देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
| ४६४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| मानुष्यं दुर्लभं प्राप्य सेविता न महेश्वरी ॥ ४०<br><br>निःश्रेणिकाग्रात्पतिता अध इत्येव विद्महे ।<br>अहङ्कारावृतं विश्वं गुणत्रयसमन्वितम् ॥ ४१<br><br>असत्येनापि सम्बद्धं मुच्यते कथमन्यथा ।<br>हित्वा सर्वं ततः सर्वैः संसेव्या भुवनेश्वरी ॥ ४२ | दुर्लभ मनुष्य-जन्म पाकर जिसने उन महेश्वरीकी उपासना नहीं की, वह मानो अन्तिम सीढ़ीसे फिसलकर गिर गया—मैं तो यही धारणा रखता हूँ। सम्पूर्ण विश्व अहंकारसे आच्छादित है, तीनों गुणोंसे युक्त है तथा असत्यसे बँधा हुआ है, तब प्राणी मुक्त कैसे हो सकता है? अतः सब कुछ छोड़कर सभी लोगोंको भगवती भुवनेश्वरीकी उपासना करनी चाहिये॥ ४०—४२॥ |
| राजोवाच<br>किं कृतं गुरुणा तत्र काव्यरूपधरेण च ।<br>कदा शुक्रः समायातस्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ ४३ | राजा बोले—हे पितामह! शुक्राचार्यका रूप धारण करनेवाले देवगुरु बृहस्पतिने वहाँ दैत्योंके पास पहुँचकर क्या किया और शुक्राचार्य पुनः कब लौटे? वह हमें बताइये॥ ४३॥ |
| व्यास उवाच<br>शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि यत्कृतं गुरुणा तदा ।<br>कृत्वा काव्यस्वरूपञ्च प्रच्छन्नेन महात्मना ॥ ४४ | व्यासजी बोले—हे राजन्! तब गोपनीय ढंगसे शुक्राचार्यका स्वरूप बनाकर देवगुरुने जो कुछ किया, वह मैं बताता हूँ, आप सुनिये॥ ४४॥ |
| गुरुणा बोधिता दैत्या मत्वा काव्यं स्वकं गुरुम् ।<br>विश्वासं परमं कृत्वा बभूवुस्तन्मयास्तदा ॥ ४५ | देवगुरु बृहस्पतिने दैत्योंको बोध प्रदान किया। तब शुक्राचार्यको अपना गुरु समझकर और उनपर पूर्ण विश्वास करके सभी दैत्य उन्हींके कथनानुसार व्यवहार करने लगे॥ ४५॥ |
| विद्यार्थं शरणं प्राप्ता भृगुं मत्वातिमौहिताः ।<br>गुरुणा विप्रलब्धास्ते लोभात्को वा न मुह्यति ॥ ४६ | अत्यधिक मोहितचित्त वे दैत्य बृहस्पतिको शुक्राचार्य समझकर विद्याप्राप्तिके लिये उनके शरणागत हुए। देवगुरु बृहस्पतिने भी उन्हें बहुत ठगा। [यह सत्य है कि] लोभसे कौन-सा प्राणी मोहमें नहीं पड़ जाता॥ ४६॥ |
| दशवर्षात्मके काले सम्पूर्णसमये तदा ।<br>जयन्त्या सह क्रीडित्वा काव्यो याज्यानचिन्तयत् ॥ ४७<br><br>आशया मम मार्गं ते पश्यन्तः संस्थिताः किल ।<br>गत्वा तान्वै प्रपश्येऽहं याज्यानतिभयातुरान् ॥ ४८<br><br>मा देवेभ्यो भयं तेषां मद्भक्तानां भवेदिति ।<br>सञ्चिन्त्य बुद्धिमास्थाय जयन्तीं प्रत्युवाच ह ॥ ४९<br><br>देवानेवोपसंयान्ति पुत्रा मे चारुलोचने ।<br>समयस्तेऽद्य सम्पूर्णो जातोऽयं दशवार्षिकः ॥ ५०<br><br>तस्माद् गच्छाम्यहं देवि द्रष्टुं याज्यान्सुमध्यमे ।<br>पुनरेवागमिष्यामि तवान्तिकमनुद्रुतः ॥ ५१ | तब जयन्तीके साथ क्रीडा करते-करते निर्धारित प्रतिज्ञासम्बन्धी दस वर्षकी अवधि पूर्ण हो जानेपर शुक्राचार्य अपने यजमानोंके विषयमें विचार करने लगे कि मेरी राह देखते हुए वे आशान्वित हो बैठे होंगे। अतः अब मैं चलकर अपने उन अत्यन्त भयभीत यजमानोंको देखूँ। कहीं ऐसा न हो कि मेरे उन भक्तोंके सम्मुख देवताओंसे कोई भय उत्पन्न हो गया हो॥ ४७-४८ ½॥<br><br>यह सोचकर अपनी बुद्धि स्थिर करके उन्होंने जयन्तीसे कहा—हे सुनयने! मेरे पुत्रसदृश दैत्यगण देवताओंके पास कालक्षेप कर रहे हैं। प्रतिज्ञानुसार तुम्हारे साथ रहनेका दस वर्षका समय पूरा हो चुका है, अतः हे देवि! अब मैं अपने यजमानोंसे मिलने जा रहा हूँ। हे सुमध्यमे! मैं पुनः तुम्हारे पास शीघ्र ही लौट आऊँगा॥ ४९—५१॥ |
अ० १३ ] चतुर्थ स्कन्ध ४६५
अ० १३ ] चतुर्थ स्कन्ध ४६५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तथेति तमुवाचाथ जयन्ती धर्मवित्तमा।<br>यथेष्टं गच्छ धर्मज्ञ न ते धर्मं विलोपये॥ ५२ | परम धर्मपरायणा जयन्तीने उनसे कहा—हे धर्मज्ञ! बहुत ठीक है, आप स्वेच्छापूर्वक जाइये। मैं आपका धर्म लुप्त नहीं होने दूँगी॥ ५२॥ |
| तच्छ्रुत्वा वचनं काव्यो जगाम त्वरितस्ततः।<br>अपश्यद्दानवानां च पार्श्वे वाचस्पतिं तदा॥ ५३<br><br>छद्मरूपधरं सौम्यं बोधयन्तं छलेन तान्।<br>जैनं धर्मं कृतं स्वेन यज्ञनिन्दापरं तथा॥ ५४<br><br>भो देवरिपवः सत्यं ब्रवीमि भवतां हितम्।<br>अहिंसा परमो धर्मोऽहन्तव्या ह्याततायिनः॥ ५५<br><br>द्विजैर्भोगरतैर्वेदे दर्शितं हिंसनं पशोः।<br>जिह्वास्वादपरैः काममहिंसैव परा मता॥ ५६ | उसका यह वचन सुनकर शुक्राचार्य वहाँसे शीघ्रतापूर्वक चल पड़े। वहाँ पहुँचकर उन्होंने देखा कि दैत्योंके पास विराजमान होकर बृहस्पति छद्मरूप धारण करके शान्तचित्त हो छलसे उन्हें अपने द्वारा रचित जिन-धर्म तथा यज्ञनिन्दापरक वचनोंकी शिक्षा इस प्रकार दे रहे हैं—‘हे देवताओंके शत्रुगण! मैं सत्य तथा आपलोगोंके हितकी बात बता रहा हूँ कि अहिंसा सर्वोपरि धर्म है। आततायियोंको भी नहीं मारना चाहिये। भोगपरायण तथा अपनी जिह्वाके स्वादके लिये सदा तत्पर रहनेवाले द्विजोंने वेदमें पशुहिंसाका उल्लेख कर दिया है, किंतु सच्चाई यह है कि अहिंसाको ही सर्वोत्कृष्ट माना गया है’॥ ५३-५६॥ |
| एवंविधानि वाक्यानि वेदशास्त्रपराणि च।<br>ब्रुवाणं गुरुमाकर्ण्य विस्मितोऽसौ भृगोः सुतः॥ ५७<br><br>चिन्तयामास मनसा मम द्वेष्यो गुरुः किल।<br>वञ्चिताः किल धूर्तेन याज्या मे नात्र संशयः॥ ५८ | इस प्रकारकी वेद-शास्त्रविरोधी बातें कहते हुए देवगुरु बृहस्पतिको देखकर वे भृगुपुत्र शुक्राचार्य आश्चर्यचकित हो गये। वे मन-ही-मन सोचने लगे कि यह देवगुरु तो मेरा शत्रु है। इस धूर्तने मेरे यजमानोंको अवश्य ठग लिया है, इसमें सन्देह नहीं है॥ ५७-५८॥ |
| धिग्लोभं पापबीजं वै नरकद्वारमूर्जितम्।<br>गुरुरप्यनृतं ब्रूते प्रेरितो येन पाप्मना॥ ५९ | नरकके द्वारस्वरूप तथा पापके बीजरूप उस उग्र लोभको धिक्कार है, जिस लोभरूप पापसे प्रेरित होकर देवगुरु बृहस्पति भी झूठ बोल रहे हैं॥ ५९॥ |
| प्रमाणं वचनं यस्य सोऽपि पाखण्डधारकः।<br>गुरुः सुराणां सर्वेषां धर्मशास्त्रप्रवर्तकः॥ ६० | जिनका वचन प्रमाण माना जाता है और जो समस्त देवताओंके गुरु तथा धर्मशास्त्रोंके प्रवर्तक हैं, वे भी पाखण्डके पोषक हो गये हैं॥ ६०॥ |
| किं किं न लभते लोभान्मलिनीकृतमानसः।<br>अन्योऽपि गुरुरप्येवं जातः पाखण्डपण्डितः॥ ६१<br><br>शैलूषचेष्टितं सर्वं परिगृह्य द्विजोत्तमः।<br>वञ्चयत्यतिसम्मूढान्दैत्यान्याज्यान्ममाप्यसौ॥ ६२ | लोभसे विकृत मनवाला प्राणी क्या-क्या नहीं कर डालता। दूसरोंकी क्या बात, जबकि साक्षात् देवगुरु ही इस प्रकारके पाखण्डके पण्डित हो गये हैं। श्रेष्ठ ब्राह्मण होकर भी ये धूर्तोंकी सारी भाव-भंगिमाएँ बनाकर मेरे इन घोर अज्ञानी दैत्य यजमानोंको ठग रहे हैं॥ ६१-६२॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे शुक्लरूपेण गुरुणा दैत्यवञ्चनावर्णनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः॥ १३॥
| ४६६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १४ |
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अथ चतुर्दशोऽध्यायः
शुक्राचार्यद्वारा दैत्योंको बृहस्पतिका पाखण्डपूर्ण कृत्य बताना, बृहस्पतिकी मायासे मोहित दैत्योंका उन्हें फटकारना, क्रुद्ध शुक्राचार्यका दैत्योंको शाप देना, बृहस्पतिका अन्तर्धान हो जाना, प्रह्लादका शुक्राचार्यजीसे क्षमा माँगना और शुक्राचार्यका उन्हें प्रारब्धकी बलवत्ता समझाना
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
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| इति सञ्चिन्त्य मनसा तानुवाच हसन्निव।<br>वञ्चिता मत्स्वरूपेण दैत्याः किं गुरुणा किल॥ १<br><br>अहं काव्यो गुरुश्चायं देवकार्यप्रसाधकः।<br>अनेन वञ्चिता यूयं मद्याज्या नात्र संशयः॥ २<br><br>मा श्रद्दध्वं वचोऽस्यार्या दाम्भिकोऽयं मदाकृतिः।<br>अनुगच्छत मां याज्यास्त्यजतैनं बृहस्पतिम्॥ ३ | मनमें ऐसा सोचकर उन दैत्योंसे शुक्राचार्यने हँसते हुए कहा—हे दैत्यगण! मेरा स्वरूप बनाये हुए इस देवगुरु बृहस्पतिने तुमलोगोंको ठग लिया क्या? शुक्राचार्य मैं हूँ और ये तो देवताओंका कार्य सिद्ध करनेवाले देवगुरु बृहस्पति हैं। हे मेरे यजमानो! इन्होंने तुम सबको अवश्य ठग लिया; इसमें सन्देह नहीं है। हे आर्यो! इनकी बातोंपर विश्वास मत करो। ये पाखण्डी हैं तथा मेरा स्वरूप बनाये हुए हैं। हे यजमानो! तुमलोग मेरा अनुसरण करो और इन बृहस्पतिका त्याग कर दो॥ १—३॥ |
| इत्याकर्ण्य वचस्तस्य दृष्ट्वा तौ सदृशौ पुनः।<br>विस्मयं परमं जग्मुः काव्योऽयमिति निश्चिताः॥ ४ | उनका यह वचन सुनकर और फिर उन दोनोंको समान रूपवाला देखकर सभी दैत्य महान् आश्चर्यमें पड़ गये। पुनः उन्होंने विचार किया कि हो सकता है ये ही शुक्राचार्य हों॥ ४॥ |
| स तान्वीक्ष्य सुसम्भ्रान्तान्गुरुर्वाक्यमुवाच ह।<br>गुरुर्वो वञ्चयत्येव मद्रूपोऽयं बृहस्पतिः॥ ५<br><br>प्राप्तो वञ्चयितुं युष्मान्देवकार्यार्थसिद्धये।<br>मा विश्वासं वचस्तस्य कुरुध्वं दैत्यसत्तमाः॥ ६<br><br>प्राप्ता विद्या मया शम्भोर्युष्मानध्यापयामि ताम्।<br>देवेभ्यो विजयं नूनं करिष्यामि न संशयः॥ ७ | इस प्रकार उन दैत्योंको अत्यन्त विस्मित देखकर [शुक्राचार्यरूपधारी] गुरु बृहस्पतिने यह बात कही—मेरा स्वरूप बनाये हुए ये देवगुरु बृहस्पति तुम सबको धोखा दे रहे हैं। ये देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके निमित्त तुमलोगोंको ठगनेके लिये आये हुए हैं। हे श्रेष्ठ दैत्यगण! तुमलोग इनकी बातपर विश्वास मत करो। मैंने शंकरजीसे विद्या प्राप्त कर ली है और उसे तुम सबको पढ़ा रहा हूँ। इस प्रकार मैं तुम्हें देवताओंपर विजय दिला दूँगा; इसमें सन्देह नहीं है॥ ५—७॥ |
| इति श्रुत्वा गुरोर्वाक्यं काव्यरूपधरस्य ते।<br>विश्वासं परमं जग्मुः काव्योऽयमिति निश्चयात्॥ ८<br><br>काव्येन बहुधा तत्र बोधिताः किल दानवाः।<br>बुबुधुर्न गुरोर्मायामोहिताः कालपर्ययात्॥ ९ | शुक्राचार्यका रूप धारण करनेवाले देवगुरु बृहस्पतिका यह वाक्य सुनकर उन दैत्योंको पूर्ण विश्वास हो गया कि ये ही निश्चितरूपसे [हमारे गुरु] शुक्राचार्य हैं। उस समय शुक्राचार्यने उन्हें बहुत प्रकारसे समझाया फिर भी समयके फेरसे गुरु बृहस्पतिकी मायासे मोहित होनेके कारण वे दैत्य समझ नहीं सके॥ ८-९॥ |
| अ० १४ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४६७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| एवं ते निश्चयं कृत्वा ततो भार्गवमब्रुवन् ।<br>अयं गुरुर्नो धर्मात्मा बुद्धिदश्च हिते रतः ॥ १०<br><br>दशवर्षाणि सततमयं नः शास्ति भार्गवः ।<br>गच्छ त्वं कुहको भासि नास्माकं गुरुरप्युत ॥ ११ | ऐसा निश्चय करनेके उपरान्त उन्होंने शुक्राचार्यसे कहा—ये ही हमारे गुरु हैं। ये धर्मात्मा हमें बुद्धि प्रदान करनेवाले हैं और हमारा हित करनेमें तत्पर हैं। इन शुक्राचार्यजीने हमें निरन्तर दस वर्षतक शिक्षा दी है। तुम चले जाओ, तुम धूर्त जान पड़ते हो; तुम हमारे गुरु बिलकुल नहीं हो सकते ॥ १०-११ ॥ |
| इत्युक्त्वा भार्गवं मूढा निर्भर्त्स्य च पुनः पुनः ।<br>जगृहुस्तं गुरुं प्रीत्या प्रणिपत्याभिवाद्य च ॥ १२ | ऐसा कहकर उन मूर्ख दैत्योंने शुक्राचार्यको बार-बार फटकारा और बृहस्पतिको प्रेमपूर्वक प्रणाम तथा अभिवादन करके उन्हें ही अपना गुरु स्वीकार कर लिया ॥ १२ ॥ |
| काव्यस्तु तन्मयान्दृष्ट्वा चुकोपाथ शशाप च ।<br>दैत्यान्विबोधितान्मत्वा गुरुणा चातिवञ्चितान् ॥ १३<br><br>यस्मान्मया बोधिता वै गृह्णीयुर्न च मे वचः ।<br>तस्मात्प्रनष्टसंज्ञा वै पराभवमवाप्स्यथ ॥ १४<br><br>मदवज्ञाफलं कामं स्वल्पे काले ह्यवाप्स्यथ ।<br>तदास्य कपटं सर्वं परिज्ञातं भविष्यति ॥ १५ | देवगुरु बृहस्पतिने इन दैत्योंको पूर्णरूपसे सिखा-पढ़ा दिया है तथा इन्हें खूब ठगा है—ऐसा मानकर और इन्हें गुरु बृहस्पतिमें तन्मय देखकर शुक्राचार्य बहुत कुपित हुए और उन्होंने शाप दे दिया कि मेरे बार-बार समझानेपर भी तुमलोगोंने मेरी बात नहीं मानी, इसलिये नष्ट बुद्धिवाले तुम सब पराभवको प्राप्त होओगे। तुमलोग थोड़े ही समयमें मेरे तिरस्कारका फल पाओगे। तब इनका सारा कपट तुम सबको मालूम पड़ जायगा ॥ १३–१५ ॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वासौ जगामाशु भार्गवः क्रोधसंयुतः ।<br>बृहस्पतिर्मुदं प्राप्य तस्थौ तत्र समाहितः ॥ १६ | व्यासजी बोले— ऐसा कहकर क्रोधमें भरे शुक्राचार्य तत्काल चल दिये और [शुक्राचार्यरूपधारी] बृहस्पति प्रसन्न होकर निश्चिन्तभावसे वहाँ रहने लगे ॥ १६ ॥ |
| ततः शप्तानगुरुर्ज्ञात्वा दैत्यांस्तान्भार्गवेण हि ।<br>जगाम तरसा त्यक्त्वा स्वरूपं स्वं विधाय च ॥ १७<br><br>गत्वोवाच तदा शक्रं कृतं कार्यं मया ध्रुवम् ।<br>शप्ताः शुक्रेण ते दैत्या मया त्यक्ताः पुनः किल ॥ १८<br><br>निराधाराः कृता नूनं यतध्वं सुरसत्तमाः ।<br>संग्रामार्थं महाभाग शापदग्धा मया कृताः ॥ १९ | तदनन्तर शुक्राचार्यके द्वारा उन दैत्योंको शापित हुआ जानकर गुरु बृहस्पति तत्काल उन्हें छोड़कर अपना रूप धारणकर वहाँसे चल पड़े। उन्होंने जाकर इन्द्रसे कहा—मैंने [आपका] सम्पूर्ण कार्य भलीभाँति बना दिया है। शुक्राचार्यने उन दैत्योंको शाप दे दिया और बादमें मैंने भी उनका त्याग कर दिया। अब मैंने उन्हें पूर्णरूपसे असहाय बना दिया है। अतः हे श्रेष्ठ देवतागण! आपलोग युद्धके लिये अब उद्योग करें। हे महाभाग! मैंने उन दैत्योंको शापसे दग्ध कर दिया है ॥ १७–१९ ॥ |
| इति श्रुत्वा गुरोर्वाक्यं मघवा मुदमाप्तवान् ।<br>जहृषुश्च सुराः सर्वे प्रतिपूज्य बृहस्पतिम् ॥ २० | गुरु बृहस्पतिका यह वचन सुनकर इन्द्र बहुत आनन्दित हुए और सभी देवता भी हर्षित हो उठे। तत्पश्चात् गुरु बृहस्पतिकी पूजा करके वे युद्धके लिये |
| ४६८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १४ | | :--- | :--- | | संग्रामाय मतिं चक्रुः संविचार्य मिथः पुनः।<br>निर्ययुर्मिलिताः सर्वे दानवाभिमुखाः सुराः॥ २१ | मन्त्रणा करने लगे। आपसमें भलीभाँति सोच-विचार करके सभी देवता एक साथ मिलकर दानवोंसे लड़नेके लिये वहाँसे निकल पड़े॥ २०-२१॥ | | सुरान्समुद्यताञ्ज्ञात्वा कृतोद्योगान्महाबलान्।<br>अन्तर्हितं गुरुं चैव बभूवुश्चिन्तयान्विताः॥ २२ | उधर महाबली देवताओंको युद्धकी तैयारी करके आक्रमणके लिये उद्यत तथा शुक्राचार्यरूपधारी गुरु बृहस्पतिको अन्तर्हित जान करके दैत्यगण बहुत चिन्तित हुए॥ २२॥ | | परस्परमथोचुस्ते मोहितास्तस्य मायया।<br>सम्प्रसाद्यो महात्मा च यातोऽसौ रुष्टमानसः॥ २३ | अब उन देवगुरुकी मायासे मोहित वे दैत्य आपसमें कहने लगे कि वे गुरु शुक्राचार्य कुपितमन होकर यहाँसे चले गये, अतः हमें उन महात्माको भलीभाँति मनाना चाहिये॥ २३॥ | | वञ्चयित्वा गतः पापो गुरुः कपटपण्डितः।<br>भ्रातृस्त्रीलम्भनः प्रायो मलिनोऽन्तर्बहिः शुचिः॥ २४ | वह पापी और कपटकार्यमें अत्यन्त प्रवीण देवगुरु हमें ठगकर चला गया। अपने भाईकी पत्नीके साथ अनाचार करनेवाला वह भीतरसे कलुषित है तथा ऊपरसे पवित्र प्रतीत होता है॥ २४॥ | | किं कुर्मः क्व च गच्छामः कथं काव्यं प्रकोपितम्।<br>कुर्वीमहि सहायार्थं प्रसन्नं हृष्टमानसम्॥ २५ | अब हम क्या करें और कहाँ जायें? अत्यन्त कुपित गुरु शुक्राचार्यको अपनी सहायताके लिये हम किस तरह हर्षित तथा प्रसन्नचित्त करें॥ २५॥ | | इति सञ्चिन्त्य ते सर्वे मिलिता भयकम्पिताः।<br>प्रह्लादं पुरतः कृत्वा जग्मुस्ते भार्गवं पुनः॥ २६ | ऐसा विचार करके वे सब एकजुट हुए। प्रह्लादको आगे करके भयसे काँपते हुए वे दैत्य पुनः भृगुपुत्र शुक्राचार्यके पास गये। | | प्रणेमुश्चरणौ तस्य मुनेर्मौनभृतस्तदा।<br>भार्गवस्तानुवाचाथ रोषसंरक्तलोचनः॥ २७ | [वहाँ पहुँचकर] उन्होंने मौन धारण किये हुए उन मुनिके चरणोंमें प्रणाम किया। तब क्रोधसे लाल नेत्रोंवाले शुक्राचार्य उनसे कहने लगे॥ २६-२७॥ | | मया प्रबोधिता यूयं मोहिता गुरुमायया।<br>न गृहीतं वचो योग्यं तदा याज्या हितं शुचि॥ २८ | हे यजमानो! मैंने तुमलोगोंको बहुत समझाया, किंतु देवगुरुकी मायासे व्यामुग्ध रहनेके कारण तुम-लोगोंने मेरा उचित, हितकर और निष्कपट वचन नहीं माना॥ २८॥ | | तदावगणितश्चाहं भवद्भिस्तद्दृशं गतैः।<br>प्राप्तं नूनं मदोन्मत्तैर्ममावमानजं फलम्॥ २९ | उस समय उनके वशवर्ती हुए तुम सबने मेरी अवहेलना की। मदसे उन्मत्त रहनेवाले तुम सबको मेरे अपमान करनेका फल अवश्य मिल गया॥ २९॥ | | तत्र गच्छत सद्भ्रष्टा यत्रासौ कपटाकृतिः।<br>वञ्चकः सुरकार्यार्थी नाहं तद्विद्धि वञ्चकः॥ ३० | तुमलोगोंका सर्वस्व छिन गया। अब तुमलोग वहींपर चले जाओ; जहाँ वह कपटी, छली और देवताओंका कार्य सिद्ध करनेवाला बृहस्पति विद्यमान है; मैं उसकी तरह वंचक नहीं हूँ॥ ३०॥ | | व्यास उवाच<br>एवं ब्रुवन्तं शुक्रं तु वाक्यसन्दिग्धया गिरा।<br>प्रह्लादस्तं तदोवाच गृहीत्वा चरणौ ततः॥ ३१ | व्यासजी बोले— इस प्रकार संदेहयुक्त वाणीमें बोलते हुए शुक्राचार्यके दोनों पैर पकड़कर प्रह्लाद उनसे कहने लगे—॥ ३१॥ |
अ० १४] चतुर्थ स्कन्ध ४६१
अ० १४] चतुर्थ स्कन्ध ४६१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी टीका |
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| प्रह्लाद उवाच<br>भार्गवाद्य समायातान्याज्यानास्मांस्तथातुरान्।<br>त्यक्तुं नार्हसि सर्वज्ञ त्वद्गतांस्तनयानिव॥ ३२ | प्रह्लाद बोले— हे भार्गव! हे सर्वज्ञ! अत्यन्त दुःखी होकर आज पास आये हुए अपने पुत्रतुल्य तथा हितचिन्तक हम यजमानोंका आप त्याग न करें॥ ३२॥ |
| गते त्वयि तु मन्त्रार्थं शैलूषेण दुरात्मना।<br>त्वद्वेषमधुरालापैर्वयं तेन प्रवञ्चिताः॥ ३३ | मन्त्र-प्राप्तिके लिये आपके चले जानेपर उस कपटी तथा दुष्टात्मा बृहस्पतिने आपकी वेश-भूषा तथा मधुर वाणीके द्वारा हमलोगोंको खूब ठगा॥ ३३॥ |
| अज्ञानकृतदोषेण नैव कुप्यति शान्तिमान्।<br>सर्वज्ञस्त्वं विजानासि चित्तं नः प्रवणं त्वयि॥ ३४ | शान्तिसम्पन्न व्यक्ति किसीके द्वारा अनजानमें किये गये अपराधसे कुपित नहीं होता। आप तो सर्वज्ञ हैं, अतः जानते ही हैं कि हमलोगोंका चित्त सदा आपमें ही अनुरक्त रहता है॥ ३४॥ |
| ज्ञात्वा नस्तपसा भावं त्यज कोपं महामते।<br>ब्रुवन्ति मुनयः सर्वे क्षणकोपा हि साधवः॥ ३५ | अतः हे महामते! अपने तपोबलसे हमलोगोंका भाव जानकर आप क्रोधका त्याग कर दीजिये; क्योंकि सभी मुनिगण कहा करते हैं कि साधुपुरुषोंका क्रोध क्षणभरके लिये ही होता है॥ ३५॥ |
| जलं स्वभावतः शीतं वह्न्यातपसमागमात्।<br>भवत्युष्णं वियोगाच्च शीतत्वमनुगच्छति॥ ३६ | जल स्वभावसे शीतल होता है, किंतु अग्नि और धूपके संपर्कसे वह गर्म हो जाता है। वही जल आग तथा धूपका संयोग दूर होते ही पुनः शीतलता प्राप्त कर लेता है॥ ३६॥ |
| क्रोधश्चाण्डालरूपो वै त्यक्तव्यः सर्वथा बुधैः।<br>तस्माद्रोषं परित्यज्य प्रसादं कुरु सुव्रत॥ ३७ | क्रोध चाण्डालरूप होता है; बुद्धिमान् लोगोंको इसका पूर्णरूपसे त्याग कर देना चाहिये। अतः हे सुव्रत! क्रोध छोड़कर आप हमपर प्रसन्न हो जाइये॥ ३७॥ |
| यदि न त्यजसि क्रोधं त्यजस्यस्मान्सुदुःखितान्।<br>त्वया त्यक्ता महाभाग गमिष्यामो रसातलम्॥ ३८ | हे महाभाग! यदि आप क्रोधका त्याग नहीं करते बल्कि अत्यन्त दुःखित हमलोगोंका ही त्याग कर देते हैं, तो आपसे परित्यक्त होकर हम सब रसातलमें चले जायँगे॥ ३८॥ |
| व्यास उवाच<br>प्रह्लादस्य वचः श्रुत्वा भार्गवो ज्ञानचक्षुषा।<br>विलोक्य सुमना भूत्वा तानुवाच हसन्निव॥ ३९ | व्यासजी बोले— प्रह्लादका वचन सुनकर शुक्राचार्य ज्ञानदृष्टिसे सब कुछ देख करके प्रसन्नचित्त हो उनसे हँसते हुए बोले—॥ ३९॥ |
| न भेतव्यं न गन्तव्यं दानवा वा रसातलम्।<br>रक्षयिष्यामि वो याज्यान्मन्त्रैरवितथैः किल॥ ४० | हे दानवो! तुमलोगोंको अब न तो डरना है और न रसातलमें ही जाना है। मैं अपने अचूक मन्त्रोंसे तुम सब यजमानोंकी निश्चय ही रक्षा करूँगा॥ ४०॥ |
| हितं सत्यं ब्रवीम्यद्य शृणुध्वं तत्तु निश्चयम्।<br>वचनं मम धर्मज्ञाः श्रुतं यद् ब्रह्मणः पुरा॥ ४१ | हे धर्मज्ञो! पूर्वकालमें मैंने ब्रह्माजीसे जो सुना है, वह हितकर, सत्य तथा अटल बात मैं तुमलोगोंको बता रहा हूँ, मेरी वह बात सुनिये—॥ ४१॥ |
| अवश्यम्भाविनो भावाः प्रभवन्ति शुभाशुभाः।<br>दैवं न चान्यथा कर्तुं क्षमः कोऽपि धरातले॥ ४२ | निश्चित रूपसे होनेवाली शुभ या अशुभ घटनाएँ होकर रहती हैं। धरातलपर कोई भी प्राणी प्रारब्धको टाल पानेमें समर्थ नहीं है॥ ४२॥ |
| ४७० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १४ |
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| अद्य मन्दबला यूयं कालयोगादसंशयम्।<br>देवैर्जिताः सकृच्चापि पातालं प्रतिपत्स्यथ॥ ४३ | इसमें संदेह नहीं कि तुमलोग आज समयके फेरसे क्षीण बलवाले हो गये हो, अतः एक बार देवताओंसे पराजित होकर तुमलोगोंको पातालमें जाना ही पड़ेगा॥ ४३॥ |
| प्राप्तः पर्यायकालो व इति ब्रह्माभ्यभाषत।<br>भुक्तं राज्यं भवद्भिश्च पूर्णं सर्वं समृद्धिमत्॥ ४४<br><br>युगानि दश पूर्णानि देवानावक्रम्य मूर्धनि।<br>दैवयोगाच्च युष्माभिर्भुक्तं त्रैलोक्यमूर्जितम्॥ ४५ | अब तुमलोगोंका समय-परिवर्तन उपस्थित हुआ है, ऐसा ब्रह्माजीने कहा था। कुछ दिनों पूर्व तुमलोगोंने सब प्रकारसे समृद्ध राज्यसुखका भोग किया था। उस समय देवताओंपर आक्रमण करके उनके मस्तकपर चरण रखकर तुमलोगोंने दैवयोगसे पूरे दस युगोंतक इस दिव्य त्रिलोकीपर शासन किया था॥ ४४-४५॥ |
| सावर्णिके मनौ राज्यं पुनस्तत्तु भविष्यति।<br>पौत्रस्त्रैलोक्यविजयी राज्यं प्राप्स्यति ते बलिः॥ ४६ | [अब आगे आनेवाले] सावर्णि मन्वन्तरमें तुम्हें वह राज्य पुनः प्राप्त होगा। तुम्हारा पौत्र बलि तीनों लोकोंमें विजयी होकर राज्यको पुनः प्राप्त कर लेगा॥ ४६॥ |
| यदा वामनरूपेण हृतं देवेन विष्णुना।<br>तदैव च भवत्पौत्रः प्रोक्तो देवेन जिष्णुना॥ ४७<br><br>हृतं येन बले राज्यं देववाञ्छार्थसिद्धये।<br>त्वमिन्द्रो भविता चाग्रे स्थिते सावर्णिके मनौ॥ ४८ | जिस समय वामनरूप धारण करके भगवान् विष्णुने [राजा बलिका राज्य] छीन लिया था, उस समय भगवान् विष्णुने आपके पौत्र बलिसे कहा था—हे बले! मैंने तुम्हारा यह राज्य देवताओंकी अभिलाषा पूरी करनेके लिये छीना है, किंतु आगे सावर्णि मन्वन्तरके उपस्थित होनेपर तुम इन्द्र होओगे॥ ४७-४८॥ |
| भार्गव उवाच<br>इत्युक्तो हरिणा पौत्रस्तव प्रह्लाद साम्प्रतम्।<br>अदृश्यः सर्वभूतानां गुप्तश्चरति भीतवत्॥ ४९ | शुक्राचार्य बोले—हे प्रह्लाद! भगवान् विष्णुके द्वारा ऐसा कहा गया तुम्हारा पौत्र बलि इस समय सभी प्राणियोंसे अदृश्य रहकर डरे हुएकी भाँति गुप्तरूपसे विचरण कर रहा है॥ ४९॥ |
| एकदा वासवेनासौ बलिर्गर्दभरूपभाक्।<br>शून्ये गृहे स्थितः कामं भयभीतः शतक्रतोः॥ ५०<br><br>पृष्टश्च बहुधा तेन वासवेन बलिस्तदा।<br>किमर्थं गार्दभं रूपं कृतवान्दैत्यपुङ्गव॥ ५१<br><br>भोक्ता त्वं सर्वलोकस्य दैत्यानां च प्रशासिता।<br>(न लज्जा खररूपेण तव राक्षससत्तम।)<br>तस्य तद्वचनं श्रुत्वा दैत्यराजो बलिस्तदा॥ ५२ | एक समयकी बात है—इन्द्रसे भयभीत बलि गर्दभका रूप धारण करके एक सूने घरमें स्थित थे, तभी [वहाँ पहुँचकर] इन्द्र उन बलिसे बार-बार पूछने लगे—हे दैत्यश्रेष्ठ! आपने गर्दभका रूप क्यों धारण किया है? आप तो समस्त लोकोंका भोग करनेवाले और दैत्योंके शासक हैं। (हे राक्षसश्रेष्ठ! क्या गर्दभका रूप धारण करनेमें आपको लज्जा नहीं लगती?) ॥ ५०-५१ १/२॥ |
| प्रोवाच वचनं शक्रं कोऽत्र शोकः शतक्रतो।<br>यथा विष्णुर्महातेजा मत्स्यकच्छपतां गतः॥ ५३ | तब इन्द्रकी वह बात सुनकर बलिने इन्द्रसे यह वचन कहा—हे शतक्रतो! इसमें शोक कैसा? जैसे महान् तेजस्वी भगवान् विष्णुने मत्स्य और कच्छपका |
अ० १५] चतुर्थ स्कन्ध ४७१
अ० १५] चतुर्थ स्कन्ध ४७१
| तथाहं खररूपेण संस्थितः कालयोगतः।<br>यथा त्वं कमले लीनः संस्थितो ब्रह्महत्यया ॥ ५४<br><br>पीडितश्च तथा ह्यद्य स्थितोऽहं खररूपधृक्।<br>दैवाधीनस्य किं दुःखं किं सुखं पाकशासन ॥ ५५<br><br>कालः करोति वै नूनं यदिच्छति यथा तथा।<br><br>भार्गव उवाच<br>इति तौ बलिदेवेशौ कृत्वा संविदमुत्तमाम् ॥ ५६<br><br>प्रबोधं प्राप्तुः कामं यथास्थानञ्च जग्मतुः।<br>इत्येतत्ते समाख्याता मया दैवबलिष्ठता ॥ ५७<br><br>दैवाधीनं जगत्सर्वं सदेवासुरमानुषम् ॥ ५८ | रूप धारण किया था, उसी प्रकार मैं भी समयके फेरसे गर्दभरूपसे स्थित हूँ। जिस प्रकार तुम ब्रह्महत्यासे दुःखी होकर कमलमें छिपकर पड़े रहे, उसी तरह मैं भी आज गर्दभका रूप धारण करके स्थित हूँ। हे पाकशासन! दैवके अधीन रहनेवालोंको क्या दुःख और क्या सुख? दैव जिस रूपमें जो चाहता है, वैसा निश्चितरूपसे करता है॥ ५२—५५ १/२॥<br><br>शुक्राचार्य बोले— इस प्रकार बलि और देवराज इन्द्रने परस्पर उत्तम बातें करके परम सन्तुष्टि प्राप्त की और इसके बाद वे अपने-अपने स्थानको चले गये। यह मैंने तुमसे प्रारब्धकी बलवत्ताका भलीभाँति वर्णन कर दिया। देवताओं, असुरों और मानवोंसे युक्त सम्पूर्ण जगत् दैवके अधीन है॥ ५६—५८॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे प्रह्लादेन शुक्रकोपसान्त्वनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
### अथ पञ्चदशोऽध्यायः
#### देवता और दैत्योंके युद्धमें दैत्योंकी विजय, इन्द्रद्वारा भगवतीकी स्तुति, भगवतीका प्रकट होकर दैत्योंके पास जाना, प्रह्लादद्वारा भगवतीकी स्तुति, देवीके आदेशसे दैत्योंका पातालगमन
| _व्यास उवाच_<br>इति तस्य वचः श्रुत्वा भार्गवस्य महात्मनः।<br>प्रह्लादस्तु सुसंहृष्टो बभूव नृपनन्दनः॥ १<br><br>ज्ञात्वा दैवं बलिष्ठञ्च प्रह्लादस्तानुवाच ह।<br>कृतेऽपि युद्धे न जयो भविष्यति कदाचन ॥ २<br><br>तदा ते जयिनः प्रोचुर्दानवा मदगर्विताः।<br>संग्रामस्तु प्रकर्तव्यो दैवं किं न विदामहे॥ ३<br><br>निरुद्यमानां दैवं हि प्रधानमसुराधिप।<br>केन दृष्टं क्व वा दृष्टं कीदृशं केन निर्मितम्॥ ४<br><br>तस्माद्युद्धं करिष्यामो बलमास्थाय साम्प्रतम्।<br>भवाग्रे दैत्यवर्य त्वं सर्वज्ञोऽसि महामते॥ ५ | **व्यासजी बोले—** उन महात्मा शुक्राचार्यका यह वचन सुनकर राजकुमार प्रह्लाद अत्यन्त हर्षित हुए। प्रारब्धको बलवान् मानकर प्रह्लादने उन दैत्योंसे कहा—युद्ध करनेपर भी विजय कभी नहीं होगी॥ १-२॥<br><br>तदनन्तर विजयकी अभिलाषा रखनेवाले उन दानवोंने अभिमानसे चूर होकर कहा—हमें तो निश्चितरूपसे संग्राम करना चाहिये। दैव क्या है! इसे हमलोग नहीं जानते। हे दानवेश्वर! उद्यमरहित लोगोंके लिये ही दैव प्रधान होता है। दैवको किसने देखा है, कहाँ देखा है, दैव कैसा है और उसे किसने बनाया है! अतएव अब हमलोग बलका आश्रय लेकर युद्ध करेंगे। हे दैत्यश्रेष्ठ! हे महामते! आप सर्वज्ञ हैं, आप केवल हमारे आगे रहें॥ ३—५॥ |
| ४७२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १५ |
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| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| इत्युक्तस्तैस्तदा राजन् प्रह्लादः प्रबलारिहा।<br>सेनानीश्च तदा भूत्वा देवान्युद्धे समाह्वयत्॥ ६ | हे राजन्! तब उन दैत्योंके ऐसा कहनेपर महाबली शत्रुओंको भी मार डालनेवाले प्रह्लादने उनका सेनाध्यक्ष बनकर देवताओंको युद्धके लिये ललकारा॥ ६॥ |
| तेऽपि तत्रासुरान्दृष्ट्वा संग्रामे समुपस्थितान्।<br>सर्वे सम्भृतसम्भारा देवास्तान्समयोधयन्॥ ७ | दैत्योंको समरांगणमें डटे हुए देखकर उन सभी देवताओंने भी अपनी पूरी तैयारी कर ली और वे उनके साथ युद्ध करने लगे॥ ७॥ |
| संग्रामस्तु तदा घोरः शक्रप्रह्लादयोरभूत्।<br>पूर्णं वर्षशतं तत्र मुनीनां विस्मयावहः॥ ८ | तदनन्तर इन्द्र और प्रह्लादका वह भीषण संग्राम पूरे सौ वर्षोंतक होता रहा। वह युद्ध मुनियोंको विस्मित कर देनेवाला था॥ ८॥ |
| वर्तमाने महायुद्धे शुक्रेण प्रतिपालिताः।<br>जयमापुस्तदा दैत्याः प्रह्लादप्रमुखा नृप॥ ९ | हे राजन्! शुक्राचार्यके द्वारा संरक्षित प्रह्लाद आदि प्रधान दैत्योंने उस हो रहे महायुद्धमें विजय प्राप्त की॥ ९॥ |
| तदैवेन्द्रो गुरोर्वाक्यात्सर्वदुःखविनाशिनीम्।<br>संस्मार मनसा देवीं मुक्तिदां परमां शिवाम्॥ १० | तब इन्द्रने गुरु बृहस्पतिके वचनानुसार सम्पूर्ण दुःखोंको दूर करनेवाली, मुक्ति देनेवाली तथा परम कल्याणस्वरूपिणी भगवतीका मन-ही-मन स्मरण किया॥ १०॥ |
| इन्द्र उवाच | इन्द्र बोले— |
| जय देवि महामाये शूलधारिणि चाम्बिके।<br>शङ्खचक्रगदापद्मखड्गहस्तेऽभयप्रदे ॥ ११ | हे महामाये! हे शूलधारिणि! हे अम्बिके! हे शंख, चक्र, गदा, पद्म तथा खड्गसे सुशोभित हाथोंवाली! हे अभय प्रदान करनेवाली! हे देवि! आपकी जय हो॥ ११॥ |
| नमस्ते भुवनेशानि शक्तिदर्शननायिके।<br>दशतत्त्वात्मिके मातर्महाबिन्दुस्वरूपिणि॥ १२ | हे भुवनेश्वरि! हे शक्ति! हे शाक्तादि छः दर्शनोंकी नायिकास्वरूपिणि! हे दस तत्त्वोंकी अधिष्ठातृदेवि! हे महाबिन्दुस्वरूपिणि! हे माता! आपको नमस्कार है॥ १२॥ |
| महाकुण्डलिनीरूपे सच्चिदानन्दरूपिणि।<br>प्राणाग्निहोत्रविद्ये ते नमो दीपशिखात्मिके॥ १३<br><br>पञ्चकोशान्तरगते पुच्छब्रह्मस्वरूपिणि।<br>आनन्दकलिके मातः सर्वोपनिषदर्चिते॥ १४ | हे महाकुण्डलिनीस्वरूपे! हे सच्चिदानन्दरूपिणि! हे प्राणाग्निहोत्रविद्ये! हे दीपशिखात्मिके! हे [अन्नमय, मनोमय, प्राणमय, विज्ञानमय, आनन्दमय] पंचकोशोंमें सदा विराजमान रहनेवाली! हे पुच्छब्रह्मस्वरूपिणि! हे आनन्दकलिके! सभी उपनिषदोंद्वारा स्तुत हे माता! आपको नमस्कार है॥ १३-१४॥ |
| मातः प्रसीद सुमुखि भव हीनसत्त्वां-<br>स्त्रायस्व नो जननि दैत्यपराजितान् वै।<br>त्वं देवि नः शरणदा भुवने प्रमाणा<br>शक्तासि दुःखशमनेऽखिलवीर्ययुक्ते॥ १५ | हे माता! आप हमपर प्रसन्न होनेकी कृपा करें और प्रफुल्लित मुखमण्डलवाली हो जायें। हे जननि! दैत्योंसे पराजित हम निर्बलोंकी रक्षा कीजिये। हे देवि! एकमात्र आप ही हमें शरण प्रदान करनेवाली हैं; आप संसारमें प्रमाणस्वरूपा हैं। हे समस्त पराक्रमोंसे युक्त भगवति! हमलोगोंका दुःख दूर करनेमें आप पूर्ण समर्थ हैं॥ १५॥ |
| अ० १५ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४७३ | | :--- | :--- |
| ध्यायन्ति येऽपि सुखिनो नितरां भवन्ति<br>दुःखान्विताविगतशोकभयास्तथान्ये ।<br>मोक्षार्थिनो विगतमानविमुक्तसङ्गाः<br>संसारवारिधिजलं प्रतरन्ति सन्तः ॥ १६ | जो भी आपका ध्यान करते हैं, वे परम सुखी हो जाते हैं; और [आपकी उपासना न करनेवाले] दूसरे लोग दुःखी तथा शोक और भयसे युक्त रहते हैं। मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले अहंकारशून्य तथा आसक्तिरहित संतलोग संसार-सागरके असीम जलको पार कर लेते हैं ॥ १६ ॥ | | त्वं देवि विश्वजननि प्रथितप्रभावा<br>संरक्षणार्थमुदितार्तिहरप्रतापा ।<br>संहर्तुमेतदखिलं किल कालरूपा<br>को वेत्ति तेऽम्ब चरितं ननु मन्दबुद्धिः ॥ १७ | हे देवि ! हे विश्वजननि ! आप विस्तृत प्रभाववाली हैं। भक्तोंकी रक्षाके लिये आप प्रकट हो जाती हैं। आप भक्तजनोंका दुःख दूर करनेमें समर्थप्रतापवाली हैं। इस सम्पूर्ण जगत्का संहार करनेके लिये आप कालस्वरूपिणी हैं। हे अम्ब ! कौन मन्दबुद्धि प्राणी आपका चरित्र जान सकता है ? ॥ १७ ॥ | | ब्रह्मा हरश्च हरिदश्वरथो हरिश्च<br>इन्द्रो यमोऽथ वरुणोऽग्निसमीरणौ च ।<br>ज्ञातुं क्षमा न मुनयोऽपि महानुभावा<br>यस्याः प्रभावमतुलं निगमागमाश्च ॥ १८ | ब्रह्मा, विष्णु, महेश, सूर्य, इन्द्र, यम, वरुण, अग्नि, वायु, निगम, आगम तथा महातपस्वी मुनिगण भी आपकी अनुपम महिमाको जाननेमें समर्थ नहीं हैं ॥ १८ ॥ | | धन्यास्त एव तव भक्तिपरा महान्तः<br>संसारदुःखरहिताः सुखसिन्धुमग्नाः ।<br>ये भक्तिभावरहिता न कदापि दुःखा-<br>म्भोधिं जनिष्यतरङ्गमुमे तरन्ति ॥ १९ | हे उमे ! जो आपकी भक्तिमें तत्पर हैं, वे ही परम धन्य हैं और सांसारिक दुःखोंसे मुक्त होकर सुखके समुद्रमें डूबे रहते हैं; किंतु जो लोग आपकी भक्तिभावनासे वंचित हैं, वे जन्म-मरणरूपी तरंगोंवाले दुःखमय भवसागरको कभी भी पार नहीं कर सकते ॥ १९ ॥ | | ये वीज्यमानाः सितचामरैश्च<br>क्रीडन्ति धन्याः शिबिकाधिरूढाः ।<br>तैः पूजिता त्वं किल पूर्वदेहे<br>नानोपहारैरिति चिन्तयामि ॥ २० | जिन भाग्यशाली लोगोंके ऊपर स्वच्छ चँवर डुलाये जा रहे हैं, जो हास-विलासका सुख भोग रहे हैं तथा जो सुन्दर यानोंपर सवारी कर रहे हैं—उनके विषयमें मैं तो यही सोचता हूँ कि उन्होंने पूर्वजन्ममें अनेकविध पूजनोपचारोंसे निश्चय ही आपकी पूजा की है ॥ २० ॥ | | ये पूज्यमाना वरवारणस्था<br>विलासिनीवृन्दविलासयुक्ताः ।<br>सामन्तैश्चोपनतैर्व्रजन्ति<br>मन्ये हि तैस्त्वं किल पूजितासि ॥ २१ | पूजित होते हुए जो लोग उत्तम हाथियोंपर विराजमान रहते हैं, जो रमणियोंके साथ आमोद-प्रमोदमें संलग्न हैं और जो विनम्र सामंतोंके साथ चलते हैं, मैं मानता हूँ कि उन्होंने अवश्य आपकी पूजा की है ॥ २१ ॥ | | व्यास उवाच<br>एवं स्तुता मघवता देवी विश्वेश्वरी तदा ।<br>प्रादुर्बभूव तरसा सिंहारूढा चतुर्भुजा ॥ २२<br>शङ्खचक्रगदापद्मानिबिभ्रती चारुलोचना ।<br>रक्ताम्बरधरा देवी दिव्यमाल्यविभूषणा ॥ २३ | **व्यासजी बोले—**तब इन्द्रके इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवती विश्वेश्वरी तुरंत प्रकट हो गयीं। उस समय वे सिंहपर बैठी हुई थीं; वे चार भुजाओंसे युक्त थीं; उन्होंने शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण कर रखा था; उनके नेत्र सुन्दर थे; वे लाल वस्त्र पहने हुए थीं और वे देवी दिव्य मालाओंसे विभूषित थीं ॥ २२-२३ ॥ |
| ४७४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १५ |
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| तानुवाच सुरान्देवी प्रसन्नवदना गिरा।<br>भयं त्यजन्तु भो देवाः शं विधास्ये किलाधुना ॥ २४ | प्रसन्न मुखमण्डलवाली भगवतीने उन देवताओंसे कहा—हे देवताओ! आपलोग भयका त्याग कर दें, अब मैं आपलोगोंका कल्याण अवश्य करूँगी ॥ २४ ॥ | | इत्युक्त्वा सा तदा देवी सिंहारूढातिसुन्दरी।<br>जगाम तरसा तत्र यत्र दैत्या मदान्विताः ॥ २५ | तब ऐसा कहकर सिंहपर सवार वे परम सुन्दर भगवती तुरंत वहाँ चल पड़ीं, जहाँ अभिमानी दानव विद्यमान थे ॥ २५ ॥ | | प्रह्लादप्रमुखाः सर्वे दृष्ट्वा देवीं पुरःस्थिताम्।<br>ऊचुः परस्परं भीताः किं कर्तव्यमितस्तदा ॥ २६ | प्रह्लाद आदि सभी प्रमुख दानव भगवतीको सामने स्थित देखकर भयभीत हो आपसमें कहने लगे कि अब हमें क्या करना चाहिये ? ॥ २६ ॥ | | देवं नारायणं चात्र सम्प्राप्ता चण्डिका किल।<br>महिषान्तकरी नूनं चण्डमुण्डविनाशिनी ॥ २७ | सम्भवतः यह चण्डिका भगवान् नारायणसे मिलकर यहाँ आयी है। इसीने महिषासुरका वध किया था तथा चण्ड-मुण्डका विनाश किया था। | | निहनिष्यति नः सर्वानम्बिका नात्र संशयः।<br>वक्रदृष्ट्या यया पूर्वं निहतौ मधुकैटभौ ॥ २८ | जिसने पूर्वकालमें अपनी वक्रदृष्टिसे मधु-कैटभका संहार कर डाला था, वह अम्बिका हम सबको अवश्य मार डालेगी ॥ २७-२८ ॥ | | एवं चिन्तातुरान्वीक्ष्य प्रह्लादस्तानुवाच ह।<br>योद्धव्यं नाथ गन्तव्यं पलाय्य दानवोत्तमाः ॥ २९ | इस प्रकार उन्हें चिन्तासे व्याकुल देखकर प्रह्लादने उनसे कहा—हे श्रेष्ठ दानवो! इस समय हमें युद्ध नहीं करना चाहिये, बल्कि भागकर यहाँसे चले जाना चाहिये ॥ २९ ॥ | | नमुचिस्तानुवाचाथ पलायनपरानिह।<br>हनिष्यति जगन्माता रुषिता किल हेतिभिः ॥ ३० | तब भागनेकी चेष्टा करनेवाले उन दैत्योंसे नमुचिने कहा—ये जगन्माता भगवती कुपित होकर शस्त्रोंसे हमलोगोंका संहार अवश्य कर देंगी। [इसके | | तथा कुरु महाभाग यथा दुःखं न जायते।<br>व्रजामोऽद्यैव पातालं तां स्तुत्वा तदनुज्ञया ॥ ३१ | बाद उसने प्रह्लादसे कहा—] हे महाभाग! आप ऐसा उपाय करें, जिससे हमलोगोंको दुःख न मिले। उन भगवतीकी स्तुति करके उनकी आज्ञासे हमलोग इसी क्षण पातालके लिये प्रस्थान कर दें ॥ ३०-३१ ॥ | | प्रह्लाद उवाच<br>स्तौमि देवीं महामायां सृष्टिस्थित्यन्तकारिणीम्।<br>सर्वेषां जननीं शक्तिं भक्तानामभयङ्करीम् ॥ ३२ | प्रह्लाद बोले—सृष्टि, पालन और संहार करनेवाली, सभी प्राणियोंकी माता तथा भक्तोंको अभय प्रदान करनेवाली शक्तिस्वरूपा भगवती महामायाकी मैं स्तुति करता हूँ ॥ ३२ ॥ | | व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वा विष्णुभक्तस्तु प्रह्लादः परमार्थवित्।<br>तुष्टाव जगतां धात्रीं कृताञ्जलिपुटस्तदा ॥ ३३ | व्यासजी बोले—ऐसा कहकर परमार्थवेत्ता विष्णुभक्त प्रह्लाद दोनों हाथ जोड़कर जगज्जननी भगवतीकी स्तुति करने लगे— ॥ ३३ ॥ | | मालासर्पवदाभाति यस्यां सर्वं चराचरम्।<br>सर्वाधिष्ठानरूपायै तस्यै ह्रींमूर्तये नमः ॥ ३४ | जिनमें यह सम्पूर्ण चराचर जगत् मालामें सर्पकी भाँति प्रतीत हो रहा है, सबकी अधिष्ठानस्वरूपा उन ‘ह्रीं’ मूर्तिधारिणी भगवतीको नमस्कार है ॥ ३४ ॥ |
अ० १५ ] चतुर्थ स्कन्ध ४७५
अ० १५ ] चतुर्थ स्कन्ध ४७५
| मूल श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| त्वत्तः सर्वमिदं विश्वं स्थावरं जङ्गमं तथा।<br>अन्ये निमित्तमात्रास्ते कर्तारस्तव निर्मिताः॥ ३५ | यह स्थावर-जंगमात्मक सम्पूर्ण विश्व आपसे ही उत्पन्न हुआ है। जो दूसरे कर्ता हैं, वे तो निमित्तमात्र हैं; क्योंकि वे भी आपके बनाये हुए हैं॥ ३५॥ |
| नमो देवि महामाये सर्वेषां जननी स्मृता।<br>को भेदस्तव देवेषु दैत्येषु स्वकृतेषु च॥ ३६ | हे देवि! आपको नमस्कार है। हे महामाये! आप सभी प्राणियोंकी जननी कही गयी हैं। स्वयं आपके ही द्वारा बनाये गये देवताओं और दैत्योंमें आपका यह कैसा भेदभाव !॥ ३६॥ |
| मातुः पुत्रेषु को भेदोऽप्यशुभेषु शुभेषु च।<br>तथैव देवेष्वस्मासु न कर्तव्यस्त्वयाधुना॥ ३७ | पुत्र अच्छे हों अथवा बुरे, उनमें माताका कैसा भेदभाव ? उसी प्रकार देवताओं और हम दैत्योंमें आपको इस समय भेदभाव नहीं करना चाहिये॥ ३७॥ |
| यादृशास्तादृशा मातः सुतास्ते दानवाः किल।<br>यतस्त्वं विश्वजननी पुराणेषु प्रकीर्तिता॥ ३८ | हे माता! दानव चाहे जिस किसी भी प्रकारके हों, किंतु वे आपके ही पुत्र हैं; क्योंकि आप पुराणोंमें विश्वजननी बतायी गयी हैं॥ ३८॥ |
| तेऽपि स्वार्थपरा नूनं यथैव वयमप्युत।<br>नान्तरं दैत्यसुरयोर्भेदोऽयं मोहसम्भवः॥ ३९ | वे देवता भी तो निश्चितरूपसे वैसे ही स्वार्थी हैं जैसे हम दैत्यगण। देवताओं और दैत्योंमें अन्तर नहीं है। यह भेद केवल मोहजनित है॥ ३९॥ |
| धनदारादिभोगेषु वयं सक्ता दिवानिशम्।<br>तथैव देवा देवेशि को भेदोऽसुरदेवयोः॥ ४० | जैसे हमलोग धन, स्त्री आदिके भोगोंमें दिन-रात आसक्त रहते हैं, वैसे ही देवता भी तो [विषय-भोगोंमें लीन] रहते हैं। अतः हे देवेश्वरि! असुरों और देवताओंमें भेद कैसा ?॥ ४०॥ |
| तेऽपि कश्यपदायादा वयं तत्सम्भवाः किल।<br>कुतो विरोधसम्भूतिर्जाता मातस्तवाधुना॥ ४१ | वे भी कश्यपजीकी संतान हैं और हम भी उन्हीं कश्यपजीसे उत्पन्न हुए हैं। हे माता! ऐसी स्थितिमें हमारे प्रति आपके मनमें यह विरोधभाव कैसे उत्पन्न हो गया ?॥ ४१॥ |
| न तथा विहितं मातस्त्वयि सर्वसमुद्भवे।<br>साम्यतैव त्वया स्थाप्या देवेष्वस्मासु चैव हि॥ ४२ | हे माता! जब सबकी उत्पत्तिमें आप ही मूल कारण हैं, तो इस प्रकार भेद करना आपके लिये उचित नहीं है। देवताओं तथा हम दैत्योंमें आपको समान व्यवहार रखना चाहिये॥ ४२॥ |
| गुणव्यतिकरात्सर्वे समुत्पन्नाः सुरासुराः।<br>गुणान्विता भवेयुस्ते कथं देहभृतोऽमराः॥ ४३ | गुणोंसे सम्बन्ध होनेके कारण ही सम्पूर्ण देवता तथा दैत्य उत्पन्न हुए हैं। तब गुणोंसे युक्त केवल वे देहधारी देवता ही आपके प्रिय क्यों हैं?॥ ४३॥ |
| कामः क्रोधश्च लोभश्च सर्वदेहेषु संस्थिताः।<br>वर्तन्ते सर्वदा तस्मात् कोऽविरोधी भवेज्जनः॥ ४४ | काम, क्रोध और लोभ सभी प्राणियोंके भीतर सदा विद्यमान रहते हैं। अतः कौन व्यक्ति विरोधभावसे शून्य रह सकता है?॥ ४४॥ |
| ४७६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १५ |
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| त्वया मिथो विरोधोऽयं कल्पितः किल कौतुकात् ।<br>मन्यामहे विभेदेन नूनं युद्धदिदृक्षया ॥ ४५<br><br>अन्यथा खलु भ्रातॄणां विरोधः कीदृशोऽनघे ।<br>त्वं चेनेच्छसि चामुण्डे वीक्षितुं कलहं किल ॥ ४६ | मैं तो समझता हूँ कि अपने विनोदके लिये आपने ही युद्ध देखनेकी इच्छासे निश्चय ही [हम दैत्यों तथा देवताओंके बीच] भेद उत्पन्न करके परस्पर यह विरोधभाव पैदा कर दिया है। अन्यथा हे अनघे! भाइयोंमें परस्पर विरोध कैसा ? हे चामुण्डे! यदि आप [दैत्यों तथा देवताओंमें] कलह देखना न चाहतीं तो यह विरोधभाव नहीं होता॥ ४५-४६॥ | | जानामि धर्मं धर्मज्ञे वेद्मि चाहं शतक्रतुम् ।<br>तथापि कलहोऽस्माकं भोगार्थं देवि सर्वदा ॥ ४७ | हे धर्मज्ञे! मैं धर्मको जानता हूँ और इन्द्रको भी भलीभाँति जानता हूँ, तथापि हे देवि! भोगके लिये हमलोगोंके बीच कलह सदासे होता रहा है॥ ४७॥ | | एकः कोऽपि न शास्तास्ति संसारे त्वां विनाम्बिके ।<br>स्पृहावतस्तु कः कर्तुं क्षमते वचनं बुधः ॥ ४८<br><br>देवासुरैरयं सिन्धुर्मथितः समये क्वचित् ।<br>विष्णुना विहितो भेदः सुधारत्नच्छलेन वै ॥ ४९ | हे अम्बिके! आपके अतिरिक्त संसारमें कोई भी एक शासक नहीं है। कौन बुद्धिमान् प्राणी किसी लोभीकी बातपर विश्वास करेगा ? किसी समयकी बात है देवताओं और असुरोंने मिलकर इस समुद्रका मन्थन किया। किंतु विष्णुने अमृतरत्नके विभाजनमें छलपूर्वक देवताओं और असुरोंमें भेदभाव किया॥ ४८-४९॥ | | त्वयासौ कल्पितः शौरिः पालकत्वे जगद्गुरुः ।<br>तेन लक्ष्मीः स्वयं लोभाद् गृहीतामरसुन्दरी ॥ ५० | आपने पालन-कार्यके लिये विष्णुको जगद्गुरु बनाया है, किंतु उन्होंने लोभवश दिव्य सुन्दरी लक्ष्मीको स्वयं अपना लिया॥ ५०॥ | | ऐरावतस्तथेन्द्रेण पारिजातोऽथ कामधुक् ।<br>उच्चैःश्रवाः सुरैः सर्वं गृहीतं वैष्णवेच्छया ॥ ५१ | उसी प्रकार विष्णुकी ही इच्छासे इन्द्रने ऐरावत हाथी, पारिजात, कामधेनु तथा उच्चैःश्रवा घोड़ेको ले लिया तथा अन्य देवताओंने शेष सब कुछ ग्रहण कर लिया॥ ५१॥ | | अनयं तादृशं कृत्वा जाता देवास्तु साधवः ।<br>(अन्यायिनः सुरा नूनं पश्य त्वं धर्मलक्षणम् ।)<br>संस्थापिताः सुरा नूनं विष्णुना बहुमानिना ॥ ५२<br><br>नूनं दैत्याः पराभूवन्पश्य त्वं धर्मलक्षणम् ।<br>क्व धर्मः कीदृशो धर्मः क्व कार्यं क्व च साधुता ॥ ५३ | इस प्रकारका अन्याय करके देवता साधु बन गये! (यदि आप धर्मका लक्षण देखें तो उससे ज्ञात हो जायगा कि देवता निश्चितरूपसे अन्यायी हैं।) महाभिमानी विष्णुने ऐसे अन्यायी देवताओंको उच्च स्थानोंपर प्रतिष्ठित किया। इसके विपरीत दैत्यगण पराभूत हुए; अब आप ही धर्मका लक्षण देख लीजिये। धर्म कहाँ है, धर्मका स्वरूप कैसा है, कैसा कार्य हुआ है और साधुता कहाँ है? ॥ ५२-५३॥ | | कथयामि च कस्याग्रे सिद्धं मैमांसिकं मतम् ।<br>तार्किका युक्तिवादज्ञा विधिज्ञा वेदवादकाः ॥ ५४ | अब मैं किसके आगे अपनी बात कहूँ? मीमांसक मत तो प्रसिद्ध ही है। [मीमांसक निरीश्वर-वादका समर्थन करते हैं] नैयायिक विद्वान् युक्तिवादके ज्ञाता और वैदिक विद्वान् विधिके ज्ञाता कहे गये हैं। |
| अ० १५ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४७७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| उक्ताः सकर्तृकं विश्वं विवदन्ते जडात्मकाः।<br>कर्ता भवति चेदस्मिन्संसारे वितते किल ॥ ५५<br><br>विरोधः कीदृशस्तत्र चैककर्मणि वै मिथः।<br>वेदे नैकमतिः कस्माच्छास्त्रेष्वपि तथा पुनः ॥ ५६<br><br>नैकवाक्यं वचस्तेषामपि वेदविदां पुनः।<br>यतः स्वार्थपरं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥ ५७<br><br>निःस्पृहः कोऽपि संसारे न भवेन्न भविष्यति। | कुछ लोग विश्वको सकर्तृक मानते हैं। [उनमें कुछ लोग विश्वका रचयिता ‘पुरुष’ को और कुछ लोग ‘प्रकृति’ को बताते हैं] जड़वादी लोग इससे विपरीत प्रकारकी बात करते हैं। यदि इस विस्तृत संसारमें कोई एक कर्ता होता तो एक ही कर्मके विषयमें लोगोंमें परस्पर विरोध कैसे होता ? वेदमें एक मत नहीं है और उसी प्रकार शास्त्रोंमें भी मतैक्य नहीं है। उन वेदविदोंके वचनमें भी एकवाक्यता नहीं है; क्योंकि यह समस्त स्थावर-जंगमात्मक जगत् ही स्वार्थपरायण है। संसारमें कोई भी न तो निःस्पृह हुआ है और न होगा॥ ५४—५७ १/२ ॥ |
| शशिनाथ गुरोर्भार्या हृता ज्ञात्वा बलादपि ॥ ५८<br><br>गौतमस्य तथेन्द्रेण जानता धर्मनिश्चयम्।<br>गुरुणानुजभार्या च भुक्ता गर्भवती बलात् ॥ ५९<br><br>शप्तो गर्भगतो बालः कृतश्चान्धस्तथा पुनः। | चन्द्रमाने जान-बूझकर अपने गुरु बृहस्पतिकी भार्याका बलपूर्वक हरण कर लिया। उसी प्रकार धर्मका निर्णय जानते हुए भी इन्द्रने महर्षि गौतमकी पत्नीके साथ अनाचार किया। देवगुरु बृहस्पतिने अपने छोटे भाईकी गर्भवती भार्याके साथ रमण किया और गर्भस्थ शिशुको शाप दे दिया तथा उसे अन्धा बना दिया॥ ५८-५९ १/२ ॥ |
| विष्णुना च शिरश्छिन्नं राहोश्चक्रेण वै बलात् ॥ ६०<br><br>अपराधं विना कामं तदा सत्त्ववताम्बिके।<br>पौत्रो धर्मवतां शूरः सत्यव्रतपरायणः ॥ ६१<br><br>यज्वा दानपतिः शान्तः सर्वज्ञः सर्वपूजकः।<br>कृत्वाथ वामनं रूपं हरिणा छलवेदिना ॥ ६२<br><br>वञ्चितोऽसौ बलिः सर्वं हृतं राज्यं पुरा किल।<br>तथापि देवान्धर्मस्थान्प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ६३<br><br>वदन्ति चाटुवादांश्च धर्मवादाञ्जयं गताः।<br>एवं ज्ञात्वा जगन्मातर्यथेच्छसि तथा कुरु ॥ ६४<br><br>शरणा दानवाः सर्वे जहि वा रक्ष वा पुनः। | हे अम्बिके! सत्त्व-सम्पन्न होते हुए भी विष्णुने बलपूर्वक सुदर्शनचक्रसे निरपराध राहुका सिर काट लिया। मेरा पौत्र बलि धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ, वीर, सत्यव्रतमें संलग्न रहनेवाला, यज्ञकर्ता, महादानी, शान्त, सर्वज्ञ तथा सबका सम्मान करनेवाला था। पूर्वकालमें कपटज्ञानी विष्णुने वामनका रूप धारण करके उस बलिके साथ भी छल किया और उसका सारा राज्य छीन लिया। फिर भी विद्वान् लोग देवताओंको धर्मनिष्ठ कहते हैं और चाटुकारितापूर्ण वचन बोलते हैं कि धर्मवादी होनेके कारण ही देवता विजयको प्राप्त हुए। हे जगज्जननि! यह सब सोच-समझकर आप जैसा चाहें, वैसा करें। सभी दानव आपकी शरणमें हैं, अब आप उनका संहार करें अथवा उनकी रक्षा करें॥ ६०—६४ १/२ ॥ |
| श्रीदेव्युवाच<br>सर्वे गच्छत पातालं तत्र वासं यथेप्सितम् ॥ ६५<br><br>कुरुध्वं दानवाः सर्वे निर्भया गतमन्यवः।<br>कालः प्रतीक्ष्यो युष्माभिः कारणं स शुभेऽशुभे ॥ ६६ | श्रीदेवी बोलीं— हे दानवो! तुम सबलोग पाताल चले जाओ और वहाँपर निर्भय तथा शोकरहित होकर इच्छानुसार निवास करो। अभी तुमलोगोंको समयकी प्रतीक्षा करनी चाहिये। वह काल ही अच्छे या बुरे कार्यमें कारण बनता है॥ ६५-६६॥ |
| ४७८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १६ |
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| सुनिर्वैदपराणां हि सुखं सर्वत्र सर्वदा।<br>त्रैलोक्यस्य च राज्येऽपि न सुखं लोभचेतसाम्॥ ६७<br><br>कृतेऽपि न सुखं पूर्णं सस्पृहाणां फलैरपि।<br>तस्मात्त्यक्त्वा महीमेतां प्रयान्त्वद्य महीतलम्॥ ६८<br><br>ममाज्ञां पुरतः कृत्वा सर्वे विगतकल्मषाः। | परम सन्तोषी लोगोंको सभी जगह सदा सुख-ही-सुख है, किंतु लोभयुक्त मनवाले लोगोंको तीनों लोकोंका राज्य मिल जानेपर भी सुख नहीं प्राप्त होता। सत्ययुगमें भी नानाविध भोगोंके रहते प्रबल कामनावाले लोगोंका सुख कभी पूरा नहीं हुआ। अतः सभी दैत्य मेरी आज्ञा मानकर इस पृथ्वीको छोड़कर अभी पातालमें चले जायँ और वहाँ निष्पाप होकर रहें॥ ६७-६८ १/२॥ |
| व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं देव्यास्तथेत्युक्त्वा रसातलं॥ ६९<br><br>प्रणम्य दानवाः सर्वे गताः शक्त्याभिरक्षिताः।<br>अन्तर्दधे ततो देवी देवाः स्वभुवनं गताः॥ ७०<br><br>त्यक्त्वा वैरं स्थिताः सर्वे ते तदा देवदानवाः। | व्यासजी बोले— भगवतीका यह वचन सुनकर सभी दानवोंने 'ठीक है'—ऐसा कहकर उन्हें प्रणाम किया और उनकी शक्तिसे रक्षित होकर वे वहाँसे चल पड़े। तत्पश्चात् भगवती अन्तर्धान हो गयीं और देवता अपने-अपने लोक चले गये। उस समय सभी देवता तथा दानव वैर-भाव छोड़कर रहने लगे॥ ६९-७० १/२॥ |
| एतदाख्यानमखिलं यः शृणोति वदत्यथ॥ ७१<br>सर्वदुःखविनिर्मुक्तः प्रयाति पदमुत्तमम्॥ ७२ | जो मनुष्य इस सम्पूर्ण कथानकको सुनता अथवा कहता है, वह सभी दुःखोंसे मुक्त होकर परमपद प्राप्त कर लेता है॥ ७१-७२॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे देवीकथनेन<br>दानवानां रसातलं प्रति गमनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः॥ १५॥
अथ षोडशोऽध्यायः
भगवान् श्रीहरिके विविध अवतारोंका संक्षिप्त वर्णन
</div>| जनमेजय उवाच<br>भृगुशापान्मुनिश्रेष्ठ हरेरद्भुतकर्मणः।<br>अवताराः कथं जाताः कस्मिन्मन्वन्तरे विभो॥ १<br><br>विस्तराद्वद धर्मज्ञ अवतारकथां हरेः।<br>पापनाशकरीं ब्रह्मञ्छ्रुतां सर्वसुखावहाम्॥ २ | जनमेजय बोले— हे मुनिश्रेष्ठ! हे विभो! अद्भुत चरित्रवाले भगवान् विष्णुने भृगुके शापसे किस मन्वन्तरमें किस प्रकार अवतार ग्रहण किये। हे धर्मज्ञ! हे ब्रह्मन्! श्रवण करनेपर समस्त सुख सुलभ करानेवाली तथा पापोंका नाश कर देनेवाली भगवान् विष्णुकी अवतार-कथाका विस्तारसे वर्णन कीजिये॥ १-२॥ |
| व्यास उवाच<br>शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि अवतारान् हरेर्यथा।<br>यस्मिन्मन्वन्तरे जाता युगे यस्मिन्नराधिप॥ ३<br><br>येन रूपेण यत्कार्यं कृतं नारायणेन वै।<br>तत्सर्वं नृप वक्ष्यामि संक्षेपेण तवाधुना॥ ४ | व्यासजी बोले— हे राजन्! हे नराधिप! जिस मन्वन्तर तथा जिस युगमें जैसे-जैसे भगवान् विष्णुके अवतार हुए हैं, उन अवतारोंको मैं बता रहा हूँ, आप सुनें। हे नृप! भगवान् नारायणने जिस रूपसे जो कार्य किया, वह सब मैं आपको इस समय संक्षेपमें बताता हूँ॥ ३-४॥ |
| धर्मस्यैवावतारोऽभूच्चाक्षुषे मनुसम्भवे।<br>नरनारायणौ धर्मपुत्रौ ख्यातौ महीतले॥ ५ | चाक्षुष मन्वन्तरमें साक्षात् विष्णुका धर्मावतार हुआ था। उस समय वे धर्मपुत्र होकर नर-नारायण नामसे धरातलपर विख्यात हुए॥ ५॥ |
| अ० १६ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४७९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अथ वैवस्वताख्येऽस्मिन्द्वितीये तु युगे पुनः।<br>दत्तात्रेयावतारोऽत्रेः पुत्रत्वमगमद्धरिः॥ ६ | इस वैवस्वत मन्वन्तरके दूसरे चतुर्युगमें भगवान्का दत्तात्रेयावतार हुआ। वे भगवान् श्रीहरि महर्षि अत्रिके पुत्ररूपमें अवतीर्ण हुए॥ ६॥ |
| ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्रस्त्रयोऽमी देवसत्तमाः।<br>पुत्रत्वमगमन्देवास्तस्यात्रेर्भार्यया वृताः॥ ७ | उन अत्रिमुनिकी भार्या अनसूयाकी प्रार्थनापर ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश—ये तीनों महान् देवता उनके पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए॥ ७॥ |
| अनसूयात्रिपत्नी च सतीनामुत्तमा सती।<br>यया सम्प्रार्थिता देवाः पुत्रत्वमगमंस्त्रयः॥ ८ | अत्रिकी पत्नी साध्वी अनसूया सती स्त्रियोंमें श्रेष्ठ थीं, जिनके सम्यक् रूपसे प्रार्थना करनेपर वे तीनों देवता उनके पुत्ररूपमें अवतरित हुए॥ ८॥ |
| ब्रह्माभूत्सोमरूपस्तु दत्तात्रेयो हरिः स्वयम्।<br>दुर्वासा रुद्ररूपोऽसौ पुत्रत्वं ते प्रपेदिरे॥ ९ | उनमें ब्रह्माजी सोम (चन्द्रमा)-रूपमें, साक्षात् विष्णु दत्तात्रेयके रूपमें और शंकरजी दुर्वासाके रूपमें उनके यहाँ पुत्रत्वको प्राप्त हुए॥ ९॥ |
| नृसिंहस्यावतारस्तु देवकार्यार्थसिद्धये।<br>चतुर्थे तु युगे जातो द्विधारूपो मनोहरः॥ १०<br><br>हिरण्यकशिपोः सम्यग्वधाय भगवान् हरिः।<br>चक्रे रूपं नारसिंहं देवानां विस्मयप्रदम्॥ ११ | देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये चौथे चतुर्युगमें दो प्रकारके रूपोंवाला मनोहर नृसिंहावतार हुआ। भगवान् श्रीविष्णुने उस समय हिरण्यकशिपुका सम्यक् वध करनेके लिये ही देवताओंको भी चकित कर देनेवाला नारसंहरूप धारण किया था॥ १०-११॥ |
| बलेर्नियमनार्थाय श्रेष्ठे त्रेतायुगे तथा।<br>चकार रूपं भगवान् वामनं कश्यपान्मुनेः॥ १२<br><br>छलयित्वा मखे भूपं राज्यं तस्य जहार ह।<br>पाताले स्थापयामास बलिं वामनरूपधृक्॥ १३ | भगवान् विष्णुने दैत्यराज बलिका शमन करनेके उद्देश्यसे उत्तम त्रेतायुगमें कश्यपमुनिके यहाँ वामनरूपसे अवतार धारण किया था। उन वामनरूपधारी विष्णुने यज्ञमें राजा बलिको छलकर उनका राज्य हर लिया और उन्हें पातालमें स्थापित कर दिया॥ १२-१३॥ |
| युगे चैकोनविंशेऽथ त्रेताख्ये भगवान् हरिः।<br>जमदग्निसुतो जातो रामो नाम महाबलः॥ १४ | उन्नीसवें चतुर्युगके त्रेता नामक युगमें भगवान् विष्णु महर्षि जमदग्निके परशुराम नामक महाबली पुत्रके रूपमें उत्पन्न हुए॥ १४॥ |
| क्षत्रियान्तकरः श्रीमान्सत्यवादी जितेन्द्रियः।<br>दत्तान्मेदिनीं कृत्स्नां कश्यपाय महात्मने॥ १५ | क्षत्रियोंका नाश कर डालनेवाले उन प्रतापी, सत्यवादी तथा जितेन्द्रिय परशुरामने सम्पूर्ण पृथ्वी [क्षत्रियोंसे छीनकर] महात्मा कश्यपको दे दी थी॥ १५॥ |
| यो वै परशुरामाख्यो हरेरद्भुतकर्मणः।<br>अवतारस्तु राजेन्द्र कथितः पापनाशनः॥ १६ | हे राजेन्द्र! मैंने अद्भुत कर्मवाले भगवान् विष्णुके पापनाशक 'परशुराम' नामक अवतारका यह वर्णन कर दिया॥ १६॥ |
| त्रेतायुगे रघोर्वंशे रामो दशरथात्मजः।<br>नरनारायणांशौ द्वौ जातौ भुवि महाबलौ॥ १७ | भगवान् विष्णुने त्रेतायुगमें रघुके वंशमें दशरथपुत्र रामके रूपमें अवतार धारण किया था। इसी प्रकार अट्ठाईसवें द्वापरयुगमें साक्षात् नर तथा नारायणके अंशसे कल्याणप्रद तथा महाबली अर्जुन |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे
| ४८० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १६ |
|---|
| अष्टाविंशे युगे शस्तौ द्वापरेऽर्जुनशौरिणौ।<br>धराभारावतारार्थं जातौ कृष्णार्जुनौ भुवि॥ १८<br><br>कृतवन्तौ महायुद्धं कुरुक्षेत्रेऽतिदारुणम्। | और श्रीकृष्ण पृथ्वीतलपर अवतीर्ण हुए। श्रीकृष्ण तथा अर्जुनने पृथ्वीका भार उतारनेके लिये ही भूमण्डलपर अवतार लिया और कुरुक्षेत्रमें अत्यन्त भयंकर महायुद्ध किया॥ १७-१८ १/२॥ | | एवं युगे युगे राजन्नवतारा हरेः किल॥ १९<br><br>भवन्ति बहवः कामं प्रकृतेरनुरूपतः।<br>प्रकृतेरखिलं सर्वं वशमेतज्जगत्त्रयम्॥ २०<br><br>यथेच्छति तथैवेयं भ्रामयत्यनिशं जगत्।<br>पुरुषस्य प्रियार्थं सा रचयत्यखिलं जगत्॥ २१ | हे राजन्! इस प्रकार प्रकृतिके आदेशानुसार युग-युगमें भगवान् विष्णुके अनेक अवतार हुआ करते हैं। यह सम्पूर्ण त्रिलोकी प्रकृतिके अधीन रहती है। ये भगवती प्रकृति जैसे चाहती हैं वैसे ही जगत्को निरन्तर नचाया करती हैं। परमपुरुषकी प्रसन्नताके लिये ही वे समस्त संसारकी रचना करती हैं॥ १९-२१॥ | | सृष्ट्वा पुरा हि भगवाञ्जगदेतच्चराचरम्।<br>सर्वादिः सर्वगश्चासौ दुर्ज्ञेयः परमोऽव्ययः॥ २२<br><br>निरालम्बो निराकारो निःस्पृहश्च परात्परः।<br>उपाधितस्त्रिधा भाति यस्याः सा प्रकृतिः परा॥ २३ | प्राचीनकालमें इस चराचर जगत्का सृजन करके सबके आदिरूप, सर्वत्र गमन करनेवाले, दुर्ज्ञेय, महान्, अविनाशी, स्वतन्त्र, निराकार, निःस्पृह और परात्पर वे भगवान् जिन मायारूपिणी भगवतीके संयोगसे उपाधिरूपमें [ब्रह्मा, विष्णु, महेश] तीन प्रकारके प्रतीत होते हैं, वे ही ‘परा प्रकृति’ हैं॥ २२-२३॥ | | उत्पत्तिकालयोगात्सा भिन्ना भाति शिवा तदा।<br>सा विश्वं कुरुते कामं सा पालयति कामदा॥ २४<br><br>कल्पान्ते संहरत्येव त्रिरूपा विश्वमोहिनी।<br>तया युक्तोऽसृजद् ब्रह्मा विष्णुः पाति तयान्वितः॥ २५<br><br>रुद्रः संहरते कामं तया सम्मिलितः शिवः। | उत्पत्ति और कालके योगसे ही वे कल्याणमयी प्रकृति उस परमात्मासे भिन्न भासती हैं। सबका मनोरथ पूर्ण करनेवाली वे प्रकृति ही विश्वकी रचना करती हैं, सम्यक् रूपसे पालन करती हैं और कल्पके अन्तमें संहार भी कर देती हैं। इस प्रकार वे विश्वमोहिनी भगवती प्रकृति ही तीन रूपोंमें विराजमान रहती हैं। उन्हींसे संयुक्त होकर ब्रह्माने जगत्की सृष्टि की है, उन्हींसे सम्बद्ध होकर विष्णु पालन करते हैं और उन्हींके साथ मिलकर कल्याणकारी रुद्र संहार करते हैं॥ २४-२५ १/२॥ | | सा चैवोत्पाद्य काकुत्स्थं पुरा वै नृपसत्तमम्॥ २६<br><br>कुत्रचित्स्थापयामास दानवानां जयाय च।<br>एवमस्मिंश्च संसारे सुखदुःखान्विताः किल॥ २७<br><br>भवन्ति प्राणिनः सर्वे विधितन्त्रनियन्त्रिताः॥ २८ | पूर्वकालमें उन भगवती परा प्रकृतिने ही ककुत्स्थवंशी नृपश्रेष्ठको उत्पन्न करके दानवोंको पराजित करनेके लिये उन्हें कहींपर स्थापित कर दिया। इस प्रकार इस संसारमें सभी प्राणी विधिके नियमोंमें बँधकर सदा सुख तथा दुःखसे युक्त रहते हैं॥ २६-२८॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे
हरेर्नानावतारवर्णनं नाम षोडशोऽध्यायः॥ १६॥
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अ० १७ ] चतुर्थ स्कन्ध ४८१
अथ सप्तदशोऽध्यायः
श्रीनारायणद्वारा अप्सराओंको वरदान देना, राजा जनमेजयद्वारा व्यासजीसे श्रीकृष्णावतारका चरित सुनानेका निवेदन करना
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| जनमेजय उवाच<br>वाराङ्गनास्त्वयाख्याता नरनारायणाश्रमे।<br>एकं नारायणं शान्तं कामयानाः स्मरातुराः॥ १<br>शप्तुकामस्तदा जातो मुनिर्नारायणश्च ताः।<br>निवारितो नरेणाथ भ्रात्रा धर्मविदा नृप॥ २ | **जनमेजय बोले—**हे मुने! आप नर-नारायणके आश्रममें आयी हुई अप्सराओंकी चर्चा पहले ही कर चुके हैं, जो काम-पीड़ित होकर शान्तचित्त मुनि नारायणपर आसक्त हो गयी थीं। उसके बाद मुनि नारायण उन्हें शाप देनेको उद्यत हो गये। इसपर उनके भाई धर्मवेत्ता नरने उन्हें ऐसा करनेसे रोक दिया था॥ १-२॥ |
| किं कृतं मुनिना तेन व्यसने समुपस्थिते।<br>ताभिः संकल्पितेनाथ कामार्थाभिर्भृशं मुने॥ ३<br>शक्रेणोत्पादिताभिश्च बहुप्रार्थनया पुनः।<br>याचितेन विवाहार्थं किं कृतं तेन जिष्णुना॥ ४<br>इत्येतच्छ्रोतुमिच्छामि चरितं तस्य मोक्षदम्।<br>नारायणस्य मे ब्रूहि विस्तरेण पितामह॥ ५ | हे मुने! अत्यन्त कामासक्त उन अप्सराओं के द्वारा [अपने मनमें पतिरूपमें] संकल्पित किये गये उन मुनि नारायणने इस विषम संकटके उपस्थित होनेपर क्या किया? इन्द्रके द्वारा प्रेषित उन वारांगनाओंके बार-बार बहुत प्रार्थना करके विवाहके लिये याचित उन भगवान् नारायणमुनिने क्या किया? हे पितामह! मैं उन नारायणमुनिका यह मोक्षदायक चरित्र सुनना चाहता हूँ; विस्तारके साथ मुझे बतायें॥ ३-५॥ |
| व्यास उवाच<br>शृणु राजन्प्रवक्ष्यामि यथा तस्य महात्मनः।<br>धर्मपुत्रस्य धर्मज्ञ विस्तरेण वदामि ते॥ ६ | **व्यासजी बोले—**हे राजन्! सुनिये, मैं बताऊँगा। हे धर्मज्ञ! उन महात्मा धर्मपुत्र नारायणका चरित्र विस्तारपूर्वक मैं आपको बता रहा हूँ॥ ६॥ |
| शप्तुकामस्तु संदृष्टो नरेणाथ यदा हरिः।<br>वारितोऽसौ समाश्वास्य मुनिर्नारायणस्तदा॥ ७ | जब नरने मुनि नारायणको शाप देनेके लिये उद्यत देखा तब उन्होंने नारायणको आश्वासन देकर [वैसा करनेसे] रोक दिया॥ ७॥ |
| शान्तकोपस्तदोवाच तास्तपस्वी महामुनिः।<br>स्मितपूर्वमिदं वाक्यं मधुरं धर्मनन्दनः॥ ८ | तत्पश्चात् क्रोधके शान्त हो जानेपर महामुनि तपस्वी धर्मपुत्र नारायण उन अप्सराओंसे मन्द-मन्द मुसकराते हुए यह मधुर वचन कहने लगे—॥ ८॥ |
| अस्मिञ्जन्मनि चार्वङ्ग्यः कृतसंकल्पवानहम्।<br>आवाभ्याञ्च न कर्तव्यः सर्वथा दारसंग्रहः॥ ९<br>तस्माद् गच्छन्तु त्रिदिवं कृपां कृत्वा ममोपरि।<br>धर्मज्ञा न प्रकुर्वन्ति व्रतभङ्गं परस्य वै॥ १० | हे सुन्दरियो! हमने इस जन्ममें संकल्प कर रखा है कि हम दोनों कभी भी विवाह नहीं करेंगे। अतः मेरे ऊपर कृपा करके आपलोग स्वर्ग लौट जायँ। धर्मज्ञ लोग दूसरेका व्रत भंग नहीं करते॥ ९-१०॥ |
| शृङ्गारेऽस्मिन् रसे नूनं स्थायीभावो रतिः स्मृतः।<br>कथं करोमि सम्बन्धं तदभावे सुलोचनाः॥ ११ | हे सुन्दर नेत्रोंवाली! इस शृंगार-रसमें रतिको ही स्थायी भाव कहा गया है। अतः [ब्रह्मचर्यव्रत धारण करनेके कारण] उसके अभावमें मैं सम्बन्ध कैसे कर सकता हूँ?॥ ११॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 16 A
४८२ श्रीमद्देवीभागवत [अ० १७]
४८२ श्रीमद्देवीभागवत [अ० १७]
| कारणेन विना कार्यं न भवेदिति निश्चयः।<br>कविभिः कथितं शास्त्रे स्थायीभावो रसः किल॥ १२ | कारणके बिना कार्य नहीं हो सकता है—यह सुनिश्चित है। कवियोंने शास्त्रमें कहा है कि स्थायीभाव ही रसस्वरूप है॥ १२॥ |
| धन्यः सुचारुसर्वाङ्गः सभाग्योऽहं धरातले।<br>प्रीतिपात्रं यतो जातो भवतीनामकृत्रिमम्॥ १३ | समस्त सुन्दर अंगोंवाला मैं इस धरातलपर धन्य तथा सौभाग्यशाली हूँ जो कि आपलोगोंका स्वाभाविक प्रीतिपात्र बन सका॥ १३॥ |
| भवतीभिः कृपां कृत्वा रक्षणीयं व्रतं मम।<br>भविष्यामि महाभागाः पतिरप्यन्यजन्मनि॥ १४ | हे महाभागाओ! आपलोग कृपा करके मेरे व्रतकी रक्षा करें। मैं दूसरे जन्ममें आपलोगोंका पति अवश्य बनूँगा॥ १४॥ |
| अष्टाविंशे विशालाक्ष्यो द्वापरेऽस्मिन्धरातले।<br>देवानां कार्यसिद्धयर्थं प्रभविष्यामि सर्वथा॥ १५ | हे विशाल नेत्रोंवाली सुन्दरियो! देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये मैं अट्ठाईसवें द्वापरमें इस धरातलपर निश्चितरूपसे अवतरित होऊँगा॥ १५॥ |
| तदा भवत्यो मद्भााः प्राप्य जन्म पृथक्पृथक्।<br>भूपतीनां सुता भूत्वा पत्नीभावं गमिष्यथ॥ १६ | उस समय आपलोग भी राजाओंकी कन्याएँ होकर पृथक्-पृथक् जन्म ग्रहण करेंगी और मेरी भार्याएँ बनकर पत्नी-भावको प्राप्त होंगी॥ १६॥ |
| इत्याश्वास्य हरिस्तास्तु प्रतिश्रुत्य परिग्रहम्।<br>व्यसर्जयत्स भगवाञ्जग्मुश्च विगतज्वराः॥ १७ | पाणिग्रहणका ऐसा आश्वासन देकर भगवान् नारायण-मुनिने उन्हें विदा किया और वे अप्सराएँ भी कामव्यथासे रहित होकर वहाँसे चली गयीं॥ १७॥ |
| एवं विसर्जितास्तेन गताः स्वर्गं तदाङ्गनाः।<br>शक्राय कथयामासुः कारणं सकलं पुनः॥ १८ | इस प्रकार उनसे विदा पाकर वे अप्सराएँ स्वर्ग पहुँचीं और फिर उन्होंने इन्द्रको सारा वृत्तान्त बता दिया॥ १८॥ |
| आश्रुत्य मधवांस्ताभ्यो वृत्तान्तं तस्य विस्तरात्।<br>तुष्टाव तं महात्मानं नारीर्दृष्ट्वा तथोर्वशीः॥ १९ | तदनन्तर उन अप्सराओंसे नारायणमुनिका वृत्तान्त विस्तारपूर्वक सुनकर तथा साथमें आयी उर्वशी आदि नारियोंको देखकर इन्द्र उन महात्मा नारायणकी प्रशंसा करने लगे॥ १९॥ |
| इन्द्र उवाच<br>अहो धैर्यं मुनेः कामं तथैव च तपोबलम्।<br>येनोर्वश्यः स्वतपसा तादृग्रूपाः प्रकल्पिताः॥ २० | **इन्द्र बोले—**अहो, उन मुनिका ऐसा अपार धैर्य तथा तपोबल है, जिन्होंने अपने तपके प्रभावसे उन्हीं अप्सराओंके सदृश रूपवाली अन्य उर्वशी आदि अप्सराएँ उत्पन्न कर दीं। नारायणमुनिकी यह प्रशंसा करके देवराज इन्द्रका मन प्रसन्नतासे परिपूर्ण हो गया। उधर, धर्मात्मा नारायण भी तपस्यामें संलग्न हो गये॥ २०-२१॥ |
| इति स्तुत्वा प्रसन्नात्मा बभूव सुरराट् ततः।<br>नारायणोऽपि धर्मात्मा तपस्यभिरतोऽभवत्॥ २१ | |
| इत्येतत्सर्वमाख्यातं मुनेर्वृत्तान्तमद्भुतम्।<br>नारायणस्य सकलं नरस्य च महामुनेः॥ २२ | [हे राजन्!] इस प्रकार मैंने आपसे मुनि नारायण और महामुनि नरके सम्पूर्ण अद्भुत वृत्तान्तका वर्णन कर दिया॥ २२॥ |
| तौ हि कृष्णार्जुनौ वीरौ भूभारहरणाय च।<br>जातौ तौ भरतश्रेष्ठ भृगोः शापवशादिह॥ २३ | हे भरतश्रेष्ठ! वे ही नर-नारायण भृगुके शापवश पृथ्वीका भार उतारनेके लिये इस लोकमें पराक्रमी कृष्ण तथा अर्जुनके रूपमें अवतरित हुए थे॥ २३॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [प्रथम खण्ड]—16 B
अ० १७] चतुर्थ स्कन्ध ४८३
| राजोवाच | राजा बोले— |
|---|---|
| कृष्णावतारचरितं विस्तरेण वदस्व मे।<br>सन्देहो मम चित्तेऽस्ति तं निवारय मानद॥ २४ | हे मानद! अब आप कृष्णावतारकी कथा विस्तारके साथ मुझसे कहिये और मेरे मनमें जो सन्देह है, उसका निवारण कीजिये॥ २४॥ |
| ययोः पुत्रत्वमापन्नौ हर्यनन्तौ महाबलौ।<br>देवकीवसुदेवौ तौ दुःखभाजौ कथं मुने॥ २५ | हे मुने! महाबली श्रीकृष्ण और बलराम जिनके पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए, उन वसुदेव और देवकीको दुःखका भागी क्यों होना पड़ा?॥ २५॥ |
| कंसेन निगडे बद्धौ पीडितौ बहुवत्सरान्।<br>ययोः पुत्रो हरिः साक्षात्तपसा तोषितोऽभवत्॥ २६ | जिनकी तपस्यासे सन्तुष्ट होकर साक्षात् भगवान् श्रीहरि उनके पुत्र बने थे, वे ही [वसुदेव और देवकी] बेड़ियोंमें बद्ध होकर कंसके द्वारा बहुत वर्षोंतक क्यों सताये गये?॥ २६॥ |
| जातोऽसौ मथुरायां तु गोकुले स कथं गतः।<br>कंसं हत्वा द्वारवत्यां निवासं कृतवान्कथम्॥ २७<br><br>पित्रादिसेवितं देशं समृद्धं पावनं किल।<br>त्यक्त्वा देशान्तरेऽनार्ये गतवान्स कथं हरिः॥ २८ | वे श्रीकृष्ण उत्पन्न तो मथुरामें हुए, किंतु गोकुल क्यों ले जाये गये? बादमें कंसका वध करके उन्होंने द्वारकामें निवास क्यों किया? अपने पिता आदिके द्वारा सेवित, समृद्धिसम्पन्न तथा पवित्र स्थानको छोड़कर वे भगवान् श्रीकृष्ण दूसरे अनार्य देशमें क्यों चले गये?॥ २७-२८॥ |
| कुलञ्च द्विजशापेन कथमुत्सादितं हरेः।<br>भारावतारणं कृत्वा वासुदेवः सनातनः॥ २९<br><br>देहं मुमोच तरसा जगाम च दिवं हरिः।<br>पापिष्ठानाञ्च भारेण व्याकुलाभूच्च मेदिनी॥ ३०<br><br>ते हता वासुदेवेन पार्थेनामितकर्मणा।<br>लुण्ठिता यैर्हरेः पत्न्यस्ते कथं न निपातिताः॥ ३१ | एक ब्राह्मणके शापसे भगवान् श्रीकृष्णके वंशका नाश क्यों हो गया? पृथ्वीका भार उतारकर उन सनातन भगवान् श्रीकृष्णने तुरंत देहत्याग कर दिया और वे स्वर्ग चले गये। जिन पापियोंके भारसे पृथ्वी व्याकुल हो उठी थी, उन्हें तो अमित कर्मोंवाले भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनने मार डाला था, किंतु जिन चोरोंने भगवान् श्रीकृष्णकी पत्नियोंका अपहरण कर लिया था, उन्हें वे क्यों नहीं मार सके?॥ २९—३१॥ |
| भीष्मो द्रोणस्तथा कर्णो बाह्लीकोऽप्यथ पार्थिवः।<br>वैराटोऽथ विकर्णश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्थिवः॥ ३२<br><br>सोमदत्तादयः सर्वे निहताः समरे नृपाः।<br>तेषामुत्तारितो भारश्चौराणां न हतः कथम्॥ ३३<br><br>कृष्णपत्न्यः कथं दुःखं प्राप्ताः प्रान्ते पतिव्रताः।<br>सन्देहोऽयं मुनिश्रेष्ठ चित्ते मे परिवर्तते॥ ३४ | भीष्म, द्रोण, कर्ण, राजा बाह्लीक, वैराट, विकर्ण, राजा धृष्टद्युम्न, सोमदत्त आदि सभी राजागण युद्धमें मार डाले गये। भगवान् श्रीकृष्णने उनका भार तो पृथ्वीपरसे उतार दिया, किंतु वे चोरोंका भार क्यों नहीं मिटा सके? कृष्णकी पतिव्रता पत्नियोंको निर्जन स्थानमें इस प्रकारका दुःख क्यों मिला? हे मुनिश्रेष्ठ! मेरे मनमें यह संदेह बार-बार हो रहा है॥ ३२—३४॥ |
| वसुदेवस्तु धर्मात्मा पुत्रदुःखेन तापितः।<br>त्यक्तवान्स कथं प्राणानपमृत्युं जगाम ह॥ ३५ | धर्मात्मा वसुदेवने पुत्रशोकसे सन्तप्त होकर अपने प्राण त्याग दिये; इस प्रकार वे अकालमृत्युको क्यों प्राप्त हुए?॥ ३५॥ |
| पाण्डवा धर्मसंयुक्ताः कृष्णे च निरताः सदा।<br>ते कथं दुःखभोक्तारो ह्यभवन्मुनिसत्तम॥ ३६ | हे मुनिवर! पाण्डव धर्मनिष्ठ थे और भगवान् कृष्णमें सदा तल्लीन रहते थे; फिर भी उन्हें दुःख क्यों भोगना पड़ा?॥ ३६॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 16 C