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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
४८४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १७

| द्रौपदी च महाभागा कथं दुःखस्य भागिनी।<br>वेदीमध्याच्च सञ्जाता लक्ष्म्यंशसम्भवा किल॥ ३७<br><br>सभायां सा समानीता रजोदोषसमन्विता।<br>बाला दुःशासनेनाथ केशग्रहणकर्शिता॥ ३८<br><br>पीडिता सिन्धुराज्ञाथ वनमध्यगता सती।<br>तथैव कीचकेनापि पीडिता रुदती भृशम्॥ ३९<br><br>पुत्राः पञ्चैव तस्यास्तु निहता द्रौणिना गृहे।<br>सुभद्रायाः सुतो युद्धे बाल एव निपातितः॥ ४०<br><br>तथा च देवकीपुत्रा षट् कंसेन निष्पिषिताः।<br>समर्थेनापि हरिणा दैवं न कृतमन्यथा॥ ४१ | महाभागा द्रौपदीको दुःख क्यों सहने पड़े ? वह तो साक्षात् लक्ष्मीके अंशसे उत्पन्न थी और वेदीके मध्यसे प्रकट हुई थी। रजोधर्मसे युक्त उस युवती द्रौपदीको उसके बाल पकड़कर घसीटते हुए दुःशासन सभामें ले आया था। वनमें गयी हुई उस पतिव्रताको सिन्धुराज जयद्रथने सताया, उसी प्रकार [अज्ञातवासके समय] कीचकने भी रोती-कलपती उस द्रौपदीको बहुत पीड़ा पहुँचायी। अश्वत्थामाने घरके अन्दर ही उसके पाँच पुत्रोंको मार डाला। सुभद्रापुत्र अभिमन्यु बाल्यावस्थामें ही युद्धमें मार डाला गया। उसी प्रकार कंसने देवकीके छः पुत्रोंका वध कर दिया। किंतु [सब कुछ करनेमें] समर्थ होते हुए भी भगवान् श्रीकृष्ण प्रारब्धको नहीं टाल सके॥ ३७-४१॥ | | यादवानां तथा शापः प्रभासे निधनं पुनः।<br>कुलक्षयस्तथा तीव्रस्तत्पत्नीनाञ्च लुण्ठनम्॥ ४२<br><br>विष्णुना चेश्वरेणापि साक्षान्नारायणेन च।<br>उग्रसेनस्य सेवा वै दासवत्सततं कृता॥ ४३<br><br>सन्देहोऽयं महाभाग तत्र नारायणे मुनौ।<br>सर्वजन्तुसमानत्वं व्यवहारे निरन्तरम्॥ ४४ | यादवोंको शाप मिला और इसके बाद प्रभास-क्षेत्रमें उनका निधन हो गया। इस प्रकार भयंकर कुलनाश हो गया और अन्तमें उनकी पत्नियोंका हरण भी हो गया। भगवान् कृष्ण स्वयं नारायण, ईश्वर और विष्णु थे; फिर भी उन्होंने दासकी भाँति उग्रसेनकी सदा सेवा की। हे महाभाग! मुनि नारायणके विषयमें मुझे यह सन्देह है कि आचार-व्यवहारमें वे सदा साधारण प्राणियोंके समान ही रहते थे॥ ४२-४४॥ | | हर्षशोकादयो भावाः सर्वेषां सदृशाः कथम्।<br>ईश्वरस्य हरेर्जाता कथमप्यन्यथा गतिः॥ ४५ | सभी प्राणियोंके समान हर्ष-शोकादि भाव उनमें भी क्यों थे ? उन भगवान् श्रीकृष्णकी भी यह अन्यथा गति क्यों हुई?॥ ४५॥ | | तस्माद्विस्तरतो ब्रूहि कृष्णस्य चरितं महत्।<br>अलौकिकेन हरिणा कृतं कर्म महीतले॥ ४६ | अतः आप श्रीकृष्णके महान् चरित्रका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये और उन लोकोत्तर भगवान्‌के द्वारा पृथ्वीतलपर किये गये कर्मोंको भी बताइये॥ ४६॥ | | हता आयुःक्षये दैत्याः क्लेशेन महता पुनः।<br>क्वैश्वर्यशक्तिः प्रथिता हरिणा मुनिसत्तम॥ ४७ | हे मुनिश्रेष्ठ! भगवान् श्रीकृष्ण दैत्योंकी आयु समाप्त होनेपर भी बड़े कष्टसे उन्हें मार पाये। उस समय उनकी विख्यात ईश्वरीय शक्ति कहाँ थी?॥ ४७॥ | | रुक्मिणीहरणे नूनं गृहीत्वाथ पलायनम्।<br>कृतं हि वासुदेवेन चौरवच्चरितं तदा॥ ४८ | रुक्मिणीहरणके समय वे वासुदेव श्रीकृष्ण उसे लेकर भाग गये थे। उस समय तो उन्होंने चौर-तुल्य आचरण किया था॥ ४८॥ | | मथुरामण्डलं त्यक्त्वा समृद्धं कुलसम्मतम्।<br>जरासन्धभयात्तेन द्वारकागमनं कृतम्॥ ४९ | समृद्धिशाली तथा अपने पूर्वजोंके द्वारा प्रतिष्ठित किये गये मथुरामण्डलको छोड़कर वे श्रीकृष्ण जरासन्धके |

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 16 D

अ० १८ ]चतुर्थ स्कन्ध४८५
तदा केनापि न ज्ञातो भगवान्हरिरीश्वरः।<br>किञ्चित्प्रब्रूहि मे ब्रह्मन् कारणं व्रजगोपनम्॥ ५०भयसे द्वारका चले गये थे। उस समय कोई भी नहीं जान सका कि ये श्रीकृष्ण ही भगवान् विष्णु हैं। हे ब्रह्मन्! [श्रीकृष्णके द्वारा अपनेको] व्रजमें छिपाये रखनेका कुछ कारण आप मुझे बताइये॥ ४९-५०॥
एते चान्ये च बहवः सन्देहा वासविसुत।<br>नाशयाद्य महाभाग सर्वज्ञोऽसि द्विजोत्तम॥ ५१हे सत्यवतीनन्दन! ये तथा और भी दूसरे बहुत-से सन्देह हैं। हे महाभाग! हे द्विजवर! आप सर्वज्ञ हैं, अतः आज आप उन्हें दूर कर दीजिये॥ ५१॥
गोप्यस्तथैकः सन्देहो हृदयान्न निवर्तते।<br>पाञ्चाल्याः पञ्चभर्तृत्वं लोके किं न जुगुप्सितम्॥ ५२एक और गोपनीय सन्देह है जो मेरे मनसे नहीं निकल पा रहा है। क्या द्रौपदीके पाँच पतियोंका होना लोकमें निन्दनीय नहीं है? विद्वज्जन तो सदाचारको ही प्रमाण मानते हैं; तब समर्थ होकर भी उन पाण्डवोंने पशु-धर्म क्यों स्वीकार किया?॥ ५२-५३॥
सदाचारं प्रमाणं हि प्रवदन्ति मनीषिणः।<br>पशुधर्मः कथं तैस्तु समर्थैरपि संश्रितः॥ ५३
भीष्मेणापि कृतं किं वा देवरूपेण भूतले।<br>गोलकौ तौ समुत्पाद्य यत्तु वंशस्य रक्षणम्॥ ५४देवतास्वरूप भीष्मपितामहने भी भूतलपर दो गोलक सन्तानें उत्पन्न कराकर अपने वंशकी जो रक्षा की, क्या यह उचित है? मुनियोंके द्वारा जो धर्मनिर्णय प्रदर्शित किया गया है कि जिस किसी भी उपायसे पुत्रोत्पत्ति करनी चाहिये, उसे धिक्कार है!॥ ५४-५५॥
धिग्धर्मनिर्णयः कामं मुनिभिः परिदर्शितः।<br>येन केनाप्युपायेन पुत्रोत्पादनलक्षणः॥ ५५
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इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्रयां संहितायां चतुर्थस्कन्धे सुराङ्गनानां प्रति नारायणवरदानं नाम सप्तदशोऽध्यायः॥ १७॥
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अथाष्टादशोऽध्यायः

पापभारसे व्यथित पृथ्वीका देवलोक जाना, इन्द्रका देवताओं और पृथ्वीके साथ ब्रह्मलोक जाना, ब्रह्माजीका पृथ्वी तथा इन्द्रादि देवताओंसहित विष्णुलोक जाकर विष्णुकी स्तुति करना, विष्णुद्वारा अपनेको भगवतीके अधीन बताना

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व्यास उवाच<br>शृणु राजन्प्रवक्ष्यामि कृष्णस्य चरितं महत्।<br>अवतारकारणं चैव देव्याश्चरितमद्भुतम्॥ १व्यासजी बोले—हे राजन्! सुनिये, अब मैं श्रीकृष्णके महान् चरित्र, उनके अवतारके कारण और भगवतीके अद्भुत चरित्रका वर्णन करूँगा॥ १॥
ध्रैरकदा भराक्रान्ता रुदती चातिकर्शिता।<br>गोरूपधारिणी दीना भीतागच्छत्त्रिविष्टपम्॥ २एक समयकी बात है—[पापियोंके] भारसे व्यथित, अत्यधिक कृश, दीन तथा भयभीत पृथ्वी गौका रूप धारण करके रोती हुई स्वर्गलोक गयी॥ २॥
पृष्टा शक्रेण किं तेऽद्य वर्तते भयमित्यथ।<br>केन वै पीडितासि त्वं किं ते दुःखं वसुन्धरे॥ ३वहाँ इन्द्रने पूछा—हे वसुन्धरे! इस समय तुम्हें कौन-सा भय है, तुम्हें किसने पीड़ा पहुँचायी है और तुम्हें क्या दुःख है?॥ ३॥
तच्छ्रुत्वेला तदोवाच शृणु देवेश मेऽखिलम्।<br>दुःखं पृच्छसि यत्त्वं मे भाराक्रान्तोऽस्मि मानद॥ ४यह सुनकर पृथ्वीने कहा—हे देवेश! यदि आप पूछ ही रहे हैं तो मेरा सारा दुःख सुन लीजिये। हे मानद! मैं भारसे दबी हुई हूँ॥ ४॥

४८६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १८

४८६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १८

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
जरासन्धो महापापी मागधेषु पतिर्मम।<br>शिशुपालस्तथा चैद्यः काशिराजः प्रतापवान्॥ ५<br><br>रूक्मी च बलवान्कंसो नरकश्च महाबलः।<br>शाल्वः सौभपतिः क्रूरः केशी धेनुकवत्सकौ॥ ६<br><br>सर्वे धर्मविहीनाश्च परस्परविरोधिनः।<br>पापाचारा मदोन्मत्ताः कालरूपाश्च पार्थिवाः॥ ७मगधदेशका राजा महापापी जरासन्ध, चेदिनरेश शिशुपाल, प्रतापी काशिराज, रुक्मी, बलवान् कंस, महाबली नरकासुर, सौभनरेश शाल्व, क्रूर केशी, धेनुकासुर और वत्सासुर—ये सभी राजागण धर्महीन, परस्पर विरोध रखनेवाले, पापाचारी, मदोन्मत्त और साक्षात् कालस्वरूप हो गये हैं॥ ५–७॥
तैरहं पीडिता शक्र भाराक्रान्ताक्षमा विभो।<br>किं करोमि क्व गच्छामि चिन्ता मे महती स्थिता॥ ८हे इन्द्र! उनसे मुझे बहुत व्यथा हो रही है। मैं उनके भारसे दबी हुई हूँ और अब [उनका भार सहनेमें] मैं असमर्थ हो गयी हूँ। हे विभो! मैं क्या करूँ और कहाँ जाऊँ? मुझे यही महान् चिन्ता है॥ ८॥
पीडिताहं वराहेण विष्णुना प्रभविष्णुना।<br>शक्र जानीहि हरिणा दुःखार्दुःखतरं गता॥ ९हे इन्द्र! पूर्वमें मैं [दानव हिरण्याक्षसे] पीड़ित थी। उस समय परम ऐश्वर्यशाली वराहरूपधारी भगवान् विष्णुने मेरा उद्धार किया था। यदि वे वराहरूप धारण करके मेरा उद्धार न किये होते तो उससे भी अधिक दुःखकी स्थितिमें मैं न पहुँचती—आप ऐसा जानिये॥ ९॥
यतोऽहं दुष्टदैत्येन कश्यपस्यात्मजेन वै।<br>हृताहं हिरण्याक्षेण मग्ना तस्मिन्महार्णवे॥ १०<br><br>तदा सूकररूपेण विष्णुना निहतोऽप्यसौ।<br>उद्धृताहं वराहेण स्थापिता हि स्थिरा कृता॥ ११<br><br>नोचेद्रसातले स्वस्था स्थिता स्यां सुखशायिनी।<br>न शक्तास्म्यद्य देवेश भारं वोढुं दुरात्मनाम्॥ १२कश्यपके पुत्र दुष्ट दैत्य हिरण्याक्षने मुझे चुरा लिया था और उस महासमुद्रमें डुबो दिया था। उस समय भगवान् विष्णुने सूकरका रूप धारणकर उसका संहार किया और मेरा उद्धार किया। तदनन्तर उन वराहरूपधारी विष्णुने मुझे स्थापित करके स्थिर कर दिया अन्यथा मैं इस समय पातालमें स्वस्थचित्त रहकर सुखपूर्वक सोयी रहती। हे देवेश! अब मैं दुष्टात्मा राजाओंका भार वहन करनेमें समर्थ नहीं हूँ॥ १०–१२॥
अग्रे दुष्टः समायाति ह्यष्टाविंशस्तथा कलिः।<br>तदाहं पीडिता शक्र गन्तास्म्याशु रसातलम्॥ १३<br><br>तस्मात्त्वं देवदेवेश दुःखरूपार्णवस्य च।<br>पारदो भव भारं मे हर पादौ नमामि ते॥ १४हे इन्द्र! अब आगे अट्ठाईसवाँ दुष्ट कलियुग आ रहा है। उस समय मैं और भी पीड़ित हो जाऊँगी तब तो मैं शीघ्र ही रसातलमें चली जाऊँगी। अतएव हे देवदेवेश! इस दुःखरूपी महासागरसे मुझे पार कर दीजिये; मेरा बोझ उतार दीजिये, मैं आपके चरणोंमें नमन करती हूँ॥ १३–१४॥
इन्द्र उवाच<br>इले किं ते करोम्यद्य ब्रह्माणं शरणं व्रज।<br>अहं तत्रागमिष्यामि स ते दुःखं हरिष्यति॥ १५**इन्द्र बोले—**हे वसुन्धरे! मैं इस समय तुम्हारे लिये क्या कर सकता हूँ! तुम ब्रह्माकी शरणमें जाओ, वे ही तुम्हारा दुःख दूर करेंगे, मैं भी वहाँ आ जाऊँगा॥ १५॥
तच्छ्रुत्वा त्वरिता पृथ्वी ब्रह्मलोकं गता तदा।<br>शक्रोऽपि पृष्ठतः प्राप्तः सर्वदेवपुरःसरः॥ १६यह सुनकर पृथ्‍वीने तत्काल ब्रह्मलोकके लिये प्रस्थान कर दिया। उसके पीछे-पीछे इन्द्र भी सभी देवताओंके साथ वहाँ पहुँच गये॥ १६॥

| अ० १८ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४८७ | | :--- | :--- |

| सुरभीमागतां तत्र दृष्ट्वोवाच प्रजापतिः।<br>महीं ज्ञात्वा महाराज ध्यानेन समुपस्थिताम् ॥ १७<br><br>कस्माद्रुदसि कल्याणि किं ते दुःखं वदाधुना।<br>पीडितासि च केन त्वं पापाचारेण भूर्वद ॥ १८ | हे महाराज! उस आयी हुई धेनुको अपने सम्मुख उपस्थित देखकर तथा ध्यान-दृष्टिद्वारा उसे पृथ्वी जान करके ब्रह्माजीने कहा—हे कल्याणि! तुम किसलिये रो रही हो और तुम्हें कौन-सा दुःख है; मुझे अभी बताओ। हे पृथ्वि! किस पापाचारीने तुम्हें पीड़ा पहुँचायी है, मुझे बताओ॥ १७-१८॥ | | धरोवाच<br>कलिरायाति दुष्टोऽयं बिभेमि तद्भयादहम्।<br>पापाचाराः प्रजास्तत्र भविष्यन्ति जगत्पते ॥ १९<br><br>राजानश्च दुराचाराः परस्परविरोधिनः।<br>चौरकर्मरताः सर्वे राक्षसाः पूर्णवैरिणः ॥ २०<br><br>तान्हत्वा नृपतीन्भारं हर मेऽद्य पितामह।<br>पीडितास्मि महाराज सैन्यभारेण भूभृताम् ॥ २१ | धरा बोली— हे जगत्पते! यह दुष्ट कलि अब आनेवाला है। मैं उसीके आतंकसे डर रही हूँ; क्योंकि उस समय सभी लोग पापाचारी हो जायेंगे। सभी राजालोग दुराचारी हो जायेंगे, आपसमें विरोध करनेवाले होंगे और चोरीके कर्ममें संलग्न रहेंगे। वे राक्षसके रूपमें एक-दूसरेके पूर्णरूपसे शत्रु बन जायेंगे। हे पितामह! उन राजाओंका वध करके मेरा भार उतार दीजिये। हे महाराज! मैं राजाओंकी सेनाके भारसे दबी हुई हूँ॥ १९-२१॥ | | ब्रह्मोवाच<br>नाहं शक्तस्तथा देवि भारावतरणे तव।<br>गच्छावः सदनं विष्णोर्देवदेवस्य चक्रिणः ॥ २२<br><br>स ते भारापनोदं वै करिष्यति जनार्दनः।<br>पूर्वं मयापि ते कार्यं चिन्तितं सुविचार्य च ॥ २३<br><br>तत्र गच्छ सुरश्रेष्ठ यत्र देवो जनार्दनः। | ब्रह्माजी बोले— हे देवि! तुम्हारा भार उतारनेमें मैं सर्वथा समर्थ नहीं हूँ। अब हम दोनों चक्रधारी देवाधिदेव भगवान् विष्णुके धाम चलते हैं। वे जनार्दन तुम्हारा भार अवश्य उतार देंगे। मैंने पहलेसे ही भलीभाँति विचार करके तुम्हारा कार्य करनेकी योजना बनायी है। [उन्होंने इन्द्रसे कहा—] हे सुरश्रेष्ठ! जहाँपर भगवान् जनार्दन विद्यमान हैं, अब आप वहींपर चलें॥ २२-२३ १/२ ॥ | | व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वा वेदकर्तासौ पुरस्कृत्य सुरांश्च गाम् ॥ २४<br><br>जगाम विष्णुसदनं हंसारूढश्चतुर्मुखः।<br>तुष्टाव वेदवाक्यैश्च भक्तिप्रवणमानसः ॥ २५ | व्यासजी बोले— ऐसा कहकर वे वेदकर्ता चतुर्मुख ब्रह्माजी हंसपर आरूढ हुए और देवताओं तथा गोरूपधारिणी पृथ्वीको साथमें लेकर विष्णुलोकके लिये प्रस्थित हो गये। [वहाँ पहुँचकर] भक्तिसे परिपूर्ण हृदयवाले ब्रह्माजी वेदवाक्योंसे उनकी स्तुति करने लगे॥ २४-२५॥ | | ब्रह्मोवाच<br>सहस्रशीर्षास्त्वमसि सहस्राक्षः सहस्रपात्।<br>त्वं वेदपुरुषः पूर्वं देवदेवः सनातनः ॥ २६<br><br>भूतपूर्वं भविष्यच्च वर्तमानं च यद्विभो।<br>अमरत्वं त्वया दत्तमस्माकं च रमापते ॥ २७<br><br>एतावान्महिमा तेऽस्ति को न वेत्ति जगत्त्रये।<br>त्वं कर्ताप्यविता हन्ता त्वं सर्वगतिरीश्वरः ॥ २८ | ब्रह्माजी बोले— आप हजार मस्तकोंवाले, हजार नेत्रोंवाले और हजार पैरोंवाले हैं। आप देवताओंके भी आदिदेव तथा सनातन वेदपुरुष हैं। हे विभो! हे रमापते! भूतकाल, भविष्यकाल तथा वर्तमानकालका जो भी हमारा अमरत्व है, उसे आपने ही हमें प्रदान किया है। आपकी इतनी बड़ी महिमा है कि उसे त्रिलोकीमें कौन नहीं जानता? आप ही सृष्टि करनेवाले, पालन करनेवाले और संहार करनेवाले हैं। आप सर्वव्यापी और सर्वशक्तिसम्पन्न हैं॥ २६-२८॥ |

४८८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १८

| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— इस प्रकार स्तुति करनेपर पवित्र हृदयवाले वे गरुडध्वज भगवान् विष्णु प्रसन्न हो गये और उन्होंने ब्रह्मा आदि देवताओंको अपने दर्शन दिये। प्रसन्न मुखमण्डलवाले भगवान् विष्णुने देवताओंका स्वागत किया और विस्तारपूर्वक उनके आगमनका कारण पूछा॥ २९-३०॥ | | इतीडितः प्रभुर्विष्णुः प्रसन्नो गरुडध्वजः।<br>दर्शनञ्च ददौ तेभ्यो ब्रह्मादिभ्योऽमलाशयः॥ २९<br><br>पप्रच्छ स्वागतं देवान्प्रसन्नवदनो हरिः।<br>ततस्त्वागमने तेषां कारणञ्च सविस्तरम्॥ ३० | | | तमुवाचाब्जजो नत्वा धरादुःखञ्च संस्मरन्।<br>भारावतरणं विष्णो कर्तव्यं ते जनार्दन॥ ३१<br><br>भुवि धृत्वावतारं त्वं द्वापरान्ते समागते।<br>हत्वा दुष्टान्नृपानुर्व्या हर भारं दयानिधे॥ ३२ | तदनन्तर पद्मयोनि ब्रह्माजीने उन्हें प्रणाम करनेके उपरान्त पृथ्वीके दुःखका स्मरण करते हुए उनसे कहा—हे विष्णो! हे जनार्दन! अब पृथ्वीका भार दूर कर देना आपका कर्तव्य है। अतः हे दयानिधे! द्वापरका अन्तिम समय उपस्थित होनेपर आप पृथ्वीपर अवतार लेकर दुष्ट राजाओंको मारकर पृथ्वीका भार उतार दीजिये॥ ३१-३२॥ | | विष्णुरुवाच | विष्णु बोले— इस विषयमें मैं (विष्णु), ब्रह्मा, शंकर, इन्द्र, अग्नि, यम, त्वष्टा, सूर्य और वरुण—कोई भी स्वतन्त्र नहीं है। यह सम्पूर्ण चराचर जगत् योगमायाके अधीन रहता है। ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त सब कुछ [सात्त्विक, राजस, तामस] गुणोंके सूत्रोंद्वारा उन्हींमें गुँथा हुआ है॥ ३३-३४॥ | | नाहं स्वतन्त्र एवात्र न ब्रह्मा न शिवस्तथा।<br>नेन्द्रोऽग्निर्न यमस्त्वष्टा न सूर्यो वरुणस्तथा॥ ३३<br><br>योगमायावशे सर्वमिदं स्थावरजङ्गमम्।<br>ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं ग्रथितं गुणसूत्रतः॥ ३४ | | | यथा सा स्वेच्छया पूर्वं कर्तुमिच्छति सुव्रत।<br>तथा करोति सुहिता वयं सर्वेऽपि तद्वशाः॥ ३५ | हे सुव्रत! वे हितकारिणी भगवती सर्वप्रथम स्वेच्छापूर्वक जैसा करना चाहती हैं, वैसा ही करती हैं। हमलोग भी सदा उनके ही अधीन रहते हैं॥ ३५॥ | | यद्यहं स्यां स्वतन्त्रो वै चिन्तयन्तु धिया किल।<br>कुतोऽभवं मत्स्यवपुः कच्छपो वा महार्णवे॥ ३६<br><br>तिर्यग्योनिषु को भोगः का कीर्तिः किं सुखं पुनः।<br>किं पुण्यं किं फलं तत्र क्षुद्रयोनिगतस्य मे॥ ३७ | अब आपलोग स्वयं अपनी बुद्धिसे विचार करें कि यदि मैं स्वतन्त्र होता तो महासमुद्रमें मत्स्य और कच्छपरूपधारी क्यों बनता? तिर्यक्-योनियोंमें कौन-सा भोग प्राप्त होता है, क्या यश मिलता है, कौन-सा सुख होता है और कौन-सा पुण्य प्राप्त होता है? [इस प्रकार] क्षुद्रयोनियोंमें जन्म लेनेवाले मुझ विष्णुको क्या फल मिला?॥ ३६-३७॥ | | कोलो वाथ नृसिंहो वा वामनो वाभवं कुतः।<br>जमदग्निसुतः कस्मात्सम्भवेयं पितामह॥ ३८<br><br>नृशंसं वा कथं कर्म कृतवानस्मि भूतले।<br>क्षतजैस्तु हृदान्सर्वानपूरयेयं कथं पुनः॥ ३९<br><br>तत्कथं जमदग्नेश्च पुत्रो भूत्वा द्विजोत्तमः।<br>क्षत्रियान्हतवानाजौ निर्दयो गर्भगानपि॥ ४० | यदि मैं स्वतन्त्र होता तो सूकर, नृसिंह और वामन क्यों बनता? इसी प्रकार हे पितामह! मैं जमदग्निपुत्र (परशुराम)-के रूपमें उत्पन्न क्यों होता? इस भूतलपर मैं [क्षत्रियोंके संहार जैसा] नृशंस कर्म क्यों करता और उनके रुधिरसे समस्त सरोवरोंको क्यों भर डालता? उस समय मैं जमदग्निपुत्र परशुरामके रूपमें जन्म लेकर एक श्रेष्ठ ब्राह्मण होकर भी युद्धमें क्षत्रियोंका संहार क्यों करता और घोर निर्दयी बनकर गर्भस्थ शिशुओंंतकको भला क्यों मारता?॥ ३८-४०॥ |

| अ० १८ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४८९ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
रामो भूत्वाथ देवेन्द्र प्राविशद्दण्डकं वनम्।<br>पदातिश्चीरवासाश्च जटावल्कलवान्पुनः॥ ४१<br>असहायो ह्यपाथेयो भीषणे निर्जने वने।<br>कुर्वन्नाखेटकं तत्र व्यचरं विगतत्रपः॥ ४२हे देवेन्द्र! रामका अवतार लेकर मुझे दण्डकवनमें पैदल विचरण करना पड़ा, गेरुआ वस्त्र धारण करना पड़ा और जटा-वल्कलधारी बनना पड़ा। उस निर्जन वनमें असहाय रहते हुए तथा पासमें बिना किसी भोज्य-सामग्रीके ही निर्लज्ज होकर आखेट करते हुए मैं इधर-उधर भटकता रहा॥ ४१-४२॥
न ज्ञातवान्मृगं हैमं मायया पिहितस्तदा।<br>उटजे जानकीं त्यक्त्वा निर्गतस्तत्पदानुगः॥ ४३उस समय मायासे आच्छादित रहनेके कारण मैं उस मायावी स्वर्ण-मृगको नहीं पहचान सका और जानकीको पर्णकुटीमें छोड़कर उस मृगके पीछे-पीछे निकल पड़ा॥ ४३॥
लक्ष्मणोऽपि च तां त्यक्त्वा निर्गतो मत्पदानुगः।<br>वारितोऽपि मयात्यर्थं मोहितः प्राकृतैर्गुणैः॥ ४४मेरे बहुत मना करनेपर भी प्राकृत गुणोंसे व्यामुग्ध होनेके कारण लक्ष्मण भी उस सीताको छोड़कर मेरे पदचिह्नोंका अनुसरण करते हुए वहाँसे निकल पड़े॥ ४४॥
भिक्षुरूपं ततः कृत्वा रावणः कपटाकृतिः।<br>जहार तरसा रक्षो जानकीं शोककर्शिताम्॥ ४५तदनन्तर कपटस्वभाव राक्षस रावणने भिक्षुकका रूप धारण करके शोकसे व्याकुल जानकीका तत्काल हरण कर लिया॥ ४५॥
दुःखार्तेन मया तत्र रुदितञ्च वने वने।<br>सुग्रीवेण च मित्रत्वं कृतं कार्यवशन्मया॥ ४६<br>अन्यायेन हतो वाली शापाच्चैव निवारितः।<br>सहायान्वानरान् कृत्वा लङ्कायां चलितः पुनः॥ ४७तब दुःखसे व्याकुल होकर मैं वन-वन भटकता हुआ रोता रहा और अपना कार्य सिद्ध करनेके लिये मैंने सुग्रीवसे मित्रता की। मैंने अन्यायपूर्वक वालीका वध किया तथा उसे शापसे मुक्ति दिलायी और इसके बाद वानरोंको अपना सहायक बनाकर लंकाकी ओर प्रस्थान किया॥ ४६-४७॥
बद्धोऽहं नागपाशैश्च लक्ष्मणश्च ममानुजः।<br>विसंज्ञौ पतितौ दृष्ट्वा वानरा विस्मयं गताः॥ ४८<br>गरुडेन तदागत्य मोचितौ भ्रातरौ किल।<br>चिन्ता मे महती जाता दैवं किं वा करिष्यति॥ ४९<br>हृतं राज्यं वने वासो मृतस्तातः प्रिया हृता।<br>युद्धं कष्टं ददात्येवमग्रे किं वा करिष्यति॥ ५०[वहाँ युद्धमें] मैं तथा मेरा छोटा भाई लक्ष्मण दोनों ही नागपाशोंसे बाँध दिये गये। हम दोनोंको अचेत पड़ा देखकर सभी वानर आश्चर्यचकित हो गये। तब गरुड़ने आकर हम दोनों भाइयोंको छुड़ाया। उस समय मुझे महान् चिन्ता होने लगी कि दैव अब न जाने क्या करेगा? राज्य छिन गया, वनमें वास करना पड़ा, पिताकी मृत्यु हो गयी और प्रिय सीता हर ली गयी। युद्ध कष्ट दे ही रहा है, अब आगे दैव न जाने क्या करेगा!॥ ४८-५०॥
प्रथमं तु महद्दुःखमराज्यस्य वनाश्रयम्।<br>राजपुत्र्यान्वितस्यैव धनहीनस्य मे सुराः॥ ५१<br>वराटिकापि पित्रा मे न दत्ता वननिर्गमे।<br>पदातिरसहायोऽहं धनहीनश्च निर्गतः॥ ५२<br>चतुर्दशैव वर्षाणि नीतानि च तदा मया।<br>क्षात्रं धर्मं परित्यज्य व्याधवृत्त्या महावने॥ ५३हे देवतागण! सर्वप्रथम दुःख तो मुझ राज्यविहीनका वनवास हुआ; वनके लिये चलते समय राजकुमारी सीता मेरे साथ थीं और मेरे पास धन भी नहीं था। वन जाते समय पिताजीने मुझे एक वराटिका (कौड़ी) भी नहीं दी; असहाय तथा धनविहीन मैं पैदल ही निकल पड़ा। उस समय क्षत्रियधर्मका त्याग करके व्याधवृत्तिके द्वारा मैंने उस महावनमें चौदह वर्ष व्यतीत किये॥ ५१-५३॥
४९०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १९
दैवाद्युद्धे जयः प्राप्तो निहतोऽसौ महासुरः।<br>आनीता च पुनः सीता प्राप्तायोध्या मया तथा ॥ ५४<br><br>वर्षाणि कतिचित्तत्र सुखं संसारसम्भवम्।<br>प्राप्तं राज्यञ्च सम्पूर्णं कोसलानधितिष्ठता॥ ५५तदनन्तर भाग्यवश युद्धमें मुझे विजय प्राप्त हुई और वह महान् असुर रावण मारा गया। इसके बाद मैं सीताको ले आया और मुझे अयोध्या फिरसे प्राप्त हो गयी। इस प्रकार जब मुझे सम्पूर्ण राज्य मिल गया, तब कोसलदेशपर अधिष्ठित रहते हुए मैंने वहाँपर कुछ वर्षोंतक सांसारिक सुखका भोग किया॥ ५४-५५॥
पुरैवं वर्तमानेन प्राप्तराज्येन वै तदा।<br>लोकापवादभीतेन त्यक्ता सीता वने मया॥ ५६<br><br>कान्ताविरहजं दुःखं पुनः प्राप्तं दुरासदम्।<br>पातालं सा गता पश्चाद्गुरां भित्त्वा धरात्मजा ॥ ५७इस प्रकार पूर्वकालमें जब मुझे राज्य प्राप्त हो गया तब मैंने लोकनिन्दाके भयसे वनमें सीताका परित्याग कर दिया। इसके बाद मुझे पुनः पत्नी-वियोगसे होनेवाला भयंकर दुःख प्राप्त हुआ। वह धरानन्दिनी सीता पृथ्वीको भेदकर पातालमें चली गयी ॥ ५६-५७॥
एवं रामावतारेऽपि दुःखं प्राप्तं निरन्तरम्।<br>परतन्त्रेण मे नूनं स्वतन्त्रः को भवेत्तदा ॥ ५८<br><br>पश्चात्कालवशात्प्राप्तः स्वर्गो मे भ्रातृभिः सह।<br>परतन्त्रस्य का वार्ता वक्तव्या विबुधेन वै॥ ५९<br><br>परतन्त्रोऽस्म्यहं नूनं पद्मयोने निशामय।<br>तथा त्वमपि रुद्रश्च सर्वे चान्ये सुरोत्तमाः ॥ ६०इस प्रकार रामावतारमें भी मैं परतन्त्र होकर निरन्तर दुःख पाता रहा। तब भला दूसरा कौन स्वतन्त्र हो सकता है? तत्पश्चात् कालके वशीभूत होकर मुझे अपने भाइयोंके साथ स्वर्ग जाना पड़ा। अतः कोई भी विद्वान् पराधीन व्यक्तिकी क्या बात करेगा? हे कमलोद्भव! आप यह जान लीजिये कि जैसे मैं परतन्त्र हूँ वैसे ही आप, शंकर तथा अन्य सभी बड़े-बड़े देवता भी निश्चितरूपसे परतन्त्र हैं॥ ५८-६०॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे ब्रह्माणं प्रति विष्णुवाक्यं नामाष्टादशोऽध्यायः॥ १८॥


अथैकोनविंशोऽध्यायः

देवताओंद्वारा भगवतीका स्तवन, भगवतीद्वारा श्रीकृष्ण और अर्जुनको निमित्त बनाकर अपनी शक्तिसे पृथ्वीका भार दूर करनेका आश्वासन देना

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
इत्युक्त्वा भगवान्विष्णुः पुनराह प्रजापतिम्।<br>यन्मायामोहितः सर्वस्तत्त्वं जानाति नो जनः॥ १<br><br>वयं मायावृताः कामं न स्मरामो जगद्गुरुम्।<br>परमं पुरुषं शान्तं सच्चिदानन्दमव्ययम्॥ २[हे राजन्!] ऐसा कहनेके उपरान्त भगवान् विष्णुने ब्रह्माजीसे फिर कहा— जिन भगवतीकी मायासे मोहित रहनेके कारण सभी लोग परमतत्त्वको नहीं जान पाते, उन्हींकी मायासे आच्छादित रहनेके कारण हम लोग भी जगद्गुरु, शान्तस्वरूप, सच्चिदानन्द तथा अविनाशी परमपुरुषका स्मरण नहीं कर पाते ॥ १-२॥

| अ० १९] | चतुर्थ स्कन्ध | ४९१ | | :--- | :--- |

| अहं विष्णुरहं ब्रह्मा शिवोऽहमिति मोहिताः।<br>न जानीमो वयं धातः परं वस्तु सनातनम्॥ ३ | हे ब्रह्मन्! मैं विष्णु हूँ, मैं ब्रह्मा हूँ, मैं शिव हूँ—इसी [अभिमानसे] मोहित हमलोग उस सनातन परम-तत्त्वको नहीं जान पाते॥ ३॥ | | यन्मायामोहितश्चाहं सदा वर्ते परात्मनः।<br>परवान्दारुपाञ्चाली मायिकस्य यथा वशे॥ ४ | उस परमात्माकी मायासे मोहित मैं उसी प्रकार सदा उसके अधीन रहता हूँ, जैसे कठपुतली बाजीगरके अधीन रहती है॥ ४॥ | | भवतापि तथा दृष्टा विभूतिस्तस्य चाद्भुता।<br>कल्पादौ भवयुक्तेन मयापि च सुधार्णवे॥ ५<br><br>मणिद्वीपेऽथ मन्दारविटपे रासमण्डले।<br>समाजे तत्र सा दृष्टा श्रुता न वचसापि च॥ ६ | कल्पके आरम्भमें आप (ब्रह्मा)-ने, शिवने तथा मैंने भी सुधासागरमें उस परमात्माकी अद्भुत विभूतिका दर्शन किया था। मणिद्वीपमें मन्दारवृक्षके नीचे चल रहे रासमण्डलमें एकत्रित सभामें भी वह विभूति साक्षात् देखी गयी थी; न कि वह केवल कही-सुनी गयी बात है॥ ५-६॥ | | तस्मात्तां परमां शक्तिं स्मरन्त्वद्य सुराः शिवाम्।<br>सर्वकामप्रदां मायामाद्यां शक्तिं परात्मनः॥ ७ | अतएव इस अवसरपर सभी देवता उसी परमा शक्ति, कल्याणकारिणी, सभी कामनाएँ पूर्ण करनेवाली, माया-स्वरूपिणी तथा परमात्माकी आद्याशक्ति भगवतीका स्मरण करें॥ ७॥ | | व्यास उवाच<br>इत्युक्ता हरिणा देवा ब्रह्माद्या भुवनेश्वरीम्।<br>सस्मरुर्मनसा देवीं योगमायां सनातनीम्॥ ८ | व्यासजी बोले— भगवान् विष्णुके ऐसा कहनेपर ब्रह्मा आदि देवता सदा विराजमान रहनेवाली भगवती योगमायाका एकाग्र मनसे ध्यान करने लगे॥ ८॥ | | स्मृतमात्रा तदा देवी प्रत्यक्षं दर्शनं ददौ।<br>पाशाङ्कुशवराभीतिधरा देवी जपारुणा।<br>दृष्ट्वा प्रमुदिता देवास्तुष्टुवुस्तां सुदर्शनाम्॥ ९ | उनके स्मरण करते ही भगवतीने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन प्रदान किया। उस समय वे देवी जपाकुसुमके समान रक्तवर्णसे सुशोभित थीं और उन्होंने पाश, अंकुश, वर तथा अभय मुद्रा धारण कर रखी थी। उन परम सुन्दर भगवतीको देखकर सभी देवता अत्यन्त प्रसन्न हुए और उनकी स्तुति करने लगे॥ ९॥ | | देवा ऊचुः<br>ऊर्णनाभाद्यथा तन्तुर्विस्फुलिङ्गा विभावसोः।<br>तथा जगद्यदेतस्या निर्गतं तां नता वयम्॥ १० | देवता बोले— जिस प्रकार मकड़ीकी नाभिसे तन्तु तथा अग्निसे चिनगारियाँ निकलती हैं, उसी प्रकार यह जगत् जिनसे प्रकट हुआ है, उन भगवतीको हम नमस्कार करते हैं॥ १०॥ | | यन्मायाशक्तिसंकॢप्तं जगत्सर्वं चराचरम्।<br>तां चितं भुवनाधीशां स्मरामः करुणार्णवाम्॥ ११ | जिनकी मायाशक्तिसे सम्पूर्ण चराचर जगत् पूर्णतः ओत-प्रोत है, उन चित्स्वरूपिणी करुणासिन्धु भुवनेश्वरीका हम स्मरण करते हैं॥ ११॥ | | यदज्ञानाद्भवोत्पत्तिर्ज्ञानाद्भवनाशनम् ।<br>संविद्रूपां च तां देवीं स्मरामः सा प्रचोदयात्॥ १२ | जिन्हें न जाननेसे संसारमें बार-बार जन्म होता रहता है और जिनका ज्ञान हो जानेसे भव-बन्धनका नाश हो जाता है, उन ज्ञानस्वरूपिणी भगवतीका हम स्मरण करते हैं। वे हमें [सन्मार्गपर चलनेके लिये] |

४९२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
महालक्ष्म्यै च विद्महे सर्वशक्त्यै च धीमहि।<br>तन्नो देवी प्रचोदयात्॥ १३प्रेरित करें। हम उन महालक्ष्मीको जानें। हम सर्वशक्तिमयी भगवतीका ध्यान करते हैं। वे भगवती हमें [सत्कर्ममें प्रवृत्त होनेकी] प्रेरणा प्रदान करें॥ १२-१३॥
मातर्नताः स्म भुवनार्तिहरे प्रसीद<br>शन्नो विधेहि कुरु कार्यमिदं दयार्द्रे।<br>भारं हरस्व विनिहत्य सुरारिवर्गं<br>मह्या महेश्वरि सतां कुरु शं भवानि॥ १४संसारका कष्ट हरनेवाली हे माता! हम आपको प्रणाम करते हैं, आप प्रसन्न होइये। हे दयासे आर्द्र हृदयवाली! हमारा कल्याण कीजिये; हमारा यह कार्य सम्पन्न कर दीजिये। हे महेश्वरि! असुर-समुदायका संहार करके पृथ्वीका भार उतार दीजिये। हे भवानि! आप सज्जनोंका कल्याण करें॥ १४॥
यद्यम्बुजाक्षि दयसे न सुरान्कदाचित्<br>किं ते क्षमा रणमुखेऽसिशरैः प्रहर्तुम्।<br>एतत्तथैव गदितं ननु यक्षरूपं<br>धृत्वा तृणं दह हुताश पदाभिलाषैः॥ १५हे कमलनयने! यदि आप देवताओंपर दया नहीं करेंगी तो वे समरांगणमें तलवारों तथा बाणोंसे [दैत्योंपर] प्रहार करनेमें समर्थ कैसे हो सकेंगे? इस बातको आपने स्वयं [यक्षोपाख्यान-प्रसंगमें] यक्षरूप धारण करके ‘हे हुताशन! आप इस तिनकेको जला दें’ इत्यादि पद-कथनोंके द्वारा व्यक्त कर दिया है॥ १५॥
कंसः कुजोऽथ यवनेन्द्रसुतश्च केशी<br>बार्हद्रथो बकबकीखरशाल्वमुख्याः।<br>येऽन्ये तथा नृपतयो भुवि सन्ति तांस्त्वं<br>हत्वा हरस्व जगतो भरमाशु मातः॥ १६हे माता! कंस, भौमासुर, कालयवन, केशी, बृहद्रथ-पुत्र जरासन्ध, बकासुर, पूतना, खर और शाल्व आदि तथा इनके अतिरिक्त और भी जो दुष्ट राजागण पृथ्वीपर हैं, उन्हें मारकर आप शीघ्र ही पृथ्वीका भार उतार दीजिये॥ १६॥
ये विष्णुना न निहताः किल शङ्करेण<br>ये वा विगृह्य जलजाक्षि पुरन्दरेण।<br>ते ते मुखं सुखकरं सुसमीक्षमाणाः<br>संख्ये शरैर्विनिहता निजलीलया ते॥ १७हे कमलनयने! जिन दैत्योंको भगवान् विष्णु, शिव और इन्द्र भी [कई बार] युद्ध करके नहीं मार सके, वे दैत्य युद्धभूमिमें आपका सुखदायक मुखमण्डल देखते हुए आपकी लीलासे आपके बाणोंके द्वारा मार डाले गये॥ १७॥
शक्तिं विना हरिहरप्रमुखाः सुराश्च<br>नैवेश्वरा विचलितुं तव देवदेवि।<br>किं धारणाविरहितः प्रभुरप्यनन्तो<br>धर्तुं धराञ्च रजनीशकलावतंसे॥ १८चन्द्रकलाको मस्तकपर धारण करनेवाली हे देवदेवि! विष्णु, शिव आदि प्रमुख देवता भी आपकी शक्तिके बिना हिलने-डुलनेतकमें समर्थ नहीं हैं। इसी प्रकार क्या शेषनाग भी आपकी शक्तिके बिना पृथ्वीको धारण कर सकनेमें समर्थ हैं?॥ १८॥
इन्द्र उवाच<br>वाचा विना विधिरलं भवतीह विश्वं<br>कर्तुं हरिः किमु रमारहितोऽथ पातुम्।<br>संहर्तुमीश उमयोज्झित ईश्वरः किं<br>ते ताभिरेव सहिताः प्रभवः प्रजेशाः॥ १९इन्द्र बोले— [हे माता!] क्या सरस्वतीके बिना ब्रह्मा इस विश्वकी सृष्टि करनेमें, लक्ष्मीके बिना विष्णु पालन करनेमें और पार्वतीके बिना शिवजी संहार करनेमें समर्थ हो सकते हैं? वे महान् देवगण उन्हीं [तीनों महाशक्तियों]-के साथ अपना-अपना कार्य कर सकनेमें समर्थ होते हैं॥ १९॥

| अ० १९ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४९३ | | :--- | :--- |

| विष्णुरुवाच<br>कर्तुं प्रभुनं द्रुहिणो न कदाचनाहं<br>नापीश्वरस्तव कलारहितस्त्रिलोक्याः।<br>कर्तुं प्रभुत्वमनघेऽत्र तथा विहर्तुं<br>त्वं वै समस्तविभवेश्वरि भासि नूनम्॥ २० | विष्णु बोले—हे अनघे! आपकी कलासे रहित होकर न तो ब्रह्मा इस त्रिलोकीकी रचना कर सकनेमें, न तो मैं इसका पालन कर सकनेमें और न तो शिव इसका संहार कर सकनेमें समर्थ हैं। हे समस्त विभवोंकी स्वामिनि! इसका सृजन, पालन तथा संहार करनेमें समर्थ निश्चितरूपसे आप ही प्रतीत होती हैं॥ २०॥ | | व्यास उवाच<br>एवं स्तुता तदा देवी तानाह विबुधेश्वरान्।<br>किं तत्कार्यं वदन्त्वद्य करोमि विगतज्वराः॥ २१<br>असाध्यमपि लोकेऽस्मिंस्तत्करोमि सुरेप्सितम्।<br>शंसन्तु भवतां दुःखं धरायाश्च सुरोत्तमाः॥ २२ | व्यासजी बोले—इस प्रकार उन देवताओंने जब देवीकी स्तुति की, तब उन्होंने उन देवेश्वरोंसे कहा—वह कौन-सा कार्य है? आपलोग सन्तापरहित होकर बतायें, मैं अभी करूँगी। इस संसारमें देवताओंके द्वारा अभिलषित जो असाध्य कार्य भी होगा, उसे मैं करूँगी। हे श्रेष्ठ देवतागण! आपलोग अपना तथा पृथ्वीका दुःख मुझे बताइये॥ २१-२२॥ | | देवा ऊचुः<br>वसुधेयं भराक्रान्ता सम्प्राप्ता विबुधान्प्रति।<br>रुदती वेपमाना च पीडिता दुष्टभूभुजैः॥ २३<br>भारापहरणं चास्याः कर्तव्यं भुवनेश्वरि।<br>देवानामीप्सितं कार्यमेतदेवाधुना शिवे॥ २४<br>घातितस्तु पुरा मातस्त्वया महिषरूपधृक्।<br>दानवोऽतिबलाक्रान्तस्तत्सहायाश्च कोटिशः॥ २५<br>तथा शुम्भो निशुम्भश्च रक्तबीजस्तथापरः।<br>चण्डमुण्डौ महावीर्यौ तथैव धूम्रलोचनः॥ २६<br>दुर्मुखो दुःसहश्चैव करालश्चाति वीर्यवान्।<br>अन्ये च बहवः क्रूरास्त्वयैव च निपातिताः॥ २७<br>तथैव च सुरारींश्च जहि सर्वान्महीश्वरान्।<br>(भारं हर धरायाश्च दुर्धरं दुष्टभूभुजाम्।) | देवता बोले—दुष्ट राजाओंसे पीड़ित यह पृथ्वी उनके भारसे व्याकुल होकर रोती तथा थर-थर काँपती हुई हम देवताओंके पास आयी। हे भुवनेश्वरि! आप इसका भार उतार दें। हे शिवे! इस समय हम देवताओंका यही अभीष्ट कार्य है॥ २३-२४॥<br>हे माता! पूर्वकालमें आप अत्यधिक बलसम्पन्न दानव महिषासुरका वध कर चुकी हैं। इसके अतिरिक्त आप उसके करोड़ों सहायकों, शुम्भ, निशुम्भ, रक्तबीज, महाबली चण्ड-मुण्ड, धूम्रलोचन, दुर्मुख, दुःसह, अतिशय बलवान् कराल तथा दूसरे भी अनेक क्रूर दानवोंको मार चुकी हैं। उसी प्रकार आप हम देवताओंके शत्रुरूप सभी दुष्ट राजाओंका वध कीजिये। (दुष्ट राजाओंका वध करके पृथ्वीका दुःसह भार उतार दीजिये)॥ २५-२७ १/२॥ | | व्यास उवाच<br>इत्युक्ता सा तदा देवी देवानाहाम्बिका शिवा॥ २८<br>सम्प्रहस्यासितापाङ्गी मेघगम्भीरया गिरा। | व्यासजी बोले—[हे राजन्!] देवताओंके ऐसा कहनेपर नीले नेत्रप्रान्तवाली कल्याणमयी भगवती हँसकर मेघके समान गम्भीर वाणीमें उनसे कहने लगीं—॥ २८ १/२॥ | | श्रीदेव्युवाच<br>मयेदं चिन्तितं पूर्वमंशावतरणं सुराः॥ २९<br>भारावतरणं चैव यथा स्याद्दुष्टभूभुजाम्।<br>मया सर्वे निहन्तव्या दैत्येशा ये महीभुजः॥ ३० | श्रीदेवी बोलीं—हे देवताओ! मैंने यह पहलेसे ही सोच रखा है कि मैं अंशावतार धारण करूँ, जिससे पृथ्वीपरसे दुष्ट राजाओंका भार उतर जाय। हे महाभाग देवताओ! मन्द तेजवाले जरासन्ध आदि जो बड़े-बड़े दैत्य राजागण हैं, उन सबको मैं अपनी |

४९४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मागधाद्या महाभागाः स्वशक्त्या मन्दतेजसः।<br>भवद्भिरपि स्वैरंशैरवतीर्य धरातले॥ ३१शक्तिसे मार डालूँगी। हे देवतागण! आपलोग भी अपने-अपने अंशोंसे पृथ्वीपर अवतार लेकर मेरी शक्तिसे युक्त होकर भार उतारें॥ २९-३१ १/२॥
मच्छक्तियुक्तैः कर्तव्यं भारावतरणं सुराः।<br>कश्यपो भार्यया सार्धं दिविजानां प्रजापतिः॥ ३२मेरे अवतार लेनेसे पूर्व देवताओंके प्रजापति कश्यप अपनी पत्नीके साथ यदुकुलमें वसुदेव नामसे अवतीर्ण होंगे। उसी प्रकार भृगुके शापसे अविनाशी भगवान् विष्णु अपने अंशसे वहींपर वसुदेवके पुत्रके रूपमें उत्पन्न होंगे॥ ३२-३३ १/२॥
यादवानां कुले पूर्वं भवितानकदुन्दुभिः।<br>तथैव भृगुशापाद्वै भगवान्विष्णुरव्ययः॥ ३३
अंशेन भविता तत्र वसुदेवसुतो हरिः।<br>तदाहं प्रभविष्यामि यशोदायां च गोकुले॥ ३४हे श्रेष्ठ देवताओ! उस समय मैं भी गोकुलमें यशोदाके गर्भसे उत्पन्न होऊँगी और देवताओंका सारा कार्य सिद्ध करूँगी। कारागारमें अवतीर्ण हुए [कृष्णरूपधारी] विष्णुको मैं गोकुलमें पहुँचा दूँगी और देवकीके गर्भसे शेषभगवान्‌को खींचकर रोहिणीके गर्भमें स्थापित कर दूँगी। मेरी शक्तिसे सम्पन्न होकर वे दोनों ही दुष्टोंका विनाश करेंगे। द्वापरके व्यतीत होते ही दुष्ट राजाओंका पूर्णरूपसे संहार बिलकुल निश्चित है॥ ३४-३६ १/२॥
कार्यं सर्वं करिष्यामि सुराणां सुरसत्तमाः।<br>कारागारे गतं विष्णुं प्रापयिष्यामि गोकुले॥ ३५
शेषं च देवकीगर्भात्प्रापयिष्यामि रोहिणीम्।<br>मच्छक्त्योपचितौ तौ च कर्तारौ दुष्टसंक्षयम्॥ ३६
दुष्टानां भूभुजां कामं द्वापरान्ते सुनिश्चितम्।<br>इन्द्रांशोऽप्यर्जुनः साक्षात्करिष्यति बलक्षयम्॥ ३७साक्षात् इन्द्रके अंशस्वरूप अर्जुन भी [उन दुष्ट राजाओंके] बलका नाश करेंगे। धर्मके अंशरूप महाराज युधिष्ठिर, वायुके अंशरूप भीमसेन तथा दोनों अश्विनीकुमारोंके अंशरूप नकुल-सहदेव भी उत्पन्न होंगे। [उसी समय] वसुके अंशसे अवतीर्ण गङ्गापुत्र भीष्म उन दुष्ट राजाओंकी शक्ति नष्ट करेंगे॥ ३७-३८ १/२॥
धर्मांशोऽपि महाराजो भविष्यति युधिष्ठिरः।<br>वाय्वंशो भीमसेनश्चाश्विन्यंशौ च यमावपि॥ ३८
वसोरांशोऽथ गाङ्गेयः करिष्यति बलक्षयम्।<br>व्रजन्तु च भवन्तोऽद्य धरा भवतु सुस्थिरा॥ ३९हे श्रेष्ठ देवतागण! अब आपलोग जायँ और पृथ्वी भी निश्चिन्त होकर रहे। मैं उन अंशावतारी लोगोंको निमित्तमात्र बनाकर अपनी शक्तिसे इस पृथ्वीका भार दूर करूँगी, इसमें सन्देह नहीं है। मैं क्षत्रियोंका यह संहार कुरुक्षेत्रमें करूँगी॥ ३९-४० १/२॥
भारावतरणं नूनं करिष्यामि सुरोत्तमाः।<br>कृत्वा निमित्तमात्रांस्तान्स्वशक्त्याहं न संशयः॥ ४०
कुरुक्षेत्रे करिष्यामि क्षत्रियाणां च संक्षयम्।<br>असूयेर्ष्या मतिस्तृष्णा ममताभिमता स्पृहा॥ ४१असूया, ईर्ष्या, बुद्धि, तृष्णा, ममता, अपनी प्रिय वस्तुकी इच्छा, स्पृहा, विजयकी अभिलाषा, काम और मोह—इन दोषोंके कारण सभी यादव नष्ट हो जायँगे। ब्राह्मणके शापसे उनके वंशका नाश हो जायगा और उसी शापवश भगवान् श्रीकृष्ण भी अपने शरीरका त्याग कर देंगे। अब आपलोग भी अपनी शक्तिस्वरूपा भार्याओंसहित अपने-अपने अंशोंसे मथुरा तथा गोकुलमें अवतरित हों और शार्ङ्गपाणि भगवान् विष्णुके सहायक बनें॥ ४१-४३ १/२॥
जिगीषा मदनो मोहो दोषैर्नङ्क्ष्यन्ति यादवाः।<br>ब्राह्मणस्य च शापेन वंशनाशो भविष्यति॥ ४२
भगवानपि शापेन त्यक्ष्यत्येतत्कलेवरम्।<br>भवन्तोऽपि निजाङ्गैश्च सहायाः शार्ङ्गधन्वनः॥ ४३
प्रभवन्तु सनारीका मथुरायां च गोकुले।
अ० २० ]चतुर्थ स्कन्ध४१५
व्यास उवाच
इत्युक्त्वान्तर्दधे देवी योगमाया परात्मनः ॥ ४४<br>सधरा वै सुराः सर्वे जग्मुः स्वान्यालयानि च।<br>धरापि सुस्थिरा जाता तस्या वाक्येन तोषिता ॥ ४५<br>ओषधीवीरुधोपेता बभूव जनमेजय।<br>प्रजाश्च सुखिनो जाता द्विजाश्चापुर्महोदयम्।<br>सन्तुष्टा मुनयः सर्वे बभूवुर्धर्मतत्पराः ॥ ४६व्यासजी बोले— ऐसा कहकर परमात्माकी योगमाया भगवती अन्तर्धान हो गयीं। तदनन्तर पृथ्वीसहित सभी देवता अपने-अपने स्थानपर चले गये। पृथ्वी भी उन भगवतीकी वाणीसे सन्तुष्ट होकर शान्तचित्त हो गयी। हे जनमेजय! वह औषधियों और लताओंसे सम्पन्न हो गयी। प्रजाएँ सुखी हो गयीं, द्विजगणोंकी महान् उन्नति होने लगी और सभी मुनिगण सन्तुष्ट होकर धर्मपरायण हो गये ॥ ४४—४६ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे देवान् प्रति देवीवाक्यवर्णनं नामैकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥


अथ विंशोऽध्यायः

व्यासजीद्वारा जनमेजयको भगवतीकी महिमा सुनाना तथा कृष्णावतारकी कथाका उपक्रम

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
शृणु भारत वक्ष्यामि भारावतरणं तथा।<br>कुरुक्षेत्रे प्रभासे च क्षपितं योगमायया ॥ १हे भारत! सुनिये, अब मैं आपको पृथ्वीका भार उतारने और कुरुक्षेत्र तथा प्रभासक्षेत्रमें योगमायाके द्वारा सेनाके संहारका वृत्तान्त बताऊँगा ॥ १ ॥
यदुवंशे समुत्पत्तिर्विष्णोरमिततेजसः।<br>भृगुशापप्रतापेन महामायाबलेन च ॥ २<br><br>क्षितिभारसमुत्तारनिमित्तमिति मे मतिः।<br>मायया विहितो योगो विष्णोर्जन्म धरातले ॥ ३भृगुके शापके प्रताप तथा महामायाकी शक्तिसे ही अमित तेजस्वी भगवान् विष्णुका आविर्भाव यदुवंशमें हुआ था। मेरा यह मानना है कि पृथ्वीका भार उतारना तो निमित्तमात्र था, वस्तुतः योगमायाने ही इस संयोगका विधान कर दिया था कि धरातलपर भगवान् विष्णुका अवतार हो ॥ २-३ ॥
किं चित्रं नृप देवी सा ब्रह्मविष्णुसुरानपि।<br>नर्तयत्यनिशं माया त्रिगुणानपरानकिमु ॥ ४हे राजन्! इसमें आश्चर्य कैसा! वे भगवती योगमाया जब ब्रह्मा, विष्णु आदि देवताओंको भी निरन्तर नचाती रहती हैं, तब त्रिगुणात्मक सामान्यजनकी क्या बात ! ॥ ४ ॥
गर्भवासोद्भवं दुःखं विण्मूत्रस्नायुसंयुतम्।<br>विष्णोरापादितं सम्यग्यया विगतलीलया ॥ ५उन भगवतीने अपनी रहस्यमयी लीलासे भगवान् विष्णुको भी सम्यक् रूपसे मल, मूत्र तथा स्नायुसे भरे गर्भवाससे होनेवाला दुःख भोगनेको विवश कर दिया था ॥ ५ ॥
पुरा रामावतारेऽपि निर्जरा वानराः कृताः।<br>विदितं ते यथा विष्णुर्दुःखपाशेन मोहितः ॥ ६पूर्वकालमें रामावतारके समय भी उन्हीं योगमायाने जिस प्रकार देवताओंको वानर बना दिया था और [राम-रूपमें अवतीर्ण] भगवान् विष्णुको दुःखपाशसे व्यथित कर दिया था, वह तो आपको विदित ही है ॥ ६ ॥
४९६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २०
संस्कृतहिन्दी अनुवाद
अहं ममेति पाशेन सुदृढेन नराधिप।<br>योगिनो मुक्तसङ्गाश्च भुक्तिकाम मुमुक्षवः ॥ ७<br><br>तामेव समुपासन्ते देवीं विश्वेश्वरीं शिवाम्।<br>यद्भक्तिलेशलेशांशलेशलेशलवांशकम् ॥ ८<br><br>लब्ध्वा मुक्तो भवेजन्तुस्तां न सेवेत को जनः।<br>भुवनेशीत्येव वक्त्रे ददाति भुवनत्रयम्॥ ९<br><br>मां पाहीत्यस्य वचसो देयाभावादृणान्विता।<br>विद्याविद्येति तस्या द्वे रूपे जानीहि पार्थिव ॥ १०हे महाराज ! अहंता और ममताके इस सुदृढ़ बन्धनसे सभी लोग आबद्ध हैं। अतः अनासक्त तथा मोक्षकी इच्छा रखनेवाले योगीजन और भोगकी कामना करनेवाले लोग भी उन्हीं कल्याणकारिणी भगवती जगदम्बाकी उपासना करते हैं। जिन योगमायाकी भक्तिके लेशलेशांशके लेशलेशलवांशको प्राप्त करके प्राणी मुक्त हो जाता है, उनकी उपासना कौन व्यक्ति नहीं करेगा ? ‘हे भुवनेशि!’ ऐसा उच्चारण करनेवालेको वे भगवती तीनों लोक प्रदान कर देती हैं और ‘मेरी रक्षा कीजिये’ इस वाक्यके कहनेपर [उसे पहले ही त्रिलोक दे देनेके कारण] अब कुछ भी न दे पानेसे वे उस भक्तकी ऋणी हो जाती हैं। हे राजन् ! आप उन भगवतीके विद्या तथा अविद्या—ये दो रूप जानिये। विद्यासे प्राणी मुक्त होता है और अविद्यासे बन्धनमें पड़ता है॥ ७—१० १/२ ॥
विद्याया मुच्यते जन्तुर्बध्यतेऽविद्यया पुनः।<br>ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च सर्वे तस्या वशानुगाः ॥ ११<br><br>अवताराः सर्व एव यन्त्रिता इव दामभिः।<br>कदाचिच्च सुखं भुंक्ते वैकुण्ठे क्षीरसागरे ॥ १२<br><br>कदाचित्कुरुते युद्धं दानवैर्बलवत्तरैः।<br>हरिः कदाचिद्यज्ञान्वै विततान्प्रकरोति च ॥ १३<br><br>कदाचिच्च तपस्तीव्रं तीर्थे चरति सुव्रत।<br>कदाचिच्छयने शेते योगनिद्रामुपाश्रितः ॥ १४ब्रह्मा, विष्णु और महेश—ये सब उनके अधीन रहते हैं। भगवान्‌के सभी अवतार रस्सीसे बँधे हुएके समान भगवतीसे ही नियन्त्रित रहते हैं। भगवान् विष्णु कभी वैकुण्ठमें और कभी क्षीरसागरमें आनन्द लेते हैं, कभी अत्यधिक बलशाली दानवोंके साथ युद्ध करते हैं, कभी बड़े-बड़े यज्ञ करते हैं, कभी तीर्थमें कठोर तपस्या करते हैं और हे सुव्रत ! कभी योगनिद्राके वशीभूत होकर शय्यापर सोते हैं। वे भगवान् मधुसूदन कभी भी स्वतन्त्र नहीं रहते॥ ११—१४ १/२ ॥
न स्वतन्त्रः कदाचिच्च भगवान्मधुसूदनः।<br>तथा ब्रह्मा तथा रुद्रस्तथेन्द्रो वरुणो यमः॥ १५<br><br>कुबेरोऽग्नी रवीन्दू च तथान्ये सुरसत्तमाः।<br>मुनयः सनकाद्याश्च वसिष्ठाद्यास्तथापरे॥ १६<br><br>सर्वेऽम्बावशगा नित्यं पाञ्चालीव नरस्य च।<br>नसि प्रोता यथा गावो विचरन्ति वशानुगाः॥ १७ऐसे ही ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र, वरुण, यम, कुबेर, अग्नि, सूर्य, चन्द्र, अन्य श्रेष्ठ देवतागण, सनक आदि मुनि और वसिष्ठ आदि महर्षि—ये सब-के-सब बाजीगरके अधीन कठपुतलीकी भाँति सदा भगवतीके वशमें रहते हैं। जिस प्रकार नथे हुए बैल अपने स्वामीके अधीन रहकर विचरण करते हैं, उसी प्रकार सभी देवता कालपाशमें आबद्ध रहते हैं॥ १५—१७ १/२ ॥
तथैव देवताः सर्वाः कालपाशनियन्त्रिताः।<br>हर्षशोकादयो भावा निद्रातन्द्रालसादयाः ॥ १८<br><br>सर्वेषां सर्वदा राजन्देहिनां देहसंश्रिताः।<br>अमरा निर्जराः प्रोक्ता देवाश्च ग्रन्थकारकैः॥ १९हे राजन् ! हर्ष, शोक, निद्रा, तन्द्रा, आलस्य आदि भाव सभी देहधारियोंके शरीरमें सदा विद्यमान रहते हैं। ग्रन्थकारोंने देवताओंको अमर (मृत्युरहित) तथा निर्जर (बुढ़ापारहित) कहा है, किंतु वे निश्चय ही केवल नामसे अमर हैं, अर्थसे कभी भी वैसे नहीं हैं।

| अ० २० ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४९७ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अभिधानतश्चार्थतो न ते नूनं तादृशाः क्वचित्।<br>उत्पत्तिस्थितिनाशाख्या भावा येषां निरन्तरम्॥ २०<br><br>अमरास्ते कथं वाच्या निर्जराश्च कथं पुनः।<br>कथं दुःखाभिभूता वा जायन्ते विबुधोत्तमाः॥ २१<br><br>कथं देवाश्च वक्तव्या व्यसने क्रीडनं कथम्।<br>क्षणादुत्पत्तिनाशश्च दृश्यतेऽस्मिन्न संशयः॥ २२<br><br>जलजानां च कीटानां मशकानां तथा पुनः।<br>उपमा न कथं चैषामायुषोऽन्ते मराः स्मृताः॥ २३जिनमें सदा उत्पत्ति, स्थिति और विनाश नामक अवस्थाएँ रहती हैं, वे अमर और निर्जर कैसे कहे जा सकते हैं? वे देवता विबुध (विशेष बुद्धिवाले) होते हुए भी दुःखोंसे पीड़ित क्यों होते हैं? जब वे भी [सामान्य लोगोंकी भाँति] व्यसन तथा क्रीडामें आसक्त रहते हैं, तब उन्हें देव क्यों कहा जाय? इसमें कोई सन्देह नहीं कि सामान्य जीवोंकी भाँति इनकी भी क्षणमें उत्पत्ति होती है और क्षणमें नाश होता है। [ऐसी स्थितिमें] इनकी उपमा जलमें उत्पन्न होनेवाले कीटों और मच्छरोंसे क्यों न दी जाय? और जब आयुके समाप्त होनेपर वे भी मर जाते हैं, तब उन्हें [अमर न कहकर] 'मर' क्यों न कहा जाय?॥ १८—२३॥
ततो वर्षायुषश्चापि शतवर्षायुषस्तथा।<br>मनुष्या ह्यमरा देवास्तस्माद् ब्रह्मा परः स्मृतः॥ २४<br><br>रुद्रस्तथा तथा विष्णुः क्रमशश्च भवन्ति हि।<br>नश्यन्ति क्रमशश्चैव वर्धन्ति चोत्तरोत्तरम्॥ २५कुछ मनुष्य एक वर्षकी आयुवाले और कुछ सौ वर्षकी आयुवाले होते हैं, उनसे अधिक आयुवाले देवता होते हैं और उनसे भी अधिक आयुवाले ब्रह्मा कहे गये हैं। ब्रह्मासे अधिक आयुवाले शिव हैं और उनसे भी अधिक आयुवाले विष्णु हैं। अन्तमें वे भी नष्ट होते हैं और इसके बाद वे फिरसे क्रमशः उत्पन्न होते हैं और उत्तरोत्तर बढ़ते हैं॥ २४-२५॥
नूनं देहवतो नाशो मृतस्योत्पत्तिरेव च।<br>चक्रवद् भ्रमणं राजन् सर्वेषां नात्र संशयः॥ २६हे राजन्! निश्चितरूपसे सभी देहधारियोंकी मृत्यु होती है और मरे हुए प्राणीका जन्म होता है। इस प्रकार पहियेकी भाँति सभी प्राणियोंका [जन्म-मृत्युका] चक्कर लगा रहता है; इसमें सन्देह नहीं है॥ २६॥
मोहजालावृतो जन्तुर्मुच्यते न कदाचन।<br>मायायां विद्यमानायां मोहजालं न नश्यति॥ २७मोहके जालमें फँसा हुआ प्राणी कभी मुक्त नहीं होता; क्योंकि मायाके रहते मोहका बन्धन नष्ट नहीं होता है॥ २७॥
उत्पित्सुकाल उत्पत्तिः सर्वेषां नृप जायते।<br>तथैव नाशः कल्पान्ते ब्रह्मादीनां यथाक्रमम्॥ २८हे राजन्! सृष्टिके समय ब्रह्मा आदि सभी देवताओंकी उत्पत्ति होती है और कल्पके अन्तमें क्रमशः उनका नाश भी हो जाता है॥ २८॥
निमित्तं यस्तु यन्नाशे स घातयति तं नृप।<br>नान्यथा तद्भवेन्नूनं विधिना निर्मितं तु यत्॥ २९हे नृप! जिसके नाशमें जो निमित्त बन चुका है, उसीके द्वारा उसकी मृत्यु होती है। विधाताने जो रच दिया है, वह अवश्य होता है; इसके विपरीत कुछ नहीं होता॥ २९॥
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखं वा सुखमेव वा।<br>तत्तथैव भवेत्कामं नान्यथेह विनिर्णयः॥ ३०जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा, रोग, दुःख अथवा सुख—जो सुनिश्चित है, वह उसी रूपमें अवश्य प्राप्त होता है; इसके विपरीत दूसरा सिद्धान्त है ही नहीं॥ ३०॥

| ४९८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २० | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सर्वेषां सुखदौ देवौ प्रत्यक्षौ शशिभास्करौ।<br>न नश्यति तयोः पीडा क्वचित्तद्दैरिसम्भवा॥ ३१<br><br>भास्करस्य सुतो मन्दः क्षयी चन्द्रः कलङ्कवान्।<br>पश्य राजन् विधेः सूत्रं दुवारं महतामपि॥ ३२प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाले सूर्य तथा चन्द्रदेव सबको सुख प्रदान करते हैं, किंतु उनके शत्रु [राहु]-के द्वारा उन्हें होनेवाली पीड़ा दूर नहीं होती। सूर्यपुत्र शनैश्चर 'मन्द' और चन्द्रमा 'क्षयरोगी तथा कलंकी' कहे जाते हैं। हे राजन्! देखिये, बड़े-बड़े देवताओंके भी विषयमें विधिका विधान अटल है॥ ३१—३२॥
वेदकर्ता जगत्स्रष्टा बुद्धिदस्तु चतुर्मुखः।<br>सोऽपि विक्लवतां प्राप्तो दृष्ट्वा पुत्रीं सरस्वतीम्॥ ३३ब्रह्माजी वेदकर्ता, जगत्की सृष्टि करनेवाले तथा सबको बुद्धि देनेवाले हैं, किंतु वे भी सरस्वतीको देखकर विकल हो गये॥ ३३॥
शिवस्यापि मृता भार्या सती दग्ध्वा कलेवरम्।<br>सोऽभवद्दुःखसन्तप्तः कामार्तश्च जनार्तिहा॥ ३४<br><br>कामाग्निदग्धदेहस्तु कालिन्द्यां पतितः शिवः।<br>सापि श्यामजला जाता तन्निदाघवशाम्नृप॥ ३५जब शिवजीकी भार्या सती अपने शरीरको दग्ध करके मर गयी, तब लोगोंका दुःख दूर करनेवाले होते हुए भी वे शिवजी शोकसन्तप्त तथा पीड़ित हो गये। उस समय कामाग्निसे जलते हुए देहवाले शिवजी यमुनानदीमें कूद पड़े। तब हे राजन्! उनके तापके कारण यमुनाजीका जल श्यामवर्णका हो गया॥ ३४-३५॥
कामार्तो रममाणस्तु नग्नः सोऽपि भृगोर्वनम्।<br>गतः प्राप्तोऽथ भृगुणा शप्तः कामातुरो भृशम्॥ ३६<br><br>पतत्वद्यैव ते लिङ्गं निर्लज्जेति भृशं किल।<br>पपौ चामृतवापीञ्च दानवैर्निर्मितां मुदे॥ ३७भृगुके वनमें जाकर जब वे शिवजी दिगम्बर होकर विहार करने लगे, तब भृगुमुनिने अतीव आतुर उन शिवजीको यह शाप दे दिया—हे निर्लज्ज ! तुम्हारा लिंग अभी कटकर गिर जाय। तब शान्तिके लिये शिवजीने दानवोंके द्वारा निर्मित बावलीका अमृत पिया॥ ३६-३७॥
इन्द्रोऽपि च वृषो भूत्वा वाहनत्वं गतः क्षितौ।<br>आद्यस्य सर्वलोकस्य विष्णोरेव विवेकिनः॥ ३८<br><br>सर्वज्ञत्वं गतं कुत्र प्रभुशक्तिः कुतो गता।<br>यद्धेममृगविज्ञानं न ज्ञातं हरिणा किल॥ ३९बैल बनकर इन्द्रको भी धरातलपर [सूर्यवंशी राजा ककुत्स्थका] वाहन बनना पड़ा। समस्त लोकके आदिपुरुष और महान् विवेकशील भगवान् विष्णुकी सर्वज्ञता तथा प्रभुशक्ति उस समय कहाँ चली गयी थी, जब [रामावतारमें] वे स्वर्णमृग-सम्बन्धी उस विशेष रहस्यको बिलकुल नहीं जान सके !॥ ३८-३९॥
राजन् मायाबलं पश्य रामो हि काममोहितः।<br>रामो विरहसन्तप्तो रुरोद भृशमातुरः॥ ४०<br><br>योऽपृच्छत्पादपान्मूढः क्व गता जनकात्मजा।<br>भक्षिता वा हृता केन रुदन्नुच्चतरं ततः॥ ४१हे राजन् ! मायाका बल तो देखिये कि भगवान् श्रीराम भी कामसे व्याकुल हुए। उन श्रीरामने सीताके वियोगसे संतप्त तथा व्याकुल होकर बहुत विलाप किया था। वे विह्वल होकर जोर-जोरसे रोते हुए वृक्षोंसे पूछते-फिरते थे कि सीता कहाँ चली गयी? उसे कोई [हिंसक जन्तु] खा गया या किसीने हर लिया ?॥ ४०-४१॥

| अ० २० ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४९९ | | :--- | :--- | | लक्ष्मणाहं मरिष्यामि कान्ताविरहदुःखितः।<br>त्वं चापि मम दुःखेन मरिष्यसि वनेऽनुज॥ ४२<br><br>आवयोर्मरणं ज्ञात्वा माता मम मरिष्यति।<br>शत्रुघ्नोऽप्यतिदुःखार्तः कथं जीवितुमर्हति॥ ४३<br><br>सुमित्रा जीवितं जह्यात्पुत्रव्यसनकर्शिता।<br>पूर्णकामाथ कैकेयी भवेत्पुत्रसमन्विता॥ ४४ | हे लक्ष्मण! मैं तो अपनी भार्याके वियोगसे दुःखित होकर मर जाऊँगा और हे अनुज! मेरे दुःखसे तुम भी इस वनमें मर जाओगे। इस प्रकार हम दोनोंकी मृत्यु जान करके मेरी माता कौसल्या मर जायँगी। शत्रुघ्न भी इस महान् दुःखसे पीड़ित होकर कैसे जीवित रह पायेगा? तब पुत्रमरणसे व्यथित होकर माता सुमित्रा भी अपने प्राण त्याग देंगी, किंतु अपने पुत्र भरतके साथ कैकेयीकी कामना अवश्य पूर्ण हो जायगी॥ ४२-४४॥ | | हा सीते क्व गतासि त्वं मां विहाय स्मरातुरा।<br>एह्येहि मृगशावाक्षि मां जीवय कृशोदरि॥ ४५<br><br>किं करोमि क्व गच्छामि त्वदधीनञ्च जीवितम्।<br>समाश्वासय दीनं मां प्रियं जनकनन्दिनि॥ ४६ | हा सीते! मुझे पीड़ित छोड़कर तुम कहाँ चली गयी हो? हे मृगलोचने! आओ, आओ। हे कृशोदरि! मुझे जीवन प्रदान करो। हे जनकनन्दिनि! मैं क्या करूँ और कहाँ जाऊँ? मेरा जीवन तो तुम्हारे अधीन है। अपने प्रिय मुझ दुःखितको सान्त्वना प्रदान करो॥ ४५-४६॥ | | एवं विलपता तेन रामेणामिततेजसा।<br>वने वने च भ्रमता नेक्षिता जनकात्मजा॥ ४७<br><br>शरण्यः सर्वलोकानां रामः कमललोचनः।<br>शरणं वानराणां स गतो मायाविमोहितः॥ ४८<br><br>सहायान्वानरान्कृत्वा बबन्ध वरुणालयम्।<br>जघान रावणं वीरं कुम्भकर्णं महोदरम्॥ ४९ | इस प्रकार विलाप करते हुए तथा वन-वन भटकते हुए वे अमित तेजस्वी राम जनकपुत्री सीताको नहीं खोज पाये। तत्पश्चात् समस्त लोकोंको शरण देनेवाले वे कमलनयन श्रीराम मायासे मोहित होकर वानरोंकी शरणमें गये। उन वानरोंको सहायक बनाकर उन्होंने समुद्रपर सेतु बाँधा और पराक्रमी रावण, कुम्भकर्ण तथा महोदरका संहार किया॥ ४७-४९॥ | | आनीय च ततः सीतां रामो दिव्यमकारयत्।<br>सर्वज्ञोऽपि हृतां मत्वा रावणेन दुरात्मना॥ ५० | तदनन्तर दुष्टात्मा रावणके द्वारा सीताको हरी गयी समझकर सर्वज्ञ होते हुए भी श्रीरामने उन्हें लाकर उनकी अग्निपरीक्षा करायी॥ ५०॥ | | किं ब्रवीमि महाराज योगमायाबलं महत्।<br>यया विश्वमिदं सर्वं भ्रामितं भ्रमते किल॥ ५१ | हे महाराज! योगमायाकी महिमा बहुत बड़ी है। मैं उन योगमायाके विषयमें क्या कहूँ, जिनके द्वारा नचाया हुआ यह सम्पूर्ण विश्व निरन्तर चक्कर काट रहा है॥ ५१॥ | | एवं नानावतारेऽत्र विष्णुः शापवशं गतः।<br>करोति विविधाश्चेष्टा दैवाधीनः सदैव हि॥ ५२ | इस प्रकार शापके वशीभूत होकर भगवान् विष्णु इस लोकमें [धारण किये गये] अनेक अवतारोंमें दैवके अधीन होकर नाना प्रकारकी लीलाएँ करते हैं॥ ५२॥ | | तवाहं कथयिष्यामि कृष्णस्यापि विचेष्टितम्।<br>प्रभवं मानुषे लोके देवकार्यार्थसिद्धये॥ ५३ | अब मैं आपसे देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये मनुष्य-लोकमें भगवान् श्रीकृष्णके अवतार तथा उनकी लीलाका वर्णन करूँगा॥ ५३॥ |

५००श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २०
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कालिन्दीपुलिने रम्ये ह्यासीन्मधुवनं पुरा।<br>लवणो मधुपुत्रस्तु तत्रासीद्दानवो बली॥ ५४प्राचीन समयकी बात है—यमुनाके मनोहर तटपर मधुवन नामक एक वन था। वहाँ लवणासुर नामवाला एक बलवान् दानव रहता था, जो मधुका पुत्र था॥ ५४॥
द्विजानां दुःखदः पापो वरदानेन गर्वितः।<br>निहतोऽसौ महाभाग लक्ष्मणस्यानुजेन वै॥ ५५वरप्राप्तिके कारण अभिमानमें चूर वह पापी दैत्य ब्राह्मणोंको दुःख देता था। हे महाभाग! लक्ष्मणके छोटे भाई शत्रुघ्नने संग्राममें उसका वध कर दिया। उस मदोन्मत्तको मारकर उन्होंने मथुरा नामक परम सुन्दर नगरी बसायी॥ ५५-५६॥
शत्रुघ्नेनाथ संग्रामे तं निहत्य मदोत्कटम्।<br>वासिता मथुरा नाम पुरी परमशोभना॥ ५६
स तत्र पुष्कराक्षौ द्वौ पुत्रौ शत्रुनिषूदनः।<br>निवेश्य राज्ये मतिमान्काले प्राप्ते दिवं गतः॥ ५७कमलके समान नेत्रोंवाले अपने दो पुत्रोंको राज्यकार्यमें नियुक्त करके वे बुद्धिमान् शत्रुघ्न समय आ जानेपर स्वर्ग चले गये॥ ५७॥
सूर्यवंशक्षये तां तु यादवाः प्रतिपेदिरे।<br>मथुरां मुक्तिदां राजन् ययातितनयः पुरा॥ ५८सूर्यवंशके नष्ट हो जानेपर उस मुक्तिदायिनी मथुराको यादवोंने अधिकारमें कर लिया। हे राजन्! पूर्वकालमें राजा ययातिका शूरसेन नामक एक पराक्रमी पुत्र था, जो वहाँका राजा हुआ। हे राजन्! उसने मथुरा और शूरसेन दोनों ही राज्योंके विषयोंका भोग किया॥ ५८—५९॥
शूरसेनाभिधः शूरस्तत्राभून्मेदिनीपतिः।<br>माथुराञ्छूरसेनांश्च बुभुजे विषयान्नृप॥ ५९
तत्रोत्पन्नः कश्यपांशः शापाच्च वरुणस्य वै।<br>वसुदेवोऽतिविख्यातः शूरसेनसुतस्तदा॥ ६०वहाँपर वरुणदेवके शापवश महर्षि कश्यपके अंशस्वरूप परम यशस्वी वसुदेवजी शूरसेनके पुत्र होकर उत्पन्न हुए। पिताके मर जानेपर वे वसुदेवजी वैश्यवृत्तिमें संलग्न होकर जीवन-यापन करने लगे। उस समय वहाँके राजा उग्रसेन थे और उनका कंस नामक एक प्रतापी पुत्र था॥ ६०-६१॥
वैश्यवृत्तिरतः सोऽभून्मृते पितरि माधवः।<br>उग्रसेनो बभूवाथ कंसस्तस्यात्मजो महान्॥ ६१
अदितिर्देवकी जाता देवकस्य सुता तदा।<br>शापाद्वै वरुणस्याथ कश्यपानुगता किल॥ ६२वरुणदेवके ही शापके कारण कश्यपकी अनुगामिनी अदिति भी राजा देवककी पुत्री देवकीके रूपमें उत्पन्न हुईं। महात्मा देवकने उस देवकीको वसुदेवको सौंप दिया। विवाह सम्पन्न हो जानेके पश्चात् वहाँ आकाशवाणी हुई—हे महाभाग कंस! इस देवकीके गर्भसे उत्पन्न होनेवाला आठवाँ ऐश्वर्यशाली पुत्र तुम्हारा संहारक होगा॥ ६२—६४॥
दत्ता सा वसुदेवाय देवकेन महात्मना।<br>विवाहे रचिते तत्र वागभूद् गगने तदा॥ ६३
कंस कंस महाभाग देवकीगर्भसम्भवः।<br>अष्टमस्तु सुतः श्रीमांस्तव हन्ता भविष्यति॥ ६४
तच्छ्रुत्वा वचनं कंसो विस्मितोऽभून्महाबलः।<br>देववाचं तु तां मत्वा सत्यां चिन्तामवाप सः॥ ६५उस आकाशवाणीको सुनकर महाबली कंस आश्चर्यचकित हो गया। उस आकाशवाणीको सत्य मानकर वह चिन्तामें पड़ गया। ‘अब मैं क्या करूँ’ ऐसा भलीभाँति सोच-विचारकर उसने यह निश्चय किया कि यदि मैं देवकीको इसी समय शीघ्र मार डालूँ तो मेरी मृत्यु नहीं होगी। मृत्युका भय उत्पन्न करनेवाले
किं करोमीति सञ्चिन्त्य विमर्शमकरोत्तदा।<br>निहत्यैनां न मे मृत्युर्भवेदद्यैव सत्वरम्॥ ६६

| अ० २० ] | चतुर्थ स्कन्ध | ५०१ | | :--- | :--- |

| उपायो नान्यथा चास्मिन्कार्ये मृत्युभयावहे।<br>इयं पितृष्वसा पूज्या कथं हन्मीत्यचिन्तयत्॥ ६७ | इस विषम अवसरपर दूसरा कोई उपाय नहीं है, किंतु यह मेरी पूज्य चचेरी बहन है। अतः इसकी हत्या कैसे करूँ, वह ऐसा सोचने लगा॥ ६५-६७॥ | | पुनर्विचारयामास मरणं मेऽस्त्यहो स्वसा।<br>पापेनापि प्रकर्तव्या देहरक्षा विपश्चिता॥ ६८<br><br>प्रायश्चित्तेन पापस्य शुद्धिर्भवति सर्वदा।<br>प्राणरक्षा प्रकर्तव्या बुधैरप्येनसा तथा॥ ६९ | उसने पुनः सोचा—अरे! यही बहन तो मेरी मृत्युस्वरूपा है। बुद्धिमान् मनुष्यको पापकर्मसे भी अपने शरीरकी रक्षा कर लेनी चाहिये। बादमें प्रायश्चित्त कर लेनेसे उस पापकी शुद्धि हो जाती है। अतः चतुर लोगोंको चाहिये कि पापकर्मसे भी अपने प्राणकी रक्षा कर लें॥ ६८-६९॥ | | विचिन्त्य मनसा कंसः खड्गमादाय सत्वरः।<br>जग्राह तां वरारोहां केशेष्वाकृष्य पापकृत्॥ ७०<br><br>कोशात्खड्गमुपाकृष्य हन्तुकामो दुराशयः।<br>पश्यतां सर्वलोकानां नवोढां तां चकर्ष ह॥ ७१ | मनमें ऐसा सोचकर पापी कंसने बाल खींचकर उस सुन्दरी देवकीको तुरंत पकड़ लिया। तत्पश्चात् म्यानसे तलवार निकालकर उसे मारनेकी इच्छासे बुरे विचारोंवाला कंस सभी लोगोंके सामने ही उस नवविवाहिता देवकीको अपनी ओर खींचने लगा॥ ७०-७१॥ | | हन्यमानाञ्च तां दृष्ट्वा हाहाकारो महानभूत्।<br>वसुदेवानुगा वीरा युद्धायोद्यतकार्मुकाः॥ ७२<br><br>मुञ्च मुञ्चेति प्रोचुस्तं ते तदाद्भुतसाहसाः।<br>कृपया मोचयामासुर्देवकीं देवमातरम्॥ ७३ | उसे मारी जाती देखकर लोगोंमें महान् हाहाकार मच गया। वसुदेवजीके वीर साथीगण धनुष लेकर युद्धके लिये तैयार हो गये। अद्भुत साहसवाले वे सब कंससे कहने लगे—कृपा करके इसे छोड़ दो, छोड़ दो। वे देवमाता देवकीको कंससे छुड़ाने लगे॥ ७२-७३॥ | | तद्युद्धमभवद् घोरं वीराणाञ्च परस्परम्।<br>वसुदेवसहायानां कंसेन च महात्मना॥ ७४<br><br>वर्तमाने तथा युद्धे दारुणे लोमहर्षणे।<br>कंसं निवारयामासुर्वृद्धा ये यदुसत्तमाः॥ ७५ | तब शक्तिशाली कंसके साथ वसुदेवजीके पराक्रमी सहायकोंका घोर युद्ध होने लगा। उस भीषण लोमहर्षक युद्धके निरन्तर होते रहनेपर जो श्रेष्ठ तथा वृद्ध यदुगण थे, उन्होंने कंसको युद्ध करनेसे रोक दिया॥ ७४-७५॥ | | पितृष्वसेयं ते वीर पूजनीया च बालिशा।<br>न हन्तव्या त्वया वीर विवाहोत्सवसङ्गमे॥ ७६<br><br>स्त्रीहत्या दुःसहा वीर कीर्तिघ्नी पापकृत्तमा।<br>भूतभाषितमात्रेण न कर्तव्या विजानता॥ ७७ | [उन्होंने कंससे कहा—] हे वीर! यह तुम्हारी पूजनीय चचेरी बहन है। इस विवाहोत्सवके शुभ अवसरपर तुम्हें इस अबोध देवकीकी हत्या नहीं करनी चाहिये। हे वीर! स्त्रीहत्या दुःसह कार्य है; यह यशका नाश करनेवाली है और इससे घोर पाप लगता है। केवल आकाशवाणी सुनकर तुम-जैसे बुद्धिमान्‌को बिना सोचे-समझे यह हत्या नहीं करनी चाहिये॥ ७६-७७॥ | | अन्तर्हितेन केनापि शत्रुणा तव चास्य वा।<br>उदितेति कुतो न स्याद्वागनर्थकरी विभो॥ ७८<br><br>यशसस्ते विघाताय वसुदेवगृहस्य च।<br>अरिणा रचिता वाणी गुणमायाविदा नृप॥ ७९ | हे विभो! हो-न-हो तुम्हारे या इन वसुदेवके किसी गुप्त शत्रुने यह अनर्थकारी वाणी बोल दी हो। हे राजन्! तुम्हारा यश और वसुदेवका गार्हस्थ्य नष्ट करनेके लिये किसी मायावी शत्रुने यह कृत्रिम वाणी घोषित कर दी हो॥ ७८-७९॥ |

५०२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २०

| बिभेषि वीरस्त्वं भूत्वा भूतभाषितभाषया।<br>यशोमूलविघातार्थमुपायस्त्वरिणा कृतः॥ ८० | तुम वीर होकर भी आकाशवाणीसे डर रहे हो तुम्हारे यशरूपी वृक्षको उखाड़ फेंकनेके लिये तुम्हारे किसी शत्रुने ही यह चाल चली है॥ ८०॥ | | पितृष्वसा न हन्तव्या विवाहसमये पुनः।<br>भवितव्यं महाराज भवेच्च कथमन्यथा॥ ८१ | जो कुछ भी हो, विवाहके इस अवसरपर तुम्हें बहनकी हत्या तो करनी ही नहीं चाहिये। हे महाराज! होनहार तो होगी ही, उसे कोई कैसे टाल सकता है?॥ ८१॥ | | एवं तैर्बोध्यमानोऽसौ निवृत्तो नाभवद्यदा।<br>तदा तं वसुदेवोऽपि नीतिज्ञः प्रत्यभाषत॥ ८२<br><br>कंस सत्यं ब्रवीम्यद्य सत्याधारं जगत्त्रयम्।<br>दास्यामि देवकीपुत्रानुत्पन्नांस्तव सर्वशः॥ ८३<br><br>जातं जातं सुतं तुभ्यं न दास्यामि यदि प्रभो।<br>कुम्भीपाके तदा घोरे पतन्तु मम पूर्वजाः॥ ८४ | इस प्रकार उन वृद्ध यादवोंके समझानेपर भी जब वह कंस पापकर्मसे विरत नहीं हुआ, तब नीतिज्ञ वसुदेवजीने उससे कहा—हे कंस! तीनों लोक सत्यपर टिके हुए हैं, अतः मैं इस समय तुमसे सत्य बोल रहा हूँ। उत्पन्न होते ही देवकीके सभी पुत्रोंको लाकर मैं आपको दे दूँगा। हे विभो! यदि क्रमसे उत्पन्न होते हुए ही प्रत्येक पुत्र आपको न दे दूँ तो मेरे पूर्वज भयंकर कुम्भीपाक नरकमें गिर पड़ें॥ ८२–८४॥ | | श्रुत्वाथ वचनं सत्यं पौरवा ये पुरःस्थिताः।<br>ऊचुस्ते त्वरिताः कंसं साधु साधु पुनः पुनः॥ ८५<br><br>न मिथ्या भाषते क्वापि वसुदेवो महामनाः।<br>केशं मुञ्च महाभाग स्त्रीहत्या पातकं तथा॥ ८६ | वसुदेवजीका यह सत्य वचन सुनकर वहाँ जो नागरिक सामने खड़े थे, वे कंससे तुरंत बोल उठे—'बहुत ठीक, बहुत ठीक। महात्मा वसुदेव कभी भी झूठ नहीं बोलते। हे महाभाग! अब इस देवकीके केश छोड़ दीजिये; क्योंकि स्त्रीहत्या पाप है'॥ ८५-८६॥ | | व्यास उवाच<br>एवं प्रबोधितः कंसो यदुवृद्धैर्महात्मभिः।<br>क्रोधं त्यक्त्वा स्थितस्तत्र सत्यवाक्यानुमोदितः॥ ८७ | व्यासजी बोले—उन महात्मा वृद्ध यादवोंके इस प्रकार समझानेपर कंसने क्रोध त्यागकर वसुदेवजीके सत्य वचनपर विश्वास कर लिया॥ ८७॥ | | ततो दुन्दुभयो नेदुर्वादित्राणि च सस्वनुः।<br>जयशब्दस्तु सर्वेषामुतपन्नस्तत्र संसदि॥ ८८ | तब दुन्दुभियाँ तथा अन्य बाजे ऊँचे स्वरमें बजने लगे और उस सभामें उपस्थित सभी लोगोंके मुखसे जय-जयकारकी ध्वनि होने लगी॥ ८८॥ | | प्रसाद्य कंसं प्रतिमोच्य देवकीं<br>महाशशाः शूरसुतस्तदानीम्।<br>जगाम गेहं स्वजनानुवृत्तो<br>नवोढया वीतभयस्तरस्वी॥ ८९ | इस प्रकार उस समय महायशस्वी वसुदेवजी कंसको प्रसन्न करके उससे देवकीको छुड़ाकर उस नवविवाहिताके साथ अपने इष्टजनोंसहित निर्भय होकर शीघ्रतापूर्वक घर चले गये॥ ८९॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे कृष्णावतारकथोपक्रमवर्णनं नाम विंशोऽध्यायः॥ २०॥

अ० २१] चतुर्थ स्कन्ध ५०३

अ० २१] चतुर्थ स्कन्ध ५०३

अथैकविंशोऽध्यायः

देवकीके प्रथम पुत्रका जन्म, वसुदेवद्वारा प्रतिज्ञानुसार उसे कंसको अर्पित करना और कंसद्वारा उस नवजात शिशुका वध

संस्कृत मूल श्लोकहिन्दी अनुवाद
व्यास उवाच<br>अथ काले तु सम्प्राप्ते देवकी देवरूपिणी।<br>गर्भं दधार विधिवद्वसुदेवेन सङ्गता॥ १व्यासजी बोले—हे राजन्! इसके बाद समय आनेपर देवस्वरूपिणी देवकीने वसुदेवके संयोगसे विधिवत् गर्भ धारण किया॥ १॥
पूर्णेऽथ दशमे मासे सुषुवे सुतमुत्तमम्।<br>रूपावयवसम्पन्नं देवकी प्रथमं यदा॥ २<br><br>तदाह वसुदेवस्तां सत्यवाक्यानुमोदितः।<br>भावित्वाच्च महाभागो देवकीं देवमातरम्॥ ३दसवाँ माह पूर्ण होनेपर जब देवकीने अत्यन्त रूपसम्पन्न तथा सुडौल अंगोंवाले अत्युत्तम प्रथम पुत्रको जन्म दिया तब सत्यप्रतिज्ञासे बँधे हुए महाभाग वसुदेवने होनहारसे विवश होकर देवमाता देवकीसे कहा—॥ २-३॥
वरोरु समयं मे त्वं जानासि स्वसुतार्पणे।<br>मोचिता त्वं महाभागे शपथेन मया तदा॥ ४<br><br>इमं पुत्रं सुकेशान्ते दास्यामि भ्रातृसूनवे।<br>(खले कंसे विनाशार्थं दैवे किं वा करिष्यसि।)<br>विचित्रकर्मणां पाको दुर्ज्ञेयो ह्यकृतात्मभिः॥ ५<br><br>सर्वेषां किल जीवानां कालपाशानुवर्तिनाम्।<br>भोक्तव्यं स्वकृतं कर्म शुभं वा यदि वाशुभम्॥ ६<br><br>प्रारब्धं सर्वथैवात्र जीवस्य विधिनिर्मितम्।हे सुन्दरि! अपने सभी पुत्र कंसको अर्पित कर देनेकी मेरी प्रतिज्ञाको तुम भलीभाँति जानती हो। हे महाभागे! उस समय इसी प्रतिज्ञाके द्वारा मैंने तुम्हें कंससे मुक्त कराया था। अतएव हे सुन्दर केशोंवाली! मैं यह पुत्र तुम्हारे चचेरे भाई कंसको अर्पित कर दे रहा हूँ। (जब दुष्ट कंस अथवा प्रारब्ध विनाशके लिये उद्यत ही है तो तुम कर ही क्या सकोगी?) अद्भुत कर्मोंका परिणाम आत्मज्ञानसे रहित प्राणियोंके लिये दुर्ज्ञेय होता है। कालके पाशमें बँधे हुए समस्त जीवोंको अपने द्वारा किये गये शुभ अथवा अशुभ कर्मोंका फल निश्चितरूपसे भोगना ही पड़ता है। प्रत्येक जीवका प्रारब्ध निश्चित-रूपसे विधिके द्वारा ही निर्मित है॥ ४—६ ½ ॥
देवक्युवाच<br>स्वामिन् पूर्वं कृतं कर्म भोक्तव्यं सर्वथा नृभिः॥ ७<br><br>तीर्थैस्तपोभिर्दानैर्वा किं न याति क्षयं हि तत्।<br>लिखितो धर्मशास्त्रेषु प्रायश्चित्तविधिर्नृप॥ ८<br><br>पूर्वार्जितानां पापानां विनाशाय महात्मभिः।देवकी बोली—हे स्वामिन्! मनुष्योंको अपने पूर्वजन्ममें किये गये कर्मोंका फल अवश्य भोगना पड़ता है; किंतु क्या तीर्थाटन, तपश्चरण एवं दानादिसे वह कर्म-फल नष्ट नहीं हो सकता? हे महाराज! पूर्व अर्जित पापोंके विनाशके लिये महात्माओंने धर्मशास्त्रोंमें तो नानाविध प्रायश्चित्तके विधानका उल्लेख किया है॥ ७—८ ½ ॥
ब्रह्महा हेमहारी च सुरापो गुरुतल्पगः॥ ९<br><br>द्वादशाब्दव्रते चीर्णे शुद्धिं याति यतस्ततः।<br>मन्वादिभिर्यथोद्दिष्टं प्रायश्चित्तं विधानतः॥ १०ब्रह्महत्या करनेवाला, स्वर्णका हरण करनेवाला, सुरापान करनेवाला तथा गुरुपत्नीके साथ व्यभिचार करनेवाला महापापी भी बारह वर्षतक व्रतका अनुष्ठान कर लेनेपर शुद्ध हो जाता है। हे अनघ! उसी प्रकार मनु आदिके द्वारा उपदिष्ट प्रायश्चित्तका विधानपूर्वक