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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

राग बिलावल www.dadooram.org अथ राग बिलावल २१ (गायन समय प्रातः 6 से 9) ३३३. परिचय विनती । त्रिताल दया तुम्हारी दर्शन पड्ये । जानत हो तुम अंतरजामी, जानराय तुम सौं कहा कहिये ॥ टेक ॥ तुम सौं कहा चतुराई कीजै, कौण कर्म कर तुम पाये । को नहीं मिले प्राण बल अपने, दया तुम्हारी तुम आये ॥ 1 ॥ कहा हमारो आन तुम आगे, कौन कला कर वश किये । जीते कौन बुद्धि बल पौरुष, रुचि अपनी तैं सरण लिये ॥ 2 ॥ तुम ही आदि अंत पुनि तुम ही, तुम कर्ता त्रय लोक मंझार । कुछ नांही तैं कहा होत है, दादू बलि पावे दीदार ॥ 3 ॥

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श्री दादूवाणी-राग बिलावल 21

३३४. (फारसी) विनती । उदीक्षण ताल मालिक महरबान करीम । गुनहगार हररोज हरदम, पन्ह राख रहीम ॥ टेक ॥ अव्वल आखिर बंदा गुनही, अमल बद विसियार । गरक दुनिया सत्तार साहिब, दरदवंद पुकार ॥ 1 ॥ फरामोश नेकी बदी करद, बुराई बद फैल । बख्शिन्दः तूँ अजीब आखिर, हुक्म हाजिर सैल ॥ 2 ॥ नाम नेक रहीम राजिक, पाक परवरदिगार । गुनह फिल कर देहु दादू, तलब दर दीदार ॥ 3 ॥ ३३५. उदीक्षण ताल कौण आदमी कमीण विचारा, किसको पूजे गरीब पियारा ॥ टेक ॥ मैं जन एक, अनेक पसारा, भौजल भरिया अधिक अपारा ॥ 1 ॥ एक होइ तो कहि समझाऊँ, अनेक अरूझे क्यों सुरझाऊँ ॥ 2 ॥ मैं हौं निबल, सबल ये सारे, क्यों कर पूजूं बहुत पसारे ॥ 3 ॥ पीव पुकारूं समझत नाहीं, दादू देखु दशों दिशि जाहीं ॥ 4 ॥ ३३६. उपदेश चेतावनी । भंगताल जागहु जियरा काहे सोवे, सेव करीमा तो सुख होवै ॥ टेक ॥ जातैं जीवन सो तैं विसारा, पच्छिम जाना पथ न संवारा । मैं मेरी कर बहुत भुलाना, अजहुँ न चेतै दूर पयाना ॥ 1 ॥ सांई केरी सेवा नाँहीं, फिर फिर डूबै दरिया मांहीं । ओर न आवा, पार न पावा, झूठा जीवन बहुत भुलावा ॥ 2 ॥ मूल न राख्या लाह न लीया, कौड़ी बदले हीरा दीया । फिर पछताना संबल नाहीं, हार चल्या क्यों पावै सांई ॥ 3 ॥ इब सुख कारण फिर दुख पावै, अजहुँ न चेतै क्यों दहकावै ।

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श्री दादूवाणी-राग बिलावल 21 दादू कहै सीख सुन मेरी, कहु करीम संभाल सबेरी ॥ 4 ॥ 337. भंगताल बार बार तन नहीं वावरे, काहे को बाद गँवावै रे । बिनसत बार कछू नहिं लागै, बहुरि कहाँ को पावै रे ॥ टेक ॥ तेरे भाग बड़े भाव धर कीन्हाँ, क्यों कर चित्र बनावै रे । सो तूँ लेइ विषय में डारे, कंचन छार मिलावै रे ॥ 1 ॥ तूँ मत जानै बहुरि पाइये, अब कै जनि डहिकावै रे । तीनि लोक की पूँजी तेरे, बनिज बेगि सो आवै रे ॥ 2 ॥ जब लग घट मैं श्वास वास है, तब लग काहे न ध्यावै रे । दादू तन धर नाम न लीन्हा, सो प्राणी पछतावै रे ॥ 3 ॥ 338. ललित ताल राम विसार्यो रे जगनाथ । हीरा हार्यो देखत ही रे, कौड़ी कीन्ही हाथ ॥ टेक ॥ काचहुता कंचन कर जानै, भूल्यो रे भ्रम पास । साचे सौं पल परिचय नाहीं, कर काचे की आस ॥ 1 ॥ विष ताको अमृत कर जानै, सो संग न आवै साथ । सेमल के फूलन पर फूल्यो, चूक्यो अब की घात ॥ 2 ॥ हरि भज रे मन सहज पिछानै, ये सुन साची बात । दादू रे अब तैं कर लीजै, आयु घटै दिन जात ॥ 3 ॥ 339. मन । ललित ताल मन चंचल मेरो कह्यो न मानै, दसों दिशा दौरावै रे । आवत जात बार नहि लागै, बहुत भाँति बौरावै रे ॥ टेक ॥ बेर बेर बरजत या मन को, किंचित सीख न मानै रे ।

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श्री दादूवाणी-राग बिलावल 21 ऐसे निकस जाइ या तन तैं, जैसे जीव न जानै रे ॥ 1 ॥ कोटिक जतन करत या मन को, निश्चल निमष न होई रे । चंचल चपल चहुँ दिशि भरमै, कहा करै जन कोई रे ॥ 2 ॥ सदा सोच रहत घट भीतर, मन थिर कैसे कीजे रे । सहजैं सहज साधु की संगति, दादू हरि भजि लीजे रे ॥ 3 ॥ ३४०. माया । उत्सव ताल इन कामिनी घर घाले रे । प्रीति लगाइ प्राण सब सोषै, बिन पावक जिय जाले रे ॥ टेक ॥ अंग लगाइ सार सब लेवै, इनतैं कोई न बाचै रे । यहु संसार जीत सब लीया, मिलन न देई साचै रे ॥ 1 ॥ हेत लगाइ सबै धन लेवै, बाकी कछु न राखै रे । माखन मांहि सोध सब लेवै, छाछ छिया कर नाखै रे ॥ 2 ॥ जे जन जानि जुगति सौं त्यागैं, तिन को निज पद परसै रे । काल न खाइ, मरै नहिं कबहुँ, दादू तिनको दरशै रे ॥ 3 ॥ ३४१. विश्वास । उत्सव ताल जनि सत छाड़ै बावरे, पूरक है पूरा । सिरजे की सब चिन्त है, देबे को सूरा ॥ टेक ॥ गर्भवास जिन राखिया, पावक तैं न्यारा । युक्ति यत्न कर सींचिया, दे प्राण अधारा ॥ 1 ॥ कुंज कहाँ धर संचरै, तहाँ को रखवारा । हिमहर तैं जिन राखिया, सो खसम हमारा ॥ 2 ॥ जल थल जीव जिते रहैं, सो सब को पूरै । संपट सिला में देत है, काहे नर झूरै ॥ 3 ॥ जिन यहु भार उठाइया, निर्वाहै सोई ।

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श्री दादूवाणी-राग बिलावल 21

दादू छिन न बिसारिये, तातैं जीवन होई ॥ 4 ॥ 342. गजताल सोई राम सँभाल जियरा, प्राण पिंड जिन दीन्हा रे । अम्बर आप उपावनहारा, मांहि चित्र जिन कीन्हा रे ।। टेक ।। चंद सूर जिन किये चिराका, चरणों बिना चलावै रे । इक शीतल इक तारा डोलै, अनन्त कला दिखलावै रे ।। 1 ।। धरती धरनि वरन बहु वाणी, रचिले सप्त समंदा रे । जल थल जीव सँभालनहारा, पूर रह्या सब संगा रे ।। 2 ।। प्रकट पवन पानी जिन कीन्हा, वरषावै बहु धारा रे । अठारह भार वृक्ष बहु विधि के, सबका सींचनहारा रे ।। 3 ।। पाँच तत्त्व जिन किये पसारा, सब करि देखन लागा रे । निश्चल राम जपो मेरे जियरा, दादू तातैं जागा रे ।। 4 ।। 343. परिचय । गज ताल जब मैं रहते की रह जानी । क ाल काया के निकट न आवै, पावत है सुख प्राणी ।। टेक ।। शोक संताप नैन नहिं देखूं, राग द्वेष नहिं आवै । जागत है जासों रुचि मेरी, स्वप्नै सोइ दिखावै ।। 1 ।। भरम कर्म मोह नहिं ममता, वाद विवाद न जानूं । मोहन सौं मेरी बन आई, रसना सोई बखानूं ।। 2 ।। निशिवासर मोहन तन मेरे, चरण कँवल मन जानै । निधि निरख देख सचु पाऊँ, दादू और न जानै ।। 3 ।। 344. राज मृगांक ताल जब मैं साँचे की सुधि पाई ।

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तब तैं अंग और नहीं आवै, देखत हूँ सुखदाई ॥ टेक ॥ ता दिन तैं तन ताप न व्यापै, सुख दुख संग न जाऊँ । पावन पीव परस पद लीन्हा, आनंद भर गुन गाऊँ ॥ 1 ॥ सब सौं संग नहीं पुनि मेरे, अरस परस कुछ नाँहीं । एक अनंत सोई संग मेरे, निरखत हूँ निज मांहीं ॥ 2 ॥ तन मन मांहिं शोध सो लीन्हा, निरखत हूँ निज सारा । सोई संग सबै सुखदाई, दादू भाग्य हमारा ॥ 3 ॥ 345. सच निदान । राज मृगांक ताल हरि बिन निहचल कहीं न देखूं, तीन लोक फिरि सोधा रे । जे दीसै सो विनश जायगा, ऐसा गुरु परमोधा रे ॥ टेक ॥ धरती गगन पवन अरु पानी, चंद सूर थिर नाँहीं रे । रैनि दिवस रहत नहिं दीसै, एक रहै कलि मांहीं रे ॥ 1 ॥ पीर पैगम्बर शेख मुशायख, शिव विरंचि सब देवा रे । कलि आया सो कोई न रहसी, रहसी अलख अभेवा रे ॥ 2 ॥ सवा लाख मेरु गिरि पर्वत, समंद न रहसी थीरा रे । नदी निवान कछू नहिं दीसै, रहसी अकल शरीरा रे ॥ 3 ॥ अविनाशी वह एक रहेगा, जिन यहु सब कुछ कीन्हा रे । दादू जाता सब जग देखूं, एक रहत सो चीन्हा रे ॥ 4 ॥ 346. पतिव्रत । राज विद्याधर ताल मूल सींच बधै ज्यों बेला, सो तत तरुवर रहै अकेला ॥ टेक ॥ देवी देखत फिरै ज्यों भूलै, खाइ हलाहल विष को फूलै । सुख को चाहे पड़ै गल फाँसी, देखत हीरा हाथ तैं जासी ॥ 1 ॥ केई पूजा रच ध्यान लगावैं, देवल देखें खबर न पावैं । तोरैं पाती जुगति न जानी, इहि भ्रम भूल रहै अभिमानी ॥ 2 ॥

श्री दादूवाणी-राग बिलावल 21 तीर्थ व्रत न पूजै आसा, वन खंड जाहिं रहैं उदासा । यूं तप कर-कर देह जलावैं, भरमत डोलैं जन्म गवावैं ॥ ३ ॥ सतगुरु मिलै न संशय जाई, ये बँधन सब देइ छुड़ाई । तब दादू परम गति पावै, सो निज मूरति मांहि लखावै ॥ 4 ॥ 347. साधु परीक्षा । दादरा सोई साधु शिरोमणि, गोविंद गुण गावै । राम भजै विषिया तजै, आपा न जनावै ॥ टेक॥ मिथ्या मुख बोलै नहीं, पर निंदा नाँहीं । औगुण छाड़ै गुण गहै, मन हरि पद माहीं ॥ 1 ॥ निर्वैरी सब आतमा, पर आतम जानै । सुखदाई समता गहै, आपा नहीं आनै ॥ 2 ॥ आपा पर अंतर नहीं, निर्मल निज सारा । सतवादी साचा कहै, लै लीन विचारा ॥ 3 ॥ निर्भय भज न्यारा रहै, काहू लिप्त न होई । दादू सब संसार में, ऐसा जन कोई ॥ 4 ॥ 348. परिचय परीक्षा । पतिताल राम मिल्या यूँ जानिये, जाको काल न व्यापै । जरा मरण ताको नहीं, अरु मेटै आपै ॥ टेक ॥ सुख दुख कबहूँ न ऊपजै, अरु सब जग सूझै । क रम को बाँधै नहीं, सब आगम बूझै ॥ 1 ॥ जागत है सो जन रहै, अरु जुग जुग जागै । अंतरजामी सौं रहै, कछु काई न लागै ॥ 2 ॥ काम दहै सहजैं रहै, अरु शून्य विचारै । दादू सो सब की लहै, अरु कबहूं न हारै ॥ 3 ॥

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श्री दादूवाणी-राग बिलावल 21 ३४९. समता ज्ञान । त्रिताल इन बातनि मेरा मन मानै । दुतिया दोइ नहीं उर अंतर, एक एक कर पीव कौं जानै ॥ टेक ॥ पूर्ण ब्रह्म देखै सबहिन में, भ्रम न जीव काहू तैं आनै । होइ दयालु दीनता सब सौं, अरि पाँचनि को करै किसानै ॥ 1 ॥ आपा पर सम सब तत चीन्हैं, हरि भजै केवल जस गानै । दादू सोई सहज घर आनै, संकट सबै जीव के भानै ॥ 2 ॥ ३५०. परिचय । एक ताल ये मन मेरा पीव सौं, औरनि सौं नाँहीं । पीव बिन पलहि न जीव सौं, यह उपजै मांहीं ॥ टेक ॥ देख देख सुख जीव सौं, तहँ धूप न छाहीं । अजरावर मन बंधिया, तातैं अनत न जाहीं ॥ 1 ॥ तेज पुंज फल पाइया, तहाँ रस खाहीं । अमर बेलि अमृत झरै, पीव पीव अघाहीं ॥ 2 ॥ प्राणपति तहँ पाइया, जहाँ उलट समाई । दादू पीव परचा भया, हियरे हित लाई ॥ 3 ॥ ३५१. त्रिताल आज प्रभात मिले हरि लाल । दिल की व्यथा पीड़ सब भागी, मिट्यो जीव को साल ॥ टेक ॥ देखत नैन संतोष भयो है, इहै तुम्हारो ख्याल ॥ 1 ॥ दादू जन सौं हिल-मिल रहिबो, तुम हो दीन दयाल ॥ 2 ॥ ३५२. (सिंधी) निज स्थान निर्णय । उपदेश एकताल अर्श इलाही रब्बदा, इथांई रहमान वे ।

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श्री दादूवाणी-राग बिलावल 21 मक्का बीचि मुसाफरीला, मदीना मुलतान वे ॥ टेक ॥ नबी नाल पैगम्बरे, पीरों हंदा थान वे । जन तहुँ ले हिकसा ला, इथां बहिश्त मुकाम वे ॥ 1 ॥ इथां आब जमजमा, इथांई सुबहान वे । तख्त रबानी कंगुरेला, इथांई सुलतान वे ॥ 2 ॥ सब इथां अंदर आव वे, इथांई ईमान वे । दादू आप वंजाइ बेला, इथांई आसान वे ॥ 3 ॥ 353. (पंजाबी) क्रीड़ा ताल खंडनि आसण रमदा रामदा, हरि इथां अविगत आप वे । काया काशी वंजणां, हरि इथैं पूजा जाप वे ॥ टेक ॥ महादेव मुनि देवते, सिद्धैंदा विश्राम वे । स्वर्ग सुखासण हुलणैं, हरि इथैं आत्माराम वे ॥ 1 ॥ अमी सरोवर आतमा, इथांई आधार वे । अमर थान अविगत रहै, हरि इथैं सिरजनहार वे ॥ 2 ॥ सब कुछ इथैं आव वे, इथां परमानन्द वे । दादू आपा दूर कर, इथांई आनंद वे ॥ 3 ॥ इति राग बिलावल सम्पूर्णः ॥ 21 ॥ पद 20 ॥ दादूराम सत्यराम

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राग सूहा अथ राग सूहा २२ (गायन समय दिन 9 से 12) 354. विनती । एक ताल तुम बिच अंतर जनि परै, माधव ! भावै तन धन लेहु । भावै स्वर्ग नरक रसातल, भावै करवत देहु ॥ टेक ॥ भावै विपति देहु दुख संकट, भावै संपति सुख शरीर । भावै घर वन राव रंक कर, भावै सागर तीर, माधव ॥ 1 ॥ भावै बँध मुक्त कर, माधव ! भावै त्रिभुवन सार । भावै सकल दोष धर माधव, भावै सकल निवार, माधव ॥ 2 ॥ भावै धरणि गगन धर, माधव ! भावै शीतल सूर । दादू निकटि सदा संग, माधव ! तूँ जनि होवै दूर, माधव ॥ 3 ॥

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श्री दादूवाणी-राग सूहा 22 ३55. परिचय । पंजाबी त्रिताल अब हम राम सनेही पाया, अगम अनहद सौं चित लाया ॥ टेक ॥ तन मन आतम ताकों दीन्हा, तब हरि हम अपना कर लीन्हा। वाणी विमल पाँच परानां, पहिली शीश मिले भगवानां ॥ 1 ॥ जीवत जन्म सुफल कर लीन्हा, पहली चेते तिन भल कीन्हा। अवसर आपा ठौर लगावा, दादू जीवित ले पहुँचावा ॥ 2 ॥ इति राग सूहा सम्पूर्णः ॥ 22 ॥ पद 2 ॥ दादूराम सत्यराम

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कायाबेली ग्रंथ www.dadooram.org अथ काया बेली ग्रन्थ २३ ३५६. पिंड ब्रह्माण्ड शोधन । पंजाबी त्रिताल साचा सतगुरु राम मिलावे, सब कुछ काया मांहि दिखावे ॥ टेक ॥ काया माँही सिरजनहार, काया माँही ओंकार। काया माँही है आकाश, काया माँही धरती पास ॥ १ ॥ काया माँही पवन प्रकाश, काया माँही नीर निवास । काया माँही शशिहर सूर, काया माँही बाजे तूर ॥ २ ॥ काया माँही तीनों देव, काया माँही अलख अभेव । काया माँही चारों वेद, काया माँही पाया भेद ॥ ३ ॥ काया माँही चारों खानी, काया माँही चारों वाणी । काया माँही उपजै आइ, काया माँही मर मर जाइ ॥ ४ ॥ काया माँही जामै मरै, काया माँही चौरासी फिरै । काया माँही ले अवतार, काया माँही बारम्बार ॥ ५ ॥

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श्री दादूवाणी-कायाबेली ग्रंथ 23 काया माँही रात दिन, उदय अस्त इकतार। दादू पाया परम गुरु, कीया एकंकार ॥ 6 ॥ 357. त्रिताल काया माँही खेल पसारा, काया माँही प्राण अधारा। काया माँही अठारह भारा, काया माँही उपावनहारा ॥ 1 ॥ काया माँही सब वन राइ, काया माँही रहे घर छाइ। काया माँही कंदलि वास, काया माँही है कैलास ॥ 2 ॥ काया माँही तरुवर छाया, काया माँही पंखी माया। काया माँही आदि अनंत, काया माँही है भगवन्त ॥ 3 ॥ काया माँही त्रिभुवन राइ, काया माँही रहे समाइ। काया माँही चौदह भुवन, काया माँही आवागवन ॥ 4 ॥ काया माँही सब ब्रह्मांड, काया माँही हैं नव खण्ड। काया माँही स्वर्ग पयाल, काया माँही आप दयाल ॥ 5 ॥ काया माँही लोक सब, दादू दिये दिखाइ। मनसा वाचा कर्मणा, गुरु बिन लख्या न जाइ ॥ 6 ॥ 358.रंगताल काया माँही सागर सात, काया माँही अविगत नाथ। काया माँही नदिया नीर, काया माँही गहर गंभीर ॥ 1 ॥ काया माँही सरवर पाणी, काया माँही बसै बिनाणी। काया माँही नीर निवान, काया माँही हंस सुजान ॥ 2 ॥ काया माँही गंग तरंग, काया माँही जमुना संग। काया माँही है सरस्वती, काया माँही द्वारावती ॥ 3 ॥ काया माँही काशी स्थान, काया माँही करै स्नान। काया माँही पूजा पाती, काया माँही तीर्थ जाती ॥ 4 ॥

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श्री दादूवाणी-कायाबेली ग्रंथ 23

काया माँही मुनिवर मेला, काया माँही आप अकेला । काया माँही जपिये जाप, काया माँही आपै आप ॥ 5 ॥ काया नगर निधान है, माँही कौतिक होइ । दादू सद्गुरु संग ले, भूल पड़े जनि कोइ ॥ 6 ॥

  1. रंगताल काया माँही विषमी बाट, काया माँही औघट घाट। काया माँही पट्टण गाँव, काया माँही उत्तम ठाँव ॥ 1 ॥ काया माँही मण्डप छाजै, काया माँही आप विराजै। काया माँही महल आवास, काया माँही निश्चल बास ॥ 2 ॥ काया माँही राजद्वार, काया माँही बोलणहार। काया माँही भरे भण्डार, काया माँही वस्तु अपार ॥ 3 ॥ काया माँही नौ निधि होइ, काया माँही अठ सिधि सोइ। काया माँही हीरा साल, काया माँही निपजैं लाल ॥ 4 ॥ काया माँही माणिक भरे, काया माँही ले ले धरे। काया माँही रत्न अमोल, काया माँही मोल न तोल ॥ 5 ॥ काया माँही कर्तार है, सो निधि जानै नाँहि। दादू गुरुमुख पाइये, सब कुछ काया मांहि ॥ 6 ॥

  2. वर्णभिन्न ताल काया माँही सब कुछ जाण, काया मांहै लेहु पिछाण। काया माँही बहु विस्तार, काया माँही अनन्त अपार ॥ 1 ॥ काया माँही अगम अगाध, काया माँही निपजे साध। काया माँही कह्या न जाइ, काया माँही रहे ल्यौ लाइ ॥ 2 ॥ काया माँही साधन सार, काया माँही करे विचार। काया माँही अमृत वाणी, काया माँही सारंग प्राणी ॥ 3 ॥

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श्री दादूवाणी-कायाबेली ग्रंथ 23 काया माँही खेलै प्राण, काया माँही पद निर्वाण। काया माँही मूल गह रहै, काया मांही सब कुछ लहै ॥ 4 ॥ काया माँही निज निरधार, काया माँही अपरम्पार। काया माँही सेवा करै, काया माँही नीझर झरै ॥ 5 ॥ काया माँही वास कर, रहै निरंतर छाइ। दादू पाया आदि घर, सद्गुरु दिया दिखाइ ॥ 6 ॥ 361. वर्ण भिन्न ताल काया माँही अनुभै सार, काया माँही करै विचार। काया माँही उपजै ज्ञान, काया माँही लागै ध्यान ॥ 1 ॥ काया माँही अमर स्थान, काया माँही आतमराम। काया माँही कला अनेक, काया माँही कर्ता एक॥ 2 ॥ काया माँही लागै रंग, काया माँही सांई संग। काया माँही सरवर तीर, काया माँही कोकिल कीर ॥ 3 ॥ काया माँही कच्छप नैन, काया माँही कूँजी बैन। काया माँही कमल प्रकाश, काया माँही मधुकर वास ॥ 4 ॥ काया माँही नाद कुरंग, काया माँही ज्योति पतंग। काया माँही चातक मोर, काया माँही चंद चकोर ॥ 5 ॥ काया माँही प्रीति कर, काया माँही सनेह। काया माँही प्रेम रस, दादू गुरुमुख येह ॥ 6 ॥ 362. राज विद्याधर ताल काया माँही तारणहार, काया माँही उतरे पार। काया माँही दुस्तर तारे, काया माँही आप उबारे ॥ 1 ॥ काया माँही दुस्तर तिरे, काया माँही होइ उद्धरे। काया माँही निपजै आइ, काया माँही रहै समाइ ॥ 2 ॥

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श्री दादूवाणी-कायाबेली ग्रंथ 23 काया माँही खुले कपाट, काया माँही निरंजन हाट। काया माँही है दीदार, काया माँही देखणहार ॥ 3 ॥ काया माँही राम रंग राते, काया माँही प्रेम रस माते। काया माँही अविचल भये, काया माँही निहचल रहे ॥ 4 ॥ काया माँही जीवै जीव, काया माँही पाया पीव। काया माँही सदा आनंद, काया माँही परमानन्द ॥ 5 ॥ काया माँही कुशल है, सो हम देख्या आइ। दादू गुरुमुख पाइये, साधु कहैं समझाइ ॥ 6 ॥ 363. राज विद्याधर ताल काया माँही देख्या नूर, काया माँही रह्या भरपूर। काया माँही पाया तेज, काया माँही सुन्दर सेज ॥ 1 ॥ काया माँही पुंज प्रकाश, काया माँही सदा उजास। काया माँही झिलमिल सारा, काया माँही सब तैं न्यारा ॥ 2 ॥ काया माँही ज्योति अनन्त, काया माँही सदा बसन्त। काया माँही खेलें फाग, काया माँही सब वन बाग ॥ 3 ॥ काया माँही खेलें रास, काया माँही विविध विलास। काया माँही बाजैं बाजे, काया माँही नाद धुनि साजे ॥ 4 ॥ काया माँही सेज सुहाग, काया माँही मोटे भाग। काया माँही मंगलाचार, काया माँही जै जैकार ॥ 5 ॥ काया अगम अगाध है, माँही तूर बजाइ। दादू प्रकट पीव मिल्या, गुरुमुख रहे समाइ ॥ 6 ॥ इति कायाबेली ग्रन्थ सम्पूर्णः ॥ 23 ॥ पद 10 ॥

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राग बसंत www.dadooram.org अथ राग बसंत २४ (गायन समय प्रभात ३ से ६ तथा बसंत ऋतु) ३६४. भजन भेद । मल्लिका मोद ताल निर्मल ना मन लीयो जाइ, जाके भाग बड़े सोई फल खाइ ॥ टेक ॥ मन माया मोह मद माते, कर्म कठिन ता मांहि परे । विषय विकार मान मन मांही, सकल मनोरथ स्वाद खरे ॥ १ ॥ काम क्रोध ये काल कल्पना, मैं मैं मेरी अति अहंकार । तृष्णा तृप्ति न मानै कबहूँ, सदा कुसंगी पाँच विकार ॥ २ ॥ अनेक जोध रहैं रखवाले, दुर्लभ दूर फल अगम अपार । जाके भाग बड़े सोई फल पावै, दादू दाता सिरजनहार ॥ ३ ॥ ३६५. (गुजराती) विरह । धीमी ताल

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श्री दादूवाणी-राग बसंत 24 तूँ घर आवने माहरे रे, हूँ जाऊँ वारणे ताहरे रे ॥ टेक ॥ रैन दिवस मूनै निरखतां जाये । वेलो थई घर आवे रे, वाहला आकुल थाये ॥ 1 ॥ तिल तिल हौं तो तारी वाटड़ी जोऊँ । एने रे आँसूड़े वाहला, मुखड़ो धोऊँ ॥ 2 ॥ ताहरी दया करि घर आवे रे वाहला । दादू तो ताहरो छे रे, मा कर टाला ॥ 3 ॥ 366. करूणा विनती । तेवरा ताल मोहन दुख दीरघ तूँ निवार, मोहि सतावै बारम्बार ॥ टेक ॥ काम कठिन घट रहै मांहि, तातैं ज्ञान ध्यान दोउ उदै नांहि । गति मति मोहन विकल मोर, तातैं चित्त न आवै नाम तोर ॥ 1 ॥ पाँचों द्वन्दर देह पूरि, तातैं सहज शील सत रहैं दूरि । सुधि बुधि मेरी गई भाज, तातैं तुम विसरे महाराज ॥ 2 ॥ क्रोध न कबहुँ तजै संग, तातैं भाव भजन का होइ भंग । समझि न काई मन मंझारि, तातैं चरण विमुख भये श्री मुरारि ॥ 3 ॥ अन्तरजामी कर सहाइ, तेरो दीन दुखित भयो जन्म जाइ । त्राहि त्राहि प्रभु तूँ दयाल, कहै दादू हरि कर संभाल ॥ 4 ॥ 367. मन स्थिरार्थ विनती । एक ताल मेरे मोहन मूरति राखि मोहि, निसवासर गुण रमूं तोहि ॥ टेक ॥ मन मीन होइ ज्यों स्वाद खाइ, लालच लागो जल तैं जाइ । मन हस्ती मातो अपार, काम अंध गज लहै न सार ॥ 1 ॥ मन पतंग पावक परै, अग्नि न देखै ज्यों जरै । मन मृगा ज्यों सुनै नाद, प्राण तजै यूं जाइ बाद ॥ 2 ॥ मन मधुकर जैसे लुब्धि वास, कँवल बँधावै होइ नास ।

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श्री दादूवाणी-राग बसंत 24 मनसा वाचा शरण तोर, दादू को राखो गोविन्द मोर ॥ ३ ॥ ३६८. उपदेश । एक ताल बहुरि न कीजे कपट कांम, हिरदै जपिये राम नांम ॥ टेक॥ हरि पाखैं नहिं कहूँ ठांम, पीव बिन खड़भड़ गांम गांम । तुम राखो जियरा अपनी मांम, अनत जनि जाय रहो विश्रांम ॥ १ ॥ कपट कांम नहीं कीजे हाँम, रघु चरण कमल कहु राम नांम । जब अंतरयामी रहै जांम, तब अक्षय पद जन दादू प्रांम ॥ २ ॥ ३६९. परिचय प्राप्ति । कड्डुक ताल तहँ खेलूं पीव सूं नित ही फाग, देख सखी री मेरे भाग ॥ टेक ॥ तहँ दिन दिन अति आनन्द होइ, प्रेम पिलावै आप सोइ । संगियन सेती रमूं रास, तहँ पूजा अर्चा चरण पास ॥ १ ॥ तहँ वचन अमोलक सब ही सार, तहँ बरतै लीला अति अपार । उमंग देइ तब मेरे भाग, तिहि तरुवर फल अमर लाग ॥ २ ॥ अलख देव कोइ जाणैं भेव, तहँ अलख देव की कीजै सेव । दादू बलि बलि बारंबार, तहँ आप निरंजन निराधार ॥ ३ ॥ ३७०. परिचय सुख वर्णन । षड़ताल मोहन माली सहज समाना, कोई जाणैं साध सुजाना ॥ टेक ॥ काया बाड़ी मांही माली, तहाँ रास बनाया । सेवग सौं स्वामी खेलन को, आप दया कर आया ॥ १ ॥ बाहर भीतर सर्व निरंतर, सब में रह्या समाई । परगट गुप्त, गुप्त पुनि परगट, अविगत लख्या न जाई ॥ २ ॥ ता माली की अकथ कहानी, कहत कही नहिं आवै । अगम अगोचर करत अनन्दा, दादू ये जस गावै ॥ ३ ॥

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श्री दादूवाणी-राग बसंत 24 371. परिचय । षड़ताल मन मोहन मेरे मन ही मांहिं, कीजै सेवा अति तहाँ ॥ टेक ॥ तहँ पायो देव निरंजना, परगट भयो हरि यह तना । नैनन ही देखूं अघाइ, प्रगट्यो है हरि मेरे भाइ ॥ 1 ॥ मोहि कर नैनन की सैन देइ, प्राण मूंखि हरि मोर लेइ । तब उपजै मोकौं इहै बानि, निज निरखत हूँ सारंगपानि ॥ 2 ॥ अंकुर आदैं प्रगट्यो सोइ, बैन बाण तातें लागे मोहि । शरणै दादू रह्यो जाइ, हरि चरण दिखावै आप आइ ॥ 3 ॥ 372. थकित निश्चल । मदन ताल मतवाले पँचूं प्रेम पूर, निमष न इत उत जाहिं दूर ॥ टेक ॥ हरि रस माते दया दीन, राम रमत ह्वै रहे लीन । उलट अपूठे भये थीर, अमृत धारा पीवहिं नीर ॥ 1 ॥ सहज समाधि तज विकार, अविनाशी रस पीवहिं सार । थकित भये मिल महल मांहिं, मनसा वाचा आन नांहिं ॥ 2 ॥ मन मतवाला राम रंग, मिल आसण बैठे एक संग । सुस्थिर दादू एकै अंग, प्राणनाथ तहँ परमानन्द ॥ 3 ॥ इति राग बसंत सम्पूर्णः ॥ 24 ॥ पद 9 ॥

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