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गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

३८४ श्रीगीतगोविन्दम् रति-कालमें वे तुम्हारे कण्ठ-स्वरके साथ ताल देने लगें। मेरे श्रोत्र-युगल जो कोयलकी कूक सुन-सुनकर खिन्न हो रहे थे, उस उद्दीपनसे अतृप्त हो रहे थे, उनमें संगीत समा जाने दो और चिरकालसे सञ्चित इस विरहके अवसादको शमित कर दो। पिक-रव विरहियोंके लिए दुःश्रव होता ही है। मामतिविफलरुषा विकलीकृतमवलोकितुमधुनेदम्। मीलतिलज्जितमिव नयनं तव विरमविसृजसि रतिखेदम्॥ क्षणमधुना.... ॥७॥ अन्वय—[मयि अकारण-कोपे तव नयनमेव प्रमाणमिति प्रार्थ्यते]—[अयि प्रेयसि] इदं तव नयनम् अधुना अति विफलरुषा (मानापरनाम्ना अकारण-कोपेन) विकलीकृतं (नितरां क्लेशितं) माम् अवलोकितुं (द्रष्टुं) लज्जितं (सलज्जमिव) मीलति (मुद्रितं भवति) [अन्योऽपि यः कश्चित् निरपराधं कुपित्वा व्याकुलीकरोति सोऽपि तन्मुखावलोकने लज्जितो भवतीत्यभिप्रायः]; तर्हि अधुना] विरम (रोषात् निवर्त्तस्व) [ततश्च] रतिखेदं (सुरत-वाम्यं) विसृज (त्यज) ॥७॥ अनुवाद—हे मानमयी! तुम अकारण ही मेरे प्रति अभिमान कर व्याकुल हो रही हो, देखो तुम्हारे लोचनद्वय मेरी ओर देखकर अर्द्धनिमीलित हो रहे हैं। अब तुम मेरे प्रति वाम्यभावका परित्याग करो। पद्यानुवाद— लाज भरे ये नेत्र देखने खुलते हैं—झप जाते। मान निगोड़ेके कारण हम, दो न एक हो पाते॥ बालबोधिनी—हे राधे! तुम्हारी ये आँखें सदैव व्यर्थके क्रोधसे मुझे ऐसे देखती थीं कि मैं व्यर्थ ही व्याकुल हो जाता था। मुझे विकल करनेके लिए तुम मेरे प्रति अकारण रोष दिखाया करती थीं। तुम्हारी इस उत्तेजनासे तो मैं

द्वादशः सर्गः—सुप्रीत-पीताम्बरः ३८५ टूक-टूक हो जाया करता था, देखो अब तुम्हारी दृष्टि मुझ पर प्रेम वर्षण कर रही है, क्रोधसे भरी दृष्टि अब स्वयं ही सलज्ज हो रही हैं, अब इन नेत्रोंके निरर्थक उन्मीलनका परित्याग कर दो। मुझ पर प्रसन्न हो जाओ और उत्साहसे भरकर रतिजन्य खेदका परित्याग कर दो। श्रीजयदेव-भणितमिदमनुपद-निगदितमधुरिपु-मोदम् । जनयतु रसिकजनेषु मनोरम रतिरस भाव-विनोदम् ॥ क्षणमधुना.... ॥८॥ अन्वय—अनुपद-निगदित-मधुरिपु-मोदं (अनुपदं प्रतिपदं निगदितः विवृतः मधुरिपोः श्रीकृष्णस्य मोदः हर्षः यत्र तादृशं) इदं श्रीजयदेव भणितं (श्रीजयदेव कथित गीतं) रसिकजनेषु (श्रीकृष्णभक्तजनविशेषेषु) मनोरम-रतिरसभावविनोदं (मनोरमे रतिरसे यो भावः तदास्वादरूपः तेन यो विनोदः हर्षः तं) जनयतु ॥८॥ अनुवाद—पद-पद पर मधुरिपु श्रीकृष्णके आनन्द विनोदका वर्णन करनेवाले जयदेव कवि द्वारा रचित यह गीत रसिक जनोंमें मनोरम-रति-रस-भाव विनोदको उत्पन्न करे। पद्यानुवाद— माधव कर मनुहार प्रियासे रति-विलास-रस भूले। जन-रञ्जक मधुमय लीला गा कवि 'जय' मनमें फूले ॥ बालबोधिनी—प्रस्तुत अष्टपदी 'मधुरिपुमोदविद्याधर-लीला' में कवि जयदेवने श्रीमूसूदनके प्रमोद-आनन्द-वर्द्धनका निरूपण किया है। यह गीत रसिकोंमें मनोहर रति-रस-आनन्दकी सृष्टि करे। रसिकजनोंमें रति-रस अथवा केलि-रसकी अनुपमता एवं उज्ज्वलताकी सर्वश्रेष्ठता अंगीकारकी जाती है। इसी राग-रसको ही महामहिम शृङ्गार-रसके नामसे ख्यापित किया गया है। इस प्रकार यह प्रबन्ध श्रीपति-श्रीकृष्णका प्रीतिकारक है, रति-रसके भावको विकसित करनेवाला है, संभोग-शृङ्गारको उन्मीलित करनेवाला है।

“अनुहारमयी राधा।”

द्वादशः सर्गः—सुप्रीत-पीताम्बरः ३८७ प्रत्यूहः पुलकांकुरेण निविडाश्लेषे निमेषेण च क्रीडाकूत-विलोकितेऽधर-सुधापाने कथा-नर्मभिः। आनन्दाधिगमेन मन्मथ-कला-युद्धेऽपि यस्मिन्नभू- दुद्भूतः स तयोर्बभूव सुरतारम्भः प्रियं भावुकः ॥१॥ अन्वय—[एवमुपकरण-सामग्रीं निरूप्य उपक्रम-सूचित- रहःकेलि-पर्यवसानमाह]—यस्मिन् (सुरतारम्भे) निविडाश्लेषे (प्रगाढालिङ्गने) पुलकाङ्कुरेण (रोमोद्गमेन); [तथा] क्रीडाकूत- विलोकिते (क्रीड़ायाम् आकूतविलोकिते सतृष्णावलोकने) निमेषेण; [तथा] अधरसुधापाने कथाकेलिभिः (वाक्चातुर्यैः); [तथाच] मन्मथकलायुद्धे (कामक्रीड़ाविशेषरूप संग्रामे) आनन्दाधिगमेन (चरमसुखप्राप्त्या) प्रत्यूहः (विघ्नः) अपि तयोः (राधाकृष्णयोः) प्रियम्भावुकः (प्रीतिजनकः) अभूत्, सः (तादृशः) सुरतारम्भः उद्भूतः (उत्पन्नः) वभूव। [अन्यत्र आरम्भे मध्ये वा प्रत्यूहो दोषजनक एव; इहतु आदौ मध्येऽपि प्रत्यूहः उत्तरोत्तरक्रीड़ारम्भक एव इति आरम्भस्य अद्भुतत्वं सूचितम्। एतेन केलीनाञ्च परमप्रेमविलासत्वमपि दर्शितम्] ॥१॥ अनुवाद—तदन्तर उन दोनोंका चिराकांक्षित अद्भुत, परमप्रिय सुरत-संग्राम आरम्भ हुआ। उस समय प्रगाढ़ आलिङ्गनमें पुलकायमान होना यथार्थ प्रतीत हुआ, क्रीड़ाके अभिप्रायसे देखनेके समय निमेषपात भी विघ्नीभूत लगता था, अधर-सुधा पान करते हुए केलि-कथाएँ भी कष्टदायिका अनुभूत हुईं, काम-कला-युद्धमें आनन्दका अधिगम भी विघ्न-सा ही प्रतीत हुआ। पद्यानुवाद— अति क्रीड़ा-बाधित आलिङ्गन। मन्द वार्ता-वारित चुम्बन॥ नयन नमित, वञ्चित मुख दर्शन। सुख अति, विस्मृत रति-लीला गुन॥

उमग रही राधा तन-मनमें। विलस रही मृदु सुमन-शयनमें॥ बालबोधिनी-प्रस्तुत श्लोकमें कवि जयदेव वर्णन करते हैं कि अब श्रीराधा और श्रीमाधवमें चिरकालसे आकांक्षित उनका अतिशय प्रिय सुरत प्रारम्भ हुआ। उस रतिक्रीड़ाके आरम्भमें पुलकावलीके प्रस्फुरणसे ही बाधा उत्पन्न होती है। आलिङ्गनके आरम्भमें सात्त्विक रोमाञ्चका होना युक्तिसंगत ही है। रोमाञ्चसे पूर्णालिङ्गनमें बाधा होना स्वाभाविक ही है। काम-क्रीड़ाके लिए विलोकन-अवलोकन करने पर पलकोंका गिरना भी बाधा प्रतीत हुई। अभिप्राय विशेषसे देखनेके कारण पलकोंका गिरना भी असहनीय होने लगा। अधर-सुधा पान करते समय काम-कथाएँ कहना भी अन्तराय प्रतीत हुआ। अधरपानमें प्रियालाप भी सहनीय नहीं होता है। रति-प्रियालापसे अतिशय रुचिर अधरपान लगता है। काम-कलाओंसे पूर्ण युद्धमें आनन्दकी प्राप्ति भी बाधा ही प्रतीत हुई। प्रस्तुत श्लोकमें शार्दूलविक्रीड़ित छन्द है, यथासंख्य अलंकार है, संभोग नामका शृङ्गार रस है, प्रस्तुत श्लोककी भूमिका चन्द्रहास नामक चौबीसवें प्रबन्धकी है।

दोर्भ्यां संयमितः पयोधर-भरेणापीड़ितः पाणिजै राविद्धो दशनैः क्षताधरपुटः श्रोणीतटेनाहतः। हस्तेनानमितः कचेऽधरसुधापानेन सम्मोहितः कान्तः कामपि तृप्तिमाप तदहो कामस्य वामा गतिः ॥२॥ अन्वय-न केवलं प्रत्यूह एव बन्धनादिकमपि क्रीड़ारम्भको वभूवेत्याह]–कान्तः (श्रीकृष्णः) दोर्भ्यां (भूजाभ्यां) संयमितः (नियन्त्रितः) पयोधरभरेण (पयोधरयोः स्तनयोः भरेण) आपीड़ितः (नितरां पीड़ितः) पाणिजैः (नखैः) आविद्धः) विक्षतः) दशनैः (दन्तैः) क्षताधरपुटः (क्षतम् अधरपुटं यस्य तादृशः)

द्वादशः सर्गः- सुप्रीत-पीताम्बरः ३८९ श्रोणीतटेन (नितम्बदेशेन) आहतः (नितरां ताड़ितः) हस्तेन कचे (केशे) आनमितः (वक्रीकृतः) अधर-मधुस्यन्देन (अधरसुधा- क्षरणेन अधरामृतदानेनेत्यर्थः) सम्मोहितः (सम्यक् मोहं प्राप्तः) [सन्] कामपि (अनिर्वाच्यां) तृप्तिं आप (प्राप्तवान्); अहो (आश्चर्यम्) तत् (तस्मात्) कामस्य गतिः (स्वरूपं) वामा (विचित्रा)। [कान्तया संयमनादिभिः परिभूतोऽपि कान्तः कामपि अनिर्वचनीयां तृप्तिं प्राप्तस्तदतीवाद्भुतमेवेति भावः] ॥२॥ अनुवाद-राधिकाकी बाहोंसे बँधे, पयोधर-भारसे दबे, पाणिज अर्थात् नखोंसे बिद्ध किये गये, दन्तोंसे क्षत किये गये अधरवाले, कटि-तट (नितम्ब) से आहत, हाथोंसे केश पकड़कर नमित किये गये, अधर-मधु-धारासे सम्मोहित प्रिय कान्त श्रीकृष्ण किसी लोकोत्तर आनन्दको प्राप्त हुए। इस प्रकार कामदेवकी गतिको अति कुटिल कहा गया है। पद्यानुवाद- बाहु-बद्ध, कुचसे आपीड़ित। दशन-अधर क्षत, श्रोणी ताड़ित॥ कर पंकज कल कुच ध्रुव धारित। रति-गति वामा (जग अपवारित)॥ उमग रही राधा तन-मनमें। विलस रही मृदु सुमन-शयनमें॥ बालबोधिनी-प्रस्तुत पद्यमें कवि जयदेव विपरीत रतिका वर्णन करते हुए कह रहे हैं कि कान्त श्रीकृष्णने किसी वाणीसे अगोचर तृप्तिको प्राप्त किया, इसीसे कहा जाता है कि कामकी गति वाम है, लोक-पथसे अतीत है। वामत्व रसान्तरके आविर्भावसे हुआ है। मानो अपराधीको वीर रसका आश्रय लेकर क्रमसे संयमन, पीड़न, बेधन, क्षताहत, नमन और सम्मोहनकी अवस्था तक पहुँचाया है। उत्साहके स्थिर होनेपर भी काम-युद्धसे विरत नहीं होते। श्रीराधाने विपरीत रतिके माध्यमसे श्रीकृष्णको अनेक प्रकारसे

३९० श्रीगीतगोविन्दम् दण्डित-पीड़ित किया। अपनी भुजाओंके बन्धनमें उनको बाँध लिया। पयोधरोंके भारसे उनको समस्त रूपसे दबाकर पीड़ित किया, नखोंसे उनको क्षत-विक्षत किया, दाँतोंसे उनके अधर-पुटको दंशित कर लिया, नितम्बोंसे उनको आस्फालित किया, प्रताड़ित किया, हाथोंसे बालोंको पकड़ लिया, अधरोंकी मधुधाराको पान करती हुई सम्मोहनको प्राप्त करा दिया। कितना आश्चर्य है! प्रस्तुत श्लोकमें शार्दूल-विक्रीड़ित छंद तथा रसवदलङ्कार है। कुछ विद्वान इसे 'कामिनीहास' नामक प्रबन्धकी भी संज्ञा देते हैं। माराङ्के रति-केलि-सङ्कुल-रणारम्भे तया साहस- प्रायं कान्तजयाय किञ्चिदुपरि प्रारम्भि यत्सम्भ्रमात्। निष्पन्दा जघनस्थली शिथिलता दोर्वल्लिरुत्कम्पितं वक्षो मीलितमक्षि पौरुषरसः स्त्रीणां कुतः सिध्यति ॥३॥ अन्वय—[तत्क्रीड़ाविशेषमाह]—माराङ्के (केलिपक्षे—मारः मदनः अङ्कः चिह्नं यत्र; रणपक्षे—मारः मारं अङ्कः चिह्नं यत्र तस्मिन्) रतिकेलिसङ्कुलरणारम्भे (रतिकेलिरेव सस्कुलरणः परस्पराहत-संग्रामः तस्य आरम्भे) तया (श्रीराधया) कान्तजयाय (कान्तस्य पराभवाय) उपरि (कान्तस्येति शेषः) साहसप्रायं (साहसबहुलं) यत्किञ्चित् (अनिर्वचनीयं) प्रारम्भि (उपक्रान्तं) तेन (वैपरीत्येन हेतुना) सम्भ्रमात् (सम्भ्रम-जनितात् आयासात् इत्यर्थः) [श्रीराधायाः] जघनस्थली निस्पन्दा [जाता], दोर्वल्लिः (भुजलता) शिथिलता (श्लथा आलस्यजड़ा इति यावत्) वक्षः उत्कम्पितं (उच्चैः कम्पितं), [तथाच] अक्षि (नेत्रयुगलं) मीलितम् (सङ्कुचितम्) [अभूत्]; [युक्तञ्चैतत्] स्त्रीणां (अवलानां) पौरुषरसः (पुरुष-सम्पाद्यव्यापारः) कुतः सिध्यति ॥३॥ अनुवाद—सुरत-क्रीड़ारूपी संग्रामके प्रारम्भ होनेपर श्रीराधाने काम-स्मर अभिनिवेशके कारण साहससे भरकर अपने कान्त पर विजय प्राप्त करनेके लिए कुछ समय तक श्रीकृष्णके

द्वादशः सर्गः—सुप्रीत-पीताम्बरः ३९१

वक्षस्थल पर सम्भ्रमपूर्वक जो विपरीत रति आरम्भ की, उससे उनकी जघनस्थली निष्पन्द हो गयी, बाहें शिथिल हो गयीं, वक्षःस्थल जोर-जोरसे काँपने लगा, आँखें बंद हो गयीं—भला स्त्रियोंका पौरुष-रस-अभिलाष कैसे सफल हो सकता है! बालबोधिनी—जैसा कि पूर्वोक्त वर्णन करते हुए आ रहे हैं, उसी वीरसंवलित शृङ्गारकी विवृत्ति करते हुए कहते हैं। इस श्लोकके पूर्व श्लोकसे ही युक्त करना चाहिए। रति-केलिसे संकुल रणके आरम्भमें वाम अंगमें वर्तमान श्रीराधाके द्वारा सम्भ्रमपूर्वक स्मर-समर अभिनिवेशसे संयम आदिके द्वारा कान्त पर विजय प्राप्त करनेके लिए जो कुछ भी साहस किया, इससे वे पूर्ण रूपसे थक गयीं। जघन-स्थलीके निष्पन्द होनेसे वह चलनेमें असमर्थ हो गयीं। दोनों भुजाओंकी शिथिलताके कारण वे बन्धन-प्रहार करनेमें असमर्थ हो गयीं। वक्षस्थल जोर-जोरसे कम्पित होने लगा। आँखें बन्द हो गयीं और देखनेमें असमर्थ हो गयीं। किसीने ठीक ही कहा—स्त्रियाँ अबला होती हैं, उनमें वीर रस किस प्रकारसे आ सकता है? पौरुषत्वको अबलाएँ प्राप्त नहीं कर सकतीं। प्रस्तुत श्लोकको कुछ विद्वानोंके द्वारा 'पौरुषप्रेम विलास' नामक प्रबन्ध माना गया है। इसमें शार्दूलविक्रीड़ित छंद, संभोग-शृङ्गार रस तथा विशेषोक्ति अलंकार है। तस्याः पाटल-पाणिजाङ्कितमुरो निद्राकषाये दृशौ निर्धौतोधर-शोणिमा विलुलिताःस्रस्तस्रजो मूर्धजाः। काञ्चीदाम दरश्लथाञ्चलमिति प्रातर्निखातै दृशो- रेभिः कामशरैस्तदद्भुतमभूत्पत्युर्मनः कीलितम् ॥ ४ ॥ अन्वय—[अथ सुरतान्ते चिह्नशोभित-वपु-दर्शनेन प्रियस्य प्रेमोत्सवमाह]—तस्याः (राधायाः) उरः (वक्षःस्थलं) पाटल- पाणिजाङ्कितं (पाटलैः पाटलकुसुमवत् श्वेतरक्तैः पाणिजैः

३१२ श्रीगीतगोविन्दम् नखैः अङ्कितं), दृशौ (नयने) निद्राकषाये (निद्रावेशेन कषाये लोहिते) अधर-शोणिमा, (अधरस्य शोणिमा लौहित्यं) निर्धौतः (बहुशः चुम्बनादिना क्षालितः); मूर्द्धजाः (केशाः) विलुलिताः (आलुलायिताः); [तथा] स्रस्तस्रजः (स्रस्ताः बन्धनशैथिल्यात् इतस्ततोगताः स्रजः मालाः येभ्यः तादृशाः); काञ्चीदाम (मेखला) दरश्लथाञ्चलम् (ईषत्श्लथप्रान्तभागम्); इति (इत्थं) प्रातः (प्रभाते) दृशोः (नेत्रयोः) निखातैः (प्रोथितैः) एभिः कामशरैः (नखाङ्क-जागरण-चुम्बनादिरूपैः मदन-बाणैः) पत्युः (कान्तस्य) मनः कीलितं (बिद्धम्), अहो तत् अद्भुतम् (आश्चर्यम्) अभूत्। [अन्यत्रार्पितशरैरन्यद् विद्धमित्याश्चर्यम्] ॥४॥ अनुवाद—श्रीराधाका उर-स्थल नखोंसे अंकित होनेके कारण पाटल वर्णका हो रहा था, निद्राके अभावसे उसकी दृष्टि लाल-लाल हो रही थी, अधरोंकी लालिमा चुम्बनसे नष्ट हो गयी थी, केशोंमें ग्रथित पुष्पमाला कुम्हला गयी थी, कमरकी करधनी शिथिल हो गयी थी, उसके समीपके वस्त्र खुल गये थे—इस प्रकार पाँच बाण जो प्रातःकाल श्रीकृष्णके नेत्रोंमें थे, उनको श्रीराधामें देखकर श्रीकृष्णका मन पुनः कामदेवके बाणोंसे कीलित हो गया। कैसी आश्चर्यकी बात है! बालबोधिनी—संभोग-लीलाका वर्णन करते हुए कवि जयदेव कहते हैं कि सम्भोगके अन्तमें श्रीराधाके पाँचों काम-शरोंके द्वारा श्रीकृष्ण कीलित हो गये। कितनी अद्भुत बात है! प्रातःकाल इन बाणोंके प्रभावसे श्रीकृष्णमें पुनः काम उद्भूत हो गया। प्रियाजुके किन अंगोंमें पञ्च बाणोंको देखकर श्रीकृष्णमें काम उत्पन्न हुआ? इसका निदर्शन करते हुए कवि कहते हैं— (१) पलाश पुष्प बाण—कामक्रीड़ामें श्रीराधाके वक्षःस्थल पर रक्त-कमलके समान अपने नखोंसे नखक्षत किया था। अतः पलाश पुष्प-बाण है।

द्वादशः सर्गः—सुप्रीत-पीताम्बरः ३९३ (२) कमल पुष्प-बाण—रात्रिमें सो न पानेके कारण आँखोंमें कषाय हो रहा था, आँखें लाल-लाल हो रही थीं, अतः कमल पुष्प-बाण है। (३) बन्धुजीव पुष्पबाण—श्रीराधाके अधरोंकी लालिमा प्रक्षालित हो गयी थी, अतः बन्धुजीव पुष्पबाण है। (४) मालती पुष्प-बाण—रति-क्रीड़ामें केशोंके मर्दनसे पुष्पमाला मुरझाकर निपतित हो गयी थी, अतः मालती पुष्पबाण है। (५) कुसुमास्त्रबाण—श्रीराधाकी मेखला और अञ्चल शिथिल हो गये थे, इससे कामदेवके सुवर्ण जातीय चम्पा आदि बाणोंको सूचित किया है। इन श्रीराधाके अङ्गोंमें विद्यमान पुष्पबाणोंको देखकर श्रीकृष्णका मन भी कीलित हो जाना स्वाभाविक ही था। इन बाणोंने श्रीकृष्णके नेत्रोंके माध्यमसे उनके मनको भी आहत कर दिया। प्रस्तुत श्लोकको ‘कामाद्भुताभिनवमृगाङ्क लेख’ नामक प्रबन्ध माना गया है। वही शार्दूलविक्रीड़ित छंद है और अद्भुतरसोपबृंहित शृङ्गार रस है। व्यालोलः केशपाशस्तरलितमलकैः स्वेदलोलौ कपोलौ क्लिष्टा दष्टाधरश्रीः कुचकलशरुचा हारिता हारयष्टिः। काञ्चीकाञ्चिद्गताशां स्तनजघनपदं पाणिनाच्छाद्यसद्यः पश्यन्ती सत्रपा मां तदपि विलुलित स्रग्धरेयं धिनोति ॥५ ॥ अन्वय—[यद्यपि श्रीराधायाः] केशपाशः व्यालोलः (श्लथः विकीर्ण इत्यर्थः) अलकैः (चूर्णकुन्तलैः) तरलितं (स्वस्थानात् भ्रंशितं); कपालौ (गण्डौ) स्वेदलोलौ (स्वेदेन घर्मजलेन लोलौ व्याप्तौ); दष्टाधरश्रीः (दशन-क्षताधर-शोभा), क्लिष्टा (क्षता); कुचकलस-रुचा (स्तनकुम्भयोः रुचा कान्त्या) [स्पर्द्धयेव] हारयष्टिः (मुक्ताहारः) हारिता (परिभूता); काञ्ची (मेखला)

३९४ श्रीगीतगोविन्दम् काञ्चीत् आशां (दिशं) गता; तदपि (तथापि) इयं (श्रीराधा) सद्यः (सपदि) पाणिना (करेण) स्तन-जघन-पदम् आच्छाद्य विलुलित-स्रग्धरा (विमर्दित माल्यधारिणी अपि) सत्रपं (रसावेश- शैथिल्ये निजाङ्गावलोकनात् आत्मनः क्रीड़ाविशेषावेशकलनात् सलज्जं यथा तथा) मां पश्यन्ति [सती] धिनोति (अत्युत्सुकं करोति) [वसनादिव्यतिरेकेण केवलाङ्गशोभादर्शनात् प्रीणनमिति ज्ञेयम्] ॥५॥ अनुवाद—जिनका केशपाश बिखर गया था, अलकावली चंचल हो गयी थी, कपोलयुगल स्वेदसे आर्द्र हो गये थे, अधरश्रीकी शोभा निरस्त हो गयी थी, कुच-कलशकी शोभासे मुक्ता-हारावली पराजित हो गयी थी, करधनीकी कान्ति हताश हो गयी थी; प्रातः ऐसी अवस्था पर क्लान्तश्रान्त श्रीराधा अपने हाथोंसे सद्यः वक्षोज एवं उरुद्वयको ढकने लगी, लज्जापूर्वक श्रीकृष्णको देखती हुई वह अपनी मुग्धकारिणी कान्तिसे श्रीकृष्णको आनन्दकारिणी जान पड़ रही थीं। बालबोधिनी—श्रीराधा रतिकालमें परिमर्दित होकर श्रान्त- क्लान्त हो गयी थीं। जैसे ही प्रातःकाल हुआ, वह लज्जापूर्वक जल्दी-जल्दी अपने अङ्गोंको आच्छादित करने लगीं। आच्छादित करती हुई वह श्रीकृष्णको देख रही थीं और अपनी मुग्ध-कान्तिसे श्रीकृष्णका मन मोह रही थीं। उनका कबरी-बन्धन खुल गया था, अलकावली इधर-उधर बिखर रही थी। कपोलयुगल पर स्वेद सूख जाने पर अनेक धब्बे पड़ गये थे, बिम्ब-अधरोंकी कान्ति धूमिल हो गयी थी, स्तन-कलशोंकी कान्तिके पुरःसरमें हार एवं काञ्चीकी कान्ति हताश हो गयी थी। कञ्चुकके अभावसे हारकी शोभा फीकी पड़ गयी थी और विवस्त्र होनेसे मेखलाकी कान्ति भी धूमिल हो गयी। प्रस्तुत पदमें स्रग्धरा छन्द है।

द्वादशः सर्गः—सुप्रीत-पीताम्बरः ३९५ ईषन्मीलितदृष्टि मुग्धविलसत्सीत्कारधारावशा- दव्यक्ताकुलकेलिकानुविकसदन्तांशुधौताधरम् । शान्तस्तब्धपयोधरं भृशपरिष्वङ्गात्कुरङ्गीदृशो हर्षोत्कर्षविमुक्तनिःसहतनोर्धन्यो धयत्याननम् ॥६॥ अन्वय—श्वासोन्नद्ध-पयोधरोपरि-परिष्वङ्गी (श्वासेन उन्नद्धयोः स्फीतयोः पयोधरयोः उपरि परिष्वङ्गः आलिङ्गनं विद्यते यस्य तादृशः) धन्यः (आत्मानं धन्यं मन्यमानः सौभाग्यशाली जनः) हर्षोत्कर्ष-विमुक्तिनिःसहतनोः (हर्षोत्कर्षस्य आनन्दातिशयस्य विमुक्त्या प्रसृत्या निःसहा धर्त्तुमशक्या तनुर्यस्याः तादृश्याः) कुरङ्गीदृशः (मृगलोचनायाः) [कान्तायाः] मीलद्दृष्टि (मीलन्ती सङ्कुचन्ती दृष्टिः यत्र तत् आवेशवशात् मुदितलोचनविशिष्ट- मित्यर्थः) मिलत्कपोलपुलकं (कपोल-पुलक-समन्वितं) शीत्कारधारावशात् (शीत्कारस्य या धारा अनवच्छिन्नता तस्या वशात्) अव्यक्ताकुल-केलि-काकु-विकसदन्तांशु-धौताधरं (अव्यक्ता अपरिस्फुटा आकुला असम्बन्धा या केलिषु काकुः तया विकसद्भिः दन्तांशुभिर्दन्त-प्रभाभिः धौतः अधरः यत्र तादृशं) आननं धयति (चुम्बति) ॥६॥ अनुवाद—मृगनयनी श्रीराधाकी आँखें कामकेलिजन्य आनन्दातिशयके कारण कुछ-कुछ बन्द-सी हो रही थीं, अन्य प्रकारके व्यापारको सह सकनेमें असमर्थ शरीरवाली हो गयी थीं, मुहुर्मुहुः सीत्कार करनेके कारण और अव्यक्त तथा आकुल केलि-काकु ध्वनि-विकारसे विकसित दाँतोंकी किरणोंसे उनके अधर प्रक्षालित हो गये थे, प्रगाढ़ आलिङ्गनके कारण उनके पयोधर शिथिल श्वासोच्छ्वासके कारण ईषत् कम्पित हो रहे थे—इस प्रकारके मुखमण्डलको कोई पुण्यशाली ही देख सकता है। बालबोधिनी—कवि कहते हैं कि रतिक्रीड़ामें अत्यधिक हर्षोत्कर्ष प्राप्त कर लेनेके कारण आलिंगन, चुम्बन आदिसे विमुक्त होकर श्रीराधा एक प्रकारसे परमानन्दमें डूब गयीं।

३९६ श्रीगीतगोविन्दम् कामावेशके वशीभूत उनके शरीरने अब किसी भी प्रकारके व्यापारको सह सकनेमें असमर्थता प्रकट कर दी। रतिकालमें उस मृगलोचनाके पयोधर प्रगाढ़ आलिङ्गनके कारण पुलकरहित कठिन और कुछ झुके हुए हो गये। इस प्रकार सुरतान्तमें कान्त श्रीकृष्ण उनके मुखको देखकर पुनरालिङ्गनके द्वारा अधर-पानकी स्पृहा करने लगे। नेत्र कुछ मुकुलित हो गये। विलास-क्रीड़ाके समय उनके द्वारा बार-बार मनोहर सीत्कार करनेके कारण निकलनेवाली अव्यक्त एवं आकुल काकु ध्वनि प्रस्फुटित हुई और दाँतोंकी किरणोंसे अधर-पुट धुल गये। श्रीराधाके इस प्रकारके मुखमण्डलको कोई सुकृतिवान् ही देख सकता है। यह सौभाग्य या तो श्रीकृष्णको अथवा उनकी मञ्जरियोंको ही प्राप्त हो सकता है। प्रस्तुत पदमें शार्दूलविक्रीड़ित छंद, जाति अलंकार, पाञ्चाली रीति, मागधी गीति, भारती वृत्ति और स्थित लययुक्त गान है। श्रीराधा श्रीकृष्णके बीच प्रगाढ़ आलिङ्गनको 'वृक्षाधिरूढ़कम्' आलिङ्गन कहा गया है। [अथ सा निर्गतबाधा राधा स्वाधीनभर्तृका। निजगाद रतिक्लान्तं कान्तं मण्डनवाञ्छया॥] अथ सहसा सुप्रीतं सुरतान्ते सा नितान्तखिन्नाङ्गी। राधा जगाद सादरमिदमानन्देन गोविन्दम् ॥७॥ अन्वय-[एवं प्रियदर्शनानन्दोन्मत्ता प्रियं जगादेति तस्याः स्वाधीनभर्त्तृकावस्थां वर्णयिष्यन् आह]-[स्वाधीनभर्त्तृकालक्षणं यथा-कान्तो रतिगुणाकृष्टो न जहाति यदन्तिकम्। विचित्र- विभ्रमासक्ता सा स्यात् स्वाधीनभर्त्तृका॥ इति साहित्यदर्पणे] सुरतान्ते (सुरतावसाने) नितान्तखिन्नाङ्गी (अतीवक्लान्तावयवा) सा राधा इति (उक्तप्रकारेण) मनसा निगदन्तं (कथयन्तं चिन्तयन्तमित्यर्थः) गोविन्दम् आनन्देन (आनन्दावेशेन) सादरं (यथा स्यात् तथा) इदं (वक्ष्यमाणं वचनं) जगाद (उक्तवती) ॥७॥

द्वादशः सर्गः—सुप्रीत-पीताम्बरः ३९७ अनुवाद—[इसके बाद जिसकी काम-बाधा शान्त हो गयी है, ऐसी स्वाधीनभर्तृका श्रीराधा अपने रति-श्रम-क्लान्त कान्तसे अपने शृङ्गारकी कामनासे बोलीं] तदनन्तर सुरतकालके अन्तमें अति खिन्न अंगोंवाली श्रीराधा अचानक आनन्द और आदरपूर्वक श्रीगोविन्दसे कहने लगीं। पद्यानुवाद— सरस सुरतिके अन्त, अङ्गसे छिन्न भिन्न हो बाला— हरिसे बोल उठी आँखोंमें भर कर मदकी हाला— हे यदुनन्दन! हृदयानन्दन! इतनी अनुनय मेरी पूर्ण करो हे असुरनिकन्दन! (लगा रहे क्यों देरी?) बालबोधिनी—अनन्तर दोनोंके परस्पर आनन्द एवं सन्दोहरूप सुरतके अवसान पर श्रीराधा गोविन्दको प्रोत्साहित करते हुए कहने लगीं। सम्भोगके अवसान पर श्रीराधाके अंग अतिशय रूपसे थक गये थे। श्रीराधाने अपने कान्त श्रीगोविन्दको आनन्दमय देखा और कहा। जब स्वामी प्रीतिपरायण हो तब ही अपनी बात कहना साफल्यपूर्ण होता है—यह नीति है। अतः श्रीराधा सस्मित गोविन्दसे जो कहने लगीं, उसका वर्णन इस काव्यके अगले प्रबन्धमें किया जा रहा है। गीतम् ॥२४॥ रामकरीरागयतित्तालभ्यां गीयते। कुरु यदुनन्दन! चन्दनशिशिरतरेण करेण पयोधरे। मृगमद-पत्रकमत्र मनोभवमङ्गलकलशसहोदरे ॥१॥ निजगाद सा यदुनन्दने क्रीड़ति हृदयानन्दने ॥ध्रुवपदम्॥ अन्वय—हृदयानन्दने (हृदयमानन्दयति स्वचापल्येन क्रीड़नाय उन्मुखं करोतीति हृदयानन्दनः तस्मिन् चित्ताह्लादके) यदुनन्दने

३९८ श्रीगीतगोविन्दम् (श्रीकृष्णे) क्रीड़ति (विलसति सति) [सुरतान्तेऽपि चिक्रीड़िषोदयात् अखण्डलीलात्वमुक्तम्] सा [राधा] [तं प्रति] निजगाद [क्रीड़नसमयेऽपि प्रियप्रेरणात् नित्यस्वाधीनभर्तृकत्वे प्राधान्यं द्योतितम्]।—अयि यदुनन्दन (महाकुलोद्भवत्वेन सर्वातिशायि- नामक-गुण-ख्यापनाय सम्बोधनमिदं) [यदि पुनर्मनोभव-मखारम्भः सम्भवति तदा] [चन्दनादपि] शिशिरतरेण; [शीतलत्वेन अव्यग्रतया करणयोग्यता सूचिता) [तव] करेण अत्र मनोभव-मङ्गल-कलस- सहोदरे (मनोभवस्य कामस्य यः मङ्गलकलसः तस्य सहोदरे तत्सदृशे; मङ्गलकलसोऽपि यथाविधानेन स्थाप्यते, अतस्त्वमपि तथा कुरु इत्यर्थः) [मम] पयोधरे (स्तने) मृगमद-पत्रकं (कस्तूरिका-पत्रावलीं) कुरु (रचय) ॥१॥ अनुवाद—हृदयको आनन्द प्रदान करनेवाले यदुनन्दनके साथ क्रीड़ा करती हुई श्रीराधाने कहा—हे यदुनन्दन! चन्दनसे भी अति शीतल अपने हाथोंसे मनोभवके मङ्गल-कलशके समान मेरे पयोधरों पर मृगमदसे पत्रक-रचना कीजिए। पद्यानुवाद— चन्दन-शिशिर समान करोंसे कुच कलशों पर मेरे, मृगमद पत्रक सुन्दर। सहचर चित्रित करो सबेरे। हे यदुनन्दन! हृदयानन्दन! इतनी अनुनय मेरी, पूर्ण करो हे असुरनिकन्दन! लगा रहे क्यों देरी? बालबोधिनी—प्रस्तुत पदमें हृदयानन्दन ध्रुव पद है। श्रीकृष्ण श्रीराधाके हृदयको आनन्द प्रदान करनेवाले थे। यदुनन्दन—यदुवंशमें उत्पन्न होनेवाले नन्दनन्दन श्रीकृष्णको अपने साथ क्रीड़ा करते देखकर श्रीराधा बोलीं—मुझे अपने हाथोंसे वैसा ही सजा दो, जैसे मैं भी पूरी-की-पूरी कृष्णभावित, कृष्णमयी हूँ। सर्वप्रथम मेरे स्तन-कलशों पर चन्दनके समान शीतल स्पर्शसे कस्तूरीसे पत्रावलीकी रचना करो। मङ्गल-कलश पयपूर्ण होते हैं, सुनील आम्र-पल्लवोंसे सुसज्जित होते हैं, जिन्हें कामदेवकी विश्वयात्राके समय

द्वादशः सर्गः - सुप्रीत-पीताम्बरः ३९९ स्थापित कर दिया जाता है। इस पदसे 'मयूरपदक' नामका नख-क्षत भी व्यञ्जित हो रहा है। यहाँ कस्तूरी-पत्रक चित्रकारीका अनुनय किया जा रहा है। अलिकुल-गञ्जन-सञ्जनकं रतिनायक-शायक-मोचने। त्वदधर-चुम्बन-लम्बित-कज्जलमुज्ज्वलय प्रियलोचने॥ निज.... ॥२॥ अन्वय-अयि प्रिय (प्रीतिभाजन), रति-नायक-शायक-मोचने (रतिनायकस्य मदनस्य सायकान् बाणान् कटाक्षादिरूपान् मोचयतीति तथोक्ते; कज्जलादिकमपि तत्रापेक्षितमस्तीति भावः) [मम] लोचने (नेत्रे) अलिकुल-गञ्जन-सञ्जनकं (अलिकुल- गञ्जनं सञ्जनयति इति तादृशं भ्रमर-निकर-तिरस्कारकमित्यर्थः) त्वदधर-चुम्बन-लम्बित-कज्जलम् (तवाधरचुम्बनेन, लम्बितं गलितं कज्जलं) उज्जलय (उज्जलं कुरु; पूर्ववत् विधेहीत्यर्थः) ॥२॥ अनुवाद-हे प्रिये! रतिनायक कामदेवके सायकोंको छोड़नेवाली मेरी आँखोंका काजल तुम्हारे अधरोंके चुम्बनसे गलित हो गया है, अलि-कुलको भी तिरस्कृत करनेवाले कज्जलको मेरी आँखोंमें उज्ज्वल कीजिए। पद्यानुवाद- रति नायक सायक मोचन ये, लोचन आँजो फिर से, चुम्बन गलित हुआ काजल है, जिस पर भौंरे तरसे। हे यदुनन्दन! हृदयानन्दन! इतनी अनुनय मेरी, पूर्ण करो हे असुरनिकन्दन! लगा रहे क्यों देरी? बालबोधिनी-हे प्रिय! हे हृदयानन्दन! श्रीराधा इस प्रकार आगे कहती हैं कि मेरी आँखोंमें नूतन कज्जल रेखाको आँजो। यह इतनी उज्ज्वल हो कि भ्रमर-समूह भी तिरस्कृत हो जायँ। मेरे ही कटाक्षपातसे कामदेवके बाण

४०० श्रीगीतगोविन्दम् चलते हैं। तुम्हारे द्वारा अधर-चुम्बन करनेसे मेरी आँखोंका काजल फैल गया है। इस पदसे श्रीकृष्णके द्वारा श्रीराधाके नेत्रोंका चुम्बन भी अभिव्यक्त हो रहा है। आप ही तो मेरी आँखोंका अञ्जन हैं। हे मनोहरवेषधारिन्! नयन-कुरङ्ग-तरङ्ग-विकास-निरासकरे श्रुतिमण्डले। मनसिज-पाश विलासधरे शुभवेश निवेशय कुण्डले ॥ निज.... ॥३॥ अन्वय—अयि शुभवेश (सुन्दर-वेशधारिन्), नयन-कुरङ्ग- तरङ्ग-विकास-निरासकरे (नयनमेव कुरङ्गः, तस्य तरङ्गः कुर्दनं तस्य या विकाशः स्फुरणं तस्य निरासं प्रत्याख्यानं करोतीति तस्मिन्) मनसिज-पाश-विलासधरे (मनसिजस्य कामस्य यः पाशः मृग-बन्धनरज्जुः तस्य विलासं शोभां धरतीति तथोक्ते) कुण्डले (सुरतभ्रष्टे इतिभावः) श्रुतिमण्डले (कर्णे) निवेशय (परिधापय)। [शुभकर्माणि कृतवेशस्य तव प्रियत्वात् ममापि तथा वेशकरणं युक्तमित्यभिप्रायः] ॥३॥ अनुवाद—हे शुभवेश ! नयनरूपी कुरङ्ग-तरङ्गके विकासको निरस्त करनेवाले तथा युवकोंके मनको बाँधनेवाले कामदेवके पाशके समान मेरे श्रुतिमण्डल पर कुण्डल धारण कराइये। पद्यानुवाद— मनसिज पाश विलास कुण्डलोंको कानोंमें धारो, हे शुभ अंग! तरंग नयन पर हरिण वृन्दको कारो। हे यदुनन्दन! हृदयानन्दन! इतनी अनुनय मेरी, पूर्ण करो हे असुरनिकन्दन! लगा रहे क्यों देरी? बालबोधिनी—श्रीराधा श्रीकृष्णसे कहती हैं—हे मनोहर- वेषधारिन्! हे प्रिय पीताम्बरधारिन्! हे हृदयानन्दन! हे क्रीड़ापरायण! आप मेरे कानोंमें कामदेवके पाशकी शोभाको धारण करनेवाले कुण्डल पहना दीजिए। मेरे इस श्रुति-मण्डलमें

द्वादशः सर्गः—सुप्रीत—पीताम्बरः ४०१ नेत्ररूपी हिरणकी तरङ्गका जो विकास है, प्रेक्षण-विशेषकी जो विशेष वृत्ति है, उसे भी निरस्त करनेवाले, युवकोंके मनको मोह लेनेवाले कुण्डल पहना दीजिए। इस पदसे नेत्रोंकी श्रुतिगामिता युक्त हुई है। मृगके समान बंकिमता एवं चंचलता द्योतित हुई है। भ्रमरचयं रचयन्तमुपरि रुचिरं सुचिरं मम सम्मुखे। जित-कमले विमले परिकर्मय नर्मजनकमलकं मुखे ॥ निज.... ॥४ ॥ अन्वय—[अयि नाथ] मम सम्मुखे (समक्षमवस्थाय) जितकमले (जितं सुषमा-पराजितं कमलं येन तादृशे) विमले (निर्मले) मुखे सुचिरं (बहुक्षणं व्याप्य) भ्रमरचयं (भ्रमरसमूहं) रचयन्तं (भ्रमर-पंक्तिबुद्धिं जनयन्तं) [अतएव सखीनां] नर्मजनकं (परिहासजनकं नेत्ररञ्जनमिति भावः) अलकं (चूर्णकुन्तलं) परिकर्मय (संस्कुरु विरचय इत्यर्थः) [अत्र मुखस्य कमलत्वेन, अलकस्य च भ्रमरत्वेन निरूपितम्] ॥४॥ अनुवाद—मनोहर और अमल कमलोंको भी जीतनेवाले विमल एवं रुचिर मेरे मुख पर नर्म परिहास जनक भ्रमरोंकी शोभा प्रकाशित करने वाले मेरे मुख पर आप सुन्दर अलकावलीको गूँथिए। पद्यानुवाद— अमल कमल मुख पर पिय बिखरी ये अलकें सुलझाओ, रह-रह झूम चूम उठते अलि, इनको दूर भगाओ! हे यदुनन्दन! हृदयानन्दन! इतनी अनुनय मेरी, पूर्ण करो हे असुरनिकन्दन! लगा रहे क्यों देरी? बालबोधिनी—श्रीराधा श्रीकृष्णसे कहती हैं—हे यदुनन्दन! मेरे मुखकी शोभाने कमलोंको भी जीत लिया है। आप इस मनोहर, विमल एवं अनवद्य मुख पर अलकोंसे प्रसाधन करें। मेरी अलकावली नर्म-परिहास वचनोंकी जननी है और

नित्य निरन्तर पद्मोंके ऊपर घिर आयी भौरोंकी भीड़का भ्रम उत्पन्न करती है। आप ही तो मेरे मुखारविन्दके कुन्तल हैं। प्रस्तुत पदमें अलक भ्रमर पंक्ति के द्वारा मुखपद्मकी उत्प्रेक्षा की गयी है। अतः यहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार है। मृगमद-रस-वलितं ललितं कुरु तिलकमलिक-रजनीकरे। विहित-कलङ्क-कलं कमलानन! विश्रमित-श्रमशीकरे ॥ निज.... ॥५ ॥ अन्वय—हे कमलानन (सरोजवदन) विश्रमित-श्रम-शीकरे (विश्रामिता अपगता श्रमशीकराः श्रमाम्बुकणाः यत्र तादृशे) अलिक-रजनीकरे (अलिकं ललाटं रजनीकरः चन्द्रइव तस्मिन्) मृगमद-रसेन (कस्तूरिका-द्रवेण) वलितं (रचितं) [अतएव] विहित-कलङ्क-कलं (विहिता कृता कलङ्कस्य कला रेखा येन तादृशं ललाटस्य बालचन्द्रत्वेन मृगमदतिलकस्य च कलङ्क- कलात्वेन निरूपितं) तिलकं ललितं (सुन्दरं यथा तथा) कुरु (रचय) ॥५॥ अनुवाद—हे कमललोचन! रतिके श्रमसे उत्पन्न स्वेदबिन्दुओंसे युक्त, मृग-लाञ्छनकी शोभा धारण करनेवाले अर्द्ध-चन्द्रके समान मेरे भाल पर मनोहर कस्तूरीसे सुन्दर तिलक रचना कीजिए। पद्यानुवाद— मृगमद रससे वलित ललित अति तिलक अलिक पर मेरे, रचो, चन्द्रको, भास उठे ज्यों मृगछाया हो घेरे! हे यदुनन्दन! हृदयानन्दन! इतनी अनुनय मेरी, पूर्ण करो हे असुरनिकन्दन! लगा रहे क्यों देरी? बालबोधिनी—श्रीराधा श्रीकृष्णसे कहती हैं—हे कमलबदन! हे हृदयानन! मेरा ललाट चन्द्रमाके समान है, आप उस पर ललित मनोहर तिलक रचना कीजिए। इस तिलकको कस्तूरी—मृगमद रससे ही रचिये। जिस प्रकार अष्टमीका अर्द्धचन्द्र कलङ्क रेखाओंसे सुशोभित होता है, उसी प्रकार

द्वादशः सर्गः-सुप्रीत-पीताम्बरः ४०३ मेरे मुख पर भी मृगलांछनके समान मेरे विशाल भाल पर तिलक स्थापित कीजिए। रति-कालमें प्रवाहित होनेवाले श्रम-जलकण भी अब शुष्क-शान्त हो गये हैं। यहाँ इस पदसे पुनः उद्दीपन विभाव भी सूचित हो रहा है। हे कृष्ण, आप ही तो मेरे सौभाग्यके केन्द्रबिन्दु हैं, आप ही मेरे ललाटके तिलक हैं। मम रुचिरे चिकुरे कुरु मानद ! मनसिज-ध्वज-चामरे। रति-गलिते ललिते कुसुमानि शिखण्डि-शिखण्डक-डामरे ॥ निज.... ॥६॥ अन्वय-अयि मानद (सम्मानप्रद) मानसज-ध्वज-चामरे (मानसजस्य कामस्य यो ध्वजः तस्य चामरे चामरतुल्ये) रतिगलिते (सम्भौगावेगेन विकीर्णे) शिखण्डि-शिखण्डक-डामरे (शिखण्डिनो मयूरस्य शिखण्डकस्य पुच्छस्य इव डामरः आटोपो यस्य तस्मिन्; मानसजध्वजादावाटोपनादिकमपि तदुपयोग्यमेवेत्यर्थः) [अतएव] रुचिरे (स्वभाव-सुन्दरे) ललिते (मनोहरे) मम चिकुरे (कुन्तले) कुसुमानि (पुष्पमाल्यं) कुरु (विनिवेशय) ॥६॥ अनुवाद-हे मानद ! रतिकालमें शिथिल हुए कामदेवकी ध्वजाके चामरके समान तथा मयूर-पुच्छसे भी मनोहर मेरे मनोहर केशोंमें कुसुम सजा दीजिए। पद्यानुवाद- मोर पंख, चामर ध्वज मनसिजसे सुन्दर अलकोंसे, गिरे सुमन क्रीड़ामें, उनको गूँथो चुन पलकोंसे। हे यदुनन्दन! हृदयानन्दन ! इतनी अनुनय मेरी, पूर्ण करो हे असुरनिकन्दन ! लगा रहे क्यों देरी ? बालबोधिनी- श्रीराधा श्रीकृष्णको इस पदमें 'मानद' शब्दसे सम्बोधित करती हैं। मानद अर्थात् मान प्रदान करनेवाले श्रीकृष्ण, अपनी प्रेयसियोंको सम्मान देनेवाले श्रीकृष्ण, 'मानद्यति' अर्थात् मानिनी रमणियोंके मानको खण्डित करनेवाले श्रीकृष्ण !