ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
इस भांति कर्कश समय । भोगता है जो स्वानंदराज्य ।
आज जो है यहां भाग्योदय । नहीं अन्यत्र ॥ २६ ॥
संजय कहता है कुरु-श्रेष्ठ । शत्रुके गुणसे होता संतुष्ट ।
यहां वह गुरु भी बना श्रेष्ठ । आत्मसुखकर ॥ २७ ॥
यदि यह प्रश्न नहीं करता । श्रीहरि ऐसे क्यों गांठ खोलता ।
तथा कैसे हमें ज्ञान मिलता । परमार्थका ॥ २८ ॥
अज्ञानके अंधेरेमें होते । जन्म मृत्युकी राह चलते ।
यहां आकर कैसे पहुंचते । आत्म प्रकाश सदनमें ॥ २९ ॥
हमें तुम्हें किया अपार । इसने यह उपकार ।
तभी हैं व्यास-सहोदर । गुरुत्वमें यह ॥ ४३० ॥
संजय कहता मनही मन । बढ गया मेरा यह कथन ।
खटकेगा धृतराष्ट्रको जान । कितना बोला मैं ॥ ३१ ॥
ऐसे अर्जुन गुण-वर्णन । छोडकर वैसे ही अपूर्ण ।
कहता पूछता क्या अर्जुन । श्रीहरिसे तब ॥ ३२ ॥
छोडकर अर्जुनका गुण-वर्णन । संजय कहता श्रीकृष्णका व्याख्यान ।
वैसेही मैं भी करूंगा सुनो व्याख्यान । ज्ञानदेव निवृत्तिका ॥ ३३ ।
गीता श्लोक २८
ओवी ४३३
ॐ
७०९ श्रद्धा-निरूपण-योग
१८
सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग
चित्सूर्यरूपी श्रीगुरु वंदन—
जय जय देव निर्मल । निज-जनाखिल मंगल ।
जन्म-जरा-जलद-जाळ । प्रभंजन ॥ १ ॥
जय जय देव प्रबल । विदलित मंगल कुल ।
निगमागमद्रुम-फल । फलप्रद ॥ २ ॥
जय जय देव सकल । विगत विषयवत्सल ।
कलितकालकौतूहल । कालातीत ॥ ३ ॥
जय जय दैव निष्कल । स्फुरदमंदानंद बहुल ।
नित्य निरस्ताखिलमल । मूलभूत ॥ ४ ॥
जय जय देव स्वप्रभ । जगदंबुगव्हर्गर्भ नभ ।
भुवनोद्भावारंभ-स्तंभ । भवध्वंस ॥ ५ ॥
जय जय देव निश्चल । चिलित-चित-पान तुंदिल ।
जगदुन्मीलनाविरल- । केलिप्रिय ॥ ६ ॥
जय जय देव विशुद्ध । विदुदयोद्यान-द्विरद ।
शम-दम-मदन-मद-भेद । दयार्णव ॥ ७ ॥
जय जय देवैकरूप । अतिकृत-कंदर्प-सर्प-दर्प ।
भक्त-भाव-भुवन-दीप । तापावह ॥ ८ ॥
जय जय देव अद्वितीय । परिणतोपरमैकप्रिय ।
निज-जन-नित-भजनीय । मायागम्य ॥ ९ ॥
जय जय देव श्रीगुरु । अकल्पनाख्य कल्पतरु ।
स्वसंविद्रुमबीजप्ररु । भूमिरूप ॥ १० ॥
निर्विशेष तेरा स्तवन कैसे करूं ?—
यह क्या एकेक कर ऐसे । अनेक परिभाषासे कैसे ।
स्तोत्र करूं तव उद्देश्यसे । निर्विशेष ॥ ११ ॥
जिन विशेषणसे करना वर्णन । वह दृश्य-रूप तेरा न होता जान ।
लज्जित होता हूं करनेमें स्तवन । तेरा मैं श्रीगुरु ॥ १२ ॥
किंतु जो मर्यादाका सागर । ऐसी उसकी ख्याति सादर ।
किंतु न देखता सुधाकर । हुवा उदय ॥ १३ ॥
निज-निर्झरसे वह सोमकांत । चंद्रको अर्घ्य न देता यदि रात ।
तब उससे दिलाता निशा-नाथ । सुनो देव ॥ १४ ॥
न जाने कैसे वसंत आता । सहसा खिलते वृक्ष-लता ।
किंतु आप न रोक सकता । खिलता वृक्ष ॥ १५ ॥
पद्मिनी पाकर रवि-किरण । सिकुडना जानती कहां कौन ।
या जल-स्पर्श होते ही लवण । भूलता अंग ॥ १६ ॥
वैसे मैं करता तेरा स्मरण । होता मैं मेरा यह विस्मरण ।
डकार रोक न सकता जान । तृप्त जैसे ॥ १७ ॥
तूने मुझे किया ही है ऐसे । मेरा मैं-पन मिटा देनेसे ।
स्तवनार्थ पागल-पनसे । नाचती वाचा ॥ १८ ॥
अथवा मैं वैसे ही सचेतन । रहके करूंगा तेरा स्तवन ।
जिससे गुण-गुणीकी तुलना । होगी मुझसे ॥ १९ ॥
तथा तू है एकरस अखंड । कैसे करें गुण-गुणीका खंड ।
मोति भला क्या तोडकर जोड़ । या समूचा वैसेही ॥ २० ॥
और तू है माता तथा पिता । इससे स्तवन नहीं होता ।
लगती उपाधिकी भृष्टता । पुत्रत्वकी मात्र ॥ २१ ॥
७११ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग
दूसरेकी करनेसे दासता । आई हुई पराधीन श्रेष्ठता ।
उपाधि उच्छिष्टका है क्या होता । बखाननेसे ॥ २२ ॥
तब तू आत्मा एक समान । ऐसे कहनेसे भी श्रीमान् ।
दृश्यादृश्यको बाहर मान । ढकेलता हुवा ॥ २३ ॥
मौन भूषणादिसे गुरु पूजन—
तभी करनेमें तेरा वर्णन । नहीं मिलता योग्य विशेषण ।
तब मौन बिन अन्य भूषण । नहीं चढाता मैं ॥ २४ ॥
स्तवन है कुछ भी न बोलना । पूजा है कुछ भी न करना ।
सन्निधिमें कुछ भी न होना । तेरे पास ॥ २५ ॥
किंतु जैसे कोई भ्रम-ग्रस्त । करता है प्रलाप बहुत ।
वैसे मैं वर्णन गुरु-मात । कहता सहले तू ॥ २६ ॥
अब दे अपना स्वाक्षर । हुवा जो गीतार्थ विस्तार ।
जिससे हो यह स्वीकार । सज्जनोंमें ॥ २७ ॥
कहते हैं श्रीनिवृत्तिनाथ यह । बार बार पूछता क्यों वह ।
कह तू पारसपे घिसते क्यों लोह । बार बार ॥ २८ ॥
ज्ञानदेव तब विनयकर । आपका प्रसाद है गुरुवर ।
सुनना जी अब चित्त देकर । ग्रंथ संवाद ॥ २९ ॥
गीत-रत्न प्रासादका कलशाध्याय—
अजी ! यह गीता-रत्न-प्रासादका । कलशही है अर्थ चिंतामणिका ।
अथवा है सभी गीता-दर्शनका । है पथ-दीप ॥ ३० ॥
लोगोंमें रही है यह मान्यता । जब दूरसे कलश दीखता ।
तब तो सहज दर्शन होता । देवताका भी ॥ ३१ ॥
अजी ! उसी भांति है यहां । एक ही अध्यायमें जहां ।
पूर्ण-दर्शन होता है यहां । गीतागमका ॥ ३२ ॥
कलश है यह इसी कारण । अध्याय यह बादरायण ।
अठारहवा जो सकारण । रचते हैं ॥ ३३ ॥
ज्ञानेश्वरी ७१२
कलशके बाद कुछ भी कहीं । मंदिरका काम रहता नहीं ।
यह बात अष्टादशमें यहीं । दीखती स्पष्ट ॥ ३४ ॥
व्यास सहज सशक्त सूत्रकार । उसने निगम-रत्नाचल पर ।
उपनिषदार्थके पठार पर । किया खनन ॥ ३५ ॥
वहां जो त्रिवर्गका असार । मिला माटी कंकड़ादि अपार ।
उससे महा-भारत प्राकार । रचा चतुर्दिक ॥ ३६ ॥
आत्म-ज्ञानका वहां अखंड । मिला जो सुंदर शिला-खंड ।
रची पार्थ-कृष्णकी अखंड । संवाद कलाकृति ॥ ३७ ॥
निवृत्ति-सूत्रका अधिष्ठान । सर्व-शास्त्रार्थका है भरण ।
आकार लाया बादरायण । मोक्ष-रेखाका ॥ ३८ ॥
करनेमें ऐसा यह निर्माण । पंद्रह अध्यायका है सदन ।
हुए हैं पंद्रह अंतस्त मान । इस प्रासादके ॥ ३९ ॥
षोडश अध्याय ऊपर । ग्रीवा घंटाका जो आकार ।
तथा कलश-पीठाकार । सप्तदश जो ॥ ४० ॥
उस पर यह अष्टादश । अपने आप हुवा कलश ।
ऊपर गीताविकमें व्यास । लगाता है ध्वज ॥ ४१ ॥
पिछले सभी अध्याय । चढते भूमिका आय ।
पूर्णता दिखाते जाय । अपनेसे ॥ ४२ ॥
हुए कार्यमें रही जो अपूर्णता । कलशमें होगी वह पूर्णता ।
वैसे अष्टादश विचार कहता । साद्यंत गीताका ॥ ४३ ॥
व्यास बडा कारीगर । रचा गीताका मंदिर ।
किया महा उपकार । प्राणि मात्रका ॥ ४४ ॥
कोई है परिक्रमा जपकी । करते बाहरसे इसकी ।
कोई श्रवणार्थ हैं छायाकी । धरते अपेक्षा ॥ ४५ ॥
तथा अवधानका संपूर्ण । देकर कोई दक्षिणा-धन ।
पैठते अंतर्गृहमें तत्क्षण । अर्थ ज्ञानके ॥ ४६ ॥
७१३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग
फिर पाते निज-बोधसे तत्काल । आत्म-रूप हरि-दर्शनका फल ।
ऐसे मोक्ष प्रासादमें है सकल । पाते हैं प्रसाद ॥ ४७ ॥
जैसे समर्थोंका पंक्ति भोजन । देता सबको एकसा पकवान ।
श्रवण पठन अर्थ-चिंतन । मोक्ष देता इसका ॥ ४८ ॥
गीता यह ऐसा वैष्णव-प्रासाद । अठारहवा कलश है विशद ।
मैंने कहा है जानेका यह भेद । इस स्थान पे ॥ ४९ ॥
सत्रहवे और अठारहवे अध्यायका संबंध—
समाप्त होता है सत्रहवां अध्याय । वहां होता कैसे अठारहवां उदय
कहूंगा यह प्रत्यक्ष-सा दृश्य । आंखमें दीखे वैसे ॥ ५० ॥
न तोडके दोनों आकार । बनाया है एक शरीर ।
है अर्धनारी नटेश्वर- । रूपमें जैसे ॥ ५१ ॥
या गंगा-यमुनाका उदक । प्रवाहमें भिन्न है जो देख ।
तथा पानी रूपसे एक । दीखता सदैव ॥ ५२ ॥
अथवा शुक्ल-पक्षमें जैसे । नाना चंद्रकला दीखती वैसे ।
पूर्णमासीका पूर्ण चंद्र जैसे । दीखता एक ॥ ५३ ॥
जैसे भिन्न होनेसे सब पद । श्लोकके होते हैं श्लोकावछेद ।
अध्यायके होते अध्याय भेद । इसी भांति ॥ ५४ ॥
किंतु कहते हैं एक ही प्रमेय । मिलकर ये अष्टादश अध्याय ।
नाना रत्नोंको पिरोती साभिप्राय । जैसे एकही डोरी ॥ ५५ ॥
अनेक मोतियां मिलकर । होता जैसा एकावली हार ।
किंतु शोभा दीखती सुंदर । एकही अखंड ॥ ५६ ॥
गिन सकते हैं वृक्षके सभी फूल । सौरभपे उंगली न पडे सरल ।
अध्यायोंमें श्लोक हैं वैसे ही अचल । जानना यहां ॥ ५७ ॥
यहां है जो सात शत श्लोक । अष्टादश अध्यायमें लेख ।
किंतु देव बोलता है एक । दूसरा नहीं ॥ ५८ ॥
ज्ञानेश्वरी ७१४
तथा मैने भी यह तजकर । नहीं किया है ग्रंथका बिस्तार ।
यहांपे भी कहता सविस्तर । निरूपणमें एक ॥ ५९ ॥
जहां सत्रहका अध्याय । कहते अंतके समय ।
कहता देव साभिप्राय । इस प्रकार ॥ ६० ॥
ब्रह्म नाममें श्रद्धा रखकर । किये जाते जितने व्यवहार ।
होते वह सब व्यर्थ आखर । निश्चित जान ॥ ६१ ॥
सुनकर यह श्रीहरिका बोल । डुलता है मनमें पार्थ निर्मल ।
कहता कर्म-निष्ठोंका है सकल । बना निम्न रूप ॥ ६२ ॥
अज्ञानसे अंध जो कर्म-जड़ । ईशको न देख सकता मूढ़ ।
उसके नाम श्रद्धादि जो गूढ़ । जानेगा कैसे ॥ ६३ ॥
तथा रज और तमोगुण । नहीं तजता अंतःकरण ।
तब होती है जो श्रद्धा क्षीण । जुडती कैसे ब्रह्मसे ॥ ६४ ॥
फिर शस्त्र-नोकसे गले लगना । तथा खडी डोरीपे दौड़ते जाना ।
अथवा मानो नागिनसे खेलना । होंगे कम धातुक ॥ ६५ ॥
कर्म ज्ञान-फलका सुक्षेत्र कैसे होगा ? अठारहवेका सूत्र—
ऐसे कर्म अति कठिन । देते हैं पुनः पुनः जनन ।
इस भांति कुयोग-पूर्ण । होते हैं जो ॥ ६६ ॥
होता यदि कर्म सांग संपूर्ण । बनता है ज्ञानके ही समान ।
नहीं तो देता नरक महान । यही कर्म ॥ ६७ ॥
कर्ममें हैं इस प्रकार । आते हैं दोष बार बार ।
तब कहां मोक्षका द्वार । खुलेगा कर्मठको ॥ ६८ ॥
मिटाना है यदि कर्म-संग । करके उसका पूर्ण त्याग ।
स्वीकार करना जो अव्यंग । संन्यास यहां ॥ ६९ ॥
कर्म-बाधाकी जो कहीं । भयकी बातही नहीं ।
वह आत्म-ज्ञान यहीं । होता हस्तगत ॥ ७० ॥
७१५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग
ज्ञानका आवाहन-मंत्र । ज्ञान फलनेका सु-क्षेत्र ।
तथा ज्ञानाकर्षक-सूत्र । तंतु ही जो ॥ ७१ ॥
यह दोनों संन्यास और त्याग । आचरनेसे छूटता जग ।
तब इस बातमें हो सजग । पूछना स्पष्ट ॥ ७२ ॥
ऐसे विचार कर अर्जुन । त्याग संन्यासका पक्व ज्ञान ।
जान लेनेमें करता प्रश्न । इस स्थानपे ॥ ७३ ॥
उसके उत्तरमें श्रीकृष्ण । करता है जो यहां कथन ।
उससे व्यक्त हुवा संपूर्ण । अष्टादशाध्याय ॥ ७४ ॥
एवं यहां ले जन्य-जनक भाव । होता अध्यायसे अध्याय प्रसव ।
अब प्रश्न किया वह सावयव । सुनलें सब ॥ ७५ ॥
कृष्णार्जुन-प्रेमका वर्णन—
वहां जो श्रीकृष्णका कथन । समाप्त होता देख अर्जुन ।
अपने मनमें होता खिन्न । जिस समय ॥ ७६ ॥
वैसे आत्म-तत्वमें निश्चित । बन गया था उसका मत ।
श्रीहरिका न करना बात । न भाया उसे ॥ ७७ ॥
बछडा होने पर भी तृप्त । गाय रहती पास सतत ।
अनन्य प्रीतकी यह रीत । चलती आयी है ॥ ७८ ॥
बिन कारण भी उनका बोलना । देख कर भी फिर फिर देखना ।
प्रिय-वस्तुके भोगसे होता दूना । भोग-भाव ॥ ७९ ॥
ऐसी है प्रेमकी यह रीति । तथा पार्थ है उसकी पूर्ति ।
तभी करती उसकी मति । चिंता मौनकी ॥ ८० ॥
तथा है संवादके निमित्तसे । व्यवहारकी जो वस्तु है उसे ।
भोगा जाता है सहज ही जैसे । दर्पण रूप ॥ ८१ ॥
फिर जब संवाद रुकता । तब यह सुख भंग होता ।
इसको फिर कैसे सहता । अभ्यस्त इसका ॥ ८२ ॥
ज्ञानेश्वरी ७१६
इसलिये वह संन्यास । पूछनेका करके मिस ।
खोलता है पर विशेष । गीता तत्वका ॥ ८३ ॥
अठारहवा अध्याय एकाध्यायी गीता है—
अठारहवा अध्याय यही नहीं । समग्र एकाध्यायी गीता है यही ।
दुहता है जब स्वयं बछडा ही । तब कैसा अकाल ॥ ८४ ॥
संवाद रुकनेका समय आया । पुनरपि गीता प्रारंभ कराया ।
गुरु-शिष्यके संवादमें अशक्य क्या । होता है कब ॥ ८५ ॥
यह सब रहने दें अब । अर्जुन पूछता सुने सब ।
कहता यह विनय अब । सुनले देव ॥ ८६ ॥
अर्जुन उवाच
संन्यासस्य महाबाहो तत्वमिच्छामि वेदितुम् ।
त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ॥ १ ॥
त्याग और संन्यासका अर्थ भिन्नत्व—
अजी ! संन्यास और त्याग । एक ही अर्थके दो अलग ।
जैसे संघात और संग , है समुदायके ॥ ८७ ॥
त्याग तथा संन्याससे । त्याग ही कहना ऐसे ।
जान लिया है मनसे । यहां मैंने ॥ ८८ ॥
इसमें है यदि अर्थ-भेद । करें देव इसको विशद ।
तब कहता वह मुकुंद । ये दोनों हैं भिन्न ॥ ८९ ॥
अर्जुनने कहा
कैसे संन्यासका तत्व तथा है त्यागका कहो ।
जानना चाहता हूं मैं कह तूं भिन्न भिन्न जो ॥ १ ॥
७१७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग
वैसे तेरा जो चिंतन । त्याग संन्यास अर्जुन ।
एक ही ऐसा निदान । वह भी सत्य ॥ ९० ॥
इन दोनोंका एक अर्थ । त्याग कहलाता निश्चित ।
भेदका कारण जो पार्थ । रहता ही है ॥ ९१ ॥
तजना कर्मको जो मूलता । वह है संन्यास कहलाता ।
तथा कर्म-फल जो तजता । वह है त्याग ॥ ९२ ॥
तब है कोई कर्मका फल । तजता कोई कर्म सकल ।
कहता हूँ यह मैं निर्मल । सुन तू चित्त देकर ॥ ९३ ॥
जैसे वनमें या पर्वत पर । वृक्ष उगते सहज अपार ।
वैसे उद्यान खेत धनुर्धर । नहीं उगते ॥ ९४ ॥
घास उगता यदि नहीं भी बोते । वैसे कभी धानादि नहीं उगते
उसमें प्रयत्न करने पडते । उसी भांति ॥ ९५ ॥
या अंगांग सहज होते । भूषण बनाने पडते ।
नदी नाले सहज होते । कूए नहीं ॥ ९६ ॥
वैसे जो नित्य नैमित्तिक । कर्म होते हैं स्वाभाविक ।
किंतु नहीं होते कामिक । निरिच्छासे ॥ ९७ ॥
भगवान उवाच
काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः ।
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥ २ ॥
संन्यासकी परिभाषा काम्य-कर्मका त्याग—
कामनाओंके समुदाय । उभारते हैं धनंजय ।
अश्वमेधादि स-समय । काम्य-कर्म ॥ ९८ ॥
श्रीभगवानने कहा
त्यजना काम्य-कर्मोंको ज्ञानी संन्यास जानते ।
कहते सब कर्मोंके फलका त्याग त्याग है ॥ २ ॥
ज्ञानेश्वरी ७१८
कूप सरोवर आराम । अग्रहारादि महाप्राम ।
व्रत समारोहादि कर्म । अन्य अनेक ॥ ९९ ॥
ऐसे इष्ट-पूर्तिके जो सकल । कामना होती है जिसका मूल ।
भोगना पड़ता इसका फल । बंधकर ही ॥ १०० ॥
करते हैं सब देह-धारण । भोगने पड़ते जनन-मरण ।
इसको अ-स्वीकारना अर्जुन । असंभव जैसे ॥ १ ॥
अथवा ललाट लिखित जैसे । कभी नहीं मिटाया जाता वैसे ।
तथा काला गोरापन धोनेसे । मिटता नहीं ॥ २ ॥
वैसे काम्य-कर्म फल पार्थ । भोगना पड़ता है निश्चित ।
धरना दे बैठता है नित । ऋणदाता समान ॥ ३ ॥
या कामना नहीं करते । सहज रूपमें कर्म होते ।
रणभूमिमें बाण लगते । न लड़ते भी जैसे ॥ ४ ॥
अजानपनसे गूड़ खाता । फिर भी वह मीठा लगता ।
राख मानकर पैर देता । जलाती आग ॥ ५ ॥
काम्य-कर्ममें जो यह एक । सामर्थ्य होता है स्वाभाविक ।
इसीलिये मुमुक्षुको देख । नहीं चाहना उसे ॥ ६ ॥
वास्तवमें पार्थ ऐसे । काम्य कर्म होता उसे ।
तज देना विष जैसे । उगलकर ॥ ७ ॥
देख कर फिर यह त्याग । संन्यास कहता है सारा जग ।
तथा देखता जो अंतरंग । सर्वदृष्टा ॥ ८ ॥
इस काम्य-कर्मको तजना । कामनाको जैसे उखाडना ।
धन-त्याग कर मिटा देना । भयको जैसे ॥ ९ ॥
नित्य-नैमित्तिक कर्मका विवेचन—
चंद्र-सूर्यके जो ग्रहण । बनाते पर्वणी अर्जुन ।
या माता-पिताका मरण । निश्चित दिवस ॥ ११० ॥
७१९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग
अथवा अतिथि जब आता । तब जो जो करना पडता ।
ऐसे कर्मको जानना पार्थ । नैमित्तिक कर्म ॥ ११ ॥
वर्षासे क्षुब्ध होता गगन । वसंतमें खिलता है वन ।
देहको शृंगारता यौवन । जिस भांति ॥ १२ ॥
या सोमकांत सोम स्रवता । सूर्यसे है कमल खिलता ।
मूलमें जो था वही विकसता । जैसे यहां ॥ १३ ॥
वैसे नित्यका जो होता कर्म । वही नैमित्तिक यह नियम ।
जब वह दृढ-सा होता नाम । नैमित्तिक ॥ १४ ॥
तथा सायं प्रात और मध्यान्ह । करना होता जो प्रतिदिन ।
जैसी दृष्टि होती है लोचन-। को नहीं भारी ॥ १५ ॥
नहीं आती है जिस भांति गति । चरणोंमें वह सहज होती ।
अथवा दीपमें होती है दीप्ति । पांडुकुमार ॥ १६ ॥
बिन पुटके जैसे चंदन । सुगंध देता है निशिदिन ।
अधिकारका वैसे अर्जुन । वही है रूप ॥ १७ ॥
नित्य-कर्म ऐसे है जन । बोलते हैं वह तू जान ।
नित्य-नैमित्तिक अर्जुन । दिखाये ऐसे ॥ १८ ॥
यही है नित्य नैमित्तिक । करना है जो आवश्यक ।
इसीलिये कहते देख । निष्फल इसको ॥ १९ ॥
किंतु जैसे भोजनमें सतत । भूख मिटकर होता तृप्त ।
वैसे नित्य-नैमित्तिकका पार्थ । अंगभूत है फल ॥ १२० ॥
हीन कस सोना आगमें पड़ता । हीनता तज कर तेज चढ़ता ।
इन कर्मोंका वैसा ही फल होता । जानना यहां ॥ २१ ॥
इससे दोष सब मिटते । स्वाधिकार सतत बढ़ते ।
तथा सद्गति ओर बढ़ते । अहर्निश ॥ २२ ॥
इतना यह सब रसाल । नित्य-नैमित्तिकका है फल ।
किंतु तजते मूलका बल । वैसे तजना इसे ॥ २३ ॥
ज्ञानेश्वरी ७२०
त्यागवृत्तिका रहस्य, संन्यास और त्यागका फल—
वन सारा खिल उठता । आम्र-वृक्ष भी महकता ।
न छूकर ही छोड़ जाता । वसंत जैसे ॥ २४ ॥
वैसे न कर कर्म-सीमा उल्लंघन । सदा कर नित्य-नैमित्तिकाचरण ।
तजना उसकी फल-आशा संपूर्ण । उच्छिष्ट जैसे ॥ २५ ॥
कर्म-फलका जो यही त्याग । ज्ञानियोंसे कहलाता त्याग ।
वैसे संन्यास और त्याग । कहा है तुझसे ॥ २६ ॥
जब यह संन्यास संभवता । काम्य-कर्म नहीं बांध सकता ।
निषिद्ध स्वभावसे छूट जाता । जो है निषिद्ध ॥ २७ ॥
तथा जो नित्यादिक होता । फल-त्यागसे है नाशता ।
जैसे अवयवोंका होता । सिर काटनेसे ॥ २८ ॥
फल पाकसे सस्य सूखता । वैसे सब कर्म है छूटता ।
आपसे आप खोजता आता । आत्म-ज्ञान ॥ २९ ॥
इस भांति यह दो अर्जुन । त्याग संन्यासका आचरण ।
देते हैं हृदय-सिंहासन । आत्म ज्ञानको ॥ १३० ॥
कर्म-त्यागकी यह कुशलता । छूट कर कर्मका त्याग जब होता ।
उस त्यागसे त्यागी है फंसता । जालमें अधिक ॥ ३१ ॥
नहीं करके रोगका निदान । औषध दिया विष होता जान ।
भूखके समय न खाया अन्न । ने मारती क्या भूख ॥ ३२ ॥
त्याग करना जहां नहीं उचित । वहां त्याग करना अनुपयुक्त ।
तथा जिसका त्यागना है उचित । नहीं करना लोभ ॥ ३३ ॥
त्यागका यह मर्म भूलकर । बना लेते हैं त्यागका भी भार ।
नहीं देखते वहां धनुर्धर । कभी वीतराग ॥ ३४ ॥
(85) ७२१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः ।
यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यमिति चापरे ॥ ३ ॥
फलाशा जो न छोड सकता । कर्मको वह बद्ध कहता ।
जैसे आप नग्न हो कहता । जग झगड़ालू ॥ ३५ ॥
जिव्हा-लंपट रोगी जैसे । अन्नको दोष देता वैसे ।
या कोढी चिढे मक्खियोंसे । उसी भांति ॥ ३६ ॥
जो हैं फल-काम दुर्बल । कहते हैं कर्म ही मल ।
फिर मत देते केवल । कर्म हैं त्याज्य ॥ ३७ ॥
कहता कोई यज्ञादिक । करना अति आवश्यक ।
उसके बिना न शोधक । दूसरा कुछ है ॥ ३८ ॥
यदि है चित्त-शुद्धिका मार्ग । चलना चाहे कोई सवेग ।
देता है कर्म उसमें वेग । उसे तजना नहीं ॥ ३९ ॥
यदि सुवर्णको शुद्ध करना । उसको जैसे आगमें तपाना ।
या लोह-दर्पण स्वच्छ करना । जमाना है रज ॥ १४० ॥
या कपडोंको स्वच्छ करना । ऐसी होती है मनोकामना ।
धोबीकी भट्टी गंदी करना । ऐसे होगा ॥ ४१ ॥
वैसे दुःख दायक कर्म जात । ऐसे मान उन्हे 'तजना नित ।
रसोईका क्लेश मान पार्थ । मिलेगा क्या अन्न ॥ ४२ ॥
सुन कर ऐसे ऐसे शब्द । कर्म-रत होते हैं सुबुद्ध ।
ऐसे त्याग विषयमें विशुद्ध । हुवा न निर्णय ॥ ४३ ॥
तमी न मिटे इसका निर्णय । त्यागके विषयमें हो निर्णय ।
ऐसे कहता हूं मैं धनंजय । ध्यानसे सुन तू ॥ ४४ ॥
छोड़ना कहते कोई कर्म हैं दोष रूप जो ।
न छोड़ कहते कोई यज्ञ दान तपादिक ॥ ३ ॥
ज्ञानेश्वरी ७२२
निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम ।
त्यागो हि पुरुषव्याघ्रः त्रिविधः संप्रकीर्तितः ॥ ४ ॥
त्याग भी तीन प्रकारका है—
त्याग जो सो यहां अर्जुन । तीन प्रकारका है जान ।
इन प्रकारका वर्णन । कहूंगा अब ॥ ४५ ॥
त्यागके तीन प्रकार । होते हैं यदि गोचर ।
इनका इत्यर्थ सार । जान तू इतना ॥ ४६ ॥
मुझ सर्वज्ञ बुद्धिको जंचता । वह निश्चित मत मैं कहता ।
उसको जान तू पहले पार्थ । इस स्थान पे ॥ ४७ ॥
चाहता जो संसारसे छुटकार । तथा इसमें सावध धनुर्धर ।
उसके लिये हैं सब ही प्रकार । करणीय हैं ये ॥ ४८ ॥
यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् ।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥ ५ ॥
आत्म-ज्ञानका निश्चय न होने तक कर्म अनिवार्य है—
जैसे यज्ञ दान तपादिक । कर्म करना है आवश्यक ।
न छोडे कभी उन्हे पथिक । डग भरना जैसे ॥ ४९ ॥
खोया हुवा जब नहीं मिलता । उसका भाग नहीं तजा जाता ।
या जब तक तृप्त नहीं होता । न छोड़ते थाली ॥ १५० ॥
तट पाने तक न तजते नांव । फलने तक केला न काटे पांडव ।
रखा हुवा मिले तब तक सदैव । रखते हैं दीप ॥ ५१ ॥
वैसे आत्म-ज्ञानका विषय । न होता जब तक निश्चय ।
न होना कर्ममें धनंजय । उदासीन ॥ ५२ ॥
तभी तू इसमें मेरा सुन निश्चित निर्णय ।
कहते जिसको त्याग वह भी तीन भांतिका ॥ ४ ॥
तप यज्ञ तथा दान अवश्य करना नित ।
होते पावन ज्ञानीको तजना न इन्हे कभी ॥ ५ ॥
७२३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग
सत्कर्मके तीर्थसे उज्वल होनेसे सत्व-शुद्धि होती है—
किंतु स्वाधिकारानुरूप । करना यज्ञ दान तप ।
अनुष्ठान करें आक्षेप । किये बिना ॥ ५३ ॥
चलनेमें जो वेग बढ़ता । विश्रांतिकाही कारण होता ।
वैसे कर्मातिशयमें आता । नैष्कर्म्य पास ॥ ५४ ॥
पथ्यमें जैसे नियमित । होता जाता है वैसे पार्थ ।
रोगसे हठता निश्चित । उसी प्रकार ॥ ५५ ॥
वैसे कर्म होते जो आवश्यक । करनेसे कुशलतापूर्वक ।
झड़ते हैं रज तम निरर्थक । पूर्ण-रूपसे ॥ ५६ ॥
या क्षारसे जैसे सतत । पुट देते स्वर्णको पार्थ ।
निर्मल हो जाता तुरंत । सुवर्ण जैसे ॥ ५७ ॥
वैसे निष्ठासे किया हुवा कर्म । धोता जाता है सदा रज तम ।
तथा सत्व-शुद्धिका पुण्य-धाम । दृष्टिमें आता ॥ ५८ ॥
इसीलिये जान तू पार्था । सत्व-शुद्धि जो है चाहता ।
उसको कर्म मानो तीर्थ- । समान जान ॥ ५९ ॥
तीर्थसे होता बाह्य मल-क्षालन । कर्मसे अभ्यंतर उजला जान ।
ऐसे निर्मल तीर्थ जान अर्जुन । सत्कर्मको ही ॥ १६० ॥
तृषार्तको जैसे मरु-भूमिके । अमृत-वर्षा साथ तपनेके ।
या नयनमें आ बैठे अंधेके । स्वयं भास्कर ॥ ६१ ॥
डूबनेवालेकी रक्षामें नदी आयी । गिरनेवालेके लिये धरणी आयी ।
मरनेवालेको मृत्युने ही बढ़ायी । आयू उसकी ॥ ६२ ॥
वैसे है कर्म-बद्धता । मुमुक्षुको छुड़ाती पांडुसुता ।
विष जैसे रसायन बनता । उपाय बलसे ॥ ६३ ॥
वैसे कर्म-कुशलता । देती बद्धको मुक्तता ।
बद्धको छुड़ानेमें पार्थ । आती काम ॥ ६४ ॥
ज्ञानेश्वरी ७२४
तुझे अब वह कुशलता । कहता सुंदरतासे पार्था ।
कर्मसे कर्मही है मिटता । जिससे यहां ॥ ६५ ॥
एतान्यापि तु कर्माणि संगंत्यक्त्वा फलानि च ।
कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ॥ ६ ॥
कर्म-नाशकी कर्म-कुशलता—
महा यागादि सब प्रमुख । कर्म-संपन्न होते हैं नेक ।
कर्तापनकी अहंता देख । रहती नहीं ॥ ६६ ॥
जैसे जो मूल्यसे यात्रा करता । उसको यात्राका गर्व न होता ।
उसको हृदयमें नहीं होता । यात्राका आनंद ॥ ६७ ॥
अथवा जो राजाकी आज्ञासे । लड़ता रहता है राजासे ।
अभिमान नहीं होता उसे । जीतता मैं राजाको ॥ ६८ ॥
अन्योंकी सहायतासे जो तरता । उसको तरनेका गर्व न होता ।
अथवा पुरोहित न धरता । दातृत्वका गर्व ॥ ६९ ॥
वैसे कर्तृत्वका अहंकार । नहीं लेते यथा अवसर ।
कर्म-मात्र सभी धनुर्धर । करना पूर्ण ॥ १७० ॥
तथा कर्म किया अर्जुना । इससे है फलका आना ।
ऐसी अपेक्षा न धरना । मनमें कभी ॥ ७१ ॥
फलकी आशा छोड़कर । कर्म करना धनुर्धर ।
पराया बच्चा निरंतर । देखती धात्री जैसे ॥ ७२ ॥
बिना किये ही फलकी आशा । तुलसीमें पानी देते जैसा ।
वैसे ही हो फलमें निराशा । करना कर्म ॥ ७३ ॥
न करके दूधकी आशा ग्वाल । करता गांवके पशु संभाल ।
उसी भांति मान कर्मका फल । करना कर्म ॥ ७४ ॥
किंतु पुण्य-कर्म भी ये ममत्व-फल छोड़के ।
करना योग्य है मेरा जान उत्तम निर्णय ॥ ६ ॥
७२५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग
इस भांति कर्म-कुशलता । साधकर जो कर्म करता ।
अपने आप दर्शन पाता । सहजमें जो ॥ ७५ ॥
तभी फल आशा छोड कर । तथा तज देह अहंकार ।
कर्म करना है धनुर्धर । यह मेरा संदेश ॥ ७६ ॥
जीव जो बंधसे थका हुवा । भक्तिकी चाह करता हुआ ।
उसे मैं कहता हूं पांडव । नहीं अन्य मार्ग ॥ ७७ ॥
नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते ।
मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः ॥ ७ ॥
तामसिक कर्म-त्याग—
अंधारमें नहीं दीखता । इसलिये आंखें फोडता ।
वैसे कर्म-द्वेषसे करता । कर्मका त्याग ॥ ७८ ॥
उसका है जो कर्मका तजना । कहता हूं मैं तामस अर्जुना ।
आधासीसीके क्रोधसे फोड़ना । कपाल जैसे ॥ ७९ ॥
पथ है यह अति कठिन । तो भी पार करेंगे चरण ।
उन्हीका करना क्या खंडण । मार्गापराधसे ॥ १८० ॥
भूखेके सम्मुख आया आहार । उसको अति उष्ण मानकर ।
करके अनशनका विचार । उसे तजना सा ॥ ८१ ॥
वैसे कर्मका बाधक कर्म । निस्तार करना यह मर्म ।
न जानता तामस सभ्रम । मत्त होकर ॥ ८२ ॥
स्वाभाविक जो भागमें आता । उस कर्मको जो तज देता ।
ऐसे तामस त्यागसे पार्थ । रहना दूर ॥ ८३ ॥
राजस कर्म-त्याग—
अथवा स्वाधिकार जो जानता । अपना विहित कर्म सूझता ।
किंतु काया-क्लेश मान तजता । आलस्यसे जो ॥ ८४ ॥
न होता साध्य संन्यास कभी नियत कर्मका ।
करनेसे स-सम्मोह कहाता त्याग तामस ॥ ७ ॥
ज्ञानेश्वरी ७२६
दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् ।
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्याग फलं लभेत् ॥ ८ ॥
कार्यारंभका जो उगम । कष्टकर होता प्रथम ।
लगता ढोना भारी काम । पाथेय जैसे ॥ ८५ ॥
कडुआ लगता है नीम । कशैला हर्रा प्रथम ।
प्रारंभमें वैसे काम । लगता सदैव ॥ ८६ ॥
गायका दोष है सींग । सेवंतीका कंटकांग ।
भोजन सुख महंगा । पकानेमें ॥ ८७ ॥
होता वैसे प्रारंभमें कर्म । आरंभमें होता है विषम ।
इसीलिये करनेमें श्रम । मानता है वह ॥ ८८ ॥
आरंभता है कर्म समस्त । वैसे यह जो शास्त्र - सम्मत ।
किंतु आंच आते ही व्यथित । हो तजता सब ॥ ८९ ॥
कहता संपत्ति शरीर जैसी । मिली है अतीव भाग्यसे ऐसी ।
कर्मादिकमें यह व्यर्थ वैसी । खपाना है पाप ॥ १९० ॥
किया हुवा कर्म कभी देगा फल । किंतु मिला है यह सुंदर फल ।
इसको अभी भोगनेमें कुशल । नहीं है क्या ? ॥ ९१ ॥
इस भांति शरीर - क्लेशसे । भीत हो तजता कर्म जैसे ।
कहलाता है सुन तू इसे । राजस त्याग ॥ ९२ ॥
इसमें भी होता है कर्म-त्याग । किंतु न मिलता त्यागका योग ।
अपनेसे गिर होता है त्याग । उसी भांति ॥ ९३ ॥
अथवा प्राण गये डूबकर । "अधोदकमें समाधि पाकर” ।
ऐसे नहीं कहते धनुर्धर । वह दुर्मरणही ॥ ९४ ॥
ऐसे शरीरका लोभ । तजाता है कर्म जब ।
नहीं मिलता है लाभ । कर्म-त्यागका ॥ ९५ ॥
कष्ट कारण जो कर्म तजता तन चोरके ।
त्याग राजस जो व्यर्थ न देखें अपना फल ॥ ८ ॥
७२७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद मोग
वास्तवमें जब अपना । ज्ञानोदय होता अर्जुन ।
जैसे उदय-काल जान । निगलता है तारे ॥ ९६ ॥
वैसे सकारण क्रिया-जात । खो जाते हैं सहजही पार्थ ।
कर्मत्याग तब लाता नित । मोक्षका फल ॥ ९७ ॥
मोक्षका फल यह अज्ञान- । त्यागको न मिलता अर्जुन ।
इसीलिये तू त्याग न मान । जो है राजस ॥ ९८ ॥
किंतु देता है कैसा त्याग । घरमें मोक्ष-फल-भाग ।
सुन अब यह प्रसंग । कहता हूं मैं ॥ ९९ ॥
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन ।
संगं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः ॥ ९ ॥
सात्विक-त्याग—
तब स्वाधिकारानुसार । आता जो सहज होकर ।
विधि-गौरवसे आचर । भूषण मान ॥ २०० ॥
किंतु यह मैं करता हूं ऐसे । स्मरण भी तज कर मनसे ।
फलाशा तज संपूर्ण-रूपसे । करना है जो ॥ १ ॥
किंतु अवज्ञा और कामना । माताके विषयमें अर्जुन ।
करनेसे होता है पतन । हेतु जो जैसे ॥ २ ॥
सो इन दोनोंको तजना । माता मान कर भजना ।
मुख अशुद्ध सो अर्जुन । तजना क्या गाय ॥ ३ ॥
अपने प्रिय फलमें धनुर्धर । छिलका और बीज जो असार ।
इसलिये तजते क्या फल सारा । कभी कोई ॥ ४ ॥
वैसे ही है कर्तृत्वका मद । तथा कर्म-फलका आस्वाद ।
इन दोनोंका नाम है बंध । कर्मका जो ॥ ५ ॥
कर्तव्य मानके कर्म करना जो नियोजित ।
ममत्व फलको छोड़ त्याग तू मान सात्विक ॥ ९ ॥
ज्ञानेश्वरी ७२८