ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
कौरवोंका हुआ अनुचित । अथवा तेरा ही हुआ घात ।
या मानो हो गया है युगांत । तो भी यहां ॥ ८१ ॥
स्वधर्मे यह रहता एक । सदा जो आचरणीय नेक ।
तुझे वह है कृपा पूर्वक । तारेगा ही ॥ ८२ ॥
अर्जुन तेरा जो चित्त । हुआ यदि द्रवीभूत ।
किंतु यह अनुचित । संग्राममें ॥ ८३ ॥
हुवा यदि गायका दूध । पथ्यमें हुआ इससे बाध ।
करेगा विषसा प्रमाद । नव ज्वरमें ॥ ८४ ॥
वैसे असमयमें अनुचित । इससे होगा हितका घात ।
इसलिये हो सावध चित । कार्यकर ऊठ ॥ ८५ ॥
व्याकुल है तू अकारण । कर स्वधर्मका आचरण ।
उससे होगा सब रक्षण । तीनों कालमें ॥ ८६ ॥
जैसे सरल पथपे चलना । उपाय है अपायसे बचना ।
या है दीप प्रकाशमें चलना । न लगे ठोकर ॥ ८७ ॥
वैसे सुन तू अर्जुन । करस्वधर्माचरण ।
सकल कामना पूर्ण । होती हैं ॥ ८८ ॥
देखो इससे अन्य नहीं । क्षत्रियकेलिये जो सही ।
रणके बिन कछु कहीं । उचित धर्म ॥ ८९ ॥
हो करके निष्कपट । लडना अति विकट ।
देखना क्या रही बाट । प्रत्यक्षमें यहां ॥ १९० ॥
यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् ।
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥ ३२ ॥
स्वधर्माचरणकी अपूर्व स्वर्णसंधि—
यह है युद्ध आजका । फल है तेरे दैवका ।
धरोहर है धर्मका । हुआ प्रकट ॥ ९१ ॥
हुवा प्राप्त अनायास स्वर्गका द्वार है खुला ।
भाग्य शाली क्षत्रियोंको मिलता धर्म-युद्ध है ॥ ३२ ॥
५३ सांख्ययोग
इसे युद्ध कहे कैसा। यह है स्वर्गरूप सा ।
या तब प्रताप ऐसा । उत्तर आया ॥ ९२ ॥
या तेरे गुणों पर हो लुब्ध । उत्कट भावसे करबद्ध ।
स्वयंवरार्थ होकर सिद्ध । आयी है कीर्ति ॥ ९३ ॥
क्षत्रियों को अतीव पुण्यसे । लडने मिलते युद्ध ऐसे ।
मिलती है चिंतामणि जैसे । राह चलतेको ॥ ९४ ॥
अथवा देते हुये जंभायी । अमृतबूंद टपक आयी ।
ऐसी है यह लडाई आयी । स्वाभाविक हो ॥ ९५ ॥
अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि ।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥ ३३ ॥
करके इसकी अवहेलना । व्यर्थका शोक करते बैठना ।
अपना घात आपही करना । यह है ऐसा ॥ ९६ ॥
पूर्वजोंका जो यश संचित । अपनेसे खोना है निश्चित ।
शस्त्र त्यजना हो शोकग्रस्त । रणमें यहां ॥ ९७ ॥
इससे नष्ट होगी तब कीर्तिं । विश्व गायेगा तेरी अपकीर्तिं ।
मिलेगी महापापकी थाथी । निश्चित तुझे ॥ ९८ ॥
वनिता जो भर्तार रहित । होती सर्वत्र अनादरित ।
वैसे है जीवनका सतत । बिन स्वधर्मके ॥ ९९ ॥
अथवा रण-भूमिका प्रेत । होता गिद्धसे क्षत विक्षत ।
नर वैसा स्वधर्म रहित । होता महादोषसे ॥ १०० ॥
अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् ।
संभावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ॥ ३४ ॥
ऐसा जो धर्म संग्राम टालेगा यदि तू यहां ।
पायेगा पाप दुष्कीर्ति तजके धर्म युद्ध को ॥ ३३ ॥
सदैव लोग गायेंगे तेरी दुष्कीर्ति विश्वमें ।
अकीर्ति मृत्युसे हीन मानी पुरुषके लिये ॥ ३४ ॥
ज्ञानेश्वरी ५४
यदि तू स्वधर्म छोडेगा । महापापका भागी होगा ।
कल्पांतमें भी न मिटेगा । कलंक अकीर्तिका ॥ १ ॥
भलोंको तब तक ही जीना । जब तक कुयश न पाना ।
इससे कैसे अब बचना कह तू अर्जुन ॥ २ ॥
निर्मत्सर तू सहृदयतासे । जायेगा लौट रण-भूमिसे ।
किंतु सभी न मानेंगे इसे । युद्ध भूमिमें ॥ ३ ॥
घेरेंगे यहां चहूं ओर । चलेंगे तीर पर तीर ।
कैसे होगा यहांसे पार । कृपालुतासे ॥ ४ ॥
इस प्राण संकटसे मुक्त । हुआ तो अपकीर्तिमें लिप्त ।
ऐसा जीवन भी है निश्चित । मृत्युसे हीन ॥ ५ ॥
भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः ।
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् ॥ ३५ ॥
न सोचता तू और एक बात । आया रणमें उत्साह सहित ।
लौटेगा यदि हो रण विरत । युद्ध भूमिसे ॥ ६ ॥
सोच देख तब अर्जुन । सोचेंगे क्या शत्रु दुर्जन ।
मानेंगे क्यां सत्य वचन । यह कहो मुझे ॥ ७ ॥
अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः ।
निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ॥३६ ॥
कहेंगे वे गयारे गया । पार्थ हमसे डर गया ।
यह वाक्य जो गूंज गया । तब क्या होगा ॥ ८ ॥
अनेक कष्ट करके जन । करते हैं स्वयश रक्षण ।
समय पे कर प्राणार्पण । आनंदसे ॥ ९ ॥
तुझे वह अनायाससे मिला अनजान भावसे ।
वह भी अद्वितीय जैसे । आकाश है ॥ २१० ॥
डरके रणसे भागा मानेंगे ये महारथी ।
मान्य तू इनमें आज पायेगा क्षुद्रता फिर ॥ ३५ ॥
बोलेंगे शत्रु जो तेरे अवाच्य कुत्सित सब ।
कोसेंगे शौर्य जो तेरा यह है अति दुःखद ॥ ३६ ॥
५५ सांख्ययोग
कीर्ति है तेरी निःसीम । वैसी ही जो निरुपम ।
तेरे गुण भी उत्तम । तीनों लोकमें ॥ ११ ॥
नृपति जो हैं त्रिभुवनके । गाते हैं गीत भाट बनके ।
डरते गीत सुनकरके । कृतांत भी वे ॥ १२ ॥
ऐसी तेरी महिमा महान । गंगाकी गरिमाके समान ।
देख करके सुभट मर्न । चकित होता ॥ १३ ॥
पौरुष तेरा ऐसा अद्भुत । सुनकरके ये हैं समस्त ।
जीवनसे हुये वे विरक्त । अपने ही ॥ १४ ॥
सिंह गर्जनासे जैसे । कांपते हैं हाथी वैसे ।
कौरव तेरे भयसे । होते त्रस्त ॥ १४ ॥
जैसे हैं पर्वत वज्रसे । अथवा सर्प गरुड़से ।
वैसे अर्जुन हैं तुझसे । सहमतें सब ॥ १६ ॥
जायेगी वह महानता । चिपकेगी अति दीनता ।
यदि तू यहांसे लौटता । युद्धके बिना ॥ १७ ॥
किंतु तुझे ये भागने नहीं देंगे । पकड़ अति अपमान करेंगे ।
अमर्याद कटु वचन कहेंगे । तेरे ही सम्मुख ॥ १८ ॥
तब होगा विदीर्ण हृदय । अब न लड़ना क्यों कौंतेय ।
राज्य करेगा पाकर जय । पृथ्वीतलका ॥ १९ ॥
हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् ।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ॥ ३७ ॥
अथवा यहीं रण भूमिमें । पावोगे मृत्यु भी लड़नेमें ।
अनायास ही स्वर्ग लोकमें । पहुंचेगा तू ॥ २२० ॥
इसी लिये तू यहां पर । छोड़कर सारे विचार ।
करमें ले कमान तीर । लडो शीघ्र ॥ २१ ॥
मरनेसे स्वर्ग भोग जीतनेसे धरातल ।
तथैव पार्थ तू उठ युद्धार्थ कर निश्चय ॥ ३७ ॥
ज्ञानेश्वरी ५६
स्वधर्मका है आचरण । करता दोष निवारण ।
चित्तभ्रम किस कारण । जो है पाप ॥ २२ ॥
डूबेगा क्या कोई नांवसे । अड़े क्या कोई पथसे ।
सही न चलने आनेसे । होगा ये सब ॥ २३ ॥
अमृत-पान भी मारेगा । विष-सह यदि पीयेगा ।
स्वधर्म भी दोष लायेगा । सहेतुक जो ॥ २४ ॥
इसीलिये तुझको पार्थ । निरहेतुक हो सर्वथा ।
लडनेमें क्षात्र-धर्मार्थ । नहीं पाप ॥ २५ ॥
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥ ३८ ॥
सम-बुद्धिसे लड —
संतोष न मानना सुखमें । विषाद न मानना दुखमें ।
तथा लाभालाभ भी मनमें । नहीं धरना ॥ २६ ॥
यहां जो विषय भी होगा । या सर्वथा तन जायेगा ।
न सोचना आगे क्या होगा । पहलेसे ही ॥ २७ ॥
उचित जो अपना । स्वधर्म सो करना ।
प्राप्तव्यको भोगना । शांत भावसे ॥ २८ ॥
ऐसे होनेसे तू सम चित्त । होगा सहज ही पाप-मुक्त ।
इसलिये हो तू युद्ध रत । निश्चिंत भावसे ॥ २९ ॥
एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धियोंगे त्विमां शृणु ।
बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ॥ ३९ ॥
बुद्धियोगका वज्र कवच —
सांख्य स्थिति यह संक्षिप्त । किया तुझको निरूपित ।
तभी होकरके निभ्रांत । लडना अब ॥ २३० ॥
हानि लाभ सुख दुःख सम हो हार जीतमें ।
फिर युद्धार्थ हो सिद्ध न होगा पाप लिप्त तू ॥ ३८ ॥
सांख्य बुद्धि यही जान सुन तू योग बुद्धि भी ।
तोडेगा उससे सारे जगमें कर्म बंधन ॥ ३९ ॥
(४) ५७ सांख्ययोग
जो है बुद्धि युक्त । सुनो वह पार्थ ।
कर्म-बंध मुक्त । रहता सदा ॥ ३१ ॥
वज्र कवच पहननेसे । शस्त्रोंकी वर्षांमें भी है जैसे ।
शरीर रहता है उससे । अचुंबित ॥ ३२ ॥
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥ ४० ॥
ईश्वरार्पित बुद्धिसे अनासक्त कर्म —
मिटता नहीं जिससे लौकिक । सहज मिलता पारलौकिक ।
चल आया पूर्वानुक्रम देख । शुद्ध रूपसे ॥ ३३ ॥
कर्माधारसे बरतना । कर्म फलको न देखना ।
मंत्रज्ञको मुक्त रहना । भूत बाधासे ॥ ३४ ॥
उस पर जो सुबुद्धि । अपनेको निरवधि ।
मिलने पर उपाधि । नहीं लगती ॥ ३५ ॥
न जा वहां पुण्य-पाप । जो है अति सूक्ष्म निष्कंप ।
औ' गुणत्रयादिका लेप । चढता नहीं ॥ ३६ ॥
अर्जुन ऐसा यदि पुण्यवश । हुआ हृदयमें बुद्धि प्रकाश ।
होगा उससे ही अशेष नाश । संसारका भय ॥ ३७ ॥
व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन ।
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥ ४१ ॥
जैसे छोटीसी दीप-ज्योति । तेजसे प्रकाशती अति ।
वैसे न मानता सुमति । अल्पसी कभी ॥ ३८ ॥
सुन तू पार्थ अनेक प्रकार । चाहते हैं बुद्धि विचार शूर ।
किंतु है दुर्लभ सचराचर । सद्वासना ॥ ३९ ॥
चूकता जो न आरंभ न बने विपरीत भी ।
अल्प भी यह धर्मांश तारता भयसे महा ॥ ४० ॥
बुद्धि एकाग्र होती है इसमें दृढ होकर ।
अनंत बहु शाखाकी बुद्धि निश्चय हीनकी ॥ ४१ ॥
ज्ञानेश्वरी ५८
(8)
जैसे वस्तु अनेक मिलते । वैसे पारस नहीं मिलते ।
अमृत-बिंदु हैं मिलते । दैव योगसे ॥ २४० ॥
वैसी दुर्लभ है सद्बुध्दि । जिसे परमात्म ही अवधि ।
जैसे भागीरथीको उदधि । निरंतर ॥ ४१ ॥
नहीं जिसे ईश्वरके बिन । कोई अन्य है अवलंबन ।
वही एक सद्बुध्दि है जान । इस जगतमें ॥ ४२ ॥
अन्य जो है सब दुर्मति । पाती है अनेक विकृति ।
वहां निरंतर सुमति । रमते हैं ॥ ४३ ॥
वेदवादविदोंके वाग्जालमें नहीं आओ—
इसीलिये सुन उन्हे पार्थ । स्वर्ग संसार नर्ककी वार्ता ।
न कभी आत्म-सुख सर्वथा । मिलता देखने भी ॥ ४४ ॥
यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः ।
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ॥ ४२ ॥
वेदके आधारसे हैं बोलते । केवल कर्म-प्रतिष्ठा करते ।
किंतु आसक्ति हैं नित धरते । कर्म फलोंमें ॥ ४५ ॥
संसारमें जनम लेकर । यज्ञ यागादि कर्मको कर ।
भोगो स्वर्ग सुख मनोहर । कहते ऐसे ॥ ४६ ॥
यहां बिन इसके नहीं । अन्य सुख सर्वथा कहीं ।
अजी ! ऐसे बोलते यही । दुर्बुद्ध लोग ॥ ४७ ॥
कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् ।
क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ॥ ४३ ॥
देखो कामनासे अभिभूत । होकरके कर्म-आचरित ।
केवल वे भोगमें दे चित्त । अपना सारा ॥ ४८ ॥
अनाडी व्यर्थकी बात कहते हैं फुलाकर ।
वेदके करते वाद कहते अन्य ना कछु ॥ ४२ ॥
जन्म लेके करो कर्म पावोगे भोग वैभव ।
लो कर्म फल स्वादिष्ट कहते स्वर्ग कामुक । ४३ ॥
५९ सांख्ययोग
क्रिया विशेषको बहुव । नहीं लोपते विधिवत ।
निपुण हो धर्ममें रत । करते हैं नित्य ॥ ४९ ॥
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयाऽपहृतचेतसाम् ।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥ ४४ ॥
किंतु करते एक बुरी बात । स्वर्ग कामनामें हो लिप्त चित्त ।
भूलते हैं यज्ञ पुरुषको नित । भोक्ता है जो ॥ २५० ॥
बनाकर जैसे कर्पूरका ढेर । उसमें आग लगाकरके फिर ।
अथवा मिष्ठान्न भला पकाकर । मिला दिया विष ॥ ५१ ॥
पाकर अमृतकुंभ दैवसे । ठुकराते हैं उसको पैरसे ।
नासते हैं धर्म-कृत्यको वैसे । करके फलाकांक्षा ॥ ५२ ॥
पुण्य करते हैं सायास । धरके संसारकी आस ।
विवेक बिनु करें नास । करें क्या ॥ ५३ ॥
जैसे घरका सुग्रास भोजन । बेचते लेकरके कुछ धन ।
वैसे खाते हैं धर्म मति-हीन । भोगार्थि जो ॥ ५४ ॥
इसीलिये सुन तू पार्थ । दुर्बुद्धिमें होकर लिप्त ।
ये वेदवाद रत सतत । आचरते हैं ॥ ५५ ॥
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन ।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ॥४५॥
तीन गुणोंसे है आवृत । जानो ये वेद निर्भ्रांत ।
उपनिषदादि समस्त । हैं सात्विक ॥ ५६ ॥
है यहां रज रज-तमात्मक । जहां है निरूपण कर्मादिक ।
जो हैं केवल ही स्वर्ग सूचक । धनुर्धर ॥ ५७ ॥
लुभायी जिससे बुद्धि भोग वैभवमें फंसी ।
न होती बुद्धि स्थायी समाधिमें कंभी स्थिर ॥ ४४ ॥
तीन गुण वदे वेद उनसे हो अलिप्त तू ।
तथा निश्चित निर्द्वन्द्व सत्वस्थ योग क्षेममें ॥ ४५ ॥
ज्ञानेश्वरी ६०
इसलिये तू जान अर्जुन । ये हैं सुख दुखके कारण ।
न जाने देना अंतःकरण । इसमें कभी ॥ ५८ ॥
गुणत्रयोंका कर अनादर । मैं मेरा ऐसा कभी न कर ।
केवल आत्म-सुखका अंतर । कर आश्रय ॥ ५९ ॥
यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके ।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥ ४६ ॥
तू निष्काम कर्म कर-
वेद यदि अनेक बोलते । विविध भेदोंको है सुझाते ।
अपना हित आप देखते । उसमेंसे ही ॥ २६० ॥
जैसे सूर्यका उदय होते । सारे पथ दिखायी पड़ते ।
किंतु सभी पथ क्या चलते । कहो मुझे ॥ ६१ ॥
या जलमय सकल । हुआ सभी महीतल ।
लेते हम जो केवल । आवश्यक ॥ ६२ ॥
वैसे ही ज्ञानी जन । कर वेदार्थ चिंतन ।
शाश्वत जो तत्व-ज्ञान । स्वीकारते हैं ॥ ६३ ॥
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥ ४७ ॥
इसीलिये सुन तू अर्जुन । करके ऐसे अवलोकन ।
तुझे यह उचित है जान । जो स्वकर्म ॥ ६४ ॥
विचार किया हमने पूर्ण । यह हमारा निश्चय जान ।
अनुचित त्यजना अर्जुन । विहित कर्म ॥ ६५ ॥
सभी ओर भरा पानी कुएंमें क्या धरा रहा ।
ब्रह्मज्ञ-तत्वज्ञानीको वेदोंमें सार जो रहा ॥ ४६ ॥
कर्मका अधिकारी तू न कर फल-कामना ।
न कर्म-फलमें हेतु न हो राग अकर्ममें ॥ ४७ ॥
६१ सांख्ययोग
किंतु कर्म फलकी आशा न करना । तथा कुकर्मका संग भी न धरना ।
सत्कर्मका आचरण सदा करना । बिन हेतुके ॥ ६६ ॥
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनंजय ।
सिद्धयसिद्धयोःसमो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥४८॥
ईश्वरार्पित कर्म सदैव पूर्ण ही-
तू योगयुक्त होकर । फलाशाको छोड़कर ।
अर्जुन ! मन देकर । कर कर्म ॥ ६७ ॥
किंतु हुआ कर्म सफल । दैव था यदि अनुकूल ।
न होना संतुष्ट बहुत । मनमें भी ॥ ६८ ॥
या हुआ कोई कारण । कार्य रहा जो अपूर्ण ।
जिससे तू अंतःकरण । न कर क्षुब्ध ॥ ६९ ॥
काम हुआ हाथका पूर्ण । यदि रहा वह अपूर्ण ।
इससे विचार सगुण । ऐसे मानना ॥ २७० ॥
कर्मका जो है मूल कारण । उसको ही किया समर्पण ।
वहीं हुआ वह परिपूर्ण । सहज भावसे ॥ ७१ ॥
सफल असफलमें सतत । रहता है जिसका सम चित्त ।
योग स्थिति है वह प्रशंसित । ज्ञानियोंसे ॥ ७२ ॥
दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय ।
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ॥ ४९ ॥
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥ ५०॥
फल लाभे न लाभे तू असंग सम-भावसे ।
योग-युक्त कर कर्म योग-सार समत्व है ॥ ४८ ॥
समत्व-बुद्धि है श्रेष्ठ उससे कर्म हीन है ।
बुद्धिका आसरा ले तू चाहते फल दीन हैं ॥४९॥
यहां समत्व बुद्धिसे टलता पाप पुण्य है ।
समत्व-युक्त हो सारा योग है कर्म-कौशल ॥ ५० ॥
ज्ञानेश्वरी ६२
ईश्वरार्पित साम्य-बुद्धि योगका सार है—
अर्जुन ! समत्व जो चित्तका । सार जान वही तू योगका ।
जिससे मन तथा बुद्धिका । होता ऐक्य ॥ ७३ ॥
बुद्धियोगका विवेचन । करनेसे लगता हीन ।
कर्म मार्ग है जो अर्जुन । वह सकाम ॥ ७४ ॥
किंतु कर्म करना है सतत । उससे योग मिलता निश्चित ।
शेष कर्ममें जो सहज चित्त । योग स्थिति है ॥ ७५ ॥
बुद्धियोग है सधर । उसमें ही हो तू स्थिर ।
मनसे ही त्याग कर । फल हेतुका ॥ ७६ ॥
लेकर आसरा बुद्धियोगका । पार हो जाते हैं भव सागरका ।
तोड़कर बंधन उभयका । पाप-पुण्य ॥ ७७ ॥
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः ।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥५१॥
वे यदि कर्म करते रहते । मनसे कर्म फल नहीं छूते ।
तभी जन्म-मृत्युसे मुक्त होते । सुनो पार्थ ॥ ७८ ॥
होते हैं जो योग च्युत । पद पाते हैं अच्युत ।
हैं जो आनंद भरित । धनुर्धर ॥ ७९ ॥
तू भी ऐसा ही होगा । यदि मोह छोड़ेगा ।
मनमें जो धरेगा । विराग को ॥ २८० ॥
यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति ।
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥५२॥
तब निष्कलंक गगन । उदित होगा तत्वज्ञान ।
उससे निरीच्छ होगा मन । सहज रूपसे ॥ ८१ ॥
समत्व-बुद्धिसे ज्ञानी तजके कर्मके फल ।
छुडाके जन्मकी गांठ पाते हैं पद अच्युत ॥ ५१ ॥
बुद्धि जो तर जायेगी मोहका जब कीचड़ ।
हुवा होगा शब्द ज्ञान पचायेगा तभी सब ॥ ५२ ॥
८२ सांख्ययोग
और है कुछ जानना। बीतेको अब स्मरना।
ऐसा सब तू अर्जुन। भूलेगा तब ॥ ८२ ॥
श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला ।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥५३॥
बुद्धि जो इंद्रियोंके संगमें । फैलती है दशदिशाओंमें ।
होगी वही फिर आत्मरूपमें । स्थिर नित्य ॥ ८३ ॥
समाधि सुखमें केवल। बुद्धि होगी अति निश्चल ।
वहां पायेगा तू सकल । योगस्थिति ॥ ८४ ॥
अर्जुन उवाच
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ॥५४॥
स्थितप्रज्ञताकी जिज्ञासा—
कहता है पार्थ हे कृष्ण। इसी बातको जानुं पूर्ण ।
कहो अब हो सकरुण । कृपानिधि ॥ ८५ ॥
कहा अच्युतने फिर । पूछ ले तू धनुर्धर ।
मनके कोई विचार । मुक्त भावसे ॥ ८६ ॥
बोला अर्जुन कृष्णसे । कहो बातें ये मुझसे ।
जानना उसको कैसे । स्थितप्रज्ञ है ॥ ८७ ॥
जो है स्थिरमति कहलाता । समाधि सुख नित भोगता ।
कैसा कहो वह जाना जाता । शार्ङ्गधर ॥ ८८ ॥
किस स्थितिमें वह रहता । कैसे वह बर्ताव करता ।
किस रूपमें वह रहता । लक्ष्मीपति ॥ ८९ ॥
सुनके उलझी बुद्धि तेरी पाकर निश्चय ।
समाधिमें स्थिर होगी पायेगा तब योग तू ॥ ५३ ॥
अर्जुनने कहा
समाधिमें स्थिराथा जो रहता किस भांतिसे ।
बोले रहे फिरे कैसे स्थित-प्रज्ञ कहो मुझे ॥५४॥
ज्ञानेश्वरी ६४
तब परब्रह्मका अवतरण । है जो षड्गुणाधिकरण ।
सुन इसे वहां नारायण । बोले ऐसा ॥ २९० ॥
भगवान उवाच
प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान् ।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥५५॥
स्थितप्रज्ञके लक्षण—
सुन तू अब अर्जुन । मनकी प्रौढ़ कामना ।
होती अति उलझन । आत्म सुखमें ॥ ९१ ॥
सदैव जो हैं नित्य तृप्त । अन्तःकरणमें भरित ।
किंतु विषयमें पतित । जिसके संगसे ॥ ९२ ॥
काम वह जब मूलतः मिटता । मन उसका आत्मतोषी हो जाता ।
तभी वह स्थितप्रज्ञ कहलाता । धनंजय ॥ ९३ ॥
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥५६॥
होते हैं जब दुख प्राप्त । तब न होता उद्विग्नचित्त ।
सुखमें भी वह हर्षित । होता नहीं ॥ ९४ ॥
होता अर्जुन उसका चित्त । सदा काम क्रोधसे रहित ।
तथा होता है भयसे मुक्त । परिपूर्ण वह ॥ ९५ ॥
ऐसा वह निरवधि । उसे जान स्थिर बुद्धि ।
सब त्यागके उपाधि । द्वंद्वातीत ॥ ९६ ॥
श्री भगवानने कहा
मनकी कामना सारी छोडके अपनी वह ।
आत्मामें रहता तुष्ट कहाता स्थित-प्रज्ञ सो ॥ ५५ ॥
उद्विग्न दुःखमें ना हो सुखकी लालसा नहीं ।
गया राग भय क्रोध है स्थित-प्रज्ञ संयमी ॥ ५६ ॥
६५ सांख्ययोग
यः सर्वत्रानभिस्नेह स्तत्त त्प्राप्य शुभाशुभम् ।
नाभिनंदति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥५७॥
सर्वत्र सदैव एकसा । संपूर्ण चंद्र देता जैसा ।
सबको समान प्रकाश । न देख अधमोत्तम ॥ ९७ ॥
ऐसी अनवच्छिन्न समता । भूतमात्रमें हो सदयता ।
तथा अपरिवर्तित चित्त । सदा सर्वत्र ॥ ९८ ॥
भला पाकर नहीं रीझता । वैसे बुराईमें न खीजता ।
दोनोंमें एक-सा है रहता । अप्रभावित ॥ ९९ ॥
ऐसा जो हर्ष शोक रहित । सदा आत्म-बोधसे भरित ।
जान तू है वह प्रज्ञा युक्त । धनुर्धर ॥ ३०० ॥
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः ।
इंद्रियाणींद्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥५८॥
अथवा कूर्मके समान । मोदमें फैलाता है तन ।
या इच्छावश आकुंचन । करता है जो ॥ १ ॥
इंद्रिया जिसके आधीन । उनका करती कथन ।
वही है स्थितप्रज्ञ जान । तू धनंजय ॥ २ ॥
विषया विनिवर्तते निराहारस्य देहिनः ।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परंदृष्ट्वा निवर्तते ॥५९॥
सर्वत्र जो अनासक्त पाता जब भला बुरा ।
न करे हर्ष या द्वेष है स्थित-प्रज्ञ जान तू ॥ ५७ ॥
लेता समेट संपूर्ण इंद्रियोंको विषयसे ।
जैसे कूर्म सभी अंग तभी प्रज्ञा हुयी स्थिर ॥ ५८ ॥
निराहार बलसे जो तजे विषय देहके ।
रस न छोड़ता चित्त जल्ता आत्म ज्ञानसे ॥ ५९ ॥
ज्ञानेश्वरी ६६
परंदृष्ट्वा निवर्तते—
अर्जुन ! तुझसे एक । कहूंगा ऐसा कौतुक ।
विषयोंके हैं साधक । करते नियम ॥ ३ ॥
संयम करते श्रोत्रादिक । किंतु छोड़ते रसना एक ।
घेरते धर रूप अनेक । तब विषय ॥ ४ ॥
ऊपर तोड़कर अंकुर । जड़में सदा जल देकर ।
फैलेगा वृक्ष जैसा अपार । नाश ऐसा ॥ ५ ॥
पीकर जल वह अधिक । फैलाता जैसा अंग अनेक ।
रसनासे विषय अनेक । फलते मनमें ॥ ६ ॥
टूटते अन्य इंद्रियोंके । विषय नहीं रसनाके ।
हैं जो आधार जीवनके । इसीलिये ॥ ७ ॥
अर्जुन इसका नियमन । होता है तब सहज जान ।
परब्रह्मानुभव महान् । होता जब ॥ ८ ॥
शरीरभाव भी मिटता । करण विषय भूलता ।
ब्रह्मभाव प्रतीत होता । अपनेमें ही ॥ ९ ॥
यततो ह्यपि कौंतेय पुरुषस्य विपश्चितः ।
इंद्रियाणि प्रमाथीनि हरंति प्रसभं मनः ॥६०॥
इंद्रियोंकी प्रबंलता—
वैसे तो सुन तू अर्जुन । न होती इंद्रियां स्वाधीन ।
साधक करते जतन । निरंतर ॥ ३१० ॥
अभ्यासका कर घर । यम नियमका द्वार ।
मनको पकड कर । रखते मुट्ठिमें ॥ ११ ॥
करते हैं इंद्रियां व्याकुल । साधकोंको भी जो हैं कुशल ।
मांत्रिकको जैसे है चुडैल । भृष्ट करती ॥ १२ ॥
ज्ञानियोंके मनको भी यत्नमें रहते हुये ।
हटाती वेगसे मत्त इंद्रियां बलवान जो ॥ ६० ॥
६७ सांख्ययोग
विषय भी होते हैं ऐसे । जो ऋद्धि-सिद्धिके रूपसे ।
जकडते हैं आ स्पर्शसे । इंद्रियोंको ॥ १३ ॥
उनके संगमें जाता है मन । अभ्यासमें होकर बल हीन ।
बल है ऐसा इंद्रियोंका जान । तू धनंजय ॥ १४ ॥
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीतमत्परः ।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥६१॥
रहो हृदयमें सदा अनुरक्त मेरा—
इसीलिये तू सुन पार्थ । छोडके विषयोंमें आस्था ।
इनका दमन सर्वथा । । कर निरंतर ॥ १५॥
इसीको तू जान अर्जुन । योग निष्ठाका है कारण ।
विषयोंसे अंतःकरण । न होता लिप्त ॥ १६ ॥
अजी ! जो आत्म बोध युक्त । होकर रहता सतत ।
हृदयमें हो अनुरक्त । रहता मेरा ॥ १७॥
विषयीको आत्मसुख नहीं—
किया बाह्य विषयोंका त्याग । अंदरसे रहा अनुराग ।
तब साद्यंत संसार भोग । करता वह ॥ १८ ॥
जैसा विषका लेश । लेनेसे होता विशेष ।
करता वह विनाश । जीवनका ॥ १९॥
वैसे विषयोंका अंश । मनमें रहके नाश ।
करता जान अशेष । विवेकको ॥ ३२० ॥
ध्यायतो विषयान् पुंसः संगस्तेषूपजायते ।
संगात् संजायते कामः कामात् क्रोधोऽभिजायते ॥६२॥
उनको युक्तिसे रोक रहना मत्परायण ।
जिसने इंद्रियां जीती है स्थित-प्रज्ञ जान तू ॥६१ ॥
करे जो विषय ध्यान उनकी लगती लत ।
लतसे फूटता काम कामसे क्रोध उद्भव ॥ ६२ ॥
ज्ञानेश्वरी ६८
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात् स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात् प्रणश्यति ॥ ६३॥
करता यदि मन विषय मनन । नि संगका भी होता उससे रंजन ।
रंजनसे प्रकट होती मूर्तिमान । अभिलाषा तब ॥ २१ ॥
होता है जहां काम उत्पन्न । क्रोधका वहां जमा आसन ।
क्रोध संगमें मोहको मान । अपने आप ॥ २२ ॥
मोहसे घिरते ही व्यक्ति । नाश होती उसकी स्मृति ।
जैसे बवंडरमें ज्योति । बुझ जाती है ॥ २३ ॥
अथवा सायंकालमें निशा । ग्रसती जैसा सूर्य प्रकाश ।
वैसी ही स्मृति भ्रंशमें दशा । होती मनुष्यकी ॥ २४ ॥
अज्ञानांध तब केवल । उससे घिरे हैं सकल ।
होती वहां बुद्धि व्याकुल । हृदयमें पार्थ ॥ २५ ॥
जन्मांध जैसे घबड़ाहटमें । अकुलाता है भाग दौड़में ।
होता वैसा बुद्धिका संसारमें । धनुर्धर ॥ २६ ॥
जब ऐसा बुद्धि-भ्रंश होता । सर्वत्र उसका कुंठा होता ।
ज्ञानका वहां नाश होता । मूल रूपसे ॥ २७ ॥
चैतन्यके नाशसे जैसे । होती देहकी दशा वैसे ।
पुरुषकी बुद्धि-नाशसे । होती है जान ॥ २८ ॥
इसीलिये सुन अर्जुन । जैसे चिनगारी ईंधन ।
पड़ बढ़ती त्रिभुवन । जलाती जाती ॥ २९ ॥
वैसे विषयोंका ध्यान । जब करता है मन ।
उससे होता पतन । जान निश्चय ॥ ३३० ॥
फूटता क्रोधसे मोह मोहसे स्मृति लोप है ।
स्मृति लोप बुद्धि-नाश उसीमें आत्म-नाश है ॥ ६३ ॥
६९ सांख्ययोग
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् ।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥६४॥
आत्मत्व प्राप्त पुरुष भी इंद्रियोंके लाड करके क्लेश ही पायेगा--
तभी विषयोंको मनसे । त्यागना है जड़ मूलसे ।
रागद्वेष सहजतासे । नष्ट होंगे सब ॥ ३१ ॥
सुन अर्जुन बात और एक । होकर नष्ट रागद्वेषादिक ।
इंद्रियोंका रमना है बाधक । न होता विषयोंमें ॥ ३२ ॥
सूर्य जैसा आकाशगत । छूता किरणोंसे जगत ।
किंतु संग-दोषसे लिप्त । होता नहीं ॥ ३३ ॥
इंद्रियोंमें वैसे उदासीन । आत्मरसमें होके तल्लीन ।
औ' कामक्रोधादिसे विहीन । होकर रहता ॥ ३४ ॥
विषयोंमें भी है जो सतत । आत्म तत्वमें रहता रत ।
उसको होंगे विषय पार्थ । बाधक कैसे ॥ ३५ ॥
पानीमें यदि पानी डूबता । तथा आगसे अग्नि जलता ।
तभी विषयोंमें है डूबता । जो है पूर्ण ॥ ३६ ॥
अपनेमें आप केवल । होकर रहा जो निर्मल ।
उसकी प्रज्ञा है निश्चल । तथा निर्भ्रान्त ॥ ३७ ॥
प्रसादे सर्व दुःखानाम् हानिरस्योपजायते ।
प्रसन्न चेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥६५॥
पाता प्रसन्नता अखंडित । जिसका चित्त है सदोदित ।
वहां प्रवेश नहीं समस्त । भवदुःखोंका ॥ ३८ ॥
मिटा तो राग औ' द्वेष होती हैं इंद्रियां वश ।
प्रभुत्वसे इंद्रियोंके प्रसाद मिलता फिर ॥ ६४ ॥
प्रसादसे सभी दुःख होते हैं नाश सत्वर ।
प्रसादसे बुद्धिकी तो स्थिरता शीघ्र निश्चित ॥ ६५ ॥
ज्ञानेश्वरी ७०
जैसे अमृतका निर्झर । बहाता जिसका उदर ।
भूख प्यासका क्या असर । उसपे होगा ॥ ३९ ॥
हृदय जब प्रसन्न होता है । तब दुःख वहां कैसे रहता है ।
सहज रूपसे मति रहती है । परमात्मामें ॥ ३४० ॥
जैसे निर्वातका दीप । न जाने सर्वथा कंप ।
स्थिर बुध्दिका स्वरूप । योगयुक्त वैसे ॥ ४१ ॥
नास्ति बुध्दिरयुक्तस्य न चा युक्तस्य भावना ।
न चाभावयतः शांतिरशांतस्य कुतः सुखम् ॥६६॥
मुक्तताका यह् मंथन । न करता जिसका मन ।
जकडा जाता वह् जान । विषयादिकोंमें ॥ ४२ ॥
उसमें स्थिर बुध्दि पार्थ । कुछ भी नहीं है सर्वथा ।
तथा स्थिरताकी जो आस्था । नहीं होगी ॥ ४३ ॥
निश्चलताकी भावना । चित्तमें न होती उत्पन्न ।
शांति होगी कैसी अर्जुन । उसको कभी ॥ ४४ ॥
नहीं जहां शांतिकी लगन । वहां न होता सुखका स्थान ।
पापियोंका जो ऐसा जीवन । वहां न देखता मोक्ष ॥ ४५ ॥
बीजको आगमें भूनकर । बोनेसे नहीं आता अंकुर ।
वैसा सुख नहीं पाता नर । है जो अशांत ॥ ४६ ॥
तभी अयुक्तपन मनका । वही सर्वस्व है दुःखका ।
कारण उसका इंद्रियोंका । भला दमन ॥ ४७ ॥
इंद्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते ।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥६७॥
अयुक्तको नहीं बुध्दि उससे भावना नहीं ।
न भाव-हीनको शांति नहीं सुख अशांतको ॥ ६६ ॥
इंद्रियां दौड़ती स्वैर पीछे ही चलता मन ।
मानो प्रज्ञा बंधी नौका नदीमें वायुसे चली ॥ ६७ ॥
७१ सांख्ययोग
जो जो इंद्रिय है करते । वही जो पुरुष करते ।
वे तरके भी न तरते । विषय सिंधु ॥ ४८ ॥
जैसे नांब लगी जो तीर । वही आंधीमें फंसकर ।
आती जैसी बीच भंवर । अपने आप ॥ ४९ ॥
वैसे आत्मत्व प्राप्त पुरुषके । दुलार करनेसे इंद्रियोंके ।
पायेगा वह क्लेश संसारके । अपने आप ॥ ३५० ॥
तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः ।
इंद्रियाणींद्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥६८॥
इसलिये स्थितप्रज्ञ दक्ष रहता है—
अपने आप यदि अर्जुन । किया है इंद्रियोंको आधीन ।
पाना कछु रहा नहीं जान । इससे अधिक ॥ ५१ ॥
कछुआ जैसे अपने फैलाता । अवयव जब वह चाहता ।
नहीं तो इच्छासे सिकोड़ लेता । अपनेमें आप ॥ ५२ ॥
इंद्रियां जिसकी अपनी होतीं । वह कहें जैसी हू बरततीं ।
जानो वह हुवा है रिथर मति । धनुर्धर तू ॥ ५३ ॥
अब और एक गहन । कहूंगा सुनो पहचान ।
जिसने पाया है अर्जुन । पूर्णत्वको ॥ ५४ ॥
यानिशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥६९॥
होते हैं जहां सब निद्रित । होता है वह वहां जाग्रत ।
जहां होते हैं सब जाग्रत । वह सोता है ॥ ५५ ॥
जिसने इंद्रियां सारीं सर्वथा है समेटलीं ।
स-निग्रह विषयोंसे तभी प्रज्ञा हुयी स्थिर ॥ ६८ ॥
रात जो सब भूतोंकी संयमी जागता वहां ।
जहां जगे सभी भूत मुनिकी रात है वह ॥ ६९॥
ज्ञानेश्वरी ७२