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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

बात भस्मासुरको जच गयी । उसने नारदको प्रणाम किया । "आपने बढ़िया बात बताई । और किसीने ऐसी बात नहीं बतायी थी" कहकर वह एक साथ कैलासपति और उमापति बननेकी उमंगमें शंकर पर दौड़ गया ! नारदने भस्मासुरमें लोभ जगाया और लोभका अंधा अपनी ही जड़ काटने चल पड़ा । शंकर पर अब संकट आया । वे विष्णुकी ओटमें गये । बिना सोचे समझे "मांगा वरदान, दिया वरदान" का परिणाम भी चखनेको मिल गया उनको । तब विष्णुने, नारदके जगाये हुए लोभके अनुरूप पार्वतीसे भी सुंदर, मोहिनीके रूपमें सामने आकर भस्मासुरको नृत्यमें उलझा कर अपने हाथसे अपनी राख बननेको बाध्य किया । इसीको उदाहरणके रूपमें रख कर अर्जुन श्रीकृष्णसे पूछ रहा है "मैं भस्मासुर जैसा पाप करूं क्या ?" देख तू जनकादिक । कर्मजात हैं अशेष । न छोड़के मोक्ष सुख । पाये यहां ॥ ज्ञा० ३-१५२ ॥ मिथिलेश जनकराजा कर्मयोगी, अनासक्त न करनेकासा सब कुछ कर्म करनेमें कुशल । इसलिये वह क्षत्रियोचित सब कुछ कर्म करने पर भी फलासक्त न होनेसे-मुक्तावस्थाको प्राप्त हुआ । यह श्रीकृष्णने कहा है । जनकराजाने कर्म-द्वारा मोक्ष प्राप्तिका आदर्श विश्वके सामने रखा है । मृत गुरु-पुत्रको दिया जीवन । तूने देखा है यह कार्य महान् । औ' मैं कर रहा कर्म स-लगन । प्रसन्न चित्तसे ॥ ज्ञा० ३-६३ ॥ "कर्म बंधन कारक नहीं । वह अनिवार्य साधन है !" इस बातको कहते हुए अपना ही उदाहरण अर्जुनके सम्मुख रखकर यह बात कही है । कृष्ण सांदीपनीके शिष्य । बलरामके साथ श्रीकृष्ण धनुर्वेद सीखनेके लिये अवंती नगरके पास रहनेवाले आचार्य सांदीपनीके पास गये । वह शस्त्राभ्यासके साथ शास्त्राभ्यास भी किया । धनुर्विद्याके साथ वेद वेदांगोंका भी अध्ययन किया । विद्याभ्यास पूरा हुआ । स्नातक बन कर आते हुए श्रीकृष्णने गुरूसे आग्रहपूर्वक पूछा "पूज्यवर ! आपको गुरुदक्षिणा क्या दूं !" आचार्य सांदीपनीका जीवन कृतार्थ जीवन था । किंतु उसमें एक व्यथा थी । उनका इकलौता पुत्र दत्त ! अकस्मात समुद्रमें डूब गया था । आचार्य सांदीपनी को वही एक दुःख था । आचार्यने अपना दुःख प्रिय शिष्यसे कहा । शिष्य भी लोकोत्तर था । गुरुकी इच्छा पूर्ण करनेकी शक्ति रखता था । गुरुकी इच्छा सुनते ही श्रीकृष्ण बलरामको साथ लेकर गुरु पुत्रके शोधार्थ यमलोक गये । वहां प्रत्यक्ष कालसे युद्ध किया और उसको जीत कर गुरु-पुत्रको ले आये । ऐसा लोकोत्तर पराक्रम करनेके बाद भी मैं लगनसे सभी कर्म करता हूं । यह कहते हुए अर्जुनको कर्मकी प्रेरणा देते हैं । शंभुने प्रसन्न चित्त । उपमन्युको जो भार्त । दिया जैसे दूधभात । क्षीराब्धी ही ॥ ज्ञा० ५-११ ॥ उपमन्यु व्याघ्रपादका ज्येष्ठपुत्र । व्याघ्रपाद वसिष्ठ गोत्रोत्पन्न एक अकिंचन ब्राह्मण । बड़ाभाई उपमन्यु छोटा धौम्य । माता दोनोंको आटा घोलकर दूध कहकर पिलाती थी । दोनों इसी पर प्रसन्न थे । (7) ८९ परिशिष्ट ४

एक दिन खेलनेके लिये दोनों किसी दूसरे आश्रममें गये । वहां अन्य बच्चोंके साथ इनको भी गायका असली और ताजा दूध मिला । अब तक इसने असली दूध चखा भी नहीं था । एक बार दूध चखनेके बाद या दूधका स्वाद लेनेके बाद दूधके नामसे भका आटेका घोल वह क्यों लेने लगा । वह असली दूधके लिये मांके पास हठ करने लगा । तब मांने उद्विग्न होकर कहा “तुमने पूर्वजन्ममें ऐसी ईश्वर-भक्ति कहां की थी कि तुमको इस जन्ममें असली दूध मिले !” यह सुनकर उपमन्युने तुरंत शिवजीकी उपासना प्रारंभ की । बालककी इस आराधनाने घोर तपका रूप ले लिया और शिवजीने प्रसन्न होकर उसको क्षीरसागर ही दे डाला । सुदामाके चिउडके हित । खोली गांठ ॥ ज्ञा० ९-३९४ ॥ ऊपरकी दो ओवियोंमें भगवान अपनी महान संपदाका वर्णन करके मुझे किसी भी बातकी कमी नहीं किंतु— भक्तोंकी ओरसे प्रेमसे दी हुई कोई वस्तु मैं कितने आनंदसे स्वीकार करता हूँ यह कहते हुए श्री सुदामाका स्मरण कर रहे हैं। सुदामा अत्यंत दरिद्री ब्राह्मण । कृष्णका बचपनका मित्र । साथी, गुरु बंधु, आचार्य सांदीपनीके यहां विद्याभ्यास करते समय दोनों साथ थे । साथ साथ गुरुसेवा करते थे । आगे श्रीकृष्ण द्वारकामें वैभवके शिखर पर पहुंच गये और सुदामा दारिद्र्यमें पिसते रहे । कृष्णसे कुछ मांग सकते हैं, मांगना चाहिए यह बात भी कभी उसके मनमें नहीं उठी । किंतु बार बार वह पत्नीसे अपनी बचपनकी बात कहता, कृष्णका प्रेम, प्रेमपूर्ण बर्ताव करता, और अपने आप गद्गद होता । यह सुनकर पत्नी उससे कृष्णसे कुछ याचना करनेको कहती । पत्नीके बार बार कहने पर आखर सुदामा तैयार हुवा । किंतु इतने सालके बाद मित्रके पास जाते समय कुछ भेंट ले जानी चाहिए और कृष्णको भेंट ले जाने जैसा घरमें कुछ है नहीं । कृष्णके पास जाते समय भेंटकी सबसे बडी समस्या हो गयी । अंतमें सुदामाकी पत्नी कहींसे थोडा चिउडा मांग लायी । उसको फटी हुई धोतीमें बांध दिया और सुदामाजी कृष्णके प्रेमका स्मरण करते करते, उनके साथ क्या क्या और कैसे बोलना चाहिए इसका विचार करते करते द्वारका आये । श्रीकृष्णने सुदामाकी बहुत आव भगत की । स्वयं उसके पैर धोये । यह सब देखकर सुदाम दंग रह गया । बेचारा सुदामा, कृष्णको अपने चिउडेकी भेंट क्या बताता ? उसके पास प्रेम था । प्रेमसे वह पुरानी बातोंका ही स्मरण करके कहने लगा और उसी बचपनके आनंदमें हंसने खेलने लगा । तब कृष्णने पूछा “अरे भाई ! वह सब रहने दे ! अब भाभीने मेरे लिये खानेको क्या दिया है ?” सुदामाका संकोच देखकर स्वयं श्रीकृष्णने ही चिउडेकी पोटली की गांठ खोल कर उसको प्रेमसे खाया । सुदामाको भी कृतार्थताका अनुभव हुवा । कृतार्थताके अनुभवके बाद भला मांगना क्या रहा ? अपना दारिद्र्य मिटानेके लिये कृष्णके पास कुछ मांगनेके विचारसे द्वारका गया हुवा सुदामा कृष्णने मेरा लाया हुवा चिउडा खाया इसी आनंदमें झूमता हुवा घर जा गया । देनेका आनंद अनुभवनेके बाद भला मांगनेका दुःख रहता कहां ? किंतु सुदामा अपने घरके पास आ कर देखता है “जहां भिक्ष-दारिद्र्य बसा हुवा था वहां सर्व संपदाका विलास था ! प्रेमसे लाये चिउडेका मंगलमय प्रसाद-प्रासाद प्राप्त हो चुका था ! पकडा मगरने गजेंद्रको । उसने स्मरण किया मुझको । व्यर्थ किया अपनी पशुताको । पाकर मद्रूप ॥ ज्ञा० ९-४४१ ॥ ज्ञानेश्वरी ९०

पाण्ड्य देशका राजा इंद्रद्युम्न । जब वह तप कर रहा था तब अगस्त्य ऋषि वहां आये । ध्यानस्थ इंद्रद्युम्नने अगस्तिको न देखा न प्रणाम किया । वह वैसे ही बैठा रहा । "इतना मदोन्मत्त यह कौन है ?" अगस्तिके मनमें आया । वृद्ध गुरुजनोंके आनेके बाद उनको उत्थान न देकर बैठा रहनेका यह अपराध देख कर अगस्तिने कहा "तू मदोन्मत्त हाथी बन जा !" और शापवाणी सुनकर सावध हुए राजाने सामने अगस्तिको देखतेही श्रद्धा भक्तिपूर्वक प्रणाम करके स्तवन किया । तब अगस्तिने कहा "हाथी बननेके बाद तुझे एक मगर पकडेगा और आदि पुरुष तेरी रक्षा करके मोक्ष देगा !" इंद्रद्युम्न हाथी बन कर मदमें झूमता हुवा वनमें भटकने लगा । और जब पानी पीने गया तब वहीं पर पडे मगरने इस गजराजको पकडा । गजराजने उस मगरसे अपनेको छुडा लेनेका खूब प्रयास किया । किंतु व्यर्थ । आखिर गजराजने सूंडसे वहीं पर उगे एक कमलको तोड ऊपर उठाते हुए आदिपुरुषका स्मरण किया तो विष्णुने मगरको मारकर गजराजका उद्धार किया । मेरा नरसिंहका भूषण । उसकी महिमा ॥ ज्ञा० ९-४४९ ॥ प्रल्हादका परिचय तीसरे परिशिष्टमें आया है। यहां प्रल्हादके लिये मैं नारसिंह बन कर आया यह कहा है । वैसे ही भयके कारण । निशिदिन कर चिंतन । अखंड वैर धर मन । कंस चैद्यादि ॥ ज्ञा० ९-९६५ ॥ भगवत्स्मरणका कारण कोई भी हो, किंतु उसीका स्मरण हो और वह सतत हो; इसीसे मुक्ति मिलती है। यह कहते समय ऊपरका उदाहरण दिया है। कंस कृष्णका महान शत्रु । कृष्णके भयसे वह सदैव कृष्णको कैसे मार डालें इसीका चिंतन करता था । इससे उसको सदैव सर्वत्र कृष्ण ही कृष्ण हो गया था । कृष्ण जन्मसे पहले ही अशरीरी वाणीसे उसको ज्ञात हो गया था कि देवकीके आठवे पुत्र कृष्णसे तुम्हारी मृत्यु होगी । इससे वह वसुदेव-देवकीको बंदीगृहमें रखकर जनमते ही वसुदेव देवकीके बच्चोंको मारने लगा। कृष्ण-जन्मके पहलेसे ही कृष्ण-चिंतन । जन्मके बाद वह बच निकला । अब बाल्यावस्थामें ही उसको मार डालनेका विचार करने लगा । जैसे जैसे कंस अपने प्रयत्नमें असफल होता गया और कृष्ण बढ़ता गया "मुझे मारनेवाला वैरी !" के रूपमें उसका चिंतन गहरा होता गया । परिणाम स्वरूप सर्वत्र उसको कृष्ण-दर्शन होने लगा । इसी स्थितिमें कृष्णने उसको मार डाला । तब भला बिना कृष्णके और कौन उसका आसरा होगा ? कंस भी कृष्णरूप हो गया ! वही चेदि राजा शिशुपाल । दमघोषका पुत्र । कृष्णकी बुआका लड़का । जब इसका जन्म हुवा तब इस शिशुका रूप विचित्र था । तीन आँखें थीं । इसके माता-पिता इसको मार डालनेको तैयार हो गये थे । इतनेमें अशरीरी वाणी हुई "यह बालक आगे चलकर अत्यंत पराक्रमी होगा । जिसकी गोदमें बिठानेसे इसकी तीसरी आंख जायेगी उसीके हाथों यह मरेगा !" "आगे चलकर कृष्ण अपनी बुआका बच्चा देखने आया । कृष्णने स्वाभाविक ही बच्चेको गोदमें लिया और तीसरी आंख गायब हुई । बुआ कृष्णके सामने रोईं । कृष्णने कहा "मैं इसके सौ अपराध भी सहन करूंगा !" माँने सोचा हो गया ! "यह सौ अपराधसे भी अधिक क्या करेगा !" शिशुपालने कृष्णको अपना शत्रु मानकर उससे वैर करना प्रारंभ किया । कंसकी भांति उसके नाशका विचार करने ९१ परिशिष्ट ४

लगा । मौका बेमौका कृष्णका विरोध करने लगा । उनको भला बुरा कहने लगा । वह रुक्मिणीसे विवाह करना चाहता था किंतु कृष्णने रुक्मिणीको जीता ! इससे वह अधिक ही चिढ़ गया । रुक्मिणीके स्वयंवरमें भी वह कृष्णसे लड़ने जाकर आग गया था । किंतु आगे जब पांडवोंके राजसूय यज्ञमें कृष्णको अग्र पूजाका मान मिला तब यह भड़क उठा । वहीं पर यह कृष्णको भला बुरा कहने लगा ! जब जीभकी लगाम टूटी तब भला सौ अपराध भरनेमें कितनी देर लगती है। कृष्णको गालियां दे देकर थका हुआ शिशुपाल यज्ञ शालाके सभा-भवनके बाहर जाने लगा-राज-सभाका अपमान करके-तब दरवाजेमें ही कृष्णके सुदर्शनने इसका शिरच्छेदन किया !! कृष्ण विरोधकी परमावधिमें कृष्णसे मृत्यु ही कृष्णमें विलीनता है । नारद ध्रुव अक्रूर । शुक और सनत्कुमार । भक्तिसे मैं धनुर्धर । हुआ प्राप्त ॥ ज्ञा० ९-४६ ॥ नारद । पहले परिशिष्टमें परिचय आया है । ध्रुव-पिता उत्तानपाद राजा । माता सुनीति । सुनीतिको सूनृता भी कहा गया है । राजा उत्तानपाद सुनीतताको नहीं चाहता था । उसकी प्रिय-पत्नी थी सुरुची । राजा इसीके साथ रहता था । उसके आधीनसा रहता था । एक बार उत्तानपाद राजा अपनी प्रिय-पत्नी सुरुचीके पुत्र उत्तमको गोदमें बिठाकर उससे प्यार करता था तब ध्रुव भी पिताकी गोदमें जा बैठ गया । तब उत्तानपादने उससे लाड़ प्यार नहीं किया और सुरुचीने तो उसको "यदि तुमको राजा की गोदमें बैठना है तो भगवानकी उपासना करके मेरी कोखसे जन्म लो !" कह कर नीचे उतार दिया । विमाताकी कठोर बात सुनकर ध्रुव खिन्न हुआ । तब भी राजा कुछ नहीं बोला । ध्रुव रोता हुआ अपनी मांके पास आया । स्वाभाविक ही माने उसको गोदमें उठा लिया । ध्रुवसे सब बात जान कर सुनीतिको बड़ा दुःख हुआ । किंतु वह समझ नहीं पायी कि ध्रुवके दुःखका अंत कैसे किया जाय । इसके बाद ध्रुव भगवानकी आराधना करनेके लिये पिताके राज्यसे निकल गया । इस समय भी राजा कुछ नहीं बोला । नारदको जब इस बातकी जानकारी मिली तब वह ध्रुवसे मिलने गये । नारदने ध्रुवसे बातें कीं । ध्रुवका क्षात्रतेज और स्वात्माभिमान देख कर नारद प्रभावित हो गये । उन्होंने ध्रुवके सिर पर हाथ रख कर उसको द्वादशाक्षरी मंत्र दिया और यमुना किनारे पर मधुवनमें जा साधना करनेको कहा । ध्रुव मधुवन गया और नारद उत्तानपादके पास । उत्तानपादसे नारदने कहा "तुम्हारा ध्रुव महापद् पाकर तुम्हारे पास आयेगा !" ध्रुवकी भगदाराधना प्रारंभ हुई । बाल हठ ! भविष्यके अज्ञानके कारण निर्माण होनेवाला असीम धैर्य । ध्रुवने अन्न जल भी छोड़ दिया । वह एक पैर पर खड़ा हुआ । ध्रुवके तपके पुण्य-भारसे पृथ्वी कांपने लगी । उसके निग्रहसे इंद्रादि देवता अकुला उठे । देवताओंने भगवानकी प्रार्थना की और भगवान विष्णु ध्रुवके सम्मुख प्रत्यक्ष हुए । विष्णुने उसके गालको वेद-शंखका स्पर्श किया और ध्रुव वेद-वाणीसे स्तवन करने लगा । विष्णुसे इसने अचल-स्थान मांग लिया । ध्रुव घर लौट आया । ध्रुवकी लौटनेकी बात सुनकर राजाको सच नहीं लगा । फिर उसको नारदकी बात याद आयी । तब उसको महान आनंद हुआ । उसी आनंदमें यह शुभ संवाद लानेवालेको राजाने गलेका हार उतार कर दिया और ध्रुवका स्वागत करने दौड़ा । सजाये हुये ज्ञानेश्वरी ९२

राज-हाथी पर बिठा कर राजा ध्रुवको घर लाये। राजाने उसका मस्तक चूम लिया। सुरुचीने “चिरंजीवी” होनेका आशीर्वाद दिया। ध्रुव उत्तमके साथ बढने लगा। ध्रुवका विवाह हुवा। मृगयामें गये उत्तमकी एक यक्षसे लडाई हुई और उत्तम मारा गया। यह सुनकर ध्रुवने यक्षनगरी अलकावती पर आक्रमण कर दिया। ध्रुवने वहां यक्षोंके गुह्यक-कुलका संहार करना प्रारंभ किया। तब उसके पितामहने ध्रुवका समाधान करके यक्ष-कुलको बचा लिया। आगे अनेक वर्ष राज्य करके अपना राज्य पुत्रोंको दे ध्रुव स्वर्ग गया ! (१) अक्रूर-सात्वत वंशका यादव। श्वफल्क राजाका पुत्र। माताका नाम गांदिनी। इस पर जैसे कंसका विश्वास था वैसे बलराम और कृष्णका भी था। इसीलिये कंसने कृष्णको मधुरामें बुलानेके लिये इसको भेज दिया था। आगे धृतराष्ट्र पांडवोंसे कैसे व्यवहार करते हैं इसकी जानकारी लाने के लिये कृष्णने इसीको हस्तिनापुर भेजा था। यह कृष्णका विश्वासी अनुचर था। (२) शुक-व्यासका पुत्र। महान बालयोगी। स्वयं महादेवने इसका उपनयन किया। बृहस्पतिने इसको वेद सिखाये। व्यासने इतिहास, राजनीति आदि सिखाया। इसने परीक्षितिको भागवत कहा। युधिष्ठिरकी मय सभामें भी यह गया था। अंतमें इसने कैलासमें जाकर शरीर त्याग किया। सनत्कुमार-इसने नारदको उपदेश दिया। इसने अनेक लोगोंको उपदेश दिया है। आज भी इसके नाम पर वास्तुशास्त्र, सनत्कुमार संहिता, सनत्कुमार कल्प, सनत्कुमार तंत्र आदि ग्रंथ मिलते हैं। आशीर्वादसे जिनके। बने आयुष्य अग्निके। दिया सिंधुने उनके। प्रेमसे नीर ॥ ज्ञा० ९-४७८॥ श्वेतकी राजाने सतत बारह वर्ष तक यज्ञ किया। उसमें जो सतत घीकी आहुतियां पडी उससे अग्निका पेट खराब हो गया। उसे अजीर्ण होकर जाड्य आया। तब वह उपाय पूछनेके लिये ब्रह्मदेवके पास गया। ब्रह्मदेवने अग्निको “अनेक औषधियुक्त खांडव वनको भक्षण कर !” ऐसा उपाय बताया। तब अग्निने ब्राह्मण वेषमें कृष्णार्जुनके पास जा कर खांडव वनका दान मांग लिया। खांडव वनको भक्षण करनेसे अग्निका जाड्य गया और उसका आयुष्य बढा। दिया सिंधुने उनके। प्रेमसे नीर ॥ वडवाग्नि समुद्रमें रह कर उसका पाणी सोखता जाता है। समुद्र उसको नित नया जल देकर स्वयं सीमामें रहता है। अब तक यह पदमुद्रा। हृदय पे धरी है सुभद्र। अपने ऐश्वर्य समुद्र। रक्षा हेतु ॥ ज्ञा० ९-४८०॥ भृगु अनेक हैं। सबसे प्रथम भृगुने ही अग्निका शोध किया। ऋग्वेदमें है “अग्नि सबसे पहिले भृगुको मिला !” भृगु ब्रह्माका मानस-पुत्रोंमें एक। भृगुकुल ऋषियोंमें उच्चकुल माना जाता है। तप-सामर्थ्यमें संपन्न। एक बार भृगु-ऋषिके मनमें आया देखें ब्रह्मा विष्णु महेशमें कौन बड़ा है। ब्रह्मा और ९३ परिशिष्ट ४

महेशको इसकी उद्दंडताका क्रोध आया किंतु विष्णुकी छाती पर लात मारने पर भी विष्णुको क्रोध नहीं आया । इतना ही नहीं विष्णु यह कहते हुए "मेरा हृदय वज्रके समान कठोर । आपके चरण कमलके समान कोमल । कहीं आपके पैरमें चोटे तो नहीं आयी ?" भृगु-ऋषिके पैर दबाने लगे । विष्णुके वनमाला, कौस्तुभ आदि आभूषणोंमें "भृगु-लांछन" भी एक भूषण है । विष्णु सदैव अपनी छाती पर भृगुके लातका चिन्ह सम्हालता रहता है ऐसी मान्यता है । शीतलताकी अपेक्षा कर । महादेवने मस्तक पर । धारण किया जो निरंतर । अर्धचंद्र ॥ ज्ञा० ९-४८६ ॥ समुद्र मंथनमेंसे चौदह रत्न निकले । उसीमें हालाहल विष भी निकला । वह विश्वको जलाने लगा । विश्व-संहारक इस विषको, जो विश्वको जलाते हुए फैल रहा है उसको रोके कौन ? तब सदाशिव आगे आये । उनका नामही सदाशिव ! विश्वकल्याणके इस महत्कार्यको वे कैसे ना कह सकते हैं ? वे इस विषको पी गये । इससे शरीरमें जलन होने लगी । वे नीलकंठ हो गये । तब शीतलताके उपायमें उन्होंने सिरपर अर्धचंद्रको धारण किया ! क्षयरोगी होता चंद्र जिस लोकका ज्ञा० ९-५०१ ॥ गुरु-पत्नी ताराका हरण किया इसलिये चंद्रको बृहस्पतिने क्षयी होनेका शाप दिया ऐसी पौराणिक कथा है । किसीके दंडसे विश्व स्थिर कराया । किसीसे नव विश्व ही है रचाया । सिंधुमें पाषाण तैराके उतराया । सैन्य तुमने ॥ ज्ञा० १०-३६ ॥ (१) वसिष्ठ और विश्वामित्रकी प्रतिस्पर्धाकी कहानियोंसे पुराण भरे पडे हैं । एक बार ब्रह्मदेवके सभामें यह प्रश्न उठा कि विश्वामित्रको ब्रह्मऋषि कहें या नहीं । इसके लिये साक्षी देनेके लिये समुद्र, सूर्य और मेरु पर्वतको ब्रह्म-सभामें जाना पडा । विश्वामित्र इन तीनोंको बुला लानेके लिये निकला । समुद्रने कहा यदि मैं ब्रह्मदेवकी सभामें आया तो वडवानल पृथ्वीको खा डालेगा । उसको पानी कौन देगा । तू वडवानलको पानी दे मैं ब्रह्म-सभामें चलूं ! सूर्यने कहा "विश्वको प्रकाश देनेकी व्यवस्था कर मैं चला !" मेरुने कहा "अरे ! मैं उठा तो पृथ्वी हवामें उड़ जायेगी उसकी क्या व्यवस्था करोगे ?" विश्वामित्रके पास भला इसकी क्या व्यवस्था थी ? अब वसिष्ठकी बारी आयी । वसिष्ठने अपने अंगवस्त्रसे सूर्यका काम किया; दंडसे मेरुका काम लिया; और कमंडलुके उदक प्रवाहसे समुद्रका । तीनो ब्रह्म-सभामें आये । (२) त्रिशंकु राजाको सशरीर स्वर्ग जाना था । विश्वामित्रने अपने यज्ञबलसे उसको स-शरीर स्वर्ग चढाया । किंतु इंद्र उसको ऊपर लेता ही नहीं । त्रिशंकु बीचमें ही लटक गया । तब विश्वामित्रने अपने तपोबलसे वहीं नयी सृष्टि रचना की । तब इंद्रने विश्वामित्रको समझा बुझाकर उसको इस कामसे विरत किया । (३) रामको लंकापर आक्रमण करनेके लिये समुद्र पर सेतु बांधना आवश्यक था । नल रामका स्थापत्य शास्त्री । तब नलने समुद्रमें जो पत्थर डाले वे डूबने लगे । सेतु तैयार कैसे होगा ? किंतु राम नाम लेकर जो पत्थर जलमें डाले वे तैरते रहे । इससे सेतु तैयार हुआ और वानर सेना लंकामें उतरी । ज्ञानेश्वरी ९४

किसीसे आकाशमें सूर्यको पकड़वाया । किसीसे सागरका आचमन करवाया ॥ ज्ञा० १०-३७ ॥ (१) मारुतिका जन्म हुआ । जन्मते ही भूख लगी । आकाशमें लाल लाल सूर्यबिंब देखा । अच्छा फल मानकर मारुति उड़कर आसमानमें पहुंचे । अब मारुति सूर्यको पकड़कर निकल जायेंगे इतनेमें इंद्रने उस पर अपना वज्र फेंका । तब मारुति बेसुध होकर नीचे पड़े । किंतु इंद्रादि देवोने सब मारुतिके पिता वायुदेवके क्रोधसे मारुतिकी स्तुति की और उसको सुखमें लाये । तब इंद्रने " इसके बाद तुम पर वज्रका कोई प्रभाव नहीं होगा !” ऐसा वर दिया और मारुति वज्रदेही बने । किंतु वज्र प्रहारसे मारुतिकी ढुड्डी टूटी इसलिये उसको हनुमान कहते हैं । (२) इंद्रने वृत्रासुरको जब मारा तब वृत्रासुरके सभी अनुयायी भयसे कातर होकर समुद्रमें छिपे रहने लगे और रातके समय आकर ऋषियोंके यज्ञ ध्वंस करने लगे । उनको सताने लगे । इससे भीतिग्रस्त ऋषि अगस्तिफे पास आये और अगस्ति इस भयानक परिस्थितिका विचार करके सारा समुद्रही पी गये । साथ साथ सारे राक्षस भी अगस्तिके उदरस्थ हो गये तब अगस्तिने पिया हुवा समुद्र छोड़ दिया । प्राणों सह चूस लिये मैंने स्तन । पूतनाके ॥ ज्ञा० १०-२८८ ॥ कृष्ण नंद और यशोदाके पुत्रके रूपमें बढ़ रहा था और मथुरामें कंस उसको मार डालनेके षडयंत्र रचनेमें व्यस्त था । कंसने कृष्णको मारनेके लिये पूतनाकी योजना की । पूतना कंसकी बहन । कृष्णकी मौसी । पूतना सज धजकर अपने स्तनमें घोर विष लगाकर गोकुल गयी । इसने गोकुलके कई दूधमुहे बच्चोंको मार डाला । यह जैसे और घर गयी वैसे ही नंदके घर गयी । इसने प्रेमसे कृष्णको गोदमें लिया । कृष्णने भी सामान्य बच्चोंकी भांति इसके स्तन पकडे । इसने उसके मुखमें स्तन दिया और कृष्णने पूरी शक्तिके साथ स्तन चूसना प्रारंभ किया । पूतना तड़पने लगी किंतु कृष्ण स्तन छोड़ता ही नहीं, मुह हटानेकी बात ही नहीं करता । कृष्णने उसके प्राण भी सोक लिये । वह तड़प तड़प कर मर गयी । गिरिधर बन कूता आर्य । इंद्रकी महिमा ॥ ज्ञा० १०-२८९ ॥ छोटीसी आयुसे कृष्णने कई दैत्योंको मारा । इतना ही नहीं इंद्रका गर्व भंग भी किया । गोप सब मिलकर प्रत्येक वर्ष नया अन्न धान्य आते ही इंद्रके लिये अन्नकोटका इंद्रोत्सव करते थे । कृष्णने यह पद्धति बंद करायी और गोकुलका संरक्षक गोवर्धनगिरिका उत्सव किया । इससे क्रुद्ध इंद्रने गोकुल पर सतत जलवृष्टि की और जल-प्रलयकी विपत्ति आयी । तब कृष्णने अपने हाथसे गोवर्धन गिरिका छातासा आसरा बना कर सारे गोकुलकी रक्षा की । मिटाया कलिंदीका हृदय शूल । बचालिया ज्वालाग्रस्त गोकुल । बनाया मैंने ब्रह्माको पागल । बछडे बनाके ॥ ज्ञा० १०-२९० ॥ (१) कालिंदीके एक बड़े कुंडमें कहु कुछका कालिया नाग आ बसा था । वह इतना विषधर था कि उसके विषसे कालिंदीका पानी ही नहीं इर्दगिर्दकी हवा भी जहरीली बन गयी थी । इससे गाय और गोपालोंकी बड़ी क्षति हो रही थी । इसलिये कभी कोई उस ओर जाता ही नहीं था । भूखसे एक बार कई गोपाल अपनी गायें लेकर उस ओर गये और उस विषके प्रभावसे गायोंके साथ वहीं मर गये । इसका कारण जान कर तब कृष्ण कालिंदिके उस कुंडमें कूदे और ९५ परिशिष्ट ४

कालियासे लड़ कर उसको अधमरा कर दिया । कृष्ण उसको मारनेवाले ही थे किंतु उसीकी प्रार्थनासे उसको वहांसे उसके मूल स्थान भगा दिया और गायों तथा गोपाळोंको बचा लिया । ( २ ) महादेवके मनमें एकबार आया कि कृष्णकी सामर्थ्यकी परीक्षा देखनी चाहिए । उन्होंने सैकडो गाय और गोपाळोंको कहीं छिपा दिया और यहां कृष्णने ऐसे ही सैकडो गाय और गोपाळोंकी नयी सृष्टि की । एक वर्ष बीता । किसीको कुछ पता नहीं चला । तब महादेवने ही हार मानकर गाय और गोपाळ लौटा दिये । नहीं तो विचार कर देख अर्जुन । सन्यासी हो चुराई तूने बहन । किंतु विकल्प न हुआ मेरा मन । क्यों कि हम एक हैं ॥ ज्ञा० १०-२९४ ॥ कृष्ण कृष्णार्जुन-प्रेमकी एकता समझा रहे हैं । कृष्ण-बलरामकी बहन सुभद्रा, जब वह विवाह-योग्य हो गयी तब बलरामने अपना शिष्य दुर्योधनसे उसका विवाह करना सोचा । किंतु कृष्णके मनमें था अर्जुनसे उसका विवाह कर देना । अर्जुन तीर्थ-यात्रा करने गया था । वह तीर्थ-यात्रासे द्वारका आया । तब कृष्णने उसको संन्यासीके रूपमें बलरामका प्रेम प्राप्त करनेको कहा। यह संन्यासी “ अत्यंत विरक्त और तपोनिष्ठ होनेसे ” बलरामने इसे अपने घर पर ठा रखा । सुभद्राको उसकी सेवा करनेको कहा । ऐसी स्थितिमें एक बार सबने रैवतक पर्वत पर जानेका निश्चय कर सुभद्राको अर्जुनके रथ पर चढ़ाया । अर्जुनने कृष्णकी सूचना पाते ही रथ इंद्रप्रस्थकी ओर दौड़ाया । उसका पीछा करनेवाले सब हार गये । आगे सबको जब मालूम हो गया संन्यासी अर्जुन है तो सबको संतोष हुआ । उन प्रिय जनोंको भी छकाया । दस गर्भवास भी सहन किया । तूने विश्व-रूप नहीं दिखाया । किसीको भी ॥ ज्ञा० ११-३५ ॥ अंबरीष सूर्यवंशी राजा । वैवस्वत मनूका पोता । अत्यंत पराक्रमी और महान विष्णु-भक्त । एकादशी इसका व्रत था । एकादशीका उपवास करना और द्वादशीको प्रातःकालमें उपवास छोड़ना । उपवास छोड़ते समय एक द्वादशीको अतिथिके रूपमें दुर्वास ऋषि आये । “ आप नदी पर जाकर नित्य-कर्म करके भोजन करने आइए !” अंबरीषने प्राथमिक सत्कारके बाद प्रार्थना की दुर्वासा ऋषि नदी पर गये । किंतु समय पर नहीं आये । यहां द्वादशी अतिक्रांत हो रही थी । अर्थात् द्वादशी समाप्त हो त्रयोदशीका प्रारंभ होने जा रहा था । व्रतभंग न हो इसलिये अंबरीषने नैवेद्य करके देवपूजा समाप्त की और तीर्थ प्राशन करके व्रत-सांगता की । इस पर दुर्वास ऋषि क्रुद्ध हुए । उन्होंने अंबरीषके वधके लिये कृत्याका निर्माण किया और शाप दिया “ तू अनेक योनियोंमें जन्म लेगा !” कृत्या अब राजाका नाश करेगी इतनेमें भगवानके सुदर्शन चक्रने कृत्याका नाश किया और वह दुर्वासाके पीछे लगा । सुदर्शनसे बचनेके लिये दुर्वासा भागे । आगे आगे दुर्वासा पीछे पीछे सुदर्शन । कोई भी सुदर्शनसे दुर्वासाकी रक्षा नहीं कर सका । अंतमें दुर्वासा ऋषि भगवान विष्णुकी शरण गये । विष्णुने ऋषिसे कहा “ आप राजाके पास जाकर उससे क्षमा मांग लीजिये । अब तक वह आपके लिये उपवासी है ।” दुर्वासा ऋषि अंबरीषके यहां आया तो राजा ऋषिकी प्रतीक्षा में वैसे ही खडा था जैसे दुर्वासाके वहांसे भागते समय खडा था ! राजाने दुर्वासाका स्वागत किया । दुर्वासाने राजाकी क्षमा मांगी । राजाने सुदर्शनसे प्रार्थना की “ आप दुर्वासा ऋषिका पीछा छोडे !” सुदर्शनने दुर्वासाको छोडा । ज्ञानेश्वरी ९३

अंबरीष राजाको दुर्वासा ऋषिका पंक्तिकाम मिला। किंतु अनेक योनिमें जन्म लेनेका दुर्वासा ऋषिका शाप ? जिसके प्रतसे राजा व्रतस्थय था उस विष्णुने ले लिया और मत्स्य, कूर्म वराहादि हुए ! भक्तके लिये दस गर्भवास सहे!” “पहले होना था जब हमारा शहन” ॥ ज्ञा० ११-६०॥ जब कौरव और पांडव बडे हो गये तब घरमें नित नया झगडा होता था। एक दूसरेसे जलते कुढते रहते । धृतराष्ट्रने युधिष्ठिरको जो युवराज-पद दिया या वह दुर्योधनको खटका । तब दूरदर्शी धृतराष्ट्रने पांडवोंको कौरवोंसे दूर रखनेका निश्चय किया और उन्हें हस्तिनापुरसे दूर, वारणावत नगरमें जाकर रहनेकी आज्ञा दी। पांडव वारणावतमें रहने गये। वारणावत नगरमें पांडवोंके लिये जो भवन बनवाया था वह दुर्योधनने अत्यंत कपटसे लाक्षादि ज्वालाग्राही वस्तुओंसे बनवाया था । विदुरके ध्यानमें यह बात आयी। विदुरने बर्बर भाषामें युधिष्ठिरको यह सब बात बता कर वहांसे सुखरूप बाहर पडनेका गुप्त मार्ग भी बता दिया। घर बांधते समय ही विदुरने गुप्त रूपसे इसको बनवा दिया था। जब पांडव लाक्षागृहमें रहते ये तब वहां नित बडा दान धर्म चलता था। जो आता उसको भोजन मिलता। एक वृद्ध स्त्री एक दिन अपने पांच लडकोंको लेकर वहां आयी। रातको वह वहीं रही। विदुरसे उसी दिन सूचना आई “घरमें स्वयं आग लगा कर तुरंत घर छोड कर गुप्त-मार्गसे चले जाओ !” विदुरसे सूचना आते ही घरमें आग लगा कर पांडव गुप्तमार्गसे बाहर चले गये । आई हुई वृद्ध स्त्री अपने लडकोंके साथ जलकर वहीं मर गयी। उन छ लोगोंके जले हुए शव देख कर कौरवोंको लगा कि कुंती सह पांडव जल मरे। अर्जुन कहता है तब तूने ही बचा लिया । हिरण्याक्षुर दुराग्रहमें भरकर । मेरी बुद्धि-भूको बगलमें दबाकर । मोहार्णव सिंधुके गवाक्षसे अंदर । जा बैठा था ॥ ज्ञा० ११-६१ ॥ हिरण्याक्ष नामका राक्षस कभी पृथ्विको बगलमें दबा कर पातालमें जा छिप गया था। तब भगवान विष्णुने वराह-रूप धारण करके उसका वध किया और पृथ्वीकी स्थापना की। इस कथाकी उपमा लेकर अर्जुन अपने बुद्धि-भ्रमका वर्णन कर कहता है । पुत्रको पुकारता अजामिल । किया चिद्रूप ॥ ज्ञा० ११-१०४ ॥ कान्यकुब्ज देशमें अजामिल नामका एक ब्राह्मण रहता था। वह माता पिता पत्नी आदिका त्याग करके एक वेश्याके साथ रहता था। उससे वेश्याके कुछ बच्चे भी हुए थे । इनमें सबसे छोटे बच्चेका नाम नारायण रखा गया । मृत्युके समय पर यह नारायणको पुकारने लगा, जिससे विष्णुदूतोंने यमदूतोंको उस पर मृत्युपाश डालनेसे रोका। अजामिलने विष्णुदूत और यमदूतोंका यह संवाद सुना और विरक्त होकर उसने भगवन्नाम-स्मरणमें ही अपना आयुष्य बिताया। मरणोत्तर उसको परम गति मिली । अब तक शत्रुक्रा ही कलेवर । भूषण बना करमें ॥ ज्ञा० ११-१०५ ॥ कृष्णने सांदीपनी गुरुका मृतपुत्र ला दिया। उस समयकी एक घटना । पंचजन दैत्य शंखरूप धारण करके समुद्रमें छिप गया था। इससे लडकर कृष्णने इसका नाश किया और इसकी अस्थि- योंका शंख बनाकर हाथमें रखा । इसीलिये कृष्णके शंखको पांचजन्य कहते हैं। ९७ परिशिष्ट ४

द्वारपाल बना तू दान मांगकर । बलिके घरका ॥ ज्ञा० ११-१०६ ॥ प्रह्लादका पोता बलि । अत्यंत बलवान् । वैसे ही उदार और धर्मात्मा । देवोंसे उसका बार बार युद्ध होता और संजीवनीके कारण वह और उसके सैनिक जी उठते । उसने इंद्र-पदकी इच्छा करके सौ यज्ञ करनेका निश्चय किया और नवानवे यज्ञ पूरे किये । घबराये हुए देवोंने तब भगवान विष्णुकी प्रार्थना की और भगवान वामन बने । वामनने यज्ञमें आकर त्रिपाद भूमि दान में मांगी । बार बार गुरु शुक्राचार्यके विरोध करने पर भी बलिने वह दे दी। दानका पानी पड़ते ही वामन विराट हुए । उसने दो पादोंमें पृथ्वी और आकाश व्याप्त किया । “अब तीसरा पैर कहां रखूं ?” विराट वामनने प्रश्न किया । “मेरे मस्तक पर !” नत मस्तक बलि झुक गया !! तीसरे पादसे वामनने बलिको पातालमें दबा दिया । किंतु प्रसन्न होकर वर दिया “वैवस्वत मन्वंतर तक तू उपेंद्र और उसके बाद इंद्र बनेगा ।” “तब तक मैं तेरा द्वारपाल बनूंगा । सुदर्शन तेरी रक्षा करेगा !” कृतयुगसे पहले कार्तिक शुद्ध प्रतिपदाको यह दान दिया गया था । इसलिये उस दिनको बलिप्रतिपदा कहते हैं । इस भांति द्वारपाल बना तू दानमांगकर बलिके घरका । या मधुवनमें ध्रुवको जैसे । गंडस्थलको शंख लगानेसे । वेदमति कुंठित हो ऐसे । स्तवन किया उसने ॥ ज्ञा० ११-१८४ ॥ ध्रुवकी तपस्यासे प्रसन्न परमात्मा ध्रुवको दर्शन देने मधुवनमें दौड़ आया। ध्रुवने परमात्माका दर्शन किया । उसका स्तवन करना चाहा किंतु अज्ञान ! शब्द नहीं सूझता । तब भगवानने ध्रुवके कपोलोंको अपना शंख लगाया और ध्रुव वेदकी तुलनामें परमात्माका स्तवन करने लगा । आब्रह्म उदकसे जैसे व्याप्त था । अकेला मार्कंडेय ही तैरता था । विश्व-रूप विस्मयमें वैसे पार्थ । लगा लौटने ॥ ज्ञा० ११-१८७ ॥ मार्कंडेय ब्रह्मऋषि । अत्यंत तपस्वी, महान ज्ञानी, वैसा ही विरक्त । इसने परमात्माकी माया देखनेकी इच्छा की । भगवानने कहा “अच्छा !” जहां बैठा था वहांसे भयानक बवंडर छूटा । सारा विश्व जलमय हो गया । मार्कंडेय अकेला तैर रहा था तब उस जल-प्रलयमें एक वटपत्र पर छोटासा बालक तैर रहा है । उस बालकके श्वाससे मार्कंडेय ऋषि उस बालकके पेटमें पहुँच गये । वहां भी बाहरकी सृष्टिकी भांति और एक सुंदर सृष्टि थी वहां मार्कंडेय ऋषिका आश्रम था । वहां भी एक मार्कंडेय ऋषि बैठा था । बालकके श्वासके साथ बाहर आये । तब उसने देखा मैं आश्रममें बैठा हूं । न बवंडर न जल-प्रलय !! तब उसने सोचा जो जाना, देखा, वह सब माया है । क्षणिक है । तूने जब गो ग्रहणके समय । मोहनास्त्र छोड़ा तब धनंजय । भीरु उत्तरने भी होके निर्भय । विवस्त्र किया सबको ॥ ज्ञा० ११-४६९ ॥ कीचकवध होनेसे दुर्योधनको संदेह हुआ कि हो न हो पांडव विराट नगरमें ही हैं । तब उसने सोचा कि अज्ञातवासमें पांडवोंको पहचान कर उनको फिर वनवासमें भेजना चाहिए और दुर्योधनने विराटके यहांका गोधन हरण करनेकी योजना बनायी । कर्णादिको साथ लेकर दुर्योधन विराटराजाकी गायें ले चला । इस समय विराटराजा त्रिगतोंके राजा सुशर्मासे लड़ने गया था । समय देख कर ही दुर्योधनने घात किया था। जिस समय यह हमला हुआ उसी समय उत्तर-कुमार अपनी बहन उत्तराकी नृत्यशालामें था । उसने कहा “यदि मेरे साथ कोई अच्छा सारथी होता तो ज्ञानेश्वरी ९८

मैंने शत्रुओंकी दुर्गत की होती !" और बृहन्नडा-अर्जुन-सारथ्य करने तैयार हो गयी । तब निरुपाय हो कर उत्तरकुमार लड़ाईके लिये चल पड़ा । किंतु प्रत्यक्षमें शत्रुओंकी बड़ी भारी सेना देख कर कांपता हुवा पीछे दौड़ने लगा । अर्जुन तब इसको रथमें बांध कर स्वयं लड़ने लगा । सबको अर्जुनने मोहनास्त्रसे बेसुध कर दिया और उत्तर कुमारसे उन बड़े बड़े सेनानियोंके वस्त्राभरणादि विजय वैभव चिन्होंको लुटवाकर उसके सिरपर मुफ्तका विजय और कर्तृत्वका सेहरा बांध दिया । इस प्रज्ञासे शंकर । सिकुडकर सभी ओर करता राख घूस-खोर । मन्मथकी भी ॥ ज्ञा० १३-२५ ॥ भगवान् शंकर अपना कैलासका राज्य छोड़कर शशानमें जा तप करने लगा । तब उस तपका भी भंग करनेवाला मन्मथ-काम ! शंकरने अपने तृतीय नेत्रसे उसका नाश किया । ब्रह्मदेवके हृदयसे कामकी उत्पत्ति है । रति उसकी पत्नी । सबके तपो भंगमें यह आगे । कहते जिसे योगी-जन । सांख्य-योग अर्जुन । जिसको कहनेमें मान । हुवा मैं कपिल ॥ ज्ञा० १३-५५७ ॥ कर्दम ऋषि एक प्रजापति । मनु-कन्या देवहूति इसकी पत्नी । इनका पुत्र कपिल, विष्णुका अवतार माना जाता है । कपिलका जन्म सिद्धपुरमें हुवा । कपिलका जीवन-वृत्त तीसरे परिशिष्टमें आया है । कपिल सांख्यशास्त्रका आदि आचार्य माना जाता है । कपिल माताको ब्रह्मज्ञान देकर पातालमें जा बसा । या एक ही दृष्टि काग दोनों ओर । फिराता चातुर्यसे स अवसर । जिससे होता है भ्रम धनुर्धर । कागकी हैं दो आंखें ॥ ज्ञा० १५-१३५ ॥ अपने वनवासके दिनोंमें राम लक्ष्मण सीता किसी एक आश्रममें रहते थे । सीता वहीं सूखनेवाले अपने खाद्य-पदार्थोंकी रखवाली करते बैठी थी । तब वहां एक कौवा आ कर सीताको बड़ा तंग करने लगा । उनके हकालने पर भी नहीं जाता था । रामने तब क्रोधसे इषीकास्त्रके मंत्रसे वहीं पर पड़ा एक तिनका कौवे पर फेंका और वह तिनका उस कौवेके पीछे वैसे ही पड़ गया जैसे दुर्वासा ऋषीके पीछे सुदर्शन पड़ा था । फिर बेचारा हताश कौवा, रामकी शरणमें आकर अपने प्राणोंकी भीख मांगने लगा । रामको दया आ गयी । रामने कहा "यह अस्त्र व्यर्थ नहीं जाता । इसलिये यह तुम्हारी एक आंख फोडेगा ।" रामकी आज्ञासे उस तिनकेने कौवेकी एक आंख फोड कर कौवेको प्राणदान दिया । तबसे कौवा एकाक्ष कहलाता है और उसकी दृष्टि दोनों आंखोंमें काम करती है ! वह अज्ञान जब ज्ञानमें डूबता । तथा वह ज्ञान जो कीर्तिमुख होता ॥ ज्ञा० १५-५२७ ॥ दक्षिणमें प्रायः प्रत्येक मंदिरके गर्भ-गृहके दरवाजेमें, ठीक देहरीके ऊपर, बीचोबीच सिंहकी-सी एक कराल मुखाकृति रहती है । उसको कीर्ति-मुख कहते हैं । कीर्तिमुखके विषयमें स्कंद पुराणके शिवकांडके सत्रहवे अध्यायमें निम्न कथा है । शंकरकी तीसरी आंखकी अग्निसे जालंधर नामका एक राक्षस उत्पन्न हुवा । यह बड़ा शास्त्रवेत्ता था । "बिना शंकर भगवानके और किसीसे उसकी मृत्यू नहीं होगी तथा जहांसे आया ९९ परिशिष्ट ४

था वहीं विलीन होगा" ऐसा वर भी उसको मिला था। शुक्राचार्य इसका गुरु । उससे संजीवनी विद्या भी यह पा चुका था । परिणाम स्वरूप सारे ब्रह्मांड पर उसकी सत्ता हो गयी । सर्व सत्ताधीश जालंधर । जहाँ जो कुछ अच्छा हो वह सब उसके भोगका साधन होना चाहिए। उसने पार्वतीके सौंदर्यकी कथा सुनी। उसके मनमें आया "ऐसा स्त्री-रत्न मेरे पास होना चाहिए।" बस तुरंत उसने भगवान शंकरको आज्ञा दी "पार्वतीको तुरंत हमारे पास पहुँचा दो !" जालंधरकी यह आज्ञा राहू वहां ले गया था। राहूसे जालंधरका संदेशा-उदंडता भरी आज्ञा-सुनते ही भगवान शंकर क्रुद्ध हुए। उनकी तीसरी नेत्रसे सिंहमुखका एक विकराल पुरुष निर्माण हुआ । राहू उससे पराजित होकर भागता भागता जालंधरके पास आया। जालंधर भी अपनी दैत्य-सेना लेकर युद्ध करने गया। वह कराल पुरुष जालंधरादि राक्षसोंको निगल गया। किंतु उसकी भूख नहीं मिटी। शंकरने उस पुरुषका भी शिरश्छेद किया और उस मुखको अपनाही शरीर खानेकी आज्ञा दी। मुखने शरीर खाया और जो मुख रहा वह कीर्ति-मुख कहलाया। प्रत्येक शिवालयमें यह कीर्तिमुख रहता है। इसका दर्शन करनेके बाद शिव-दर्शन । यह शिवाज्ञा है। जैसे कीर्तिमुखने प्रथम सभी राक्षसोंको खाकर अपना शरीर भी खाया वैसे ज्ञान अज्ञानको निगलकर स्वयं नष्ट होता है यह इस छंदमें कहा गया है। मुझ चैतन्य शंभुका माथा। जो गीता तत्व था वह पार्था । उसका गौतम बन आस्था । निधि तू आया ॥ ज्ञा० १५-५७९ ॥ नासिक जिलामें ब्रह्मगिरीके पास गौतम ऋषिका एक आश्रम है। उस आश्रममें गौतम ऋषिके कई शिष्य भी रहते थे । गौतमके उन शिष्योंमें गणपति भी घुस गया ! गौतमके शिष्योंमें ऐसे घुस जानेका गणपतिको भी एक प्रयोजन था। सदैव शंकरके सिरपर गंगा ! पार्वतीको यह अच्छा नहीं लगता था। पार्वती गंगाको शिवके सिरपरसे नीचे उतारना चाहती थी । इसलिये पार्वती ने गणपति को यह काम दिया था। गणपतिने जया नामकी एक स्वर्गीय स्त्रीकी सहायता ली। जया गाय बनी। गाय खेत चरने लगी। कोई गाय ऋषिका अन्न खाती है यह देखकर गौतमने एक दर्भ उस गाय पर फेंक दिया। दर्भ लग गाय मर गयी । हां हां कहते गोहत्या हो गयी ! "गोहत्याका पातक अब कैसे मिटेगा !" गौतम सोचने लगा। गणपति सलाह देने आये । "शिवसे गंगा मांग लीजिये ! गंगा आयी कि गंगा स्नान कीजिये !" गोहत्याके पाप-क्षालनके लिये गंगावतरण आवश्यक था। गौतम ब्रह्मगिरि पर तपस्या करने लगे। शिवजी प्रसन्न हुए। जटाकी गंगा मुक्त हुई । गंगाद्वारसे, शिव-जटासे-मुक्त हो कर वह कुशावर्तमें गिरती हुई आज भी दिखायी जाती है । जैसे रंभाके भी अनेक रूप। न जगा सके शुकमें कंदर्प । या राखमें न होती उहीप। घृतसे भी आग ॥ ज्ञा० १६-१२८ ॥ व्यास पुत्र शुक। जन्मता महा-ज्ञानी, विरक्त । उसका तपोभंग करनेकेलिये इंद्रने रंभाको भेजा था किंतु शुकके तपाचरण पर रंभाका कोई भी प्रभाव नहीं पड़ा । ज्ञानेश्वरी १०९

त्रिगुण-पुरमें जो घिरा गया । जीवत्व-दुर्गमें अटका गया । आत्मा-शंभुने वह छुडा लिया । तेरे स्मरणसे ॥ ज्ञा० १७-२ ॥ मयासुर शिल्पका आचार्य । ब्रह्माके वरसे इसने अजेय ऐसे तीन नगर बसा लिये । लोह-नगर, रजत-नगर, स्वर्ण-नगर । एकके ऊपर एक । एकके अंदर एक । इसको त्रिपुर कहा करते थे । मयासुरके बाद उसके अनुयायियोंने इस अभेद्य नगरकी सहायतासे देवोंको खूब सताना प्रारंभ किया । सभी देव तब शंकर भगवानके पास गये । शंकर भगवानकी प्रार्थना की । सब देवोंको साथ लेकर शंकर भगवान त्रिपुर पर चढ़ाई कर गये । किंतु जाते समय सर्वप्रथम गणपति पूजन नहीं किया था । इससे त्रिपुर-विजय नहीं हुआ । वहीं घिर गये । तब, सबने वहां गणपति पूजन कर युद्धारंभ किया और शंकर भगवान त्रिपुरोंका संहार कर सके । ज्ञानेश्वर महाराजने गणपतिरूप गुरुवंदन करते समय यह कथा सुनाई है । प्रथम आया वैराग्यका गरल । उसको दिया धैर्य-शंभुने गला । तभी होता ज्ञानामृतका निर्मल । महदानंद ॥ ज्ञा० १८-७८९ ॥ समुद्र-मंथनमें प्रथम हलाहल विष आया वैसे ही जीवन-मंथनमें प्रथम वैराग्य आता है । वहां इस हलाहलको शंकरने गलेमें धारण कर लिया । यहां पर धैर्य ही वह शंकर है । धैर्यसे वैराग्यके झटके सहने पड़ते हैं । इसके बाद जैसे वह अमृत कुंभ निकला वैसे यहां निर्मल ज्ञानामृतका महान आनंद मिलता है । जीवनकी आध्यात्मिक साधनाको दर्शाते समय पौराणिक कथाकी उपमा दी है । जैसे है छठीकी रात । नहीं भूलते हैं ज्योत । वैसे ईश्वरकी बात । चित्तमें रखना ॥ ज्ञा० १८-८३७ ॥ बच्चा पैदा होनेपर छठी रातको छठीकी पूजा करते हैं । विश्वेशस्य जन्मदानां जीवन्यपर- नाम्न्याः षष्ठीदेव्याः शस्त्रागर्भाभगवत्याश्च पूजनं करिष्ये । यह पूजाका संकल्प होता है । इसके बाद पटलेपर चावल, उसपे चार पूगीफल-सुपारी-रखकर जीवंति, षष्ठी, शस्त्रागर्भा भगवती ऐसी तीन देवियोंकी प्रतिष्ठा करते हैं । एक हंसिया रेशमी कपड़ेमें लपेटकर सूपमें रखा जाता है । फिर- गौरीपुत्रो यथा स्कंदः शिशुत्वे रक्षितः पुरा । तथा ममाप्ययं बालः षष्ठिके रक्षतां नमः ॥ ऐसी प्रार्थना की जाती है । और रात भर ज्योति जलती रखी जाती है । क्यों कि कहीं अंधेरेमें छठी बालकका घात नहीं करे । अमरत्व परोसा पानमें । कारण हुआ था मृत्यु लानेमें । न जान कर भोग भोगनेमें । होता है ऐसा ॥ ज्ञा० १८-१४७८ ॥ समुद्रमंथनमेंसे जब अमृत निकला तब वह देव और दानव दोनोंके अधिकारका था । किंतु दानवोंको अमृत देकर अमर करना लोक-क्षयकारी होगा इस विचारसे विष्णूने मोहिनीके रूपमें अमृत-कलश लूटा । इसके बाद देव और दानव भोजनके लिये-अमृतपानके लिये-सामने सामने बैठे । मोहिनीके रूपमें विष्णु देवोंको अमृत परोसने लगा । उसी समय राहू नामका दैत्य धोखा देकर देवोंकी पंगतमें बैठ गया । साथ साथ उसने अमृतपान भी किया किंतु अमृत गलेके नीचे उतरनेके पहले ही सूर्य और चंद्रने उसको पहचान लिया और विष्णुने सुदर्शनसे उसका शिरच्छेद किया । १०१ परिशिष्ट ४

नहुष हुवा जो स्वर्गाधीश्वर । किंतु भूला वहांका व्यवहार । जिससे सर्प हुवा पृथ्वीपर । जानता है तू ॥ ज्ञा० १८-१४७९ ॥ पुरूरवाका पोता राजा नहुष । अत्यंत पराक्रमी । सद्गुणी । ब्रह्महत्याके पापके कारण जब इंद्रको इंद्रत्वसे हटना पड़ा तब देवऋषियोंने मिलकर नहुषको इंद्र बनाया । और नहुष "शानसे" रहने लगा । नहुषकी इस शानमें इंद्राणीकी न्यूनता खटकने लगी । इंद्रके साथ इंद्राणीका होना आवश्यक है । नहीं तो इंद्रपदकी शान कहां ? उसने तुरंत इंद्राणीको अंतःपुरमें आनेकी आज्ञा दी । इस आज्ञाने धर्म-संकटका काम किया । यह संकट टालनेके लिये इंद्राणीने अत्यंत चतुरतासे "कृपया अपूर्व वाहनमें बैठकर मुझे ले जानेके लिये पधारिये ।" ऐसा संदेश भेज दिया । अब नहुष अपूर्व वाहनका विचार करने लगा । वह सप्तऋषियोंको रथमें जोत कर उस "अपूर्व वाहन" में इंद्राणीको लानेके लिये जाने लगा । नहुषको जल्दीसे जल्दी वहां पहुंचनेकी पड़ी थी और बेचारे वृद्ध ऋषि रथ खींचकर जल्दी नहीं चल रहे थे । राजाने उनको “सर्प सर्प” जल्दी जल्दी कहते हुए लात मारना प्रारंभ किया । इस पर अगस्तिने क्रोधमें आकर शाप दिया कि "तू अब अजगर सर्पयोनिमें जा !” और नहुष रथमें ही अजगर बनकर भूमीपर गिर पडा । कोई पद मिलना कठिन नहीं किंतु योग्यता पूर्वक उसको संभालना कठिन है यह समझाते हुए ज्ञानेश्वर महाराजने ऊपरकी कथा कही है । अथवा यहु गीता सप्तशती । जो मंत्रप्रतिपाद्या भगवती । मोह-महिषासुरसे मुक्ती । आनंदती है ॥ ज्ञा० १८-१६८८ ॥ महिषासुर रंभासुरका पुत्र । घोर तपस्या करके इसने ब्रह्मदेवसे पुरुषसे मृत्यु न होनेका वर ले लिया । उसके बाद यह देवोंको तंग करने लगा । प्राणिमात्रका पीडन इसका कार्य । तब आदि शक्तिने उसको युद्धके लिये प्रवृत्त करके उसका वध किया । महिषासुरने आदि शक्तिको सामान्य स्त्री मानकर उसको मोहित करनेका प्रयत्न किया किंतु वह सब व्यर्थ था । श्रीगुरुके नामसे मृत्तिका । मूर्ति रख वनमें विद्याका । रोव कर डंका श्रेष्ठताका । बजाया भिल्लने ॥ ज्ञा० १८-१७३० ॥ हिरण्यधनु नामका एक भिल्ल-राज था । उसका पुत्र एकलव्य । वह अत्यंत बुद्धिमान् था । अस्त्र-विद्या सीखनेके लिये वह द्रोणाचार्यके पास गया । किंतु द्रोणाचार्यने वह भिल्ल होनेसे उसको अस्त्र-विद्या सिखाना अस्वीकार कर दिया । तब उसने द्रोणाचार्यकी पादुकाएं मांग लीं, वनमें जाकरके मिट्टीसे द्रोणाचार्य की एक मूर्ती बनायी और उसके सामने धनुर्विद्याका अभ्यास करने लगा । तथा इस अभ्यासमें वह इतना प्रवीण हुवा कि कोई भी उसकी समानता नहीं कर सकता था । द्रोणाचार्यका सर्व श्रेष्ठ शिष्य अर्जुन ! इसने भी एकलव्यकी श्रेष्ठता स्वीकार करली । ॐ ज्ञानेश्वरी १०२

परिशिष्ट पांचवा इस परिशिष्टमें ज्ञानेश्वरीके कुछ शब्दोंकी विस्तृत जानकारी दी है। इन शब्दोंकी पूर्ण जानकारीके बिना ज्ञानेश्वरीका ही नहीं भारतीय तत्त्वज्ञानका, अथवा चिंतन पद्धतिका मर्म समझना असंभव सा है और इन शब्दोंके विषयमें अनेक प्रकारकी गलत धारणायें भी बनी हुई हैं इसलिये विषयका ज्ञान होनेकी दृष्टिसे इन शब्दोंकी कुछ अधिक जानकारी देना आवश्यक समझा गया।

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परिशिष्ट पांचवा अंतःकरण—करणका अर्थ है इंद्रिय । अर्थात् अंतःकरणका अर्थ अंदरका इंद्रिय ऐसा होता है । इंद्रियोंके दो प्रकार होते हैं । जैसे बाह्यचक्षु अंतरचक्षु । बाह्य इंद्रियां बाहरी विषयका ज्ञान करा देती हैं । प्रांपंचिक ज्ञानका साधन बनती हैं किंतु अंतर्विषयोंके ज्ञानका क्या साधन ? वह है अंतःकरण । इसी अंतःकरणके कारण सुख, दुःख, राग, द्वेष, आदिका ज्ञान होता है । यह अंतःकरण बाह्य इंद्रियोंको—ज्ञानेंद्रिय और कर्मेंद्रियोंको—नियंत्रित करता है । दार्शनिक दृष्टिसे यह अंतःकरण दर्पणकी भांति होता है अथवा जलाशयकी भांति होता है । जैसे स्वच्छ दर्पणमें किसीका स्पष्ट प्रतिबिंब पड़ता है, या तरंग रहित शांत जलाशयमें विश्व प्रतिबिंबित होता है वैसे शुद्ध निर्मल अंतःकरणमें ब्रह्म प्रतिबिंबित होता है । मन, बुद्धि, चित्त, और अहंकार मिलकर अंतःकरण होता है । संदेह, निश्चय, स्मरण और अभिमान इनके विषय हैं । अक्षर—न + क्षर = अक्षर । जिसका क्षय नहीं होता, जो नहीं घुलता, गलता, वह अक्षर है । अक्षरमें किसी प्रकारका विकार नहीं होता । परिवर्तन नहीं होता । वह नित्य है । सदैव एकसा रहता है । वह भावोंसे परे, गुणोंसे परे, अर्थात भावातीत= निर्भाव, गुणातीत= निर्गुण, आकारा- तीत= निराकार ऐसा है । वेदांतके मतसे यही परब्रह्म है । गीतामें भी अक्षर शब्द इसी अर्थमें आया है । ओंकार, वेदसार, ईश्वरवाचक नाम, इसी अर्थमें गीतामें यह शब्द आया है । अर्थात ज्ञानेश्वरीमें यह शब्द इसी अर्थमें लिया गया है । इसी अर्थका और एक शब्द अव्यय भी आया है । न + व्यय=अव्यय । अक्षौहिणीसेना—महाभारतयुद्धमें कुल अठारह अक्षौहिणी सेना थी । पांडवोंकी सात अक्षौहिणी सेना और कौरवोंकी ग्यारह अक्षौहिणी सेना । अक्षौहिणी इस सेना विभागमें २१८४० रथ, उतने ही हाथी, ६५६१० घोडे, तथा १०९३५० पादचारी सैनिक होत थे । प्रत्येक रथ, हाथी, तथा घोडेके साथ ५ पैदल सैनिक रहा करते थे । कुल मिलाकर एक अक्षौहिणी सेनामें २१८७०० सैनिक होते थे । जिसके आधीन यह सेना होती थी उसको अक्षौहिणीपति कहा जाता था । अज्ञान—अविद्याकी जो बात वही अज्ञानकी बात है । गीताके, ज्ञानेश्वरीके तेरहवे अध्यायमें–विस्तारपूर्वक इसके लक्षण कहे गये हैं । इसका लक्षण कहते समय " जो अनादि अनंत है, नित्य है उस पर परदा डालनेवाला तत्व अज्ञान है" ऐसे कहा गया है । गीतामें " आत्मज्ञान को ही नित्य कहा है । इस बोधको ज्ञान और उसके विपरीत सबको अज्ञान कहा है । " आत्मविषयक अज्ञानके कारण ही मनुष्य अपूर्णताका अनुभव करता है और अपूर्णताके अनुभवसे वह विषयोंके (8) १०५ परिशिष्ट ५

पीछे दौड़ता है। इस अज्ञानसे अविवेक, अविवेकसे अभिमान, और अभिमानसे राग-द्वेषादि द्वंद्व परंपरा प्रारंभ होती है। इसीसे कर्मचक्र और जन्म मरणका चक्र, चलता रहता है। ज्ञानसे अज्ञान नष्ट होता है। ज्ञान एक चिनगारी है जो अज्ञानका सारा कूड़ा जला कर राख कर देता है किंतु जब तक कूड़ा है तब तक आग जलती रहती है। जब तक अज्ञान है तब तक ज्ञान रहता है। जैसे कूड़ा जला कर आग स्वयं बुझ जाती है वैसे अज्ञानको नष्ट करके ज्ञान भी नष्ट हो जाता है। यही सहज स्थिति है। ज्ञानेश्वर महाराजकी दृष्टिसे ज्ञानाज्ञानसे परेकी अवस्था मुक्तावस्था है। सामान्य जीवन ज्ञानाज्ञानका कल्लोल है। सद्गुरु ज्ञान देता है अर्थात् कूड़ेके ढेर पर चिनगारी रखता है। इसीका नाम दीक्षा है। उस कूड़ेको जलाना साधना है। कूड़ेके साथ आगका भी बुझ जाना सिद्धि ! अद्वैत—जिसमें द्विधा-भाव नहीं वह अद्वैत है। जगद्गुरु श्रीआद्य शंकराचार्य इस अद्वैत दर्शनके आद्य आचार्य माने जाते हैं। "केवल ब्रह्म ही सत्य है और सारा असत्य है यही वेद उपनिषदादिमें कहा है" ऐसे आद्य शंकराचार्य कहते हैं। केवल ब्रह्म सत्य है। दीखनेवाला यह नामरूपात्मक जगत् मिथ्या है। जीव और ब्रह्म एक है। यह आद्य शंकराचार्यका सिद्धांत है। किंतु ज्ञानेश्वर महाराज दीखनेवाले नामरूपात्मक जगतको मिथ्या न मानकर ब्रह्मका स्फुरण मानते हैं यह स्फुरण सिद्धांत ज्ञानेश्वर महाराजका स्वतंत्र आविष्कार है। जैसे बीजसे वृक्षका स्फोट होता है, शरीरसे रोमावलीका स्फुरण होता है वैसे ब्रह्मसे ब्रह्मांडका स्फोट या स्फुरण हुआ है। ब्रह्म जमा हुवा घी तो ब्रह्मांड पिघला हुवा घी है। यह सारा, जो कुछ हम देखते हैं वह सब आत्माका विस्तार है। यह सारी विविधता आत्माका ऐश्वर्य योग है। इसका बोध ही आत्मबोध है। ज्ञानेश्वरी और अनुभवामृतमें इसीको विस्तारपूर्वक कहा गया है। अनादि—जिसका कोई आदि नहीं। जो कबसे है यह नहीं कहा जाता वह अनादि है। ब्रह्मका परिचय देते समय "अनादि अनंत" ऐसे दो शब्द आते हैं। अनादि अनंतका अर्थ देश- कालमें न आनेवाला, बिना ओर छोरका अथवा देशकालातीत ऐसा मान सकते हैं। ब्रह्मके साथ मायाको भी अनादि कहा गया है क्यों कि मायाका अपना कोई अस्तित्व नहीं है। जिसका अस्तित्व ही नहीं उसका भला आदि कैसे? वैसे ही जो है ही नहीं उसका अंत कहां? माया अस्तित्व हीनताके कारण अनादि है किंतु ब्रह्मका अस्तित्व हो कर भी वह अनादि है। अनंत है। अर्थात् बिना ओर छोरका है। ब्रह्म शब्दका अर्थ है बृहत, बडा; इतना बडा कि कोई भी उसको आच्छादित नहीं कर सकता, उसका आदि अंत नहीं नाप सकता। उसका ओर छोर नहीं पा सकता। अनादि शब्दमें आद्य तथा स्वसंबेद्य इन शब्दोंका भाव समाया हुवा है। अनाहतध्वनि—योग-विद्यामें छ चक्रोंका विवेचन है। इसको षट्चक्र कहा गया है। वे छ चक्र हैं (१) मूलाधार (२) स्वाधिष्ठान (३) मणिपूरक (४) अनाहत (५) विशुद्धि (६) आज्ञाचक्र। इसमें अनाहत हृदय-स्थानमें है। वह रक्तवर्ण है। बिना किसी ताडनाके, प्रेरणाके वह शब्द-प्रत्यय देता है। इसलिये वह अनाहत चक्र है। अनाहत चक्रमें शब्द-ब्रह्मका बिना किसी आघातके, अनुभव होता है। इसको अनाहत ध्वनि कहते हैं। ज्ञानेश्वरी १०६

नाद आकाश तत्त्वका गुण है। यह दो प्रकारका होता है। एक आघात-जन्य दूसरा बिन आघातके । हृदय चैतन्यका स्थान है। इसीमें शुद्ध-आकाशका एक स्थान है। वहाँ सदैव बिना आघातके ही नाद गूंजता रहता है। किंतु बाह्य-विषयोंमें फंसा हुआ मनुष्य उसको नहीं सुन सकता । योगी लोग इंद्रियोंको अंतर्मुख करके वह नाद सुननेका अभ्यास करते हैं। कुंडलिनी शक्ति जगने पर ही यह ध्वनि आने लगती है। कुंडलिनी शक्ति हृदय कमलके पास-अनाहत चक्रके पास-आनेपर, दस प्रकारसे यह अनाहत ध्वनि सुनाई देती है । चिणी, चिणचिणी, घंटा, शंख, तंत्री, ताल, वेणु, मृदंग, भेरी, और मेघ ध्वनि । इसके बाद, आज्ञाचक्रके पास जाने पर वही सोऽहम् शब्द, ओंकार नादमें परिवर्तित होता है। नाद अथवा ध्वनि अव्यक्त परतत्वके व्यक्तिकरणकी सूचना है। परा-वाणीमें सूक्ष्म रूपसे निहित यही शब्द अपरावाणीमें आकर सदैव हृदयमें गूंजने लगता है। इसका रूप ॐ है। यही ब्रह्मांडका मूलतत्त्व है। यह नाद अनाहत रूपसे व्यक्तिके हृदयाकाश तथा विश्वाकाशमें एकरूपसे गूंजता रहता है। इस गूंजनकी एकताका अनुभव ही सोऽहं भाव है। सदैव इस सोऽहं भावमें डूबा रहना ही अद्वैतस्थिति अथवा ब्राह्मी-स्थिति है जो सब प्रकारकी साधनाओंकी परम-सिद्धि है ! अपान—मनुष्यमें पांच प्रकारके प्राण होते हैं। इन्हें पंच-प्राण कहा जाता है । (१) प्राण (२) अपान (३) व्यान (४) उदान (५) समान ये उनके नाम हैं। शरीरमें उनका भिन्न भिन्न स्थान और काम है। हठयोगमें इसका विस्तृत विवेचन किया गया है। अपान वायु अधोमुखी होता है। मलमूत्रादि बाहर ढकेलना इसका सामान्य काम है। उपनिषदोंमें इसका स्थान नाभी कहा गया है। अन्नादिके निस्सार भागको नाभीके नीचे ढकेलना, मूत्र शुक्रादिको बहाना इसका कार्य है । किंतु योगी, योग विद्यासे इसको ऊर्ध्वमुख करके अपनी सुप्त शक्तिको जगाते हैं । अपानको ऊर्ध्वमुख करके प्राण और अपानको मिलानेसे मनुष्योंमें नयी शक्ति जगती है। अमृत—जिसको पीनेसे मृत्यु नहीं होती वह अमृत । इसको पीयूष, सुधा आदि भी कहा गया है। समुद्र मंथनसे अमृतकी प्राप्ति हुई । यद्यपि देव और दानव दोनोंने समुद्र मंथन किया था अंतमें देवोंको ही अमृत मिला। दैत्योंको नहीं मिला। यह पौराणिक कथा है। किंतु वैदिक “ऋषिकी प्रतिभा=अमृत” रहस्य जाननेके लिये स्वर्ग-मृत्यु पातालका अतिक्रमण करती है। उपनिषद् “ मृत्योर्मामृतं गमय ” कहते हैं। उपनिषद् अमृत न कहकर अमृतत्व कहते हैं। वह है जन्म मरणका अतिक्रमण करके पानेवाली स्थिति। जिसे पीनेसे मरण ही नहीं तब भला पुनर्जन्म कैसे ? अर्थात् ज्ञानेश्वर या ज्ञानेश्वरीका अमृत या अमृतत्त्व जन्म-मरण रहित मुक्तावस्था है। अरणी—दो लकड़ीके टुकड़ोंके घर्षणसे यज्ञाग्निका निर्माण किया जाता है। इसके लिये पीपलकी लकड़ी काममें लायी जाती है। इन लकड़ीके दो टुकड़ोंमेंसे जो नीचेका टुकड़ा रहता है उसे अधरारणी कहते हैं तो ऊपरके टुकड़ेको उत्तरारणी कहते हैं। अधरारणीमें खांच करके जो लकड़ीका टुकड़ा बिठाते हैं उसको मंथा कहते हैं। ऋग्वेदमें इस प्रकारके अग्निस्फोटका वर्णन आता है। अर्धमात्रा—ॐकारकी साढ़ेतीन मात्राओंमें अर्धमात्रा । योग-शास्त्रमें परा ब्रह्मांडमें मूर्धन्याकाशका भाग। आज्ञाचक्र, जो भृकुटीमध्यमें होता है और सहस्रार ब्रह्मरंध्र सहस्रदल- लाखमें होता है, इसकी मध्यसंधि है। ज्ञानेश्वरीके छठे अध्यायमें इसका विस्तृत विवेचन है। १०७ परिशिष्ट ५

अवभृथ—यज्ञादिके बाद समारोह पूर्वक जो सामूहिक स्नान होता है उसे अवभृथस्नान कहते हैं । दक्षिणके जन-जीवनमें यह अत्यधिक प्रचलित है। जैसे मंदिरोंमें होनेवाले रथोत्सवादि उत्सवानुष्ठान, भजन-सप्ताह,—सात दिन तक चलनेवाले भजनानुष्ठान-संपन्न होनेके बाद लोग आनं- दोत्सव पूर्वक गुलाल उछालते हैं। हल्दी और चूना मिलाया हुवा लाल पानी बना कर उस पानीसे खेलते हैं। वह पानी उछाला जाता है । एक दूसरे पर उंड़ेला जाता है। उसके बाद ऐसे ही गीले कपड़ोंसे उछलते कूदते, नामस्मरणकी गर्जना करते, गांवके बाहरके जलाशय पर स्नान करने जाते हैं। वहां स्नान करके वैसे ही भगवन्नाम-गाते मंदिर आते हैं । ऐसे समय अधिकतर पालकी उत्सवमूर्ति-साथ होती है। इसको ओकली भी कहा जाता है । अविद्या—विद् धातुसे विद्या शब्द बना है। विद् का अर्थ है जानना । इस पर अविद्याका अर्थ नहीं जानना ऐसा है। किंतु दर्शन-शास्त्रमें “असत् प्रकाशन शक्ति” माना गया है । अर्थात् सत्यको नहीं जानना ही असत्‌का प्रकाशन है। इस शक्तिके दो रूप हैं। (१) सत् को छिपाना । सत् पर परदा डालना (२) उसपर दूसरी वस्तुका आरोप करना या संभ्रम निर्माण करना । आत्माके नित्यत्वको-आत्मबोधको छिपाना तथा शरीरभावको दिखाना । यह अविद्याका कार्य है । अष्टमहासिद्धि—(१) अणिमा-शरीरको अत्यंत सूक्ष्म बना लेना—(२) महिमा— शरीरको बडा और भारी बना लेना। (३) लघिमा-शरीरको अत्यंत हलका बना लेना—(४) प्राप्ति-प्रत्येक इंद्रियकी एक अधिकारी देवता है। जैसे कानके-दिशा, नेत्रका सूर्य, जीभका वरुण, नाकका अश्विनी, त्वचाका वायु, मुखका अग्नि, हाथका इंद्र, पायका उपेंद्र, लिंगका प्रजापति, गुदाका यम, अपनी इंद्रियोंकी अधिष्ठात्री देवताओंसे संबंध जोड़ना—(५) प्राकाम्य-इस विश्व तथा परलोकके अदृश्य विषयोंका ज्ञान प्राप्त करना । (६) ईशिता-ईश्वरी शक्तिकी उसके अंशोंकी अन्यान्य स्थान और व्यक्तियोंमें जो जो सत्ता है उस पर स्वामित्व पाना । ईश्वरी सत्ता या प्रभावकी प्राप्ति । (७) वशिता-भोग भोगते हुए भी अनासक्त रहनेकी शक्ति । (८) प्राकाम्य-जिस सुखकी इच्छा करें उसकी अमर्याद् प्राप्ति ! अष्टलोकपाल—आठ दिशाओंके आठ स्वामी-(१) पूर्वका इंद्र (२) आग्नेयका अग्नि (३) दक्षिणका यम (४) नैऋत्यका नैऋति (५) पश्चिमका वरुण (६) वायव्यका वायु (७) उत्तरका कुबेर (८) ईशान्यका ईश । अष्टसात्विक भाव—ईश्वरीय भक्तिसे जब हृदय भर जाता है तब उसके जो परिणाम शरीर पर स्पष्ट दीखते हैं उनको अष्ट-सात्विक भाव कहा जाता है । वे इस प्रकार हैं—(१) स्तंभ=स्तब्धता (२) स्वेद=शरीरके रोमरोमसे स्वेदकण प्रस्फुटित होना (३) रोमांच=शरीरके रोमरोम खिल उठते हैं (४) स्वरभंग=स्वर बदलना, गद् गद् होना (५) कंप=शरीर कांपना, सिहर उठना (६) वैवर्ण्य=चेहरेका रंग बदलना-ऐसे समय-या तो चेहरा लाल हो जाता है या फीका पडता है (७) अश्रुपात=आंखोंसे आनंदाश्रु स्रवना (८) प्रलय=भाव समाधि, शरीर निश्चेष्ट होना । ज्ञानेश्वरी १०८