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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

कलश चढाया कत्थीका पोला । ऊपर चमकता सोना-सा पीला ।
वैसे क्या कामका है चित्रका फल । अंदर है गोबर ॥ ४७० ॥
वैसे है कर्म बाहरका । हीन-वस्तु नहीं मोलका ।
गंगामें धोनेसे मलका । घडा न होता शुद्ध ॥ ७१ ॥
अजी ! अंतर होता ज्ञानसे उज्ज्वल । तभी बाहर होता है कर्म निर्मल ।
किंतु कहां होता ज्ञान-कर्मका मेल । ऐसे संभव ॥ ७२ ॥
इसीलिये बाह्य-भाग । धोया कर्मसे सर्वांग ।
ज्ञानसे मिटाया जंग । अंतरंगका ॥ ७३ ॥
इससे अंतर बाह्य गया । एक निर्मलत्व ही भया ।
अथवा मात्र रह गया । शुचित्व ही ॥ ७४ ॥
सद्-भाव जो जीवगत । बाहर होता है प्रकटित ।
स्फटिक सदनमें स्थित । दीपक जैसे ॥ ७५ ॥
जिससे विकल्प उपजते । व्यर्थके विकार भी उठते ।
कु-प्रवृत्ति-बीजमें फूटते । अंकुर अनेक ॥ ७६ ॥
बात ऐसी सुन या देखता । चितपे तरंग न उठता ।
जैसे आकाश नहीं मलता । बादलोंसे ॥ ७७ ॥
वैसे इंद्रियां भोग-लिप्त । विषय-रत हो सतत ।
किंतु विकार नहीं स्फूर्ते । होते वहां ॥ ७८ ॥
किसी पथ पर किसी दिन । हो भली बुरी स्त्रीका दर्शन ।
नहीं होते विकार उत्पन्न । उसी भांति ॥ ७९ ॥
या पति-पुत्रसे आलिंगन । करे एक ही तरुणांगना ।
पुत्र-भावमें वहां स्फुरण । होता नहीं कामका ॥ ४८० ॥
जिसका हृदय है वैसे निर्मल । संकल्प-विकल्प ज्ञानमें कुशल ।
कृत्य-अकृत्य जानता जो सकल । सभी प्रकारके ॥ ८१ ॥
पानीमें जैसे हीरा नहीं भीगता । उबालनेसे कंकड नहीं गलता ।
वैसे जिसका चित्त नहीं लीपर्ता । विकल्पसे कभी ॥ ८२ ॥
४६९ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

इसका नाम शुचिता । सार्थ है जान तू पार्थ ।
जहां देखो वहां बसता । निःशंक-ज्ञान ॥ ८३ ॥
८ ज्ञानका लक्षण, स्थैर्य—
तथा स्थैर्य जहां बसता । चित्तका घर बना लेता ।
वह पुरुष जान पार्थ । जीवन ज्ञानका ॥ ८४ ॥
लदा देह कार्य-रत । चलता अपना पथ ।
किंतु होता स्थिर-चित्त । अंतरंगमें ॥ ८५ ॥
बछडे परसे गायकी जैसे । न आती ममता वनमें वैसे ।
सती जानेमें पतिके भोगसे । प्रिय नहीं होते ॥ ८६ ॥
अथवा लोभी जाता है दूर । चित्त रहता गांठ ही पर ।
वैसे चलनेसे भी शरीर । चित्तसे वे अचल ॥ ८७ ॥
चलते रहते हैं बादल । रहता है आकाश निश्चल ।
भ्रमण-चक्रमें अचल । ध्रुव है जैसे ॥ ८८ ॥
पथिकोंका होता आवागमन । साथ पथ न चलता अर्जुन ।
वृक्ष भी नहीं छोडते स्वस्थान । वैसे जान तू ॥ ८९ ॥
वैसे ही चलन-वलनात्मक । शरीर है यह पंच भौतिक ।
पंच-भूतोर्मियोंमें वह एक । रहता है स्थिर ॥ ४९० ॥
जैसे बवंडरका कल्लोल । पृथ्वीको न करते चंचल ।
वैसे उपद्रवोंके उबाल । उसको डिगाते नहीं ॥ ९१ ॥
दैन्य-दुःखमें जो नहीं तपता । भय-शोकमें जो नहीं कांपता ।
शरीरके नाशमें नहीं ढलता । भयसे कभी ॥ ९२ ॥
आशा-आसक्तिके भारसे । वार्धक्य-व्याधिके विशेष भयसे ।
आगे औ' पीछे लगे रहनेसे । रहता जो निश्चल ॥ ९३ ॥
निंदा या तेजोवधसे अपमानित । काम-लोभादिकसे भी जो आच्छादित ।
किंतु अंतरंगमें रहता है शांत । रोम भी हिलता नहीं ॥ ९४ ॥
ज्ञानेश्वरी ४७०

आकाश भी है यदि टूटता । भूमिका मध्य-बिंदु ढलता ।
तो भी परावृत्त नहीं होता । चित्तसे वह ॥ ९५ ॥
हाथी पे किया फूलसे प्रहार । उसको नहीं लगता है मार ।
वैसे तीखे दुर्वचन प्रहार । उसको न करें अशांत ॥ ९६ ॥
जैसे क्षीरार्णव-कल्लोल । न कंपाता मंदराचल ।
या प्रचंड अग्निका ज्वाल । नहीं जलाता आकाश ॥ ९७ ॥
आती जाती है मानो लहर । किंतु चित्त न होता अस्थिर ।
क्षमा-धैर्यका वह आधार । कल्पांतमें भी ॥ ९८ ॥
स्थैर्यकी यह परि-भाषा । कही है मैंने सविशेष ।
देख यह लक्षण-दशा । अति स्पष्ट ॥ ९९ ॥
पराक्रम-पूर्ण यह स्थिरता । अपनेमें जो अंतर्बाह्य पाता ।
ज्ञानका सागर ही बनता । अपने आप ॥ ५०० ॥
९ ज्ञानका लक्षण, इंद्रिय-निग्रह—
सांप जैसे शत्रु का घर । सैनिक अपना हत्यार ।
लोभी अपना भंडार । नहीं भूलते ॥ १ ॥
अथवा इकलौता बालक । माताका सर्वस होता नेक ।
मधुपे जैसे मधु-मक्षिका । लोभिन होती ॥ २ ॥
इस भांति जो अर्जुन । करता स्वचित्त जतन ।
उन्हे न देता कभी स्थान । इन्द्रिय-द्वारमें ॥ ३ ॥
कहुता काम-भकाऊ सुनेगी । या आशाकी चुडैल देखेगी ।
अंतःकरणकी स्थिति जानेगी । इससे डरता हूं ॥ ४ ॥
बाहरकी ढीलको जैसे । साहसी पुरुष भी वैसे ।
मुट्ठीमें ही रखता वैसे । अपनी वृत्तिको ॥ ५ ॥
रखता है संयममें नित । अंतरको रखके सचेत ।
रखता तनको नियमित । आजीवन ॥ ६ ॥
४७१ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

मनके महाद्वार पर । प्रत्याहारके थाने पर ।
यम-दमके चौकीदार । बिठाता सदैव ॥ ७॥
आधार-नाभि-कंठमें । बंध-त्रयके घरमें ।
चन्द्र-सूर्य संपुटमें । सुलाता नित ॥ ८ ॥
समाधि-शैयाके पास पार्थ । लांघ रखता ध्यान सतत ।
तथा चित्त-चैतन्यमें रत । रखता उमगसे ॥ ९ ॥
यह जो चित्तकी स्थिति है । कहाता चित्त-निग्रह है ।
यही सदैव विजय है । ज्ञानका ही ॥ ५१० ॥
जिसकी आज्ञा सदैव अर्जुन । झेलता रहता अंतःकरण।
उसको मनुष्याकारमें जान । आज्ञा-स्वयं ॥ ११ ॥
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार एव च ।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥ ८ ॥
१० ज्ञानका लक्षण, वैराग्य—
विषयोंके विषयमें । सदा वैराग्य मनमें ।
भर आता उमंगमें । जिसके है ॥ १२ ॥
वमन किया हुवा अन्न । न चाहता रसना-मन ।
न होती इच्छा-अलिंगन । करने की प्रेतसे ॥ १३ ॥
जैसे विष भोजन नहीं भाता । जलते घरमें न जाया जाता ।
व्याघ्र-गव्हहरमें नहीं करता । वसति-स्थान ॥ १४ ॥
तप्त लोह-रसमें जैसे । कूदा नहीं जाता है वैसे ।
तकिया न करता जैसे । अजगरका कोई ॥ १५ ॥
इस भांति जिसको अर्जुन । विषय-वार्ता न भाती जान ।
इन्द्रिय-सुखमें विषयान्न । नहीं जाने देता ॥ १६ ॥
चित्तमें निरहंकार विषयोंमें विरक्तता ।
जन्म-मृत्यु-जरा रोग दुःख दोष विवेचना ॥ ८ ॥
ज्ञानेश्वरी ४७२

विषयोंमें जो आलस्य । शरीरमें सदा काश्यं ।
शम-दममें स्वारस्य । रहता जिसका ॥ १७ ॥
तप-व्रतोंका सम्मिलन । होता है उसका जीवन ।
मानता युगांत समान । जनमें आनेको ॥ १८ ॥
योगाभ्यासमें आस । विजनोंमें उल्हास ।
जन-संगकी त्रास । भाती नहीं ॥ १९ ॥
शर-शैयापे शयन । पूय-पंकमें लुंटन ।
वैसे ही भोगता मान । विषय भोग ॥ ५२० ॥
तथा स्वर्ग-प्राप्तिकी बात । सुननेमें भी घृणा पार्थ ।
मानो वह श्वान-पिशित । सडा हुवा जो ॥ २१ ॥
यह है विषय-वैराग्य । आत्म-लाभका जो सौभाग्य ।
इससे ब्रह्मानंद-योग्य । होता जीव ॥ २२ ॥
उभय भोगमें जो त्रास । पाता है जिसका मानस ।
वहां जान करता वास । ज्ञान सदैव ॥ २३ ॥
११ ज्ञानका लक्षण, अनहंकार—
करता जो निष्ठा पूर्वक । सत्कार्य नित्य नैमित्तिक ।
कर्तृत्व-भावसे अलीक । रहता अलिप्त ॥ २४ ॥
वर्णाश्रमके पोषक । कर्म नित्य-नैमित्तिक ।
करें नियम-पूर्वक । अखंडित ॥ २५ ॥
किंतु यह सब मैंने किया । या यह मुझसे सिध्द भया ।
स्मरणमें भी न रखा गया । कभी किंचित ॥ २६ ॥
सहसा जैसा पांडुकुमार । वायुका होता सर्व-संचार ।
या उदय होता है भास्कर । निराभिमानसे ॥ २७ ॥
या श्रुतिके स्वाभाविक बोल । या गंगाकी निरुद्देश्य चाल ।
उसके व्यवहार सकल । ऐसे अहंकार शून्य ॥ २८ ॥
४७३ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
(60)

उचित-समय जैसे वृक्ष फलते । हम फले या नहीं यह न जानते ।
ऐसी वृक्ष-वृत्तिसे जो हैं रहते । कर्म रत सदैव ॥ २९ ॥
ऐसे मन कर्म-वचन । अहंकार रहित जीवन ।
मणि-मालाका खींचा जान । बीचका सूत्र ॥ ५३० ॥
संबंध बिन जैसे बादल । आकाशमें चलते हैं चाल ।
ऐसे कर्म उसके सरल । तनसे होते हैं ॥ ३१ ॥
शराबीके तनपे वस्त्र । या चित्रके हाथमें शस्त्र ।
बैल पर लादा है शास्त्र । वैसे ही अर्जुन ॥ ३२ ॥
उसको जैसे इस शरीरमें । मैं हूं इसका भान न हो मनमें ।
निरहंकारिता है सहजमें । कहते इसको ॥ ३३ ॥
संपूर्ण जहां यह दीखता । वहीं है ज्ञान घर करता ।
नहीं है यहां आवश्यकता । संदेहकी कोई ॥ ३४ ॥
१२ ज्ञानका लक्षण, गुणदोष-दर्शन—
जन्म मृत्यु जरा दुःख । व्याधि वार्धक्य कलुष ।
सावध रहता देख । दूरसे जो ॥ ३५ ॥
मांत्रिक जैसे पिशाचका । तथा योगी उपसर्गका ।
राजा आगे पीछे होनेका । देखता पहलेसे ही ॥ ३६ ॥
जैसे वैर जन्मांतरका । साप न जाने भूलनेका ।
वैसे वह पूर्व जन्मका । धोता दोष ॥ ३७ ॥
आंखमें कंकर न घुलता । घावमें बरछा न सहता ।
वैसा वह दुःख न भूलता । जन्म-जन्मका ॥ ३८ ॥
पूय-गर्तमें मैं गया । मूत्र-रंध्रमें निभाया ।
सहज ही स्वाद लिया । कुच-स्वेदका ॥ ३९ ॥
सदैव वह इस प्रकार । करता है जन्मका विचार ।
जिससे हो जन्म बार बार । ऐसा न करता कुछ ॥ ५४० ॥
ज्ञानेश्वरी ४७४

जैसे दांव हारा हुवा जुवारी । जीतनेमें करता फुरहरी ।
अथवा जैसे बापका वैरी । मारता पुत्र ॥ ४१ ॥
हत्याके बाद अपनोंका नेक । बदला लेता है अंग-रक्षक ।
ऐसे यह जन्मका है देख । पीछा करता ॥ ४२ ॥
किंतु जन्मकी जो लाज । न छोडता अपनी निज ।
संभावित जैसे निस्तेज । सहता नहीं ॥ ४३ ॥
तथा मृत्यु आगे आयेगी । कल्पांतमें जा जकडेगी ।
किंतु उसकी आज होगी । तत्परता जागृत ॥ ४४ ॥
मध्य-प्रवाह अथाह सुनकर । तैरनेवाला जैसे किनारे पर ।
सावधान हो कमर बांधकर । होता है सिद्ध ॥ ४५ ॥
या रणमें जानेसे पूर्व अर्जुन । संभालकर होता है सावधान ।
घाव लगनेसे पूर्व ही ओढन । आगे करता जैसे ॥ ४६ ॥
या जानके आगेका पथ-वध । पथिक होता पहले सावध ।
अथवा मृत्युसे पूर्व औषध । करते जैसे ॥ ४७ ॥
नही तो सदैव ऐसा होता । जलते घरमें है फंसता ।
तब कुंआं खोदने जो लगता । व्यर्थ होता जान ॥ ४८ ॥
अथाह गर्तमें डूबे·जैसे पत्थर । संसार सागरमें वैसे धनुर्धर ।
डूब गये हैं कई चीख चीखकर । ऐसा करेगा कौन ॥ ४९ ॥
जिसका रहता समर्थसे वैर । तब वह जैसा आठ ही पहर ।
रहता है बांधकर तलवार । सावधान हो ॥ ५५० ॥
बाप मानता कन्या उपवर । या सन्यासी रहता मरने तैयार ।
वैसे वह सदैव मृत्युका विचार । करता रहता है ॥ ५१ ॥
ऐसे जन्मसे जन्म-निवारण । औ' मृत्युसे कर मृत्यु-हरण ।
स्वयं रहता करके धारण । अपना निज-रुप ॥ ५२ ॥
उसके घरमें ज्ञानका । अभाव न रहा जिसका ।
गया दुःख जन्म-मृत्युका । धनंजय ॥ ५३ ॥
४७५ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

न छूता उसका शरीर । वार्धक्य अभी धनुर्धर ।
तभी करता है विचार । तारुण्यमें वृद्धत्वके ॥ ५४ ॥
कहे आज इस अवसर । बडा हुवा है यह शरीर ।
होगा सूखा पातसा आखर । कल निश्चित ॥ ५५ ॥
जैसे दैव-हीनके व्यवसाय । मंत्री-हीन राजाके राज-कार्य ।
वैसे ही होंगे मेरे हाथ पाय । बल-हीन ॥ ५६ ॥
लेनेमें पुष्पोंकी गंध । नाक बनेगी निगंध ।
जैसे बधिर एकाध । ऊन्टकी टांग ॥ ५७ ॥
जैसे वोढर-पशुके खुर । सढते हैं कीचडमें भर ।
वैसे ही होगा मेरा शरीर । वार्धक्यसे ॥ ५८ ॥
ईर्शासे जो पद्म-दलसे । लडते नयन ये जैसे ।
होंगे सडे परवलसे । रूप-हीन ॥ ५९ ॥
भिवयोंके पलक जैसे । झूलेंगे जो गली-छालसे ।
गिरेंगे आंसू भी उनसे । सडेगा उर ॥ ५६० ॥
गिरगिट कीकरपे दौडता । और कर्तारसे गजबजाता ।
उसी भांति है लारसे बनता । मुख मेरा ॥ ६१ ॥
रसोई-घरकी नालीमें । बुदबुदाते मांड-सांडमें ।
वैसे ही सब नाकमें । लथपतायेगा ॥ ६२ ॥
तांबूलसे होंठ सजाकर । हंस हंस दांत दिखाकर ।
बोलसे मैं सदा स-नागर । दिखाता अकड ॥ ६३ ॥
उन्हीं होंठ पर कल । आयेगी लार उबल ।
दांत दाढ भी निकल । जायेगी सब ॥ ६४ ॥
अथवा ऋणसे डूब जाता कृषक । वर्षा-झडी में पशु लगाते बैठक ।
वैसे उठ नहीं सकेगी यकायक । यही जीभ ॥ ६५ ॥
जैसे सूखे हुये तिनके । हवा में उडते घासके ।
वैसे ही डाढ़ीके बालोंके । होंगे हाल ॥ ६६ ॥
ज्ञानेश्वरी ४७६

तथा झडीसे आषाढ़की । झरनी खाई पहाड़की ।
वैसे मुखसे लारकी । बहेगी धार ॥ ६७ ॥
बोल तुतला घिघियायेंगे । कान तुतुने बधिरायेंगे ।
पिंड जकड कुम्हलायेगा । मानो बानर-सा ॥ ६८ ॥
खेतोंमें हौवा जैसे घासका । कांपता खाके झोंका हवाका ।
वैसे हाल होगा सर्वांग शरीरका । उस समय ॥ ६९ ॥
पैरमें पैर अटकेंगे । हाथ कांप सकुचायेंगे ।
शरीर-कर्म उपहासेंगे । अपने आपको ॥ ७० ॥
होंगे मलमूत्रादिके द्वार । जैसे टूटे घडेके खापर ।
और मेरे निधनमें इतर । करेंगे मनौतियां ॥ ७१ ॥
यह देखके कोसेगा जग । होगा तब मृत्युका वियोग ।
आप्त-जन करेंगे उबग । तब मेरा ॥ ७२ ॥
स्त्रियां कहेंगी मुझको भूत । सुन होंगे बालक मूर्छित ।
इससे बनूंगा मैं सतत । घृणा-पात्र ॥ ७३ ॥
रातमें खांसीका उबाल । सोये हुये सुन सकल ।
“कितनोंको खायेगा काल” । कहेंगे “न जाने यह” ॥ ७४ ॥
वार्धक्यका ऐसा विज्ञापन । देख होता वह सावधान ।
तारुण्यमें ही उसका मन । होता उपशम ॥ ७५ ॥
कहता यह कल आयेगा । आजका भोगमें बीतेगा ।
आत्म-हितमें क्या रहेगा । अपने पास ॥ ७६ ॥
आनेसे पहले बधिरता । सुनने-योग्य सब सुनता ।
जब तक पंगु नहीं होता । करता देशाटन ॥ ७७ ॥
जब तक दृष्टि रहती । देखने योग्य देख लेती ।
जब तक वाचा रहती । गाता मंगल-गान ॥ ७८ ॥
हाथ होंगे ये तब बधिर । जान करता अब अधीर ।
सत्कर्मको वह निरंतर । दानादिक ॥ ७९ ॥
४७७ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

ऐसा होगा तब सकल । मन होगा जान पागल ।
ध्यान-मग्न होता निश्चल । आत्म-ज्ञानमें ॥ ५८० ॥
चोर आयेंगे दिनमें जो जानता । तभी संपत्तीकी व्यवस्था करता ।
दीप बुझनेसे पहले लगाता । वस्तु सुचारु रूपसे ॥ ८१ ॥
वैसे वार्धक्य कल आयेगा । यह सब ही व्यर्थ जायेगा ।
तारुण्यमें ही कर रखेगा । सभी व्यवस्था ॥ ८२ ॥
अति दुर्गम-पथ यह जान । संध्याकाल कर अवलोकन ।
आप मात्र निकला जो अर्जुन । क्या करेंगे चोर ॥ ८३ ॥
ऐसी जराकी आहट पाकर । जो व्यर्थ न हो यह जानकर ।
बैठा है शत-वृद्ध बनकर । उसको डरना क्या ? ॥ ८४ ॥
फटकी बालोंको फटकना । उससे न निकलना दाना ।
या राखको ही फिर जलाना । इससे होगा क्या ? ॥ ८५ ॥
करके वार्धक्यका विचार । किया उसका प्रभाव दूर ।
उसके पास ज्ञान अपार । रहता सदैव ॥ ८६ ॥
वैसे ही नहीं जब अनेक रोग । जिसके नहीं व्यापते सभी अंग ।
तभी वह आरोग्यका उपयोग । करता सदैव ॥ ८७ ॥
अजी ! सांपके मुखसे । गिरा हुवा कौर जैसे ।
तज देता सदा वैसे । बुध्दिमान ॥ ८८ ॥
जिसके वियोगसे दुःख । बढ़ते विपत्ति औ' शोक ।
तजके वैसे स्नेह-सुख । रहता उदासीन ॥ ८९ ॥
अजी ! दोष स्पर्शेंगे कैसे । न करता कर्म जो वैसे ।
नियमित कर्मेंद्रियोंसे । रोकके रहता ॥ ५९० ॥
ऐसे अनेक युक्तिसे । रहता है दक्षतासे ।
ज्ञान-संपत्तिका उसे । मानो स्वामी ॥ ९१ ॥
अब और ही एक । लक्षण अलौकिक ।
कहता सुन नेक । धनंजय ॥ ९२ ॥
ज्ञानेश्वरी ४७८

असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु ।
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥ ९ ॥

१३ ज्ञानके लक्षण, अनासक्ति -

वह अपने शरीर पर । उदास होता इस प्रकार ।
पथिक पराये वस्तु पर । बैठा हो रक्षक ॥ ९३ ॥

या जैसे है साया वृक्षकी । क्षण भर मिली राहकी ।
घर पर नहीं उसकी । ममता उतनी भी ॥ ९४ ॥

सायाकी भांति रहता है जैसे । रह कर भी न जानता वैसे ।
रहता है अलोलुप भावसे । पत्नीमें नित ॥ ९५ ॥

वैसे ही संतानके विषयमें । रहता जैसे पंथी पड़ावमें ।
अथवा गोरु वृक्षकी सायामें । बैठ जाते हैं ॥ ९६ ॥

यदि वह रहता श्रीमंत । ऐसे रहता है पांडुसुत ।
जैसे रहा कोई साक्षीभूत । किसीके धनका ॥ ९७ ॥

या तोता जैसे पिंजडेमें । रहना स्वामीकी आज्ञामें ।
ऐसे वह वेद-आज्ञामें । रहता हो विधेय ॥ ९८ ॥

वैसे ही गृह-दारा-पुत्र- । बना नहीं रखते मित्र ।
उसको तू जान पवित्र । नींव-ज्ञानकी ॥ ९९ ॥

१४ ज्ञानके लक्षण, अखंड सम-चित्तता—

तथा महा-सिंधु जैसे । ग्रीष्म-वर्षा में एकसे ।
इष्ट अनिष्ट भी वैसे । जानता नहीं ॥ ६०० ॥

या तीन कालमें नहीं होता । तीन प्रकारका सविता ।
वैसे सुखदुःखमें रहता । समचित्त वह ॥ १ ॥


निःसंग वृत्ति कर्मोंमें पुत्रादिमें अलिप्तता ।
प्रिय अप्रिय लाभोंमें अखंड समचित्तता ॥ ९ ॥

४७९
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

जहां आकाशकी भांति । साम्यमें खामी न आती ।
जान तू सुभद्रापति । वहां है ज्ञान ॥२॥
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ॥ १० ॥
१५ ज्ञानका लक्षण, निष्काम एकनिष्ठ भक्ति—
वैसे ही बिना मेरे कहीं । श्रेष्ठ अन्य कुछ भी नहीं ।
ऐसा दृढ निश्चय सही । जिसने किया ॥ ३ ॥
काया-वाचा तथा मनसे । कृत-निश्चय किया ऐसे ।
मेरे बिना दूसरा ऐसे । नहीं देखते ॥ ४ ॥
या जिसने अपना मन । किया पूर्ण मुझमें लीन ।
एकत्वमें शय्या-समान । कर लिया है ॥ ५॥
चितामें जाते समय सती । अन्य न सोचती बिना-पति ।
ऐसे उसकी केवल गति । एकमात्र मैं हूं ॥ ६॥
मिल कर भी जो मिलता रहता । सागरसे नित प्रवाह सरिता ।
मैं बन कर भी मुझको भजता । वैसे वह सदैव ॥ ७ ॥
जैसे सूर्यके साथ उदय होता । वैसे उसके साथ अस्त होता ।
यह पारतंत्र्य ही जैसे शोभता । प्रभाको सदैव ॥ ८ ॥
पानीकी सतह पर । उठता है पानी सुंदर ।
उसे कहते लहर । वैसे वह पानी ही ॥ ९ ॥
अनन्य जो इस प्रकार । हुवा है नित मुझपर ।
मूर्तिमंत है धनुर्धर । ज्ञान-रूप जो ॥ ६१० ॥
१६ ज्ञानका लक्षण, सदा एकांतमें प्रीति—
होती सदा चाह उसकी । तीर्थ-क्षेत्रोंमें रहनेकी ।
वन-गुहामें एकांतकी । धनंजय ॥ ११ ॥
मुझमें हो अनन्यत्व भक्ति निष्काम निश्चल ।
एकांतमें रहे प्रीति अरुचि जन-संगमें ॥ १० ॥
ज्ञानेश्वरी ४८०

शैल-कक्षाके गह्वर । जलाशय परिसर ।
किंतु न चाहे शहर । रहनेके लिये ॥ १२ ॥
एकांत पर उसकी प्रीति । जन-संगमें है अ-प्रवृति ।
जान तू मनुष्याकार-मूर्ति । ज्ञानकी वह ॥ १३ ॥
कहता ज्ञानके लक्षण । और भी मैं तुझे अर्जुन ।
तू है अत्यंत बुद्धिमान । सुनो इसे ॥ १४ ॥
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ॥ ११ ॥
१७-१८ ज्ञानका लक्षण, अध्यात्म-ज्ञान, ज्ञेय-दर्शन--
अजी ! परमात्म ऐसे । वस्तु होती है जिससे ।
दर्शन होता है उसे । कहते हैं ज्ञान ॥ १५ ॥
इस एक ज्ञानके बिन । स्वर्ग-दायक आदि ज्ञान ।
मानना है वह अज्ञान । निश्चय-पूर्वक ॥ १६ ॥
स्वर्गकी बात वह छोडता । संसारसे नाता ही छोडता ।
अध्यात्म-ज्ञानमें डूब जाता । सद्भावकासे ॥ १७ ॥
पथिक जैसे चौराहे पर । दूसरे पथोंको तज कर ।
चलता अपने पथ पर । वैसे ही वह ॥ १८ ॥
कर ज्ञान मात्रका निरीक्षण । दूसरे सबका निराकरण ।
स्वीकार करता केवल आत्म-ज्ञान । अपने मन-बुद्धिसे ॥ १९ ॥
कहता है सही यह एक । अन्य सभी है भ्रांति-मूलक ।
ऐसी मति कर स्थिर देख । रहता मेरु-सा ॥ ६२० ॥
ऐसा निश्चय जिसका । आत्म-ज्ञान विषयका ।
ध्रुव जैसा गगनका । वैसा रहता ॥ २१ ॥
अध्यात्म-ज्ञानमें श्रध्दा तत्वत' ज्ञेय-दर्शन ।
कहा है इसको ज्ञान अज्ञान विपरीत जो ॥ ११ ॥
४८१ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
(61)

ऐसे ही मनुष्योंमें ज्ञान । रहता निःसंशय जान ।
ऐसा ही मन-ज्ञान-लीन । होता है मद्रूप ॥ २२ ॥
बैठनेके बाद होनेका जो हो जाता । वह सब बैठते ही नहीं होता ।
किंतु ज्ञानमें मन स्थिर हो जाता । बनता ज्ञानी वह ॥ २३ ॥
तथा तत्व-ज्ञान निर्मल । फलता जो एक ही फल ।
ज्ञेय पर ही जो सरल । जम जाती दृष्टि ॥ २४ ॥
वैसे बोध हुवा जो ज्ञान । हुवा नही ज्ञेय दर्शन ।
नहीं मिला उसको ज्ञान । ऐसे मानते हम ॥ २५ ॥
अंधेके हाथमें दीप देनेसे । क्या लाभ होगा उसको उससे ।
कुछ न दीखता जिस दीपसे । लाभ ही क्या भला ॥ २६ ॥
अजी ! प्रकाश जब ज्ञानका । न कराता दर्शन ज्ञेयका ।
उससे क्या लाभ है किसका । निरर्थक-बुद्धि ॥ २७ ॥
जिससे-ज्ञेय दर्शन । करता सर्वत्र मन ।
वही शुद्ध-बुद्धि जान । धनंजय ॥ २८ ॥
˙वही है निर्दोष ज्ञान । जिससे ज्ञेय दर्शन ।
वही है ज्ञान-संपन्न । हुवा पार्थ ॥ २९ ॥
जितनी ज्ञानकी वृद्धि । उतनी है उसकी बुद्धि ।
उसको शब्दसे सिद्धि । करना व्यर्थ ॥ ६३० ॥
ज्ञान प्रकाशके साथ । बुद्धि ज्ञेयसे सतत ।
चिपकती वही पार्थ । पाता पर-तत्व ॥ ३१ ॥
ज्ञानेश्वरकी सहज काव्य स्फूर्ति—
उसीको मैं यदि ज्ञान कहता । इसमें विस्मय क्या पांडुसुत ।
अजी ! सविताको कहो सविता । नहीं कहें क्या ॥ ३२ ॥
तब कहते हैं सब श्रोता । विस्तार न कर ज्ञानी-वार्ता ।
ग्रंथार्थमें यह बाधा लाता । क्यों भला व्यर्थकी ॥ ३३ ॥
ज्ञानेश्वरी ४८२

हमें यह तेरा मधुर । वक्तृत्वका पाहुनाचार ।
ज्ञानका कराया साकार । शब्द-दर्शन ॥ ३४ ॥
रस होना है अति मात्र । लिया है तूने कवि मंत्र ।
बुलाके हमें यह तंत्र । करता क्यों शत्रुताका ॥ ३५ ॥
प्रेमसे भोजनमें बुलाया । सजाके पंगतमें बिठाया ।
और सभी पकवान्न भगाया । इससे मिला क्या ॥ ३६ ॥
गाय है सुंदर पुष्ट बछडा साथ । काह्यमें हाथ लगाते मारती लाथ ।
कौन पालेगा कहो उसे समर्थ । व्यर्थ ही घरमें ॥ ३७ ॥
वैसे ज्ञानमें मति नहीं प्रकाशती । जल्पोंमें व्यर्थ स-कौतुक दौडती ।
वैसे तूने अन्य कवि-गणकी भांति । तिहीं किया निरूपण ॥ ३८ ॥
पानेके लिये जो कुछ ज्ञानांश । करता योग-यागादि सायास ।
उस ज्ञानका तूने किया स-उल्हास । योग्य-निरूपण ॥ ३९ ॥
अमृत मिला जैसे सतत । इससे ऊबेगा कोई तात ।
या सुखके दिनका गणित । करेगा क्या कोई ॥ ४० ॥
या पूर्ण चंद्रकी रात । आयेगी युग-पर्यंत ।
कहेगा उसे क्या व्यर्थ । कभी चकोर ॥ ४१ ॥
वैसे हैं ज्ञानके बोल । वह भी ऐसे रसाल ।
कौन कहेगा अकुशल । हुवा बहु ॥ ४२ ॥
आता जब भाग्यशाली अतिथि । परोसती गृहिणी दैववती ।
रसौयी चुक न जाये चाहती । मती-मनुष्यकी ॥ ४३ ॥
ऐसे ही आया अब प्रसंग । ज्ञानमें हमको अति-राग ।
तेरा भी उसीमें अनुराग । इससे यहां ॥ ४४ ॥
इसीलिये यह प्रवचन । खिला है भक्तिसे शत-गुण ।
तभी ज्ञानमें तू है संपूर्ण । कैसे न कहे हम ॥ ४५ ॥
अब यहां इसपर । ज्ञानकी पिछली ओर ।
पद है वह स्पष्ट कर । निरूपणसे ॥ ४६ ॥
४८३ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

सुनके संत-वचन ऐसे । कहे निवृत्ति-दास सबसे ।
मेरा भी मनोगत था ऐसे । निरूपणका ॥ ४७ ॥
अब तो यहां हैं आप । आज्ञा देते हैं सकृप ।
व्यर्थका शब्द मैं आप । न करूं यहां ॥ ४८ ॥
जैसे आपने सुना । पार्थसे कृष्णका कहना ।
ज्ञानके लक्षण संपूर्ण । अष्टादश ॥ ४९ ॥
फिर कहते हैं हरि अर्जुन । वह है ज्ञानका वसति-स्थान ।
यह मेरा मत है जो संपूर्ण । ज्ञानी भी यही कहते ॥ ६५० ॥
करतल पर है गोल । फिर रहा जैसे आमला ।
ज्ञान तुझको हे निर्मल । दिखाया मैने ॥ ५१ ॥
अज्ञानके लक्षण-
सुन तू महामति पार्थ । अज्ञान जो है कहलाता ।
वह मैं तुझसे कहता । स-लक्षण ॥ ५२ ॥
जब होता है ज्ञानका भान । जानना सहज है अज्ञान ।
अजी ! जो नहीं होता है ज्ञान । अज्ञान ही रहा ॥ ५३ ॥
दिवस होता है जब समाप्त । रहती है केवल-मात्र रात ।
तीसरा अन्य नहीं होता पार्थ । उसी भांतिसे ॥ ५४ ॥
जहां नहीं होता ज्ञान । वहां देख तू अज्ञान ।
तो भी कहता हूं सुन । लक्षण उसके ॥ ५५ ॥
१ अज्ञानका लक्षण, अभिमान-
मौका देखता स्व-प्रतिष्ठाका । प्रतीक्षा करता सम्मानका ।
होता जब सत्कार उसका । खिलता संतोषसे ॥ ५६ ॥
गर्व-पर्वतके शिखर । बढ़ते जाता महत्व पर ।
उसमें तू पांडुकुमार । अज्ञान जान ॥ ५७ ॥
२ अज्ञानका लक्षण, दंभ-
जैसे स्वधर्मका मंगल । बांधता वाचाका पीपल ।
तथा खडा किया देवल- । में मानो कूंबा ॥ ५८ ॥
ज्ञानेश्वरी ४८४

करता अपने ज्ञानका पसारा । तथा पीटता सु-कृतका ढिंढोरा ।
करता सदा प्रतिष्ठा विचार । बढानेका ॥ ५९ ॥
करता है स्नान देहार्चन । प्राणियोंकी पूजासे वंचन ।
वह आज्ञानकी खान जान । सदैव, पार्थ ॥ ६६० ॥
३ अज्ञानका लक्षण, हिंसा—
होता जब वनमें अग्नि-संचार । जलते हैं तब जंगम-स्थावर ।
वैसे ही होते हैं उनके उपचार । जन दुःखके कारण ॥ ६१ ॥
सहज ही करता जो भाषण । होता है सबरीसे भी तीक्ष्ण ।
विषसे भी करता है मारण । अधिक संकल्प ॥ ६२ ॥
उसका अति अज्ञान । अज्ञानका है निधान ।
तथा हिंसाका सदन । जीवन उसका ॥ ६३ ॥
४ अज्ञानका लक्षण, अशांति—
धौंकनी जब है फूंकती । फूलती और सिकुड़ती ।
संयोग-वियोगमें होती । वैसी स्थिति उसकी ॥ ६४ ॥
जिस भांति बवंडरमें धूल । पहुंचती गगनमें सरल ।
फूलता वह स्तुतिसे बहुल । अपनी पार्थ ॥ ६५ ॥
अल्पांश भी निंदा सुनकर । पकड़कर बैठता शिर ।
सुखाती हवा गळता नीर । कीचडको जैसे ॥ ६६ ॥
मानापमानमें वैसे होता । कोई भी ऊर्मी नहीं सहता ।
जान लेना उसमें तू पार्थ । अज्ञान पूरा ॥ ६७ ॥
५ अज्ञानका लक्षण, कुटिलता—
उसके मनमें होता भिन्न । तथा वाचा बोलती है भिन्न ।
देता किसीको कुछ वचन । सहायता तीसरेको ॥ ६८ ॥
जैसे व्याधका चारा डालना । सरळताका स्वांग रचना ।
सज्जनोंका हृदय जीतना । ऐसे शत्रु-भावसे ॥ ६९ ॥
४८५ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

जैसे कायीसे लीपती शिला । अथवा पका निंबौला पीला ।
वैसे दीखता उसका भला । बाह्य-आचार ॥ ६७० ॥
उसमें भरा है अज्ञान । बसता है जान अर्जुन ।
इस बोलसे नहीं भिन्न । दूसरा सत्य ॥ ७१ ॥
६ अज्ञानका लक्षण, गुरुद्रोह--
गुरु-भक्तिमें मानता लांछन । गुरु-सेवामें माने अपमान ।
गुरुसे मिली है विद्या महान । मानता नहीं यह ॥ ७२ ॥
करना उसका नामोच्चरण । चांडालका अन्न खाना ही मान ।
कहनेमें अज्ञानका लक्षण । बोलना पडा मुझे ॥ ७३ ॥
अब गुरु-सेवकका नाम लेगा । जिससे वाचाका प्रायश्चित्त होगा ।
गुरु-भक्तके नामसे दूर होगा । जैसे तम सूर्यसे ॥ ७४ ॥
इससे ही सब पापका । दूर होगा दोष वाचाका ।
जो आया गुरु-निंदाका । नाम लेनेसे ॥ ७५ ॥
गुरु-भक्तका नामोच्चार । उस बातका भय हर ।
अब सुनो चित्त देकर । अन्य लक्षण ॥ ७६ ॥
७ अज्ञानका लक्षण, अशौच--
स्वयं होता है जो कर्म-विरत । मनमें सदा विकल्प भरित ।
रहता कांटे कीचड सहित । वनका कुवास ॥ ७७ ॥
ऊपर झाड झंकाड । अंदर भरे है हाड ।
अशुचिका भरा आड । अंदर बाहर ॥ ७८ ॥
जिस भांति बुभुक्षित कुत्ता । खुला या ढका नहीं जानता ।
अपना पराया न देखता । वैसे द्रव्यार्थ जो ॥ ७९ ॥
इन ग्राम-सिंहमें जैसे । मिलन निषेध ना वैसे ।
स्त्रियोंके विषयमें वैसे । विचार करते नहीं ॥ ६८० ॥
कर्मका समय वे चुकाते । नित्य-नैमित्तिक है टालते ।
इससे वे नहीं पछताते । मनमें कभी ॥ ८१ ॥
ज्ञानेश्वरी ४८६

पापके वे सदा संग । पुण्यमें होते असंग ।
जिनके मनमे वेग । सदा विकल्पके ॥ ८२ ॥
जान तू वह संपूर्ण । अज्ञान है मूर्तिमान ।
मूंदता सदा नयन । वित्ताशासे ॥ ८३ ॥
८ अज्ञानका लक्षण, चांचल्य-
अल्प स्वार्थसे होता चंचल । स्थिरतासे होता है विचल ।
जैसे तृणांकुर जाता ढल । चींटीसे भी ॥ ८४ ॥
पैर भी पडनेसे जैसे । डबरे गंदलाते वैसे ।
भयके नाम सुननेसे । घबडाता जो ॥ ८५ ॥
मनोरथके प्रवाहमें । बहता जाता जो मनमें ।
कुझडा जैसे प्रवाहमें । बहता जाता ॥ ८६ ॥
जैसे है वायुके साथ । धूम्र फैलता दिगंत ।
होती है दुखःकी बात । उसको वैसी ॥ ८७ ॥
जैसे होता बवंडर । होता नहीं कहीं स्थिर ।
तीर्थक्षेत्र और पुर । न करता स्थान ॥ ८८ ॥
जैसे है गिरगिट उन्मत्त । चढने उतरनेमें रत ।
रहता है सदा ही व्यर्थ । उसी प्रकार ॥ ८९ ॥
जैस बिन पेंदीका जो घडा । बिन गाडे न रहता खडा ।
वैसे नींदमें रहता पडा । नहीं तो भटकता ॥ ६९० ॥
उसमें रहता बहुत । अज्ञान भंडार विस्तृत ।
चांचल्य में लघुभ्रात । मर्कटका जो ॥ ९१॥
९ अज्ञानका लक्षण, स्वैराचार-
और सुन तू धनुर्धर । न छूता उसका अंतर ।
संयमका गंध संस्कार । नाम मात्रको ॥ ९२ ॥
अजी ! जब नालेमें आता पूर । उसे न रोकता बालूका घेरा ।
शास्त्र-निषेधका उसपर । होता नहीं प्रभाव ॥ ९३ ॥
४८७ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

करता व्रतोंका अवहेलन । वैसे ही स्वधर्मका उल्लंघन ।
यम-नियम मर्यादा खंडन । करता वह ॥ ९४॥
पापसे वह नहीं उकताता । नहीं उसको पुण्यमें भी आस्था ।
वैसे ही लोक-लाजकी खो देता । सीमा रेखा ॥ ९५ ॥
कुल-धर्म नहीं पहचानता । वेदोंकी आज्ञाको नहीं जानता ।
भला-बुराका ध्यान नहीं देता । कभी वह पार्थ ॥ ९६ ॥
सांडसा वह अनिर्बन्ध । आंधीसा होता अमर्याद ।
टूटा हुवा नदका बांध । निर्जनमें कहीं ॥ ९७ ॥
जैसे अंधा गज मदसे मत्त । या जलता हुआ वन पर्वत ।
वैसे विषयोंमें होता उन्मत्त । चित्त उसका ॥ ९८ ॥
घूरेपर कब कौन क्या न डालते । ग्राम द्वार देहरी कौन न लांघते
राहके सांडको कहो कौन बांधते । पांडुकुमार ॥ ९९ ॥
जैसे अन्न-छत्रमें सभी जाते । या सामान्य अधिकार जताते ।
या सारायीमें कोई घुसते । वैसे ही सदा ॥ ७०० ॥
रहता जिसका अंतःकरण । उसमें होता संचार संपूर्ण ।
अज्ञानमें वहां है निशिदिन । रहती बुद्धि ॥ १ ॥
१० अज्ञानका लक्षण भोगलिप्सा--
विषयोंकी जो है उसकी आस । जीने मरनेमें न होती नास ।
स्वर्गमें भी उसीके आशापाश । ले चलता वह ॥ २ ॥
करता भोगका अखंड जतन । काम्य-क्रियाका है जिसका व्यसन ।
विरक्तका कर मुखावलोकन । करता शबैल ॥ ३ ॥
विषय है उनसे उकताने । ये न उकताने सावध होते ।
सडे हुये हाथोंसे जैसे खाते । महारोगी ॥ ४ ॥
जैसे गर्दभी नहीं आने देती । लातोंसे खरका नाक तोडती ।
फिर भी गर्दभ है सआसक्ति । न लौटना पीछे ॥ ५ ॥
वैसे ही जो विषयोंमें रत । कूदते स्थानमें ज्वाला-ग्रस्त ।
व्यसनमें होकर वे लिप्त । मानते यह भूषण ॥ ६ ॥
ज्ञानेश्वरी ४८८