भारतकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

[ १९ ]

विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
८३- पार्वतीको पुत्रकी प्राप्ति होनेपर हिमवान्‌का शिशुके दर्शनकेसुनाना, विश्वकर्माका प्रस्थान, उसी समय वृकासुर
लिये आना और उसे अनेक प्रकारसे आभूषणोंसे अलंकृतकरदैत्यका वहाँ आना, गुणेशद्वारा असुरका वध ........४९४
उसका 'हेरम्ब' यह नाम रखना, फिर हिमालयका प्रस्थान,९६- सातवें वर्षमें गुणेशका यज्ञोपवीत-संस्कार सम्पन्न
गृध्रासुरद्वारा बालक हेरम्बका हरणकर आकाशमें ले चलना,होना, यज्ञोपवीत-महोत्सवका वर्णन, उसी अन्तरालमें
पार्वतीका शोक, बालक हेरम्बद्वारा गृध्रासुरका वध .....४६५वहाँ आये कृतान्त तथा काल नामक दैत्योंका वध
८४- बालक हेरम्बकी बाल-लीलाद्वारा क्षेम, कुशल, क्रूरकरना, महर्षि कश्यप तथा अदितिद्वारा गुणेश्वरका
तथा बालासुर आदि दैत्योंके वधका आख्यान ...........४६७पूजन, देवताओंद्वारा बालक गुणेश्वरकी महिमाका
८५- महर्षि मरीचिका पार्वतीपुत्रका दर्शन करनेके लिये आना,प्रतिपादन ................................................................४९८
मरीचिद्वारा देवी पार्वतीसे विनायकके परब्रह्मस्वरूपका९७- माता कद्रूका अपने पुत्र शेषनागके पास पातालमें जाना
प्रतिपादन, बालककी रक्षाके लिये महर्षिका गणेशकवचऔर विनता तथा गरुड़द्वारा हुए अपने अपमानका बदला
बतलाना, गणेशकवचका माहात्म्य तथा उसकी उपदेश-लेनेके लिये कहना, वासुकि आदि नागों तथा गरुड़
परम्परा ................................................................४७०आदि पक्षियोंका घनघोर युद्ध, नागोंद्वारा विनता और
८६- गौतम आदि महर्षियोंद्वारा पार्वतीपुत्रका भूमि-उपवेशन नामकउनके पुत्रोंको बन्धनमें डालना, विनताद्वारा मुनि कश्यपको
संस्कार सम्पन्न किया जाना, बालकके वधकी इच्छासेअपना दुःख निवेदित करना और कश्यपद्वारा उसे एक
व्योमासुरका वहाँ आना, बालकद्वारा व्योमासुरका वध...४७२अभेद्य अण्डकी उत्पत्तिका आश्वासन देना ...............५०२
८७- बालक विनायकद्वारा शतमाहिषा नामक राक्षसी और९८- आठवें वर्षमें गुणेश्वरद्वारा विचित्र दैत्यका वध और
कमठासुरका वध, इस आख्यानके श्रवण और श्रावणकाविनताके गर्भसे उत्पन्न अण्डका भेदन, उसमेंसे मयूर
माहात्म्य ................................................................४७४नामक पक्षीका प्राकट्य, विनताद्वारा गुणेश्वरकी स्तुति,
८८- आठवें मासमें बालक गुणेशद्वारा किये गये तल्पासुरगुणेश्वरका मयूरको अपना वाहन बनाना और मयूरेश्वर
एवं दुन्दुभि नामक दैत्योंके वधका आख्यान ...........४७७नामसे प्रसिद्ध होना ..................................................५०५
८९- दसवें मास तथा ग्यारहवें मासकी अवस्थामें बालक९९- नौवें वर्षमें गुणेश्वरका बालकोंके साथ जलक्रीडा
गुणेशद्वारा किये गये आजगरासुर तथा शलभासुरकरना, गुणेशद्वारा अश्वरूपी दैत्यका वध, नागकन्याओंका
नामक दैत्योंके वधकी कथा ..................................४७९गुणेशको नागलोक ले जाना, भगासुर
९०- बालक गुणेशके द्वारा बारहवें मासमें नूपुर तथानामक दैत्यके वधकी कथा ..................................५०७
अविपुत्र नामक दैत्योंका वध ...................................४८११००- नागलोकमें नागकन्याओंद्वारा मयूरेश्वरका स्वागत-सत्कार,
९१- बालक गुणेशद्वारा कूट तथा मत्स्य आदि रूप धारणनागराज वासुकिको मयूरेश्वरद्वारा आभूषणके रूपमें धारण
करनेवाले दैत्योंके वधकी लीला-कथा ....................४८४करना, सर्पों तथा मयूरका युद्ध, शेषनागको आभूषणके रूपमें
९२- चार वर्षकी अवस्थावाले बालक गुणेशके द्वारा दैत्यधारण करना, शेषनागद्वारा मयूरेशकी स्तुति, शेषनागद्वारा
कर्दमासुरका वध, गुणेशद्वारा माता पार्वतीको अपनेसम्पाती आदिको बन्धन-मुक्त करना, मयूरेश्वरका नागलोकसे
मुखके भीतर समस्त विश्वका दर्शन कराना, माताद्वाराधरतीपर आना, भगासुरसे बालकोंको मुक्त कराकर वापस
गुणेशकी स्तुति ........................................................४८७घरमें आना और अपनी माया दिखाना .......................५११
९३- गुणेशके पाँचवें वर्षमें खड्गासुरका ऊँटका रूप बनाकर१०१- मयूरेश्वरद्वारा दसवें वर्षमें दैत्य कमलासुरकी सेनाका
तथा चंचल दैत्यका छायाका रूप धारणकर गुणेशकीवध, मरे हुए सैनिकोंका मयूरेश्वरकी कृपासे मुक्ति
बालमण्डलीमें आना, गुणेशद्वारा लीलापूर्वक उनकाप्राप्त करना ..............................................................५१४
वध करना .............................................................४९०१०२- दैत्य कमलासुर और मयूरेश्वरके युद्धका वर्णन ......५१६
९४- मुनिबालकोंके साथ गुणेशका महर्षि गौतम तथा१०३- कमलासुर और मयूरेशका भीषण युद्ध, कमलासुरके
अहल्याके आश्रममें जाकर ओदन-क्रीडा करना,रक्तबिन्दुओंसे अनेक दैत्योंकी उत्पत्ति, देवी सिद्धि-
पार्वतीद्वारा गुणेशको बन्धनमें डालना तथा उनकीबुद्धिकी सेनाके सैनिकोंद्वारा उन असुरोंका भक्षण,
मायासे मोहित होना, महर्षि गौतमद्वारा अहल्यासेमयूरेश्वरद्वारा कमलासुरका वध और मुनिगणोंद्वारा की
गुणेश्वरकी भगवत्ताका वर्णन ................................४९२गयी मयूरेश्वर-स्तुति .............................................५१८
९५- गुणेशके छठे वर्षमें विश्वकर्माका उनके दर्शनके लिये१०४- ब्रह्माजीद्वारा मयूरेशकी स्तुति, स्तुतिका माहात्म्य,
पार्वतीके पास आना, विश्वकर्माका पार्वतीकी स्तुति'कमण्डलुभवा' नामक नदीका प्राकट्य, मयूरेशकी
करना, पार्वतीका उन्हें भक्तिका वर देना, विश्वकर्माद्वारामायासे ब्रह्माका मोहित होना, मयूरेशकी परीक्षाके
गुणेशका स्तवन और उन्हें अंकुश आदि आयुध प्रदानलिये ब्रह्माद्वारा सृष्टिका तिरोधान, मयूरेशद्वारा पुनः
करना, गुणेशके द्वारा आयुधोंकी प्राप्ति कहाँसे हुई-सृष्टि कर लेना और ब्रह्माजीको अपने विश्वरूपका
इस जिज्ञासापर विश्वकर्माका सूर्य तथा संज्ञाकी कथादर्शन कराना ..........................................................५२०

[ २० ] विषय पृष्ठ-संख्या १०५- मयूरेशकी बारहवीं जन्मतिथिके महोत्सवमें विष्णुभक्त ब्राह्मण विश्वदेवका वहाँ आना, पार्वतीद्वारा उनका आतिथ्य, किंतु विश्वदेवद्वारा यह कहकर उनका आतिथ्य स्वीकार नहीं करना कि वे केवल विष्णुको ही भगवान् मानते हैं अन्यको नहीं, तब मयूरेशका अपनी मायाद्वारा उनकी भेदबुद्धिको दूर करना, इस प्रसंगमें गणेशभक्त पराशरकी कथा ......................... ५२४ १०६- मयूरेशद्वारा तेरहवें वर्षमें मंगल दैत्यका वध और शिवके ललाटपर स्थित चन्द्रमाके हरणकी लीला, मयूरेशका गणोंका स्वामी होना ..................... ५२७ १०७- मयूरेश्वरके चौदहवें वर्षमें मुनियोंके कहनेपर पार्वतीका इन्द्रयाग करना, मयूरेश्वरद्वारा कल तथा विकल नामक दैत्योंका वध और फिर इन्द्रयागको विध्वंस करना, रुष्ट होकर इन्द्रका मयूरेशपुरवासियों तथा मयूरेशपुरीको संतप्त करना, मयूरेश्वरका सबकी रक्षा करना एवं इन्द्रका मयूरेशकी शरण ग्रहण करना ............... ५२९ १०८- पन्द्रहवें वर्षमें मयूरेश्वरद्वारा व्याघ्ररूपी दैत्यको विकृत रूपवाला बनानेकी कथा तथा यमराजके दर्वापहरणका आख्यान .................................................... ५३२ १०९- देवर्षि नारदसे शिव-पार्वतीका मयूरेशके विवाहके लिये कन्याके अन्वेषणके लिये कहना, देवर्षि नारदद्वारा सिद्धि एवं बुद्धि नामक कन्याओंको मयूरेशके योग्य बताना, शिव-पार्वती तथा ससैन्य मयूरेशका गण्डकीनगरीकी ओर प्रस्थान, मार्गमें हेम नामक दैत्यका ससैन्य आगमन, मयूरेशकी कृपासे मुनिबालकोंद्वारा अभिमन्त्रित कुशोंसे असुर-सेनाका वध ...................................... ५३४ ११०- सिन्धु दैत्यद्वारा गण्डकीनगमें बन्दी बनाये गये देवताओंको मुक्त करनेके लिये मयूरेशका नन्दीश्वरको वहाँ प्रेषित करना ......................................... ५३६ १११- नन्दीश्वरका दैत्य सिन्धुकी सभामें प्रवेश करके मयूरेशका सन्देश सुनाना, किंतु दैत्य सिन्धुके द्वारा देवताओंको मुक्त करनेसे मना कर देना, नन्दीश्वरका वापस लौटकर मयूरेशको सम्पूर्ण वृत्तान्त बतलाना, मयूरेशद्वारा गणोंको युद्धकी आज्ञा देना........................... ५३८ ११२- मयूरेशका गणोंकी सेनाके साथ सिन्धुदैत्यपर आक्रमण करनेके लिये प्रस्थान, गणोंद्वारा दैत्य सिन्धुकी सेनापर आक्रमण, पराजित हो सिन्धुसेनाका पलायन, क्रुद्ध दैत्य सिन्धुका स्वयं भी युद्धके लिये प्रस्थान ......... ५४० ११३- युद्धके लिये दैत्यराज सिन्धुकी चतुरंगिणी सेनाका प्रस्थान, मयूरेशकी सेना और दैत्यसेनाका भीषण संग्राम, सिन्धुसेनाके दो अमात्य वीर-मैत्र और कौस्तुभका वीरभद्र एवं कार्तिकेयसे युद्ध तथा दोनों अमात्य वीरोंके वधका वर्णन ........................... ५४२ विषय पृष्ठ-संख्या ११४- दैत्यराज सिन्धुकी सेनाका मयूरेशकी सेनाके साथ भीषण संग्राम और सिन्धुसेनाकी पराजय .............. ५४५ ११५- दैत्यराज सिन्धुका सुसज्जित होकर रणभूमिके लिये प्रस्थान, सिन्धुका मयूरेशकी सेनाके वीरोंको पराजितकर मयूरेशके साथ घोर संग्राम, मयूरेशका सर्वत्र चतुर्भुजरूप दिखाना, मोहित होकर सिन्धुदैत्यका अपने भवनमें वापस आना.. ५४७ ११६- देव मयूरेशद्वारा सिन्धुदैत्यपर विजयप्राप्ति करनेपर मुनिगणों तथा देवी पार्वती एवं शिवका उनके दर्शनके लिये आना, युद्धमें मृत देवगणोंको खोजनेके लिये मयूरेश तथा मुनिगणोंका जाना, देव मयूरेशद्वारा मृत देवोंको अपने शरीरकी वायुके स्पर्शसे जीवित करना .. ५५० ११७- पराजित होकर दैत्यराज सिन्धुका अपने भवनमें आकर अत्यन्त चिन्ताग्रस्त होना, उसकी पत्नी दुर्गाका वहाँ उपस्थित होना, दुर्गाके पूछनेपर दैत्यराज सिन्धुका अपनी चिन्ताका कारण बतलाना, दुर्गाका उसे समझाना तथा मयूरेशसे सन्धि करनेके लिये कहना, किंतु सिन्धुका उसके प्रस्तावको अस्वीकृतकर पुनः युद्धके लिये सुसज्जित होना................................... ५५२ ११८- कल तथा विकल नामक दैत्योंका चतुरंगिणी सेना लेकर युद्धके लिये प्रस्थान, देवसेनामेंसे सेना लेकर पुष्पदन्त तथा वृषका उन दोनोंके साथ भयंकर संग्राम, वीरभद्र और षडाननद्वारा दोनों दैत्योंका वध, दैत्य सैनिकोंद्वारा युद्धका समाचार दैत्यराज सिन्धुको देना............. ५५४ ११९- दैत्यराज सिन्धुका पराजित होकर चिन्ताग्रस्त होना, उसके दो पुत्र धर्म तथा अधर्मका पिताको आश्वस्त करना तथा युद्धके लिये आज्ञा माँगना, सेना लेकर दोनोंका युद्धार्थ प्रस्थान, वीरभद्र, कार्तिकेय, हिरण्यगर्भ तथा भूतराजकी सेनाओंका दैत्यसेनाके साथ भीषण संग्राम, कार्तिकेयका धर्म एवं अधर्मका वध करना तथा सम्पूर्ण समाचार शिव-पार्वतीको निवेदित करना ..... ५५७ १२०- दूतोंका धर्म एवं अधर्मकी मृत्युका समाचार दैत्यराज सिन्धुको देना, सिन्धुद्वारा शोक प्रकट करना, सखियोंद्वारा समाचार मिलनेपर सिन्धुपत्नी दुर्गांका राजसभामें उपस्थित हो पुत्रोंके लिये विलाप करना, सखियोंद्वारा उसे आश्वस्त करना, क्रुद्ध दैत्यराज सिन्धुका चतुरंगिणी सेना लेकर युद्धके लिये प्रस्थान, उसी समय पिता चक्रपाणिका प्रकट होकर पुत्र सिन्धुको मैत्रीका उपदेश देना, किंतु सिन्धुका उसे अस्वीकृत कर देना ........ ५५९ १२१- राक्षसराज सिन्धुकी सेनाके साथ कार्तिकेय, वीरभद्र आदि देववीरोंकी सेनाओंका भयंकर संग्राम, सिन्धुसेनाकी पराजय, दैत्यराज सिन्धुका स्वयं युद्धके लिये प्रस्थान, मयूरेशके परशुसे उत्पन्न कालपुरुषद्वारा दैत्य सैनिकोंका भक्षण किया जाना, चिन्तित होकर दैत्य सिन्धुका घरमें आकर छिपकर रहना ... ५६२

[ २१ ] [ स्तम्भ १ ] विषय | पृष्ठ-संख्या १२२- गौतम आदि महर्षियों तथा भगवान् शिवद्वारा मयूरेशकी महिमा एवं पराक्रमका वर्णन, षडानन आदिका देवर्षि नारदके साथ संवाद, देव मयूरेशका दैत्य सिन्धुसे युद्धके लिये सन्नद्ध होना, किंतु नन्दी, भृंगी आदिका उन्हें रोककर स्वयं युद्धके लिये प्रस्थान करना, वीरभद्र तथा भूतराजका भी साथमें जाना, दैत्य सिन्धुके साथ उनका युद्ध और दैत्यसेनाका पराजित होना.......... ५६६ १२३- देव मयूरेश और दैत्य सिन्धुका भीषण संग्राम, मयूरेशका विराट्रूप धारण करना, पुनः लघुरूपमें होकर मन्त्रोंद्वारा अभिमन्त्रित परशुद्वारा सिन्धुका वध करना, शिव-पार्वती तथा देवोंका उपस्थित होना और मयूरेशस्तोत्रद्वारा स्तुति करना ............................... ५६९ १२४- सिन्धु-वधके अनन्तर माता-पिता तथा पत्नीका करुण विलाप, पत्नी दुर्गाका सती होना, पिता चक्रपाणिके द्वारा मयूरेशकी स्तुति और उनसे गण्डकीनगमें चलनेके लिये प्रार्थना करना, शिव-पार्वती तथा गणों एवं मुनियोंसहित मयूरेशका गण्डकीनगरके लिये प्रस्थान .. ५७२ १२५- कारागारसे मुक्त हुए देवताओंका मयूरेशकी महिमाका गान करना, चक्रपाणिद्वारा मयूरेशकी प्रथम पूजा करनेसे इन्द्रका रुष्ट होना, महान् ध्वनिके साथ मयूरेशका प्रकट होना और पुनः पंचदेवोंके रूपमें अवतरित होना, ब्रह्माजीद्वारा सिद्धि-बुद्धि नामक कन्याओंका मयूरेशके साथ विवाह करना ......... ५७५ १२६- विवाहके अनन्तर मयूरेशका अपनी पुरीको प्रस्थान, मयूरेशपुरीका वर्णन, भाद्रपदमासके गणेशव्रतकी विधि तथा उसकी महिमा, मयूरेशका द्वापरयुगमें सिन्दूरवधके लिये पुनः अवतरित होनेका आश्वासन देकर अन्तर्धान होना, ब्रह्माजीद्वारा एक सुन्दर प्रासादको निर्मितकर उसमें गजाननप्रतिमाकी प्रतिष्ठा करना, मयूरेशचरित्र-श्रवणकी महिमा ............................................... ५७९ १२७- गजानन-अवतारके प्रसंगमें ब्रह्माजीकी जँभाईसे सिन्दूरकी उत्पत्ति, ब्रह्माजीद्वारा उसे अनेक वरदानोंकी प्राप्ति, वरदानोंकी परीक्षाके लिये सिन्दूरका ब्रह्माजीको ही लक्ष्य बनाना और ब्रह्माजीका भयभीत होकर वैकुण्ठ जाना.................. ५८२ १२८- ब्रह्माजीका नारायणको सिन्दूरदैत्यके विषयमें बताना, उसी समय सिन्दूरका वहाँ आना, भगवान् विष्णुके कहनेपर सिन्दूरका भगवान् शिवसे युद्ध करने कैलासपर जाना, शिवको ध्यानस्थ देखकर सिन्दूरका पार्वतीका हरण करना, मयूरेशका द्विज्रूपसे उपस्थित होकर सिन्दूरको समझाना, सिन्दूरका वापस लौट जाना, मयूरेशद्वारा माता पार्वतीको अपने गजानन-अवतारका स्मरण दिलाना .............. ५८४ १२९- सिन्दूरके अत्याचारसे पीड़ित देवताओं तथा ऋषियोंद्वारा विनायककी स्तुति, दुःखप्रशमनस्तोत्र और उसका माहात्म्य, विनायकद्वारा सिन्दूरके वधका आश्वासन दिया जाना, माता पार्वतीके गर्भमें तेजःपुंजका प्रकट होना, उस तेजसे सन्तप्त पार्वतीका भगवान् शिव तथा गणोंके साथ पर्थली नामक वनमें जाना और वहाँ सखियोंके साथ निवास करना .............................. ५८८ [ स्तम्भ २ ] विषय | पृष्ठ-संख्या १३०- पार्वतीजीके गर्भसे गजाननका आविर्भाव तथा उनके विलक्षण स्वरूपको देखकर विस्मित पार्वतीको शिवजीके द्वारा प्रबोधित किया जाना................................... ५९१ १३१- भगवान् शंकरकी आज्ञासे नन्दीका शिशु गजाननको वरेण्यपत्नीके पास ले जाना.................................. ५९३ १३२- सिन्दूरका गजाननको ले जाकर नर्मदा में फेंकना, गजाननके रक्तसे रंजित शिलाओंकी 'नार्मद गणेश' संज्ञा, उमामहेश्वरका कैलास-गमन ................... ५९४ १३३- राजा वरेण्यके द्वारा गजमुखाकृति शिशुका भयभीत होकर वनमें परित्याग और पराशर मुनिके द्वारा शिशु गजाननका पालन ............................................... ५९६ १३४- पराशराश्रममें मूषकका प्रबल उपद्रव और गजाननका उसे दमितकर अपना वाहन बनाना........................ ५९८ १३५- गजाननके वाहन मूषकके पूर्वजन्मका वर्णन.......... ६०० १३६- गजाननका सिन्दूरके साथ युद्धार्थ प्रस्थान, सिन्दूरके दूतोंसे गजाननका संवाद एवं सिन्दूरका युद्धहेतु आगमन............................................................. ६०२ १३७- युद्धभूमिमें गजाननका सिन्दूरको मारकर उसके रक्तका अपने शरीरमें लेपन करना और देवताओं, ऋषियों तथा राजाओंका वहाँ आकर पूजन-स्तवनादि करना......... ६०४ १३८- सूत-शौनक-संवादमें गणेशगीताका उपक्रम ............ ६०७ १३९- कर्मयोग.......................................................... ६१० १४०- ज्ञानयोग ......................................................... ६१२ १४१- संन्यासयोग ................................................... ६१४ १४२- योगावृत्तिकी प्रशंसा........................................... ६१६ १४३- श्रीगणेशजीका राजा वरेण्यको अपने तात्त्विक स्वरूपका परिचय देना .................................................... ६१७ १४४- श्रीगणेशजीका राजा वरेण्यसे उपासना-योगका वर्णन करना ............................................................ ६१८ १४५- श्रीगणेशजीका राजा वरेण्यको अपने विराट्रूपका दर्शन कराना .................................................... ६१९ १४६- सगुणोपासनाकी श्रेष्ठता; क्षेत्र, ज्ञान तथा ज्ञेयका वर्णन.. ६२१ १४७- दैवी, आसुरी और राक्षसी प्रकृति....................... ६२२ १४८- तप, दान, ज्ञान, कर्म, कर्ता, सुख-दुःख, ब्रह्म एवं वर्णानुसार कर्मोंके भेद तथा गणेशगीताकी महिमा .. ६२३ १४९- ब्रह्माजीके द्वारा व्यासदेवकी जिज्ञासाका समाधान, कलियुगवर्णन एवं कलियुगके अन्तमें गणपति का अवतीर्ण होकर धर्म-संस्थापन ........................................... ६२५ १५०- व्यासमुनिको गणपतिदेवका साक्षात्कार और उनसे वरकी प्राप्ति ..................................................... ६२८ १५१- गणेशपुराणके श्रवणसे राजाकी रोगनिवृत्ति और गणपतिके द्वारा प्रेषित विमानपर आरूढ़ होकर परमधामगमन .... ६२९ १५२- अमात्योंका राजसभामें जाकर हेमकण्ठको राजाके आगमनकी सूचना देना और उसी प्रसंगमें राजा सोमकान्तके ऊपर हुए गणपति-अनुग्रह आदिका वर्णन करना ............................................................ ६३१

[ २२ ] {cc|cc} विषय & पृष्ठ-संख्या & विषय & पृष्ठ-संख्या

\hline १५३- राजा सोमकान्तका विमानसे उतरकर पुत्र तथा नागरिकोंसे & & आवरणोंका क्रमिक वर्णन.................................. & ६३६

मिलना और उन सभीके साथ गणपतिलोकको & & १५५-गणेशपुराणीय माहात्म्य-निरूपणके प्रसंगमें विविध &

जाना ..................................................... & ६३४ & इतिहास एवं ग्रन्थकी फलश्रुति ....................... & ६३७

१५४-राजाके पूछनेपर गणपतिदूतोंका काशीमें स्थित विनायकोंके & & १५६- नम्र निवेदन एवं क्षमा-प्रार्थना................... & ६४१

\begin{center} \textbf{चित्र-सूची} \end{center} {cc|cc} विषय & पृष्ठ-संख्या & विषय & पृष्ठ-संख्या

\hline \multicolumn{4}{c}{\textbf{( रंगीन चित्र )}}

१- भगवान् गणपतिका मनोहर रूप.......... आवरण-पृष्ठ प्रथम & & ८- भगवान् शिवकी क्रोधाग्निसे कामदहन ...................... & ७

२- सिद्धि-बुद्धिद्वारा उपासित श्रीगणेश..... '' '' द्वितीय & & ९- दैत्यराज बलिकी यज्ञशालामें भगवान् वामनका आगमन .... & ७

३- भगवान् मयूरेश्वर गणपति ...................................... & ३ & १०- चार युगोंमें भगवान् गणेशके पृथक्-पृथक् चार अवतार .... & ८

४- श्रीशिव-परिवार ................................................ & ४ & ११- महर्षि व्यासद्वारा भगवान् गणेशका पूजन ................... & ९

५- देवसेनापति भगवान् श्रीकार्तिकेय ............................ & ५ & १२- श्रीगणेशजीद्वारा राजा वरेण्यपर कृपा........................ & ९

६- भगवान् शिव एवं माता पार्वतीके अंकमें & & १३- देवगणोंके समक्ष श्रीगणेशजीद्वारा सिद्धि-बुद्धिका &

बालक गणेश ................................................ & ६ & पाणिग्रहण ................................................. & ९

७- भगवान् शिवद्वारा त्रिपुरदाह ................................... & ६ & १४- महाराष्ट्रस्थित अष्टगणपतिस्थानोंके विग्रह .................. & १०

\multicolumn{4}{c}{\textbf{( सादे चित्र )}}

१. भगवान् गणेश ................................................... & ३४ & १९. प्रद्युम्न और रतिको देखकर आश्चर्यचकित रुक्मिणी .... & २६०

२. देवताओंद्वारा भगवान् गणेशका पूजन ...................... & ३५ & २०. शिव-पार्वती-संवाद ........................................ & २६०

३. सूत-शौनक-संवाद ............................................ & ४० & २१. विनायकके दर्शनहेतु उत्सुक काशीकी स्त्रियाँ.......... & २९९

४. श्रीगणेशपुराणकी कथा सुनाते सूतजी .................... & ४३ & २२. काशीनगरीको जलाता ज्वालामुख .................... & ३०५

५. भगवती योगनिद्राकी स्तुति करते ब्रह्माजी ............... & ७३ & २३. शुक्लशर्मा एवं विढुमापर गणेशजीकी कृपा ............. & ३२८

६. भगवान् विष्णुद्वारा मधु-कैटभका वध .................... & ७८ & २४. तपस्यामें संलग्न देवमाता अदिति ......................... & ३३९

७. भक्त बल्लालपर श्रीगणेशजीकी कृपा .................... & ८९ & २५. महर्षि कश्यप और दिति ................................... & ३३९

८. देवताओंपर भगवान् गणेशकी कृपा ........................ & १२२ & २६. हिरण्यकशिपुका वध करते भगवान् नृसिंह ............ & ३४०

९. त्रिपुरदाह ......................................................... & १५९ & २७. भगवान् वामनका बलिकी यज्ञशालामें प्रवेश ............. & ३४५

१०. श्रीगणेशपुराणके कतिपय लीला-प्रसंग-एक & & २८. भगवान् शिव और भगवती पार्वतीका संवाद ............. & ३४७

[क] महर्षि गौतमद्वारा इन्द्र और अहल्याको शाप .. & १६५ & २९. यज्ञमें अवहेलना देख क्रुद्ध देवी सावित्री................ & ३५६

[ख] देवादिद्वारा शिवजीसे त्रिपुरासुर-वधकी प्रार्थना. & १६५ & ३०. भगवान् विष्णुद्वारा चक्र-सरोवरका निर्माण ............ & ३६२

[ग] श्रीगणेश-पूजन ........................................... & १६५ & ३१. भस्मासुरके भयसे भागते भगवान् शिव ................... & ३६५

[घ] श्रीगणेश-कृपासे चन्द्रको पुनः अपने स्वरूपकी & & ३२. श्रीगणेशपुराणके कतिपय लीला-प्रसंग-तीन &

प्राप्ति .................................................... & १६५ & [क] श्रीशिव-परिवार ........................................ & ३७५

११. श्रीगणेशपुराणके कतिपय लीला-प्रसंग-दो & & [ख] श्रीगणेश-परिवार ...................................... & ३७५

[क] तपस्यारत श्रीशिवपर कामदेवका आक्रमण .... & १६६ & ३३. श्रीगणेशपुराणके कतिपय लीला-प्रसंग-चार &

[ख] भगवान् शिवद्वारा कुमार कार्तिकेयको उपदेश. & १६६ & [क] भगवान् वामनको राजा बलिद्वारा भूदान ......... & ३७६

[ग] मत्स्य-उदरसे प्रद्युम्नका निकलना ................. & १६६ & [ख] भगवान् शिवद्वारा सूर्यदेवको काशीपुरी भेजना . & ३७६

[घ] प्रद्युम्नद्वारा शम्बरासुरका वध ..................... & १६६ & ३४. काशिराज राजा दिवोदासकी तपस्या ....................... & ३८३

१२. कार्तवीर्यद्वारा कामधेनुका अपहरण ........................ & २३६ & ३५. विष्णुलोकमें पार्षदोंसहित श्रीलक्ष्मी-नारायण ......... & ३९६

१३. परशुरामद्वारा कार्तवीर्यकी भुजाओंका काटना ............ & २४४ & ३६. पाताललोकमें विराजमान शेषनाग ....................... & ५०२

१४. भगवान् शिवकी प्रार्थना करते देवता एवं मुनिगण ....... & २४५ & ३७. श्रीगणेशपुराणके कतिपय लीला-प्रसंग-पाँच &

१५. कामदेवका भगवान् शिवपर बाणका प्रहार करना.... & २४७ & [क] सिद्धि-बुद्धिके साथ मयूरेशका विवाह ........... & ५७७

१६. देवताओंद्वारा कार्तिकेयका स्तवन-वन्दन ................. & २५२ & [ख] व्यासजीद्वारा भगवान् गणेशजीकी स्तुति .......... & ५७७

१७. कार्तिकेयका तारकासुरपर शक्तिका प्रहार करना ...... & २५५ & ३८. सकाम भक्तोंकी विभिन्न देवताओंके प्रति भक्ति .......... & ६१९

१८. शिवसे कामको पुनर्जीवित करनेकी प्रार्थना करती रति... & २५७ & ३९. भगवान् गणपतिका मनोहर रूप........................... & ६४१

"श्रीराधामाधव-अङ्क" "श्रीराधामाधव-अङ्क" "श्रीराधामाधव-अङ्क" "श्रीराधामाधव-अङ्क" "श्रीराधामाधव-अङ्क" "श्रीराधामाधव-अङ्क" "श्रीराधामाधव-अङ्क" "श्रीराधामाधव-अङ्क" 'श्रीराधामाधव-अङ्क' 'श्रीराधामाधव-अङ्क' 'श्रीराधामाधव-अङ्क' 'श्रीराधामाधव-अङ्क' स्मरण-स्तवन "श्रीराधामाधव-अङ्क" "श्रीराधामाधव-अङ्क" "श्रीराधामाधव-अङ्क" "श्रीराधामाधव-अङ्क" 'श्रीराधामाधव-अङ्क" "श्रीराधामाधव-अङ्क" "श्रीराधामाधव-अङ्क" "श्रीराधामाधव-अङ्क" "श्रीराधामाधव-अङ्क" "श्रीराधामाधव-अङ्क" "श्रीराधामाधव-अङ्क" "श्रीराधामाधव-अङ्क"

वैदिक गणेश-स्तवन

गणानां त्वा गणपतिँ हवामहे प्रियाणां त्वा | हे परमदेव गणेशजी! समस्त गणोंके अधिपति एवं प्रियपतिँ हवामहे निधीनां त्वा निधिपतिँ | प्रिय पदार्थों-प्राणियोंके पालक और समस्त सुखनिधियोंके हवामहे वसो मम। आहमजानि गर्भधमा त्वमजासि | निधिपति! आपका हम आवाहन करते हैं। आप गर्भधम्॥ [शु०यजु० २३।१९] | सृष्टिको उत्पन्न करनेवाले हैं, हिरण्यगर्भको धारण | करनेवाले अर्थात् संसारको अपने-आपमें धारण करनेवाली | प्रकृतिके भी स्वामी हैं, आपको हम प्राप्त हों।

नि षु सीद गणपते गणेषु त्वामाहुर्विप्रतमं | हे गणपते! आप स्तुति करनेवाले हमलोगोंके कवीनाम्। न ऋते त्वत्क्रियते किं चनारे महामर्कं | मध्यमें भली प्रकार स्थित होइये। आपको क्रान्तदर्शी मघवञ्चित्रमर्च॥ [ऋक्० १०।११२।९] | कवियोंमें अतिशय बुद्धिमान्-सर्वज्ञ कहा जाता है। | आपके बिना कोई भी शुभाशुभ कार्य आरम्भ नहीं | किया जाता। (इसलिये) हे भगवन् (मघवन्)! ऋद्धि- | सिद्धिके अधिष्ठाता देव! हमारी इस पूजनीय प्रार्थनाको | स्वीकार कीजिये।

गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं | हे अपने गणोंमें गणपति (देव), क्रान्तदर्शियों कवीनामुपमश्रवस्तमम्। ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां | (कवियों)-में श्रेष्ठ कवि, शिवा-शिवके प्रिय ज्येष्ठ ब्रह्मणस्पत आ नः शृण्वन्नूतिभिः सीद सादनम्॥ | पुत्र, अतिशय भोग और सुख आदिके दाता! हम [ऋक्० २।२३।१] | आपका आवाहन करते हैं। हमारी स्तुतियोंको सुनते | हुए पालनकर्ताके रूपमें आप इस सदनमें आसीन हों।

नमो गणेश्भ्यो गणपतिभ्यश्च वो नमो नमो | देवानुचर गण-विशेषोंको, विश्वनाथ महाकालेश्वर व्रातेभ्यो व्रातपतिभ्यश्च वो नमो नमो | आदिकी तरह पीठभेदसे विभिन्न गणपतियोंको, संघोंको, गृत्सेभ्यो गृत्सपतिभ्यश्च वो नमो नमो | संघपतियोंको, बुद्धिशालियोंको, बुद्धिशालियोंके परिपालन विरूपेभ्यो विश्वरूपेभ्यश्च वो नमः॥ | करनेवाले उनके स्वामियोंको, दिगम्बर-परमहंस- [शुक्लयजु० १६।२५] | जटिलादि चतुर्थश्रमियोंको तथा सकलात्मदर्शियोंको | नमस्कार है।

ॐ तत्कराटाय विद्महे हस्तिमुखाय धीमहि। | उन कराट (सूँड़को घुमानेवाले) भगवान् गणपतिको तन्नो दन्ती प्रचोदयात्॥ [कृ०यजु० मैत्र० २।९।१६] | हम जानते हैं, गजवदनका हम ध्यान करते हैं, वे दन्ती | सन्मार्गपर चलनेके लिये हमें प्रेरित करें।

नमो व्रातपतये नमो गणपतये नमः | व्रातपति (गणोंके स्वामी)-को नमस्कार, गणपतिको प्रमथपतये नमस्तेऽस्तु लम्बोदरायैकदन्ताय | नमस्कार, प्रमथपतिको नमस्कार; लम्बोदर, एकदन्त, विघ्ननाशिने शिवसुताय श्रीवरदमूर्तये नमः॥ | विघ्ननाशक, शिवतनय श्रीवरदमूर्तिको नमस्कार है। [कृ० यजुर्वेदीय गणपत्यथर्वशीर्ष १०] |

२४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- श्रीगणपति-ध्यान-मंजरी


गणपति

सिन्दूराभं त्रिनेत्रं पृथुतरजठरं हस्तपद्मैर्दधानं दन्तं पाशाङ्कुशेष्टान्युरुकरविलसद्बीजपूराभिरामम्। बालेन्दुद्योतमौलिं करिपतिवदनं दानपूरार्द्रगण्डं भोगीन्द्राबद्धभूषं भजत गणपतिं रक्तवस्त्राङ्गरागम्॥ जो सिन्दूरकी-सी अंगकान्तिवाले और त्रिनेत्रधारी हैं; जिनका उदर बहुत विशाल है; जो अपने चार करकमलोंमें दन्त, पाश, अंकुश और वर-मुद्रा धारण करते हैं; जिनके विशाल शुण्ड-दण्डमें बीजपूर (बिजौरा नीबू या अनार) शोभा दे रहा है; जिनका मस्तक बालचन्द्रसे दीप्तिमान् और गण्डस्थल मदके प्रवाहसे आर्द्र है; नागराजको जिन्होंने भूषणके रूपमें धारण किया है तथा जो लाल वस्त्र और अरुण अंगरागसे सुशोभित हैं, उन गजेन्द्र-वदन गणपतिको भजन करो।


सिंहगणपति

वीणां कल्पलतामरिं च वरदं दक्षे विधत्ते करै- र्वमे तामरसं च रत्नकलशं सन्मञ्जरीं चाभयम्। शुण्डादण्डलसन्मृगेन्द्रवदनः शङ्खेन्दुगौरः शुभो दीव्यद्रत्ननिभांशुको गणपतिः पायादपायात् स नः॥ जो दायें हाथोंमें वीणा, कल्पलता, चक्र तथा वरद (मुद्रा) धारण करते हैं और बायें हाथोंमें कमल, रत्नकलश, सुन्दर धान्य-मंजरी एवं अभय मुद्रा धारण किये हुए हैं, जिनका सिंहसदृश मुख शुण्डादण्डसे सुशोभित है, जो शंख और चन्द्रमाके समान गौरवर्ण हैं तथा जिनका वस्त्र दिव्य रत्नोंके समान दीप्तिमान् है, वे शुभस्वरूप (मंगलमय) गणपति हमको अपाय (विनाश)-से बचायें।


एकाक्षरगणपति

रक्तो रक्ताङ्गरागांशुककुसुमयुतस्तुन्दिलश्चन्द्रमौलि- र्नेत्रैर्युक्तस्त्रिभिर्वामनकरचरणो बीजपूरान्तनासः। हस्ताग्राक्लृप्तपाशांकुशवरदवरदो नागवक्त्रोऽहिभूषो देवः पद्मासनो वो भवतु नतसुरो भूतये विघ्नराजः॥ वे विघ्ननाशक श्रीगणपति शरीरसे रक्तवर्णके हैं। उन्होंने लाल रंगके ही अंगराग, वस्त्र और पुष्पहार धारण कर रखे हैं। वे लम्बोदर हैं; उनके मस्तकपर चन्द्राकार मुकुट है; उनके तीन नेत्र हैं और हाथ-पैर छोटे-छोटे हैं; उन्होंने शुण्डाग्रभागमें बीजपूर (बिजौरा नीबू) ले रखा है; उनके हस्ताग्रभागमें पाश, अंकुश, दन्त तथा वरद (मुद्रा) सुशोभित हैं; उनका मुख गजके समान है और वे सर्पमय आभूषण धारण किये हैं। वे कमलके आसनपर विराजमान हैं और समस्त देवता उनके चरणोंमें नतमस्तक हैं; ऐसे विघ्नराजदेव आपलोगोँके लिये कल्याणकारी हों।


हेरम्बगणपति

मुक्ताकाञ्चननीलकुन्दघुसृणच्छायैस्त्रिनेत्रान्वितै- र्नागास्यैर्हरिवाहनं शशिधरं हेरम्बमर्कप्रभम्। दृप्तं दानमभीतिमोदकरदान् टङ्कं शिरोऽक्षात्मिकां मालां मुद्गरमङ्कुशं त्रिशिखिकं दोर्भिर्दधानं भजे॥ हेरम्बगणपति पाँच हस्तिमुखोंसे युक्त हैं। चार हस्तिमुख चारों ओर और एक ऊर्ध्व दिशामें हैं। उनका ऊर्ध्व हस्तिमुख मुक्तावर्णका है। दूसरे चार हस्तिमुख क्रमशः कांचन, नील, कुन्द (श्वेत) और कुंकुमवर्णके हैं। प्रत्येक हस्तिमुख तीन नेत्रोंवाला है। वे सिंहवाहन हैं। उनके कपालमें चन्द्रिका विराजित है और देहकी कान्ति सूर्यके समान प्रभायुक्त है। वे बलदृप्त हैं और अपनी दस भुजाओंमें वर और अभयमुद्रा तथा क्रमशः मोदक, दन्त, टंक, सिर, अक्षमाला, मुद्गर, अंकुश और त्रिशूल धारण करते हैं। मैं उन भगवान् हेरम्बका भजन करता हूँ।

अङ्क ] * पञ्चश्लोकिगणेशपुराणम् * २५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 पञ्चश्लोकिगणेशपुराणम् श्रीविघ्नेशपुराणसारमुदितं व्यासाय धात्रा पुरा | पूर्वकालमें ब्रह्माजीने व्यासजीको श्रीविघ्नेश (गणेश)- तत्खण्डं प्रथमं महागProperty... तत्खण्डं प्रथमं महागणपतेश्चोपासनाख्यं यथा। | पुराणका सारतत्त्व बताया था। महागणपतिके उस पुराणका संहर्तुं त्रिपुरं शिवेन गणपस्यादौ कृतं पूजनं | उपासना-संज्ञक प्रथम खण्ड है। भगवान् शिवने पहले त्रिपुरका कर्तुं सृष्टिमिमां स्तुतः स विधिना व्यासेन बुद्ध्याप्तये ॥ १ ॥ | संहार करनेके लिये गणपतिका पूजन किया। फिर ब्रह्माजीने इस सृष्टिकी रचना करनेके लिये उनकी विधिवत् स्तुति की। तत्पश्चात् व्यासजीने बुद्धिकी प्राप्तिके लिये उनका स्तवन किया ॥ १ ॥ संकष्टीदेवीकी, गणेशकी, उनके मन्त्रकी, सङ्कष्ट्याश्च विनायकस्य च मनोः स्थानस्य तीर्थस्य वै | स्थानकी, तीर्थकी और दूर्वाकी महिमा यह भक्तिचरित है। दूर्वाणां महिमेति भक्तिचरितं तत्पार्थिवस्यार्चनम्। | उनके पार्थिव-विग्रहका पूजन भी भक्तिचर्या ही है। उन तेभ्यो यैर्यदभीप्सितं गणपतिस्तत्तत्प्रतुष्टो ददौ | भक्तिचर्या करनेवाले पुरुषोंमेंसे जिन-जिनने जिस-जिस ताः सर्वा न समर्थ एव कथितुं ब्रह्मा कुतो मानवः ॥ २ ॥ | वस्तुको पानेकी इच्छा की, सन्तुष्ट हुए गणपतिने वह-वह वस्तु उन्हें दी। उन सबका वर्णन करनेमें ब्रह्माजी भी समर्थ नहीं हैं, फिर मनुष्यकी तो बात ही क्या है! ॥ २ ॥ अब क्रीडाकाण्डमथो वदे कृतयुगे श्वेतच्छविः काश्यपः | क्रीडाकाण्डका वर्णन करता हूँ। सत्ययुगमें दस भुजाओंसे सिंहाङ्कः स विनायको दशभुजो भूत्वाथ काशीं ययौ। | युक्त श्वेत कान्तिमान् कश्यपपुत्र सिंहध्वज महोत्कट विनायक हत्वा तत्र नरान्तकं तदनुजं देवान्तकं दानवं | काशीमें गये। वहाँ नरान्तक और उसके छोटे भाई देवान्तक त्रेतायां शिवनन्दनो रसभुजो जातो मयूरध्वजः ॥ ३ ॥ | नामक दानवको मारकर त्रेतामें वे षड्बाहु शिवनन्दन मयूरध्वजके रूपमें प्रकट हुए ॥ ३ ॥ उन्होंने कमलासुरको तथा महादैत्यपति सिन्धुको उसके गणोंसहित मार डाला। हत्वा तं कमलासुरं च सगणं सिन्धुं महादैत्यपं | तत्पश्चात् ब्रह्माजीने सिद्धि और बुद्धि नामक दो कन्याएँ पश्चात् सिद्धिमती सुते कमलजस्तस्मै च ज्ञानं ददौ। | उन्हें दीं और ज्ञान भी प्रदान किया। द्वापरयुगमें गौरीपुत्र द्वापारे तु गजाननो युगभुजो गौरीसुतः सिन्दुरं | गजानन दो भुजाओंसे युक्त हुए। उन्होंने अपने हाथसे सम्मर्द्य स्वकरेण तं निजमुखे चाखुध्वजो लिप्तवान् ॥ ४ ॥ | सिन्दूरासुरका मर्दन करके उसे अपने मुखपर पोत लिया। उनकी ध्वजामें मूषकका चिह्न था ॥ ४ ॥ उन्होंने सन्तुष्ट राजा वरेण्यको गणेश-गीताका उपदेश किया। फिर गीताया उपदेश एव हि कृतो राज्ञे वरेण्याय वै | [कलियुगमें] वे धूम्रकेतु नामसे प्रसिद्ध धर्मयुक्त तुष्टायाथ च धूम्रकेतुरभिधो विप्रः स धर्मर्धिकः। | धनवाले ब्राह्मण होंगे। उस समय उनके ध्वजका चिह्न अश्वाङ्को द्विभुजो सितो गणपतिम्लेंच्छान्तकः स्वर्णदः | अश्व होगा। उनके दो भुजाएँ होंगी। वे गौरवर्णके गणपति क्रीडाकाण्डमिदं गणस्य हरिणा प्रोक्तं विधात्रे पुरा ॥ ५ ॥ | म्लेच्छोंका अन्त करनेवाले और सुवर्णके दाता होंगे। गणपतिके इस क्रीडाकाण्डका वर्णन पूर्वकालमें भगवान् विष्णुने ब्रह्माजीसे किया था ॥ ५ ॥ जो मनुष्य प्रतिदिन भक्तिभावसे इन पाँच एतच्छ्लोकसुपञ्चकं प्रतिदिनं भक्त्या पठेद्यः पुमान् | श्लोकोंका पाठ करेगा, वह समस्त उत्तम भोगोंका उपभोग निर्वाणं परमं व्रजेत् स सकलान् भुक्त्वा सुभोगानपि। | करके अन्तमें परम निर्वाण (मोक्ष)-को प्राप्त होगा। ॥ इति श्रीपञ्चश्लोकिगणेशपुराणं सम्पूर्णम् ॥ ॥ इस प्रकार श्रीपंचश्लोकी गणेशपुराण सम्पूर्ण हुआ ॥

२६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 सर्वकामप्रद श्रीगणेशाष्टकम् [श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें महर्षि कश्यपकी प्रेरणासे भक्तोंने सामूहिकरूपसे इस श्रीगणेशाष्टक स्तोत्रको भगवान् गजाननके प्रति कहा है। जिससे प्रसन्न होकर भगवान् गणेशने स्वयं प्रकट होकर आश्वासन देते हुए कहा कि इस स्तोत्रका पाठ करनेसे समस्त कामनाओंकी सिद्धि हो जायगी। कारागारमें बँधे हुए तथा राजाके द्वारा वध-दण्ड पानेवाले कैदी भी इस स्तोत्रका पाठ करनेसे बन्धन-मुक्त हो जायँगे; इस स्तोत्रका पाठ करनेसे विद्यार्थीको विद्या, पुत्रार्थीको पुत्र, कामार्थीको समस्त मनोवांछित कामनाओं तथा गणेश-भक्तिकी प्राप्ति हो जायगी।] सर्वे ऊचुः यतोऽनन्तशक्तेरनन्ताश्च जीवा यतो निर्गुणादप्रमेया गुणास्ते। यतो भाति सर्वं त्रिधा भेदभिन्नं सदा तं गणेशं नमामो भजामः॥ १॥ यतश्चाविरासीज्जगत्सर्वमेतत्तथाब्जासनो विश्वगो विश्वगोप्ता। तथेन्द्रादयो देवसङ्घा मनुष्याः सदा तं गणेशं नमामो भजामः॥ २॥ यतो वह्निभानूद्भवो भूर्जलं च यतः सागराश्चन्द्रमा व्योम वायुः। यतः स्थावरा जङ्गमा वृक्षसङ्घाः सदा तं गणेशं नमामो भजामः॥ ३॥ यतो दानवाः किन्नरा यक्षसङ्घा यतश्चारणा वारणाः श्वापदाश्च। यतः पक्षिकीटा यतो वीरुधश्च सदा तं गणेशं नमामो भजामः॥ ४॥ यतो बुद्धिरज्ञाननाशो मुमुक्षोर्यतः सम्पदो भक्तसंतोषिकाः स्युः। यतो विघ्ननाशो यतः कार्यसिद्धिः सदा तं गणेशं नमामो भजामः॥ ५॥ सब भक्तोंने कहा—जिन अनन्त शक्तिवाले परमेश्वरसे अनन्त जीव प्रकट हुए हैं; जिन निर्गुण परमात्मासे अप्रमेय (असंख्य) गुणोंकी उत्पत्ति हुई है; सात्त्विक, राजस और तामस—इन तीन भेदोंवाला यह सम्पूर्ण जगत् जिनसे प्रकट एवं भासित हो रहा है, उन गणेशका हम नमन एवं भजन करते हैं॥ १॥ जिनसे इस समस्त जगत्का प्रादुर्भाव हुआ है; जिनसे कमलासन ब्रह्मा, विश्वव्यापी विश्वरक्षक विष्णु, इन्द्र आदि देव-समुदाय और मनुष्य प्रकट हुए हैं, उन गणेशका हम सदा ही नमन एवं भजन करते हैं ॥ २॥ जिनसे अग्नि और सूर्यका प्राकट्य हुआ; पृथ्वी, जल, समुद्र, चन्द्रमा, आकाश और वायुका प्रादुर्भाव हुआ तथा जिनसे स्थावर-जंगम और वृक्षसमूह उत्पन्न हुए हैं, उन गणेशका हम नमन एवं भजन करते हैं ॥ ३ ॥ जिनसे दानव, किंनर और यक्षसमूह प्रकट हुए; जिनसे हाथी और हिंसक जीव उत्पन्न हुए तथा जिनसे पक्षियों, कीटों और लता-बेलोंका प्रादुर्भाव हुआ, उन गणेशका हम सदा ही नमन और भजन करते हैं॥ ४॥ जिनसे मुमुक्षुको बुद्धि प्राप्त होती है और अज्ञानका नाश होता है; जिनसे भक्तोंको सन्तोष देनेवाली सम्पदाएँ प्राप्त होती हैं तथा जिनसे विघ्नोंका नाश और समस्त कार्योंकी सिद्धि होती है, उन गणेशका हम सदा नमन एवं भजन करते हैं॥ ५॥

अङ्क ] * सर्वकामप्रद श्रीगणेशाष्टक * २७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 यतः पुत्रसम्पद् यतो वाञ्छितार्थो यतोऽभक्तविघ्नास्तथानेकरूपाः। यतः शोकमोहौ यतः काम एव सदा तं गणेशं नमामो भजामः ॥ ६ ॥ यतोऽनन्तशक्तिः स शेषो बभूव धराधारणेऽनेकरूपे च शक्तः। यतोऽनेकधा स्वर्गलोका हि नाना सदा तं गणेशं नमामो भजामः ॥ ७॥ यतो वेदवाचो विकुण्ठा मनोभिः सदा नेति नेतीति यत्ता गृणन्ति। परब्रह्मरूपं चिदानन्दभूतं सदा तं गणेशं नमामो भजामः ॥८॥ श्रीगणेश उवाच पुनरूचे गणाधीशः स्तोत्रमेतत्पठेन्नरः। त्रिसन्ध्यं त्रिदिनं तस्य सर्वं कार्यं भविष्यति ॥ ९ ॥ यो जपेदष्टदिवसं श्लोकाष्टकमिदं शुभम्। अष्टवारं चतुर्थ्यां तु सोऽष्टसिद्धीरवाप्नुयात् ॥ १०॥ यः पठेन्मासमात्रं तु दशवारं दिने दिने। स मोचयेद् बन्धगतं राजवध्यं न संशयः ॥ ११ ॥ विद्याकामो लभेद्विद्यां पुत्रार्थी पुत्रमाप्नुयात्। वाञ्छिताँल्लभते सर्वानेकविंशतिवारतः ॥ १२ ॥ यो जपेत् परया भक्त्या गजाननपरो नरः। एवमुक्त्वा ततो देवश्चान्तर्धानं गतः प्रभुः ॥ १३॥ ॥ इति श्रीगणेशपुराणे उपासनाखण्डे श्रीगणेशाष्टकं सम्पूर्णम् ॥ जिनसे पुत्र-सम्पत्ति सुलभ होती है; जिनसे मनोवांछित अर्थ सिद्ध होता है; जिनसे अभक्तोंको अनेक प्रकारके विघ्न प्राप्त होते हैं तथा जिनसे शोक, मोह और काम प्राप्त होते हैं, उन गणेशका हम सदा नमन एवं भजन करते हैं॥६॥ जिनसे अनन्त शक्तिसम्पन्न सुप्रसिद्ध शेषनाग प्रकट हुए; जो इस पृथ्वीको धारण करने एवं अनेक रूप ग्रहण करनेमें समर्थ हैं; जिनसे अनेक प्रकारके अनेक स्वर्गलोक प्रकट हुए हैं, उन गणेशका हम सदा ही नमन एवं भजन करते हैं ॥७॥ जिनके विषयमें वेदवाणी कुण्ठित है; जहाँ मनकी भी पहुँच नहीं है तथा श्रुति सदा सावधान रहकर 'नेति-नेति'- इन शब्दोंद्वारा जिनका वर्णन करती है; जो सच्चिदानन्दस्वरूप परब्रह्म हैं, उन गणेशका हम सदा ही नमन एवं भजन करते हैं ॥८॥ श्रीगणेशजी बोले-जो मनुष्य तीन दिनोंतक तीनों संध्याओंके समय इस स्तोत्रका पाठ करेगा, उसके सारे कार्य सिद्ध हो जायँगे ॥ ९ ॥ जो आठ दिनोंतक इन आठ श्लोकोंका एक बार पाठ करेगा और चतुर्थी तिथिको आठ बार इस स्तोत्रको पढ़ेगा, वह आठों सिद्धियोंको प्राप्त कर लेगा ॥ १० ॥ जो एक मासतक प्रतिदिन दस-दस बार इस स्तोत्रका पाठ करेगा, वह कारागारमें बँधे हुए तथा राजाके द्वारा वध-दण्ड पानेवाले कैदीको भी छुड़ा लेगा, इसमें संशय नहीं है ॥ ११ ॥ इस स्तोत्रका इक्कीस बार पाठ करनेसे विद्यार्थी विद्याको, पुत्रार्थी पुत्रको तथा कामार्थी समस्त मनोवांछित कामनाओंको प्राप्त कर लेता है ॥ १२ ॥ जो मनुष्य पराभक्तिसे इस स्तोत्रका जप करता है, वह गजाननका परम भक्त हो जाता है-ऐसा कहकर भगवान् गणेश वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ १३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणमें श्रीगणेशाष्टक सम्पूर्ण हुआ ॥

२८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- श्रीगणेशपञ्चरत्नस्तोत्रम् मुदा करात्तमोदकं सदा विमुक्तिसाधकं कलाधरावतंसकं विलासिलोकरञ्जकम्। अनायकैकनायकं विनाशितेभदैत्यकं नताशुभाशुनाशकं नमामि तं विनायकम्॥ १ ॥ नतेतरातिभीकरं नवोदितार्कभास्वरं नमत्सुरारिनिर्जरं नताधिकापदुद्धरम्। सुरेश्वरं निधीश्वरं गजेश्वरं गणेश्वरं महेश्वरं तमाश्रये परात्परं निरन्तरम्॥ २ ॥ समस्तलोकशङ्करं निरस्तदैत्यकुञ्जरं दरेतरोदरं वरं वरेभवक्त्रमक्षरम्। कृपाकरं क्षमाकरं मुदाकरं यशस्करं मनस्करं नमस्कृतां नमस्करोमि भास्वरम्॥ ३॥ अकिञ्चनार्तिमार्जनं चिरन्तनोक्तिभाजनं पुरारिपूर्वनन्दनं सुरारिगर्वचर्वणम्। प्रपञ्चनाशभीषणं धनञ्जयादिभूषणं कपोलदानवारणं भजे पुराणवारणम्॥ ४॥ नितान्तकान्तदन्तकान्तिमन्तकान्तकात्मजम् अचिन्त्यरूपमन्तहीनमन्तरायकृन्तनम्। हृदन्तरे निरन्तरं वसन्तमेव योगिनां तमेकदन्तमेव तं विचिन्तयामि सन्ततम्॥ ५॥ महागणेशपञ्चरत्नमादरेण योऽन्वहं प्रगायति प्रभातके हृदि स्मरन् गणेश्वरम्। अरोगतामदोषतां सुसाहितीं सुपुत्रतां समाहितायुरष्टभूतिमभ्युपैति सोऽचिरात्॥ ६॥ ॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतं श्रीगणेशपञ्चरत्नस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥ जिन्होंने बड़े आनन्दसे अपने हाथमें मोदक ले रखे हैं; जो सदा ही मुमुक्षुजनोंकी मोक्षाभिलाषाको सिद्ध करनेवाले हैं; चन्द्रमा जिनके भालदेशके भूषण हैं; जो भक्तिभावमें निमग्न लोगोंके मनको आनन्दित करते हैं; जिनका कोई नायक या स्वामी नहीं है; जो एकमात्र स्वयं ही सबके नायक हैं; जिन्होंने गजासुरका संहार किया है तथा जो नतमस्तक पुरुषोंके अशुभका तत्काल नाश करनेवाले हैं, उन भगवान् विनायकको मैं प्रणाम करता हूँ॥ १ ॥ जो प्रणत न होनेवाले—उद्दण्ड मनुष्योंके लिये अत्यन्त भयंकर हैं; नवोदित सूर्यके समान अरुण प्रभासे उद्भासित हैं; दैत्य और देवता—सभी जिनके चरणोंमें शीश झुकाते हैं; जो प्रणत भक्तोंका भीषण आपत्तियोंसे उद्धार करनेवाले हैं, उन सुरेश्वर, निधियोंके अधिपति, गजेन्द्रशासक, महेश्वर, परात्पर गणेश्वरका मैं निरन्तर आश्रय ग्रहण करता हूँ॥ २ ॥ जो समस्त लोकोंका कल्याण करनेवाले हैं; जिन्होंने गजाकार दैत्यका विनाश किया है; जो लम्बोदर, श्रेष्ठ, अविनाशी एवं गजराजवदन हैं; कृपा, क्षमा और आनन्दकी निधि हैं; जो यश प्रदान करनेवाले तथा नमनशीलोंको मनसे सहयोग देनेवाले हैं, उन प्रकाशमान देवता गणेशको मैं प्रणाम करता हूँ॥ ३ ॥ जो अकिंचन-जनोंकी पीड़ा दूर करनेवाले तथा चिरंतन उक्ति (वेदवाणी)के भाजन (वर्ण्य-विषय) हैं; जिन्हें त्रिपुरारि शिवके ज्येष्ठ पुत्र होनेका गौरव प्राप्त है; जो देव-शत्रुओंके गर्वको चूर्ण कर देनेवाले हैं; दृश्य- प्रपंचका संहार करते समय जिनका रूप भीषण हो जाता है; धनंजय आदि नाग जिनके भूषण हैं तथा जो गण्डस्थलसे दानकी धारा बहानेवाले गजेन्द्ररूप हैं, उन पुरातन गजराज गणेशका मैं भजन करता हूँ॥ ४॥ जिनकी दन्तकान्ति नितान्त कमनीय है; जो अन्तकके अन्तक (मृत्युंजय) शिवके पुत्र हैं; जिनका रूप अचिन्त्य एवं अनन्त है; जो समस्त विघ्नोंका उच्छेद करनेवाले हैं तथा योगियोंके हृदयके भीतर जिनका निरन्तर निवास है, उन एकदन्त गणेशका मैं सदा चिन्तन करता हूँ॥ ५॥ जो मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल मन-ही-मन गणेशका स्मरण करते हुए इस 'महागणेश-पंचरत्न' का आदरपूर्वक उच्चस्वरसे गान करता है, वह शीघ्र ही आरोग्य, निर्दोषता, उत्तम ग्रन्थों एवं सत्पुरुषोंका संग, उत्तम पुत्र, दीर्घ आयु एवं अष्ट सिद्धियोंको प्राप्त कर लेता है॥ ६॥ ॥ इस प्रकार श्रीशंकराचार्यरचित श्रीगणेशपंचरत्नस्तोत्र सम्पूर्ण हुआ ॥

अङ्क ] * गणेशगीतोक्त परब्रह्म श्रीगणेश-तत्त्व * २९ गणेशगीतोक्त परब्रह्म श्रीगणेश-तत्त्व शिवे विष्णौ च शक्तौ च सूर्ये मयि नराधिप। याभेदबुद्धिर्योगः स सम्यग्योगो मतो मम॥ अहमेव जगद्यस्मात्सृजामि पालयामि च। कृत्वा नानाविधं वेषं संहरामि स्वलीलया॥ अहमेव महाविष्णुरहमेव सदाशिवः। अहमेव महाशक्तिरहमेवार्यमा प्रिय॥ अहमेको नृणां नाथो जातः पञ्चविधः पुरा। अज्ञानान्मां न जानन्ति जगत्कारणकारणम्॥ मत्तोऽग्निरापो धरणी मत्त आकाशमारुतौ। ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च लोकपाला दिशो दश॥ वसवो मुनयो गावो मनवः पशवोऽपि च। सरितः सागरा यक्षा वृक्षाः पक्षिगणा अपि॥ तथैकविंशतिः स्वर्गा नागाः सप्त वनानि च। मनुष्याः पर्वताः साध्याः सिद्धा रक्षोगणास्तथा॥ अहं साक्षी जगच्चक्षुरलिप्तः सर्वकर्मभिः। अविकारोऽप्रमेयोऽहमव्यक्तो विश्वगोऽव्ययः॥ अहमेव परं ब्रह्माव्यानन्दात्मकं नृप। मोहयत्यखिलान् माया श्रेष्ठान् मम नरानमून॥


मत्त एव महाबाहो जाता विष्ण्वादयः सुराः। मय्येव च लयं यान्ति प्रलयेषु युगे युगे॥ अहमेव परो ब्रह्मा महारुद्रोऽहमेव च। अहमेव जगत्सर्वं स्थावरं जङ्गमं च यत्॥ अजोऽव्ययोऽहं भूतात्मानादीरीश्वर एव च। आस्थाय त्रिगुणां मायां भवामि बहुयोनिषु॥ अधर्मोपचयो धर्मोपचयो हि यदा भवेत्। साधून् संरक्षितुं दुष्टांस्ताडितुं सम्भवाम्यहम्॥ उच्छिद्याधर्मनिचयं धर्मं संस्थापयामि च। हन्मि दुष्टांश्च दैत्यांश्च नानालीलाकरो मुदा॥ (गणेशपुराण, क्रीडाखण्ड १३८। २१-२९, १४०। ७-११) [राजा वरेण्यके पूछनेपर भगवान् श्रीगणेशजी कहते हैं- ] हे राजन्! शिव, विष्णु, शक्ति, सूर्य और मुझमें जो अभेदबुद्धिरूप योग है, उसीको मैं यथार्थ योग मानता हूँ॥ मैं ही अपनी लीलासे अनेक वेष धारण करता हुआ इस जगत्की उत्पत्ति, पालन और संहार करता हूँ॥ हे प्रिय! मैं ही महाविष्णु, मैं ही सदाशिव, मैं ही महाशक्ति और मैं ही सूर्य हूँ॥ एकमात्र मैं ही मनुष्योंका स्वामी हूँ, [विष्णु, शिव, शक्ति, सूर्य तथा गणेश- ] इन पाँच प्रकारसे मैं पूर्वकालमें उत्पन्न हुआ हूँ, मैं जगत्के कारणका भी कारण हूँ, मुझको अज्ञानीलोग नहीं जानते॥ अग्नि, जल, पृथ्वी, आकाश, वायु, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, लोकपाल और दसों दिशाएँ, आठ वसु, मुनि, गौ, मनु, पशु, नदी, समुद्र, यक्ष, वृक्ष, पक्षियोंके समूह, इक्कीस स्वर्ग, नाग, सात वन, मनुष्य, पर्वत, साध्य, सिद्ध, राक्षस इत्यादि सब मुझसे ही उत्पन्न हुए हैं॥ मैं ही सबका साक्षी, सम्पूर्ण जगत्का नेत्र, सभी कर्मोंसे अलिप्त, निर्विकार, अप्रमेय, अव्यक्त, सम्पूर्ण जगत्में व्याप्त और अविनाशी हूँ॥ हे राजन्! मैं ही अव्यय आनन्दस्वरूप परब्रह्म हूँ, मेरी माया सम्पूर्ण जगत्को तथा श्रेष्ठ पुरुषोंको भी मोहित करती है॥


हे महाबाहो! मुझसे ही विष्णु आदि देवता उत्पन्न हुए हैं और युग-युगमें प्रलयके समय मुझमें ही लय हो जाते हैं॥ मैं ही श्रेष्ठ ब्रह्मा हूँ, मैं ही महारुद्र हूँ, मैं ही स्थावर-जंगमरूप सम्पूर्ण जगत् हूँ॥ मैं अजन्मा, अविनाशी तथा सभी जीवोंका आत्मा अनादि ईश्वर हूँ और त्रिगुणात्मक मायामें स्थित होकर मैं ही अनेक अवतार धारण करता हूँ॥ जिस समय अधर्मकी वृद्धि और धर्मकी हानि होती है, उस समय साधुओंकी रक्षा और दुष्टोंको मारनेके लिये मैं अवतार लेता हूँ॥ मैं अधर्मके समूहको नष्टकर धर्मका संस्थापन करता हूँ और अनेक प्रकारकी लीलाकर आनन्दसे दुष्टों तथा दैत्योंका वध करता हूँ॥

३० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

श्रीगणेशपुराण-सूक्तिसुधा

शुभं वाप्यशुभं कर्म न मुञ्चति नरं क्वचित्॥ यस्र्यां यस्यामवस्थायां कृतं भवति कर्म यत्। तस्यां तस्यामवस्थायां भुज्यते प्राणिभिर्ध्रुवम्॥ मनुष्यके द्वारा किया गया शुभ या अशुभ कर्म उसका कभी पीछा नहीं छोड़ता; जिस-जिस अवस्थामें जैसा-जैसा कर्म किया गया होता है, उस-उस अवस्थामें प्राणीको उसका फल भोगना पड़ता है, यह ध्रुव सत्य है। [उपासनाखण्ड २।२-३] दुःखस्य भोक्ता न परोऽस्ति नैव सुखस्य वा पूर्वकृतस्य जन्तोः। यथा यथा कर्मफलं प्रसक्तं तदेव भोग्यं स्वयमेव तादृक्॥ पूर्वकालमें किये गये [पाप या पुण्य] कर्मका फल दुःख या सुखके रूपमें प्राणीको स्वयं ही भोगना पड़ता है, दूसरा कोई उसे नहीं भोग सकता। जिस-जिस प्रकारसे कर्मफलको भोगना निश्चित होता है, उसे वैसे ही और स्वयंको ही भोगना पड़ता है। [उपासनाखण्ड २।२२] पितुर्वाक्ये रतो नित्यं श्रद्धया श्राद्धकृत्तथा। पिण्डदो यो गयायां तु स पुत्रः पुत्र उच्यते॥ पिताके वचनोंका पालन करनेमें नित्य रत रहनेवाला, [मरणोपरान्त] श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करनेवाला और गयामें पिण्डदान करनेवाला पुत्र ही पुत्र कहा जाता है। [उपासनाखण्ड २।२८] परोपकारं कुर्याच्च द्रव्यप्राणवचोऽमृतैः। परापकारं नो कुर्यादात्मस्तवनमेव च॥ धन, प्राण तथा अमृतरूपी (सहानुभूतिपूर्ण) वचनोंसे दूसरोंका उपकार करे, कभी किसीका अपकार न करे और न ही आत्मप्रशंसा करे। (उपासनाखण्ड ३।२५) विश्वासो यस्य नैव स्यात्तत्र नो विश्वसेत् क्वचित्॥ विश्वस्तेऽत्यन्तविश्वासो न कर्तव्यो बुभूषता। कृतवैरेऽथ विश्वस्ते कदापि न च विश्वसेत्॥ जो विश्वसनीय न हो, उसपर कभी भी विश्वास न करे। समृद्धिकी इच्छावाला राजा विश्वस्त व्यक्तिपर भी अत्यन्त विश्वास न करे। जिससे एक बार वैर हो गया हो, वह यदि पुनः विश्वस्त बन गया हो तथापि उसपर तो कभी भी विश्वास न करे। [उपासनाखण्ड ३।३०-३१] अधमो यदि निन्देत स्तुवीत यदि वा क्वचित्। न क्रुध्येन्न च तुष्येच्च किं तया किं तयापि च॥ यदि अधम व्यक्ति कभी निन्दा करे अथवा प्रशंसा करे तो न तो उसपर क्रोधित हो, न ही प्रसन्न; क्योंकि उसकी निन्दा या स्तुतिका क्या अर्थ!। [उपासनाखण्ड ३।३५] ऋणतो ब्राह्मणं चैव पङ्कतो गां समुद्धरेत्। अनृतं न वदेत् क्वापि सत्यं क्वापि न हापयेत्॥ ब्राह्मणका ऋणसे और गायका कीचड़से सम्यक् रूपसे उद्धार करे। कभी असत्य न बोले और कभी सत्यको न छोड़े। [उपासनाखण्ड ३।४०] क्षुब्धं प्रसन्नं हृदयं समीक्ष्या- पकारिणं चोपकरं हि वक्ति॥ क्षुब्ध या प्रसन्न हृदय स्वयं ही समीक्षा करके बता देता है कि कौन अपकारी है और कौन उपकारी। [उपासनाखण्ड ५।२६] विचार्य सम्यक् कर्तव्यं कर्म साध्वितरच्च यत्॥ कर्मोंकी गति बड़ी ही सूक्ष्म होती है, अतः सत्कर्म या दुष्कर्मको भलीभाँति विचारकर करना चाहिये। [उपासनाखण्ड १०।१७] बुद्ध्या युक्त्यार्जवेनापि गुरूणि च लघूनि च॥ कार्याणि साधयेद्धीमान् गर्वान्न च मत्सरात्। कार्य चाहे बड़े हों या छोटे; बुद्धिमान् मनुष्यको उन्हें बुद्धिद्वारा, युक्तिपूर्वक और विनम्रतासे सम्पन्न करना चाहिये न कि गर्व और मत्सर (ईर्ष्या)-पूर्वक। [उपासनाखण्ड १०।१८-१९] नालोकयेन्मुखं तेषां विमुखा ये गजानने। तेषां दर्शनमात्रेण विघ्नानि स्युः पदे पदे॥

अङ्क] * श्रीगणेशपुराण-सूक्तिसुधा * ३१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐


[बायाँ स्तम्भ]

जो लोग गणेशजीकी भक्तिसे विमुख हैं, उनका तो मुख भी नहीं देखना चाहिये। उनके दर्शनमात्रसे पग-पगपर विघ्न उपस्थित होते हैं। [उपासनाखण्ड १९। ८] साधूनां सङ्गतिः सद्यो ददाति फलमुत्तमम्। साधुजनोंकी संगति शीघ्र ही उत्तम फल देती है। [उपासनाखण्ड १९। ३५] पूर्वजन्मकृतात् पापाज्जायते दुःखभाङ्नरः॥ दुःखवान् सुखमाप्नोति सुखवानपि तत्पुनः। पूर्वजन्ममें किये हुए पापके कारण ही मनुष्य दुःखका भागी होता है। जिसे दुःख प्राप्त है, उसे भी सुखकी प्राप्ति होती है; वैसे ही जिसे सुख प्राप्त है, उसे भी दुःखकी प्राप्ति होती है। [उपासनाखण्ड १९। ४८-४९] मातापित्रोर्वचः कार्यं सत्पुत्रेण यशस्विना। पूजनं च तयोः कार्यं पोषणं पालनं तथा॥ माता-पिताके वचनका पालन करना, उनका पूजन करना और उन दोनोंका पालन-पोषण करना यशस्वी सत्पुत्रके लिये कर्तव्य है। [उपासनाखण्ड २३। २२] यो यथा कुरुते कर्म स तथा फलमश्नुते॥ जो जैसा कर्म करता है, वह वैसा ही फल भोगता है। [उपासनाखण्ड २३। २६] परपुंसि मनो यस्याः सा वै निरयभागभवेत्॥ जिसका मन परपुरुषमें लग जाता है, वह [नारी] निश्चय ही नरकका भोग करनेवाली होती है। [उपासनाखण्ड २८। १५] लोकेषु वर्षते मेघः शेषेण ध्रियते धरा॥ उपकाराय सूर्योऽपि भ्रमतेऽहर्निशं द्विज। हे द्विज! बादल सम्पूर्ण लोकोंमें वर्षा करते हैं, शेषजी पृथ्वीको धारण करते हैं, सूर्य भी [लोगोंका] उपकार करनेके लिये ही दिन-रात भ्रमण करते रहते हैं। [उपासनाखण्ड २९। २२-२३] अनुतापविहीनस्य निष्कृतिर्नैव विद्यते। जिसे अपने दुष्कृतका पछतावा न हो, उसके


[दायाँ स्तम्भ]

उद्धारका तो कोई उपाय ही नहीं होता। [उपासनाखण्ड ३२। २९] पितृहा मातृहा स्त्रीहा मद्यपी गुरुतल्पगः। तस्य संस्पर्शनादेव सचैलं स्नानमाचरेत्॥ जो पिता-माता, स्त्रीका वध करनेवाला है, सुरापान करनेवाला है तथा गुरुपत्नीके साथ गमन करनेवाला है, उसका स्पर्शमात्र हो जानेपर वस्त्रोंसहित स्नान करना चाहिये। [उपासनाखण्ड ७६। ६०] दोषे जाते स्वयं सन्तः ख्यापयन्ति जनेषु तम्। आच्छादने दोषवृद्धिः ख्यापने तु लयो भवेत्। सन्तजन [अपनेमें] कोई दोष उत्पन्न हो जानेपर स्वयं ही जनसमुदायमें उसका ख्यापन कर देते हैं। छिपानेसे दोषकी वृद्धि होती है और प्रकट कर देनेसे उसका नाश हो जाता है। [उपासनाखण्ड ३३। ३-४] पुण्यक्षयो भवेत्तस्य परदोषं य ईरयेत्॥ जो दूसरेके दोषोंका बखान करता है, उसके पुण्यका क्षय हो जाता है। [उपासनाखण्ड ७६। ५६] परेषां दोषकथने दोषो यद्यपि वर्तते॥ प्रश्ने कृते तु वक्तव्यं याथातथ्यान्न मत्सरात्। यद्यपि दूसरेके दोषोंका कथन करनेमें दोष होता है, तथापि पूछे जानेपर यथार्थरूपसे उसका वर्णन करना चाहिये, ईर्ष्या-द्वेषवश नहीं। [क्रीडाखण्ड २६। ३-४] परस्यानिष्टमिच्छेद्यः स स्वयं निधनं व्रजेत्। जो दूसरेके अनिष्टकी कामना करता है, वह स्वयं मृत्युको प्राप्त होता है। [क्रीडाखण्ड २९। ५९] यस्य स्वभावो यादृक् स्यात्स तथा वर्तते नरः। न जहाति घृष्यमाणश्चन्दनः स्वसुगन्धिताम्॥ कस्तूरीकर्दमयुतः पलाण्डुर्वा निजं गुणम्। जिस व्यक्तिका जैसा स्वभाव होता है, वह वैसा ही व्यवहार करता है। जैसे घिसे जानेपर भी चन्दन अपने सुगन्धरूपी स्वभावको नहीं छोड़ता और कस्तूरीपंकसे सना होनेपर भी प्याज अपने स्वाभाविक गुण दुर्गन्धका त्याग नहीं करता। [क्रीडाखण्ड २२। १२-१३]

३२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] महान् क्षुद्रस्य वाक्यं चेत् कुरुते सोऽपि साधुताम्। प्राप्नोति सर्वलोकेषु कीर्तिं स्फीतां समुत्कटाम्॥ यदि कोई महापुरुष क्षुद्र व्यक्तिके अनुरोध वचनको स्वीकार करता है तो वह भी साधुताको प्राप्त करता है और सभी लोकोंमें अत्यन्त उत्कर्षयुक्त विशद यशको प्राप्त करता है। [उपासनाखण्ड ७८।२०] ईश्वरे सानुकूले कः पीडितुं क्षमते जनम्। यदि ईश्वर अनुकूल हो तो व्यक्तिको मारनेमें कौन समर्थ हो सकता है? [क्रीडाखण्ड ८४।६३] यमीश्वरोऽवति सदा तं हन्तुं यः समीहते। स एव विलयं याति पतङ्ग इव दीपकः॥ भगवान् जिसकी सदा रक्षा करते हैं, उसे जो मारनेकी इच्छा करता है, निश्चय ही वह उसी प्रकार विनष्ट हो जाता है, जैसे दीपकके पास जानेवाला पतिंगा नष्ट हो जाता है। [क्रीडाखण्ड ८६।२९] सन्तः प्राणात्यये प्राप्ते न भाषन्तेऽनृतं क्वचित्। सन्तोंका यह स्वभाव होता है कि वे प्राणोंपर संकट आ जानेपर भी कभी भी मिथ्या वचन नहीं बोलते। [क्रीडाखण्ड ९२।३२] सभायामागतः साधुरसाधुर्दुर्बलो बली। प्रष्टव्यो माननीयश्च नीतिरेषा सनातनी॥ सभामें जो कोई भी आये, चाहे वह साधु हो या असाधु, दुर्बल हो अथवा बलवान्; वह सम्माननीय होता है, उससे कुशल-क्षेम पूछना चाहिये—यही सनातन नीति है। [क्रीडाखण्ड १११।८-९] प्रसङ्गं नैव जानासि यतो वाचस्पतेरपि। अज्ञानात् प्रकृतार्थस्य वचो याति वृथार्थताम्॥ तुम प्रसंगानुकूल बात करना नहीं जानते हो, अज्ञानवश समयके अनुकूल बात न करनेवालेका वचन सर्वथा व्यर्थ हो जाता है, चाहे वह बृहस्पति ही क्यों न हो। [क्रीडाखण्ड १११।२४] नायकेन न हन्तव्यो दूतस्तेनापि नायकः। स्वामीको दूतका वध नहीं करना चाहिये और [ठीक इसी प्रकार] दूतको भी स्वामीका वध नहीं

[दायाँ स्तम्भ] करना चाहिये। [क्रीडाखण्ड १११।३३] अशुभात्कर्मणो दुःखं सुखं स्याच्छुभकर्मणः। अतः सन्तः प्रकुर्वन्ति शुभं कर्म सदादरात्॥ हितं च सर्वजन्तूनां कायेन मनसा गिरा। अशुभ कर्मसे दुःख और शुभकर्मसे सुखकी प्राप्ति होती है, अतः सदाचारी पुरुष सदा ही बड़े आदरपूर्वक शुभ कर्म ही करते हैं और शरीरसे, मनसे तथा वाणीसे सभी प्राणियोंका कल्याण करते हैं। [क्रीडाखण्ड ११७।१७-१८] निरुपाधितया दुःखं यः परस्य निवारयेत्। तद्दुःखदुःखी च पुमान् पुरुषार्थी स भण्यते॥ जो मनुष्य निश्छल भावसे दूसरेके दुःखका निवारण करता है, और उसके दुःखके कारण स्वयं भी दुःखका अनुभव करता है, वह व्यक्ति ही पुरुषार्थी कहा जाता है। [क्रीडाखण्ड ११७।२१] क्षीणे ऋणानुबन्धे च स्त्री पुत्रः पशुरेव च। न तिष्ठति ध्रुवं तत्र कृतः शोको वृथा भवेत्॥ यह निश्चित है कि ऋणका बन्धन छूट जानेपर, स्त्री, पुत्र, पशु—कुछ भी इस संसारमें स्थिर नहीं रहता, अतः शोक करना व्यर्थ है। [क्रीडाखण्ड १२०।२६] यथा काष्ठं काष्ठगतं पूरे स्याच्च वियुज्यते। तद्वज्जन्तुर्वियोगं च योगं च प्राप्नुतेऽवशः॥ जिस प्रकार जलप्रवाहमें बहते हुए दो काष्ठ कभी जुड़ जाते हैं तो कभी अलग हो जाते हैं, वैसे ही [प्रारब्धके कारण] विवश हुआ प्राणी [दूसरे प्राणीके साथ] कभी संयोग तो कभी वियोग प्राप्त करता है। [क्रीडाखण्ड १२०।२७] न लघुर्लघुतामेति पराक्रमयुतोऽपि चेत्। अणुमात्रो दहेद्वह्निः सकलं नगरं महत्॥ यदि पराक्रमी व्यक्ति लघु [आकारवाला] हो, तो भी उसे लघु मानना अनुचित है, वह लघु प्रभाववाला नहीं होता, जैसे अग्निकी चिनगारी अणुवत् हो करके भी विशाल नगरको सम्पूर्णतः जला सकती है। [क्रीडाखण्ड १३७।८]

अङ्क ] * श्रीगणेशपुराण-सूक्तिसुधा * ३३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 वासनासहितादाद्यात्संसारकारणाद् दृढात्। अज्ञानबन्धनाज्जन्तुर्बुद्ध्वायं मुच्यतेऽखिलात् ॥ वासना; जो कि संसारका मूल और दृढ़ कारण है, और वही अज्ञानका बन्धन है, इसे जानकर प्राणी सबसे मुक्त हो जाता है। [क्रीडाखण्ड १४०।२१] क्रियायामक्रियाज्ञानमक्रियायां क्रियामतिः। यस्य स्यात्स हि मर्त्येऽस्मिँल्लोके मुक्तोऽखिलार्थकृत् ॥ क्रियामें अक्रियाका ज्ञान और अक्रियामें क्रियाकी बुद्धि जिसकी होती है, वही इस लोकमें सभी कर्मोंका करनेवाला होकर भी मुक्त हो जाता है। [क्रीडाखण्ड १४०।२४] कर्माङ्कुरवियोगेन यः कर्माण्यपि चेह वा। तत्त्वदर्शननिर्दग्धक्रियमाहुर्बुधा बुधम् ॥ जो कर्मोंके अंकुरसे रहित अर्थात् संकल्प और कामनारहित कर्म करते हैं, तत्त्वके जाननेसे उस बुद्धिमान्‌की सारी क्रियाएँ दग्ध हो जाती हैं, ऐसा पण्डितजन कहते हैं। [क्रीडाखण्ड १४०।२५] निरीहो निगृहीतात्मा परित्यक्तपरिग्रहः। केवलं वैग्रहं कर्माचरन्नायाति पातकम् ॥ जो इच्छारहित, आत्मजित् एवं सम्पूर्ण परिग्रहका परित्याग किये हैं, ऐसे व्यक्ति यदि शरीरनिमित्तक (जीवननिर्वाहार्थ) कर्म भी करें तो उन्हें कुछ पातक नहीं लगता। [क्रीडाखण्ड १४०।२७] अद्वन्द्वोऽमत्सरो भूत्वा सिद्ध्यासद्ध्योः समश्च यः। यथाप्राप्तीह सन्तुष्टः कुर्वन् कर्म न बद्ध्यते ॥ जो द्वन्द्व और ईर्ष्याहीन होकर सिद्धि-असिद्धिमें समान दृष्टि रखते हुए जो कुछ प्राप्ति हो, उसीमें सन्तुष्ट रहते हैं, ऐसे प्राणी कर्म करते हुए भी लिप्त नहीं होते। [क्रीडाखण्ड १४०।२८] सर्वेषां भूप यज्ञानां ज्ञानयज्ञः परो मतः। अखिलं लीयते कर्म ज्ञाने मोक्षस्य साधने ॥ हे राजन्! सब यज्ञोंमें ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है। मोक्षसाधक ज्ञानयज्ञमें सब कर्म क्षीण हो जाते हैं। [क्रीडाखण्ड १४०।३९] भक्तिमानिन्द्रियजयी तत्परो ज्ञानमाप्नुयात्। लब्ध्वा तत्परमं मोक्षं स्वल्पकालेन यात्यसौ ॥ इन्द्रियोंको वशमें करनेवाला भक्तिमान्, तत्पर पुरुष ही ज्ञानको प्राप्त कर सकता है और ज्ञान प्राप्त होनेसे थोड़े समयमें ही वह मुक्तिको प्राप्त हो जाता है। [क्रीडाखण्ड १४०।४७] भक्तिहीनोऽश्रद्दधानः सर्वत्र संशयी तु यः। तस्य शं नापि विज्ञानमिह लोकोऽथ वा परः ॥ जो भक्तिहीन, श्रद्धारहित और सर्वत्र संदिग्ध चित्तवाला है, उसे कल्याणकी प्राप्ति नहीं होती, न ज्ञान होता है तथा उसका इहलोक और परलोक नष्ट हो जाता है। [क्रीडाखण्ड १४०।४८] जेतारः षड्रिपूणां ये शमिनो दमिनस्तथा। तेषां समन्ततो ब्रह्म स्वात्मज्ञानां विभात्यहो ॥ जो काम-क्रोधादि छहों शत्रुओंको जीत चुके हैं, जो शम और दमका पालन करते हैं, उन आत्मज्ञानियोंको सर्वत्र ब्रह्म ही दीखता है। [क्रीडाखण्ड १४१।२५] यो निग्रहं दुर्ग्रहस्य मनसः सम्प्रकल्पयेत्। घटीयन्त्रसमादस्मान्मुक्तः संसृतिचक्रकात् ॥ [हे राजन्!] जो निग्रह करनेमें कठिन इस मनका नियमन करता है, वह घटीयन्त्रके समान घूमनेवाले इस संसारचक्रसे मुक्त हो जाता है। [क्रीडाखण्ड १४२।२०] यं यं देवं स्मरन् भक्त्या त्यजति स्वं कलेवरम्। तत्तत्सालोक्यमायाति तत्तद्भक्त्या नराधिप ॥ भक्तिपूर्वक जिस-जिस देवताको स्मरण करता हुआ प्राणी अपने कलेवरका त्याग करता है, हे राजन्! उनकी भक्ति करनेसे उन्हींके लोकको प्राप्त होता है। [क्रीडाखण्ड १४३।१७] अनन्यशरणो यो मां भक्त्या भजति भूमिप। योगक्षेमौ च तस्याहं सर्वदा प्रतिपादये ॥ हे राजन्! जो अनन्यशरण होकर भक्तिसे मेरा भजन करता है, मैं सदा उसके योगक्षेम (मंगल)-का विधान करता हूँ। [क्रीडाखण्ड १४३।२०] कामो लोभस्तथा क्रोधो दम्भश्चत्वार इत्यमी। महाद्वाराणि वीचीनां तस्मादेतांस्तु वर्जयेत् ॥ काम, लोभ, क्रोध, दम्भ-ये नरकके चार महाद्वार हैं, इस कारण इनको त्यागना चाहिये। [क्रीडाखण्ड १४७।२३]

३४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- भगवान् श्रीगणेशजीकी आरती आरति गजवदन विनायक की। सुर-मुनि-पूजित गणनायक की ॥ टेक ॥ एकदंत शशिभाल गजानन, विघ्नविनाशक शुभगुण-कानन, शिवसुत वन्द्यमान-चतुरानन, दुःख-विनाशक सुखदायक की ॥ सुर० ॥ ऋद्धि-सिद्धि-स्वामी समर्थ अति, विमल बुद्धि दाता सुविमल-मति, अघ-वन-दहन, अमल अविगत-गति, विद्या-विनय-विभव-दायक की ॥ सुर० ॥ पिङ्गल नयन, विशाल शुण्डधर, धूम्रवर्ण शुचि वज्राङ्कुश-कर, लम्बोदर बाधा-विपत्ति-हर, सुर-वन्दित सब बिधि लायक की ॥ सुर० ॥

सम्पादकीय लेख— श्रीगणेशपुराण—एक परिचय

अत्यन्त प्राचीन कालकी बात है, सौराष्ट्रदेशके प्रसिद्ध देवनगरमें शास्त्र-मर्मज्ञ सोमकान्त नामक धर्मपरायण एक नरेश थे। वे अतिशय सुन्दर, विद्वान्, धनवान्, तेजस्वी एवं पराक्रमी थे। उनकी बुद्धिमती, अनिन्द्य सुन्दरी, धर्मपरायणा सती पत्नीका नाम सुधर्मा था। सुधर्माके गर्भसे हेमकण्ठ नामक अत्यन्त सुन्दर, शूर, पराक्रमी एवं विद्या-विनय-सम्पन्न पुत्र उत्पन्न हुआ। हेमकण्ठ अपने माता-पिताके सर्वथा अनुकूल था और वह सोमकान्तके शासन-कार्यमें दक्षतापूर्वक सहयोग प्रदान करता रहता था। रूपवान्, विद्याधीश, क्षेमंकर, ज्ञानगम्य और सुबल नामक पाँच स्वामिभक्त अमात्य भी राजा सोमकान्तकी प्रत्येक रीतिसे सेवा किया करते। सोमकान्तके राज्यमें प्रजा समृद्ध एवं सुखी थी। वह सर्वथा निरापद जीवन व्यतीत करती थी। साधु और ब्राह्मण निश्चिन्त होकर श्रीभगवान्की आराधना किया करते थे। सहसा सोम-तुल्य राजा सोमकान्तको गलितकुष्ठ हो गया। उनके शरीरमें सर्वत्र घाव हो गये। उनसे रक्त और पीब बहने लगा। नरेशने प्रख्यात चिकित्सकोंसे अनेक उपचार करवाये, किंतु उनसे उनको कोई लाभ नहीं हुआ। यशस्वी नरपति अत्यन्त निर्बल तो हो ही गये थे, उनके व्रणोंमें कीड़े पड़ गये और उनसे दुर्गन्ध निकलने लगी। अत्यन्त दुखी होकर देवनगर-नरेशने अपना शेष जीवन अरण्यमें जाकर तपश्चरणमें व्यतीत करनेका निश्चय किया। उन्होंने विधिपूर्वक अपने सुयोग्य पुत्र हेमकण्ठको आचार, धर्म और नीतिकी शिक्षा दी। तदनन्तर उसे राज्य-पदपर अभिषिक्त कर दिया। नरेशने अपने परम बुद्धिमान् एवं राजभक्त क्षेमंकर, रूपवान् और विद्याधीश नामक अमात्यत्रयको युवराजके सहयोगसे सुचारूरूपसे राज्य-संचालनका आदेश प्रदान किया। तदनन्तर राजा सोमकान्तने अत्यन्त श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणोंकी पूजा की। फिर उन्हें विविध प्रकारके व्यंजनोंसे तृप्तकर बहुमूल्य दक्षिणाएँ प्रदान कीं। राजा वनके लिये प्रस्थित हुए तो प्रजावत्सल नरेशके वियोगकी कल्पनासे समस्त प्रजा व्याकुल हो गयी। हेमकण्ठके दुःखकी सीमा नहीं थी। वह प्रजाके साथ रोता हुआ पिताके साथ पीछे-पीछे चल रहा था, किंतु नरेशने अपनी सहधर्मिणी सुधर्मा तथा सुबल और ज्ञानगम्य— दो अमात्योंके अतिरिक्त अन्य सबको समझाकर लौट जानेका आदेश दिया। हेमकण्ठको विवशतः अपनी प्रजाके साथ लौटना पड़ा। चिन्तित, दुखी, पीड़ित, निराश और उदास नरेश अपनी पत्नी सुधर्मा और दोनों अमात्योंके साथ वनके कष्ट सहते चले जा रहे थे। सती सुधर्मा अपने पतिकी निरन्तर सेवा किया करती और दोनों मन्त्री उनके लिये फल-फूल ढूँढ़कर ले आते। इस प्रकार यात्रा करते हुए वे सघन वनमें एक सरोवरके तटपर पहुँचे। सोमकान्त व्रणोंकी पीड़ा और यात्राके कष्टसे लेट गये थे। सुधर्मा उनके चरण दबा रही थी। दोनों मन्त्री फल-मूलके लिये कुछ दूर निकल गये थे। उसी समय

३६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- जल भरनेके लिये कलश लिये एक तेजस्वी मुनिकुमार सरोवरके तटपर पहुँचे। सती सुधर्माने उन मुनिपुत्रसे पूछा—'आप किसके पुत्र हैं और यहाँ कैसे पधारे हैं?' अत्यन्त मधुर वाणीमें ऋषिकुमारने उत्तर दिया— 'मैं महात्मा भृगुकी सती पत्नी पुलोमाका पुत्र हूँ। च्यवन मेरा नाम है। आपलोग कौन हैं और इस निबिड़ वनमें कैसे आये हैं?' अत्यन्त दुखी सुधर्माने मुनिकुमारसे अपना विस्तृत परिचय देते हुए कहा—'महात्मन्! परम प्रतापी, समस्त ऐश्वर्योंका उपभोग करनेवाले मेरे स्वामी पता नहीं, किस कर्मका फल भोग रहे हैं? ऋषि स्वाभाविक दयालु होते हैं। आप दयापूर्वक हमारे कल्याणका कोई उपाय कीजिये।' अत्यन्त दुःखके कारण रानीके नेत्रोंसे आँसू बहने लगे। मुनिपुत्र च्यवनने चुपचाप सरोवरके जलसे कलश भरा और शीघ्रतासे अपने आश्रम पहुँचे। वहाँ महर्षि भृगुने उनसे विलम्बका कारण पूछा तो उन्होंने राजा सोमकान्तकी दुर्दशा और उनकी पत्नीकी अद्भुत सेवाका अत्यन्त करुण वर्णन सुनाया। कृपामय महात्मा भृगुने अपने पुत्रसे कहा—'बेटा! तुम उन लोगोंको यहीं ले आओ।' च्यवन पुनः सरोवर-तटपर पहुँचे। तबतक राजाके दोनों अमात्य भी वहाँ आ गये थे। च्यवनने महारानीसे कहा—'माता! मेरे तपस्वी पिताने आपलोगोंको आश्रममें बुलाया है।' सुधर्मा अत्यन्त प्रसन्न हुई। वह अपने पति एवं सेवकोंसहित मुनिपुत्रके पीछे-पीछे महर्षिके आश्रम- पर पहुँची। महर्षि भृगुका आश्रम अत्यन्त पवित्र एवं सुखद था। उसमें सर्वत्र विविध प्रकारके सुगन्धित पुष्प खिले थे। आश्रममें वृक्षोंपर विविध प्रकारके पक्षी कलरव कर रहे थे। विडाल, नेवला, बाज, मयूर, सर्प, गज, गाय, सिंह और व्याघ्र आदि सभी प्राणी अपना वैरभाव त्यागकर एक साथ सुखपूर्वक रह रहे थे। वेद-पाठ हो रहा था और यज्ञ-धूमसे समस्त आश्रम पावनताका विग्रह बना हुआ था। सोमकान्त, उनकी पत्नी सुधर्मा और दोनों मन्त्रियोंने व्याघ्रचर्मपर आसीन परम तेजस्वी तपस्वी महर्षि भृगुको देखा तो दण्डकी भाँति उनके चरणोंपर गिर पड़े। नरेशने हाथ जोड़कर निवेदन किया—'प्रभो! आपके दर्शनसे मेरे पुण्य उदित हो गये। मैंने जीवनभर धर्मका पालन किया है, किंतु पता नहीं, मेरे किस महान् पातकसे मेरी ऐसी दुर्दशा हो रही है कि मेरा जीवन दुर्बह हो गया है। मेरे सभी प्रयत्न विफल हो गये हैं। अब मैं आपकी शरणमें हूँ। आपके आश्रममें हिंस्र पशुओंने भी अपना सहज वैर त्याग दिया है। दयामय! आप मुझपर दया करें।' नरेशके करुण वचन सुन महर्षि भृगु कुछ क्षणोंके लिये ध्यानस्थ हुए और फिर उन्होंने उनसे कहा— 'राजन्! तुम चिन्ता मत करो। मैं तुम्हें रोगसे छूटनेका उपाय बताऊँगा। अभी तुमलोग यात्रासे थके हुए हो; स्नान, भोजन और विश्राम करो।' वहाँ सबने तेल लगाकर स्नान किया और फिर वे भोजन करने बैठे। अनेक प्रकारके सुस्वादु षड्रस व्यंजन थे। राजा, रानी और अमात्य उक्त पवित्रतम आहारसे पूर्ण तृप्त हुए और फिर परम त्यागी महर्षि भृगुके आश्रममें राज्योचित व्यवस्थासे चकित-विस्मित नरेश अपनी पत्नी एवं सेवकोंसहित सुकोमल शय्यापर विश्राम करने लगे। रात्रि व्यतीत हुई। अरुणोदय हुआ। महर्षि भृगु स्नान, संध्या, जप और होम आदिसे निवृत्त हुए ही थे कि दैनिक कृत्य कर राजा सोमकान्तने अपनी सहधर्मिणी सुधर्मा एवं अमात्योंसहित महामुनिके चरणोंमें प्रणाम किया और हाथ जोड़कर उनके सम्मुख बैठ गये। 'राजन्! पूर्वके जिन कुकर्मोंसे तुम्हें गलितकुष्ठकी यह दारुण यातना सहनी पड़ रही है, उसे बता रहा हूँ; तुम ध्यानपूर्वक सुनो!' करुणहृदय महात्मा भृगु राजा सोमकान्तको उनके पूर्वजन्मका वृत्तान्त सुनाते हुए कहने

अङ्क ] * श्रीगणेशपुराण-एक परिचय * ३७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

लगे—'विन्ध्यगिरिके निकट कोल्हार नामक सुन्दर नगरमें चिद्रूप नामक एक धन-वैभवसम्पन्न वैश्य था। पतिके अनुकूल जीवन व्यतीत करनेवाली उसकी सुन्दरी पत्नीका नाम सुभगा था। तुम उसी सुभगाके पुत्र थे। तुम्हारा नाम था कामद।' एकमात्र पुत्र होनेके कारण माता-पिताने तुम्हारा अतिशय प्रीतिपूर्वक पालन किया। युवक होनेपर कुटुम्बिनी नामक सुन्दरी और सद्धर्मपरायणा युवतीसे तुम्हारा विवाह हुआ। कुटुम्बिनीके गर्भसे तुम्हारे सात कन्याएँ और पाँच पुत्र उत्पन्न हुए। कुछ समय बाद तुम्हारे पिता चिद्रूपका शरीरान्त हो गया। तुम्हारी पतिपरायणा माता सुभगा अपने पतिके साथ सती हो गयी। तुम धनसम्पन्न और पूर्ण स्वतन्त्र थे। दुराचरणमें तुमने अपना सर्वस्व नष्ट कर दिया। यहाँतक कि घर भी बिक गया। तुम्हारी सरला पत्नी समझाती, पर तुम उसकी उपेक्षा कर देते। विवशतः वह अपनी संततियोंके साथ अपने पिताके घर जाकर जीवन- निर्वाह करने लगी। तुम दुराचरण-सम्पन्न सर्वथा निरंकुश थे। बलपूर्वक दूसरेका धन छीनकर मद्य, मांस और परस्त्रीका सेवन करते। तुम्हारी दुष्टता पराकाष्ठापर पहुँच गयी, तब राजाज्ञासे तुम नगरसे निर्वासित कर दिये गये। तुम वनमें पहुँचे। वहाँ तुम दस्यु-जीवन व्यतीत करने लगे। तुमसे भयभीत होकर मनुष्य ही नहीं, पशु भी प्राण बचाकर भागते थे। तुम पर्वतकी गुफामें रहते थे। तुम्हारे श्वशुरने तुमसे भयभीत होकर तुम्हारी पत्नी और बच्चोंको तुम्हारे पास पहुँचा दिया। तुम्हारी पत्नीके पास वस्त्राभरण थे और तुम्हारे पुत्र भी तेजस्वी थे; किंतु तुम रात्रिमें यात्रियोंको लूटकर उनके धन और स्त्रीका उपभोग करते। तुम सर्वथा निर्दय और हृदयहीन हो गये थे। एक बार एक ब्राह्मण अपनी युवती पत्नीके साथ उधरसे जा रहे थे। तुमने उन्हें पकड़ लिया। ब्राह्मणने करुण प्रार्थना की, धर्मोपदेश दिया, पर तुमपर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। तुमने उन दीन ब्राह्मणदेवताका मस्तक उतार लिया। इस प्रकार तुम प्रतिदिन स्त्री, वृद्ध और बालकोंकी निर्दयतापूर्वक हत्या करते ही रहे। तुम सर्वथा विवेक- भ्रष्ट हो गये थे। तुम्हारा यौवन तो हत्या, लूट, परधन एवं पर- दारापहरणमें बीता; पर देखते-ही-देखते वृद्धावस्था आ गयी। तुम निर्बल हो गये। तुम्हारा शरीर काँपने लगा और तुमको अनेक प्रकारके कष्ट होने लगे। इस स्थितिमें तुम्हारा स्वजन या हितैषी कोई नहीं रहा। पुत्र और नौकर आदि सभी तुम्हारा तिरस्कार करते रहते। तुम निरन्तर दुखी रहने लगे। तुमने सोचा, 'अपना शेष धन दान कर दूँ।' तुम्हारी प्रार्थनासे एक ब्राह्मण वनमें गये। उनकी प्रार्थनापर ऋषिगण तुम्हारे पास आये, पर जब तुमने अपना धन उन्हें स्वीकार करनेके लिये आग्रह किया, तो वे तुरंत उलटे पैर वापस चले गये। सबने एक ही बात कही—'तेरे-जैसे अधम, हत्यारे, मद्यप, परस्त्रीगामी एवं क्रूरतम पापात्माका दिया धन लेनेका साहस कौन करेगा?' तुम रोगाक्रान्त थे। मुनियों और ब्राह्मणोंके वचन सुन मन-ही-मन पश्चात्ताप करने लगे। तुम्हारा हृदय हाहाकार कर रहा था, पर कोई वश नहीं था। तुम्हारे पास चाँदी, सोना और रत्नादि अधिक थे। तुमने ब्राह्मणोंके परामर्शसे एक पुरातन गणेश-मन्दिरका जीर्णोद्धार करवाया। मन्दिरके भव्य और आकर्षक बनवानेमें तुम्हारा सारा धन समाप्त हो गया। कुछ तुम्हारी स्त्री और कुछ तुम्हारे पुत्रों और मित्रोंने ले लिया। कुछ ही समय बाद तुम्हारा देहावसान हो गया। यमदूतोंने तुम्हें बड़ी यातना दी। यमके पूछनेपर तुमने पहले पुण्यकर्मोंका फल प्राप्त करना स्वीकार किया। फलतः अत्यधिक कान्तिपूर्ण गणेश-मन्दिरका जीर्णोद्धार करानेके कारण तुम सुन्दर राजा सोमकान्त हुए और तुम्हें अत्यन्त रूपवती धर्मपत्नी भी प्राप्त हो गयी।''

३८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] सर्वथा निःस्पृह, परम वीतराग, दयामूर्ति महर्षि भृगु राजा सोमकान्तको उसके पूर्वजन्मका वृत्तान्त सुना रहे थे, किंतु ऋषि-वचनोंपर उसे विश्वास नहीं हुआ। राजाके मनमें सन्देह उत्पन्न होते ही उनके शरीरसे विविध रंगके पक्षी निकल पड़े और उनके अंग-प्रत्यंग नोच-नोचकर खाने लगे। दुःखसे छटपटाते हुए राजाने महामुनि भृगुसे करुण प्रार्थना की—'मुनिनाथ! आपके इस वनमें पशु भी अपना सहज वैर त्याग देते हैं, फिर आपकी शरणमें आये मुझ कुष्ठीको ये पक्षी कष्ट क्यों दे रहे हैं? आप कृपापूर्वक मेरी रक्षा करें।' 'तुमने मेरे वचनपर सन्देह किया, इस कारण मैंने तुम्हें इतना अनुभव करा दिया। अब ये पक्षी शीघ्र चले जायँगे।' महर्षिने क्षणभर ध्यानस्थ होनेके अनन्तर कहा—'तुम्हारे पातक महान् हैं, तथापि मैं उन्हें दूर करनेका उपाय बताऊँगा।' 'हुं' महामुनि भृगुके उच्चारण करते ही समस्त पक्षी अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर महात्मा भृगुने राजा सोमकान्तको गणेशका 'अष्टोत्तरशतनाम' सुनाया और उससे अभिमन्त्रित जल राजाके शरीरपर छिड़क दिया। उक्त जलका छींटा पड़ते ही राजाकी नासिकासे एक छोटा काले मुखवाला बालक धरतीपर गिर पड़ा। थोड़ी ही देरमें वह अत्यन्त विशाल और भयानक हो गया। उसके मुखसे अग्निकी ज्वालाएँ निकल रही थीं। वहाँ सर्वत्र रक्त और पीब फैल गया। भयाक्रान्त आश्रम- वासियोंको भागते देखकर महर्षि भृगुने उस पुरुषसे उसका परिचय पूछा। उक्त भयानक पुरुषने उत्तर दिया—'मैं प्रत्येक प्राणीके शरीरमें रहनेवाला पापपुरुष हूँ। आपके अभिमन्त्रित जलका छींटा पड़नेसे इस राजाके शरीरसे निकला हूँ। आप मुझे निवास एवं भक्ष्य प्रदान कीजिये; अन्यथा मैं आपके सम्मुख ही सबके साथ इस राजा सोमकान्तको भी खा जाऊँगा।'

[दायाँ स्तम्भ] महामुनि भृगुने वहाँसे हटकर एक शुष्क आम्रवृक्षके कोटरकी ओर संकेत करते हुए उक्त पापपुरुषसे कहा— 'नीच! तू सूखे पत्तोंको खाकर इस कोटरमें रह; अन्यथा मैं तुझे भस्म कर दूँगा।' महामुनि भृगुकी वाणी सुनकर पापपुरुषने उस वृक्षका स्पर्श किया ही था कि पक्षियोंसहित वृक्ष तुरंत जलकर भस्म हो गया। मुनिसे भयभीत पापपुरुष भी उस भस्ममें छिप गया। इसके अनन्तर महर्षि भृगुने राजा सोमकान्तके समीप जाकर कहा—'जब तुम 'गणेशपुराण' सुनना प्रारम्भ करोगे, तब इस भस्मसे पुनः नया आम्रवृक्ष उगेगा। जिस प्रकार यह वृक्ष धीरे-धीरे बढ़ता जायगा, उसी प्रकार तुम्हारे पाप भी नष्ट होते जायँगे।' चकित होकर नरेशने अत्यन्त विनयपूर्वक महर्षिसे पूछा—'मुनिवर! ऐसा पुराण तो मैंने न कहीं देखा और न सुना ही है। वह कहाँ प्राप्त होगा और उसके वक्ता कहाँ हैं?' दयालु मुनि भृगुने कहा—'पहले उसे वेदगर्भ ब्रह्माने महर्षि व्यासको सुनाया था और उनकी कृपासे वह पापनाशक 'गणेशपुराण' मुझे प्राप्त हुआ। तुम तीर्थमें जाकर पहले 'गणेशपुराण'-श्रवणका संकल्प कर लो।' महर्षि भृगुकी आज्ञासे राजा सोमकान्तने प्रख्यात भृगुतीर्थमें स्नान किया और फिर पवित्र मनसे हाथमें जल लेकर संकल्प किया—'मैं श्रद्धा और विधिपूर्वक गणेशपुराण-श्रवण करूँगा।' राजाके आश्चर्यकी सीमा नहीं थी। संकल्पका जल धरतीपर छोड़ते ही वे पूर्णतया रोगमुक्त होकर पूर्ववत् सुन्दर और तेजस्वी हो गये। गलितकुष्ठकी पीड़ाकी बात तो दूर—शरीरपर उसका कोई चिह्न भी कहीं शेष नहीं रहा। हर्षमग्न नरेश महामुनिके समीप पहुँचे तो उनके चरणोंपर गिर पड़े। उन्होंने अत्यन्त विनयपूर्वक कहा—'मुनिनाथ! अत्यन्त आश्चर्यकी बात है कि