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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

आनंदमय अब संपूर्ण । करेगा जगतको श्रीकृष्ण ।
राजन् ! करें उसको श्रवण । कहता संजय ॥ ५२ ॥
महाभारतमें इस प्रकार । श्रीव्यासने जो प्रतिभा-सागर ।
शांति-कथा गायी है जो अमर । भीष्म-पर्वमें ॥ ५३ ॥
वह कृष्णार्जुन संवाद । देश-भाषामें मैं विशद ।
कह दिखलाऊंगा प्रबंध । ओवी छंदमें ॥ ५४ ॥
केवल वह शांति-कथा । चलेगी शब्दका वाक्पथ ।
पग रख श्रृंगार माथा- । पर अबिरल ॥ ५५ ॥
देशीके बोल सुंदर । सजायेंगे अलंकार ।
लजायेंगे जो मधुर । अमृतको यहां ॥ ५६ ॥
उन शब्दोंका जो शांति-गुण । दिखाएगा चंद्रमा है उष्ण ।
करेगा रसना लुबुधन । नादका लोप ॥ ५७ ॥
इससे पिशाचका भी मन । बनेगा सात्विकताकी खान ।
श्रवण-मात्रसे है सुमन । पायेगा समाधि ॥ ५८ ॥
वाग्विलास बिस्तार कर । गीतार्थसे विश्वको भर ।
बांधेंगे विशाल मंदिर । इस जगतका ॥ ५९ ॥
मिटेगी न्यूनता विवेककी । सार्थकता हो कान-मनकी ।
खुलेगी खान ब्रह्म-विद्याकी । चाहे जिसको ॥ ११६० ॥
पर-तत्त्व देखें नयन । पाये सुख-वसंतोद्यान ।
आकंठ ब्रह्म रस पान । करे विश्व ॥ ६१ ॥
होगा सब यह साकार । ऐसा बोलूंगा मैं सुंदर ।
कृपासे किया है स्वीकार । मेरा श्रीगुरुने ॥ ६२ ॥
स्पष्ट शब्दार्थसे तब ऐसे । उपमादिके अधिकतासे ।
समझाऊं प्रति -पदमैसे । भावार्थ-सार ॥ ६३ ॥
मेरे गुरुवर श्रीमंत । पूर्ण-बोधसे विद्यावंत ।
किया मुझे हो कृपायुत । श्रीगुरुने ॥ ६४ ॥
५२९ क्षेत्र क्षेत्रज्ञयोग
(67)

अबतक उस कृपासे । निकला जो मेरे मुखसे ।
मान्य हुवा आप सबसे । यहां गीतार्थ ॥ ६५ ॥
फिर आप संत चरण । देते हैं मुझको शरण ।
न रही है इसी कारण । कोई न्यूनता ॥ ६६ ॥
कभी क्या सरस्वर्तिका मूक । सहज भी होता है बालक ।
तथा न्यूनता क्या सामुद्रिक । महा-लक्ष्मीको ॥ ६७ ॥
ऐसे आप संतोंके पास । अज्ञानका कैसे वास ।
तभी मैं अब नव-रस । वर्षा करूंगा ॥ ६८ ॥
क्या कहूं अब गुरुवर । मुझे दे इक अवसर ।
ज्ञानदेव कहे सुंदर । कहूंगा गीतार्थ ॥ ६९ ॥
गीता श्लोक ३४
ज्ञानेश्वरी ओवी ११६९.

१४
गुणोत्कर्ष-गुण-निस्तारयोग
आचार्य वंदना—
जय जय आचार्य । समस्त गुरुवर्य ।
प्रज्ञा-प्रभात सूर्य । सुखोदय ॥ १ ॥
जय जय सर्व-विश्राम-स्थान । सोऽहं-भाव बोध-दाता महान ।
अनेक लोक-तरंग निदान । महा-समुद्र तू ॥ २ ॥
सुनिये आर्त-बंधू । सदा कारुण्य-सिंधू ।
विशद-विद्या- वधू । वल्लभाजी ॥ ३ ॥
जिनसे तू अदृश्य होता । उनको तू विश्व दिखाता ।
जिनसे तू प्रकट होता । तू ही सर्वस्व ॥ ४ ॥
कोई अन्योंकी दृष्टि चुराता । किंतु अपनेको है दीखता ।
तेरे लाघवकी कौतुकता । आपही अदृश्य ॥ ५ ॥
विश्वका सर्वस्व तू महान । किसे ज्ञान औ' किसे अज्ञान ।
ऐसा सहज लाघव-स्थान । नमन तुझको ॥ ६ ॥
विश्वमें जो सलिल द्रवित । तेरे द्रवसे है प्रवाहित ।
तुझसे ही सहन समर्थ । हुई पृथ्वी ॥ ७ ॥
रवि-चंद्रादि सिकता-कण । विश्वको दे प्रकाश-दान ।
तेरी ही दीप्तिके कारण । तेजका तेज तू ॥ ८ ॥
अनिलकी जो दृढ चल । उसकी नींव तेरा बल ।
गगनका जो चला खेल । तुझमें ही देव ॥ ९ ॥

अथवा जो अन्यथा ज्ञान । उसकी ज्योति आप जान ।
करना आपका वर्णन । श्रुतिको भी असाध्य ॥ १० ॥
जब तक न होता तेरा दर्शन । तब तक ही है वेदका वर्णन ।
दर्शन होने पर होते हैं मौन । हम और वेद ॥ ११ ॥
अजी ! एकार्णव-सिंधू । न जानता एक बिंदु ।
तभी नदी जाने गंध- । उसका कैसे ॥ १२ ॥
या उदय होते ही भास्वत । बन जाता है चंद्र खद्योत ।
वैसे ही हम श्रुति-सहित । बनते हैं मौन ॥ १४ ॥
अथवा मिट जाता जहां द्वैत । होता है परा पश्यंतिका अंत ।
तब होगा किस भांति वर्णित । किस भाषासे ॥ १४ ॥
इसीलिए छोड स्तवन । नम्रतासे होकर मौन ।
चरणमें करें नमन । यही भला है ॥ १५ ॥
जैसे हैं वैसे श्री गुरुवर । चरणमें करूं नमस्कार ।
सफल होनेमें वे आधार । ग्रंथ निरूपणमें ॥ १६ ॥
खोलकर अब कृपा-भांडार । मेरी बुध्दिकी झोली भरकर ।
मुझको काव्य-ज्ञान भी देकर । करें कृतार्थ ॥ १७ ॥
तब मैं विवेक-कर्ण-भूषण । चढाऊंगा संतोंको सुलक्षण ।
संभाल कर मैं अपने प्राण । तब प्रसादसे ॥ १८ ॥
गीतार्थका जो विधान । निकालेगा मेरा मन ।
उसे गुरु-कृपांजन । देना स्वामी ॥ १९ ॥
यह शब्द-सृष्टि सकल । दृष्टि देखेगी एक काल ।
वैसे उदय हो निर्मल । गुरु-कारुण्य बिंब ॥ २० ॥
मेरी प्रज्ञा-लतामें विशाल । लगे सरस काव्य-सु-फळ ।
वैसे वसंत बन स्नेहळ- । शिरोमणि देव ॥ २१ ॥
मति-गंगा-प्रवाह गंभीर । लेकर बहे प्रमेय-पूर ।
ऐसे उदार बरसा कर । मेरे स्वामी ॥ २२ ॥
ज्ञानेश्वरी ५३२

अजी ! हे विश्वैक धाम । तेरा प्रसाद चंद्रमा ।
करें मुझको पूर्णिमा । उदय होके ॥ २३ ॥
करेंगे आप यदि अवलोकन । उन्मेष-सागरमें नित-नवीन ।
आयेगा रस-वृत्तिमें उफान । स्फूर्तिमय जो ॥ २४ ॥
श्री गुरु तब हो मुदित । तूने किया है स्तवनार्थ ।
विनीत भावसे है द्वैत । बोले ऐसे ॥ २५ ॥
छोड दे यह व्यर्थके बोल । गीतार्थ कह तू अनमोल ।
श्रोताओंकी इच्छा जो निर्मल । न कर व्यर्थ ॥ २६ ॥
अजी ! हां श्रीगुरुदेव । मेरा भी यही था भाव ।
श्रीमुखसे कहे देव । कहो ग्रंथ ॥ २७ ॥
दूर्वांकुरकी मूलिका । अमर जो स्वाभाविक ।
उस पर पीयूषका । आया पूर ॥ २८ ॥
अजी ! श्रीगुरु-प्रसादसे । वर्णूंगा अभी विस्तारसे ।
मूल शास्त्रको चातुर्यसे । आपके समक्ष ॥ २९ ॥
जिससे जीवके अंतर्गत । नांव जो है संशय-भरित ।
डूबकर वह सुनिश्चित । बढेगी श्रवणेच्छा ॥ ३० ॥
वाणीमें उतरे माधुर्य । गुरु-गृहका भिक्षा-चर्य ।
वास्तविक जो है सौंदर्य । गुरु-कृपासे ॥ ३१ ॥
त्रयोदशमें श्रीकृष्ण । बोले हैं यह वचन ।
सुन तू वह अर्जुन । ध्यान देकर ॥ ३२ ॥
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ संयोगसे । बनता है जगत जैसे ।
औ' होता है गुण-संगसे । आत्मा संसारी ॥ ३३ ॥
तथा यह प्रकृतिगत । सुखदुःख भोगके हित ।
अथवा रहा गुणातीत । होकर केवल ॥ ३४ ॥
हुवा है कैसे असंगको संग । कैसे यह क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-योग ।
अथवा कैसे सुख-दुख भोग । होता है उसे ॥ ३५ ॥
५३३ गुण-निस्तारयोग

गुण हैं कितने औ' कैसे । बांधते है उनको कैसे ।
या वह गुणातीत कैसे । उसके लक्षण क्या ? ॥ ३६ ॥
करने इसका स्पष्टीकरण । इस चतुर्दशका है कथन ।
कहता है सविस्तर श्रीकृष्ण । अर्जुनसे यहां ॥ ३७ ॥
अब यहां यह ऐसा । प्रस्तुत करेगा कैसा ।
साभिप्राय जो विश्वेश । बैकुंठका ॥ ३८ ॥
कहता है वह अर्जुन । अवधानकी सर्व सेना ।
लाकर है अब भिड़ाना । ज्ञानसे यहां ॥ ३९ ॥
कहा तुझे कई प्रकारसे । करके युक्ति-वाद जिससे ।
किंतु तू उस प्रतीतिसे । भरा नहीं ॥ ४० ॥
भगवानुवाच
परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् ।
यज्ज्ञात्वामुनयः सर्वे परां सिद्धिमितोगताः ॥ १ ॥
इस समयमें अर्जुन । तुझसे कहता हूं सुन ।
कहा है जो महान-ज्ञान । श्रुतिने सर्वत्र ॥ ४१ ॥
ज्ञान मनुष्यके हृदयमें ही होता है—
वैसे ज्ञान है रूप अपना । पर उसका है जो फैलना ।
भव स्वर्गादिक जब जाना । इससे हुवा पराया ॥ ४२ ॥
अजी ! केवल इसी कारण । अन्य ज्ञान सब मानो तृण ।
शेष है यह अग्नि-समान । कहता हूं मैं ॥ ४३ ॥
भव स्वर्गको जो जानते । यज्ञको ही भला कहते ।
तथा द्वैतको है मानते । भली भांति ॥ ४४ ॥
श्री भगवानने कहा
जो सभी ज्ञानमें श्रेष्ठ ज्ञान मैं कहता तुझे ।
इसको जानके मोक्ष पाये हैं सब ही मुनि ॥ १ ॥
ज्ञानेश्वरी ५३४

इससे वे सभी ज्ञान । किये हैं स्वप्न-समान ।
वातोर्मियोंको गगन । निगलता जैसे ॥ ४५ ॥
अथवा उदित रश्मि-राज । छिपाता है चंद्रबिका तेज ।
अथवा नाना प्रलयांबुज । नदी नदादिको ॥ ४५ ॥
वैसे इसके होते ही उदय । अन्य सभी ज्ञान होते हैं लय ।
इसीलिये कहा है धनंजय । मैंने यह उत्तम ॥ ४७ ॥
अनादिसे जो मुक्त । स्थिति है पांडुसुत ।
होती है हस्तगत । इसी ज्ञानसे ॥ ४८ ॥
अंतर्मुख दृष्टिसे वह ज्ञान प्राप्त होता है--
जिसको कर प्रतीत । विचार-वीर समस्त ।
संसारको हैं सतत । दबाते जो ॥ ४९ ॥
मनसे पीछे हटाके मन । लेता है जहां विश्रांति तन ।
तब अनुभवता तन । तन-भाव ऐसा ॥ ५० ॥
फिर कर वे देह पार । दोनों ही जो एक ही बार ।
वे तोलमें पांडुकुमार । होते मेरे सम ॥ ५१ ॥
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥ २ ॥
इस ज्ञानसे मेरे समान होते हैं -
जो है मेरी नित्यता । उसीको वह पाता ।
परि-पूर्ण पूर्णता । मेरी उसको ॥ ५२ ॥
जैसे मैं आनंदानंद । सत्य-सिंधु हूं अगाध ।
नहीं है हममें भेद । रहा कोई ॥ ५३ ॥
हुए वे मुझ जैसे ही इसी ज्ञान-प्रतीतिसे ।
आना जाना उन्हे एक वे अभंग सदा सम ॥ २ ॥
५३५ गुण-निस्तारयोग

क्योंकि मैं हूं जैसा जितना । वह भी है वैसा उतना ।
घट-संगसे है गगन । होता घटाकाश जैसे ॥ ५४ ॥
नहीं हो तो दीप-मूल है एक । उसमें मिली शाखायें अनेक ।
किंतु वास्तवमें है वह एक । इसी प्रकार ॥ ५५ ॥
इसी प्रकार हे अर्जुन । द्वैत अनुभवके बिन ।
नामार्थ रूपमें हो लीन । हुए एक ॥ ५६ ॥
यही है जो एक कारण । होती जब सृष्टि निर्माण ।
तब भी है जन्म-धारण । नहीं उसको ॥ ५७ ॥
होती है जब सृष्टि निर्माण । तब न जिसे देह-धारण ।
आया उसको कहां मरण । प्रलय-कालमें ॥ ५८ ॥
इसीलिये जन्म-क्षय । अतीत है वे धनंजय ।
मद्रूप हुये निश्चय । मेरे ज्ञानसे ॥ ५९ ॥
ऐसा जो महत्व ज्ञानका । प्रिय विषय श्रीकृष्णका ।
बढाने रस अर्जुनका । बखानता है ॥ ६० ॥
स्वरूप-विस्मरण ही अज्ञान है--
तब मानो वह अर्जुन । बना लेता सर्वांग कान ।
अथवा होता अवधान- । मूर्ति केवल ॥ ६१ ॥
तब श्रीकृष्णका व्याख्यान । कर सका है आकलन ।
तथा वह हुवा निरूपण । गगनसे विशाल ॥ ६२ ॥
तब कहता है हे प्रज्ञा-कांत । उजली है आज जो वक्तृता
उसके समान ही जो श्रोता । मिला आज ॥ ६४ ॥
अजी ! यदि मैं हूं एक । देह-पाशमें अनेक ।
पकडा जाता हूं देख । गुणोंसे कैसे ॥ ६४ ॥
कैसा क्षेत्रका संग करता । कैसे जगतको मैं प्रसवता ।
इसीको मैं तुझसे कहता । सुन तू अब ॥ ६५ ॥
ज्ञानेश्वरी ५३६

तभी यह क्षेत्र कहलाता । इसमें मत्संगसे पकता ।
नाना प्राणि लेके विचित्रता । पांडुकुमार ॥ ६६ ॥
मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम् ।
संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥ ३ ॥
वैसे है यह महद्ब्रह्म । तभी यह इसका नाम ।
महदादिका जो विश्राम- । धाम है यह ॥ ६७ ॥
बढाता है यह बहु विचार । इसीलिये है पांडुकुमार ।
कहते हैं इसे सरासर । महद्ब्रह्म ॥ ६८ ॥
अव्यक्त वादका मत । कहता इसे अव्यक्त ।
सांख्य करते प्रतीत । प्रकृति है यह ॥ ६९ ॥
वेदांति इसको माया । कहते हैं प्रज्ञा-राया ।
वैसे ही इसे बताया । यह है अज्ञान ॥ ७० ॥
अपनेको है अपना । रहता है विस्मरण ।
यही रूप है अर्जुन । इस अज्ञानका ॥ ७१ ॥
अज्ञानका रूप विवेचन—
इसका होता है एक ऐसा । विचारमें न दीखता जैसा ।
दीपकके प्रकाशमें जैसा । रहता अंधःकार ॥ ७२ ॥
अथवा हिलता है जब क्षीर । न दीखती मलाई किसी ओर ।
किंतु जब होता है दूध स्थिर । तब वह दीखती ॥ ७३ ॥
अथवा न जागृति न स्वप्न । नहीं है स्वरूप अवस्थान ।
अथवा सुषुप्ति है जो घन । वैसी होती ॥ ७४ ॥
जब वायुको न प्रसवता । आकाश बांझ होता है रीता ।
वैसी होती है वह अवस्था । अज्ञानकी ॥ ७५ ॥
प्रकृति क्षेत्र है मेरा देता हूं बीज मैं उसे ।
उसमेंसे सभी भूत होते उत्पन्न भारत ॥ ३ ॥
५३७ · गुण-निस्तारयोग
(68)

यह खंभा है या मनुष्य । नहीं होता एक निश्चय ।
होता एक भास अवश्य । वैसे ही पार्थ ॥ ७६ ॥
ऐसी वस्तु होती है वैसे । वैसी नहीं दीखती जैसे ।
किंतु विपरीत भी वैसे । नहीं दीखती ॥ ७७ ॥
न होती रात या तेज । वह संधि जैसे सांझ ।
वैसे विरुद्ध ना निज । है यह अज्ञान-रूप ॥ ७८ ॥
अज्ञानावृत प्रकाश ही क्षेत्रज्ञ है--
ऐसी वस्तु होती है एक दशा । उसको कहते अज्ञान ऐसा ।
उससे लपेट लिया प्रकाश । वह है क्षेत्रज्ञ ॥ ७९ ॥
अज्ञानको महत्व देना । अपनेको ही न जानना ।
उसी रूपको है जानना । क्षेत्रज्ञका ही ॥ ८० ॥
यह है दोनोंका संयोग । जान तू इसको चांग ।
यह है सत्ता निसर्ग- । स्वभाव जान ॥ ८१ ॥
आप ही अज्ञानत्वसे । वस्तु दीखती है वैसे ।
किंतु अनेक रूपसे । जानते नहीं ॥ ८२ ॥
जैसा कोई भ्रमता एक । हुवा अब मैं राजा देख ।
या कहे पाया-स्वर्ग-लोक । कोई भ्रमिष्ठ ॥ ८३ ॥
जब दृष्टि है दृढ जाती । तब जो जो कुछ देखती ।
तभी हुई है कहलाती । सृष्टि-प्रसूती मुझसे ॥ ८४ ॥
मनुष्य जैसे स्वप्न मोहमें । अपनेको देख नग्न-रूपमें ।
वैसे आत्म-स्फुरण अभावमें । दीखता सर्व ॥ ८५ ॥
यही मैं दूसरा प्रकार । कहता सुन धनुर्धर ।
स्वप्न-सा मिथ्या मानकर । दृढ अनुभवसे ॥ ८६ ॥
मेरी यह गृहिणी । अनादि है तरुणी ।
अनिर्वचन गुणी । है अविद्या ॥ ८७ ॥
ज्ञानेश्वरी ५३८

न होना इसका रूप । व्याप्ति है इसकी अमाप ।
निद्रस्तके यह समीप । जगते ही दूर ॥ ८८॥
मैं सोता तब यह जगती । ब्रह्मांड उदरमें रखती ।
सत्ता-संभोगसे है बनती । गर्भवती यह ॥ ८९॥
प्रकृतिके आठ विकारोंकी सहायतासे अनेक ब्रह्मांड उत्पन्न होते हैं—
इसी महद्ब्रह्मका उदर । प्रकृतिके आठ ही विकार ।
गर्भ अभिवृद्धि धनुर्धर । करता जगद्रूप ॥ ९० ॥
उभय संगसे प्रथम । बुद्धि तत्वका हुवा जन्म ।
रजस वह भरा सम । बनता मन ॥ ९१ ॥
ममता तरुणी तब भनकी । रचना करती अहंकारकी ।
उसने की पंच-महाभूतोंकी । अभिव्यक्ति ॥ ९२ ॥
विषयेंद्रिय जो स्वभावता । रहती भूतोंके अंतर्गत ।
जिससे वे भी भूतोंके साथ । लेते आकार ॥ ९३ ॥
बने हुए विचार-क्षोभसे । पीछे त्रिगुण खडे होनेसे ।
तब जीव वासना गर्भसे । जाता स्थान स्थानपे ॥ ९४ ॥
जैसे बीजका एक कण । पानीसे कर संघटण ।
वृक्षका रूप सुलक्षण । लेता अपनेमें ॥ ९५ ॥
वैसे मेरे ही संग । अविद्या नाना जग ।
नित ले आता डग । अंकुर रूप ॥ ९६ ॥
अजी ! फिर वह गर्भ-गोल । जैसे रूप ले आता सकल ।
वह तू सुन अब निर्मल । चित्त देकर ॥ ९७ ॥
मणिज स्वेदज । उद्बिज जारज ।
उगते सहज । अवयव ॥ ९८ ॥
व्योम वायु-वश । बढा गर्भ-रस ।
मणिज ले खास । अवयव ॥ ९९ ॥
५३९ गुण-निस्तारयोग

पेटमें सोते तम-रज । उसमें आया आप-तेज
उससे सहज स्वेदज । उत्पन्न होते ॥ १०० ॥
आप पृथ्वी उत्कट । तम-मात्र निकृष्ट ।
स्थिर होता प्रकट । उद्बीज रूप ॥ १ ॥
पांच ही जब एकत्र होते । मन-बुद्धि साथ पाते ।
जारजका हेतु बनते । तब ये पार्थ ॥ २ ॥
ब्रह्मांडका पूर्ण रूप—
ऐसे ये चार सरल । कर चरण तल ।
महा-प्रकृति मूल । बनता शिर ॥ ३ ॥
प्रवृत्ति उसका पेट । निवृत्ति सरल पीट ।
सुर-योनि अंग आठ । उर्ध्व भागके ॥ ४ ॥
कंठ उल्हसित स्वर्ग । मृत्यु-लोक मध्य-अंग ।
पाताल है अधो-भाग । त्रिलोकका ॥ ५ ॥
ऐसा बालक एक । जन्म दिया है देख ।
जिसके तीनों लोक । है विकास ॥ ६ ॥
चौरासी लक्ष जो योनी । इसके जोडोंके मणी ।
बढता है क्षण-क्षण । यह बालक ॥ ७ ॥
शरीरके सभी अंग पर । डालती नामके अलंकार ।
बढाती मोह-स्तन्य देकर । नित्य-नवीन ॥ ८ ॥
नाना सृष्टि इस बालककी । उंगलियां कर-चरणकी ।
भिन्नाभिमान उंगुलियोंकी । मुंदरियां अनेक ॥ ९ ॥
इकलौता यह चराचर । अविचारित अति सुंदर ।
बालकको जो जन्म-देकर । बनी महान ॥ ११० ॥
ब्रह्मा इसका प्रातःकाल । विष्णु रहा मध्यान्ह काल ।
सदाशिव है सायंकाल । इस बालकका ॥ ११ ॥
ज्ञानेश्वरी ५४०

महा-प्रलय शैय्यापर सोता । जब यह खेल करके आता ।
कल्पोदयमें यह है उठता । विषम-ज्ञानसे ॥ १२ ॥
इस प्रकार अर्जुन । मिथ्या दृष्टिका सदन ।
युगानुवृत्ति चरण । रखता स-कौतुक ॥ १३ ॥
संकल्प है इसका इष्ट । अहंकार साथी विनट ।
इसका अंत है निकट । आता ज्ञानसे ॥ १४ ॥
रहने दो बखान बहुत । यह विश्व है मायासे जात ।
मेरी सत्ता है आधारभूत । इस कार्यमें ॥ १५ ॥
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः संभवन्ति याः ।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥ ४ ॥
इस दृश्यमान विश्वमें भी मैं ओतप्रोत भरा हूं—
इसीलिये मैं पिता । महद्ब्रह्म है माता ।
आपत्य पांडुसुता । जगडंबर ॥ १६ ॥
शरीर है सो अब बहुत । देखके चित्तमें न हो द्वैत ।
मन बुद्धि आदि जो हैं भूत । एक ही यहां ॥ १७ ॥
जैसे शरीरमें एक । अवयव होते अनेक ।
कैसे विचित्र विश्व देख । एक ही यहां ॥ १८ ॥
ऊंची नीची विविध प्रकार । होती डालियां विविध आकार ।
होता है उसका जो आधार । बीज एक ॥ १९ ॥
संबंध है वह भी कैसा । घट माटीका पुत्र जैसा ।
या कपासका पुत्र जैसा । वस्त्रत्व होता है ॥ १२० ॥
अनेक लहरोंकी परंपरा । सिंधु-संतति जिस प्रकार ।
सब चराचरका औ' हमारा । संबंध भी ऐसा ॥ २१ ॥
किसी भी योनिमें मूर्ति जन्मती है कहीं कभी ।
उन्हें प्रकृति है माता पिता मैं बीज रोपता ॥ ४ ॥
५४१ गुण-निस्तारयोग

तभी है अग्नि और ज्वाल । दोनों ही हैं अग्नि केवल ।
उसी भांति मेरा है सकल । संबंध वैसा ॥ २२ ॥
निर्मित जगसे यदि मैं छिपता । तब जगत्वसे है कौन दीखता ।
मानव-तेजसे क्या छिपता । कभी माणिक्य ॥ २३ ॥
जब अलंकारका रूप लिया । तब क्या उसका स्वर्णत्व गया ।
या मानो कमल खिल गया । मिटा क्या कमलत्व ॥ २४ ॥
अभी कह यह तू पार्थ । अवयवसे आच्छादित ।
या उसीसे है प्रकटित । अवयवी यहां ॥ २५ ॥
अविमें बोया गया एक दाना । बढ़कर होता है बहुगुना ।
या व्यर्थ गया है वह अर्जुन । उसी प्रकार ॥ २६ ॥
तभी विश्वके उस पार । देखना पट कर दूर ।
तब सर्वत्र धनुर्धर । केवल मैं हूं ॥ २७ ॥
तू यह साक्षात्कार । सदा हृदयमें भर ।
दृढ़तासे तू आदर । जीवनमें इसे ॥ २८ ॥
जब मैं मुझमें प्रकाशता । देहमें भिन्न दीखता ।
तब मैं गुणोंसे बंधा जाता । दीखता ऐसे ॥ २९ ॥
स्वप्नमें आप ही कल्पनासे । आत्म-मरण जगाते जैसे ।
तथा आप ही भोगते जैसे । पांडुकुमार ॥ १३० ॥
कामलमें जैसे नयन । करके पीला प्रकाशन ।
देते हैं कामलका ज्ञान । उनको ही ॥ ३१ ॥
अथवा सूर्यका प्रकाश । कराता बादलका भास ।
लोपसे देता है प्रकाश । सूर्य ही तब ॥ ३२ ॥
आनेसे ही जन्म जिसका । छाया होती कारण भयका ।
किंतु अपनेसे है छायाका । सदा अभिन्नत्व ॥ ३३ ॥
वैसे करके प्रकाशन । अनेक देहमें समान ।
दिखाता गुणका बंधन । वह मैं ही ॥ ३४ ॥
ज्ञानेश्वरी ५४२

बंध क्यों नहीं बांधता । मुझे मैं सही जानता ।
अज्ञान कारण होता । बंधका वहां ॥ ३५ ॥
मुझको ये बंधन ऐसे । किन गुणसे दीखे वैसे ।
कहता हूं शांत चित्तसे । सुन तू इसको ॥ ३६ ॥
सत्व रज तम इन तीन गुणोंके कारण पुनर्जन्म होता है—
कितने गुण है या धर्म । उसका क्या रूप औ' नाम ।
कहां हुए इसका मर्म । कहता हूं सुन ॥ ३७ ॥
सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः ।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ॥ ५ ॥
सुन सत्व रज तम । यहां तीनोंके ये नाम ।
तथा प्रकृतिसे जन्म । पाते हैं ये ॥ ३८ ॥
यहां है सत्व उत्तम । तथा रज है मध्यम ।
तीनोंमें है यह तम । कनिष्ट सहज ॥ ३९ ॥
जैसे एक ही शरीरमें तीन । अवस्थायें होती हैं भासमान ।
एक अंतःकरणमें त्रिगुण । होते हैं भास ॥ १४० ॥
जैसे जैसे कस-हीन । होता सोनेमें मिलन ।
बढ़ स्वर्णका वजन । होता अवमूल्य ॥ ४१ ॥
सावधानता जैसे जैसे । दूर होती है आलससे ।
जकड़ती है निद्रा वैसे । दृढ मूल हो ॥ ४२ ॥
अज्ञान अंगीकार कर । उठती है वृत्ति ऊपर ।
वह है सत्व रज द्वारा । तममें भी जाती ॥ ४३ ॥
यह तू जान अर्जुन । इनका नाम है गुण ।
अब करना दर्शन । बद्धताका ॥ ४४ ॥
प्रकृतिसे बने हैं ये गुण सत्व रजस्तम ।
वे निर्विकार आत्माको जोतते मान देहमें ॥ ५ ॥
५४३    गुण-निस्तारयोग

जब क्षेत्रज्ञ-दशा । आत्मा छू लेता जैसा ।
यह देह मैं ऐसा । कहने लगता ॥ ४५ ॥
जन्मसे मरण पर्यंत । देहके धर्ममें समस्त ।
यह जो ममत्वका है सूत । पिरोता है ॥ ४६ ॥
मीनके मुखमें जैसे । अमिष पहुंचनेसे ।
झटका देता कांटेसे । जल पारधी ॥ ४७ ॥
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् ।
सुखसंगेन बध्नाति ज्ञानसंगेन चानघ ॥ ६ ॥
गुणोंके लक्षण, सत्व गुण—
तभी है जो लुब्धक । सुख-ज्ञानका पाश फेंक ।
खींचता है मृग-शावक । सुख-ज्ञानमें ॥ ४८ ॥
ज्ञानसे फिर तडपता । विद्वताके पैर झाडता ।
आत्म-सुखको है गंवाता । अपने ही हाथसे ॥ ४९ ॥
विद्या-मानसे तब तोषता । किसी लाभ-मात्रसे हर्षाता ।
स्व-संतोषमें धन्य मानता । अपने आप ॥ १५० ॥
कहता भाग्य है मेरा । नहीं है ऐसा दूसरा ।
विकाराष्टकसे भरा । फूलता वह ॥ ५१ ॥
मानो इतना नहीं पूरा । बंधन लगे दूसरा ।
विद्वत्ताका भूत संवार । चढता सिरपे ॥ ५२ ॥
मैं हूं स्वयं ज्ञान-स्वरूप । खोनेका दुःख ना अमाप ।
विषय-ज्ञान-लीन आप । चढा गगन ॥ ५३ ॥
जैसे राजा स्वप्नमें । रंक बन भिक्षामें ।
दाना पाके सुखमें । मानता इंद्र ॥ ५४ ॥
इनमें शुचि जो सत्व ज्ञान आरोग्य दायक ।
सुखी मैं और मैं ज्ञानी इससे बांधता नित ॥ ६ ॥
ज्ञानेश्वरी ५४४

वैसे वह देहातीत । बनकर देहवंत ।
बहलता पांडुसुत । बाह्य-ज्ञानसे ॥ ५५ ॥
प्रवृत्ति-शास्त्र सूझता । यज्ञ-ज्ञान जूझता ।
स्वर्ग भी है दीखता । और क्या रहा ॥ ५६ ॥
मैं हूं महा-ज्ञानवान । मुझसे नहीं विद्वान ।
मेरा चित्त है गगन । या सूर्य-चंद्रका ॥ ५७ ॥
ऐसे ही सत्व-सुख-ज्ञानका । जीवमें लगे बागडोरका ।
बलसे देता जाता झटका । जुते हुये बैलकासा ॥ ५८ ॥
ऐसे ही यह रजो गुणसे । शरीरमें बंधा जाता कैसे ।
कहता हूं मैं तू सुन इसे । पांडुकुमार ॥ ५९ ॥
रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् ।
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसंगेन देहिनम् ॥ ७ ॥
रजोगुणके लक्षण—
तभी यह रज कहलाता । जीवनका रंजन जानता ।
यौवन नित बना रहता । अभिलाषाका ॥ १६० ॥
रजका जब स्पर्श होता । जीव काम-मदमें आता ।
हवा पर सवार होता । चिंतनके यह ॥ ६१ ॥
अग्नि-कुंडमें घृत सिंचन किया । विद्युताग्निने उसका साथ दिया
कहो अधिक कम क्या रह गया । कहेंगे तब ॥ ६२ ॥
इच्छा दाह तब भडकता । क्लेश-सह मधुर लगता ।
इंद्रैश्वर्य भी ओछा लगता । ऐसे समय ॥ ६३ ॥
इच्छा दाह अब बढता । मेरु भी हाथमें लगता ।
फिर भी वह है चाहता । और भी बडा ॥ ६४ ॥
रज है वासना-रूप तृष्णा आसक्ति-वर्धक ।
आत्माको कर्मके साथ बांधता बल-पूर्वक ॥ ७ ॥
५४५ गुण-निस्तारयोग
(69)

खर्च किया आज ऐसा । कलका चलेगा कैसा ।
इससे बहु बडा-सा । करेगा उद्यम ॥ ६५ ॥
दमडी पर जीवन । दे करके बलिदान ।
कमाकर एक तृण । मानता धन्य ॥ ६६ ॥
कहता स्वर्गपे जाना । सोचता कहां क्या खाना ।
यज्ञानुष्ठान करना । इसीलिये ॥ ६७ ॥
सदा व्रत पर व्रत । करता इष्ट प्राप्त्यर्थ ।
कभी कामना रहित । न करता कुछ ॥ ६८ ॥
जैसा है ग्रीष्मका पवन । न ही जानता शांति-क्षण ।
रहता वह निशिदिन । ऊधमग्रस्त ॥ ६९ ॥
होता है चंचल मीन । या कामिनी कटाक्ष समान ।
या बिजलीकी गति मान । रहता प्रवृत्तिमें ॥ १७० ॥
चाहता इसी वेगसे । संसार स्वर्ग भी वैसे ।
क्रियाकी आगमें वैसे । घुसता वह ॥ ७१ ॥
देहमें या देहसे भिन्न । तृष्णा श्रृंखलाके बंधन ।
सदा उपद्रुव्याप विभिन्न । गलेमें व्यापारके ॥ ७२ ॥
रजो गुणका यह दारुण । देहमें देहीके है बंधन ।
सुन तू अब कथा अर्जुन । तमो गुणकी ॥ ७३ ॥
तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् ।
प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत ॥ ८ ॥
तमोगुणके लक्षण-
व्यवहारके जो नयन । बंद होते जिससे जान ।
मोह-रात्रीके हैं जो घन । काले अतिशय ॥ ७४ ॥
मोहता तम देहीको अज्ञानको बढाकर ।
निद्रा प्रमाद आलस्य इससे घेर बांधता ॥ ८ ॥
ज्ञानेश्वरी ५४६

उसकी प्रीति अज्ञानसे । केवल इसी कारणसे ।
भ्रमग्रस्त होकर जैसे । नाचता जीव ॥ ७५ ॥
अविवेक महा-मंत्र । मूढता मद्य-पात्र ।
इसका है मोहनास्त्र । जीवोंके लिये ॥ ७६ ॥
अर्जुन यह है तम । इसका है यह मर्म ।
बांधता देह ही आत्म । इस अज्ञानसे ॥ ७७ ॥
ऐसा ही है सब शरीर । मानता सब चराचर ।
तम बिन अन्य विचार । नहीं है जान ॥ ७८ ॥
सब इंद्रियोंमें जाड्य । मनमें भरा है मौढ्य ।
दोनोंमें हुवा है धाढर्य । आलस्यका ॥ ७९ ॥
अंगअंग मोडता रहता । किसी काममें नहीं आता ।
उबासियां लेता रहता । प्रति क्षण ॥ १८० ॥
खुले रख भी नयन । नहीं देखता अर्जुन ।
कोई बात भी न सुन । जी ! कह उठता ॥ ८१ ॥
पत्थरसा पडा ही रहता । हिलनेकी बात न करता ।
सदा कुंडली मार बैठता । उठता नहीं ॥ ८२ ॥
धरणी धंसती है पताल । गगन गिरता धरातल ।
किंतु उठना भी है केवल । उसको नहीं भाता ॥ ८३ ॥
यह उचित या अनुचित । प्रश्न नहीं करता है चित्त ।
पडा रहना मात्र सतत । जानती बुद्धि ॥ ८४ ॥
उठाके अपने करतल । उससे पकडकर गाल ।
घुटनोंमें सिकुड सकल । बैठा रहता ॥ ८५ ॥
सोनेमें करता है मन । नींदको स्वर्ग सुख मान ।
अन्य सब तुच्छ अर्जुन । कहता आप ॥ ८६ ॥
करके ब्रह्मायु प्राप्त । सोया रहता सतत ।
दूसरी कुछ भी बात । नहीं मनमें ॥ ८७ ॥
५४७ गुण-निस्तारयोग

राह चलते भी यदि गिरता । वहींपे खर्राटे भरता ।
अमृत मिला तो भी नहीं पीता । जब आती नींद ॥ ८८ ॥
वैसे भी कभी क्रोशावेशमें । निकले कभी किसी व्यापारमें ।
निकलता जैसे अंधा क्रोधमें । उसी भांति ॥ ८९ ॥
कब कैसे बरतना । किससे कैसे बोलना ।
साध्य असाध्यका ज्ञान । न होता उसे ॥ १९० ॥
संपूर्ण अग्नि-तेज जैसे । पोंछने अपने पंखसे ।
उड़ता है पतंग वैसे । पांडुकुमार ॥ ९१ ॥
ऐसे ही काम उसे रुचता । जो न करना वही है भाता ।
वैसे वह करता रहता । प्रमाद-साहस ॥ ९२ ॥
एवं निद्रा-आलस्य-प्रमाद । तमके रूप हैं त्रिविध ।
निरुपाधिकके होते बंध । धनंजय ॥ ९३ ॥
आगसे जब घिरता काठ । तब दीखता आगसा काठ ।
या आकाशको घिरता घट । कहलाता घटाकाश ॥ ९४ ॥
पानीसे जब ताल भरता । चन्द्र-बिंब उसमें भासता ।
वैसे गुणमें भी भास होता । आत्म-तत्वका ॥ ९५ ॥
सत्त्वं सुखे संजयति रजः कर्मणि भारत ।
ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे संजयत्युत ॥ ९ ॥
रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत ।
रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥ १० ॥
सुखमें जोडता सत्त्व कर्ममें जोडता रज ।
ढकके ज्ञान संपूर्ण भ्रममें डालता तम ॥ ९ ॥
जीतके अन्य दोनोंको तीसरा करता बल ।
ऐसा कभी बढे सत्त्व कभी रज कभी तम ॥ १० ॥
ज्ञानेश्वरी ५४८