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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

तथा प्रवास या पीडासे । थका मांदा जो मिला उसे ।
देता है वह शुश्रूषासे । सुख और शांति ॥ ६ ॥
सभी तीर्थका जो आधार । माता पिताका है शरीर ।
उनपर है निछावर । होता सेवामें ॥ ७ ॥
वैसे ही संसार जैसा दारुण । मिलते ही जो हरता थकान ।
ज्ञान-दानमें वह सकरुण । भजता गुरु ॥ ८ ॥
तथा अग्निमें जो स्वधर्मकी । मलिनता देह-अहंताकी ।
मिटाना पुट देके आवृत्तिकी । पुनः पुनः पार्थ ॥ ९ ॥
भूतजातमें वह वस्तुको जान । करता परोपकार औ' नमन ।
स्त्री-विषयमें करता क्षण क्षण । निग्रह मनका ॥ २१० ॥
जन्मके ही प्रसंग । स्पर्श हुवा स्त्री अंग ।
आगे है जन्म सांग । रखना शुद्ध ॥ ११ ॥
भूतजातमें एक । वस्तुको वह देख ।
नहीं जो तृण तक । करता भंग ॥ १२ ॥
इस भांतिका जब आचरण । करता रहता जिसका तन ।
तब उसमें खिला यह जान । शारीरिक तप ॥ १३ ॥
करना यह सब पार्थ । देहसे ही है विशेषता ।
तभी मैं उसको कहता । तप शारीरिक ॥ १४ ॥
एवं शारीरिक जो तप । दिखाया है उसका रूप ।
कहता हूं सुन निष्पाप । तप वाङ्मय ॥ १५ ॥
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥ १५॥
वाणीका तप सात्विक—
लोहेका आकार तूक । न घटाकर कनक ।
करता कैसे है देख । पारस वैसे ॥ १६ ॥
हितार्थ बोलना सत्य प्रेमसे न खले कभी ।
स्वाध्याय करना नित्य वाणीका तप है कहा ॥ १५ ॥
६८९
(३३) श्रद्धा-निरूपण-योग

ऐसे जो नहीं दुखाता । जो सुनता सुख पाता ।
ऐसा ही वह बोलता । साधुतासे ॥ १७ ॥
पानी तो वृक्षको दिया जाता । किंतु पासका घास उगता ।
ऐसे है एकसे कहा जाता । होता सबका सुख ॥ १८ ॥
जैसे अमृतकी गंगा बहकर । करती है वह प्राणोंको अमर ।
स्नानसे पाप ताप विनाश कर । देती है शांति ॥ १९ ॥
वैसे है अविवेकको मिटाता । अपना अनादित्व दिलाता ।
पीयूषसा रुचि न विघडाता । सुननेवालेकी ॥ २२० ॥
जब कोई है पूछता । तब है ऐसा बोलता ।
या आवर्तन करता । नाम या निगम ॥ २१ ॥
ऋग्वेदादि जो है तीन । जा बसते वाग्भुवन ।
बनता जैसे वदन । ब्रह्मशाला ॥ २२ ॥
नहीं तो कोई भी नांव । शैव अथवा वैष्णव ।
बनाता वाचा वाग्भव । तप मानके ॥ २३ ॥
मानसिक तप, सात्विक—
अब तप जो मानसिक । यह भी कहता हूं देख ।
कहे लोक-नाथ नायक । इस समय ॥ २४ ॥
मनःप्रसादःसौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः ।
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ॥ १६ ॥
सरोवरको यदि तरंग । तजते हैं आकाशको मेघ ।
या चंदन-वनको आग । उसी भांति ॥ २५ ॥
नाना कला-वैषम्य चंद्र । तजती चिंतायें नरेंद्र ।
अथवा है क्षीर समुद्र । मंदराचल ॥ २६ ॥
प्रसन्न वृत्ति सौम्यत्व आत्म-चिंतन संयम ।
भावना रखना शुद्ध मनका तप है कहा ॥ १६ ॥
ज्ञानेश्वरी ६९०

वैसे नाना विकल्प-जाल । छोड़कर जाते सकल ।
मन रहता है केवल । स्वरूपावस्थामें ॥ २७ ॥
उष्णताके बिन प्रकाश । जाड्य बिन अन्नमें रस ।
रिक्तता बिन अवकाश । होता जैसे ॥ २८ ॥
देखकर अपना विश्रांति-स्थान । अपना स्वभाव छोड़ता है मन ।
शीतसे कांपने न देता है तन । अपने ही शीतसे ॥ २९ ॥
जैसे अचल कलंक बिन । चंद्र-बिंब होता परिपूर्ण ।
वैसे सुशोभित स्वच्छ मन । होता है जो ॥ २३० ॥
मिट गये हैं वैराग्यके आघात । तथा पचा मनका अस्वास्थ्य पार्थ ।
बन गया है वहां उत्तम खेत । निज-बोधका ॥ ३१ ॥
तभी विचार करने शास्त्र । चलना चाहते जो एकत्र ।
वह है कभी वाचाका सूत्र । नहीं पकड़ता ॥ ३२ ॥
स्व-लाभका लाभ होते ही जब । मनका मनत्व मिटता तब ।
नीर-स्पर्शसे पिघलता सब । लवण जैसे ॥ ३३ ॥
जब वहां भाव ही नहीं उठता । इंद्रियोंके पीछे वह कैसे दौड़ता ।
तब यह कैसे कह तू पहुंचता । विषय-ग्राममें ॥ ३४ ॥
इसीलिये है मनमें ऐसे । भाव-शुद्धि होती है आपसे ।
रोम-शुद्धि हथेलीपे जैसे । होती है आप ॥ ३५ ॥
अधिक क्या कहें अर्जुन । यह दशा पाता है मन ।
तब मन-तपाभिधान । प्राप्त करता ॥ ३६ ॥
किंतु अब तू यह जान । मानस तपका लक्षण ।
श्रीकृष्ण कहता संपूर्ण । कहा मैने ॥ ३७ ॥
इसीलिये देह वाचा चित्त । करता जो विविधत्व प्राप्त ।
वह है सामान्य तप पार्थ । जाना तूने ॥ ३८ ॥
अब गुण-त्रयके संगसे । यही त्रिविध रूप लेनेसे ।
क्या होता यह प्रज्ञा बलसे । सुन तू अब ॥ ३९ ॥
३९१ श्रद्धा-निरूपण-योग

श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः ।
अफलाकांक्षिभिर्युक्तैः सात्विकं परिचक्षते ॥ १७ ॥
सात्विक तप—
तभी यह तप है त्रिविध । कहा है तुझसे प्रबुद्ध ।
वह करें हो पूर्ण श्रद्ध । छोडके फलाशा ॥ २४० ॥
वह संपूर्ण सत्व-शुद्धि । करता हो आस्तिक बुद्धि ।
तब उसको है सुबुद्धि । कहते तप सात्विक ॥ ४१ ॥
राजसिक तप—
सत्कारमानपूजार्थं तपो दंभेन चैव यत् ।
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम् ॥ १८ ॥
या करने तपका स्थापन । जगमें द्वैत कर उत्पन्न ।
प्राप्त करने सर्वोच्च स्थान । लोगोंमें तब ॥ ४२ ॥
तथा त्रिभुवनका सन्मान । नहीं पाये कोई अन्य जन ।
पंगतमें सर्वोच्च आसन । पाने भोजनमें ॥ ४३ ॥
अथवा विश्वके स्तोत्र । बनना है आप मात्र ।
विश्व ही अपनी यात्रा । करने आये ॥ ४४ ॥
तथा लोगोंसे ले पूजा विविध । आश्रय बने आप यह साध ।
इससे भोग भोगें सर्व-विध । इस आशासे ॥ ४५ ॥
करके अंगांगका श्रृंगार । सजाता है तपसे शरीर ।
तडपती बेचने शरीर । वेश्या जैसे ॥ ४६ ॥
रखके धन-मानमें आस । तपते हैं करके आयास ।
तब ऐसा ही तप राजस । कहलाता है ॥ ४७ ॥
त्रिविध तप जो सारा श्रद्धा उत्कट जोडके ।
तजके फलकी आशा होता है वह सात्विक ॥ १७ ॥
चाहके मान सत्कार करते दंभ-पूर्वक ।
वह चंचल तू जान तप राजस अस्थिर ॥ १८ ॥
ज्ञानेश्वरी ६९२

पहुरणी जब थन चूसता । गायके पास दूध न रहता ।
या जानवर खेतको चरता । न मिलती उपज ॥ ४८ ॥
तपका ऐसे प्रदर्शन । करनेसे वह अर्जुन ।
होता है फलसे विहीन । कष्टसे जो किया था ॥ ४९ ॥
देख कर ऐसे विफल । छोड़ता है तप सकल ।
तभी होता वह चंचल । तप राजस ॥ २५० ॥
जैसे अकालके बादल । भर देते नभ - मंडल ।
नहीं टिकते क्षण-काल । गरज कर भी ॥ ५१ ॥
राजस तप ऐसा होता । फलते निष्फल बनता ।
आचरणमें न टिकता । सिद्धि तक ॥ ५२ ॥
देख तू अब वही तप । किया जाता तामस रूप ।
इह-परमें परंतप । होता व्यर्थ ॥ ५३ ॥
मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः ।
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम् ॥ १९ ॥
तामसिक तप-
केवल मूर्खताका संचार । जीवमें होकर धनुर्धर ।
माना जाता अपना शरीर । शत्रुरूप ॥ ५४ ॥
जहां पंचाग्निकी ज्वाल । जलाती देह सकल ।
मानो तन मन बल । बनाके समिधा ॥ ५५ ॥
मस्तकपे जलाते गुगूल । या पेटमें चुभाते हैं कील ।
या जलाते हैं अंग सकल । आगसे अपना ॥ ५६ ॥
तथा रोककर श्वासोच्छ्वास । करते व्यर्थ ही उपवास ।
या करते धूममें वास । हो अधोमुख ॥ ५७ ॥
हठसे जो किया जाता करके आत्म-पीडन ।
तथा जो पर-घातार्थ कहाता तप तामस ॥ १९ ॥
६९३ श्रद्धा-निरूपण-योग

तथा हिमोदकमें आकंठ । नदीमें या पाषाणपे बैठ ।
जीते मांसके टुकडे काट । डालते हैं ॥ ५८ ॥
ऐसे भांति भांतिसे काया । जला घुलाके धनंजया ।
नाशार्थ तप कहलाया । दूसरोंके ॥ ५९ ॥
अंग-भारसे छूटा पाषाण । गिरके टूटता आप जान ।
आता है जो उसका हनन । करता राहमें ॥ २६० ॥
अपनेको देकर दुःख । पाते रहते हैं जो सुख ।
करने उन्हे अधोमुख । तप जो करते ॥ ६१ ॥
ऐसे दुःखका कर स्वीकार । करते हैं तप धनुर्धर ।
स्व-पर घातक हैं जो घोर । तप तामस ॥ ६२ ॥
ऐसे सत्त्वादिके कारण । होते तपके प्रकार तीन ।
उसको व्यक्त किया है जान । स्पष्ट रूपसे ॥ ६३ ॥
करनेमें अब कथन । सहज प्रसंग है जान ।
कहता दानका लक्षण । तीन प्रकारके ॥ ६४ ॥
इन्ही गुणके कारण । दान भी त्रिविध जान ।
वही तू पहले सुन । सात्विक कैसे ॥ ६५ ॥
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे ।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ॥ २० ॥
सात्विक दान—
करते स्वधर्माचरण । पाया है आप जो धन ।
उसको देना स-संमान । किसी समय ॥ ६६ ॥
मिलता सु-बीज प्रसंग । नहीं मिलता खेत चांग ।
ऐसा यह दानका योग । दीखता मुझे ॥ ६७ ॥
अनर्घ्य रत्न चढ़ता हाथ । तब स्वर्ण न मिलता पार्थ ।
दोनो मिलते हैं एक साथ । न आता ऐसा योग ॥ ६८ ॥
धर्मके भावसे देना उपकार न चाहके ।
देश काल तथा पात्र देखके दान सात्विक ॥ २० ॥
ज्ञानेश्वरी ६९४

किंतु पर्व सुहृद् संपत्ति । इन तीनोंकी होती है युति ।
जब करता भाग्य उन्नति । अपना तब ॥ ६९ ॥
इस भांति होता हो तो दान । बने जो सत्वका संघटन ।
वहां है देश-काल भाजन । सब उगते हैं ॥ २७० ॥
करना पहला ऐसा प्रयास । होना कुरुक्षेत्र या काशीवास ।
नहीं हो तो ऐसा कोई देश । धनुर्धर ॥ ७१ ॥
तब हो रवि-चंद्र राहु मेल । होने पाये ऐसा ही पुण्य-काल ।
अथवा हो ऐसा कोई निर्मल । काल दूसर ॥ ७२ ॥
ऐसे ही स्थल-काल हो एकत्र । मिले ऐसे ही संपत्ति पात्र ।
जैसे मूर्त-रूप ही पवित्र । आया हो वहां ॥ ७३ ॥
सदाचारका हो सदन । चलता हो वहां वेद-दान ।
ऐसे द्विज-रत्न पावन । आया हो वहां ॥ ७४ ॥
उनके पद-तलमें पार्था । उत्सर्ग करना वित्त सत्ता ।
जैसे पतिके सम्मुख कांता । आती जैसे ॥ ७५ ॥
या पराई धरोहर । सांस लेते लौटाकर ।
या राजाको जो किंकर । देता है पान ॥ ७६ ॥
ऐसे हो निष्काम अंतःकरण । करना भूमि धनादि अर्पण ।
तथा उठने न देना अर्जुन । फलेच्छा कभी ॥ ७७ ॥
और जिसको देना है दान । पात्र वह ऐसे हो अर्जुन ।
न करे कभी उसका मन । लौटानेका नाम ॥ ७८ ॥
यदि कोई आकाशको पुकारता । आकाश उसका उत्तर न देता ।
या उलटे देखनेसे न दीखता । दर्पणमें जैसे ॥ ७९ ॥
गेंद जैसे पानी पर । मारनेसे भी दे जोर ।
न आता उछलकर । अपने हाथमें ॥ २८० ॥
अथवा सांडको दिया चारा । तथा कृतघ्नको माना प्यारा ।
न मानते वे उपकार । उसी भांति ॥ ८१ ॥
६९५ श्रद्धा-निरूपण-योग

करता है जो दानका अंगीकार । न कर सके कभी प्रत्युपकार ।
वैसे रहता दाताको भूलकर । चितमें भी वह ॥ ८२ ॥
ऐसी परिस्थितिमें जो दान । सहज दिया गया अर्जुन ।
जान तू वही सात्विक दान । सबमें श्रेष्ठ ॥ ८३ ॥
वही है स्थल और काल । घटता पात्रका सुमेल ।
दान-भाग भी है निर्मल । होना न्यायगत ॥ ८४ ॥
यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः ।
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् ॥ २१ ॥
राजसिक दान—
दूधकी आशा मनमें रखकर । लाते हैं नित गायको चराकर ।
तथा उपजकी आशा रखकर । करते खेत जैसे ॥ ८५ ॥
या दृष्टि रख उपहार पर । बुलाते हैं आप्तोंको घर पर ।
या वायन भेजते घर पर । गोद भरनेवालोंके ॥ ८६ ॥
काटकर सूदका धन । देते हैं जैसे आप ऋण ।
या लेकर शुल्कका धन । औषध वैद्य ॥ ८७ ॥
जैसे जिसे दिया जो दान । काम आये वह स-साधन ।
ऐसी भावना रख अर्जुन । दिया जाता जो ॥ ८८ ॥
अथवा कोई राह चलता । जो है किसी काम नहीं आता ।
मिलता है तब पांडुसुत । द्विजोत्तम ऐसा ॥ ८९ ॥
एक भी कवडीके लिये । गोत्रजोंने जो पाप किये ।
सर्व प्रायश्चित्तके लिये । छोडता उदक ॥ २९० ॥
वैसे ही पारलौकिक । वांछना रख अनेक ।
दिया जाता वह एक । ग्रासमें भी न आता ॥ ९१ ॥
उपकार अपेक्षासे अथवा फल चाहके ।
क्लेश-पूर्वक जो देते जान तू दान राजस ॥ २१ ॥
ज्ञानेश्वरी ६९६

ले जाता ब्राह्मण जब दान । थकता बडी हानि मान ।
लुट लिया सारा ही धन । चोरोंने जैसे ॥ ९२ ॥
सुन इस मनोवृत्तिसे । दिया जाता जो दान उसे ।
कहाता त्रिलोकमें जैसे । राजस दान ॥ ९३ ॥
अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते ।
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम् ॥ २२ ॥
तामसिक दान—
म्लेच्छोंका जो वसति-स्थान । धर्म-हीन स्थान या वन ।
या शिविर हो या कुस्थान । चौराहेका ॥ ९४ ॥
ऐसे स्थान पर धनंजय । सांझ हो या रातके समय ।
उदारतासे करता व्यय । चोरीका धन ॥ ९५ ॥
पात्र वहां ग्राम या नागरी । सामान्य स्त्रियां हो या जुआरी ।
मूर्तिमंत जो भूलसे पूरी । भूल-मात्र ॥ ९६ ॥
रूप नृत्यका जो प्रदर्शन । होता वहां आंखोंको दर्शन ।
तथा भाटोंका गीत-श्रवण । होता कर्ण जप ॥ ९७ ॥
अल्प-स्वल्प फिर जो मादक । पुष्प चंदनादि सुगंधिक ।
उसमें उतरता भ्रामक । वेताल तामस ॥ ९८ ॥
वहां लूटे हुए अनेक । भूषण स्वर्ण-रत्नादिक ।
डालता अन्न छत्र एक । वधिकोंको जैसे ॥ ९९ ॥
ऐसे जो जो है दिया जाता । उसे मैं तामस कहता ।
उसमें भी दैवसे होता । और सुयोग ॥ ३०० ॥
दैवयोगसे गुणाक्षर घडता । अथवा तालियोंमें काग फंसता ।
वैसे ही देशमें आ जुडता । तामसोंका पर्व ॥ १ ॥
धरके भावना तुच्छ देश काल न देखके ।
बिना आदर जो देते जान तू दान तामस ॥ २२ ॥
६९७ श्रद्धा-निरूपण-योग

जब देख तमोगुणी संपन्न । भाग्यसे आया कोई लेने दान ।
तब वह फूलता साभिमान । नशामें उन्मत्तसा ॥ २ ॥
नहीं होती मन में श्रद्धा पार्थ । न झुकाता वह अपना माथ ।
आप नहीं करता या कराता । अर्घ्यादिक ॥ ३ ॥
नहीं देता अभ्यागतको आसन । वहां गंधाक्षतकी बात ही कौन ।
तामसमें कहां ये सब लक्षण । कह तू होंगे संभव ॥ ४ ॥
कुछ देकर जैसे लौटाते ऋणदाता । वैसे उसके हाथमें वह कुछ देता ।
तू तुकार कर बोलना उसका होता । स्वभाव सदैव ॥ ५ ॥
जिसको जो कुछ जब वह देता । उसीमें करता उसकी योग्यता ।
या उसका अपमान भी करता । कुवचनोंसे ॥ ६ ॥
होता है जो इस प्रकार । धन देता पांडुकुमार ।
उसे कहता चराचर । तामस दान ॥ ७ ॥
सत्वको स्पष्ट करनेके लिये रज तम दिखाया है—
ऐसे हैं जिनके लक्षण । इन लक्षणोंके जो तीन ।
कहे हैं ये दान दे ध्यान । रज तम पर ॥ ८ ॥
यहां मैं यह जानता । मनमें है तू सोचता ।
तेरी यह कल्पकता । है विलक्षण ॥ ९ ॥
जो है भव-बंध मोचक । कहा गया कर्म सात्विक ।
तब क्यों कहता सदोष । कर्मका लक्षण ॥ ३१० ॥
जैसे पिशाचको नहीं हटाते । गढ़ा हुवा धन न पा सकते ।
या यदि धुंएको नहीं सहते । न लगता दीप ॥ ११ ॥
शुद्ध सत्व पर भी वैसे सतत । पट पडता रज-तमका पार्थ ।
उसको भेदनेकी यह जो बात । अस्वाभाविक क्या ? ॥ १२ ॥
श्रद्धा दानादि जो सभी पार्थ । हमने तुझको क्रियाजात ।
कहे हैं अब उसमें व्याप्त । तीनों ही गुण ॥ १३ ॥
वहां कहनेके ये जो तीन । उद्देश्य न रखता था मन ।
बतानेमें सत्वके लक्षण । कहे ये दो भी ॥ १४ ॥
ज्ञानेश्वरी ६९८

अध्याय १३: क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग

दोनोंमें जब तीसरा होता । दोनोंको तजनेसे मिलता ।
अहोरात्र त्यागसे मिलता । संध्यारूप जैसे ॥ १५ ॥
वैसे रज-तमका विनाश । डालता उत्तम प्रकाश ।
तब दीखता सत्व विशेष । स्पष्टरूपसे ॥ १६ ॥
एवं दिखानेमें सत्व तुझ । दिखाया है तम तथा रज ।
वह छोड़ सत्वसे तू काज । साध ले अपना ॥ १७ ॥
सत्वसे जो ऐसे निर्मल । कर तू यज्ञादि सकल ।
जिससे होगा करतल । सकल सिद्धि ॥ १८ ॥
सूर्य जब प्रकाशित करता । जगमें तब क्या न दीखता ।
वैसे ही सत्वसे नहीं मिलता । फल वह कौन ॥ १९ ॥
अजी ! जो मन भाया फल । प्राप्त करनेमें सकल ।
तथा मोक्षमें मी निश्चल । होता समर्थ ॥ ३२० ॥
इससे भिन्न है बात एक । उसका साथ मिलता नेक ।
तब पैठता वह सात्विक । मोक्ष-ग्राममें ॥ २१ ॥
होता है जब स्वर्ण शुद्ध । तथा राजाक्षरसे सिद्ध ।
चलन कहाता प्रसिद्ध । उसी भांति ॥ २२ ॥
स्वच्छ शीतल सुगंध । जल होता सुख-प्रद ।
किंतु पावित्र्य संबंध । आता तीर्थसे ॥ २३ ॥
नाला हो कितना ही अपार । जब गंगा करती स्वीकार ।
तब होता उसका सागर- । प्रवेश संभव ॥ २४ ॥
वैसा सात्विक कर्म अर्जुन । करने आता मोक्षालिंगन ।
न होता तब अधिक जान । भिन्न जो वह बात ॥ २५ ॥
सुन यह वचन धनुर्धर । कहता हृदय उमड़ कर ।
प्रभो ! कह वह कृपा कर । अति शीघ्र ॥ २६ ॥
तब वह कृपा-गुण-चक्रवर्ती । कहता सुन उसकी अभिव्यक्ती ।
दिखाता जो सात्विक कर्म मुक्ती- । दीप सदैव ॥ २७ ॥
६९९ श्रद्धा-निरूपण-योग

यज्ञादिके आदि लेनेका मंगल-नाम—
ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः ।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ॥ २३ ॥
ऐसे अनादि परब्रह्म । जगदादि विश्रामधाम ।
उसका है एकही नाम । कहा तीन प्रकारसे ॥ २८ ॥
वास्तविक वह नाम जाति रहित । किंतु पडे जो अविज्ञातममें ग्रस्त ।
उनके लिये श्रुतिने किया चिन्हित । जाननेमें उसे ॥ २९ ॥
नव जात शिशुको जैसे । कोई नाम न होता उसे ।
बुलाते तो रखे नामसे । जी कह उठता ॥ ३३० ॥
संसार-दुःखसे जो हैं पीडित । जीव आते उसके पास नित ।
उनको ओ ! देता है संकेत । जो यह नाम ॥ ३१ ॥
मिटे पर-ब्रह्मका चिर-मौन । तथा अद्वयत्वसे हो मिलन ।
ऐसा मंत्र दिया हो सकरुण । श्रुति-माताने ॥ ३२ ॥
वेदका दिया हुवा जो नाम । सुनते ही वह पर-ब्रह्म ।
सम्मुख आता वह परम । होता जो पीछे ॥ ३३ ॥
किंतु निगमाचल शिखर पर । बसे जो उपनिषदार्थ नगर ।
करते वहां ब्रह्म सह विहार । वही जानते यह ॥ ३४ ॥
रहने दे वह प्रजापति । रखता सृष्टि कर्तृत्व-शक्ति ।
उसका आधार है आवृत्ति । इस नामकी ॥ ३५ ॥
हुवा जब सृष्टिका उपक्रम । सुन अर्जुन उसके प्रथम ।
पगलाया हुवा-सा यह ब्रह्म । था अकेला ही ॥ ३६ ॥
मुझ ईश्वरको जो न जानता । तथा सृष्टि भी न कर सकता ।
ऐसेको वह महान बनाता । नाम एक ॥ ३७ ॥
ॐ तत्सत् तीन नामोंसे किया निर्देश ब्रह्मका ।
जिससे ये हुए वेद यज्ञ याज्ञिक आदि में ॥ २३ ॥
ज्ञानेश्वरी ७००

उस नामका हृदयमें चिंतन । उस वर्ण-त्रयका नित स्मरण ।
करनेसे योग्यता विश्व-सृजन । आयी उसमें ॥ ३८ ॥
रचे तब ब्रह्माने जन । तथा वेद जैसे शासन ।
और यज्ञ सम वर्तन । जीवन रूप ॥ ३९ ॥
ऐसे कितने लोक फिर । सृजन किये हैं अपार ।
ब्रह्म-दत्त दे अग्रहार । बने त्रिभुवन ॥ ३४० ॥
ऐसे नाम-मंत्रसे महान । बना जो ब्रह्मदेव अर्जुन ।
उसका रूप अब तू सुन । कहता श्रीकांत ॥ ४१ ॥
ओं तत्सत्का दर्शन—
यहां सब मंत्रोंका राजा । आदि प्रणव वह दूजा ।
है तत्कार और जो है तीजा । वहां सत्कार ॥ ४२ ॥
एवं जो ओं तत्सदाकार । ब्रह्मनाम त्रि-प्रकार ।
पुष्प सुगंध सुंदर । लेते उपनिषद ॥ ४३ ॥
इनसे होकर जब एक । कर्म चलता है सात्विक ।
बन जाता है नित सेवक । मोक्ष घटमें ॥ ४४ ॥
कर्पूरके भी अलंकार । देगा यदि दैव लाकर ।
उन्हे चढाना देह पर । है कठिनाई ॥ ४५ ॥
वैसे आचरण किया सत्कर्म । उच्चारण किया ब्रह्मका नाम ।
किंतु नहीं जानता यदि मर्म । विनियोगका ॥ ४६ ॥
साधुओंका समुदाय । घर आता धनंजय ।
किंतु होगा पुण्यक्षय । अवज्ञासे ॥ ४७ ॥
अथवा करने अलंकार । स्वर्णकी पोटली बंधकर ।
गलेमें बांधली धनुर्धर । उसी भांति ॥ ४८ ॥
लेता मुखसे ब्रह्म-नाम । हाथमें हैं सात्विक कर्म ।
प्रयोगके बिन जो कर्म । होता व्यर्थ ॥ ४९ ॥
अजी ! अन्न और जो भूख । साथ रखा हुवा भी देख ।
खाना न जानता बालक । घडता उपवास ॥ ३५० ॥
७०१ श्रद्धा-निरूपण योग

या स्नेह बात इक ठौर । आने पर पांडुकुमार ।
जलाना न जाने पर । प्रकाश कैसे ? ॥ ५१ ॥
आया कृत्य समय अर्जुन । तथा मंगलका हुवा स्मरण ।
किंतु कार्य है वह अपूर्ण । बिना प्रयोगके ॥ ५२ ॥
तभी वर्ण-त्रयात्मक । पर-ब्रह्म नाम एक ।
विनियोग सुन नेक । इस समय ॥ ५३ ॥
तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः ।
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥ २४ ॥
नामके हैं जो तीन अक्षर । कर्मके आदि मध्य नंतर ।
प्रयोग करना सविचार । यही तीन ॥ ५४ ॥
ओंका महत्व—
यही हाथ दीप लेकर । करने ब्रह्म साक्षात्कार ।
आये हैं सब धनुर्धर । ब्रह्म-ज्ञानी ॥ ५५ ॥
ब्रह्मसे होनेमें अद्वैत । यज्ञसे न होते वंचित ।
जानते शास्त्रोंको जो पार्थ । किसी समय ॥ ५६ ॥
सर्व-प्रथम वे ओंकार । ध्यानसे करते गोचर ।
फिर करते हैं उच्चार । वाणीसे भी ॥ ५७ ॥
उसके ध्यानसे प्रकट । प्रणवोच्चार होता स्पष्ट ।
तब करते हैं वे श्रेष्ठ । क्रियाचरण ॥ ५८ ॥
अंधेरेमें जैसे दीप अभंग । अरण्यमें समर्थ साथी संग ।
वैसे जानना प्रणवका योग । कार्यारंभमें ॥ ५९ ॥
धर्म-मार्गसे पाया हुवा धन । वेदोक्त देवोद्देश्यसे अर्जुन ।
यज्ञोंमें ब्राह्मणोंद्वारा अर्पण । करते हैं जो ॥ ३६० ॥
सदा प्रथम ओंकार बोल कर उपासक ।
करते हैं अनुष्ठान यज्ञ दान तपादिक ॥ २४ ॥
ज्ञानेश्वरी ७०२

हवनादि जो अग्निमें । त्यागादिरूप आहुतिमें ।
यज्ञ-विविध विधानोंमें । करते निष्णात ॥ ६१ ॥
ऐसे विविध-रूप याग । निष्पन्न होकर तदंग ।
करते हैं उपाधि त्याग । जो हैं असार ॥ ६२ ॥
या न्यायसे प्राप्त पवित्र । भूमि आदि जो स्वतंत्र ।
देश-कालादि शुद्ध पात्र । देख देते दान ॥ ६३ ॥
अथवा एकांतर कृच्छ्रादिव्रत । चांद्रायण मासोपवास सहित ।
शोषण कर देह-धातुका नित । करते हैं तप ॥ ६४ ॥
एवं यज्ञ दान तप । प्रसिद्ध बंधन-रूप ।
बना लेते परंतप । मोक्ष-साधन ॥ ६५ ॥
स्थल पर जो है महा बोझ । नांव तैराती जलमें तुझ ।
बंधनसे मुक्त जो सहज । करता नाम वैसे ॥ ६६ ॥
ऐसे वे सब धनंजया । यज्ञादिक हैं सभी क्रिया ।
ओंकारके लेके सहाय । चलते हैं ॥ ६७ ॥
तथा होती जब फलाशा स्पर्श । तब सावध साधक सोल्हास ।
उच्चार कर तत्कार विशेष । करते अर्पण ॥ ६८ ॥

तदित्यनभिसंधाय फलं यज्ञतपःक्रियाः ।
दानक्रियाश्च विविधाः क्रियंते मोक्षकांक्षिभिः ॥ २५ ॥

तत्कारसे होनेवाले लाभ—
वस्तु है जो विश्वातीतः । तथा जो विश्व-लक्षित ।
ऐसे तत् शब्दसे व्यक्त । होती है वर वस्तु ॥ ६९ ॥
चित्तमें सर्वांदिकत्व नित । ध्यान करके तद्रूप पार्थ ।
उच्चार करके अभिव्यक्त । करते स्पष्ट ॥ ३७० ॥

तत् के स्मरणसे सारी टूटती फल-वासना ।
नाना यज्ञ तप दान करते मोक्ष साधक ॥ २५ ॥

५०३ श्रद्धा-निरूपण-शोध

यह हो तद्रूप ब्रह्मार्पण । न रहे यहां फल-कारण ।
भोग रूप न रहे स्मरण- । बीजका भी ॥ ७१ ॥
ऐसे तदात्मक जो ब्रह्म । साकार यहां सब कर्म ।
कह कर इदं न मम । झटक देते हैं ॥ ७२ ॥
ओंकारसे ऐसे प्रारंभ कर । तथा तत्कारमें अर्पण कर ।
कर्मको बनाया इस प्रकार । ब्रह्मकर्म ॥ ७३ ॥
हुवा वह कर्म ब्रह्मकार । इससे न होता कार्य भार ।
कर्ता कर्मका रहा विचार । भिन्नत्वका जो ॥ ७४ ॥
रूपसे लवण घुल जाता । किंतु स्वादसे जो रह जाता ।
वैसे द्वैत-भावसे रहता । कर्ता जो भिन्न ॥ ७५ ॥
रहता जब द्वैतका भान । होता भव-भयका कारण ।
ऐसे स्वमुखसे हैं श्रीकृष्ण । बोलते वेद ॥ ७६ ॥
तभी जो परत्वमें ब्रह्म रहता । उसको आत्मत्वमें जानना होता ।
सत् शब्द ऋण दोषार्थ रखता । यहां श्रीकृष्ण ॥ ७७ ॥
तो भी यहां ओंकार तत्कारमें । ब्रह्म-कर्म किया जो शरीरमें ।
वह कर्म प्रशस्तादि शब्दोंमें । किया है बखान ॥ ७८ ॥
उस प्रशस्त कर्ममें है । सत् शब्दका विनियोग है ।
वहीं जो प्रभु कहता है । सुनो अब ॥ ७९ ॥
सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते ।
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते ॥ २६ ॥
सत् भावसे होनेवाले लाभ—
सत् शब्दका यहां सारांश । असत् नाट्यका हो निरास ।
दीखते हैं रूप निर्दोष । सत्ताका यहां ॥ ३८० ॥
सत्का स्मरण देता है सत्यता और साधुता ।
वैसे ही कर्म-सौंदर्य कहा सत्कारका फल ॥ २६ ॥
ज्ञानेश्वरी ७०४

जिस सत्तांका रूप संतत । रहता है स्थल-कालातीत ।
तथा होता है जो अखंडित । अपने आपमें ॥ ८१ ॥
जितना जो है यह दीखता । असत् यह वह नहीं होता ।
रूप जो यह जानता पाता । उसका आश्रय ॥ ८२ ॥
इससे वह् प्रशस्त कर्म । हुवा है जो सर्वात्मक ब्रह्म ।
कर देखना उससे सम । ऐक्य बोधसे ॥ ८३ ॥
ओंकार तथा जो तत्कार । दिखाता कर्म ब्रह्माकार ।
होना उसे निगलकर । केवल ब्रह्म ॥ ८४ ॥
ऐसा यह अंतरंग । सत् शब्दका विनियोग ।
कहता यह श्रीरंग । मैं नहीं कहता ॥ ८५ ॥
यदि कहता मैं, मैं यह कहता । श्रीरंगमें द्वैतकी आती हीनता ।
इसीलिये यह वचन है कहता । श्रीहरिका ही ॥ ८६ ॥
सत् शब्दका और एक अर्थ—
अब और ही एक प्रकार । सत् शब्दका सुन तू धनुर्धर ।
करता सात्विक कर्म पर । उपकार जो ॥ ८७ ॥
सत्कर्म चलते हैं सुंदर । अपने अधिकारानुसार ।
जब कोई अंग धनुर्धर । होता हीन कस ॥ ८८ ॥
एक अवयवकी दुर्बलता । शरीर व्यापारको ही रोकता ।
या किसी अंगसे है रुक जाता । रथका वेग ॥ ८९ ॥
वैसे ही एक गुणके बिन । संतमें आता असंतपन ।
तब सत्कर्म बनाता है जान । असत्कर्म ॥ ३९० ॥
तब ओंकार तथा तत्कार । करते हैं कर्मको सुंदर ।
वैसे ही उसका जीर्णोद्धार । करता सत् शब्द ॥ ९१ ॥
कर्मके असत्‌को यह मिटाता । उसमें सद्भाव रूढ करता ।
निज सत्त्वकी प्रौढ़ता बढ़ाता । यह सत् शब्द ॥ ९२ ॥
दिव्यौषधिसे रोगीको जैसे । असहायको सहायतासे ।
कर्म-व्यंगमें सत् शब्द वैसे । करता पूर्ण ॥ ९३ ॥
(84) ७०५ श्रद्धा-निरूपण-योग

अथवा हो कोई प्रमाद । कर्म छोडकर मर्यादा ।
भूलसे राहपे निषिद्ध । राहपे वहां ॥ ९४ ॥
चलते हुए भी मार्ग भूलता । तज्ञोंकी दृष्टिमें वह आता ।
व्यवहारमें क्या नहीं होता । कह तू मुझे ॥ ९५ ॥
इसीलिये ऐसे जो कर्म होते । अविचारसे सीमाको लांघते ।
असाधुता दुर्नाम पहुंचते । उस समय ॥ ९६ ॥
वहां पर यह सत् शब्द । उन दोनोंसे है प्रबुद्ध ।
नियोजित साधुता-सिद्ध । उस कर्मका ॥ ९७ ॥
जैसे लोह पारसकी दृष्टि । नाला और गंगाकी भेटी ।
अथवा मृत पर हो वृष्टि । अमृतकी जैसे ॥ ९८ ॥
असाधु कर्ममें अर्जुन । सत् शब्द प्रयोग तू जान ।
रहता है जो बड़प्पन । इस शब्दका ॥ ९९ ॥
जान कर यह सब मर्म । विचार करेगा यह नाम ।
यही है केवल पर-ब्रह्म । अनुभवेगा तू ॥ ४०० ॥
यह नाम शुद्ध पर-ब्रह्म है—
देख तू यह ओं' तत् सत् ऐसे । वहां पहुंचते बोलनेसे ।
सब प्रकाशता है जहांसे । दृश्य विश्व यह ॥ १ ॥
वह है पूर्ण निर्धर्म । शुद्ध ऐसा पर-ब्रह्म ।
यह अंतरंग नाम । करता व्यक्त ॥ २ ॥
आश्रय आकाशका जैसा । केवल आकाश है वैसा ।
यह नाम सबमें वैसा । है अभेद ॥ ३ ॥
आकाशमें जो उदय होता । सूर्य ही सबको प्रकाशता ।
वैसे है नाम ही प्रकाशता । नामीको यहां ॥ ४ ॥
तभी तीन अक्षरोंका नाम । नाम नहीं है केवल ब्रह्म ।
यह जान कर जो जो कर्म । किया जाता है ॥ ५ ॥
ज्ञानेश्वरी ७०६

यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते ।
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते ॥ २७ ॥
याग हो अथवा दान । तथा तपादि गहन ।
पूर्ण अथवा अपूर्ण । रहे वह ॥ ६ ॥
पारसकी कसौटी पर जैसे । भले बुरेकी बात न हो वैसे ।
ब्रह्ममें अर्पण करते जिसे । वह है ब्रह्म-रूप ॥ ७ ॥
नहीं रहते पूर्ण या अपूर्ण । किये जाते कर्म जो ब्रह्मार्पण ।
देखी न जाती सिंधुमें अर्जुन । जैसे नदियां ॥ ८ ॥
ऐसे पार्थ तेरे प्रति । ब्रह्म नामकी है शक्ति ।
कही है स-उपपत्ति । बुद्धिमान तू ॥ ९ ॥
तथा एकेक अक्षर । भिन्न भिन्न स्पष्ट कर ।
विनियोग धनुर्धर । कहा तुझसे ॥ ४१० ॥
अब ऐसे सु-महिम । इसीलिये है ब्रह्मनाम ।
जान लिया न यह मर्म । तूने अर्जुन ॥ ११ ॥
तभी इस पर श्रद्धा । बढ़ती रहने दो सदा ।
उसका विनियोग कदा । रुकने न देना ॥ १२ ॥
जिस कर्ममें यह प्रयोग । अनुष्ठान किया सद्द्विनियोग ।
वहां अनुष्ठान किया सांग । वेदविदित ॥ १३ ॥
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् ।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह ॥ २८ ॥
तप यज्ञ तथा दान करता कर्म साधक ।
उसमें बरता जाता उसको सत् कहा गया ॥ २७ ॥
अश्रद्धासे किया कर्म यज्ञ दान तपादिक ।
असत् वह कहा जाता होता सर्वत्र निष्फल ॥ २८ ॥
७०७ श्रद्धा-निरूपण-योग

श्रद्धाहीन कार्य कभी सफल नहीं होता—
अथवा नामको छोड़कर । तोड़कर श्रद्धाका आधार ।
दुराग्रह बल बढ़ाकर । धनंजय ॥ १४ ॥
अश्वमेघ किये अगणित । रत्नमय पृथ्वी-दान पार्थ ।
एकांगुष्ठ तप भी सतत । किया गया ॥ १५ ॥
जलाशयके नाम पर । बन गये नये सागर ।
किंतु वे सब धनुर्धर । व्यर्थ ही मान ॥ १६ ॥
पत्थर पर मेघ बरसना । या राखमें हवन किया जाना ।
या प्रेमसे आलिंगन करना । अपनी छायाका ॥ १७ ॥
या आकाशको बेंत । मारना जैसे पार्थ ।
वैसे ही सब है व्यर्थ । यह समारोह ॥ १८ ॥
कोल्हूमें कंकडका घान डाला । उससे न खली न तेल मिला ।
किंतु अपना दारिद्र्य सकल । रहा साथ ही ॥ १९ ॥
गांठमें बंधा हुवा ढेला । यहां या वहां नहीं चला ।
जिससे मर गया भला । उपवाससे ॥ ४२० ॥
वैसे कर्म जात सफल । नहीं देते हैं यहां फल ।
तब होंगे वहां विफल । कहना रहा क्या ॥ २१ ॥
ब्रह्म नामकी श्रद्धा तजकर । करनेमें ये सभी व्यवहार ।
व्यर्थ ही जान तू पांडुकुमार । केवल दिखानेके ॥ २२ ॥
जो कलुष-कुल-केसरी । त्रिताप-तिमिर-तमारी ।
वीरवर श्रीनरहरी । बोलते ऐसे ॥ २३ ॥
निजानन्दमें तद्रूप । हुवा तब परंतप ।
चंद्रमा जैसे तद्रूप । होता चांदनीसे ॥ २४ ॥
अजी ! यह युद्ध ऐसा देखा । वाणी तथा बाणके जो नोक ।
नापते हैं जीव सह एकेक । मांस खंड ॥ २५ ॥
ज्ञानेश्वरी ७०८