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गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

२३ बालकाण्ड फलोंमें सर्वश्रेष्ठ मोक्ष कहा गया है। यदि किसीको पहले ही मोक्ष मिल जाय तो अर्थादि तीनों फलोंकी पीछेसे प्राप्ति उसके लिये अनावश्यक होगी। यहाँ मोक्षस्वरूप श्रीरामजीका जन्म प्रथम ही हो चुका है। यदि अर्थ, धर्म पहले सङ्ग रहें, काम, मोक्ष पीछे प्राप्त हों तो क्रम ठीक होगा। जैसे शत्रुघ्न, भरत राजाके साथ अयोध्यासे मिथिला बारातमें गये और लक्ष्मण, श्रीरामजी वहाँ मिले, तब वहाँ चारों फलकी उपमा देना बन गया है—‘नृप समीप सोहहिं सुत चारी। जनु धन धरमादिक तनुधारी ॥’ तथा ‘जनु पाए महिपाल मनि क्रियन्ह सहित फल चारि ॥’ इत्यादि ] ॥८॥ झुण्ड-की-झुण्ड स्त्रियाँ विचित्र थालोंमें आरती सजाकर अपने-अपने कुलके अनुसार बधावा लेकर गाती हुई चलीं ॥९॥ [और बालकको ऐसा आशीर्वाद देने लगीं कि] इन बालकोंकी उन्नतिको सहन न करनेवाले तथा इनसे द्वेष माननेवाले लोग मन-ही-मन मर जायँ और इनके वैरियोंके विषाद- की वृद्धि हो तथा श्रीशङ्कर और पार्वतीजीकी कृपासे ये चारों ही सुन्दर राजकुमार दीर्घजीवी हों ॥१०॥ प्रजाजन प्रसन्न हों, भाँति- भाँतिके उपहारोंके भार लेकर चले और राजभवनके द्वारपर आकर महाराजकी दुहाई देते हुए नाचने और गाने लगे ॥११॥ हाथी, रथ और घुड़सवार-सेनाने अपने-अपने वाहन और साजोंको सजाया, मानो इस समय रतिराज (कामदेव) और ऋतुराज (वसन्त) अपने समाजसहित कोसलपुरमें विहार कर रहे हैं ॥१२॥ घण्टा, घण्टी और पखावजों तथा तासोंका शब्द हो रहा है; झाँझ, बाँसुरी, डफ और करताल बज रहा है तथा नूपुर और मंजीरोंकी मनोहर ध्वनि और हाथोंके कङ्कणोंकी झङ्कार हो रही है ॥१६॥ नट-नटी, नर-नारी

गीतावली २४ अपने-अपने रंगमें भरकर नृत्य कर रहे हैं, मानो कामदेव और रति तरह-तरहके रूप धारणकर सुन्दर ढंगसे सुन्दर नाच नाच रहे हों ॥१४॥ नाना प्रकारके छन्द, प्रबन्ध, गीत, पद, राग और तानके क्रमोंका उद्‌घाटन हो रहा है, जिसे सुनकर गन्धर्व और किन्नरगण प्रशंसा कर रहे हैं तथा देवताओंके विमान भी थकित हो रहे हैं ॥१५॥ केसर, अगर और अरगजा छिड़कते हैं तथा गुलाल और अबीर लगाते हैं, आकाशसे फूलोंकी झड़ी लगी है तथा नगरमें बड़ा कोलाहल और सुन्दर भीड़ हो रही है ॥१६॥ महाराज दशरथको गुरु और देवताओंके आशीर्वादसे वृद्धावस्थामें विधाता अनुकूल हुआ है। इस समय दशरथजीके सम्पूर्ण सुकृतरूप अमृतसमुद्र अपनी मर्यादा छोड़कर उमड़ आये हैं ॥१७॥ ब्राह्मणलोग वेदध्वनि तथा बन्दीलोग विरदावली, जयघोष और मङ्गलगान कर रहे हैं। अतः कामकाजी लोग बाहर-भीतर आते-जाते समय [कोलाहलके कारण एक दूसरेका शब्द न सुन सकनेसे] आपसमें कानसे लगकर बात- चीत करते हैं ॥१८॥ राजमहिषी और नगरकी नारियाँ समान- भावसे मोती और रत्न आदि निछावर कर रही हैं। सारे नगरमें निछावर किये गये मणिगण बिखरे हुए हैं, मानो ज्वार, जौ और धान बिखरे पड़े हैं ॥१९॥ महाराजने परम आनन्दित होकर राजभवनमें सब प्रकारकी वैदिक और लौकिक रीति की है। इस समय कौसल्या, कैकेयी और सुमित्रा तथा सारा रनिवास अति हर्षित हो रहा है ॥२०॥ रानियोंने वस्त्र, मणि और आभूषणादि दिये हैं तथा राजाने [रुपया, अशरफी आदि] बाहरी कोष दान किया है। उन्हें लेकर मागध, सूत, भाट, नट और याचकलोग आपसमें जहाँ

२५ बालकाण्ड

तहाँ लेन-देन कर रहे हैं ॥२१॥ महाराजने विप्रवधू और सुवासिनियों- (पितृगृहमें रहनेवाली विवाहिता लड़कियों) का सम्मान कर अपने आश्रित और पुरवासियोंको वस्त्रादि पहनाकर सम्मानित किया है। अतः वे सब लोग महादेव और विष्णुभगवान्‌को मनाते हुए उन्हें आशीर्वाद दे रहे हैं ॥२२॥ इस समय आठों सिद्धियाँ, नवों निधियाँ और सब प्रकारकी विभूतियाँ महाराजके महलमें टहल कर रही हैं। महाराज दशरथके इस समय और समाजको देखकर सभी लोकपाल सिहा रहे हैं ॥२३॥ अवधवासियोंके इस समयके प्रेम, प्रमोद और उत्साहका वर्णन कौन कर सकता है ? वह शारदा, शेष, गणेश और भगवान् शङ्करकी भी पहुँचके बाहर है और वेद भी उसका पार नहीं पा सकते ॥२४॥ महाराज दशरथके सौभाग्यकी शिवु, ब्रह्मा, मुनि और सिद्धगण भी प्रशंसा कर रहे हैं। इस समय तुलसीदास भी प्रेमसे- उमँग-उमँगकर प्रभुका सोहिला गा रहा है ॥२५॥

राग बिलावल [ ३ ] आजु महामङ्गल कोसलपुर सुनि नृपके सुत चारि भए । सदन-सदन सोहिलो सोहावनो, नभ अरु नगर निसान हए ॥ १ ॥ सजि-सजि जान अमर-किंनर-मुनि जानि समय सम गान ठए । नाचहिं नभ अपसरा मुदित मन, पुनि-पुनि बरषहिं सुमन-चए ॥ २ ॥ अति सुख बेगि बोलि गुरु भूसुर भूपति भीतर भवन गये । जातकर्म करि कनक, बसन, मनि भूषित सुरभि-समूह दए ॥ ३ ॥ दल-फल-फूल, दूब-दधि-रोचन, जुवतिन्ह भरि-भरि थार लए । गावत चलीं भीर भइ बीथिन्ह, बन्दिन्ह बाँकुरे बिरद बए ॥ ४ ॥

गीतावली २६ कनक-कलस, चामर-पताक-धुज, जहाँ-तहँ बन्दनवार नए । भरहिं अबीर, अरगजा छिरकहिं सकल लोक एक रङ्ग रए ॥ ५ ॥ उमगि चल्यौ आनन्द लोकतिहुँ, देत सबनि मन्दिर रितए । तुलसिदास पुनि भरेइ देखियत, रामकृपा चितवनि चितए ॥ ६ ॥ महाराज दशरथके चार पुत्र हुए सुनकर आज कोसलपुरमें अत्यन्त मङ्गल हो रहा है । घर-घरमें सुहावना सोहिला हो रहा है तथा आकाश और नगरमें नगाड़े बजाये जा रहे हैं ॥१॥ भगवान्‌का जन्म जानकर देवता, किन्नर और मुनिजन अपने-अपने यान सजा- कर आये हैं तथा गन्धर्वोंने समयानुकूल गान आरम्भ कर दिया है । आकाशमें अप्सराएँ प्रसन्नचित्तसे नृत्य कर रही हैं और बारम्बार सुमनसमूह बरसाती हैं ॥२॥ महाराज परम आनन्दसे गुरुजी तथा अन्य ब्राह्मणोंको बुलाकर [उन्हें अपने साथ ले] महलके भीतर गये और बालकोंका जातकर्म संस्कार कर उन्हें सुवर्ण, वस्त्र, मणि और सजी हुई गौवोंके समूह दान किये ॥३॥ युवतियोंने थाल भर-भरकर पत्र, फूल, नारियल आदि माङ्गलिक फल, दूब, दही और रोरीलीं और गान करती हुई राजमन्दिरकी ओर चलीं, इससे गलियोंमें भीड़ हो गयी है तथा बन्दीजन महाराजके वंशका अनोखा यश गा रहे हैं ॥४॥ जहाँ-तहाँ सुवर्णमय कलश, चँवर, पताका, ध्वजा और नयी-नयी बन्दनवारें बाँधी गयी हैं । सभी लोग एक ही रङ्गमें रँगकर परस्पर अबीर उड़ाते अरगजा छिड़कते हैं ॥५॥ तीनों लोकोंमें आनन्द उमड़ चला है तथा सभी लोग [निछावर कर-करके] अपने घरोंको खाली किये देते हैं, किन्तु तुलसीदासजी कहते हैं कि रघुनाथजीके कृपादृष्टिसे निहारते ही वे सब पुनः ज्यों-के-त्यों भरे हुए ही दिखायी देते हैं ॥६॥

२७ बालकाण्ड राग जैतश्री [ ४ ] गावैं बिबुध बिमल बर बानी। भुवन-कोटि-कल्यान-कन्द जो, जायो पूत कौसिला रानी ॥ १ ॥ मास, पाख, तिथि, बार, नखत, ग्रह, जोग, लगन सुभ ठानी। जल-थल-गगन प्रसन्न साधु-मन, दस दिसि हिय हुलसानी ॥ २ ॥ बरषत सुमन, बधाव नगर-नभ, हरष न जात बखानी। ज्यों हुलास रनिवास नरेसहि, त्यों जनपद-रजधानी ॥ ३ ॥ अमर, नाग, मुनि, मनुज सपरिजन बिगत बिषाद गलानी। मिलेहि माँझ रावन रजनीचर लङ्क सङ्क अकुलानी ॥ ४ ॥ देव-पितर, गुरु-बिप्र पूजि नृप दिये दान रुचि जानी। मुनि-बनिता, पुरनारि, सुआसिनि सहस भाँति सनमानी ॥ ५ ॥ पाइ अघाइ असीसत निकसत जाचक-जन भए दानी। 'ज्यों प्रसन्न कैकयी सुमित्रहि होउ महेस-भवानी' ॥ ६ ॥ दिन दूसरे भूप-भामिनि दोउ भईं सुमङ्गल-खानी। भयो सोहिलो सोहिले मो जनु सृष्टि सोहिले-सानी ॥ ७ ॥ गावत-नाचत, जो मन भावत, सुख सों अवध अधिकानी। देत-लेत, पहिरत-पहिरावत प्रजा प्रमोद-अघानी ॥ ८ ॥ गान-निसान-कुलाहल-कौतुक देखत दुनी सिहानी। हरि-बिरञ्चि-हर-पुर सोभा कुलि कोसलपुरी लोभानी ॥ ६ ॥ आनँद-अवनि, राजरानी सब माँगहु कोखि जुड़ानी। आसिष दै दै सराहहिं सादर उमा-रमा-ब्रह्मानी ॥ १० ॥ बिभव-बिलास बाढ़ि दसरथकी देखि न जिनहिं सोहानी। कीरति, कुसल, भूति, जय, ऋधि-सिधि तिन्हपर सबै कोहानी ॥ ११ ॥

गीतावली २८ छठी-बारहौं लोक-वेद-बिधि करि सुबिधान बिधानी । राम-लषन-रिपुदवन-भरत धरे नाम ललित गुरग्यानी ॥ १२ ॥ सुकृत-सुमन तिल-मोद बासि बिधि जतन-जन्त्र भरि घानी । सुख-सनेह सब दिये दसरथहि खरि खलेल-थिर थानी ॥ १३ ॥ अनुदिन उदय-उछाह, उमग जग, घर-घर अवध कहानी । तुलसी राम-जनम-जस गावत सो समाज उर आनी ॥ १४ ॥ देवतालोग अति विशुद्ध और सुन्दर वाणीमें गाते हैं—महारानी कौसल्याने जो पुत्र उत्पन्न किया है, वह करोड़ों भुवनोंके कल्याणका मूल ही है ॥१॥ मास, पक्ष, तिथि, वार, नक्षत्र, ग्रह, योग और लग्न सभी बहुत शुभ आ बने हैं । जल, थल, आकाश और साधुओंके हृदय प्रसन्न हैं तथा दसों दिशाओंमें उल्लास भरा हुआ है ॥२॥ पुष्पोंकी वर्षा हो रही है तथा आकाश और नगरमें बधावा हो रहा है । इस समयका हर्ष कहा नहीं जाता । जैसा आनन्द रनिवास और महाराजको है वैसा ही सारे देश और राजधानीको भी है ॥३॥ देवता, नाग, मुनि, मनुष्य और परिजन सभी विषादऔरग्लानिसे रहित होगये हैं तथा इसके साथ ही रावण और राक्षसोंके सहित सम्पूर्ण लङ्कापुरी शङ्कितहोकरव्याकुल हो रही है ॥४॥ महाराजने देवता, पितर, गुरु और ब्राह्मणोंका पूजन कर तथा उनकी रुचि जानकर दान दिये हैं । मुनि- पत्नियों, पुरनारियों और सुवासिनियोंका हजारों प्रकारसे सम्मानकिया है ॥५॥ याचकलोग भरपूर द्रव्य पाकर दानी हो गये हैं, वेद्वारसे निकलते हुए आशीर्वाद देते हैं कि कैकेयी और सुमित्रापर भी भगवान् शङ्कर और पार्वतीजी इस प्रकार प्रसन्न हों ॥६॥ इसके दूसरे ही दिन वे दोनों राजरानियाँ भी [भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्नजीके जन्म लेनेसे

२६ बालकाण्ड मङ्गलकी खानि हो गयीं। इस प्रकार सोहिलेमें सोहिला हो रहा है, मानो सारी सृष्टि ही सोहिलेमें सनी हुई है ॥७॥ सब लोग नाच-गा रहे हैं, यह मेरे मन को भाता है, सुखसे अयोध्याकी शोभा और बढ़ गयी है। सम्पूर्ण प्रजा आनन्दमें अघाकर लोगोंको (उपहार) देती और स्वयं लेती है, लोग स्वयं वस्त्राभूषण पहनते हैं और दूसरोंको पहनाते हैं ॥८॥ गान तथा बाजोंके शोरका कुतूहल देखकर सारी दुनिया सिहा रही है। विष्णु, ब्रह्मा और महादेवजीकी पुरियोंकी भी सारी शोभा कोसलपुरीपर लुब्ध हो रही है ॥९॥ सब राजमहिलाएँ अति आनन्दित हैं, क्योंकि (पति- सुखसे] उनकी माँग और [पुत्रजन्मसे] कोख धन्य हो गयी है। पार्वतीजी, लक्ष्मीजी और ब्रह्माणी भी आशीर्वादि देती हुई आदरपूर्वक उनके भाग्यकी प्रशंसा कर रही हैं ॥१०॥ महाराज दशरथके वैभव और विलासकी वृद्धि देखकर जिन्हें अच्छी नहीं लगी उनपर कीर्ति, कुशल, वैभव और ऋद्धि-सिद्धि सभी कुपित हो गयीं ॥११॥ विधिवेत्ता वसिष्ठजीने लोक और वेदकी विधिसे सब विधान करते हुए छठी- बरहीकी और उन ज्ञानी गुरुदेवने उन बालकोंके राम, लक्ष्मण, शत्रुघ्न और भरत—ये अति सुन्दर नाम रखे ॥१२॥ इस समय विधाताने मोदरूपी तिलोंको सुकृत ( पुण्य ) रूप पुष्पोंकी गन्धमें बसाकर उन्हें यत्नरूप यन्त्रोंमें पेरकर उनसे निकला हुआ सुखरूप स्नेह तो दशरथजीको दिया है तथा [ सांसारिक सुखरूप ] खली और मैल दिक्पालोंको दिये हैं ॥१३॥ प्रतिदिन सम्पूर्ण जगत्में भगवान्‌के

गीतावली ३० आविर्भावका उत्साह और उमङ्ग बढ़ रहे हैं तथा घर-घरमें अवधकी ही कहानी सुनायी देती है। तुलसीदास भी उस समाजको हृदयमें धारणकर रामजन्मका यश गान करता है ॥ १४ ॥ राग केदारा [ ५ ] घर-घर अवध बधावने मङ्गल-साज-समाज। सगुन सोहावने मुदित मन कर सब निज-निज काज ॥ निज काज सजत सँवारि पुर-नर-नारि रचना अनगनी। गृह, अजिर, अटनि, बजार, बीथिन्ह चारु चौकें बिधि घनी ॥ चामर, पताक, बितान, तोरन, कलस, दीपावलि बनी। सुख-सुकृत-सोभामय पुरी बिधि सुमति जननी जनु जनी ॥ १ ॥ चैत चतुरदसि चाँदनी, अमल उदित निसिराज। उडुगन अवलि प्रकाशहीं उमगत आनँद आज ॥ आनँद उमगत आजु, बिबुध बिमान बिपुल बनाइकै। गावत, बजावत, नटत, हरषत, सुमन बरसत आइकै ॥ नर निरखि नभ, सुर पेखि पुरछबि परस्पर सचु पाइकै। रघुराज-साज सराहि लोचन-लाहु लेत अघाइकै ॥ २ ॥ जागिय राम छठी सजनि रजनी रुचिर निहारि। मङ्गल मोदमढ़ी मूरति नृपके बालक चारि ॥ मूरति मनोहर चारि बिरचि बिरञ्चि परमारथमई। अनुरूप भूपति जानि पूजन-जोग बिधि सङ्कर दई ॥ तिन्हकी छठी मञ्जुलमठी, जग सरस जिन्हकी सरसई। किए नींद-भामिनि जागरण, अभिरामिनी जामिनि भई ॥ ३ ॥ सेवक सजग भए समय-साधन सचिव सुजान। मुनिवर सिखये लौकिकौ बैदिक बिबिध बिधान ॥

३१ बालकाण्ड बैदिक बिधान अनेक लौकिक आचरत सुनि जानिकै । बलिदान-पूजा मूलिकामनि साधि राखी आनिकै ॥ जे देव देवी सेइयत हित लागि चित सनमानिकै । ते जन्त्र-मन्त्र सिखाइ राखत सबनिसों पहिचानिकै ॥ ४ ॥ सकल सुआसिनि, गुरजन, पुरजन, पाहुन लोग। बिबुध-बिलासिनि, सुर-मुनि, जाचक, जो जेहि जोग ॥ जेहि जोग जे तेहि भाँति ते पहिराइ परिपूरन किये। जय कहत, देत असीस, तुलसीदास ज्यों हुलसत हिये ॥ ज्यों आजु कालिहु परहुँ जागन होहिँगे, नेवते दिये। ते धन्य पुन्य पयोधि जे तेहि समै सुख-जीवन जिये ॥ ५ ॥ भूपति-भाग बली सुर-बर नाग सराहि सिहाहिँ । तिय बरबेष अली रमा सिधि अनिमादि कमाहिँ ॥ अनिमादि, सादर, सैलनंदिनि बाल लालहि पालहीं । भरि जनम जे पाए न, ते परितोष उमा-रमा लहीं ॥ निज लोक बिसरे लोकपति, घरकी न चरचा चालहीं । तुलसी तपत तिहु ताप जग, जनु प्रभुछठी-छाया लही ॥ ६ ॥ अवधमें घर-घर बधावा हो रहा है; मङ्गलका साज सज रहा है। सुहावने शकुन हो रहे हैं, और सब लोग प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने कार्योंमें जुटे हुए हैं, नगरके नर और नारी अपने-अपने कार्य सँभाल- कर सजाते और अगणित रचनाएँ करते हैं। घर, आंगन, अटारी, बाजार और गलियोंमें अनेक प्रकारसे सुन्दर चौक पूरे गये हैं। चँवर, पताका, मण्डप, कलश और दीपावलीसे सजी हुई, सुख, सुकृत और शोभामयी अयोध्यापुरीको मानो विधाताकी सुमतिरूप जननीने उत्पन्न किया है ॥१॥ आज चैत्र शुक्ला चतुर्दशीके दिन, जबकि निर्मल

गीतावली ३२ निशानाथ प्रकाशमान हैं और दसों दिशाओंमें तारामण्डल जगमगा रहा है, आनन्दकी बाढ़ आ रही है। आज आनन्द उमड़ रहा है। देवतालोग अनेक विमान सजाकर गाते, बजाते, नाचते और प्रसन्न होते हैं तथा आकाशमें आ-आकर फूलोंकी वर्षा करते हैं। पुरवासी आकाशकी ओर देखकर और देवगण नगरकी शोभानिहारकर परस्पर सुखी होते हैं और जी भरकर रघुराज (दशरथ) के साज-सामानकी सराहना करते तथा नेत्रोंका लाभ लूटते हैं ॥२॥ [उधर अन्तःपुरमें सखियोंमें बात हो रही है कि] अरी सखि ! आज रामजीकी छठी है। आज रातभर जागना चाहिये [ छठीके दिन पूतना आदिके आक्रमणका भय होता है। इससे लोग रातभर जागते रहते हैं ] । आजकी रात्रिको, रामकी छठीकी रात होनेसे, तू सुन्दर समझ । चारों राजकुमार क्या हैं, मानो मङ्गल और मोदसे मढ़ी हुई मूर्तियाँ ही विराज रही हैं। विधाताने चार अति मनोहर परमार्थमयी मूर्तियाँ रची हैं और उनकी पूजाके लिये दशरथजीको उपयुक्त समझ उन्हींको ब्रह्मा और शिव दोनोंने मिलकर वे मूर्तियाँ सौंप दी हैं। महाराजके मञ्जुल भवनमें आज उन्हींकी छठी है, जिनके आनन्दसे सम्पूर्ण जगत् आनन्दित हो रहा है। इस समय निद्रारूप स्त्रीने भी जागरण किया है, इसलिये रात्रि बड़ी सुहावनी जान पड़ती है ॥३॥ सेवक और सुजान् सचिवगण भी समयको साधनेके लिये सावधान ही गये हैं [ जिससे कि निर्दिष्ट समयपर मन्त्र-तन्त्रका प्रयोग कर सकें ] क्योंकि गुरुवर वसिष्ठ मुनिने उन्हें सब प्रकारके लौकिक और वैदिक विधानोंका आदेश दिया है। इस समय अनेक वैदिक और लौकिक विधानोंका, जिन्हें उन्होंने सुन रखा है, समझकर व्यवहार कर रहे हैं।

३३ बालकाण्ड उन्होंने बलिदान एवं पूजाकी सामग्री और मूलिकामणि आदि लाकर सजा रक्खी हैं । जिन देवताओं और देवियोंका अपने हितके लिये हृदयसे आदरपूर्वक पूजन करते हैं वे सब लोगोंसे परिचय करके उन्हें यन्त्रों-मन्त्रोंका प्रयोग सिखा देते हैं ॥ ४ ॥ सुवासिनी, गुरुजन, पुरजन, पाहुने, सुर-सुन्दरियाँ, देवता, मुनि और याचक—इन सबमें जो जिनकी योग्य हैं—जिनकी जैसी योग्यता है, महाराजने उन्हें वैसी ही पहरावनी देकर पूर्णकाम किया है और वे भी जय-जयकार करते हुए उन्हें आशीर्वाद देते हैं तथा तुलसीदास- जीके समान ही हृदयमें आनन्द मानते हैं । 'जिस प्रकार आज हुआ है उसी प्रकार कल और परसों भी जागरण होगा' ऐसा कहकर न्योता दिया गया है। वे लोग धन्य एवं पुण्यनिधि हैं जो उस समय आनन्दमय जीवन पाकर जी रहे थे ॥ ५ ॥ बड़े-बड़े देवता और नागगण भी महाराजके सौभाग्यकी प्रशंसा करते हुए प्रसन्न होते हैं। सुन्दरी स्त्रीके रूपमें लक्ष्मीजी और सखीरूपसे अणिमादिक सिद्धियाँ उनकी परिचर्या करती हैं। अणिमादि सिद्धियाँ, शारदा और पार्वतीजी उन बालकोंका लालन-पालन करती हैं। पार्वती और लक्ष्मीजीको जो सुख सारे जन्ममें नहीं मिला वह इस समय प्राप्त हुआ है* । लोकपालगण अपने लोकोंको भूल गये । वे अपने घरोंकी चर्चा भी नहीं चलाते । तुलसीदासजी कहते हैं कि तीनों तापोंसे तपे हुए लोकको मानो प्रभुकी छठीरूप छाया प्राप्त हो गयी है ॥ ६ ॥ *क्योंकि यहाँ भगवान् उन्हें बालरूपसे प्राप्त हुए हैं । गी० ५—

गीतावली ३४ नामकरण राग जैतश्री [ ६ ] बाजत अवध गहागहे आनंद-बधाए । नामकरन रघुबरनिके नृप सुदिन सोधाए ॥ १ ॥ पाय रजायसु रायको ऋषिराज बोलाए । सिष्य-सचिव-सेवक-सखा सादर सिर नाए ॥ २ ॥ साधु सुमति समरथ सबै सानंद सिखाए । जल, दल, फल, मनि-मूलिका, कुलि काज लिखाए ॥ ३ ॥ गनप-गौरि-हर पूजिकै गोबृन्द दुहाए । घर-घर मुद मंगल महा गुन-गान सुहाए ॥ ४ ॥ तुरत मुदित जहँ-तहँ चले मनके भए भाए । सुरपति-सासतु घन मनो मारुत मिला धाए ॥ ५ ॥ गृह, आँगन, चौहट, गली, बाजार बनाए । कलश, चँवर, तोरन, धुजा सुबितान तनाए ॥ ६ ॥ चित्र चारु चौकें रचीं, लिखि नाम जनाए । भरि-भरि सरवर-बापिका अरगजा सनाए ॥ ७ ॥ नर-नारिन्ह पल चारिमें सब साज सजाए । दसरथ-पुर छबि अपनी सुरनगर लजाए ॥ ८ ॥ बिबुध बिमान बनाइकै आनंदित आए । हरषि सुमन बरसन लगे, गए धन जनु पाए ॥ ६ ॥ बरे बिप्र चहुँ बेदके, रबिकुल-गुरु ग्यानी । आपु बसिष्ठ अथरबणी, महिमा जग जानी ॥ १० ॥ लोक-रीति बिधि बेदकी करि कह्यो सुबानी— 'सिसु-समेत बेगि बोलिए कौसल्या रानी' ॥ ११ ॥

३५ बालकाण्ड

सुनत सुआसिनि लै चलीं गावत बड़भागीं। उमा-रमा, सारद-सची लखि सुनि अनुरागीं ॥ १२ ॥ निज-निज रुचि बेष बिरचिकै हिलि-मिलि सँग लागीं। तेहि अवसर तिहु लोककी सुबसा जनु जागीं ॥ १३ ॥ चारु चौक बैठत भई भूप-भामिनि सोहैं। गोद मोद-मूरति लिए, सुकृती जन जोहैं ॥ १४ ॥ सुख-सुखमा, कौतुक कला देखि-सुनि मुनि मोहैं। सो समाज कहैं बरनिकै, ऐसे कबि को हैं? ॥ १५ ॥ लगे पढ़न रच्छा-ऋचा ऋषिराज बिराजे। गगन सुमन-झरि, जय-जय, बहु बाजन बाजे ॥ १६ ॥ भये अमंगल लंकमें, संक-संकट गाजे। भुवन चारिदसके बड़े दुख-दारिद भाजे ॥ १७ ॥ बाल बिलोकि अथरबणी हँसि हरहि जनायो। सुभको सुभ, मोद मोदको, 'राम' नाम सुनायो ॥ १८ ॥ आलबाल कल कौसिला, दल बरन सोहायो। कंद सकल आनंदको जनु अंकुर आयो ॥ १९ ॥ जोहि, जानि, जपि, जोरिकै करपुट सिर राखे। 'जय जय जय करुनानिधे !' सादर सुर भाषे ॥ २० ॥ 'सत्यसंध ! साँचे सदा जे आखर आषे। प्रनतपाल ! पाये सही, जे फल अभिलाषे' ॥ २१ ॥ भूमिदेव देव देखिकै नरदेव सुखारी। बोलि सचिव सेवक सखा पटधारि भंडारी ॥ २२ ॥ देहु जाहि जोइ चाहिए सनमानि सँभारी। लगे देन हिय हरषिकै हेरि-हेरि हँकारी ॥ २३ ॥

गीतावली ३६ राम-निछावरि लेनको हठि होत भिखारी। बहुरि देत तेहि देखिये मानहुँ धनधारी॥ २४॥ भरत लषन रिपुदवनहूँ धरे नाम बिचारी। फलदायक फल चारिके दसरथा-सुत चारी॥ २५॥ भए भूप बालकनिके नाम निरुपम नीके। सबै सोच-संकट मिटे तबतें पुर-तीके॥ २६॥ सुफल मनोरथ बिधि किये सब बिधि सबहीके। अब होइहै गाए सुने सबके तुलसीके॥ २७॥ अवधमें अत्यन्त सुन्दर आनन्द-बधावे बज रहे हैं। महाराजने रघुवंशमें श्रेष्ठ बालकोंके नामकरणकी शुभ तिथियोंका शोधन कराया ॥१॥ राजा दशरथकी आज्ञा पा ऋषिराज वसिष्ठजीने शिष्य, मन्त्री, सेवक, सखाओंको बुलाया और उन्होंने आदरपूर्वक आकर सिर नवाया ॥ २ ॥ गुरुजीने उन सभी साधु, सुमति और सामर्थ्यवान् लोगोंको शिक्षा दी तथा [ सब तीर्थोंका ] जल, [ तुलसी आदि ] पत्र, [आम्र, नारियल आदि] फल और मूलिका नवग्रहकी मणियाँ आदि सारी पूजोपयोगी सामग्री लिखवायीं ॥ ३ ॥ गणेशजी पार्वती और भगवान् शङ्करका पूजन कर गौओंका दोहन कराया गया, घर-घर महान् आनन्दमङ्गल और सुन्दर गुणगान होने लगा ॥४॥ अपनी मनभावनी बात हो रही है—यह देखकर तुरन्त ही मनमें आनन्दित होकर वे लोग जहाँ-तहाँ चल पड़े, मानों इन्द्रकी आज्ञासे मेघगण पवनके साथ मिलकर दौड़ रहे हों ॥ ५ ॥ घर, आँगन, चौक, गली और बाजारोंको सजाया गया। सर्वत्र कलश, चँवर, तोरण, ध्वजा और चँदोवे लगाये गये॥६॥अति विचित्र और सुन्दर चौक

३७ बालकाण्ड पूरे गये; उनमें नाम लिख-लिखकर यह सूचित किया गया कि अमुक चौक अमुकका रचा हुआ है। तालाब और बावड़ियोंको भर-भरकर उनमें अरगजा साना गया है ॥७॥ स्त्री-पुरुषोंने चार ही पलमें सारे साज सजा लिये। इस समय दशरथपुरीने अपनी छबिसे देवपुरीको भी लज्जित कर दिया है ॥८॥ देवता लोग अपने-अपने विमान सजाकर आनन्दपूर्वक आये और हर्षित होकर फूलोंकी वर्षा करने लगे, मानों उन्हें गया हुआ धन फिर मिल गया हो ॥९॥ वेदपाठके लिये चारों वेदके जाननेवाले ब्राह्मण वरण किये गये हैं। उनमें अथर्ववेदी तो स्वयं रघुकुलगुरु ज्ञाननिष्ठ वसिष्ठजी ही हैं, जिनकी महिमा सारा जगत जानता है ॥१०॥ उन्होंने लोकरीति और वेदविधि सम्पन्न कर सुमधुर वाणीमें कहा—'कौसल्यारानीको शीघ्र ही बालक- के सहित बुलवाइये' ॥११॥ यह सुनते ही बड़भागिनी सुवासिनीं स्त्रियाँ उन्हें गाती हुई ले चलीं। यह दृश्य देख और सुनकर पार्वती, लक्ष्मी, शारदा और शची अति प्रेममग्न हुईं ॥१२॥ वे अपनी- अपनी रुचिके अनुसार वेष बनाकर हिल-मिलकर उनके साथ हो गयीं; उस समय मानों तीनों लोकोंका भाग जग गया ॥१३॥ सुन्दर चौकोंमें बैठी हुई रानियाँ गोदमें आनन्दमूर्ति बालकोंको लिये अति शोभायमान हो रही हैं; पुण्यवान् लोग उन्हें देख रहे हैं ॥१४॥ उस समयके सुख, सौन्दर्य और कौतुककी कला देख-सुनकर मुनि- जन मोहित हो जाते हैं, भला ऐसे कौन कवि हैं जो उस समाजका वर्णन कर सकें ? ॥१५॥ फिर ऋषिराज वसिष्ठजी रक्षाऋचा* *ॐ अङ्गादङ्गाभिजायतोऽसि हृदयादभिजायसे । आत्मा वै पुत्रनामासि त्वं जीव शरदां शतम् ॥

गीतावली ३८ पढ़ने लगे। आकाशसे फूलोंकी झड़ी लग गयी तथा जय-जयकारके सहित बहुत-से बाजे बजने लगे ॥१६॥ लङ्कामें अमङ्गल होने लगे, तरह-तरहकी शङ्काएँ और आपत्तियाँ उमड़ आयीं; किन्तु चौदहों भुवनके बड़े-बड़े दुःख और दारिद्र्य दूर हो गये ॥ १७ ॥ अथर्व- वेदी वसिष्ठजीने बालककी ओर देखकर हँसते हुए भगवान् शङ्करको बतलाया [कि तुम्हारे इष्टदेव ये ही हैं] और उनका, शुभके लिये भी शुभ तथा आनन्दके भी आनन्ददायक 'राम' नाम सुनाया ॥ १८ ॥ श्रीकौसल्याजी सुन्दर आलवाल (वृक्षका थाला) हैं, ('राम' नामके) दो अक्षर सुन्दर दल हैं, मानो सकल आनन्दका कन्द ही अंकुरके रूपमें प्रकट हुआ है ॥ १९ ॥ [वसिष्ठजीने जो भगवान् शङ्करको यह सूचना दी थी कि ये आपके इष्टदेव हैं सो] शिवजीने उन्हे देखकर और पहचानकर भगवान्का नाम जपते हुए हाथ जोड़कर सिरके पास लगाया। उस समय देवताओंने आदरपूर्वक 'जय जय जय करुणानिधे' कहा ॥ २० ॥ हे सत्यसन्ध! आपने जो अक्षर कहे हैं वे सर्वदा सत्य हैं। हे प्रणतपाल! आपसे जिन-जिन फलोंकी इच्छा की है उन सभीको प्राप्त किया है॥ २१ ॥ उस समय ब्राह्मण और देवताओंको देखकर महाराज दशरथ बड़े आनन्दित हुए और अपने मन्त्री, सेवक, सखा, पटधारी और भण्डारीको बुलाकर कहा- ॥ २२ ॥ 'जाओ, जिसे जो चाहिये उसे सम्मान और सावधानीसे वही वस्तु दो।' तब वे हृदयमें हर्षित हो याचकोंको ढूँढ़-ढूँढ़कर तथा बुला-बुलाकर दान देने लगे ॥२३॥ सब लोग भगवान् रामकी निछावर लेनेके लिये हठपूर्वक भिखारी बन जाते हैं और फिर वे ही दान देते हुए

३६ बालकाण्ड

दिखाई देते हैं, मानो साक्षात् कुबेर ही हों ॥२४॥ वसिष्ठजीने विचार करके भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्नके भी नाम रखे। महाराज दशरथके चारों पुत्र मानों अर्थ, धर्मादि चारों फलोंको भी फल देनेवाले हैं ॥२५॥ इस प्रकार राजकुमारोंके सुन्दर एवं अनुपम नाम रखे गये। उस समयसे नगरकी स्त्रियोंके सारे शोक और सङ्कट (राजाके पुत्रहीन रहनेका शोक और राजा के बाद पुररक्षकके अभाव से होनेवाला सङ्कट ) दूर हो गये ॥ २६ ॥ विधाताने सबके सभी मनोरथ सब प्रकार पूर्ण कर दिये। अब भी उनका गान या श्रवण करनेसे तुलसीदास तथा सबकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो जायँगी ॥२७॥

दुलार राग बिलावल [ ७ ] सुभग सेज सोभित कौसिल्या रुचिर राम-सिसु गोद लिये। बार-बार बिधुबदन बिलोकति लोचन चारु चकोर किये ॥ १ ॥ कबहुँ पौढ़ि पयपान करावति, कबहुँ राखति लाइ हिये। बालकेलि गावति हलरावति, पुलकति प्रेम-पियूष पिये ॥ २ ॥ बिधि-महेस, मुनि-सुर सिंहात सब, देखत अंबुद ओट दिये। तुलसिदास ऐसो सुख रघुपति पै काहू तो पायो न बिये ॥ ३ ॥ महारानी कौसल्या सुन्दर बालक रामको गोदमें लिये मनोहर शय्यापर सुशोभित हैं और अपने नेत्रोंको सुन्दर चकोर बनाकर बार- बार भगवान्‌का मुखचन्द्र निहारती हैं ॥ १ ॥ कभी शय्यापर लेट कर दुग्धपान कराती हैं, कभी उन्हें हृदय से लगा लेती हैं और कभी भगवान्‌की बाललीला गाती हुई उन्हें हिलाने-डुलाने लगती हैं और

गीतावली ४० प्रेमामृत पानकर पुलकित होती हैं ॥२॥ ब्रह्मा, महादेव, ऋषि और देवता—ये सभी बालकोंकी ओटमें छिपे-छिपे प्रसन्न होकर देख रहे हैं किन्तु तुलसीदासजी कहते हैं कि रघुनाथजीका ऐसा सुख तो [कौसल्याको छोड़कर] और किसीको नहीं मिला ॥३॥ राग सोरठ [ ८ ] ह्वै हौ लाल कबहिं बड़े बलि मैया। राम-लषन भावते भरत-रिपुदवन चारु चारचो भैया ॥ १ ॥ बाल बिभूषन बसन मनोहर अंगनि बिरचि बनैहौं। सोभा निरखि, निछावरि करि, उर लाइ बारने जैहौं ॥ २ ॥ छगन-मगन अँगना खेलिहौ मिलि, ठुमुकु-ठुमुकु कब धैहौ। कलबल बचन तोतरे मंजुल कहि 'माँ' मोहि बुलैहौ ॥ ३ ॥ पुरजन-सचिव, राउ-रानी सब, सेवक-सखा-सहेली। लैहैं लोचन लाहु सुफल लखि ललित मनोरथ-बेली ॥ ४ ॥ जा सुखकी लालसा लटू सिव, सुक-सनकादि उदासी। तुलसी तेहि सुखसिंधु कौसिला मगन, पै प्रेम-पियासी ॥ ५ ॥ 'हे लाल ! मैया बलि जाती है, तुम कब बड़े होगे ? प्यारे राम, लक्ष्मण और भरत, शत्रुघ्न । तुम चारों सुन्दर भाई कब बड़े होगे॥१॥ऐसा कब होगा कि मैं तुम्हारे मनोहर अङ्गोंके लिये बालोचित आभूषण और वस्त्र बना-बनाकर उन्हे सजाऊँगी तथा उस शोभाको देखकर नाना प्रकारकी निछावर कर तुम्हें हृदयसे लगाकर वारी जाऊँगी ॥ २ ॥ तुम सब बालक मग्न हो मिल-जुलकर कब आँगनमें खेलोगे, कब ठुमुक-ठुमुककर दौड़ोगे तथा कब अति मधुर और

४१ बालकाण्ड मनोहर तोतली बोली बोलकर मुझे 'माँ' कहकर बुलाओगे ॥ ३ ॥ अपनी मनोरथरूपी सुन्दर बेलको सफल हुई देख पुरवासी, मन्त्रि- मण्डल, राजा, रानी, सेवक, सखा और सहेलियाँ कब अपने नेत्रोंका लाभ लूटेंगी ?' ॥ ४ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं कि जिस सुखकी लालसामें शिव, शुकदेव और सनकादि विरक्त जन भी लट्टू हुए रहते हैं उसी सुखसमुद्रमें कौसल्या भी मग्न हैं, तो भी उन्हें प्रेमकी प्यास लगी हुई है ॥ ५ ॥ [ ९ ] पगनि कब चलिहौ चारौ भैया ? प्रेम-पुलकि, उर लाइ सुवन सब, कहति सुमित्रा मैया ॥ १ ॥ सुंदर तनु सिसु-बसन-बिभूषन नखसिख निरखि निकैया । दलि तृन, प्रान निछावरि करि करि लैहैं मातु बलैया ॥ २ ॥ किलकनि, नटनि, चलनि, चितवनि, भजि मिलनि मनोहर तैया । मनि-खंभनि-प्रतिबिंब झलक, छबि छलकिहै भरि अँगनेया ॥ ३ ॥ बालबिनोद, मोद मंजुल बिधु, लीला ललित जुन्हैया । भूपति पुन्य-पयोधि उमँग, घर घर आनंद बधैया ॥ ४ ॥ व्हैहैं सकल सुकृत-सुख-भाजन, लोचन-लाहु लुटैया । अनायास पाइहैं जनमफल तोतरें बचन सुनैया ॥ ५ ॥ भरत, राम, रिपुदवन, लखनके चरित-सरित अन्हवैया । तुलसी तबके-से अजहुँ जानिबे रघुबर-नगर-बसैया ॥ ६ ॥ सुमित्रा मैया सब बालकोंको प्रेमपुलकित हो हृदयसे लगाकर कहती हैं—'तुम चारों भैया कब पैरों चलोगे ? ॥ १ ॥ तुम्हारे सुन्दर शरीरोंपर बालोचित वस्त्राभूषण तथा नखसिखकी सुन्दरता देख माताएँ [ नजर न लग जाय, इसलिये ] तिनका तोड़ेंगी और प्राण

गीतावली ४२ निछावर कर बलैया लेंगी ॥ २ ॥ तुम्हारे किलकने, नाचने, चलने, देखने और दौड़कर मिलनेकी मनोहरतासे तथा मणिमय खम्भोंमें तुम्हारा प्रतिबिम्ब पड़नेसे आँगनमें छवि छलकने लगेगी ॥ ३ ॥ तुम्हारे बालविनोदके आनन्दरूप मनोहर चन्द्रकी ललित लीला रूप चन्द्रिकासे महाराज दशरथका पुण्यरूप समुद्र उमड़ेगा और घर- घरमें आनन्द-बधाई होने लगेगी ॥ ४ ॥ सभी लोग नेत्रोंका आनन्द लूटकर पुण्य और सुखके भाजन होंगे तथा तुम्हारी तोतली बोली सुननेवाले अनायास ही अपने जन्मका फल पा लेंगे' ॥ ५ ॥ तुलसी दासजी कहते हैं कि राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्नके चरितरूप सरितामें स्नान करनेवाले जैसे तत्कालीन अवधवासी थे वैसे ही आज के भी समझने चाहिये ॥ ६॥ राग केदारा [ १० ] चुपिरि उबटि अन्हवाइकै नयन आँजे, चिर रुचि तिलक गोरोचनको कियो है। भ्रूपर अनूप मसिबिंदु, बारे बाढ बार बिलसत सीसपर, हेरि हरै हियो है ॥ १ ॥ मोदभरी गोद लिये लालति सुमित्रा देखि देव कहैं, सबको सुकृत उपचियो है। मातु, पितु, प्रिय, परिजन, पुरजन धन्य, पुन्यपुंज पेखि पेखि प्रेमरस पियो है ॥ २ ॥ लोहित ललित लघु चरन-कमल चारु, चाल चाहि सो छवि सुकबि जिय जियो है। बालकेलि बातबस झलकि झलमलत सोभाकी दीयटि मानो रूप-दीप दियो है ॥ ३ ॥