भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

वैसे शिष्यके प्रेममें आकर । कृष्णत्वको पूर्ण गलाकर । लिया जो विश्व-रूप भयंकर । बना फिर श्रीकृष्ण ॥ ४५ ॥ अजी ! शिष्यका दिया यह त्रास । सहनेवाले गुरु कहां कौन देश । न जाने कैसे हरिका प्रेम-विकास ! कहता है संजय ॥ ४६ ॥ विश्व-रूपका यह योग विस्तार । समा लिया अपनेमें ही सत्वर । तथा प्रकटा कृष्ण-रूप सुन्दर । क्षण भरमें ॥ ४७ ॥ जैसे त्वं पद होता संपूर्ण । तत् पदमें लीन सर्व रूपेण । वृक्ष मिटा होता बीज-कण । यह उसी भांति ॥ ४८ ॥ अथवा स्वप्न-संभ्रम जैसा । निगलता जागृत जीव-दशा । श्रीकृष्णने योग-विस्तार वैसा । समा लिया अपनेमें ॥ ४९ ॥ जैसे सूर्यादिका तेज बिंबमें । घनादिका जल गगनमें । ज्वारका जल सब समुद्रमें । वैसे नरेंद्र ॥ ५० ॥ अथवा कृष्ण रूपका थान । खोल दिया विश्व-रूप दर्शन । दिखाता स-कौतुक जनार्दन । प्रिय अर्जुनको ॥ ५१ ॥ मानो तब उसका आकार प्रकार । गाहक कहता है देखकर । यह नहीं हमारे मन अनुसार । और समेटा थान ॥ ५२ ॥ अपना पसारा फैलाकर । विश्वको किया सहज पार । उसे समेट हुवा साकार । बना मन-मोहन ॥ ५३ ॥ वह भाग्य अर्जुनको मिला जो किसीको नहीं मिला था— अथवा हुवा अनंत । जैसे था बना जो सांत । पार्थको करने शांत । था जो अधीर ॥ ५४ ॥ जैसे देखता है स्वर्ग स्वप्नमें । जगते ही पाता बिछावनमें । ऐसे ही पार्थको क्षण-भरमें । हुवा अति विस्मय ॥ ५५ ॥ अथवा गुरु-कृपासे संपूर्ण । प्रपंच-ज्ञान होता है क्षीण । तथा होता पर-ब्रह्म स्फुरण । वैसा देखा कृष्ण-रूप ॥ ५६ ॥ सोचता था पार्थ चितमें एक । विश्व-रूपके परदेको रोक । वह गया बड़ा ही हुवा नेक । मेरे हितमें ॥ ५७ ॥ ३९९ · विश्व रूप-दर्शनयोग

आया जैसे कालको जीतकर । अथवा बवंडर चीरकर । या सप्त-सागर तैरकर । अपने बाहूसे ॥ ५८ ॥ उसे हुआ ऐसा अति-संतोष । माना पार्थने परम-उल्लास । देख कर श्रीकृष्णको स-हास । विश्व-रूपके नंतर ॥ ५९ ॥ सूर्यके होते ही अस्तमान । नक्षत्रोंसे भरता गगन । वैसे देखने लगा अर्जुन । लोगों सह पृथ्वी ॥ ६६० ॥ देखता वैसे ही कुरु-क्षेत्र । दोनों ओर हैं वैसे सगोत्र । रण-सज्ज वीर ले शस्त्रास्त्र । चलाते हुए ॥ ६१ ॥ रण-मध्यमें वहां सब शांत । वैसा ही रथ खडा है रक्षित । बैठा है उसमें श्रीलक्ष्मी-कांत । अपने पास ॥ ६२ ॥ अर्जुन उवाच दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन । इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः ॥ ५१ ॥ एवं पहले जैसे था वैसे । देखा यह वीर्य-विलाससे । फिर कहता जिया मैं ऐसे । हुवा अब ॥ ६३ ॥ बुद्धिको छोड कर ज्ञान । भयसे गया था जो वन । अहंकार सह है मन । भाग गया था ॥ ६४ ॥ इन्द्रियां प्रवृत्ति भूल गयी थीं । भाषा प्राणसे वंचित हुई थीं । शरीर-ग्राममें अव्यवस्था थी । अभूतपूर्व ॥ ६५ ॥ हुवे वे सब अब प्रफुल्लित । प्रकृति हुई फिरसे जीवित । अब हुवा पुनरुज्जीवित । ऐसे लगता मुझे ॥ ६६ ॥ जीवने ऐसा सुख पा लिया । फिर कृष्णसे है कह दिया । मैंने तेरा वह जो पा लिया । यह मानवी रूप ॥ ६७ ॥ अर्जुनने कहा देखके यह जो सौम्य मानवी-रूप माधव । हुवा प्रसन्न औ' शांत आया मैं निज भावमें ॥ ५१ ॥ ज्ञानेश्वरी ४००

देवेश ! तूने यह रूप दिखाकर । मुझ राह भूले शिशुको बुलाकर । माताने मानो स्नेहसे गोद लेकर । कराया स्तन-पान ॥ ६८ ॥ अजी ! महा सागरमें विश्व-रूपके । जूझ रहा था हमलोंसे तरंगोंके । अब पा लिया किनारा निज-मूर्ति के । दर्शनानुग्रहसे देव ॥ ६९ ॥ सुन तू यह द्वारकापुराध्यक्ष । विश्व रूपसे मानो सूखा था वृक्ष । इस दर्शनसे तूने की है रक्षा । प्रेम-मेघ-वर्षासे ॥ ६७० ॥ तृषार्थिको जैसे मिला अपार । लहराता अमृत-सिंधु तीर । जीनेका संदेह हुवा है दूर । इस दर्शनसे ॥ ७१ ॥ मेरे हृदयांगणमें आज । खिली आनंद-लता सहज । सुख-दर्शनका हुवा साज । मुझको तेरे ॥ ७२ ॥ भगवान उवाच सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम । देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः ॥ ५२ ॥ पार्थके ऐसे बोलको सुन । ऐसे क्यों कहता जनार्दन । तू आ-प्रेमका दृढ स्थान मान । विश्व-रूप वह ॥ ७३ ॥ सदैव यहां मूर्ति-दर्शन । करना केवल लेके तन । भूला तू मेरा यह कथन । सुभद्रापति ॥ ७४ ॥ केवल अनन्य भक्तिसे ही यह मिलता है— अरे ! ऐसा कैसा तू अंधा अर्जुन । हाथ आया स्वर्गका मेरु महान । कहता है वह ओछा तेरा मन । यह है भ्रम-भाव ॥ ७५ ॥ रूप है जो मेरा विश्वात्मक । दिखाया तुझे प्रेम-पूर्वक । शंभूने किये तप अनेक । किंतु न पा सका वह ॥ ७६ ॥ तथा संकटमें अष्टांग-योगके । पडते हैं योगी आशासे इसके । किंतु नहीं पाते भाग्य दर्शनके । इसके कभी वे ॥ ७७ ॥ श्री भगवानने कहा देखा तूने वह मेरा अति दुर्लभ दर्शन । चाहते देव भी नित्य वह स्वरूप दर्शन ॥ ५२ ॥ ४०१ विश्व-रूप-दर्शनयोग (51)

विश्व-रूप कभी किसी काल । देखेंगे अणुमात्र केवल । इस आशासे देव सकल । करते हैं चिंतन ॥ ७८ ॥ अंजली जैसे आशाकी । माथे पर ले सदाकी । निहारते आकाशकी । राह चातक ॥ ७९ ॥ ऐसे उत्कंठासे भरकर । देखते हैं सदा सुर नर । निहारते हैं आठो प्रहर । उसके दर्शनार्थ ॥ ८० ॥ फिर भी विश्व-रूप सरीखा । स्वप्न भी किसीने नहीं देखा । प्रत्यक्ष मिला जो वह सुख । तुझको यहां ॥ ८१ ॥ नाहं वेदैर्न तपसा न दाने न चेज्यया । शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥ ५३ ॥ वहां पहुंचनेका साधन । कोई नहीं जान तू अर्जुन । वेद सहित षड्दर्शन । व्यर्थ है वहां ॥ ८२ ॥ करने विश्व-रूप दर्शन । करनेमें सब तपको जान । अशक्य पानेमें वह स्थान । धनंजय ॥ ८३ ॥ तथा जैसे देखा तूने सविस्तर । वैसे ज्ञान यज्ञसे भी धनुर्धर । निहारना जान तू अति दुस्तर । किसीको भी ॥ ८४ ॥ इसका है एक ही प्रकार । सुन तू यह चित्त देकर । चित्त करता जब स्वीकार । भक्तिको नित्य ॥ ८५ ॥ भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन । ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप ॥ ५४ ॥ वह भी भक्ति है कैसी । वर्षा न जानती जैसी । दूसरा आसरा वैसी । धरती बिन ॥ ८६ ॥ तप यज्ञ किया दान तथा अभ्यास वेदका । तो भी दर्शन है मेरा अशक्य जो तुझे मिला ॥ ५३ ॥ अनन्य भक्तिसे शक्य मेरा है ज्ञान दर्शन । तत्वता जानना पाना प्रवेश मुझमें फिर ॥ ५४ ॥ ज्ञानेश्वरी ४०२

या सकल जल संपत्ति । लेकर सागरमें जाती । जैसे गंगा अनन्य-गति । लय हो मिलती है ॥ ८७ ॥ वैसे सर्व भाव सहित । होकर अति स्नेह-सिक्त । रहना मुझमें हो रत । मेरे ही रूपमें ॥ ८८ ॥ तथा मैं रहता ऐसा । क्षीर-सागरमें है जैसा । तटपे मध्यमें एकसा । रहता है दूध ॥ ८९ ॥ मुझसे चींटी पर्यंत । चराचरमें समस्त । भजनमें नहीं भ्रांत । होता कभी ॥ ६९० । उसी क्षणसे है होती । विश्व-रूपकी प्रतीति । नयन सम्मुख आती । मूर्ति विश्व-रूपकी ॥ ९१ ॥ ईंधनसे जैसे अग्नि प्रदीप्त । होनेसे होता ईंधन समाप्त । तथा ईंधन ही अग्नि बन व्याप्त । होता है वैसे ॥ ९२ ॥ सूर्यके अभावसे जैसे अंबर । बन जाता है स्वयं ही अंधकार । सूर्योदयसे होता है तेजाकार । पूर्णरूपसे वह ॥ ९३ ॥ वैसे है मेरा साक्षात्कार । दूर करता अहंकार । तथा मिटता द्वैताकार । सहज भावसे ॥ ९४ ॥ फिर मैं वह यह संपूर्ण । बनता है जो एक रूपेण । तथा एक भाव एक गुण । होता है समरस ॥ ९५ ॥ मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः संगवर्जितः । निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पांडव ॥ ५५ ॥ मेरे लिए ही जो सतत । करता कर्म समर्पित । मेरे बिन उसे जगत । लगता सूना ॥ ९६ ॥ दृश्यादृश्य उसे सकल । जो कुछ है मैं ही केवल । उसका जीनेका जो फल । मेरा ही नाम ॥ ९७ ॥ मग्न जो कर्ममें मेरे भक्तिसे है भरा हुआ । असंग सर्व-निर्वैर पाता हो मुझ मत्पर ॥ ५५ ॥ ४०३ विश्व-रूप-दर्शनयोग

प्राणि-मात्रोंकी बातको भूल । सर्वत्र देखता मुझे ही केवल । इसीलिये होता निर्वैर सकल । विश्वको भजता ॥ ९८ ॥ अजी ! होता है जो ऐसा भक्त । होनेपे उसका देह-पात । मैं ही हो जाता है वह पार्थ । पूर्ण रूपसे ॥ ९९ ॥ अगले अध्यायकी भूमिका— ऐसा वह विश्वोदर तोंदल । वैसे ही करुणा-रस रसाल । श्रीकृष्ण बोला ऐसे मधुबोल । कहता संजय ॥ ७०० ॥ सुनकर यह पांडुकुमार । आनंद-संपदामें भरकर । श्रीहरि पद-कमल-भ्रमर । मान अपनेको ॥ १ ॥ उसने देखली वे दोनो मूर्ति । अपने चितमें भरी आकृति । तब विश्व-रूपसे कृष्णाकृति । लगी सुंदर ॥ २ ॥ किंतु उसका बना जो ज्ञान । अमान्य करता जनार्दन । व्यापकसे न होता महान । कभी रूप एक ॥ ३ ॥ करनेमें समर्थन । इसका श्री भगवान । कहता है दो वचन । अर्जुनसे ॥ ४ ॥ उन्हें सुनकर अर्जुन । चितमें करता चिंतन । इसमें बड़ा है कौन । पूछें इनसे ॥ ५ ॥ ऐसा सोचकर चितमें पार्थ । करेगा प्रश्न जो अब उचित । सुनेंगे अब हम जो खचित । अगले निरूपणमें ॥ ६ ॥ प्रांजल ओवी प्रबंध । कहा मैंने स-विनोद । यह निवृत्ति प्रसाद । कहे ज्ञानदेव ॥ ७ ॥ भरके सद्भावनाकी अंजली । मैंने ओवी सुमन भरी खुली । अर्पण की हे चरण युगली । विश्व-रूपके ॥ ८ ॥ गीता श्लोक ५५ ज्ञानेश्वरी ओवी ७०८. ॐ

१२ भक्तियोग मातृ-रूपसे गुरुका वन्दन— जय-जय हे शुद्धे । उदारतम प्रसिद्ध । अनवरत आनन्दे । वर्षा कर ॥ १ ॥ विषयव्यालका जकडनव । विषतम भ्रमका अंजन । गुरु-कृपाके स्निग्ध-नयन । निर्विष करेंगे ॥ २ ॥ झुरसा हो कैसे ही तापमें । या जला हो कैसे हि शोकमें । तव कृपा-रस-कल्लोलमें । होंगे शीतल ॥ ३ ॥ अजी ! योग-सुखका उमंग । तव स्नेह-रसके तरंग । सोऽहं सुख सिद्धिसें अंतरंग । भर देते हैं ॥ ४ ॥ आधार शक्तिकी गोदमें । बढाती प्रेम-सुख-मोदमें । हृदयाकाश पालनेमें । झुलाती सदा ॥ ५ ॥ उतारती प्रागज्योतिकी आरति । मन पवन खिलौनोंसे खिलाती । आत्म-सुख अलंकारसे सजाती । बालकको नित ॥ ६ ॥ सत्रहवींका स्तन्य देती । अनाहतके गीत गाती । समाधि-बोधमें सुलाती । समझाके ॥ ७ ॥ तभी तू साधकोंकी मां कहलाती । चरणमें साहित्य-लता खिलती । तब चरण तलकी छाया ही गति । सर्वदा मुझे ॥ ८ ॥ अजी ! सद्गुरुकी कृपा-दृष्टि । तब कारुण्य जिसकी अधिष्ठी । सकल विद्याओंकी जो सृष्टि । धात्री ही है ॥ ९ ॥

तभी हे अंबे श्रीमंते । निज-जन कल्पलते । आज्ञा दे तू मुझे माते । ग्रन्थ-निरूपणकी ॥ १० ॥ नव-रसके भरे सागर । जो हैं महा रत्नोंके आगर । भावार्थके ऊँचे गिरिवर । उठ आयेंगे ॥ ११ ॥ साहित्य सुवर्णकी खान । हो देश-भाषाका अंगन । विवेक-वल्लीका उद्यान । लगे सर्वत्र ॥ १२ ॥ संवाद-फल निधान । प्रमेयोंका उपवन । लगे सर्वत्र गहन । निरंतर ॥ १३ ॥ पटे पाखंडकी खायी महान । मिटे वाग्वाद सब अर्थ-शून्य । भगे कुतर्कके दुष्ट-श्वान । सदाके लिए ॥ १४ ॥ मेरा चित्त सदैव श्री कृष्ण गुणवर्णनमें समर्थ हो— श्रीकृष्ण-गुणगानमें चित्त । रहे मेरा सर्वदा समर्थ । श्रोता श्रवणासनपे रत । रहे निरंतर ॥ १५ ॥ त्रिभुवनके सभी नगर । बने ब्रह्मविद्याका आगर । लेन-देनका रहे आधार । सुविचार मात्र ॥ १६ ॥ मां अपने स्नेहांचलमें । संभालो सर्वदा गोदमें । वहां यह सब लीलामें । उपजाऊँ मैं ॥ १७ ॥ इस विनयसे रीझ उठी । श्रीगुरुकी अनुग्रह-दृष्टि । कहा कर अब गीता गोष्ठि । न बोल अन्य ॥ १८ ॥ वहांका यह महा-प्रसाद । पाकर हुआ महदानन्द । अब कहूँगा गीता-प्रबंध । सुनियेजी ॥ १९ ॥ अर्जुन उवाच एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते । ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ॥ १ । विलीन तुझमें होके भजता भक्त जो तुझे । कोई अक्षर अव्यक्त योगियोंमें श्रेष्ठ कौन हैं ॥ १ ॥ ज्ञानेश्वरी ४०६

ईश्वर प्राप्तिके दो मार्ग— तब सकल वीराधिराज । सोम-वंशका विजयध्वज । बोलने लगा वह आत्मज । पांडु नृपतिका ॥ २० ॥ कृष्ण ! मैने किया श्रवण । तथा विश्वरूप दर्शन । भय-ग्रस्त हुआ जी मन । देख अद्भुत ॥ २१ ॥ कृष्ण-मूर्तिका है रूप सुन्दर । जिसका किया चितने आधार । श्रीकृष्ण तूने ना कहकर । दूर किया मुझसे ॥ २२ ॥ अजी ! व्यक्त तथा अव्यक्त । एकमात्र तू है निर्भ्रांत । भक्तिसे जो मिलता व्यक्त । अव्यक्त योगसे ॥ २३ ॥ अजी ! ये हैं दो ही पथ । दर्शनार्थिको उचित । द्वारमें व्यक्त अव्यक्त । पहुंचाते जो ॥ २४ ॥ कस होता है जो तोला स्वर्णका । वही कस होता एक रत्तिका । इसीलिए जो है एक व्यापक । दूसरा है सीमित ॥ २५ ॥ जो महानता अमृत व सिंधुकी । वही शक्ति है अमृत-बिंदुकी । करनेसे आचमन दोनोंकी । मिलती एकसे जो ॥ २६ ॥ इन दोनोंसे तत्वतः तुझे कौन जानता है ?— बात है यह मेरा चित्त । प्रतीत करता निश्चित । जानना चाहूं तेरा मत । योगेश्वर ॥ २७ ॥ श्रीकृष्ण तूने क्षण एक । स्वीकार किया जो व्यापक । यथार्थमें था या कौतुक । जिज्ञासासे ॥ २८ ॥ तेरे लिए ही सब कर्म । तु ही है जिनका परम । भक्तका यह मनो-धर्म । सर्व-समर्पण ॥ २९ ॥ तथा अन्य सब भांति । तुझको ही मान गति । दृढ़ कर यह मति । भजते तुझे ॥ ३० ॥ तथा जो प्रणवके उस पार । वैखरीके लिए भी जो है पर । उपमा रहित औ' निराकार । वस्तु है जो ॥ ३१ ॥ ४०७ भक्तियोग

वह है अक्षर औ' अव्यक्त । तथा निर्देश देश रहित । तत्वऽमसि भावसे पूजित । ज्ञानियोंसे ॥ ३२ ॥ योगी या भक्तमें तत्वता । तुमको कौन है जानता । कह तू मुझको अनंता । इस समय ॥ ३३ ॥ सुन अर्जुनकी यह बात । जगद्बन्धु हो प्रसन्न चित्त । कहे करना प्रश्न उचित । जानता तू ॥ ३४ ॥ भगवान उवाच मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते । श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः ॥ २ ॥ दिन रात मेरा चिंतन करनेवाला भक्त मुझे जानता है - जैसे अस्ताचलके समीप । गये रवि-बिंबके आतप । रविके पीछे अपने आप । चलता वैसे ॥ ३५ ॥ वर्षा-ऋतुकी जो सरिता । चढ़ती जाती पांडुसुता । वैसी नित्य-नूतन आस्था । दीखे भजनमें ॥ ३६ ॥ मिलन स्थलमें जैसे सागर । गंगा-प्रवाह होता अनिवार । वैसा आता है अनिवार पूर । प्रेम-भावका ॥ ३७ ॥ वैसे जो सर्वेंद्रिय सहित । नित रहता मुझमें रत । स्मरता रहता दिन-रात । न जानकर भी ॥ ३८ ॥ इस प्रकार है जो भक्त । कर सर्वस्व समर्पित । उसको ही मैं योगयुक्त । मानता श्रेष्ठ ॥ ३९ ॥ ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते । सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम् ॥ ३ ॥ मुझमें मनको रोप भजता नित्य जो मुझे । जुड़ा परम श्रद्धासे उसे मैं श्रेष्ठ मानता ॥ २ ॥ जो है अचिंत्य अव्यक्त सर्व-व्यापी अवर्णित । नित्य निश्चल निर्लिप्त जो अक्षर उपासता ॥ ३ ॥ ज्ञानेश्वरी ४०८

निराकारका योग-मार्ग— तथा अन्य है जो पांडव । आरूढ होके सोऽहं भाव । उलझते निरवयव । अक्षरसे ॥ ४० ॥ जहाँ मनकी रसाई नहीं होती । बुद्धिकी दृष्टि भी नहीं पहुँचती । वहाँ होगी इन्द्रियोंकी कौन गति । कह तू अर्जुन ॥ ४१ ॥ ध्यानमें भी वह आना कठिन । होता नहीं उसका एक स्थान । न होता उसका आकार गुण । इससे ही ॥ ४२ ॥ जिसका सर्वत्र सर्व काल । रहना सदैव सर्व-स्थल । देख होती कुंठित सकल । चिंतन-शक्ति ॥ ४३ ॥ जिसका आदि अन्त है नहीं । तथा है नहींका पता नहीं । जिसका कोई उपाय नहीं । जाननेका ॥ ४४ ॥ जो स्थिर न चर । जर ना अजर । पाया वह पर । जिन्होंने स्वयं ॥ ४५ ॥ संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः । ते प्राप्नुवंति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥ ४ ॥ उनके वैराग्य महाज्वालसे । विषय-वाहिनीको जलानेसे । अधजले इंद्रियोंको धैर्यसे । समेट लिया है ॥ ४६ ॥ फिर संयमके पाशमें । पैंठके अंतर तममें । इंद्रियाँ हृदय द्वारमें । बाँध रखी ॥ ४७ ॥ लगाया अपानका जो द्वार । देकर आसन मुद्राधार । मूलबन्धका सुदृढ़ घर । बना लिया ॥ ४८ ॥ तोड़ा लगाव चाहका । ढा दिया ढाँचा भयका । मिटाया निद्रा-तमका । अंधियारा जो ॥ ४९ ॥ रोकता इन्द्रियां सारी सर्वत्र सम-बुद्धिसे । पाते हैं मुझको ही वे विश्वके हितमें रत ॥ ४ ॥ (52) ४०९ भक्तियोग

महा ज्वालाओंसे वजाग्निकी । होली कर अपान धातुकी । व्याधि-वर्ग मुंडोंसे पूजा की । शतघ्नीकी ॥ ५० ॥ फिर मशाल कुण्डलिनीकी । आधारचक्र पर खड़ी की । राह बतायी ब्रह्म-रंध्रकी । उस प्रभाने ॥ ५१ ॥ नव-द्वारके किवाड पर । संयम सांखली लगाकर । खोला सुषुम्ना गवाक्ष-द्वार । धनंजय ॥ ५२ ॥ तब प्राण-शक्ति चामुंडा । प्रहारसे संकल्प भेड । मन महिषासुर मुंड । लेती है बलि ॥ ५३ ॥ इडा पिंगलाका ऐक्य कर । अनाहद नाद जगाकर । जीत लिया इन्द्रामृत नीर । उसी क्षण ॥ ५४ ॥ फिर मध्यमा मध्य विवर । जिसका द्वार अति सुन्दर । खोलके ब्रह्मरंध्र शिखर । पालिया है ॥ ५५ ॥ सिवा मकारांत सोपान । छोड करके जो गहन । फाँकमैं ले शून्य गगन । पाया ब्रह्मैक्य ॥ ५६ ॥ ऐसे जो सर्वत्र समबुद्धि । निगल जानेमें सोऽहं सिद्धि । प्राप्त करते हैं निरवधि । योग दुर्ग ॥ ५७ ॥ अपनेको ही बेचकर । लेते हैं शून्य निराकार । वे भी पाते हैं धनुर्धर । मुझको ही ॥ ५८ ॥ अव्यक्तोपासकसे व्यक्तोपासक भले-क्यों कि— पाते हैं योग बलसे । विशेष हैं कछु ऐसे । नहीं कष्ट ही अधिकसे । पाते हैं वे ॥ ५९ ॥ क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् । अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥ ५ ॥ विशेष क्लेश पाते हैं गूंथ अव्यक्तमें चित्त । होना अज्ञातमें बोध कठिन देह-धारिको ॥ ५ ॥ ज्ञानेश्वरी ४१०

सकल भूतोंके हितार्थ । निरालंब औ' अव्यक्त । उसमें हुआ जो आसक्त । बिना भक्तिके ॥ ६० ॥ उसको इन्द्रादिक पद । करते हैं पथमें वध । तथा ऋद्धि-सिद्धियोंका द्वंद्व । बनते हैं रोडे ॥ ६१ ॥ काम-क्रोधके उत्पात । करते बडे आघात । तथा शून्यसे भिडन्त । नित है तनको ॥ ६२ ॥ प्याससे प्यास ही है पीना । भूखसे भूख ही है खाना । दिन रात हवा गिनना । हवासे ही ॥ ६३ ॥ सतत-जागृति जहां सोना । इन्द्रिय इन्द्रियको ही भोगना । वृक्षोंसे मैत्री करके बोलना । स्वभावसे ॥ ६४ ॥ शीतको बिछाना । तापको ओढना । घरमें हैं सोना । वर्षाके ॥ ६५ ॥ अथवा यह हे धनंजया । अग्नि-प्रवेश है नित-नया । आंतर बिना ही पूर्णतया । करना ही योग ॥ ६६ ॥ न है यह स्वामीका काज । जिसमें मिलता स-व्याज । किंतु मात्र मृत्युसे झूज । नित्य-नयी ॥ ६७ ॥ ऐसा मृत्युसे भी जो भीषण । तप्त विष घूंटसे भी तीक्ष्ण । पहाड लीलनेमें आनन । न फटेगा क्या ? ॥ ६८ ॥ योगीका जो पथ । चलते हैं पार्थ । दुःख ही हैं साथ । उनके सदा ॥ ६९ ॥ अजी ! लोहेके ही चने । पडते हैं नित खाने । पेट भरने या मरने । क्या कहें इसे ? ॥ ७० ॥ बाहुसे तरना सागर । पैरोंसे गगन विहार । ऐसा ही है पांडुकुमार । बात जो यह ॥ ७१ ॥ बीच रण रंगमें जाकर । तनपे घाव न झेलकर । सूर्य मण्डलको भेदकर । आना कैसे ? ॥ ७२ ॥ ४११ भक्तियोग

पंगुकी बराबरी वायुसे । शरीरीकी निर्गुणमें वैसे । प्रवेश है समान रूपसे । जान तू पांडव ॥ ७३ ॥ फिर भी करके साहस । लिपट लेते हैं आकाश । जिससे पायेंगे वे क्लेश । निश्चित जान ॥ ७४ ॥ किंतु इस और पार्थ । न जाने क्या है व्यथा । तभी है ये भक्ति-पंथ । आते हैं जन ॥ ७५ ॥ भक्ति पंथ सरल है—क्यों कि— ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः । अनन्येनैव योगेन मां ध्यायंत उपासते ॥ ६ ॥ कर्मेंन्द्रिय यहां स-सुख । करती हैं कर्म विशेष । प्राप्त हैं जो वर्ण विशेष । स्वभाव-जन्य ॥ ७६ ॥ विधिको है पालना । निषिद्धको त्यागना । अर्पण कर जलाना । कर्म-फलको ॥ ७७ ॥ इस भांति कर समर्पण । कर्मका करते हैं क्षालन । ऐसे करते कर्म अर्जुन । जो हैं भक्त ॥ ७८ ॥ दूसरे भी हैं जो जो सर्व । काया वाचा मनके भाव । मेरे बिना नहीं है ठाव । कोई भी अन्य । ॥ ७९ ॥ ऐसे होके जो मत्पर । उपासते निरंतर । जिससे हैं मेरा घर । ध्यानसे वे ॥ ८० ॥ उनकी रुचि चाह चाव । मेरे लिए ही है ये सर्व । योग-क्षेम मोक्षादि भाव । त्यजे कुलादि भी ॥ ८१ ॥ ऐसा यह अनन्य-योग । न्योच्छावर मन प्राण अंग । उनका क्या है एकेक भाग । करता हूं मैं सब ॥ ८२ ॥ किंतु जो सब ही कर्म करके मुझ अर्पण । अनन्य भक्तिसे मेरा करते नित्य चिंतन ॥ ६ ॥ ज्ञानेश्वरी ४१२

तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् । भवामि न चिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥ ७ ॥ निष्काम भक्तसे मैं अत्यंत प्रेम करता हूँ— अथवा जो पांडुकुमार । आता जो माताके उदर । उससे माता कैसे प्यार । करती है नित ॥ ८३ ॥ वैसा मैं करता उनसे । जहां वे जैसे रहते वैसे । कलिकालके परिहारसे । करता स्वीकार ॥ ८४ ॥ वैसा तो कभी मेरा भक्त । संसार चिंता नहीं करता । अजी ! क्या श्रीमंतकी कांता । मांगती कोरास ॥ ८५ ॥ वैसा वे सर्वदा सर्वत्र । माननाजी मेरा कलत्र । लजाऊँ ना मैं तिलमात्र । उनकी सेवामें ॥ ८६ ॥ जन्म-मृत्युके भंवरमें । देख डूबे हुए विश्वमें । उठे ये विचार मनमें । ऐसे सब ॥ ८७ ॥ भव सागरके खम्भारमें । भय न हो किसके हियमैं । यहां यदि मेरे ही जनमें । होगी भीति ॥ ८८ ॥ इसीलिये मैं अर्जुन ! रूप लेकर सगुण । जहां बसते सज्जन । आया वहां ॥ ८९ ॥ मेरे नाम हैं जो अनंत । नांव है यहां मूर्तिमंत । इसको लेकर मैं पार्थ । बना मांझी ॥ ९० ॥ ये जो परिग्रह रहित । उनको लगाया ध्यानार्थ । जो ये परिग्रह सहित । उनको नाममें ॥ ९१ ॥ प्रेमकी पेटी बांधकर । लाया किसीको तैराकर । पहुंचाया है तीर पर । सायुज्यके ॥ ९२ ॥ रोक्ता मुझमें चित्त उनको शीघ्र मैं स्वयम् । बिना विलम्ब उद्धार करता भव-सिंधुसे ॥ ७ ॥ ४१३ भक्तियोग

जिसने पकडे मत्पाद । भले ही होवे चतुष्पाद । उनको मिला महापद । मेरे सानिध्यका ॥ ९३ ॥ इसीलिए जी भक्त । नहीं होते चिंतित । उनका समुद्धर्त्ता । मैं हूं सदा ॥ ९४ ॥ तथा जबसे की भक्ति । दी मुझको चित्त-वृत्ति । उनके फंदकी शक्ति । खींचती मुझे ॥ ९५ ॥ इस कारणसे अर्जुन । कर भक्तिका आचरण । यह मंत्र रखो स्मरण । मनमें सदा ॥ ९६ ॥ मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय । निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥ ८ ॥ मन बुद्धि आदिका मुझमें लीन होनेसे मद्रूप हो जाता है— अजी ! मानस यह एक । मेरे स्वरूपमें वृत्तिक । करके रख तू निष्कंक । निश्चित बुद्धिसे ॥ ९७ ॥ इन दोनों साधनसे । मुझमें रहे प्रेमसे । मिलन होगा मुझसे । तेरा निश्चित ॥ ९८ ॥ मन बुद्धिने घर । किया मेरे भीतर । रहा क्या भेद और । मेरे तेरेका ॥ ९९ ॥ जैसे ज्योति बुझने पर । मिट जाती कांति सत्वर । या अस्त होते ही भास्कर । जाता प्रकाश ॥ १०० ॥ तजता जब तनको प्राण । निकल जाते सभी कण । जहां मन-बुद्धिका गमन । वहां अहंकार ॥ १ ॥ इसीलिये मेरे स्वरूपमें । मन बुद्धिके रत आनेमें । होगा तू विश्व-व्यापकतामें । मैं ही मान ॥ २ ॥ मनको मुझमें रोक बुद्धि भी मुझमें रख । तभी तू फिर निःशंक पाएगा मम रूप ही ॥ ८ ॥ ज्ञानेश्वरी ४१४

इस बचनमें कहीं । अन्यथा कछु भी नहीं । मेरी प्रतिज्ञा है यही । सौगंध पूर्वक ॥ ३ ॥ अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् । अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनंजय ॥ ९ ॥ मद्रूपका क्षणिक अनुभव-अभ्यास-योग— अथवा यह चित्त । मन बुद्धि सहित । मुझको अचुंबित । न दे सके तो ॥ ४ ॥ तब तो ऐसा कर । दिनमें क्षण भर । सबको भूलकर । रत हो मुझमें ॥ ५ ॥ जिससे तू निमिष एक । अनुभवेगा मेरा सुख । उससे होगा अरोचक । विषय-मात्र ॥ ६ ॥ जैसा शरत्काल आता । सूखते जाती सरिता । वैसी छूटेगी ममता । प्रपंचसे ॥ ७ ॥ फिर पूर्णमासीसे जैसे । शशि-बिंब लगता वैसे । अमावसमें पूर्णरूपसे । मिट जाता है ॥ ८ ॥ ऐसे वासनासे निकलकर । मुझमें चित्त चुभते जाकर । धीरे धीरे वह अर्जुन स्थिर । होगा मद्रूप ॥ ९ ॥ अजी ! अभ्यास योगका अर्थ । एक ही जो है सर्व समर्थ । जिससे न होगा कुछ प्राप्त । ऐसा नहीं ॥ ११० ॥ सुन अभ्यासका बल । देता मति अन्तराल । व्याघ्र सर्पको प्रांजल । करते इससे ॥ ११ ॥ विषका ही आहार बनता । सागरपे पगसे चलता । कोई वाग्ब्रह्मको ही जीतता । अभ्यास बलसे १२ ॥ करना चित्तको शांत असाध्य मुझमें तब । अभ्यास योगसे चाह तू मेरी प्राप्तिको कर ॥ ९ ॥ ४१५ भक्तियोग

अभ्यासको कुछ नहीं । सर्वथा दुष्कर कहीं । इसलिए मुझमें ही । उससे रत हो ॥ १३ ॥ अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव । मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि ॥ १० ॥ निराग्रह वृत्तिसे जीवन-यापन— अथवा अभ्यासमें ऐसा । न आता साहस सहसा । तब रह अब है जैसा । अर्जुन तू ॥ १४ ॥ इन्द्रियोंका निग्रह न कर । विषय-भोग कम न कर । याभिमानका त्याग न कर । स्वजातिका ॥ १५ ॥ कर कुल धर्माचरण । विधि निषेधका पालन । तब भी सुखसे जीवन । चलता रहता है ॥ १६ ॥ किंतु काया वाचा मन । करता जो आचरण । उसका जो अहंपन । न मान तू ॥ १७ ॥ जिसको है विश्व चलाना । पूर्ण यह उसने जाना । करना या नहीं करना । उसका काम ॥ १८ ॥ उसमें कुछ जो न्यून पूर्ण । उससे अछूता रख मन । स्वजातिके लिए ही जीवन । देकर तू ॥ १९ ॥ जैसा ही माली चलाता ले जाता । वैसा ही पानी है सहज जाता । यदि तू वैसा ही करता जाता । निराभिमानसे ॥ १२० ॥ वैसे ही देख तू पार्थ । कैसा है अपना पथ । देखता क्या यह रथ । अल्पसा भी ॥ २१ ॥ तभी प्रवृत्ति या निवृत्ति । इससे दूर रख मति । तथा अखंड चित्त-वृत्ति । मेरे स्मरणमें ॥ २२ ॥ अभ्याससे न हो साध्य तब मत्कर्म आचर । मिलेगी तुझको सिद्धि सत्कर्म करने पर ॥ १० ज्ञानेश्वरी ४१६

जैसे वृक्ष अथवा वेल। गिर देते हैं पक्व फल। वैसे तज दें फल सकल। कर्म सिद्धिके ॥ ज्ञा. १२-१२९

The provided image is completely blank and contains no text.