ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
रुद्राणां शंकरश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् । वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम् ॥ २३ ॥ मैं हूँ रुद्रोंमें शंकर । कामसे जिसका वैर । निःसंशय धनुर्धर । निष्भ्रांत मान तू ॥ २५ ॥ यक्ष-रक्ष गणमें विख्यात । शंभुका मित्र जो धनवंत । वह कुबेर मैं हूँ अनंत । कहने लगा ॥ २६ ॥ वैसे ही मैं वसुओंमें । अग्नि हूँ जान मनमें । सर्वोव्य मैं शिखरोंमें । मेरू हूं गिरीश जो ॥ २७ ॥ पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिं । सेनानिनामहं स्कंदः सरसामस्मि सागरः ॥ २४ ॥ महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् । यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः ॥ २५ ॥ स्वर्ग सिंहासन सहायक । सर्वश्रेष्ठ सर्वज्ञ जो नेक । पुरोहित स्वर्गका प्रमुख । मैं वह बृहस्पति ॥ २८ ॥ त्रिभुवनका श्रेष्ठ सेनापति । कहलाता स्कंद जो महामति । अग्नि कृत्तिका जान जो विभूति । शिव वीर्य से ॥ २९ ॥ विश्वके सकल सरोवरमें । जल राशिमें समुद्र रूपमें । तपोराशि हूँ मैं महर्षियोंमें । कहलाता भृगु मुनि ॥ ३० ॥ सकल अक्षरोंमें जो है श्रेष्ठ । जहां सत्योत्कर्ष परमोत्कट । ज्ञानी जन जिससे एक निष्ठा । वह ओंकार मैं हूँ ॥ ३१ ॥ कुबेर यक्ष रक्षोंमें रुद्रोंमें मैं सदाशिव । मेरू मैं गिरि-मालामें अग्नि मैं वसु वर्गमें ॥ २३ ॥ बृहस्पति मुझे जान पुरोहित प्रधान जो । स्कंद सेनाधिपोंमें मैं समुद्र जल-राशिमें ॥ २४ ॥ मैं एकाक्षर वाणीमें भृगु मैं ऋषि-वृंदमें । जप हूं सब यज्ञोंमें स्थावरोंमें हिमालय ॥ २५ ॥ ज्ञानेश्वरी ३२०
जो है समस्त यज्ञोंमें । जपयज्ञ मैं लोकमें । कर्म-त्याग प्रणवादिमें । नित्य होता ॥ ३२ ॥ अजी ! जप यज्ञ जो परम । बांध न सकते यज्ञादि कर्म । नामसे पावन धर्म-अधर्म । परब्रह्म वेदार्थ ॥ ३३ ॥ स्थावरोंमें जो पर्वत । पुण्य रूप रहा स्थित । पुण्य-पुंज हिमवंत । मैं हूँ जान तू ॥ ३४ ॥ अश्वत्थः सर्ववृक्षाणाम् देवर्षीणां च नारदः । गंधर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलोमुनिः ॥ २६ ॥ उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम् । ऐरावतं गजेंद्राणाम् नराणां च नराधिपम् ॥ २७ ॥ कल्पद्रुम औ' पारिजात । गुणमें चंदन है ख्यात । फिर भी वृक्षोंमें अश्वत्थ । मेरी विभूति है ॥ ३५ ॥ देवऋषियोंमें मुझे पार्थ । जानना तू नारद यथार्थ । तथा गंधर्वोंमें चित्ररथ । मुझे ही जान ॥ ३६ ॥ सभी सिद्धोंमें महासिद्ध । कपिलाचार्य जो प्रबुद्ध । तुरंगोंमें जो हैं प्रसिद्ध । उच्चैःश्रव मैं ॥ ३७ ॥ गजोंमें मैं हूं राज-भूषण । ऐरावत स्वर्ग-भूषण । पय-राशि कर मंथन । निकाला अमृतांश ॥ ३८ ॥ यहां मैं नरोंमें जो राजा । विभूति विशेष सहज । जन कहलाते हैं प्रजा । जिसकी सब ॥ ३९ ॥ अश्वत्थ सब वृक्षोंमें देवर्षि बोच नारद । चित्ररथ गंधर्वों में सिद्धोंमें कपिलमुनि ॥ २६ ॥ उच्चैश्रवा अश्वोंमें मैं निकला जो अमृतसे । ऐरावत गजेंद्रोंमें नरोंमें मैं नराधिप ॥ २७ ॥ ३२१ विभूति-चिंतनयोग (41)
आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् । प्रजनश्चास्मि कंदर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः ॥ २८ ॥ अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् । पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम् ॥ २९ ॥ वज्र हूँ मैं हथियारोंमें । पकड़ता इंद्र करमें । जो शतमख करनेमें । होता है उत्तीर्ण ॥ ४० ॥ धेनुओंमें मैं कामधेनु । कहता कृष्ण भगवान । जन्मदात्रोंमें मैं मदन । जान तू यह ॥ ४१ ॥ सर्प कुलका अधिष्ठाता । वासुकि हूँ मैं कुंति-सुत । नागोंमें जो कहलाता । वह अनंत मैं हूँ ॥ ४२ ॥ जलराशी में पांडुसुत । पश्चिम प्रमदाका कांत । कहता है देवकी सुत । मैं हूँ वरुण ॥ ४३ ॥ तथा पितृगणोंमें समस्त । जो है अर्यमा पितृ-देवता । वह मैं ही यह तत्वता । जान तू अर्जुन ॥ ४४ ॥ जगका कर शुभाशुभ लेखन । तथा प्राणियोंके मनका दर्शन । तदनुरूप करते नियमन । पाप-पुण्य फलका ॥ ४५ ॥ उन नियमितोंमें यम । सर्व साक्षी रूप मैं धर्म । कहता यह आत्माराम । मैं हूँ वह ॥ ४६ ॥ प्रल्हादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् मृगानां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम् ॥ ३० ॥ मैं कामधेनु गायोंमें शस्त्रोंमें वज्र मैं रहा । उत्पत्ति हेतु मैं काम मैं सर्पोत्तम वासुकी ॥ २८ ॥ मैं हूँ वरुण पानीमें नागोंमें शेष-नाग मैं । पितरोंमें अर्यमा हूँ यम संयम-कारक ॥ २९ ॥ मैं हूँ प्रह्लाद दैत्योंमें काल हूँ गणितज्ञमें । मृगोंमें मैं मृगराज पक्षियोंमें खगेंद्र हूँ ॥ ३० ॥ ज्ञानेश्वरी ३२२
दानव कुल तिलक। भक्त प्रल्हाद मैं नेक। आसुरी गुणोंमें देख। न हुआ जो लिप्त ॥ ४७ ॥ ग्रासनेमें मैं महाकाल। कहता है वह गोपाल। श्वापदोंमें मैं शार्दूल। जान तू यह ॥ ४८ ॥ पक्षि-जातिमें तू सुन। गरुड हूं मैं अर्जुन। तभी तो वह आसन। हो सका मेरा ॥ ४९ ॥ पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम् झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी ॥ ३१ ॥ पृथिवीका है जो पसारा। क्षण भरमें धनुर्धर। उङ्घाण जो सप्तसागर। करते रहते ॥ २५० ॥ ऐसे रहते जो गतिवंत। उनमें पवन मैं पांडुसुत। शस्त्र-धारियोंमें जो हैं समस्त। श्रीराम मैं हूं ॥ ५१ ॥ पक्ष लेके संकटग्रस्त धर्मका। सहारा मात्र अपने धनुष्यका। मोड़ लिया मुख विजय लक्ष्मीका। जिसने अपनी ओर ॥ ५२ ॥ चढ़कर पर्वत मस्तक सुवेली। प्रताप लंकेश्वरकी मस्तकावली। आकाशस्त भूतोंको दी हस्त-बलि। जो चीखते थे ॥ ५३ ॥ बढाया उन्होंने देवोंका मान। किया धर्मका जीर्णोद्धार जान। जनमा सूर्यवंशको महान। मानो सूर्य रूप ही ॥ ५४ ॥ ऐसा जो धनुर्बाण हस्त। रामचंद्र मैं सीता-कांत। तथा मकर पुच्छवंत। मैं हूं जलचरोंमें ॥ ५५ ॥ अजी ! जान तू सकल जल ओघ। उसमें भगीरथकी लायी गंगा। उसको निगले जन्हुकी जांघ। फाड आयी जो ॥ ५६ ॥ वह त्रिभुवनैक सरिता। जाह्नवी है सुन पांडुसुत। जल प्रवाहोंमें समस्त। मेरी विभूति है ॥ ५७ ॥ राम मैं शस्त्र-वीरोंमें वायु मैं वेगवानमें। मत्स्योंमें मैं बना नक्र नदियोंमें गंगा नदी ॥ ३१ ॥ ३२३ विभूति-चिंतनयोग
ऐसी मेरी विभूति अनेक । उनका नाम लूं मैं एकेक । बीतेंगे सहस्र जन्म देख । सुननेमें ही ॥ ५८ ॥ सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन । अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम् ॥ ३२ ॥ अक्षराणामकारोऽस्मि द्वंद्वः सामासिकस्य च । अहमेवाक्षयः कालो धाताऽहं विश्वतोमुखः ॥ ३३ ॥ नक्षत्र चुनना आकाशके पूर्ण । ऐसी अपेक्षा जब करेगा मन । तब पोटलीमें बांधना गगन । यही है अच्छा ॥ ५९ ॥ यदि पृथ्वीके परमाणु गिनना । तो पृथ्वीको ही बगलमें दबाना । वैसा विस्तार यदि मेरा जानना । तो मेरे ही ज्ञानसे ॥ २६० ॥ जैसे शाखाओंके फूल फल । बटोरना चाहे तो सकल । उखाडना वृक्ष सहमूल । लेना हाथमें ॥ ६१ ॥ वैसी मेरी विभूति विशेष । जानना चाहे यदि अशेष । मेरा स्वरूप एक निर्दोष । जानना होगा ॥ ६२ ॥ अन्यथा भिन्न भिन्न विभूति । कहूँ कितनी सुभद्रापति । एक बातमें ही जान महामति । मैं हूँ सर्वस्व ॥ ६३ ॥ मैं हूं संपूर्ण सृष्टिमें । अजी ! आदि मध्यांतमें । होते हैं जैसे पटमें । तंतु ही तंतु ॥ ६४ ॥ व्यापक ऐसे मुझे जानना । विभूति-भेद है क्या करना । तुझमें योग्यताका न होना । सो कहना पड़ा ॥ ६५ ॥ या तूने पूछ लिया है पार्थ । इसीलिये कहता विस्तृत । विद्याओंमें जान तू प्रस्तुत । मैं हूँ आत्म-विद्या ॥ ६६ ॥ आदि मध्य तथा अंत मैं चराचर सृष्टिका । विद्यामें आत्म-विद्या मैं वादिका तत्व-वाद मैं ॥ ३२ ॥ मैं हूँ द्वंद्व समासोंमें अक्षरोंमें अकार मैं । मैं ही अक्षय जो काल विश्वकर्ता विराट् स्वयम् ॥ ३३ ॥ ज्ञानेश्वरी ३२४
वाद जो है बोलनेवालोंमें । जान तू वह हूँ मैं संक्षेपमें । कभी न आते एक मतमें । जिससे शास्त्र ॥ ६७ ॥ विषय-निश्चयमें जो बढता । सुनके तर्कका जोर चढता । तथा वाणीका रस है बढता । औ' होता मधुर भाषण ॥ ६८ ॥ ऐसे प्रतिपादनमें वाद । कहता है मैं ही हूँ गोविंद । औ' अक्षरोंमें जो विशद् । वह अकार मैं हूँ ॥ ६९ ॥ वैसे समासमें अर्जुन । द्वंद्व समास मैं हूँ जान । करता जो सर्व भक्षण । वह काल मैं हूँ ॥ २७० ॥ जिसमें मेरु मंदार सहित । पृथिवी भी हो जाती द्रवित । उस एकार्णवको भी जो पार्थ । पचाता अपनेमें ॥ ७१ ॥ उस प्रलय तेजको भी ग्रासता । तथा महा अनिलको निगलता । आकाशको भी अपनेमें समाता । धनंजय ॥ ७२ ॥ ऐसा है जो असीम काल । मैं हूँ कहता है गोपाल । सृजता विश्व जो निर्मल । वह ब्रह्मा मैं हूँ ॥ ७३ ॥ मृत्युः सर्व हरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम् । कीर्तिः श्रीवाक् च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ॥३४॥ तथा उत्पन्न भूतोंका धारण । सबका जीवन भी संपूर्ण । अंतमें सबको देता मरण । वह भी मैं हूँ ॥ ७४ ॥ स्त्री जातिमें अर्जुन । सात मेरी है सुन । कहता वह कौन । सकौतुक ॥ ७५ ॥ सुन नित्य नूतन कीर्ति । अर्जुन वह मेरी मूर्ति । तथा स-औदार्य संपत्ति । मैं हूँ जान ॥ ७६ ॥ तथा वह है जो वाणी । न्याय सुआसन वासिनी । औ' विवेक-पथ गामिनी । मेरा ही रूप ॥ ७७ ॥ सर्व नाशक मैं मृत्यु जन्म भी मैं भविष्यका । वाणी श्री कीर्ति नारीमें क्षमा मेधा धृति स्मृति ॥ ३४॥ ३२५ विभूति-चिंतनयोग
देख विश्वका पदार्थ । देता मेरा यथार्थ । ज्ञान जो है वह पार्थ । स्मृति मैं विशुद्ध ॥ ७८ ॥ स्वहितके अनुकूल । मेधा हूं मैं जो निर्मल । त्रिभुवन धृति-शील । तथा क्षमा मैं ॥ ७९ ॥ नारि जातिमें सात । शक्तियां हैं जो पार्थ । मैं हूं कही है बात । श्रीकृष्णने यह ॥ २८० ॥ बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् । मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः ॥ ३५ ॥ वेद-राशिमें बृहत्साम । मैं हूं सुन तू प्रियोत्तम । कहता है पुरुषोत्तम । धनंजयसे ॥ ८१ ॥ छंदमें गायत्री छंद । मेरा स्वरूप है विशद । जान यह अप्रमाद । अर्जुन तू ॥ ८२ ॥ मासोंमें जो मगसिर । जान यह धनुर्धर । ऋतुमें कुसुमाकर । वसंत मैं हूं ॥ ८३ ॥ द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् । जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्वं सत्ववतामहम् ॥३६॥ वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पांडवानां धनंजयः । मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः ॥ ३७ ॥ कपट कारस्थानमें द्यूत । मैं हूं जान यह पांडुसुत । तभी चौरस्तेका है प्रशस्त । चलता यह चौर्य ॥ ८४ ॥ तेजस्वियोंका तेज निश्चय । मैं ही हूं जान तू धनंजय । कार्योद्देश्यमें जो है विजय । वह भी मैं हूं ॥ ८५ ॥ गायत्री सब छंदोंमें मैं बृहत्साम साममें । मैं मार्गशीर्ष मासोंमें ऋतुओंमें वसंत मैं ॥ ३५ ॥ द्यूत मैं छलियोंमें हूं तेज तेजस्विका बना । सत्व मैं सात्विकोंमें हूँ जय मैं व्यवसायमें ॥ ३६ ॥ मैं वासुदेव वृष्णीमें पांडवोंमें धनंजय । मुनियोंमें मुनी व्यास कविमें उशना कवि ॥ ३७ ॥ ज्ञानेश्वरी ३२६
उद्योगमें जो है धनंजय । उद्योगसे दीखता है न्याय । मेरा रूप यह यदुराय । कहता है ॥ ८६ ॥ सत्व है जो सत्वस्थमें । कृष्ण है यदुवंशमें । तथा श्री संपन्नतामें । मैं हूं जान ॥ ८७ ॥ वसुदेव देवकीसे मैं उत्पन्न । कुमारि स्थानमें गोकुल गमन । प्राणोसह चूस लिय मैंने स्तन । पूतनाके ॥ ८८ ॥ मिटा नहीं था अभी कौमार्य । किया अदानव सृष्टिकार्य । गिरिधर बन कूता आर्य । इंद्रकी महिमा ॥ ८९ ॥ मिटाया कालिंदी-हृदय शूल । बचा लिया ज्वाला ग्रस्त गोकुल । बनाया मैने ब्रह्माको पागल । बछडे बनाके ॥ २९० ॥ होते ही बाल्यका प्रभात । कंसादि प्रचंड अत्यंत । मिटाये दुष्ट जो ज्वलंत । सहज लीलासे ॥ ९१ ॥ कहना मेरा कार्य कितना । तूने स्वयं देखा है अर्जुन । यादवोंमें श्रीकृष्ण जानना । मेरा रूप ॥ ९२ ॥ पांडव जो हैं सोम वंशस्थ । उनमें मैं अर्जुन हूं पार्थ । हमारा प्रेम भाव विध्वस्थ । कभी न टूटता ॥ ९३ ॥ नहीं तो विचार कर देख अर्जुन । संन्यासी हो चूराई तूने बहन । किंतु विकल्प न हुआ मेरा मन । क्यों कि हम एक हैं ॥ ९४ ॥ मुनियोंमें मैं व्यासराय । मैं कहता है यादवराय । तथा मैं हूं उषनाचार्य । कवीश्वरोंमें ॥ ९५ ॥ दंडो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् । मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम् ॥ ३८ ॥ चींटीसे ब्रह्मतक समान । चलता है जो सुनियमन । उसमें अनिवार्य शासन । मैं हूं पार्थ ॥ ९६ ॥ दंड मैं दमवंतोंमें धर्म मैं विजयर्थिका । ज्ञान हूँ ज्ञानियोंमें में गूढोंमें श्रेष्ठ मौन हूँ ॥ ३८ ॥ ३२७ विभूति-चिंतनयोग
सारासार कर निर्णय । धर्म-ज्ञानका जो निश्चय । सभी शास्त्रोंमें धनंजय । मैं हूँ नीति शास्त्र ॥ ९७ ॥ सब गुह्योंमें अर्जुन । मौन है अति महान । गूँगोंके सम्मुख जान । होता अज्ञानी ब्रह्म ॥ ९८ ॥ अजी ! मैं हूँ ज्ञानियोंमें । श्रेष्ठ है जो जगतमें । ज्ञान जान तू इसमें । अंत नहीं पार्थ ॥ ९९ ॥ यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन । न तदस्ति विना यत्स्यान् मया भूतं चराचरं ॥ ३९ ॥ नांतोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप । एषतूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया ॥ ४० ॥ अजी ! पर्जन्यकी धार । गिनेगा क्या धनुर्धर । या पृथ्वीके तृणाँकुर । होंगे क्या गिनके ॥ ३०० ॥ लहरें क्या महा सागरकी । किसीने कभी क्या गिननेकी । मेरी अनंत विभूतियोंकी । कहूँ कैसा ॥ १ ॥ फिर भी पचत्तर प्रधान । विभूतियां तुझसे अर्जुन । ऊपर ऊपरकी तू जान । कहीं तुझसे ॥ २ ॥ मेरे विभूति-विस्तारका कहीं । आदि अंत यहां कुछ भी नहीं । तभी तू सुनेगा कितनी यहीं । और मैं कहूँगा कितनी ॥ ३ ॥ इसीलिये एक वाक्यमें तुझ । मर्म कहता हूँ अब मैं निज । तभी तू सब भूतांकुर-बीज । जान मुझको ही ॥ ४ ॥ तभी छोटा बडा न मानना । नीच उच्च भावको तजना । भूतमात्रमें मुझे देखना । सम भावसे ॥ ५ ॥ वैसे ही सब भूतोंका मुझको बीज जान तू । बिना मेरे नहीं कोई कहीं भी कुछ भी यहां ॥ ३९ ॥ नहीं अंत कभी आता मेरी दिव्य समृद्धिका । तो भी विभूति विस्तार मैंने जो अल्पमें कहा ॥ ४० ॥ ज्ञानेश्वरी ३२८
इस पर भी साधारण । कर कहता सावधान । सूचित करता अर्जुन । मेरी विभूति ॥ ६ ॥ यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा । तत्तदेवावगच्छत्वं मम तेजोंऽशसंभवम् ॥ ४१ ॥ जहां जहां संपत्ति औ' दया । दोनो वसति हैं धनंजय । वहां तू जान अति निश्चय । मेरी विभूति है ॥ ७ ॥ अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन । विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥ ४२ ॥ नभमें होता रवि-बिंब एक । त्रिभुवनका जो है प्रकाशक । उसके आज्ञा-रत होते लोक । सकल हि सदैव ॥ ८ ॥ ऐसोंको अकेला नहीं कहना । साधन-हीन न मानना । साथ होते हैं क्या सभी साधन । कामधेनुके कभी ॥ ९ ॥ उससे जब जो चाहता । तभी प्रसवती है माता । वैसे अंगभूत रहता । विश्व भी उसके ॥ ३१० ॥ उनकी पहचानकी है संज्ञा । विश्व मानता उसकी आज्ञा । ऐसे मनुष्यको जान तू प्राज्ञ ! । मेरा ही अवतार ॥ ११ ॥ अब है सामान्य विंशेष । जानना यहां महा दोष । क्यों कि मैं ही एक अशेष । विश्व है जान ॥ १२ ॥ तब क्यों बुरा भला कहना । स्व-मतिसे विभाग करना । औ' अपनी मतिसे लगाना । कलंक मुझको ॥ १३ ॥ नहीं तो क्या घीका करते मंथन । अमृतको पकाके करें क्या न्यून । वायुका होता क्या दायां बायां पन । कह तू मुझसे ॥ १४ ॥ विभूति-युक्त जो वस्तु लक्ष्मीवंत उदात्त वा । मेरी ही किरणोंमेंसे निकली जान तू यह ॥ ४१ ॥ अथवा लाभ ही क्या है जान विस्तारसे तुझे । एकांशमें विश्व सारा मुझसे है भरा रहा ॥ ४२ ॥ ३२९ विभूति-चिंतनयोग (42)
रविका होता क्या पेट पीठ । देखनेसे अंधी होगी दीठ । ऐसी मेरी स्वरुप-गोष्ट । न यहां भला-बुरा ॥ १५॥ गिनेगा कितनी मेरी विभूति । अनगिनतकी क्या है गिनती । जाने दें बातें हे सुभद्रापति । विभूतीकी आज ॥ १६ ॥ मेरा है एक ही जो अंश । विश्व व्यापता अशेष । भेद छोड़ तू निःशेष । भज साम्य भावसे ॥ १७ ॥ ऐसा ज्ञानी-वन वसंत । विरक्त जनोंका एकांत । बोला यह बात श्रीमंत । श्रीकृष्णचंद्र ॥ १८ ॥ अजी ! देव-देवेश श्रीकृष्ण । कहता है सनम्र अर्जुन । बोला तू अविवेक वचन । भेद त्यागका ॥ १९ ॥ अर्जुनका अद्वैतानुभव— विश्वसे कहता है क्या भास्कर । आता मैं दूर करो अंधार । कैसे कहूँ मेरा यह विचार । तू है अडबंग नाथ ॥ ३२०॥ तेरा नाम भी किसी समय । सुनने मिला तो हे तन्मय । छोडकर भागेगा हृदय । भेदासुर तुरंत ॥ २१॥ ऐसा है परब्रह्म तू अभेद श्रेष्ठ । दान-सा मिला हो भाग्यका पराकाष्ठ । तो भी देखता है क्या भेद कनिष्ठ । किससे औ' कहां ॥ २२॥ चंद्र-बिंबके हृदयमें ठौर । 'तपन' कहता क्या यदु-श्रेष्ठ । शोभा देता है क्या कह तू स्पष्ट । यह बड़ायी तेरी ॥ २३ ॥ श्री कृष्णका अर्जुन प्रेम— सुन यह कृष्णने मन ही मन । कर लिया पार्थका प्रेमालिंगन । इस बोलने पर न रुसना । कहता श्री हरि ॥ २४ ॥ भेद मार्गसे कही कहानी । विभूतियोंकी बडी सुहानी । अभेदांतःकरणसे सुनी । तुझे जंची या नहीं ॥ २५ ॥ देखनेके लिये मैंने इसीको । कही बाह्य व्यवहारी बातको । जाना तूने विभूति विस्तारको । भली भांति ॥ २६ ॥ अर्जुन कहता देवदेवेश । तू ही जाने तेरा वह विशेष । किंतु मैं देखता विश्व अशेष । तुझसे भरा हुआ ॥ २७ ॥ ज्ञानेश्वरी ३३०
यह सुन कर अंधा धृतराष्ट्र अंतःकरणसे भी अंधा ही रहा— राजन् कहता है यहां अर्जुन । वह अद्वयानुभव वरण । संजयका शब्द कर श्रवण । स्तब्ध है धृतराष्ट्र ॥ २८ ॥ संजयका दुखी अंतःकरण । जैसे हैं इसके बाह्य नयन । वैसे ही अंधा है अंतःकरण । कहता संजय ॥ २९ ॥ किंतु वहां वह अर्जुन । बढाता है स्वहित मान । - दूसरा जागृत महान । संकल्प एक ॥ ३० ॥ सोचता यह हृदयानभव । बना लेना है नयनका भाव । बुद्धिमें हुआ इच्छाका उद्भव । सहज भावसे ॥ ३१ ॥ मेरे यही दोनों नयन । करें विश्व-रूप दर्शन । ळालसा हुई दैववान । सहज भावसे ॥ ३२ ॥ आज वह् है कल्पतरुकी शाख । उसकी इच्छा व्यर्थ न होती देख । जो जो कहेगा आज उसका मुख । सिद्ध करेगा दैव ॥ ३३ ॥ सुन कर प्रल्हादका बोल । प्रसन्न हुआ वन सकल । वह सद्गुरु मिला कुशल । अर्जुनको ॥ ३४ ॥ विश्वरूप दर्शनार्थ वैसे । पूछेगा अर्जुन श्रीकृष्णसे । कहूँगा कहता श्रोताओंसे । निवृत्तिदास ज्ञानदेव ॥ ३३५ ॥ गीता श्लोक ४२ ज्ञानेश्वरी ओवी ३३५.
११ विश्व-रूप-दर्शनयोग यह अध्याय शांत अद्भुत रसोंका प्रयागराज है— एकादश है इसके अनंतर । कथा भरी है दो रसोंका भंडार । वहां दर्शन करेगा धनुर्धर । विश्व-रूपका ॥ १ ॥ जहां शांत-रसके सदन । अद्भुत आया अतिथि -वत्त । मिला पंगतका बहुमान । अन्य रसोंको ॥ २ ॥ होता जब वधु-वरोंका मिलन । तब होता बारातियोंका सन्मान । वैसे मिला है देशीका सिंहासन । अन्य रसोंको भी ॥ ३ ॥ किंतु उत्तम जो शांत अद्भुत । जंचेंगे आखोंको कर तृप्त । जैसे हैं प्रेम-भावालिंगित । हरिहर दोनों ॥ ४ ॥ अथवा जैसे अमावासके दिन । करते हैं दोनों बिंब आलिंगन । वैसे दोनों रसोंका सम्मेलन । हुआ इस स्थलमें ॥ ५ ॥ मिले हैं गंगा-यमुनाके ओघ । वैसे रसोंका हुआ है प्रयाग । इसीलिये यहां सुस्नात जग । संपूर्ण-रूपसे ॥ ६ ॥ इसमें गीता-सरस्वती गुप्त । तथा ये दोनों रस-ओघ मूर्त । इसीलिये त्रिवेणी है उचित । सबको प्राप्त है ॥ ७ ॥
सबको त्रिवेणी-स्नान सुलभ हो इसलिये देश-भाषाका घाट बांधा है— अजी ! यहां श्रवणके द्वारसे । तीर्थमें प्रवेश सुलभ हो ऐसे । करवाया है श्री गुरुने मुझसे । कहता ज्ञानदेव ॥ ८ ॥ अजी ! संस्कृतका तीर है गहन । उसको देशीके ये शब्द सोपान । निर्माण कराये हैं धर्म-निधान । निवृत्तिनाथने ॥ ९ ॥ यहां करना सबको सद्भाव-स्नान । प्रयाग-माधव विश्व-रूप-दर्शन । तथा करना यहां संसार-तर्पण । तिलोदकका ॥ १० ॥ ऐसे हैं यह सावयव । स्वरूप लाये रस-भाव । औ' श्रवण-सुखका चाव । मिला विश्वको ॥ ११ ॥ यहां प्रत्यक्ष शांत-अद्भुत । अन्य रसोंको शोभा प्राप्त । साथ ही हुआ है मोक्ष-प्राप्त । स्पष्ट रूपसे ॥ १२ ॥ यह ग्यारहवां अध्याय है । वेदोंका जो विश्राम-धाम है । सुदैवियोंमें पार्थ श्रेष्ठ है। पहुंचा जो वहां ॥ १३ ॥ पार्थ वहां पहुंचा भला क्यों अकेला । जिसे माता है उसका हुवा सुकाल । गीता-भाव उभरा देशीमें सकल । इसी समय ॥ १४ ॥ संत जनोंसे कविकी विनय — मेरी बात यह इसीलिये । विनय करता सुन-लीजिये । जरासा ध्यानसे चित्त दीजिये । आप सज्जन ॥ १५ ॥ अजी ! यह है संतोंकी परिषद । ऐसा लगाव यहां अ-शोभास्पद । किंतु आपत्य बन आनंद-स्पंद । कहता मैं यह ॥ १६ ॥ आप ही पहले तोतेको पढाते । वह बोलता तब आप डुलते । या बच्चेसे नकल करा रीझते । माता पिता जैसे ॥ १७ ॥ वैसे जो जो कुछ मैं बोलता । प्रभु आपने ही सिखाया था । जो आपने ही जो है दिया था । सुनिये चित्त देकर ॥ १८ ॥ अजी ! गाछ है यह सारस्वतका । आपने ही जो लगाया था उसका । सिंचन कर अवधानामृतका । बढाया कीजिये ॥ १९ ॥ ३३३ विश्व रूप-दर्शनयोग
रस-भाव तब पुष्प-सा खिलेगा । नाना अर्थ फल-भारसे फलेगा । आपके ही धर्मका सुकाल होगा । सारे जगतमें ॥ २० ॥ इस बातसे रीझ उठे सब संत । "भल कहा" कह कर हो प्रमुदित । अब कहो कृष्णार्जुनमें क्या बात । हुयी जो वहां ॥ २१ ॥ तब निवृत्तिदास कहता । कृष्णार्जुनकी मैं क्या जानता । सामान्य क्या मैं कह सकता । कहलाते सब आप ॥ २२ ॥ अजी ! जंगलका जो पात खाते । रावण पर वे विजय पाते । पार्थ अक्षोहिणी सैन्य जीतते । अकेले ही ॥ २३ ॥ तभी जो जो करते हैं समर्थ । चराचरमें होता वह सार्थ । मुझसे कहलाते हैं तदर्थ । संत जन आप ॥ २४ ॥ सुनिये अब यह बोल । गीता भावार्थके निर्मल । वैकुंठ-पतिके सरल । निकल मुखसे ॥ २५ ॥ धन्य धन्य वह ग्रंथ गीता । वेद-प्रतिपाद्य जो देवता । बना है श्रीकृष्ण महा-वक्ता । इस ग्रंथका ॥ २६ ॥ कैसे करें उस गौरवका वर्णन । न होता शिव-बुद्धिको भी आकलन । जीव-भावसे करना उसे वंदन । यही भला है ॥ २७ ॥
बुद्धिने जो स्वीकार किया उसको आंखोंसे देखनेकी इच्छा-अर्जुनका संकोच-
सुनिये अब वह किरीटी । विश्व-रूपपे रख दृष्टि । करने लगा है कैसे गोष्ठि । श्रीकृष्णसे ॥ २८ ॥ सकल ही है यह सर्वेश्वर । अनुभव है यह रुचिकर । होना यह नयनसे गोचर । प्रत्यक्ष रूपमें ॥ २९ ॥ आशा है यह अंतःकरणकी । विवंचना है कैसे कहनेकी । विश्व-रूपके महा-गुपितकी । अर्जुनको यहां ॥ ३० ॥ सोचता पीछे कभी कहीं । प्रिय-जनने पूछा नहीं । सहसा मैं इनको यहीं । पूछूं कैसे ? ॥ ३१ ॥ यद्यपि है हमारा स्नेह चांग । तो क्या लक्ष्मी मातासे अंतरंग । वह भी डरती ऐसा प्रसंग । पूछनेमें ॥ ३२ ॥
ज्ञानेश्वरी ३३४
हमने सेवा की है बहुत नेक । किंतु क्या गरुड़से भी अधिक। इसमें वह भी न पूछता एक । चुपचाप बैठा है ॥ ३३ ॥ मैं क्या सनकादिकसे अधिक। वे भी झमेला करते न देख । मैं हूँ क्या गोपियोंसे भी भावुक । प्रिय-जन उन्हें ? ॥ ३४ ॥ उन प्रिय-जनोंको भी छकाया । दस गर्भ वास भी सहन किया । विश्व-रूप नहीं दिखाया । किसीको भी ॥ ३५ ॥ ऐसी यह गुपित बात । छिपायी जो हृदय-गत । पूछना क्या मुझे उचित । क्या कैसे ॥ ३६ ॥ यदि मैं यह प्रश्न नहीं पूछता । उसके बिन सुख नहीं मिलता । जान लेना भी संभव नहीं होता । यह बात कभी ॥ ३७ ॥ श्री कृष्णका भक्त-प्रेम— पूछें अब अल्पसी बात । फिर देखें हरिका मत । सोचकर हो भीति-युक्त । पूछता अर्जुन ॥ ३८ ॥ तब अर्जुनका यह भाव । सुन एक दो शब्दमें देख । दिखाता विश्व-रूप-वैभव । पूर्ण-रूपसे ॥ ३९ ॥ गाय जो बछडेको देखकर । ऊठ जाती है हडबडाकर । मुखमें ले स्तन चूसने पर । न स्त्रवेगी क्या दूध ? ॥ ४० ॥ जहां आता है पांडवोंका नाम । रक्षार्थ दौडना जिसका काम । पूछना अर्जुनका सप्रेम । सहेगा कैसे ? ॥ ४१ ॥ श्रीकृष्ण सहज प्रेमावतरण । अर्जुन प्रेम-नशाको उत्तेजन । समरस होनेमें यहां अभिन्न । भिन्नता भान विस्मय ॥ ४२ ॥ अर्जुनके बोलनेसे अब महज । कृष्ण विश्व-रूप दिखायेग सहज । ऐसा अद्भुत प्रसंग आया है आज । सुनियोगा ॥ ४३ ॥ ३३५ विश्व-रूप-दर्शनयोग
अर्जुन उवाच मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् । यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ॥ १ ॥ प्रभो तूने अपने हृदयका दर्शन दिया और — कृष्णसे फिर कहता अर्जुन । श्रीकृष्ण तूने मेरे ही कारण । वाच्य किया था जो गुह्य कथन । कृपा करके ॥ ४४ ॥ महाभूत जब ब्रह्ममें विलीन । जीव महदादि भी होते हैं लीन । अंतिम वह जो है विश्रांति-स्थान । आपका रूप ॥ ४५ ॥ अंतःकरणके वह भीतर । रखा था वेदोंसे भी छिपाकर । कहता है कृष्णसे धनुर्धर । कृपणके भांति ॥ ४६ ॥ वह तूने आज श्री नारायण । दिया है मुझे हृदय-दर्शन । उसपे शिवने अध्यात्म-ध्यान । किया न्योच्छावर ॥ ४७ ॥ ऐसी वस्तु तूने मुझे दी है । क्षण भी विलंब न किया है । यदि हम ऐसे कहते हैं । तो मैं भिन्न हूं क्या ? ॥ ४८ ॥ भंवरमें मैं महा-मोहके । डुबा था शिखा तक देखके । श्रीहरि तूने स्वयं कूदके । उभार लिया मुझे ॥ ४९ ॥ तुझ एक बिना देव कभी कहीं । विश्वमें अन्य वस्तुका नाम नहीं । किंतु देख यहां दुर्दैव है यही । मानते "हम हैं" भिन्न ॥ ५० ॥ विश्वमें मैं कोयी एक अर्जुन । धर ऐसा देहका अभिमान । तथा कौरवको यहां स्वजन । कहता था मैं ॥ ५१ ॥ इस पर भी मैं इन्हें मारूंगा । इसका पाप-भोगी भी बनूंगा । ऐसे दुःस्वप्न रत मुझे जगा- । दिया तूने कृष्ण ॥ ५२ ॥ अर्जुनने कहा करके करुणा मेरी कहा तूने रहस्य जो । उस अध्यात्म विद्यासे मेरा जो मोह था गया ॥ १ ॥ ज्ञानेश्वरी ३३६
गंधर्व-नगरकी बस्ती । छोड़ निकला मैं लक्ष्मी-पति । प्याससे पानीका था मैं प्रार्थी । औ' पीता था मृगजल ॥ ५३ ॥ अजी ! वरूके सर्प-दंशसे । चढती विष-ल्हरियोंसे । त्रस्त जीवको मृत्यु-भयसे । उभार लिया देव ॥ ५४ ॥ अपना प्रतिबिंब न जानकर । कूपमें कूदना सिंह देखकर । उसको बचा लिया पकड़कर । मेरी रक्षा की ऐसी ॥ ५५ ॥ मुझपर अपार कृपा करके मेरी रक्षा की - अब-- नही तो मेरा यहां तक । निश्चय हुवा था तू देख । सप्त-सागर हुये एक । मिलकर ॥ ५६ ॥ या डूबने दो युग संपूर्ण । या टूटने दो यह गगन । लड़ेगा नहीं कभी अर्जुन । स्व-गोत्रजोंसे ॥ ५७ ॥ ऐसी अहंकार-उर्मियोंमें उन्मत्त । आग्रह जलमें डूबा था मैं अनंत । उठा लिया है तूने हो स्नेहार्द्र-चित्त । कौन था अन्य मेरा ॥ ५८ ॥ नहीं था यह एक-मात्र अर्जुन । वैसे दूसरेको नाम दे स्वजन । सवार हुवा ऐसा पागलपन । तूने बचा लिया देव ! ॥ ५९ ॥ पहले होना था जब हमारा दहन । भय था तब देह जल जानेका सुन । अब चैतन्य सह होना था दहन । बचा लिया तूने दोनो बार ॥ ६० ॥ हिरण्यासुर दुराग्रहमें भरकर । मेरी बुद्धि-भूको बगलमें दबाकर । मोहार्णव-सिंधुके गवाक्षसे अंदर । जा बैठा था ॥ ६१ ॥ तेरे ही बलसे मधुसूदन । विवेकने ले लिया है स्व-स्थान । वराहका पुनरावतरण । लेना पडा यह ॥ ६२ ॥ अपार कृपा है तेरी मुझ पर । एक वाचासे ही बोलूं क्यों कर । पंच-प्राण किये तूने न्योच्छावर । मुझपर देव ॥ ६३ ॥ कुछ भी वह व्यर्थ नहीं गया । उसमें संपूर्ण यश भी आया । देव ! मैं साद्यंत रूपसे माया- । रहित हुवा जी ॥ ६४ ॥ आनंद सरोवरके कमल । वैसे हैं तेरे नयन निर्मल । अपने प्रसादके हैं महल । बना लेते हैं ॥ ६५ ॥ (43) ३३७ विश्व-रूप-दर्शनयोग
उसका तथा मोहका मिलन । है यह व्यर्थ-बातका कथन । मृगजलसे होगा क्या शमन । वडवानलका ॥ ६६ ॥ तथा जो मैं हूं तब श्रीकृष्ण । पाके कृपाका अंतःकरण । करता हूं सानंद भोजन । ब्रह्म-रसका ॥ ६७ ॥ इससे हुवा मेरा मोह निवारण । इसमें क्या भला विस्मयका कारण । इससे हुवा मेरा उद्धार श्रीकृष्ण । तेरे चरणोंकी सौगंध ॥ ६८ ॥ भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया । त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ॥ २ ॥ अर्जुनकी आंतरिक द्विविधा— अजी ! हे कमल-नयन । कोटि-सूर्य-तेज वदन । मैंने तुझसे जनार्दन । सुना है आज ॥ ६९ ॥ प्रकृतिसे उत्पन्न भूत-जात । वैसे प्रकृतिमें उसका अंत । कैसा होता है जो प्राकृत । कहा है देवने ॥ ७० ॥ प्रकृतिका दिया संपूर्ण-ज्ञान । बताया ब्रह्मका वसति-स्थान । जिसको ओढ करके महान् । हुए हैं वेद ॥ ७१ ॥ ज्ञान-राशीको जो बढाता । धर्म-रत्नोंको प्रसवता । वेद है आश्रय करता । तेरे स्वरूपका ॥ ७२ ॥ ऐसा अगाध है महात्म्य । जो सकल मार्गैक्य-गम्य । तथा है स्वानुभव रम्य । दिखाया मुझे ॥ ७३ ॥ हटाकरके सब बादल । दिखाते जैसे सूर्य-मंडल । सेवार हटाकर निर्मल । जल दिखाते हैं ॥ ७४ ॥ छुडानेसे सांपकी जकडन । होता जैसे चंदन-दर्शन । या करनेसे पिशाचोच्चाटन । मिलती भूमिस्थ निधि ॥ ७५ ॥ उत्पत्ति नाश भूतोंका सुना मैंने सविस्तर । अभंग महिमा वैसे तेरे ही मुखसे प्रभु ॥ २ ॥ ज्ञानेश्वरी ३३८
वैसे थी प्रकृतिकी अडचन । हटाया तूने उसे जनार्दन । पर-तत्वमें की है फिर लीन । बुद्धि मेरी ॥ ७६ ॥ इस विषयमें मेरा देव । हुवा संदेह रहित जीव । किंतु और एक संकल्प-भाव । हुआ उत्पन्न ॥ ७७ ॥ रहने दिया इसे संकोचकर । किससे पूछें कहो चक्रधर । तेरे बिना नहीं अन्य आधार । जानता मैं ॥ ७८ ॥ जलचर माने जलका आभार । या बालक स्तन्यका संकोच कर । जीनेका वह दूसरा क्या आधार । ढूंढेगा देव ! ॥ ७९ ॥ तो संकोच नहीं करना । मनकी जो बात कहना । कहे तब कृष्ण अर्जुन । कह तू चाह ॥ ८० ॥ एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर । द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ॥ ३ ॥ स-संकोच विश्व-रूप दर्शनकी प्रार्थना - तब कहता किरीटी । कही थी तूने जो गोष्टि । उससे प्रतीति दृष्टि । शांत हुई मेरी ॥ ८१ ॥ संकल्प जहांसे है निकलता । लोक-क्रमका उदयास्त होता । जिस स्थानको है तू 'मैं कहता । जनार्दन ॥ ८२ ॥ वह वास्तविक रूप है तेरा । जहांसे आता तू ले अवतार । सुर-कार्यार्थ तू है चक्रधर । द्विभुज या चतुर्भुज हो ॥ ८३ ॥ क्षीर-शयनाभिनय समाप्त कर । मत्स्य-कूर्मका अलंकार छोड़कर । लीला-साधन सबको तू छिपाकर । रखता लपेटके ॥ ८४ ॥ उपनिषद करते गायन । योगी-जन हृदयमें दरशन । सनकादिक नित आलिंगन । करते जिसके ॥ ८५ ॥ , तेरा जो ईश्वरी रूप मानना हूँ यथार्थ है । वही मैं देखना चाहूँ प्रत्यक्ष पुरुषोत्तम ॥ ३ ॥ ३३९ विश्व-रूप-दर्शनयोग