैं सौभाग्यशालिनी मानूँगा।" अठारह नदी के किनारे से आवाजें आने लगीं। सवेरे-सवेरे ठंडी हवा तेजी में बह रही थी। सम्भाजी राजा की आँख के सामने अँधेरा था। उन्हें दिन और रात के परिवर्तन का चराचर की हलचलों से ही पता चलता था। सवेरे वक्त उन्हें बड़ी प्रगाढ़ और शान्तिमयी नींद आयी थी। कुएँ के भीतर बुलबुल की तरह सम्भाजी राजा की आवाज फूटी- "कविराज- ?" कविराज के कानों से आवाज टकराई। उनके मुंह में जीभ नहीं थी। आँखों का गोलक समाप्त होकर केवल कोटर बचा था। उन दोनों राजबन्दियों के मन में अन्न-पानी के प्रति कोई आकर्षण शेष न था। बादशाह के दुष्ट सैनिक उनके बालों को पकड़कर बेरहमी से झटकते थे। किसी प्रकार जीवित बनाए रखने के लिए चुल्लू-भर दूध पिलाते थे। दोनों ही बहुत दुर्बल हो गये थे। सम्भाजी राजा के नेत्र गर्म सलाई से खोदकर निकाल गये थे। औरंगजेब का अनुमान था कि इन यातनाओं से थककर ये लोग जिन्दगी की भीख माँगेंगे। मृत्यु का भय उन्हें विवश करेगा। इसी आशा में सम्भाजी राजा की जबान अभी तक नहीं काटी गयी थी। सम्भाजी राजा उदासी से हँसे। उनके कविराज शब्द के उच्चारण पर एक मानवीय रक्त-मांस का फटेहाल जीवित गोला उनकी ओर सरका। राजा ने उस घिसटते कवि-कलश का हाथ अपने हाथ में ले लिया। उन्होंने कहा- "पानी केरा बुदबुदा अस मानुस की जात। देखत ही छिप जाएगा ज्यों तारा परभात।। मनुष्य का जीवन पानी के बुलबुले की भाँति क्षणभंगुर है। देखते-देखते यह प्रभातकाल के तारे की तरह लुप्त हो जाता है। उसके लिए दुख और खेद कैसा? हम एक दृष्टि से भाग्यशाली हैं। कल रात हवा का झोंका बनकर मेरे पिताजी आये थे। बहुत प्रेम से मिले। बहुत समय तक हम दोनों के बीच कुशल-क्षेम चलता सम्भाजी · 759
रहा। उस आनन्द के प्रवाह में हम डूब गये थे। उस भेंट से शरीर इतना पावन हो गया कि मृत्यु का कोई भय नहीं रहा। अब जब चाहें वे यमदूत आ जाएँ।'' कविराज आगे सरके। राजा का खुरदुरा और थका हुआ हाथ अपने गालों के पास रखा। उनका मन भर आया। उस राक्षसी बन्दीखाने में पाशविक बेड़ियाँ भी हँसने लगीं। सम्भाजी राजा कहने लगे, "मृत्यु एक हठी मेहमान है। धक्का देकर हटाएँ तो भी दरवाजे पर पालथी मारकर बैठ जाने वाली। किन्तु अब वह कभी भी आ जाये चिन्ता नहीं है। वह जीभ लपलपाती आये, वज्रयात बनकर आये, ज्वालामुखी का लावा बनकर आये या राज्यप्रासाद का खम्भा बनकर गिरे, कोई चिन्ता नहीं है। अब इस शरीर को मृत्यु का भय रहा ही नहीं।।" बोलते-बोलते सम्भाजी राजा की नाक से गर्म श्वास निकलने लगी। उन्होंने अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं। वे बेचैन होकर कहने लगे, "एक ही बात की तीव्र इच्छा थी जो अधूरी रह गयी। उस पापी औरंगजेब का सिर काटकर, चितदरवाजे की देहरी के नीचे एक बार गाड़ दिया होता तो निश्चिन्त मन से हँसते-हँसते स्वर्ग की सीढ़ियाँ चढ़ा होता। इसी बात का दुख हो रहा है। जिन हाथों सुदूर कावेरी की धारा में घोड़ा कुदाया, त्रिचनापल्ली के गर्वीले पाषाणकोट की तटबन्दी में सुरंग लगाई, जिसके भय से पुर्तगालियों के वाइसराय को नाव में बैठकर जान बचाकर भागना पड़ा, जिसने सिद्दियों की पूँछ तोड़कर जंजीरे की बिल में घुसाकर रखा, औरंगजेब की पाँच लाख की फौज देहाती कुत्तों की तरह दूर-दूर से गुर्राती रही किन्तु सह्याद्रि में प्रवेश करने की हिम्मत नहीं हुई। किसी दूसरे किले पर भी मुगल अधिकार न जमा सके, उसी सम्भाजी की पीठ में अपने लोगों ने ही बगावत की विषैली कटार भोंक दी। खैर, इस सम्भाजी ने जिन्दगी में कभी भी मृत्यु की चिन्ता नहीं की। मृत्यु को मैंने अनेक बार धक्का दिया है। हुआ यह कि अनेक बार मृत्यु स्वयं डरकर भाग गयी। युद्धभूमि में मृत्यु मिल गयी होती तो उसे बाँहों में भर लेता। उस रूप में जलकर खाक होते हुए सात जन्मों की कृतार्थता का अनुभव करता। किन्तु आज इस प्रकार चोर उचक्के की तरह दबे पाँव आ रही है, इसका दुख हो रहा है।" दोपहर में अचानक वाहनों की घड़घड़ाहट सुनाई पड़ने लगी। उनकी अस्पष्ट फुसफुसाहट और तीव्रगति से होने वाली हलचल से सम्भाजी राजा ने जान लिया कि वे मृत्यु दूत थे। सम्भाजी राजा सावधान हो गये। पर वे भयानक कदम दूसरी ओर ही रुक गये। कवि कलश के साथ कुछ हाथापायी सुनाई दी। ऐसा लगा कि उन शैतान यमदूतों ने कविराज को जकड़ लिया है। पदचाप दूर जाती सुनाई दी। आँखों में दृष्टि नहीं थी। किन्तु राजा के रोम-रोम अपने आत्मीय मित्र के लिए क्रन्दन कर रहे थे। सम्भाजी राजा ने कठोर स्वर में पुकारा, "ठहरोऽऽ इधर आओऽऽ।" यह 760 सम्भाजी
आवाज इतनी तेज और धारदार थी कि यमदूतों के पैर लड़खड़ा गये। वे यन्त्रवत कवि कलश को लेकर सम्भाजी राजा के सामने आ गये। दोनों की साँसों को एक दूसरे की आत्मीय पहचान थी। सम्भाजी राजा ने 'कविराजऽऽ' कहकर दहाड़ मारी। दोनों के शरीर एक दूसरे की ओर खिंचते गये। दोनों के ही हाथ पीठ पर बँधे थे। एक दूसरे के गले मिलने की दोनों की प्रबल आकांक्षा थी, किन्तु यह सम्भव नहीं था। चकमक पत्थर पर पत्थर रगड़ने से जिस प्रकार चिनगारियाँ निकलतीं उसी तरह दोनों के शरीर परस्पर सम्बन्ध स्थापित कर रहे थे। उनकी करुण श्वासों और हुंकारों ने एक विचित्र वातावरण निर्मित कर दिया था। जीभ के अभाव में कविराज बोल नहीं पा रहे थे। उन दोनों की छटपटाहट विलक्षण थी। पंखकटा जटायु भी इतना न तिलमिलाया होगा। शम्भूराजा ने रोते हुए पूछा, "कविराज, चल पड़े आप मृत्यु के महामन्दिर की ओर? मुझसे भी पहले? कितने भाग्यवान हैं आप?" कविराज की देह तमतमा गयी। औरंगजेब की दुष्ट कटार से जीभ काट दी गयी थी। किन्तु उनकी तनी नसें, खुले हुए रन्ध्र, शरीर पर खड़े रोम रोम अर्थात् पूरा शरीर बोलने लगा। श्वासों में स्वर फूटे, "हाँ राजन, मैं सचमुच भाग्यवान हूँ। इसीलिए तो आपसे पहले दौड़ पड़ा हूँ उस स्वर्ग मन्दिर की ओर। ईश्वर के दरबार से फूलों की डलियाँ लूटकर ले आऊँगा और सारे फूल आपके रास्ते में बिछा दूँगा। इतने दिनों के घोर परिश्रम के कारण आपके पैर आहत और श्रान्त हो गये हैं। इतनी सुविधा ही उन्हें दे सकूँ तो धन्य हो जाऊँगा।" यह क्षणिक स्पर्श भी अधिक देर तक सम्भव न था। उन यमदूतों ने कविराज को खींचकर अलग कर दिया। कविराज को खींचते घसीटते नदी के किनारे ले गये। औरंगजेब के जल्लादों ने दोपहर को ही सारी तैयारी पूरी कर ली थी। कविराज के हाथ पैर आदि प्रत्येक अवयव काट दिए गये। उनके अवयव एवं रक्त मांस को नदी के किनारे बिखेर दिया गया। पन्द्रह कोस की परिधि में पसरे बादशाह के शिविर में सन्नाटा छाया हुआ था। कविराज की इस अमानवीय हत्या की खबर चारों ओर फैल गयी। फौजी खेमे ने अनुभव किया कि कवि कलश पर होने वाला यह नृशंस अत्याचार, सम्भाजी राजा पर होने वाले अत्याचार का पूर्वाभ्यास था। बादशाह की फौज में काम करने वाले गरीब भिश्ती, जो मराठी थे, छिप छिप कर रो रहे थे। शिवाजी महाराज के केवल दस वर्ष बाद उनके पुत्र, महाराष्ट्र के दूसरे छत्रपति का इस प्रकार पीड़ित किया जाना उन्हें डरा रहा था। बादशाही खेमे में मृत्युदंड देने के लिए अलग एक तख्ता बनाया गया था। किन्तु कविराज और सम्भाजी राजा को वहाँ न ले जाने का निर्णय स्वयं औरंगजेब ने
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लिया था। जहाँ-जहाँ और जब-जब अवसर मिलता था; औरंगजेब यही बताने का प्रयत्न करता था कि कवि कलश और सम्भाजी राजा मामूली कैदी हैं। वह अट्टहास करते हुए कहता था कि इनकी औकात फाँसी के तख्ते पर ले जाने की नहीं है। इसी का परिणाम था कि कविराज के शरीर के टुकड़े भीमा नदी के किनारे फेंक दिये गये थे। यह खबर फैल गयी कि सम्भाजी को मृत्युदंड बादशाह के सामने दिया जाना था। इसी के लिए बादशाह निकल चुका था। इसकी खबर मिलते ही असदखान ने खेमे के दरवाजे पर ही उन्हें रोक लिया। असदखान ने कहा, "जहाँपनाह, आप बार-बार कहते हैं कि सम्भा एक मामूली कैदी है उसकी ऐसी क्या औकात कि उसकी सजा अमल में लाते समय स्वयं किबलाए आलम वहाँ उपस्थित हों ?" बादशाह ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। वह रुका भी नहीं। उसकी सवारी तीव्रगति से नदी की ओर चल पड़ी। बादशाह नदी के किनारे पहुँच गया। भीमा नदी में सूर्य का बिम्ब छुपने लगा था। आसपास के तम्बुओं, डेरों, घरों के नेत्र उग आये थे। सभी की दृष्टि नदी के किनारे की ओर लगी थी। वृक्षों की डालियों में पंछी मौन हो गये थे। दो टिटहिरियाँ टीं-टीं करती हुई नदी के पाट वेग से पार करती हुई चली गयीं। बेड़ियों से जकड़े शम्भू महाराज नदी की ढाल पर खड़े थे। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि उनकी आँखों के कोटरों से कुछ मोम जैसा द्रव बह रहा था। डेढ़ महीने के बढ़े हुए दाढ़ी के बाल कड़े होकर ऐंठ गये थे। वे योगी की मुद्रा में खड़े थे। सभी गतिविधियों में हर्ष और उन्माद का भाव दिख रहा था। इतने संकटों के बाद भी और तूफानी हवा के झोंकों में मौत की दहशत सामने होने पर भी सम्भाजी राजा गर्दन और पीठ सीधी करके खड़े थे। “चलोऽऽ बेवकूफ़ो हटो, कैदी के तो आँख ही नहीं है, उसे टोपी क्यों पहना रहे हो ?" इसके साथ ही टोपी दूर फेंक दी गयी। औरंगजेब स्वयं जाकर उस खम्भे के पास खड़ा हो गया। उसने जल्लादों को दूर हटने का इशारा किया। खम्भे से जकड़े हुए उस देह को औरंगजेब किसी उन्मादी की तरह देख रहा था। इसी नर शरीर ने पाँच वर्षों तक औरंगजेब के सिर से ताज को खिसका दिया था। इसी ने औरंगजेब को दुख, अपमान और विफलता का बोध देकर दक्खिन की खाक छनवाई थी। वही हठी विद्रोही देह आज औरंगजेब की मुट्ठी में आ गयी थी। इसका वह हार्दिक समाधान और सन्तोष अनुभव कर रहा था। खम्भे के साथ, जंजीरों से जकड़े सम्भाजी राजा की ओर देखते हुए औरंगजेब ने कहा, "जहन्नमी सम्भाऽऽ, तूने अपने बाप की अपेक्षा हमें दस गुना ज्यादा परेशान किया है, सताया 762 :: सम्भाजी
है। हमारी एक भी बात तूने नहीं मानी। कम से कम एक बार शरणागत होने की बात तू कहे, इसीलिए ही तेरी जुबान हमने सलामत रखी है। किन्तु तुमने अपनी जुबान का इस्तेमाल नहीं किया। वर्षों से मेरे साथ विश्वासघात करने वाले गद्दारों का नाम बताने के लिए भी तू तैयार नहीं है। तुम्हारी आँखों के कोटर से गोलक को निकाले आज सात दिन हो गये। तुम्हें अँधेरे के समुद्र में ढकेल दिया, फिर भी तुम्हारे अभिमानी पैर काँपे नहीं, मौत के दरवाजे पर तेरा पशुओं जैसा जुलूस निकाला गया फिर भी रायगढ़ पर तुम्हारी रानी जरा भी नहीं घबराई। किलों की चाभियाँ लेकर वह तुम्हारी जिन्दगी भी माँगने मेरे पास नहीं आयी। सह्याद्रि के पहाड़ों की भाँति तुम दोनों को कितना अभिमान है। सम्भा इसके बाद भी तुम्हें जीवित रखा जाए, इसकी कोई वजह तो नहीं बची है।" मृत्यु की दहलीज पर वह महायोगी, बिना रंचमात्र भी विचलित हुए खड़ा था। कमाल की ठसक, न हाँ न हूँ। जीवन-मरण की कल्पना से वह योजनों ऊँचे उठ चुका था। बादशाह की फौज, उसका कैदखाना, उसकी राक्षसी कुटिलताएँ आदि उसे नगण्य लग रहे थे। उसके भीतर केवल जगदम्बा, जगदीश्वर और शिवाजी महाराज की स्मृतियों का आवर्तन हो रहा था। बादशाह बड़ी दृढ़ता से कदम बढ़ाता हुआ उस तेज पुंज योद्धा के पास आकर बुदबुदाया, "सम्भा, काफिर बच्चे, मैंने पिछले आठ वर्षों में जंग ए मैदान में तुम्हारे जलवों को देखा है। उन्हें दाद देने के लिए, तुम्हारे सारे गुनाहों को माफ करके, तुम्हें राजबन्दी बनाकर उम्रकैद में रखने की इच्छा मेरे जैसे बादशाह के मन में हुई तो इसमें बुराई क्या है? इसलिए एक आखिरी मौका ले लो। हमें बता दो कि तुम्हारे हीरे-जवाहरात से भरे खजाने कहाँ हैं? यह भी बता दो कि वे गद्दार कौन हैं जो जिन्दगीभर बादशाह का नमक खाकर भी दुश्मनों का गुणगान करते रहे।" बादशाह की इस कुटिल चाल का कोई उपयोग नहीं हुआ। वह सीधी गर्दन और पीठ बादशाह के सामने जरा भी नहीं झुकी। औरंगजेब अपनी विफलता से आहत, पीड़ा भरी हँसी हँसते हुए बोला, "सम्भा, यह तो खुदा की ही मेहरबानी है कि तू धोखे से एक दक्खिनी सरदार के हाथ लग गया। नहीं तो जंगली पंछी और बहती हवा को कौन पकड़ पाता है? इससे आगे तुम्हें जीवित रखने का गुनाह हम कतई नहीं करेंगे। क्योंकि यदि इस बार मैंने तुम्हें जिन्दा छोड़ दिया तो हमें पूरा यकीन है कि तू मेरा ही खात्मा कर देगा। इस बात को तुम भी जानते हो और मैं भी अच्छी तरह जानता हूँ।" अधिक विलम्ब न करके बादशाह ने जल्लादों की ओर घूरकर देखा। उनके हाथों में धारदार तलवारें और कुल्हाड़ियाँ थीं। तलवारें और कुल्हाड़ियाँ मशालों की रोशनी में चमक रही थीं। पास ही भीमा नदी की अँधेरे में डूबी धारा थी। इस सम्भाजी 703
क्रूर शैतानी दृश्य को देखने से बचने के लिए प्रकाश अँधेरे की ओट में भागा जा रहा था। आज कुछ जल्दी ही सूर्यास्त हो गया था। कहीं से कुत्तों के रोने की आवाजें आ रही थीं। सम्भाजी राजा 'जगदम्ब, जगदम्ब' का जाप कर रहे थे। आँखों के कोटर में नेत्रकमल नहीं थे। किन्तु राजा के मन की आँखों के सामने अनेक दृश्य झिलमिलाने लगे थे। पुरन्दर पर तेज बरसाती धाराएँ, हिन्दवी स्वराज्य के छत्रपति के पुत्र के रूप में जन्म लेना, वहाँ का आनन्दोत्सव, उस गोरे-चिट्टे तेजस्वी बालक का पालने में सुलाया जाना, सोने की जंजीरों से लटकते पालने का हल्के से झुलाया जाना। जीजामाता और सोयराबाई का मधुर गीत— सोजा, सोजा शम्भू बाल शिवबा के प्राण पियारे लाल सोजा सोजा शम्भू बाल। पास पलंग पर रुग्णावस्था में सईबाई बैठी हैं। अपने श्रान्त नेत्रों से गोर चिट्टे राजकुमार को बड़े प्यार से देख रही हैं। वे बाणकोट की खाड़ी की लहरें। शिवाजी महाराज के कन्धों का सहारा लेकर तैरते राजकुमार सम्भाजी अपनी बालपन की कोमल काय पर वस्त्रालंकार संभालते, बादशाह की नजरों में सीधे देखते केवल नौ वर्ष के राजकुमार, शृंगारपुर में शिक्षा ग्रहण करते हुए अपनी सहपाठिनी येसूबाई के साथ की गयी ठिठोलियाँ, बुरहानपुर से दक्षिण में कावेरी की धारा में धँसे त्रिचनापल्ली किले की दीवारें, सह्याद्रि के साथ ही दक्षिण की प्रत्येक घाटी में देश, धर्म और मिट्टी के लिए हजारों साथी, अकाल की चिन्ता न करने वाले त्रस्त जानवर, पेट-पीठ एक हो जाने पर भी बादशाह के विरुद्ध खड़े रहने वाले तलवार और भालों से सुसज्ज बहादुर, आठ वर्षों के निरन्तर संघर्ष में मृत्यु पाने वाले असंख्य घोड़े। क्या कुछ नहीं याद आ रहा था, सम्भाजी राजा को? सम्भाजी बादशाह की कोई भी बात सुनने को तैयार न थे। यह देखकर वह भयंकर रूप से क्रुद्ध हो गया। उसने फर्सियाँ लेकर खड़े दल को एक ओर कर दिया। हाथों में बघनखा पहने दूसरा दल पास ही तैयार खड़ा था। बादशाह ने उनकी ओर इशारा किया। इशारा पाते ही वे आगे दौड़ पड़े। शम्भूराजा को खम्भे के साथ बाँध दिया गया था। दो हट्टे कट्टे राक्षस आगे बढ़े। एक ने पीठ की ओर ऊपरी मनके के पास और दूसरे ने आगे से गले के पास बघनखे घुसा दिए। उन राक्षसों को प्रोत्साहित करने के लिए ढोल-नगाड़े जोर-जोर से बजाए जाने लगे। वे दोनों 'दीनऽऽ—दीनऽऽ' करके चिल्लाने लगे। वे राजा के अंग में घुसे बघनखों को जोर 764 :: सम्भाजी
लगाकर नीचे खींचने लगे। राजा की त्वचा चर्र-चर्र करके फटने लगी। चमड़ी छिलने लगी, आँतड़ियां टूटने लगीं। उन दोनों जल्लादों के हाथों से छिलने पर रक्त के फौवारे छूटने लगे। रक्त की धारा नीचे जमीन पर गिरने लगी। सम्भाजी राजा ने अपनी जान बचाने के लिए कोई मिन्नत नहीं की। वे अपने दाँतों को बिठाकर अत्याचार को सहने का प्रयास कर रहे थे। किसी पुराने कपड़े की तरह राजा का शरीर चिन्दी-चिन्दी हो रहा था। वह रक्तरंजित गोला अपनी जगह पर थरथरा रहा था। अंगों से रक्त के फौवारे छूट रहे थे। महादेव की पिंडी पर चढ़ाया गया दूध-दही जिस प्रकार नीचे जमा हो जाता है उसी प्रकार राजा के पैरों के पास रक्त जमा हो रहा था। बकरे की तरह राजा की छिली देह को देखकर औरंगजेब खिलखिलाकर हँस रहा था। राजा का फटा हुआ जीवित शरीर अपनी जगह पर फड़फड़ा रहा था। दोनों जल्लाद सम्भाजी राजा के शरीर को छीलकर एक तरफ हो गये। उसके बाद बादशाह ने फर्सीधारी पाँच जल्लादों की ओर इशारा किया। उन दैत्यों के हाथों में हलचल हुई। दूसरे ही क्षण वे सम्भाजी राजा पर टूट पड़े। एक ने अपनी कुल्हाड़ी की तेज धार सम्भाजी राजा की गर्दन में घुसा दी। रक्त की धार उठी, आधी खोपड़ी कट गयी। गर्दन से नीचे लटकने लगी। इसके बाद ही एक दूसरा वार किया गया जिससे सिर धड़ से अलग हो गया। सम्भाजी का सिर उठाकर बादशाह के सामने लाया गया। औरंगजेब ने उसे हाथ में लिया। उसने रक्त से सनी हुई दाढ़ी पर हाथ फिराया। वह बहुत प्रसन्न था। कुछ वर्ष पूर्व उसने अपने बड़े भाई दारा की खोपड़ी भी बड़ी भावशून्य दृष्टि से देखी थी। इस खोपड़ी को असदखान को सौंपते हुए बादशाह गरजा, "इस काफिर बच्चे के सिर को भाले में लटकाकर गाँव-गाँव घुमाओ, सभी के बीच दहशत फैलाओ। यह औरंगजेब जब तक जिन्दा है तब तक दक्खन में कोई दूसरा सम्भाजी पैदा न हो।" औरंगजेब ने जल्लादों की ओर पुनः इशारा किया। वे सम्भाजी राजा पर टूट पड़े। खम्भे से जकड़े शरीर से रक्त की धारा बहने लगी। धारदार कुल्हाड़ियों से कटकर शरीर का रक्त-मांस नीचे बिखरने लगा। भीमामाई सहम गयी। अँधेरे में डूबा सगा सह्याद्रि दुःख से काँप गया। शाही हुक्म हुआ। उसके अनुसार हाड़-मांस के टुकड़े एकत्र किये गये। मुर्दाखोरों ने उन्हें भीमा नदी के किनारे फेंक दिया। कुछ टुकड़े नदी की धारा में पड़े और कुछ किनारे पर। बादशाह को अपने जीवन के महत्त्वपूर्ण कार्य को पूरा करने की प्रसन्नता हुई। सम्भाजी :: 765
बादशाह सामने की कछार चढ़कर झपाटे से उस अँधेरी रात में ऊपर आया। इस विजय के लिए आलमगीर ने कितना खून पसीना बहाया था? लाखों मनुष्यों और जानवरों को मारा था, पागल कर दिया था अथवा भयंकर रोग के मुख में झोंक दिया था। थका-हारा बादशाह उस रात्रि बेला में, तुलापुर के भीमा कछार पर आकर खड़ा हो गया। उस घुप्प अँधेरे में नदी की काली धारा की ओर आहत दृष्टि से देखने लगा। बादशाह के डेरे में विजय की सूचक नौबत बजी। हर्षोल्लास से सैकड़ों तासे-ढोल एक साथ बजने लगे थे। हजारों मुगल सैनिक बाजार में खुशी से नाचने लगे थे। मशालों का नृत्य आरम्भ हो गया था। 'सम्भा मर गयाऽऽ, सम्भा कत्ल किया गयाऽ' ऐसा चिल्लाते हुए घुड़सवार जोर-जोर से शोर मचा रहे थे। यह अमावस्या की रात इन दैत्यों के लिए उत्सव की रात बन गयी। आसमान में विजय की चन्द्रज्योति प्रकाशित हुई। चारों ओर हर्षोल्लास का वातावरण छाया था। कछार पर खड़ा बादशाह आतंकित-सा बार बार नदी की धारा की ओर देख रहा था। वह क्षणभर के लिए हैरान हुआ कि कहीं वहाँ काले पानी में सम्भाजी तो नहीं खड़ा है? उसे शंका हो रही थी, किन्तु उसके आसपास त्योहार जैसा उत्सव फौज मना रही थी। शंका के लिए कोई अवकाश शेष नहीं था! समाप्त कर दिया गया काफिर बच्चा अन्ततः समाप्त हो गया था। पिछले आठ वर्षों में जिसने मुगल सेना के लाखों लोगों और जानवरों को विनष्ट करने के लिए जमीन-आसमान एक कर दिया था, आखिर समाप्त हो गया। उस जहन्नमी शिवाजी का दुष्ट छोकरा समाप्त हो गया। औरंगजेब बड़ी राहत का अनुभव कर रहा था। वह बड़ी प्रसन्नता से हँसा, खिलखिलाकर हँसा, बार-बार हँसा। यह सफलता इतनी बड़ी थी कि बादशाह विदूषक की भाँति खूब हँसा। धीरे धीरे उसकी हँसी बन्द हो गयी। पहला दौर समाप्त हो गया। बादशाह के अंगों में कूट-कूटकर भरा हुआ क्रूर हैवान आलमगीर के अति हिंसात्मक रूप को देखकर दूर भाग गया। बादशाह के अंग-प्रत्यंग में एक अनाम खालीपन भर गया था। वह घबराने लगा। उसे अपनी कामयाबी से ही भय लगने लगा। खालीपन उसे खाने लगा, बेचैन करने लगा। वह सोचने लगा कि यदि सम्भा सचमुच समाप्त हो गया है तो इसके बाद वह लड़े तो किसके विरुद्ध? 'बादशाह सलामत चलिए! हजरत चलिए।' इस आवाज से औरंगजेब का ध्यान टूटा। वह होश में आया। शहाबुद्दीनखान, रूहूल्लाखान, हसनअलीखान जैसे बड़े सरदार नदी के किनारे की ओर दौड़ पड़े थे। उन्हें अपने मालिक की इस दिग्विजय पर बधाइयाँ देनी थीं। रूहूल्लाखान बड़े उत्साह से बोला, "चलिए हजरत आपको मुबारकबाद देने के लिए सारी फौज बेताब हो रही है। अपने खास 766 :: सम्भाजी
सरदारों ने वहीं पर फतह की बड़ी महफिल सजा रखी है।" "वहाँ पर मरगट्टों के बड़े बड़े ब्राह्मण, जमींदार और अनेक मराठा जागीरदार खासतौर पर हाजिर हैं। चलिए, उनसे मुलाकात कीजिए।" हसनअलीखान ने साग्रह कहा। बादशाह कुछ अजीब ढंग से हँसते हुए बोला, "क्या मिलना उन मराठा कुत्तों से? जागीर की लालच में आये कुत्ते, उनकी परवाह कौन करता है?" "लेकिन, लेकिन जहाँपनाह?" "उन मूर्खों पर गर्व करने की आवश्यकता नहीं है। उन्हें यदि आज धक्का मारकर बाहर निकाल दिया जाये तो कल वे फिर पैरों में पूँछ दबाए ये नामर्द फिर आ जाएँगे।" "लेकिन जहाँपनाह, फौज को आपसे एक बहुत जरूरी काम है।" इखलामखान बादशाह के नंगे सिर की ओर देखते हुए बोला। "आपके सिर पर कितने सालों से ताज नहीं—" "अँ?" "जी हाँ, मेरे आका, चलिए आपऽ। वर्षों से आपके ताजविहीन सिर को देखकर हम फौजियों को शर्म आती रही है। सम्भा का खात्मा किये बगैर सिर ताज धारण न करने की सौगन्ध आपने पाँच वर्ष पहले ली थी। कल्याण के एक विशेष सुनार से आधे करोड़ की कीमत का, हीरे जवाहरात वाला राजमुकुट हमने आपके लिए तैयार करवाया है।" "हाँ, हाँ हुजूर! चलिए आज वह मुकुट पूरी शानो शौकत के साथ आपकी खिदमत में पेश करना है।" एक साथ पाँच-छह लोग बोल पड़े। "इसकी क्या वजह है?" बादशाह ने खिन्न मन से पूछा। "आपकी इस महान बहादुरी के लिए। एक निहायत नापाक, नादान दुश्मन को आपने आज जिन्दा कत्ल कर दिया। आपने तो बहुत बडी फतह हासिल की है हजरतऽ।" अपने साथियों द्वारा की जाने वाली प्रशंसा से बादशाह ऊब चुका था। वह चलते चलते रुक गया। ऐसा लगा जैसे उसका दम फूल रहा हो। वह सोच नहीं पा रहा था कि सत्य बात को कहे या न कहे। उसके भीतर का कठोर शासक उसके पापों के द्वार पर कड़ा पहरा दे रहा था। किन्तु उसके अन्तरतम में बैठी मानवीय आत्मा द्रवित हो गयी थी। वह अपने बादशाह के अनुशासन को धोखा दिया। आँखों की पुतलियों के पीछे भरे आँसुओं को वह सँभाल नहीं पाया, उनकी सीमा टूट गयी। पहरेदारों की चिन्ता किये बिना उसकी आँखों से तीन बूँद आँसू ढरक गये, गालों से होते उसकी सफेद दाढ़ी में समा गये। सम्भाजी · 767
औरंगजेब उदास स्वर में बोला, "अरे बेवकूफोऽ कैसा जश्न मना रहे हो? मारने वाला मर गया और मरने वाला अमर हो गया। जिसने कत्ल किया वह मर गया, जिसका कत्ल हुआ वह अमर हो गया।" उन्नीस भूकम्प के बाद के उजड़े हुए कुरूप दिन की तरह वह भयानक दिन था। भीमा के तट पर कोरेगाँव परिसर में अनेक गाँवों में डरावना सन्नाटा पसरा हुआ था। छह सात गाँवों के बाहरी हिस्से में फैला, तीन-साढ़े तीन लाख का फौजी खेमा दिन में भी झपकियाँ ले रहा था। संगीत और गायन-वादन के विरोधी बादशाह ने मौज मस्ती की खुली छूट दे दी थी। काफिरों के निपात के उपलक्ष्य में रातभर गाना बजाना चलता रहा। आज सवेरे देर से बादशाही खेमा जगा। वढू गाँव की स्थिति अन्य गाँवों से अलग थी। कल शाम को शम्भुराजा की नृशंस हत्या की खबर कुछ ही लोगों को थी। शेष गाँव के हट्टे कट्टे युवक अपने घरों में घायल होकर पड़े थे। दो दिन पहले ही बादशाही फौज के हत्यारे सैनिकों ने घरों में घुसकर उन्हें बुरी तरह पीटा था। पिछले पाँच-छह दिनों से गाँव में शाही फौज के घोड़े आते थे और खड़ी फसल में घुसकर उन्हें तहस-नहस कर देते थे। विशेष रूप से रूहूल्लाखान के खेमे के घोड़े खुले छोड़े जाते थे। इस ध्वंसलीला के कारण गाँव के लोग बहुत चिढ़ गये। युवकों ने लाठियाँ लेकर घोड़ों को मार भगाया। घोड़ों का झुंड नदी पार चला गया। इससे रूहूल्लाखान बहुत क्रुद्ध हुआ। उसी रात रूहूल्लाखान के दो-तीन सौ सैनिकों ने वढू गाँव पर आक्रमण कर दिया। काफिरों के युवकों का यह प्रतिशोध उससे सहन नहीं हुआ। सैनिकों ने घरों में घुसकर युवकों, बूढ़ों आदि सभी को खींच-खींचकर बाहर निकाला और चौराहों पर लाकर उन्हें मारते-मारते बेदम कर दिया। इस बात को अभी दो ही दिन हुए थे। युवकों का घायल शरीर उनका साथ नहीं दे रहा था। लोग आहत और विवश अपने घरों में पड़े थे। बादशाह के विरोध में शिकायत करें भी तो किससे? वे अपनी मार की असह्य पीड़ा झेलते हुए, अपने झोपड़ों की आड़ में निढाल पड़े थे। दोपहर बीती। गाँव के दामाजी पाटील के बाड़े से धोने वाले कपड़ों का बड़ा 768 :: सम्भाजी
गट्ठर लेकर जना धोबिन बाहर निकली। शाम होने के पहले उसे कपड़ों को धो डालना था। वह भीमा और इन्द्रायणी के संगम के बहाव की ओर गयी। नदी के पाट में अनेक जगहें निकल आयी थीं। दूसरी ओर तुलापुर के किनारे पर जगह जगह फौजियों के डेरे-तम्बू लगे थे। उस ओर नदी का स्वच्छ पानी और धोने के लिए एक बड़ा और चौड़ा पत्थर जना को दिखाई पड़ा। वह उसी ओर तेजी से बढ़ गयी। पाटील की बारहबन्दी पानी में खंगालकर धोने लगी। जना की उम्र तीस वर्ष की थी। मायका पाबल और ससुराल वढू। बचपन से ही उसने लोक गायकों से शिवाजी महाराज के पवाड़े सुने थे। इसलिए रायगढ़ के प्रति उसके मन में बड़ा आकर्षण था। विवाह से पहले उसने अपने पिता से कई बार कहा था, "तात्या आप मेरे लिए रायगढ़ के आसपास का कोई दूल्हा क्यों नहीं ढूँढ़ देते?" "इतनी दूर क्यों रे छोकरी?" पिता ने पूछा था। "वहाँ रही तो किसी न किसी दिन शिवाजी महाराज और सम्भाजी महाराज के कपड़े धोने को मिलेंगे न? ऐसा होने पर जन्म सार्थक हो जाएगा।" जना के भाग्य में वढू गाँव ही था। गाँव की धोबिन के नाते दामाजी पाटील के घर के कपड़े धोने को मिलते थे। रोज की तरह सहज भाव से उसका कार्य शुरू था। उसी समय तुलापुर गाँव का बैजा गड़रिया अपनी भेड़ों को लेकर आता दिखाई दिया। कपड़ों को और स्वच्छ करने के लिए जना थोड़े गहरे पानी में उतर गयी। कपड़ों को पानी में खँगालते समय एक विचित्र वस्तु उसके हाथ लगी। रस्सी की तरह की उस लिजलिजी वस्तु को किनारे की ओर सरकाते-सरकाते तंग आकर जना चिल्ला पड़ी। "कौन युवा है यह? आदमी है कि जानवर? बकरे की अंतड़ी को पानी में डालने की बेवकूफी लोग क्यों करते हैं?" जना की बात सुनकर बैजा गड़रिया फीकी हँसी हँसते हुए बोला, "जना वह अँतड़ी बकरे की नहीं, आदमी की है।" "हैंऽऽ? क्या कह रहे हो?" "तुम्हें पता नहीं है क्या? कल रात उस बादशाह ने शिवाजी महाराज के बेटे शम्भू महाराज को यहीं नदी के किनारे, बकरे की तरह काटा है। ध्यान से पीछे देख, उन्हीं का रक्त-मांस पीछे चटाई पर पड़ा है।" "क्या कह रहे हो, मामा?" "हाथ नहीं लगाना। घर भाग जा। शम्भूराजा के रक्त-मांस को छूना नहीं। यह बादशाह का हुक्म है। खान के सिपाही तुझे बेदम करके मारेंगे।" सम्भाजी •• 769
धोने वाले कपड़ों को वैसे समेटकर जना तत्काल पीछे मुड़ी। वह अपने गाँव की ओर सरपट भागने लगी। उसने पाटील के बाड़े में कपड़ों की गठरी को नीचे गिरा दिया। उसकी यह दशा देखकर राधाबाई पाटील ने पूछा, "क्या हो गया है, आज तुझे? कपड़े बिना धोये ही वापस लेकर आ गयी। नदी के घाट पर कोई साँप बिच्छू देख लिया क्या?" "अपने गाँव के सयानों में साहस नहीं रह गया तो क्या जाता है? वैसे ही नाग की तरह मुवों को घूमने दो।" जना ने चिढ़कर कहा। "क्या कह रही हो, जना?" "माँ जी, शिवाजी महाराज के बेटे की अंतड़ियाँ निकालकर उस बादशाह ने नदी की रेत में फेंक दी हैं। इसकी शर्म हमारे गाँव के मर्दों को क्यों नहीं आ रही है? ये मुये रणुए क्यों मूँछों पर ताव देते हैं और बाजार में सीना तानकर चलते हैं?" यह खबर सुनते ही राधाबाई पाटील के हाथ का निवाला नीचे गिर गया। पाटील के बाड़े के पास बढ़इयों के बाड़े और गाँव की चौपाल में भी यह दुखद समाचार पहुँचा। समाचार पाते ही गाँव का कलेजा दहल गया। महादेव के मन्दिर में पिछले कुछ दिनों से गोरखनाथ बाबा ठहरे हुए थे। गाँव के वरिष्ठ लोग दौड़कर गये। वे भी दुख से काँप गये। यह दुखद समाचार उनके कानों तक पहले ही पहुँच चुका था। उसी शाम को दामाजी पाटील कोरेगाँव से लौट आये। लोग आकर उनके आसपास जमा हो गये। 'दुहाई हो माई-बाप' गोपाल नाक चिल्लाते हुए आया। पुनः महादेव मन्दिर के चबूतरे पर गाँव वालों का जमावड़ा हुआ। सभी के मन उदास थे। बादशाह के कृत्य से सभी का कलेजा काँप गया था। भय के कारण उनके शरीर में कँपकँपी छूट रही थी। शम्भूराजा की हत्या के समाचार से सभी को पीड़ा हो रही थी। अनेक लोगों की आँखों में आँसू भरे थे। अपने को न रोक पाकर गोरखनाथ जी बोले, "और तो कुछ नहीं, किन्तु महाराज के बेटे का रक्त-मांस अपने गाँव की सीमा के पास पड़ा रहे और हम चुपचाप बैठे रहें, यह सोचकर दुख हो रहा है?" "आपकी बात सच है महाराज।" मन्दिर के बाहर बैठा गोविन्द नाक बोला, "शिवाजी महाराज ने इस प्रदेश में अपने बाल-बच्चों पर कुछ कम उपकार किये हैं क्या? आज उनके बेटे की अंतड़ियों के लोथड़े हमारी सीमा पर पड़े हैं और हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें यह ठीक नहीं है। पाटीलजी आप सोचें।" दामाजी पाटील आस्तिक वृत्ति का व्यक्ति था। पंढरीनाथ की नियमित सेवा करता था। तुकोबा के चिरंजीव, नारायण महाराज को पिछले कुछ वर्षों से सरकारी सहायता मिल रही थी। शम्भूराजा के समय में ही देहू से पंढरपुर के लिए पालकी 770 :: सम्भाजी
यात्रा आरम्भ हो गयी थी। उसके साथ दामाजी ने चार बार यात्राएँ की थीं। गोविन्द नाक ने अपने जीवन में शम्भूराजा की बहादुरी की असंख्य कहानियाँ सुनी थीं। उसका सगा मौसेरा भाई रायप्पा नाक अपने भाई के साथ बहादुरगढ़ की ओर निकल गया था। उसे शम्भू महाराज से मिलना था। परन्तु वे दोनों भाई लौटकर नहीं आये। वहीं कहीं शहीद हो गये। शिवाजी और सम्भाजी के साथ सारे गाँव का ऐसा ही आत्मीय रिश्ता था। इसलिए सभी छोटे-बड़े तिलमिला रहे थे। आज का यह प्रसंग बहुत जटिल था। सभी की बातें सुनकर दामाजी पाटील ने निर्णायक स्वर में कहा, "भाइयो, शम्भू महाराज के लिए आप लोगों की अपेक्षा मेरे दिल में अधिक दर्द है। पर करना क्या है? गाँव के सामने ही तीन-चार लाख की फौज का घेरा लगा हुआ है। बादशाह की शक्ति असीम है। बादशाह ने फरमान जारी किया है कि शम्भू महाराज के रक्त-मांस को किसी को छूना नहीं है।" "सच है पाटील, आज दिनभर आसपास के दस गाँवों के लोग दिनभर घर से बाहर नहीं निकले। सभी भयभीत होकर सोच रहे हैं कि बादशाह के साथ बेवजह पंगा क्यों लिया जाए? अपने गाँव के साठ-सत्तर युवकों को चार दिन पहले सैनिकों ने इतना पीटा है कि उन युवकों ने अभी भी बिस्तर नहीं छोड़ा है। अब फिर गाँव में नयी मुसीबत नहीं चाहिए। पाँच कोस के क्षेत्र में अन्य सभी गाँव चुपचाप बैठे हैं तो हम ही क्यों यह आफत मोल लें?" भोजन का समय हो गया था। गाँव के पाटील ने अपना निर्णय सुना दिया। गाँव वाले अपने अपने घरों को लौट गये। वे रोटी खाकर बिस्तर में जाने की तैयारी करने लगे। किन्तु जना धोबिन बड़ी साहसी महिला थी। राधाबाई पाटील के साथ उसकी घनिष्ठ मित्रता थी। जना आज अपना दाना पानी भूलकर राधाबाई के बाड़े में ही बैठी थी। राधाबाई ने भोजन परोसते समय पुनः पाटील से निवेदन किया, "शम्भू महाराज के लिए कुछ तो कीजिए जी?" राधाबाई ने बहुत आग्रह किया किन्तु मुगल सेना के विरुद्ध खड़े होने की दामाजी की इच्छा न थी। अन्ततः बाड़े में राधाबाई और जना ही बैठे रह गये थे। राधाबाई ने गोविन्दा के द्वारा गाँव की महिलाओं को सन्देश भेजा। सन्देश पाते ही गाँव की माताएँ, बेटियाँ आदि पाटील के बाड़े में इकट्ठा हो गयीं। गाँव की उन महिलाओं को हाथ उठाकर जना ने सम्बोधित किया, "इतनी निर्दयता? दुनिया पर क्या पानी पड़ गया है? अपने गाँव के एकदम पास शम्भू महाराज के मांस के लोथड़े इस तरह क्यों पड़े रह जाएँ? पाटीलबाई, मैं तो कहती हूँ कि हमारे पूर्वजों ने पिछले जन्मों में जरूर बड़े पुण्य किये होंगे। इसीलिए तो शिवाजी महाराज का बेटा हमारे गाँव की सीमा की गोद में सोने के लिए इतनी दूर आ गया।" सम्भाजी :: 771