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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

आत्माके एकत्वका विवेचन-आत्मानात्म विचार-
इस प्रकारसे पार्थ । पहिलेसे ही निश्चित ।
स्पष्ट किया क्या है खेत । विवेचनसे ॥ ३९ ॥
वैसे ही क्षेत्र-दर्शन । करने दिये नयन ।
कहते हैं जिसे ज्ञान । कहा वह भी ॥ ४० ॥
वैसे ही अज्ञान लक्षण । किये सविस्तर वर्णन ।
जिसे सुनकर अर्जुन । थका होगा तू ॥ ४१ ॥
तथा स्पष्टतासे पार्थ । कहा देकर दृष्टांत ।
ज्ञेय-स्वरूप निश्चित । समझाके ॥ ४२ ॥
यह जो विवेचन संपूर्ण । करता है हृदय ग्रहण ।
मत्सिद्धि भावना प्राण । करता सहज ॥ ४३ ॥
तब देहादिका परिग्रह । होता है संन्यास निराग्रह ।
तथा प्राण होता निरीह । सेवक मेरा ॥ ४४ ॥
तब वे मैं ही हूं अर्जुन । अंतिम आसरा है जान ।
कर मुझे चित्त अर्पण । होते मद्रूप ॥ ४५ ॥
मद्रूप होनेका पथ । .रचाया सुन तू पार्थ ।
सुलभ और निश्चित । हमने यह ॥ ४६ ॥
चढनेमें जैसे सीढी रचते । अथवा ऊपर मंच बांधते ।
तथा अपनी नांव भी रखते । तैरने पूरमें ॥ ४७ ॥
सब कुछ है यदि यहां आत्मा । ऐसा कहता तो मैं वीरोत्तम ।
ग्रहण न करना मनो-धर्म । यह बात मेरी ॥ ४८ ॥
इसीलिये था जो एकाकार । कर बताये चार प्रकार ।
देखके तेरी पांडुकुमार । मंद बुद्धि ॥ ४९ ॥
शिशुको जब खिलाते । ग्रास बीस कर देते ।
वैसे ही चार कहे ये । हमने एकके ॥ ५० ॥
५०९ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

एक क्षेत्र औ' एक ज्ञान । एक ज्ञेय एक अज्ञान ।
भाग किये ये तेरी जान । ग्रहण-शक्ति ॥ ५१ ॥
किंतु इस भांतिसे भी पार्थ । मंतव्य समझमें न आता ।
तब यह दूसरी व्यवस्था । कहता तुझे ॥ ५२ ॥
चार भाग यहां नहीं करूंगा । एक ही तत्व नहीं कहूंगा ।
आत्मानात्म विचार कहूंगा । अब तुझसे ॥ ५३ ॥
किंतु तुझे इतना करना । ध्यान पूर्वक बात सुनना ।
श्रवणोंका है नाम रखना । अपना ही ॥ ५४ ॥
सुनकर कृष्ण वचन पार्थ । प्रसन्न-मन हुवा रोमांचित ।
कृष्ण मानता हुई है अंकित । बात इनपे ॥ ५५ ॥
इससे हुवा भावावेग । समेट कहता श्रीरंग ।
प्रकृति-पुरुष विभाभ । कहता हूं सुन ॥ ५६
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्धयनादी उभावपि ।
विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् ॥ १९ ॥
कहते जिसे योगी-जन । सांख्य-योग इसे अर्जुन ।
जिसको कहनेमें मान । हुवा मैं कपिल ॥ ५७ ॥
सुन तू अब निर्दोष । प्रकृति-पुरुष विवेक ।
कहता है आदि पुरुष । अर्जुनसे वहां ॥ ५८ ॥
प्रकृति प्रेरित कर्मका भोक्ता—
पुरुष अनादि है साथी । उसकी रही है प्रकृति ।
जैसे है दिवस औ' राति । दोनों अनादि ॥ ५९ ॥
रूप नहीं होता व्यर्थ । छाया होती उसके साथ ।
दाने सह भूसा भी पार्थ । बढता जैसे ॥ १६० ॥
प्रकृति-पुरुषकी है जोडी जान अनादि तू ।
होते प्रकृतिके द्वारा विकार गुण है सब ॥ १९ ॥
ज्ञानेश्वरी ५१०

दोनो रहते हैं वैसे साथ । प्रकृति-पुरुष होते व्यक्त ।
परस्पर चिपके हैं पार्थ । अनादि सिद्ध ॥ ६१ ॥
जिसका नाम क्षेत्र । कहा है एक-मात्र ।
जानता है सर्वत्र । प्रकृति उसे ॥ ६२ ॥
तथा क्षेत्रज्ञ है ऐसे । कहा है जिसको उसे ।
मानता पुरुष उसे । यह है स्पष्ट ॥ ६३ ॥
इनके हैं ये नाम भिन्न । किंतु तत्व एक अर्जुन ।
न भूलना यह लक्षण । यहां कभी ॥ ६४ ॥
रही है यहां जो सत्ता । वही पुरुष है पार्थ ।
प्रकृति नाम समस्त । क्रिया मात्रका ॥ ६५ ॥
बुध्दि-इंद्रिय-अतःकरण । इत्यादि है विकार भरण ।
तथा रहे हैं वे तीनों गुण । सत्व रजादिक ॥ ६६ ॥
इन सबका मिलन । प्रकृतिसे हुवा जान ।
इसीसे होते उमझ । सभी कर्म ॥ ६७ ॥
कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते ।
पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ॥ २० ॥
वहां इच्छा बुध्दि सहित । अहंकार सह घाटित ।
उसे चस्का लगाते पार्थ । करणोंका ॥ ६८ ॥
यही कारण करने संपन्न । जिन उपयोंका सूत्र चालन ।
उसको कहते सुन अर्जुन । कार्य है यह ॥ ६९ ॥
तथा इच्छा मदके द्वारा । प्रकृतिने मन उभारा ।
औ' इंद्रियोंका व्यवहार । वह है कर्तृत्व ॥ १७० ॥

कहा प्रकृतिके पास कर्तृत्व देह-इंद्रिका ।
तथा पुरुषके पास भोक्तृत्व सुख दुःखका ॥ २१ ॥
५११ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

सभी यह तीनों जान । कार्य कर्तृत्व कारण ।
प्रकृति मूल श्रीकृष्ण । कहता यहां ॥ ७१ ॥
ऐसे तीनोंके ही समन्वयसे । प्रकृति होती है कर्म-रूपसे ।
फिर जो गुण बढ़ाता है जैसे । लेती है वह रूप ॥ ७२ ॥
सत्व-गुणसे जो बनता । वह सत्कर्म कहलाता ।
रजसे जो है निपजता । वह है मध्यम ॥ ७३ ॥
जिसका आधार है तम । ऐसे होते हैं सब काम ।
कहलाते हैं वे अधम । जान तू यहां ॥ ७४ ॥
ऐसे होते हैं प्रकृतिसे । भले बुरे कर्म जो जैसे ।
उत्पन्न होते हैं उनसे । सुख दुःख ॥ ७५ ॥
असत्कर्मसं दुःख उत्पन्न । सत्कर्मसे है सुख अर्जुन ।
उन दोनोंको कहते जान । भोग पुरुषका ॥ ७६ ॥
सुख दुःख सब जब तक । सच मानते हैं तब तक ।
प्रकृति कर्मरत है देख । औ' पुरुष भोगता ॥ ७७ ॥
प्रकृति पुरुषका संसार । अति असंगत धनुर्धर ।
लाती है भार्या जो कमाकर । खाता है भर्त्ता ॥ ७८ ॥
तथा भर्त्ता भार्या परस्पर । नहीं करते संग संसार ।
और सुनो यह चमत्कार । प्रकृति जनती जग ॥ ७९ ॥
पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान् ।
कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ॥ २१ ॥
प्रकृतिके गुणोंसे होने वाला भास—
यह भर्त्ता है निराकार । निष्क्रिय निर्गुण है और ।
जरा-जीर्ण है धनुर्धर । वृद्धातिवृध्द ॥ ९८० ॥
बंधा है प्रकृतीसे जो उसके गुण भोगता ।
शुभाशुभ जन्म पाता प्रकृति-संगसे यह ॥ २१ ॥
ज्ञानेश्वरी ५१२

वह नाम मात्रका है पुरुष । नहीं नर नारी जो नपुंसक ।
अथवा मानो नहीं जाने एक । क्या है निश्चित ॥ ८१ ॥
वह है अचक्षु अश्रवण । तथा जो अ-हस्त अ-चरण ।
जिसका नहीं रूप औ' वर्ण । नाम भी नहीं ॥ ८२ ॥
जहां कुछ भी नहीं है पार्थ । देखती वहां प्रकृति भर्ता ।
इससे उसे भोगना होता । सुख दुःख ॥ ८३ ॥
वह है जो अकर्ता । उदास औ' अभोक्ता ।
किंतु है पतिव्रता । भोगती है ॥ ८४ ॥
उसके गुण-रूपका मेल । कर दिखाता है बड़ा खेल ।
दिखाती झांकी वह केवल । धनुर्धर ॥ ८५ ॥
इस प्रवृत्तिको यहां अब । गुण-मयी कहते हैं सब ।
अथवा वह गुणोंकी सब । मूर्ति ही है ॥ ८६ ॥
प्रति-पलमें यह नित्य-नूतन । दिखाती है गुणोंका रंग अर्जुन ।
जिससे जड़ भी उन्मादित मन । होते उन्मत्त ॥ ८७ ॥
यही है नामको प्रसिद्ध । करती है स्नेहसे स्निग्ध ।
होती हैं इंद्रियां प्रबुध्द । इससे ही ॥ ८८ ॥
अजी ! कहते हैं मन नपुंसक । किंतु भोगती वह तीनो लोक ।
ऐसे ऐसे हैं इसके अलौकिक । करतूत सारे ॥ ८९ ॥
भ्रमका यह महा-द्वीप । व्याप्तिका है सुंदर रूप ।
विकार इसके अमाप । सभी प्रकारके ॥ ९९० ॥
यह है कामकी मांडवी । मोह-वनकी जो माधवी ।
इसको कहते हैं “देवी- । माया” है यह ॥ ९१ ॥
यह है वाङ्मयका विस्तार । नाम-रूप करती साकार ।
प्रपंच जाल जो निरंतर । फैलती अभंग ॥ ९२ ॥
कालकी है यही जाया । विद्याको इसने किया ।
इच्छा ज्ञान तथा क्रिया । इसीसे जान ॥ ९३ ॥
५१३
(65) क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

यह है नादका टंकसाळ । सकल चमत्कारका स्थल ।
अथवा करती सब खेल । अखिल विश्वका ॥ ९४ ॥
उत्पत्ति प्रलय जो पार्थ । इसके सब सायं-प्रात ।
यह सब अति अद्भुत । मोहका सारा ॥ ९५ ॥
अद्वयकी दूसरी मूर्ति । मानो निःसंगकी साथी ।
शून्यके घरमें वस्ति । धनंजय ॥ ९६ ॥
उसका है पांडुकुमार । सौभाग्य-व्याप्तिका विस्तार ।
अनावृत पुरुष पर । डालती आवरण ॥ ९७ ॥
सदा है वह निर्विकार । बनती उसके विकार ।
वहां यह सब प्रकार । बनती आप ॥ ९८ ॥
उस स्वयंभूकी है उत्पत्ति । उस अमूर्तकी जो है मूर्ति ।
तथा बनती स्थिति-प्रकृति । स्वयं आप ॥ ९९ ॥
उस अनार्तकी यह आर्त । तथा पूर्णत्वकी यह तृप्त ।
उस अकुलकी जात-गोत । बनती यही ॥ १००० ॥
अवर्णनीयका वर्णन । उस अपारका प्रमाण ।
तथा उस अमनस्कका मन । बुद्धि भी बनती ॥ १ ॥
उस निराकारका आकार । तथा निष्व्यापारका व्यापार ।
निरहंकारका अहंकार । बन बैठती है ॥ २ ॥
उस अनामका नाम । तथा अजन्मका जन्म ।
स्वयं होती यह कर्म- । क्रिया उसकी ॥ ३ ॥
उस निर्गुणके गुण । अ-चरणके चरण ।
अ-श्रवणके श्रवण । अ-चक्षुके चक्षु ॥ ४ ॥
उस भावातीतका है भाव । निरवयवके अवयव ।
अथवा बनती है सर्व । उस पुरुषका ॥ ५ ॥
इस भांति यह प्रकृति । बढाकर अपनी व्याप्ति ।
विकृति जालमें फंसाती । अविकारीको ॥ ६ ॥
ज्ञानेश्वरी ५१४

यहां जो पुरुषत्व होता । प्रकृति कारण बनता ।
अमावास्यमें रहता । चन्द्रमा जैसे ॥ ७ ॥
जैसे अति-स्वच्छ सुवर्ण । मिलकर जस्तके कण ।
बनता जाता है जो हीन । उसी भांति ॥ ८ ॥
या बनता जैसे सज्जन । पिशाच-संगसे है हीन ।
बादल व्याप्त हो गगन । दुर्दिन करता ॥ ९ ॥
या पय होता पशुके स्तनमें । अथवा अग्नि होता लकडीमें ।
तथा लपेट लिया है वस्त्रमें । नंदादीप ॥ १०१० ॥
जब होता राजा पराधीन । तथा सिंह रोगके आधीन ।
वैसे पुरुषत्व तेज-हीन । होता प्रकृतिमें ॥ ११ ॥
जगता हुवा मनुष्य जैसे । यकायक निद्रित होनेसे ।
स्वप्नमें दुःख भोगता वैसे । यहां वह ॥ १२ ॥
वैसे प्रकृतिके आधीन । भोगता है पुरुष गुण ।
जैसे विरक्त स्त्री-आधीन । उखडता है ॥ १३ ॥
वैसे ही अज नित्यका जो होता । जन्म-मृत्यु सहना पडता ।
प्रकृति-गुण संगसे होता । सभी यह ॥ १४ ॥
किंतु यह जैसे पांडुसुत । तप्त लोहपे होता आघात ।
तब अग्निको होते हैं घान । मानते वैसे ॥ १५ ॥
या आंदोलनसे उदक । प्रतिभा होती है अनेक ।
उसे कहे नानात्व लोक । चंद्रका जैसे ॥ १६ ॥
या पास होनेसे दर्पण । एकके दो दीखते आनन ।
या कुंकुमसे रक्त-वर्ण । आता स्फटिकमें ॥ १७ ॥
गुण संगसे ऐसा होता । अजन्मा है जनम लेता ।
ऐसा यह आभास होता । अन्यथा नहीं ॥ १८ ॥
अधमोत्तम योनि वैसे । मानते हैं इसको ऐसे ।
संन्यासी स्वप्नमें ही जैसे । बनता अंत्यज ॥ १९ ॥
५१५ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

इसलिये केवल पुरुष । नहीं भोगता है कुछ देख ।
यहां गुण-संग ही अशेष । लगता मूलमें ॥ १०२० ॥
उपद्रष्टानुमंता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः ।
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः ॥ २२ ॥
अजी ! यह खड़ा है प्रकृतिमें । आधार-स्तंभसा लता बीचमें ।
अंतर जो है धरणी नभमें । वही इनमें है ॥ २१ ॥
तीरमें प्रकृति सरिताके । खडा मेरु-सा बन करके ।
प्रवाहमें स्थिर है इसके । प्रतिबिंब मात्र ॥ २२ ॥
प्रकृति होती है प्रवाहित । स्थिर रहता यह सतत ।
तभी इसमें होता शासित । ब्रह्मांड सारा ॥ २३ ॥
प्रकृति है इससे ही जीवित । इसकी सत्तासे ही वस्तुजात ।
प्रसवती तभी है यह कांत । होता प्रकृतिका ॥ २४ ॥
अनंत-कालसे अर्जुन । सृष्टि होती यह उत्पन्न ।
तथा होती इसीमें लीन । कल्पांतमें ॥ २५ ॥
तभी है यह प्रकृतिका ईश । ब्रह्मांडका सूत्रधार विशेष ।
इसे तोलता रहता अशेष । पांडुकुमार ॥ २६ ॥
अजी ! सुन इस शरीरमें । परमात्म है ऐसे बोलनेमें ।
आता है जो इसीके विषयमें । जान ले तू ॥ २७ ॥
प्रकृतिके उस पार एक । कोई है कहते सभी देख ।
वह यही परम पूरुष । जान तत्वतः ॥ २८ ॥
य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ॥ २३ ॥
सर्व-साक्षी अनु-ज्ञाता भर्ता भोक्ता महेश्वर ।
कहते परमात्मा है देहमें पर- पूरुष ॥ २२ ॥
ऐसा पुरुषका रूप प्रकृतिका गुणात्मक
जानता जो यह ऐसा न कभी जन्मता फिर ॥ २३ ॥
गी ५१६
ज्ञानेश्व

जिसने यह जान लिया वह मुक्त है—
पुरुषका जो शुद्ध-रूप । संपूर्ण जानता है आप ।
प्रकृतिके क्रिया कलाप । गुण हैं सारे ॥ २९ ॥
यह रूप तथा यह छाया । यह जल तथा यह माया ।
करना निर्णय धनंजय । ऐसा सभी ॥ १०३० ॥
इस प्रकारसे अर्जुन । प्रकृति पुरुष विवेचन ।
स्पष्ट करता जिसका मन । सदा सर्वत्र ॥ ३१ ॥
शरीरसे रखके मेल । करता है कर्म सकल ।
रहता नभसा निर्मल । असंग हो ॥ ३२ ॥
देहमें वह ऐसा रहता । देह-मोहसे नहीं भ्रमता ।
देह-पातपे नहीं जन्मता । फिरसे वह ॥ ३३ ॥
होता है जब यह एक । प्रकृति पुरुष विवेक ।
तब करता अलौकिक । महदुपकार ॥ ३४ ॥
यह विवेक-भानुके समान । उजलायेगा अंतःकरण ।
उसके उपाय अनेक सुन । कहता हूं मैं ॥ ३५ ॥
ध्यानेनात्मनि पश्यंति केचिदात्मानमात्मना ।
अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे ॥ २४ ॥
आत्मानात्म विवेक-साधनका उपाय—
सुन तू अर्जुन कई एक । विचार-रूपी अग्निमें रख ।
हीन कसका जो सुवर्णक । पुट देकर ॥ ३६ ॥
जलाते सभी सैंतीस । अनात्म-भेद सर्वस ।
चुनते हैं शुद्ध-शेष । आत्म-तत्व ॥ ३७ ॥
अपने ही हियमें उसे । देखते अपनी दृष्टिसे ।
आप ही सदा अपनेसें । पांडुकुमार ॥ ३८ ॥
ध्यानसे देखता कोई आत्माको हियमें स्वयं ।
सांख्य-योग तथा कोई पाते हैं कर्म-योगसे ॥ २४ ॥
५१७ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

और कुछ दैव-योगसे । चित्त देते सांख्य-योगसे ।
और कुछ कर्माचरणसे । देखते वह तत्व ॥ ३९ ॥
अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते ।
तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः ॥ २५ ॥
ऐसे सुन पांडुकुमार । तर जाते भव-भंवर ।
पाके कुछ अन्य प्रकार । भली भांतिसे ॥ १०४० ॥
तब वह ऐसा करते । अभिमान सभी तजते ।
गुरुपे विश्वास रखते । पूर्ण-रूपसे ॥ ४१ ॥
हित अहित सब देखते । हानि देख दयासे भरते ।
जानकर दुःख भी हरते । तथा देते हैं सुख ॥ ४२ ॥
उनके मुखसे जो शब्द निकलते । सब वे अति-आदरसे सुनते ।
तथा तन मनसे वैसे ही बनते । पांडुकुमार ॥ ४३ ॥
सुननेके लिये ही केवल । करते हैं कर्तव्य सकल ।
शब्द पर निष्ठासे अचल । होते निछावर ॥ ४४ ॥
सुन तू यह धनंजय । मरणार्णवसे निर्भय ।
निकलते हो अमृतमय । भली भांति ॥ ४५ ॥
जाननेके हैं अनेक । उपाय यहां हैं देख ।
उससे जानना एकं । परम तत्व ॥ ४६ ॥
कोई भाग्यवान ही विश्वकी विविधतामें एकता देख सकता है—
अब हुआ यह बहुत । किंतु सर्वार्थका मथित ।
सिद्धांत तत्व-नवनीत । देता हूं तुझे ॥ ४७ ॥
स्वयं न जानके कोई बड़ोंसे सुनके सब ।
तरते मृत्युको वे भी श्रद्धासे कर वर्तन ॥ २५ ॥
ज्ञानेश्वरी ५१८

इससे होगा सहज । अनुभव तुझे आज ।
यह होने पर तुझ । न होगा सायास ॥ ४८ ॥
इसीलिये शुद्ध-प्रज्ञासे कर । सिद्धांतकी रचना सुंदर ।
पाखंडकी पूरी खंडना कर । कहता फलितार्थ ॥ ४९ ॥
यावत्संजायते किंचित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् ।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ ॥ २६ ॥
क्षेत्रज्ञ क्या यह समझाया । अपना रूप तुझे दिखाया ।
तथा क्षेत्र भी सब समझाया । संपूर्ण रूपसे ॥ १०५० ॥
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका यह मिलन । करता भूत-मात्रको उत्पन्न ।
जैसे सलिल अनिल मिलन । रचते तरंग ॥ ५१ ॥
अथवा जब दिनकरके किरण । करते ऊसर भूमिका आलिंगन ।
होता है मृगजल-पूर-सा दर्शन । धनंजय ॥ ५२ ॥
अथवा वर्षाकी धारासे । भीगी हुयी धरणीमेंसे ।
अंकुर नाना प्रकारसे । निकलते अनेक ॥ ५३ ॥
वैसे चराचर संपूर्ण । जीव-जगतका निर्माण ।
करता उभय मिलन । क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका ॥ ५४ ॥
इसीलिये हे अर्जुन । क्षेत्र-क्षेत्रज्ञसे भिन्न ।
नहीं है कोई जान । साकार वस्तु ॥ ५५ ॥
समं सर्वेषुभूतेषु तिष्ठंतं परमेश्वरम् ।
विनश्यत्स्वविनश्यंतं यः पश्यति स पश्यति ॥ २७ ॥
विश्वमें उत्पन्न जो जो होते स्थावर जंगम ।
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ संयोग यही कारण जान तू ॥ २६ ॥
समान सब भूतोंमें रहा है परमेश्वर ।
अनाशी नाशवंतोंमें जो देखे वह देखता ॥ २७ ॥
५१९ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

जैसे पटत्व नही है तंतु । किंतु पटका आधार तंतु ।
यह प्रज्ञा-दृष्टिसे जान तू । ऐक्य भाव ॥ ५६ ॥

सब भूतोंका आधार । एक ही है तत्व-सार ।
दीखते भिन्न आकार । देखनेमें ॥ ५७ ॥

इनके नाम अनेक । व्यवहार भी अनेक ।
तथा रूप भी अनेक । दीखते हैं ॥ ५८ ॥

देख कर यह अर्जुन । करेगा द्वैत-भाव मन ।
मुक्त होना अवश्य जान । जन्म-मरणसे ॥ ५९ ॥

जैसे अनेक कारणसे । लगते नाना आकारसे ।
लतामें अगणित जैसे । फल कुमडेके ॥ १०६० ॥

अथवा बेरकी जो लकडी । सरल हो अथवा हो टेढी ।
वस्तु एक है खडी या पडी । वैसे वह तत्व ॥ ६१ ॥

जैसे अग्निकण अनेक । उसकी दाहकता एक ।
वैसे जीव-राशि अनेक । एक परतत्व ॥ ६२ ॥

वर्षाधार गगन भर । उसमें एक ही है नीर ।
वैसे हे नाना भूताकार । सबमें ईश एक ॥ ६३ ॥

भूतग्राम सब विषम । सबमें वस्तु एक सम ।
घर घरमें होता व्योम । एकसा जैसे ॥ ६४ ॥

नाश होने पर भूताभास । आत्मा होता एक अविनाश ।
जैसे अलंकार है विशेष । उसमें एक स्वर्ण ॥ ६५ ॥

जैसे जीव-धर्म हीन । तथा जीवसे अभिन्न ।
देखता जो सु-नयन । ज्ञानियोंमें ॥ ६६ ॥

ज्ञान-दृष्टिमें अर्जुन । होता है जो सु-नयन ।
वही बडा भाग्यवान । नहीं यह बढा ॥ ६७ ॥

ज्ञानेश्वरी ५२०

समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् ।
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् ॥ २८ ॥
गुणेंद्रियोंकी जो धोकटी । देह-धातुओंकी त्रिपुटी ।
पंच मेलकी यह पटी । दारुण है सब ॥ ६८ ॥
पांच डंकोंका है यह वृश्चिक । अथवा पंचाग्नि ताप-दायक ।
अथवा मृगकी मांद है एक । मिली वन-राजको ॥ ६९ ॥
शरीरमें रहकर ऐसे । नित्य-भावकी तलवारसे ।
अनित्यताका उदर कैसे । नहीं फाडता ॥ १०७० ॥
ज्ञानीका गंतव्य, जहां मोक्ष भी विश्रांति लेता है—
किंतु इस देहमें रहकर । न करता अपने प्रहार ।
तथा अवसानपे धनुर्धर । मिलता मुझमें ॥ ७१ ॥
अनेक जन्मोंको पार कर । योग-ज्ञानका सहारा लेकर ।
योगी जन डुबकी लगाकर । बैठते यहां ॥ ७२ ॥
आकारका जो पैल तीर । नादका जो उस पार ।
तुर्यावस्थाका मध्य घर । पर-ब्रह्म जो ॥ ७३ ॥
मोक्ष सह सभी गति । लेती है यहां विश्रांति ।
गंगादि नदीकी गति । जैसे समुद्र ॥ ७४ ॥
वह सुख इसी देहमें । मिलता है विपुलतामें ।
न होती भूत-वैषम्यमें । विषय-बुद्धि ॥ ७५ ॥
सभी दीप-ज्योतिमें जैसे । रहता तेज एक जैसे ।
रहता है सर्वत्र वैसे । ईश एक ॥ ७६ ॥
ऐसी सम-दृष्टिसे पार्थ ! । सदा सर्वत्र जो देखता ।
कभी आधीन नहीं होता । जन्म मरणके ॥ ७७ ॥

जो देखे प्रभु सर्वत्र भरा है सम जो स्वयं ।
आत्माकी न करे हिंसा पाता है गति उत्तम ॥ २८ ॥
(66) ५२१ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

इसीलिये वह भाग्यवान । ऐसे करते हम वर्णन ।
साम्य-सेज पर है नयन । लगे हैं उसके ॥ ७८ ॥
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः
यःपश्यति तथात्मानमकर्त्तारं सपश्यति ॥ २९ ॥
मन बुद्धि जिसमें प्रमुख । ज्ञान औ' कर्मेंद्रिय अशेष ।
करती है जो प्रकृति देख । जानता वह सत्व ॥ ७९ ॥
गृह-निवासी सभी करता । घर कुछ भी नहीं करता ।
बादल आकाशमें दौड़ता । आकाश रहता स्थिर ॥ १०८० ॥
वैसी ही प्रकृति आत्म-प्रभा । गुण-क्रीडासे विविधारंभ ।
आत्मा रहता है जैसे स्तंभ । यह न जानते ॥ ८१ ॥
ऐसा जो यह् निर्णय । जिसमें हुवा उदय ।
उसने जाना निश्चय । अकर्त्तापन ॥ ८२ ॥
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति ।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म संपद्यते तदा ॥ ३० ॥
वैसे सहज अर्जुन । होगा ब्रह्मत्व संपन्न ।
भूताकृति है जो भिन्न । दीखेगी एकमें ॥ ८३ ॥
लहर जैसे सलील पर । परमाणु-कण स्थल पर ।
किरण-जाल आकाश पर । भास्करका ॥ ८४ ॥
या देहमें अवयव । मनमें संपूर्ण भाव ।
विस्फुलिंग सावयव । एक अग्निके ॥ ८५ ॥
करनेसे प्रकृतीके होते हैं कर्म जो सब ।
अकर्ता है स्वयं आत्मा यथार्थ यह देखना ॥ २९ ॥
जुड़ा एकत्वमें देखे भूतोंकी भिन्नता सब ।
उसीसे जान विस्तार पाता ब्रह्मत्व है तभी ॥ ३० ॥
ज्ञानेश्वरी ५२२

वैसे एकके भूताकार । दृष्टिगत होंगे साकार ।
ब्रह्म-संपत्ति भांडार । लगेगा हाथ ॥ ८६ ॥
सर्वत्र सब तुझे अर्जुन । होगा पर-ब्रह्मका दर्शन ।
तथा अभयादि समाधान । मिलेगा तब ॥ ८७ ॥
इस भांति यह जो पार्थ । प्रकृति-पुरुष व्यवस्था ।
करलें प्रतीति सतत । चाहे वैसे वे ॥ ८८ ॥
अब तू कर वह प्रतीति । चित्तमें स्थिरकर निश्चिति ।
अब नहीं तो सुभद्रापति । तो नंतर कुछ ॥ ८९ ॥
मिला है कुल्ला करने अमृत । अथवा भांडार हुवा लक्षित ।
ऐसा मिला यह लाभ निश्चित । ज्ञान-रहस्य ॥ १०९० ॥
कहूंगा अब दो बोल । अति-गूढ अनमोल ।
चित्त देकर सकल । सुन तू वे ॥ ९१ ॥
श्रीकृष्णका यह बोल । सुनता पार्थ निश्चल ।
इंद्रियां तब केवल । करके कान ॥ ९२ ॥
अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः ।
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥ ३१ ॥
आत्मा और शरीरकी तुलना तथा संबंध—
अजी ! परमात्मा जो कहलाता । जलमें बिंबित हो न भीगता ।
जैसा सूर्य वैसा वह रहता । प्रकृतिमें निर्लेप ॥ ९३ ॥
जलके आदि और अंत । रहता है सूर्य सतत ।
केवल है वह बिंबित । अन्योंकी दृष्टिसे ॥ ९४ ॥
आत्मा वैसे देहमें होता कहां । रहता है वह जहांका तहां ।
कहा जाता है देहमें रहता वहां । नहीं है सत्य ॥ ९५ ॥
अव्ययी परमात्मा है तथा अनादि निर्गुण ।
देहमें रहके पार्थ करता लीपता नहीं ॥ ३१ ॥
५२३ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

दर्पणमें मुख जैसे । बिंबित है यह वैसे ।
रहता देहमें वैसे । आत्म-तत्त्व ॥ ९६ ॥
संबंध जो देह-आत्मका । सर्वथा निर्जीव बातका ।
होता क्या बात औ' रेतिका । संबंध पार्थ ॥ ९७ ॥
आग तथा पंखमें जैसे । नत्थी करना कहो कैसे ।
या पत्थरको आकाशसे । कैसे जोडना ॥ ९८ ॥
एक जाता पूर्वकी ओर । दूसरा पश्चिमकी ओर ।
भेंट होती कैसी आखर । दोनोंकी पार्थ ॥ ९९ ॥
प्रकाश और अंधार । निर्जीव सजीव नर ।
तथा आत्मा औ' शरीर । एक समान ॥ ११०० ॥
रात्र और दिवस । कनक औ' कपास ।
नाता कैसा है वैसा । इन दोनोंका ॥ १ ॥
देह यह है पांचोंका जाल । गुण-कर्मकी गांठ केवल ।
जन्म-मृत्यु चक्र पर डाल । घुमाई जाती है ॥ २ ॥
कुंडमें जैसे कालानलके । गोले पडे हैं नवनीतके ।
हिलनेमें ही पांव माखिके । जाते पिघल ॥ ३ ॥
पडनेसे यह आगमें । भस्म हो उडता क्षणमें ।
जानेसे श्वान उदरमें । होता है मल ॥ ४ ॥
इन दोनोंसे यदि चूकता । कृमियोंका पुंज बनता ।
इसका परिणाम है पार्थ । कल्मष ही है ॥ ५ ॥
इस देहकी यह दशा । तथा आत्मा है वह ऐसा ।
नित्य-शुद्ध-सिद्ध एकसा । अनादित्वसे ॥ ६ ॥
सकल नहीं है या यह निष्कल । न अक्रिय या यह क्रिया-शील ।
नहीं यह कृश अथवा स्थूल । निर्गुणत्वसे ॥ ७ ॥
आभास नहीं या निराभास । प्रकाश नहीं या अप्रकाश ।
न अल्प अथवा बहुवस । अरूपतासे ॥ ८ ॥
ज्ञानेश्वरी ५२४

जो न रीता या भरित । न रहित या सहित ।
मूर्त नहीं या अमूर्त । शून्यत्वसे ॥ ९ ॥
जो न आनंद या निरानंद । न है एक अथवा विविध ।
न है जो मुक्त अथवा बद्ध । आत्मत्वसे ॥ ११० ॥
न वह इतना या उतना । न स्वत सिद्ध या न है बना ।
न है वक्ता अथवा मौन । अलक्षत्वसे ॥ ११ ॥
सृष्टि-साथ यह नहीं बनता । या प्रलयके साथ न नाशता ।
होने न होनेसे परे रहता । लय स्थान जो ॥ १२ ॥
अगणित अथवा अचर्चित । मिटता न होता वृद्धिगत ।
न घटता न होता विकृत । अव्यवत्वसे ॥ १३ ॥
इस भांति है यह आत्मा । देहमें कहते प्रियोत्तम ।
मवाकाशमें जैसे व्योम । नाम जिसका ॥ १४ ॥
ऐसे उस अखंड पर । बनते देहके आकार ।
वह न ले या तजकर । रहता सहज ॥ १५ ॥
आत्मा शरीरमें रहकर भी न कुछ करता न लीपता—
जैसे प्रकाश और अंधकार । आते जाते आकाशपर ।
शरीर है आत्म-तत्व ˙पर । इसी भांति ॥ १६ ॥
इस देहमें न कुछ करता । अथवा वह न कुछ कराता ।
सहज व्यापारमें न गूंथता । कर्त्ता पनसे ॥ १७ ॥
इसीलिये वह स्वरूपसे । अल्पता अथवा पूर्णतासे ।
न लीपता है कभी देहसे । देहमें भी ॥ १८ ॥
यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते ।
सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते ॥ ३२ ॥
आकाश ज्यों सर्व-व्यापी न लीपे सूक्ष्म होकर ।
व्याप्त सर्वत्र त्यों आत्मा देहमें लीपता नहीं ॥ ३२ ॥
५२५ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

यह आकाश नहीं कहां। कब वह न घुसता कहां ।
सर्वत्र रहता जहां तहां । किंतु निर्लिप्त ॥ १९ ॥
वैसा सदैव वह शरीरगत । रहता है आत्मा सर्वत्र सतत ।
किंतु नहीं होता वह कभी लिप्त । क्षेत्र दोषसे ॥ १२० ॥
लक्षण यह पुनः पुनः । जानना सदा सत्य मान ।
सर्वगत क्षेत्र-विहीन । क्षेत्रज्ञका तू ॥ २१ ॥
यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः ।
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥ ३३ ॥
लोहेको चुंबक हिलात । लोहा चुंबक नहीं होता ।
क्षेत्र क्षेत्रज्ञका होता । इस भांतिसे ॥ २२ ॥
दीप-ज्योति निरंतर । चलाती घरका व्यापार ।
इन दोनोंका है अंतर । अमर्याद ॥ २३ ॥
काठमें रहती है आग । किंतु काठ न होता आग ।
ऐसे दोनों होते अलग । देह और आत्मा ॥ २४ ॥
आकाश और बादल । सूर्य तथा मृगजल ।
ऐसा भेद तू निश्चल । यदि देखेगा ॥ २५ ॥
जैसा आकाशमें एक । रहता है वह अर्क ।
प्रकाशता तीन लोक । नित्य नित्य ॥ २६ ॥
ऐसा क्षेत्रज्ञ है एक । क्षेत्र पूर्ण प्रकाशक ।
न यह संवेद्य-जनक । न प्रक्षेप्यार्थ भी ॥ २७ ॥
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा ।
भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यांति ते परम् ॥ ३४ ॥
जैसे है एक ही सूर्य उजळाता भुवनत्रय ।
वैसे प्रकाशता क्षेत्र क्षेत्रज्ञ पूर्ण रूपसे ॥ ३३ ॥
क्षेत्रक्षेत्रज्ञका भेद देखते ज्ञान-दृष्टिसे ।
पाते वे मोक्षका धाम भूत-प्रकृति लांघके ॥ ३४ ॥
ज्ञानेश्वरी ५२६

आत्मानात्म-व्यवस्थाके राजहंस—
शब्द-तत्व सारज्ञ । दीखता है जो प्राज्ञ ।
क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ । इनमें भेद ॥ २८ ॥
इन दोनोंका जो अंतर । देखता है वही चतुर ।
वे ज्ञानियोंका महा-द्वार । रहते नित्य ॥ २९ ॥
इसीलिये जो सुमति । जोड़ते शांति-संपत्ति ।
शास्त्रोंकी सदा दुभति । पालते घरमें ॥ ११३० ॥
भोगके आकाश पर । साहस युत संचार ।
करते जो धनुर्धर । इसी आशासे ॥ ३१ ॥
शरीरादि जो समस्त । मानकर तृणवत ।
लेते संत-सेवा व्रत । जीव-भावसे ॥ ३२ ॥
करके ऐसे प्रकार । अनेक सायास कर ।
होते हैं चितमें स्थिर । ज्ञान-भावसे ॥ ३३ ॥
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका जो अंतर । देखते रहते निरंतर ।
करते हैं हम न्योच्छावर । अपना ज्ञान उनपे ॥ ३४ ॥
तथा महा-भूतादिक । प्रभेद लेके अनेक ।
फैली है अवास्तविक । प्रकृति है जो ॥ ३५ ॥
वह शुक-नलिका-न्यायसे । न चिपके ही चिपकी वैसे ।
मानता है जो जैसेको वैसे । यह धनुर्धर ॥ ३६ ॥
जैसे माल ही है माल । देखती आंखें निर्मल ।
सर्प-भ्रमको चंचल । दूर करके ॥ ३७ ॥
अथवा शुक्तिको शुक्ति । करता है सही प्रतीति ।
छोडकर रजत-भ्रांति । सहज भावसे ॥ ३८ ॥
आत्म-प्रकृतिकी जो है भिन्नता । उसको हृदयसे जो जानना ।
उसे मैं पर-ब्रह्म ही कहता । पांडुकुमार ॥ ३९ ॥
५२७ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

आकाशसे भी जो महान । अव्यक्तका पैल-तीर मान ।
पाके उसे साम्या-साम्य-भान । नहीं रहता ॥ ११४० ॥
आकार वहां मिटता । जीवत्व सभी घुलता ।
द्वैत-नाम भी खो जाता । वह है अद्वय ॥ ४१ ॥
परम-तत्व वे पार्थ । होते हैं वहां सर्वथा ।
आत्म-अनात्म-व्यवस्था । उसके वे राजहंस ॥ ४२ ॥
तेरहवे अध्यायका उपसंहार—
इस भांति यह संपूर्ण । पांडवको वह श्रीकृष्ण ।
देता ज्ञान हो स-करुण । जीवनका सब ॥ ४३ ॥
एक कलशमें रहता जो जल । दूसरेमें डालते जैसे सकल ।
वैसे श्रीकृष्णने दिया सकल । ज्ञान पार्थको ॥ ४४ ॥
तथा किसको देगा कौन । वह है नर-नारायण ।
फिर अर्जुनको श्रीकृष्ण । कहाता मैं यह ॥ ४५ ॥
रहने दो यह सकल । बिना प्रइनके बोल ।
अपना सर्वस सकल । दिया श्रीहरिने ॥ ४६ ॥
अगले अध्यायकी भूमिका—
किंतु मनमें वह अर्जुन । अब तक तृप्ति नहीं मान ।
अधिकाधिक इच्छा महान । बढाते रहा ॥ ४७ ॥
स्नेहसे भरी ज्योति । जैसे बढते जाती ।
ऐसे श्रवण-भक्ति । बढी पार्थकी ॥ ४८ ॥
जहां सु-गृहिणी उदार । रसज्ञ औ' भोजनहार ।
मिले जब बढता कर । उसी भांति ॥ ४९ ॥
उभर आया श्रीकृष्णका मन । देखकर उल्हसित अर्जुन ।
उमड अया तब प्रवचन । छलकता हुवा ॥ ११५० ॥
सु-वायुसे मेघ उमड़ता । चंद्रमासे सिंधु उमड़ता ।
वक्तृतामें रस भर आता । श्रोताके आदरसे ॥ ५१ ॥
ज्ञानेश्वरी · ५२८