ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
यदि मृग टूट भी गिरता । अपनी दौड बढाता जाता ।
किंतु असत्य नहीं मानता । मृगजलका भ्रम ॥ ७ ॥
वैसे जन्मसे मृत्यु पर्यंत । विषयोंमें हो सदैव त्रस्त ।
फिर भी अधिक हो आसक्त । करता मोह ॥ ८ ॥
पहले होती बालदशा । माता पिता इसीकी आशा ।
फिर स्त्री-शरीरका नशा । भुलाता सब ॥ ९ ॥
स्त्री-भोगमें तब काल हरण । होता है वार्धक्यका आगमन ।
तथा बनते अनुराग-स्थान । अपने बालक ॥ ७१० ॥
जन्मांध जैसे अपना घर । नहीं छोड़ता जीवन-भर ।
बच्चोंके विषय तिरस्कार । कभी नहीं होता ॥ ११ ॥
उसमें जान धनुर्धर । अज्ञान रहता अपार ।
सुन अब अन्य प्रकार । अज्ञानके ॥ १२ ॥
११ अज्ञानका लक्षण, देहाभिमान—
यह देह ही है आत्मा । बनाकर मनोधर्म ।
करता रहता कर्म । दिनरात ॥ १३ ॥
कभी कोई कर्माचरण । होता कम अधिक मान ।
तब वह स-अभिमान । फूलता सूखता ॥ १४ ॥
सिरपर देव-मूर्तिके बोझसे । अकडकर चलता पूजारी जैसे ।
विद्या धन वयादि अभिमानसे । अकड चलता वह ॥ १५ ॥
मैं ही हूं महा-धनवान । मेरे घरमें गुण-धन ।
मेरे घरका आचरण । मिलता कहां ? ॥ १६ ॥
कोई नहीं है मेरे समान । मैं ही धन-गुण विद्यावान ।
ऐसे गर्व-तुष्टी मान लीन । हो फिरता वह ॥ १७ ॥
व्याधिग्रस्त मनुष्य जैसे । नहीं सहता भोग वैसे ।
अन्योंकी भलाई उससे । सही नहीं जाती ॥ १८ ॥
४८९ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
(62)
गुण सारा खाता ही जाता । स्नेह सब जला डालता ।
रखा वहां काला करता । जैसे दीप ॥१९॥
जीवन स्पर्शता तो तडतडता । हवा लगनेसे प्राण ही तजता ।
जहां लगता राख कर रखता । सर्वस्वका ही ॥२०॥
अल्पस्वल्प प्रकाश देता । वैसा ही वह उष्मा देता ।
ऐसे दीपक-भांति होता । वह सुविद्य ॥२१॥
औषध मान दिया भी दूध । नव-ज्वरमें करता बाध ।
पीता है जब वह एकाधा । बनता गरल ॥२२॥
वैसे सद्गुणीका मत्सर । व्युत्पत्तिमें जो अहंकार ।
तप ज्ञानका है अपार । अकड उसको ॥२३॥
बिठाया पंचमको राज्यपर । या निगला खांबको अजगर ।
तब जैसे फूलता स-शरीर । ऐसे वह मानंस ॥२४॥
बेलन जैसे नहीं झुकता । पत्थर जैसे नहीं द्रवता ।
फुरसे जैसे न उतरता । मदारीके मंत्रसे ॥२५॥
ऐसा जो मनुष्य है जान । उसमें बढता अज्ञान ।
यह है निश्चित अर्जुन । कहता हूँ मैं ॥२६॥
१२ अज्ञानका लक्षण, अविचार-
वैसे ही वह पांडुकुमार । नहीं करता कोई विचार ।
गृह-देह-जन्म-मृत्यू पर । अपने कभी ॥२७॥
कृतघ्न पर किया उपकार । या चोरको कर दिया व्यापार ।
या निर्लज्जकी की स्तुति अपार । वे भूलते जैसे ॥२८॥
उठल्लू कुत्तेको जैसे । पूंछ काट भगानेसे ।
फिर वहीं आता वैसे । गीली पूंछ ले ॥२९॥
मेंढक सापके मुखके अंदर । जाता है अपना सर्वस लेकर ।
पकडे रखता मुखमें शिकार । अपनी न सोचता ॥ ७३०॥
ज्ञानेश्वरी ४९०
वैसे हैं स्रवते नव-द्वार । त्वचा-रोगसे गला शरीर ।
चितमें उसका जो विचार । नहीं करता ॥ ३१ ॥
माताके उदर गह्वरमें । पचके मलके गर्तमें ।
नव माह तक जठरमें । ऊबा था जो ॥ ३२ ॥
गर्भकी थी जो वह व्यथा । जन्मके बाद वही कथा ।
यह सब ही है सर्वथा । भूलके बैठा ॥ ३३ ॥
मल मूत्र लिप्त बालक । गोदमें देख स-कौतुक ।
न घिनता सोचके शोक । करता अपना ॥ ३४ ॥
कलका जन्म जो गया । आजका भी जन्म आया ।
सोच नहीं आया गया । इसका कभी ॥ ३५ ॥
वैसे ही सुन तू अर्जुन । तारुण्यका कर दर्शन ।
न सोचता उसका मन । मृत्युकी बात ॥ ३६ ॥
जीवनका अति विश्वास । मृत्युके अस्तित्वका भास ।
सदैव उसका मानस । भूलता जाता ॥ ३७ ॥
होते हैं डबरेके मीन जैसे । यह नहीं सूखेगा मान ऐसे ।
उसीमें पडे रहते हैं वैसे । न जाते गहरेमें ॥ ३८ ॥
सुनकर किरातका गान । मृग करते व्याध-दर्शन ।
आमिष लोभसे जैसे मीन । निगलता कांटा ॥ ३९ ॥
जैसे देख ज्योतिका जगमग । जला लेता अपनेको पतंग ।
नहीं जानता है जलेगा अंग । मोहमें वैसे ॥ ७४० ॥
निद्रा-सुखमें जैसे गंवार । नहीं देखता जलता घर ।
नहीं जान अन्नमें जहर । खाता अज्ञ ॥ ४१ ॥
वैसे जीवनका रूप लेकर । आयी मृत्यू यह न जानकर ।
पडता विषय-सुख भंवर । मस्त हो क्षणिक ॥ ४२ ॥
दिन-रात जो खपता । शरीरको है बढाता ।
सुख वैभव मानता । विषयका सत्य ॥ ४३ ॥
४९१ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
बेचारा यह न जानता । बेश्याकी सर्वस्व-दातृता ।
वही सही कारण होता । सर्व-नाशका ॥ ४४ ॥
मित्रता चोरके साथ । प्राण लेती है निश्चित ।
धोना चित्रको सतत । उसीमें नाश ॥ ४५ ॥
पांडु-रोगीकी देह फूलना । जैसे उसका नाम मिटना ।
वैसे किसीका है भूलना । आहार-निद्रा ॥ ४६ ॥
सम्मुख देखकर शूल । चलता जो पैरसे चपल ।
प्रति पगमें मृत्यु निश्चल । लाना पास ॥ ४७ ॥
जैसे देह बढती जाती । वैसे आयु घटती जाती ।
औ' विषय-भोगकी होती । समृद्धि नित्य ॥ ४८ ॥
तथा आती है अधिकाधिक । मृत्यु जीवनके नजदीक ।
जैसे मिटते जाता नमक । पानीसे सतत ॥ ४९ ॥
ऐसे जीवन गलता जाता । मरण नित समीप आता ।
इस बातको जो न देखता । प्रत्यक्ष रूपसे ॥ ७५० ॥
अथवा जान तू अर्जुन । मृत्यूसे लीपा यह तन ।
न होता उसका दर्शन । विषय-भ्रांतिसे ॥ ५१ ॥
अज्ञान देशका भूप । जान तू उसको आप ।
यह अपनेमें आप । निश्चित बात ॥ ५२ ॥
१३ अज्ञानका लक्षण, वृद्धावस्थासे अनजान --
जीवनके संतोषसे जैसे । नहीं देखता है मृत्यू वैसे ।
तरुणायीके नशामें उसे । न दीखाता वार्धक्य ॥ ५३ ॥
गाडी कगारसे फिसली हुयी । शिला-शिखरसे जो छूटी हुयी ।
आगे न देखते गढा या खायी । वैसे वह वार्धक्य ॥ ५४ ॥
वनके नालेमें पानी चढा । या भैंसेसे जाके भैंसा भिडा ।
वैसे तारुण्यका नशा चढा । जिसको उसे ॥ ५५ ॥
ज्ञानेश्वरी ४९२
पुष्टि बिगडती । कांति उतरती ।
मान भी कांपती । अस्थिरतासे ॥ ५६ ॥
बाल सब पकते । अंगांग भी कांपते ।
तो भी फंसे रहते । माया-जालमें ॥ ५७ ॥
सामनेका जब नहीं टकराता । तब तक अंधा कुछ न जानता ।
अथवा आंखोंके नशा पर होता । आलसी संतुष्ट ॥ ५८ ॥
भोगता वैसे ही आजका यौवन । तो आ पहुंचता वार्धक्य दारुण ।
नहीं देखता इसको जो अज्ञान । कहलाता पार्थ ॥ ५९ ॥
दुबला कुबडा देखकर । चिढाता है अकडकर ।
कल होगा अपना शरीर । ऐसा यह न जानता ॥ ७६० ॥
शरीरमें वार्धक्य दीखता । जो है मृत्यूका संदेश देता ।
किंतु वह भ्रममें रहता । अपने तारुण्यके ॥ ६१ ॥
वह है अज्ञानका आगार । और भी सुन लक्ष देकर ।
और भी लक्षण धनुर्धर । कहता हूं मैं ॥ ६२ ॥
१४ अज्ञानका लक्षण, रोगसे असावधान—
जैसे कभी व्याघ्र वनसे । चरके लौटा जो दैवसे ।
फिर जाता है ढिटायीसे । जैसे सांड ॥ ६३ ॥
अथवा घरसे सांपके । द्रव्य अचानक उठाके ।
लाता जो मानता सांपके । नहीं होते दांत ॥ ६४ ॥
वैसे ही कभी अकस्मात । होता है एक दो घटित ।
मानता है वह निश्चित । नहीं है रोग ॥ ६५ ॥
देखकर जो शत्रू सोया । मानता वैर मिट गया ।
उसने सर्वस्व ही खोया । अपना जैसे ॥ ६६ ॥
वैसे आहार निद्राका व्यवस्थित । चलते हैं व्यवहार नियमित ।
तब तक है व्याधिसे निश्चित । रहता जो ॥ ६७ ॥
४९३ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
तथा स्त्री-पुत्रके साथ । भोगता है संपदा पार्थ ।
रजसे होता है उन्मत्त । विषयोंमें जो ॥ ६८ ॥
इसके साथ वियोग भी होगा । वैसे ही कोयी संकट आयेगा ।
इस भांति वह नहीं देखेगा । विचारसे ॥ ६९ ॥
उसीको अज्ञानी जान । तथा वही अर्जुन ।
देता है यथेच्छ अन्न । इंद्रियोंको ॥ ७० ॥
तारुण्य मदमें न देखता । संपत्तिके साथ ही बहता ।
सेव्य असेव्य नहीं मानता । ऐसा कभी ॥ ७१ ॥
करना नहीं वही करता । असंभाव्य मनमें धरता ।
अ-सोचका चिंतन करता । जिसका मन ॥ ७२ ॥
नहीं घुसना वहीं घुसता । जो न चाहना वही मांगता ।
नहीं छूना उसीसे मिलता । जिसका मन अंग ॥ ७३ ॥
नहीं जाना वहीं है जाता । न देखना वह देखता ।
नहीं खाना वही खाता । संतोषसे जो ॥ ७४ ॥
न करना उसका संग । नहीं भोगना वही भोग ।
नहीं चलना वही मार्ग । चलता वह ॥ ७५ ॥
नहीं सुनना वही सुनता । नहीं बोलना वही बकता ।
इतने पर भी न देखता । इसमें दोष ॥ ७६ ॥
तन-मनको जो रुचता । कृत्य-अकृत्य न देखता ।
कर्तव्य मानके करता । असंगत सारा ॥ ७७ ॥
इससे पाप भी होगा । नरक-क्लेश भी होगा ।
यह कुछ न देखेगा । भविष्यका जो ॥ ७८ ॥
इसके संगतिसे अज्ञान । होता है इतना बलवान ।
ज्ञानसे जो उतरता जान । संघर्ष रत हो ॥ ७९ ॥
रहने दो अब यह अर्जुन । दिखाता हूं अज्ञान मूर्तिमान ।
इससे मानेगा तू वह पूर्ण । सही रूपसे ॥ ७८० ॥
ज्ञानेश्वरी ४९४
१५ अज्ञानका लक्षण, सदा विषय-सेवन—
अनुराग जिसका संपूर्ण । उलझा हुवा घरमें जान ।
जिस भांति भ्रमर अर्जुन । नवगंध केसरमें ॥ ८१ ॥
देख जैसा शर्कराका ढेर । न उठे मक्षिका बैठकर ।
वैसे रमणीमें रमकर । न उठे चित्त ॥ ८२ ॥
जैसे पानीमें मेंढक । तथा श्लेष्ममें मशक ।
कीचड़में फंसा देख । चौपाये जैसे ॥ ८३ ॥
वैसे घरसे कभी निकलना । नहीं करता जीव मन प्राण ।
जैसे सांप बेंबीमें दे आसन । बैठा ही रहता ॥ ८४ ॥
जैसे प्रमदा बन कंठहार । पकड बैठती है प्रियकर ।
वैसे अपनी कुटियाका द्वार । पकड बैठता यह ॥ ८५ ॥
मधुर रसके उद्देश्यसे । खपता है मधुकर जैसे ।
गृह-संगोपनमें भी वैसे । रहता है यह ॥ ८६ ॥
जब बुढापेमें है होता । दैवसे पुत्र इकलौता ।
उससे जैसे प्रेम होता । माता-पिताका ॥ ८७ ॥
उसी प्रेमसे होती पार्था । घरमें उसकी जो आस्था ।
बिना स्त्रीके वह सर्वथा । न जाने कुछ ॥ ८८ ॥
जैसे स्त्री-देहमें वह जीव । भजता रहता सर्व-भाव ।
कौन मैं कर्तव्य क्या स्वभाव । भूलता है ॥ ८९ ॥
महा पुरुषका जो चित्त । बनके ऐसा वस्तुगत ।
भूलता व्यवहार-जात । उसी भांति ॥ ८९० ॥
हानि लाज नहीं देखता । परापवाद नहीं सुनता ।
सर्वेंद्रियोंसे जो रमता । स्त्रीमें एकाग्र हो ॥ ९१ ॥
चित्त करता है स्त्री-आराधन । तथा उसकी धुनमें नर्तन ।
जैसे मर्कट हो आज्ञाधीन । मदारीके जैसे ॥ ९२ ॥
४९५ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
जैसे अपनेको थकाता । जो है दूसरोंका दुखाता ।
कवडी कवडी गिनता । लोभी जैसा ॥ ९३ ॥
दान-पुण्यको धता बताता । इष्ट-मित्रोंको सदा फंसाता ।
स्त्रीकी बात है पूरी करता । नहीं करता न्यून ॥ ९४ ॥
देवतोंसे समझौता । गुरुजनोंको छकाता ।
मां-बापको न कहता । सदैव ही ॥ ९५ ॥
किंतु वह स्त्रीके हेतु । लाता सभी भोग-वस्तु ।
भरता उससे वास्तु । जहां जो देखी ॥ ९६ ॥
प्रेमसे जैसे भजता भक्त । सदा अपना कुल-दैवत ।
वैसे हो वह एकाग्र-चित्त । पूजता स्त्रीको ॥ ९७ ॥
स्त्रीके लिये भला पूरा । ला देता है सदा सारा ।
औरोंको सभी प्रकार । छकाता रहता ॥ ९८ ॥
उसको कोयी देखेगा । तथा कोयी बिगडेगा ।
जग ही डूब जायेगा । ऐसा मानता ॥ ९९ ॥
जैसे कभी खसरा होगा । नाग मनौती न तोडेगा ।
वैसे स्त्रीकी पूरी करेगा । सभी मांग ॥ ८०० ॥
स्त्री ही सर्वस्व है जिसका । अन्य कुछ न है उसका ।
आप्तोंसे स्नेह भी उसका । उसीके लिये ॥ १ ॥
जो है अन्य भी समस्त । उसीका संपत्ति-जात ।
जीबसे भी वह आप्त । मानता जो ॥ २ ॥
अज्ञानका है वही मूल । अज्ञानको उसीसे बल ।
रहता है वह केवल । अज्ञान-रूप ॥ ३ ॥
उफान-भरे सागर पर । नाव जैसे बिन-पतवार ।
हिलोरे लेती लहर पर । वैसे चित्त ॥ ४ ॥
जब वह प्रिय-वस्तु पाता । अति-सुखसे गगन छूता ।
तथा अप्रियसे पहुंचता । रसातलको ॥ ५ ॥
ज्ञानेश्वरी ४९६
ऐसा जिसका चित्त । विषम होता पार्थ ।
होके भी बुध्दिवंत । अज्ञानी वह ॥ ६ ॥
फलमें रखके आसक्ति । करता वह मेरी भक्ति ।
जैसे करते हैं धनार्थी । विरक्तिका स्वांग ॥ ७ ॥
अथवा पतिके मनमें घुसकर । उसका विश्वास संपूर्ण पाकर ।
यत्न करती जाना जारके घर । स्वैरणी जैसे ॥ ८ ॥
जैसे मेरी उपासना । मनमें भोग-कामना ।
करता है वह अर्जुना । विषयार्थी हो ॥ ९ ॥
ऐसी भक्ति करने पर । फलको नहीं प्राप्त कर ।
छोड़ता है सब सत्वर । निरर्थक मान ॥ ८१० ॥
नित नयी भूमी किसान । बुआयी करता अर्जुन ।
ऐसे वह देवतार्चन । करता सदैव ॥ ११ ॥
देख किसी गुरुकी शान-मान । करता उसका मार्गानुगमन ।
तथा अन्योंको अति-क्षुद्र मान । उसका मंत्र लेता ॥ १२ ॥
प्राणि-जातसे जो निष्ठुर । पूजता है मूर्ति-स्थावर ।
ऐसी भक्ति तो अपार । निष्ठा कहीं नहीं ॥ १३ ॥
मेरी मूर्ति है बनवातां । घरके कोनमें रखता ।
आप यात्रामें है जाता । तीर्थ-क्षेत्रकी ॥ १४ ॥
प्रति-दिन मेरा आराधन । कार्यमें कुलदेवतार्चन ।
करता अन्य-देव पूजन । पर्व विशेषमें ॥ १५ ॥
घरमें है मेरा अधिष्ठान । अभिष्ठयर्थ अन्यका पूजन ।
पित्र-कार्यमें होता तर्पण । पितरोंका भी ॥ १६ ॥
जैसे एकादशीका पूजन । होता वैभवसे मेरा जान ।
वैसे नगापंचमीके दिन । नागोंका भी ॥ १७ ॥
गणेश-चतुर्थी देवता । गणेशका भक्त बनता ।
चतुर्दशी देख कहता । जै दुर्गे तेरा मै ॥ १८ ॥
४९७ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
(63)
नवमीमें है मंडन । नव-चंडीका पूजन ।
रविवारमें भोजन । भैरवका ॥ १९॥
जब आता है सोमवार । दौड जाता शिव-मंदिर ।
करे तुष्ट इस प्रकार । सबको वह ॥ ८२०॥
करता अखंड भजन । क्षण भी न रहता मौन ।
जैसी है ग्राम-सुहागन । रहती है वैसे ॥ २१ ॥
ऐसा होता यह भगत । सभीके पूजामें है रत ।
जान अज्ञान मूर्तिमंत । अवतरा है ॥ २२ ॥
१६-१७ अज्ञानका लक्षण, एकांतमें अरुचि जनसंगमें प्रीति—
शुचि सु-चित एकांत सुंदर । तपोबन या तीर्थ देखकर ।
मुरझाता मनमें निरंतर । अज्ञानरूप जो ॥ २३ ॥
जन-संगमें जिसको सुख । भाता है अतिशय लौकिक ।
गडबडमें जो स-कौतुक । रहता सदैव ॥ २४ ॥
जिससे आत्मा होती है गोचर । उस विद्याका नाम सुनकर
भाग जाता है गडबडाकर । ऐसा विद्वान वह ॥ २५ ॥
उपनिषद नहीं पढता । योग-शास्त्र उसे न रुचता ।
अध्यात्म-ज्ञानमें न पैठता । चित्त उसका ॥ २६ ॥
आत्म-चर्चाका नाम सुनकर । भागता जैसा रस्सी तोडकर ।
चौपाया वैसे वह चौंककर । लांघ श्रद्धा-सीमा ॥ २७ ॥
कर्म-कांड वह सब जानता । पुराण सब मुखोद्गत गाता ।
ज्योतिषयमें जो प्रवीण बनता । पारंगत जैसे ॥ २८ ॥
शिल्पमें अति निपुण । पाक-कर्ममें प्रवीण ।
जानता है अथर्वण । विधि समस्त ॥ २९ ॥
काम-शास्त्रमें मति सिद्ध । भारत पाठ तो प्रसिद्ध ।
आगम-शास्त्रमें विशुद्ध । किया अपनासा ॥ ८३० ॥
ज्ञानेश्वरी ४९८
अध्याय १०: विभूतियोग
जानता है सभी नीति । वैद्यकमें खासी गति ।
काव्यमें है पक्व-मति । तथा न्यायमें भी ॥ ३१ ॥
होता स्मृतियोंका तज्ञ । गारुडी विद्याका मर्मज्ञ ।
शब्दकोशका महा-प्राज्ञ । माना कोश है दास ॥ ३२ ॥
व्याकरण-ज्ञानमें अगाध । तर्क-शास्त्रका है पूर्ण बोध ।
किंतु आत्म-ज्ञानमें जन्मांध । होता है धनंजय ॥ ३३ ॥
इस एकके बिन जो सभी शास्त्र । जानता वह मूल सिद्धांत-सूत्र ।
जलने दो लगा है मूला नक्षत्र । न देखो वह ॥ ३४ ॥
मोर-पंखके शरीर पर । उसपे होती आंख सुंदर ।
दृष्टि नहीं होती एक पर । वैसा है यह ॥ ३५ ॥
अध्यात्म-ज्ञानके बिन सब व्यर्थ—
यदि परमाणु जितना । संजीवनी जड पा जाना ।
अन्य औषध क्या करना । ढेरोंका जो ॥ ३६ ॥
आयुष्य बिन सब लक्षण । अथवा शरीर बिन आभूषण ।
बरात जैसे वैभव-पूर्ण । दूल्हा बिन निंदित ॥ ३७ ॥
सब शास्त्र वैसे ज्ञान । सर्वथा है अप्रमाण ।
अध्यात्म ज्ञान बिन । स्वयंपूर्ण जो ॥ ३८ ॥
इसीलिये जान तू अर्जुन । जो है अध्यात्म-बोध विहीन ।
उसको कहते प्राज्ञ जान । शास्त्र-मूढ ॥ ३९ ॥
मानो उसका जो शरीर । अज्ञान-बीजका अंकुर ।
उसका हुवा जो विस्तार । अज्ञान-वृक्ष ॥ ८४० ॥
होते हैं उसके सभी बोल । आज्ञानके खिले हुये फूल ।
फले तो उसके पुण्य-फल । अज्ञानके ही ॥ ४१ ॥
अध्यात्ममें जिसे रस नहीं । उसको ज्ञेय दीखता नहीं ।
यह कहना अवश्य नहीं । जान तू यह ॥ ४२ ॥
४९९ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
इस तीरको भी जो न पाता । तीर देखके भी भाग जाता ।
पैल तीरकी वह क्या वार्ता । जानेगा भला ॥ ४३ ॥
या देहरी पर ही उसका सिर । दबाया कंगूरमें जकडकर ।
देखेगा कैसा वह पांडुकुमार । अंर्तगृहकी बात ॥ ४४ ॥
आत्म-ज्ञानकी पहचान । नहीं है उसको अर्जुन ।
जानेगा कैसा सत्य-ज्ञान । विषय भी वह ॥ ४५ ॥
तभी इसमें विशेष । तत्व नहीं है देख ।
कहना तुझे शेष । रहा ही क्या ॥ ४६ ॥
जैसे स-गर्भाको पगेसा अन्न । उससे बढता गर्भका तन ।
पिछले पदमें किया वर्णन । वही है सब ॥ ४७ ॥
अंधेको दिया जब निमंत्रण । उसके संग आता स-नयन ।
जाने है अज्ञान लक्षण । ज्ञान भी आया ॥ ४८ ॥
ज्ञेयकी पूर्व-पीठिका—
तभी तो यहां अर्जुन । कहे अज्ञान लक्षण ।
अमानित्वादिके जान । हैं विरुद्ध जो ॥ ४९ ॥
ज्ञानके जो अठराह लक्षण । उसके उलटकर दर्शन ।
करनेसे दीखेगा अज्ञान । सहज भावसे ॥ ८५० ॥
पीछे श्लोकार्धमें एक । कहा है श्रीकृष्णने देख ।
उलटके ज्ञानको देख । वही है अज्ञान ॥ ५१ ॥
तभी इस पद्धतिको स्वीकार । किया है उस अर्थका विस्तार ।
न तो दूधमें मिलाकर नीर । न फैलाता ऐसे ॥ ५२ ॥
वैसे दिखायी नहीं वाचालता । शब्दकी सीमामें हूं मैं स्पष्टता ।
बना मूल-ध्वनिके विस्तारार्थ । निमित्तमात्र ॥ ५३ ॥
तब कहते हैं श्रोता जन । अनावश्यक स्व-समर्थन ।
विस्तार भीति है अकारण । कवि पोषक अपनी ॥ ५४ ॥
ज्ञानेश्वरी ५००
आज्ञा देता है धरणीधर । मेरा अभिप्राय स्पष्ट कर ।
छिपा रखा शब्दके भीतर । हमने यहां ॥ ५५ ॥
परमात्माका मनोरथ । हमें दिखाता है तू मूर्त ।
यह कहने पर चित्त । उमड आयेगा ॥ ५६ ॥
इसलिये यह नहीं कहते । किंतु कहनेसे नहीं रहते ।
श्रवण-सुखसे हैं हम पाते । ज्ञान-नौका यहां ॥ ५७ ॥
अब तू इस पर । कहता जो श्रीधर ।
हमें कह सत्वर । जो यथार्थ ॥ ५८ ॥
सुन कर यह संतोंका बचन । बोले निवृत्तिदास मुदित मन ।
करो ध्यानसे चित्त देके श्रवण । कहा जो श्रीहरिने ॥ ५९ ॥
कहते हैं तुझको अर्जुन । यह चिन्ह समुच्चय पूर्ण ।
श्रवण किया यह अज्ञान । मूर्ति रूप था ॥ ८६० ॥
अज्ञानसे मुडकर । ज्ञानमें पांडुकुमार ।
निश्चय कर सत्वर । दृढतासे तू ॥ ६१ ॥
उस ज्ञानसे अर्जुन । होगा ज्ञेयका दर्शन ।
सुन अर्जुनका मन । करता जिज्ञासा ॥ ६२ ॥
तब वह सर्वज्ञ-श्रेष्ठ । जानके यह भाव स्पष्ट ।
अभिप्राय कहके तुष्ट । करेगा ज्ञेयका ॥ ६३ ॥
ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते ।
अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते ॥ १२ ॥
ज्ञेयका स्वरूप-
जिसको यह ज्ञेय कहना । उसका कारण है इतना ।
वह जो कभी ज्ञानके बिना । जाना नहीं जाता ॥ ६४ ॥
कहूँगा ज्ञेय मैं सारा पानेसे अमृतत्व है ।
अनादि जो पर ब्रह्म है परे अस्तिनास्तिके ॥ १२ ॥
५०१ क्षेत्र--क्षेत्रज्ञयोग
तथा उसको जानने पर । रहता नहीं कर्तव्य फिर ।
उससे मिलती निरंतर । तद्रूपता ॥ ६५ ॥
उस ज्ञान प्राप्तिके नंतर । संसार रहता तट पर ।
डूबा ही रहता निरंतर । नित्यानंदमें ॥ ६६ ॥
ज्ञान होता है ऐसे । आदी न होती जिसे ।
पर-ब्रह्म है ऐसे । कहते उसको ॥ ६७ ॥
इसको यदि नहीं कहते । विश्वाकारसे इसे देखते ।
यदि इसे विश्व ही कहते । विश्व है माया ॥ ६८ ॥
रूप वर्ण तथा व्यक्ति । नहीं दृश्य द्रष्टा स्थिति ।
वह है ऐसी जो मति । होगी किसकी ॥ ६९ ॥
और यदि यह नहीं है । महदादि तत्व कैसे हैं ।
कहांसे स्फुरण होते हैं । यह प्रश्न उठता ॥ ८७० ॥
तभी हैं अस्ति नास्ति ये जोड । देख यह मूक होते फोल ।
विचारकी चहल पहल । रुक जाती है ॥ ७१ ॥
जैसे घटका मटकाकार । बन रहती पृथ्वी साकार ।
वैसे सबमें सब होकर । रहता ज्ञेय ॥ ७२ ॥
सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥ १३ ॥
सभी स्थल-कालमें उनसे । भिन्न नहीं होते स्थल-कालसे ।
होती स्थूल सूक्ष्म क्रिया भूतोंसे । हाथोंसे उनके ॥ ७३ ॥
उसको इसी कारणसे । कहते विश्वबाहू ऐसे ।
जो सर्वत्र सर्व-रूपसे । करता सदैव ॥ ७४ ॥
दीखते पद हस्तादि सर्वत्र उसके शिर ।
मुख आंख तथा कान सबको घेरके रहे ॥ १३ ॥
ज्ञानेश्वरी ५०२
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का देवनागरी में सटीक लिप्यंतरण है:
तथा वह सर्वत्र समस्त । स्थानमें होता है प्राप्त ।
सभी रूपमें पूर्ण-दर्शित । सो विश्वतःपाद ॥ ७५ ॥
सविताको जैसे नहीं नयन । अवयव में दीखते हैं भिन्न ।
किंतु करता सबका दर्शन । वह स्वरूप ॥ ७६ ॥
इसीलिये वह विश्वतचक्षु । वास्तवमें होकर जो अचक्षु ।
कहलाता बोलनेमें जो वृक्ष । वेदसे भी ॥ ७७ ॥
जो है सबके शिर पर । रहता है नित्य तत्पर ।
आत्म-सत्तासे होके स्थिर । तभी है विश्वमूर्ध्ने ॥ ७८ ॥
जैसे संपूर्ण मूर्ति ही मुख । हुताशनका वैसे है देख ।
वैसे है सर्व-मुखसे अशेष । है वह भोक्ता ॥ ७९ ॥
इसीलिये सुन पार्थ । विश्वतोमुख व्यवस्था ।
चली आयी है वाक्प्रथा । श्रुतिसे ही ॥ ८८० ॥
वस्तु-मात्रमें गगन । जैसे रहता संलग्न ।
वैसे शब्दमें हैं कान । जिसको सर्वत्र ॥ ८१ ॥
इसीलिये हम जिसे । सभी सुनता है वैसे ।
कहते हैं सदा जिसे । विश्व-व्यापक ॥ ८२ ॥
वैसे तो सुन महामती । विश्वतः चक्षु आदि श्रुति ।
दिखाती है उसकी व्याप्ति । मूर्तिरूपसे ॥ ८३ ॥
इसीलिये नेत्र-पाद-हस्त । सभी भाषा है व्यर्थ ।
तथा शून्य भी अयुक्त पार्थ । 'वर्णनमें यहां ॥ ८४ ॥
कल्लोल निगलता कल्लोल । यही देखते हम सकल ।
ग्रासता ग्राससे जो सलिल । भिन्न है क्या ॥ ८५ ॥
वैसे सत्य ही जो एक । जो है व्याप्त औ' व्यापक ।
किंतु भाषा-हेतु देख । होता है भेद ॥ ८६ ॥
होता है जब शून्य दिखाना । पडता है बिंदु ही लिखना ।
वैसे जब अद्वैत कहना । द्वैतकी भाषामें ॥ ८७ ॥
५०३ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
नहीं तो सुन पार्थ । गुरु-शिष्य सत्पथ ।
टूट जाता सर्वथा । शब्द ही रुकेगा ॥ ८८ ॥
इसी कारणसे श्रुति । द्वैत भावसे करती ।
स्पष्ट अद्वैतकी स्थिति । परंपरासे ॥ ८९ ॥
सुन तू वही अब धनुर्धर । यहां जो नेत्र-गोचर आकार ।
वह सब ज्ञेय इस प्रकार । विश्व-व्यापक है ॥ ८९० ॥
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् ।
असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च ॥ १४ ॥
ब्रह्मदर्शनकी कृतार्थता—
अर्जुन वह व्याप्त है ऐसे । अवकाशको आकाश जैसे ।
वस्त्र रूपसे हैं तंतु जैसे । होते हैं व्याप्त ॥ ९१ ॥
उदकमें जैसे रसत्व । दीपमें जैसे प्रकाशत्व ।
वैसे व्याप्त है वह तत्व । सदा सर्वत्र ॥ ९२ ॥
कर्पूरत्वसे कर्पूरमें जैसे सौरभ । सौरभ भरा रहता है वैसे ।
कर्म-रूपसे शरीरमें वैसे । बसता शरीर ॥ ९३ ॥
अथवा जैसे है अर्जुन । स्वर्णमें व्यापता है सुवर्ण ।
वैसे ही सर्वांग-संपूर्ण । बसता है वह ॥ ९४ ॥
कण रूपमें रहता सुवर्ण । कहते तब सुवर्णका कण ।
टूटता है कण-रूप सुवर्ण । स्वर्ण कहते तब ॥ ९५ ॥
प्रवाह जब टेढा बनता । पानी है तब सीधा रहता ।
आगसे लोहा लाल हो जाता । न होता वह अग्नि ॥ ९६
गोल होता जब घटाकार । नभ होता तब गोलाकार ।
होता है जब घर चौकाकार । नभ भी वैसे ही ॥ ९७ ॥
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वह जो इंद्रियातीत उनके कार्य भासते ।
अ-स्पर्शसे धरे सारे अगुण गुण भोगके ॥ १४ ॥
ज्ञानेश्वरी ५०४
आकाशका नहीं होता आकार । दीखता जैसे वह सर्वाकार ।
अकाशपे नहीं होते विकार । वैसी वह वस्तु ॥ ९८ ॥
मन मुख्य इंद्रियोंसे । तथा सन्त्वादि गुणसे ।
आकार लेता है वैसे । दीखता यहां ॥ ९९ ॥
जैसे मीठेकी जो मिठास । न होती आकारमें खास ।
नहीं होता वह विशेष । गुणोंद्रियोंमें ॥ १०० ॥
अजी ! है दूधकी स्थितिमें । घृत होता उसी रूपमें ।
तथा दूधके अभावमें । घृत ही घृत ॥ १ ॥
यहां है वह विकारसे । विकृत नहीं होता वैसे ।
गहना आकार नामसे । नहीं तो सोना सोनाही ॥ २ ॥
यहां यदि स्पष्ट रूपसे । कहना हो सरलतासे ।
वह है गुण-इंद्रियोंसे । भिन्न तत्व ॥ ३ ॥
नभ-रूपका संबंध । जाति क्रिया आदि भेद ।
यह आकार प्रवाद । तत्वका नहीं ॥ ४ ॥
अजी ! वह कोई भी गुण नहीं । गुणसे उसका संबंध नहीं ।
किंतु गुणोंको उसके तईं । होता भास ॥ ५ ॥
यहां इसी कारणसे । मति संभ्रम होनेसे ।
उसमें विकार ऐसे । देखते हैं ॥ ६ ॥
उन विकारोंका धारण । जैसे बादलोंको गगन ।
या है प्रतिबिंब दर्पण । करते वैसे ॥ ७ ॥
अथवा सूर्य प्रति मंडल । धरता है पृथ्वीपे सलिल ।
या रश्मि-करमें मृगजल । धरता वैसे ॥ ८ ॥
वैसे है संबंधके बिन । सबको धरता निर्गुण ।
किंतु वह है व्यर्थ जान । भ्रांत-दृष्टि ॥ ९ ॥
इस भांति है निर्गुण । भोगता है सब गुण ।
रंकका राज धारण । स्वप्नमें जैसे ॥ ९१० ॥
(64) ५०५ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
इसीलिये गुणका संग । अथवा होना गुण-भोग ।
वह है निर्गुणमें त्याग । नहीं होता ॥ ११ ॥
बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च ।
सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ॥ १५ ॥
चराचर भूतोंमें होता । विविध अग्नि पांडुसुत ।
किंतु होती जैसी उष्णता । अभेद रूपसे ॥ १२ ॥
वैसे ही अविनाश भावसे । रहता पूर्ण सूक्ष्म रूपसे ।
व्याप्त होकर जान उसे । यहां तू ज्ञेय ॥ १३ ॥
एक जो बाहर अंदर । वही एक पास औ' दूर ।
उस एकसे धनुर्धर । नहीं अन्य ॥ १४ ॥
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् ।
भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ॥ १६ ॥
क्षीर-सागरमें जैसा । माधुर्य होता एक-सा ।
तटमें मध्यमें वैसा । पूर्ण है जो ॥ १५ ॥
स्वेदज अंडजादिक । भूतोंमें व्याप्त जो एक ।
न होता उसमें देख । कभी न्यून ॥ १६ ॥
जिस प्रकार अनेक घटोंमें । प्रतिबिंब पडते सहस्रोंमें ।
किंतु भिन्नता नहीं चंद्रिकामें । वैसे ही पार्थ ॥ १७ ॥
या नाना लवण-कण राशिमें । क्षारता एक-सी होती सबमें ।
अथवा अनेक इक्षु-दंडमें । मिठास एक-सी ॥ १८ ॥
एक है जो अंतर्बाह्य जो है एक चराचर ।
जो है दूर तथा पास सूक्ष्मत्वसे अगम्य जो ॥ १५ ॥
अभेद भूत-मात्रोंमें रहा है जो विभक्त-सा ।
जन्म दे पालता भूत लीलता अंतमें स्वयं ॥ १६ ॥
ज्ञानेश्वरी ५०६
वैसे अनेक भूत-जात । उस एकसे ही व्याप्त ।
विश्व-कार्यका वही पार्थ । कारण एक ॥ १९ ॥
इसीलिये सब भूताकार । जिसका एक-मात्र आधार ।
जैसे तरंगोंका है सागर । आधार एक ॥ ९२० ॥
बाल्यादि स्थितियोंमें जैसे । शरीर है एक ही वैसे ।
सृष्टि-स्थिति-लयमें वैसे । अखंड है वह ॥ २१ ॥
सायं प्रातः पाध्यान्ह । चलता दिनमान ।
किंतु जैसे गगन । रहे एक-सा ॥ २२ ॥
सृष्टि-वेलामें प्रियोत्तम । कहते हैं जिसको ब्रह्म ।
व्याप्तिमें है जो विष्णु नाम । पडा उसको ही ॥ २३ ॥
मिटता है जब आकार । रुद्र तब प्रलयंकर ।
रहता तब शून्याकार । मिटते गुणत्रय ॥ २४ ॥
निगलकर नभका शून्य । मिटाकर जो गुणको अन्य ।
रहता है शून्य महाशून्य । श्रुति-वचन ऐसा ॥ २५ ॥
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते ।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम् ॥ १७ ॥
अग्निका जो दीपन । चंद्रका जो जीवन ।
सूर्यके हैं नयन । देखते जिससे ॥ २६ ॥
सदैव जिसका उजियाला । प्रकाशता तारागण-माला ।
जिससे महा-तेज है खिला । सुखसे सर्वत्र ॥ २७ ॥
जो है आदिका आदि । तथा वृद्धिकी वृद्धि ।
बुद्धिकी भी है बुद्धि । जीवका जीव ॥ २८ ॥
कहाता तेजका तेज तथा तम तमांधका ।
ज्ञानका ज्ञान जो ज्ञेय सबका हृदयस्थ है ॥ १७ ॥
५०७ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
मनका है जो मन । नेत्रका है नयन ।
कानका है जो कान । वाचाकी वाचा ॥ २९ ॥
प्राणका है जो प्राण । गतिके है चरण ।
क्रियाका कर्तापन । जिससे है ॥ ९३० ॥
आकारता जिससे आकार । विस्तारता उससे विस्तार ।
संहारता उससे संहार । धनंजय यहां ॥ ३१ ॥
जो है मेदिनीकी मेदिनी । जो पानीको पीकर पानी ।
तेजका प्रकाश-दायिनी । महा-तेजशक्ति ॥ ३२ ॥
वायुका है वह श्वासोच्छ्वास । तथा गगनका अवकाश ।
इन सबका है जो आभास । आभासता जिससे ॥ ३३ ॥
अथवा है यह अर्जुन । सबमें है सर्वस्व पूर्ण ।
वहां नहीं होता दर्शन । द्वैतका कभी ॥ ३४ ॥
होते ही इसका दर्शन । मिटता दृश्य-द्रष्टा पूर्ण ।
हो जाता है जब मिलन । समरस भावसे ॥ ३५ ॥
फिर होता वहीं ज्ञान । ज्ञाता ज्ञेयका दर्शन ।
औ' ज्ञानसे प्राप्ति-स्थान । वह भी यही ॥ ३६ ॥
जैसा समाप्त होते लेख । संख्या सब हो जाती एक ।
वैसे साध्य-साधनादिक । आता एकत्वमें ॥ ३७ ॥
जिस स्थानमें अर्जुन देख । नहीं होता द्वैतका उल्लेख ।
वही होता हृदयमें एक । भूतमात्रके ॥ ३८ ॥
इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः ।
मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते ॥ १८ ॥
कहा है अल्पमें क्षेत्र वैसे ही ज्ञान ज्ञेय भी ।
जानके भक्त है मेरा पाता सायुज्य है मम ॥ १८ ॥
ज्ञानेश्वरी ५०८