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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

अध्याय ३: कर्मयोग

होता है वही निरुपाधि । उसे जान तू स्थिर-बुद्धि ।
वही होता है निरवधि । मुणीश्वर ॥ ५६ ॥
आपूर्यमाणं अचलप्रतिष्ठं
समुद्रमापः प्रविशंति यद्वत् ।
तद्वत् कामा यं प्रविशंति सर्वे
स शांतिमाप्नोति न कामकामी ॥७०॥
सभी सुख-समुद्र उसमें लीन--
अर्जुन और एक प्रकार । उसको जाननेका विचार ।
शांत रहता जैसा सागर । अखंडित ॥ ५७ ॥
सरिता ओघ यदि समस्त । करते हैं जल समर्पित ।
तो भी रहता जैसे सीमित । अपनी सीमामें ॥ ५८ ॥
अथवा ग्रीष्मकालमें सरिता । सुखालेती है प्रवाह सर्वथा ।
किंतु उसमें न्यून नहीं आता । समुद्र वैसाही ॥ ५९ ॥
वैसे ही पानेसे ऋध्दि सिद्धि । नहीं क्षोभती उसकी बुद्धि ।
न मिलनेसे उसकी बुध्दि । न होती उदास ॥ ३६० ॥
अथवा सूरजके समीप । प्रकाश लगाते क्या दीप ।
होता क्या, न लगानेसे दीप । अंधार वहां ॥ ६१ ॥
ऋध्दि सिद्धिका उसपर । न होता कुछ भी असर ।
हियमें होती निरंतर । शांति उसके ॥ ६२ ॥
मानता जो अपना वैभव महान । उसके सम्मुख तुच्छ इंद्र भुवन ।
वह करें क्या पर्ण-कुटिमें रंजन । भिल्लोंकी ॥ ६३ ॥
न भंग पाता भर भी सदैव
समुद्र है नीर सभी पचाता ।
वैसे पचाते सब काम भोग
वे शांति पाते नहीं भोग-लुब्ध ॥७०॥
७३ सांख्ययोग
(10)

अमृतको जो फीका मानता। वह क्या कांजी पीता बैठता।
वैसा ही स्वानुभावी त्यागता। ऋध्दि सिध्दि ॥ ६४ ॥
पार्थ है यह नवल देख । तुच्छ है जहां स्वर्गका सुख ।
वहां ऋध्दि सिध्दिको क्या साख। रहती है ॥ ६५ ॥
विहाय कामान्यः सर्वान् पुमांश्चरति निःस्पृहः ।
निर्ममो निरहंकारःस शान्तिमधिगच्छति ॥७१॥
ममता और अहंता त्यागमें शांति—
ऐसा आत्म बोधमें तुष्ट । परमानंदमें है पुष्ट ।
वही है स्थित-प्रज्ञ श्रेष्ठ । जान तू ॥ ६६ ॥
अहंकारको जो मिटाकर । सब कामनाको त्याग कर ।
विचरता विश्वमें बनकर । विश्वमें ही ॥ ६७ ॥
एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति.
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥ ७२ ॥
यही ब्राह्मी स्थिति—
है यह ब्राह्मी स्थिति निःसीम । अनुभवनेसे जो निष्काम ।
अनायास पाये पर-ब्रह्म । धनंजय ॥ ६८ ॥
चिद्रूपमें जब मिलता । देह-अंतकी व्याकुलता ।
नहीं वह अनुभवता । चितमें अपने ॥ ६९ ॥
वही है यह स्थिति । स्वमुखसे श्रीपति ।
कहते पार्थके प्रति । बोले संजय ॥ ३७० ॥
तजके कामना सारी फिर होकर निःस्पृह ।
अहंता ममता छूटी हुवा जो शांति रूप ही ॥ ७१ ॥
अर्जुन स्थिति है ब्राह्मी पाके न टलती वह ।
टिकती अंतमें भी जो ब्रह्म निर्वाण दायिनी ॥ ७२ ॥
ज्ञानेश्वरी ७४

सुनकर यह कृष्ण वचन । अर्जुन कहता मन ही मन ।
इस विचारसे है सिद्ध जान । अपना कार्य ॥ ७१ ॥
तीसरे अध्यायकी भूमिका—
कर्म- मार्ग इससे संपूर्ण । होता सहज निराकरण ।
तब रहा युद्धका कारण । कहां औ' कैसे ॥ ७२ ॥
इस विचारसे अर्जुन । होकर संतुष्ट महान ।
पूछेगा भला-सा प्रश्न । संदेहसे ॥ ७३ ॥
वह प्रसंग अति सुंदर । सकल धर्मका है आगर ।
या विवेकामृतका सागर । सीमातीत ॥ ७४ ॥
है जो स्वयं सर्वज्ञ नाथ । कहेगा अब श्रीअनंत ।
वही है ज्ञानदेव बात । निवृत्तिदास ॥ ७५ ॥
गीता श्लोक ७२
ज्ञानेश्वरी ओवी ३७५.
ॐ
(10*)

३
कर्मयोग
अर्जुन उवाच
ज्यायसी चेत् कर्मणस्ते मताबुद्धिर्जनार्दन ।
तत् किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ॥ १ ॥
तो र्म करने क्यों कहता है ?—
सुनो तब बोला अर्जुन । देव तूने कहा वचन ।
किया है उसका मनन । कमलापति ॥ १ ॥
वहां कर्म तथा कर्ता । देखनेसे नहीं रहता ।
ऐसा मत तेरा अनंत । यदि निश्चित है ॥ २ ॥
मुझे तब कैसा श्रीधर । कहता है तू युद्ध कर ।
यहां कर्ममें महा घोर । ढकलता कैसे ॥ ३ ॥
अजी तू ही कर्म अशेष । निषेध करता निःशेष ।
किंतु मुझसे यह हिंसक । कराता कैसे ॥ ४ ॥
सोचो यह हृषीकेश । मानता तू कर्म-लेश ।
हमसे तू ऐसी हिंसा । कराता है ॥ ५ ॥
अर्जुनने कहा
कर्मसे बुद्धिको श्रेष्ठ मानता तू जनार्दन ।
तब क्यों कर्ममें घोर डालता मुझ केशव ॥ १ ॥

व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे ।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ॥ २ ॥
सरल शब्दोंमें उपदेश दो—
तू ही जब देव ! ऐसा कहता । अज्ञानी मैं कह क्या करता ।
मिट ही गयी अब मनो-वार्ता । विवेककी ॥ ६ ॥
ऐसा यदि तेरा उपदेश । रहा क्या दूसरा स्मृति-भ्रंश ।
हुआ अब संपूर्ण विनाश । आत्मबोधका ॥ ७ ॥
वैद्य पहल पथ्य कहता । फिरसे चुपके विष देता ।
फिर क्या है रोगीका बनता । कहो मुझे ॥ ८ ॥
भटकना जैसे अंधेको । मद्य पिलाना मर्कटको ।
वैसा उपदेश हमको । देता सुन्दर ॥ ९ ॥
पहले ही मैं हूं अजान । फिर मोहग्रस्त महान ।
विवेक मैंने यह मान । तुझसे पूछा ॥ १० ॥
देव ! है तेरी निराली बात । उपदेशसे चित्त भ्रमित ।
ऐसे करना है क्या उचित । अपनोंसे ॥ ११ ॥
हम हैं तन-मन जीवसे । करें अनुकरण सदासे ।
तथा तेरा करना जो ऐसे । मिटा सर्वस ॥ १२ ॥
ऐसा यदि तेरा उमदेश । उसमें कैसी हितकी आस ।
औ' मिटे ज्ञानार्जनकी आस । कहता अर्जुन ॥ १३ ॥
गई कुछ जाननेकी बात । मन भी हुआ अव्यस्थित ।
पहले था जो स्थिर चित्त । मेरा देव ॥ १४ ॥
वैसे है श्रीकृष्ण तेरा । चरित्र अंति गहरा ।
तू देखता चित्त मेरा । इस बहाने ॥ १५ ॥
अथवा तू हमें फंसाता । या गूढ तत्व है कहता ।
वह समझमें न आता । सोचनेसे ॥ १६ ॥
मिश्र-वचनसे बुद्धि करता मोह-युक्त तू।
जिससे श्रेय पाऊं मैं कह तू एक निश्चित ॥ २ ॥
७७ कर्मयोग

श्रीकृष्ण बात मेरी सुनना । गूढार्थ मुझसे न बोलना ।
सरल विवेक जो कहना । देश-भाषामें ॥ १७ ॥
मेरी मति है जड़ अत्यंत । तो भी समझं ऐसी ही बात ।
हरि तुझे बोलना सतत । निश्चयात्मक ॥ १८ ॥
रोगको है यदि जीतना । उस पर औषध देना ।
किंतु वह सुस्वादु होना । अति मधुर ॥ १९ ॥
देव तेरे जैसे सद्गुरु । इच्छाकी तृप्ति क्यों न करूं ।
यहां संकोच किसका धरूं । तू ही माय मेरी ॥ २० ॥
अजी ! कामधेनु दुहनेमें । आयी अपने ही सदनमें ।
तब भी कामना करनेमें । कृपणता क्यों ? ॥ २१ ॥
चिंतामणि करमें आया । वांछित जो मन भाया ।
भोगनेमें संकोच किया । ऐसा क्यों ॥ २२ ॥
अमृत-सागरके पास । आके न मिटाता है प्यास ।
आना तब उसके पास । व्यर्थ ही है ॥ २४ ॥
जन्मोंकी उपासनासे । श्रीहरि दैव योगसे ।
तू हुआ है अपनेसे । आधीन आज ॥ २५ ॥
तभी न मांगें क्यों सर्वस । सुकाल है यह परेश ।
आयी जन्मांतरकी आस । पूर्ण होनेको ॥ २६ ॥
सकल जीवन सफल । मिला पुण्य यशका फल ।
सिद्ध मनोरथ सकल । हुए मेरे ॥ २७ ॥
सकल मंगल धाम । अजी देवदेवोत्तम ।
हुआ आज पूर्ण काम । तू स्वाधीन है ॥ २८ ॥
माताके पास बालक जैसे । लगता है स्तनमें स्वेच्छासे ।
न देखे काल अकाल वैसे । भक्त वत्सल ॥ २९ ॥
वैसे देव तुझसे । पूछते हैं स्वेच्छासे ।
न जाने समय ऐसे । कृपानिधि ॥ ३० ॥
देव ! सर्वत्र जो हित । आचरणमें उचित ।
कह एक जो निश्चित । कहता पार्थ ॥ ३१ ॥
ज्ञानेश्वरी ७८

भगवान उवाच
लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ ।
ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ॥ ३ ॥
अधिकार भेदसे उपदेश भिन्नता—
इस बातसे अच्युत । कहता है हो विस्मित ।
अर्जुनका है ध्वनित । अभिप्रायसे ॥ ३२ ॥
अजी ! बुद्धि-योगकी बात । कहनेमें ही सांख्यमत ।
प्रकट किया स्वभावतः । अल्पमें ही ॥ ३३ ॥
उद्देश्य न वह जान कर । क्षुभित हुआ तेरा अंतर ।
कहूंगा मैं दोनों सत्वर । योग मार्ग ॥ ३४ ॥
सरल शब्दोंमें उपदेश दो—
सुन तू वीर श्रेष्ठ । जनमें दोनों निष्ठा ।
मुझसे ही प्रकट । अनादि सिद्ध ॥ ३५ ॥
एक ज्ञान-योग कहलाता । अनुष्ठान जो सांख्य करता ।
मूल तत्वसे है तन्मयता । पाता है वह ॥ ३६ ॥
दूसरा कर्मयोग जान । जो साधक जन निपुण ।
प्राप्त करते वे निर्वाण । परमगति ॥ ३७ ॥
मार्ग है दोनों भिन्न । अन्तमें हैं समान ।
पक्वापक्व भोजन । तृप्ति एक ॥ ३८ ॥
या पूर्व-पश्चिमकी सरिता । दीखनेमें है अति भिन्नता ।
सागर संगमसे एकता । होती दोनोंमें ॥ ३९ ॥
वैसे हैं ये दोनों मत । एक हेतुसे प्रेरित ।
किंतु जैसे उपासित । योग्यतासे ॥ ४० ॥
श्रीभगवानने कहा
जगमें दोहरी निष्ठा कही है पहले तुझे ।
ज्ञानसे सांख्य जो पाते योगी हैं कर्मसे यही ॥ ३ ॥
७९ कर्मयोग

पंछी जैसे उड़कर । पाता है फल सत्वर ।
पायेगा क्या ऐसा नर । पक्षि की भाँति ॥ ४१ ॥
चढ़ेगा वह डाल डाल । देख करके काल बेल ।
धीरेसे पायेगा ही फल । निश्चित ॥ ४२ ॥
वैसे विहंगम गतिसे । आचरण कर ज्ञानसे ।
सांख्य अति तीव्र गतिसे । पाता मोक्ष ॥ ४३ ॥
वैसे योगी कर्माधार । विधिसे कर्म आचर ।
पूर्णत्व स-अवसर । पाता ही है ॥ ४४ ॥
न कर्मणामनारम्भात्रैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते ।
न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥ ४ ॥
न कर कर्मारंभ उचित । बनना चाहे तो सिद्धवत ।
कर्म हीनको जान निश्चित । असंभव ॥ ४५ ॥
प्राप्त कर्म छोड़ना । फिर नैष्कर्म्य होना ।
व्यर्थ बोल अर्जुन । मूर्खताके ॥ ४६ ॥
वहां किनारे लगना । यहां नावको त्यजना ।
ऐसी बातोंका घडना । कैसे होगा ॥ ४७ ॥
इच्छा करना भोजनकी । किंतु पाक न करनेकी ।
सिद्ध पाक भी त्यजनेकी । होगी कैसी ॥ ४८ ॥
जब तक नहीं हुई निरिच्छिता । तब तक कर्मकी अनिवार्यता ।
आत्म तृप्तिसे मिटता स्वभावता । कर्म बंधन ॥ ४९ ॥
इसलिये तू सुन पार्थ । जिसे है नैष्कर्म्यमें आस्था ।
उसे उचित कर्म सर्वथा । नहीं त्याज्य ॥ ५० ॥
अपने करनेसे होता । तथा छोड़नेसे मिटता ।
इच्छा पर है क्या चलता । कभी कर्म ॥ ५१ ॥
टालके कर्म आरंभ नैष्कर्म्य मिलता नहीं ।
संन्यासकी क्रियासे ही न पाते पूर्ण सिद्धिको ॥ ४ ॥
ज्ञानेश्वरी ८०

ऐसा बोलना जान व्यर्थका । हल करना उलझनका ।
त्यजनेसे न होता कर्मका । त्याग निश्चित ॥ ५२ ॥
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥ ५ ॥
कर्मातीत अवस्थामें कर्मत्याग असंभव—
जब है प्रकृतिका अधिष्ठान । तब छोड़ना करना अज्ञान ।
चेष्टायें चलती हैं गुणाधीन । अपने आप ॥ ५३ ॥
विहित कर्म है जितना । ठान लिया यदि त्यागना ।
मिटेंगे क्या स्वभाव नाना । इंद्रियोंके ॥ ५४ ॥
सुनना छोड़ेंगे क्या कान । देखना छोड़ेंगे नयन ।
सूंघना भूलेगा क्या घ्राण । गंध जो ॥ ५५ ॥
अथवा प्राणापानकी गति । निर्विकल्प बनेगी क्या मति ।
तथा क्षुधा-तृषादिकी आर्ति । मिटेगी क्या ॥ ५६ ॥
मिटेगा क्या स्वप्नादि बोध । भूलेंगे क्या चलना पाद ।
तथा जन्म-मृत्युका नाद । मिटेगा क्या ॥ ५७ ॥
यह सब नहीं रुकता । इसीलिये कर्म रहता ।
कर्मका त्याग नहीं होता । देह धारिका ॥ ५८ ॥
कर्म होता है पराधीन । प्रकृति गुणसे निष्पन्न ।
चित्तका यह अभिमान । है व्यर्थका ॥ ५९ ॥
बैठा जब रथ पर । अति निश्चल होकर ।
किंतु चले पथ पर । परतंत्र हो ॥ ६० ॥
अथवा उड़ा हवासे । सूखा पत्ता ऊंचा जैसे ।
भ्रमता निश्चेष्टतासे । आकाशमें ॥ ६१ ॥
बिना कर्म कभी कोई न रहे क्षण-मात्र भी ।
प्रकृति गुणसे सारे बद्ध हो करते नित ॥ ५ ॥
८१ कर्मयोग

वैसे प्रकृति आधार । कर्मेंद्रियोंके विकार ।
चले कर्म निरंतर । नैष्कर्म्यका ॥ ६२ ॥
जब तक नाता है प्रकृतिका । तब तक त्याग न होता कर्मका ।
ऐसा करूंगा कहनेवालों का । रहता है उठ ॥ ६३ ॥
कर्मेंद्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् ।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥ ६ ॥
कर्म त्यागमें नैष्कर्म्यका दंभ—
उचित कर्म जो छोड़ते । नैष्कर्म्य साधना चाहते ।
प्रकृति निरोध करते । कर्मेंद्रियोंकी ॥ ६४ ॥
उनका कर्म त्याग नहीं होता । कर्तव्य भाव मनमें रहता ।
वैसा केवल बनाव बनता । दरिद्र जो ॥ ६५ ॥
ऐसे वे रहते पार्थ । विषयासक्त सर्वथा ।
जानना यह तत्वता । विभ्रांत ॥ ६६ ॥
अब मेरी बात सुन । अवसर है अर्जुन ।
कहता नैष्कर्म्य चिन्ह । तुझसे मैं ॥ ६७ ॥
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन ।
कर्मेंन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥ ७ ॥
आत्मरत कर्मोंसे कर्म-मुक्त नैष्कर्मी है –
होता जो अन्तरमें दृढ । परमात्म रूपमें गूढ ।
बाहर लौकिकमें रूढ । सबका सा ॥ ६८ ॥
इंद्रियोंको आज्ञा नहीं देता । विषयोंका भय न धरता ।
प्राप्त कर्म वह न छोड़ता । उचित जो ॥ ६९ ॥
रोक कर्मेंद्रियोंको तो चित्तमें स्मरता रहा ।
विषयोंको मह-मूढ मिथ्याचारी कहा उसे ॥ ६ ॥
मनसे इंद्रियोंको तो लगके कर्ममें नित ।
निःसंग रहता योगी माना वह विशेष है ॥ ७ ॥
ज्ञानेश्वरी ८२

इंद्रियोंको वह कर्ममें । नहीं रोकता बंधनमें ।
किंतु उनकी धर्मियोंमें । उलझता नहीं ॥ ७० ॥
न होता कामनामें लिप्त । नहीं मोह मलमें सिक्त ।
सदा रहता है अलिप्त । पद्मपत्रसा ॥ ७१ ॥
सबके संगमें वह रहता । सब्रके समान वह दीखता ।
जैसे जलमें है आभास होता । भानुबिंबका ॥ ७२ ॥
जन सामान्यसा रहता । साधारण ही दीखता ।
वैसे निर्णय नहीं होता । कल्पनासे भी ॥ ७३ ॥
ऐसे चिन्होंसे चिन्हित । रहता है वह मुक्त ।
आशा पाशसे रहित । उसे जान ॥ ७४ ॥
वही है योगी कहलाता । विश्व-विशेष हो रहता ।
तभी मैं तुझसे कहता । बन वैसा ॥ ७५ ॥
मनका तू नियमन कर । निश्चल कर निज अन्तर ।
कर्मेंद्रियोंका व्यापार कर । सुखसे तब ॥ ७६ ॥
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः ।
शरीरयात्राऽपि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मणः ॥ ८ ॥
निरहंकार निष्काम कर्म कर -
होना चाहे' यदि कर्मातीत । यह यहां असंभव बात ।
सोचो निषिद्धकर्ममें रत । रहे क्यों ॥ ७७ ॥
इसी लिये जो है उचित । तथा समय पर प्राप्त ।
वह कर्म, हेतु रहित । करते जाना ॥ ७८ ॥
पार्थ अन्य ही एक । न जाने तू कौतुक ।
ऐसा कर्म मोचक । सहज होता ॥ ७९ ॥
रहता जो कर्मानुगत । स्वधर्ममें सतत रत ।
जिससे है मोक्ष निश्चत । जान तू ॥ ८० ॥
नेमे हुये करो कर्म योग्य हैं करना इसे ।
तेरी शरीर यात्रा भी बिना कर्म चले नहीं ॥ ८ ॥
८३ कर्मयोग

यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर ॥ ९ ॥
स्वधर्म अनादि और अनिवार्य –
स्वधर्म जो है अर्जुन । वही नित्य यज्ञ ज्ञान ।
करनेसे आचरण । नहीं पाप ॥ ८१ ॥
त्यजनेसे निज-धर्म । चिपकते हैं कुकर्म ।
यह बंधनका मर्म । सांसारिक ॥ ८२ ॥
तभी स्वधर्माचरण । नित्य यज्ञके समान ।
जिससे होता बंधन । कभी नहीं ॥ ८३ ॥
लोक है यह कर्ममें बद्ध । परतंत्र देहमें आबद्ध ।
क्यों कि हैं नित्य यज्ञ विरुद्ध । चलनेसे ॥ ८४ ॥
इस विषयमें अब पार्थ । कहता हूं तुझे एक कथा ।
विश्व आदिकी यह है संस्था । रची ब्रह्माने ॥ ८५ ॥
सहयज्ञाः प्रजाःसृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ।
अनेन प्रसविष्यध्वम् एषवोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥ १० ॥
वह नित्य-याग सहित । सृजे भूत मात्र समस्त ।
किंतु ये यज्ञसे अज्ञात । सूक्ष्म होनेसे ॥ ८६ ॥
प्रार्थना जब की प्रजाने ब्रह्माकी । औ' याचना की उनसे आश्रयकी ।
कमल संभवने तब बात की । भूतमात्रसे ॥ ८७ ॥
वर्ण विशेषको हमने उचित । व्यवस्था की है स्वधर्मकी निश्चित ।
उस पर चलनेसे है खचित । इच्छा तृप्ति ॥ ८८ ॥
यज्ञार्थ कर्मको छोड लोकमें कर्म-बंधन ।
यज्ञार्थ ही कर कर्म अर्जुन मुक्त संग तू ॥ ९॥
प्रजाके साथ ही यज्ञ ब्रह्माने सृजके कहा ।
यज्ञोंसे ही बने श्रेष्ठ तुम्हारी कामधेनु ये ॥ १० ॥
ज्ञानेश्वरी ८४

न करना अनुष्ठान । न यात्रादि तीर्थस्थान
औ' अन्य देह दंडन । करना नहीं ॥ ८९ ॥
न करे योगादि साधन । तथा सकाम आराधन ।
मंत्र तंत्र आदि विधान । अनावश्यक ॥ ९० ॥
देवताओंका पूजन । सर्वथा ही वर्ज मान ।
करो स्वधर्माचरण । अनायास ॥ ९१ ॥
सदा अहेतुक भावसे । पतिव्रता जैसे पतिसे ।
अनुसरना तुम वैसे । स्वधर्मको ॥ ९२ ॥
वैसा स्वधर्म रूप मख । यही नित्य सेव्य है एक ।
ऐसा सत्य-लोक नायक । कहने लगे ॥ ९३ ॥
नित जो स्वधर्म भजेगा । उसकी कामधेनु होगा ।
न प्रजाको वह त्यजेगा । यह निश्चित ॥ ९४ ॥
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥ ११ ॥
इससे होगा समस्त । संतुष्ट होंगे दैवत ।
फिर तुम्हे वे ईप्सित । देंगे वर ॥ ९५ ॥
स्वधर्म पूजनसे नित । देव गण मिल समस्त ।
योग क्षेम सब निश्चित । देखेंगे तुम्हारा ॥ ९६ ॥
देवोंको तुम भजोगे । देव तुम्हें तोष देंगे ।
ऐसा परस्पर होगा । प्रेम वहां ॥ ९७ ॥
जहां जो करना चाहेगा । वह सहज सिद्ध होगा ।
वांछित जो वर मिलेगा । मानसका ॥ ९८ ॥
वाचा सिद्धि मिलेगी । आज्ञा धारक होंगी ।
तुमसे आज्ञा लेंगी । महा सिद्धियां ॥ ९९ ॥
देवोंको यज्ञसे तोषो तोषेंगे देव भी तुम्हें ।
अन्योन्य करके तुष्ट पावो परम श्रेयको ॥ ११ ॥
८५ 'कर्मयोग'

जैसे ऋतुपतिका द्वार । वनश्रीसे ही निरंतर ।
लदा रहता फल भार । सौंदर्यमय ॥ १०० ॥
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुंक्ते स्तेन एव सः ॥ १२ ॥
वैसे सब सुखके साथ । दैव ही जैसे मूर्तिमंत ।
खोज कर तुम्हारा पथ । आयेगा जान ॥ १ ॥
होंगे समस्त भोग भरित । वैसे ही सदा इच्छा रहित ।
होंगे यदि स्वधर्म निरत । रहोगे भाई ॥ २ ॥
किंतु सकल संपदा तजकर । तथा इंद्रिय मदमें डूब कर ।
विषय स्वादमें जो लुब्ध होकर । रहता है सदा ॥ ३ ॥
तजकर वह यज्ञ भाव । देते हैं जो यज्ञ-तुष्ट देव ।
रख ईश्वरमें भक्ति भाव । भजेगा नहीं ॥ ४ ॥
न अग्नि मुखमें हवन । न करेगा देवतार्चन ।
न प्राप्त समय भोजन । ब्राह्मणोंको ॥ ५ ॥
नहीं करेगा गुरु-भक्ति । तथा न आदर अतिथि ।
न रखेगा संतुष्ट जाति । अपनी भी ॥ ६ ॥
स्वधर्म-क्रिया रहित । संपन्नतामें प्रमत्त ।
ऐसा मात्र भोगासक्त । होगा वह ॥ ७ ॥
इसमें है आपदा बहुत । संपदा होगी उसकी हत ।
न भोग सकेगा वह प्राप्त । भोग भी कभी ॥ ८ ॥
शरीर है जिसका गतायुष । उसमें न होता चैतन्यवास ।
दैव हत घरमें कभी वास । न होता लक्ष्मीका ॥ ९ ॥
लोप होता है जब स्वधर्मका । टूटता तब आश्रय सुखका ।
मिटता बुझनेसे दीपकका । प्रकाश जैसे ॥ १० ॥
यज्ञ-तुष्ट तुम्हें देव देंगे इच्छित भोग जो ।
उनका न उन्हे देके खाता जो वह चोर है ॥ १२ ॥
ज्ञानेश्वरी ८६

मिटती है जब निज-वृत्ति । न रहती स्वातंत्र्यकी बस्ती ।
सुनो प्रजाजन यह उक्ति । कहता है ब्रह्म ॥ ११ ॥
जो कोई स्वधर्म छोड़ेगा । उसको काल दंड देगा ।
चोर मानके हर लेगा । उसका सर्वस ॥ १२॥
जन्म देता सभी पापको । घेर लेते हैं जो उसको ।
रात्रि स-समय श्मशानको । जैसे भूत ॥ १३ ॥
दुःख ल्केश वहां त्रिभुवनके । पाप अनेकानेक प्रकारके ।
घर करते हैं दैन्य विश्वके । उसी स्थानमें ॥ १४ ॥
वह उन्मत्त ऐसे । कितने ही रोनेसे ।
कल्पांतमें भी उसे । नहीं मुक्ति ॥ १५ ॥
इसलिये निज धर्म न छोड़ना । इंद्रियोंको नहीं भड़कने देना ।
चतुरानने कहे ये वचन । प्रजा जनसे ॥ १६ ॥
छोड़ते ही जैसे जलचर । उसी क्षणम जाता है मर ।
वैसा ही स्वधर्म छोड़कर । होता नाश ॥ १७ ॥
इसलिये तुमको समस्त । अपनेलिये है जो उचित ।
स्वकर्ममें रहना उचित । कहा ब्रह्माने ॥ १८ ॥
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यंते सर्वकिल्बिषैः ।
भुंजते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥१३॥
तन त्यक्तेन-शेष प्रसाद सेवन —
जो विहितक्रिया विधि । करे निर्हेतुक बुद्धि ।
जिससे प्राप्त समृद्धि । करता विनियोग ॥ १९ ॥
गुरु गोत्र अग्नि जो पूजता । स-समय द्विजको भजता ।
निमित्तादिकमें जो यजता । पितरुद्देशसे ॥ १२० ॥
यज्ञ क्रियामें जो उचित । आहुति देकर बचत ।
हुत शेष ही स्वभावतः । रहता है ॥ २१ ॥
खाके संत यज्ञ-शेष जलाते दोष हैं सब ।
पापी वे पाप खाते हैं पकाते अपने लिये ॥ १३ ॥
८७ कर्मयोग्

अपने घरमें उसका सुखसे । आप सहित भोजन करनेसे ।
वह सुख भोग ही सब दोषोंसे । करेगा मुक्त ॥ २२ ॥
वह यज्ञ-शिष्ट भोग । सभी हरते हैं अध ।
जैसे नष्ट होते रोग । अमृत सिञ्चिसे ॥ २३ ॥
अथवा तत्व-निष्ठ जैसा । भ्रम रहित होता वैसा ।
यज्ञ शिष्ट भोग ही वैसा । होता दोष रहित ॥ २४ ॥
स्वधर्मसे जो किया उपार्जन । स्वधर्ममें व्यय कर सुजन ।
शेषका भोग करके अर्जुन । रहता तुष्ट ॥ २५ ॥
बिन उसके सुन तू पार्थ । आचरना नहीं अन्यथा ।
ऐसी है यह आदिकी कथा । कहता कृष्ण ॥ २६ ॥
जो हैं देहको ही आप मानते । विषय ही को है भोग्य जानते ।
बिन इसके नहीं समझते । दूसरा कुछ ॥ २७ ॥
जीवन है यज्ञोपकरण । न जानकर मोह कारण ।
भ्रमग्रस्त उदर भरण । करते अहंभावसे ॥ २८ ॥
जिव्हा चापल्यसे जो लोक । कराते रुचिकर पाक ।
सेवन करते पातक । पापी जन ॥ २९ ॥
जो है संपत्ति-मात्र संपूर्ण । यज्ञ द्रव्य होनेके कारण ।
करता स्वधर्म-यज्ञार्पण । आदि पुरुषमें ॥ १३० ॥
यज्ञ-शेष अन्न है ब्रह्म—
यह छोड़ कर मूर्ख । अपने लिये ही देख ।
बनवाते हैं सुपाक । नानाविध ॥ ३१ ॥
जिससे यज्ञ सिद्ध होता है । परेशको संतोष होता है ।
यह सामान्य नहीं होता है । अन्न तू जान ॥ ३२ ॥
इसे न मानना तू साधारण । जीवन हेतु होनेके कारण ।
ब्रह्मरूप अन्न है यह जान । विश्वमें सर्वत्र ॥ ३३ ॥
ज्ञानेश्वरी ८८

अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसंभवः ।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥१४॥
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ।
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥१५॥
अन्नसे ही हैं भूत । बढ़ते हैं समस्त ।
फिर मेघ अन्नार्थ । बरसते हैं ॥ ३४ ॥
यज्ञसे पर्जन्यका जन्म । यज्ञको प्रसवता है कर्म ।
तथा कर्मका आदि है ब्रह्म । वेद रूप ॥ ३५ ॥
फिर वेदोंका परापर । प्रसवता है अक्षर ।
इसीलिये सचराचर । ब्रह्म-बद्ध ॥ ३६ ॥
किंतु कर्मकी है जो मूर्ति । यज्ञमें अधिष्ठित श्रुति ।
सुन तू हे सुभद्रापति । अखंडित ॥ ३७॥
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ॥१६॥
पूर्व कर्म-फल भोगके लिये मनुष्य जन्म--
ऐसी है आदि परंपरा । संक्षेपमें धनुर्धरा ।
कही है तुझसे अध्वरा- । केलिये ॥ ३८ ॥
तभी मूलमें यह उचित । स्वधर्म रूप यज्ञ सुकृत ।
आचरण न करते मत्त । इस लोकमें ॥ ३९ ॥
अन्नसे जन्मते जीव वर्षासे अन्न संभव ।
यज्ञसे बरसे वर्षा कर्मसे यज्ञ उद्भव ॥ १४ ॥
ब्रह्मसे कर्म उत्पन्न ब्रह्म अक्षरसे बना ।
सर्वव्यापक जो ब्रह्म यज्ञमें रहता नित ॥ १५ ॥
ऐसा प्रेरक जो चक्र निभाता जगमें नहीं ।
इंद्रियासक्त है पापी खोता है व्यर्थ जीवन ॥ १६ ॥
८९ कर्मयोग
(12)

रचते वे ढेर पातकोंके । भार रूप जानो वे भूमिके ।
कुकर्म करते इंद्रियोंके । तोषार्थ जो ॥ १४० ॥
उनका जन्म कर्म सकल । अर्जुन है अति निष्फल ।
जैसे होता है अभ्र पटल । अकालका ॥ ४१ ॥
अथवा कंठ स्तन हैं अजके । वैसे जीवन है मान उनके ।
जिससे अनुष्ठान स्वधर्मके । घडते नहीं ॥ ४२ ॥
इसीलिये सुन अर्जुन । स्वधर्मको नहीं त्यजना ।
सर्व भावसे है भजना । यही एक ॥ ४३ ॥
शरीर हुवा यदि प्राप्त । वह पूर्व -कर्मानुगत ।
फिर कर्तव्य जो उचित । छोड़ना क्यों ॥ ४४ ॥
सुन तू यह धनुर्धर । प्राप्त कर यह शरीर ।
आलस्य करते गंवार । कर्ममें जो ॥ ४५ ॥
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ।
आत्मन्येव च संतुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥१७॥
आत्मलीन ही कर्म मुक्त-
वे रह कर देह धर्ममें । लिप्त नहीं होते हैं कर्ममें ।
रमते हैं जो आत्म रूपमें । अखंडित ॥ ४६ ॥
आत्मबोधमें जो मुदित । अपनेमें हुवा कृतार्थ ।
इसीलिये सहज मुक्त । कर्म संगसे ॥ ४७ ॥
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन ।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥१८॥
आत्मामें ही रमता जो तृप्त हो आत्म भोगमें ।
आत्मामें ही सदा तुष्ट वह कर्तव्य मुक्त है ॥ १७ ॥
करे या न करे कर्म उसको ना प्रयोजन ।
न रहा उसका लोभ किसी भी प्राणिमें कहीं ॥ १८ ॥
ज्ञानेश्वरी ९०

आत्महित और लोकहितार्थ कर्म—
तृप्ति हुई है जिसकी । साधना मिटी उसकी ।
बात आत्म-संतोषकी । कर्ममें नहीं ॥ ४८ ॥
जब तक है अर्जुन । आत्म-बोध न लेता मन ।
तब तक है साधना । रहती ही ॥ ४९ ॥
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥१९॥
इसीलिये तू नियत । सभी कामना रहित ।
होकर कर उचित । स्वधर्माचरण ॥ १५० ॥
स्वकर्ममें निष्कामता । अनुकरण किया पार्थ ।
उन्होंने पाया है तत्वता । कैवल्यधाम ॥ ५१ ॥
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।
लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि ॥२०॥
देख तू जानकादिक । कर्मजात है अशेष ।
न छोड़के मोक्ष सुख । पाये यहां ॥ ५२ ॥
इस कारणसे पार्थ । करना कर्ममें आस्था ।
और भी एक है अर्थ । उपकारक ॥ ५३ ॥
अपने आचरण करनेसे । होगा अनुकरण जिससे ।
कर्म लोपकी विपदासे । बचेगा विश्व ॥ ५४॥
जिसने पाया जो पानेका । बीज भी मिटा कामनाका ।
फिर भी कर्तव्य उनका । रहा औरोंकेलिये ॥ ५५ ॥
तथैव नित्य निःसंग कर कर्तव्य कर्म तू ।
निःसंग करके कर्म कैवल्य पद लाभता ॥ १९ ॥
प्राप्त की है कर्मसे ही संसिद्धि जनकादिने ।
कर तू कर्म जो योग्य लोक-संग्रहकेलिये ॥ २० ॥
९१ कर्मयोग

अंधोंको दिखलानेमें जैसे । स-दृष्टि राह चला वैसे ।
आचरणसे धर्म वैसे । सिखाना मूढको ॥ ५६ ॥
ज्ञानी यदि ऐसा न करेंगे । अज्ञानी यह कैसे जानेंगे ।
कैसे धर्माचरण करेंगे । उचित रूपसे ॥ ५७ ॥
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ २१ ॥
बड़े लोग जो जो करते । उसीको धर्म है कहते ।
उसको अन्य आचरते । सामान्य सभी ॥ ५८ ॥
ऐसा होना ही है स्वाभाविक । तभी कर्माचरण आवश्यक ।
विशेष रूपसे है अधिक । संत जनोंको ॥ ५९ ॥
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन ।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ॥ २२ ॥
मैं स्वयं कर्म रत हूं—
अब दूसरोंकी बात । कहूं क्यों तुझसे पार्थ ।
स्वयं कर्ममें सतत । रहता यहां ॥ १६० ॥
मुझमें है कोई अपूर्णता । अथवा किसी इच्छासे पार्थ ।
मैं स्वधर्माचरण करता । ऐसा कहो तो ॥ ६१ ॥
देखें तो पूर्णत्वकी दृष्टिसे । दूसरा नहीं विश्वमें ऐसे ।
मुझमें बसा बल है ऐसे । जानता तू ॥ ६२ ॥
मृत गुरु-पुत्रको दिया जीवन । तूने देखा है यह कार्य महान ।
औ' मैं कर रहा कर्म सं-लग्न । प्रसन्न चित्तसे ॥ ६३ ॥
जो जो आचरते श्रेष्ठ उसीको दूसरे जन ।
वह जो करता मान्य उसीको अन्य लोग भी ॥ २१ ॥
नहीं कर्तव्य कोयी भी मुझको तीन लोकमें ।
फिर भी मैं सदा पार्थ रहता कर्म-तत्पर ॥ २२ ॥
ज्ञानेश्वरी ९२