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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

दीखते स्थित हैं देहमें । किंतु वे स्थिर हैं मुझमें । औ' मैं उनके हृदयमें । रहता संपूर्ण ॥ ८ ॥ संपूर्ण वटवृक्ष जैसे । बीजमें रहता है वैसे । तथा रहता बीज जैसे । वट-वृक्षमें ॥ ९ ॥ वैसे हमें और उन्हें परस्पर । बाहरको नामका ही है अंतर । किंतु अंतरमें जो वस्तु-विचार । हम हैं एक ॥ ४१० ॥ उधार लाये हुए अलंकार । चढाते हैं जैसे शरीर पर । वैसे धारण करता शरीर । उदास भावसे ॥ ११ ॥ परिमल ले गया जब पवन । डंडीमें रहता है तब सुमन । वैसे प्रारब्ध भोगके ही कारण । शरीर रहता है ॥ १२ ॥ अहंकार उनका संपूर्ण । हुआ है विलीन मद्भावन । मेरे ही अंदर है अर्जुन । स्थिर रूपसे वह ॥ १३ ॥ अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् । साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥३०॥ प्रेम भावसे करता भजन । उसको फिर न मिलता तन । उसकी जातिकी नहीं अर्जुन । कोई बात ॥ १४ ॥ जो जिस क्षणसे भक्त बना उसी क्षणसे मेरा बना— देखें तो उसका पूर्व जीवन । सब ही दुराचारोंकी है खान । किंतु उसने है अब जीवन । बेचा है भक्तिको ॥ १५ ॥ मरण समयमें जैसी है मति । रहती है जैसी, वैसी ही गति । मिलती है यह जानके भक्ति । की है सर्व भावसे ॥ १३ ॥ पहले था रत दुराचार । सर्वोत्तम है पांडुकुमार । महापूरमें है डूबकर । मरा नहीं ॥ १७ ॥ कोयी बडा दुराचारी भजे मुझ अनन्य हो । मानना उसको साधु उसको शुभ निश्चयी ॥ ३० ॥ ज्ञानेश्वरी २८६

जीवन उसका इस किनारे आया । इसलिए डूबा हुआ भी व्यर्थ गया रहा ही ऐसा नहीं जो पाप किया । भक्तिके कारण ॥ १८ ॥ पहले था जो दुराचारी महान् । किंतु पश्चात्ताप तीर्थमें कर स्नान । मेरी शरणमें आया जो अर्जुन । सर्व भावसे ॥ १९ ॥ उसका है अब पवित्र कुल । अभिजात्य तथा अति निर्मल । जन्मका उसको मिला है फल । भक्तिके कारण ॥ ४२० ॥ उसने किया सब अध्ययन । तथा समस्त तप अनुष्ठान । अष्टांग-योग भी सुन अर्जुन । सिद्ध उसको ॥ २१ ॥ रहने दे अब यह पार्थ । जिसकी चाह है "मैं" सतत । कर्म-बंधनसे वह मुक्त । सर्वदा ही ॥ २२ ॥ मन-बुद्धि सब एक गांठमें । बांध कर दी वह पिटारीमें । वह पिटारी मेरे स्वरूपमें । रख दी धनंजय ॥ २३ ॥ क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति । कौन्तेय प्रति जानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥ ३१ ॥ स-समय वह मद्रूप होगा । चितमें तेरे यह भाव होगा । सदैव जो अमृतमें रहेगा । मरेगा कैसे ॥ २४ ॥ तभी रात्री कहलाती है । सूर्य जब नहीं होता है । भद्भक्ति बिन जो होता है । वह सब पाप ॥ २५ ॥ इसलिए उसका चित । रहता मुझमें सतत । तभी होता वह निश्चित । मद्रूप तत्वतः ॥ २६ ॥ जैसे दीपसे दीप है जलता । वहां पहला कौन न जानता । वैसे सदैव जो मुझे भजता । होता वह मैं ही ॥ २७ ॥ फिर मेरी ही नित्य-शांति । उसकी दशा वही कांति । जीवित रहता स-भक्ति । मेरे ही जीवसे ॥ २८ ॥ होगा जो शीघ्र धर्मात्मा शांति शाश्वत पाकर । जान निश्चित तू मेरे भक्तका नाश है नहीं ॥ ३१ ॥ २८७ राज-विद्या-समर्पणयोग

केवल शास्त्रीय भक्तिसे मेरी प्राप्ति नहीं होती— कहूँ कितना पुनः पुनः । वही वही फिर अर्जुन। नहीं होगी भक्तिके बिन । मेरी प्राप्ति ॥ २९ ॥ व्यर्थ है कुल अभिमान । व्यर्थ शास्त्राध्ययनभान । व्यर्थ है श्रेष्ठताका मान । लोभ-मात्र ॥ ४३० ॥ व्यर्थ है रूप अभिमान । व्यर्थ है तारुण्य यौवन । एक मेरे भावके बिन । व्यर्थका बतंगड ॥ ३१ ॥ भुट्टे लगे बहु धान विहीन । बसे नगर, पर हैं वीरान । उसका है कहो क्या प्रयोजन । वैसे ही पार्थ ॥ ३२ ॥ सरोवर बड़ा नीर विहीन । तथा दुखीसे दुखिका मिलन । बांझ लताका बहार सुमन । खिला वैसा ॥ ३३ ॥ वैसा मानो सकल वैभव । अथवा कुल-जाति-गौरव । वैसा ही देह स-अवयव । किंतु नहीं प्राण ॥ ३४ ॥ वैसी मेरी भक्ति बिन । व्यर्थ है सारा जीवन । अजी ! पृथ्विपे पाषाण । रहते वैसे ॥ ३५ ॥ हिंवारेका आच्छादन घन । त्यज देते हैं जैसे सज्जन । पुण्य करता अवहेलन । वैसे अभक्तको ॥ ३६ ॥ नीममें निंबौरिका बहार आया । जिससे कौवोंका ही सुकाल भया । वैसे भक्ति-हीनको ऐश्वर्य आया । दोष बढानेको ॥ ३७ ॥ परोसा खप्परमें षड्रसान्न । रखा चौराहे पर अपरान्ह । खायेगा उसको केवल श्वान । वैसे ही पार्थ ॥ ३८ ॥ वैसे भक्ति-हीनका जीवन । स्वप्नमें भी सुकृति-विहीन । संसार दुःखका आव्हान । केवल-मात्र ॥ ३९ ॥ व्यर्थ है कुलकी उत्तमता । अन्त्यजका भी तन मिलता । पशुका शरीर भी मिलता । शरीरके नामसे ॥ ४४० ॥ पकड़ा मगरने गजेन्द्रको । उसने स्मरण किया मुझको । व्यर्थ किया अपनी पशुताको । पाकर मद्रूप ॥ ४१ ॥ ज्ञानेश्वरी २८८

मेरी भक्ति में कुल जाति आदिका बंधन नहीं—मुझे प्रेम चाहिये— आती लेनेमें लज्जा नाम । जो अधमोंमें अधमतम । ऐसी योनिमें जिन्होंने जन्म । लिया है अर्जुन ॥ ४२ ॥ मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः । स्त्रियो वैश्यास्तथाशूद्रास्तेऽपि यांति परां गतिम् ॥ ३२ ॥ जो हैं पापयोनिके मूढ । जैसे पत्थर सम जड । किंतु है मुझमें वे दृढ । सर्व भावसे ॥ ४३ ॥ वाणीमें जिनके मेरे आलाप । नयन भोगते मेरे ही रूप । मनमें सतत मेरा संकल्प । भरे रहते हैं ॥ ४४ ॥ मेरी कीर्ति-कथाके बिन । न करते अन्य श्रवण । जिनके सर्वांग-भूषण । मेरी सेवा ॥ ४५ ॥ ज्ञानका विषय वे न जानते । केवल मुझ एकको जानते । उन्हें ऐसा लाभ मिला तो जीते । नहीं तो मरण ॥ ४६ ॥ ऐसा हुआ जो सम्पूर्ण । सर्व-भाव कर अर्पण । जीवनका बना जीवन । मैं ही एक ॥ ४७ ॥ पाप योनिमें हुआ जनन । सुनके भी न हुआ पठन । तुलनामें उनका वज़न । मुझसे कम नहीं ॥ ४८ ॥ भक्ति संपन्नताके कारण । देव बने राक्षसोंसे हीन । मेरा नरसिंहका भूषण । उसकी महिमा ॥ ४९ ॥ किया प्रह्लादका अंगीकार । मेरे स्थानमें पांडुकुमार । प्रह्लाद कथामें साक्षात्कार । होता मेरा ही ॥ ४५० ॥ उसका है दैत्य-कुल आखर । इंद्रको नहीं वह अधिकार । यहां है भक्ति महिमा अपार । कुल-जातिकी नहीं ॥ ५१ ॥

करके आसरा मेरा भोले स्त्री-वैश्य-शूद्र भी । या पाप-योनिके जीव पाते हैं सुख शाश्वत ॥ ३२ ॥ (37) २८९ राज-विद्या-समर्पणयोग

राजाज्ञाके होते चार अक्षर । वह भी चामके टुकडे पर । वह टुकडा देता है अपार । वस्तु-मात्र ॥ ५२ ॥ आज्ञाके उन अक्षरके बिन । स्वर्ण-रजत भी प्रमाण-हीन । उस अक्षर चामके कारण । मिलते सर्व वस्तु ॥ ५३ ॥ उत्तमता तो तभी है । यथा सर्वज्ञता भी है । मन बुद्धि भारता है । जब मेरे प्रेमसे ॥ ५४ ॥ इसलिए कुल जाति वर्ण । ये सब ही हैं बिना कारण । मुझमें हैं अनन्य शरण । सार्थक एक ॥ ५५ ॥ मुझमें मिलनेके बाद कोयी भिन्नता नहीं रहती— जब किसी न किसी कारण । मन होता मद्रूपमें लीन । तब होता है पुर्णरूपेण । जाति कुलादि व्यर्थ ॥ ५३ ॥ तब तक नाले कहलाते । गंगामें जब नहीं मिलते । फिर मात्र गंगाजल होते । गंगारूप हो ॥ ५७ ॥ जैसे खदिर चंदनादि काष्ठ । तब तक भिन्न रहते स्पष्ट । यज्ञाहुति देने पर है नष्ट । भिन्नता सारी ॥ ५८ ॥ वैसे हैं क्षत्रिय वैश्य स्त्रियां । शूद्र अन्त्यजादि कहलाया । मुझमें विलय न हो गया । तब तक ही सब ॥ ५९ ॥ जाति कुल व्यक्ति फिर बनता शून्य । होता है जब चित्त मुझमें अनन्य । घुलते जैसे लवण कण सामान्य । सागरमें वैसे ॥ ४६० ॥ तब तक नदी नदोंका नाम रहता । वैसे ही पूर्व पश्चिम प्रवाह रहता । किंतु जब सागरमें मिल जाता । सब होता एकरूप ॥ ६१ ॥ लेकर कोयी न कोयी निमित्त । होता लय जब मुझमें चित्त । फिर होता है उसमें निश्चित । मद्रूप ऐसे ॥ ६२॥ अव्यभिचारी शत्रुतासे भी मेरी प्राप्ति होती है — तोडने हेतु पडा पारस पर । लोहेका घन उसे स्पर्श कर । होगा निश्चित ही सुवर्ण सत्वर । सहज-भावसे ॥ ६३ ॥ ज्ञानेश्वरी २९०

वृजांगनाएं प्रेमवश होकर । मनमें स्मरण कर निरन्तर । पार्थ वे सब मुझसे मिलकर । मद्रूप हो गयीं ॥ ३४ ॥ वैसे ही भयके करण । निशिदिन कर चिंतन । अखंड बैर धर मन । कंस चेद्यादि ॥ ६५ ॥ ममत्वसे भी भक्त मुझे मिलते हैं— आप्तत्वसे हैं पांडव । संगसे सब यादव । ममत्वसे वसुदेव । तथा अन्य भी सब ॥ ६६ ॥ नारद ध्रुव अक्रूर । शुक और सनत्कुमार । भक्तिसे मैं धनुर्धर । हुवा प्राप्त ॥ ६७ ॥ वृजांगनाओंको कामसे । कंसको भय संभ्रमसे । धातुक मनके धर्मसे । शिशुपालादिकको ॥ ६८ ॥ सब पंथोंका एक स्थान । होना है मुझमें विलीन । सभक्ति विषय भंजन । या विराग वैसे ॥ ६९ ॥ इसलिए हे अर्जुन । होने मुझमें विलीन । उपायोंका जो बंधन । नहीं है कोई ॥ ४७० ॥ तथा किसी कुलमें होना जनन । करें प्रेम-वैर अथवा भजन । किंतु भक्त या शत्रु होना अर्जुन । एकमात्र मेरा ही ॥ ७१ ॥ किसी रूपमें सतत । होना है मुझमें रत । मद्रूप होना निश्चित । स्वाभाविक ॥ ७२ ॥ वैसे ही पाप योनी भी अर्जुन । क्षत्रिय वैश्य शूद्र औ' अंगना । भजकर मुझे मेरे सदन । पायेंगे ही ॥ ७३ ॥ वर्णमें हैं जो छत्र चामर । स्वर्ग है जिनका अग्रहार । मंत्र है जिनका मातृघर । वे हैं ब्राह्मण ॥ ७४ ॥ बसता जहाँ अखंड याग । तथा हैं जो वेदोंका वस्त्रांग । जिनकी दृष्टिका है उत्संग । बढाता मांगल्य ॥ ७५ ॥ जो हैं पृथ्वी तलके देव । तपावतार जो सवयव । सकल तीर्थोंका जो है दैव । उदित हुआ है ॥ ७६ ॥ २९१ राज-विद्या-समर्पणयोग

जिनकी आस्था है शीतल । बढाती सत्कर्मकी वेल । सत्य है जीवित केवल । उनके संकल्पसे ॥ ७७ ॥ किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा । अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥ ३३ ॥ सबके लिए मेरा द्वार खुला है— आशिर्वादसे उनके । बने आयुष्य अग्निके । दिया सिंधुने उनके । प्रेमसे नीर ॥ ७८ ॥ मैंने किया लक्ष्मीको कुछ दूर । लिया हाथ कौस्तुभ उठाकर । बढाया हृदय आगेकी ओर । चरण रजके लिए ॥ ७९ ॥ अब तक वह पद मुद्रा । हृदयपे धरी है सु-भद्र । अपने ही ऐश्वर्य समुद्र । रक्षा हेतु ॥ ४८० ॥ जिनका क्रोध है अर्जुन । कालाग्निका वसतिस्थान । उनका प्रसाद महान । देता सर्व-सिद्धि ॥ ८१ ॥ ऐसे पुण्य-पूज्य जो ब्राह्मण । मुझमें होते अति निपुण । होके नित मत्परायण । यह क्या कहना ? ॥ ८२ ॥ चंदन-वृक्षके समीप होनेसे । तथा उनके पवनके स्पर्शसे । निर्जीव नीम भी हुआ योग्यतासे । चढा प्रभु मस्तक पर ॥ ८३ ॥ फिर चंदन वहां न पहुंचेगा । इस बातको मन कैसे मानेगा । अथवा चंदन वहां पहुंचेगा । यह कहना पडे क्यों ? ॥ ८४ ॥ शीतलताकी अपेक्षा कर । महादेवने मस्तक पर । धारण किया जो निरंतर । अर्ध चन्द्र ही ॥ ८५ ॥ जहां शीतलतामें अप्रतिम । सुवासमें चंद्रसे भी उत्तम । ऐसा चंदन क्यों न सर्वोत्तम । लगायें सर्वांगपे ॥ ८६ ॥ वहां ब्रह्मर्षि राजर्षि इनकी बात क्या रही । भज तू मुझ आया है दुखी नश्वर लोकमें ॥ ३३ ॥ ज्ञानेश्वरी २९२

रथ्योदक हो जहां गंगा-शरण । करते हैं सागरोदक वरण । वहां जान्हवीकी समरस पूर्ण । अन्य गति कैसी ॥ ८७ ॥ इसलिए राजऋषि हो या ब्राह्मण । उनकी गति मति मैं ही हूँ शरण । उनका त्रिशुद्धि पूर्वक है निर्वाण । स्थिति-गति मैं हूँ ॥ ८८ ॥ जीर्ण आयुष्य नौकामें बैठकर मूर्खता-- बैठकरके शत-जर्जर नावमें । होता कैसे कहो निश्चित मनमें । या विवश हो जीना कैसे रणमें । शत संवत्सर ॥ ८९ ॥ पडता जहाँ पाषाण शरीर पर । न रखें ढाल कहो बीचमें क्योंकर । रहे कैसे उदास हो रोग-जर्जर । शरीर औषधसे ॥ ४९० ॥ भड़की जहां चहूं ओर आग । न जाय कैसे बचाकर भाग । कष्टमें नित न हो सानुराग । मुझे न भजे कैसे ॥ ९१ ॥ नहीं लगे मेरे भजनमें । ऐसा क्या सामर्थ्य है जनमें । विश्वास घरमें या भोगमें । है उनके ॥ ९२ ॥ या विद्याका या आयुका । ऐसा कौनसा प्राणियोंका । है मुझे न भजनेका । कहो सुखाधार ॥ ९३ ॥ मिलता है जितना भोग्य-जात । वह है केवल शरीर हित । ओ' शरीर रहता है सतत । मृत्युके मुखमें ॥ ९४ ॥ अजी ! दुःखका माल आयात होता । हाठमें मृत्युके तौलसे तुलता । उस मृत्युलोकमें आना पडता । अन्तिम हाठमें ॥ ९५ ॥ अब सुखका जीवित । कैसे मिले पांडुसुत । फूंककर राख जोत । जलेगी कैसे ॥ ९६ ॥ अजी ! विषकंद पीसकर । उसका रस निचोडकर । उसे नाम अमृत देकर । अमर हो कैसे ॥ ९७ ॥ ऐसे हैं विषयोंका सुख । केवल है परम दुःख । सेवन करते हैं मूर्ख । जीव भावसे ॥ ९८ ॥ २९३ राज-विद्या-समर्पणयोग

अथवा काटकर अपना शिर । करना पैर तलके उपचार । ऐसा है मृत्यु लोकका व्यवहार । भला है सतत ॥ ९९ ॥ मृत्युलोकमें कहानी सुखकी । श्रवण करना सभी व्यथाकी । जहाँ शैया ही अग्नि-स्फुलिंगकी । सुख-निद्रा कैसी ॥ ५०० ॥ क्षयरोगी होता चन्द्र जिस लोकका । अस्तार्थ उदय होता रवि जहांका दुःख आता है आवरणमें सुखका । छलनेके लिए ही ॥ १ ॥ जहां फूटते ही मांगल्यका अंकुर । पडते अमंगल कीट उसपर । पडता जहां मृत्यु पाश भयंकर । गर्भमें ही ॥ २ ॥ मिलना नहीं जो उसका चिंतन । मिले तो करते गंधर्व हरण । जाता उसका न होता आकलन । कहां और कैसे ॥ ३ ॥ अजी ! खोल जब सब ही पथ । लौटा पदचिह्न न देख पार्थ । मिलता सब मृतकोंका कथित । पुराणोंमें जहाँ ॥ ४ ॥ यहाँकी अनित्यताकी महती । ब्रह्मकी आयुतक पहुँचती । नश्वरताकी है कितनी व्याप्ति । स्वस्थ चित्त सुन तू ॥ ५ ॥ सुन ऐसे लोगोंका बर्ताव । जबसे जन्म लिये ये जीव । उनकी निश्चिंतता वैभव । कौतुकास्पद ॥ ६ ॥ जहां होता इह परका लाभ । वहां धरते कवडीका लोभ । तथा होता जहां विनाश सब । खरचते हैं करोडों ॥ ७ ॥ उलझता जो विषय भोगमें । सुखी कहलाता इस लोकमें । गडा जाता है जो महा-लोभमें । वह है महा-ज्ञानी ॥ ८ ॥ जिसका रहा अल्प जीवन । हुआ सब बल-बुद्धि जीर्ण । उसके पकडते चरण । वृद्ध कहकर ॥ ९ ॥ जैसा होता बालकका विकास । माता-पिता नाचते स-उल्लास । अंदरसे होता जीवन ह्रास । इसका नहीं खेद ॥ ५१० ॥ जो जन्मके दिवस दिवस-से । चलता मृत्यु दिशामें गतिसे । करते शुभोत्सव उल्लाससे । वृद्धि-दिवस मानकर ॥ ११ ॥ ज्ञानेश्वरी २९४

अजी ! मृत्यु यह शब्द न सहते । मरने पर जो रुदन करते । तथा आयुष्य व्यर्थ ही खोते । मूर्खताओंमें ॥ १२ ॥ निगलता है सांप मेंढकको । मेंढक जीभ चाटता है कीटकको । औ' प्राणि किस लोभसे किसको । बढाता तृष्णा ॥ १३ ॥ अजी ! यह है सब अनिष्ट । मृत्यु लोकका सब उलट । यहां अर्जुन तू अवघट । जन्म लिया है ॥ १४ ॥ तू इससे दूर रह कर मेरी भक्ति कर - तू हो दूर इससे अलग । मेरी भक्तिके पथमें लग । पायेगा तू जिससे अव्यंग । निजधाम मेरा ॥ १५ ॥ मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ॥ ३४ ॥ मनको तू मद्रूप कर । मेरी भक्तिमें डूब कर । सर्वत्र कर नमस्कार । एक मुझको ॥ १६ ॥ मेरी भक्ति करनेका अर्थ सब कुछ मुझे समर्पण करना - कर तू सतत मेरा अनुसंधान । उससे होगा संकल्प-बीज दहन । इसको कहते हैं भगवद्भजन । पांडुकुमार ॥ १७ ॥ होगा तू इससे मम-योग संपन्न । तब रहेगा मेरे स्वरूपमें लीन । यह मेरे अंतःकरणका वचन । कहा तुमसे ॥ १८ ॥ सबसे छिपाई बात । हुई अब तुझे प्राप्त । उससे हो तू सुखी शाश्वत । सदैव रहेगा ॥ १९ ॥ ऐसा श्याम-परब्रह्म । भक्त-वत्सल कल्पद्रुम । बोला है जो आत्माराम । कहता संजय ॥ ५२० ॥ प्रेमसे ध्यानसे नित्य भज तू पूज तू मुझे । ऐसे ही मिल आत्मामें मुझमें लीन होकर ॥ ३४ ॥ २९५ राज-विद्या-समर्पणयोग

कृष्णकी बात धृतराष्ट्रसे कहते समय संजयकी मनस्थिति— अजी ! श्रवण किया क्या अपने। पूछा जब राजासे संजयने । मौन होके सुन लिया बूढेने । पानीमें पडे भैसेकासा ॥ २१ ॥ तब डुला संजय सहसा । मानो आज अमृत बरसा । किंतु होकर भी न होनासा । रहा यह बूढा ॥ २२ ॥ फिर भी यह हमारा दातार । मानके रहा स्वस्थ-स-आदर । इनका स्वभाव है मानकर । संजय मनमें ॥ २३ ॥ करके श्रीमुनि-व्यासने निमित्त । राजको सुनाना युद्धका वृत्तांत । किया मानो मेरा उद्धार निश्चित । हर्षाया संजय ॥ २४ ॥ दृढ कर अपना सायास । बोला वह इतना मानस । पुलक हो आये स-उल्लास । अष्ट-सिद्धि-भाव ॥ २५ ॥ भक्तिके अष्ट सिद्धि भाव— चकित हो भर आया है चित्त । लूली पडी वाचा हो प्रमुदित । आपाद मस्तक है कंचुकित । हुआ रोमांचसे ॥ २६ ॥ भये अर्धोन्मिलित नयन । वरस पडे आनंद घन । हुआ सकंप सारा बदन । अंतर्मुख भावसे ॥ २७ ॥ अजी ! संपूर्ण रोममूल । खिले स्वेदकण निर्मल । जैसे मोतिकी मणिमाल । बनी कंचुकिसी ॥ २८ ॥ महा सुखके अति-रससे ऐसा । मिटने लगी जैसी जीवदशा । वहां श्री व्यासाज्ञाका भान कैसा । रहेगा भला ॥ २९ ॥ इतनेमें कृष्णार्जुनके वचन । गूंजने लगे श्रवणोंमें महान । लौटा लाया वह शरीरका भान । संजयका तब ॥ ५३० ॥ ध्यान देनसे आनंद-सिंहासन पर चढते ?— पोंछा तब नयन जल । तथा स्वेद बिंदु निर्मल । मुखसे निकले ये बोल । श्रीमान् सुनिये जी ॥ ६१ ॥ ज्ञानेश्वरी २९६

पड़ेगे अब कृष्णार्जुन वाक्य बीज । सात्विक भाव-युत चित्तमें सहज । खिलेगा प्रेम-प्रमेयका बाग आज । श्रोताओंके लिए ॥ ३२ ॥ अजी ! देना अब अवधान । चढना आनंद सिंहासन । देवने डाली माला श्रवण- । इंद्रियको आज ॥ ३३ ॥ विभूतियोंका अब महाज्ञान । देगा अर्जुनको सिद्ध श्रीकृष्ण । सुनिये ज्ञानदेवका कथन । जो है निवृत्तिका दास ॥ ३४ ॥ गीता श्लोक ३४ ज्ञानेश्वरी ओवी ५३४- ॐ (38)

१० विभूति-चिंतनयोग श्री गुरु निवृत्तिनाथका आध्यात्मिक स्वरूप विश्वबोधविदग्ध । विद्यारविंद-प्रबोध । पराप्रमेय-प्रमद- । विलासिया नमो ॥ १ ॥ संसारतमका तू सूर्य । अप्रतिम परम-वीर्य । नमो तरुण-तर-तूर्य । लालनलीला ॥ २ ॥ जगदखिल-पालन । मंगलमणि-निधान । स्वजन-वन-चंदन । नमो आराध्यलिंग ॥ ३ ॥ चतुर-चित-चकोरचंद्र । आत्मानुभव-महानरेंद्र । श्रुतिगुणगण तू समुद्र । मन्मथ मन्मथ नमो ॥ ४ ॥ सुभाव-भजन-भाजन । तू भवेभ-कुंभ-भंजन । विश्व-उद्भवका भवन । नमो श्री गुरुदेव ॥ ५ ॥ श्री गुरुका सामर्थ्य— तेरा अनुग्रह श्री गणेश । देता है जो अपना स्वरस । तब सरस्वतीमें प्रवेश । होता है शिशुका ॥ ६ ॥ आश्वासन उदार देयका । जलाता दीप नव-रसका । थाह लगाता तब वाणीका । अनायास ॥ ७ ॥

तेरा ही स्नेह वागीश्वर। कर गूंगेका अंगीकार। स्पर्धा बाहस्पतिसे कर। जीतता वह ॥ ८ ॥ पडती दृष्टि तेरी जिस पर। रखता तू सिरपे पद्मकर। करता वह जीव होने पर। समानता शिवसे ॥ ९ ॥ श्री गुरुका अवर्णनीय - महिमा - जिसकी महिमांका यह करना। वाचालतासे वर्णन क्या करना। सूर्यको कैसे उबटन लगाना। चमकाने को ॥ १० ॥ कल्पतरुके फलका कैसे बहार । क्षीरसागरका कैसा पाहुनाचार । अन्य किस गंधकी अपेक्षा कर्पूर । सुवासित करनेमें ॥ ११ ॥ चंदनको किसका उबटन । अमृतका कैसे करें पक्वान । कैसे बांधे गगनपे भवन । कहो मुझसे ॥ १२ ॥ वैसे श्री गुरुका महिमान । आकलनका क्या है साधन । यह जानके किया नमन । मैंने चुपचाप ॥ १३ ॥ बुद्धिकी संपन्नता पर समर्थ । श्री गुरु-वर्णन करना यथार्थ । मोति पर पानी चढाना है सार्थ । अभ्रकका वैसे ॥ १४ ॥ स्वर्ण पर रौप्यका पानी चढाना । वैसा है श्रीगुरुका स्तवन गाना । स-मौन श्री-चरणपे नत होना । यही भला है ॥ १५ ॥ गीताकी यह धरोहर श्री गुरु-कृपाका फल है— अजी ! श्रीगुरु परम उदार । कृपा-दृष्टी रखते हम पर । तभी कृष्णार्जुन संगम पर । प्रयाग बने हम ॥ १६ ॥ मांगा जब दूध घूंट भर । बना क्षीरसागर कटोर । सम्मुख रखता है शंकर । उपमन्युके वैसे ॥ १७ ॥ अथवा जैसे वैकुंठनायक । रिझाया ध्रुव जब स-कौतुक । रीझाया ध्रुवपद भातुक । समझाके वैसे ॥ १८ ॥ ब्रह्मविद्याका जो राजा महान । सकल शास्त्रका बसति स्थान । ओवियोंमें भगवद्गीता गान । संभव किय ॥ १९ ॥ २९९ विभूति-चिंतनयोग

शब्दारण्यमें भटक दिन-रात । न सुनी अक्षर फलनेकी बात । वाचा-बनी स्वयं कल्पलता सत्- । विवेककी यहां ॥ २० ॥ देहात्म-बुद्धि भी जो निरंतर । बनी थी मंदिर आनंदका भंडार । मनने किया गीतार्थका सागर । शयन सुखसे ॥ २१ ॥ श्री गुरुकी लीला अपार । करूं कैसे वर्णन मै पामर । फिर भी गाया ढीठ बनकर । सहन कीजिये यह ॥ २२ ॥ आपका ही कृपा-प्रसाद । बना भगवद्गीता प्रबंध । पूर्वार्ध गाया स-विनोद । ओवियोंमें ॥ २३ ॥ सूत्र रूपसे पिछले नौ अध्यायोंका उपसंहार -- पहलेमें अर्जुनका विषाद । दूसरेमें गाया योग विशुद्ध । किंतु सांख्य तथा ज्ञानका भेद । दिखा कर ॥ २४ ॥ तीसरेमें केवल कर्म प्रतिष्ठित । चौथेमें वही ज्ञान-सह प्रकटित । पांचवेमें अष्टांग-योगका गुपित । कहा वैसे ही ॥ २५ ॥ छठेमें कहा वही प्रकट । आसनादि-सह कर स्पष्ट । जीवात्म-भावैक्य जो है श्रेष्ठ । होता जिससे ॥ २६ ॥ वैसी ही वह योग-स्थिति । योग-भ्रष्टोंकी है क्या गति । वह पूर्णस-उपपत्ति । सुना दी है ॥ २७ ॥ उस पर है जो सप्तम । प्रकृति-रूप उपक्रम । भक्त चार पुरुषोत्तम । होते हैं कैसे ॥ २८ ॥ फिर सप्तमीकी प्रश्न सिद्धि । कह करके प्रयाण-सिद्धि । एवं सकल वाक्य अवधि । अष्टमाध्यायमें ॥ २९ ॥ अगणित है जो शब्द-ब्रह्म । उसमें है जो अर्थ परम । महा-भारतमें अनुपम । एक लक्ष्यमें मिलता ॥ ३० ॥ फिर अठारह पर्व भारतमें । मिलता वह कृष्णार्जुन उक्तिमें । तथा अभिप्राय जो सप्तशतिमें । नौवेमें मिलता ॥ ३१ ॥ तभी नवमका अभिप्राय । पूर्ण हुआ करनेमें भय । प्रतीत कर नवमाध्याय । हुआ किस गर्वसे ॥ ३२ ॥ ज्ञानेश्वरी ३००

अजी ! गूड़ शर्करा औ' राब । होते एक ही वस्तुके सब । अनुभवती है स्वाद जीभ । भिन्न भिन्न ॥ ३३ ॥ कुछ जान करके कहते । कुछ पुनः पुनः ज्ञान देते । कुछ जानतेमें है खो जाते । ज्ञेय गुणमें ॥ ३४ ॥ ये सारे अध्याय मैंने गुरु-कृपासे गाये है— ऐसे हैं ये गीताके अध्याय । नवम है अनिर्वचनीय । गाया मैंने कर श्रवणीय । तव सामर्थ्यसे ॥ ३५ ॥ किसीके दंडसे सूर्योदय कराया । किसीसे नव-विश्व ही है रचाया । सिंधुमें पाषाण तैराके उतराया । सैन्य तुमने ॥ ३६ ॥ किसीसे आकाशमें सूर्य पकड़वाया । किसीसे सागरका आचमन करवाया । तुमने ही मुझ गंवारसे है गवाया । अनिर्वचनीय ऐसे ॥ ३७ ॥ पर यह रहने दो तू ऐसे । राम-रावण भिडे थे कैसे । राम-रावण भिडे थे वैसे । समरमें जो ॥ ३८ ॥ वैसे नवमें श्री कृष्णका बोलना । उसे नवम जैसा ही है कहना । गीता-तत्त्वज्ञ जाने यह कहना । मेरा समुचित ॥ ३९ ॥ नवमका प्रारंभिक कथन । जिसका किया अल्पसा वर्णन । अब उत्तर खंडका श्रवण । कीजियेगा ॥ ४० ॥ यहां विभूति प्रति विभूति । धनुर्धरसे हैं कही जाती । उसमें चातुर्य-रस-वृत्ति । प्रतीत होगी ॥ ४१ ॥ ज्ञानेश्वरका मातृभाषा प्रेम-मेरा अनुवाद गीताके तोडका है— यहां देशिका नागरिकपन । जीतेगा शांत श्रंगारको जान । ओवियां ये होंगी महा-भूषण । साहित्यका ॥ ४२ ॥ मूल-ग्रंथ जो गीता संस्कृतका । तथा यह अनुवाद देशिका । जाननेसे मूल अनुवादका । होगा अनुभवैक्य ॥ ४३ ॥ जैसे शरीरका सुंदरपन । बनता अलंकारका भूषण । सजा कौन किससे यह ज्ञान । होता नहीं ॥ ४४ ॥ ३०१ विभूति-चिंतनयोग

वैसे देशी और संस्कृतवाणी । सोहती सार्थ चिर-संगिनी । भावार्थ-सिंहासन भूषिणी । शुद्ध भावसे ॥ ४५ ॥ खिलाया जहां भावोंका रूप । आया है रस-वृत्तिमें ओप । प्रतिष्ठा मिली हमें अमाप । कहता चातुर्य ॥ ४६ ॥ वैसे देशीका लावण्य । जिससे लेके तारुण्य । रचा है फिर अगण्य । गीता-तत्व ॥ ४७ ॥ ऐसा चराचर गुरुवर । जो चतुर चित्त चमत्कार । वह सुनोजी यादवेश्वर । बोलने लगे ॥ ४८ ॥ कहे ज्ञानदेव निवृत्तिदास । सुनो श्री हरि बोले जो सरस । अर्जुन तू है अन्यंग सर्वस । अंतः करणका ॥ ४९ ॥ भगवान उवाच भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः । यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया ॥ १ ॥ मैं तेरी आंखों से दीखता हूं उतना ही नहीं— हमने जो निरूपण किया । तेरा अवधान भी देख लिया ! वह भी हमने संपूर्ण पाया । धनुर्धर ॥ ५० ॥ देखना घटमें भर अल्प नीर । वह नहीं चुआ तो अधिक भर । देखी तेरी चाह कुछ कह कर । अब कहता हूं सुन ॥ ५१ ॥ कोई आया जो अनायास । उस पर छोड़ा सर्वस । हुआ मेरा निज-निवास । तू इस समय ॥ ५२ ॥ पार्थकी योग्यता देख सर्वेश्वर । ऐसे बोलने लगा सादर । आती मेघमाला जैसे घर कर । देख हिमालय ॥ ५३ ॥ फिरसे सुन तू मेरी बात उत्तम अर्जुन । प्रेमसे कहता तेरी करके हित-कामना ॥ १ ॥ ज्ञानेश्वरी : ३०२

बोले कृपालुओंके राज । सुन धनुर्धर तू आज । कहा था तुझको जो गूज । कहूंगा पुनरपि ॥ ५४ ॥ अजी ! प्रतिवर्ष जैसे खेत पेरना । हरे भरे खेतको फिर काट-लेना । खेतमें श्रमने कभी न डकताना । पाने अधिक उपज ॥ ५५ ॥ पुनः पुनः पुट देनेसे । सुवर्ण चमकता जैसे । वैसा सुवर्ण खोजनेसे । मिलता नहीं ॥ ५६ ॥ यहां भी ऐसा ही है पार्थ । तेरे हित नहीं सर्वथा । सुनो अपने ही स्वार्थार्थ । बोलता मैं ॥ ५७ ॥ करनेसे शिशुका अलंकार । होगा क्या उसपर उपकार । देखके होंगे आनंद विभोर । स्वयं माता पिता ॥ ५८ ॥ जैसे तू अपना हित पूर्ण । जानेगा हम होंगे प्रसन्न । यह है वास्तविकता जान । हमारे कहनेकी ॥ ५९ ॥ जाने दो सुमन सुभाषित । तुझसे है ममत्व बहुत । औ' तुझे भाती है यह बात । तभी कहता हूं ॥ ६० ॥ अर्जुन हम इसी कारण । करते हैं तुझसे भाषण । सुन यह स-अंतःकरण । चित्त देकर ॥ ६१ ॥ सुन सुन तू यह मर्म । मेरा वाक्य यह परम । आया स्वयं अक्षर-ब्रह्म । तुझसे मिलने ॥ ६२ ॥ पार्थ तू मुझको न जानता । न जानो तो मैं यह कहता । अजी ! मैं जो यहां हूं बोलता । मानो ब्रह्मांड ही है ॥ ६३ ॥ न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः । अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः ॥ २ ॥ यहां वेद हुए मौन । लंगडा हुआ पवन । बिन रातके विलीन । होते रवि-शशि ॥ ६४ ॥ न देव जानते मेरा प्रभाव न महर्षि भी । सभी प्रकारसे मैं हूं उनका मूल कारण ॥ २ ॥ ३०३ विभूति-चिंतनयोग

सब कोयी मुझसे ही उत्पन्न हुए हैं इसलिये मुझे कोयी नहीं जानता— अजी ! गर्भ जो है उदरका । नहीं जानता पय माताका । वैसे ही ज्ञान-जात देवोंका । मेरे विषयमें ॥ ६५ ॥ जलचरोंको सागरका भान । गुरगुरेको जैसा है गगन । वैसा ही महर्षियोंका ज्ञान । मेरे विषयमें ॥ ६६ ॥ मैं हूँ कौन तथा हूँ कितना । कब किससे हुआ उत्पन्न । इसपे न कहा है वचन । युग-युगोंसे ॥ ६७ ॥ महर्षी तथा वे देव । ये भूतजात हैं सर्व । मैं अनादि हूँ पांडव । जान तू यह स्पष्ट ॥ ६८ ॥ उतरा हुआ नीर चढ़ेगा पर्वत । वृक्ष बढता जायेगा जड पर्यंत । जानेगा तब मुझसे बना जगत । मुझे पूर्ण ॥ ६९ ॥ या वटांकुरमें वृक्ष समायेगा । अथवा उर्मिमें सागर डूबेगा । या परमाणुमें ही समा जायेगा । ब्रह्मांड गोल ॥ ७० ॥ तो भी मुझसे बने थे जीव । महर्षी अथवा जो हैं देव । मुझे जाननेमें हैं पांडव । लेंगे समय बहुत ॥ ७१ ॥ मुझे जाननेके लिये इंद्रियोंको अंतरमुख करो— मुझे जानना है यद्यपि कठिन । कोई रखे इंद्रिय बहिर्गमन । कर उसको अंतर्मुख विलीन । अपनेमें ही ॥ ७२ ॥ बढ़ता है वह मेरी ओर । चढ़ भूतोंके सिरपर । छोड़के असत्य संसार । धनंजय ॥ ७३ ॥ यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् । असंमूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ३ ॥ जाने जो मैं अजन्मा हूं स्वयम्भू विश्व-चालक । निर्मोही हो मनुष्योंमें छूटता सब पापसे ॥ ३ ॥ ज्ञानेश्वरी ३०४

भली भांति यहां रह कर । स्व-प्रकाशमें ही जानकर । देखता अजत्व जो प्रखर । मेरे नयनों से ॥ ७४ ॥ मैं हूं अनादिसे पर । सर्व लोक महेश्वर । मुझको ऐसा जो नर । जानता है ॥ ७५ ॥ पाषाणमें वह पारस । रसमें है जो सिद्धरस । मनुष्याकृतिमें जो अंश । मेरा ही जान ॥ ७६ ॥ जंगम बिंब है वह ज्ञानका । अवयव सुखके अंकुरका । प्रकाश है वह मानवताका । लोकदृष्टिका है भ्रम ॥ ७७ ॥ कर्पूरमें हिरा मिला । उस पर पानी डाला । कर्पूर सब पिघला । प्रकटा हीरा ॥ ७८ ॥ रूपमें है वह मानुष । देखनेमें अन्य सदृश । न स्पर्शते प्रकृति-दोष । उसको कभी ॥ ७९ ॥ उसको छोड़ जाते हैं सब पाप । जैसे जलता चंदन वृक्ष साप । वैसे ब्रह्म-ज्ञानीको कोई संकल्प । कभी छूता नहीं ॥ ८० ॥ होना यदि मेरा ज्ञान । ऐसा चाहता है मन । मैं कैसा हूँ यह जान । तथा मज्जन्य वस्तु ॥ ८१ ॥ सभी है मेरे ही विकार । भूतमात्रके रूप धर । फैले हैं त्रिलोकमें भर । धनंजय ॥ ८२ ॥ बुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः । सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च ॥ ४ ॥ अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः । भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ॥ ५ ॥ बुद्धि ज्ञान क्षमा शांति सत्य निर्मोह निग्रह । जन्म-मृत्यु सुख-दुःख लाभालाभ भयामय ॥ ४ ॥ अहिंसा समता तुष्टि तप दान यशायश । हुये ये मुझसे भाव भूतोंमें भिन्न भिन्न जो ॥ ५ ॥ (३१) ३०५ विभूति-चिंतनयोग